ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—५५ देवता—इंद्र
मैं हजारों गायों के ऊपर धारण किए हुए, महान्, विस्तृत, आह्लादकारक एवं निर्मल हिरण्य को स्वीकार करता हूं. (११) नपातो दुर्गहस्य मे सहस्रेण सुराधसः. श्रवो देवेष्वक्रत.. (१२) मुझ अरक्षित एवं दुःखी के संबंधी लोग हजारों धनों वाले हों. देवों की प्रसन्नता अन्न देती है. (१२) सूक्त—५५ देवता—इंद्र तरोभिर्वो विदद्वसुमिन्द्र सबाध ऊतये. बृहद् गायन्तः सुतसोमे अध्वरे हुवे भरं न कारिणम्.. (१) हे ऋत्विजो! तुम दुःखी होने पर वेगशाली अश्वों द्वारा आकर धन देने वाले इंद्र की सेवा बृहत्साम गाकर करो. मैं निचोड़े हुए सोमरस वाले यज्ञ में इंद्र को उसी प्रकार बुलाता हूं, जिस प्रकार कोई कुटुंबपोषक एवं हितकारी को बुलाता है. (१) न यं दुध्रा वरन्ते न स्थिरा मुरो मदे सुशिप्रमन्धसः. य आदृत्या शशमानाय सुन्वते दाता जरित्र उक्थ्यम्.. (२) दुर्धर्ष असुर, स्थिरदेव एवं मरणशील मनुष्य युद्ध में जिस इंद्र का निवारण नहीं कर सकते, ऐसे इंद्र सोमरस पीने के कारण उत्पन्न होने वाला आनंद पाने के लिए अपने स्तोता को प्रशंसनीय धन देते हैं. (२) यः शक्रो म्क्षो अश्व्यो यो वा कीजो हिरण्ययः. स ऊर्वस्य रेजयत्यपावृतिमिन्द्रो गव्यस्य वृत्रहा.. (३) शक्र सेवा करने योग्य, अश्वविद्या में निपुण, अद्भुत सोने के शरीर वाले एवं वृत्रनाशक इंद्र विपुल गायों को बाहर लाकर कंपित करते हैं. (३) निखातं चिद्यः पुरुसम्भृतं वसुद्धिदपति दाशुषे. वज्री सुशिप्रो हर्यश्व इत् करदिन्द्रः क्रत्वा यथा वशत्.. (४) हव्य देने वाले यजमान का धरती में गड़ा हुआ एवं संगृहीत बहुत धन ऊपर उठाने वाले, वज्रधारी, शोभन नासिका वाले एवं हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र जो चाहते हैं, उसे यज्ञादि के द्वारा पूरा कर देते हैं. (४) यद्भावन्थ पुरुष्टुत पुरा चिच्छूर नृणाम्. वयं तत्त इन्द्र सं भरामसि यज्ञमुक्थं तुरं वचः.. (५) eBook converter DEMO Watermarks*
हे बहुतों द्वारा स्तुत एवं शूर इंद्र! तुमने प्राचीन यजमानों से जो कामना की थी, उसे हम तुरंत पूरा कर रहे हैं. हम यज्ञ, उक्थ अथवा स्तुतिवचन तुम्हें शीघ्र समर्पित करते हैं. (५) सचा सोमेषु पुरुहूत वज्रिवो मदाय द्युक्ष सोमपा:. त्वमिद्धि ब्रह्मकृते काम्यं वसु देष्ट: सुन्वते भुव:.. (६) हे बहुतों द्वारा बुलाए हुए, वज्रधारी एवं सोमरस पीने वाले इंद्र! सोमरस निचुड़ जाने पर तुम नशा करने के लिए हमारे साथ रहो. सोमरस निचोड़ने वाले स्तोता को कमनीय धन तुम्हीं देते हो. (६) वयमेनमिदा ह्योऽपीपेमेह वज्रिणम्. तस्मा उ अद्य समना सुतं भरा नूनं भूषत श्रुते.. (७) हम इन इंद्र को आज और कल सोमरस पिलाकर तृप्त करेंगे. हे अध्वर्युजनो! उन्हीं इंद्र के लिए युद्ध में निचोड़ा हुआ सोमरस ले आओ. इंद्र इस समय स्तोत्र सुनकर आवें. (७) वृकश्चिदस्य वारण उरामथिरा वयुनेषू भूषति. सेमं न: स्तोमं जुजुषाण आ गहीन्द्र प्र चित्रया धिया.. (८) चोर सबको हानिकारक एवं पथिकों का विनाशकर्त्ता होकर भी इंद्र के कार्य में अनुकूलता धारण करता है. हे इंद्र! हमारे स्तोत्र को प्रेम करते हुए एवं विचित्र स्तुतियों से प्रभावित होकर आओ. (८) कदू न्व१स्याकृतमिन्द्रस्यास्ति पौंस्यम्. केनो नु कं श्रोमतेन न शुश्रुवे जनुष: परि वृत्रहा.. (९) ऐसा कौन सा पुरुषार्थ है जो इंद्र ने न किया हो? किस सुनने योग्य पुरुषार्थ के साथ इंद्र नहीं सुने जाते? इंद्र की वृत्रवध वाली घटना उनके जन्म से ही सुनी जा रही है. (९) कदू महीरधृष्टा अस्य तविषी: कदु वृत्रघ्नो अस्तृतम्. इन्द्रो विश्वान् बेकनाटाँ अहर्दृश उत क्रत्वा पणीँरभि.. (१०) इंद्र की महती शक्ति कब शत्रुधर्षक नहीं हुई है? इंद्र का वध्य कब वधरहित रहा? इंद्र सभी सूद खाने वालों, दिन गिनने वाले कर्महीनों एवं पणियों को ताड़न आदि के द्वारा पराजित करते हैं. (१०) वयं घा ते अपूर्व्येन्द्र ब्रह्माणि वृत्रहन्. पुरूतमास: पुरुहूत वज्रिवो भृतिं न प्र भरामसि.. (११) हे वृत्रहंता, बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं वज्रधारी इंद्र! हम बहुत से लोग वेतन के समान ebook converter DEMO Watermarks*
तुम्हारे ही निमित्त नवीन स्तुतियां अर्पित करते हैं. (११) पूर्वीश्चिद्धि ते तुविकूर्मिन्नाशसो हवन्त इन्द्रोतयः. तिरश्चिदर्यः सवना वसो गहि शविष्ठ श्रुधि मे हवम्.. (१२) हे अनेक कर्म करने वाले इंद्र! तुमसे बहुत सी आशाएं संबंधित हैं एवं स्तोता तुम्हें बुलाते हैं. इसलिए तुम हमारे शत्रुओं के यज्ञों का तिरस्कार करके हमारे यज्ञों में आओ. हे अतिशय शक्तिशाली इंद्र! मेरी पुकार सुनो. (१२) वयं घा ते त्वे इद्धिन्द्र विप्रा अपि ष्मसि. नहि त्वदन्यः पुरुहूत कश्चन मघवन्नस्ति मर्डिता.. (१३) हे इंद्र! हम तुम्हारे ही हैं और तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं धनस्वामी इंद्र! तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी सुख देने वाला नहीं है. (१३) त्वं नो अस्या अमतेरुत क्षुधो३ भिशस्तेरव स्पृधि. त्वं