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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

तृतीयाऽध्याय १ आह्निक ५३

तृतीयाऽध्याय १ आह्निक ५३ उ०-शरीर और इन्द्रियों के उपघात होने से ( पूर्वपक्ष ) ठीक नहीं ॥ इस सूत्र में गोतम मुनि अपना अन्तिम सिद्धान्त कहते हैं । हम नित्य आत्मा के वध को हिंसा नहीं कहते किन्तु कार्याश्रय शरीर और विषयोप- लब्धि के कारण इन्द्रियों के उपघात ( जिस से आत्मा में विकलता उत्पन्न होती है ) को हिंसा कहते हैं । सुख दुःखरूप कार्य हैं, उन का संवेदन शरीर के द्वारा किया जाता है, इस लिये वह कार्याश्रय कहाता है और इन्द्रियों से विषयों का ग्रहण किया जाता है, इस लिये उन में कर्तृत्व का व्यपदेश किया है तो बस शरीर और इन्द्रियों के प्रबन्ध का जो उच्छेद करना है, इसी का नाम हिंसा है, इस लिये हमारे मत में उक्त दोष नहीं आता ॥ अब आत्मा के देहादि संघात से भिन्न होने में दूसरा हेतु देते हैं:- सव्यदृष्टस्येतरेण प्रत्यभिज्ञानात् ॥ ७ ॥ उ०-बाईं आंख से देखी हुई वस्तु का दाहिनी आंख से प्रत्यभिज्ञान होने से ( आत्मा देहादि से पृथक् है ) ॥ पूर्वापर ज्ञान के मेल को प्रत्यभिज्ञान कहते हैं । जैसे-यह वही यज्ञदत्त है जिस को मैंने वाराणसी में देखा था । बाईं आंख से देखी हुई वस्तु की जो दाहिनी आंख से प्रत्यभिज्ञा होती है इस से सिद्ध होता है कि उस प्रत्यभिज्ञा का कर्त्ता इन्द्रियों से भिन्न कोई और ही पदार्थ है । यदि इन्द्रिय ही चेतन होते तो बाईं आंख से देखी हुई वस्तु को दाईं आंख कभी नहीं पहचान सकती थी, क्योंकि देवदत्त के देखे हुये को यज्ञदत्त नहीं जान सकता ॥ इस पर आक्षेप करते हैं:- नैकस्मिन्नासास्थिव्यवहिते द्वित्वाभिमानात् ॥ ८ ॥ पू०-नाक की हड्डी का आवरण होने से एक में दो का अभिमान होने से ( यह कथन ) युक्त नहीं है ॥ वास्तव में चक्षु इन्द्रिय एक ही है, नाक की हड्डी के बीच में आजाने से लोगों को दो की भ्रान्ति हो रही है । जैसे किसी तड़ाग में पुल बान्ध देने से दो तड़ाग नहीं हो जाते, ऐसे ही एक मस्तक में नाक का व्यवधान होने से आंख दो वस्तु नहीं हो सकतीं । अतएव प्रत्यभिज्ञा कैसी ? अब इस आक्षेप का समाधान करते हैं:- एकविनाशे द्वितीयाऽविनाशान्नैकत्वम् ॥ ९ ॥

५४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद उ०-एक के नाश होने पर दूसरी का नाश न होने से एकता नहीं हो सकती॥ यदि चक्षु इन्द्रिय एक ही होता तो एक आंख के नष्ट होने पर दूसरी भी नहीं रहती, परन्तु यह प्रत्यक्ष सिद्ध है कि एक आंख के फूट जाने पर दूसरी शेष रहती है और उस से आंख का काम लिया जाता है। इस लिये चक्षु एक नहीं॥ पुनः पूर्वपक्षी इस पर आक्षेप करता है:- अवयवनाशेऽप्यवयव्युपलब्धेरहेतुः ॥ १० ॥ पू०-अवयव का नाश होने पर भी अवयवी की उपलब्धि होने से ( उक्त हेतु ) अहेतु है ॥ उक्त हेतु ठीक नहीं है क्योंकि अवयव के नाश होने पर भी अवयवी की उपलब्धि देखने में आती है। जैसे-वृक्ष की किन्हीं शाखाओं के कट जाने पर भी वृक्ष की उपलब्धि होती है, ऐसे ही अवयव रूप एक चक्षु के विनाश होने पर भी दूसरे चक्षु में अवयवी की उपलब्धि शेष रहती है। इस लिये चक्षुद्वैत मानना ठीक नहीं ॥ अब सिद्धान्त सूत्र के द्वारा समाधान करते हैं:- दृष्टान्तविरोधादप्रतिषेधः ॥ ११ ॥ उ०—दृष्टान्त के विरोध से निषेध नहीं हो सकता ॥ दृष्टान्त के विरोध से चक्षुर्द्वैत का निषेध नहीं हो सकता, क्यों कि जैसे शाखायें वृक्ष रूप अवयवी का अवयव हैं, तद्वत् एक चक्षु दूसरे चक्षु का अव- यव नहीं अर्थात वे दोनों ही अवयव हैं। अवयवी उन का कोई और है। अतः दृष्टान्त में विरोध आने से निषेध युक्त नहीं। अथवा दृश्यमान अर्थ के विरोध को दृष्टान्तविरोध कहते हैं। मृत मनुष्य के कपाल में नासास्थि का व्यवधान होने पर भी दो छिद्र भिन्न २ रूप से स्पष्ट दीख पड़ते हैं। यों तो हृदय का व्यवधान होने से दोनों हाथों को भी कोई एक कह सकता है, परन्तु यह दृश्यमान अर्थ का साक्षाद्विरोध है इस लिये चक्षुरैक्य ठीक नहीं और जब चक्षु दो सिद्ध हो गये, तब एक के देखे हुवे अर्थ की दूसरे को प्रत्य- भिज्ञा होना यह सिद्ध करता है कि उस प्रतिभिज्ञा का कर्त्ता इन्द्रियों से भिन्न कोई और ही पदार्थ है और वही चेतन आत्मा है ॥ फिर उसी की पुष्टि करते हैं:- इन्द्रियान्तरविकारात् ॥ १२ ॥

