साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पञ्चमोऽध्यायः २३
पञ्चमोऽध्यायः २३
स ह्यन्तरात्मा भूतानां क्षेत्रज्ञश्चैव कथ्यते।
त्रिगुणव्यतिरिक्तोऽसौ पुरुषश्चेति विश्रुतः ॥१५॥
जो सूक्ष्म, अविज्ञेय, अव्यक्त (अप्रकाश), अचल, ध्रुव (नित्य) हैं; इन्द्रिय, इन्द्रियार्थ तथा सभी प्राणियों से जो बहिर्भूत हैं, सभी प्राणीगण की अन्तरात्मा तथा क्षेत्रज्ञ हैं। वे त्रिगुणातिरिक्त पुरुषरूपेण विश्रुत हैं॥१४-१५॥
हिरण्यगर्भो भगवान् स वै बुद्धिरिति स्मृतः।
धृतेनैकात्मना येन त्रैलोक्यमिदमात्मना ॥१६॥
वे हिरण्यगर्भ भगवान् जो बुद्धिस्वरूप कहे जाते हैं, जो अपने एक रूप से त्रिलोक को धारण करते हैं॥१६॥
अशरीरः शरीरेषु सर्वेषु निवसत्यसौ।
वसन्नपि शरीरेषु न स लिप्यति कर्मभिः ॥१७॥
सभी देव-देवियों के शरीर में वे अशरीरी रूपेण निवास करते हैं। सभी शरीर में वास करने पर भी वे कर्मों से लिप्त नहीं होते॥१७॥
ममान्तरात्मा तव च ये चान्ये देहसंज्ञिताः।
सर्वेषां साक्षिभूतोऽसौ न ग्राह्यः केनचित्क्वचित् ॥१८॥
सगुणो निर्गुणो विश्वो ज्ञानगम्यो ह्यसौ स्मृतः ॥१९॥
वे हम सबकी अन्तरात्मा हैं तथा सभी देहधारियों के साक्षी-स्वरूप हैं। वे कभी भी किसी के द्वारा ग्रहण करने योग्य नहीं हैं। वे सगुण-निर्गुण विश्वरूप तथा ज्ञानगम्य कहे जाते हैं॥१८-१९॥
सर्वतः पाणिपादोऽसौ सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः।
सर्वतः श्रुतिमांल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥२०॥
वे सर्वतः पाणि-पादयुक्त, चक्षु, मस्तक तथा मुखयुक्त हैं। वे सर्वतः (सबके) कर्ण हैं तथा समस्त लोक के सब कुछ को घेर कर अवस्थित हैं॥२०॥
सर्वेन्द्रियगुणावासः सर्वेन्द्रियमथो ह्यसौ।
यथा दीपसहस्राणि स च एकः प्रसूयते ॥२१॥
बुध्यते स यदात्मानं तदा भवति केवलः।
एकत्वं प्रलये चास्य बहुत्वं च प्रवर्त्तनात् ॥२२॥
नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावरजङ्गमम्।
ऋते तमेकमीशानं भूतं स्थावरजङ्गमम् ॥२३॥
२४ श्रीसाम्बपुराणम्
समस्त इन्द्रियों के गुणाश्रय वे सकल इन्द्रियरूप हैं। जैसे एक ही दीपक से हजारों दीपक प्रज्वलित होते हैं, वैसे ही वे अकेले ही बहुरूपेण प्रकाशित हो रहे हैं। जब उन्हें जाना जाता है, तब वे केवल आत्मरूपेण अवस्थान करते हैं। प्रलय में इनका एक-रूपत्व रहता है एवं सृष्टिकाल में इनका बहुरूपत्व हो जाता है। यह एक एवं नित्यस्वरूप हैं। इन एक ईश्वर के अतिरिक्त इस जगत् में कोई भी स्थावर-जंगम प्राणी नित्य नहीं है॥२१-२३॥
अक्षयश्चाप्रमेयश्च सर्वगश्च स उच्यते।
तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम॥२४॥
वे अक्षय, अप्रमेय (अतुलनीय), सर्वग (सर्वत्र गमनशील) एवं अव्यक्त हैं। हे द्विजोत्तम! उनसे ही त्रिगुण उत्पन्न हुआ है॥२४॥
अव्यक्तव्यक्तभावस्था या सा प्रकृतिरुच्यते।
तां योनिं ब्रह्मणो विद्धि नित्यं योऽसौ मदात्मकः॥२५॥
जो अव्यक्त तथा व्यक्तभावरूप हैं, उन्हें प्रकृति कहा गया है। वह ब्रह्मयोनि (प्रकाश स्थान) है। वह नित्य तथा मेरा ही स्वरूप है॥२५॥
लोके च पूज्यते योऽसौ दैवे पित्र्ये च कर्मणि।
नास्ति तस्मात्परो ह्यन्यः पिता देवोऽपि सात्त्विकः॥२६॥
जगत् में वे दैव तथा पितृकर्म में पूजित होते हैं, उनकी अपेक्षा अन्य कोई पिता अथवा सात्त्विक देवता नहीं है॥२६॥
आत्मा हि नः स विज्ञेयस्ततस्तं पूजयाम्यहम्।
स्वर्गस्था अपि ये केचित्तं नमस्यन्ति देहिनः॥२७॥
ते तत्प्रसादाद् गच्छन्ति तेनोद्दिष्टफलाद् गतिम्।
तं देवाश्चाश्रमस्थाश्च नानामूर्तिसमाश्रिताः॥२८॥
भक्त्या सम्पूजयन्त्याद्यगतिं चैषां ददाति सः।
स हि सर्वगतश्चैव निर्गुणश्चैव कथ्यते॥२९॥
वे हमारी आत्मारूप से विज्ञेय हैं, अतएव मैं उनकी पूजा करता हूँ। स्वर्गस्थ कोई-कोई देहधारी उनको नमस्कार करते हैं। वे उनकी कृपा से उनके द्वारा प्रदत्त गति प्राप्त करते हैं। नाना मूर्तियुक्त देवता तथा आश्रमस्थ साधकादि जो उनकी अर्चना करते हैं, भक्तियुक्त पूजनादि करते हैं, वे उन्हें उत्तमा गति प्रदान कर देते हैं। वे सर्वत्र, सर्व प्राणीगण में गमनशील तथा निर्गुण कहे जाते हैं॥२७-२९॥
एवं ज्ञात्वा तमात्मानं पूजयामि सनातनम्।
ये तु तद्भाविता लोका एकत्वञ्च समाश्रिताः॥३०॥
पञ्चमोऽध्यायः २५
पञ्चमोऽध्यायः २५
तमेव चैव ते सर्वे विशन्त्यक्षयमव्ययम्। एतदभ्यधिकं तेषां यदैनं प्रविशन्ति ते॥३१॥
ऐसा जानकर मैं उन आत्मस्वरूप सनातन तत्त्व का पूजन करता हूँ। जो उनके भाव से सराबोर, भावित तथा तन्मय हैं एवं एकत्व से युक्त हैं, वे सभी इस अक्षय-अव्ययस्वरूप में प्रवृष्ट हैं। यह उनकी प्राप्ति है। वे उनमें ही प्रवेश करते हैं॥३०-३१॥
