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सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

दूसरा अध्याय

दूसरा अध्याय पहला खंड पान्तमा वो अन्धस इन्द्रमभि प्र गायत. विश्वासाहं १३ शतक्रतुं म १३ हिष्ठं चर्षणीनाम्.. (१) हे यजमानो! आप इंद्र की स्तुति कीजिए. वे आप के द्वारा चढ़ाए गए सोमरूपी अन्न को पीने वाले तथा शत्रुओं का नाश करने वाले हैं. वे सैकड़ों प्रकार के कर्म करने वाले व मनुष्यों को धन देने वाले हैं. (१) पुरुहूतं पुरुष्टुतं गाथान्या ३ १३ सनश्रुतम्. इन्द्र इति ब्रवीतन.. (२) हे यजमानो! आप इंद्र की उपासना कीजिए. वे बहुत प्रसिद्ध हैं. वे यज्ञ में अनेक लोगों द्वारा बुलाए जाते हैं. अनेक लोगों द्वारा उन की उपासना की जाती है. (२) इन्द्र इन्नो महोनां दाता वाजानां नृतुः. महाँ अभिज्ञा यमत्.. (३) हे यजमानो! इंद्र अन्न और धन देने वाले हैं. वे महान देव हैं. वे हमारे सामने प्रकट हो कर हमें अन्नधन आदि देने की कृपा करें. (३) प्र व इन्द्राय मादन १३ हर्यश्वाय गायत. सखायः सोमपाव्ने.. (४) हे यजमानो! इंद्र हरि नाम के घोड़े वाले हैं. वे सोमरस पीने वाले हैं. आप उन इंद्र के लिए मादक स्तोत्र गाइए. (४) श १३ सेदुक्थ १३ सुदानव उत द्युक्षं यथा नरः. यकृमा सत्यराधसे.. (५) हे यजमानो! इंद्र श्रेष्ठ धनदाता और सत्यरूपी धन वाले हैं. हम विधिविधान सहित इंद्र की स्तुति करते हैं. आप भी उन की स्तुति कीजिए. (५) त्वं इन इन्द्र वाजयूस्त्वं गव्युः शतक्रतो. त्व १३ हिरण्ययुर्वसो.. (६) हे इंद्र! आप सैकड़ों प्रकार के कर्म करने वाले हैं. आप हमें अन्न, गाएं व सोना दीजिए. (६) वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः. कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते.. (७) हे इंद्र! हम आप को अपना बनाना चाहते हैं. हम मित्र भाव से आप की उपासना करते ebook converter DEMO Watermarks*

हैं. हम कण्वगोत्र के हैं. हमारी संतान भी आप की स्तुति करती है. (७) न घेमन्यदा पपन वज्रिन्नपसो नविष्टौ. तवेदु स्तोमैश्चिकेत.. (८) हे इंद्र! आप वज्र धारण करने वाले हैं. यज्ञ अनुष्ठान में आप के स्तोत्र के अलावा हम और कोई स्तोत्र नहीं पढ़ेंगे. हम आप के ही स्तोत्रों से स्तुति करना जानते हैं. (८) इच्छन्ति देवाः सुन्वन्तं न स्वप्नाय स्पृहयन्ति. यन्ति प्रमादमतन्द्राः.. (९) सोमयज्ञ करने वालों पर देवगण की कृपा रहती है. केवल सपने देखने वालों से वे प्रेम नहीं करते हैं. परिश्रम करने वाले ही आनंददायी सोम को प्राप्त कर सकते हैं. (९) इन्द्राय मद्धने सुतं परि ष्टोभन्तु नो गिरः. अर्कमर्चन्तु कारवः.. (१०) हे यजमानो! आप सराहनीय सोमरस की उपासना कीजिए. वे उपासना के योग्य हैं. इंद्र सोमरस को चाहते हैं. हमारी वाणी को छाने हुए सोमरस की स्तुति करनी चाहिए. (१०) यस्मिन्विश्वा अधि श्रियो रणन्ति सप्त स ☷ सदः. इन्द्र ☷ सुते हवामहे.. (११) इंद्र सारी शोभाओं से शोभित हैं. यज्ञ में सात पुरोहित इंद्र को हवि देने के लिए अनेक मंत्र पढ़ते हैं. हम सोमयज्ञ में उन इंद्र को आमंत्रित करते हैं. (११) त्रिकद्रुकेषु चेतनं देवासो यज्ञमतनत. तमिद्वर्धन्तु नो गिरः.. (१२) यज्ञ उत्साहवर्द्धक है. सभी देव यज्ञ के तीन दिनों में यज्ञ की बढ़ोतरी करते हैं. हमारी स्तुति और वाणियां भी उस यज्ञ की बढ़ोतरी करें. (१२) दूसरा खंड अयं त इन्द्र सोमो निपूतो अधि बर्हिषि. एहीमस्य द्रवा पिब.. (१) हे इंद्र! हम ने आप के लिए छान कर सोमरस तैयार किया है. यज्ञ की वेदी पर बिछे हुए कुश के आसन पर उसे प्रतिष्ठित किया है. आप जल्दी ही उस के निकट पधारिए. उस सोमरस को पीने की कृपा कीजिए. (१) शाचिगो शचिपूजनाय ☷ रणाय ते सुतः. आखण्डल प्र हूयसे.. (२) हे इंद्र! आप सामर्थ्यवान व प्रकाशमान किरणों वाले हैं. आप शक्तिमान, पूजनीय और शत्रुओं का मानमर्दन करने वाले हैं. हम ने आप की तृप्ति के लिए यह सोमरस तैयार किया है. आप पधारिए. इस सोमरस को ग्रहण कीजिए. (२) यस्ते शृङ्गवृषो णपातप्रणपात्कुण्डपाय्यः. न्यस्मिन् दध्र आ मनः.. (३) हे इंद्र! शृंगवृष ऋषि के पुत्र सूर्य को आप ने धुरी पर स्थापित किया है. कुंडपायी यज्ञ, जिस में कुंडियों से सोमरस पिया जाता है, में मन लगाने की कृपा कीजिए. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

