१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
उपदेश ४ मन्त्र ३९ १४६ प्राणियों को अभयदान प्रदान किया गया है, मुझमें ही सबकी प्रवृत्ति होती है।) जल का आचमन करके पूर्व दिशा की ओर पूरी अञ्जलि भरकर जल डालकर 'ॐ स्वाहा' कहकर शेष बचे हुए शिखा के बालों को उखाड़ डाले। इसके पश्चात् अगले मन्त्र "यह यज्ञोपवीत परम पवित्र है। यह पूर्वकाल में प्रजापति भगवान् ब्रह्मा जी के साथ ही प्रादुर्भूत हुआ है। यह सर्वश्रेष्ठ एवं आयुष्य की वृद्धि करने वाला है। यज्ञोपवीत को बाहर न रखना चाहिए। हे यज्ञमय सूत्र ! आप मेरे अन्तः में प्रविष्ट होकर आत्मा के साथ निरन्तर एकाकार होकर रहें। आप परम पवित्र हैं। मुझे सुयश, बल, ज्ञान, वैराग्य एवं धारण शक्ति प्रदान करें।" (यह मन्त्र पढ़कर) यज्ञोपवीत को तोड़ डाले और जलाञ्जलि के साथ उसे हाथ में लेकर 'ॐ भूः समुद्रं गच्छ स्वाहा' - इस मन्त्र के द्वारा जल में हवन (विसर्जन) कर दे। तदनन्तर 'ॐ भूः संन्यस्तं मया' 'ॐ भुवः संन्यस्तं मया'' ॐ सुवः संन्यस्तं मया' -इस प्रकार तीन बार इस मन्त्र को पढ़कर तीन बार जल को अभिमन्त्रित करके उसका आचमन करे। इसके बाद 'ॐ भूः स्वाहा' कहता हुआ वस्त्र एवं कटि सूत्र को भी जल में समर्पित कर दे। तत्पश्चात् इस बात को याद करते हुए कि मैं समस्त कर्मों का त्यागी हूँ, दिगम्बर (वस्त्र रहित) होकर अपने आत्म-स्वरूप का चिन्तन करते हुए ऊपर की ओर बाँह उठाये हुए उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान कर जाए ॥ ३७॥ पूर्ववद्विद्वात्सन्न्यासी चेद्गुरोः सकाशात्प्रणवमहावाक्योपदेशं प्राप्य यथासुखं विहरन्मत्तः कश्चिन्नान्यो व्यतिरिक्त इति फलपत्रोदकाहारः पर्वतवनदेवतालयेषु संचरेत्संन्यस्याथ दिगम्बरः सकलसञ्चारकः सर्वदानन्दस्वानुभवैकपूर्णहृदयः कर्मातिदूरलाभः प्राणायामपरायणः फलर- सत्वक्पत्रमूलोदकैर्मोक्षार्थी गिरिकन्दरेषु विसृजेद्देहं स्मरंस्तारकम्॥ ३८ ॥ यदि पूर्व की भाँति विद्वान्-संन्यासी हो, तो वह गुरु से ॐकार एवं महावाक्यों का उपदेश ग्रहण करके, मेरे से भिन्न और दूसरा कोई नहीं है, इस निश्चय दृष्टिकोण के साथ आनन्दपूर्वक भ्रमण करता रहे। पत्र, पुष्प, फल एवं जल का ही आहार ग्रहण करे। पर्वत, वन एवं देवालयों में ही विचरण करता हुआ निवास करे। संन्यास के पश्चात् यदि वह दिगम्बर (वस्त्र रहित) हो गया हो, तो वह अपने हृदय कमल में स्थित सदैव आनन्द-स्वरूप आत्मा की ही अनुभूति को भरकर, कर्मों के द्वारा अत्यधिक दूर रहने में ही लाभ मानता हुआ, प्राणायाम का अभ्यास करता हुआ (फल-फूलों के) रस, छिलके, पत्ते, मूल (जड़) तथा जल के माध्यम से प्राण तत्त्व को धारण करे एवं मात्र मोक्ष की ही इच्छा रखकर पर्वत की गुफाओं में रहकर तारक मन्त्र (अथवा परब्रह्म) का सतत जप एवं चिन्तन करते हुए अपने शरीर का परित्याग कर दे ॥ ३८ ॥ विविदिषासंन्यासी चेच्छतपथं गत्वाचार्यादिभिर्विप्रैस्तिष्ठ तिष्ठ महाभाग दण्डं वस्त्रं कमण्डलुं गृहाण प्रणवमहावाक्यग्रहणार्थं गुरुनिकटमागच्छेत्याचार्यैर्दण्डकटिसूत्रकौपीनं शाटीमेकां कमण्डलुं पादादिमस्तकप्रमाणमव्रणं समं सौम्यमकालपृष्ठं सलक्षणं वैणवं दण्डमेकमाचमनपूर्वकं सखा मा गोपायौजः सखायोऽसीन्द्रस्य वज्रोऽसि वार्त्रघ्नः शर्म मे भव यत्पापं तन्निवारयेति दण्डं परिगृह्येजज्जजीवनं जीवनाधारभूतं माते मा मन्त्रयस्व सर्वदा सर्वसौम्येति प्रणवपूर्वकं कमण्डलुं परिगृह्य कौपीनाधारं कटिसूत्रमोमिति गुह्याच्छादकं कौपीनमोमिति शीतवातोष्णत्राणकरं देहैकरक्षणमोमिति कटिसूत्रकौपीनवस्त्रमाचमनपूर्वकं योगपट्टाभिषिक्तो भूत्वा कृतार्थोऽहमिति मत्वा स्वाश्रमाचारपरो भवेदित्युपनिषत् ॥ ३९ ॥ 'यदि ज्ञान को प्राप्त करने की आकांक्षा से परिव्राजक (संन्यास) धर्म का वरण किया हो, तो वह सौ कदम आगे की ओर चलने के पश्चात् आचार्य आदि गुरुजनों-ब्राह्मणों के द्वारा यों कहकर बुलाये जाने पर कि
१४७ नारदपरिव्राजकोपनिषद् 'हे महाभाग! रुको, रुको; यह ब्रह्मदण्ड, वस्त्र एवं कमण्डलु धारण करो। तुम्हें ॐकार एवं महावाक्य का उपदेश स्वीकार (ग्रहण) करने के लिए गुरु के समीप आ जाना चाहिए। गुरु के समीप आ जाने के पश्चात् गुरुजनों एवं आचार्यों द्वारा प्रदान किये जाने पर ही दण्ड, कटिसूत्र, कौपीन, एक शाटी (चादर) तथा एक कमण्डलु अपने पास धारण करे। दण्ड बाँस का ही हो। उसकी ऊँचाई पैरों से लेकर सिर तक ही होनी चाहिए। वह खरोंच अथवा छेद से रहित, बराबर, चिकना तथा श्रेष्ठ लक्षणों से सम्पन्न हो। उस दण्ड का रंग काला न हो। इन सभी वस्तुओं को ग्रहण करने से पूर्व आचमन आदि कृत्य पूर्ण कर ले, तत्पश्चात् निर्धारित मन्त्र- 'सखा मा गोपायौजः ...............तन्त्रिवाय।' (अर्थात्-'हे दण्ड ! आप मेरे सखा अर्थात् प्राण शक्ति की रक्षा करें। आप ही मेरे सखा हैं, जो इन्द्र के हाथ में वज्र के रूप में रहते हैं। आपने ही वज्ररूप से आहत करके वृत्रासुर का विनाश किया है। आप हमारे लिए कल्याण रूप बनें। हमारे अन्दर जो भी पाप हों, उनका शमन करें)' का उच्चारण करके दण्ड को हाथ में धारण करे, तदनन्तर 'जगज्जीवनं ............सर्वसौम्य' मन्त्र के साथ ॐकार का उच्चारण करते हुए कमण्डलु को धारण करे। तदुपरान्त 'कौपीनाधारं कटिसूत्रमोम्' ऐसा कहकर कटिसूत्र धारण करे। 'गुह्याच्छादकं कौपीनमोम्', यह कहकर कौपीन (लँगोटी) धारण करे और 'शीतवातोष्ण त्राणकरं देहैक रक्षणमोम्' इस मन्त्र का उच्चारण करने के पश्चात् ही वस्त्र धारण करे। इसके बाद पुनः आचमन करके योगपट्टाभिषिक्त हो 'मैं कृतार्थ हो गया,' ऐसा मानता हुआ अपने आश्रम के उचित सदाचार के पालन में संलग्न हो जाए। ऐसी ही है यह उपनिषद् ॥ ३९ ॥ ॥ पञ्चमोपदेशः ॥ अथ हैन पितामहं नारदः पप्रच्छ भगवन्सर्वकर्मनिवर्तकः संन्यास इति त्वयैवोक्तः पुनः स्वाश्रमाचारपरो भवेदित्युच्यते। ततः पितामह उवाच। शरीरस्य देहिनो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति- तुरीयावस्थाः सन्ति। तदधीनाः कर्मज्ञानवैराग्यप्रवर्तकाः पुरुषा जन्तवस्तदनुकूलाचाराः सन्ति। तथैव चेद्भगवन्संन्यासाः कतिभेदास्तदनुष्ठानभेदाः कीदृशास्तत्त्वतोऽस्माकं वक्तुमर्हसीति। तथेत्यङ्गीकृत्य तं पितामहेन ॥ १ ॥ (संन्यास एवं संन्यासी के प्रकार और संन्यास धर्म तथा उसके पालन का महत्त्व) इसके पश्चात् भगवान् ब्रह्माजी से देवर्षि नारद ने पूछा- 'हे भगवन् ! आप ने ही कहा है कि संन्यास आश्रम समस्त कर्मों का निवृत्तिकारक है; पुनः यह भी कहते हैं कि संन्यासी अपने आश्रमोचित आचार-विचार के पालन में संलग्न हो जाएँ। इस विषय में समाधान करने की कृपा करें। तदनन्तर ब्रह्मा जी ने कहा-'हे नारद ! शरीर में प्रतिष्ठित देहधारी प्राणी की जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय-ये चार अवस्थाएँ होती हैं। इन्हीं अवस्थाओं के अधीन रहकर पुरुष कर्म, ज्ञान तथा वैराग्य के प्रवर्तक होते हैं। सभी प्राणी इन्हीं चारों अवस्थाओं के अधीन रहकर जब-जब जिस अवस्था में स्थित होते हैं, उसी के अनुकूल रहते हुए आचरण करते हैं। संन्यासी, ब्रह्मचारी, गृहस्थ तथा वानप्रस्थ के द्वारा आवश्यक रूप से सेवनीय तथा श्रौत-स्मार्त कर्मों का ही संन्यासी अपने आश्रमोचित सदाचार के पालन में संलग्न हो जाए। ऐसा सुनकर नारद जी ने कहा-'हे भगवन् ! आप अब कृपा करके यथार्थ रूप से संन्यास के कितने प्रकार हैं तथा उनके अनुष्ठान में क्या अन्तर है, बतलाएँ ? ॥ १ ॥ संन्यासभेदैराचारभेदः कथमिति चेत्तत्त्वतस्त्वेक एव संन्यासः अज्ञानेनाशक्तिवशात्क- र्मलोपतश्च त्रैविध्यमेत्य वैराग्यसंन्यासो ज्ञानसंन्यासो ज्ञानवैराग्यसंन्यासः कर्मसंन्यासश्चेति
