श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
तृतीय अध्याय
तृतीय अध्याय ——— एक ही परमात्मामें शासक और शासनीयभावका समर्थन कथमाद्वितीयस्य परमात्मन | अद्वितीय परमात्मामें शासक और शासनीय आदि भाव कैसे रह सकते हैं?—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है— ईशित्रीशितव्यादिभावः ? इत्याशङ्क्याह— य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वांल्लोकानी- शत ईशनीभिः। य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एतद्वि- दुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १ ॥ जो एक जालवान् (मायावी) अपनी ईश्वरीय शक्तियोंसे शासन करता है, जो अकेला ही ऐश्वर्यसे योग होनेपर और जगत्के प्रादुर्भावके समय अपनी शक्तियोंसे सम्पूर्ण लोकोंका शासन करता है, उसे जो जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥ १ ॥ य एक इति । य एकः पर- | 'य एको' इत्यादि । जो एक परमात्मा है वह जालवान् है । मात्मा स जालवान् जालं माया | दुस्तर होनेके कारण जाल मायाका नाम है । भगवान्ने भी ऐसा ही कहा दुरत्ययत्वात् । तथा चाह भग- | है कि "मेरी मायाको पार करना कठिन है।" उस जालसे जो युक्त वान्—"मम माया दुरत्यया" | है वह [ परमात्मा ] जालवान् है । (गी० ७।१४) इति । तद्वां- | 'तत् अस्य अस्ति' (वह उसका है)* इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'जालवान्' स्तदस्यास्तीति जालवान्मायावी- | शब्द सिद्ध होता है । जालवान् ————————————————————————————————
- 'तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप्' (५।२।९४) इस पाणिनिसूत्रसे यहाँ 'मतुप्' प्रत्यय करके 'मादुपधायाश्च मतोर्वो ० ० ०' (८।२।९) इस सूत्रसे 'म'का 'व' आदेश होता है।
१५२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१५२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ त्यर्थः। ईशत ईष्टे मायोपाधिः सन्। | अर्थात् मायावी परमेश्वर मायोपाधिक | होकर शासन करता है। किनके कैः ? ईशनीभिः स्वशक्तिभिः। | द्वारा शासन करता है ? [ इसके | उत्तरमें कहते हैं-] 'ईशनीभिः' अपनी तथा चोक्तम्—ईशत ईशनीभिः | शक्तियोंके द्वारा । इसी आशयसे | यहाँ ऐसा कहा है—'ईशते ईश- परमशक्तिभिरिति। कान्? सर्वांल्लो- | नीभिः।' 'ईशनीभिः' अर्थात् अपनी | परम शक्तियोंके द्वारा शासन करता कानीशत ईशनीभिः । कदा ? | है। किनका शासन करता है ? वह | उन शक्तियोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंका उद्भवे विभूतियोगे सम्भवे प्रादु- | शासन करता है । किस समय ? | उद्भव—अर्थात् विभूतियों (ऐश्वर्यों) र्भावे च । य एतद्विदुरमृता | से योग होनेपर और सम्भव जगत्के | प्रादुर्भावके समय । जो इसे जानते अमरणधर्माणो भवन्ति ॥ १ ॥ | हैं वे अमृत — अमरणधर्मा ( अमर ) | हो जाते हैं ॥१॥ कस्मात्पुनर्जालवान् ? इत्या- | किन्तु वह मायावी कैसे है ? शङ्क्य आह— | ऐसी आशङ्का करके कहते हैं— एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थु- र्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः । प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्त- काले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः ॥२॥ क्योंकि एक ही रुद्र है, इसलिये [ ब्रह्मविद्गण ] उससे भिन्न किसी अन्य वस्तुके लिये अपेक्षा नहीं करते । वह अपनी [ ब्रह्मादि ] शक्तियों- द्वारा इन लोकोंका शासन करता है वह समस्त जीवोंके भीतर स्थित है,
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५३ और सम्पूर्ण लोकोंकी रचना कर उनका रक्षक होकर प्रलयकालमें उन्हें संकुचित कर लेता है ॥ २ ॥
[मूल संस्कृत शाङ्करभाष्य] एको हीति । हिशब्दो यस्मा- दर्थे । यस्मादेक एव रुद्रः स्वतो न द्वितीयाय वस्त्वन्तराय तस्थु- र्ब्रह्मविदः परमार्थदर्शिनः । उक्तं च—एको रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुरिति । य इमाँल्लोकानीशते नियमयतीशनीभिः । सर्वांश्च जना- न्प्रत्यन्तरः प्रतिपुरुषमवस्थितः । रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूवेत्यर्थः । किञ्च, संचुकोच अन्तकाले प्रलयकाले । किं कृत्वा ? संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा गोप्ता भूत्वा । एतदुक्तं भवति—अद्वि- तीयः परमात्मा, न चासौ कुम्भ- कारवदात्मानं केवलं मृत्पिण्ड- स्थानीयमुपादानकारणमुपादत्ते । किं तर्हि ? स्वशक्तिविक्षेपं कुर्वन्स्रष्टा नियन्ता वाभिधीयत इति । उत्तरो मन्त्रस्तस्यैव विराडात्मनावस्थानं