आ तू न इन्द्र क्षमन्तं चित्रं ग्राभ २४ सं गृभाय. महाहस्ती दक्षिणेन.. (४) हे इंद्र! आप बड़ेबड़े हाथों वाले हैं. आप दाएं हाथ में हमारे लिए यशस्वी, विलक्षण और उपयुक्त धन धारण कीजिए. आप हमें उस धन को प्रदान करने की कृपा कीजिए. (४) विद्मा हि त्वा तुविकूर्मिं तुविदेष्णं तुवीमघम्. तुविमात्रमवोभिः.. (५) हे इंद्र! आप बहुत शक्तिमान व बहुत देने योग्य संपत्ति वाले हैं. आप बहुत धनवान व विशाल आकृति वाले हैं. हम जानते हैं कि आप के पास संरक्षण के बहुत सारे साधन हैं. (५) न हि त्वा शूर देवा न मर्तासो दित्सन्तम्. भीमं न गां वारयन्ते.. (६) हे इंद्र! आप पराक्रमी हैं. आप दाता हैं. जैसे भारी भरकम भयंकर बैल को कोई नहीं हटा सकता है, वैसे ही क्या देव, क्या मनुष्य कोई भी आप को नहीं डिगा सकता. (६) अभि त्वा वृषभा सुते सुत २४ सृजामि पीतये. तृम्पा व्यश्नुही मदम्.. (७) हे इंद्र! आप बलशाली हैं. हम आप के पीने के लिए अच्छी तरह छान कर सोमरस तैयार करते हैं. आप उस मदमस्त बना देने वाले सोमरस को पी कर तृप्त होइए. (७) मा त्वा मूरा अविष्यवो मोपहस्वान आ दभन्. मा कीं ब्रह्मद्विषं वनः.. (८) हे इंद्र! आप ब्राह्मणों से द्वेष रखने वालों की सेवा स्वीकार मत कीजिए. मूर्ख मनुष्य व दूसरों की हंसी उड़ाने वालों पर अपनी कृपा मत कीजिए. ये लोग आप पर किसी तरह अपना प्रभाव न जमा पाएं. (८) इह त्वा गोपरीणसं महे मन्दन्तु राधसे. सरो गौरो यथा पिब.. (९) हे इंद्र! यजमान आप से बहुत धन पाना चाहते हैं. वे गाय के दूध में मिले सोमरस से आप को तृप्त करना चाहते हैं. हिरण जैसे तालाब में जल पीता है, वैसे ही आप इस यज्ञ में (पधार कर) सोमरस पीजिए. (९) इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम्. अनाभयिन्नरिमा ते.. (१०) हे इंद्र! आप सर्वव्यापक हैं. आप पेट भर कर इस सोमरस को पीजिए. हम आप जैसे निर्भय को सोमरस समर्पित करते हैं. (१०) नृभिर्धौतः सुतो अश्वैरव्या वारैः परिपूतः. अश्वो न निक्तो नदीषु.. (११) हे इंद्र! नदी के पानी में धो कर जैसे घोड़े को साफ करते हैं, वैसे ही पानी में पत्थरों से कूट कर इस सोमरस को साफ किया है. पत्थरों से कूट कर इस का रस निचोड़ा है. भेड़ के बालों की छलनी से छानछान कर इसे साफ किया है. (११) तं ते यवं यथा गोभिः स्वादुमकर्म श्रीणन्तः. इन्द्र त्वास्मिन्त्सधमादे.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! जौ से जिस प्रकार पुरोडाश (भोग) बनाया जाता है, उसी प्रकार सोम रस में गाय का दूध मिला कर उसे हम ने तैयार किया है. वह सोमरस स्वादिष्ट है. हम उसी सोमरस को पीने के लिए यज्ञ में आप को आमंत्रित करते हैं. (१२) तीसरा खंड इद ँ१ ह्यन्वोजसा सुत ँ१ राधानां पते. पिबा त्वा ३ स्य गिर्वणः.. (१) हे इंद्र! आप धनपति, उपासना के योग्य व बलशाली हैं. आप नियमपूर्वक संस्कार किए गए इस सोमरस को शीघ्र ग्रहण कीजिए. (१) यस्ते अनु स्वधामसत्सुते नि यच्छ तन्वम्. स त्वा ममत्तु सोम्य.. (२) हे इंद्र! आप सोम के योग्य हैं. यह सोमरस आप के लिए तृप्तिदायी हो. यह सोमरस अन्न स्वरूप है. आप इस सोमरस में सशरीर पधारिए. (२) प्र ते अश्नोतु कुक्ष्योः प्रेन्द्र ब्रह्मणा शिरः. प्र बाहू शूर राधसा.. (३) हे इंद्र! आप शक्तिमान हैं. विशुद्ध सोम प्रार्थनाओं से आप के सिर, दोनों भुजाओं व कांखों तक पहुंचे. हम आप से धन चाहते हैं. (३) आ त्वेता नि षीदतेन्द्रमभि प्र गायत. सखाय स्तोमवाहसः.. (४) हे यजमानो! आप इंद्र को प्रसन्न करने के लिए शीघ्र आइए, बैठिए. उन के लिए प्रार्थना व उपासना कीजिए. (४) पुरूतंमं पुरूणामीशानं वार्याणाम्. इन्द्र ँ१ सोमे सचा सुते.. (५) हे यजमानो! आप इकट्ठे होइए. इंद्र शत्रुओं को हराने की सामर्थ्य रखते हैं. वे ऐश्वर्य के स्वामी हैं. आप सभी उन की उपासना कीजिए. (५) स घा नो योग आ भुवत्स राये स पुरन्ध्या. गमद्वाजेभिरा स नः.. (६) हे इंद्र! आप हमें वीर बनाइए और निखारिए. आप हमें समृद्धि प्रदान कीजिए. आप हमें ज्ञान व पोषकता प्रदान कीजिए. आप हमारे समीप पधारने की कृपा कीजिए. (६) योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे. सखाय इन्द्रमूतये.. (७) हे यजमानो! हम पर बारबार कामों में अपनी रक्षा के लिए अपने मित्र इंद्र का आह्वान करते हैं. (७) अनु प्रत्नस्यौकसो हुवे तुविप्रतिं नरम्. यं ते पूर्वं पिता हुवे.. (८) इंद्र स्वर्गवासी हैं. वे बहुत लोगों की मदद करते हैं. हमारे पिता (पूर्वजों) ने उन का आह्वान किया था. हम भी उन का आह्वान करते हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

