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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

१५. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८७

१५. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८७ दृष्टान्ते दर्शयितव्यमिति, न च तर्हि प्रत्यक्षादीनामप्रमाण्यम् । अथ प्रत्यक्षादीना- मप्रामाण्यम् ? उपादीयमानमप्युदाहरणं नार्थं साधयिष्यतीति । सोऽयं सर्वप्रमाणै- र्व्याहतो हेतुरहेतुः 'सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः' ( १. २. ६) इति । वाक्यार्थो ह्यस्य सिद्धान्तः । स च वाक्यार्थः- प्रत्यक्षादीनि नार्थं साधयन्तीति । इदं चावयवानामुपादानमर्थस्य साधनायेति । अथ नोपादीयते ? अप्रदर्शितहेत्व- र्थस्य दृष्टान्ते न साधकत्वमिति निषेधो नोपपद्यते; हेतुत्वासिद्धेरिति ॥ १३ ॥ तत्प्रामाण्ये वा न सर्वप्रमाणविप्रतिषेधः ॥ १४ ॥ प्रतिषेधलक्षणे स्ववाक्ये तेषामवयवाश्रितानां प्रत्यक्षादीनां प्रामाण्येऽभ्यनु- ज्ञायमाने परवाक्येऽप्यवयवाश्रितानां प्रामाण्यं प्रसज्यते; अविशेषादिति । एवं च न सर्वाणि प्रमाणानि प्रतिषिध्यन्त इति । विप्रतिषेध इति 'वि' इत्ययमुपसर्गः संप्रतिपत्त्यर्थे, न व्याघाते; अर्थाभावादिति ॥ १४ ॥ त्रै काल्याप्रतिषेधश्च शब्दादातोद्यसिद्धिवत् तत्सिद्धेः ॥ १५ ॥ किमर्थं पुनरिदमुच्यते ? पूर्वोक्तनिबन्धनार्थम् । यत्तावत्पूर्वोक्तम्- 'उपलब्धि- दिखाना पड़ेगा । इससे प्रत्यक्षादि का अप्रमाणत्व फिर भी नहीं बनेगा । यदि प्रत्यक्षादि का अप्रामाण्य ही मान लें तो दिया हुआ उदाहरण अर्थ को सिद्ध न कर सकेगा- इसलिए वह हेतु हेतु नहीं होगा । अतः यह जिस 'सिद्धान्त का आश्रय लेकर प्रवृत्त है उसका विरोध करने वाला विरुद्ध' (१.२.६) हेत्वाभास होगा; क्योंकि 'प्रत्यक्षादि प्रमाण अर्थ की सिद्धि नहीं करते' यह वाक्यार्थ ही पूर्वपक्षी का सिद्धान्त है, और उसके द्वारा यह प्रतिज्ञादि पांचों अवयवों का ग्रहण भी अर्थसिद्धि के लिये ही करना पड़ता है । यदि इनका ग्रहण न किया जाय तो अप्रदर्शित हेत्वर्थ की दृष्टान्त में साधकता नहीं बनेगी, तब प्रतिषेध भी कैसे हो सकेगा; क्योंकि हेतुत्व ही सिद्ध नहीं हुआ ॥ १३ ॥ अवयवाश्रित प्रत्यक्ष आदि को प्रमाण मानने पर समग्र प्रमाणों का प्रतिषेध सिद्ध न होगा ॥ १४ ॥ प्रतिषेधलक्षणक स्ववाक्य में यदि पूर्वपक्षी उन अवयवों पर आश्रित प्रत्यक्षादि को प्रमाण मानता है तो सिद्धान्ती के वाक्य में अवयवाश्रितत्व समानता के कारण प्रत्यक्षादि को प्रमाण मानना पड़ेगा; इस तरह सब प्रमाण प्रतिषिद्ध कहाँ हुए ! 'विप्रतिषेध' शब्द में 'वि' यह उपसर्ग 'समग्र प्रमाणों के निषेध का यथार्थ ज्ञान' का बोधक है, न कि विरोध का; क्योंकि 'विरोध' अर्थ मानने का कोई प्रयोजन नहीं है ॥ १४ ॥ ध्वनिरूप शब्द से वाद्ययन्त्र की सिद्धि की तरह प्रमाणरूप कारण को सिद्धि होने से प्रमाणों में त्रैकाल्य-प्रतिषेध भी नहीं बनेगा ॥ १५ ॥ यह बात पहले ( २. १. ११ में ) कह ही आये, अब फिर क्यों कही जा रही है ?

८८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० हेतोरुपलब्धिविषयस्य चार्थस्य पूर्वापरसहभावानियमाद् यथादर्शनं विभाग- वचनम्' इति, तदितः समुत्थानं यथा विज्ञायेत । अनियमदर्शी खल्वयमृषि- र्नियमेन प्रतिषेधं प्रत्याचष्टे । त्रैकाल्यस्य१ चायुक्तः प्रतिषेध इति । तत्रैकां विधामुदाहरति-शब्दा- दातोद्यसिद्धिवदिति । यथा पश्चात्सिद्धेन शब्देन पूर्वसिद्धमातोद्यमनुमीयते । साध्यं चातोद्यम्, साधनं च शब्दः, अन्तर्हिते ह्यातोद्ये स्वनतोऽनुमानं भवतीति । 'वीणा वाद्यते', 'वेणुः पूर्यते' इति स्वनविशेषेण आतोद्यविशेषं प्रतिपद्यते । तथा पूर्वसिद्धमुपलब्धिविषयं पश्चात्सिद्धेनोपलब्धिहेतुना प्रतिपद्यते इति । निदर्शनार्थत्वाच्चास्य, शेषयोर्विध्योर्यथोक्तमुदाहरणं वेदितव्यमिति । कस्मात् पुनरिह तन्नोच्यते ? पूर्वोक्तमुपपाद्यत इति । सर्वथा तावदयमर्थः प्रकाशयितव्यः-स इह वा प्रकाश्येत, तत्र वा; न कश्चिद्विशेष इति ॥ १५ ॥ प्रमाणं प्रमेयमिति च समाख्या समावेशेन वर्त्तते; समाख्यानिमित्तवशात् । समाख्यानिमित्तं तूपलब्धिसाधनं प्रमाणम्, उपलब्धिविषयश्च प्रमेयमिति । पहले कही बात को ही पुष्ट करने के लिये । हमने जो पहले यह कहा था कि 'उपलब्धि- हेतु तथा उपलब्धि-विषय अर्थ में पूर्व-अपर काल या सहभाव का नियम न होने के कारण यथादर्शन विभाग कहा गया हैं' यह बात यहीं से आधार लेकर कही थी। प्रमाण- प्रमेय-नियम न मानने वाले सूत्रकार ने नियम से प्रतिषेधपक्ष का खण्डन किया हैं। त्रैकाल्य का प्रतिषेध अयुक्त है, इसमें एक उदाहरण देते हैं—ध्वनिरूप शब्द से वाद्ययन्त्र की सिद्धि की तरह । जैसे पश्चात्काल में सिद्ध ध्वनिरूप शब्द से पूर्वसिद्ध वाद्ययन्त्र की सिद्धि का अनुमान होता है। यहाँ शब्द साधन है, वाद्ययन्त्र साध्य है। अनभिव्यक्त वाद्ययन्त्र का ध्वनि से अनुमान होता है। 'वीणा बज रही हैं' या 'वंशी बज रही हैं'—ऐसा हम ध्वनिविशेष सुनकर ही अनुमान करते हैं। इसी प्रकार पूर्वसिद्ध उपलब्धिविषय का पश्चात्सिद्ध उपलब्धिहेतु से ज्ञान होता है। यह एक उदाहरण दे दिया है। (२. १. ११) सूत्र में अवशिष्ट दोनों प्रकारों का भी इसी तरह उदाहरण समझ लेना चाहिये । उन दोनों का भी यहाँ फिर से व्याख्यान क्यों नहीं किया गया ? यहाँ पूर्वोक्त बात ही समझायी जा रही हैं, कोई नयी बात नहीं कही जा रही; फिर उसे यहाँ कह दिया या वहाँ कह लें, क्या नयी बात हो जायेगी ॥ १५ ॥ 'प्रमाण' तथा 'प्रमेय'—ये संज्ञायें संज्ञानिमत्त की स्थिति रहने पर व्यापकता रहती हैं। जैसे संज्ञानिमित्त 'प्रमाण' उपलब्धि-साधन है, तथा 'प्रमेय' उपलब्धि-विषय। परंतु जब १. 'त्रैकाल्ये'—इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१६. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८९