न ऊती तव चित्रया धिया शिक्षा शचिष्ठ गातुवित्.. (१४) हे इंद्र! तुम हमें दरिद्रता, भूख एवं निंदा से बचाओ. हे महाबली एवं मार्ग जानने वाले इंद्र! तुम अपनी रक्षा एवं विचित्र यज्ञकर्मों के साथ हमें हमारे मनचाहे पदार्थ दो. (१४) सोम इद्धः सुतो अस्तु कलयो मा बिभीतन. अपेदेष ध्वस्मायति स्वयं घैषो अपायति.. (१५) हे महर्षि कलि के पुत्रो! तुम्हारा निचोड़ा हुआ सोमरस इंद्र के लिए ही हो. तुम मत डरो. ये राक्षस आदि तुमसे दूर जा रहे हैं. वे स्वयं ही भाग रहे हैं. (१५) सूक्त—५६ देवता—आदित्य त्यान्नु क्षत्रियाँ अव आदित्यान्याचिषामहे. सुमृळीकाँ अभिष्टये.. (१) हम अभिलषित धन पाने के लिए क्षत्रिय जाति वाले एवं भली प्रकार सुखदाता आदित्यों से रक्षा की याचना करते हैं. (१) मित्रो नो अत्यंहतिं वरुणः पर्षदर्यमा. आदित्यासो यथा विदुः.. (२) मित्र, वरुण, अर्यमा और आदित्य हमें पाप से पार उतारें, क्योंकि वे हमारे दुःसह कार्यों को जानते हैं. (२) तेषां हि चित्रमुक्थ्यं१ वरूथमस्ति दाशुषे. आदित्यानामरण्कृते.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
आदित्यों का विचित्र एवं स्तुतियोग्य धन हव्य देने वाले एवं पर्याप्त यज्ञ करने वाले यजमान के लिए है. (३) महि वो महतामवो वरुण मित्रार्यमन्. अवांस्या वृणीमहे.. (४) हे वरुण, मित्र एवं अर्यमा! तुम महान् हो एवं यजमान के प्रति तुम्हारी रक्षा महान् है. हम तुम्हारी रक्षा की प्रार्थना करते हैं. (४) जीवान्नो अभि धेतनादित्यासः पुरा हथात्. कद्ध स्थ हवनश्रुतः.. (५) हे आदित्यो! हम जीवितों के पास दौड़कर आओ. हे पुकार सुनने वाले आदित्यो! हमारी मृत्यु से पहले आना. (५) यद्वः श्रान्ताय सुन्वते वरूथमस्ति यच्छर्दिः. तेना नो अधि वोचत.. (६) हे आदित्यो! सोमरस निचोड़ने के काम से थके हुए यजमान के लिए तुम्हारे पास जो उत्तम धन एवं घर है, उससे हमें प्रसन्न करके हमसे अच्छी-अच्छी बातें करो. (६) अस्ति देवा अंहोरुर्वस्ति रत्नमनागसः. आदित्या अद्भुतैनसः.. (७) हे देवो! पापी के पास महान् पाप है एवं पापहीन के पास उत्तम पुण्य है. हे पापरहित आदित्यो! हमारी अभिलाषा पूरी करो. (७) मा नः सेतुः सिषेद्यं महे वृणक्तु नस्परि. इन्द्र इद्धि श्रुतो वशी.. (८) जाल हम लोगों को न बांधे. जाल हमें महान् यज्ञकर्म के लिए छोड़ दे. इंद्र प्रसिद्ध एवं सबको वश में करने वाले हैं. (८) मा नो मृचा रिपूणां वृजिनानामविष्यवः. देवा अभि प्र मृक्षत.. (९) हे रक्षा के इच्छुक देवो! हमें छुड़ाओ. हमें हिंसा करने वाले शत्रुओं के जाल में मत बांधना. (९) उत त्वामदिते मह्यहं देव्युप ब्रुवे. सुमृळीकामभिष्टये.. (१०) हे महान् एवं सुख देने वाली अदिति देवी! मनचाहा फल पाने के लिए मैं तुम्हारी स्तुति करता हूं. (१०) पर्षि दीने गभीर आँ उग्रपुत्रे जिघांसतः. माकिस्तोकस्य नो रिषत्.. (११) हे अदिति! हमारा सब ओर से पालन करो. उथले एवं पुत्रों को दुःखी करने वाले जल में हिंसक का जाल हमारे पुत्र को न मारे. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
अनेहो न उरुव्रज उरूचि वि प्रसर्तवे. कृधि तोकाय जीवसे.. (१२) हे विस्तीर्ण गमन वाली एवं महती अदिति! हम पापहीनों को जीवित रखो, जिससे हमारे पुत्र जीवित रह सकें. (१२) ये मूर्धानः क्षितीनामदब्धासः स्वयशसः. व्रता रक्षन्ते अद्रुहः.. (१३) सबसे मूर्धन्य, मनुष्यों की हिंसा न करने वाले, स्वाधीन यश वाले एवं द्रोहरहित आदित्य हमारे यज्ञकर्मों की रक्षा करते हैं. (१३) ते न आस्नो वृकाणामादित्यासो मुमोचत. स्तेनं बद्धमिवादिते.. (१४) हे आदित्यो! मैं हिंसकों के जाल में इस प्रकार फंस गया हूं, जैसे लोग चोर को पकड़ते हैं. हे अदिति! तुम हमें छुड़ाओ. (१४) अपो षु ण इयं शरुरदित्या अप दुर्मतिः. अस्मदेत्वजघ्नुषी.. (१५) हे आदित्यो! यह जाल एवं दुर्बुद्धि हमारी हिंसा न करके हमसे दूर जाए. (१५) शश्वद्वि वः सुदानव आदित्या उतिभिर्वयम्. पुरा नूनं बुभुज्महे.. (१६) हे शोभन दान करने वाले आदित्यो! तुम्हारी रक्षाओं के कारण हम पहले के समान इस समय भी बहुत से सुख भोगेंगे. (१६) शश्वन्तं हि प्रचेतसः प्रतियन्तं चिदेनसः. देवाः कृणुथ जीवसे.. (१७) हे उत्तम ज्ञान वाले देवो! हमारी ओर बार-बार आने वाले पापी शत्रुओं को हमारे जीवन के लिए हमसे अलग करो. (१७) तत्सु नो नव्यं सन्यस आदित्या यन्मुमोचति. बन्धाद् बद्धमिवादिते.. (१८) हे अदिति एवं आदित्यो! वह प्रशंसनीय जाल हमें छोड़ने के कारण सेवायोग्य बने जो तुम्हारी कृपा से हमें छोड़ता है. जैसे बंधन बंधे हुए पुरुष को छोड़ता है, उसी प्रकार यह जाल हमें छोड़ता है. (१८) नास्माकमस्ति तत्तर आदित्यासो अतिष्कदे. यूयमस्मभ्यं मृळत.. (१९) हे आदित्यो! हमारा वेग तुम्हारे समान नहीं है. तुम्हारा वेग हमें जाल से छुड़ा सकता है. तुम हमें सुखी करो. (१९) मा नो हेतिर्विवस्वत आदित्याः कृत्रिमा शरुः. पुरा नु जरसो वधीत्.. (२०) हे आदित्यो! क्रिया द्वारा बनाया हुआ यह हिंसक जाल विवस्वान् के पुत्र यम के जाल
सूक्त—५७ देवता—इंद्र
