श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
१२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ सविता देवताकी अनुमति होनेपर उन्हींकी प्रेरणासे परमात्मामें लगे हुए मनके द्वारा हम यथाशक्ति परमात्मप्राप्तिके हेतुभूत ध्यानकर्मके लिये प्रयत्न करेंगे ॥२॥ युक्तेनेति । यदा तत्त्वाय मनो | 'युक्तेन' इत्यादि । जिस समय योजयन्ननुग्राहकदेवताशक्त्याधा- | तत्त्वज्ञानके लिये मनोनिग्रह करते नेन देहेन्द्रियदार्ढ्यं करोति तदा | हुए अनुग्राहक देवताओके शक्ति- युक्तेन सवित्रा परमात्मनि संयो- | सञ्चारके द्वारा [ सविता ] देह और जितेन मनसा वयं तस्य देवस्य | इन्द्रियोंकी दृढता कर देगा उस सवितुः सवेऽनुज्ञायां सत्यां सुव- | समय युक्त—सविता देवताद्वारा र्गेयाय स्वर्गप्राप्तिहेतुभूताय ध्यान- | परमात्मामें लगाये हुए मनके द्वारा कर्मणे यथासामर्थ्यं प्रयतामहे । | हम उस देवका सव प्राप्त होनेपर परमात्मवचनोऽत्र स्वर्गशब्दः । | अर्थात् उनकी अनुज्ञा मिलनेपर तत्प्रकरणात्तस्यैव सुखरूपत्वात्त- | सुवर्गेय—स्वर्गप्राप्तिके हेतुभूत ध्यान- दंशत्वाच्चेतरस्य सुखस्य । तथा | कर्मके लिये यथाशक्ति प्रयत्न करेंगे। च श्रुतिः—"एतस्यैवानन्दस्या- | यहाँ 'स्वर्ग' शब्द परमात्मवाची है, न्यान्यि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति" | क्योंकि परमात्माका ही यहाँ प्रकरण (बृ० उ० ४। ३। ३२) इति॥२॥ | है, वही सुखस्वरूप है तथा अन्य | सब सुख भी उसीके अंश हैं। ऐसी | ही यह श्रुति भी है--"इसी | आनन्दकी सूक्ष्मतर मात्राके आश्रय- | से अन्य सब जीव जीवित रहते | हैं" ॥ २ ॥ युक्त्वायैति पुनरपि सोऽप्येवं | 'युक्त्वाय' इत्यादि मन्त्रसे, फिर करोत्विति प्रार्थना— | भी वह ऐसा करे—ऐसी प्रार्थना | करते हैं—
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७ युक्त्वाय मनसा देवान्सुवर्यतो धिया दिवम् । बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान् ॥ ३ ॥ पूर्णानन्दस्वरूप परमात्माकी ओर जाते हुए तथा सम्यग्दर्शनके द्वारा ज्योतिःस्वरूप ब्रह्मका प्रकाशन करते हुए मनके सहित इन्द्रियोंको परमात्मा- से संयुक्त कर वह सवितृदेव उन्हें अनुज्ञा (सामर्थ्य) प्रदान करे ॥३॥ युक्त्वाय योजयित्वा देवान् मनआदीनि करणानि तेषां विशेषणं सुवः स्वर्गं सुखं पूर्णानन्दब्रह्म, यत इति द्वितीयाबहुवचनं पूर्णानन्दब्रह्म गच्छतो न शब्दादिविषयान् । पुनरपि विशेषणान्तरं धिया सम्यग्दर्शनेन दिवं द्योतनस्वभावं चैतन्यैकरसं बृहन्महद्ब्रह्म ज्योतिः प्रकाशं करिष्यतः पूर्णानन्दब्रह्माविष्करिष्यतः। अत्र द्वितीयाबहुवचनम् । देवताओं, मन आदि इन्द्रियोंको [ परमात्मामें ] युक्त—संयोजित कर—उन इन्द्रियोंका विशेषण है 'सुवर्यतः' सुवः-अर्थात् स्वर्ग—सुख यानी पूर्णानन्दस्वरूप ब्रह्मके प्रति यतः—जाती हुई [इन्द्रियोंको]। यहाँ 'यतः' यह शब्द द्वितीयाका बहुवचन है । तात्पर्य यह है कि पूर्णानन्द ब्रह्मकी ओर जाती हुई इन्द्रियोंको [ परमात्मामें संयोजित कर ], शब्दादि विषयोंकी ओर जानेवाली इन्द्रियोंको नहीं । [इन्द्रियोंके लिये] पुनः एक दूसरा विशेषण भी दिया जाता है—जो 'धिया' यानी सम्यग्दर्शनके द्वारा दिवम्—द्योतनस्वभाव चैतन्यैकरस बृहत्-महत् अर्थात् ब्रह्मको ज्योतिः—प्रकाशित करेंगी, अर्थात् पूर्णानन्द ब्रह्मका प्रादुर्भाव—अनुभव करेंगी [ उन इन्द्रियोंको ]—यहाँ 'करिष्यतः' में द्वितीयाका बहुवचन है—
१२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
१२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
सविता प्रसुवाति तान्करणानि । | उन इन्द्रियोंको सवितृदेव अनुज्ञा देता यथा करणानि विषयेभ्यो निवृत्ता- | है। तात्पर्य यह है कि इन्द्रियाँ | विषयोंसे निवृत्त हो आत्माभिमुखी न्यात्माभिमुखान्यात्मप्रकाशमेव | होकर जिस प्रकार आत्माको ही | प्रकाशित करें वैसी अनुज्ञा (सामर्थ्य) कुर्युस्तथानुजानातु सवितेत्यर्थः॥३॥ | उन्हें सवितादेवता प्रदान करे ॥३॥