आ घा गमद्यदि श्रवत्सहस्रिणीभिरूतिभिः. वाजेभिरुप नो हवम्.. (९) हे यजमानो! हमें आशा है कि इंद्र हमारी प्रार्थना से प्रसन्न होंगे. वे अपनी रक्षा और वैभव के साथ हमारे पास अवश्य पधारेंगे. (९) इन्द्र सुतेषु सोमेषु क्रतुं पुनीष उक्थ्यम्. विदे वृधस्य रक्षस्य महाँ हि षः.. (१०) हे इंद्र! आप के पुत्र आप के लिए सोमरस परिष्कृत करते हैं. आप महान हैं. आप उन के यज्ञों तथा उन के स्तोत्रों की बढ़ोतरी करते हैं. (१०) स प्रथमे व्योमनि देवाना २४ सदने वृधः. सुपारः सुश्रवस्तमः समप्सुजित्.. (११) हे यजमानो! इंद्र प्रथम देवता हैं. वे आकाश में देवताओं के आवास में निवास करते हैं. वे भलीभांति हमारी रक्षा करते हैं. वे हमें यश प्रदान करते हैं. वे असुर विजेता हैं. हम उन का आह्वान करते हैं. (११) तमु हुवे वाजसातय इन्द्रं भराय शुष्मिणम्. भवा नः सुम्ने अन्तम् सखा वृधे.. (१२) हे इंद्र! हम अन्नप्राप्ति के लिए आप का आह्वान करते हैं. हम अपने भरणपोषण के लिए आप का आह्वान करते हैं. हम सुमन (अच्छे मन वाले) व आप के सखा बनें. आप हमारी बढ़ोतरी में हमारा सहयोग करने की कृपा कीजिए. (१२) चौथा खंड एना वो अग्निं नमसोजों नपातमा हुवे. प्रियं चेतिष्ठमरतिं २४ स्वध्वरं विश्वस्य दूतममृतम्.. (१) हे अग्नि! आप विश्व के दूत हैं. आप अमर, प्रिय व अक्षय हैं. हम अपने यज्ञ में आप का आह्वान करते हैं. (१) स योजते अरुषा विश्वमोजसा स दुद्रवत्स्वाहुतः. सुब्रह्मा यज्ञः सुशमी वसूनां देव २४ राधो जनानाम्.. (२) अग्नि लोगों के लिए धन स्वरूप, विद्वान्, संयमशील व सब को जोड़ते हैं. आप समस्त विश्व को ओज से पूर्ण करते हैं. हम आप का आह्वान करते हैं. (२) प्रत्यु अदर्श्यायत्यु ३ च्छन्ती दुहिता दिवः. अपो मही वृणुते चक्षुषा तमो ज्योतिष्कृणोति सूनरी.. (३) उषा स्वर्गलोक की पुत्री व अंधकार को दूर करती हैं. वे अपनी किरणों से सभी को प्रकाशित करती हैं. वे आंख की ज्योति हैं. वे अंधकार में ज्योति हैं. वे उत्तम नारी हैं. (३) उदुस्रियाः सृजते सूर्यः सचा उद्यन्नक्षत्रमर्चिवत्. eBook converter DEMO Watermarks*

तवेदुषो व्युषि सूर्यस्य च सं भक्तेन गमेमहि.. (४) सूर्य, नक्षत्र और ग्रह ये तीनों आकाश को प्रकाशमान करते हैं. सूर्य अपनी किरणों का प्रसार करते हैं और प्रकाश से हम भक्तों तक पहुंचते हैं. (४) इमा उ वां दिविष्टय उस्रा हवन्ते अश्विना. अयं वामह्ने ऽ वसे शचीवसू विशंविश 28 हि गच्छथ:.. (५) हे अश्विनीकुमारो! आप स्वर्गलोक के वासी हैं. स्वर्ग प्राप्त करने के इच्छुक लोग अपनी इच्छापूर्ति के लिए आप का आह्वान करते हैं. आप स्तुति करने वालों के पास पहुंचते हैं. हम आप का आह्वान करते हैं. (५) युवं चित्रं ददथुर्भोजनं नरा चोदथा 28 सूनूतावते. अर्वाग्रथ 28 समनसा नि यच्छतं पिबत 28 सोम्यं मधु.. (६) हे अश्विनीकुमारो! आप युवा नेता हैं और श्रेष्ठ आहार देने वाले व स्तुति करने वालों को प्रेरित करते हैं. कृपया आप अपना रथ रोकिए. आप अपना मन लगा कर मधुर सोमरस का पान कीजिए. (६) पांचवां खंड अस्य प्रत्नामनु द्युत 28 शुक्रं दुदुह्वे अहय:. पयः सहस्रामृषिम्.. (१) सोमरस चमकीला, ज्ञान बढ़ाने वाला व मनोकामना पूरी करने वाला है. ऋषियों ने इस के सहस्र स्वरूप का स्मरण कर के इसे तैयार किया है. (१) अय 28 सूर्य इवोपद्गय 28 सरा 28 सि धावति. सप्त प्रवत आ दिवम्.. (२) सोम सात धाराओं से उसी प्रकार दौड़ते हैं (प्रवाहित होते हैं), जिस तरह सूर्य स्वर्गलोक से सात किरणों से धरती पर आने के लिए दौड़ते हैं. (२) अयं विश्वानि तिष्ठति पुनानो भुवनोपरि. सोमो देवो न सूर्य:.. (३) सोम सभी भुवनों के ऊपर प्रतिष्ठित हैं व समस्त संसार पर राज करते हैं. वे हमारे सूर्य हैं. (३) एष प्रत्नेन जन्मना देवो देवेभ्यः सुतः. हरिः पवित्रे अर्षति.. (४) सोमरस दिव्य है. देवता संस्कारपूर्वक उसे परिष्कृत करते हैं. वह हरा है और उसे पवित्र छलनी में परिष्कृत किया जाता है. (४) एष प्रत्नेन मन्मना देवो देवेभ्यस्परि. कविर्विप्रेण वावृधे.. (५) सोम कवि और विद्वानों से प्रशंसा प्राप्त करते हैं. वे सभी देवताओं से ऊपर हैं. उन को ebook converter DEMO Watermarks*

संस्कारपूर्वक अनेक विधियों से परिष्कृत किया जाता है. (५) दुहानः प्रत्नमित्पयः पवित्रे परि षिच्यसे. क्रन्दं देवाँ अजीजनः.. (६) सोमरस को छलनी से परिष्कृत किया जाता है और उसे बरतन (पात्र) में निचोड़ा जाता है. सोम आवाज करते हुए पात्र में जाते हैं तो लगता है मानो वे देवताओं का आह्वान कर रहे हों. (६) उप शिक्षापतस्थुषो भियसमा धेहि शत्रवे. पवमान विदा रयिम्.. (७) हे सोम! आप अकल्याणकारियों को भयभीत कीजिए. आप हमारा मार्गदर्शन कीजिए. आप हमें धनधान्य से परिपूर्ण करने की कृपा कीजिए. (७) उपो षु जातमप्तुरं गोभिर्भङ्गं परिष्कृतम्. इन्दुं देवा अयासिषुः.. (८) सोमरस को निचोड़ा जाता है. तत्पश्चात उस को परिष्कृत किया जाता है. फिर जल में मिलाया जाता है. आप को गाय के दूध में मिलाया जाता है. देवता भी सोम को बुलाते हैं. (८) उपास्मै गायता नरः पवमानायेन्दवे. अभि देवाँ इयक्षते... (९) हे यजमानो! आप देवताओं के गुण गाने की अपेक्षा सोम के गुण गाइए. (९) छठा खंड प्र सोमासो विपश्चितो ऽ पो नयन्त ऊर्मयः. वनानि महिषा इव.. (१) सागर की लहरें सागर में जैसे मिल जाती हैं, वैसे सोमरस जल में मिल जाता है. वन में मिले भैंसों की तरह सोमरस जल में एकमेक हो जाता है. (१) अभि द्रोणानि बभ्रवः शुक्रा ऋतस्य धारया. वाजं गोमन्तमक्षरन्.. (२) सोमरस चमकीला है. वह अपनी ऋत की धारा से भूरा सोम गाय के दूध में झरता है. वह शक्तिमान है. (२) सुता इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः. सोमा अर्षन्तु विष्णवे.. (३) सोम इंद्र, वायु, मरुद्गणों व विष्णु को प्राप्त हों. (३) प्र सोम देववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा. अ ॐ शोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छा कोशं मधुश्रुतम्.. (४) हे सोम! आप को पानी से भरीपूरी नदियों की तरह पानी में मिलाया जाता है. आप मदिर (आनंददायी) व जाग्रत हैं. मधुरता चुआते हुए सोमरस (पात्र में) इकट्ठा होता है. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