इति गुह्यसमुद्देशस्तव नारद कीर्त्तितः। अस्मद् भक्त्या तु देवर्षे त्वयापि परमं श्रुतम्॥३२॥
हे नारद! यह गोपनीय रहस्य तुमको मैंने बतलाया। हे देवर्षि! मेरी भक्ति के कारण तुमने भी इस परम तत्त्व को सुना॥३२॥
सुरैर्वा मुनिभिर्वापि पुराणं यैरिदं स्मृतम्। ते सर्वे परमात्मानं पूजयन्ति दिवाकरम्॥३३॥
देवगण अथवा मुनिगण जो इस पुराण का स्मरण करते हैं, वे सभी परमात्मा दिवाकर का पूजन करते हैं॥३३॥
इदमाख्यानमार्षेयं यन्मया कीर्त्तितं तव। न ह्यनादित्यभक्ताय त्वया देयं कथञ्चन॥३४॥
यह ऋषियों द्वारा कथित आख्यान है, जिसे मैंने तुमसे कहा। इसे आदित्यभक्त के अतिरिक्त किसी को भी नहीं बतलाना चाहिये॥३४॥
यश्चैतच्छावयेन्नित्यं यश्चैतत् शृणुयान्नरः। स सहस्रार्चिषं देवं प्रविशेन्नात्र संशयः॥३५॥
जो नित्य इसको सुनते हैं तथा सुनाते हैं, वे सहस्र किरणों वाले देवता सूर्य में प्रवेश करते हैं; यह निःसंदिग्ध है॥३५॥
मुच्येत्तार्त्तस्तथा रोगान्मुने श्रुत्वा कथामिमाम्। जिज्ञासुर्लभते ज्ञानं गतिमिष्टां तथैव च॥३६॥ क्षेमेन ब्रजतेऽध्वानमिदं यः पठते पथि। यो यं कामयते कामं स तं प्राप्नोत्यसंशयः॥३७॥
इसका श्रवण करके आर्त्त व्यक्ति रोगमुक्त हो जाता है, जिज्ञासु ज्ञानलाभ करता है और अभीप्सित गति को प्राप्त करता है। जो मार्ग में इसे पढ़ता है, वह निर्विघ्न अपने गन्तव्य तक पहुँच जाता है। इस प्रकार जो जिस कामना को करते हैं, वे उसे निःसंदेह प्राप्त कर लेते हैं॥३६-३७॥
२६ | श्रीसाम्बपुराणम्
वशिष्ठ उवाच
एवमेतन्मयाख्यातं नारदेन महात्मना।
मयापि च तवाख्यातं भक्त्या भानोरिदं नृप ॥३८॥
ऋषि वशिष्ठदेव कहते हैं—महात्मा नारद ने मुझसे यह कहा था। हे राजन्! सूर्य की भक्ति के कारण मैंने इसे तुमसे कहा।।३८।।
त्वया तत् सततं राजन्नभ्यर्च्यो भगवान् रविः।
स हि धाता विधाता च सर्वस्य जगतो गुरुः ॥३९॥
इति श्रीसाम्बपुराणे मित्रवरुणयोस्तपोनाम पञ्चमोऽध्यायः
अतएव हे राजन्! तुम सर्वदा भगवान् सूर्य की अर्चना करो। वे ही धाता, विधाता तथा समस्त जगत् के गुरु हैं।।३९।।
श्री साम्ब पुराणान्तर्गत मित्र-वरुणतपस्या नामक पञ्चम अध्याय समाप्त
षष्ठोऽध्यायः
( भक्त्युपस्थानम्)
बृहद्वल उवाच
कथं साम्बः प्रपन्नोऽर्कं केन वा प्रतिपादितः।
उग्रं शापं च सम्प्राप्य पितरं स किमुक्तवान् ॥१॥
बृहद्वल कहते हैं—साम्ब किसलिये सूर्य के शरणापन्न हुये? वह कैसे सम्पन्न हुआ तथा उग्र शाप पाकर उन्होंने पिता से क्या कहा।।१।।
वशिष्ठ उवाच
ततः शापाभिभूतश्च साम्बः पितरमब्रवीत्।
किं मयापकृतं देव येन शप्तो ह्यहं त्वया ॥२॥
ऋषि वशिष्ठदेव कहते हैं—तदनन्तर साम्ब शाप से अभिभूत होकर पिता से बोले—हे देव! मैंने क्या अपराध किया था, जो आपके शाप द्वारा मैं अभिशप्त हो गया?।।२।।
अहं त्वदाज्ञया देव त्वरमाण इहागतः।
कथं निपातितः शापो मयि तेऽनपकारिणी ॥३॥
मैंने तो आपका कोई अपराध नहीं किया था। आप की आज्ञा पाकर ही यहाँ आया था। आप प्रसन्न हो जायँ। हे देवेश! शाप लौटा लीजिये। हे प्रभु! आप मुझ पर प्रसन्न होईये।।३।।
न तेऽपकुर्मेऽहं किञ्चित् प्रसीद जगतः पते।
शापं नियच्छ देवेश प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥४॥
मैंने आपका कोई अपराध नहीं किया है। हे जगत् के पति! आप प्रसन्न हो जाईये। शाप लौटा लीजिये। प्रसन्न हो जाईये।।४।।
तमुवाच ततः कृष्णः साम्बं बुद्ध्वा ह्यनागसम् ॥५॥
तस्मात्त्वमेव पृच्छस्व प्रसाद्य ऋषिसत्तमम्।
आख्यास्यति स ते देवः शापं यस्ते विनेष्यति ॥६॥
तदनन्तर कृष्ण ने बुद्धि द्वारा साम्ब को निरपराध जानकर उससे कहा—तुम ऋषि-श्रेष्ठ (नारद) को प्रसन्न करके पूछो। वे ही तुमको बतायेंगे कि कौन देवता इस शाप का अपनोदन कर सकते हैं।।५-६।।
२८ श्रीसाम्बपुराणम्
अथैतत् स पितुर्वाक्यं श्रुत्वा जाम्बवतीसुतः ।
दीनः शापपरीताङ्गस्ततः सञ्चिन्त्य वै पुनः ॥७॥
द्वारवत्यां स्थितं विष्णुं कदाचिद्द्रष्टुमागतम् ।
विनयादुपसङ्गम्य साम्बः पप्रच्छ नारदम् ॥८॥
अब जाम्बवती-पुत्र साम्ब पिता का वाक्य सुनकर और अतिदीन भाव से कुष्ठ रोगाक्रान्त होकर रहने लगे। तदनन्तर एक बार द्वारका में विष्णुदर्शनार्थ आये नारद के पास जाकर सविनय जिज्ञासा करने लगे।।७-८।।
साम्ब उवाच
भगवन् ब्रह्मणः पुत्र सर्वज्ञः सर्वलोकगः ।
दयां हि कुरु विप्रेन्द्र प्रणतस्य ममानघ ॥९॥
त्वत्तोऽहं श्रोतुमिच्छामि निश्चयं ब्रूहि तन्मम ।
कः स्तुत्यः सर्वदेवानां कः परः पुरुषोऽव्ययः ॥१०॥
दीनस्यार्तिहरः कश्च शरणं कं व्रजाम्यहम् ।
पितृशापसमुत्थेन कश्मलेन महामुने ॥११॥
अतिभूतस्य मोक्षो मे किं प्रपन्नस्य वै भवेत् ।