तस्यैवमनुजानतो महती परि- | इस प्रकार अनुज्ञा देनेवाले उस ष्टुतिः कर्तव्येत्याह— | देवकी महती स्तुति करनी उचित है | —इस अभिप्रायसे श्रुति कहती है— युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः । वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः ॥ ४ ॥ जो विप्रगण मन और इन्द्रियोंको परमात्मामें लगाते हैं उनको चाहिये कि जिस एक प्रज्ञावित्ने होतृसाध्य [ यज्ञादि ] क्रियाओंका विधान किया है उस महान्, सर्वज्ञ और विप्र ( विशेषरूपसे व्यापक ) सवितृदेवकी महती स्तुति करें ॥ ४ ॥ युञ्जत इति । युञ्जते योज- | 'युञ्जते' इत्यादि । जो विप्र- यन्ति ये विप्रा मन उत युञ्जते | ब्राह्मण, मन एवं अन्य इन्द्रियोंको धिय इतराण्यपि करणानि । धी- | परमात्मामें लगाते हैं। इन्द्रियाँ बुद्धि- हेतुत्वात्करणेषु धीशब्दप्रयोगः । | जनित हैं इसलिये उनके लिये 'धी' | शब्दका प्रयोग किया गया है। ऐसा तथा च श्रुत्यन्तरम्—"यदा | ही एक दूसरी श्रुति भी कहती है पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा | —"जब मनके सहित पाँच ज्ञान
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९ सह" (क० उ० २।३।१०) इति । | ( ज्ञानेन्द्रियाँ ) रुक जाती हैं" विप्रस्य विशेषेण व्याप्तस्य बृहतो | इत्यादि । विप्र—विशेषरूपसे महतो विपश्चितः सर्वज्ञस्य | व्यापक, बृहत्—महान् एवं देवस्य सवितुर्मही महती परिष्टुतिः | विपश्चित्—सर्वज्ञ सवितृदेवकी महती कर्तव्या । कैर्विप्रैः । | स्तुति करनी चाहिये । किन्हें पुनरपि तमेव विशिनष्टि— | करनी चाहिये ?—ब्राह्मणोंको । वि होत्रा दधे होत्राः क्रिया यो | फिर भी उस सवितृदेवके ही विदधे वयुनाविप्रज्ञावित्सर्वज्ञाना- | विशेषण दिये जाते हैं—'वि होत्रा त्साक्षिभूत एकोऽद्वितीयः । ये | दधे' जिसने होत्रा यानी यज्ञक्रियाओं- विप्रा मनआदिकरणानि विषयेभ्य | का विधान किया है और जो वयुना- उपसंहृत्यात्मन्येव योजयन्ति तै- | वित्—प्रज्ञावित् अर्थात् सब कुछ र्विप्रस्य बृहतो विपश्चितो महती | जाननेके कारण साक्षिस्वरूप है, वह परिष्टुतिः कर्तव्या । होत्रा विदधे | [सविता देवता] एक—अद्वितीय है । वयुनाविदेकः सविता ॥ ४ ॥ | अर्थात् जिसने यज्ञक्रियाओंका विधान किया वह प्रज्ञानवान् सविता एक ही है। अतः जो ब्राह्मण मन आदि इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर आत्मामें ही लगाते हैं उन्हें इस महान् एवं सर्वज्ञ विप्र ( विशेषरूपसे व्यापक ) सविताकी महती स्तुति करनी चाहिये ॥४॥ किञ्च— | तथा— युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभि- र्विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः । शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥ ५ ॥
१३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
१३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ [ हे इन्द्रियवर्ग और इन्द्रियाधिष्ठातृ देवगण ! ] मैं तुमसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरातन ब्रह्ममें नमस्कार ( चित्त-प्रणिधान आदि ) द्वारा मन लगाता हूँ । सन्मार्गमें विद्यमान विद्वान्की भाँति मेरा यह कीर्तनीय श्लोक ( स्तुतिपाठ ) लोकमें विस्तारको प्राप्त हो । जिन्होंने सब ओरसे दिव्य धामोंपर अधिकार कर रखा है वे अमृत ( हिरण्यगर्भ ) के पुत्र विश्वेदेवगण श्रवण करें ॥५॥ युजे वामिति । युजे वां समा- | 'युजे वाम्' इत्यादि। इन्द्रिय और | उनके अनुग्राहक देवगण ! तुम दधे वां युवयोः करणानुग्राहकयोः | दोनोंके द्वारा प्रकाश्यनीय होनेके | कारण तुमसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्रह्ममें संबन्धि प्रकाश्यत्वेन तत्प्रकाशितं | मैं मनको नियुक्त—समाहित करता | हूँ; तात्पर्य यह है कि ब्रह्म इनके ब्रह्मेत्यर्थः । अथवा वामिति बहु- | द्वारा प्रकाशित है । अथवा 'वाम्' | इस शब्दका यदि बहुवचनमें अर्थ वचनार्थे युष्माकं करणभूतं ब्रह्म | किया जाय तो 'तुम्हारे करणभूत | पूर्वतन—चिरकालीन ब्रह्ममें मैं चित्त पूर्व्यं पूर्वं चिरन्तनं समादधे । | समाहित करता हूँ' ऐसा अर्थ होगा। | [ किस प्रकार चित्त समाहित करता नमोभिर्नमस्कारैश्चित्तप्रणिधाना- | हूँ ? ] नमस्कारोंद्वारा अर्थात् चित्त- दिभिः । | प्रणिधान (मनोनियोग) आदिके द्वारा। एष एवं समाधानस्य मम | इस प्रकार चित्तसमाधान करने- | वाले मेरा कीर्तितव्य श्लोक ( स्तोत्र- श्लोकः कीर्तितव्य एतु विविधमेतु | पाठ ) सन्मार्गमें वर्तमान विद्वान्के | समान विविधरूप (विस्तारको प्राप्त) पथ्येव सूरेः पथि सन्मार्गे । | हो जाय । अथवा [ 'पथ्या इव' | ऐसा पदच्छेद करके ] पथ्याका अर्थ अथवा पथ्या कीर्तिरित्येतद्वाक्यं | कीर्ति करना चाहिये । अर्थात्
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१