आ हर्यतो अर्जुनो अत्के अव्यत प्रियः सूनुर्न मर्ज्यः. तमी ॐ हिन्वन्त्यपसो यथा रथं नदीष्वा गभस्त्योः.. (५) सोमरस को बच्चे की तरह साफसुथरा बना लिया है. प्रिय सोमरस को तेज गति से जल में मिलाया जाता है. वह वैसे ही वेग से पानी में मिलता है, जैसे युद्ध में तेज गति से कोई रथ जाता है. (५) प्र सोमासो मदच्युतः श्रवसे नो मघोनाम्. सुता विदथे अक्रमूः.. (६) सोमरस आनंद बरसाने वाला व यशदाता है. वह यज्ञ में निरंतर पहुंच कर इच्छाओं की पूर्ति करता है. (६) आदी ॐ ह ॐ सो यथा गणं विश्वस्यावीवशनमतिम्. अत्यो न गोभिरज्यते.. (७) सोमरस हंस की गति से जाता है. वह संसार के बुद्धिमानों की बुद्धि तक पहुंच रखता है. (७) आदीं त्रितस्य योषणे हरि ॐ हिन्वन्त्यद्रिभिः. इन्दुमिन्द्राय पीतये.. (८) सोमरस हरा है. इसे पत्थरों से कूट कर निचोड़ा जाता है. उस को तीन ऋषियों की अंगुलियों से इंद्र के पीने के लिए निचोड़ा जाता है. (८) अया पवस्व देवयू रेभन्पवित्रं पर्योषि विश्वतः. मधोर्धारा असृक्षत.. (९) हे सोम! आप देवताओं से मिलने के इच्छुक हैं. आप पवित्र और अविरल मीठी धारा से झरते हैं व आवाज करते हुए प्रवाहित होते हैं. (९) पवते हर्यतो हरिरति ह्वरा ॐ सि र ॐ ह्या. अभ्यर्ष स्तोतृभ्यो वीरवद्यशः.. (१०) सोमरस पवित्र और हरा है. वह पराक्रमी संतान और यश प्राप्ति के इच्छुक यजमानों के लिए प्रवाहित होता है. (१०) प्र सुन्वानायान्धसो मर्तो न वष्ट तद्वचः. अप श्वानमराधसं हता मखं न भृगवः.. (११) परिष्कृत किए जाते समय सोमरस आवाज करता है. दुष्ट लोग इस आवाज को न सुनें. भृगुओं ने जैसे मख को दूर किया, उसी तरह पापी और कुत्तों को यज्ञ से दूर किया जाए. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

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तीसरा अध्याय

तीसरा अध्याय पहला खंड पवस्व वाचो अग्रियः सोम चित्राभिरूतिभिः. अभि विश्वानि काव्या.. (१) हे सोम! आप प्रमुख हैं, आगे की पंक्ति में रहने वाले हैं. आप हमारी स्तुतियों पर ध्यान दीजिए. हमारी सभी स्तुतियों और प्रार्थनाओं को सुनिए. आप पूजनीय व संरक्षणशील हैं. (१) त्व ꣳ समुद्रिया अपो ऽ ग्रियो वाच ईरयन्. पवस्व विश्वचर्षणे.. (२) हे सोम! आप सभी के कर्मों को ध्यान से देखने वाले हैं. आप अग्रगण्य स्तुतियों के प्रेरक हैं. अंतरिक्ष के जल आप को प्राप्त होते हैं. (२) तुभ्येमा भुवना कवे महिम्ने सोम तस्थिरे. तुभ्यं धावन्ति धेनवः.. (३) हे सोम! आप के ही लिए ये लोक स्थिर हैं. आप की महानता के कारण ये लोक स्थिर हैं. गाएं आप को दूध देने के लिए दौड़दौड़ कर आप के पास आ रही हैं. (३) पवस्वेन्दो वृषा सुतः कृधी नो यशसो जने. विश्वा अप द्विषो जहि.. (४) छाना हुआ आप का रस स्फूर्तिदायी है. आप छनते हुए अपनी धाराओं से पवित्र होइए. हम लोगों को यशस्वी बनाइए. हमारे सभी शत्रुओं का नाश कीजिए. (४) यस्य ते सख्ये वय ꣳ सासह्वाम पृतन्यतः. तवेन्दो द्युम्न उत्तमे.. (५) हे सोम! हम आप के मित्र हैं. हम ने आप से तेजस्विता पाई है. हम सभी शत्रुओं को नष्ट करने की क्षमता वाले हो गए हैं. (५) या ते भीमान्यायुधा तिग्मानि सन्ति धूर्वणे. रक्षा समस्य नो निदः.. (६) हे सोम! आप के अस्त्रशस्त्र भयंकर हैं. वे शत्रुओं को डरा देने वाले हैं. उन की सहायता से शत्रुओं द्वारा की गई निंदा की पीड़ा से हमारी रक्षा कीजिए. (६) वृषा सोम द्युमाँ असि वृषा देव वृषव्रतः. वृषा धर्माणि दध्रिषे.. (७) हे सोम! आप शक्तिमान, प्रकाशमान, इच्छापूरक एवं बल बढ़ाने के लिए संकल्पशील हैं. हे इच्छापूरक! आप देवता और मनुष्य सब के लिए कल्याणकारी कर्म धारण करने वाले ebook converter DEMO Watermarks*