साम्ब कहते हैं—हे भगवन् ब्रह्मपुत्र, सर्वज्ञ, सर्वलोक-गमनकारी, विप्रेन्द्र, निष्पाप! मैं प्रणत हूँ, मुझ पर दया करिये। मैं आपसे जो सुनना चाहता हूँ, वह आप अवश्य कहिये। सभी देवताओं में कौन स्तुत्य है? कौन अव्यय पुरुष है? कौन दीनों का हितकारी है? हे महामुने! पिता द्वारा शापोद्भूत पाप के क्षालनार्थ मैं किसकी शरण ग्रहण करूँ?।।९-११।।
वशिष्ठ उवाच
एवं सम्पृच्छते तस्मै साम्बायोवाच नारदः ॥१२॥
ऋषि वशिष्ठदेव कहते हैं—इस प्रकार का प्रश्न पूछने पर नारद ने साम्ब से कहा।।१२।।
नारद उवाच
कदाचित् पर्यटँल्लोकान् सूर्यलोकमहं गतः ।
तत्र दृष्ट्वा मया सूर्यः सर्वदेवगणैर्वृतः ॥१३॥
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च नागैर्यक्षैः सराक्षसैः ।
गायन्ति तत्र गन्धर्वा नृत्यन्तोऽप्सरसस्तथा ॥१४॥
रक्षन्त्युद्यतशस्त्रास्त्रा यक्षराक्षसपन्नगाः ।
ऋचो यजूंषि सामानि मूर्तिमन्ति हि तत्र च ॥१५॥
षष्ठोऽध्यायः <span style="float: right;">२९</span>
नारद कहते हैं—किसी समय मैं नाना स्थानों में पर्यटन करते-करते सूर्यलोक में गया था। वहाँ देखा कि देवता, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, यक्ष, राक्षस सभी सूर्यदेव को घेरे हुए हैं। वहाँ गन्धर्वगण गायन कर रहे थे तथा अप्सरायें नृत्य कर रहीं थी। यक्ष, राक्षस तथा सर्पगण उद्यत शस्त्र-अस्त्र द्वारा सूर्यदेव की रक्षा कर रहे थे एवं ऋक्, यजुः तथा सामवेद मूर्त्तिमान होकर वहाँ विराजित थे॥१३-१५॥
तत्कृतैर्विविधैः स्तोत्रैः स्तुवन्ति ऋषयो रविम्।
मूर्त्तिमन्तः शुभास्तत्र तिस्रः सन्ध्याः शुभाननाः॥१६॥
ऋषिगण ऋक् आदि स्तोत्रों से उनकी स्तुति का गायन कर रहे थे। मंगलमयी शुभानना प्रातः, मध्याह्न तथा सायं सन्ध्या मूर्त्ति धारण करके वहाँ स्थित थीं॥१६॥
गृहीतैर्वज्रनाराचैः परिचर्य रविं स्थिताः।
आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चाश्विनौ तथा॥१७॥
वज्र, नाराच प्रभृति अस्त्र धारण किये अदिति के पुत्रगण, वसुगण, मरुद्गण तथा अश्विनीकुमारद्वय वहाँ सूर्य की परिचर्या करते हुये विद्यमान थे॥१७॥
त्रिसन्ध्यं पूजयत्यर्कं तत्रान्यं च दिवौकसः।
ईरयन् जयशब्दं तु शक्रस्तत्रैव तिष्ठति॥१८॥
वहाँ तीनों सन्ध्या में सूर्य का पूजन हो रहा था तथा जय-जयकार शब्द का उद्घोष करते हुये इन्द्र भी वहाँ उपस्थित थे॥१८॥
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च प्रयुञ्जन्त्याशिषः शुभाः।
रथं हि वाहते तस्य अरुणो नाम सारथिः॥१९॥
हरितैः सप्तभिर्युक्तं छन्दोभिर्वाजिरूपिभिः।
द्वे भार्ये पार्श्वयोस्तस्य ते राज्ञीनिक्षुभे शुभे॥२०॥
ब्रह्मा-विष्णु तथा रुद्र शुभाशीष दे रहे थे। अरुण नामक सूर्य का सारथी सप्तवर्ण अश्वरूप छन्दों से युक्त रथ चला रहा था। उसके दोनों पार्श्व में दो भार्या मंगलमयी राज्ञी तथा निक्षुभा बैठीं थी॥१९-२०॥
अन्यैश्च नामभिर्देवाः परिचर्यविधिं स्थिताः।
पिङ्गलो देवकस्तत्र ततोऽन्यो दण्डनायकः॥२१॥
राज्ञस्तोषौ च तद्द्वारे ततः कल्माषपक्षिणौ।
ततो व्योमचतुःशृङ्गं मेरोः सदृशलक्षणम्॥२२॥
३० श्रीसाम्बपुराणम्
दण्डिर्नग्नोऽग्रतस्तस्य दिक्षु चान्ये स्थिताः सुराः । एवं सर्वगतं नित्यं प्रदीप्तं जगतः शुभम् । ब्रह्माद्यैः संस्तुतं देवैरादित्यं शरणं व्रज ॥२३॥ इति श्रीसाम्बपुराणे भक्त्युपस्थानो नाम षष्ठोऽध्यायः
अन्य विविध नामों के देवगण उनकी परिचर्या कर रहे थे। उनमें पिङ्गल, देवक, दण्डनायक सूर्य के द्वारदेश पर विद्यमान थे। स्तोषनामक कल्माष पक्षीद्वय मेरुतुल्य व्योम के चार शृङ्गरूप थे। उनके सामने नग्न तथा दण्डि एवं चतुर्दिक अन्य देवता अवस्थित थे। इस प्रकार सर्वगत, नित्य, प्रदीप्त (उज्ज्वल), जगत् का शुभ करने वाले ब्रह्मादि देवताओं से संस्तुत आदित्य की शरण ग्रहण करो।।२१-२३।।
श्रीसाम्बपुराण का भक्त्युपस्थान नामक षष्ठ अध्याय समाप्त
सप्तमोऽध्यायः
(रवेः सर्वव्यापित्वनिरूपणम्)
साम्ब उवाच
तत्त्वतः श्रोतुमिच्छामि कथं सर्वगतो रविः।
कतिधा रश्मयस्तत्र मूर्त्तयश्च कति स्मृताः ॥१॥
का राज्ञी निक्षुभा का च कश्चायं दण्डनायकः।
पिङ्गलश्चापि कः प्रोक्तः किं चासौ लिखने सदा ॥२॥
साम्ब ने नारद से पूछा—मैं यह तत्त्वतः सुनना चाहता हूँ कि रवि सर्वगत क्यों हैं? उनकी कितनी किरणें तथा कितनी मूर्तियाँ कही गयी हैं? (तत्त्वविभाग का निरूपण सुनना चाहता हूँ) राज्ञी कौन हैं? निक्षुभा कौन है तथा वे दण्डनायक कौन हैं? पिङ्गला किसे कहा गया है? वे सदा क्या लिखने में व्यापृत रहते हैं? ।।१-२।।
राज्ञस्तोषौ च कौ द्वारे कौ च कल्माषपक्षिणौ।
किं दैवतञ्च तद्व्योम मेरोः सदृशलक्षणम् ॥३॥