प्रार्थनारूपं शृण्वन्तु विश्वेऽमृतस्य | [विद्वान्की कीर्तिकी भाँत मेरा श्लोक ब्रह्मणः पुत्राः सूत्रात्मनो हिरण्य- | विस्तारको प्राप्त हो—] इस प्रार्थनारूप गर्भस्य । के ते ? ये धामानि | वाक्यको अमृत—ब्रह्म यानी दिव्यानि दिवि भवान्यातस्थु- | हिरण्यगर्भके सूर्यरूप समस्त पुत्र रधितिष्ठन्ति ॥ ५ ॥ | सुनें । वे कौन हैं ?—जिन्होंने | सम्पूर्ण दिव्य—द्युलोकान्तर्गत धामों- | पर अधिकार कर रखा है ॥ ५ ॥
सविताकी अनुज्ञाके बिना हानि युञ्जानः प्रथमं मन इत्यादिना | ‘युञ्जानः प्रथमं मनः’ इत्यादि सवित्रादिप्रार्थना प्रतिपादिता । | मन्त्रसे सविता आदिकी प्रार्थना कही यस्तु पुनः प्रार्थनामक़त्वा तैर- | गयी । किन्तु जो पुरुष उनकी ननुज्ञातः सन्योगे प्रवर्तते स | प्रार्थना न करके उनकी अनुज्ञाके भोगहेतौ कर्मण्येव प्रवर्तत | बिना ही योगमें प्रवृत्त होता है इत्याह— | उसकी भोगके हेतुभूत कर्मोंमें ही | प्रवृत्ति हो जाती है—यह बात अब | श्रुति बतलाती है— अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राधिरुध्यते । सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः ॥ ६ ॥ जहाँ ( अग्न्याधानादि कर्ममें ) अग्निका मन्थन किया जाता है, जहाँ वायुका अधिरोध होता है और जहाँ सोमरसकी अधिकता होती है उन कर्मोंमें ही [ उसके ] मनकी प्रवृत्ति होती है ॥ ६ ॥ अग्निर्यत्रेति । अग्निर्यत्राभिम- | ‘अग्निर्यत्र’ इत्यादि । जहाँ अग्न्या- | धानादिमें अग्निका मन्थन किया जाता थ्यत आधानादौ । वायुर्यत्राधि- | है, जहाँ प्रवग्र्यादि ( वायुकी स्तुति
१३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
१३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
रुध्यते प्रवर्यादौ। सवित्रा प्रेरितः | आदि) में वायुका अधिरोध होता है | अर्थात् जहाँ सवितासे प्रेरित होकर शब्दमभिव्यक्तं करोति। सोमो | वायु शब्दको अभिव्यक्त करता है | और जहाँ दशापवित्र (छाननेके यत्र दशापवित्रात्पूयमानोऽति- | वस्त्र) से पवित्र किये (छाने हुए) | सोमरसकी अधिकता होती है उस रिच्यते तत्र क्रतौ संजायते मनः। | यज्ञकार्यमें उसका मन लग जाता है। अग्निर्यत्राभिमथ्यत इत्यत्रापरा | 'अग्निर्यत्राभिमथ्यते' इस मन्त्रकी | यह दूसरी व्याख्या की जाती है— व्याख्या—अग्निः परमात्मा, | अग्नि परमात्माको कहते हैं, क्योंकि अविद्यातत्कार्यस्य दाहकत्वात् । | वह अविद्या और उसके कार्यको उक्तं च—"......अहमज्ञानजं | दग्ध करनेवाला है। [श्रीमद्भगवद्गीता- | में] कहा भी है "मैं अपने भक्तोंके तमः । नाशयाम्यआत्मभावस्थो | अन्तःकरणमें स्थित होकर प्रकाशमय ज्ञानदीपेन भास्वता" (गीता | ज्ञानदीपकसे उनके अज्ञानजनित १०।११) इति । यत्र | अन्धकारको नष्ट कर देता हूँ।" यस्मिन्पुरुषे मथ्यते स्वदेह- | उस परमात्मारूपिका 'स्वदेहमरणिं | कृत्वा' इत्यादि पूर्वमन्त्रसे कहे हुए मरणिं कृत्वेत्यादिना पूर्वो- | ध्यानरूप निर्मन्थनके द्वारा जिस क्तध्याननिर्मथनेन वायुर्यत्राधि- | पुरुषमें मन्थन होता है, तथा जहाँ | वायुका अधिरोध होता है अर्थात् रुध्यते शब्दमव्यक्तं करोति | रेचकादि क्रियाओके कारण जहाँ रेचकादिकरणात् । सोमो यत्रा- | वायु अव्यक्त शब्द करता है और | जहाँ अनेक जन्मोंतक [अग्निकी] तिरिच्यतेऽनेकजन्मसेवया तत्र | सेवा करनेसे सोमकी बहुलता होती तस्मिन्यज्ञदानतपःप्राणायामसमा- | है, उस यज्ञ, दान, तप, प्राणायाम धिविशुद्धान्तःकरणे संजायते | एवं समाधि आदिसे विशुद्ध हुए
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ परिपूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्माकारं | अन्तःकरणमें ही पूर्णानन्दाद्वितीय मनः समुत्पद्यते, नान्यत्रा- | ब्रह्माकार मन ( मनोवृत्ति ) का उदय शुद्धान्तःकरणे । उक्तं च— | होता है, अन्यत्र अशुद्ध अन्तः- | करणमें नहीं । कहा भी है— “प्राणायामविशुद्धात्मा | “क्योंकि जिसका चित्त यस्मात्पश्यति तत्परम् । | प्राणायामके अभ्याससे शुद्ध हो तस्मान्नातः परं किञ्चि- | गया है वही उस परमात्माका त्प्राणायामादिति श्रुतिः ॥ | साक्षात्कार करता है, इसलिये इस अनेकजन्मंसंसार- | प्राणायामसे बढ़कर कुछ भी नहीं चिते पापसमुच्चये । | है—ऐसी श्रुति है । अनेक जन्मके तत्क्षीणे जायते पुंसां | संसारसे जो पापराशि सञ्चित हो गोविन्दाभिमुखी मतिः॥ | गयी है उसके क्षीण हो जानेपर जन्मान्तरसहस्रेषु | पुरुषोंकी बुद्धि श्रीगोविन्दकी ओर तपोज्ञानसमाधिभिः । | होती है । सहस्रों जन्मोंके अनन्तर नराणां क्षीणपापानां | तप, ज्ञान और समाधिके द्वारा जिनके कृष्णे भक्तिः प्रजायते ॥” | पाप क्षीण हो गये हैं उन पुरुषोंकी तस्मात्प्रथमं यज्ञाद्यनुष्ठानं ततः | श्रीकृष्णचन्द्रमें भक्ति होती है ।” | अतः सबसे पहले यज्ञादिका प्राणायामादि ततः समाधिस्ततो | अनुष्ठान किया जाता है, फिर | प्राणायामादिका, फिर समाधिका और वाक्यार्थज्ञाननिष्पत्तिस्ततः कृत- | उसके पश्चात् महावाक्यके अर्थका | ज्ञान होता है, तथा उससे कृत- कृत्यतेति ॥ ६ ॥ | कृत्यता होती है ॥ ६ ॥ सविताकी अनुज्ञासे लाभ यस्मादननुज्ञातस्य तस्य भोग- | क्योकि [सविता देवताकी] अनुज्ञा | न होनेपर उसकी भोगके हेतुभूत हेतौ कर्मण्येव प्रवृत्तिस्तस्मात्— | कर्ममें ही प्रवृत्ति होती है, इसलिये—