[हिन्दी अनुवाद] 'एको हि' इत्यादि । क्योंकि एक ही रुद्र है, अतः परमार्थदर्शी ब्रह्मविद्गण स्वतः किसी दूसरी वस्तु- के लिये अपेक्षा नहीं करते । यहाँ 'हि' शब्द 'यस्मात्' ( क्योंकि ) के अर्थमें है । इसीसे कहा है 'एको रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः ।' जो अपनी शक्तियोंद्वारा इन लोकोंका शासन-नियमन करता है । वह समस्त जीवोंके भीतर अर्थात् प्रत्येक पुरुषमें स्थित है । तात्पर्य यह है कि प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है । तथा वह अन्तकाल यानी प्रलय- कालमें संकुचित करता है। क्या करके? सम्पूर्ण लोकोंकी रचना कर उनका गोपा-रक्षक होकर । यहाँ यह कहा गया है कि परमात्मा अद्वितीय है, वह कुम्हारकी तरह मृत्पिण्डरूप अपने-आपको उपादान कारणरूपसे ग्रहण नहीं करता; तो फिर क्या करता है ? वह अपनी शक्तिको क्षुब्ध करनेसे ही जगत्का रचयिता या नियन्ता कहा जाता है । अगला मन्त्र उसीकी विराड्रूपसे स्थिति
१५४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१५४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ तत्स्रष्टृत्वं प्रतिपादयति ॥ २ ॥ और उसके जगत्कर्तृत्वका प्रतिपादन करता है ॥ २ ॥ परमेश्वरसे जगत्की सृष्टिका प्रतिपादन विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् । सं बाहुभ्यां धमति संपतत्रै- र्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः ॥ ३ ॥ वह सब ओर नेत्रोंवाला, सब ओर मुखोंवाला, सब ओर भुजाओंवाला और सब ओर पैरोंवाला है। वह एकमात्र देव ( प्रकाशमय परमात्मा ) द्युलोक और पृथिवीकी रचना करता हुआ [ वहाँके मनुष्य-पक्षी आदि प्राणियोंको ] दो भुजाओं और पतत्रों ( पैरों एवं पंखों ) से युक्त करता है* ॥ ३ ॥
- इस मन्त्रके उत्तरार्द्धका अर्थ अन्यान्य टीकाकारोंने अनेक प्रकारसे किया है । प्रस्तुत अर्थ शांकरभाष्यके अनुसार है । शंकरानन्दजी इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं—“हस्ताभ्यां विश्वमुत्पादयन्नुत्पत्तिकोले विविधान्शब्दानुत्पाद्योत्पाद- कादिरूपेण करोति । बाहुभ्यामिति द्विवचनसामर्थ्यात्सर्वकर्महेतुत्वाच्च धर्माधर्माभ्या- मिति विवक्षितम् ।......यद्यपि धमतिरग्निसंयोगार्थस्तदापि सन्तापकारित्वेन सुख- दुःखयोरुत्पत्तौ स्थितौ संहारे च सुखदुःखकारित्वं व्याख्येयम् । संपतत्रैः पतनशीलैः पञ्चीकृतपञ्चमहाभूतैर्न परमाणुभिः......धमतीत्यनुषङ्गः ।” अर्थात् वह हाथोंसे विश्वको उत्पन्न कर उसकी उत्पत्तिके समय उत्पाद्य-उत्पादकादिरूपसे अनेक प्रकारके शब्द करता है । ‘बाहुभ्याम्’ इस पदमें द्विवचन है तथा हाथ समस्त कर्मोंके हेतु होते हैं, इसलिये इस पदसे ‘धर्माधर्मके द्वारा’ यह अर्थ बतलाना अभीष्ट है । जिस समय ‘धमति’ क्रियाका अर्थ अग्निसंयोग लिया जाय उस समय भी सन्तापकारक होनेके कारण सुख-दुःखकी उत्पत्ति-स्थिति और संहारमें उनका सुख-दुःखकारित्व ही बतलाना चाहिये । ‘संपतत्रैः’—पतनशील पञ्चीकृत महाभूतोंसे युक्त करता है, परमाणुओंसे नहीं । नारायणतीर्थ लिखते हैं—“बाहुभ्यां विद्याकर्मभ्यां संधमति पतत्रैः वासनारूपैः संधमति दीपयति जीवनिष्ठविद्याकर्मवासनादिभिरीश्वरो जगत्प्रव-
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५५ 𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍𑁍 विश्वतश्चक्षुरिति । सर्वप्राणि- | 'विश्वतश्चक्षुरत' इत्यादि । गतानि चक्षूंष्यस्येति विश्वत- | समस्त प्राणियोंके चक्षु इस परमात्मा- | के ही हैं, इसलिये यह विश्वतश्चक्षु श्चक्षुः । अतः स्वेच्छयैव सर्वत्र | है । अतः अपनी इच्छामात्रसे ही | इसमें सर्वत्र चक्षु यानी रूपादिको चक्षू रूपाद्यौ सामर्थ्यं विद्यत इति | ग्रहण करनेका सामर्थ्य है । इसी | प्रकार आगे [ विश्वतोमुखः आदि ] विश्वतश्चक्षुः । एवमुत्तरत्र योज- | में भी अर्थयोजना कर लेनी चाहिये । | वह दो भुजाओंद्वारा संयुक्त करता नीयम् । सं बाहुभ्यां धमति संयो- | है; धातुओंके अनेक अर्थ होते हैं जयतीत्यर्थः; अनेकार्थत्वाद्धात्तू- | [ इसीसे अग्निसंयोगके अर्थमें प्रयुक्त | होनेवाले 'धमति' का अर्थ संयोजन नाम् । पक्षिणश्च धमति द्विपदो | लिया गया है ] । तथा पक्षियों और | दो पैरोंवाले मनुष्यादिको पंतत्रों मनुष्यादींश्च पतत्रैः । किं कुर्वन् ? | ( पंखों और पैरों ) से युक्त करता | है । क्या करता हुआ ? द्युलोक द्यावापृथिवी जनयन्देव एको | और पृथिवीकी सृष्टि करता हुआ । विराजं सृष्टवानित्यर्थः ॥ ३ ॥ | तात्पर्य यह है कि उस एकमात्र | देवने विराट्की रचना की ॥३॥ र्तयतीत्यर्थः ।” अर्थात् बाहु—विद्या और कर्मद्वारा तथा पतत्र-वासनाओंद्वारा संधमति—दीप्त करता है; अर्थात् जीवनिष्ठ विद्या और कर्मादिके द्वारा ईश्वर जगत्- को प्रवृत्त करता है। विज्ञानभगवान् कहते हैं—"बाहुभ्यां मनुष्यादीन्संधमति संयोजयति*** पतत्रैः पतनसाधनैः पादैः संधमति***अथवा पतत्रैः पक्षैः पक्षिणः संधमति ।” अर्थात् वह मनुष्यादिको भुजाओंसे युक्त करता है और पतत्र—चलनेके साधन यानी पैरोंसे युक्त करता है । अथवा पतत्र यानी पक्षोंसे पक्षियोंको युक्त करता है। १. 'पतत्र' शब्दका अर्थ है पतनसे बचानेवाला । अतः मनुष्योंके विषयमें इसका अर्थ पैर समझना चाहिये और पक्षियोंके विषयमें पक्ष ।
१५६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१५६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ परमेश्वरका स्तवन इदानीं तस्यैव सूत्रसृष्टिं प्रति- | अब उसी परमात्माकी हिरण्यगर्भ- पादयन्मन्त्रदृगभिप्रेतं प्रार्थयते— | सृष्टिका प्रतिपादन करती हुई | श्रुति मन्त्रदर्शी ऋषियोंके अभिमत | अर्थके लिये प्रार्थना करती है— यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ ४ ॥ जो रुद्र देवताओंकी उत्पत्ति तथा ऐश्वर्यप्राप्तिका हेतु, जगत्पति और सर्वज्ञ है तथा जिसने पहले हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया था, वह हमें शुभ बुद्धिसे संयुक्त करे ॥ ४ ॥ यो देवानामिति । यो देवा- | 'जो देवानाम्' इत्यादि । जो नामिन्द्रादीनां प्रभवहेतुरुद्भव- | देवताओंकी अर्थात् इन्द्रादिकी हेतुश्च । उद्भवो विभूतियोगः । | उत्पत्तिका और उद्भवका हेतु है । विश्वाधिपो विश्वाधिपः पाल- | उद्भव विभूतियोगको कहते हैं । जो | विश्वाधिप—विश्वका स्वामी अर्थात् यिता । महर्षिः—महांश्चासावृषि- | पालन करनेवाला है, महर्षि-महान् श्चेति महर्षिः सर्वज्ञ इत्यर्थः । | ऋषि यानी सर्वज्ञ है, हित-रमणीय हितं रमणीयमत्युज्ज्वलं ज्ञानं | अर्थात् अत्यन्त उज्ज्वल ज्ञान जिसका गर्भोऽन्तःसारो यस्य तं जनया- | गर्भ—अन्तःसार है उस [ हिरण्य- | गर्भ ] की जिसने पहले—सृष्टिके मास पूर्वं सर्गादौ । स नोऽस्मान् | आरम्भमें रचना की थी वह हमें शुभ बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु परम- | बुद्धिसे संयुक्त करे; अर्थात् हम पदं प्राप्नुयामेति ॥ ४ ॥ | परमपद प्राप्त करें ॥ ४ ॥
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 पुनरपि तस्य स्वरूपं दर्शयन्न- | फिर भी [ आगेके ] दो मन्त्रोंसे भिप्रेतमर्थं प्रार्थयते मन्त्रद्वयेन— | उसके स्वरूपको प्रदर्शित करती हुई श्रुति अभिप्रेत अर्थके लिये प्रार्थना करती है— या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी । तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥५॥ हे रुद्र ! तुम्हारी जो मङ्गलमयी, शान्त और पुण्यप्रकाशिनी मूर्ति है, हे गिरिशन्त ! उस पूर्णानन्दमयी मूर्तिके द्वारा तुम [ हमारी ओर ] देखो ॥ ५ ॥ या ते रुद्रेति । हे रुद्र तव या | 'या ते रुद्र' इत्यादि । हे रुद्र ! शिवा तनूरघोरा । उक्तं च “तस्यैते | तुम्हारी जो मङ्गलमयी अघोरा (शान्त) मूर्ति है । अन्यत्र ऐसा ही कहा भी तनुवौ घोरान्या शिवान्या” इति । | है— “उसकी ये दो आकृतियाँ हैं, अथवा शिवा शुद्धाविद्यातत्कार्य- | एक घोरा है और दूसरी मङ्गलमयी” । विनिर्मुक्ता सच्चिदानन्दाद्वयब्रह्म- | अथवा [ तुम्हारी जो मूर्ति ] शिवा— शुद्धा यानी अविद्या और उसके रूपा न तु घोरा शशिविम्बमि- | कार्योंसे रहित सच्चिदानन्दाद्वितीय ब्रह्मरूपा है, घोरा नहीं है, अपि तु वाह्लादिनी । अपापकाशिनी स्मृ- | चन्द्रमण्डलके समान आह्लादकारिणी तिमात्राघनाशिनी पुण्याभिव्यक्ति- | है; तथा अपापकाशिनी—स्मरणमात्र- से ही पापोंका नाश करनेवाली करी । तयात्मना नोऽस्माञ्छन्त- | अर्थात् पुण्यकी अभिव्यक्ति करनेवाली मया सुखतमया पूर्णानन्दरूपया | है, अपनी उस शन्तम–सुखतम–पूर्णानन्दरूप मूर्ति (देह) से हे गिरिशन्त! हे गिरिशन्त गिरौ स्थित्वा शं | —गिरिमें रहकर शं–सुखका विस्तार सुखं तनोतीति । अभिचाकशीहि | करनेवाले ! हमें देखो—हमारी ओर
