निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
कौन है काल पुरुष व परम पुरुष
कौन है काल पुरुष व परम पुरुष ?
आओ इस भेद को थोड़ा समझें !
‘‘वेद चारों नाहिं जानत, सत्य पुरुष कहानियाँ॥’’
धर्म दास के पूछने पर आदि उत्पति का रहस्य संसार को सब से पहले कबीर साहिब जी ने दिया। आप ने कहा सत्य पुरुष पहले गुप्त और अकेले थे। वे कभी बने ही नहीं, न ही कभी मिटेंगे। जिस वस्तु का सर्जन होता है वह नष्ट भी अवश्य होती है। कबीर साहिब कहते हैं मैं तब की बात कहता हूँ जब साकार, निराकार, लोक-लोकांतर, सूर्य, चांद, तारे, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, काल निरंजन (मन) भी नहीं बना था।
सब से पहले उस गुप्त, अगम पुरुष ने अपनी इच्छा से शब्द उचारा। जिस से अद्भुत श्वेत प्रकाश उत्पन्न हुआ, जो इस संसारी प्रकाश जैसा नहीं था। जिस का एक-एक कण करोड़ों सूर्यों को भी लज्जा दे। अगम पुरुष स्वयं उस प्रकाश में समा गये और वह प्रकाश जीवित हो गया। अगम पुरुष जो पहले गुप्त थे, प्रकाश में आने से उनको सत्य पुरुष, परम पुरुष, दयाल पुरुष कहा गया। वो ही अमर लोक सतलोक कहलाया।
फिर उन्होंने अपनी मौज से अपने ही स्वरूप को अपने में से शटका दिया, अनन्त बूंदें हुई। जो वापस उस अद्भुत अनन्त प्रकाश में आई। लेकिन उनका अपना अलग वजूद रहा वो उस अद्भुत अनन्त प्रकाश में मिक्स नहीं हो पाई। क्योंकि सत्यपुरुष ने इच्छा की कि इनका अलग अस्तित्व रह जाये। वे ही जीव (आत्मा) कहलाई। वे सब जीव उसी प्रकाश में विचरण करने लगे जैसे पानी में मछली। अमर लोक में आत्मा का प्रकाश सोलह सूर्य जितना है।
9
10 साहिब बन्दगी
इसके बाद सत्य पुरुष ने सौलह शब्द उचारे जिससे इनके सोलह शब्द पुत्र उत्पन्न हुए। इसके पश्चात् सत्य पुरुष का पांचवां पुत्र निरंजन, जिसको निराकार, निरंजन, नारायण, अथवा मन आदि नामों से जाना जाता है जिसे संसारिक लोग राम, ब्रह्मा, आदि दिरंजन, कादर, क्रीम, प्रमेश्वर, प्रमात्मा, हरी, हरि, अद्वैत, भगवान, तथा अलख निरंजन आदि नामों से याद करते हैं। निरंजन ने 70 युग तक एकागर चित होकर पर्म पुरुष का एक पग पर खड़े होकर ध्यान किया। इस तप से खुश होकर सत्यपुरुष ने निरंजन को मानसरोवर दीप में जाकर रहने को कहा।
इस स्थान पर निरंजन बहुत खुश हुआ और फिर से 70 युग तक एक पग पर खड़े हो कर परम पुरुष का ध्यान किया। परमपुरुष के प्रसन्न होने से निरंजन ने कहा या तो मुझे अमर लोक का राज्य दो नहीं तो अलग से एक न्यारा देश दे दो जिस पर मेरा पूरा अधिकार हो। सत्यपुरुष ने कहा तुम्हें 17 चौकड़ी असंख्या युग का राज्य देता हूं। अपने बड़े भाई कुरम से बीज लेकर शून्य में एक अलग ब्रह्मांड की रचना बनाओ। निरंजन ने बिनती किए बिना कुरम के तीन सीस काट डाले और उनके पेट से पांच तत्व का बीज छीन लिया। इस तरह निरंजन ने 49 क्रोड़ योजन पृथ्वी, सूर्य, चंद्र, तारे सप्त पाताल, सप्त लोक आदि सब बना दिये और शून्य में रहने लगा लेकिन वहां जीव नहीं थे, सोचा जीव नहीं तो ब्रह्मांड का क्या लाभ। अतः उसने पुनः 64 युग तक फिर परमपुरुष का ध्यान किया। परम पुरुष ने पूछा अब क्या चाहते हो ? निरंजन ने कहा जीव ही नहीं है तो राज्य किस पर करूँ। इस लिए कृप्या कर थोड़े से जीव मुझे भी दे दो।
अब परमपुरुष ने आदि शक्ति की उत्पत्ति कर उसे अनन्त आत्मायें देकर कहां हे ! पुत्री मानसरोवर में निरंजन के पास जाओ और
निराले सद्गुरु 11
मिलकर सत्य सृष्टि करो। पांच तत्वों से बनी रूदर मांस वाली नहीं (यानि आत्माओं को शरीरों में डालने की आज्ञा नहीं दी गई)।
निरंजन आद्या शक्ति का सौंदर्य देख कामुक हो गया तथा उसे निगल गया। यह परमपुरुष को बुरा लगा और निरंजन को शाप दे दिया कि तूं एक लाख जीवों को रोज निगलेगा तो भी तेरा पेट नहीं भरेगा और सवा लाख उत्पन्न करेगा मगर तू सत्यलोक नहीं आ सकेगा। तब से इसका नाम काल पुरुष हुआ। सत्य पुरुष ने सोचा निरंजन ने पहले कुर्म के तीन शीश काटे फिर आदि शक्ति को निगल लिया, तो विचार किया कि निरंजन को मिटा देता हूं। सोचा इसे मिटा दिया तो सोलह पुत्र जो एक नाल में हैं वे भी मिट जाएंगे और जो मैंने 17 चौकड़ी असंख्य युग का राज्य दिया है, मेरा शब्द भी कट जाएगा।