१३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
१३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम् । तत्र योनिं कृणवसे न हि ते पूर्तमक्षिपत् ॥ ७ ॥ सविता देवताके द्वारा अनुज्ञात होकर उस चिरन्तन ब्रह्मका सेवन करना चाहिये । तुम उस ब्रह्ममें निष्ठा ( समाधि ) करो । इससे पूर्त कर्म तुम्हारा बन्धन करनेवाला नहीं होगा ॥७॥ सवित्रा प्रसवेन सस्यप्रसवेनेति | सविताद्वारा प्रसूत यानी जो अन्न यावत् । जुषेत सेवेत ब्रह्म पूर्व्यं | प्रसव करनेवाला है उस सविता- चिरन्तनम् । तस्मिन्ब्रह्मणि योनिं | द्वारा अनुज्ञात होकर चिरन्तन ब्रह्मका निष्ठां समाधिलक्षणां कृणवसे | सेवन करना चाहिये। उस ब्रह्ममें तुम कुरुष्व । एवं कुर्वतो मम किं | योनि—समाधिरूप निष्ठा करो । ततो भवति? इत्यत आह—न हि | ऐसा करनेपर मुझे उससे क्या त इति। न हि ते पूर्तं स्मार्तं कर्मेष्टं | होगा ? सो श्रुति बतलाती है— श्रौतं च कर्माक्षिपन्न पुनर्भोग- | 'न हि ते' इत्यादि । इससे तुम्हारा हेतोर्बध्नाति, ज्ञानाग्निना सबीजस्य | पूर्त्त—स्मार्त्त इष्टकर्म और श्रौत- दग्धत्वात् । उक्तं च—"यथेषी- | कर्म भी पुनः भोगके हेतुसे कातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयत एवं हास्य | बन्धन नहीं करेगा; क्योंकि ज्ञानाग्निके सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते" (छा० | द्वारा वह बीजसहित भस्म हो जायगा । उ० ५। २४। ३) इति। "ज्ञानाग्निः | कहा भी है—"जिस प्रकार अग्निमें सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा" | डाला हुआ सींकका रूआँ भस्म ( गीता ४।३७) इति च ॥ ७ ॥ | हो जाता है उसी प्रकार इस (ज्ञानी) | के समस्त पाप भस्म हो जाते हैं", | "इसी प्रकार ज्ञानाग्नि समस्त कर्मों- | को भस्म कर डालता है" इत्यादि ॥७॥
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५ ध्यानयोगकी विधि और उसका महत्त्व तत्र योनिं कृणवस् इत्युक्तं | ऊपर यह कहा गया कि 'उसमें | समाधि करो, सो वह समाधि किस कथं योनिकरणम् ? इत्याशङ्क्य | प्रकार की जाय, ऐसी आशङ्का तत्प्रकारं दर्शयति— | करके उसका प्रकार दिखाते हैं— त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य । ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥ ८ ॥ [ शिर, ग्रीवा और वक्षःस्थल इन ] तीनोंको ऊँचे रखते हुए शरीरको सीधा रख मनके द्वारा इन्द्रियोंको हृदयमें सन्निविष्ट कर विद्वान् ओंकाररूप नौकाके द्वारा सम्पूर्ण भयानक जलप्रवाहोंको पार कर जाता है ॥८॥ त्रिरुन्नतमिति । त्रीण्युुरोग्रीवा- | ‘त्रिरुन्नतम्’ इत्यादि । वक्षःस्थल, शिरांस्युन्नतानि यस्मिञ्शरीरे | ग्रीवा और शिर ये तीन जिसमें उन्नत तत्तिरुन्नतं संस्थाप्यते समं | (उठे हुए) रखे जाते हैं उस त्रिरुन्नत शरीरम् । हृदीन्द्रियाणि मन- | शरीरको समानभावसे स्थित किया जाता श्चक्षुरादीनि मनसा संनिवेश्य | है। तथा मनके द्वारा मन एवं चक्षु आदि संनियम्य ब्रह्मैवोडुपस्तरणसाधनं | इन्द्रियोंको हृदयमें नियन्त्रित कर ब्रह्म | ही उडुप—तरणका साधन है, उस तेन ब्रह्मोडुपेन । ब्रह्मशब्दं प्रणवं | ब्रह्मरूप उडुपके द्वारा—यहाँ आचार्य- | लोग 'ब्रह्म' शब्दका अर्थ प्रणव बतलाते वर्णयन्ति । तेनोडुपस्थानीयेन | हैं, उस उडुप (नौका) स्थानीय प्रणवेन, काकाक्षिवदुभयत्र संब- | प्रणवके द्वारा । काकाक्षिन्यायसे १. कौएके दोनों नेत्रगोलकोंमें एक ही आँख होती है, उसीसे वह दोनों ओर देख लेता है। इसी प्रकार जहाँ एक वस्तुका दो वस्तुओंके साथ सम्बन्ध होता है वहाँ काकाक्षिन्याय कहा जाता है।
१३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
१३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