तृतीयाऽध्याय १ आन्हिक ५५ उ०-(किसी इन्द्रिय से उस के विषय को ग्रहण करने पर) अन्य इन्द्रिय में विकार उत्पन्न होने से (आत्मा देहादि से पृथक् है) ॥ किसी अम्ल द्रव्य को चक्षु से देखने अथवा घ्राण से उस का गन्ध ग्रहण करने पर रसना में विकार उत्पन्न होता है, अर्थात् मुंह में पानी भर आता है। यदि इन्द्रियों को ही चेतन माना जावै तो यह बात हो नहीं सकती कि अन्य के देखे को कोई और स्मरण करे। इस लिये इन्द्रियों से पृथक् कोई आत्मा है ॥ अब इस पर शङ्का करते हैं:— न, स्मृतेः स्मर्त्तव्यविषयत्वात् ॥ १३ ॥ पू०—स्मृति के स्मर्त्तव्यविषयिणी होने से (पृथक् आत्मा के मानने की कोई आवश्यकता) नहीं ॥ स्मरणयोग्य विषयों का अनुभव करना स्मृति का धर्म है, वह स्मृति स्मर्त्तव्य विषयों के योग से उत्पन्न होती है, उसी से इन्द्रियान्तरविकार उत्पन्न होते हैं। जिस मनुष्य ने एक बार निंबू के रस को चाखा है, दूसरी वार उस को स्मरण करने से उस के मुंह में पानी भर आता है, सो यह स्मृति का धर्म है, न कि आत्मा का ॥ अब इस का समाधान करते हैं:— तदात्मगुणसद्भावादप्रतिषेधः ॥ १४ ॥ उ०—उस के आत्मगुण होने से (आत्मा का) निषेध नहीं हो सकता ॥ स्मृति कोई द्रव्य नहीं है, किन्तु वह आत्मा का एक गुण है, इस लिये उक्त आक्षेप युक्त नहीं है। जब स्मृति आत्मा का गुण है तभी तौ अन्य के देखे का अन्य को स्मरण नहीं होता। यदि इन्द्रियों को चेतन मानोगे तो अनेक कर्त्ता होने से विषयों का प्रतिसन्धान न होसकेगा, जिस से विषयों की कोई व्यवस्था न रहेगी अर्थात् कोई देखेगा और कोई स्मरण करेगा और यह हो नहीं सकता। यह व्यवस्था तौ तभी ठीक रह सकती है जब कि अनेक अर्थों का एक द्रष्टा भिन्न २ निमित्तों के योग से पूर्वानुभूत विषयों का स्मरण करता हुवा इन्द्रियान्तरविकारों को उत्पन्न करता है, ऐसा माना जायगा। क्योंकि अनेक विषयों के द्रष्टा को ही दर्शन के प्रतिसन्धान से स्मृति का होना सिद्ध हो सकता है, अन्यथा विना आधार के स्मृति किस में रहे ? इस के अति- रिक्त "मैं स्मरण करता हूं" यह प्रत्यय (जो बिना किसी भेद के प्रत्येक मनुष्य को होता है) भी स्मृति का आत्मगुण होना सिद्ध करता है ॥

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ५६ वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद पुनः उसी की पुष्टि करते हैं:— अपरिसंख्यानाच्च स्मृतिविषयस्य ॥ १५ ॥ उ०-स्मृतिविषय का परिगणन न करने से भी (यह शङ्का उत्पन्न हुई है) ॥ स्मृतिविषय के विस्तार और सत्व पर ध्यान न देकर प्रतिवादी ने यह आक्षेप किया है कि "स्मर्त्तव्य विषयों को स्मरण करना स्मृति का काम है" वास्तव में स्मृति का विषय बड़ा लम्बा और गहरा है । " मैंने इस अर्थ को जाना, मुझ से यह अर्थ जाना गया, इस विषय में मुझ से जाना गया, इस विषय का मुझ को ज्ञान हुआ, यह जो चार प्रकार का परोक्षज्ञान है, यही स्मृति का मूल है, इसमें सर्वत्र ज्ञाता ज्ञान और ज्ञेय इन तीनों की उपलब्धि होती है । अब प्रत्यक्ष अर्थ में जो स्मृति होती है, उस से तीन प्रकार के ज्ञान एक ही अर्थ में उत्पन्न होते हैं । उदाहरण—" जिस को मैंने पहले देखा था, उसी को अब देख रहा हूं" इस में दर्शन, ज्ञान और प्रत्यय ये तीनों संयुक्त हैं । तो यह एक अर्थ तीन प्रकार के ज्ञानों से युक्त हुवा न तौ अकर्त्तृक है और न नानाकर्त्तृक किन्तु एककर्त्तृक है, क्योंकि एक ही सब विषयों का ज्ञाता अपने सम्पूर्ण ज्ञानों का प्रतिसन्धान करता है । "इस अर्थ को जानूंगा, इस को जानता हूं, इसे जाना और अमुक अर्थ की जिज्ञासा करते हुवे बहुत काल तक न जानकर फिर मैंने जाना" इत्यादि ज्ञानों का निश्चय करता है । यदि इस को केवल संस्कारों का फैलाव मात्र ही माना जाय तो हो नहीं सकता, क्योंकि प्रथम तो संस्कार उत्पन्न होकर विलीन हो जाते हैं, इस के अतिरिक्त कोई संस्कार ऐसा नहीं है जो तीनों काल के ज्ञान और स्मृति का अनुभव कर सके । बिना अनुभव के "मैं और मेरा" यह ज्ञान और स्मृति का प्रतिसन्धान उत्पन्न ही नहीं हो सकता । इस से अनुमान किया जाता है कि एक सब विषयों का ज्ञाता प्रत्येक देह में अपने ज्ञान और स्मृति के प्रबन्ध को फैलाता है, देहान्तर में उस की प्राप्ति न होने से उस के ज्ञान और स्मृति का प्रतिसन्धान हो नहीं सकता" ॥ ५ ॥ यदि कहो कि शरीर को ज्ञानाश्रय होना सिद्ध न हो, न सही, परन्तु आत्मा को ज्ञानाश्रय होना भी तौ सिद्ध नहीं हो सकता । क्योंकि आत्मा और ज्ञान में तादात्म्य सम्बन्ध नहीं ? तो उत्तर- १२३-अन्यदेव हेतुरित्यनपदेशः ॥ ७ ॥ CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

तृतीयाऽध्याय १ आन्हिक ५१ (हेतुः) हेतु (अन्यत्) साध्य से भिन्न (एव) ही होता है (इति) इस से (अनपदेशः) यह हेतु नहीं ॥ यद्यपि सौगतादि मत के लोग मानते हैं कि जिस का जिस से तादात्म्य सम्बन्ध हो, वा जिस की जिस से उत्पत्ति हो वही उस का हेतु होता है, परन्तु हम (वैशेषिकाचार्य) इतनी बात तो मानते हैं कि जिस की जिस से उत्पत्ति हो वह उस का साधक हेतु होता है, किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि हेतु और साध्य में तादात्म्य सम्बन्ध भी हो ही हो । बहुत स्थलों में तादात्म्य सम्बन्ध है, पर हेतुता नहीं, तथा तादात्म्य संबन्ध नहीं और हेतुता है। जो आगे १३ वें सूत्र तक स्पष्ट होगी ॥ ७ ॥ यदि कहो कि साध्य से अन्य ही हेतु हुआ करता है जैसे अग्नि से अन्य धूम अग्नि का हेतु है तो हम कहते हैं कि यदि अन्य ही हेतु हुआ करता हो तो धूम को अग्नि का ही हेतु क्यों मानें, गधे का हेतु भी क्यों न जान लें, क्योंकि गधे से भी धूम "अन्य" तो है ? तो उत्तर- १२४-अर्थान्तरं ह्यर्थान्तरस्याऽनपदेशः ॥ ८ ॥ (अर्थान्तरम्) अन्य अर्थ (अर्थान्तरस्य) अन्य अर्थ का (हि) भी (अनपदेशः) हेतु नहीं हुआ करता ॥ अर्थात् यह भी नियम नहीं कि एक अर्थ दूसरे अर्थ का हेतु हो ही हो, होता भी है, नहीं भी होता ॥ ८ ॥ १२५-संयोगि समवाय्येकार्थसमवायि विरोधि च ॥९॥ (संयोगि) संयोग वाला, (समवायि) नित्यसम्बन्ध वाला, (एकार्थ समवायि) एकार्थसमवायी (च) और (विरोधि) विरोध रखने वाला [लिङ्ग होता है] ॥९॥ आगे उदाहरण सूत्रकार स्वयं देते हैं। एकार्थसमवायी का उदाहरणः- १२६-कार्यं कार्यान्तरस्य ॥ १० ॥ (कार्यम्) एक कार्य (कार्यान्तरस्य) अन्य कार्य का [लिङ्ग होता है] ॥ एक कार्य 'रूप' है जो अन्य कार्य 'स्पर्श' का एकार्थसमवायी लिङ्ग है ॥ अर्थात् जिस अर्थ (वस्तु) में 'रूप' गुण समवायसम्बन्ध से वर्त्तमान है, ८