के समान इस समय कमजोर हम लोगों को पहले के समान न मारे. (२०) वि षु द्वेषो व्यंहतिमादित्यासो वि संहितम्. विष्वग्वि वृहता रपः.. (२१) हे आदित्यो! हमारे द्वेषियों एवं पापियों का विनाश करो तथा इस जाल एवं सब जगह फैले हुए पाप का नाश करो. (२१) सूक्त—५७ देवता—इंद्र आ त्वा रथं यथोतये सुम्नाय वर्तयामसि. तुविकूर्मिमृतीषहमिन्द्र शविष्ठ सत्पते.. (१) हे अतिशय शक्तिशाली, हिंसकों को हराने वाले, बहुत कर्म करने वाले एवं सज्जनपालक इंद्र! हम सुरक्षा और सुख पाने के लिए तुम्हें रथ के समान बार-बार बुलाते हैं. (१) तुविशुष्म तुविक्रतो शचीवो विश्वया मते. आ पप्रथ महित्वना.. (२) हे अधिक शक्तिशाली, अनेक कर्म करने वाले, अधिक बुद्धिमान् एवं पूजनीय इंद्र! तुमने विश्वव्यापक महत्त्व द्वारा संसार को व्याप्त किया है. (२) यस्य ते महिना महः परि ज्मायन्तमीयतुः. हस्ता वज्रं हिरण्ययम्.. (३) हे महान् इंद्र! तुम्हारी महिमा के कारण तुम्हारे हाथ धरती में सब जगह व्याप्त हिरण्यमय वज्र को पकड़ते हैं. (३) विश्वानरस्य वस्पतिमाननतस्य शवसः. एवैश्च चर्षणीनामूती हुवे रथानाम्.. (४) हे मरुतो! मैं समस्त शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले एवं शत्रुओं द्वारा न झुकने वाली शक्ति के स्वामी इंद्र को तुम्हारी सेनाओं एवं रथों के गमनों के साथ बुलाता हूं. (४) अभिष्टये सदावृधं स्वर्मीळ्हेषु यं नरः. नाना हवन्त ऊतये.. (५) हे यजमानो! मैं तुम्हारी सहायता के लिए सदा बढ़ने वाले इंद्र को आने के लिए निवेदन करता हूं. उन्हें मनुष्य युद्धों में अपनी श्रद्धा के निमित्त भांति-भांति से बुलाते हैं. (५) परोमात्रमृचीषममिन्द्रमुग्रं सुराधसम्. ईशानं चिद्वसूनाम्.. (६) मैं असीमित शरीर वाले, स्तुति के अनुरूप रूपधारी, उग्र, शोभनधन से युक्त एवं संपत्तियों के स्वामी इंद्र को बुलाता हूं. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
तं तमिद्राधसे मह इन्द्रं चोदामि पीतये. यः पूर्व्यामनुष्टुतिमीशे कृष्टीनां नृतुः.. (७) मैं नेता, यज्ञ के प्रमुख स्थान में बैठने वाले एवं मनुष्यों की क्रमबद्ध स्तुति सुनने वाले इंद्र को महान् धन पाने की आशा से सोमरस पीने के लिए बुलाता हूं. (७) न यस्य ते शवसान सख्यमानंश मर्त्यः. नकिः शवांसि ते नशत्.. (८) हे शक्तिशाली इंद्र! मनुष्य तुम्हारी मित्रता प्राप्त नहीं कर सकता. तुम्हारी शक्तियों को भी कोई नहीं पा सकता. (८) त्वोतासस्त्वा युजाप्सु सूर्ये महद्धनम्. जयेम पृत्सु वज्रिवः.. (९) हे वज्रधारी इंद्र! हम तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर तुम्हारी सहायता से युद्धों में महान् धन जीतेंगे. जिससे जल में स्नान एवं सूर्यदर्शन कर सकें. (९) तं त्वा यज्ञेभिरीमहे तं गीर्भिर्गिर्वणस्तम. इन्द्र यथा चिदाविथ वाजेषु पुरुमाय्यम्.. (१०) हे स्तुतियों द्वारा अत्यधिक प्रसिद्ध इंद्र! मुझ अधिक बुद्धि वाले को तुम जिस प्रकार की स्तुतियों और यज्ञों के कारण बचा सको, मैं उसी प्रकार की स्तुतियों और यज्ञों द्वारा तुमसे याचना करता हूं. (१०) यस्य ते स्वादु सख्यं स्वाद्धी प्रणीतिरद्रिवः. यज्ञो वितन्तसाय्यः.. (११) हे वज्रधारी इंद्र! तुम्हारी मित्रता एवं धनादि का निर्माण अत्यंत हर्षकारक है. तुम्हारा यज्ञ विशेषरूप से विस्तृत करने योग्य है. (११) उरु णस्तन्वे३ तन उरु क्षयाय नस्कृधि. उरु णो यन्धि जीवसे.. (१२) हे इंद्र! तुम हमारे पुत्र, पौत्र एवं निवासस्थान के निमित्त प्रचुर धन दो. तुम हमारे जीवन के लिए हमारी मनचाही वस्तुएं दो. (१२) उरुं नृभ्य उरुं गव उरुं रथाय पन्थाम्. देववीतिं मनामहे.. (१३) हे इंद्र! हम तुमसे प्रार्थना करते हैं कि हमारे मनुष्यों, गायों एवं रथों के मार्गों का कल्याण करो. हम तुमसे यज्ञ की प्रार्थना करते हैं. (१३) उप मा षड् द्वाद्वा नरः सोमस्य हर्ष्या. तिष्ठन्ति स्वादुरातयः.. (१४) सोमरस पीने से उत्पन्न नशे के कारण छः राजा स्वादिष्ट भोग साथ लेकर दो-दो के समूह में हमारे पास आते हैं. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*
ऋज्राविन्द्रोत आ ददे हरी ऋक्षस्य सूनवि. आश्वमेधस्य रोहिता.. (१५) राजपुत्र इंद्रोत से मैंने सरल गति वाले दो घोड़े प्राप्त किए हैं एवं ऋक्ष के पुत्र से हरे रंग के तथा अश्वमेध के पुत्रों से लाल रंग के घोड़े पाए हैं. (१५) सुरथाँ अतिथिग्वे स्वभीशूँराक्षै. आश्वमेधे सुपेशसः.. (१६) मैंने अतिथिग्व के पुत्र इंद्रोत से सुंदर रथ वाले एवं ऋक्ष के पुत्र से सुंदर लगाम वाले घोड़ों को पाया है. मैंने अश्वमेध से सुंदर घोड़े पाए हैं. (१६) षळश्वाँ अतिथिग्व इन्द्रोते वधूमतः. सचा पूतक्रतौ सनम्.. (१७) मैंने ऋक्ष एवं अश्वमेध के पुत्रों द्वारा दिए गए घोड़ों के साथ ही शुद्ध यज्ञकर्म वाले एवं अतिथिग्व के पुत्र इंद्रोत द्वारा घोड़ियों सहित दिए गए घोड़ों को ग्रहण किया है. (१७) ऐषु चेतद्वृषण्वत्यन्तर्ऋज्रेष्वरुषी. स्वभीशुः कशावती.. (१८) इन सरल गति वाले घोड़ों में गर्भाधान योग्य घोड़ों से युक्त, शोभायमान एवं सुंदर लगाम वाली घोड़ियां भी जान पड़ती