को दण्डिर्नग्नको यश्च के देवा दिक्षु ये स्थिताः।
तत्त्वतो निगमञ्चैव विस्तरेण वदस्व मे ॥४॥
(सूर्य के) राजद्वार पर स्तोषद्वय कौन हैं? कल्माष पक्षिद्वय कौन हैं? मेरुशृङ्ग के समान उस व्योम में कौन देवता है? नग्नक नामक दण्डि कौन है? चारो ओर स्थित देवगण कौन हैं? कृपया इनका तत्त्वतः स्वरूप कहिये।।३-४।।
नारद उवाच
विस्तरेणानुपूर्व्या च सूर्यं निगदितं शृणु।
ततः शेषं प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य विवस्वते ॥५॥
नारद कहते हैं—विस्तृत रूप से मैं आनुपूर्वीक सूर्य का तत्त्व कहता हूँ, सुनो। तदनन्तर सूर्य को नमस्कार करके शेष तत्त्व कहूँगा।।५।।
अव्यक्तं कारणं यत्तत् नित्यं सदसदात्मकम्।
प्रधानं प्रकृतिश्चेति तमाहुस्तत्त्वचिन्तकाः ॥६॥
गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम्।
जगद्योनिं समुद्भूतं परं ब्रह्म सनातनम् ॥७॥
३२ श्रीसाम्बपुराणम्
जो अव्यक्त कारणस्वरूप, नित्य सत् तथा असदात्मक है, उन्हें तत्त्वविद् गण प्रधान एवं प्रकृति कहते हैं। वे गन्ध, वर्ण, रस, शब्द, स्पर्श से रहित एवं जगत् के कारण के रूप में समुद्भूत सनातन परम ब्रह्म हैं॥६-७॥
विग्रहः सर्वभूतानामव्यक्तमभवत् पुरा ।
अनाद्यन्तमजं सूक्ष्मं त्रिगुणप्रभवाप्ययम् ॥८॥
जो सभी प्राणिगण के विग्रहस्वरूप हैं, वे पूर्व में अव्यक्त थे। वे आदि-अन्तरहित, अज, सूक्ष्म, त्रिगुणात्मक, सृष्टि-प्रलयरूप हैं॥८॥
असाम्प्रतमति ज्ञेयं तमाहुः परमं पदम्।
तेनात्मना सर्वमिदं जगद् व्याप्तं महात्मना ॥९॥
जो बुद्धि से भी अतीत तथा दुर्विज्ञेय हैं, उन्हें (विद्वान्) परमपद कहते हैं। उन महात्मा के आत्मस्वरूप के द्वारा यह समस्त जगत् व्याप्त है॥९॥
तस्येश्वरस्य प्रतिमा ज्ञानवैराग्यलक्षणा ।
धर्मैश्वर्यकृता बुद्धिर्ब्राह्मी तस्याभिमानिता ॥१०॥
उन ईश्वर की प्रतिमा ज्ञान-वैराग्यरूप है। धर्म में ऐश्वर्यकृता बुद्धि है। ब्राह्मी है—उनकी अभिमानिता॥१०॥
अव्यक्ताज्जायते तस्य मनसा यद् यदिच्छति ।
चतुर्मुखस्य ब्रह्मत्वे कालत्वे चान्तकृद्भवः ॥११॥
वे जो इच्छा मन ही मन करते हैं, वह अव्यक्त से उत्पन्न हो जाता है। चतुर्मुख में ब्रह्मत्व, कालत्व एवं विनाशकारित्व तथा उत्पन्नत्व है॥११॥
सहस्रमूर्धा पुरुषः तिस्रोऽवस्थाः स्वयम्भुवः ।
सत्त्वं रजश्च ब्रह्मत्वे कालत्वे च रजस्तमः ॥१२॥
वे सहस्र मस्तक वाले पुरुष जो विशिष्ट हैं तथा स्वयम्भु हैं, उनकी तीन अवस्था हैं। ब्रह्मरूप से सत्त्व एवं रजोगुण तथा कालरूप से रजः एवं तमोगुण॥१२॥
सात्त्विकं पुरुषत्वे च गुणावृत्तं स्वयम्भुवः ।
ब्रह्मत्वे सृजते लोकान् कालत्वे स क्षिपत्यपि ॥१३॥
पुरुषरूप से उनके सात्त्विक गुण का प्रकाश होता है। स्वयम्भु ब्रह्मा रूप से वे जगत् की सृष्टि करते हैं तथा कालरूप से वे निक्षेप (विनाश) करते हैं॥१३॥
पुरुषत्वे ह्युपासीने तिस्रोऽवस्थाः स्वयम्भुवः ।
त्रिधा विभज्य चात्मानं त्रैकाल्यं सम्प्रवर्त्तते ॥१४॥
सप्तमोऽध्यायः ३३
सप्तमोऽध्यायः ३३
पुरुषरूप से पालन करते हैं (स्थिति); यह है—स्वयम्भु की तीन अवस्था। वे स्वयं को तीन भाग करके भूत-भविष्य-वर्त्तमान अथवा सृष्टि-स्थिति-संहार का प्रवर्त्तन करते हैं।।१४।।
सृज्यते ग्रसते चैव वीक्ष्यते च त्रिभिः स्वयम्।
अग्रे हिरण्यगर्भस्तु प्रादुर्भूतः स्वयम्भुवः ॥१५॥
स्वयं ही तीन गुणों से सृष्टि, विनाश तथा दर्शन (सृष्टि, स्थिति, प्रलय) करते हैं। स्वयम्भु ही हिरण्यगर्भ रूप से प्रादुर्भूत हैं।।१५।।
आदित्यस्त्वादिवेदत्वादाजातत्वादजः स्मृतः।
देवेषु च महादेवो महादेवस्ततः स्मृतः ॥१६॥
सर्वेशत्वाच्च लोकस्य ह्यवश्यत्वात् स चेश्वरः।
बृंहित्वाच्च स्मृतो ब्रह्मा भूतत्वाद्भव उच्यते ॥१७॥
वे आदिदेव आदित्य हैं (आदिदेव होने के कारण आदित्य हैं)। अजात होने के कारण अज हैं। देवों में वे महान् देव होने के कारण महादेव हैं। समस्त जगत् के सत्त्वरूप होने के कारण तथा उन्हें कोई वश में नहीं कर सकता, इस कारण वे ईश्वर हैं। बृहत् होने से वे ब्रह्मा हैं तथा भूतरूप (उत्पन्नरूप) होने से वे भव हैं।।१६-१७।।
यान्ति यस्मात् प्रजाः सर्वाः प्रजापतिरिति स्मृतः।
पुर्यां तु शेते यस्माच्च तस्मात् पुरुष उच्यते ॥१८॥
जिससे समग्र प्रजा की उत्पत्ति होती है, वे प्रजापति यही हैं। वे पुरी में (प्रत्येक देह में) शयन करने के कारण पुरुष कहलाते हैं।।१८।।
नोत्पादनत्वात् पूर्वत्वात्स स्वयम्भुरिति स्मृतः।
हिरण्येन तु गर्भस्थो यस्मादेव समावृतः ॥१९॥
तस्माद्धिरण्यगर्भेति सूर्यो देवो निगद्यते।
वे कभी भी उत्पन्न नहीं होते अर्थात् उनका उत्पादक, जनक कोई भी नहीं है तथा वे सबसे पूर्व के होने के कारण स्वयम्भु कहलाते हैं। हिरण्य द्वारा गर्भस्थ होकर समावृत होने के कारण वे हिरण्यगर्भ कहलाते हैं।।१९।।