ध्यते । तेनोपसंहृत्य तेन प्रत- | इसका [ संनिवेश और तरण ] | दोनोंके साथ सम्बन्ध है । अर्थात् रेतातिकामेद्विद्वान्स्रोतांसि संसार- | प्रणवके द्वारा मन और इन्द्रियोंको सरितः स्वाभाविकाविद्याकाम- | नियमित कर प्रणवहीसे विद्वान् संसार- | सरिताके स्वाभाविक अविद्या, कामना कर्मप्रवर्तितानि भयावहानि प्रेत- | और कर्मोंद्वारा प्रवर्तित भयावह— तिर्यगूर्ध्वप्राप्तिकराणि पुनरावृत्ति- | प्रेत, तिर्यक् एवं ऊर्ध्व योनियोंको प्राप्त | करानेवाले पुनरावृत्तिके हेतुभूत भाञ्जि ॥ ८ ॥ | स्रोतोंको पार कर लेता है ॥ ८ ॥ प्राणायामका क्रम और उसकी महत्ता प्राणायामक्षपितमनोमलस्य चित्तं | प्राणायामके द्वारा जिसके पाप प्राणायाम- ब्रह्मणि स्थितं भव- | क्षीण हो गये हैं उसका चित्त ब्रह्ममें निर्देशः | स्थिर हो जाता है, इसलिये प्राणायाम- तीति प्राणायामो | का वर्णन किया जाता है । पहले निर्दिश्यते । प्रथमं नाडीशोधनं | नाडीशोधन करना चाहिये । उसके कर्तव्यम् । ततः प्राणायामेऽधि- | पीछे प्राणायाममें अधिकार होता है। कारः । दक्षिणनासापुटमङ्गु- | दायें नासारन्ध्रको अँगूठेसे दबाकर ल्यावष्टभ्य वामेन वायुं पूरये- | बायेंसे यथाशक्ति वायु खींचे। द्यथाशक्ति । ततोऽनन्तरमुत्सृज्यैवं | तत्पश्चात् दायीं नासिकाको छोड़कर दक्षिणेन पुटेन समुत्सृजेत् । | इसी प्रकार [ वाम नासारन्ध्रको सव्यमपि धारयेत् । पुनर्दाक्षिणेन | अँगुलीयोंसे दबावे और] दायेंसे वायुको पूरयित्वा सव्येन समुत्सृजेद्यथा- | बाहर निकाले। फिर दायेंसे पूरक करके शक्ति । त्रिः पञ्चकृत्वो वा एवम् | यथाशक्ति बायें नासिकारन्ध्रसे रेचक अभ्यस्यतः सवनचतुष्टयमपररात्रे | करे । इस प्रकार शेषरात्रि, मध्याह्न, मध्याह्ने पूर्वरात्रेऽर्धरात्रे च पक्षा- | पूर्वरात्रि और अर्धरात्रि इन चार | समय तीन-तीन या पाँच-पाँच बार | अभ्यास करनेवालेकी एक पक्ष या एक
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ · १३७
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ · १३७
न्मासाद्विशुद्धिर्भवति । त्रिविधः | मासमें नाडीशुद्धि हो जाती है । प्राणायामो रेचकः पूरकः कुम्भक | यह रेचक, कुम्भक और पूरकभेदसे इति । तदेवाह— | तीन प्रकारका प्राणायाम है । ऐसा | ही कहा भी है— “आसनानि समभ्यस्य | “हे गार्गि ! अपने अभीष्ट वाञ्छितानि यथाविधि । | आसनोंका यथाविधि अभ्यास कर प्राणायामं ततो गार्गि | फिर जिस आसनका अभ्यास हो जितासनगतोऽभ्यसेत् ॥ | उससे बैठकर प्राणायामका अभ्यास मृद्वासने कुशान्सम्य- | करे। कोमल आसनपर सम्यक् प्रकार- गास्तीर्याजिनमेव च । | से कुशा और मृगचर्म बिछाकर फल लम्बोदरं च संपूज्य | तथा मोदक आदि नैवेद्यके द्वारा फलमोदकभक्षणैः ॥ | गणेशजीका पूजन कर उस आसनपर तदासने सुखासीनः | बायें हाथपर दायाँ हाथ रखे हुए सव्ये न्यस्येतरं करम् । | सुखपूर्वक बैठे । शिर और ग्रीवाको समग्रीवशिरः सम्य- | सीधे रखे, मुखको [ किसी वस्त्रसे ] क्संवृतास्यः सुनिश्चलः ॥ | अच्छी तरह ढँक ले तथा शरीरको प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि | निश्चल रखे । इस प्रकार नासिकाग्र- नासाग्रन्यस्तलोचनः । | पर दृष्टि लगाकर पूर्व या उत्तरकी अतिभुक्तमभुक्तं च | ओर मुख करके बैठ जाय । तथा वर्जयित्वा . प्रयत्नतः ॥ | अतिभोजन और अभोजनको प्रयत्न- नाडीसंशोधनं कुर्या- | पूर्वक त्यागकर शास्त्रोक्त पद्धतिसे दुक्तमार्गेण यत्नतः । | नाडीशोधन करे । जो योगी नाडी- वृथा क्लेशो भवेत्तस्य | शोधन किये बिना अभ्यास करता तच्छोधनमकुर्वतः ॥ | है उसका श्रम व्यर्थ होता है । नासाग्रे शशभृद्बीजं | नासिकाग्रपर चन्द्रिकायुक्त विश्वव्यापी चन्द्रातपवितानितम् । | चन्द्रबीज ( ठँ या मँ ) को तथा
१३८ श्वैताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
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सप्तमस्य तु वर्गस्य सप्तम वर्गके बिन्दुयुक्त चतुर्थ वर्ण (वं)
चतुर्थं बिन्दुसंयुतम् ॥ को स्थापित कर दोनों नेत्रोंको
विश्वमध्यस्थमालोक्य नासिकाके अग्रभागपर स्थापित
नासाग्रे चक्षुषी उभे । करे । इडा (वाम) नाडीद्वारा
इडया पूरयेद्वायुं द्वादशमात्रा-क्रमसे बाह्यवायुको भीतर
बाह्यं द्वादशमात्रकैः ॥ खींचे । फिर पूर्ववत् देदीप्यमान-
ततोऽग्निं पूर्ववद्ध्याये- शिखाओंसे युक्त अग्निका ध्यान करे
त्स्फुरज्जवालावलीयुतम् । और उस अग्निमण्डलमें स्थित
रेफं च बिन्दुसंयुक्तं बिन्दुयुक्त रेफ (रं) का ध्यान करे।
शिखिमण्डलसंस्थितम् ॥ तत्पश्चात् धीरे-धीरे पिङ्गला (दायीं)
ध्यायेद्विरेचयेद्वायुं नाडीसे वायुको निकाल दे । फिर
मन्दं पिङ्गलया पुनः । वह मतिमान् योगी दायें नासारन्ध्रसे
पुनः पिङ्गलयापूर्य पिङ्गला नाडीद्वारा प्राण खींचकर