१५८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१५८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ अभिपश्य निरीक्षस्व श्रेयसा नि- | दृष्टिपात करो अर्थात् हमें कल्याण- योजयस्वेत्यर्थः ॥ ५ ॥ | पथसे युक्त करो ॥ ५ ॥ किञ्च— | तथा— यामिषुं गिरिशन्त हस्ते बिभर्ष्यस्तवे । शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिꣲसीः पुरुषं जगत् ॥ ६ ॥ हे गिरिशन्त ! जीवोंकी ओर फेंकनेके लिये तुम अपने हाथमें जो बाण धारण किये रहते हो, हे गिरित्र ! उसे मङ्गलमय करो, किसी जीव या जगत्की हिंसा मत करो ॥ ६ ॥ यामिषूमिति । यामिषुं गिरि- | 'यामिषुम्' इत्यादि । हे गिरि- शन्त हस्ते बिभर्षि धारयस्यस्तवे | शन्त ! तुम जीवोंकी ओर छोड़नेके लिये जो बाण धारण किये रहते हो, जने क्षेप्तुं शिवां गिरित्र गिरिं | हे गिरित्र ! —पर्वतकी रक्षा करनेके त्रायत इति तां कुरु । मा हिंसीः | कारण भगवान् गिरित्र हैं—उसे शिव ( मङ्गलमय ) करो। हमारे किसी पुरुषमस्मदीयं जगदपि कृत्स्नम् । | पुरुषकी और सारे जगत्की भी हिंसा मत करो। यहाँ इस अभिप्रेत अर्थकी साकारं ब्रह्म प्रदर्शयेत्यभिप्रतमर्थं | प्रार्थना की है कि हमें सम्पूर्ण साकार प्रार्थितवान् ॥ ६ ॥ | ब्रह्मके दर्शन कराओ ॥ ६ ॥ परमात्मतत्त्वके ज्ञानसे अमृतत्वकी प्राप्ति इदानीं तस्यैव कारणात्मना- | अब उस परमात्माकी ही जगत्- वस्थानं दर्शयञ्ज्ञानादमृतत्व- | के कारणरूपसे स्थिति दिखलाती हुई श्रुति ज्ञानसे अमृतत्वकी प्राप्ति माह— | दिखलाती है—
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९
ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितार- मीशं तं ज्ञात्वामृता भवन्ति ॥ ७ ॥
उस [ पुरुषयुक्त जगत् ] से परे जो ब्रह्म-हिरण्यगर्भसे उत्कृष्ट एवं महान् है, जो समस्त प्राणियोंमें उनके शरीरके अनुसार (परिच्छिन्नरूपसे) छिपा हुआ है तथा विश्वका एकमात्र परिवेष्टा है उस परमेश्वरको जानकर जीवगण अमर हो जाते हैं ॥ ७ ॥
[संस्कृत भाष्यम्] ततः परमिति । ततः पुरुष- युक्ताज्जगतः परं कारणत्वात्कार्य- भूतस्य प्रपञ्चस्य व्यापकमित्यर्थः । अथवा ततो जगदात्मनो विराजः परम् । किं तद्ब्रह्मपरं बृहन्तं ब्रह्मणो हिरण्यगर्भात्परं बृहन्तं महद्व्यापित्वात् । यथानिकायं यथाशरीरं सर्वभूतेषु गूढमन्तर- वस्थितं विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं सर्वमन्तः कृत्वा स्वात्मना सर्वं व्याप्यावस्थितमीशं परमेश्वरं ज्ञात्वामृता भवन्ति ॥ ७ ॥
[भाष्यार्थ] 'ततः परम्' इत्यादि । जो उससे यानी पुरुषयुक्त जगत्से परे है अर्थात् कारण होनेसे अपने कार्य- भूत जगत्में व्यापक है, अथवा जो उससे—जगद्रूप विराट्स परे है, वह क्या है ? इसके उत्तरमें श्रुति कहती है—ब्रह्मपरं बृहन्तम् । जो ब्रह्म अर्थात् हिरण्यगर्भरूप कार्यब्रह्म- से पर और व्यापक होनेके कारण बृहत्—महान् है। तथा जो समस्त प्राणियोंमें यथानिकाय—उनके शरीर- के अनुसार गूढ—अन्तःस्थित है, एवं विश्वका एकमात्र परिवेष्टा है अर्थात् सबको अपने भीतर करके— अपने स्वरूपसे सबको व्याप्त करके स्थित है। उस ईश—परमेश्वरको जानकर जीव अमर हो जाते हैं ॥७॥
१६० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१६० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ परमेश्वरके विषयमें ज्ञानीजनोंके अनुभवका प्रदर्शन इदानीमुक्तमर्थं द्रढयितुं मन्त्र- | अब उपर्युक्त अर्थको पुष्ट करने- | के लिये मन्त्रद्रष्टा ऋषिका अनुभव दृगनुभवं दर्शयित्वा पूर्णानन्दा- | दिखलाती हुई श्रुति यह प्रदर्शित द्वितीयब्रह्मात्मपरिज्ञानादेव परम- | करती है कि पूर्णानन्दाद्वितीय ब्रह्म- | का आत्मस्वरूपसे ज्ञान होनेपर ही पुरुषार्थप्राप्तिर्नान्येनेति दर्शयति— | परम पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है, | अन्य किसी उपायसे नहीं— वेदाहमेतं पुरुषं महान्त- मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ ८ ॥ मैं इस अज्ञानातीत प्रकाशस्वरूप महान् पुरुषको जानता हूँ । उसे ही जानकर पुरुष मृत्युको पार करता है, इसके सिवा परमपदप्राप्तिका कोई और मार्ग नहीं है ॥ ८ ॥ वेदाहमेतमिति । वेद जाने | 'वेदाहमेतम्' इत्यादि । मैं उस तमेतं परमात्मानम् । अथैतं प्रत्य- | परमात्माको जानता हूँ । यह जो गात्मानं साक्षिणं पुरुषं पूर्णं | प्रत्यगात्मा-साक्षी, पुरुष-पूर्ण, महान्तं सर्वात्मत्वात् । आदित्य- | और सर्वरूप होनेसे महान् तथा वर्णं प्रकाशरूपं तमसोऽज्ञानात् | आदित्यवर्ण-प्रकाशस्वरूप एवं तम परस्तात्तमेव विदित्वाति मृत्युमेति | यानी अज्ञानसे अतीत है इसे जानकर मृत्युमत्येति । कस्मात् ? अस्मा- | जीव मृत्युको पार कर लेता है; कैसे न्नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय | कर लेता है ? क्योंकि परमपदप्राप्तिके परमपदप्राप्तये ॥ ८ ॥ | लिये इससे भिन्न कोई और मार्ग | नहीं है ॥ ८ ॥