उपदेश ५ मन्त्र १० १४८ चातुर्विध्यमुपागतः ॥ २ ॥ तद्यथेति दुष्टमदनाभावाच्चेति विषयवैतृष्ण्यमेत्य प्राक्पुण्यकर्मव- शात्संन्यस्तः स वैराग्यसंन्यासी ॥ ३ ॥ शास्त्रज्ञानात्पाप पुण्येल्लोकानुभवश्रवणात्प्रपञ्चोपरतः क्रोधेष्र्यासूयाहङ्काराभिमानात्मकसर्वसंसारं निर्वृत्य दारेषणाधनेषणालोकेषणात्मकदेहवासनां शास्त्रवासनां लोकवासनां त्यक्त्वा वमनान्नमिव प्रकृतीयं सर्वमिदं हेयं मत्वा साधनचतुष्टयसंपन्नो यः संन्यस्यति स एव ज्ञानसंन्यासी ॥ ४ ॥ क्रमेण सर्वमभ्यस्य सर्वमनुभूय ज्ञानवैराग्याभ्यां स्वरूपानुसंधानेन देहमात्रावशिष्टः संन्यस्य जातरूपधरो भवति स ज्ञानवैराग्यसंन्यासी ॥ ५ ॥ ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भूत्वा वानप्रस्थाश्रममेत्य वैराग्यभावेऽप्याश्रमक्रमानुसारेण यः संन्यस्यति स कर्मसंन्यासी ॥ ६ ॥ ब्रह्मचर्येण संन्यस्य संन्यासाज्जातरूपधरो वैराग्यसंन्यासी । विद्वत्संन्यासी ज्ञानसंन्यासी विविदिषासंन्यासी कर्मसंन्यासी ॥ ७॥ ब्रह्माजी ने कहा- 'हे नारद ! संन्यास के भेद से आचरण के भेद में क्या अन्तर पड़ता है, यह मैं तुम्हें बतलाता हूँ; श्रवण करो। वास्तव में संन्यास एक ही प्रकार का है; किन्तु ज्ञानरहित होने के कारण, असमर्थतावश तथा कर्मलोप के कारण तीन भेदों में बँटकर वैराग्य-संन्यास, ज्ञान-संन्यास, ज्ञान-वैराग्य-संन्यास तथा कर्म- संन्यास' इन चार भेदों को प्राप्त होता है। जो मन में दूषित भावनाओं का अभाव होने पर विषय वासनाओं में आसक्त न होकर पूर्व जन्म के पुण्य कर्म के प्रभाव से संन्यास ग्रहण कर लेता है, वह वैराग्य संन्यासी कहलाता है। जो मनुष्य शास्त्रों की जानकारी प्राप्त करने से तथा पापरूप और पुण्यरूप लोकों का अनुभव तथा श्रवण करने के कारण प्रपञ्चादि से स्वभावतः विरक्त हो गया है; क्रोध, ईर्ष्या, असूया (दृष्टिदोष), अहंकार तथा अभिमान ही जिसके प्रत्यक्ष स्वरूप हैं, ऐसे इस सम्पूर्ण जगत् को अपने मन से रहित करके, स्त्री कामना, धन कामना तथा लोक में प्रसिद्धि की कामना आदि त्रिविध रूपों वाली दैहिक-वासना, शास्त्र-वासना एवं लोक- वासना का परित्याग कर देता है और जैसे सामान्यजन वमन किए हुए भोजन को त्याज्य समझते हैं, वैसे ही इन सभी तरह के भोगों को त्याज्य मानते हुए जो व्यक्ति साधन-चतुष्टय से युक्त हो, वही संन्यास ग्रहण करता है, वही ज्ञान संन्यासी कहलाने का अधिकारी होता है। जो मनुष्य क्रमानुसार (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आदि का) अभ्यास करता हुआ, सभी कुछ अनुभव में लाकर के ज्ञान तथा वैराग्य के द्वारा निरन्तर अपने ही स्वरूप- मात्र का ध्यान करता हुआ जातरूपधर (बालकवत् निश्छल) हो जाता है, वही ज्ञान-वैराग्य-संन्यासी कहलाता है। जो ब्रह्मचर्य धर्म को पूर्ण करके गृहस्थ होकर एवं गृहस्थ से वानप्रस्थ-धर्म में प्रविष्ट हो करके पूर्ण वैराग्य न होने पर भी आश्रम-क्रमानुसार सबसे बाद में जो संन्यास ग्रहण करता है, वही कर्म-संन्यासी है अथवा ब्रह्मचर्य के पश्चात् ही संन्यास ग्रहण कर संन्यास-धर्म से जो जातरूपधर हो जाता है, वही वैराग्य संन्यासी कहलाता है। विद्वान् संन्यासी ही ज्ञान संन्यासी है और विविदिषा संन्यासी ही कर्म संन्यासी बतलाया गया है॥ कर्मसंन्यासोऽपि द्विविधः निमित्तसंन्यासोऽनिमित्तसंन्यासश्चेति । निमित्तस्त्वातुरः । अनिमित्तः क्रमसंन्यासः । आतुरः सर्वकर्मलोपः प्राणस्योत्क्रमणकालसंन्यासः सनिमित्त- संन्यासः । दृढाङ्गो भूत्वा सर्वं कृतकं नश्वरमिति देहादिकं सर्वं हेयं प्राप्य ॥ ८-९॥ हंसः शुचिषद्द्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदुतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ १० ॥ “कर्म संन्यास के भी दो भेद होते हैं-प्रथम निमित्त संन्यास तथा द्वितीय अनिमित्त संन्यास। आतुर- संन्यास ही निमित्त संन्यास कहा जाता है तथा क्रम-संन्यास को अनिमित्त संन्यास कहते हैं। रोगादि के कारण
१४९ नारदपरिव्राजकोपनिषद् जिसमें समस्त कर्म लुप्त हो जाते हैं, अर्थात् जिसमें नित्य-नैमित्तिक आदि कोई भी कर्म निर्मित नहीं हो सकते एवं जो प्राण के परित्याग करने के समय ग्रहण किया जाता है, ऐसा वह संन्यास ही निमित्त संन्यास कहा गया है, इसे ही आतुर-संन्यास भी कहते हैं। शरीर के बलवान् होने पर जो विचार द्वारा यह दृढ़-निश्चय करके कि प्रादुर्भूत होने वाली सम्पूर्ण वस्तुएँ नाशवान् हैं और इसी तरह से शरीर को भी त्याज्य मान लेता है "वह परमात्मा आकाश में विचरण करने वाला हंस (सूर्य) है, वही अन्तरिक्ष में स्वेच्छापूर्वक विचरण करने वाला वसु है। वही होता तथा यज्ञ-वेदी पर प्रतिष्ठित रहने वाला अग्नि रूप है। सद्गृहस्थों के भवनों में आतिथ्यरूप में आश्रय प्राप्त करने वाला भी वही है। पुरुषों में उसकी ही सत्ता सर्वश्रेष्ठ है। अत्यधिक श्रेष्ठ एवं अनुपम वस्तुओं में उसका ही अस्तित्व है। शाश्वत सत्य में उसी का निवास है। आकाश में वही सत्य रूप है! वही जल से प्रादुर्भूत होता है। वही गौ अर्थात् पृथ्वी एवं वाणी से उत्पन्न होने वाला है। सत्य से भी उसी का प्राकट्य होता है। वही पर्वतों से उत्पन्न होकर इन सभी से भिन्न एवं अति विलक्षण एक मात्र महान् सत्य है" ॥ ८-१०॥ ब्रह्मव्यतिरिक्तं सर्वं नश्वरमिति निश्चित्याथो क्रमेण यः संन्यस्यति स संन्यासोऽनिमित्त- संन्यासः ॥ ११ ॥ संन्यासः षड्विधो भवति । कुटीचको बहूदको हंसः परमहंसः तुरीयातीतोऽ- वधूतश्चेति ॥ १२ ॥ कुटीचकः शिखायज्ञोपवीती दण्डकमण्डलुधरः कौपीनकन्थाधरः पितृमातृगुर्वाराधनपरः पिठरखनित्रशिक्यादिमन्त्रसाधनपर एकत्रान्नादनपरः श्वेतोर्ध्वपुण्ड्रधारी त्रिदण्डः । बहूदकः शिखादिकन्थाधरस्त्रिपुण्ड्रधारी कुटीचकवत्सर्वसमो मधुकरवृत्त्याष्टक- वलाशी ॥ १३ ॥ हंसो जटाधारी त्रिपुण्ड्रोर्ध्वपुण्ड्रधारी असंक्लृप्तमाधूकरान्नाशी कौपीनखण्ड- तुण्डधारी ॥ १४॥ परमहंसः शिखायज्ञोपवीतरहितः पञ्चगृहेष्वेकरात्रान्नादनपरः करपात्री एककौपीनधारी शाटीमेकामेकं वैणवं दण्डमेकशाटीधरो वा भस्मोद्धूलनपरः सर्वत्यागी ॥१५॥ (इस प्रकार उपर्युक्त मन्त्र के भावार्थानुसार) जो केवल परब्रह्म परमात्मा को ही सत्य-स्वरूप जानता है तथा ब्रह्म से अलग और सभी कुछ नाशवान् है, ऐसा दृढ़-निश्चय करता हुआ क्रमशः संन्यास-आश्रम में प्रविष्ट होता है। उसका यही संन्यास अनिमित्त संन्यास कहलाता है। संन्यासी के छह भेद इस प्रकार कहे गये हैं-१ कुटीचक, २. बहूदक, ३. हंस, ४. परमहंस, ५. तुरीयातीत, तथा ६. अवधूत। कुटीचक संन्यासी शिखा एवं सूत्र (यज्ञोपवीत) से सम्पन्न होता है। वह दण्ड, कमण्डलु, कौपीन एवं कन्था (कथरी) को धारण करता है। माता, पिता तथा गुरु की सेवा में निरन्तर लगा रहता है। पात्र, खनती (मिट्टी खोदने वाला) तथा झोली आदि को सतत अपने साथ रखता है और मन्त्रादि की साधना में सदैव तत्परतापूर्वक लगा रहता है। एक ही स्थान पर भोजन करता है, श्वेत ऊर्ध्वपुण्ड्र (ऊर्ध्वमुख तिलक) धारण करता तथा त्रिदण्ड को भी धारण किये रहता है। बहूदक भी कुटीचक की तरह से शिखा (चोटी) यज्ञोपवीत, दण्ड, कमण्डलु, कौपीन (लंगोटी) और कन्था (कथरी) को धारण करता है। मस्तक में त्रिपुण्ड्र धारण किये रहता है। सभी के प्रति समान भाव रखने वाला होता है और मधुकरी वृत्ति से विभिन्न गृहों से अन्न प्राप्त करके मात्र आठ ग्रास भोजन ही ग्रहण करता है। हंस नाम वाला संन्यासी जटा-जूट धारण करने वाला होता है, त्रिपुण्ड्र एवं ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करता है, अनिश्चित गृहों से मधुकरी (भिक्षा) लाकर भोजन करने वाला तथा कौपीन खण्ड एवं तुम्बी धारण करने वाला होता है। परमहंस नामक संन्यासी शिखा और यज्ञोपवीत को धारण नहीं करता है। यह संन्यासी पाँच घरों से अन्न (भोजन) प्राप्त करके केवल एक रात ही भोजन करता है अर्थात् दूसरे दिन दूसरे अन्य पाँच घरों से अन्न प्राप्त करता है। एक कौपीन, एक ओढ़ने का वस्त्र तथा एक बाँस का दण्ड अपने पास में रखता है। यह संन्यासी या