१६. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८९ यदा च उपलब्धिविषयः क्वचिदुपलब्धिसाधनं भवति, तदा प्रमाणं प्रमेयमिति चैकोऽर्थोऽभिधीयते । अस्यार्थस्यावद्योतनार्थमिदमुच्यते— प्रमेया¹ च तुला प्रामाण्यवत् ॥ १६ ॥ गुरुत्वपरिमाणज्ञानसाधनं तुला प्रमाणम्, ज्ञानविषयो गुरुद्रव्यं सुवर्णादि प्रमेयम् । यदा सुवर्णादिना तुल्यान्तरं व्यवस्थाप्यते तदा तुलान्तरप्रतिपत्तौ सुवर्णादि प्रमाणम्, तुल्यान्तरं प्रमेयमिति । एवमनवयवेन तन्त्रार्थ उद्दिष्टो वेदितव्यः । आत्मा तावदुपलब्धिविषयत्वात् प्रमेये परिपठितः उपलब्धौ स्वातन्त्र्यात् प्रमाता । बुद्धिरुपलब्धिसाधनत्वात्² प्रमाणम् । उपलब्धिविषयत्वात् प्रमेयम् । उभयाभावात् तु प्रमितिः । एवमर्थविशेषे समाख्यासमावेशो योज्यः । तथा च कारक शब्दा निमित्तवशात् समावेशेन वर्तन्त इति । वृक्षस्तिष्ठतीति स्वस्थितौ स्वातन्त्र्यात् कर्ता । वृक्षं पश्यतीति दर्शनेनाप्तुमिष्यमाणतमत्वात् उपलब्धि-साधन ही कहीं उपलब्धि-विषय बन जाता है तो उस समय वह प्रमाण 'प्रमेय' भी बन जाता है और दोनों संज्ञाओं में से एक ही अर्थ लिया जाता है। इसी अर्थ को सूत्रकार स्पष्ट करते हैं— प्रमाणता के समान तुला प्रमेय भी है ॥ १६ ॥ गुरुत्व ( वजन ) तथा परिमाण के ज्ञान का साधन तुला 'प्रमाण' है, ज्ञान के विषय वजनी द्रव्य सुवर्णादि 'प्रमेय' है। जब उस तुले हुये सुवर्ण आदि से दूसरी चीज का तोल किया जाता है तब वही सुवर्णादि प्रमाण बन जाता है। इस प्रकार यहाँ शास्त्र ( सूत्र ) का अर्थ संघात ( व्यापक ) रूप से उपदिष्ट है—ऐसा समझना चाहिये । उपलब्धि विषय होने से प्रमेय में पढा गया 'आत्मा' उपलब्धि ( ज्ञान ) में स्वातन्त्र्य होने के कारण 'प्रमाता' भी कहलाता है, इसी तरह प्रमेयपरिपठित होते हुये भी ज्ञान- साधन होने से 'प्रमाण' है, उपलब्धिविषय होने से 'प्रमेय' है, दोनों ही विषय या साधन जब न हों तब वह 'प्रमिति' है। इस प्रकार अर्थविशेष में संज्ञा का समावेश लगा लेना चाहिए । इसी तरह कारक शब्द भी व्यवहृत होते हैं। जैसे—'वृक्ष खड़ा है' यहाँ वृक्ष अपनी स्थिति में स्वतन्त्र होने से 'कर्ता' है; परन्तु 'वृक्ष को देखता है'—इस वाक्य में दर्शन- १. 'प्रमेयता च'इति पाठ० । शब्दोऽयं तात्पर्यटीकानुसारमत्र स्थापितः । २. 'बुद्धिरूपोपलब्धिसाधनत्वात्' इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

९० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १ आ० कर्म । वृक्षेण चन्द्रमसं ज्ञापयतीति ज्ञापकस्य साधकतमत्वात् करणम् । 'वृक्षा- योदकमासिञ्चति' इति आसिच्यमानेनोदकेन वृक्षमभिप्रेतीति सम्प्रदानम् । वृक्षात्पर्णं पततीति 'ध्रुवमपायेऽपादानम्' इत्यपादानम् । वृक्षे वयांसि सन्तीति 'आधारोऽधिकरणम्' इत्यधिकरणम् । एवं च सति न द्रव्यमात्रं कारकम्, न क्रियामात्रम्, किं तर्हि ? क्रियासाधनं क्रियाविशेषयुक्तं कारकम् । यत्क्रिया- साधनं स्वतन्त्रः स कर्ता, न द्रव्यमात्रं न क्रियामात्रम् । क्रियया व्याप्तुमिष्य- माणतमं कर्म, न द्रव्यमात्रं न क्रियामात्रम् । एवं साधकतमादिष्वपि । एवं च कारकार्थान्वाख्यानं यथैव उपपत्तितः, एवं लक्षणतः कारकान्वाख्यानमपि न द्रव्यमात्रेण न क्रियया वा; किं तर्हि ? क्रियासाधने क्रियाविशेषयुक्त इति । कारकशब्दश्चायं प्रमाणं प्रमेयमिति, स च कारकधर्मं न हातुमर्हति ॥ १६ ॥ अस्ति भोः ! कारक शब्दानां निमित्तवशात् समावेशः । प्रत्यक्षादीनि च प्रमाणानि, उपलब्धिहेतुत्वात्; प्रमेयं चोपलब्धिविषयत्वात् । संवेद्यानि च क्रिया से ईप्सा का विषय होने के कारण वही 'कर्म' हो गया है। इसी प्रकार 'वृक्ष से चन्द्रमा को दिखाता है' यहाँ ज्ञप्ति का साधन होने से वही वृक्ष 'करण' है । 'वृक्ष को जल सींचता है' इस वाक्य में सींचे जाने वाले जल का वृक्ष अभिप्रेत है अतः वह 'सम्प्र- दान' है । 'वृक्ष से पत्ते गिरते हैं' इसमें 'ध्रुवमपायेऽपादानम्' ( पा० सू० १.४.२४ ) इस पाणिनि के नियम से वही वृक्ष 'अपादान' है ।'वृक्ष पर पक्षी बैठे हैं' इस वाक्य में 'आधारो- ऽधिकरणम्' ( पा० सू० ४. १. २५ ) इस नियम से पक्षियों का आधार बन जाने से वह 'अधिकरण' है। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि द्रव्य या क्रिया ही कारक नहीं होते;' अपितु क्रिया ( व्यापार ) का साधन तथा क्रिया ( व्यापार ) विशेष से युक्त कारक होता है। जो स्वतन्त्र रहता हुआ क्रिया का साधन है वह 'कर्ता' कहलाता है न कि केवल द्रव्य या केवल क्रिया । इसी तरह क्रिया से ईप्सिततम कारक 'कर्म' कह- लाता है, न कि केवल द्रव्य या केवल क्रिया । इसी प्रकार साधकतम ( क्रिया का अत्यन्त साधक ) 'करण' आदि कारकों के विषय में भी समझ लेना चाहिये। इस प्रकार जैसे कारक के अर्थ का अन्वाख्यान युक्ति से किया गया है उसी तरह कारकों का स्वरूपकथन भी केवल द्रव्य या क्रिया से नहीं; अपितु 'क्रिया (व्यापार) विशेष से युक्त क्रियासाधन'- ऐसा कर लेना चाहिए। यह 'कारक' शब्द प्रमाण भी है, प्रमेय भी है, यह दोनों अवस्थाओं में अपने 'कारकत्व' को नहीं छोड़ता ॥ १६ ॥ शङ्का—हम उक्त रीति से कारकों का निमित्तों के सम्बन्धों से समावेश होना मान लेते हैं । प्रकृत में - प्रत्यक्षादि उपलब्धिहेतु होने से प्रमाण हैं, उपलब्धिविषय होने से प्रमेय हैं। ये प्रत्यक्षादि संवेद्य (विभाग से जानने योग्य) भी हैं, क्योंकि 'प्रत्यक्ष से जानता हूँ', 'अनुमान से जानता हूँ', 'उपमान से जानता हूँ' 'शब्द प्रमाण से जानता हूँ' —ऐसा CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१७ सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९१

१७ सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९१ प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि—प्रत्यक्षेणोपलभे, अनुमानेनोपलभे, उपमानेनोपलभे, आगमेनोपलभे; प्रत्यक्षम् मे ज्ञानम्, आनुमानिकं मे ज्ञानम्, औपमानिकं मे ज्ञानम्, आगमिकं मे ज्ञानमिति विशेषा१ गृह्यन्ते । लक्षणतश्च ज्ञाप्यमानानि ज्ञायन्ते विशेषेण—‘इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम्’ इत्येवमादिना । सेयमुपलब्धिः प्रत्यक्षादिविषया किं प्रमाणान्तरतः, अथान्तरेण प्रमाणा- न्तरमसाधनेति ? कश्चात्र विशेषः ? प्रमाणतः सिद्धेः प्रमाणानां प्रमाणान्तरसिद्धिप्रसङ्गः ? ॥ १७ ॥ यदि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणेनोपलभ्यन्ते ? येन प्रमाणेनोपलभ्यन्ते तत् प्रमा- णान्तरमस्तीति प्रमाणान्तरसद्भावः प्रसज्यत इति अनवस्थामाह—तस्याप्यन्येन, तस्याप्यन्येनेति । न चानवस्था शक्याऽनुज्ञातुम्; अनुपपत्तेरिति ॥ १७ ॥ अस्तु तर्हि प्रमाणान्तरमन्तरेण निःसाधनेति ? विभक्त प्रमाणरूप से प्रत्यक्षादि का ग्रहण करता है। इसी तरह ‘मेरा यह ज्ञान प्रत्यक्ष से हुआ है’, ‘अनुमान से हुआ है’, ‘उपमान से हुआ है’, ‘आगम से हुआ है’, ऐसे भेद से भी ये प्रमाण गृहीत होते हैं। ये प्रत्यक्षादि, लक्षण से जाने जाते हुए ‘यह ज्ञान इन्द्रिया- र्थसन्निकर्षजन्य है, अतः प्रत्यक्ष है’—ऐसे अपनी विशेषताओं से पृथक् हैं। हमारा आशय यह है कि प्रत्यक्षादि का यह उपर्युक्त ज्ञान क्या किसी प्रमाणान्तर से होता है ? या किसी प्रमाणान्तर के बिना ही असाधन हैं ? सिद्धान्ती पूछता है—यह ज्ञान तुम्हारे बताये प्रकारों में से किसी भी प्रकार से हो, विशेषता क्या आयेगी ? प्रश्नकर्ता उत्तर देता है— यदि यह ज्ञान अन्य प्रमाण से सिद्ध होता है तो ( इनसे भिन्न ) प्रमाणान्तर मानना पड़ेगा ? ॥ १७ ॥ यदि प्रत्यक्षादि प्रमाण से उपलब्ध होते हैं तो ये जिस प्रमाण से उपलब्ध होते हों उस प्रमाणान्तर की सत्ता माननी पड़ेगी । इससे अनवस्था यह पैदा होगी कि उस उस ज्ञान के लिये पूर्व-पूर्व प्रमाणान्तर की अनन्त कल्पनायें करनी पड़ेंगी । प्रायः अयुक्त होने के कारण इस अनवस्था का मानना उचित नहीं है ॥ १७ ॥ तो दूसरा पक्ष—प्रमाणान्तर के बिना ही असाधन है—यह मान लें ? पूर्वपक्षी कहता है— १. ‘ज्ञानविशेषाः’ इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