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६१
कस्मात्पुनस्तमेव विदित्वाति | किन्तु जीव उसीको जानकर मृत्युमेति ? इत्युच्यते— | मृत्युको कैसे पार कर लेता है ? सो | बतलाया जाता है— यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चि- द्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक- स्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ॥ ९ ॥ जिससे उत्कृष्ट और कोई नहीं है, तथा जिससे छोटा और बड़ा भी कोई नहीं है वह यह अद्वितीय परमात्मा अपनी द्योतनात्मक महिमामें वृक्षके समान निश्चलभावसे स्थित है, उस पुरुषने ही इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है ॥ ९ ॥ यस्मादिति । यस्मात्परं पुरु- | 'यस्मात्' इत्यादि । जिस षात्परमुत्कृष्टमपरमन्यन्नास्ति, य- | पुरुषसे उत्कृष्ट अन्य कोई नहीं है, स्मान्नाणीयोऽणुतरं न ज्यायो | तथा जिससे अणीयस्—न्यूनतर और महत्तरं वास्ति । वृक्ष इव स्तब्धो | ज्यायस्—महत्तर भी कोई नहीं है निश्चलो दिवि द्योतनात्मनि स्वे | वह अद्वितीय परमात्मा दिवि अर्थात् महिम्नि तिष्ठत्येकोऽद्वितीयः पर- | अपनी द्योतनात्मक महिमामें वृक्षके मात्मा तेनाद्वितीयेन परमात्मनेदं | समान स्तब्ध-निश्चलभावसे स्थित है। सर्वं पूर्णं नैरन्तर्येण व्याप्तं पुरुषेण | उस अद्वितीय परमात्मा पूर्ण पुरुषने पूर्णेन ॥ ९ ॥ | इस सबको पूर्ण--निरन्तरतासे व्याप्त | कर रखा है ॥ ९ ॥
इदानीं ब्रह्मणः पूर्वोक्तकार्य- | अब पहले बतलायी हुई ब्रह्मकी कारणतां दर्शयञ्ज्ञानिनाममृतत्व- | कार्य-कारणता दिखलाकर श्रुति | ज्ञानियोंको अमृतत्व और अन्य सबको मितरेषां च संसारित्वं दर्शयति- | संसारित्वकी प्राप्ति प्रदर्शित करती है—
१६२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१६२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ ततो यदुत्तरतरं तद्रूपमनामयम् । य एतद्विदुर- मृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १० ॥ उस (कारण-ब्रह्म) से जो उत्कृष्टतर है वह अरूप और अनामय है। उसे जो जानते हैं वे अमर हो जाते हैं, तथा अन्य दुःखको ही प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥ तत इति। तत इदंशब्दवाच्या- | 'ततः' इत्यादि । उससे अर्थात् | इदंशब्दवाच्य जगत्से उत्कृष्ट तो ज्जगत उत्तरं कारणं ततोऽप्युत्तरं | उसका कारण है और उससे भी कार्यकारणविनिर्मुक्तं ब्रह्मैव | उत्कृष्टतर कार्य-कारणभावशून्य ब्रह्म | ही है । वह अरूप - रूपादि- इत्यर्थः । तदरूपं रूपादिरहितम्, | रहित और आध्यात्मिकादि त्रिविध अनामयमाध्यात्मिकादितापत्रय- | तापोंसे रहित होनेके कारण अनामय | (दुःखहीन) है। जो इसे जानते रहितत्वात् । य एतद्विदुरमृतत्वेन | हैं अर्थात् अपने अमृतस्वरूपसे 'मैं अहमस्मीत्यमृता अमरणधर्माणस्ते | यही हूँ' ऐसा अनुभव करते हैं वे | अमृत - अमरणधर्मा हो जाते हैं। भवन्ति । अथेतरे ये न विदुस्ते | और अन्य जो ऐसा नहीं जानते वे दुःखमेवापियन्ति ॥ १० ॥ | दुःखको ही प्राप्त होते हैं ॥१०॥ इदानीं तस्यैव सर्वात्मत्वं | अब श्रुति उसीकी सर्वात्मकता दर्शयति— | दिखलाती है— सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः । सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात्सर्वगतः शिवः ॥११॥ वह भगवान् समस्त मुखोंवाला, समस्त शिरोंवाला और समस्त ग्रीवाओंवाला है, वह सम्पूर्ण जीवोंके अन्तःकरणोंमें स्थित और सर्वव्यापी है; इसलिये सर्वगत और मङ्गलरूप है ॥ ११ ॥