परम पुरुष ने अपने को मथ ज्ञानी पुरुष (कबीर साहिब योग जीत) को निकाला वास्तव में वो खुद ही सत्यपुरुष थे और उसे निरंजन की गलतियां बताकर कहा निरंजन को मानसरोवर से निकाल दो (मानसरोवर अमरलोक का हिस्सा है) ताकि वो सतलोक न आ सके। साहिब की आज्ञा से योगजीत ने निरंजन को शून्य में फेंक दिया। वहां निरंजन डर से सम्भल कर उठा तो आदि शक्ति परमपुरुष का ध्यान कर उसके पेट से बाहर आ गई और निरंजन को देख डरने लगी।
अब निरंजन ने आदि शक्ति को प्यार से कहा मैं पाप पुन्य से नहीं डरता मेरे से इसका हिसाब लेने वाला कोई नहीं मैं आगे भी पाप पुन्य कर्मों का जाल ही बिछाऊंगा, मुझ से मत डरो। परमपुरुष ने तुम्हे मेरे लिए रचा है। आठ भुजाओं वाली आदि शक्ति काल निरंजन के साथ सहमत हो गई और दोनों एक साथ रहने लगे, जिस से इनके तीन पुत्र ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी पैदा हुए।
12 | साहिब बन्दगी
निरंजन ने आद्या शक्ति को कहा जीव और बीज तुम्हारे पास है और तीनों पुत्र भी सौंपता हूं। मैं शून्य में निराकार रूप में समाऊंगा और मन बन कर सभी जीवों के साथ रहूंगा। मेरा भेद किसी को नहीं देना। मेरा कोई दर्शन नहीं कर सकेगा, चाहे खोजते खोजते जन्म गवादे। तुमने तीनों पुत्रों के साथ राज्य करना। जब यह बड़े होंगे तो समन्दर मन्थन के लिए भेजना।
यहाँ नोट करने वाली बात यह है कि काल निरंजन ने आद्या शक्ति को परमपुरुष का भेद छुपाने के लिए आपने साथ मिला लिया और भी देखे तो निरंजन ने आद्या शक्ति को चार खानि व 84 लाख जूनिया कैसे बनाना है इसका पूरा भेद बताकर शून्य में समा गया और कहा मैं मन रूप में हर जीव के साथ रहूँगा है ताकि कोई भी जीव परम पुरुष का भेद न जान पाये।
बच्चे बड़े हुए तो माता आद्या शक्ति ने तीनों पुत्रों को समुन्दर मन्थन के लिए भेजा। इतने में काल निरंजन ने तमाशा किया स्वांस द्वारा पवन में वेद उत्पन्न किये। निरंजन ने वायु में वेद के शब्द किए कोई पुस्तक नहीं लिखी थी। इस लिए वेद निराकार तक की बात कहता है। वेद उसका पूरा भेद नहीं बता रहा है। समुन्दर मन्थन के बाद ब्रह्मा को वेद, विष्णु को तेज और शिवजी को विष मिला। माता ने कहा जो जो तीनों को मिला है अपने पास रख लें।
कबीर साहिब धर्मदास को बता रहे हैं के अब आदि शक्ति ने पुनः तीनों पुत्रों को समुद्र मन्थन के लिए भेजा तो इतने में आद्या शक्ति ने तीन कन्याओं की उत्पत्ति कर समुद्र में समाने को कहा। जब समुद्र मन्थन हुआ तो तीनों को तीन कन्याएँ मिली। माता पास आए तो माता ने सावित्री ब्रह्मा जी को, लक्ष्मी विष्णु जी को और पार्वती शंकर जी को
निराले सद्गुरु 13
दे दी। तीनों भाई बड़े खुश हुए तीनों काम के वशीभूत उनमें रम गए। ऐसे में दैत्यों, देवताओं और राक्षसों की उत्पत्ति हुई। जगत की रचना शुरु हो गई।
ऐका माई जुगति वियाई तिनि चेले परवान।
एकु संसारी एकु भंडारी, एक लाये दिवान॥
सृष्टि रचना के लिए तीनों को अलग-अलग डिउटी दी गई। ब्रह्मा जी को उत्पत्ति करने की, विष्णु जी को पालनकर्ता की और शिवजी को संहारकर्त्ता का काम सौंपा गया। इसके आगे तेंतिस करोड़ देवी देवता जिनकी संसार किसी न किसी रूप में पूज रहा है यह सारा निरंजन का परिवार हुआ।
आओ, पाँच भोतिक तत्वों में से इसके अस्तित्व को देखें। चार तत्व तो हमें खुली आंखों से नजर आ रहे हैं लेकिन जो पांचवां तत्व आकाश तत्व है वह चारों तत्वों में रमा हुआ है, यह ही निरंजन है।
84 लाख योनियों में से जिस इंसानी देह को निरंजन ने अपने आप जैसा बनाया है, जिसको हरी मंदिर भी कहते हैं उसमें भी पांचवां तत्व जो आकाश तत्व है वहीँ काल पुरुष है। जो सभी शरीरों में मन रूप में रहता है। जब के जीव आत्मा का इस निरंजन के किसी भी देश, देवी, देवता व शरीर से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह तो निरंजन ने जीव आत्मा को रोकने के लिए 84 लाख किस्मों के कैद खाने बनाए हैं। जीव आत्मा जो सत्य पुरुष की अंश है यह बिना बाती और तेल के जलती है, यह बिना आंख के देखती है, बिना पांव चलती है, बिना कानों के सुनती है, इसे कोई काट नहीं सकता, इसे किसी का डर नहीं है। यह निडर है। इसका कभी भी अंत नहीं हो सकता।
14 <p align="right">साहिब बन्दगी</p>
शरीर रूपी कैद खानों से आत्मा को आज़ाद करवाने के लिए पूर्ण संत सद्गुरू से विदेह नाम लेना पड़ेगा। बिना विदेह नाम के जीव आत्मा सन्तलोक नहीं जा सकती।
