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निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

सुलझावन हारी है आपकी वाणी

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80 | साहिब बन्दगी

सुलझावन हारी है आपकी वाणी

आपके शब्द कभी आपस में विपरीत दिशा में नहीं जाते हैं। वे एक ही लाइन पर होते हैं। और फिर जो बात आप आज कहेंगे, वही मानो 50 साल के बाद भी कहेंगे। कहीं भी आपकी वाणी में बदलाव नहीं मिलेगा। यानी आपकी हर बात में सत्यता है, इसलिए वो कभी बदलती नहीं। महात्मा लोगों को देखें तो वो उलझी हुई बातें कहते हैं। कुछ पहले शिवजी के जयकारे लगाते हैं, फिर अचानक विष्णु जी और फिर हनुमान जी के जयकारे शुरू हो जाते हैं। भक्त लोग उलझन में पड़ जाते हैं कि बाबा जी भक्त किसके हैं और हम किसकी भक्ति करें। कौन बड़ा है, यह समझ नहीं आता है। सच यह होता है बाबा जी खुद उलझे होते हैं, उन्हें खुद मालूम नहीं होता कि कौन बड़ा है, कौन छोटा। साहिब ने इस पर बड़ा प्यारा शब्द कहा है-

मैं कहता हूँ आँखिन देखी, तू कहता कागज की लेखी।
मैं कहता सुलझावन हारी, तू राख्यो उलझाई रे ॥..

कहने का भाव है कि जो खुद नहीं पहुँचा है, जो केवल कागज की लिखी बातें बोल रहा है, वो उलझाने वाली बात ही करेगा। किताबों में तो सबकी बात लिखी है। बस, महात्मा भी सबको महत्व दे रहे हैं। पर जो खुद किसी मुकाम पर पहुँचता है, वो उसी मुकाम की बात करता है और बड़े दावे से कहता है कि मैं वहाँ गया हूँ। फिर वो अपनी बात से पलटता भी नहीं है। क्योंकि उसने वो स्थान खुद देखा होता है। चाहे वो तीन लोक की सीमा में ही हो। कहने का भाव है कि महात्मा लोग आंतरिक दुनिया में बिलकुल भी नहीं गये होते हैं और केवल किताबों से पढ़कर ही दुनिया को उलझाया करते हैं। पर आपकी वाणी उलझाने वाली नहीं है। आप एक परम-पुरुष की भक्ति देते हैं। आपकी शरण में आने वाला इसलिए तो कहीं और भटकता नहीं है। क्योंकि उसे एक सही ठिकाना मिल जाता है। उसकी सब उलझने समास हो जाती हैं।

आपके पास हज़ार रूपया भी नहीं मिलता है

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आपके पास हज़ार रुपया भी नहीं मिलता है

एक बार काबला सिंह जी आपके पास आए, कहा कि मैं अपनी 40 कनाल ज़मीन को बोरिंग कराना चाहता हूँ, बताओ कि किससे करवाऊँ? आपने बता दिया कि फलाने से करवाओ। अचानक आपको एक आश्रम से फ़ोन आया कि यहाँ काम लगा है, सामान ख़त्म हो गया है, पैसे चाहिए और सेवा के लिए लड़के भी भेजो। आपके पास पैसे ही नहीं थे। आपको पता था कि काबला सिंह महीना लगायेगा काम शुरू करने में। तो आपने काबला सिंह को कहा कि मुझे एक लाख उधार दे दो, बाद में जब काम लगवाओगे तो ले लेना। उन्होंने दे दिये। बाद में एक महीने बाद वे आए, कहा कि मशीन लगवाई है, पैसे चाहिए। पूर्णिमा के दिन 10 लाख मिले थे, वे पाँच मिनट में ख़त्म हो गये थे। तब आपको अन्य किसी से लेकर उन्हें देने पड़े।

आपका कोई बैंक में भी पैसा जमा नहीं है। आप कोई भी पैसा अपने पास नहीं रखते हैं। बाकी महात्माओं की तरह न आपका कोई बैंक में खाता है, न आप अपने घर में देते हैं। आपने तो शादी ही नहीं की और न ही अपनी माँ, अपने भाई, अपनी बहन या अपने रिश्तेदारों को ही कभी संगत का एक पैसा ही दिया।

आप संगत का पैसा संगत की सेवा में ही लगा देते हैं; आश्रम पर आश्रम बनाते जाते हैं; रोज़-रोज़ उनके लिए जहाँ सत्संग होता है, वहाँ भण्डारा खोल देते हैं। जब यात्रा होती है तब तो कहना ही क्या! माँ भी इतना नहीं खिलाती। क्योंकि आपको पाखण्डियों की तरह वो पैसा अपने निजी काम के लिए तो रखना ही नहीं है। उलटा आप उधार लेकर संगत को खिलाते हैं। आप पर 50 लाख से ऊपर उधार रहता ही है। यानी आप अपने को गिरवी रखकर संगत की सेवा कर रहे हैं।

इसलिए लड़कियों की शादियाँ करवाते हैं आप

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साहिब बन्दगी

इसलिए लड़कियों की शादियाँ

करवाते हैं आप

एक लड़की आपसे नाम लिये थी। उसकी शादी थी। सब आपके पास सुबह आए। लड़का नामी नहीं था। आपने लड़की की सास से कहा कि लड़की बाकी चीजें नहीं करेगी, एक परम-पुरुष की भक्ति करेगी। पहले बताना ही ठीक है; ताकि बाद में यह नहीं कहे कि किसी को नहीं मान रहे हैं। मान रहे हैं न। एक परम पुरुष को मान रहे हैं। पर लड़की की सास कहने लगी कि हम जहाँ भी जायेंगे, इसे भी साथ में ले जायेंगे; जहाँ माथा टेकेंगे, यह भी टेकेगी। पर लड़की यह सब नहीं करना चाहती थी।