उपदेश ५ मन्त्र २० १५० तो एक चादर अपने शरीर में सदैव ओढ़कर रहता है अथवा सम्पूर्ण अंगों में भस्म धारण किये रहता है, परमहंस सर्वत्यागी होता है ॥ ११-१५ ॥ तुरीयातीतो गोमुखः फलाहारी। अन्नाहारी चेद्गृहत्रये देहमात्रावशिष्टो दिगम्बरः कुणपवच्छरीरवृत्तिकः॥ १६॥ अवधूतस्त्वनियमोऽभिशस्तपतितवर्जनपूर्वकं सर्ववर्णेष्व- जगरवृत्त्याहारपरः स्वरूपानुसंधानपरः ॥ १७ ॥ तुरीयातीत संन्यासी गौ के सदृश ईश्वरेच्छा से जो कुछ भी प्राप्त हो जाए, उसी में निर्वाह कर लेता है। यह संन्यासी कभी किसी से कुछ नहीं माँगता। यह प्रायः फलाहारी ही होता है और यदि अन्नाहार करता है, तो केवल तीन घरों से ही अन्न लेता है। शरीर के अतिरिक्त उसके पास और कुछ भी नहीं होता। वह दिगम्बर (नग्न) रहते हुए अपनी इन्द्रियों को मृतकों की भाँति चेष्टारहित बना लेता है। अवधूत नामक संन्यासी किसी भी तरह के बन्धन को नहीं मानता। कलंक युक्त और पथ-भ्रष्ट मनुष्यों को त्यागकर बिना-किसी वर्ण-भेद के अजगर वृत्ति से अन्न प्राप्त करते हुए अपने आत्मा के स्वरूप के चिन्तन में सतत संलग्न रहता है ॥ १६-१७ ॥ आतुरो जीवति चेत्क्रमसंन्यासः कर्तव्यः ॥ १८॥ आतुर मनुष्य संन्यास स्वीकार करने के बाद जीवित रहे, तो उसे क्रम-संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए ॥ कुटीचकबहूदकहंसानां ब्रह्मचर्याश्रमादितुरीयाश्रमवत् कुटीचकादीनां संन्यासविधिः ॥ १९ ॥ कुटीचक, बहूदक तथा हंस नामक इन तीन तरह के संन्यासियों को ब्रह्मचर्य, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ के क्रमानुसार ही चतुर्थ आश्रम अर्थात् संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होने का नियम है ॥ १९ ॥ परमहंसादित्रयाणां न कटिसूत्रं न कौपीनं न वस्त्रं न कमण्डलुर्न दण्डः। सार्ववर्णिकभैक्षा- टनपरत्वं जातरूपधरत्वं विधिः । संन्यासकालेऽप्यलं बुद्धिपर्यन्तमधीत्य तदनन्तरं कटिसूत्रं कौपीनं दण्डं वस्त्रं कमण्डलुं सर्वमप्सु विसृज्याथ जातरूपधरश्चरेन्न कन्थावेशो नाध्येतव्यो न वक्तव्यो न श्रोतव्यमन्यत्किंचित्प्रणवादन्यं न तर्कं पठेन्न शब्दमपि बृहच्छब्दान्नाध्यापयेन्न महद्वाचो विग्लापनं गिरा पाण्यादिना संभाषणं नान्यस्माद्वा विशेषेण न शूद्रस्त्रीपतितोदक्या संभाषणं न यतेर्देवपूजा नोत्सवदर्शनं तीर्थयात्रावृत्तिः ॥ २० ॥ परमहंस, तुरीयातीत एवं अवधूत संन्यासियों के लिए कटिसूत्र, कौपीन दण्ड, कमण्डलु एवं वस्त्रादि धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। वे जातरूपधर रहकर समस्त वर्ण-जाति के घरों से भिक्षा याचना के लिए स्वतन्त्र हैं। संन्यास धर्म स्वीकार करने के समय 'मैंने जितना भी कुछ अध्ययन किया है, वह अपने आप में पर्याप्त है' इस तरह का दृढ़-निश्चय जब तक न हो जाए, तब तक अध्ययन करते रहना चाहिए। तत्पश्चात् कौपीन, कटिसूत्र आदि को जल में विसर्जित कर देना चाहिए। यदि वह दिगम्बर (वस्त्र से रहित) हो, तो फिर वह कन्था (कथरी) आदि अपने पास न रखे, पठन-पाठन न करे, प्रवचन, कथा-स्तुति आदि श्रवण न करे तथा उसे व्याख्यान आदि भी नहीं देना चाहिए। तर्कशास्त्र एवं शब्दशास्त्र आदि कुछ भी पढ़ने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। उसे मात्र प्रणव रूपी ॐकार का ही जप करना चाहिए। वाणी का व्यर्थ में अपव्यय करना वर्जित है। संकेत मात्र से बात करना भी निषिद्ध है। वह शूद्र, पदच्युत एवं स्त्री से बात बिल्कुल न करे। रजस्वला स्त्री से तो भूलकर भी बात न करे। विशेष उत्सव समारोह-पूजा आदि देखना, तीर्थ यात्रा करना या देवताओं का पूजन-अर्चन आदि भी यति के लिए आवश्यक नहीं है ॥ २० ॥
१५१ नारदपारिव्राजकोपनिषद् पुनर्यतिविशेषः। कुटीचकस्यैकत्र भिक्षा बहूदकस्यासंकॢप्तं माधूकरं हंसस्याष्टगृहेष्वष्टक- वलं परमहंसस्य पञ्चगृहेषु करपात्रं फलाहारो गोमुखं तुरीयातीतस्यावधूतस्याजगरवृत्तिः सार्ववर्णिकेषु यतिर्नैकरात्रं वसेन्न कस्यापि नमेत्तुरीयातीतावधूतयोर्न ज्येष्ठो यो न स्वरूपज्ञः। स ज्येष्ठोऽपि कनिष्ठो हस्ताभ्यां नद्युत्तरणं न कुर्यान्न वृक्षमारोहेन्न यानादिरूढो न क्रयविक्रयपरो न किंचिद्विनिमयपरो न दाम्भिको नानृतवादी न यतेः किंचित्कर्तव्यमस्त्यस्ति चेत्सांकर्यम्। तस्मान्मननादौ संन्यासिनामधिकारः॥ २१॥ अब संन्यासियों के फिर से कुछ विशेष नियमोपनियम वर्णित किये जाते हैं। कुटीचक संन्यासी के लिए एक ही स्थान विशेष पर भिक्षा स्वीकार करने की विधि है। बहूदक संन्यासी के लिए निश्चयरहित घरों से मधुकरी (भिक्षा) प्राप्त करने का नियम है। हंस संन्यासी के लिए आठ गृहों से मात्र आठ ग्रास अन्न लेकर भोजन ग्रहण करने का विधान है। परमहंस के लिए पाँच गृहों से अन्न (भोजन) प्राप्त करने का विधान है। हाथ ही उसका पात्र है, इस कारण उसे 'करपात्री' भी कहते हैं। तुरीयातीत के लिए गोमुख-वृत्ति से फलाहार का ही विधान है। यानी जिस प्रकार गाय को जो कुछ भी भोजन कराया जाय, वह मुँह खोलकर ग्रहण कर लेती है, उसी प्रकार दैव इच्छा से जो भी कुछ फल-फूल प्राप्त हो जाए, उसे ही ले लेना चाहिए। अवधूत संन्यासी के लिए समस्त वर्ण-जाति के लोगों के यहाँ से अजगर-वृत्ति के अनुसार अन्न-प्राप्त करने का विधान है। यति (संन्यासी) किसी गृहस्थ के घर एक रात्रि भी निवास न करे। किसी को भी नमन-वंदन न करे। तुरीयातीत एवं अवधूत इन दोनों संन्यासियों में अवस्थानुसार न कोई बड़ा होता है और न ही कोई छोटा होता है। जिसे अपने स्वरूप का ही बोध नहीं है, वह अवस्था में बड़ा होते हुए भी छोटा ही कहा जायेगा। संन्यासी को कभी भी तैरकर नदी पार नहीं करनी चाहिए। वृक्षों पर भी नहीं चढ़ना चाहिए। सवारी पर न चले। क्रय-विक्रय आदि कुछ भी न करे। किसी भी वस्तु की अदला-बदली न करे। दम्भी (अहंकारी) एवं असत्यवादी कदापि न बने। यति के लिए कुछ भी करना कर्त्तव्य नहीं है। संन्यासियों का चिन्तन-मनन में ही समग्र रूप से पूर्ण अधिकार है॥ २१॥ आतुरकुटीचकयोर्भूर्लोकभुवर्लोकौ बहूदकस्य स्वर्गलोको हंसस्य तपोलोकः परमहंसस्य सत्यलोकस्तुरीयातीतावधूतयोः स्वात्मन्येव कैवल्यं स्वरूपानुसन्धानेन भ्रमरकीटन्यायवत् ॥२२ यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेव समाप्नोति नान्यथा श्रुतिशासनम्॥ २३॥ आतुर एवं कुटीचक नाम वाले संन्यासी पृथिवी लोक और भुवः लोक को प्राप्त करते हैं। बहूदक संन्यासी स्वर्ग को अर्थात् स्वः लोक को तथा हंस-संन्यासी को तपोलोक की प्राप्ति होती है। परमहंस संन्यासी को सत्यलोक की प्राप्ति होती है। तुरीयातीत एवं अवधूत संन्यासी अपनी अन्तरात्मा में एकमात्र कैवल्य प्राप्ति का ही अधिकारी होता है। वह भ्रमर का ध्यान करने वाले कृमि-कीटकों के सदृश सतत अपने स्वरूप का अनुसंधान करते रहने के कारण आत्मस्वरूप ही हो जाता है। व्यक्ति मृत्यु के समय जिस-जिस भाव का ध्यान करते हुए अपने शरीर का परित्याग करना है, वह उसी-उसी भाव को प्राप्त करता है, यह बात व्यर्थ नहीं है, यह श्रुति-सम्मत उपदेश है॥ २२-२३॥ तदेवं ज्ञात्वा स्वरूपानुसंधानं विनान्यथाचारपरो न भवेत्तदाचारवशात्तत्तल्लोकप्राप्तिर्ज्ञा- नवैराग्यसंपन्नस्य स्वस्मिन्नेव मुक्तिरिति न सर्वत्राचारप्रसक्तिस्तदाचारः। जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति- ष्वेकशरीरस्य जाग्रत्काले विश्वः स्वप्नकाले तैजसः सुषुप्तिकाले प्राज्ञः अवस्थाभेदादवस्थेश्वरभेदः
उपदेश ५ मन्त्र २६ १५२ कार्यभेदात्कारणभेदस्तासु चतुर्दशकरणानां बाह्यवृत्तयोऽन्तर्वृत्तयस्तेषामुपादानकारणम्। वृत्तयश्चत्वारः मनोबुद्धिरहंकारश्चित्तं चेति । तत्तद्वृत्तिव्यापारभेदेन पृथगाचारभेदः ॥ २४॥ अतः इस तरह से समझकर संन्यासी को चाहिए कि वह अपने आत्मस्वरूप के चिन्तन के अतिरिक्त और किसी भी आचार में संलग्न न रहे। अलग-अलग आचारों का अनुष्ठान संकल्प लेने से तदनुकूल लोकों की प्राप्ति होती है; किन्तु ज्ञान-वैराग्य से युक्त संन्यासी की अपने आप में अर्थात् स्वयं में ही मुक्ति प्राप्त होती है। अन्य और किसी भी आचार में आसक्त न होना ही उसका अपना विशिष्ट आचार है। जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति इन तीनों स्थितियों में वह एक रूप होता है। जाग्रत् अवस्था में वही विश्वरूप, स्वप्नावस्था में तैजस-सम्पन्न तथा सुषुप्ति अवस्था में प्राज्ञ-स्वरूप कहलाता है। काल-भेद से उन-उन अवस्थाओं के स्वामी में भेद होता है, कार्यभेद से ही कारण भेद की जानकारी प्राप्त होती है। जाग्रदादि अवस्थाओं में चौदह करणों (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय तथा चार अन्तःकरण) की जो बाह्य वृत्तियाँ हैं, उनका उपादान कारण एक ही है अन्तः की वृत्तियाँ। अन्तः की चार वृत्तियाँ-मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार बतलायी गई हैं। उन-उन वृत्तियों के व्यापार- भेद से अलग-अलग आचरण भेद होते हैं॥ २४॥ नेत्रस्थं जागरितं विद्यात्कण्ठे स्वप्नं समाविशेत् । सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्ध्नि संस्थितम् ॥ २५ ॥ तुरीयमक्षरमिति ज्ञात्वा जागरिते सुषुप्त्यवस्थापन्न इव यद्यच्छ्रुतं यद्यद्दृष्टं तत्तत्सर्वमविज्ञातमिव यो वसेत्तस्य स्वप्नावस्थायामपि तादृगवस्था भवति । स जीवन्मुक्त इति वदन्ति । सर्वश्रुत्यर्थप्रति- पादनमपि तस्यैव मुक्तिरिति । भिक्षुर्नैहिकामुष्मिकापेक्षः । यद्यपेक्षास्ति तदनुरूपो भवति । स्वरूप- पानुसन्धानव्यतिरिक्तान्यशास्त्राभ्यासैरुष्ट्रकुङ्कुमभारवद्व्यर्थो न योगशास्त्रप्रवृत्तिर्न सांख्यशा- स्त्राभ्यासो न मन्त्रतन्त्रव्यापारः । इतरशास्त्रप्रवृत्तिर्यतेरस्ति चेच्छ्रवालांकारवच्चर्मकारवदतिविदूर- कर्माचारविद्यादूरो न प्रणवकीर्तनपरो यद्यत्कर्म करोति तत्तत्फलमनुभवति । एरण्डतैलफेनवदतः सर्वं परित्यज्य तत्प्रसक्तं मनोदण्डं करपात्रं दिगम्बरं दृष्ट्वा परिव्रजेद्भिक्षुः । बालोन्मत्तपिशाच- वन्मरणं जीवितं वा न काङ्क्षेत कालमेव प्रतीक्षेत निर्देशभृतकन्यायेन परिव्राडिति ॥ २६ ॥ जाग्रत् अवस्था तथा उसके नियन्ता विश्व की स्थिति नेत्र के अन्दर निहित है। स्वप्न एवं उसके अधिष्ठाता तैजस का कण्ठ में निवास है। सुषुप्ति तथा उसके स्वामी प्राज्ञ की स्थिति हृदय क्षेत्र में है और तुरीय तथा उसके स्वामी परमेश्वर का निवास ब्रह्मरन्ध्र (सिर) में कहा गया है। जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं का वर्णन करते हुए तुरीयरूप में जिसकी स्थिति कही गई है, वह तुरीय स्वरूप अविनाशी परमात्मतत्त्व मैं ही हूँ, ऐसा जानकर जो जाग्रत् अवस्था में ही सुषुप्त की स्थिति में रहता है; जो-जो सुनी तथा जो-जो दृष्टिपात की हुई वस्तुएँ हैं, वे सब मानों अपरिचित सी हैं। इस तरह से उनकी ओर चिन्तन न करते हुए, जो स्थित रहता है, उसकी स्वप्नावस्था में भी वैसी ही स्थिति बनी रहती है अर्थात् वह स्वप्न में उपलब्ध पदार्थों को भी स्वीकार नहीं करता है। इस तरह का पुरुष जीवन्मुक्त है, ऐसा विद्वज्जन कहते हैं। समस्त श्रुतियों का मन्तव्य भी यही है कि उसी की मुक्ति होती है। भिक्षु इस लोक एवं परलोक के विषयों की भी आकांक्षा नहीं रखता है; किन्तु यदि उसकी उसके प्रति आकांक्षा हो, तो वह तदनुरूप ही हो जायेगा। अपने स्वरूप के अनुसंधान को त्यागकर दूसरे शास्त्रों का अभ्यास उसके लिए उसी तरह से बेकार है, जिस तरह से ऊँट की पीठ पर लदा हुआ केसर का भार। उस यति की योगशास्त्र में रुचि नहीं रहनी चाहिए। उसको सांख्य-शास्त्र का अभ्यास एवं मन्त्र-तन्त्र का व्यापार भी उचित नहीं है। यदि संन्यासी की रुचि अन्यान्य-शास्त्रों में होती है, तो वह सभी कुछ उसके लिए
१५३ नारदपरिव्राजकोपनिषद् मृतक को धारण कराये हुए आभूषणों के सदृश हैं। चर्मकार की तरह से सभी से अत्यधिक दूर रहकर कर्म- आचरण एवं विद्या से भी दूर रहना चाहिए। ॐकार का भी ऊँचे स्वर से कीर्तन नहीं करना चाहिए; क्योंकि व्यक्ति जो-जो कार्य करता है, उन-उन सबका फल भी उसे भुगतना पड़ता है। इस कारण सभी को अंडी (एरण्ड) के तेल के फेन की तरह से साररहित जानकर छोड़ देना चाहिए और परमात्मा के ध्यान में रत रहकर मनोमय दण्ड तथा हाथ रूपी पात्रों को ग्रहण करने वाले दिगम्बर (वस्त्ररहित) संन्यासी का दर्शन करके उसके आदर्श को अपने समक्ष रखकर संन्यासी सर्वत्र भ्रमण करे। वह बालक, मतवाला तथा पिशाचों की तरह से जीवन अथवा मृत्यु की इच्छा न करे। आज्ञापालक भृत्य (नौकर) की तरह से परिव्राजक को मात्र काल की ही प्रतीक्षा करते रहना चाहिए अर्थात् समय के अनुसार चलना चाहिए ॥ २५-२६॥ तितिक्षाज्ञानवैराग्यशमादिगुणवर्जितः। भिक्षामात्रेण जीवी स्यात्स यतिर्यतिवृत्तिहा ॥२७॥ न दण्डधारणेन न मुण्डनेन न वेषेण न दम्भाचारेण मुक्तिः ।॥ २८॥ ज्ञानदण्डो धृतो येन एकदण्डी स उच्यते। काष्ठदण्डो धृतो येन सर्वाशी ज्ञानवर्जितः। स याति नरकान्घोरान्महारौर- वसंज्ञितान् ॥ २९॥ प्रतिष्ठा सूकरीविष्ठासमा गीता महर्षिभिः । तस्मादेनां परित्यज्य कीटवत्पर्यटेद्यतिः ॥ ३० ॥ अयाचितं यथालाभं भोजनाच्छादनं भवेत् । परेच्छया च दिग्वासाः स्नानं कुर्यात्परेच्छया ॥ ३१ ॥ स्वप्नेऽपि यो हि युक्तः स्याज्जाग्रतीव विशेषतः। ईदृक्चेष्टः स्मृतः श्रेष्ठो वरिष्ठो ब्रह्मवादिनाम् ॥ ३२ ॥ अलाभे न विषादी स्याल्लाभे चैव न हर्षयेत्। प्राणयात्रिकमात्रः स्यान्मात्रासङ्गविवर्जितः ॥ ३३॥ अभिपूजितलाभांश्च जुगुप्सेतैव सर्वशः। अभिपूजितलाभैस्तु यतिर्मुक्तोऽपि बध्यते ॥ ३४॥ जो संन्यासी सहनशील, ज्ञान, वैराग्य तथा शम-दम आदि श्रेष्ठ गुणों से रहित रहते हुए भिक्षा मात्र से ही जीवनयापन करता है, वह संन्यासी संन्यासवृत्ति का हनन करने वाला कहा गया है। केवल दण्ड ग्रहण करने, सिर मुँड़ाने, विभिन्न तरह के वेश बनाने तथा प्रदर्शनात्मक दृष्टि से किसी भी तरह के आचरण करने से मुक्ति नहीं मिलती। जिस यति ने ज्ञान-स्वरूप दण्ड को ग्रहण किया है, वही एकदण्डी होता है। जिस संन्यासी ने लकड़ी का दण्ड तो धारण कर लिया है; लेकिन मन में सभी तरह की इच्छाओं को स्थान दे रखा है और जो सर्वथा ज्ञान से रहित है, वह संन्यासी महारौरव आदि नाम वाले भयानक नरक को प्राप्त होता है। महान् ऋषि- मनीषियों ने प्रतिष्ठा को शूक़री के मल (विष्ठा) के सदृश बतलाया है। इस कारण से संन्यासी प्रतिष्ठा को छोड़कर कृमि-कीटकों की तरह से यत्र-तत्र भ्रमण करता रहे। दिगम्बर (वस्त्र रहित) संन्यासी बिना याचना के जो कुछ प्राप्त हो जाए, वही भोजन करे तथा वैसे ही वस्त्रादि से अपने तन को ढककर रहे। वह अन्य दूसरों के कहने से वस्त्रों को धारण करे तथा दूसरों की ही इच्छा से स्नानादि सम्पन्न करे। जो संन्यासी स्वप्नावस्था में भी जाग्रदवस्था के सदृश ही विशेष रूप से सतर्क होकर के वैसी ही चेष्टा निरन्तर करता है, वही ब्रह्मवादियों में श्रेष्ठ माना गया है। भिक्षा आदि न प्राप्त होने पर विषाद नहीं करना चाहिए तथा भिक्षा के प्राप्त हो जाने पर अत्यधिक हर्षान्वित न हो जाए। भिक्षा उतनी ही स्वीकार करे, जितने से प्राणों की रक्षा हो सके। रूप, रस और शब्दादि विषयों की आसक्ति से सदैव दूर रहे। सम्मान मिलने को वह सभी तरह से घृणा की दृष्टि से ही देखे। सम्मान का लाभ प्राप्त करने वाला संन्यासी मुक्ति प्राप्त करने पर भी आबद्ध हो जाता है॥ २७-३४॥ [ऋषि ने आन्तरिक स्तर पर वैराग्य भाव न होने पर भी संन्यासी जैसा वेश बनाने की प्रवृत्ति को नर्क का मार्ग कहा है। दण्ड आत्मानुशासन का प्रतीक है। यदि वह न हो, तो उसे धारण करना व्यर्थ है। प्रतिष्ठा-सम्मान प्राप्त करने की
उपदेश ५ मन्त्र ४६ १५४ इच्छा को लोकैषणा कहा जाता है। कामासक्ति और अर्थासक्ति से छुटकारा पा लेने पर भी यथाशक्ति पीछा, नहीं छोड़ती। सम्मान की आकांक्षा के कारण सम्मान-सुविधा देने वालों के प्रति भी आसक्ति होने लगती है। आसक्ति ही बन्धन है, जो मुक्ति में बाधक है।] प्राणयात्रानिमित्तं च व्यङ्गारे भुक्तवज्जने। काले प्रशस्ते वर्णानां भिक्षार्थं पर्यटेद्गृहान् ॥ ३५ ॥ पाणिपात्रश्चरन्योगी नासकृद्भैक्षमाचरेत्। तिष्ठन्भुञ्ज्याच्चरन्भुञ्ज्यान्मध्येनाचमनं तथा ॥ ३६॥ अब्धिवद्भूतमर्यादा भवन्ति विशदाशयाः। नियतिं न विमुञ्चन्ति महान्तो भास्करा इव ॥ ३७॥ आस्येन तु यदाहारं गोवन्मृगयते मुनिः। तदा समः स्यात्सर्वेषु सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ ३८ ॥ अनिन्द्यं वै व्रजेद्गेहं निन्द्यं गेहं तु वर्जयेत्। अनावृते विशेद्द्वारि गेहे नैवावृते व्रजेत् ॥ ३९ ॥ पांसुना च प्रतिच्छन्नशून्यागारप्रतिश्रयः। वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः ॥४०॥ जब चूल्हे की अग्नि बुझ जाए अर्थात् भोजन बनकर तैयार हो जाए और घर के सभी सदस्य भोजन प्राप्त कर लें, तब ऐसे ही उपयुक्त समय में संन्यासी श्रेष्ठ वर्ण वाले गृहस्वामियों के घर भिक्षार्थ गमन करे। भिक्षा का उद्देश्य केवल प्राण यात्रा का निर्वाह ही होना चाहिए। हाथों को ही पात्र रूप निर्मित करके भ्रमण करने वाला करपात्री संन्यासी बार-बार भिक्षा की याचना न करे। एक ही बार में जो कुछ प्राप्त हो जाए, उसे खड़े-खड़े ही ग्रहण कर ले या फिर चलते-चलते ही भोजन ग्रहण कर ले। हाथ का भोजन जब तक पूर्ण न हो जाए, बीच में जल कदापि ग्रहण न करे। संन्यासी को समुद्र के सदृश मर्यादित होकर के रहना चाहिए। उन श्रेष्ठ महाभाग का आशय महान् होता है। वे महान् रहकर सूर्य के सदृश अपने नियमों का उल्लंघन कभी नहीं करते। जिस समय संन्यासी मुनि गौ की तरह मुख से भोजन स्वीकार करने लगता है अर्थात् यदि कोई भी व्यक्ति उस यति के मुख में कुछ डाल दे, तब ही वह भोजन ग्रहण करता है। उस समय समस्त प्राणि-समुदाय के प्रति उसका समान भाव हो जाता है तथा वह अमृतत्व अर्थात् मुक्ति का अधिकारी हो जाता है। जो घर निन्दनीय न हो, वहीं भिक्षा ग्रहण हेतु जाये। निन्दित गृहों का परित्याग कर दे। जिस भवन का दरवाजा खुला हो, उसी में प्रवेश करे। जिसका दरवाजा बन्द हो, उस घर में उसे नहीं जाना चाहिए। धूल आदि से आच्छादित निर्जन भवनों में उसे आश्रय प्राप्त करना चाहिए। सभी प्रकार प्रिय एवं अप्रिय का परित्याग कर देना चाहिए॥ ३५-४०॥ यत्रास्तमितशायी स्यान्निरग्निरनिकेतनः। यथालब्धोपजीवी स्यान्मुनिर्दान्तो जितेन्द्रियः ॥ ४१ ॥ निष्क्रम्य वनमास्थाय ज्ञानयज्ञो जितेन्द्रियः। कालकाङ्क्षी चरन्नेव ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ४२ ॥ अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा चरति यो मुनिः। न तस्य सर्वभूतेभ्यो भयमुत्पद्यते क्वचित् ॥ ४३ ॥ निर्मानश्चानहंकारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः। नैव क्रुध्यति न द्वेष्टि नानृतं भाषते गिरा ॥ ४४ ॥ पुण्यायतनचारी च भूतानामविहिंसकः। काले प्राप्ते भवेद्भैक्षं कल्पते ब्रह्मभूयसे ॥ ४५ ॥ वानप्रस्थगृहस्थाभ्यां न संसृज्येत कर्हिचित्। अज्ञातचर्यां लिप्सेत न चैनं हर्ष आविशेत्। अध्वा सूर्येण निर्दिष्टः कीटवद्विचरेन्महीम् ॥ ४६ ॥ जहाँ सूर्यास्त हो जाए, संन्यासी को वहीं पर शयन करना चाहिए। अपने पास न तो कोई अग्नि ही रखे तथा न ही अपना कोई घर ही निर्माण करे। ईश्वरेच्छा से जो भी कुछ मिल जाए, उसी पर आश्रित होकर जीवन- यापन करे। मन तथा इन्द्रियों को सदैव अपने अंकुश में रखे। जो 'यति' अपने घर का परित्याग करके, वन का आश्रय प्राप्त करता है, अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हुए ज्ञान-यज्ञ का अनुष्ठान सम्पन्न करता है तथा काल की प्रतीक्षा करता हुआ निरन्तर विचरण करता है, ऐसा वह संन्यासी निश्चय ही ब्रह्म भाव को प्राप्त करने का
१५५ नारदपरिव्राजकोपनिषद् अधिकारी होता है। जो परिव्राजक समस्त प्राणियों को अभयदान करके विचरण करता है, उसे भी किसी प्राणी से कहीं पर भी भय नहीं होता; जो मान और अहंकार का परित्याग करके द्वन्द्व जनित विकार से रहित हो जाता है; उसके मन के सभी संशय मिट जाते हैं; वह न तो किसी प्राणी पर क्रोध करता है, न किसी से ईर्ष्या-द्वेष आदि रखता है तथा न वाणी से कभी मिथ्यावादन ही करता है। जो पुण्य स्थलों में सतत विचरण करता रहता है, किसी भी भूत (प्राणी) की हिंसा नहीं करता तथा समय मिलने पर भिक्षा-मात्र से ही अपना जीवन-निर्वाह पूर्ण करता है; ऐसा यति ब्रह्म के भाव को प्राप्त करने में समर्थ होता है। उसे वानप्रस्थ तथा गृहस्थों से कभी भी संसर्ग नहीं रखना चाहिए। वह इस बात का ध्यान रखे कि उसकी जीवनचर्या अन्य दूसरों पर परिलक्षित न हो। संन्यासी में कभी भी प्रसन्नता का आवेश नहीं होना चाहिए। जिस प्रकार कृमि-कीटक सतत विचरण करते रहते हैं, उसी प्रकार संन्यासी भी सूर्य के द्वारा दिखलाए हुए मार्ग से पृथिवी पर विचरण करे अर्थात् रात्रि में विचरण न करे॥ ४१-४६॥ आशीर्युक्तानि कर्माणि हिंसायक्तानि यानि च। लोकसंग्रहयुक्तानि नैव कुर्यान्न कारयेत् ॥४७॥ नासच्छास्त्रेषु सज्जेत नोपजीवेत जीविकाम्। अतिवादांस्त्यजेत्तर्कान्नपक्षं कंचन नाश्रयेत् ॥ ४८ ॥ न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान्नैवाभ्यसेद्बहून्। न व्याख्यामुपयुञ्जीत नारम्भानारभेत्क्वचित् ॥ ४९ ॥ अव्यक्तलिङ्गोऽव्यक्तार्थो मुनिरुन्मत्तबालवत्। कविर्मूकवदात्मानं तद्दृष्ट्या दर्शयेन्नृणाम् ॥५०॥ न कुर्यान्न वदेत्किंचिन्न ध्यायेत्साध्वसाधु वा। आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः ॥५१॥ एकश्चरेन्महीमेतां निःसङ्गः संयतेन्द्रियः। आत्मक्रीड आत्मरतिरात्मवान्समदर्शनः ॥५२॥ बुधो बालकवत्क्रीडेत्कुशलो जडवच्चरेत्। वदेदुन्मत्तवद्विद्वान् गोचर्यां नैगमश्चरेत् ॥ ५३ ॥ क्षिप्तोऽवमानितोऽसद्भिः प्रलब्धोऽसूयितोऽपि वा। ताडितः संनिरुद्धो वा वृत्त्या वा परितापितः ॥ विष्ठितो मूत्रितो वाऽज्ञैर्बहुधैवं प्रकल्पितः। श्रेयस्कामः कृच्छ्रगत आत्मनात्मानमुद्धरेत् ॥ ५५ ॥ संमाननं परां हानिं योगर्द्धेः कुरुते यतः। जनेनावमतो योगी योगसिद्धिं च विन्दति ॥ ५६ ॥ तथा चरेत वै योगी सतां धर्ममदूषयन्। जना यथावमन्येरन्नाच्छेयुर्नैव सङ्गतिम् ॥ ५७ ॥ जरायुजाण्डजादीनां वाङ्मनःकायकर्मभिः। युक्तः कुर्वीत न द्रोहं सर्वसङ्गांश्च वर्जयेत् ॥ ५८ ॥ कामक्रोधौ तथा दर्पलोभमोहादयश्च ये। तांस्तु दोषान्परित्यज्य परिव्राड् भयवर्जितः ॥ ५९॥ 'कामनाओं, हिंसा एवं लोक संग्रह से संयुक्त जो-जो भी कर्म हैं, उन समस्त कर्मों को परिव्राजक न तो खुद करें और न ही दूसरे अन्य लोगों से ही कराये। असत् शास्त्रों के प्रति कभी भी आसक्त न हो। वह किसी भी तरह का जीविका-उपार्जन का साधनभूत कर्म सम्पन्न करके जीवनयापन कदापि न करे। अनावश्यक बात कभी न करे तथा तर्क-वितर्क आदि भी करना त्याग दे। वादी एवं प्रतिवादी में से किसी का भी पक्ष ग्रहण न करे। शिष्यों का भी संग्रह नहीं करना चाहिए। विभिन्न तरह के अधिकाधिक ग्रंथों का अध्ययन न करे तथा अपने पक्ष की सफलता के लिए अपने मन की व्याख्या का प्रयोग न करे। भिन्न-भिन्न आयोजनों-उत्सवों आदि के द्वारा अपनी ख्याति न फैलाए। अपने आश्रमादि का कोई चिह्न विशेष न लगाए। दूसरे लोगों के समक्ष पागल अथवा बालकों के सदृश अज्ञानी बना रहे। ज्ञानवान् होकर के भी गूँगे की भाँति मौन धारण किये रहे। दूसरे अन्य लोग जिस प्रकार का भाव रखें, उनके सामने वैसा ही अपना स्वरूप बनाकर रहे। अच्छे-बुरे विचारों को अपने मन में न आने दे। मूक होकर विचरण करे तथा किसी भी तरह का कोई कर्म न करे। अपनी आत्मा में ही सदैव रमण करता रहे। सर्वत्र जड़वत् शान्त होकर रहे। अपनी इन्द्रियों को संयमित रखे। वासना का
उपदेश ५ मन्त्र ६६ १५६ परित्याग कर दे तथा भूमि पर अकेला ही भ्रमण करे। किसी को अपना साथी-सहचर आदि न बनाये। सभी को सम्यक् दृष्टि से देखे। बालक की तरह चेष्टा करे। समस्त कार्यों में पारंगत होते हुए भी अज्ञानियों की तरह रहे। वेदों का पूर्ण ज्ञान होने पर भी गौ की तरह से (सहज) रहे। सदैव उन्मत्तों की तरह से बात करे। दुष्टजनों के द्वारा किये गये अपमान, झूठे आरोप, लांछन आदि को शान्त मन से सहन कर ले। यदि वे दुष्टजन प्रताड़ित करते हैं, बाँधकर के रखते हैं या क्रियाकलाप में व्यवधान उत्पन्न करते हैं, तब भी विचलित न होकर शान्त ही बने रहना चाहिए। अज्ञानी लोग यदि शरीर के ऊपर थूक दें, मल-मूत्र त्याग करें अथवा अन्य किसी भी तरह का कष्ट दें, तो उसे भी सहन कर लेना चाहिए। संकट के उत्पन्न होने पर अपना ही उद्धार करने का सदैव प्रयत्न करना चाहिए। दूसरे अन्य लोगों के द्वारा प्राप्त हुआ आदर-सम्मान तप के उपार्जन में हानि प्रदान करने वाला है; किन्तु अपमानित हुआ परिव्राजक बहुत शीघ्र ही अपने लक्ष्य (योगसिद्धि) को प्राप्त कर लेता है। श्रेष्ठयोगी परिव्राजक श्रेष्ठ जनों के धर्म को कलङ्कित न करते हुए दृढ़-निश्चय होकर ऐसा आचरण करे, जिससे कि सामान्य जन उसका अपमान ही करें तथा उसके सम्पर्क में न आयें। परिव्राजक योगारूढ़ हो मन, वचन, कर्म एवं शरीर द्वारा जरायुज तथा अण्डज आदि किसी भी प्राणी के साथ द्रोह न करे एवं सभी तरह की आसक्तियों का परित्याग कर दे। काम, क्रोध, मद, लोभ तथा मोह आदि जितने भी प्रकार के दोष हैं, उनका त्याग करके परिव्राजक भयरहित हो जाता है ॥ ४७-५९ ॥ भैक्षाशनं च मौनित्वं तपो ध्यानं विशेषतः। सम्यग्ज्ञानं च वैराग्यं धर्मोऽयं भिक्षुके मतः ॥ ६० ॥ काषायवासाः सततं. ध्यानयोगपरायणः । ग्रामान्ते वृक्षमूले वा वसेद्देवालयेऽपि वा । भैक्षेण वर्तयेन्नित्यं नैकान्नाशी भवेत्क्वचित् ॥ ६१ ॥ चित्तशुद्धिर्भवेद्यावत्तावन्नित्यं चरेत्सुधीः । ततः प्रव्रज्य शुद्धात्मा संचरेद्यत्र कुत्रचित् ॥ ६२ ॥ बहिरन्तश्च सर्वत्र संपश्यन्हि जनार्दनम्। सर्वत्र विचरेन्मौनी वायुवद्धीतकल्मषः ॥ ६३ ॥ समदुःखसुखः क्षान्तो हस्तप्राप्तं च भक्षयेत् । निर्वैरेण समं पश्यन्द्विजगोऽश्वमृगादिषु ॥ ६४ ॥ भावयन्मनसा विष्णुं परमात्मानमीश्वरम्। चिन्मयं परमानन्दं ब्रह्मैवाहमिति स्मरन् ॥ ६५ ॥ ज्ञात्वैवं मनोदण्डं धृत्वा आशानिवृत्तो भूत्वा आशाम्बरधरो भूत्वा सर्वदा मनोवाक्कायकर्मभिः सर्वसंसारमुत्सृज्य प्रपञ्चावाङ्मुखः स्वरूपानुसन्धानेन भ्रमरकीटन्यायेन मुक्तो भवतीत्युपनिषत् ॥ ६६ ॥ परिव्राजक का निश्चय किया हुआ धर्म-भिक्षा की वृत्ति द्वारा अर्जित भोज्य-पदार्थ ग्रहण करना, मौन व्रत का अवलम्बन ग्रहण करना, तपस्या में निरन्तर लगे रहना, सद्ज्ञान के अनुसंधान में रत रहना तथा मन में सदैव विरक्ति भाव उत्पन्न होना है। गेरुआ वस्त्र धारण कर योगी निरन्तर ध्यान-योग में संलग्न रहे। गाँव के बाहर, वृक्ष की जड़ के समीप में या किसी देव मन्दिर में वास करे। नित्य वह भिक्षा द्वारा अर्जित भोज्य-सामग्री से ही अपना निर्वाह करे। किसी एक ही सद्गृहस्थ के घर का अन्न-भोज्य पदार्थ तो उसे कभी नहीं ग्रहण करना चाहिए। श्रेष्ठ ज्ञानी मनुष्य को प्रतिदिन अपने आश्रमानुसार श्रेष्ठ आचरण का पालन करना चाहिए तथा यह श्रेष्ठ आचरण तब तक करता रहे, जब-तक कि अन्तःकरण पूरी तरह से पवित्र न हो जाए। अन्तःकरण के शुद्ध हो जाने पर वह योगी संन्यास-धर्म ग्रहण कर यत्र-तत्र इच्छानुसार भ्रमण करे। संन्यासी बाह्य-जगत् एवं अन्तर्जगत् सभी जगह एकमात्र श्रीमन्नारायण का ही दर्शन करते हुए वायु की तरह से पाप-सम्पर्क से अलग होकर मौन रहते हुए सर्वत्र विचरण करे। उसे सुख-दुःख में समान रूप से रहना चाहिए। अपने मन में सदैव क्षमा-भाव बनाये रखे। हाथ पर जो भी कुछ भोज्य-पदार्थ आ जाए, उसे ही ग्रहण कर लेना चाहिए। कहीं पर