निरंजन ने जिस बीज रुपी पाँच शब्दों से पांच तत्व के शरीर की रचना की उन शब्दों का स्थान भी शरीर में रख दिया। जिसे काया का नाम कहते हैं। जीव आत्मा को सत्य पुरुष से दूर रखने के लिए काल निरंजन ने जीवों को अपनी भक्ति में लगाने के लिए काया नाम के प्रगट शब्द गुरु मंत्र के रुप में जीवों को दीये जिसमें सभी जीव काया के नाम का सिमरन करने लगे और अन्दर में खोज करने लगे। बड़े-बड़े ऋषी, मुनि, सिद्ध, साथक, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, पीर, पैगम्बर, औलिया भी इन शब्दों में उलझ गये। निरंजन ने इस भक्ति से जीव को बड़ी-बड़ी शक्तिया, रिद्ध, सिद्ध, पावर, चार तरह की मुक्ती का स्वर्ग दे दिया, यहां तक के सभी साधक निरंजन भगवान् की साधना में रम गए और 70 प्रकार की अनहद धुनों में आनन्द मगन रहने लगे और चुप्प रह कर अनहद धुनों का रस लेने के लिए एकांत की तालाश में रहे। मगर आत्मा का ज्ञान न हुआ ऐसे में आत्मा शरीर से अलग ना हो कर अमर लोक अपने निज धाम न जा सकी।
<p align="right"><i>-विसथार के लिए देखें पुस्तक अनुराग सागर वाणी</i></p>सुन्न गगन में सबद उठत है, सो सब बोल में आवै।
निःसबदी वह बोलै नाहीं, सो सत सबद कहावै॥
<p align="right"><b>-पलटू साहिब जी</b></p>
प्रेम के अथाह सागर हैं आप
निराले सद्गुरु
प्रेम के अथाह सागर हैं आप
आत्मा प्रेम से ओत-प्रोत है; उसमें प्रेम लबालब भरा हुआ है। आत्मपिता होने से आप प्रेम के अथाह सागर हैं। सागर की तो फिर भी एक थाह होती है, पर आपकी कोई थाह नहीं है। आप अथाह हैं, आपका प्रेम अथाह है। करोड़ों बड़ा-बड़ा प्रेम करने वाले प्रेमी भी आपमें समा जायेंगे और पता भी नहीं चल पायेगा।
यह आत्मा प्रेम की ही तलाश में है और यह प्रेम ही करना चाहती है। पर इसे प्रेम का सही रिस्पॉन्स नहीं मिल पाता है, इसलिए यह कभी संतुष्ट नहीं हो पाती है।
बाहर जहाँ भी प्रेम लगेगा, वो सच्चा नहीं होगा। वो शरीर की सीमा में आ ही जायेगा। वहाँ धोखा भी मिल सकता है। पर आपका प्रेम सत्य है, क्योंकि वो शरीर की सीमा से परे है। आपके यहाँ धोखा नहीं है। आपके पास से पूरा-पूरा सही जबाब मिलेगा।
एक माई आपके पास आई, बोली-गुरु जी! मैं जब छोटी थी, पढ़ती थी तो एक लड़के से प्रेम करने लगी। मैं प्रेम करना चाहती थी। वो भी मुझसे बहुत प्रेम करता था। पर कुछ देर बाद वो वासना पर उतर आया। मैंने उससे किनारा कर लिया। मुझे सच्चा प्रेमी नहीं मिल पाया। पर मैं प्रेम करना चाहती थी। इसलिए मैं फिर अपने ही मौहल्ले के एक लड़के से प्रेम करने लगी। पर कुछ देर बाद वो भी सही रिस्पॉन्स नहीं दे सका और वासना पर उतर आया। मैंने उससे भी किनारा कर लिया। मैं सच्चा प्रेमी चाहती थी। फिर मेरी शादी हो गयी और मैंने सोचा कि पति से ही प्रेम कर लेती हूँ। पर गुरु जी, पति तो जैसे सोचने लगा कि
15
आत्मा आपकी तरफ आकर्षित होती है
16 साहिब बन्दगी
आत्मा आपकी तरफ आकर्षित होती है
आत्मा ईश्वर की प्राप्ति चाहती है, परमात्मा को पाना चाहती है। हर वस्तु जिसका भी अंश है, उसके इर्द-गिर्द रहती है। जल समुद्र का अंश है, फेंको तो बहने लगता है और बहते-बहते अपने अंशी की तरफ जाने लगता है; आग जलाओ तो वो ऊपर की ओर ही उठती है, अपने अंशी की ओर जाना चाहती है। ऐसे ही सब आपकी तरफ खिंचे चले आते हैं। जो नाम पा लेता है, अंदर से आत्मा जान जाती है कि यह रिश्ता नया नहीं है, बल्कि बहुत पुराना है, इसलिए वो आपसे जुदा नहीं हो पाता है। वो बार-बार खिंचा चला आता है आपके पास। सत्संग तो एक बहाना है; यदि आप उलटी गिनती भी गिनें तो भी संगत ऐसे ही आपके पास आती रहेगी। आपके नामी को 1-2 नहीं, 3-4 भी नहीं, 8-10 बार महीने में आपके दर्शन करके भी चैन नहीं आता है। कई तो दिन में एक बार करके भी चैन नहीं पाते हैं और आपसे मिलने वाले उस अमृत को पाने के लिए दिन में 3-3 सत्संग सुनने पहुँच जाते हैं। चाहे दिन में 5-5 बार भी आपके दर्शन कर लिए जाएँ तो भी चैन नहीं आता है। सच ही कहती है आपकी संगत-
साहिब तुझसे मिलने का, सत्संग बहाना है।
दुनिया वाले क्या जानें, हमारा रिश्ता पुराना है ॥
आपके प्रेम का स्वाद चख चुकी आत्मा कहीं चैन पा ही कैसे सकती है! आपके प्रेम का आस्वादन करने वाले नामी का कहीं भी दिल लग ही नहीं सकता है। आपके प्रेम का आकर्षण ही कुछ ऐसा है कि माँ-बाप, भाई, बहन आदि किसी का प्रेम आकर्षित नहीं कर पाता है। सारा प्यार ही जैसे आप खींच लेते हैं; केवल कर्त्तव्य निभाने मात्र के लिए उनके बीच रहते हैं। आपके प्रेमी तो बस जैसे जबरन कर्त्तव्य निभाने मात्र को अपने घर-परिवार में नज़र आते हैं; पर वास्तव में अन्दर से वे आपके पास ही रहते हैं। उन्हें यह समझ नहीं आता है कि कहाँ जाएँ! उन्हें तो