यही कारण है कि आप लड़कियों की शादियाँ करवाते हैं और उनके लिए नामी लड़का ही ढूँढ़ते हैं। लड़की गैरनामी हो तो ठीक है; पर उस पर भी आप यह दबाव नहीं डालने देते कि नाम ले। वो उसकी मरजी है कि किसी को भी माने।

विश्राह में आपका एक नामी अपनी लड़की की शादी नौग्राम में करना चाहता था। एक शास्त्री का बेटा था लड़का। अब शास्त्री आपका कट्टर विरोधी था और लड़के वाले सारे उसके कट्टर अनुयायी थे। फिर वहाँ लड़की व्याहेंगे तो दिक्कत तो आयेगी। आपने कहा-नहीं, मैं चाहता हूँ कि लड़की गैरनामी के पास न जाए। क्योंकि फिर वो बाद में सताते हैं। इसलिए परेशान किया जाता है। गाँव वाले जानते हैं कि यह तो सारे परिवार को साहिब के यहाँ ले जायेगी, इसलिए सभी उसे परेशान करते हैं, जबरन उससे सब कुछ करने को कहते हैं। इसलिए लड़कियों की शादियाँ करवाना आपकी एक मजबूरी भी है।

हरेक की शंका मिटा देते हैं आप

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हरेक की शंका मिटा देते हैं आप

चण्डीगढ़ में एक जज साहब हैं। वे बड़े ही ईमानदार हैं। आपने उनसे कहा कि घूस नहीं लेना। पहले वे वकील थे। महीने में 4-5 लाख कमा लेते थे। जब जज बने तो आपसे पूछा कि क्या करूँ? आपने कहा कि जज वाली नौकरी कर लो। उन्होंने कहा कि वहाँ 50 हज़ार तनख़्वाह है जबकि यहाँ 4-5 लाख मैं कमा लेता हूँ महीने में। आपने कहा-यह मत सोचो। वहाँ आपको इंसाफ़ करने का मौका मिलेगा। पैसा ही सब कुछ नहीं है। आप जज बन जाएँ और लोगों को इंसाफ़ दिलाएँ। उसने आपको बाद में फ़ोन किया-कहा कि मैं ओथ (शपथ) तब लूँगा, जब आप यहाँ आयेंगे। जब दिल में ऐसा भाव था तो आपको जाना ही पड़ा। तब उन्होंने ओथ ली।

तो एक दिन आपका चण्डीगढ़ में प्रोग्राम था। उनको पता चला तो कहा कि वहाँ मेरे एक जज मित्र हैं; मैं उनको फ़ोन करता हूँ; वे आपके दर्शन के लिए आयेंगे। वे पंजाब हाईकोर्ट के जज हैं। उन जज साहब ने आपको फ़ोन किया और अपने घर चरण रखने को कहा। आपने सोचा कि ठीक है, मैं ही चला जाता हूँ। वहाँ सत्संग के बाद आप उनके घर गये तो उनकी बहुत सारी शंकाएँ थी। जज कोई मामूली चीज़ तो होते नहीं हैं। उन्होंने अपराध होते तो देखा होता नहीं है, पर फिर भी गवाहों और तर्कों के आधार पर जान जाते हैं कि अपराधी कौन है। तो आपकी उनसे आधा घण्टा बात हुई। उनकी उम्र भी कोई 55 साल के करीब होगी। और अपने दोस्त यानी आपके नामी की संगत में रहने के कारण ईमानदार भी बहुत थे। वे कोई गलत फैसला करने वालों में नहीं थे। बड़े गंभीर थे। उन्होंने कहा कि मुझे बहुत ख़तरनाक जजों में गिना जाता है। क्योंकि मैं घूस भी नहीं लेता हूँ। उन्होंने कई सवाल पूछे। आपने हरेक सवाल का बड़ा सुन्दर जवाब दिया, बड़े सरल तरीके से समझा

आपको नाराज़ करना ठीक नहीं है

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साहिब बन्दगी

दिया। वो आपको आने नहीं देना चाह रहे थे, पर आप आधे घण्टे बाद उठकर चल पड़े।

फिर बाद में उन्होंने आपको फ़ोन किया, कहा कि आपने आधे घण्टे में मेरी कई शंकाओं का निराकरण कर दिया। अब मुझपर कृपा करो और बताओ कि मैं कहाँ पर दीक्षा लेने आऊँ?

कहने का भाव है कि आप हरेक की शंकाओं को बहुत ही कम समय में मिटा देते हैं। पर कोई समझने वाला हो। यही कारण तो है कि आपके पास विभिन्न पंथ वाले अपने-अपने पंथों को छोड़कर आपके पास चले आते हैं, क्योंकि अध्यात्म के विषय में जो खोजी होते हैं, उनकी तो कई शंकाएँ रहती हैं। जब उनकी शंकाएँ अपने पंथ में नहीं मिट पाती हैं तो वे उन शंकाओं को लेकर आपके पास आते हैं। आप जब उन शंकाओं को मिटा देते हैं तो वे प्रभावित होकर आपसे नाम ले लेते हैं; वे समझ जाते हैं कि आपके पास सच्चा ज्ञान है, केवल किताबी ज्ञान नहीं।

आपको नाराज़ करना ठीक नहीं

आप किसी से नाराज़ होना ही नहीं चाहते हैं। पर जब होते हैं तो परेशान हो जाता है वो। आपकी नाराज़गी दिल में खलबली मचा देती है। पर यदि ज़्यादा हो गये तो पागल हो जायेगा बंदा और यदि बहुत ज़्यादा हो गये तो फिर तो मर ही जायेगा।

आपके गुरु ने आपको गद्दी देते समय कोई ज़्यादा समझाया नहीं कि ऐसे-ऐसे करना। बस, उन्होंने एक शब्द लिया, कहा कि मेरे बेटों से नाराज़ नहीं होना। क्योंकि वे जानते थे आपकी नाराज़गी को।

एक नामी ने आपकी सेवा की, ज़मीन दान में दी, पर वो कहीं अहंकार में आकर बदतमीजी कर गया। आप उससे दिल से नाराज़ हो गये; बहुत नाराज़ हो गये। बेटा बाप को चाँटा मार दे तो कैसा है!