आपो नारा इति प्रोक्ता ऋषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥२०॥
अयनं तस्य तत्पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः।
तत्त्वदर्शी ऋषिगण 'नारा' जल को कहते हैं, उसके अयन होने के कारण इनको नारायण कहा जाता है।।२०।।
३४ श्रीसाम्बपुराणम्
अरमित्येष सिद्धार्थे निपातः करिभिः स्मृतः ॥२१॥ कविगण अर शब्द का अर्थ सिद्धार्थ निपात कहते हैं॥२१॥
एकार्णवे पुरा तस्मिन् नष्टे स्थावर-जङ्गमे । नारायणाख्यः पुरुषः सुष्वाप सलिले स्मृतः ॥२२॥ स्थावर एवं जंगम के नष्ट हो जाने पर अर्थात् प्रलय में सृष्टि का विनाश हो जाने पर इसी एकार्णव सलिल में नारायण नामक पुरुष शयन करते हैं॥२२॥
सहस्रशीर्षा सुमहान् सहस्रपात् सहस्रचक्षुर्वदनः सहस्रभुक् । सहस्रबाहुः प्रथमः प्रजापतिः सूर्याख्यतेजाः पुनरुच्यते रविः ॥२३॥ आदित्यवर्णो भुवनस्य गोप्ता ह्यपूर्व एकः पुरुषः पुराणः । हिरण्यगर्भः पुरुषो महात्मा स ईष्यते वै तमसः परस्तात् ॥२४॥ वह महान् पुरुष सहस्र मस्तकों से युक्त है (सहस्र = असंख्य)। वह सहस्र पैरों से युक्त है। सहस्र चक्षु तथा मुखयुक्त है। वह हजारों बार (असंख्य बार) भोजन करने वाला है। उसके हजारों बाहु हैं। वह प्रथम प्रजापति सूर्य नामक तेजयुक्त है; अतः उसे रवि कहते हैं। वह आदित्यवर्ण (सूर्य के समान उज्ज्वल कान्ति वाला), भुवनों का पालक, अपूर्व, पुराणपुरुष, हिरण्यगर्भ है। तमोलोक के पश्चात् उसे प्राप्त किया जाता है॥२३-२४॥
तुल्यं युगसहस्रस्य नैशं कालमुपास्यतः । संवर्त्तन्ते प्रकुरुते ब्रह्मत्वं सर्गकारणात् ॥२५॥ सलिलेनाप्लुतां भूमिं दृष्ट्वा कार्यं विचिन्त्य सः । भूत्वा वै स तु वाराहो ह्यपः संविशते प्रभुः ॥२६॥ वे हजारों युगों के तुल्य नैश (रात्रि) अन्धकार को दूर करके प्रलयान्त में सृष्टि के लिये ब्रह्मारूप से आविर्भूत हो जाते हैं। वह प्रभु भूमि को जल से आप्लुत देखकर सृष्टिकार्य की विवेचना करके वराह रूप से जल में प्रवेश करते हैं॥२५-२६॥
सञ्चिन्त्यैवं च देवोऽसौ भूमेरुद्धरणं क्षमः । महीं महार्णवे मग्नामुद्धर्तुमुपचक्रमे ॥२७॥ पृथ्वी के उत्तरण में सक्षम वह देव इस प्रकार की चिन्तना करके महार्णव में डूबी पृथ्वी का उद्धार करने का उपक्रम करने लगे॥२७॥
उत्तिष्ठतस्तस्य जलार्द्रकुक्षेर्महावराहस्य महीं निधाय । विधुन्वतो वेदमयं शरीरं लोमान्तरस्था मुनयो जयन्ति ॥२८॥ पृथ्वी को धारण करके जल से उत्थित जलसिक्त कुक्षियुक्त महावराह के विकम्पन से प्रकटित वेदमय शरीर की उनके लोमों में स्थित मुनिगण आराधना करने लगे॥२८॥
सप्तमोऽध्यायः ३५
सप्तमोऽध्यायः ३५
उद्धृत्य चोर्वीं सलिलात् प्रजासर्गमकल्पयत्। विसृजन् मानसान् पुत्रानात्मनस्तेजसा समान्॥२९॥
सलिल से पृथ्वी का उद्धार करके प्रजासृष्टि-हेतु चिन्तन करके उन्होंने अपने तेज के समान तेजोमय मानस पुत्रगण की सृष्टि की॥२९॥
भृग्वङ्गिरसमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्। मरीचिमथ दक्षं च वशिष्ठं नवमं तथा॥३०॥ नव प्रजापतीन् सृष्ट्वा ततः स पुरुषोत्तमः। प्रादुर्भूतोऽदितेः पुत्रः प्रजानां हितकाम्यया॥३१॥
भृगु, अङ्गिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि, दक्ष तथा वशिष्ठ—ये नौ प्रजापति हैं। ये सृष्टि करते हैं। तत्पश्चात् वे पुरुषोत्तम प्रजा की मङ्गलकामना के लिये अदिति के पुत्ररूप में प्रादुर्भूत हुये॥३०-३१॥
मरीचिः कश्यपं पुत्रं नावि वै जनयज्जले। प्रजापतीनां दशमं तेजसा ब्रह्मणा समम्॥३२॥
जल में नौका के समान (जैसे जलोत्तरण में लोग नौका का सहारा लेते हैं) सहायता के लिये (सृष्टिकार्य में सहायता के लिये) मरीचि ने कश्यप नामक पुत्र को उत्पन्न किया। इनका तेज ब्रह्मा के समान था और ये दशम प्रजापति कहे जाते हैं॥३२॥
दक्षकन्यादितिर्नाम्ना पत्नी सा कश्यपस्य तु। अण्डं सा जनयामास भूनभस्तलविस्तरम्॥३३॥ तत्रोत्पन्नः सहस्त्रांशुर्द्वादशात्मा दिवाकरः। नवयोजनसाहस्रो विस्तारस्तस्य वै स्मृतः। विस्तारत्रिगुणश्चास्य परिणाहस्तु मण्डले॥३४॥
दक्ष की अदिति नामक कन्या कश्यप की पत्नी थी। उन्होंने एक अण्डा उत्पन्न किया, जो पृथ्वी से आकाश तक विस्तार वाला था। उससे सहस्त्रांशु द्वादशात्मा (१२ मूर्त्तिरूप से प्रकट) दिवाकर उत्पन्न हुये। उनका विस्तार ९००० योजन प्रसिद्ध है। इसकी परिधि की विशालता त्रिगुण विस्तृत थी॥३३-३४॥
तथा पुष्पं कदम्बस्य समन्तात् केशरैर्वृतम्। तथैव तेजसो गोलं समन्ताद् रश्मिभिर्वृतम्॥३५॥