९२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० तन्निवृत्तेर्वा प्रमाणसिद्धिवत् प्रमेयसिद्धिः ? ॥ १८ ॥ यदि प्रत्यक्षाद्युपलब्धौ प्रमाणान्तरं निवर्तते, आत्माद्युपलब्धावपि प्रमाणान्तरं निवत्स्य॑ते, अविशेषात् ? ॥ १८ ॥ एवं च सर्वप्रमाणविलोप इत्यत आह— न; प्रदीपप्रकाशवत् तत्सिद्धेः ॥ १९ ॥ यथा प्रदीपप्रकाशः प्रत्यक्षाङ्गत्वात् दृश्यदर्शने प्रमाणम्, स च प्रत्यक्षान्तरेण चक्षुषः सन्निकर्षेण गृह्यते। प्रदीपभावाभावयोर्दर्शनस्य तथाभावाद् दर्शनहेतुर- नुमीयते। 'तमसि प्रदीपमुपाददीथाः' इत्याप्तोपदेशेनापि प्रतिपद्यते। एवं प्रत्यक्षा- दीनां यथादर्शनं प्रत्यक्षादिभिरेवोपलब्धिः। इन्द्रियाणि तावत् स्वविषयग्रहणेनैवानुमीयन्ते। अर्थाः प्रत्यक्षतो गृह्यन्ते। इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्त्वावरणेन लिङ्गेनानुमीयन्ते। इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमात्ममनसोः संयोगविशेषादात्मसमवायाच्च सुखादिवद् गृह्यते। एवं उक्त प्रत्यक्षादि के ज्ञान में प्रमाणान्तर न मानने पर आत्मादि प्रमेय की सिद्धि में भी प्रमाणान्तर नहीं मानना पड़ेगा ? ॥ १८ ॥ यदि इस प्रत्यक्षादि ज्ञान में प्रमाणान्तर निवृत्त हो जाता है तो प्रमेय (आत्मा आदि) के ज्ञान में भी प्रमाणान्तर मानने की क्या आवश्यकता है; क्योंकि बात दोनों जगह बराबर है ? ॥ १८ ॥ इस तरह आपका 'सब प्रमाणों का प्रकरण' ही समाप्त हो जायेगा ? (इसका सिद्धान्ती उत्तर देते हैं— ) नहीं; प्रदीपप्रकाश की तरह उसकी सिद्धि हो जायेगी ॥ १९ ॥ जैसे—दीपक का प्रकाश प्रत्यक्ष का अङ्ग ( साधन ) होने से दृश्य को दिखाने में प्रमाण है, और वह प्रत्यक्षान्तर—चक्षुःसन्निकर्ष—से गृहीत होता है। तथा 'दीपक के रहते अन्धकार में दृश्य का दिखायी देना, और दीपक के न रहने पर दिखायी न देना—' इस व्यतिरेकव्याप्ति से दीपक में दर्शनहेतुत्व अनुमान प्रमाण से, तथा 'अन्धकार में दीपक का सहारा लेना चाहिये'—इस आप्तोपदेश से भी सिद्ध किया जा सकता है ! अतः सिद्ध हो गया कि दीपक की तरह प्रत्यक्षादि प्रमाणों का भी दर्शन के अनुसार उन्हीं प्रत्यक्षादि प्रमाणों से ज्ञान हो जाता है। अतीन्द्रिय इन्द्रियों का स्वविषयग्रहणरूप हेतु से अनुमान होता है, अर्थों का प्रत्यक्ष होता है, इन्द्रिय और अर्थ का सम्बन्ध आवरण हेतु से अनुमित होता है, इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से उत्पन्न ज्ञान भी सुखादि ज्ञान की तरह आत्मनःसंयोग, तथा आत्मा के साथ समवाय ( सम्बन्ध ) से होता है—इस प्रकार प्रमाणविशेष का विभागपूर्वक विवेचन करना CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१९. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९३

१९. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९३ प्रमाणविशेषी विभज्य वचनीयः । यथा च दृश्यः सन् प्रदीपप्रकाशो दृश्यान्तराणां दर्शनहेतुरिति दृश्यदर्शनव्यवस्थां लभते, एवं प्रमेयं सत्किञ्चिदर्थजातमुपलब्धि- हेतुत्वात् प्रमाणप्रमेयव्यवस्थां लभते । सेयं प्रत्यक्षादिभिरेव प्रत्यक्षादीनां यथा- दर्शनमुपलब्धिर्न प्रमाणान्तरतः, न च प्रमाणमन्तरेण निःसाधनेति । तेनैव तस्याग्रहणमिति चेद् ? न; अर्थभेदस्य लक्षणसामान्यात् । प्रत्यक्षा- दीनां प्रत्यक्षादिभिरेव ग्रहणमित्ययुक्तम्, अन्येन ह्यन्यस्य ग्रहणं दृष्टमिति ? न; अर्थभेदस्य लक्षणसामान्यात् । प्रत्यक्षलक्षणेनानेकोऽर्थः सङ्गृहीतः, तत्र केनचित् कस्यचिद् ग्रहणमित्यदोषः । एवमनुमानादिष्वपीति । यथा—उद्धृतेनोदकेना- शयस्थस्य ग्रहणमिति । ज्ञातृमनसोश्च दर्शनात् । अहं सुखी, अहं दुःखी चेति तेनैव ज्ञात्रा तस्यैव ग्रहणं दृश्यते । 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्' ( १. १. १६ ) इति च तेनैव मनसा तस्यैवानुमानं दृश्यते, ज्ञातुर्ज्ञेयस्य चाभेदो ग्रहणस्य ग्राह्यस्य चाभेद इति । चाहिये । और जैसे प्रदीपप्रकाश स्वयं दृश्य होता हुआ दृश्यान्तर का दर्शनहेतु बनकर दृश्य ( प्रमेय ) दर्शन ( प्रमाण ) व्यवस्था को प्राप्त कर लेता है, इसी प्रकार आत्मादि (पदार्थ) भी जब स्वयं ज्ञान का विषय होता है तो 'प्रमेय', तथा जब किसी अन्य पदार्थ के ज्ञान का साधन बन जाता है तो 'प्रमाण' कहलाता है । यों यह प्रत्यक्षादि का ज्ञान प्रत्यक्षादि की उपलब्धि के अनुसार गृहीत हो जाता है, इसके लिए न प्रमाणान्तर की आवश्यकता है, न प्रमाणान्तर के बिना यह असाधन ही है । यदि यह कहें कि उसी ( प्रत्यक्ष ) से उस ( प्रत्यक्ष ) का ग्रहण नहीं होगा ? तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि भिन्न-भिन्न प्रत्यक्षादि सभी रूप अर्थ प्रत्यक्ष के साधारण लक्षण से गृहीत हैं । तात्पर्य यह है कि प्रत्यक्षादि से प्रत्यक्षादि का ग्रहण युक्त नहीं, क्योंकि दूसरा दूसरे को देखता है—ऐसा ही लोक में देखा जाता है ? नहीं, क्योंकि भिन्न-भिन्न प्रत्यक्षादि रूप अर्थों में साधारण लक्षण समान है । उस प्रत्यक्ष के लक्षण में अनेक अर्थ संगृहीत हैं, अतः वहाँ किसी से किसी न किसी का ग्रहण हो जायेगा—अतः कोई दोष नहीं । इसी तरह अनुमानादि के विषय में भी समझना चाहिये; जैसे—जला- शय से उद्धृत जल का अनुमान होता है । ज्ञाता ( आत्मा ) तथा मन में अपने से ही अपना ज्ञान होता है । 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ'—यह उस ज्ञाता द्वारा उसका अपने विषय में ही ज्ञान देखा जाता है । 'युगपद् ज्ञान का अनुत्पाद मन की सत्ता में हेतु हैं' ( १. १. १६ ) इस लक्षण से उसी मन से उस मन का अनुमान देखा जाता है । आत्मा में ज्ञाता तथा ज्ञेय का, और मन में ग्रहण व ग्राह्य का अभेद ही है, अतः वे स्व से स्व का ज्ञान करने में असमर्थ नहीं होते । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

९४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० निमित्तभेदोऽत्रेति चेत् ? समानम् । न निमित्तान्तरेण विना ज्ञाताऽऽत्मानं जानीते, न च निमित्तान्तरेण विना मनसा मनो गृह्यत इति ? समानमेतत्; प्रत्यक्षादिभिः प्रत्यक्षादीनां ग्रहणमित्यत्राप्यर्थभेदो न गृह्यत इति । प्रत्यक्षादीनां चाविषयस्यानुपपत्तेः । यदि स्यात् किञ्चिदर्थजातं प्रत्यक्षा- दीनामविषयः-यत्प्रत्यक्षादिभिर्न शक्यं ग्रहीतुम्, तस्य ग्रहणाय प्रमाणान्तरमुपा- दीयेत, तत्तु न शक्यं केनचिदुपपादयितुमिति । प्रत्यक्षादीनां यथादर्शनमेवेदं सच्चासच्वं सर्वं विषय इति ॥ १९ ॥ केचित्तु दृष्टान्तमपरिगृहीतं हेतुना विशेषहेतुमन्तरेण साध्यसाधनायोपा- ददते-'यथा प्रदीपप्रकाशः प्रदीपान्तरप्रकाशमन्तरेण गृह्यते, तथा प्रमाणानि प्रमाणान्तरेण गृह्यते' इति । स चायम्— क्वचिन्निवृत्तिदर्शनादनिवृत्तिदर्शनाच्च क्वचिदनेकान्तः १ ॥ २० ॥ यथा चायं प्रसङ्गो निवृत्तिदर्शनात् प्रमाणसाधनायोपादीयते, एवं प्रमेयसाधनायाप्युपादेयः, अविशेषहेतुत्वात् । यथा च स्थाल्यादिरूपग्रहणे यदि कहें कि आत्मा तथा मन में तादृश ज्ञान के लिये एक सहकारिविशेष ग्राह्य- ग्राहकसम्बन्ध नियामक माना गया है ? तो प्रत्यक्षादि में भी बात वरावर है । तात्पर्य यह है कि यदि पूर्वपक्षी कहे कि दूसरे निमित्त के विना ज्ञाता अपने आप को कैसे जानेगा, या ज्ञानसाधनरूप अन्य निमित्त हुए विना मन स्वयं को कैसे जानेगा ? तो यह ठीक नहीं; क्योंकि प्रत्यक्षादि प्रमाणों में भी यह बात समान ही है । 'प्रत्यक्षादिकों से प्रत्यक्षादि का ग्रहण होता है' यहाँ भी पूर्वोक्त रीति से अर्थभेद न होने पर भी अर्थ जाना ही जाता है । ऐसा भी सम्भव है कि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों को अगोचर विषय की सिद्धि में प्रमाणान्तर की अपेक्षा हो सकती है? नहीं, ऐसा कोई विषय नहीं है जो इन प्रमाणों में से किसी का विषय न हो । अतः, दर्शनानुसारेण सत् हो या असत् वह प्रत्यक्षादि का विषय है ही ॥ १९ ॥ कुछ विद्वान् हेतु से अपरिगृहीत दृष्टान्त को विशेष हेतु के विना साध्य की सिद्धि के लिए प्रयुक्त करते हैं, जैसे—प्रदीपप्रकाश प्रदीपान्तर के विना स्वयं दिखायी दे जाता है, उसी तरह प्रमाण भी प्रमाणान्तर के विना उपलब्ध हो सकते हैं ? वह यह— कहीं (प्रदीपादि में) निवृत्ति दीखने से, कहीं (पटरूपादि में) निवृत्ति न दीखने से (यह हेतु) अनेकान्तिक (व्यभिचारी) है ॥ २० ॥ जैसे प्रदीप के उदाहरण (दृष्टान्त) से प्रमाणान्तर के विना प्रत्यक्षादि प्रमाणों की सिद्धि करते हैं उसी प्रकार यह उदाहरण प्रमेय (स्थाली-आदि) की सिद्धि के समय में ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि बात उभयत्र समान है । अथ च, स्थाल्यादि का रूप जानने १. क्वचिदिदं सूत्रत्वेन न लिखितम् ।