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वो मर गया। कुछ देर बाद आपने सोचा कि देखते हैं कि कहाँ है। जब आपने देखा तो वो रेगीस्तान में गर्मी से तड़प रहा था। आपको दया आ गयी, सोचा कि कल्याण करूँ, पर फिर ख़्याल आया कि इसे तो अभी लाखों साल यहाँ सड़ना है। गुरु निंदा की यही सज़ा है। गुरु को नाराज़ करना ही नहीं है। आप समझाते हैं कि कभी यह मत सोचना कि गुरु को नाराज़ करके प्रभु की शरण में चले जायेंगे तो बच जायेंगे। नहीं! ऐसा नहीं होगा।

एक बादशाह के जहाँ यासीम खाँ बड़ी ऊँची पोस्ट पर था। वो कमाल जी का शिष्य था। मौलवियों ने बादशाह को शिकायत की कि इसे सज़ा देनी चाहिए, यह धर्म विरोधी बातें करता है। बादशाह ने कमाल को कहा कि ऐसा मत कहो; पर उन्होंने वही कहा। तो बादशाह ने कहा कि इसे ले जाकर चौराहे पर बाँध दो और हर आने-जाने वाले को कह दो कि इस पर पत्थर फेंके, थूके या मारे। जो नहीं मानेगा, उसे भी इसके साथ बाँध देना और उसके साथ भी यही कार्रवाही करना।

लोग आते गये और उनपर कुछ-न-कुछ फेंकते रहे; पर कमाल जी मुस्कराते रहे। यासीम खाँ उनका शिष्य था; वो भी संयोग से वहाँ से निकला। तो सिपाहियों ने कहा कि यह बादशाह का हुकुम है; आप तो हमारे अधिकारी हैं। पर कोई हमारी शिकायत कर देगा तो हमारी भी ख़ैर नहीं है, इसलिए कुछ भी मार दें। यासीम खाँ डर गया; उसने फूल की एक पखुण्डी उठाई और गुरु जी पर धीरे-से फेंका। कमाल ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। यासीम खाँ ने कहा कि गुरु जी, लोग आपको पत्थर मार रहे थे, आपपर थूक रहे थे, पर आप मुस्करा रहे थे। मैंने आपपर फूल फेंका तो आप रोने लग गये। कमाल ने कहा कि वो अनजान हैं, मुझे नहीं जानते, पर तू तो मेरी रुहानी शक्तियों को जानता था, इसलिए यह चोट मेरे दिल पर लगी है। तू भी यहीं बँध जाना था मेरे साथ। तब तेरा नाम भी मेरे साथ अमर हो जाना था।

बाहरी दिखावे से बहुत दूर रहते हैं आप

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फिर यासीम खाँ ने क्षमा माँगी। उसका मस्तिष्क कुंद पड़ गया। पर कमाल खुश नहीं हुए। उसने सोचा कि कबीर साहिब के पास जाते हैं; ये तो उनके शिष्य हैं। साहिब के पास गये तो साहिब ने कहा कि मैं माफ़ नहीं कर सकता; माफ़ी तो तेरा गुरु ही दे सकता है। पर तू उम्मीद से आया है, इसलिए तेरे साथ चलता हूँ। लाहौर पहुँचे। साहिब ने कमाल से कहा कि इससे गलती हुई है। कमाल ने कहा कि आप तो समरथ हैं, पर यह मृत्यु के 32 साल तक अमर लोक नहीं जा पायेगा। तब 32 साल के बाद उसकी रूह कब्र फोड़कर अमर-लोक गयी।

आज भी लाहौर में यासीम खाँ की कब्र है। साहिब समझा रहे हैं-

गुरु गूँगे गुरु बाँवरे, गुरु के रहिये दास।
जो गुरु भेजे नरक में, तो राखिये स्वर्ग की आस ॥

बाहरी दिखावे से बहुत दूर रहते हैं आप

आप दिखावे की दुनिया से परे रहते हैं। आप अपने शरीर पर कोई अलंकरण धारण नहीं करते। न गले में फूल-मोतियों की माला, न माथे पर तिलक, न रँगा हुआ चोला, न लंबी-लंबी दाढ़ी, न लंबी-लंबी जटाएँ, न अन्य कोई स्वाँग। बाहरी दिखावे की इन चीज़ों से आप बिल्कुल दूर रहते हैं। आपका मानना है कि ये चीज़ें भक्ति की पहचान नहीं हैं।

इतना ही नहीं, आप अपने सामने अगरबत्ती नहीं जलाने देते। आप अपने गले में किसी को फूलों की माला नहीं डालने देते। आप किसी को अपने ऊपर फूल नहीं फेंकने देते। आप इन सब चीज़ों के लिए संगत को मना करते रहते हैं। मगर लोग हैं मानते ही नहीं जबरदस्ती गले में फूलों की माला डालते और आदर भाव से ऊपर फूल फेंकने लग जाते हैं।

जासूसी करने आए थे और भक्त बन गये

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क्योंकि आपके पास विभिन्न मत-मतान्तरों के लोग पहुँचते हैं। वो वहाँ ये सब करते हैं तो सोच बन गयी होती है कि इसी तरह से महात्मा लोग खुश होते हैं। इसलिए आप उन्हें समझाया करते हैं कि इन चीज़ों से भक्ति नहीं होती है। भक्ति दिल से की जाती है। दिल में श्रद्धा होनी चाहिए। आप तो यहाँ तक कहते हैं कि भूल कर भी फूल नहीं फेंकना। कुछ आपकी गाड़ी को हाथ लगाकर प्रणाम करते हुए चलते हैं। आप समझाते हैं कि ये बेकार की चीज़ें हैं, इनसे कुछ लाभ नहीं होने वाला है। गाड़ी को प्रणाम करने से क्या होगा!