हैं. (१८) न युष्मे वाजबन्धवो निनित्सुश्चन मर्त्यः. अवद्यमधि दीधरत्.. (१९) हे अन्न देने वाले छः राजाओ! निंदा करने वाला व्यक्ति भी तुम्हारे सामने निंदा का वचन नहीं बोलता. (१९) सूक्त-५८ देवता-वरुण प्र वस्त्रिष्ठुभमिषं मन्दद्वीरायेन्दवे. धिया वो मेधसातये पुरन्ध्या विवासति.. (१) हे अध्वर्युगण! तुम वीरों को हर्षित करने वाले इंद्र के लिए तीन स्तंभों से युक्त अन्न का संग्रह करो. इंद्र परम बुद्धियुक्त यज्ञकर्म द्वारा यज्ञ आरंभ करने के लिए तुम्हारा सत्कार करते हैं. (१) नदं व ओदतीनां नदं योयुवतीनाम्. पतिं वो अघ्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि.. (२) हे यजमानो! उषाओं को उत्पन्न करने वाले, नदियों को शब्दायमान करने वाले एवं अवध्य गायों के पालक इंद्र को बुलाओ. तुम गायों के दूध की इच्छा करते हो. (२) ता अस्य सूददोहसः सोमं श्रीणन्ति पृश्नयः. जन्मन्देवानां विशस्त्रिष्वारोचने दिवः.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
वे चितकबरे रंग की गाएं तीनों सवनों में इंद्र से संबंधित सोमरस को अपने दूध से मिश्रित करती हैं जो देवों के जन्मस्थान एवं आदित्य के मनपसंद द्युलोक में प्रवेश कर सकती हैं एवं जिनके दूध से कुआं भर सकता है. (३) अभि प्र गोपर्ति गिरेन्द्रमर्च यथा विदे. सूनुं सत्यस्य सत्पतिम्.. (४) गायों के पालक, यज्ञ के पुत्र एवं साधुओं का पालन करने वाले इंद्र की स्तुति उसी प्रकार करो, जिस प्रकार वे यज्ञ के प्रति जाने का रास्ता जान सकें. (४) आ हरयः ससृजिरेऽरुषीरधि बर्हिषि. यत्राभि सन्नवामहे.. (५) दीप्तिशाली एवं हरितवर्ण के अश्व इंद्र को कुश पर स्थापित करें. हम वहां स्थित इंद्र की स्तुति करेंगे. (५) इन्द्राय गाव आशिरं दुदुहे वज्रिणे मधु. यत्सीमुपह्वरे विदत्.. (६) जिस समय वज्रधारी इंद्र समीप में रखे हुए सोमरस को प्राप्त करते हैं, उस समय गाएं इंद्र के लिए मधुर दूध देती हैं जो सोमरस में मिलाया जा सके. (६) उद्वद् ब्रध्नस्य विष्टपं गृहमिन्द्रश्च गन्वहि. मध्वः पीत्वा सचेवहि त्रिः सप्त सख्युः पदे.. (७) मैं एवं इंद्र जिस समय सूर्य के निवासस्थान में जाते हैं, उस समय मधुर सोमरस पीकर सबके सखा आदित्य के इक्कीस स्थानों में हम एकत्रित हों. (७) अर्चत प्रार्चत प्रियमैधासो अर्चत. अर्चन्तु पुत्रका उत पुरं न धृष्ण्वर्चत.. (८) हे प्रियमेध ऋषि के वंश वाले लोगो! इंद्र की विशेष रूप से पूजा करो. तुम्हारे पुत्र और तुम इंद्र की इस प्रकार पूजा करो, जिस प्रकार शत्रु का नगर नष्ट करने वाले वीर की पूजा की जाती है. (८) अव स्वराति गर्गरो गोधा परि सनिष्षणत्. पिङ्गा परि चनिष्कददिन्द्राय ब्रह्मोद्यतम्.. (९) घर्घर ध्वनि करता हुआ युद्ध का बाजा बज रहा है. हाथों पर बंधा हुआ गोह का चमड़ा भी शब्द कर रहा है. पीले रंग की धनुषडोरी शब्द कर रही है. इंद्र को लक्ष्य करके इस समय स्तुति बोलो. (९) आ यत्पतन्त्येन्यः सुदुघा अनपस्फुरः. अपस्फुरं गृभायत सोममिन्द्राय पातवे.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
जिस समय सफेद रंग की, शोभन जल देने वाली एवं बहुत अधिक बढ़ी हुई नदियां बहती हैं, उस समय तुम इंद्र के पीने के लिए सोमरस को ले जाओ. (१०) अपादिन्द्रो अपादग्निर्विश्वे देवा अमत्सत. वरुण इदिह क्षयत्तमापो अभ्यनूषत वत्सं संशिश्वरीरिव.. (११) इंद्र ने सोमरस पिया एवं अग्नि ने सोमरस पिया. देवगण सोमरस पीकर तृप्त हुए. वरुण सोमरस पीने के लिए यज्ञशाला में निवास करें. गाएं जिस प्रकार बछड़े से मिलने दौड़ती हैं, उसी प्रकार उक्थ मंत्र वरुण की स्तुति करते हैं. (११) सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धव:. अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव.. (१२) हे वरुण! तुम शोभन देव हो. तुम्हारे समुद्ररूपी तालु में गंगा आदि सात नदियां इस प्रकार गिरती हैं जिस प्रकार सूर्य के सामने किरणें गिरती हैं. (१२) यो व्यतीँरफाणयत् सुयुक्ताँ उप दाशुषे. तक्वो नेता तदिद्वपुरुपमा यो अमुच्यत.. (१३) जो इंद्र विविध गमन वाले के रथ में भली प्रकार जुते हुए घोड़ों को हव्यदाता यजमान के पास जाने के लिए चलाते हैं, वे उपमा देने योग्य हैं, यज्ञ में आते हैं, यज्ञ के फल के नेता हैं एवं उदक उत्पन्न करते हैं. वे असुर आदि से मुक्त रहते हैं. (१३) अतीदु शक्र ओहत इन्द्रो विश्वा अति द्विष:. भिनत्कनीन ओदनं पच्यमानं परो गिरा.. (१४) शक्र (इंद्र) युद्ध में सभी शत्रुओं का अतिक्रमण करके चलते हैं. वे सभी द्वेषियों को छोड़ देते हैं. सुंदर एवं मेघों के ऊपर वर्तमान इंद्र गर्जन एवं वज्र के शब्द से ताड़ित करके मेघों का भेदन करते हैं. (१४) अर्भको न कुमारकोऽधि तिष्ठन्नवं रथम्. स पक्षन्महिषं मृगं पित्रे मात्रे विभुक्रतुम्.. (१५) बालक के समान छोटे शरीर वाले कुमार इंद्र प्रशंसनीय रथ पर बैठते हैं. इंद्र महान् एवं माता-पिता के सामने इधरधर दौड़ने वाले मृगशावक के समान अनेक कर्मों वाले मेघ को वर्षा के लिए प्रेरित करते हैं. (१५) आ तू सुशिप्र दम्पते रथं तिष्ठा हिरण्ययम्. अध द्युक्षं सचेवहि सहस्रपादमरुषं स्वस्तिगामनेहसम्.. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*