२०. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९५

२०. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९५ प्रदीपप्रकाशः प्रमेयसाधनायोपादीयते, एवं प्रमाणसाधनायाप्युपादेयः; विशेष- हेत्वभावात् । सोऽयं विशेषहेतुपरिग्रहमन्तरेण दृष्टान्त एकस्मिन् पक्षे उपादेयो न प्रतिपक्ष इत्यनेकान्तः । एकस्मिंश्च पक्षे दृष्टान्त उपादेयो न प्रतिपक्षे दृष्टान्त इत्यनेकान्तः; विशेषहेत्वभावादिति । विशेषहेतुपरिग्रहे सति उपसंहाराभ्यनुज्ञानादप्रतिषेधः¹ । विशेषहेतुपरिगृही- तस्तु दृष्टान्त एकस्मिन् पक्षे उपसंह्रियमाणो न शक्योऽननुज्ञातुम् । एवं च सत्यनेकान्त इत्ययं प्रतिषेधो न भवति । प्रत्यक्षादीनां प्रत्यक्षादिभिरुपलब्धावनवस्थेति चेद् ? न; संविद्विषय- निमित्तानामुपलब्ध्या व्यवहारोपपत्तेः । प्रत्यक्षेणार्थमुपलभे, अनुमानेनार्थ- मुपलभे, उपमानेनार्थमुपलभे, आगमेनार्थमुपलभे इति, प्रत्यक्षं मे ज्ञानमानु- मानिकं मे ज्ञानमौपमानिकं मे ज्ञानमागम्रिकं मे ज्ञानमिति—संविद्विषयं संविन्निमित्तं चोपलभमानस्य धर्मार्थसुखापवर्गप्रयोजनस्तत्प्रत्यनीकपरिवर्जन- के लिए जैसे प्रदीपप्रकाश आवश्यक है, उसी प्रकार उन प्रमाणादि को जानने के लिये प्रमाणान्तर की आवश्यकता पड़ेगी ही—इस तरह विशेष हेतु के बिना ही परिगृहीत 'दृष्टान्त' एक ही पक्ष में उपादेय होता हैं, प्रतिपक्ष में नहीं—अतः अनैकान्तिक है । अर्थात् प्रमाणान्तर को न मानने में प्रदीपप्रकाश दृष्टान्त को लेना तथा स्थाल्यादि के रूपप्रकाश के लिये दूसरे प्रमाण की आवश्यकता में न लेना—यह इस हेतु में अनैकान्तिक दोष है; क्योंकि एक ही पक्ष का दृष्टान्त लेने में कोई विशेष हेतु नहीं है। यदि उपर्युक्त दोनों पक्षों में से किसी एक पक्ष का साधक कोई विशेष हेतु स्वीकार किया जाये तो उस पक्ष के दृष्टान्त के बल पर 'उपसंहार' (चतुर्थ अवयव) के स्वीकार होने से प्रतिषेध नहीं बनेगा । तात्पर्य यह है कि विशेषहेतु से परिगृहीत दृष्टान्त एक पक्ष में उपसंहृत होता है तो इसमें आपको क्या आपत्ति है ! ऐसा मान लेने से आपका उठाया 'अनैकान्तिक' वाला प्रतिषेध भी नहीं बन सकेगा । प्रत्यक्षादि प्रमाणों की उन्हीं प्रत्यक्षादिकों से सिद्धि मानने से अनवस्था दोष होने लगेगा ? नहीं; क्योंकि ज्ञानविषय कारणों की उपलब्धि होने से सम्पूर्ण व्यवहार चलते देखे जाते हैं। 'प्रत्यक्ष द्वारा विषय को जानता हूँ' 'अनुमान द्वारा साध्य को जानता हूँ', 'उपमान से उपमेय को जानता हूँ' 'आगम (शब्द) द्वारा विषय को जानता हूँ'—ऐसा, या 'मेरा ज्ञान प्रत्यक्ष है' 'आनुमानिक है', औपमानिक है', 'शब्द है'—ऐसे ज्ञान, तथा ज्ञानविषय को जानने वाले पुरुष के धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति के लिए तथा १. भाष्यमिदं सूत्रत्वेन क्वचिदुल्लिखितम् । प्रमाणं प्रमाणान्तरनिरपेक्षम्, प्रकाश- कत्वात्, प्रदीपवदिति विशेषहेतुपरिग्रहे सतीत्यर्थः ।

न्तरमनवस्थासाधनीयम्, येन प्रयुक्तोऽनवस्थामुपाददीतेति ॥ २० ॥

९६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० प्रयोजनश्च व्यवहार उपपद्यते । सोऽयं तावत्येव निर्वर्त्तते । न चास्ति व्यवहारा- न्तरमनवस्थासाधनीयम्, येन प्रयुक्तोऽनवस्थामुपाददीतेति ॥ २० ॥ प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् [ २१-३७ ] प्रत्यक्षलक्षणपरीक्षा सामान्येन प्रमाणानि परीक्ष्य विशेषेण परीक्ष्यन्ते । तत्र— [ पूर्वपक्षः ] प्रत्यक्षलक्षणानुपपत्तिरसमग्रवचनात् ॥ २१ ॥ आत्ममनःसन्निकर्षो हि कारणान्तरं नोक्तमिति । न चासंयुक्ते द्रव्ये संयोगजन्यस्य गुणस्योत्पत्तिरिति, ज्ञानोत्पत्तिदर्शनादात्म- मनःसन्निकर्षः कारणम् । मनःसन्निकर्षानपेक्षस्य चेन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य ज्ञान- कारणत्वे युगपदुत्पद्येरन् बुद्धय इति मनःसन्निकर्षोऽपि कारणम् । तदिदं सूत्रं पुरस्तात् कृतभाष्यम्¹ ॥ २१ ॥ नात्ममनसोः सन्निकर्षाभावे प्रत्यक्षोत्पत्तिः ॥ २२ ॥ तद्विरुद्ध को छोड़ने के लिए किये गये समग्र व्यवहार चलते हैं । ये व्यवहार उतने पर आकर अपने व्यापार से निवृत्त हो जाते हैं । अन्य कोई व्यवहार अवशिष्ट नहीं जिसमें अनवस्था दी जा सके, या जिसके द्वारा अनवस्था का ग्रहण कर सके ॥ २० ॥ प्रमाणों की सामान्यरूप से परीक्षा की जा चुकी, अब विशेषरूप से परीक्षा कर रहे हैं । उनमें सर्वप्रथम प्रत्यक्ष के विषय में विचार करते हैं— लक्षण पूर्ण विषयविषयक न होने से प्रत्यक्ष का लक्षण नहीं बनता ॥ २१ ॥ आत्ममनःसन्निकर्ष भी प्रत्यक्ष में कारण है, वह आपने प्रत्यक्ष-लक्षण में नहीं दिखाया (अतः आपका प्रत्यक्षलक्षण पूर्ण नहीं है) । असंयुक्त द्रव्य संयोगजन्य गुण की उत्पत्ति नहीं होती; जब कि ज्ञानोत्पत्ति होती है तब आत्ममनःसन्निकर्ष से लोक में ज्ञानोत्पत्ति देखे जाने से यह भी प्रत्यक्ष का कारण है । मनःसन्निकर्ष की अपेक्षा न रखते हुए इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को ही प्रत्यक्ष का कारण मानने पर अनेक ज्ञान एक साथ उत्पन्न होने लगेंगे, अतः मनःसन्निकर्ष भी प्रत्यक्ष में कारण है । इस सूत्र के व्याख्यान में कथनीय विषय का विस्तृत विवेचन हम पहले ( १. १. ४ ) कर चुके हैं ॥ २१ ॥ आत्ममनःसन्निकर्ष के बिना प्रत्यक्ष की उत्पत्ति नहीं होती ॥ २२ ॥ १. अत्र तात्पर्यकाराः—‘‘तदिदम् ‘नात्ममनसोः सन्निकर्षा०' इत्यादि सूत्रं पाठस्य पुरस्तात् कृतभाष्यम्''—एवं व्याचक्षते, तत् युक्तिपूर्वकं न्यायपरिशुद्धौ खण्डितम् ।