५८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद उसी में दूसरा कार्य गुण 'स्पर्श' भी वर्त्तमान देखा जाता है। इसी प्रकार 'रस' का लिङ्ग 'गन्ध' भी होता है ॥ १० ॥ विरोधी लिङ्ग, जैसे:- १२७-विरोध्यभूतं भूतस्य ॥ ११ ॥ (अभूतम्) अवर्त्तमान [वर्षा] (भूतस्य) वर्त्तमान वर्षा का (विरोधी) विरोधी [लिङ्ग है] ॥ वर्षा का अभाव, हुई वर्षा का विरोधी लिङ्ग है ॥ ११ ॥ इसी प्रकार:- १२८-भूतमभूतस्य ॥ १२ ॥ (भूतम्) जो है, वह (अभूतस्य) न हुवे का [विरोधी लिङ्ग है] ॥ वर्त्तमान वर्षा, न वर्त्तमान वर्षा का लिङ्ग है ॥ १२ ॥ तथा- १२९-भूतं भूतस्य ॥ १३ ॥ (भूतम्) जो है वह (भूतस्य) हुवे का [विरोधी लिङ्ग है] ॥ वर्त्तमान मण्डलाता हुआ सर्प, वर्त्तमान झाड़ के नीचे स्थित नकुल का लिङ्ग है। यह भी विरोधी लिङ्ग है ॥ शेष संयोगी लिङ्ग का उदाहरण, जैसे-विलक्षण गति वाले रथों को देखकर तत्संयुक्त चतुर सारथियों का अनुमान करना। विद्वान् विद्यार्थियों को देखकर अनुभवी अध्यापकों को पहचानना इत्यादि । समवायी लिङ्ग, जैसे-स्पर्श से वायु का, रूप से तेज का, गन्ध से पृथिवी का पहचानना लिङ्ग है इत्यादि ॥ १९ ॥ इस प्रकार सब प्रकार के लिङ्गों को जान कर लिङ्गी जीवात्मा का दे- हेन्द्रियसङ्घात से पृथक् होना सिद्ध है। यही बात सांख्यदर्शन अध्याय १ सूत्र २ और ३ में भी नीचे लिखे अनुसार वर्णित है। यथा- देहादिव्यतिरिक्तोऽसौ वैचित्र्यात् ॥ २ ॥ वह (आत्मा) विचित्र होने से, देहादि से भिन्न (वस्तु) है ॥ देह, इन्द्रियां, मन इत्यादिसंघात जड़ है, आत्मा इस से विचित्र चेतन है, इस लिये देहादि का ही नामान्तर आत्मा नहीं है, किन्तु इस से भिन्न आत्मा विचित्र है ॥ २ ॥ षष्ठीव्यपदेशादपि ॥ ३ ॥ षष्ठी (विभक्ति) के व्यपदेश से भी (आत्मा देहादि से भिन्न सिद्ध है)।

संस्कृत की षष्ठी विभक्ति का अर्थ "का, के, की" होता है। उदाहरण- देवदत्त का शिर, यज्ञदत्त के हाथ, विष्णुमित्र की जङ्घा इत्यादि । इस से पाया जाता है कि देवदत्त और शिर एक ही होते तो 'देवदत्त का शिर' यह षष्ठी ( का ) प्रयोग में न आती । आती है, इस से पाया जाता है कि शिर, हाथ, जङ्घा आदि से देवदत्त यज्ञदत्तादि संज्ञा वाले आत्मा भिन्न हैं । जैसे 'देवदत्त का घोड़ा' कहने से देवदत्त और घोड़ा एक नहीं हो सकते, इसी प्रकार देवदत्त का शिर, हाथ, पांव कहने से देवदत्त ही शिर हाथ पांव नहीं हो सकते । इस से पाया जाता है कि आत्मा ही देहादि संज्ञक नहीं है ॥ १३०-प्रसिद्धिपूर्वकत्वादपदेशस्य ॥ १४ ॥ ( अपदेशस्य ) लिङ्ग के ( प्रसिद्धिपूर्वकत्वात् ) प्रसिद्धिपूर्वक होने से ॥ सूत्र ९ में कह आये हैं कि इन्द्रियार्थों की प्रसिद्धि, इन्द्रियार्थों से भिन्नार्थ का हेतु है । क्योंकि लिङ्ग प्रसिद्धिपूर्वक हुआ करता है, इस कारण प्रसिद्धि से जिस की जिस के साथ व्याप्ति ज्ञात हो, उस को उस का लिङ्ग समझना चाहिये । जैसे अग्नि की धूम के साथ व्याप्ति है, इस लिये धूम अग्नि का लिङ्ग है ॥ " व्याप्ति " क्या पदार्थ है, इस के विषय में लगभग एक दूसरे से मिलते जुलते कई प्रकार के मत हैं । कोई तो कहते हैं कि-किसी वस्तु का स्वा- भाविक और अव्यभिचारी ( अटल ) सम्बन्ध जो साध्य और साधन में है, वह व्याप्ति कहाता है । इसी को कोई अविनाभाव सम्बन्ध कहते हैं, इस का भी वही तात्पर्य है कि एक का दूसरे के बिना न होना, अर्थात् व्यभिचारराहित्य से नित्य सम्बन्ध । कोई इसी व्याप्ति को साहचर्य नियम कहते हैं। नवीन लोग इसी व्याप्ति पदार्थ को बड़े जटिल शब्दों में कहते हैं कि- साध्यवत्प्रतियोगिकभेदाधिकरणनिरूपितवृत्तित्वाऽभाव= व्याप्ति है, अथवा:- हेतुसमानाधिकरणात्यन्ताभावा- ऽप्रतियोगिसाध्यसमानाधिकरणता=

६० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद

व्याप्ति है। उस व्याप्तिज्ञान को या तो व्यभिचाररहित बहुधा साहचर्य से वा एक बार साहचर्य से, जिस का जिस के साथ ग्रहण हो उस को उस का अनुमान कराने वाला लिङ्ग समझना चाहिये ॥ जैसा कि रसोई घर आदि बहुत स्थानों में साधन धर्म धूमादि को अग्नि आदि से साहचर्य देखते हैं, इस से यह निश्चित ज्ञान होता है कि जहां २ धुवा है, वहां २ अग्नि का अनुमान करना चाहिये । यह तो निश्चित साध्यवाला सपक्ष है । और जहां पर्वतादि में साध्य धर्म विषयक यह संदेह हो कि यहां अग्नि आदि है वा नहीं? यह संदिग्ध साध्यवान् पक्ष है ॥ अनुमान करने के साधन ( करण ) को " अनुमान " कहते हैं । क्रिया करने के असाधारण क्रियायुक्त साधन को " करण "कहते हैं। जो कारण से उत्पन्न होकर किसी कार्य को उत्पन्न करती है, वह " क्रिया " कहाती है, इसी को " व्यापार " भी कहते हैं । जैसा कि छेदन एक क्रिया वा व्यापार है, उस क्रिया का क्रियायुक्त असाधारण साधन कुठार है, उस कुठार को 'करण' कहेंगे । और छिन्न होने वाले काष्ठ से छेदन उत्पन्न होकर छेदनानन्तर हुवे द्वैधीभाव का उत्पादक होने से छेदन ( काष्ठ पर कुठार के आघात ) का नाम " क्रिया " हुआ ॥ भाव यह है कि जो छेदन क्रिया में साधन रूप कुठार करण है, उस लिङ्ग का ज्ञान, बिना व्याप्ति ज्ञान के हो नहीं सकता । व्याप्ति ज्ञान प्रसिद्धि से होता है, प्रसिद्धि बहुतायत से अनुभव द्वारा होती है । जब बहुत बार कुठार से आघात करके काष्ठ का छेदन अनुभव में आता है तब तब काष्ठ और कुठार के संयोग से छेदन क्रिया में अनुमान होने लगता है ॥ जैसे अग्नि का धुंवे से अविनाभाव सम्बन्ध = व्याप्ति है । इसी प्रकार रस से भी अविनाभाव सम्बन्ध है । पृथिवी जल तेज इन तीनों में रूप सदा रहता है, और पृथिवी तथा जल में रस सदा रहता है । अर्थात् जहां पृथिवी है वहां गन्ध है, जहां तेज है वहां रूप है, जहां जल है वहां रस है, तथा जहां पृथिवी जल तेज हैं वहां रूप है, यह व्याप्ति पाई जाती है। इस प्रकार गन्ध पृथिवीत्व का व्यापक है, पृथिवीत्व गन्ध का भी व्यापक है तथा पृथिवीत्व गन्ध का व्याप्य है और गन्ध पृथिवीत्व का भी व्याप्य है अर्थात् दोनों में परस्पर व्याप्य व्यापक सम्बन्ध है । इसी को समानव्याप्ति

तृतीयाऽध्याय १ आन्हिक ६१ वा समव्याप्ति कहते हैं । जो वर्त्ताव सब देशों और सब कालों में पाया जावे, वह ' व्याप्यवृत्ति' कहाता है, तथा जो एक देश या एक काल में वर्त्तता है उस को 'अव्याप्यवृत्ति' कहते हैं ॥ जो देश विशेष के कारण से हो उस को ' देशकृताऽव्याप्यवृत्ति ' और जो काल विशेष के कारण से हो उस को ' कालकृताऽव्याप्यवृत्ति ' कहते हैं । अधिक बात यह है कि अव्याप्यवृत्ति पदार्थ की भी अधिकरणता व्याप्य- वृत्ति होती है, अव्याप्यवृत्ति नहीं हुआ करती । जैसे-दण्डी पुरुषः = दण्ड- वाला पुरुष । इस में यद्यपि पुरुष के एक देश ( हाथ) में दण्ड का संयोग है, तथापि समग्र पुरुष को दण्ड की अधिकरणता ( आश्रय ) कही जाती है, न कि पुरुष के एक देश ( हाथ वा अङ्गुलियों ) को । इस कारण देशकृत ऽव्याप्यवृत्ति हुई ॥ अन्वयव्याप्ति और व्यतिरेकव्याप्ति इस प्रकार भी व्याप्ति के दो भेद हैं । साध्य साधन की व्याप्ति अन्वयव्याप्ति और साध्याऽभाव और साधनाऽभाव की व्याप्ति व्यतिरेकव्याप्ति कहाती है । जैसे-जहां धुंवां है वहां अग्नि है। यह अन्वयव्याप्ति हुई, तथा जहां अग्नि नहीं वहां धुंवां नहीं। यह व्यतिरेकव्याप्ति हुई । नवीन नैयायिक गदाधरादि लोग अन्वयव्याप्ति का लक्षण इस प्रकार करते हैं कि-हेतुसमानाधिकरणात्यन्ताऽभावाऽप्रतियोगिसाध्यसामानाधि- करण्यं व्याप्तिः। हेतु के समानाधिकरणस्थ अत्यन्ताऽभाव को 'हेतुसमानाधिकर- णाऽत्यन्ताऽभाव' कहते हैं। जिस का अभाव हो उस को प्रतियोगी और जिस का अभाव न हो (भाव हो) उस को अप्रतियोगी कहते हैं । साध्य के साथ समान (एक) अधिकरण में रहना = साध्यसामानाधिकरण्य कहाता है। अब नवीनों के लक्षण का अर्थ यह हुवा कि “हेतु के साथ समानाधिकरणस्थ अत्यन्ताऽभाव के अप्रतियोगी साध्य के साथ हेतु की समानाधिकरणता = अन्वयव्याप्ति है”। अर्थात् जो साध्य के हेतु के अधिकरणस्थ अत्यन्ताऽभाव का प्रतियोगी नहीं, उस के साथ हेतु की एकाधिकरणता वा समानाधिकरणता होना = हेतु में साध्य की व्याप्ति = अन्वयव्याप्ति कहाती है । जैसे-पर्वत अग्नि वाला है, धूम से, जैसा-रसोई घर । इस अनुमान में पर्वत तो पक्ष है, अग्नि वाला होना साध्य है, धूम हेतु है और रसोईघर दृष्टान्त है । हेतु के अधि- करण पर्वत वा रसोई घर आदि में अग्नि = साध्य के वर्त्तमान होने से अग्नि