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६३ ൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘ सर्वाननेति । सर्वाण्या- | 'सर्वानन' इत्यादि । समस्त मुख, ननानि शिरांसि ग्रीवाश्चास्येति | शिर और ग्रीवाएँ इसीकी हैं, सर्वाननशिरोग्रीवः । सर्वेषां भूता- | इसलिये यह सर्वाननशिरोग्रीव है । नां गुहायां बुद्धौ शेत इति सर्व- | यह समस्त प्राणियोंकी गुहा—बुद्धि- भूतगुहाशयः । सर्वव्यापी स | में शयन करता है इसलिये सर्वभूत- भगवानैश्वर्यादिसमष्टिः । उक्तं | गुहाशय है। वह सर्वव्यापी और च— | भगवान्—ऐश्वर्यादिकी समष्टिरूप "ऐश्वर्यस्य समग्रस्य | है। कहा भी है—"समग्र ऐश्वर्य, धर्मस्य यशसः श्रियः । | धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य— ज्ञानवैराग्ययोश्चैव | इन छः का नाम भग है।" भगवान्में षण्णां भग इतीरणा ॥" | ये सब ऐसे ही हैं इसलिये वह सर्वगत (वि० पु० ६ । ५ । ७४) | भगवति यस्मादेवं तस्मात् | और शिव (मङ्गलरूप) है ॥११॥ सर्वगतः शिवः ॥ ११ ॥ | ═══════════ किञ्च— | तथा— महान्प्रभुर्वै पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः । सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्ययः ॥१२॥ यह महान्, परमसमर्थ, शरीररूप पुरमें शयन करनेवाला, इस [ स्वरूपास्थितिरूप ] निर्मल प्राप्तिके उद्देश्यसे अन्तःकरणको प्रेरित करने- वाला, सबका शासक, प्रकाशस्वरूप और अविनाशी है ॥ १२ ॥ महानिति । महान्प्रभुः समर्थो | 'महान्' इत्यादि । वह महान्, वै निश्चयेन जगदुदयस्थितिसंहारे | प्रभु अर्थात् जगत्के उत्पत्ति, स्थिति • | और संहारमें निश्चय ही समर्थ और सत्त्वस्यान्तःकरणस्यैष प्रवर्तकः | सत्त्व यानी अन्तःकरणका प्रेरक है । प्रेरयिता । किमर्थमुद्दिश्य ? सुनिर्म- | किस प्रयोजनके उद्देश्यसे उसका
१६३ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१६३ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ लामिमां स्वरूपावस्थालक्षणां प्राप्तिं | प्रवर्त्तक है ?—इस स्वरूपावस्थिति- परमपदप्राप्तिम् । ईशान ईशिता । | रूप सुनिर्मल प्राप्ति यानी परमपदकी ज्योतिः परिशुद्धो विज्ञानप्रकाशः । | प्राप्तिके उद्देश्यसे । तथा वह ईशान अव्ययोऽविनाशी ॥ १२ ॥ | —शासक, ज्योतिः—विशुद्धविज्ञान- | प्रकाशस्वरूप और अव्यय— | अविनाशी है ॥१२॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः । हृदा मन्वीशो मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥१३॥ यह अङ्गुष्ठमात्र, पुरुष, अन्तरात्मा, सर्वदा जीवोंके हृदयमें स्थित, ज्ञानाधिपति एवं हृदयस्थित मनके द्वारा सुरक्षित है । जो इसे जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥ १३ ॥ अङ्गुष्ठमात्र इति । अङ्गुष्ठमा- | 'अङ्गुष्ठमात्रः' इत्यादि । अपनी त्रोऽभिव्यक्तिस्थानहृदयसुषिरपरि- | अभिव्यक्तिके स्थान हृदयाकाशके माणापेक्षया पुरुषः पूर्णत्वात्पुरि | परिमाणकी अपेक्षासे यह अङ्गुष्ठमात्र शयनाद्वा । अन्तरात्मा सर्वस्या- | है, पूर्ण अथवा शरीररूप पुरमें न्तरात्मभूतः स्थितः । सदा | शयन करनेके कारण पुरुष है, जनानां हृदये संनिविष्टो हृदय- | अन्तरात्मा अर्थात् सबके अन्तरात्म- स्थेन मनसाभिगुप्तः । मन्वीशो | स्वरूपसे स्थित है । सर्वदा जीवोंके ज्ञानेशः । य एतद्विदुरमृतास्ते | हृदयमें स्थित है, हृदयस्थित मनके भवन्ति ॥ १३ ॥ | द्वारा सुरक्षित है और मन्वीश— | ज्ञानाध्यक्ष है । जो इसे जानते हैं वे | अमर हो जाते हैं ॥ १३ ॥
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६५
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६५ परमेश्वरके सर्वात्मभाव या विराट्-स्वरूपका वर्णन पुरुषोऽन्तरात्मेत्युक्तं पुनरपि | वह परमेश्वर पुरुष एवं अन्तरात्मा है—यह कहा गया, अब सबकी सर्वात्मानं दर्शयति—सर्वस्य | तद्रूपता प्रदर्शित करनेके लिये श्रुति तावन्मात्रत्वप्रदर्शनार्थम् । उक्तं | फिर भी उसका सर्वात्मभाव दिखलाती है । कहा भी है—"अध्यारोप और च--"अध्यारोपापवादाभ्यां नि- | अपवादके द्वारा निष्प्रपञ्चको प्रपञ्चित ष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते" इति । | किया जाता है" इत्यादि । सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१४॥ वह सहस्र शिर, सहस्र नेत्र और सहस्र चरणोंवाला है तथा पूर्ण है । वह भूमिको सब ओरसे व्याप्त कर अनन्तरूपसे उसका अतिक्रमण करके स्थित है । [ अथवा ऐसा अर्थ करना चाहिये कि नाभिसे ऊपर दश अङ्गुल परिमाणवाले हृदयमें स्थित है ] ॥ १४ ॥ सहस्राण्यनन्तानि शीर्षाण्य- | इसके सहस्र अर्थात् अनन्त शिर हैं इसलिये यह सहस्रशिरवाला है । स्येति सहस्रशीर्षा । पुरुषः पूर्णः । | पुरुष अर्थात् पूर्ण है । इसी प्रकार एवमुत्तरत्र योजनीयम् । स भूमिं | आगेके विशेषणोंका भी अर्थ कर लेना १. अध्यारोप और अपवाद ये वेदान्तके पारिभाषिक शब्द हैं । किसी सत्य वस्तुमें असत्य पदार्थका भ्रम होना अध्यारोप है, जैसे रज्जुमें सर्पकी भ्रान्ति; तथा उस असत्य पदार्थके बाधपूर्वक परमार्थ-सत्यको प्रदर्शित कराना अपवाद है, जैसे कल्पित सर्पके निराकरणद्वारा उसकी अधिष्ठानभूता रज्जुका भान । इसी प्रकार निष्प्रपञ्च ब्रह्ममें मायाका आरोप करके प्रपञ्चप्रतीतिका व्यवस्था की जाती है और प्रपञ्चके अपवादद्वारा शुद्ध ब्रह्मका साक्षात्कार कराया जाता है । परन्तु वस्तुतः ये दोनों प्रपञ्चके ही अन्तर्गत हैं, अखण्ड चिन्मात्र शुद्ध ब्रह्ममें तो किसी भी प्रकारके अध्यारोप या अपवादका अवकाश ही नहीं है । इस प्रकार अध्यारोप और अपवाद- के द्वारा उस निर्विशेषका सविशेषरूपसे वर्णन किया जाता है ।