२४. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ९७

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२४. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ९७ आत्ममनसोः सन्निकर्षाभावे नोत्पद्यते प्रत्यक्षम्, इन्द्रियार्थसन्निकर्षाभाव- वदिति ॥ २२ ॥ सति चेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानोत्पत्तिदर्शनात् कारणभावं ब्रुवतः- दिग्देशकालाकाशेष्वप्येवं प्रसङ्गः ? ॥ २३ ॥ दिगादिषु सत्सु ज्ञानभावात् तान्यपि कारणानीति ? । अकारणभावेऽपि ज्ञानोत्पत्तिः, दिगादिसन्निधेरवर्जनीयत्वात् । यदाप्यकारणं दिगादीनि ज्ञानोत्पत्तौ, तदापि सत्सु दिगादिषु ज्ञानेन भवितव्यम्, न हि दिगा- दीनां सन्निधिः शक्यः परिवर्जयितुमिति । तत्र कारणभावे हेतुवचनम्-एतस्मा- द्धेतोर्दिगादीनि ज्ञानकारणानीति ॥ २३ ॥ आत्ममनःसन्निकर्षस्तर्ह्युपसङ्ख्येय इति ? [ सिद्धान्तपक्षः ] तत्रेदमुच्यते- ज्ञानलिङ्गत्वादात्मनो नानवरोधः१ ॥ २४ ॥ आत्मा तथा मन के सन्निकर्ष के बिना प्रमेय का प्रत्यक्ष नहीं होता, जैसे इन्द्रियार्थ- सन्निकर्ष के बिना उसका प्रत्यक्ष नहीं होता; अतः आत्ममनःसन्निकर्ष भी प्रत्यक्ष में कारण है ॥ २२ ॥ [मध्यस्थ पुरुष पूर्वपक्षी तथा सिद्धान्ती, दोनों को आपत्ति दे रहा है-] इन्द्रियार्थ- सन्निकर्ष की सत्ता से ज्ञान (प्रत्यक्ष) की उत्पत्ति देखी जाने से उक्त सन्निकर्ष को प्रत्यक्ष का कारण बतलानेवाले के मत में- दिशा देश, काल, आकाश में भी यही प्रसङ्ग होने लगेगा ॥ २३ ॥ प्रत्यक्ष के समय दिशा-आदि भी रहते हैं तो इन्हें भी प्रत्यक्ष का कारण मान लिया जाये ? [मध्यस्थ पुरुष को इस आपत्ति का भाष्यकार परिहार करते हैं-] यदि उक्त दिशा-आदि को ज्ञान का कारण न मानें तो भी उनके सामीप्य को हटाना दुःशक है अर्थात् उनको कारण मानने या न मानने पर भी ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व वे रहते ही हैं, अतः उनका सामीप्य निराकृत करना असम्भव है। उनका कारणत्व सिद्ध करने के लिए आप (मध्यस्थ) को कोई हेतु दिखाना चाहिये कि इस हेतु से वे दिगादिक प्रत्यक्ष में कारण हैं ॥ २३ ॥ [पूर्वपक्षी सिद्धान्ती से पूछता है-] तो प्रत्यक्षलक्षण में 'आत्ममनःसन्निकर्ष' का उपसङ्ख्यान कर देना चाहिये ? सिद्धान्ती उत्तर देता है- आत्मा की ज्ञानरूप हेतु से सिद्धि होने के कारण (प्रत्यक्ष-लक्षण में) उसका असंग्रह नहीं है ॥ २४ ॥ १. 'नाऽवरोधः' इति, 'नानवबोधः' इति च पाठ० । न्या०-द० ७

९८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० ज्ञानमात्मलिङ्गम्; तद्गुणत्वात् । न चासंयुक्ते द्रव्ये संयोगजस्य गुणस्यो- त्पत्तिरस्तीति ॥ २४ ॥ तदयौगपद्यलिङ्गत्वाच्च न मनसः ॥ २५ ॥ अनवरोध इति वर्त्तते । 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्' ( १. १. १६ ) इत्युच्यमाने सिद्धत्येव मनःसन्निकर्षापेक्ष इन्द्रियार्थसन्निकर्षो ज्ञानकारण- मिति ॥ २५ ॥ प्रत्यक्षनिमित्तत्वाच्चेन्द्रियार्थयोः सन्निकर्षस्य स्वशब्देन वचनम् ॥ २६ ॥ प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दानां निमित्तमात्ममनःसन्निकर्षः, प्रत्यक्षस्यैवेन्द्रियार्थ- सन्निकर्ष इत्यसमानः, असमानत्वात् तस्य ग्रहणम् ॥ २६ ॥ सुप्तव्यासक्तमनसां चेन्द्रियार्थयोः सन्निकर्षनिमित्तत्वात् ॥ २७ ॥ आत्मा का गुण होने से ज्ञान उसका (साधक) है। असंयुक्त द्रव्य में संयोजक गुण की उत्पत्ति नहीं देखी जाती । अतः प्रत्यक्षलक्षण में ज्ञान का निवेश होने से आत्ममनः- सन्निकर्ष भी उसमें आ जाता है, पृथक्पाठ की कोई आवश्यकता नहीं ॥ २४ ॥ और अनेक ज्ञान के एक काल में न होने का साधक होने से मन का भी (प्रत्यक्ष- लक्षण में असंग्रह) नहीं (है) ॥ २५ ॥ ऊपर (२४वें सूत्र) से 'अनवरोधः' की अनुवृत्ति आ रही है। 'एक साथ अनेक ज्ञानों की अनुत्पत्ति ही मन की सत्ता में हेतु हैं' (१. १. १६)—ऐसा जब हम कह चुके तो उसी से यह सिद्ध हो जाता है कि इन्द्रियार्थसन्निकर्षज प्रत्यक्ष भी मनःसन्निकर्ष की अपेक्षा रखता है ॥ २५ ॥ [यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि उक्त प्रकार से आत्मा तथा मन का प्रत्यक्षलक्षण में समावेश हो सकता है तो इन्द्रिय-अर्थ के सन्निकर्ष का भी प्रत्यक्षलक्षण में कारण होने से आत्ममनस्क सन्निकर्ष की तरह ग्रहण हो सकता था, फिर उसका प्रत्यक्षलक्षण में शब्दतः ग्रहण क्यों किया ? इसके उत्तर में सूत्रकार कहते हैं—] एकमात्र प्रत्यक्ष ज्ञान में कारण होने से इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष को शब्दतः (नामग्रहणपूर्वक) लक्षण में पढ़ा गया है ॥ २६ ॥ आत्ममनःसन्निकर्ष तो सामान्यतः प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द—चारों ही प्रमाणों के सहकारी कारण है; परन्तु इन्द्रियार्थसन्निकर्ष प्रत्यक्ष में ही कारण है—यह विशेषता है। अतः उसका कण्ठतः शब्दपूर्वक ग्रहण किया गया है ॥ २६ ॥ [सूत्रकार कण्ठतः ग्रहण में एक कारण और बतला रहे हैं—] सोये हुए तथा किसी एक विषय में आसक्त मन वाले पुरुषों के प्रत्यक्ष में इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष में निमित्त कारणत्व होने से भी ॥ २७ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