१५७ नारदपरिव्राजकोपनिषद् भी किसी से बैर न रखते हुए ब्राह्मण, गौ, अश्व एवं मृग आदि समस्त जीवों में समान दृष्टि रखे। मन ही मन सभी परमपिता सर्वव्यापी परमात्मस्वरूप का ही ध्यान करते हुए मैं ही 'परमानन्द स्वरूप परब्रह्म हूँ' ऐसी भावना करनी चाहिए। 'यति' परिव्राजक इस तरह से समझकर मनोमय ज्ञानरूपी दण्ड धारण करके समस्त आशाओं से मुक्त हो जाता है तथा वस्त्र रहित होकर सदैव मन, वचन, कर्म एवं शरीर के द्वारा सम्पूर्ण जगत् का परित्याग करके, मायाजनित प्रपञ्चों की ओर से मुख मोड़कर भ्रमर कीटक न्याय के अनुसार (ब्रह्म में निमग्न) रहकर मुक्ति प्राप्त करता है। ऐसा ही यह उपनिषद् है ॥ ६०-६६ ॥ [ 'भ्रमरकीटक-न्याय' का उल्लेख ध्यान-धारणा के क्रम में बहुधा आता है। भृंगी नामक कीट किसी कीट को पकड़कर अपने बिल में ले जाता है। वहाँ वह उसे भ्रमर गुंजार से इतना प्रभावित कर लेता है कि वह कीट भी भृंगी बन जाता है। यति को सतत ब्रह्म चिन्तन में लीन रहकर स्वयं को ब्रह्मरूप अनुभव करना चाहिए। यह इस उक्ति का भाव है।] ॥ षष्ठोपदेशः ॥ (तुरीयातीत पद एवं उसकी प्राप्ति के उपाय तथा परिव्राजक की जीवनचर्या) अथ नारदः पितामहमुवाच । भगवन् तदभ्यासवशात् भ्रमरकीटन्यायवत्तदभ्यासः कथमिति। तमाह पितामहः। सत्यवाग्ज्ञानवैराग्याभ्यां विशिष्टदेहावशिष्टो वसेत् ॥ १ ॥ तत्पश्चात् पितामह ब्रह्मा जी से देवर्षि नारद ने पूछा- "हे पितामह ! आपने यह कहा है कि भ्रमर-कीट- न्याय द्वारा अपने स्वरूप को जान लेने के पश्चात् मुक्ति को प्राप्त कर लेता है, परन्तु उस स्वरूप को जान लेने का अभ्यास कैसे किया जाये ?" ऐसा श्रवण कर पितामह ब्रह्माजी ने कहा- "हे नारद ! जीवन में सत्य को धारण करते हुए ज्ञान एवं वैराग्य के द्वारा इस शरीर की आसक्ति का परित्याग करे, शेष बचे हुए एक अतिश्रेष्ठ शरीर में प्रतिष्ठित होकर रहे ॥ १॥" ज्ञानं शरीरं वैराग्यं जीवनं विद्धि शान्तिदान्ती नेत्रे मनो मुखं बुद्धिः कला पञ्चविंशति- तत्त्वान्यवयवा अवस्था पञ्चमहाभूतानि कर्म भक्तिज्ञानवैराग्यं शाखा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीया- श्चतुर्दशकरणानि पङ्कस्तम्भाकाराणीति। एवमपि नावमतिपङ्कं कर्णधार इव यन्तेव गजं स्वबुद्ध्या वशीकृत्य स्वव्यतिरिक्तं सर्वं कृतकं नश्वरमिति मत्वा विरक्तः पुरुषः सर्वदा ब्रह्माहमिति व्यवहरेन्नान्यत्किंचिद्वेदितव्यं स्वव्यतिरेकेण। जीवन्मुक्तो वसेत्कृतकृत्यो भवति। न नाहं ब्रह्मेति व्यवहरेत्किंतु ब्रह्माहमस्मीत्यजस्रं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु। तुरीयावस्थां प्राप्य तुरीयातीतत्वं व्रजेत् ॥२ ॥ ज्ञान ही वह अवशिष्ट शरीर है। वैराग्य ही उस देह का प्राण है, शम एवं दम ही दो नेत्र हैं। पूर्णरूपेण शुद्ध मन ही मुख है, बुद्धि कला है, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण, पाँच विषय, चार अन्तःकरण एवं अव्यक्त प्रकृति-यही पच्चीस तत्त्व उस अवशिष्ट शरीर के अंग-अवयव हैं। उस शरीर के पंचमहाभूत जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय एवं तुरीयातीत ये पाँच अवस्थायें हैं। इस शरीर की शाखाएँ अर्थात् भुजाएँ कर्म, भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य कही गयी हैं अथवा ये चारों अवस्थायें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय ही चार भुजाएँ हैं। पूर्व में कहे हुए चौदह करण पङ्क में विद्यमान जीर्ण खम्भों के सदृश हैं। इस तरह की स्थिति में भी, जिस प्रकार कीचड़ में पड़ी हुई नाव को भी श्रेष्ठ नाविक ठीक रास्ते पर ढकेल कर ला ही देता है, वैसे ही संसार रूपी सागर के कीचड़ में फँसी हुई इस जीवन रूपी नौका को श्रेष्ठ बुद्धि के द्वारा अपने वश में रख कर ठीक उसी प्रकार पार लगायें, जैसे महावत हाथी को अपने अंकुश में रखकर सही मार्ग से ले जाता है। ज्ञानस्वरूप उस श्रेष्ठ शरीर
उपदेश ६ मन्त्र ३ १५८ में प्रतिष्ठित हुआ पुरुष 'मेरे सिवाय जो भी है, वह सभी कुछ काल्पनिक होने के कारण नाशवान् है', ऐसा समझकर सदैव 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म ही हूँ) का उच्चारण करे। अपनी अन्तरात्मा के अलावा दूसरी अन्य कोई भी वस्तु ज्ञात नहीं है, इस प्रकार से दृढ़ निश्चय करके जीवन्मुक्त होकर विचरण करे। इस तरह से जीवन- यापन करने वाला परिव्राजक कृतकृत्य हो जाता है। अपने व्यावहारिक जगत् में भी इस प्रकार न कहे कि "मैं ब्रह्म नहीं हूँ।" वरन् निरन्तर इस धारणा को पुष्टि प्रदान करता रहे कि "मैं स्वयं ही ब्रह्म हूँ।" इन तीन अवस्थाओं-जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति को क्रमशः पार करके तुरीयावस्था में पहुँचकर परिव्राजक तुरीयातीत परमात्मा के पद में प्रविष्ट होता है ॥ २ ॥ दिवा जाग्रन्नक्तं स्वप्नं सुषुप्तमर्धरात्रं गतमित्येकावस्थायां चतस्रोऽवस्थास्त्वेकैक - करणाधीनानां चतुर्दशकरणानां व्यापारश्चक्षुरादीनाम्। चक्षुषो रूपग्रहणं श्रोत्रयोः शब्दग्रहणं जिह्वाया रसास्वादनं घ्राणस्य गन्धग्रहणं वचसो वाग्व्यापारः पाणेरादानं पादयोः संचारः पायोरुत्सर्ग उपस्थस्यानन्दग्रहणं त्वचः स्पर्शग्रहणम्। तदधीना च विषयग्रहणबुद्धिः बुद्ध्या बुद्ध्यति चित्तेन चेतयत्यहंकारेणाहंकरोति। विसृज्य जीव एतान्देहाभिमानेन जीवो भवति। गृहाभिमानेन गृहस्थ इव शरीरे जीवः संचरति। प्राग्दले पुण्यावृत्तिराग्नेय्यां निद्रालस्यौ दक्षिणायां क्रौर्यबुद्धिर्नैर्ऋत्यां पापबुद्धिः पश्चिमे क्रीडारतिर्वायव्यां गमने बुद्धिरुत्तरे शान्तिरीशान्ये ज्ञानं कर्णिकायां वैराग्यं केसरेष्वात्मचिन्ता इत्येवं वक्त्रं ज्ञात्वा ॥ ३ ॥ दिन जाग्रत्-अवस्था है, रात्रि स्वप्नावस्था है तथा सुषुप्ति अर्द्धरात्रि स्वरूप है। ये तीनों अवस्थाएँ तुरीयावस्था में विद्यमान हैं। तुरीयावस्था तुरीयातीत में प्रतिष्ठित है। इस तरह से एक ही अवस्था में चार अवस्थायें निहित हैं। मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार-इन चार अन्तःकरणों में से हर एक के अधीन जो नेत्र आदि चौदह करण आगे स्पष्ट किये गये हैं, उनके पृथक्-पृथक् कार्य बतलाये जाते हैं। चक्षुओं का कार्य रूप को आकृष्ट करना है, श्रोत्रों का कार्य-क्षेत्र शब्द की उपलब्धि अर्जित करना है, जिह्वा का कार्य रसास्वादन लेने का है, गन्ध की अनुभूति नासिका का कार्य है, वाक्शक्ति का कार्य बोलना है। हाथों का कार्य किसी वस्तु को प्राप्त करना, उठाना व पहुँचाना है, पैरों का कार्य निरन्तर चलते रहना है, गुदा का काम मल विसर्जन है तथा विषय जनित आनन्दानुभव जननेन्द्रिय का काम है। स्पर्शानुभव त्वचा का कार्य है। इनके आश्रित विषय-ग्रहण की बुद्धि है। बुद्धि के द्वारा जानकारी प्राप्त करता है। चित्त से चैतन्यता की प्राप्ति करता है। अहंकार से अहंता का अनुभव होता है। इन सभी (चौदह) भावों की विशेषरूप से सृष्टि करके इनके समूह रूपी देह में आत्माभिमान करने के कारण तुरीय-चेतनतत्त्व ही जीवरूप में हो जाता है। जिस प्रकार गृह में अभिमानपूर्वक व्यक्ति गृहस्थ बन जाता है, उसी प्रकार देह में अभिमानपूर्वक तुरीय चेतन जीव होकर विचरण करता है। शरीर के अन्तःकरण में अष्टपंखुड़ियों से युक्त हृदय रूपी कमल है, उस हृदय में प्रतिष्ठित रहने वाला जीव जब उक्त कमल के पूर्ववर्त्ती दल में विचरण करता है, तब उसमें पुण्यरूपी अनुष्ठान की प्रवृत्ति होती है। आग्नेय कोण वाले दल में स्थित होने पर वह पुरुष आलस्य एवं निद्रा से ग्रस्त हो जाता है। दक्षिण दिशा के दल में प्रतिष्ठित होने पर उस व्यक्ति में क्रूरता का भाव आ जाता है। नैर्ऋत्य कोण का आश्रय प्राप्त करने पर उस पुरुष में सद्बुद्धि जाग्रत् हो जाती है। पश्चिम दिशा के दल में प्रतिष्ठित होने पर वह क्रीड़ा में अत्यधिक आसक्त हो जाता है। वायव्य कोण के दल में गमन करने पर उस पुरुष की बुद्धि श्रेष्ठ मार्ग में गमन करने लगती है। उत्तर दिशा के दल में प्रविष्ट होने पर उसे शान्ति की अनुभूति होती है। ईशानकोण में स्थिति होने पर विशेष ज्ञान की प्राप्ति
१५९ नारदपरिव्राजकोपनिषद्