जासूसी करने आए थे और भक्त बन गये

पंडित पी. आर. अवस्थी शास्त्री जी पहले पहल आपकी जासूसी करने आए थे। एक दिन वे आपके आगे लंबे लेट गये; कहा-मुझे अपनी शरण में ले लो; मैंने कई दिन आपकी जासूसी की है, पर अब मुझे दीक्षा दो; आज मैं जासूस बनकर नहीं आया हूँ; आज मैं भक्त बनकर आया हूँ।

इसी तरह सी. आई. डी. और आई. बी. के कई लोग आपके पास पहले जासूसी करने के मकसद से आए, पर जब आपकी असलियत पता चली तो आपके परम-भक्त बन गये।

दीनों के नायक हैं आप

आप दीन-दुखियों, गरीबों, पीड़ितों की रक्षा करते हैं। आप उन्हीं के हैं। आपने अमीरों को नहीं चुना; आपने गरीबों को चुना, उनका दर्द समझा और उसे दूर किया। एक भोली सी लड़की राँजड़ी में अपने मामा के घर रहने आयी थी। बगुना, सूचानी आदि के गुण्डों ने उसे देखा तो अपने गिरोह के सरदार को सूचना दी। उनका बड़े-बड़े नेता लोगों से भी संबंध था। वे रात को उसे उसके घर से ले गये। उसका पति भी वहीं था। लड़की बड़ी खूबसूरत थी। 10-12 गुण्डों ने मिलकर उसके

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फौज में रहे शान से

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आप कोई बॉडिगार्ड लेकर घूमने वाले या बुल्ट प्रूफ में बैठकर सत्संग करने वालों में नहीं हैं। आप सच्चे संत हैं, जिन्हें इस नश्वर शरीर की कोई परवाह नहीं है। इस नश्वर शरीर के मिटने का डर तो उसे होता है, जिसे आत्मा का ज्ञान नहीं मिल पाया हो। आप तो कहते हैं कि यदि यह शरीर नहीं भी रहा, मैं तो भी अपनी संगत से मिल लूँगा। इसलिए आप बिना किसी डर के, बिना अपनी जान की चिंता किये दीनों के लिए लड़ते हैं, उन्हें इंसाफ़ दिलाते हैं।

फौज में रहे शान से

आपने फौज की नौकरी बड़े शान से की। वहाँ सबसे माँस कटाया जाता था, पर आप नहीं काटते थे। आप सैनिक थे जो कमाण्डर था, उसने कहा कि माँस काटना है सबने। आपने कहा कि मैं खाता नहीं हूँ तो काटूँ क्यों? जो खाते हैं, उन्हीं को कहो। उसने कहा कि मैं चार्ज शीट पर लिख दूँगा। आप नहीं डरते थे, कहा कि लिख दो। पर कभी आपको सज़ा नहीं हो पाती थी। आपने किसी के साथ समझौता नहीं किया। वे जानबूझ कर करते थे। फिर जब दूसरा कमाण्डर था तो माँस को मच्छरदानी में रखकर काटते थे, ताकि मक्खियाँ न भिनभिनाएं तो सबको काटना होता था और सबकी मच्छरदानी का इस्तेमाल किया जाता था। पर आपने कभी अपनी मच्छरदानी नहीं दी। आपने कहा कि मैं खाता नहीं हूँ, मच्छरदानी क्यों दूँ? खून के छींटें पड़ते हैं और मुझे बदबू आती है। कमाण्डर ने कहा कि फिर लड़ाई कैसे करनी है? आपने कहा कि वो दूसरा मुद्दा है; वहाँ दुश्मन को मारकर खाना थोड़े है। आपके तर्क के आगे सब झुक जाते थे। वे कोई सज़ा भी नहीं दे पाते थे।

जब आप नाचे.....

31 दिसंबर का दिन, अखनूर आश्रम में विशाल प्रोग्राम और आप मौज में थे। जैसे ही आप झूमे तो संग ही आश्रम का कुल्ला भी झूमने

बदमाशों को भी सिखाया प्रेम आपने

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लगा, सब कुछ झूमने लगा, सबको लगा मानो पूरा ब्रह्माण्ड झूम रहा हो। वैसे तो आप नाचते नहीं हैं, पर एक बार तब आप मौज में थे और आपके साथ पूरा ब्रह्माण्ड प्रसन्नचित्त होकर नाच रहा था। यह नज़ारा देखते ही बनता था। जो भी वहाँ मौजूद था, वो ही इस अद्भुत नज़ारे का आनन्द उठा रहा था।

बदमाशों को भी सिखाया प्रेम आपने

प्रेम के द्वारा आप बदमाशों को भी सीधे रास्ते पर ले आते हैं। आपका प्रेम पाकर उनमें से भी प्रेम प्रस्फुटित होने लगता है। वे अपना स्वभाव भूल जाते हैं और आपके प्रेम में रंगकर दयालु स्वभाव के हो जाते हैं।