२८. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ९९

२८. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ९९ इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य ग्रहणम्, नात्ममनसोः सन्निकर्षस्येति । एकदा खल्वयं प्रबोधकालं प्रणिधाय सुप्तः प्रणिधानवशात् प्रबुध्यते । यदा तु तीव्रौ ध्वनि- स्पर्शा प्रबोधकारणं भवतः, तदा प्रसुप्तस्येन्द्रियार्थसन्निकर्षनिमित्तं प्रबोधज्ञान- मुत्पद्यते, तत्र न ज्ञातुर्मनसश्च सन्निकर्षस्य प्राधान्यं भवति, किं तर्हि ? इन्द्रि- यार्थयोः सन्निकर्षस्य । न ह्यात्मा जिज्ञासमानः प्रयत्नेन मनस्तदा प्रेरयतीति । एकदा खल्वयं विषयान्तरासक्तमनाः सङ्कल्पवशाद्विषयान्तरं जिज्ञासमानः प्रयत्नप्रेरितेन मनसा इन्द्रियं संयोज्य तद्विषयान्तरं जानीते । यदा तु खल्वस्य निःसङ्कल्पस्य निर्जिज्ञासस्य च व्यासक्तमनसो बाह्यविषयोपनिपातनाज्ज्ञान- मुत्पद्यते तदेन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य प्राधान्यम् । न ह्यत्रासौ जिज्ञासमानः प्रयत्नेन मनः प्रेरयतीति । प्राधान्याच्चेन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य ग्रहणं कार्यम्, गुणत्वाद् नात्ममनसोः सन्निकर्षस्येति ॥ २७ ॥ प्राधान्ये च हेत्वन्तरम्— तैश्चापदेशो ज्ञानविशेषाणाम् ॥ २८ ॥ प्रत्यक्षलक्षण में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष का ग्रहण है, आत्ममनःसन्निकर्ष का नहीं । कोई पुरुष 'मैं अमुक समय पुनः जग जाऊँगा'—ऐसा निश्चय करके सो जाता है, तो उस निश्चय के अनुसार जग जाता है । परन्तु जब कोई तीव्र शब्द या किसी वस्तु का स्पर्श जगने में कारण बन जायें तो उस सोये हुए को बीच में इन्द्रियसन्निकर्षहेतुक प्रबोध ज्ञान हो जाता है । उक्त प्रबोध ज्ञान में आत्मा या मन का सन्निकर्ष प्रधान (मुख्य) नहीं हैं; अपितु इन्द्रियार्थसन्निकर्ष का ही प्राधान्य है; क्योंकि उस समय आत्मा किसी जिज्ञासा से प्रयत्नपूर्वक मन को कोई प्रेरणा नहीं करता । इसी प्रकार कभी आत्मा किसी समय किसी दूसरे विषय में चित्त के आसक्त होने पर भी संकल्पवश अन्य विषय की जिज्ञासा करता हुआ मन को इन्द्रिय से लगा कर विषयान्तर जान लेता है; परन्तु यही निःसङ्कल्प रहे या कोई जिज्ञासा न करे तथा अन्य विषय में आसक्त हो तो उस समय भी बाह्य विषय का जो अकस्मात् ज्ञान होता है— उसमें इन्द्रियार्थसन्निकर्ष ही प्रधान होता है, न कि आत्ममनःसन्निकर्ष; क्योंकि इसमें भी आत्मा कोई प्रयत्न करके मन को प्रेरणा नहीं करता । इस प्रकार उक्त प्रत्यक्षलक्षण में मुख्य होने के कारण इन्द्रियार्थसन्निकर्ष का ही ग्रहण करना चाहिये, न कि गौण आत्ममनःसन्निकर्ष का ॥ २७ ॥ इस इन्द्रियार्थसन्निकर्ष के मुख्य होने में एक और कारण है— ज्ञानविशेषों (चाक्षुष, घ्राणज आदि विभिन्न प्रत्यक्षज्ञानों) का उन्हीं इन्द्रियों से व्यवहार होता है ॥ २८ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१०० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० तैरिन्द्रियैरर्थैश्च व्यपदिश्यन्ते ज्ञानविशेषाः । कथम् ? घ्राणेन जिघ्रति, चक्षुषा पश्यति, रसनया रसयतीति; घ्राणविज्ञानं चक्षुर्विज्ञानं रसनविज्ञानं गन्धविज्ञानं रूपविज्ञानं रसविज्ञानमिति च । इन्द्रियविषयविशेषाच्च पञ्चधा बुद्धिर्भवति । अतः प्राधान्यमिन्द्रियार्थसन्निकर्षस्येति ॥ २८ ॥ यदुक्तम्—‘इन्द्रियार्थसन्निकर्षग्रहणं कार्यम्, नात्ममनसोः सन्निकर्षस्येति, कस्मात् ? सुप्तव्यासक्तमनसामिन्द्रियार्थयोः सन्निकर्षस्य ज्ञाननिमित्तत्वात्' इति, सोऽयम्— व्याहतत्वादहेतुः ॥ २९ ॥ यदि तावत् क्वचिदात्मनसोः सन्निकर्षस्य ज्ञानकारणत्वं नेष्यते ? तदा 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्' ( १. १. १६ ) इति व्याहन्येत । नेदानीं मनसः सन्निकर्षमिन्द्रियार्थसन्निकर्षोऽपेक्षते । मनःसंयोगानपेक्षायां च युगपद् ज्ञानोत्पत्तिप्रसङ्गः । अथ मा भूद् व्याघात इति सर्वविज्ञानानामात्ममनसोः सन्निकर्षः कारणमिष्यते ? तदवस्थमेवेदं भवति—'ज्ञानकारणत्वादात्ममनसोः सन्निकर्षस्य ग्रहणं कार्यम्' इति ॥ २९ ॥ उन उन इन्द्रिय तथा अर्थों से वे वे ज्ञान व्यवहृत होते हैं । जैसे—नाक से सूंघता है, आँख से देखता है, जिह्वा से चखता है; या यह नाक से प्रत्यक्ष हुआ ज्ञान है, यह आँख से हुआ ज्ञान है, यह घ्राणेन्द्रिय से उत्पन्न गन्ध का ज्ञान है, यह चक्षुरिन्द्रिय से उत्पन्न रूप का ज्ञान है और यह जिह्वेन्द्रिय से उत्पन्न रस का ज्ञान है आदि । इन्द्रिय तथा उनके विषयों के भेद से यह ज्ञान पाँच प्रकार का है । अस्तु । इस लिये भी इन्द्रियार्थसन्निकर्ष के प्रधान होने से प्रत्यक्षलक्षण में इस 'इन्द्रियार्थसन्निकर्ष' का शब्दतः ग्रहण हुआ है ॥ २८ ॥ पूर्वपक्ष—यह जो कहा था कि 'इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को ही प्रत्यक्षलक्षण में लेना चाहिये, आत्ममनःसन्निकर्ष को नहीं; क्योंकि सुप्त तथा व्यासक्तमना पुरुषों के आकस्मिक ज्ञान में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष ही प्रधानतया कारण हैं'—यह हेतु विरोधी होने के कारण असद्धेतु है ? ॥ २९ ॥ क्योंकि यदि आत्ममनःसन्निकर्ष को कहीं प्रत्यक्ष ज्ञान में कारण न मानोगे तो 'युगपज्ज्ञानानुत्पाद ही मन की सत्ता में हेतु हैं' (१.१.१६)—यह वचन-भंग हो जायेगा; क्योंकि सुप्त-व्यासक्तमना पुरुषों का इन्द्रियार्थसन्निकर्षज ज्ञान मनःसन्निकर्ष की अपेक्षा नहीं रखता । यदि यह ज्ञान मनःसन्निकर्ष की अपेक्षा न रखेगा तो फिर युगपद् अनेक ज्ञान भी उत्पन्न होने लगेंगे । और यदि, उक्त वचनभङ्ग न हो, इसलिए सभी प्रत्यक्ष ज्ञानों में आत्ममनःसन्निकर्ष मानोगे तो फिर वही बात मान लेनी होगी कि ज्ञानकारण होने से आत्ममनःसन्निकर्ष का भी प्रत्यक्षलक्षण में ग्रहण करना चाहिए ? ॥ २९ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

३०. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०१

३०. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०१ नार्थविशेषप्राबल्यात् ॥ ३० ॥ नास्ति व्याघातः, न ह्यात्ममनःसन्निकर्षस्य ज्ञानकारणत्वं व्यभिचरति । इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य प्राधान्यमुपादीयते ; अर्थविशेषप्राबल्याद्धि सुप्तव्यासक्त- मनसां ज्ञानोत्पत्तिरेकदा भवति । अर्थविशेषः = कश्चिदेवेन्द्रियार्थः, तस्य प्राबल्यम् = तीव्रता-पटुते । तच्चार्थविशेषप्राबल्यमिन्द्रियार्थसन्निकर्षविषयम्, नात्ममनसोः सन्निकर्षविषयम् । तस्मादिन्द्रियार्थसन्निकर्षः प्रधानमिति । असति प्रणिधाने, सङ्कल्पे चासति, सुप्तव्यासक्तमनसां यदिन्द्रियार्थसन्न्रि- कर्षादुत्पद्यते ज्ञानं तत्र मनःसंयोगोऽपि कारणमिति मनसि क्रियाकारणं वाच्यमिति ? यथैव ज्ञातुः खल्वयमिच्छाजनितः प्रग्रहो१ मनसः प्रेरक आत्मगुणः, एव- मात्मनि गुणान्तरं सर्वस्य साधकं प्रवृत्तिदोषजनितमस्ति, येन प्रेरितं मन इन्द्रियेण सम्बध्यते । तेन ह्यप्रेर्यमाणे मनसि संयोगाभावाद् ज्ञानानुत्पत्तौ सर्वार्थताऽस्य निवर्त्तते । एषितव्यं चास्य गुणान्तरस्य द्रव्यगुणकर्मकारणत्वम्; उत्तरपक्ष- किसो इन्द्रियविशेष के प्रवल होने से (वचनव्याघात नहीं है) ॥ ३० ॥ वचनव्याघात नहीं है, अर्थात् आत्ममनःसनिकर्ष का ज्ञानकारणत्व व्यभिचरित नहीं होता । हम तो इन्द्रियार्थसन्निकर्ष कारण को प्रत्यक्षज्ञान में प्रधानतामात्र दे रहे हैं; क्यों- कि सुप्त या व्यासक्तमना पुरुषों को अर्थविशेष के प्राधान्य से उस-उस समय में वैसा-वैसा ज्ञानोत्पाद हो जाता है । अर्थविशेष से तात्पर्य है कोई खास इन्द्रियार्थ, उसका प्राबल्य अर्थात् तीव्रता या पटुता । यह अर्थविशेष की प्रबलता इन्द्रियार्थसन्निकर्षविषयक ही है, न कि आत्ममनःसन्निकर्षविषयक । अतः इन्द्रियार्थसन्निकर्ष ही प्रत्यक्षज्ञान में प्रधान है । . शङ्का-इच्छा तथा सङ्कल्प के न रहने पर सुप्त तथा व्यासक्तमना पुरुषों का जो इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से ज्ञान उत्पन्न होता है, वहाँ मनःसंयोग भी कारण है तो उस संयोग को उत्पन्न करनेवाली मनःक्रिया किस कारण से होती है-यह बताना चाहिये ? उत्तर-जैसे आत्मा ( ज्ञाता ) का इच्छाजनित प्रयत्न मन का प्रेरक है, उसी प्रकार आत्मा में एक और ( अदृष्ट ) गुण है जो कि समग्र भोग तथा उनके साधनों का जनक है, तथा पूर्वोक्त ( १.१.१७-१८ ) प्रवृत्ति तथा दोष से जनित है, इसकी प्रेरणा से मन इन्द्रिय के साथ सम्बद्ध होता है । वह अदृष्ट आत्मगुण यदि मन को प्रेरणा न करे तो संयोग न होने से ज्ञानोत्पत्ति न हो सकने से इसकी सर्वार्थता (.सब कार्यों का कारण होना ) निवृत्त हो जाती है; अदृष्ट गुण को द्रव्य, गुण तथा कर्मों का कारण मानना भी आवश्यक है; अन्यथा पृथ्वी-आदि चार भूतों के मूल कारण अणु सूक्ष्म १. 'प्रयत्नः' इति पाठ० ।