हे शोभन-नासिका वाले एवं गृहस्वामी इंद्र! तुम रथरूपी घर में बैठो. वह रथ सोने का बना हुआ है, दीप्त, अनेक पहियों वाला, कुशलतापूर्वक चलने वाला एवं पापरहित है. हम दोनों उस रथ में मिलें. (१६) तं घेमित्था नमस्विन उप स्वराजमासते. अर्थं चिदस्य सुधितं यदेतव आवर्तयन्ति दावने.. (१७) हव्य-अन्न धारण करने वाले लोग इस प्रकार विराजमान इंद्र की उपासना करते हैं. जब इंद्र को चलकर स्वयं आने एवं दान के योग्य स्तुतियां प्रेरित करती हैं, तब इंद्र का भली प्रकार स्थापित धन प्राप्त होता है. (१७) अनु प्रत्नस्यौकसः प्रियमेधास एषाम्. पूर्वामनु प्रयतिं वृक्त बर्हिषो हितप्रयस आशत.. (१८) प्रियमेध ऋषि के परिवार वाले लोगों ने देवों के पुराने स्थान अर्थात् स्वर्ग को प्राप्त किया है, मुख्य दान के लक्ष्य से कुशों का विस्तार किया है तथा सोमरस आदि प्राप्त किया है. (१८) सूक्त—५९ देवता—इंद्र यो राजा चर्षणीनां याता रथेभिरध्रिगुः. विश्वासां तरुता पृतनानां ज्येष्ठो यो वृत्रहा गृणे.. (१) मैं प्रजाओं के राजा, रथ द्वारा चलने वाले, गमन में निर्बाध, सभी सेनाओं को तारने वाले, ज्येष्ठ एवं वृत्रहंता इंद्र की स्तुति करता हूं. (१) इन्द्रं तं शुम्भ पुरुहन्मन्नवसे यस्य द्विता विधर्तरि. हस्ताय वज्रः प्रति धायि दर्शतो महो दिवे न सूर्यः.. (२) हे पुरुहन्मा ऋषि! तुम अपनी रक्षा के लिए इंद्र को अलंकृत करो. तुम्हारे विधाता इंद्र का स्वभाव उग्र एवं कोमल दो प्रकार का है. इंद्र अपने हाथ में दर्शनीय एवं आकाश में सूर्य के समान दिखाई देने वाला वज्र धारण करते हैं. (२) नकिष्टं कर्मणा नशद्यश्चकार सदावृधम्. इन्द्रं न यज्ञैर्विश्वगूर्तमृभ्वसमधृष्टं धृष्ण्वोजसम्.. (३) जो यज्ञसाधनों द्वारा सदा वृद्धि करने वाले, सबके स्तुतियोग्य, महान् अन्यों द्वारा पराभवरहित एवं सबको दबाने वाली शक्ति से युक्त इंद्र को यज्ञसाधनों द्वारा अपने अनुकूल बना लेते हैं, उनके कर्म में कोई व्यक्ति बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
अषाळ्हमुग्रं पृतनासु सासहिं यस्मिन्महीरुरुजयः. सं धेनवो जायमाने अनोनवुर्द्यावः क्षामो अनोनवुः.. (४) मैं दूसरों के लिए असहनीय, उग्र व शत्रु सेनाओं को पराजित करने वाले इंद्र की स्तुति करता हूं. इंद्र के जन्म के समय विशाल एवं वेगशालिनी गायों ने, द्युलोक तथा धरती ने स्तुति की थी. (४) यद् द्याव इन्द्र ते शतं शतं भूमीरुत स्युः. न त्वा वज्रिन्सहस्रं सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी.. (५) हे इंद्र! यदि सौ द्यौ एवं सौ भूमियां हो जावें, तब भी तुम्हें नापा नहीं जा सकता. हे वज्रधारी इंद्र! सौ सूर्य तुम्हें प्रकाशित नहीं कर सकते और न आठ द्यावा-पृथिवी तुम्हारी सीमा बना सकते हैं. (५) आ पप्राथ महिना वृष्ण्या वृषन्विश्वा शविष्ठ शवसा. अस्माँ अव मघवन्गोमति व्रजे वज्रिश्चित्राभिरूतिभिः.. (६) हे अभिलाषापूरक, अतिशय शक्तिशाली, धनस्वामी एवं वज्रधारी इंद्र! तुमने अपनी महान् शक्ति द्वारा शत्रुओं की आयुध बरसाने वाली सेनाओं को वश में किया है. तुम नाना रक्षासाधनों द्वारा शत्रुओं से हमारी गोशाला की रक्षा करो. (६) न सीमदेव आपदिषं दीर्घायो मर्त्यः. एतग्वा चिद्य एतशा युयोजते हरी इन्द्रो युयोजते.. (७) हे दीर्घ आयु वाले इंद्र! देवों को न मानने वाला मनुष्य सब अन्न प्राप्त नहीं करता. जो मनुष्य इंद्र के श्वेतवर्ण अश्वों को रथ में जोड़ता है, इंद्र अपने घोड़ों की सहायता से उसी के यज्ञ में आते हैं. (७) तं वो महो महाय्यमिन्द्रं दानाय सक्षणम्. यो गाधेषु य आरणेषु हव्या वाजेष्वस्ति हव्यः.. (८) हे महान् ऋत्विजो! दान पाने के लिए तुम उस पूज्य इंद्र की सेवा करो. इंद्र जलप्राप्ति के लिए निचले स्थानों में पहुंचने के लिए तथा युद्ध में विजय पाने के लिए बुलाने योग्य हैं. (८) उद् षु णो वसो महे मृशस्व शूर राधसे. उद् षु मह्यै मघवन्मघत्तय उदिन्द्र श्रवसे महे.. (९) हे निवासस्थान देने वाले एवं शूर इंद्र! महान् अन्न देने के लिए हमें उन्नत करो. हे धनस्वामी एवं शूर इंद्र! हमें महान् धन एवं विशाल कीर्ति देने का प्रयास करो. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