जैसे कदम्बपुष्प चारो ओर केशर से परिवृत्त रहता है, उसी प्रकार उनका तेजोमय गोला (वर्त्तुलाकार) चारो ओर रश्मियों से घिरा रहता है॥३५॥
३६ श्रीसाम्बपुराणम्
सहस्रशीर्षा पुरुषः प्राङ्मया य उदाहृतः।
तेजसस्तस्य गोलस्य स तु मध्ये व्यवस्थितः॥३६॥
पहले जिन सहस्रशीर्षा पुरुष की कथा इस ग्रन्थ में कही गयी है, इस तेजोमय गोला के मध्य में वे स्थित हैं॥३६॥
आदित्यः स तपत्येष वियन्नापो गभस्तिभिः।
सहस्रपादस्त्वेषोऽग्निर्वृत्तकुम्भनिभः स्मृतः॥३७॥
आदत्ते स तु रश्मीनां सहस्रेण समन्ततः।
आपो नदीसमुद्रेभ्यो हृदकूपेभ्य एव च॥३८॥
प्रभा सौरी तु पादेन ह्यस्तं याति दिवाकरे।
अग्निमाविशते रात्रौ तस्माद् दूरात् प्रकाशते॥३९॥
वह आदित्य अपनी किरणों से द्युलोक तथा जलाशयों को ताप प्रदान करते हैं। वे वृत्ताकार कुम्भतुल्य सहस्रपाद युक्त अग्नि कहे जाते हैं। ये चारो ओर हजारों-हजारों रश्मियों द्वारा नदी, समुद्र, हृद तथा कूप से जल का आहरण करते हैं।
दिवाकर का सूर्यास्त होने पर रात्रि में सूर्य की प्रभा का एक पाद अग्नि में प्रवेश करता है, तब दूर से सूर्यप्रभा प्रकाशित होती है॥३७-३९॥
उदिते च पुनः सूर्यो चौष्ण्यमाग्नेयमाविशत्।
पादेन तेजसश्चाग्नेस्तथा तत्तपते दिवा॥४०॥
प्रकाशं च तथौष्ण्यञ्च सौर्याग्नेये च तेजसि।
परस्परानुप्रवेशादाप्यायेते दिवानिशम्॥४१॥
सूर्य के पुनः उदित होने पर उसमें अग्नि की उष्णता प्रवेश करती है। ऐसे ही अग्नि का तेज एक पाद से दिन में ताप देता है। सूर्य तथा अग्नि के दो तेज हैं—प्रकाशक धर्म तथा उष्णत्व अर्थात् सूर्य का तेज है—प्रकाशक धर्म तथा अग्नि का तेज है—उष्णत्व धर्म। ये परस्पर अनुप्रवेश द्वारा दिवा-रात्रि को प्रकाशित करते हैं॥४०-४१॥
नारद उवाच
व्यापकत्वं च रश्मीनां नामानि च निबोध मे।
हेतयः किरणा गावो रश्मयोऽथ गभस्तयः॥४२॥
अभीषवो वनान्युस्रा घृणयोऽथ मरीचयः।
नाड्यो दीधितयः साध्या मयूखा भानवोंऽशवः॥४३॥
सप्तर्षयः सुपर्णांश्च कराः पादास्तथैव च।
एवं नाम्ना तु पर्यायाः रश्मीनां विंशतिः स्मृता॥४४॥
सप्तमोऽध्यायः ३७
सप्तमोऽध्यायः ३७
नारद कहते हैं—रश्मियों का व्यापकत्व तथा नाम मैं कहता हूँ, श्रवण करो। हेति, किरण, गो, रश्मि, गभस्ति, अभीषव, वन, उस्र, घृणि, मरीचि, नाड़ी, दीधिति, साध्य, मयूख, भानु, अंश, सप्तर्षिगण, कर तथा पाद—ये सूर्यरश्मि के २० पर्यायवाची नाम कहे गये हैं॥४२-४४॥
वन्दनादिति वक्ष्यामि नामान्येषां पृथक्-पृथक्।
रवेः करसहस्रं तु शीतवर्षोष्मभिस्तपन्॥४५॥
इन सबके प्रणाम तथा स्तुतियोग्य नाम पृथक्-पृथक् हैं। रवि के करसहस्र शीत, वर्षा तथा ऊष्म के साथ ताप प्रदान करते हैं॥४५॥
तासां चतुःशतं नाड्यो वर्षन्तेऽचिन्त्यमूर्तयः।
वन्दनाश्चैव मेध्याश्च कातनाः केतनास्तथा॥४६॥
तदनन्तर उनकी ४०० अचिन्त्य मूर्ति नाड़ियाँ वर्षण करती हैं। वन्दनीय, मेध्य (पवित्र), कातना एवं केतना—ये हैं सूर्यरश्मियों के नाम॥४६॥
अमृता नामतः सर्वाः रश्मयो वृष्टिसर्जनाः।
हिमावहास्तु त्रिंशद्वै ताभ्योऽन्या रश्मयः स्मृताः॥४७॥
अमृतरूप रश्मिसमूह वृष्टि के उत्पादक हैं। उनमें से ३० हिमवाहक एवं अन्य रश्मि के नाम से अभिहित हैं॥४७॥
चन्द्रास्ता नामतः सर्वाः पीताभास्तु गभस्तयः।
रश्मयो मेघपौष्यश्च ह्लादिन्यो हिमसर्जनाः॥४८॥
चन्द्र नामक जो रश्मियाँ हैं, वे सभी पीताभ (पीत वर्ण कान्ति वाली) हैं। मेघ तथा पूषा-सम्बन्धित रश्मियाँ ह्लादकारी (आनन्ददायक) तथा हिम की उत्पादिका हैं॥४८॥
समं बिभ्रति ताः सर्वान् मनुष्यान् देवताः पितॄन्।
मनुष्यानोषधीभिस्तु स्वधया च पितॄनपि॥४९॥
अमृतेन सुरान् सर्वांस्त्रयस्त्रिभिरतर्पयेत्।
वसन्ते चैव ग्रीष्मे च शतैः प्रतपति त्रिभिः॥५०॥
ये सब मनुष्य, देवता तथा पितरों का पोषण करती हैं। औषधि द्वारा मनुष्यों का तथा स्वधा (पिण्डादि) द्वारा पितरों का तथा अमृत द्वारा समस्त देवताओं का तृप्ति-विधान करती हैं। मनुष्य, पितर तथा देवता यथाक्रमेण औषधि, स्वधा तथा अमृत से तृप्त होते हैं। वसन्त तथा ग्रीष्म में ३०० किरणों द्वारा सूर्य ताप प्रदान करते हैं॥४९-५०॥
शरत्सु चैव वर्षासु चतुर्भिः सम्प्रवर्षति।
हेमन्ते शिशिरे चैव हिमोत्सर्गं त्रिभिः पुनः॥५१॥
३८ श्रीसाम्बपुराणम्
ओषधीषु बलं धत्ते स्वधायां च स्वधी पुनः ।
सूर्योऽमृतावमृते च त्रयं त्रिषु नियच्छति ॥५२॥
शरत् काल तथा वर्षाकाल में सूर्य चार रश्मियों से वर्षण करते हैं। हेमन्त में तथा शिशिर में पुनः तीन रश्मियों से हिमयोग करते हैं। सूर्य औषधियों में (लता-गुल्म-शस्यादि में), स्वधा तथा अमृत में बल देते हैं। तीन में (मनुष्य-देवता तथा पितरों में) तीन वस्तु (यथाक्रम औषधि-अमृत तथा स्वधा) की स्थापना करते हैं॥५१-५२॥