१०२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० अन्यथा हि चतुर्विधानामणूनां भूतसूक्ष्माणां मनसां च ततोऽन्यस्य क्रियाहेतो- रसम्भवात् शरीरेन्द्रियविषयाणामनुत्पत्तिप्रसङ्गः ॥ ३० ॥ विषयपरीक्षा प्रत्यक्षमनुमानमेकदेशग्रहणादुपलब्धेः ? ॥ ३१ ॥ यदिदमिन्द्रियार्थसन्निकर्षादुत्पद्यते ज्ञानम् 'वृक्ष' इति एतत् किल प्रत्यक्षम्, तत् खल्वनुमानमेव । कस्मात् ? एकदेशग्रहणात् वृक्षस्योपलब्धेः । अर्वाग्भागमयं गृहीत्वा वृक्षमुपलभते; न चैकदेशो वृक्षः । तत्र यथा धूमं गृहीत्वा वह्निमनु- मिनोति तादृगेव तद् भवति ? ॥ ३१ ॥ किं पुनर्गुह्यमाणादेकदेशाद् अर्थान्तरमनुमेयं मन्यसे ! अवयवसमूहपक्षे अवयवान्तराणि, द्रव्यान्तरोत्पत्तिपक्षे तानि चावयवी चेति ? अवयवसमूह- पक्षे तावदेकदेशग्रहणाद् वृक्षबुद्धेरभावः, नागृह्यमाणमेकदेशान्तरं वृक्षो गृह्य- भूत तथा इस मन में अदृष्ट गुण को छोड़कर अन्य कोई क्रियोत्पादक कारण न होने से शरीर, इन्द्रिय तथा विषयों की उत्पत्ति ही नहीं बनेगी—यह एक नयी बाधा आ खड़ी होगी ! ॥ ३० ॥ [ इस प्रकार प्रत्यक्षलक्षण के स्वरूप की परीक्षा करने के बाद उसके विषय की परीक्षा प्रारम्भ की जा रही है—] प्रत्यक्ष अनुमान ही है, क्योंकि अवयवी का एकदेश के ग्रहण से ज्ञान होता है ? ॥३१॥ इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से उत्पन्न 'वृक्ष' यह प्रत्यक्ष ज्ञान एक तरह से अनुमान ही है; क्योंकि यह वृक्ष के एक भाग ( कुछ अवयवों ) का ग्रहण करके ही हो जाता है । वृक्ष के अगले हिस्से को देखकर यह वृक्ष का ज्ञान कर लेता है, परन्तु अगला हिस्सा ही तो वृक्ष नहीं है ! वहाँ ( अनुमान में ) जैसे धूम को देखकर वह्नि का अनुमान होता है, वही स्थिति यहाँ ( वृक्ष के प्रत्यक्ष में ) भी है। इस प्रकार 'प्रत्यक्षादि चार प्रमाण हैं' सिद्धान्ती की यह प्रतिज्ञा नष्ट हो गयी ? ॥ ३१ ॥ सिद्धान्ती पूछता है कि आप चक्षुःसन्निकर्ष से ज्ञायमान वृक्ष के अग्रभाग से अनुमान . करने योग्य दूसरा क्या पदार्थ मानते हैं ? इसके उत्तर में पूर्वपक्षी कहता है कि यहाँ हमें दो विप्रतिपत्तियां हैं—१. 'अवयवी अवयवों से पृथक् नहीं हैं' इस अवयवसमूहपक्ष में अन्य अवयवों ( जो दिखायी नहीं दिये थे ) का अनुमान करते हैं, तथा २. 'अवयवों से कोई अवयवी नामक अर्थान्तर ही उत्पन्न होता हैं'—इस द्रव्यान्तरोत्पत्तिपक्ष में अवशिष्ट अवयवों तथा अवयवी का अनुमान करते हैं? इस पर सिद्धान्ती का उत्तर है—अवयवसमूहपक्ष में, एकदेश ( अग्रभाग ) के ग्रहण से 'यह वृक्ष है' ऐसी बुद्धि नहीं हो सकती; इसी प्रकार, गृह्यमाण एकदेश की तरह

३२. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०३

३२. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०३ माणैकदेशवदिति । अथ एकदेशग्रहणादेकदेशान्तरानुमाने समुदायप्रतिसन्धानात् तत्र वृक्षबुद्धिः ? न तर्हि वृक्षबुद्धिरनुमानमेवं सति भवितुमर्हतीति । द्रव्यान्तरो- त्पत्तिपक्षे नावयव्यनुमेयः, अस्यैकदेशसम्बद्धस्याग्रहणात्, ग्रहणे चाविशेषादनु- मेयत्वाभावः । तस्माद् वृक्षबुद्धिरनुमानं न भवति । एकदेशग्रहणमाश्रित्य प्रत्यक्षस्यानुमानत्वमुपपाद्यते । तच्च— न; प्रत्यक्षेण यावत्तावदप्युपलम्भात् ॥ ३२ ॥ न प्रत्यक्षमनुमानम् । कस्मात् ? प्रत्यक्षेणैवोपलम्भात् । यत् तदेकदेशग्रहण- माश्रीयते, प्रत्यक्षेणासावुपलम्भः । न चोपलम्भो निर्विषयोऽस्ति । यावच्चार्थ- जातं तस्य विषयः, तावदभ्यनुज्ञायमानं प्रत्यक्षव्यवस्थापकं भवति । किं पुनस्ततोऽन्यदर्थजातम् ? अवयवी, समुदायो वा । न चैकदेशग्रहणम- नुमानं भावयितुं शक्यम्; हेत्वभावादिति । अन्यथापि च प्रत्यक्षस्य नानुमानत्वप्रसङ्गः; तत्पूर्वकत्वात् । प्रत्यक्षपूर्वकम्- नुमानं सम्बद्धावग्निधूमौ प्रत्यक्षतो दृष्टवतो धूमप्रत्यक्षदर्शनादग्नावनुमानं भवति । तत्र यच्च सम्बद्धयोर्लिङ्गलिङ्गिनोः प्रत्यक्षम्, यच्च लिङ्गमात्रप्रत्यक्ष- अगृह्यमाण एकदेश (अवशिष्ट अवयव) भी वृक्ष नहीं है, तब तो 'यह वृक्ष है' इस बुद्धि का ही अपलाप होने लगेगा ! यदि यह कहो कि एकदेश के ग्रहण से अवशिष्ट एक- देश का अनुमान करके समूहप्रतिसन्धान से 'यह वृक्ष है'—ऐसी बुद्धि हो सकती है ? हम कहते हैं कि तत्र भी 'यह वृक्ष है'—ऐसी बुद्धि कैसे बनेगी; क्योंकि तुमने अवयवान्तरों का ही अनुमान किया है, वृक्ष का तो अनुमान किया नहीं ! द्रव्यान्तरोत्पत्तिपक्ष में भी— अवयवान्तरसम्बद्ध होकर अवयवी कैसे गृहीत होगा ? यदि होता है तो दृश्यमान अवयव से सम्बद्ध होकर अवयवी का प्रत्यक्ष हो गया, तब वह अनुमेय नहीं होगा ! एकदेश का ग्रहण होकर वृक्षप्रत्यक्ष का अनुमान में अन्तर्भाव करना उचित— नहीं; क्योंकि उस अवशिष्ट एकदेश का ग्रहण भी प्रत्यक्ष से ही होता है ॥ ३२ ॥ प्रत्यक्ष अनुमान में अन्तर्भूत नहीं हो सकता; क्योंकि पूर्वपक्षी द्वारा गृहीत उस वृक्ष के अवशिष्ट एकदेश का भी प्रत्यक्ष होता है । जिसके एकदेश का ग्रहण आधार माना जाता है वह भी प्रत्यक्षविषय है । ऐसा कोई ज्ञान नहीं, जो विषय-रहित हो; क्योंकि जितने अग्रभाग के साथ अर्थसमुदाय विषय होंगे वे सब प्रत्यक्ष-व्यवस्थापक हैं—ऐसा मानने पर प्रत्यक्ष भी सिद्ध हो जाता है । दृश्यमान अवयवों से भिन्न इस अवशिष्ट अर्थसमूह को आप क्या मानते हैं ? अव- यवी, या समुदाय ! तब हेतु के न रहते उस एकदेश का ग्रहण अनुमान से कैसे होगा ! एक दूसरी युक्ति भी प्रत्यक्ष के अनुमानान्तर्भाव की बाधिका है, वह है—तत्पूर्वकत्व । अर्थात् अनुमान तो स्वयं प्रत्यक्षपूर्वक होता है, उसमें प्रत्यक्ष का अन्तर्भाव कैसे हो पावेगा ! CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१०४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० ग्रहणम्, नेतदन्तरेणानुमानस्य प्रवृत्तिरस्ति । नत्वेतदनुमानम्; इन्द्रियार्थसन्निकर्ष- जत्वात् । न चानुमेयस्येन्द्रियेण सन्निकर्षादनुमानं भवति । सोऽयं प्रत्यक्षानु- मानयोर्लक्षणभेदो महानाश्रयितव्य इति ॥ ३२ ॥ न चैकदेशोपलब्धिरवयविसद्भावात् १ ॥ ३३ ॥ न चैकदेशोपलब्धिमात्रम् । किं तर्हि ? एकदेशोपलब्धिः, तत्सहचरितावयव्यु- पलब्धिश्च । कस्मात् ? अवयविसद्भावात् । अस्ति ह्ययमेकदेशव्यतिरिक्तोऽवयवी, तस्यावयवस्थानस्योपलब्धिकारणप्राप्तस्यैकदेशोपलब्धावनुपलब्धिरनुपपन्नेति । अकृत्स्नग्रहणादिति चेद्, न; कारणतोऽन्यस्यैकदेशस्याभावात् । न चावयवाः पहले कभी धूम-अग्नि को एक साथ प्रत्यक्ष देखने वाले को ही अब धूम के प्रत्यक्षदर्शन से अग्नि का अनुमान हो पाता है। अन्यथा अनुमान की इस पूरी प्रक्रिया में सम्बद्ध लिङ्ग ( धूम ) तथा लिङ्गी ( वह्नि ) का पहले प्रत्यक्ष, तथा अनुमानकाल में लिङ्गदर्शन के बिना अनुमान की प्रवृत्ति कैसे होगी ? इसे आप अनुमान तो कह नहीं सकते; क्योंकि यह इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य ही है । अनुमेय ( वह्नि ) का यदि इन्द्रियसन्निकर्ष हो जाये तो वह अनुमान क्यों कर होगा ! यह अनुमान और प्रत्यक्ष का सबसे बड़ा भेद है—इसे प्रत्येक जिज्ञासु को समझे रखना चाहिये ॥ ३२ ॥ [ नैयायिकों के मत से घटावयवों से भिन्न एक अलग घटादि अवयवी होता है, परन्तु बौद्धों के मत में यह अवयवी कोई पृथक् प्रमेय नहीं है, अपितु वह परमाणुरूप अवयवसमूह ही है। बौद्धों के मत में परमाणुरूप कतिपय अवयवों का प्रत्यक्ष होता है, परन्तु नैयायिकों के मत में अवयवी का भी होता है। अतः बौद्धों का आक्षेप है कि घटादि अवयवी का प्रत्यक्ष नहीं होगा, इसका समाधान कर रहे हैं—] एकदेश का ही प्रत्यक्ष नहीं होता, अपितु उसके साथ अवयवी का भी प्रत्यक्ष होता है; क्योंकि वहाँ अवयवी भी रहता है ॥ ३३ ॥