त्वं न इन्द्र ऋतयुस्त्वानिदो नि तृम्पसि. मध्ये वसिष्व तुविन्मृणोर्वोर्नि दासं शिश्नथो हथैः.. (१०) हे यज्ञाभिलाषी इंद्र! तुम अपने निंदक का धन छीनकर बहुत प्रसन्न होते हो. हे अधिक धन वाले इंद्र! हमारी रक्षा के लिए तुम हमें अपनी दोनों जांघों के बीच छिपा लो एवं हमसे द्वेष करने वाले दासों को आयुधों द्वारा मारो. (१०) अन्यव्रतममानुषमयज्वानमदेवयुम्. अव स्वः सखा दुधुवीत पर्वतः सुघ्नाय दस्युं पर्वतः.. (११) हे इंद्र! तुम्हारे मित्र पर्वत ऋषि तुम्हारे अतिरिक्त किसी अन्य के लिए यज्ञ करने वाले, मानव से भिन्न, यज्ञरहित व देवों को न मानने वाले को स्वर्ग से नीचे गिरा देते हैं एवं दस्यु को मृत्यु की ओर प्रेरित करते हैं. (११) त्वं न इन्द्रासां हस्ते शविष्ठ दावने. धानानां न सं गृभायास्मयुर्द्धिः सं गृभायास्मयुः.. (१२) हे शक्तिशाली इंद्र! तुम हमें देने की अभिलाषा से गायों को इस प्रकार ग्रहण करो, जिस प्रकार जौ हाथ में लिए जाते हैं. तुम हमें देने की अभिलाषा से अधिक वस्तुएं हाथ में लो. (१२) सखायः क्रतुमिच्छत कथा राधाम शरस्य. उपस्तुतिं भोजः सूरियों अहयः.. (१३) अध्वर्यु मित्रो! तुम इंद्र संबंधी यज्ञ करने की इच्छा करो. हम शत्रुहिंसक इंद्र की स्तुति कैसे करेंगे? शत्रुओं को खाने वाले एवं मित्रों के रक्षक इंद्र शत्रुओं को झुकाते हैं. (१३) भूरिभिः समह ऋषिभिर्बर्हिष्मद्भिः स्तविष्यसे. यदित्यमेकेमेकमिच्छर वत्सानपराददः.. (१४) हे सब लोगों द्वारा पूज्य इंद्र! बहुत से ऋषियों और ऋत्विजों द्वारा तुम्हारी स्तुति की जाती है. हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम स्तोताओं को एक-एक करके अनेक प्रकार से बछड़े देते हो. (१४) कर्णगृह्या मघवा शौरदेव्यो वत्सं नस्त्रिभ्य आनयत्. अजां सूरिर्न धातवे.. (१५) धनी इंद्र संग्राम में शत्रुओं से छीनी हुई गायों को एवं उनके बछड़ों को कान पकड़कर हमारे पास इस प्रकार ले आवें, जिस प्रकार बालक बकरी को पानी पिलाने ले जाता है. (१५) सूक्त—६० देवता—अग्नि
त्वं नो अग्ने महोभिः पाहि विश्वस्या अरातेः. उत द्विषो मर्त्यस्य.. (१) हे अग्नि! तुम महाधन देकर दानरहित लोगों से हमारी रक्षा करो एवं हमें शत्रु लोगों से बचाओ. (१) नहि मन्युः पौरुषेय ईशे हि वः प्रियजात. त्वमिदसि क्षपावान्.. (२) हे प्रिय जन्म वाले अग्नि! पुरुषों का क्रोध तुम्हें बाधा नहीं पहुंचा सकता. तुम ही रात में तेजस्वी हो. (२) स नो विश्वेभिर्देवेभिरूर्जो नपाद्द्रशोचे. रयिं देहि विश्ववारम्.. (३) हे शक्ति के नाती एवं स्तुति योग्य प्रकाश वाले अग्नि! तुम सब देवों के साथ मिलकर हमें सबके वरण करने योग्य धन दो. (३) न तमग्ने अरातयो मर्तं युवन्त रायः. यं त्रायसे दाश्वांसम्.. (४) हे अग्नि! तुम जिस हव्यदाता यजमान का पालन करते हो, उसे धनी एवं दानरहित लोग अपने से अलग नहीं कर सकते. (४) यं त्वं विप्र मेधसातावग्ने हिनोषि धनाय. स तवोती गोषु गन्ता.. (५) हे अग्नि! जिस हव्यदाता यजमान का तुम यज्ञ में धन देने के लिए प्रेरित करते हो, वह तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर गायों वाला बनता है. (५) त्वं रयिं पुरुवीरमग्ने दाशुषे मर्ताय. प्र णो नय वस्यो अच्छ.. (६) हे अग्नि! तुम हव्य देने वाले मनुष्य को अनेक वीर पुत्रों से युक्त धन देते हो, इसलिए हमें भी निवासस्थान देने योग्य धन दो. (६) उरुष्या णो मा परा दा अघायते जातवेदः. दुराध्ये३ मर्ताय.. (७) हे जातवेद अग्नि! हमारी रक्षा करो. हमें पाप की इच्छा करने वाले एवं हिंसकबुद्धि मनुष्य को मत सौंपो. (७) अग्ने माकिष्टे देवस्य रातिमदेवो युयोत. त्वमीशिषे वसूनाम्.. (८) हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम धनों के स्वामी हो. कोई भी देवरहित व्यक्ति तुम्हारे दान को दूर नहीं कर सकता. (८) स नो वस्व उप मास्यूर्जो नपान्माहिनस्य. सखे वसो जरितृभ्यः.. (९) हे बल के नाती, सखा एवं निवासस्थान देने वाले अग्नि! तुम हम स्तोताओं को महान् ebook converter DEMO Watermarks*
धन दो. (९) अच्छ नः शीरशोचिषं गिरो यन्तु दर्शतम्. अच्छा यज्ञासो नमसा पुरूवसुं पुरुप्रशस्तमूतये.. (१०) हमारी स्तुतियां जलाने वाली ज्वालाओं से युक्त एवं दर्शनीय अग्नि के सामने जावें. रक्षा पाने के लिए हमारे यज्ञ हव्य अन्न से युक्त होकर अधिक धन वाले एवं बहुतों द्वारा प्रशंसित अग्नि के समीप जाएं. (१०) अग्निं सूनुं सहसो जातवेदसं दानाय वार्याणाम्. द्विता यो भूदमृतो मर्त्येष्वो होता मन्द्रतमो विशि.. (११) सभी स्तुतियां वरण करने योग्य, धनदान के निमित्त, बल के पुत्र एवं जातधन अग्नि के सामने जाएं. मरणरहित अग्नि मनुष्यों में दो रूपों में रहते हैं. देवों में अमर एवं मानवों में होम पूरा करने वाले तथा प्रजाओं में अतिशय प्रसन्न करने वाले. (११) अग्निं वो देवयज्ययाग्निं प्रयतध्वरे. अग्निं धीषु प्रथममग्निमर्वत्यग्निं क्षेत्राय साधसे.. (१२) हे यजमानो! मैं तुम्हारे देवसंबंधी यज्ञ के आरंभ होने पर अग्नि की स्तुति करता हूं. मैं यज्ञ प्रारंभ करने के समय, बंधु-भाव प्राप्त होने पर एवं क्षेत्र-लाभ होने पर सब देवों से पहले अग्नि की स्तुति करता हूं. (१२) अग्निरिषां सख्ये ददातु न ईशे यो वार्याणाम्. अग्निं तोके तनये शश्वदीमहे वसुं सन्तं तनूषाम्.. (१३) वरण करने योग्य धनों के स्वामी अग्नि हम मित्रों को अन्न दें. हम निवासस्थान देने वाले एवं अंगों का पालन करने वाले अग्नि से अपने पुत्र और पौत्र के लिए बहुत सा धन मांगते हैं. (१३) अग्निमीळिष्वावसे गाथाभिः शीरशोचिषम्. अग्निं राये पुरुमीळ्ह श्रुतं नरोऽग्निं सुदीतये छर्दिः.. (१४) हे पुरुमीढ ऋषि! तुम मंत्रों द्वारा दाहक ज्वालाओं वाले अग्नि की स्तुति रक्षा एवं धन पाने के लिए करो. अन्य यजमान भी अग्नि की स्तुति करते हैं. तुम अग्नि से मेरे लिए घर मांगो. (१४) अग्निं द्वेषो योतवै नो गृणीमस्यग्निं शं योश्च दातवे. विश्वासु विश्ववितेव हव्यो भुवद्वस्तुतॄंऋषूणाम्.. (१५) eBook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—६१ देवता—अग्नि