६२ वैशेषिकदर्शन - भाषानुवाद का अत्यन्ताऽभाव नहीं हो सक्ता, किन्तु घट पटादि का अत्यन्ताऽभाव हो सक्ता है, और उस धूम हेतु के पर्वत अधिकरण में रहने से ( जिस में अग्नि भी रहता है ) हेतुसमानाधिकरण हुआ । उस अभाव के प्रतियोगी घट पटादि और अप्रतियोगी अग्नि (साध्य) के साथ धूम हेतु की समानाधिकरणता= एक पर्वत अधिकरण में वर्त्तमान होना।=ही अग्नि साध्य में, धूम हेतु की व्याप्ति= अन्वयव्याप्ति हुई । इस के विरुद्ध व्याप्ति व्यतिरेकव्याप्ति कहाती है ॥ १५ ॥ १३१-अप्रसिद्धोऽनपदेशः ॥ १५ ॥ ( अप्रसिद्धः ) जिस में व्याप्ति न पाई जावे, वह ( अनपदेशः ) अहेतु वा असद्धेतु वा हेत्वाभास भी कहाता है ॥ तौ क्या वैशेषिक में एक ही हेत्वाभास है ? नहीं, किन्तु- १३२-असन् संदिग्धश्चाऽनपदेशः ॥ १६ ॥ ( असन् ) असिद्ध ( च ) और ( संदिग्धः ) सन्देहयुक्त ( अनपदेशः ) हेत्वाभास होता है ॥ हेत्वाभास इस शास्त्र में दो प्रकार के हैं । एक-असत्=असिद्ध=विरुद्ध, दूसरा-संदिग्ध=इसी को अनैकान्तिक कहते हैं ॥ १६ ॥ जैसे- १३३-यस्माद्विषाणी तस्मादश्वः ॥ १७ ॥ ( यस्मात् ) क्योंकि ( विषाणी ) सींगों वाला है, ( तस्मात् ) इस कारण ( अश्वः ) घोड़ा है ॥ यह असिद्ध हेत्वाभास का उदाहरण है । क्योंकि जिस २ के सींग हों वह २ अश्व ( घोड़ा ) कभी नहीं होता ॥ १७ ॥ और- १३४-यस्माद्विषाणी तस्माद्गौरित्यनैकान्तिकस्योदाहरणम्॥१८॥ ( यस्मात् ) क्योंकि ( विषाणी ) सींग वाला है ( तस्मात् ) इस से ( गौः।) बैल है ( इति ) यह ( अनैकान्तिकस्य ) अनैकान्तिक हेतु का ( उदाहरणम् ) उदाहरण है ॥ केवल बैल के ही सींग नहीं देखे जाते किन्तु भैंसे बकरे आदि के भी देखे जाते हैं, इस लिये सींग वाला होना गौ बैल होने में हेतु तो है परन्तु असाधारण हेतु नहीं, क्योंकि गौ बैल के अतिरिक्त अन्य बकरी आदि में भी अतिव्याप्ति वाला है ॥ १८ ॥

तृतीयोऽध्याय १ आह्निक ६३

तृतीयोऽध्याय १ आह्निक ६३

१३५-आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षाद्यन्निष्पद्यते तदन्यत् ॥ १८ ॥ (आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षात्) आत्मा इन्द्रिय और अर्थ=विषयों के समीप होने से (यत्) जो (निष्पद्यते) सिद्ध होता है, (तत्) वह (अन्यत्) अन्य है ॥ जीवात्मा नित्य है, उस का गुण ज्ञान भी नित्य है, परन्तु इन्द्रियों और अर्थों के संयोग से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, वह जन्य है, नित्य नहीं, इस लिये आत्मा के स्वरूपगत ज्ञान से इन्द्रियद्वाराऽनुभूत ज्ञान पृथक् है । इस सूत्र पर यदि शङ्कराचार्यादि ने उपहास किया है तो वह उन्हीं के (ज्ञोऽत एव । वेदान्तद० २ । ३ । १८) सूत्रभाष्य का उपहासकारक है । जीवात्मा समस्त श्रुति स्मृति और दर्शन शास्त्रों ने चेतन और अनेक माने हैं । न केवल एक । इस विषय में पं० धारेश्वर जी के संग्रह को देखिये जिसे हम यहां उद्धृत करके पाठकों का उपकार होना समझते हैं । यथा- अणुरेव वै जीवोऽपरिसंख्येयश्च तद्भेदः । तदेतद् गम्यते- "वयं नमो अरन्त एमसि", "वयं स्याम पतयो रयीणाम्", "उद्वयं...अगन्म ज्योतिरुत्तमम्", "अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्", "यद्भद्रं तन्न आसुव", "स नः पितेव सूनवे...सचस्वा नः स्वस्तये", "वयः सुपर्णा उपसेदुरिन्द्रं प्रियमैधा ऋषयो नाथमानाः । अपध्वान्तमूर्- र्णुहि पूर्षि चक्षुर्मुमुग्धि अस्मान् निधयेव बद्धान् ॥", "तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि", "समानी व आकूतिः.... यथा वः सुसहासति", "असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृताः । तांस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्महनोजनाः" इत्यादिपरःसहस्रवेदमन्त्रगतजीवात्म- परकबहुवचनप्रयोगगतिमत्त्ववचनतः । एतेषु खलु जीवानां

६४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद

बहुत्वं गतिमत्त्वं च स्पष्टमुपदिष्टमनीशत्वं च ध्वनितमत्रे- वेति । अणुत्वं नाम सौक्ष्म्यममहत्त्वं परिच्छिन्नत्वमेकदेश- वृत्तित्वं जीवानां बहुत्वादवगम्यते गतिमत्त्वादपि । ये खलु जीवा बहवोऽपरिसंख्येया गतिमन्तश्च ते कथं न स्युः परिच्छिन्नैकदेशवृत्तयः ? तदिदमणुत्वं बहुत्वं गतिमत्त्वं च जीवग्रामस्य स्मृतमुपनिषत्स्वपि- " एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश । प्राणेचित्तं सर्व- मोतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥ ' बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च । भागो जीवः सविज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ", " नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तमा- त्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषा- म् ", " योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणु- मन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ", " नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं तद् भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ", " तस्माच्च देवा बहुधा संप्रसूताः साध्यामनुष्याः पशवो वयांसि ", तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ", "संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः। ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति", " ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम् । य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापि यन्ति ", " आराग्रमात्रोह्यवरो ऽपि दृष्टः ", " गुणान्वयो यः फलकर्मकर्त्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता । स विश्वरूपस्त्रिगुणस्त्रिवर्त्मा प्राणाधिपः

[शीर्षक]: तृतीयाऽध्याय १ आन्हिक ६५

सञ्चरति स्व कर्मभिः", "अङ्गुष्ठमात्रोरवितुल्यरूपः सङ्कल्पा- ऽहङ्कारसमन्वितोयः", "यो वा एतदक्षरं गार्गि अविदित्वा अस्मल्लोकात्प्रैति सकृपणः,अथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वा अस्मल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः", "यथापि हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति अनृ- तेन हि प्रत्यूढाः", "अथ य एष संप्रसादः अस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेण अभिनिष्पद्यते एष आत्मा इति ह उवाच एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्म इति", "तद् ये एव एतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येण अनुविन्दन्ति तेषामेव एष ब्रह्मलोकः तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति", "स यदा अस्मात् शरीरादुत्क्रामति सह एव एतैः सर्वैरुत्क्रामति", "स य एवंवित् अस्माल्लोकात्प्रेत्य... कामरूपी अनुसञ्चरन्", "तस्माल्लोकात्पुनरेति अस्मै लोकाय कर्मणे", "तेन प्रद्योतेन एष आत्मा निष्क्रामति चक्षुषो वा मूर्ध्नो वा अन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यः", "तमृचो मनुष्यलोकमपनयन्ते... सोन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते स सोमलोकं स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्त्तते... स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीव घनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते"। दर्शनेष्वपि पुरुष- बहुत्वं प्रतिपादितमस्ति, यथा "पुरुषबहुत्वं व्यवस्थातः", "नाद्वैतश्रुतिविरोधो जातिपरत्वात्" इति सांख्ये; "सुख- दुःखज्ञाननिष्पत्त्यविशेषादैकात्म्यम्", "व्यवस्थातो नाना" इति वैशेषिके; "कृतार्थं प्रति नष्टमपि अनष्टं तदन्यसाधा- ९