घ्राणं दक्षिणतः सुधीः ॥ उसे धीरे-धीरे इडा नाडीद्वारा बाहर
तद्वद्विरेचयेद्वायु- निकाले। इस प्रकार गुरुकी बतलायी
मिडया तु शनैः शनैः । हुई विधिसे एकान्तमें तीन-चार वर्ष
त्रिचतुर्वत्सरं चापि या तीन-चार मासतक अभ्यास
त्रिचतुर्मासमेव वा ॥ करे । प्रातःकाल, मध्याह्न तथा
गुणोक्तप्रकारेण सायंकालमें स्नान कर सन्ध्यादि कर्मों-
रहस्येवं समभ्यसेत् । से निवृत्त हो छः-छः प्राणायाम करे
प्रातर्मध्यांदिने सायं तथा नित्यप्रति मध्यरात्रिमें भी
स्नात्वा षट्कृत्व आचरेत्॥ अभ्यास करे । ऐसा करनेसे उसकी
संध्यादिकर्म कृत्वैव नाडीशुद्धि हो जाती है और उसके
मध्यरात्रेऽपि नित्यशः । चिह्न स्पष्ट दीखने लगते हैं।
नाडीशुद्धिमवाप्नोति
तच्चिह्नं दृश्यते पृथक् ॥
१. जितने समयमें हाथ जानुमण्डलके चारों ओर घूम जाय उसे एक मात्रा
कहते हैं।
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३९
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३९ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦
[वाम भाग / Left Column] शरीरलघुता दीप्ति- जठराग्निविवर्धनम् । नादाभिव्यक्तिरित्येत- ल्लिङ्गं तच्छुद्धिसूचनम् ॥ शुष्यन्ति न जपैस्तेन स्पर्शशुद्धेरेहेतवः । प्राणायामं ततः कुर्या- द्रेचपूरककुम्भकैः ॥ प्राणापानसमायोगः प्राणायामः प्रकीर्तितः । प्रणवं त्र्यात्मकं गार्गि रेचपूरककुम्भकम् ॥ तदेतत्प्रणवं विद्धि तत्स्वरूपं ब्रवीम्यहम् । यो वेदादौ स्वरः प्रोक्तो वेदान्तेषु प्रतिष्ठितः ॥ तयोरन्तं तु यद्गार्गि वर्गपञ्चकपञ्चमम् । रेचकं प्रथमं विद्धि द्वितीयं पूरकं विदुः ॥ तृतीयं कुम्भकं प्रोक्तं प्राणायामस्त्रिरात्मकः । त्रयाणां कारणं ब्रह्म भारूपं सर्वकारणम् ॥ रेचकः कुम्भको गार्गि सृष्टिस्थित्यात्मकावुभौ ।
[दक्षिण भाग / Right Column] शरीरका हल्कापन, कान्ति, जठराग्नि- की वृद्धि, नादका सुनायी देने लगना—ये सब नाडीशुद्धिकी सूचना देनेवाले चिह्न हैं। नाडियों- की शुद्धि जप करनेसे नहीं होती, अतः वह नाडीशुद्धिका हेतु नहीं है। "इसके पश्चात् रेचक, पूरक और कुम्भक क्रमसे प्राणायाम करे। प्राण और अपानका संयोग होना ही प्राणायाम कहलाता है। हे गार्गि! प्रणव त्रिरूप है। ये जो रेचक, पूरक और कुम्भक हैं इन्हें प्रणव ही समझो। मैं तुम्हें प्रणवका स्वरूप बतलाता हूँ। वेदके आदिमें जो स्वर (अ) है और जो स्वर (उ) वेदान्तोंमें स्थित है तथा इनके पीछे जो पञ्चम वर्ग (पवर्ग) का पञ्चम वर्ण (म) है, इन [ओंकारकी तीन मात्रा अ, उ और म] में प्रथम वर्णको रेचक जानो, द्वितीयको पूरक समझा जाता है और तृतीयको कुम्भक बतलाया गया है। इस प्रकार यह तीन अङ्गोंवाला प्राणायाम है। इन तीनोंका कारण सभीका कारणरूप प्रकाशमय ब्रह्म है। हे गार्गि! रेचक और कुम्भक—ये दोनों तो क्रमशः सृष्टि और स्थिति-
१४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
१४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
पूरकस्त्वथ संहारः | रूप हैं तथा पूरक संहाररूप है । कारणं योगिनामिह ॥ | इस प्रकार ये योगियोंकी उत्पत्त्यादि- पूरयेत्षोडशैर्मात्रै- | के कारण हैं । पहले षोडशमात्रां- रापादतलमस्तकम् । | क्रमसे पैरोंसे लेकर मस्तकपर्यन्त मात्रैर्द्वात्रिंशकैः पश्चा- | पूरक करे । फिर खूब सावधानीसे द्रेचयेत्सुसमाहितः ॥ | बत्तीसमात्राक्रमसे रेचक करे और संपूर्णकुम्भबद्वायो- | हे गार्गि ! भरे हुए घड़ेके समान निश्चलं मूर्धदेशतः । | चौसठमात्राक्रमसे मूर्द्धदेशमें कुम्भक कुम्भकं धारणं गार्गि | करता हुआ वायुको निश्चलभावसे चतुःषष्ट्या तु मात्रया ॥ | धारण करे । ऋषयस्तु वदन्त्यन्ये | "इसके सिवा हे सुन्दरि ! जिन्होंने प्राणायामपरायणाः । | भूत और आँतोंकी शुद्धि की है पवित्रभूताः पूतान्त्राः | ऐसे प्राणजयमें तत्पर कुछ अन्य प्रभञ्जनजये रताः ॥ | प्राणायामपरायण ऋषियोंका कहना तत्रादौ कुम्भकं कृत्वा | है कि पहले चौसठमात्राक्रमसे चतुःषष्ट्या तु मात्रया । | कुम्भक करके एक नासारन्ध्रसे रेचयेत्षोडशैर्मात्रै- | षोडशमात्राक्रमसे रेचक करे । र्नासेनैकैन सुन्दरि ॥ | इसके पश्चात् षोडशमात्राक्रमसे तयोश्च पूरयेद्वायुं | दोनों नासारन्ध्रोंमें वायु पूर्ण करे । शनैः षोडशमात्रया । | इस प्रकार प्राणजयी योगी प्राणसंयमको प्राणस्यायमनं त्वेवं | अपने अधीन कर ले । वशं कुर्याज्जयी वशी ॥ | पञ्च प्राणाः समाख्याता | "प्राण पाँच कहे गये हैं, वे वायवः प्राणमाश्रिताः । | प्राणके आश्रित पाँच दैहिक वायु | हैं । समस्त प्राणियोंके शरीरोंके प्राणो मुख्यतमस्तेषु | अन्तर्गत उन पाँच प्राण-वायुओंमें सर्वप्राणभृतां सदा ॥ | प्राण सबसे मुख्य है । वह प्राण