कालोऽग्निर्ब्रह्मणश्चैव द्वादशात्मा प्रजापतिः ।
तपत्येष सुरश्रेष्ठस्त्रींल्लोकान् सचराचरान् ॥५३॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च एष एव महेश्वरः ।
ऋचो यजूंषि सामानि ह्येष एव न संशयः ॥५४॥
काल में ब्रह्मा के द्वादशात्मा प्रजापति स्थावर-जंगम त्रिभुवन को ताप प्रदान करते हैं। सूर्य ही ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वर हैं। ये ही निःसन्दिग्ध रूप से ऋक्, यजुः तथा साम वेदरूप हैं॥५३-५४॥
उद्यन् सन्दीप्यते ऋग्भिर्मध्याह्ने यजुभिस्ततः ।
सामभिश्चापि सायाह्ने दीप्यते भास्करः क्रमात् ॥५५॥
स एष तेजसो राशिर्दीप्तिमान् सार्वलौकिकः ।
पार्श्वेनोर्ध्वमधश्चैव प्रपतत्येष सर्वतः ॥५६॥
ये उदयकाल में ऋक् के द्वारा सन्दीप्त होते हैं, मध्याह्न में यजु के द्वारा तथा सायाह्न में साम द्वारा दीप्त होते हैं अर्थात् प्रातःकाल में ऋक् मन्त्र से, मध्याह्न काल में यजुर्मन्त्र से तथा सन्ध्या में साम मन्त्र से पूजित होते हैं। यह तेजोराशि, दीप्तिमान तथा सार्व-लौकिक है। ये ही पार्श्व, ऊर्ध्व या अधोदेश को ताप प्रदान करते हैं॥५५-५६॥
यथा प्रभाकरो दीपो गृहमध्ये व्यवस्थितः ।
पार्श्वेनोर्ध्वमधश्चैव तमो नाशयते समम् ॥५७॥
तद्वत् सहस्रकिरणो ग्रहराजो जगत्पतिः ।
त्रीणि रश्मिशतान्यस्य भूर्लोकं द्योतयन्ति च ॥५८॥
जैसे प्रभायुक्त दीपक गृह में स्थित होकर पार्श्व-ऊर्ध्व तथा अधः के अन्धकार को समान रूप से नष्ट करता है, वैसे ही सहस्र किरणयुक्त ग्रहराज, जगत्पति सूर्य सर्वत्र ताप प्रदान करते हैं एवं इनकी तीन सौ रश्मियाँ भू-लोक को उद्भासित—द्योतित करती हैं॥५७-५८॥
चत्वारि तु पुनस्तिर्यक् त्रीणि चोर्ध्वं सुरालयम् ।
इत्येतन्मण्डलं शुक्लं भास्करं लोकसंज्ञितम् ॥५९॥
सप्तमोऽध्यायः ३९
सप्तमोऽध्यायः ३९
नक्षत्र-ग्रह-सोमानां प्रतिष्ठा योनिरेव च।
चन्द्राद्याश्च ग्रहाः सर्वे विज्ञेयाः सूर्यसम्भवाः ॥६०॥
चार सौ रश्मियाँ तिर्यक् रूप से पितृलोक को तथा तीन सौ रश्मियाँ ऊर्ध्व रूप में स्वर्गलोक को प्रकाशित करती हैं। यह मण्डल शुक्ल है तथा भास्कर लोक कहा जाता है। सूर्य ही नक्षत्र, ग्रह तथा सोम की प्रतिष्ठा का कारण है। चन्द्रादि सभी ग्रह सूर्य से ही उत्पन्न हैं॥५९-६०॥
रवेः करसहस्रं यत् प्राङ्मया समुदाहृतम्।
तेषां श्रेष्ठाः शुभाः सप्तरश्मयो ग्रहयोनयः ॥६१॥
सुषुम्नो हरिकेशश्च विश्वकर्मा तथैव च।
विश्वव्यचाः पुनश्चान्यः सौम्यश्च सुरतः स्मृतः ॥६२॥
उदन्वसुः पुनश्चान्यः सुरादन्यः प्रकीर्त्तितः ॥६३॥
मैंने जो पूर्व में सूर्य के सहस्र किरणों की बात कही है, उनमें से श्रेष्ठ मंगलकारी सात रश्मियाँ ग्रहयोनि हैं अर्थात् ग्रहों की उत्पत्ति में अलग से सुषुम्न, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, सौम्य (बुध ग्रह), सुव्रत तथा उदन्वसु देवता कहे गये हैं॥६१-६३॥
सुषुम्नः सूर्यरश्मिर्यः क्षीणं शशिनमेधते।
अमृतं स्वर्धमानेन सम्भृत्यैकेन रश्मिना ॥६४॥
सुषुम्न नामक क्षीण सूर्यरश्मि क्षीण चन्द्र को वर्द्धित करती है एवं एक रश्मि द्वारा मिलित होकर अमृत का वर्द्धन करती है॥६४॥
आप्यायनाच्च देवानामादित्यश्चन्द्रतिग्मतः।
शुक्लत्वामृतशीतत्वे दीप्तौ चाह्लादनेऽपि च ॥६५॥
धातुश्च दीप्तिबह्वर्थ्यस्तेनासौ चन्द्र उच्यते।
संयद्वसुस्तु यो रश्मिर्योनिः सोऽङ्गारकस्य तु ॥६६॥
आदित्य के चन्द्रकिरणों से देवगण आप्यायन करते हैं। शुक्लत्व, अमृतत्व, शीतत्व, दीप्ति तथा आह्लाददान (आनन्ददान), दीप्ति प्रभृति अनेक अर्थ के वाचक होने से इसे चन्द्र कहा जाता है। संयद्वसु नामक जो योनि है, वह अङ्गारक (मङ्गल) की योनि है॥६५-६६॥
दक्षिणे विश्वकर्मा तु रश्मिराप्यायते बुधम्।
उदावसुस्तु यो रश्मिर्योनिः स तु बृहस्पतेः ॥६७॥
दक्षिण दिशा की विश्वकर्मा नामक रश्मि बुध को आप्यायित करती है। उदावसु नामक रश्मि बृहस्पति की योनि (कारण) है॥६७॥
४० | श्रीसाम्बपुराणम्
विश्वव्यचास्तु यः पश्चाच्छुक्रयोनिः स वै स्मृतः।
शनैश्चैवं पुनश्चापि रश्मिराप्यायते स्वराट्॥६८॥
हरिकेशस्तु यो रश्मिस्तेजो नक्षत्रयोगिनः।
न क्षीयन्ते यतस्तानि तेषां नक्षत्रता ततः॥६९॥
क्षत्रं वीर्यं बलं तेज इति चैकार्थवाचकम्।
सूर्यः क्षत्रं तथादत्ते तेषां नक्षत्रता स्मृता॥७०॥
विश्वव्यचा नामक जो रश्मि पीछे रहती है, वह शुक्र की उत्पत्ति का कारण है। सूर्य स्वयं शनैश्चर को आप्यायित करते हैं। हरिकेश नामक जो रश्मि है, वह नक्षत्रयोगियों का तेज है; क्योंकि वे क्षय-प्राप्त नहीं होते, अतः नक्षत्र कहे गये हैं। क्षत्र, वीर्य, बल, तेज—ये सभी एकार्थ-वाचक शब्द हैं। सूर्य का तेज ग्रहण करने के कारण ही इनको नक्षत्र कहा गया है॥६८-७०॥