ऽव्यतिकरः ” इत्यादि वेदान्तदर्शनसूत्रेषु । प्रशस्तपादभाष्ये

६६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद

रणत्वात्” इति योगदर्शने; “तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरि- ष्वक्तः”, “ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ”, “ नाणुरतच्छ्रुतेरिति- चेन्नेतराधिकारात्”, “अंशो नानाव्यपदेशात्”, “असंततेश्चा- ऽव्यतिकरः ” इत्यादि वेदान्तदर्शनसूत्रेषु । प्रशस्तपादभाष्ये ऽपि च “आत्मत्वाभिसंबन्धादात्मा, तस्य सौक्ष्म्यादप्रत्यक्षत्वे सति करणैः शब्दाद्युपलब्ध्यनुमितैः श्रोत्रादिभिः समधिगमः क्रियते... तस्य गुणा बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माऽधर्म- संस्कारसंख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः ... व्यवस्था- वचनात्संख्यापृथक्त्वमप्यत एव । पृथिव्युदकज्वलनपव- नात्ममनसामनेकत्वाऽपरजातिमत्त्वे, बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेष- प्रयत्नानां द्वयोरात्ममनसोः संयोगादुपलब्धिः” इति । एवं श्रुतिस्मृतिशास्त्रप्रतिपादितमिदमाऽऽत्मबहुत्वं लोकव्यवहारे ऽपि प्रसिद्धम्” ॥ जीव अणु हैं और अनेक तथा असंख्येय हैं। इस विषय में “नमोभस्त एमसि० ” इत्यादि वेदवचन ऊपर संस्कृत में देखिये, जिन से जीवों का अणुत्व परिच्छिन्नत्व और एकदेशीयपना तथा बहुत होना पाया जाता है जो वस्तु संख्या में अनेक हों वे सर्वव्यापक नहीं हो सकते और जो जीव गमनशील हों अर्थात् एक देह से दूसरे देह में जावें, वे विभु नहीं हो सकते यह बात “एषोणुरात्मा०” इत्यादि सैकड़ों उपनिषद् वचनों में भी वर्णित है जिन में से कुछ एक ऊपर संस्कृत में लिखे हैं । अन्य दर्शनों में भी जीवात्मा का बहुत्व माना गया है जैसा कि सांख्यदर्शन में-“ पुरुषबहुत्वं व्यवस्थातः ६। ४५ । और-“ नाद्वैतश्रुतिविरोधो जातिपरत्वात् ” १ । १५४ इन सूत्रों में जीवों का बहुत्व और अद्वैत कहने वाली श्रुतियों का जातिपरक होना मानकर विरोधपरिहार किया गया है । इसी प्रकार योगदर्शन में भी जीवात्मा का अनेक होना और एकदेशीय होना कहा गया है । यथा - “कृता प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ” २ । २२ इत्यादि । इसी प्रकार

तृतीयाऽध्यायः १ आह्निकं ६३

तृतीयाऽध्यायः १ आह्निकं ६३ वेदान्तदर्शन में भी- "तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः ३ । १ । १ और- “उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम्” २ । ३ । १९ तथा-“नाणुरतच्छ्रुतेरिति चेन्नेतराधि- कारात् ” २ । ३ । २१ और भी-“ अंशोनानाव्यपदेशात् ” २ । ३ । ४३ तथा च-“ असन्ततेश्चाव्यतिकरः ” २ । ३ । ४९ इत्यादि सूत्रों में जीवों का भागना, दौड़ना जाना आना अणु होना और अणुत्वविरोधाभासप्रतिपादक वाक्यों- का दोषपरिहार और नानात्व तथा एकदेशीयत्व और अव्यापकत्व स्पष्ट प्रति- पादन किया है ॥ प्रशस्तपाद भाष्य में भी जो ऊपर संस्कृत में उद्धृत है, जीव का संख्या- युक्त होना, अलग २ होना, संयोग और विभाग करना कहा गया है । इस प्रकार वेद, उपनिषद्, सांख्य योग वेदान्त इत्यादि दर्शन, प्रशस्तपाद भाष्य और अनेक उपनिषद् जीवों को बहुत्व मानते हैं । इस पर कई लोग शङ्का करेंगे कि आप ने जीवों के बहुत्वप्रतिपादक वचन तौ इकट्ठे कर दिये परन्तु सैंकड़ों वचन जो वेद, उपनिषद् और शास्त्रों में आत्मा के एकत्व को प्रति- पादन करते हैं उन की क्या गति होगी ? यथा-यस्तु सर्वाणि० यस्मिन् सर्वाणि० योसावादित्ये पुरुषः० ईशोपनिषद् और-यदेवेह तदमुत्र० मनसैवेदमाप्तव्यम्० कठोपनिषद् इत्यादि अनेक उपनिषदों, वेदों और दर्शनसूत्रों में कहे गये हैं ? उत्तर-प्रत्येक वचन के यहां संग्रह करने और दोषपरिहार करने में तौ ग्रन्थ बहुत बढ़ जावेगा किन्तु यदि वाचकवृन्द विचार करेंगे तो सर्वत्र ही नीचे लिखे कारणों से संगति मिल जायगी और दोषपरिहार हो जायगा ॥ १-कहीं २ अपने समान सुख दुःख का अनुभव जानकर किसी पर भी अन्याय न करने के लिये आत्मा आत्मा की एकता कहते हुवे एकत्व का भ्रम होता है। कहीं २ जीवात्मा को परमात्मा से अनन्य भक्ति के समय तन्मयता का वर्णन करने को वचन हैं, जिन में जीव ब्रह्म की एकता भ्रान्ति से प्रतीत होती है । कहीं २ परमात्मा का एकत्व प्रतिपादित है जिसको भ्रम से कोई लोग जीवों का एकत्व समझ लेते हैं परन्तु वास्तव में भेदप्रतिपादक वाक्य स्पष्ट और यथार्थ हैं और समस्त व्यवहार उन्हीं से चलता है, इस के विरुद्ध एकत्वप्रति- पादक वाक्य लक्षण से व्याख्या करने योग्य हैं ॥ १९ ॥ १३६-प्रवृत्तिनिवृत्ती च प्रत्यगात्मनि दृष्टे परत्र लिङ्गम् ॥ २० ॥ ( प्रवृत्तिनिवृत्ती च ) प्रवृत्ति और निवृत्ति ( प्रत्यगात्मनि ) अपने अपने आत्मा में ( दृष्टे ) देखी जाती हैं (परत्र ) पराये में (लिङ्गम् ) वही लिङ्ग हैं ॥