हम शत्रुओं से बचने के लिए सुख एवं भयहीनता के लिए अग्नि की स्तुति करते हैं. संपूर्ण प्रजाओं के रक्षक अग्नि ऋषियों को निवासस्थान देने वाले तथा बुलाने योग्य हैं. (१५) सूक्त—६१ देवता—अग्नि हविष्कृणुध्वमा गमदध्वर्युर्वनते पुनः. विद्वाँ अस्य प्रशासनम्.. (१) हे अध्वर्युगण! अग्नि आए हैं. तुम उन्हें शीघ्र हव्य दो. हव्य देना जानने वाले अध्वर्यु यज्ञ की पुनः सेवा करते हैं. (१) नि तिग्ममभ्यं१ शुं सीदद्धोता मनावधि. जुषाणो अस्य सख्यम्.. (२) होता तीखी ज्वाला वाले अग्नि की मित्रता यजमान से कराता हुआ अग्नि के पास बैठता है. (२) अन्तरिच्छन्ति तं जने रुद्रं परो मनीषया. गृभ्णन्ति जिह्वया ससम्.. (३) होता अपनी बुद्धि के बल से यजमान का मनोरथ पूरा करने के लिए दुःख नष्ट करने वाले अग्नि को सामने स्थापित करना चाहते हैं. होता बाद में अग्नि की स्तुतियां बोलते हुए ग्रहण करते हैं. (३) जाम्यतीतपे धनुर्वयोधा अरुहद्वनम्. दृषदं जिह्वयावधीत्.. (४) अन्य देने वाले अग्नि सबसे ऊपर वर्तमान अंतरिक्ष को भी अतिक्रमण कर जाते हैं. अपनी ज्वाला से मेघ का वध करने वाले अग्नि जल को मुक्त करने के लिए ऊपर चढ़ते हैं. (४) चरन्वत्सो रुशन्निह निदातारं न विन्दते. वेति स्तोतव अम्ब्यम्.. (५) बछड़े के समान इधर-उधर घूमने वाले एवं श्वेत रंग वाले अग्नि को इस संसार में रोकने वाला कोई नहीं मिलता, वे स्तोता के स्तोत्रों की कामना करते हैं. (५) उतो न्वस्य यन्महदश्वावद्योजनं बृहत्. दामा रथस्य ददृशे.. (६) अंतरिक्ष में आदित्यरूपी अग्नि के रथ में घोड़े जोड़ने का महान् एवं विशाल कार्य दिखाई देता है तथा रथ की रस्सियां दिखाई देती हैं. (६) दुहन्ति सप्तैकामुप द्वा पञ्च सृजतः. तीर्थे सिन्धोरधि स्वरे.. (७) शब्द करने वाले सिंधु तट पर सात ऋत्विज् जल का दोहन करते हैं. इन में भी दो शेष पांच को प्रयुक्त करते हैं. (७)
आ दशभिर्विवस्वत इन्द्रः कोशमचुच्यवीत्. खेदया त्रिवृता दिवः.. (८) यजमान ने दस उंगलियों द्वारा इंद्र से याचना की. इंद्र ने आकाश में तीन प्रकार की किरणों द्वारा मेघ से जल टपकाया. (८) परि त्रिधातुरध्वरं जूर्णिरिति नवीयसी. मध्वा होतारो अञ्जते.. (९) तीन रंगों वाले एवं वेगवान् अग्नि अपनी नवीन ज्वाला के साथ यज्ञ में जाते हैं. अध्वर्यु आदि घी एवं मधु से उसकी पूजा करते हैं. (९) सिञ्चन्ति नमसावतमूच्चाचक्रं परिज्मानम्. नीचीनबारमक्षितम्.. (१०) अध्वर्यु नमस्कार के द्वारा अवनत, ऊपर स्थित चक्र वाले, सब ओर व्याप्त, नीचे की ओर द्वार वाले एवं अक्षीण अग्नि को सींचते हैं. (१०) अभ्यारमिदद्रयो निषिक्तं पुष्करे मधु. अवतस्य विसर्जने.. (११) आदर करते हुए अध्वर्युगण समीपवर्ती एवं रक्षक अग्नि के विसर्जन के समय विशालपात्र में मधु सिक्त करते हैं. (११) गाव उपावतावतं मही यज्ञस्य रप्सुदा. उभा कर्णा हिरण्यया.. (१२) हे गायो! यज्ञ के लिए दोहन के समय तुम रक्षक अग्नि के पास जाओ. अग्नि के दोनों कान सोने के हैं. (१२) आ सुते सिञ्चत श्रियं रोदस्योरभिश्रियम्. रसा दधीत वृषभम्.. (१३) हे अध्वर्युगण! दूध दुह लेने के बाद द्यावा-पृथिवी पर आश्रित दूध को सींचो. इसके बाद बकरी के दूध में अग्नि को स्थापित करो. (१३) ते जानत स्वमोक्यं१ सं वत्सासो न मातृभिः. मिथो नसन्त जामिभिः.. (१४) गायों ने अपने निवासदाता अग्नि को जाना. बछड़े जिस प्रकार अपनी माताओं से मिलते हैं, उसी प्रकार गाएं अपने साथ की दूसरी गायों को लेकर अग्नि से मिलती हैं. (१४) उप स्रक्वेषु बप्सतः कृण्वते धरुणं दिवि. इन्द्रे अग्ना नमः स्वः.. (१५) ज्वाला के द्वारा भक्षण करने वाले अग्नि का अन्न अंतरिक्ष में इंद्र और अग्नि का पोषण करता है. इंद्र एवं अग्नि को हव्य अन्न दो. (१५) अधुक्षत्पिप्युषीमिषमूर्जं सप्तपदीमरिः. सूर्यस्य सप्त रश्मिभिः.. (१६) अध्वर्यु वायु एवं गतिशील माध्यमिकी वाक् के द्वारा सूर्य की सात किरणों से बढ़े हुए ebook converter DEMO Watermarks*
अन्न एवं रस को दुहते हैं. (१६) सोमस्य मित्रावरुणोदिता सूर आ ददे. तदातुरस्य भेषजम्.. (१७) हे मित्र व वरुण! निकल आने पर सूर्य सोमरस ग्रहण करते हैं. वह ग्रहण हम बीमारों की दवा है. (१७) उतो न्वस्य यत्पदं हर्यतस्य निधान्यम्. परि द्यां जिह्वयातनत्.. (१८) सोमरस देने वाले मुझ हर्यत ऋषि का स्थान हव्य रखने योग्य है. वहां बैठकर अग्नि अपनी ज्वाला से द्युलोक को भरते हैं. (१८) सूक्त—६२ देवता—अश्विनीकुमार उदीराथामृतायते युञ्जाथामश्विना रथम्. अन्ति षद्भूतू वामव:.. (१) हे अश्विनीकुमारो! यज्ञ की अभिलाषा करने वाले मेरे लिए उन्नत बनो एवं यज्ञ में आने के लिए रथ में घोड़े जोड़ो. तुम्हारी रक्षा हमारे समीप रहे. (१) निमिषश्चिज्जवीयसा रथेना यातमश्विना. अन्ति षद्भूतू वामव:.. (२) हे अश्विनीकुमारो! आंखों के