सब महात्माओं से अलग हैं आप
निराले सद्गुरु <span style="float: right;">17</span>
बस यही लगता है कि जहाँ आप हों, वहीं चले जाएँ। जब भी आप अपने प्रेमियों को याद करते हैं तो वे रुक नहीं पाते हैं, सब काम छोड़कर आपके पास पहुँच जाते हैं। तभी तो संगत कहती है-
जदों तारां खड़कदीयां, मेरे कोलों रुकेया नेइ जादां॥
सब महात्माओं से अलग हैं आप
किसी महापुरुष की पहचान दाढ़ी या जटाएँ नहीं है, इसलिए आपने इसकी ज़रूरत नहीं समझी, इसका सहारा नहीं लिया। कभी भभूत नहीं रमाई, बाल नहीं बढ़ाए, रँगे चोले नहीं पहने; सोचा कि बाहरी सहारा नहीं चाहिए। केवल भारत में आपका व्यक्तित्व है कि कोई चिह्न नहीं रखा। कुछ भिन्न-2 चिह्न रखकर इज्जत चाहते हैं। आपको इज्जत नहीं चाहिए। कुछ तो सत्संग में अपने लोगों को कहते हैं कि बीच-बीच में तालियाँ बजाते रहना..... हौसला बढ़ाने के लिए। फिर ताली से उसका क्या हाल होगा! वो तो नीचे गिर जाएगा। ‘अस्तुति निंदा नाहिं जिन, बैरी मीत समान। कह नानक सुन रे मना, मुक्त ताहि को जान॥’ महात्माओं के रहन-सहन को देख आपको दुख होता है। कोई साथ में बॉडीगार्ड लेकर घूम रहा है, कोई कमांडो, कोई लाल बत्ती का सहारा लेकर घूम रहा है। आपको भी सरकार ने एक बॉडीगार्ड दिया था। वो नाम भी नहीं लिया। मोटू-सा था। उसने सोचा कि यहाँ तो आज़ादी है, मिठाइयाँ वगैरह खाने को हैं, कोई टेंशन भी नहीं है। पर आपको वो चुभा। आपने अपने लोगों को कहा कि इसे हटाओ। मेरी संगत कह रही है कि साहिब जी असां डोरां तेरे उते सुट्टियाँ।’ इस बंदूक वाले को देख उनके दिल में आयेगा कि साहिब ने अपनी डोरें इस पर फेंकी हुई हैं ....रक्षा के लिए। इसलिए कहा कि इसे दूर करो।
एक ने आपसे कहा कि गाड़ी में लाल बत्ती लगवा लो; बड़ी संगत हो गयी है; आपको मंजूरी मिल जायेगी। आपने कहा कि नहीं
18
साहिब बन्दगी
लगानी है। जो गाड़ी रोशनी देती है, वही रहने दो। जिनको मंजूरी नहीं है, वे भी लगाए हुए हैं। ऐसा इसलिए करते हैं कि दिखाते हैं कि हम भी कुछ हैं। पर यह कोई महात्मा की निशानी नहीं है; यह तो दिखावे वाली बात है कि मैं खास आदमी हूँ।
शीश उतारे भूईँ धरे, तापर राखे पाँव। कहें कबीर धर्मदास से, ऐसा होय तो आव॥
ये महात्मा नहीं हैं। आपकी जान को तो बड़ा ख़तरा भी है। आपके लिए 10 लाख की सुपारी भी दी। आप नहीं डरे। आपके लोग डरे; उन्होंने अपने घरों से तस्वीरें निकाल दीं। क्योंकि ऐसा करने के लिए उन्हें मजबूर किया गया, धमकाया गया। आपने कहा कि ऐसा मत करो, बाद में पछताओगे। आप बेपरवाह रहे।
.....तो आपने कहा कि बॉडिगार्ड नहीं चाहिए। एक तो वो बात थी; फिर दूसरी बात थी कि वो मोटू था। आपने विचार किया कि जब तक कोई हमला करेगा, तब तक यह तो फैसला भी नहीं कर पायेगा जबकि मैं हमलावर की रिवालवर ही छीन लूँगा। क्योंकि आप फौज में रहे हैं; यही तो सीखा है। आप Quick Reaction Team के कमाण्डर भी रहे हैं। वो तो बार-बार पैंट ऊँची करता था; ऐसा लगता था कि ज़मीन में गिर जाएगी। तो कोई बात होती तो पहले अपनी पैंट ठीक करता, इसलिए आपने सोचा कि इसकी ज़रूरत नहीं है। फिर संतों को यह सब शोभा ही नहीं देता है। मुख्य बात यह है। कबीर साहिब का कौन सा बॉडिगार्ड था, नानक देव जी का कौन बॉडिगार्ड था! पर बलिहारी कलयुग के महात्माओं की।
एक आदमी आपके पास आया और कहा कि नाम दो। आपने कहा कि पहले कुछ सत्संग सुनो, तुम नये लग रहे हो। उसने कहा- महाराज! मेरी उम्र 55 साल हो गयी है; कब स्वाँस छूट जाए, कोई पता नहीं। उसने बताया; कहा कि मैं भारत वर्ष के बड़े-बडे पंथों को देखा,
निराले सद्गुरु
19
महात्माओं के संपर्क में आया, उन्हें देखा, पर कोई मुझे जंचा नहीं। पहले एक के पास गया तो वहाँ देखा कि बाबा जी सोया है तो 4 बंदूक वाले आगे तो 4 बंदूक वाले पीछे पहरा दे रहे हैं। फिर बुलिट प्रूफ कैबिन के अंदर से वो सत्संग करता था। मैंने सोचा कि इसने संगत के लिए कुछ नहीं सोचा और अपनी सुरक्षा का पूरा इंतजाम किया हुआ है। यदि इसे खुद अपनी जान के लाले पड़े हुए हैं तो हमें निर्भयता कैसे प्रदान करेगा! एक महात्मा को किसका डर! यह सोच मैं वहाँ से बिना नाम लिए ही चला आया। फिर कहा कि मैं भारत के बहुत बड़े पंथ से जुड़ा। पर मैंने देखा कि वहाँ पैसे का सौदा था। पैसे वालों के लिए इंतजाम अच्छा था, ग़रीबों के लिए बेकार। कुल मिलाकर अच्छा नहीं लगा। फिर जम्मू आया तो आपकी बड़ी निंदा सुनी। आपको भी देखा। मैंने चुपके से आपको देखा। मैंने देखा कि आप सबसे निराले हैं, सब काम खुद करते हैं, कहीं पतीला माँजने लग जाते हैं, कहीं कुछ। फिर आप फकड़ टॉइप लगे। आप निडर होकर घूमते रहते हैं। कोई बॉडीगार्ड भी नहीं है आपका। मैंने आपको परख लिया है; अब मुझे नाम दे दो।