गलबड्डे का मक्खू जब आपके पास नाम लेने आया तो उसी के गाँव के लोगों ने आपसे कहा कि इसे नाम नहीं देना; यह बहुत बड़ा बदमाश है; इसने बड़े क़त्ल भी किये हैं। यदि इसे नाम दिया तो कोई आपके पास नहीं आयेगा। आपने कहा-इसे तो पहले नाम देना है। क्योंकि आप तो जानते हैं कि ऐसे लोगों को कैसे सुधारना है। जब आपने उसे सुरति दी, प्रेम दिया तो वो आपके प्रेम में रँगकर निर्मल हो गया; उसकी सारी बदमाशी समाप्त हो गयी। गाँव वाले उसके बदले हुए निर्मल स्वभाव को देख इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने भी आपसे नाम ले लिया। उन्होंने मिलकर आपको धन्यवाद दिया कि आपने ऐसे बदमाश को सुधार दिया, जो कभी सुधरने वाला नहीं था। ऐसे ही सैकड़ों बदमाशों को आपने अपने प्रेम द्वारा नेक इंसान बना दिया।

वो भी करते हैं बंदगी

पशु-पक्षी, कीट-पतंगे, पेड़-पौधे सब आपको प्रणाम करते हैं। आपके कुल्ले में अनेक साँप रहते हैं। आप कभी उन्हें भगाने का प्रयास

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नहीं करते। जब आश्रम में भीड़ होती है, तब वे सामने नहीं आते हैं, पर जब सभी अपने-अपने घरों को लौट जाते हैं तो वे सामने आ जाते हैं। कभी-कभी वे आपको बंदगी करने आते हैं और आपकी इच्छा से वे आपको बंदगी करके फिर अपने-अपने स्थान को लौट जाते हैं।

अखनूर आश्रम की नींव रखनी थी। पहली बार आपने वहाँ चरण रखे तो एक साँप सामने की ओर से, दो साँप एक सॉइड से और दो साँप दूसरी सॉइड से आपकी तरफ बढ़े और पास आकर आपके चरणों में सिर टिका दिया; बंदगी की और चले गये। आज बहुत समय हो गया है। वे बहुत बड़े हो गये हैं। आज भी वे चुपके से कभी-कभी आपको बंदगी करने आते हैं और प्रेम सहित आपको बंदगी करके लौट जाते हैं।

यह एक रहस्यमय सत्य है, पर दुनिया इन बातों पर आसानी से विश्वास नहीं कर पाती है।

पशु पक्षी नर नाग सभी जीव,
करते हैं साहिब आपको,
बारंबार परनाम।
कर बंदगी वे बारंबार,
सुरति के अमृत को पीकर,
पाते हैं विश्राम।
जानत वे मानुष आप नाहीं,
देखते सबमें आत्म का रूप,
नहीं चाम से काम।
हो साहिब आप अमर लोक के,
आए हो लेने
आत्म को निज धाम॥

बिल्ली बोली-मेरे बच्चे कहां हैं

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बिल्ली बोली-मेरे बच्चे कहाँ हैं

सब जीव आपसे बातें करते रहते हैं। आप सब जीवों का कष्ट समझते हैं। सब आपको अपने-अपने कष्ट सुनाते हैं। एक समय राँजड़ी आश्रम में एक बिल्ली ने कुछ बच्चे दिये। वे बड़ी शरारत करते थे। कभी वे खाना बनाने वाली जगह पहुँच जाते थे, कभी कहीं। आपने विचार किया कि यह तो ठीक नहीं हो रहा है। संगत को इनका झूठा भोजन खिलाने वाली बात है। यह विचारकर आपने उन्हें राँजड़ी से बड़ी दूर बाड़ी ब्राह्मणा में पहुँचा दिया।

रात को बिल्ली आपके कमरे में आई। ऐसे वो कभी आपके कुल्ले में नहीं आई थी। पर उस रात वो आपके कुल्ले में आई। जैसे आदमी घुटनों के बल बैठकर बात करते हैं, ऐसे ही वो बैठ गयी और आपसे प्रश्न करने लगी। वो कहने लगी कि मेरे बच्चे कहाँ हैं? तुमने उन्हें कहाँ भेज दिया है? वो आपसे बड़ी करुणामयी वाणी में अपना दर्द कहने लगी।

यह बातें कोई कहानियाँ नहीं हैं। इन सबमें सच्चाई है। पर सच है कि कलयुग की दुनिया पाखण्डियों पर ही विश्वास करती है। संतों के खेल को वो पाखण्ड ही समझती है।

साँच कहे जग मारन धाये, झूठे जग पतियाना।
कहो साहिब किसे समझायें, कहा कोई न माना॥

ऐसे निपटते हैं आप

कुछ समय पहले जब हमला हुआ तो 11 आश्रम जलाए गये। एक मंदिर जला दिया जाए तो पूरी दुनिया में हड़कंप मच जाएगा, हड़तालें हो जायेंगी। अगर किसी मस्जिद में आग लगा दी जाए तो हड़कंप मच जायेगा। अगर एक चर्च में आग लगा दें तो कैसा होगा! पूरी दुनिया में हड़कंप मच जायेगा। 'साहिब बंदगी' के 11 आश्रम जला दिए गये। यह कितना बड़ा ज़ुल्म है! सरकार ने भी साथ नहीं दिया, पुलिस ने भी नहीं। यह धार्मिक अपराध है, ईश्वरीय अपराध भी है। आपने