अस्माद् लोकादमुं लोकं तीर्णानां सुकृतैर्गृहात्।
तारणात्तारका ह्येषा शुक्लत्वाच्चैव तारकाः॥७१॥
सूर्यस्यैवापरो रश्मिर्नाम्ना वृष्टिपतिः स्मृतः।
समत्वं प्रतिबद्धस्तु स जीवयति वै जगत्॥७२॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सर्वव्यापित्वनिरूपणं नाम सप्तमोऽध्यायः
●
इस पृथ्वीलोक से लेकर उस लोक में (स्वर्गादि में) सुकृति के फल से जो उत्तीर्ण हैं, उन्हें तारण कराने के लिये तारका नाम से अभिहित हैं। शुक्लत्व के कारण भी इन्हें तारका कहते हैं। सूर्यदेव की ही अन्य रश्मि वृष्टिपति नाम से स्मृत है। सूर्य के साथ युक्त होने से समान रूप से रक्षा करके ये जगत् को जीवित करते हैं॥७१-७२॥
श्रीसाम्बपुराण का सर्वव्यापित्व-निरूपण नामक सप्तम अध्याय समाप्त
●
अष्टमोऽध्यायः
(सूर्यनिगमनम्)
नारद उवाच
आदित्यमूलमखिलं त्रैलोक्यं यदुनन्दन।
भवत्यस्माज्जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥१॥
रुद्रोपेन्द्रमहेन्द्राणां विप्रेन्द्रत्रिदिवौकसाम्।
महाद्युतिमतां चैव तेजो यत् सार्वलौकिकम् ॥२॥
नारद कहते हैं—हे यदुनन्दन (जाम्बवतीसुत साम्ब)! समस्त त्रिभुवन के मूल आदित्य हैं। देवता, असुर तथा मनुष्य के साथ समस्त जगत् सूर्य से ही उत्पन्न है। रुद्र, उपेन्द्र, महेन्द्र, ब्राह्मणश्रेष्ठ, स्वर्गवासी देवगण एवं महाद्युति-सम्पन्न सबका जो सार्वलौकिक तेज है, वह सूर्य से ही उत्पन्न है॥१-२॥
सर्वात्मा सर्वलोकेशो देवदेवः प्रजापतिः ॥३॥
वे सर्वात्मा, समस्त लोक के ईश्वर, देवताओं के देवता तथा प्रजागण के पालक प्रजापति हैं॥३॥
सूर्य एव त्रिलोकस्य मूलं परमदैवतम्।
अग्नौ क्षिप्त्वाऽहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते।
आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजा ॥४॥
सूर्य त्रिलोक के मूल (प्रधान) परम दैवत हैं। अग्नि में प्रक्षिप्त आहुति सम्यक् रूपेण आदित्य को मिलती है। आदित्य से वृष्टि का उदय होता है। वृष्टि से अन्न तथा अन्न से प्रजागण उत्पन्न होते हैं॥४॥
सूर्यात् प्रसूयते सर्वं तत्र चैव प्रलीयते।
भावाभावौ हि लोकानामादित्यान्निःसृतौ पुरा ॥५॥
सततं ध्यायिनो ध्यानं मोक्षश्चाप्येष मोक्षिणाम्।
अत्र गच्छन्ति निर्वाणं जायन्तेऽस्मात् पुनः प्रजाः ॥६॥
सूर्य से ही सब कुछ उत्पन्न होता है और अन्त में वहीं विलीन हो जाता है। समस्त लोक की उत्पत्ति तथा विनाश आदित्य से ही होता है। इनका निरन्तर ध्यान से ध्यानकारीगण ध्यान तथा मोक्षाकांक्षीगण (सूर्य में) मोक्ष प्राप्त करते हैं। इसी से सबका निर्वाण होता है एवं पुनः सूर्य से ही प्रजागण उत्पन्न होते हैं॥५-६॥
४२ श्रीसाम्बपुराणम्
क्षणा मुहूर्त्ता दिवसा निशाः पक्षास्तथैव च।
मासाः संवत्सराश्चैव ऋतवोऽथ युगानि च ॥७॥
तदादित्यादृते ह्येषां कालसंख्या न विद्यते।
कालादृते न नियमो नाग्नेर्विहरणक्रिया ॥८॥
क्षण, मुहूर्त, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, संवत्सर, षड् ऋतु, चारो युग—इन सबकी आदित्य के अतिरिक्त कोई कालसंख्या नहीं हो सकती। काल के विना कोई नियम नहीं है। निर्दिष्ट काल में ही सभी अनुष्ठानादि सम्पन्न होते हैं। काल के अभाव में अग्नि की कोई विहरण क्रिया भी नहीं है अर्थात् निर्दिष्ट काल में ही अग्नि में आहुति प्रदान की जाती है॥७-८॥
ऋतूनामभिभावाच्च पुष्पं मूलं फलं कुतः।
कुतश्च सस्यनिष्पत्तिः तृणौषधिगणाः कुतः ॥९॥
अभावो व्यवहाराणां जन्तूनां दिवि चेह च।
जगत्प्रतानमृते भास्करे वारितस्करम् ॥१०॥
ऋतुओं का आविर्भाव हुये विना फूल, मूल, फल कैसे उत्पन्न होंगे? कैसे शस्यादि तृण, औषधिगण उत्पन्न होंगे? उसके अभाव से जगत् में प्राणीगण तथा स्वर्ग लोक में देवगण के खाद्य का अभाव परिलक्षित होने लगेगा। जगत् को ताप न देकर भास्कर अपनी रश्मि संहत कर लेंगे। (जब रश्मियाँ संहत हो जायेंगी तब पानी वाष्प होकर कैसे मेघरूप में सञ्चित होगा)॥९-१०॥
नावृष्ट्या तपते सूर्यो नावृष्ट्या परितुष्यति।
नावृष्ट्या परिषध्यन्ते वारिणा दीयते रविः ॥११॥
वृष्टिपात के विना सूर्य ताप नहीं देते, वृष्टिपात के विना उनकी तुष्टि नहीं होती, वृष्टिपात के विना उनकी सिद्धि नहीं होती, जल के द्वारा ही रवि दान करते हैं॥११॥
वसन्ते कपिलः सूर्यो ग्रीष्मकाञ्चनसन्निभः।
श्वेतो वर्षासु वर्णेन पाण्डुः शरदि भास्करः ॥१२॥
हेमन्ते ताम्रवर्णस्तु शिशिरे लोहितो रविः।
इति वर्णा समाख्याताः सूर्यस्य ऋतुसम्भवाः।
ऋतुस्वभावजैर्वर्णैः सूर्यः क्षेमे सुभिक्षकृत् ॥१३॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्यनिगमनं नामाऽष्टमोऽध्यायः