लोग मोटे-मोटे महात्माओं को देख रहे हैं तो सोच रहे हैं कि वाह! क्या महात्मा है! एक ने आपसे कहा कि बड़े दुबले हो; हमारे गुरु जी तो लाल, गोल-मटोल हैं। आपने कहा कि तुमने यह कभी सोचा है कि उन्हें कितनी परेशानी है। मैं जानता हूँ कि क्या करते होंगे। जितना खाया, उतना फैलेगा। कण्ट्रोल नहीं किया। जमकर खाया; रोग हो गये। आपने कहा कि गुरु जी को मेरे हवाले करो। जहाँ-जहाँ मैं जाऊँगा, उनको साथ-साथ ही रखूँगा; जो-जो करूँगा, उनसे भी करवाऊँगा। 15 दिन में वो ऐम्स में मिलेंगे। बेटे, उसने मेहनत नहीं की, इसलिए रोग आ गया मोटापे का।
कुछ कहते हैं कि हमारा गुरु जी तो हमें कुछ कहता ही नहीं है; कहता है कि जैसे चाहे वैसे रहो। आपने कहा कि फिर वो कोई सुधार
20 साहिब बन्दगी
भी नहीं कर पायेगा। वो दुनिया को खुश रखना चाह रहा है। उसकी कोई निंदा भी नहीं होगी। जबकि एक महात्मा की पहचान ही निंदा है। ‘जब चारों ओर मार मार धाए, तब लालों के लाल कहाय ॥’ जिसकी निंदा नहीं वो महात्मा नहीं हो सकता। क्यों है निंदा! 13 अगस्त 1985 को आप राँजड़ी में आए। इस दौरान कभी किसी माई ने नहीं कहा कि उसे छेड़ा है; पर दुनिया कितनी जालिम है, कहा कि दो लड़कियों को लेकर भाग गया। जब 25 साल के थे, तब आपने विवाह नहीं किया। कोई आँख ख़राब नहीं थी, कोई बीमारी नहीं थी; अगर ज़रूरत होती तो कोई मिल जाती। अब बूढ़ा होकर भागना था क्या! ख़ैर हमारे देश की परंपरा है कि यहाँ हड्डियों की पूजा ही होती है। आप जो मना करते हैं कि भूत-प्रेतों की पूजा नहीं करो, सयानों से बचो, इससे सयानों का नुक़सान है, उनकी आमदनी पर लात बजती है। जब कोई आपसे नाम लेता है तो वो भूत-प्रेत से न्यारा हो जाता है, औरों को भी लाता है। अब जिस सयाने ने उसे सालों से फँसाया होता है, वो परेशान हो जाता है। उसकी आमदनी कम हो जाती है। तो वो निंदा शुरू कर देता है। आपने कभी संगत को नहीं कहा कि सयानों को पकड़ कर मारो, आपने कभी नहीं कहा कि शिवजी बुरे हैं। विरोध तो इन बातों से है कि आप कहते हैं कि हत्या नहीं मनाना, चंदा नहीं करना। एक महात्मा आता है तो पहले 100-100 रुपये और 5-5 किलो चीनी लेता है। समाज कब सोचेगा! इन लोगों की आमदनी आपके कारण से कम हो रही है। इसलिए निंदा करते हैं। अपने हितों के लिए, अपने स्वार्थों के लिए निंदा करते हैं, कोई दोषों के लिए नहीं। वास्तविकता तो जानते हैं।
वास्तव में आप 10 साल में जो इतना मशहूर हुए, उसमें 70 प्रतिशत सहयोग तो निंदकों का रहा है। किसी की कोई निंदा करे तो कहता है कि मर जाए उधर ही, कीड़े पड़ जाएँ, पर आप चिंतित नहीं होते हैं। आप मानते हैं कि निंदक ही आपके सच्चे प्रचारक हैं। इसलिए आपने कभी उनके ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही भी नहीं की।
आपकी किसी से स्पर्द्धा (competition) नहीं है
निराले सद्गुरु \hfill 21
आप हर समय इतने कण्ट्रोल में रहते हैं, इतने कंसन्ट्रेट रहते हैं कि कोई नहीं रह सकता है।
आपकी किसी से स्पर्द्धा (Compitetion)
नहीं है
आज प्रतिस्पर्द्धा का युग है। जीवन के हरेक क्षेत्र में स्पर्द्धा है। सब एक-दूसरे से आगे निकलना चाहते हैं। उसके लिए वे छल-कपट आदि का सहारा भी लेने से चूकते नहीं हैं। यह प्रतिस्पर्द्धा धर्म-क्षेत्र में भी साफ़ दिखाई देती है। एक पंथ दूसरे से आगे निकलना चाहता है। सब अपनी संख्या बढ़ाने में लगे हुए हैं। पर आपकी किसी से स्पर्द्धा नहीं है। यह एक बड़ा ही प्यारा रहस्य है।
स्पर्द्धा बराबर वालों में होती है। जिसके बराबर पहुँचकर हम उससे आगे निकल सकें, उससे स्पर्द्धा की जा सकती है। पर आप सबसे निराले हैं। आपकी बराबरी का प्रश्न ही नहीं उठता है। इसलिए किसी से स्पर्द्धा वाली बात ही नहीं है।
इसमें स्पर्द्धा इस बात की नहीं होती है कि किस पंथ के पास कितनी ज़मीन है, कितनी जायदाद है। यह तो ईर्ष्या वाली बात है। यह तो हौसला पस्त करने वाली बात है। जो चीज़ आपके पास है, वो किसी के पास है ही नहीं, फिर स्पर्द्धा किससे करनी!