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४१
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४१ ൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘ ओष्ठनासिकयोर्मध्ये | ओष्ठ और नासिकाके मध्यमें, हृदये नाभिमण्डले । | हृदयमें, नाभिमण्डलमें तथा पैरोंके पादाङ्गुष्ठाश्रितः प्राणः | अँगूठोंमें भी रहता हुआ शरीरके सर्वाङ्गेषु च तिष्ठति ॥ | सभी अङ्गोंमें विद्यमान है। नित्यप्रति नित्यं षोडशसंख्याभिः | सोलह प्राणायामोंका अभ्यास करे, प्राणायामं समभ्यसेत् । | इससे मनोवाञ्छित पदार्थ प्राप्त होते मनसा प्रार्थितं याति | हैं और वह योगाभ्यासी समस्त सर्वप्राणजयी भवेत् ॥ | प्राणोंपर विजय प्राप्त कर लेता है। प्राणायामैर्दहेद्दोषान् | साधकको चाहिये कि प्राणायामद्वारा धारणाभिश्च किल्विषान् । | शारीरिक दोषोंको भस्म करे, धारणा- प्रत्याहाराच्च संसर्गान् | से पापोंका नाश करे, प्रत्याहारसे ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥ | वैषयिक संसर्गोंका अन्त करे और प्राणायामशतं स्नात्वा | ध्यानसे अनीश्वर गुणोंकी निवृत्ति यः करोति दिने दिने । | करे। जो पुरुष प्रतिदिन स्नान मातापितृगुरुघ्नोऽपि | करके सौ प्राणायाम करता है वह त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति ॥” | यदि माता, पिता या गुरुकी हत्या तदेतदाह प्राणानित्यादिना— | करनेवाला हो तो भी तीन वर्षमें | उस पापसे मुक्त हो जाता है।” | यही बात ‘प्राणान्’ इत्यादि मन्त्रसे | बतलायी जाती है--
प्राणान्प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत । दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ ६ ॥ साधकको चाहिये कि युक्त आहार-विहार करता हुआ प्राणोंका निरोध कर जब प्राणशक्ति (प्राणधारणका सामर्थ्य) क्षीण हो जाय तब
१४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
१४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ नासिकारन्ध्रद्वारा उसे बाहर निकाल दे। और फिर वह विद्वान् पुरुष दुष्ट अश्वसे युक्त रथके सारथिके समान सावधान होकर मनका नियन्त्रण करे ॥९॥ प्राणान्प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः | जिसकी चेष्टा “नात्यश्नतस्तु “नात्यश्नतः” (गी० ६।१६) | योगोऽस्ति”इत्यादिश्लोकमें बतलाये हुए इति श्लोकोक्तप्रकारेण संयुक्ता | नियमके अनुसार संयुक्त यानी संयत चेष्टा यस्य स संयुक्तचेष्टः। क्षीणे | है उसे संयुक्तचेष्ट कहते हैं। प्राणके शक्तिहान्या तनुत्वं गते मनसि | क्षीण होनेपर अर्थात् प्राणशक्तिका नासिकायाः पुटाभ्यां शनैः शनै- | ह्रास होनेसे मनके तनु हो जानेपर रुत्सृजेन्न मुखेन। वायुं प्रतिष्ठाप्य | नासिकारन्ध्रोके द्वारा धीरे-धीरे श्वास शनैर्नासिकयोत्सृजेदिति। उदा- | बाहर निकाले, मुखसे नहीं। तात्पर्य त्ताश्वयुतं रथनियन्तारमिव मननेन | यह है कि वायुको रोककर फिर उसे मनो धारयेताप्रमत्तः प्रणिहि- | धीरे-धीरे नासिकासे निकाले। फिर तात्मा ॥९॥ | अप्रमत्त—सावधान रहकर उद्धत | घोड़ोंवाले रथके सारथिके समान | मनको मनन करनेसे रोके ॥९॥ ध्यानके लिये उपयुक्त स्थानोंका निर्देश समे शुचौ शर्करावह्निवालुका- विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः । मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०॥ जो समतल, पवित्र, शर्करा, अग्नि और बालूसे रहित तथा शब्द, जल और आश्रयादिसे भी शून्य हो, मनके अनुकूल हो एवं नेत्रोंको पीड़ा देनेवाला न हो ऐसे गुहा आदि वायुशून्य स्थानमें मनको युक्त करे ॥१०॥
[अध्याय २] शाङ्करभाष्यार्थ १४३
[अध्याय २] शाङ्करभाष्यार्थ १४३
[संस्कृत-भाष्य] सम इति । समे निम्नोन्नत- रहिते देशे । शुचौ शुद्धे। शर्करा- वह्निवालुकाविवर्जिते । शर्कराः क्षुद्रोपलाः, वालुकास्तच्चूर्णम् । तथा शब्दजलाश्रयादिभिः । शब्दः कलहादिध्वनिः जलं सर्वप्राण्युपभोग्यम् । मण्डप आ- श्रयः । मनोऽनुकूले मनोरमे चक्षु- पीडने प्रतिवाद्यभिमुखे । छान्दसो विसर्गलोपः । गुहानिवाताश्रयणे गुहायामेकान्ते निवाते समाश्रित्य प्रयोजयेत्प्रयुञ्जीत चित्तं परमा- त्मनि ॥ १०॥