  • एकदेश ( अवयव ) मात्र का ही प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता; अपितु एकदेश के ज्ञान के साथ तत्सहचरित अवयवी का भी ज्ञान हो जाता है। कैसे ? क्योंकि उस इन्द्रियार्थ- सन्निकर्ष के समय अवयव के साथ उस अवयवी की भी सत्ता रहती है। यद्यपि यह अवयवी अपने उस अवयव से पृथक् है, परन्तु जब वह अवयवसंस्थानविशेष के रूप में में उपलब्धि-कारण हो तब एकदेश की उपलब्धि के समय कारण बन कर प्रत्यक्षज्ञान करा देगा तो वहीं मौजूद अवयवी का ज्ञान न हो—यह कैसे हो सकेगा ! यदि कहो कि एकदेश का ग्रहण होने से वह नहीं दिखायी देगा ? तो यह भी नहीं कह सकते; क्योंकि समवायिकारण को छोड़कर दूसरा एकदेश पृथक् नहीं है। पूर्वपक्षी कहता है कि १. इदं न सूत्रं किन्तु भाष्यमेवेति केचित् । केचित्पुनरवयविसद्भावादित्येव सूत्रमिति वदन्ति । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

३३. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०५

३३. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०५ कृत्स्ना गृह्यन्ते, अवयवैरेवावयवान्तरव्यवधानाद्; नावयवी कृत्स्नो गृह्यते इति, नायं गृह्यमाणेष्ववयवेषु परिसमाप्त इति सेयमेकदेशोपलब्धिरनिवृत्तैवेति ? कृत्स्न- मिति वै खल्वशेषतायां सत्यां भवति, अकृत्स्नमिति शेषे सति । तच्चैतत्तदवयवेषु बहुष्वस्ति, अव्यवधाने ग्रहणाद् व्यवधाने चाग्रहणादिति । अङ्ग तु भवान् पृष्टो व्याचष्टाम्-गृह्यमाणस्यावयविनः किमगृहीतं मन्यते, येनैकदेशोपलब्धिः स्यादिति; न ह्यस्य कारणेभ्योऽन्ये एकदेशा भवन्तीति तत्राव- यववृत्तं नोपपद्यत इति ! इदं तस्य वृत्तम्-येषामिन्द्रियसन्निकर्षाद् ग्रहणम्, अवयवानां तैः सह गृह्यते, येषामवयवानां व्यवधानाद् ग्रहणं तैः सह न गृह्यते । न चैतत्कृतोऽस्ति भेद इति । समुदाय्यशेषता वा समुदायो वृक्षः स्यात्, तत्प्राप्तिर्वा; उभयथा ग्रहणा- भावः । मूलस्कन्धशाखापलाशादीनामशेषता वा समुदायो वृक्ष इति स्यात्, प्राप्तिर्वा समुदायिनामिति, उभयथा समुदायभूतस्य वृक्षस्य ग्रहणं नोपपद्यते सम्पूर्ण अवयवों का उस समय ग्रहण नहीं होता; क्योंकि पृष्ठभाग के अवयव अग्रभाग के अवयवों से व्यवहित हैं-इसलिये समग्र अवयवी भी गृहीत नहीं होता, तथा गृह्यमाण अवयवों में अवयवी पर्याप्त नहीं है, अतः एकदेशोपलब्धि में अवयव्युपलब्धि कैसे होगी ? उत्तर है-'कृत्स्न'-ऐसा कथन तभी बन सकता है, जब कोई शेष न बचे; 'अकृत्स्न'- ऐसा भी तब कहते हैं, जब कोई शेष बच जाये। यह 'कृत्स्न' या अकृत्स्न' व्यवहार अनेक अवयवों के होने पर ही हो सकता है। तब जिन अवयवों में व्यवधान होता है, उनका ग्रहण नहीं हो पाता, अव्यवहितों का प्रत्यक्ष हो जाता है। अवयवी को कृत्स्न या अकृत्स्न कैसे कहा जा सकता है ?-पूछने पर, पूर्वपक्षी सम्भवतः यह भी कहने लगे कि ज्ञायमान वृक्षावयवी का क्या नहीं जाना गया मानते हो, जिससे मदुक्त एकदेशोपलब्धि बन सके; वृक्षावयवी का समवायिकारण शाखा, पत्र, मूल से अतिरिक्त कोई एकदेश नहीं होता, जिससे उसमें अवयवस्वभाव उपपन्न नहीं होता ! परन्तु पूर्वपक्षी का यह कथन अयुक्त है; क्योंकि उस अवयवी का यह स्वभाव है कि जिन अवयवों के साथ इन्द्रिय का सन्निकर्ष व्यवधान होने से न हो उनके साथ वह गृहीत नहीं होता, तथा अव्यवहितों के साथ इन्द्रियसन्निकर्ष से वह गृहीत हो जाता है। इतनी बात को लेकर वस्तुतः कोई भेद नहीं बनता। [ अब भाष्यकार 'परमाणुरूप अवयवसमूह ही अवयवी (वृक्ष) होता है' इस बौद्धमत का खण्डन कर रहे हैं-] समुदायवाले परमाणुओं की अशेषता (सम्पूर्णता) ही अवयव- समुदाय वृक्ष हो, या उन अवयवों का संयोग-उभयथा ही वृक्षबुद्धि का ग्रहण नहीं होगा। तात्पर्य यह है कि मूल, स्कन्ध शाखा पत्र-आदि अवयवों की समग्रता को ही

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१०६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० इति । अवयवैस्तावदवयवान्तरस्य व्यवधानादशेषग्रहणं नोपपद्यते । प्राप्तिग्रहण- मपि नोपपद्यते; प्राप्तिमतामग्रहणात् । सेयमेकदेशग्रहणसहचरिता वृक्षबुद्धि- र्द्रव्यान्तरोत्पत्तौ कल्पते, न समुदायमात्रे इति ॥ ३३ ॥ प्रसङ्गोपात्ता अवयविपरीक्षा साध्यत्वादवयविनि सन्देहः ? ॥ ३४ ॥ यदुक्तम्—'अवयविसद्भावात्' इति, अयमहेतुः, साध्यत्वात् । साध्यं तावत्- एतत्कारणेभ्यो द्रव्यान्तरमुत्पद्यते इति, अनुपपादितमेतत् । एवं च सति विप्रति- पत्तिमात्रं भवति, विप्रतिपत्तेश्चावयविनि संशय इति ? ॥ ३४ ॥ सर्वग्रहणमवयव्यसिद्धेः ॥ ३५ ॥ यद्यवयवी नास्ति सर्वस्य ग्रहणं१ नोपपद्यते । किं तत् सर्वम् ? द्रव्यगुणकर्म- सामान्यविशेषसमवायाः । कथं कृत्वा ? परमाणुसमवस्थानं तावद् दर्शनविषयो न भवति, अतीन्द्रियत्वादणूनाम् । द्रव्यान्तरं चावयविभूतं दर्शनविषयो नास्ति, दर्शनविषयस्थाश्चेमे द्रव्यादयो गृह्यन्ते, ते निरधिष्ठाना न गृह्येरन् ! गृह्यन्ते तु- समुदाय रूप से वृक्ष मानें या उन समुदायियों की परस्पर प्राप्ति (संयोग) मानें, दोनों ही नयों में समुदायभूत (अवयवी) वृक्ष का ग्रहण नहीं हो पायेगा; क्योंकि अवयवों से अव- यवान्तर का व्यवधान होने के कारण ग्रहण नहीं बन सकेगा । अवयवों के परस्पर संयोग से भी ग्रहण नहीं हो सकेगा । क्योंकि संयोगवाले अवयवों में यह ग्रहण नहीं होता, अतः यह एकदेशग्रहण के साथ होनेवाली 'यह वृक्ष है' ऐसी बुद्धि द्रव्यान्तरोत्पत्ति मानने पर तो बन सकती है, अवयवों का समुदायमात्र मानने पर नहीं बनेगी ॥ ३३ ॥ साध्य होने से अवयवों से भिन्न अवयवी में संशय है ॥ ३४ ॥ पूर्वोक्त ३३ वें सूत्र में एकदेशोपलब्धि न होने में 'अवयवसिद्भाव' हेतु दिया गया था, यह हेतु साध्य है। अर्थात् प्रमाणों से यह सिद्ध करना चाहिये कि 'इन कारणों से द्रव्यान्तर उत्पन्न होता है'। क्योंकि यह सिद्ध नहीं किया गया, अतः अयुक्त है। इस तरह उक्त हेतु में विप्रतिपत्ति होने लगेगी, तथा विप्रतिपत्ति से अवयवी में संशय होगा ॥ ३४ ॥ और अवयवी की सिद्धि न होने से सम्पूर्ण का ग्रहण न होगा ॥ ३५ ॥ यदि अवयवी सिद्ध न होगा तो सम्पूर्ण का ग्रहण न होगा । वह सम्पूर्ण क्या है ? द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय । क्यों ऐसा होगा ? परमाणु का परस्परसंयोग प्रत्यक्ष का विषय नहीं हुआ करता; क्योंकि परमाणु अतीन्द्रिय हैं। यदि उन्हें अवयवी मानें तो तुम्हारे मत से द्रव्यान्तर कह कर कोई अवयवी नहीं है। द्रव्यादि तो दर्शनविषय (अवयवी) में ही रहते हैं, अवयवी के न रहने पर वे निरधिष्ठान होते हुए प्रत्यक्ष कैसे होंगे ! लोक में अवयवी वृत्ति के लिये यह व्यवहार देखा जाता है—यह घट १. अवयव्यसिद्धेः प्रत्यक्षाभावः, प्रत्यक्षाभावेऽनुमाद्यभावः इति सर्वप्रमाणाग्रहणमिति वार्त्तिकेऽर्थान्तरमपि व्याख्यातम् ।