चाहे किसी के पास 70-80 लाख सत्संगी हों या एक करोड़, पर उससे आपको कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। आपने सन् 1970 में सबसे पहले आदमी को नाम दिया था। वो राजस्थान का था। उसका नाम था-नीरसिंह राठौर। उसे आपने सबसे पहले नाम दिया था। जब आपने उसे नाम दिया तो कहा कि हमारा पंथ दुनिया का सबसे बड़ा पंथ है, क्योंकि इससे न्यारा मार्ग किसी के पास नहीं है।
अब किसी की कोयले की दुकान है तो उसकी सोने का
सभी डर रहे हैं आपसे
| 22 | साहिब बन्दगी |
|---|
व्यापार करने वाले से कौन-सी स्पर्द्धा हुई! इस तरह जो चीज़ आपके पास है, जब वो किसी के पास है ही नहीं तो स्पर्द्धा किस बात की! इसलिए चाहे सब आपसे मुकाबला करते रहें, पर वास्तव में आपकी किसी से स्पर्द्धा नहीं है।
सभी डर रहे हैं आपसे
पहले एक बार आस्था चैनल से आपको फ़ोन आया कि कुछ लोग कह रहे हैं कि आपका प्रोग्राम मत दो। पर चैनल वालों ने कहा कि हम तो देंगे, क्योंकि हमें तो पैसे से मतलब है। उन्होंने बंद नहीं किया। फिर कुछ समय बाद फिर फ़ोन आया कि महात्मा लोग कह रहे हैं कि इनका प्रोग्राम मत दो, हमारा वजूद मिट रहा है, ये कैसी बातें कह रहे हैं!
कई महात्मा अपने आपको बचाने के लिए, अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए आपको कोई ओपन सत्संग नहीं करने देना चाहता है। परेड ग्राउण्ड जम्मू में कई बार जब औरों को पता चलता है कि आप आ रहे हैं तो पहले ही अपना सत्संग रख देते हैं। कोई सतवा शुरू कर देता है। सतवा परेड ग्राउण्ड में पहले कभी नहीं होता था। वहाँ पर बच्चे क्रिकेट खेलते हैं, पर वे वो पिचें ही ख़राब कर देते हैं। उन्हें तो अपना स्वार्थ ही सूझता है, बच्चों की कोई परवाह उन्हें कहाँ! आपको देखकर वो भी शुरू हो गये हैं। उन्हें डर है कि कहीं आप सबको पाखण्ड से छुड़ा लेंगे तो उनके पास कोई नहीं आयेगा, उनका वजूद ही मिट जायेगा। इसलिए अपने वजूद को बनाए रखने के लिए वे आपके रास्ते में रुकावटें डालते रहते हैं। सतवारी चौक जम्मू, गाँधी नगर का दशहरा ग्राउण्ड आदि जगहों पर तो इन लोगों ने सत्संग पर रोक ही लगवा दी। किसी ने सुरक्षा की दृष्टि से ग्राउण्ड देना मना कर दिया तो कोई जानबूझकर मोटी रक़म माँगने लगा ताकि आप सत्संग न कर पाएँ। जब आप को ऐसे कई स्थानों पर सत्संग करने से मना
निराले सद्गुरु | 23
किया तो "आप ने कहा ऐसा ही होता रहा तो मैं रुकने वाला नहीं हूँ। मैं अपनी बात करने आया हूँ और चौराहें पर खड़ा होकर भी बोलूंगा, हमें भय नहीं है।'"
जो भी चीज़ विकास करती है तो उसका विरोध भी होता है। जैसे कोई अच्छा होता है तो दूसरे ईर्ष्या करने लगते हैं। मानव-तन में ये दोष हैं।
तो पाखण्डी भी आपसे ईर्ष्या करते हैं; वे रुकावटें डालते हैं। कहीं भी ओपन प्रोग्राम होता है तो वहाँ रुकावट डालने की कोशिश करते हैं। पाखण्डियों की कलयुग में चलती भी बहुत है। एक तो निरंजन की दुनिया, फिर ऊपर से महाकलयुग। ऐसे में निरंजन के चेलों ने सत्य का विरोध तो करना ही है।
आपका अधिक विकास देख व्यवधान डालने की कोशिश करें तो यह उनकी मजबूरी है। भाइयों के प्रति भी ईर्ष्या होती है। कभी-कभी अपने प्रति भी यह ईर्ष्या हो जाती है। अपने लिए भी यह ईर्ष्या स्वाभाविक हो जाती है।
जब साहिब-बंदगी पंथ छोटा था, तो कुछ बात नहीं थी, पर जैसे ही विकास हुआ तो दूसरे पंथों को परेशानी हुई। उन्होंने सतवारी, परेड ग्राउण्ड, गाँधी नगर (दशहरा ग्राउण्ड), हर जगह रुकावटें देनी शुरू की। वहाँ प्रोग्राम नहीं होने दिया। आपने किसी के सत्संग में रुकावट नहीं दी। कहीं उन्होंने आपके बड़े-बड़े पोस्टर फाड़ दिये। ये हरकतें कभी भी अच्छे लोगों की नहीं हो सकती हैं। यानी आदि निरंजन, निराकार की भक्ति के बड़े-बड़े पंथ ही हमारे देश में छाए हुए हैं, इसी निराकार, निरंजन को सन्तों ने काल पुरुष कहा। आज उन्हीं की चलती है। असल बात यह है कि वे केवल हाथी की तरह बड़े हैं, पर अंदर से खाली हैं, इसलिए उन्हें डर है कि साहिब-बंदगी पंथ के विकसित हो जाने से उनका वजूद समास हो जायेगा। पर आख़र झूठ की हार ही होती है।
24 साहिब बन्दगी
दुनिया समझेगी इन बातों को। आख़िर आप जो कहते हैं कि जो वस्तु मेरे पास है, वो कहीं नहीं है। इसमें वज़न है। अन्य बड़े-बड़े पंथ वाले जानते हैं कि उनके पास कुछ नहीं है, केवल किताबी बातें हैं, इसलिए साहिब बन्दगी का विरोध उनकी मजबूरी है। जो ऐसा नहीं करते, वे अच्छे हैं। भक्तों की यही निशानी होती है कि खुद भी आगे बढ़ो और दूसरों को भी आगे बढ़ने दो। अपना भी कल्याण करो, दूसरों का भी कल्याण करो। जो केवल अपने कल्याण तक सीमित है, वो भक्त नहीं हो सकता है। इसलिए जो पंथ विरोध करने वाले हैं, उनमें से किसी का लक्ष्य पैसा है, किसी का लक्ष्य इज्जत है, किसी का लक्ष्य रोमांस है, किसी का लक्ष्य राजाओं की तरह रहना है।
आप इन चीज़ों से परेशान नहीं होते, पर समाज को समझना होगा कि क्या ऐसी हरकतें कभी कोई भक्त कर सकता है! यानी भारत के बड़े-बड़े धार्मिक पंथों में भक्त नहीं रह रहे! इस रहस्य को समझना होगा। सत्य है, ये लोग भक्त नहीं हैं। एक भक्त दूसरे भक्त को कष्ट नहीं दे सकता, क्योंकि वो सबमें एक आत्मा देखता है। उसकी दृष्टि विश्व व्यापक होती है। आपने अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ भी कोई कार्यवाही क्यों नहीं की, इसका एक ही कारण है और वो यह कि आप कहते हैं कि वो भी हमारे ही हैं। कितनी प्यारी सोच है आपकी! दुनिया कब सच्चे संत को पहचानेगी!