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किसी धर्म स्थान को नुक़सान नहीं पहुँचाया। यह सब आपकी प्लॉनिंग में नहीं है। जब आश्रमों को जलाकर भी जी नहीं भरा तो गुण्डों ने मिनिस्टर गुण्डों के साथ मिलकर रखबंधु आश्रम को तुड़वाने की प्लॉनिंग बना ली। रातों-रात आश्रम तोड़ने की योजना बन गयी, आर्डर भी पास करवा दिया। उस आश्रम की ज़मीन योगियों ने दान में दी थी। उसकी रिजिस्ट्री नहीं हुई थी। बस, पाखण्डियों को तो मौका ही चाहिए था। अब सवाल है कि किस मंदिर की रजिस्ट्री है! पहले वहाँ कारंवाही होनी चाहिए। दूसरे पंथों पर कारंवाही होनी चाहिए। साहिब बंदगी का तो 108 आश्रमों में से केवल वही आश्रम है, जिसकी रिजिस्ट्री नहीं है, बाकी की है। वो भी आपको दान में मिली है। कोई सरकारी भी नहीं है। बाकी पंथों की ज़मीनें तो सरकारी हैं, पर वहाँ कोई हाथ नहीं डालता है, क्योंकि वे राजनीति में हैं, मिनिस्टरों से मिली हुई हैं, उनसे जान-पहचान है। आप राजनीति में नहीं हैं। यही कारण है कि पाखण्डी सोचते हैं कि ये कुछ नहीं कर सकते हैं। पर उन्हें आपके सोटे का पता नहीं है। उन्हें नहीं मालूम है कि आपका अपराधी चाहे कहीं भी चला जाए, वो बच नहीं सकता है। तो आपने रात को आश्रम टूटने नहीं दिया, अंदर से ही उन्हें रोक दिया। आपने कहा कि सुबह तोड़ दें तो कोई बात नहीं है, फिर हम कानूनी कारंवाही कर लेंगे। तब तक आपने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री, उपआयुक्त (डेप्यूटी कमिश्नर)आदि तक लिखित संदेश भिजवा दिया कि हमारे साथ ऐसा-ऐसा होने जा रहा है। अब कुछ भी हो जाए, बिना किसी रोक के आप कानूनी कारंवाही के लिए तैयार हो गये। पाखण्डी कितनी भी घिनौनी हरकतें करते रहें, पर आपके काम शिष्ट ही रहे हैं। अब अखनूर हमले की बात क्या थी? मास्टर जी का वो दोहा था। आपने कहा भी था कि नहीं लिखो। पर दोहा ख़राब नहीं था। लोगों ने उसका अर्थ गलत लगाया। दोहा था-

निगुरा ब्राह्मण नहीं भला, गुरुमुख भला चमार।
देवतन से कुत्ता भला, नित उठ भूँके द्वार॥

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इसका अर्थ तो यह है कि ब्राह्मण होकर निगुरा नहीं रहना चाहिए। जो ब्राह्मण होकर निगुरा रहता है, वो अच्छा नहीं है। फिर बीच में अल्प विराम है और उसके बाद कहा है कि यदि कोई चमार है और वो गुरुमुख है, तो वो अच्छा है। फिर दूसरी पंक्ति का अर्थ है कि देवतन यानी जो मिट्टी, पत्थर आदि के मोहरे हैं, उनसे तो कुत्ता अच्छा है। यदि कोई चोर घर आ जाए तो वो भौंकता तो है न, पर वो तो कोई रक्षा नहीं कर सकते हैं। देवतन कोई ब्रह्मा, विष्णु, महेश को नहीं बोला है। वो तो देवता हैं। लोगों को पता ही नहीं है। अर्थ नहीं समझा। फिर आपने हाई कोर्ट में हरिद्वार से छपी किताब भी दिखाई, जिसमें यह दोहा लिखा था। आबे-बाबाओं ने दोहे को तो बहाना बनाया। इससे पता चलता है कि हमारे धर्म में कितना पाखण्ड छिपा है। यह कितना खतरनाक काम किया और 5 हज़ार लोग झगड़ा करने आ गये। अगर एक इशारा आप कर देते तो सबकी बुरी हालत हो जाती। वो तो 10-20 लड़के जोश में आकर भागे। आपने तो मना किया। अगर नहीं करते तो कुछ और ही कहानी होती। पर आपके काम गुण्डों वाले नहीं हैं, संतों वाले हैं। सरकार ने भी किसी को नहीं पकड़ा, कोई कदम नहीं उठाया। आप निपटते तो हैं ऐसे लोगों से, पर अंदाज बड़ा प्यारा है आपका।

आपके ऐसे व्यवहार को देखते हुए ही तो आपको सन् 2002 के गाँधी पीस पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आपने हिंसा का जबाब हिंसा से नहीं दिया। किसी भी गुरु पर कोई उँगली उठाए तो संगत का दिल तार-तार हो जाता है; वो भड़क उठती है, कहीं रोड़ जाम तो कहीं खूनी खेल खेला जाता है। एक निंदा का शब्द भी कोई अपने गुरु के लिए सहन नहीं कर पाता है। आपकी इतनी निंदा हुई; लोगों ने जगह-जगह पुतले फूँके, हमले किये गये, मारने का प्रयास किया गया, पर कहीं भी आपने अपनी संगत को न तो रोड़ जाम करने दिये, न ही कोई हिंसात्मक कार्य करने दिया। संतों ने ये काम किये ही नहीं। संतों में सहनशीलता

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होती है। यदि हिंसा का जबाब वे हिंसा से दें तो फिर उनमें और दूसरों में अंतर क्या रहेगा! जो सहनशीलता आपकी संगत ने दिखाई, उसका उदाहरण कहीं नहीं मिल सकता है। जहाँ कहीं वो परेशान हुई, जोश में आई, आपने उसे रोक लिया। आपने बार-बार समझाया कि यह मत सोचो कि तुम ही मेरे हो और वे कोई बेगाने हैं। वे भी मेरे ही हैं, मेरे पास ही आयेंगे। और ऐसा हुआ भी। 1-2 नहीं, 10-20 नहीं, 100-200 भी नहीं, हज़ारों कट्टर विरोधी आपके शिष्य हो गये और कइयों ने पछताकर आपसे क्षमा माँगी, आपको सच्चा महात्मा कहा। यह कोई मामूली बात नहीं है। ऐसा उदाहरण कलयुग में कहीं नहीं मिलेगा। आप जैसा व्यवहार कहीं मिल पाना संभव ही नहीं है।