६८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद जिस प्रकार रागोत्पन्न प्रयत्न=प्रवृत्ति और द्वेषोत्पन्न प्रयत्न=निवृत्ति अपने आत्मा में देखी जाती हैं इसी प्रकार हितकारक कामों में प्रवृत्ति और अहित कामों में निवृत्ति देखकर दूसरों के आत्मा का लिङ्ग से अनुमान करना चाहिये कि मेरे समान इन की भी प्रवृत्ति निवृत्ति आदि चेष्टायें हैं इसलिये अवश्य मेरे समान इन में भी एक पृथक् २ आत्मा है ॥ २० ॥ इस प्रकार आत्मा की सिद्धि के प्रकरण से आत्मा के लिङ्ग और अनात्मा के लिङ्ग तथा अपने आत्मा के समान पराये आत्माओं का होना इस आन्हिक में वर्णन किया गया ॥ इति तृतीयाध्याये प्रथममाह्निकम् अथ द्वितीयमाह्निकम् आत्मा की पहचान में जिस प्रकार प्रथमान्हिक में इन्द्रियार्थप्रसिद्धि को लिङ्ग कहा गया, इसी प्रकार इस द्वितीय आन्हिक में मन की गति को आत्मा का लिङ्ग बतायेंगे, इस लिये प्रथम मन की परीक्षा आरम्भ करते हैं और उद्देश के क्रम को छोड़कर भी आवश्यकतावश मन की परीक्षा करते हैं:- १३७-आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानस्य भावोऽभावश्च मनसो लिङ्गम् ॥ १ ॥ (आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे) आत्मा, इन्द्रियों और विषयों के सामीप्य में भी ( ज्ञानस्य ) ज्ञान का ( भावः ) होना ( च ) और ( अभावः ) न होना ( मनसः ) मन का ( लिङ्गम् ) लिङ्ग है ॥ देखा जाता है कि इन्द्रियों के समीप विषय हों तब भी उन का ज्ञान नहीं होता और होता भी है अर्थात् हमारी आंख के सामने से हाथी निकल जाता है और हमें ज्ञान नहीं होता । हमारे कानों को सुनाने के लिये कोई पुकार जाता है और हम नहीं सुनते, इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों के विषयों को भी हम ग्रहण नहीं करते, जब तक कि इन्द्रियों के अतिरिक्त मन भी उस विषय में न लगे । यों तो एक ही काल में हमारी त्वचा स्पर्श करती रहती है, नासिका के सामने गन्ध उपस्थित रहता है, आंखों के आगे कोई न कोई रूप रहता है परन्तु क्या हम पाञ्चों इन्द्रियों से पाञ्चों विषयों का ग्रहण एक

तृतीयाऽध्याय २ आह्निक ६९

तृतीयाऽध्याय २ आह्निक ६९ साथ कर सकते हैं ? कभी नहीं, किन्तु जिस विषय में इन्द्रिय और मन दोनों लगें, उसी विषय का ग्रहण होता है और जिस विषय में इन्द्रिय लगे, परन्तु मन न लगे, उस का ग्रहण नहीं होता । इस लिये मन का होना सिद्ध है जो एक साथ अनेक विषयों का ग्रहण नहीं होने देता । ऐसा ही न्यायदर्शन में लिखा है किः- युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम् १ । १ । १६ ॥ अर्थात् एक साथ अनेक ज्ञानों का उत्पन्न न होना मन का लिङ्ग है । इस प्रकार न्याय और वैशेषिक का मत समान है ॥ १ ॥ यदि कहो कि मन सिद्ध हुवा परन्तु मन का द्रव्य होना और नित्य होना कैसे सिद्ध होंगे ? तो उत्तर- १३८-तस्य द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ २ ॥ (तस्य) उस मन के (द्रव्यत्वनित्यत्वे) द्रव्यपना और नित्यपना (वायुना) वायु से (व्याख्याते) व्याख्यान किये ॥ जिस प्रकार वायु द्रव्य और नित्य है उसी प्रकार मन भी द्रव्य और नित्य है । द्रव्य के लक्षण में कह चुके हैं कि जो क्रियावाला और गुणवाला तथा समवायी कारण हो उस को द्रव्य कहते हैं, जैसे वायु गति क्रिया वाला है वैसे मन भी गति क्रिया वाला है, जैसे वायु स्पर्श गुण वाला है वैसे मन भी बोध गुण वाला है और जैसे वायु अपने कार्यों का समवायी कारण है वैसे मन भी अपने कार्यों का समवायी कारण है और जैसे वायु मोक्ष पर्यन्त स्थायी है वैसे मन भी मोक्ष पर्यन्त ठहरने वाला है । इस लिये वायु के द्रव्यत्व और नित्यत्व के समान मन का भी द्रव्यत्व और नित्यत्व कहा गया सम- झना चाहिये ॥ २ ॥ क्यों जी ? यह मन प्रत्येक शरीर में अनेक हैं वा एक ? उत्तरः- १३९-प्रयत्नायौगपद्याज्ज्ञानायौगपद्याच्चैकम् ॥ ३ ॥ (प्रयत्नायौगपद्यात्) प्रयत्न के एक साथ न होने से (च) और (ज्ञाना- यौगपद्यात्) ज्ञान के एक साथ न होने से (एकम्) एक है ॥ यदि मन अनेक होते तो एक साथ अनेक प्रयत्न हो सकते क्योंकि एक मन से एक प्रयत्न और दूसरे मन से दूसरा प्रयत्न हो सकता । इसी प्रकार एक

९७ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद मन से एक ज्ञान और दूसरे मन से दूसरा ज्ञान हो सकता, और होता है नहीं, इस लिये मन एक है ॥ ३ ॥ उद्देश क्रम को छोड़ कर आवश्यकता से मन की परीक्षा कही गई अब फिर उद्देश क्रमानुसार आत्मा की परीक्षा करते हुये उस के साधक लिङ्गों का वर्णन करते हैं:- १४०-प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि ॥ ४ ॥ ( प्राणापा-विकाराः ) प्राण, अपान, निमेष, उन्मेष, जीवन, मनो- गति और इन्द्रियान्तरविकार, तथा ( सुखदुः-प्रयत्नाः ) सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न ( आत्मनः ) आत्मा के ( लिङ्गानि ) लिङ्ग हैं ॥ मुख और नासिका से बाहर निकलने वाला, ऊपर को चलने वाला, शरीरस्थ वायु प्राण कहाता है; मूत्र और विष्ठा को नीचे निकालने वाला शरीरस्थ वायु अपान कहाता है; आंख की पलकों को मिलाना निमेष कहाता है, और आंख की पलकों को पृथक् करना उन्मेष कहाता है; शरीर की वृद्धि और घाव का भर आना आदिक जीवन कहाता है; अपने चाहे विषयों के ग्राहक इन्द्रियों से सम्बन्ध जोड़ने को उस २ विषय पर मन का लेजाना मनोगति कहाता है; एक इन्द्रिय से ग्रहण किये हुये विषय का दूसरे इन्द्रिय में विकार उत्पन्न होजाना-जैसे आंख से खटाई को देखकर जीभ में पानी भर आना इन्द्रियान्तरविकार कहाता है; किसी विषय का अनुकूल प्रतीत होना सुख कहाता है; किसी विषय का प्रतिकूल प्रतीत होना दुःख कहाता है; अपने लिये वा पराये लिये अप्राप्त वस्तु की प्रार्थना करना इच्छा कहाता है और जिस से अपने आत्मा में जलन सी प्रतीत हो उस अप्रियता के ज्ञान से उत्पन्न हुवा गुण द्वेष कहाता है; और कुछ करना प्रयत्न कहाता है । यह सब आत्मा के होने में लिङ्ग हैं अर्थात् जहां आत्मा होता है वहीं प्राणादि प्रयत्न पर्यन्त लिङ्ग पाये जाते हैं और जब आत्मा देह से निकल जाता है तब यह लिङ्ग नहीं पाये जाते । इस लिये यह आत्मा के लिङ्ग हैं । शरीर में प्राण और अपान दोनों रहते हैं जिन में से एक नीचे और दूसरा ऊपर जाने वाला है, इन दोनों परस्परविरोधियों को प्रयत्न से अपने अधिकार में रखना अर्थात् जब चाहे तब अपान को नीचे निकाले और