यदि आप किसी पेड़ पर बैठकर सत्संग करेंगे तो भी आपकी संगत आपके पास आयेगी। पेड़ों पर बैठकर किसी जंगल में सत्संग सुनना पड़ेगा तो भी सुनेगी। आपने जो रंग दिया है, वो उतरने वाला नहीं है; फिर बाकी किसी का रंग नहीं चढ़ सकता है, सब फीका लगता है।
पाखण्डियों के इन गंदे कामों से आपकी संगत और अधिक मजबूत होती है। इसलिए सच में ये निंदक आपकी संगत का भला करने वाले हैं, उन्हें भक्ति में अधिक मजबूत करने वाले हैं। फिर इसी से संगत
निराले सद्गुरु
25
बढ़ती भी है। बेचारे पाखण्डियों पर तरस भी आता है कि कितनी मेहनत करते हैं, पर उसका रिजल्ट उलटा ही होता है। बाद में खुद बेचारे यह देख परेशान हो जाते हैं कि साहिब-बंदगी वाले तो भी हार नहीं मान रहे हैं; एक जगह सत्संग नहीं होने दो तो दूसरी जगह पहुँच जाते हैं; वहाँ अपनी गंदी हरकत का परिचय दो तो तीसरी जगह पहुँच जाते हैं; पर रुकते नहीं हैं; कहीं न कहीं रास्ता ढूँढ़ ही निकालते हैं और संगत भी ऐसी है कि कहीं भी प्रोग्राम हो, पहुँच जाती है। संगत पर आपका इतना रंग देख वे आखिर खुद परेशान हो जाते हैं और कुछ देर के लिए शांत हो जाते हैं। पर आपका सिलसिला नहीं रुकता। उन पंथों की पोल को समझ लोग टूटकर आपके पास आते रहते हैं। जब बड़े-बड़े टूटते हैं तो आमदनी कम होते देख उनके पेट का दर्द फिर बढ़ जाता है और वे फिर अपनी गंदी हरकतें दिखाना शुरू कर देते हैं। जैसे किसी को प्रेम का रोग हो जाता है तो किसी डॉ० की कोई दवा काम नहीं आती है। ऐसे ही इनके पेट का दर्द किसी गोली से नहीं जाता है। उसका हल ही निंदा है, उसका हल ही गंदी हरकतें है, सत्संग में रुकावट डालना है।
क्या ऐसे लोगों को यह नहीं पता है कि उनका आख़िर क्या हाल होगा ! एक शेर होता है; हिरण उसके सामने बड़ी कलाबाजी दिखाता है, बड़ी तेज़ भागकर दिखाता है। शेर चाहे तो उसे जल्दी पकड़ ले, पर वो ऐसा नहीं करता; वो उसे भागने देता है। जब भागते-भागते वो थक जाता है, उसका खून गर्म हो जाता है, तब शेर उससे एक फीट लंबी 28 फीट छलांग लगाता है और उसे पकड़ लेता है। ऐसे ही अभी आप इन पाखण्डियों को अपने खेल दिखाने दे रहे हैं, पर जब आप अपना खेल दिखायेंगे तो इनका वजूद ही मिट जायेगा।
पाखण्डियों के पास आपकी प्रोग्राम लिस्ट रहती है। उन्हें ठीक-ठीक मालूम रहता है कि आप कब और कहाँ प्रोग्राम देने वाले हैं। जब
26 साहिब बन्दगी
भी आपका ओपन प्रोग्राम परेड ग्राउण्ड, जम्मू में होता है तो वे रुकावट देने की सोचते हैं। कई बार उन्हें इसमें सफलता भी मिल जाती है। वे उन्हें अधिक पैसा खिलाकर पहले से आपके सत्संग के लिए बुक हुई ग्राउण्ड को भी अपने पाखण्ड और स्वार्थ के लिए बुक करवा लेते हैं। दुनिया तो ऐसी है ही। चाहे वे नाचें-गायें, कुछ भी करें, लोग पहुँचते-ही-पहुँचते हैं। खैर, दुनिया को तो सच्चाई का पता नहीं होता कि बाबा जी कैसा है, उनका लक्ष्य क्या है! पर जो बाबा जी के साथी होते हैं, वे कैसे भक्त हुए! वे भक्त हो ही नहीं सकते हैं। वे भी पाखण्डी ही हुए। क्या वे धूर्त नहीं हुए! पक्का हुए। बाबा जी खुद तो छल-कपट करके नरक में जा ही रहे हैं, पर साथ-ही-साथ चेलों को भी पकड़कर ले जा रहा है। चेले बेचारों का क्या कसूर! उन्हें तो माँ के गर्भ में 9-10 महीने वाला कष्ट भूल गया है न, इसलिए दोबारा अब नरकों की मार का स्वाद चखना चाहते हैं।
आप इसके बावजूद शांत रहते हैं; उनकी तरह ऐसे धूर्त वाले काम नहीं करते। यही तो आपमें और उनमें बाहरी दृष्टि से मुख्य अन्तर नज़र आता है। यह किसी एक बाबा की बात नहीं समझ लेना। इस जहाँ में आप सबसे निराले हैं। इसलिए सबका मुकाबला ही आप के साथ है।