१६६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ भुवनं सर्वतोऽन्तर्बहिश्च वृत्वा | चाहिये । * वह भूमि अर्थात् संसार- | को सर्वतः—बाहर और भीतरसे व्याप्यात्यतिष्ठदतीत्य भुवनं सम- | व्याप्त करके संसारका भी अतिक्रमण | करके स्थित है। दशाङ्गुल अर्थात् धितिष्ठति। दशाङ्गुलमनन्तमपार- | अनन्त--अपार रूपसे । अथवा मित्यर्थः। अथवा नाभेरुपार दशा- | नाभिसे ऊपर जो दश अङ्गुल | परिमाणवाला हृदय है उसमें स्थित ङ्गुलं हृदयं तत्राधितिष्ठति ॥१४॥ | है॥ १४ ॥ ननु सर्वात्मत्वे सप्रपञ्चं ब्रह्म | किन्तु सर्वात्मक होनेपर तो ब्रह्म | सप्रपञ्च ( सविशेष ) सिद्ध होगा, स्यात्तद्व्यतिरेकेणाभावादित्याह-- | क्योंकि उससे अतिरिक्त प्रपञ्चकी सत्ता | ही नहीं है, इसपर श्रुति कहती है— पुरुष एवेदग्ँ सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥१५॥ जो कुछ भूत और भविष्यत् है एवं जो अन्नके द्वारा वृद्धिको प्राप्त होता है वह सब पुरुष ही है; तथा वही अमृतत्व ( मुक्ति ) का भी प्रभु है ॥ १५ ॥ पुरुष एवेदमिति । पुरुष एवेदं | 'पुरुष एवेदम्' इत्यादि । यह | जो अन्नसे बढ़ता है तथा यह जो सर्वं यदन्नेनातिरोहति यदिदं | वर्तमान दिखायी देता है तथा जो दृश्यते वर्तमानं यद्भूतं यच्च भव्यं | कुछ भूत और भविष्यत् है वह सब | पुरुष ही है। इसके सिवा, वह भविष्यत् । किञ्च—उतामृतत्व- | अमृतत्वका ईशान है अर्थात् अमरण-
- अर्थात् सहस्र यानी अनन्त अक्षि ( नेत्र ) और पाद ( चरण ) होनेके कारण वह सहस्राक्ष और सहस्रपाद है।
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६७
स्येशानोऽमरणधर्मत्वस्य कैवल्य- | धर्मत्व यानी कैवल्यपदका भी प्रभु | है । तथा जो अन्नसे बढ़ता है, जो स्येशानः । यच्चान्नेनातिरोहति | विद्यमान है उसका यह स्वामी यद्वर्तते तस्येशानः ॥ १५ ॥ | है ॥ १५ ॥
पुनरपि निर्विशेषं प्रतिपाद- | फिर भी उसको निर्विशेष प्रति- यितुं दर्शयति— | पादन करनेके लिये श्रुति दिखलाती | है— सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १६ ॥ उसके सब ओर हाथ-पाँव हैं, सब ओर आँख, शिर और मुख हैं तथा वह सर्वत्र कर्णोंवाला है एवं लोकमें सबको व्याप्त करके स्थित है ॥ १६ ॥ सर्वत इति । सर्वतः | 'सर्वतः' इत्यादि । उसके सब पाणयः पादाश्चेति सर्वतः- | ओर हाथ-पाँव हैं इसलिये वह सर्वतः- पाणिपादं तत् । सर्वतोऽक्षीणि | पाणिपाद है, तथा सब ओर आँख, शिरांसि मुखानि च यस्य तत्सर्व- | शिर और मुख हैं इसलिये सर्वतो- तोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिः | ऽक्षिशिरोमुख है । उसके सब ओर श्रवणमस्येति श्रुतिमत् । लोके | श्रुति-कर्ण हैं इसलिये वह सर्वतः प्राणिनिकाये सर्वमावृत्य संव्या- | श्रुतिमान् है । तथा यह लोकमें | अर्थात् प्राणिसमूहमें सबको आवृत प्य तिष्ठति ॥ १६ ॥ | —व्याप्त करके स्थित है ॥ १६ ॥
आत्माके देहावस्थान और इन्द्रिय-सम्बन्धराहित्यका निरूपण उपाधिभूतपाणिपादादीन्द्रि- | उपाधिभूत पाणिपादादिके अध्या- याध्यारोपणाज्ज्ञेयस्य तद्वत्ताशङ्का | रोपसे ऐसी आशङ्का न हो जाय कि | ज्ञेय ( ब्रह्म ) उनसे युक्त है इसी मा भूदित्येवमर्थमुत्तरतो मन्त्रः— | प्रयोजनसे आगेका मन्त्र है—