तृतीयाऽध्याय २ आन्हिक ९१ जब चाहे तब प्राण को ऊपर फेंके। यह सब चेष्टा बिना शरीराधिष्ठाता आत्मा के नहीं हो सक्तीं। इस लिये प्राण और अपान आत्मा के लिङ्ग हैं। इसी प्रकार आंख मीचना और खोलना एक दूसरे के विरोधी दो कर्म बिना किसी स्वतन्त्र प्रयत्न करने वाले के हो नहीं सक्ते, इसलिये निमेष और उन्मेष भी आत्मा के लिङ्ग हैं। तथा प्रतिक्षण शरीर का बढ़ना और चोट लगने पर घाव का फिर से भरना भी, जो जीवन है, बिना किसी अधिष्ठाता आत्मा के हो नहीं सक्ता, इसलिये जीवन आत्मा का लिङ्ग है। इसी प्रकार भिन्न २ विषयों की ग्रहण करने वाली इन्द्रियों को मन की सहायता से किसी एक विषय में लगाना और दूसरे विषय से हटाना भी आत्मा के बिना नहीं हो सक्ता, इसलिये मनोगति आत्मा का लिङ्ग है और नारङ्गी को आंख से देख कर उस के स्वाद को याद करना और फिर दूसरी इन्द्रिय रसना से विकार उत्पन्न करना आत्मा के बिना कैसे हो सकता है, इस लिये इन्द्रियान्तर विकार आत्मा का लिङ्ग हैं। जो गुण है वह किसी द्रव्य के आश्रय रहता है जैसा कि रूप तेज के आश्रय रहता है। इसी प्रकार सुख दुःख इच्छा द्वेष और प्रयत्न भी गुण हैं जो किसी द्रव्य के आश्रय रहने चाहियें और वह द्रव्य आत्मा ही हो सकता है, इस लिये सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न भी आत्मा के लिङ्ग हैं ॥ ४ ॥ क्यों जी ! प्राणापानादि लिङ्गों से आत्मा तो सिद्ध हुवा, परन्तु आत्मा का द्रव्यत्व और नित्यत्व कैसे सिद्ध हो ? उत्तर- १४१-तस्य द्रव्यत्वनित्यत्वे वायुना व्याख्याते ॥ ५ ॥ (तस्य) उस आत्मा के (द्रव्यत्वनित्यत्वे) द्रव्यत्व और नित्यत्व (वायुना) वायु से (व्याख्याते) कहे गये ॥ वायु के द्रव्यत्व और नित्यत्व के समान हेतु से आत्मा का भी द्रव्यत्व और नित्यत्व कहा गया समझना चाहिये अर्थात् जैसे वायु नित्य और द्रव्य है, वैसे ही आत्मा भी नित्य और द्रव्य है। इतना विशेष समझना चाहिये कि वायु के समान आत्मा व्यावहारिक नित्य नहीं किन्तु वास्तविक नित्य है और वायु व्यावहारिक नित्य है क्योंकि वायु सृष्टि के आरम्भ से प्रलय की अवधिपर्य्यन्त नित्य है, परन्तु आत्मा प्रलय में भी नष्ट नहीं होता, इस लिये वास्तविक नित्य है, यहां उस को वायु के समान नित्य कहना केवल नित्य शब्द की समानता को लेकर है ॥ ५ ॥

७२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद


प्रश्न- ज्ञानादि गुण तो अदृष्ट हैं ? किसी दृष्ट लिङ्ग से आत्मा सिद्ध कीजिये ? उत्तर- सुनियेः-

१४२-यज्ञदत्त इति सन्निकर्षे प्रत्यक्षाभावाद् दृष्टं लिङ्गं न विद्यते ॥ ६ ॥

( सन्निकर्षे ) समीप होने पर भी ( यज्ञदत्तः इति ) यज्ञदत्त है, ऐसा ( प्रत्यक्षाभावात् ) प्रत्यक्ष न होने से ( दृष्टम् ) दृष्ट ( लिङ्गम् ) लिङ्ग ( न ) नहीं ( विद्यते ) होता है ॥

भाव यह है कि संसार में सामने खड़े हुये देवदत्त यज्ञदत्तादि को देख कर भी केवल शरीर का प्रत्यक्ष होता है, न कि इस बात का कि यह देवदत्त है वा यज्ञदत्त है। तब फिर आत्मा के सिद्ध करने में यदि दृष्ट लिङ्ग न हो तो क्या हानि वा आश्चर्य है ? ॥ ३ ॥

तब फिर आत्मा कैसा है ? उस को कैसे जानें ? सुनियेः-

१४३-सामान्यतोदृष्टाच्चाविशेषः ॥ ७ ॥

( सामान्यतोदृष्टात् ) सामान्यतोदृष्ट से ( च ) और [ ज्ञानादि गुणों से ] ( अविशेषः ) विशेष नहीं कह सकते ॥

अर्थात् जो ज्ञानादि गुण चतुर्थ सूत्र में कहे गये हैं उन्हीं से समझलो कि इन गुणों का आश्रय कोई द्रव्य है, विशेष कुछ नहीं कह सकते ॥ ७ ॥

तो फिर उस का नाम आत्मा है, यह कैसे जानें ? उत्तरः-

१४४-तस्मादागमिकः ॥ ८ ॥

( तस्मात् ) इस कारण ( आगमिकः ) शास्त्रसिद्ध है ॥

अर्थात् जब सामान्यतोदृष्ट ज्ञानादि गुणों का आश्रय द्रव्य विशेष कोई न कोई है और वह क्या है अर्थात् उसका नाम क्या है यह बात शास्त्र में देखकर इतनी ही निश्चित होती है कि उस का नाम आत्मा है। जैसा कि “आत्मैवाभूद्विजानतः” यजुः ४०।७। “आत्मानं चेद्विजानीयात्” बृहदारण्यक ४।४।१२ इत्यादि शास्त्र में उस का नाम आत्मा पाया जाता है ॥ ८ ॥

प्रश्न- पृथिव्यादि आठ द्रव्यों में से ही किसी को आत्मा क्यों न मान लिया जाय ? उत्तर-

१४५-अहमिति शब्दस्य व्यतिरेकान्नागमिकम् ॥ ९ ॥