कुछ स्त्रियों को, छोटे-छोटे बच्चों को जानबूझकर आगे कर देते हैं। दुनिया एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए बड़े तमाशे कर रही है। सब एक तरफ हैं और आप एक तरफ। फिर भी वे आपके हौसले को दबा नहीं पाते हैं। जितनी रुकावटें वे देते जाते हैं, आप उतना अधिक परिश्रम करके उन्हें शिष्ट तरीके से जबाब देते जाते हैं और आखिर में वे हारकर थक जाते हैं और कुछ देर शांत पड़े रहकर पुनः अपनी घिनौनी हरकतें शुरू कर देते हैं। उन्हें क्या मालूम कि आप थकने वालों में हैं ही नहीं। आप तो कई-कई रातें बिना सोए भी गुज़ार लेते हैं; कई-कई दिन बिना कुछ खाए भी रह लेते हैं। पर बाकी महात्मा यह सब तो कर नहीं सकते हैं। साहिब जी के
सेवा है आपका लक्ष्य
निराले सद्गुरु 27
चेले भी आखिरकार थक ही जाते हैं। पर आप खुद कभी नहीं थकते हैं और जब चाहते हैं तो अपनी सुरति देकर अपनी संगत को भी चेतन कर देते हैं। यह चीज़ें लालची लोग कभी समझ नहीं पायेंगे, क्योंकि आखिर उनका दिमाग़ है ही शैतानी। वे शैतानी बातें ही सोच-समझ सकते हैं। वो आरामपरस्त हैं, स्वार्थ के लिए, पैसे के लिए प्रोग्राम देते हैं जबकि आप परिश्रमी हैं, परमार्थ के लिए, जीवों को चेतन करने के लिए यह काम कर रहे हैं।
यदि आप एक इच्छा करें तो उन्हें नानी-परनानी भी याद आ जाए, पर आप यह काम नहीं करना चाहते हैं। जब निरंजन आपसे भयभीत रहता है, फिर वे बेचारे किस खेत की मूली हैं! पर अन्तर यह है कि निरंजन को आपकी शक्तियों की पूरी जानकारी है; आप क्या कर सकते हैं, वो समझता है। इसलिए सीधे-सीधे आपसे कोई पंगा न लेकर अपने उपासकों के द्वारा यह काम करता है।
जब 21 ब्रह्माण्डों पर कब्जा करने वाले, प्रलय करने वाले निरंजन का आपके आगे कुछ बस नहीं चलता है तो इन बाबों की क्या बात करनी! ये बेचारे तो हैं ही नहीं। इनका तो होना या न होना एक समान है। इनमें रूहानियत का कोई जलवा ही नहीं है, इसलिए बाहरी रुकावटें देने में लगे हुए हैं। जब रूहानियत का कोई लक्षण ही नहीं है तो फिर छल-कपट करना तो इनकी मजबूरी हो जाती है। इन्हें डर है कि धूर्तों वाला काम नहीं किया तो सारी पब्लिक ‘साहिब-बंदगी’ पंथ में चली जायेगी। उन्हें इस बात का भय है।
सेवा है आपका लक्ष्य
आपका सारा समय परमार्थ में, सेवा में व्यतीत होता है। अपने लिए आपके पास कोई समय नहीं है। सबसे बड़ी बात है कि सेवा के लिए आप सही पात्र को चुनते हैं।
28 साहिब बन्दगी
एक समय आप अखनूर जा रहे थे तो नेर्शानल हाइवे पर आपको एक पागल मिला। वो केवल कमीज़ पहने था, नीचे कुछ नहीं पहने था; बिलकुल नंगा था। वो सड़क पर से पत्थर उठा-उठा कर साइड पर रख रहा था। आपने सोचा कि कोई रात के समय उस पर गाड़ी चढ़ा सकता है। आपके दिल में उसके प्रति दया की भावना उमड़ आई। आपने उसी समय फैसला किया कि आप पागलों के लिए अलग से एक आश्रम बनवाकर वहाँ उनकी सेवा करेंगे।
आप ऐसे लोगों की तलाश करते हैं। आपको ऐसे लोगों की ज़रूरत है, जिन्हें दुनिया ने ठुकरा दिया हो। दुनिया जिन्हें बेघर कर देती है, आप उन्हें शरण देने की ठान लेते हैं। आप सभी पागलों को इकट्ठा करना चाहते हैं। तभी तो आप इनके लिए एक अलग आश्रम बनाना चाहते हैं जहाँ ऐसे लोगों की जमकर सेवा की जा सके। आप कहते हैं कि यही मेरा काम है, क्योंकि इन्हें कोई नहीं पूछ रहा है, इन्हें कोई नहला नहीं रहा है, कोई खिला नहीं रहा है, घर वालों ने इन्हें घर से बाहर कर दिया है। आपका धर्म ही सेवा है तो इससे बेहतर पात्र नहीं मिलेंगे। आप अपने लोगों को ऐसे लोगों को ढूँढ़ने में लगाएँगें। जहाँ भी दया का कोई ऐसा पात्र मिल जाए, उसे आश्रम में लाया जायेगा और फिर उसकी सेवा की जायेगी। फेरी वाला वहीं जाता है, जहाँ ग्राहक हों। आपका काम ही परमार्थ है, इसलिए आप उन्हें लाना चाहते हैं, आश्रम में रखकर उन्हें नहलाना चाहते हैं, पूरी ड्यूटी के साथ उनकी सेवा करना चाहते हैं। आप अपना काम खुद करते हैं, किसी से अपनी सेवा नहीं करवाते, इसलिए आप अपने लोगों को इनकी सेवा में लगाना चाहते हैं। आप कहते हैं कि यही मेरी सेवा होगी।
आप सबमें एक आत्मा देखते हैं, इसलिए आप पहले उन लोगों को चुनते हैं, जिन्हें सेवा की ज़रूरत है। जब कभी भण्डारा होता है तो