चौकीचौरा में सत्संग था; कुछ बदमाश आए, कहा-सत्संग नहीं होने देंगे। आपने कहा कि यात्रा से आना है, चाय-पानी पीना है। कहा- यहाँ नहीं होने देना है। आपने कहा कि लड़ाई करना ठीक नहीं है, इसलिए आप खुद पास के थाने में गये, वहाँ कहा कि ऐसी-ऐसी बात है। उन्होंने कहा कि यहाँ के सरपंच ने ऐसा कहा है। आपने कहा कि लिख कर दो कि नहीं होने देना है सत्संग। उसने लिख दिया। आपने कहा कि यह आपने अच्छा किया। आपने बाद में केस कर दिया कोर्ट में। सालों से वो चक्कर काट रहे हैं कोर्ट के। यदि कोर्ट छोड़ दे तो आप हाई कोर्ट में अपील कर देंगे। यदि वहाँ भी छूट गये तो सुर्प्रीम कोर्ट में करेंगे। बाल सफेद कर देते हैं, पर छोड़ते नहीं और आख़िर जीतते ही हैं। ऐसे लोगों से पहले आप कानून से निपटते हैं। आप तो हारकर भी जीतते ही हैं। क्योंकि केवल कानून से ही नहीं निपटते, कुछ अंदर की बात भी होती है। रातों की नींद, दिन का चैन भी छिन जाता है ऐसे लोगों का। यदि कानून भी इंसाफ़ नहीं करे तो आपके सोटे को वो सज़ा देनी पड़ती है।

एक वकील ने कुछ गुण्डों को लेकर आश्रम की पाइप तोड़ी। आपने केस दर्ज करवाने को कहा तो केस रजिस्टर न करें वो। फिर

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आपने कोर्ट में अपील की। 10 साल हो गये; उनकी नानी की भी तौबा कर दी। 9 लोग थे। कुछ समय बाद उनमें से 3 लोग मर गये। जज रोने लगा, कहा कि तीन तो मर गये, बाकी को माफ़ करो। आपने कहा- नहीं, आप बरी करो, मैं हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में ले चलूँगा। दौड़ाऊँगा खूब, कुतुबमीनार, लाल किला सब दिखाना चाहता हूँ इनको।

पर आप मुकद्दमे लड़ने नहीं आए। किसी से झगड़ा करने नहीं आए। मुकद्दमा एक तरीका है, एक मजबूरी है, क्योंकि आप हिंसात्मक कार्यों से दूर रहते हैं। आसानी से आप मुकद्दमा नहीं करते, पर जब एक बार कर देते हैं तो फिर पीछे नहीं हटते, समझौता नहीं करते। हार जाना ठीक है, पर समझौता नहीं मंजूर है आपको। जिनपर आपने केस किये हैं, वे संदेश भिजवाते हैं, पर आप समझौता नहीं करते।

आप किसी को सताने नहीं आए। आपके लिए तो सब समान हैं; सब आपके हैं। आपकी लड़ाई झूठ के ख़िलाफ़ है, और बड़ी तगड़ी है। आपकी हर बात सच्ची है। ऐसे ही सत्य नहीं लिख रखा है।

पर आप एक तरीके से निपटते हैं। जब हमला हुआ था तो बाद में एक माई ने आपसे कहा-साहिब जी! कुछ करिए न। वो माई शायद चाहती थी कि आप अपना असली रूप दिखाएँ और हनुमान जी की तरह सब पाखण्डी रूपी राक्षसों को उठा-उठा कर फेंक दें.....कहीं दूर। यदि ऐसा काम किया तो राक्षसों वाला काम हुआ। पर आप संतों वाला काम करना चाहते हैं।

पाखण्डी तो लीडर बनने के लिए साहिब-बंदगी की ख़िलाफ़त करते हैं। एक नामी था, उसे लगा कि वो अब जाने वाला है। उसने घर वालों को कह दिया कि उसका अंतिम संस्कार साहिब-बंदगी के अनुसार करना। उसने गाँव वालों से भी कह दिया। जब उसका शरीर छूट गया तो कुछ लोगों ने बदमाशों से कह दिया कि इसका अंतिम संस्कार साहिब बंदगी के अनुसार नहीं होने देना है। बदमाशों ने आकर घर वालों

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को धमकाया और जबरन उसका संस्कार करवाया, कहीं पिण्ड दान करवाया, कहीं कुछ। जब आपको पता चला तो आपने अपने लोग भेजे, कहा कि कार्यवाही करनी है, क्योंकि इन्होंने एक पार्थिव शरीर के साथ बदतमीजी की है। आपने माई को कहा कि यदि तू केस नहीं करेगी तो मैं तेरी लड़कियों की तरफ से दावा करूँगा।

आप कानून का सहारा लेते हैं। यदि पुलिस भी कार्यवाही नहीं करती है तो आप न्यायालय में अपील करते हैं। आप नागरिक अधिकारों को जानते हैं।

एक शास्त्री जी अपने सत्संग में आपके ख़िलाफ़ बोल रहे थे, बड़ी निंदा कर रहे थे। वहाँ आपका एक नामी भी बैठा था, उसने कहा कि ऐसा तो नहीं है। शास्त्री जी ने कहा कि इधर आ, तू उनका शिष्य है क्या? कहा-हाँ। वो उधर ही उसे मारना शुरू कर दिया। यह गुण्डापन नहीं था तो और क्या था ! फिर 50-60 बंदे भेजकर उसपर हमला किया। आपको पता चला तो आपने पुलिस से संपर्क किया, पर कोई कार्यवाही नहीं की पुलिस ने।