[हिन्दी-अनुवाद] 'समे' इत्यादि । सम अर्थात् जो देश ऊँचाई-नीचाईसे रहित हो, तथा जो शुचि—शुद्ध हो, शर्करा, अग्नि और वालूसे रहित हो—शर्करा छोटे-छोटे पत्थरके टुकड़ोंको और बालू उनके चूरेको कहते हैं—तथा शब्द, जल और आश्रयादिसे भी शून्य हो, यानी शब्द—कलह आदिके कोलाहल, समस्त प्राणियोंके उपयोगमें आनेवाले जल (पनघट) और आश्रय— जनसाधारणके ठहरनेके स्थानसे रहित हो, मनोऽनुकूल-मनोरम हो, नेत्रोंको पीड़ा पहुँचानेवाला अर्थात् जहाँ कोई विरोधी सामने [न] हो। यहाँ 'चक्षु- पीडने' में चक्षुःके विसर्गका लोप वैदिक है। ऐसे गुहादि एकान्त और वायुशून्य स्थानमें बैठकर चित्तको प्रयुक्त करे अर्थात् परमात्मा- में लगावे ॥ १० ॥
योगसिद्धिके पूर्वलक्षण
[संस्कृत-भाष्य] इदानीं योगमभ्यस्यतोऽभि- व्यक्तिचिह्नानि वक्ष्यन्ते नीहार इत्यादिना—
[हिन्दी-अनुवाद] अब 'नीहार०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा योगाभ्यासीको प्रकट होनेवाले ब्रह्माभिव्यक्तिके पूर्वचिह्न बतलाये जाते हैं—
नीहारधूमार्कानिलानलानां खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् ।
१४४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
१४४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ एतानि रूपाणि पुरःसराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ॥११॥ योगाभ्यास आरम्भ करनेपर पहले अनुभव होनेवाले कुहरे, धूम, सूर्य, वायु, अग्नि, खद्योत (जुगनू), विद्युत्, स्फटिकमणि और चन्द्रमा इनके रूप ब्रह्मकी अभिव्यक्ति करनेवाले होते हैं ॥११॥ नीहारस्तुषारः । तद्वत्प्राणैः | नीहार कुहरेको कहते हैं, प्राणों- समा चित्तवृत्तिः प्रवर्तते । ततो | के सहित चित्तवृत्ति कुहरेके समान | प्रवृत्त होने लगती है ।* उसके धूम इवाभाति । ततोऽर्कवत्ततो | पश्चात् धूआँ-सा भासने लगता है । | फिर सूर्यवत् और उसके पश्चात् वायुरिवाभाति । ततो वह्निरिवा- | वायु-सा प्रतीत होता है । तदनन्तर | वायु अग्निके समान अत्यन्त उष्ण त्युष्णो वायुः प्रकाशदहनः प्रव- | एवं प्रकाश और दाह करनेवाला र्तते । बाह्यवायुरिव संक्षुभितो | जान पड़ता है तथा बाह्यवायुके | समान अत्यन्त क्षुभित होकर बड़ा बलवान्विजृम्भते । कदाचित्ख- | बलवान् जान पड़ता है । कभी द्योतखचितमिवान्तरिक्षमालक्ष्यते । | जुगनुओंसे जगमगाता हुआ-सा आकाश विद्युदिव रोचिष्णुरालक्ष्यते | दिखायी देने लगता है, कभी | विद्युत्के समान तेजोमयी वस्तु दीखती कदाचित्स्फटिकाकृतिः । कदा- | है, कभी स्फटिकका आकार दीख चित्पूर्णशशिवत् । एतानि रूपाणि | पड़ता है और कभी पूर्ण चन्द्रमा-सा | दिखायी देता है । ब्रह्मानुसन्धानके योगे क्रियमाणे ब्रह्मण्याविष्क्रिय- | प्रयोजनसे किये जानेवाले योगमें ये माणे निमित्ते पुरःसराण्यग्रगा- | सब रूप पहले दिखायी देते हैं । | इसके पश्चात् परमयोगकी सिद्धि मीणि । तदा परमयोगसिद्धिः ११ | होती है ॥११॥
- अर्थात् अभ्यासकालमें मनोवृत्तिके सामने कुहरा-सा छा जाता है ।
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५
अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५ रोग, जरा और अकालमृत्युपर विजय पानेके चिह्न पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते । न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥१२॥ पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाशकी अभिव्यक्ति होनेपर अर्थात् पञ्चभूतमय योग-गुणोंका अनुभव होनेपर जिसे योगाग्निमय शरीर प्राप्त हो गया है उस योगीको न रोग होता है, न वृद्धावस्था प्राप्त होती है और न उसकी असामयिक मृत्यु ही होती है ॥ १२ ॥ लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसादं स्वरसौष्ठवं च । गन्धः शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगप्रवृत्तिं प्रथमां वदन्ति ॥१३॥ शरीरका हल्कापन, नीरोगता, विषयासक्तिकी निवृत्ति, शारीरिक कान्तिकी उज्ज्वलता, स्वरकी मधुरता, सुगन्ध और मल-मूत्रकी न्यूनता— इन सबको योगकी पहली सिद्धि कहते हैं ॥१३॥ पृथ्वीति । पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे | 'पृथ्व्यप्तेजो०' इत्यादि । 'पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे' इस पदसे पृथिव्यादीनि भूतानि द्वन्द्वैक- | समाहारद्वन्द्वसमाससम्बन्धी एकवद्भाव- वद्भावेन निर्दिश्यन्ते । तेषु | द्वारा पृथिवी आदि पाँच भूतोंका निर्देश किया गया है । उन पाँचों पञ्चसु भूतेषु समुत्थितेषु पञ्चात्मके | भूतोंके प्रकट होनेपर अर्थात् पञ्चात्मक योगगुणके प्रवृत्त होनेपर योगगुणे प्रवृत्त इत्यस्य व्याख्यानम्। | —इस प्रकार यह इसकी व्याख्या कः पुनर्योगगुणः प्रवर्तते ? | है । वह कौन योगगुण प्रवृत्त होता