हैं. (७) वृष्णस्ते वृष्ण्य २४ शवो वृषा वनं वृषा सुतः. स त्वं वृषन्वृषेदसि.. (८) हे सोम! आप शक्तिशाली, बहुत सामर्थ्यवान हैं. आप की सेवा भी शक्तिवर्द्धक है. आप का रस एवं आप स्वयं भी बलवर्द्धक हैं. (८) अश्वो न क्रदो वृषा सं गा इन्दो समर्वतः. वि नो राये दुरो वृधि.. (९) हे सोम! आप शक्तिमान हैं. आप घोड़े की तरह आवाज करते हैं. आप हमें गोधन और अश्वधन देते हैं. आप हमारे लिए धन के द्वार खोलते हैं. (९) वृषा ह्यसि भानुना द्युमन्तं त्वा हवामहे. पवमान स्वर्द्दशम्.. (१०) हे सोम! आप अवश्य ही शक्तिवर्द्धक हैं. आप पवित्र व प्रकाशमान हैं. हम यज्ञ में आप को बुलाते हैं. (१०) यदद्भिः परिषिच्यसे मर्मृज्यमान आयुभिः. द्रोणे सधस्थमश्रुषे.. (११) हे सोम! यजमान आप को शुद्ध बनाते हैं. जल से आप को सींचा जाता है. जल मिलाने के बाद आप को द्रोणकलश में स्थापित किया जाता है. (११) आ पवस्व सुवीर्यं मन्दमानः स्वायुध. इहो ष्विन्दवा गहि.. (१२) हे सोम! हमारे यज्ञ में पधार कर आप उस की शोभा बढ़ाइए. आप आनंददायी हैं. आप हमें वीर बनाइए. हमें श्रेष्ठ वीर्य (संतान) प्रदान कीजिए. (१२) पवमानस्य ते वयं पवित्रमभ्युन्दतः. सखित्वमा वृणीमहे.. (१३) हे सोम! छलनी में छन कर पवित्र होने वाले आप से हम मित्रता की इच्छा रखते हैं. (१३) ये ते पवित्रमूर्म्मयो ऽ भिक्षरन्ति धारया. तेभिर्नः सोम मृडय.. (१४) हे सोम! अपनी लहरों जैसी झरती हुई पवित्र धाराओं से हमें सुख प्रदान कीजिए. (१४) स नः पुनान आ भर रयिं वीरवतीमिषम्. ईशानः सोम विश्वतः.. (१५) हे सोम! आप संसार के ईश्वर व पवित्र हैं. आप हमें धनवान, अन्नवान और वीर पुत्रवान बनाने की कृपा कीजिए. (१५) दूसरा खंड अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्. अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्.. (१) अग्नि सभी धन पास रखने वाले, देवताओं को यज्ञ में बुलाने वाले, यज्ञ को ठीक तरह ebook converter DEMO Watermarks*

कराने वाले व देवों को हवि पहुंचाने वाले हैं. हम आप की उपासना करते हैं. (१) अग्निमग्निं ꣳ हवीमभिः सदा हवन्त विश्पतिम्. हव्यवाहं पुरुप्रियम्.. (२) हे अग्नि! आप प्रजापालक, हविवाहक, सर्वप्रिय, बुलाने योग्य व अनेक नाम वाले हैं. आप हम सब के नेता हैं. हम मंत्रों से आप का आह्वान करते हैं. (२) अग्ने देवाँ इहा वह जज्ञानो वृक्तबर्हिषे. असि होता न ईड्यः.. (३) हे अग्नि! आप अरणियों से उत्पन्न होने वाले व देवताओं के दूत हैं. आप आसन फैलाने वाले यजमान के लिए देवताओं को बुला लाइए. आप मददगार और उपासना के योग्य हैं. (३) मित्रं वय ꣳ हवामहे वरुण ꣳ सोमपीतये. या जाता पूतदक्षसा.. (४) हम शुद्ध, बलवान और यज्ञस्थल में प्रकट होने वाले मित्र और वरुण देवता का सोमरस पीने के लिए यज्ञ में आह्वान करते हैं. (४) ऋतेन यावृतावृधावृतस्य ज्योतिषस्पती. ता मित्रावरुणा हुवे.. (५) मित्र और वरुण देवता यजमान पर दयालु हैं. वे सत्यमार्गियों पर कृपालु हैं. उन प्रकाशमान मित्र और वरुण देवताओं का हम आह्वान करते हैं. (५) वरुणः प्राविता भुवान्मित्रो विश्वाभिरूतिभिः. करतां नः सुराधसः.. (६) मित्र और वरुण देवता अपने सभी रक्षा साधनों से हमारी रक्षा करें. वे हमारे शरणदाता हैं. वे हमें यशस्वी धन प्रदान करने की कृपा करें. (६) इन्द्रमिद्गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः. इन्द्रं वाणीरनूषत.. (७) साम गाने वाले पुरोहितों ने बृहतसाम गा कर इंद्र की स्तुति की. यजमानों ने भी मंत्र गा कर इंद्र की स्तुति की. शेष बचे हुए लोगों ने भी वाणी से इंद्र की स्तुति की. (७) इन्द्र इद्धर्योः सचा सम्मिश्ल आ वचोयुजा. इन्द्रो वज्री हिरण्ययः.. (८) इंद्र वज्रधारी हैं. वे सोने के आभूषणधारी हैं. उन की वाणी सुनते ही हरि नामक घोड़े रथ में जुत जाते हैं. अब वे अपने उन्हीं घोड़ों को एक साथ रथ में जोतने वाले हैं. (८) इन्द्र वाजेषु नो ऽ व सहस्रप्रधनेषु च. उग्र उग्राभिरूतिभिः.. (९) हे इंद्र! आप किसी से नहीं हार सकते. आप हमें अपना प्रबल संरक्षण प्रदान कीजिए. जिन युद्धों में हजारों हाथीघोड़ों का लाभ होता है, उन युद्धों में भी आप हमारी सहायता कीजिए. (९) इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्य ꣳ रोहयदि्व. वि गोभिरद्रिमैरयत्.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! संसार को प्रकाश देने के लिए आप ने स्वर्गलोक में सूर्य की स्थापना की. उसी प्रकार अपनी रश्मियों (किरणों) से बरसात के लिए बादलों को प्रेरित किया. (१०) इन्द्रे अग्ना नमो बृहत्सुवृक्तिमेरयामहे. धिया धेना अवस्यवः.. (११) अपने संरक्षण की कामना से हम अग्नि और इंद्र के पास हवि और स्तुति पहुंचाते हैं. हम बुद्धि और मनोयोग से दोनों देवताओं की उपासना करते हैं. (११) ता हि शश्वन्त ईडत इत्था विप्राय ऊतये. सबाधो वाजसातये.. (१२) अनेक बुद्धिमान लोग अग्नि और इंद्र की रक्षा के लिए उपासना करते हैं. वे लोग वैसे ही उन की उपासना करते हैं, जैसे अन्न के लिए लड़तेझगड़ते हैं. (१२) ता वां गीर्भिर्विपन्यवः प्रयस्वन्तो हवामहे. मेधसाता सनिष्यवः.. (१३) हम स्तुतियों से अग्नि और इंद्र की उपासना करते हैं. उन को आमंत्रित करते हैं. हम धन के इच्छुक हवि के साथ आप दोनों को यज्ञ में आमंत्रित करते हैं. (१३) तीसरा खंड वृषा पवस्व धारया मरुत्वते च मत्सरः. विश्वा दधान ओजसा.. (१) हे सोम! आप शक्तिवर्द्धक हैं. आप धारा रूप में छनिए. आप द्रोणकलश में पधारिए. आप अपने बल से विश्व को धारण करने वाले मरुतों के मित्र इंद्र को आनंद प्रदान कीजिए. (१) तं त्वा धर्तारमोण्यो ३: पवमान स्वर्दृशम्. हिन्वे वाजेषु वाजिनम्.. (२) हे सोम! आप पवित्र, स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक को धारण करने वाले व सर्वद्रष्टा हैं. आप को हम युद्धों में जाने के लिए प्रेरित करते हैं. हमें आप अन्न आदि दीजिए. (२) अया चित्तो विपानया हरिः पवस्य धारया. युजं वाजेषु चोदय.. (३) हे सोम! आप हरे हैं. आप को अंगुलियों से निचोड़ा गया है. आप द्रोणकलश में धारा रूप में झरते जाइए. आप अपने मित्र इंद्र को युद्धों में जाने के लिए प्रेरित कीजिए. (३) वृषा शोणो अभिकनिक्रदद्गा नदयन्नेषि पृथिवीमुत द्याम्. इन्द्रस्येव वग्नुरा शृण्व आजौ प्रचोदयन्नर्षसि वाचमेमाम्.. (४) हे सोम! हमारी प्रार्थनाओं को सुन कर आप उसी तरह आवाज करते हैं, जैसे गायों को देख कर लाल बैल आवाज करता है. आप स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक पर पधारते हैं. इंद्र के शब्दों के समान हम आप की आवाज सुनते हैं. आप अपना स्वरूप सब को बोध कराते हैं. यजमान की प्रार्थनाओं को सुनने की कृपा करते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