१६८ श्ववेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१६८ श्ववेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ॥१७॥ वह समस्त इन्द्रियवृत्तियोंके रूपमें अवभासित होता हुआ भी समस्त इन्द्रियोंसे रहित है, तथा सबका प्रभु, शासक और सबका आश्रय एवं कारण है ॥ १७ ॥ सर्वेन्द्रियेति । सर्वाणि च तानी- | 'सर्वेन्द्रिय०' इत्यादि । श्रोत्रादि न्द्रियाणि श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्य- | इन्द्रियोंसे लेकर अन्तःकरणपर्यन्त न्तःकरणपर्यन्तानि सर्वेन्द्रियग्रह- | जो समस्त इन्द्रियाँ हैं वे सर्वेन्द्रिय-पदके ग्रहणसे गृहीत होती हैं । णेन गृह्यन्ते । अन्तःकरणबहि- | अन्तःकरण और बाह्य करण जिसकी ष्करणोपाधिभूतः सर्वेन्द्रियगुणै- | उपाधि हैं वह परमात्मा उन समस्त रध्यवसायसंकल्पश्रवणादिभिर्गुण- | इन्द्रियोंके अध्यवसाय, संकल्प एवं वदाभासत इति सर्वेन्द्रियगुणा- | श्रवणादि गुणोंसे गुणवान्-सा भासता है । इसलिये वह सर्वेन्द्रियगुणाभास भासम् । सर्वेन्द्रियैर्व्यापृतमिव | है । तात्पर्य यह है कि उसे समस्त तज्ज्ञेयमित्यर्थः । "ध्यायतीव | इन्द्रियसे व्यापारयुक्त-सा जानना लेलायतीव" (बृ० उ० ४।३।७) | चाहिये; जैसा कि "ध्यान करता हुआ-सा, चेष्टा करता हुआ-सा" इति श्रुतेः । कस्मात्पुनः कारणा- | इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात होता है । तद्व्यापृतमिवेति गृह्यते ? इत्याह- | किन्तु वह किस कारणसे व्यापारयुक्त-सा ग्रहण किया जाता है [ वास्तवमें 'सर्वेन्द्रियविवर्जितम्' सर्वकरण- | व्यापार करता है-ऐसा क्यों नहीं माना जाता ? ] इसपर श्रुति कहती रहितमित्यर्थः । अतो न च | है--'सर्वेन्द्रियविवर्जितम्' अर्थात् वह समस्त इन्द्रियोंसे रहित है । करणव्यापारैर्व्यापृतं तज्ज्ञेयम् । | अतः उसे इन्द्रियोंके व्यापारोंसे व्यापारवान् नहीं जानना चाहिये ।
अध्याय शाङ्करभाष्यार्थ १६९
अध्याय शाङ्करभाष्यार्थ १६९ सर्वस्य जगतः प्रभुमीशानम् । | वह समस्त जगत्का प्रभु और सर्वस्य शरणं परायणं बृहत्कारणं | शासक है तथा सबका शरण— च ॥१७॥ | आश्रय और बृहत्—कारण है ॥१७॥ किञ्च— | तथा— नवद्वारे पुरे देही हँसो लेलायते बहिः । वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥१८॥ सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत्का स्वामी यह हंस ( परमात्मा ) देहा- भिमानी होकर नव द्वारवाले [ देहरूप ] पुरमें बाह्य विषयोंको ग्रहण करनेके लिये चेष्टा किया करता है ॥ १८ ॥ नवद्वार इति । नवद्वारे शिरसि | 'नवद्वारे' इत्यादि । [ दो | आँख, दो नाक, दो कान और सप्तद्वाराणि द्वे अवाची पुरे देही | एक मुख—इन ] सात शिरके और | [ गुदा एवं लिङ्ग ] दो निम्न- विज्ञानात्मा भूत्वा कार्यकारणो- | भागके इस प्रकार नौ द्वारोंवाले | शरीरमें देही—विज्ञानात्मा यानी भूत पाधिः सन्हंसः परमात्मा हन्त्य- | और इन्द्रियरूप उपाधिवाला होकर | यह हंस—परमात्मा बाह्य विषयोंको विद्यात्मकं कार्यमिति, लेलायते | ग्रहण करनेके लिये चेष्टा करता— | चलता है। यह अविद्याजनित कार्यका चलति बहिर्विषयग्रहणाय । वशी | हनन करता है इसलिये हंस है। तथा | यह स्थावर-जंगम समस्त लोकका सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य | वशी ( स्वामी ) है ॥ १८ ॥ च ॥१८॥ |
१७० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
१७० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ ब्रह्मका निर्विशेष रूप एवं तावत्सर्वात्मकं ब्रह्म प्रति- इसप्रकार यहाँतक ब्रह्मका सर्वात्म- पादितम् । इदानीं निर्विकारा- भावसे प्रतिपादन किया गया; अब नन्दस्वरूपेणानुदितानस्तमितज्ञा- अपने निर्विकार चिदानन्दस्वरूपसे तथा कभी उदित एवं अस्त न होनेवाले नात्मनावस्थितं परमात्मानं दर्श- ज्ञानस्वरूपसे स्थित परमात्माको यितुमाह— प्रदर्शित करनेके लिये श्रुति कहती है— अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥१९॥ वह हाथ-पाँवसे रहित होकर भी वेगवान् और ग्रहण करनेवाला है, नेत्रहीन होकर भी देखता है और कर्णरहित होकर भी सुनता है। वह सम्पूर्ण वेद्यवर्गको जानता है, किन्तु उसे जाननेवाला कोई नहीं है। उसे [ ऋषियोंने ] सबका आदि, पूर्ण एवं महान् कहा है ॥१९॥ अपाणिपाद इति । नास्य 'अपाणिपादः' इत्यादि । इसके पाणि और पाद नहीं हैं, इसलिये पाणिपादावित्यपाणिपादः । यह अपाणिपाद है । [ पैर जवनो दूरगामी । ग्रहीता पाण्य- न होनेपर भी ] जवन—दूरगामी है और ग्रहीता—हाथ न होने- भावेऽपि सर्वग्राही । पश्यति सर्व- पर भी सबको ग्रहण करनेवाला मचक्षुरपि सन् । शृणोत्यकर्णो- है। यह नेत्रहीन होनेपर भी सबको देखता है, कर्णहीन होनेपर भी ऽपि । स वेत्ति वेद्यं सर्वज्ञत्वाद- सुनता है और अमनस्क होनेपर भी मनस्कोऽपि । न च तस्यास्ति सर्वज्ञ होनेके कारण वेद्यवर्गको जानता है। किन्तु कोई उसे जाननेवाला वेत्ता “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” नहीं है, जैसा कि “इससे भिन्न