निमेष से भी अधिक गतिशील रथ द्वारा हमारे यज्ञ में आओ. तुम्हारी रक्षा हमारे समीप रहे. (२) उप स्तृणीतमत्रये हिमेन घर्ममश्विना. अन्ति षद्भूतू वामव:.. (३) हे अश्विनीकुमारो! असुरों द्वारा अग्नि में फेंके हुए अत्रि ऋषि की जलन दूर करने के लिए जल छिड़को. तुम्हारी रक्षा हमारे समीप रहे. (३) कुह स्थ: कुह जग्मथु: कुह श्येनेव पेतथु:. अन्ति षद्भूतू वामव:.. (४) हे अश्विनीकुमारो! तुम कहां हो, कहां जाते हो और बाज के समान कहां गिरते हो? तुम्हारी रक्षा हमारे समीप रहे. (४) यदद्य कर्हि कर्हि चिच्छ्रुश्रूयातमिमं हवम्. अन्ति षद्भूतू वामव:.. (५) हे अश्विनीकुमारो! हमें यह पता नहीं है कि आज तुम कहां और कब हमारी पुकार सुनोगे? तुम्हारी रक्षा हमारे पास रहे. (५) अश्विना यामहूतमा नेदिष्ठं याम्याप्यम्. अन्ति षद्भूतू वामव:.. (६) मैं उचित समय पर बुलाने योग्य अश्विनीकुमारों एवं उनके समीपवर्ती बंधुओं के पास ebook converter DEMO Watermarks*
जाता हूं. तुम्हारी रक्षा हमारे पास रहे. (६) अवन्तमत्रये गृहं कृणुतं युवमश्विना. अन्ति षद्भूतू वामवः... (७) हे अश्विनीकुमारो! तुमने अत्रि की रक्षा के लिए घर बनाया था. तुम्हारी रक्षा हमारे समीप रहे. (७) वरेथे अग्निमातपो वदते वल्ग्वत्रये. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (८) हे अश्विनीकुमारो! मनोहर स्तुति करने वाले की उष्णता से रक्षा करो. तुम्हारी रक्षा हमारे समीप रहे. (८) प्र सप्तवध्रिराशसा धारामग्नेरशायत. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (९) महर्षि सप्तवध्रि ने तुम अश्विनीकुमारों की स्तुति करके अग्नि को मंजूषा से निकालकर पुनः उसीमें सुला दिया था. तुम्हारी रक्षा हमारे पास रहे. (९) इहा गतं वृषण्वसू शृणुतं म इमं हवम्. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (१०) हे वर्षाकारक एवं धनसंपन्न अश्विनीकुमारो! यहां आओ और हमारी पुकार सुनो. तुम्हारी रक्षा हमारे पास रहे. (१०) किमिदं वां पुराणवज्ज्रतोरिव शस्यते. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (११) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हें पुराने एवं बुड्ढे व्यक्ति के समान बार-बार क्यों बुलाना पड़ता है? तुम्हारी रक्षा हमारे साथ रहे. (११) समानं वां सजात्यं समानो बन्धुरश्विना. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (१२) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे जन्म एवं बंधु समान हैं. तुम्हारी रक्षा हमारे पास रहे. (१२) यो वां रजांस्यश्विना रथो वियाति रोदसी. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (१३) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा रथ सारे लोकों एवं द्यावा-पृथिवी में घूमता है. तुम्हारी रक्षा हमारे साथ रहे. (१३) आ नो गव्येभिरश्व्यैः सहस्रैरुप गच्छतम्. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (१४) हे अश्विनीकुमारो! हजारों गायों एवं अश्वों को लेकर हमारे पास आओ, तुम्हारी रक्षा हमारे पास रहे. (१४) मा नो गव्येभिरश्व्यैः सहस्रेभिरति ख्यतम्. अन्ति षद्भूतू वामवः.. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अश्विनीकुमारो! हजारों गायों एवं अश्वों को हमसे दूर मत करना. तुम्हारी रक्षा हमारे पास रहे. (१५) अरुणप्सुरुषा अभूदकञ्ज्योतिर्र्ऋतावरी. अन्ति षद्भूतु वामवः.. (१६) हे अश्विनीकुमारो! श्वेत वर्ण वाली उषा प्रकाश फैलाती हुई सब जगह जाती है. तुम्हारी रक्षा हमारे पास रहे. (१६) अश्विना सु विचाकशद्वृक्षं परशुमाँ इव. अन्ति षद्भूतु वामवः.. (१७) हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार लकड़हारा कुल्हाड़ी से पेड़ काटता है, उसी प्रकार अग्नि अंधकार को मिटाते हैं. तुम्हारी रक्षा हमारे पास रहे. (१७) पुरं न धृष्णवा रुज कृष्णया बाधितो विशा. अन्ति षद्भूतु वामवः.. (१८) हे शत्रुओं को दबाने वाले ऋषि सप्तवध्रि! तुम काले संदूक में बंद थे. बाद में अश्विनीकुमारों की कृपा से तुमने बाहर निकल कर उसे जला दिया था. अश्विनीकुमारों की रक्षा हमारे पास रहे. (१८) सूक्त—६३ देवता—अग्नि आदि विशोविशो वो अतिथिं वाजयन्तः पुरुप्रियम्. अग्निं वो दुर्यं वचः स्तुषे शूषस्य मन्मभिः.. (१) हे अन्नाभिलाषी ऋत्विजो एवं यजमानो! तुम सारी प्रजा के अतिथि एवं बहुतों के प्रिय अग्नि की सेवा स्तुति द्वारा करो. मैं तुम्हारी सुखप्राप्ति के लिए सुंदर स्तुतियों द्वारा गूढ़वचन बोलता हूं. (१) यं जनासो हविष्मन्तो मित्रं न सर्पिरासुतिम्. प्रशंसन्ति प्रशस्तिभिः.. (२) लोग हव्य धारण करके एवं घी का हवन करते हुए अग्नि की स्तुति सूर्य के समान करते हैं. (२) पन्यांसं जातवेदसं यो देवतात्युद्यता. हव्यान्यैरयद्दिवि.. (३) अग्नि स्तोता के यज्ञकर्म की प्रशंसा करने वाले, जातवेद तथा यज्ञ में डाले गए हव्य को स्वर्ग में ले जाने वाले हैं. (३) आगन्म वृत्रहन्तमं ज्येष्ठमग्निमानवम्. यस्य श्रुतर्वा बृहन्नाक्षों अनीक एधते.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*