रसाय्यः पयसा पिन्वमान ईरयन्नेषि मधुमन्तमंशुम्. पवमान सन्तनिमेषि कृण्वन्निन्द्राय सोम परिषिच्यमानः.. (५) स्वादिष्ट और मीठा सोमरस गाय का दूध मिलाने से और स्वादिष्ट और मीठा हो जाता है. पानी मिला कर छानने पर धारा रूप धारण कर के सोम इंद्र को प्राप्त हो जाते हैं. (५) एवा पवस्व मदिरो मदायोदग्राभस्य नमयन्वधस्नुम्. परि वर्णं भरमाणो रुशन्तं गव्युर्नो अर्ष परि सोम सिक्तः.. (६) हे सोम! आप स्फूर्तिदायी हैं. आप वृत्रासुर का वध हो जाने के बाद पानी बहाने वाले मेघों को झुकाइए. उन के जल में मिल कर छनते जाइए. आनंददायी होइए. आप पानी में मिल कर और चमकीले हो जाइए. आप गाय के दूध के रूप में हमारे चारों ओर प्रवाहित होइए. (६) चौथा खंड त्वामिद्धि हवामहे सातौ वाजस्य कारवः. त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः.. (१) हे इंद्र! हम यजमान अपने अन्न की बढ़ोतरी की आकांक्षा से आप को आमंत्रित करते हैं. आप पर्वतवासी, सत्पति व वृत्रहंता हैं. श्रेष्ठ जन विपत्ति के समय आप को स्मरण करते हैं. (१) स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया मह स्तवानो अद्रिवः. गामश्वं रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे.. (२) हे इंद्र! आप हाथ में वज्र धारण करते हैं. आप बलधारी व शक्तिधारी हैं. आप यजमानों की प्रार्थना से प्रसन्न होइए. उन्हें अन्नधन प्रदान करने की कृपा कीजिए. (२) अभि प्र वः सुराधसमिन्द्रमर्च यथा विदे. यो जरितृभ्यो मघवा पुरूवसुः सहस्रेणेव शिक्षति.. (३) हे यजमानो! इंद्र नाना प्रकार के वैभव देने वाले हैं. आप हजारों विधियों से उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश करो. (३) शतानीकेव प्र जिगाति धृष्णुया हन्ति वृत्राणि दाशुषे. गिरेरिव प्र रसा अस्य पिन्विरे दत्राणि पुरुभोजसः.. (४) दुश्मनों का संहार करते समय इंद्र यजमान की वैसे ही रक्षा करते हैं, जैसे सेनानी शत्रु पर चढ़ाई के समय सेना की. उन का यह संरक्षण यजमानों को झरने के जल की तरह शांति और तृप्ति प्रदान करता है. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

त्वामिदा ह्यो नरो ऽ पीप्यन्वज्रिन् भूर्णयः. स इन्द्र स्तोमवाहस इह श्रुध्युप स्वसरमा गहि.. (५) हे वज्रधारी इंद्र! यजमान आप को हवि प्रदान करते हैं. वे ही यजमान आप को सोमरस भेंट करते हैं. स्तोता (उपासक) आप के लिए साम गा रहे हैं. आप सुनिए और यज्ञ में पधारिए. (५) मत्स्वा सुशिप्रिन्हरिवस्तमीमहे त्वया भूषन्ति वेधसः. तव श्रवा ॐ स्युपमान्युक्थ सुतेष्विन्द्र गिर्वणः.. (६) हे सुंदर ठुड्डी वाले इंद्र! आप अस्त्रशस्त्रधारी हैं. आप उपासना के योग्य हैं. हम यजमान अनेक प्रकार की सामग्री से आप की पूजा करते हैं. हम आप को सजाते व सोमरस से छकाते हैं. हम और भी प्रिय पदार्थ आप को भेंट करते हैं. आप अश्वपालक हैं. (६) पांचवां खंड यस्ते मदो वरेण्यस्तेना पवस्वान्धसा. देवावीरघश ॐ सहा.. (१) हे सोम! आप का रस वरेण्य, मददायी व दिव्य हैं. आप परिष्कृत होइए. (१) जघ्निर्वृत्रममित्रिय ॐ सस्नििर्वाजं दिवेदिवे. गोषातिरश्वसा असि.. (२) हे सोम! आप वृत्रासुर अमित्रों (शत्रुओं) के नाशक, दिव्य व संघर्षशील हैं. आप गोधन व अश्वधन प्रदान करते हैं. (२) सम्मिश्लो अरुषो भुवः सूपस्थाभिर्न धेनुभिः. सीदं च्छ्येनो न योनिमा.. (३) हे सोम! बाज जैसे घोंसले में सुशोभित होता है, उसी प्रकार आप अपने सदन में सुशोभित होते हैं. आप गायों के दूध में मिलने पर चमचमाते हैं. (३) अयं पूषा रयिर्भगः सोमः पुनानो अर्षति. पतिर्विश्वस्य भूमनो व्यख्यद्रोदसी उभे.. (४) हे सोम! आप विश्वपति व पवित्र हैं. आप पूषा और भग के लिए प्रवाहित होइए. आप पृथ्वीलोक और स्वर्गलोक दोनों को प्रकाशित करते हैं. (४) समु प्रिया अनूषत गावो मदाय घृष्वयः. सोमासः कृण्वते पथः पवमानास इन्दवः.. (५) हे सोम! आप मददायी व प्रिय हैं. आप के लिए की गई स्तुतियां एकदूसरे से होड़ करती हैं. आप सभी का पथप्रदर्शन करते हैं. (५) य ओजिष्ठस्तमा भर पवनाम श्रवाय्यम्. ebook converter DEMO Watermarks*