आप सब काम तरीके से करते हैं, कानून का सहारा लेकर करते हैं, पर जब कहीं से कोई कार्यवाही नहीं होती तो फिर आपका सोटा वो काम पूरा करता है। मोल्हू, पलाँवाला के लोग कारगिल की लड़ाई के बाद अपने घर नहीं जा सके। बाकी छः महीने में चले गये, पर जो हमले वाले थे, वे दो साल वहीं रहे। उनकी लड़कियाँ ख़राब हो गयीं, पशु मर गये। यह था आपका सोटा। पर कुछ मूर्खों को तब भी होश नहीं आई।

यह सब इसलिए हुआ कि आपके नामियों को भी उन लोगों ने मारा था, घरों में नहीं जाने दिया था, तब अपने भक्तों के कष्टों को देख आपके मुँह से निकला था कि चिंता मत करो, ये भी अपने घर नहीं जा पायेंगे।

10-11 साल पहले की बात है, राँजड़ी में एक लड़का था, वो आपका बड़ा विरोध करता था, यदि कोई ग़रीब नामी होता तो उसका

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अपमान भी कर देता था, क्योंकि तगड़ा था। एक दिन चक्की चल रही थी तो उसका बाजू उसमें आकर कट गया। उस जमाने में गाड़ियाँ भी कम चलती थीं। सुबह 4-5 बजे एक आदमी आपके पास आया, कहा कि ऐसे-2 उस लड़के की बाजू कट गयी है, कोई गाड़ी नहीं है, उसे अस्पताल ले जाना है। उस समय आपके पास ही थी गाड़ी। आपने ड्राइवर को कहा कि उसे अस्पताल ले जाओ। डॉ० ने कहा कि यदि 10-12 मिनट लेट हो जाते तो यह मर जाता, क्योंकि खून इतना बह रहा था।

उसके बाद वो कहीं भी मिलता तो आपको कटी हुई बाजू ऊपर करके प्रणाम करता। पर ‘अब पछताए क्या होत, जब चिड़ियाँ चुग गयीं खेत॥’

यह पक्की बात है कि आपके बंदे को कोई कुछ करेगा तो उसकी खिचड़ी निकल जायेगी।

कहँ कबीर ऐसे उजाड़ूँ, जस मूली को खेत॥

सुँगल पिंड की तरफ सरपंच था; वो आपकी निंदा करता था; वो हमले में भी शामिल था। एक दिन जब वो जा रहा था, एक और आदमी ने आश्रम की तरफ देखकर निंदा के शब्द कहे। सरपंच ने कहा कि मेरे सामने निंदा मत करो। उसने कहा कि आप भी नामी हो गये हैं क्या? सरपंच ने कहा कि मैं नामी नहीं हूँ, पर मैं भी तुम्हारी तरह साहिब की निंदा करता था, मुझे नींद आनी बंद हो गयी, मैं पागल हो गया। तब मुझे समझ आया कि यह क्यों हुआ। इसलिए तुझे भी समझा रहा हूँ कि ऐसा मत कर।


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नाना पंथों से लोग जुड़े हैं, जो दीक्षा लेने के बाद भी वे छल-कपट नहीं छोड़ रहे, पाप नहीं छोड़ रहे। यह भक्ति है क्या? नहीं। समुद्र के किनारे जहाँ तक लहरें पहुँचती हैं, वहाँ केवल रेत होती है। वहाँ कोई

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पेड़ नहीं होता है। नमक का पानी ज़मीन को ऊसर बना देता है। जब तूफान चले तो दो फर्लांग दूर तक लहरें पहुँचती हैं। वहाँ तक कोई घास तक नहीं होती है।

नमकीन पानी ने ज़मीन को ऊसर बना दिया। नमक खाने में स्वादिष्ट है, पर उसमें बड़े दोष हैं। राँज़ड़ी में दो अमरूद के पेड़ थे। उनपर इतने अमरूद आते थे कि इतने पत्ते भी नहीं होते थे। कुछ समय बाद दोनों पेड़ कुम्हला गये, रंग मटमैला हो गया, फल खारा हो गया। आपने लोगों से पूछा कि कैसे हुआ, पर किसी को जानकारी नहीं थी। बात यह थी कि कुल्फियाँ जमाते हैं तो उसमें बर्फ और नमक दोनों डालते हैं। बेचने के बाद लड़कों ने वो बचा हुआ पानी पेड़ों में फेंक दिया। दोनों दूषित हो गये। वो पेड़ आज भी हैं। बाद में आपने वो वाली मिट्टी निकलवाकर दूसरी नयी मिट्टी डलवायी। .... इस तरह भक्ति को दोष दूषित कर देते हैं। यदि दूषित हो जायेगी भक्ति तो फिर कोई फल नहीं देगी।

70 यात्री एक बार समुद्र में प्यासे मर गये। अचरज वाली बात है। पहले कुछ दिन पिया, पर उससे लीवर ख़राब हुआ। फिर बाद में पानी नहीं पी रहे थे, प्यासे रहे। समुद्र में एक जहाज़ में 70 आदमी प्यासे मरे।

वर्तमान में हम देख रहे हैं, लोग भक्ति करना चाह रहे हैं, पर पाबन्द नहीं रहना चाहते हैं, चारसौबीसी, छल-कपट, पाप सब करना चाहते हैं। जहाँ अधर्म है, वहाँ भक्ति नहीं पनपेगी। गुरु लोग भी पाप, छल-कपट छोड़ने को नहीं कह रहे हैं। वो जानते हैं कि ऐसे में कोई नहीं आयेगा। इसलिए बाकी पंथों में लोग दौड़कर पहुँचते हैं, पर आपके पास आसानी से नहीं आते हैं। पहले हज़ार बार सोचते हैं। सिद्धांत सुनने के बाद आदमी की चुटिया खड़ी हो जाती है। हालांकि वो अंदर से जानते हैं कि इनकी भक्ति अच्छी है।