यः पञ्च चर्षणीरभि रयिं येन वनामहे.. (६) सोम ओजवान, अंधकार दूर करने वाले और पवित्र हैं. आप पंचों से प्रशंसा प्राप्त करने योग्य रस हमें प्रदान करने की कृपा कीजिए. (६) वृषा मतीनां पवते विचक्षणः सोमो अह्नां प्रतरीतोषसां दिवः. प्राणा सिन्धूनां कलशाँ अचिक्रददिन्द्रस्य हार्द्याविशन्मनीषिभिः.. (७) हे सोम! आप बुद्धि बढ़ाने वाले, विलक्षण, स्वर्गलोक व उषा को जानते हैं. आप दिनरात को प्रकाशित व जाग्रत करते हैं. आप मनीषियों द्वारा इंद्र के लिए परिष्कृत किए जाते हैं. आप आवाज करते हुए पात्र में प्रवाहित होते हैं. (७) मनीषिभिः पवते पूर्व्यः कविर्नृभिर्यतः परि कोशा असिष्यदत्. त्रितस्य नाम जनयन्मधु क्षरन्निद्रस्य वायु ॐ सख्याय वर्धयन्.. (८) सोम पवित्र, अपूर्व व कवि हैं. मनीषी और मनुष्य आप को परिष्कृत करते हैं. आप तीनों सवनों में इंद्र की प्रसिद्धि फैलाते हैं. सोम इंद्र को तृप्ति देते हैं. सोम वायु की मित्रता की बढ़ोतरी के लिए प्रवाहित होते हैं. (८) अयं पुनान उषसो अरोचयदय ॐ सिन्धुभ्यो अभवदु लोककृत्. अयं त्रिः सप्त दुदुहान आशिर ॐ सोमो हृदे पवते चारु मत्सरः.. (९) सोम पवित्र व चमकने वाले हैं. वे हितकारी और उषा को प्रकाशित करते हैं. सोमरस नदियों में जल की बढ़ोतरी करता है. यह तीन गुणे सात को पोसता हुआ प्रवाहित होता है. यह सब के हृदय में निवास करता है. (९) छठा खंड एवा ह्यसि वीरयुरेवा शूर उत स्थिरः. एवा ते राध्यं मनः.. (१) हे इंद्र! आप शूरवीर हैं. आप संग्रामों में शूरवीरों को अपनी वीरता दिखाने का अवसर प्रदान करते हैं. आप उन युद्धों में स्थिर रहते हैं. इसीलिए आप का मन आराधना के योग्य है. (१) एवा रातिस्तुविमघ विश्वेभिर्धायि धातृभिः. अधा चिदिन्द्र नः सचा.. (२) हे इंद्र! आप सभी ऐश्वर्य धारण करते हैं. आप की कृपा कभी भी समाप्त नहीं होती है. आप हम पर कृपा कीजिए. (२) मो षु ब्रह्मेव तन्द्रयुर्भुवो वाजानां पते. मत्स्वा सुतस्य गोमतः.. (३) हे इंद्र! आप बलवान, शक्ति के स्वामी एवं ब्रह्मा के समान हैं. आप हमें बुद्धिमान बनाने की कृपा कीजिए. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः रथीतम २४ रथीनां वाजानां २४ सत्पतिं पतिम्.. (४) हे इंद्र! आप समुद्र जैसे भरेपूरे हैं और विश्व को धारण करते हैं. आप सत्पति, शक्तिपति और दैवी शक्तियों के स्वामी हैं. हम वाणी से आप की उपासना करते हैं. (४) सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते. त्वामभि प्र नोनुमो जेतारमपराजितम्.. (५) हे इंद्र! हम आप के सखा हैं. आप शक्तिमान हैं. आप की छत्रछाया में हम कभी किसी से भयभीत न हों. आप अपराजेय व विजेता हैं. हम आप को नमन करते हैं. (५) पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न वि दस्यन्त्यूतयः. यदा वाजस्य गोमत स्तोतृभ्यो म २४ हते मघम्.. (६) हे इंद्र! आप का दान अपूर्व है. आप हमें (पूर्ण) संरक्षण देते हैं. आप जब उपासकों को अन्नधन दान देते हैं तो वह कभी क्षीण नहीं होता. (६)

चौथा अध्याय

चौथा अध्याय पहला खंड एते असृग्रमिन्दवस्तिरः पवित्रमाशवः. विश्वान्यभि सौभगा.. (१) हे सोम! आप तेजी से छलनी की ओर भाग रहे हैं. यजमान अपने सौभाग्य के लिए आप को परिष्कृत कर रहे हैं. (१) विघ्नन्तो दुरिता पुरु सुगा तोकाय वाजिनः. त्मना कृण्वन्तो अर्वतः.. (२) हे सोम! आप शक्तिदाता, पापनाशी व हमारी पीढ़ियों को पशु धन देते हैं. आप अपना मार्ग स्वयं निर्मित करते हैं. (२) कृण्वन्तो वरिवो गवे ऽ भ्यर्थन्ति सुष्टुतिम्. इडामस्मभ्य ꣳ संयतम्.. (३) हे सोम! आप हमें धन प्रदान करते हैं. आप हमारी गायों के लिए भी श्रेष्ठ धन प्रदान करते हैं. आप पालने वाले हैं. आप हमारी प्रार्थनाओं को स्वीकार कीजिए. (३) राजा मेधाभिरीयते पवमानो मनावधि. अन्तरिक्षेण यातवे.. (४) हे सोम! आप राजा हैं. हम बुद्धि से आप की उपासना करते हैं. आप अंतरिक्ष में भ्रमण करते हैं. आप द्रोणकलश में स्थित रहते हैं. (४) आ नः सोम सहो जुवो रूपं न वर्चसे भर. सुषवाणो देववीतये.. (५) हे सोम! आप को देवीदेवताओं के उपयोग के लिए परिष्कृत किया जाता है. आप हमें भरपूर रूप, वर्चस्व (प्रभाव) व तेज प्रदान कीजिए. (५) आ न इन्द्रो शातग्विनं गवां पोष ꣳ स्वश्व्यम्. वहा भगत्तिमूतये.. (६) हे सोम! आप हमें सैकड़ों गाएं व घोड़े प्रदान कीजिए. आप उन सब का पालनपोषण करने में सक्षम हैं. आप हमें भाग्यशाली बनाने की कृपा कीजिए. (६) तं त्वा नृम्णानि बिभ्रत ꣳ सधस्थेषु महो दिवः. चारु ꣳ सुकृत्येमहे.. (७) हे सोम! आप स्वर्गलोक के महान वैभव से संपन्न हैं. आप चारु (सुंदर) हैं. आप को हम अपने सुकर्मों से पाना चाहते हैं. हम आप की उपासना करते हैं. (७) संवृक्त धृष्णुमुक्थ्यं महामहिव्रतं मदम्. शतं पुरो रुरुक्षणिम्.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

हे सोम! आप महान, महिमाशाली व व्रती हैं. आप शत्रुओं के सैकड़ों नगरों का नाश करने वाले हैं. हम आप से धन चाहते हैं. (८) अतस्त्वा रयिरभ्यवद्राजान २४ सुक्रतो दिव:. सुपर्णो अव्यथी भरत्.. (९) हे सोम! आप सुकर्म करने वाले, धन व शक्तिदाता हैं. आप कभी व्यथित नहीं होते हैं. गरुड़ आप को स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक पर लाने की कृपा करें. (९) अधा हिन्वान इन्द्रियं ज्यायो महित्वमानशे. अभिष्टिकृद्विचर्षणि:.. (१०) हे सोम! स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक पर आने के बाद आप और ज्ञानदायी (संपन्न), महिमाशाली, आकर्षक व क्षमतावान हो जाते हैं. (१०) विश्वस्मा इत् स्वर्दृशे साधारण २४ रजस्तुरम्. गोपामृतस्य विभ्रत्.. (११) हे सोम! आप स्वयं प्रकाशमान हैं. आप यज्ञ के रक्षक व जल के प्रेरक हैं. आप अमृत और दिव्य हैं. (११) इषे पवस्व धारया मृज्यमानो मनीषिभि:. इन्दो रुचाभि गा इहि.. (१२) हे सोम! आप ज्ञानवान हैं. मनीषी यजमान आप को परिष्कृत करते हैं. आप पौष्टिक अन्न देने वाले है. आप अपनी धाराओं में प्रवाहित होइए. (१२) पुनानो वरिवस्कृध्यूर्जं जनाय गिर्वण:. हरे सृजान आशिरम्.. (१३) हे सोम! आप हरे व उपासना के योग्य हैं. आप जलवान होइए. आप यजमानों को अन्न प्रदान करने की कृपा कीजिए. (१३) पुनानो देववीतय इन्द्रस्य याहि निष्कृतम्. द्युतानो वाजिभिर्हित:.. (१४) हे सोम! आप पवित्र व दिव्य हैं. आप को इंद्र और देवताओं के लिए परिष्कृत किया जाता है. आप हित साधक, द्युतिमान व शक्तिशाली हैं. आप इंद्र तक पहुंचने की कृपा कीजिए. (१४) दूसरा खंड अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा. हव्यवाड् जुह्वास्य.. (१) हे अग्नि! आप कवि, विद्वान्, युवा, हविवाहक व यज्ञ के रक्षक हैं. आप को समिधा से प्रज्वलित किया जाता है. (१) यस्त्वामग्ने हविष्पतिर्दूतं देव सपर्यति. तस्य स्म प्राविता भव.. (२) हे अग्नि! आप हविपति तथा देवदूत हैं. आप की जो विधिवत रक्षा करते हैं, आप उन की रक्षा करने की कृपा कीजिए. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

यो अग्निं देववीतये हविष्माँ आविवासति. तस्मै पावक मृडय.. (३) हे अग्नि! आप हविमान हैं. हम देवताओं को हवि पहुंचाने के लिए आप से अनुरोध करते हैं. आप पवित्र हैं. आप हमें सुखी बनाने की कृपा कीजिए. (३) मित्र ॐ हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम्. धियं घृताची ॐ साधन्ता.. (४) हे मित्र! आप पवित्र और दक्ष हैं. हे वरुण! आप जल उपजाते हैं. आप दोनों देव हमें बुद्धि प्रदान कीजिए. आप हमें साधिए एवं हमारे शत्रुओं का नाश कीजिए. हम आप दोनों देवों का आह्वान करते हैं. (४) ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा. क्रतुं बृहन्तमाशाथे.. (५) हे मित्र! हे वरुण! आप सत्य के रक्षक हैं. आप यज्ञ को सफल बनाते हैं. आप हमें भी पुण्यशाली व सत्य का रक्षक बनाइए. (५) कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया. दक्षं दधाते अपसम्.. (६) हे मित्र! हे वरुण! आप दक्ष, जलधारी, कवि व अनेक स्थानों पर वास करते हैं. आप हमें क्षमतावान बनाते हैं. (६) इन्द्रेण स ॐ हि दृक्षसे संजग्मानो अबिभ्युषा. मन्दू समानवर्चसा.. (७) हे मरुद्गण! आप समान वर्चस्व वाले सदैव प्रसन्न रहते हैं. आप तेजोमय, वीर व भयमुक्त हैं. आप इंद्र के साथ सुशोभित होते हैं. (७) आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे. दधाना नाम यज्ञियम्.. (८) हे मरुद्गण! आप पूजनीय व नामधारी हैं. आप अपने धाम (नष्ट होने के बाद फिर से उत्पन्न होने वाले अन्न और जल) में गर्भ धारण कर के आकार प्राप्त करते हैं. आप यज्ञ को धारण करते हैं. (८) वीडु चिदारुजत्नुभिर्गुहा चिदिन्द्र वह्निभिः. अविन्द उस्रिया अनु.. (९) हे इंद्र! आप मजबूत से मजबूत किले को भी ढहा सकते हैं. आप गूढ़ से गूढ़ गुफा में भी प्रवेश कर सकते हैं. आग जैसे तेजस्वी मरुद्गण रुकी हुई किरणों को प्रकाश में लाते हैं. (९) ता हुवे ययोरिदं पप्रे विश्वं पुरा कृतम्. इन्द्राग्नी न मर्धतः.. (१०) हे इंद्र! हे अग्नि! आप पराक्रमी उपासकों के सारे कष्ट हरने वाले व सनातन हैं. हम आप दोनों देवों का आह्वान करते हैं. (१०) उग्रा विघनिना मृध इन्द्राग्नी हवामहे. ता नो मृडात ईदृशे.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*