होती है। उस कमल की कर्णिका में विद्यमान रहने पर उस पुरुष के अन्तः में वैराग्य-भाव की जागृति होती है तथा केसरों में प्रविष्ट होने पर उस पुरुष श्रेष्ठ का मन आत्मा के ध्यान में लगता है। इस तरह से जिसमें चैतन्यतत्त्व ही मुख के सदृश प्रमुख है, ऐसे उस आत्मस्वरूप को समझ कर ज्ञानवान् मनुष्य (परिव्राजक) तुरीयातीत ब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित हो जाता है॥ ३॥ जीवदवस्थां प्रथमं जाग्रद्द्वितीयं स्वप्नं तृतीयं सुषुप्तं चतुर्थं तुरीयं चतुर्भिर्वरहितं तुरीयातीतम्। विश्वतैजसप्राज्ञतटस्थभेदैरेक एव एको देवः साक्षी निर्गुणश्च तद्ब्रह्माहमिति व्याहरेत्। नो चेज्जाग्रदवस्थायां जाग्रदादिचतस्रोऽवस्थाः स्वप्ने स्वप्नादिचतस्रोऽवस्थाः सुषुप्ते सुषुप्त्यादिचतस्रोऽवस्थाः तुरीये तुरीयादिचतस्रोऽवस्थाः न त्वेवं तुरीयातीतस्य निर्गुणस्य। स्थूलसूक्ष्मकारणरूपैर्विश्वतैजसप्राज्ञैश्वरैः सर्वावस्थासु साक्षी त्वेक एवावतिष्ठते। उत तटस्थो द्रष्टा तटस्थो न द्रष्टा द्रष्टृत्वात् द्रष्टैव कर्तृत्वभोक्तृत्वाहंकारादिभिः स्पृष्टो जीवः जीवेत्तरो न स्पृष्टः। जीवोऽपि न स्पृष्ट इति चेन्न। जीवाभिमानेन क्षेत्राभिमानः शरीराभिमानेन जीवत्वम्। जीवत्वं घटाकाशमहाकाशवद्व्यवधानोऽस्ति। व्यवधानवशादेव हंसः सोऽहमिति मन्त्रेणोच्छ्वासनिः- श्वासव्यपदेशेनानुसन्धानं करोति। एवं विज्ञाय शरीराभिमानं त्यजेन्न शरीराभिमानी भवति। स एव ब्रह्मेत्युच्यते॥ ४॥ जीव की चार अवस्थाओं में से पहली जाग्रत् अवस्था, दूसरी स्वप्नावस्था, तीसरी सुषुप्ति तथा चौथी तुरीयावस्था है। इन चारों अवस्थाओं से परे तुरीयातीत अवस्था है। एक ही आत्मा विश्व, तैजस, प्राज्ञ एवं तटस्थ के भेद से चार तरह का प्रतीत होता है। इस कारण एक ही परमात्मदेव सभी के साक्षी स्वरूप एवं सत्त्वादि गुणों से परे माने गये हैं तथा वह ब्रह्म मैं स्वयं हूँ, ऐसा ही कहे। तुरीयातीत अवस्था से युक्त पुरुष को उपर्युक्त चारों अवस्थाओं के अनुभव से रहित मानना चाहिए। अन्यथा जिस तरह से जाग्रत् अवस्था में जाग्रत् आदि चार अवस्थायें होती हैं, स्वप्न में स्वप्नादि चार अवस्थाएँ होती हैं, सुषुप्ति में सुषुप्ति आदि चार अवस्थाएँ होती हैं तथा तुरीय में तुरीयादि चार अवस्थाएँ होती हैं, वैसे ही तुरीयातीत में भी इन चारों अवस्थाओं के होने की स्थिति हो सकती है; किन्तु यथार्थ में तुरीयातीत के निर्गुण होने से उसमें अवस्था भेद संभव नहीं है। स्थूल, सूक्ष्म एवं कारणरूप जो विश्व, तैजस एवं प्राज्ञ ब्रह्मरूप हैं, इन सभी के साथ समस्त अवस्थाओं में एक ही साक्षी रहता है; किन्तु तटस्थ ईश्वर द्रष्टा नहीं, क्योंकि तटस्थ मायाधारी ईश्वर के रूप में होता है, किन्तु उसका कोई द्रष्टा नहीं है, अतः तटस्थ ही द्रष्टा नहीं हो सकता। इस कारण वह द्रष्टा नहीं है, ऐसा ही मानना चाहिए। तब जीव को ही द्रष्टा मान लिया जा सकता है। नहीं, जीव द्रष्टा नहीं हो सकता है; क्योंकि वह कर्तृत्व, भोक्तृत्व एवं अहंकार आदि से युक्त है। जीव के अतिरिक्त जो तुरीयातीत परमात्मसत्ता है, वह ऊपर कहे हुए दोषों के सम्पर्क से परे है। यदि यह कहें कि जीव भी स्वरूपानुसार शुद्ध चैतन्य ही है, इस कारण वह भी कर्तृत्व आदि के संस्पर्श से परे है, तो यह भी सही नहीं कहा जा सकता; क्योंकि उसमें जीवत्व का अहं होने से इस देह रूपी क्षेत्र में उसका अभिमान है तथा शरीर के अहं (अभिमान) के कारण ही उसमें जीवत्व निहित है। परमात्मतत्त्व से जीव तत्त्व का व्यवधान ठीक उसी तरह से है, जिस तरह महाकाश से घटाकाश का है। व्यवधान के कारण ही हंसरूपी जीव उच्छ्वास एवं निःश्वास के माध्यम से सदैव 'सोऽहम्' नामक मंत्र का चिन्तन करते हुए निरन्तर अपने आत्म-स्वरूप का अनुसंधान करता है। ऐसा समझकर शरीर में आत्माभिमान का परित्याग कर दे। जो 'यति' शरीराभिमानी नहीं होता, वही ब्रह्म कहलाता है॥४॥
उपदेश ६ मन्त्र ४२ १६२ ततः संवत्सरस्यान्ते ज्ञानयोगमनुत्तमम् । आश्रमत्रयमुत्सृज्य प्राप्तश्च परमाश्रमम् ॥३२॥ अनुज्ञाप्य गुरूँश्चैव चरेद्धि पृथिवीमिमाम्। त्यक्तसङ्गो जितक्रोधो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ॥ ३३ ॥ गुरु के हित में सतत संलग्न रहते हुए जिज्ञासु पुरुष को गुरु-आश्रम में एक वर्ष तक निवास करना चाहिए। आश्रम के नियमोपनियमों के पालन में कभी भी आलस्य-प्रमादादि नहीं करना चाहिए एवं ब्रह्मचर्य और अहिंसा आदि यमों के पालन में भी सदैव सतर्क रहना चाहिए। इस तरह से साधना करते हुए गुरु की विशेष कृपा से वर्ष के अन्त में सर्वश्रेष्ठ ज्ञानयोग को प्राप्त करके धर्मानुकूल सदाचार पूर्वक ब्रह्मचर्य आदि तीनों आश्रमों का विधिवत् सेवन करता हुआ परिव्राजक-संन्यासी पृथ्वी पर विचरण करे। आसक्ति का परित्याग कर क्रोध को अपने वश में कर ले। 'योगी' को स्वल्प आहार ग्रहण करने वाला और वाक् आदि इन्द्रियों पर संयम रखने वाला होना चाहिए ॥ ३०-३३॥ द्वाविमौ न विरज्येते विपरीतेन कर्मणा । निरारम्भो गृहस्थश्च कार्यावांश्चैव भिक्षुकः ॥ ३४ ॥ माद्यति प्रमदां दृष्ट्वा सुरां पीत्वा च माद्यति । तस्माद्दृष्टिविषां नारीं दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ३५ ॥ संभाषणं सह स्त्रीभिरालापः प्रेक्षणं तथा । नृत्तं गानं सहासं च परिवादांश्च वर्जयेत् ॥ ३६ ॥ न स्नानं न जपः पूजा न होमो नैव साधनम् । नाग्निकार्यादिकार्यं च नैतस्यास्तीह नारद ॥ ३७॥ नार्चनं पितृकार्यं च तीर्थयात्रा व्रतानि च । धर्माधर्मादिकं नास्ति न विधिर्लौकिकी क्रिया ॥३८॥ संत्यजेत्सर्वकर्माणि लोकाचारं च सर्वशः । कृमिकीटपतङ्गांश्च तथा योगी वनस्पतीन् ॥ ३९ ॥ न नाशयेद्बुधो जीवान्यरमार्थमतिर्यतिः। नित्यमन्तर्मुखः स्वच्छः प्रशान्तात्मा स्वपूर्णधीः ॥ ४० ॥ अन्तःसङ्गपरित्यागी लोके विहर नारद। नाराजके जनपदे चरत्येकचरो मुनिः ॥ ४१ ॥ निःस्तुतिर्निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च। चलाचलनिकेतश्च यतिर्यादृच्छिको भवेत् ॥४२॥ इत्युपनिषत् । निरारम्भ (कामनापूर्वक किसी कार्य का प्रारंभ न करने वाले) गृहस्थ एवं कर्मरत (प्रव्रज्या में सतत सचेष्ट) परिव्राजक इन दोनों की शोभा तभी तक होती है, जब तक कि वे अपने आश्रम धर्म के अनुकूल श्रेष्ठ आचरण करें। मनुष्य मदिरा-पान करने से मतवाला होता है; किन्तु रूपवान् सुन्दर तरुणी नारी के दर्शन-मात्र से ही उन्मत्त हो उठता है। इस कारण दर्शन मात्र से विष जैसा प्रभाव डालने वाली नारी का परिव्राजक दूर से ही परित्याग कर दे। नारियों के साथ वार्तालाप करना, उनके समक्ष संदेश भेजना, नृत्य-गायन आदि करना, हास- परिहास करना एव छिद्रान्वेषण करना आदि दुर्गुण परिव्राजक को त्याग देना चाहिए। हे नारद ! संन्यासी के लिए [नैमित्तिक] स्नान, देवपूजन, जप, यज्ञ-यागादि कर्म-नहीं करने हैं। उसके लिए तो श्राद्ध-तर्पण, तीर्थों की यात्रा करना, व्रत-उपवास, धर्म-अधर्म और लोकाचार सम्बन्धी कर्म भी आवश्यक नहीं है। योगारूढ़ संन्यासी सभी कर्मों का परित्याग कर दे तथा समस्त लोकाचारों से भी उसे दूर रहना चाहिए। विद्वान् 'योगी' अपनी बुद्धि एवं सामर्थ्य को परमार्थ में लगाकर कृमि, कीट-पतङ्गों तथा वनस्पति आदि प्राणियों को कभी नष्ट न करे। संन्यासी सर्वदा अन्तर्मुखी रहे, बाह्य एवं अन्तः से सदैव अपने को स्वच्छ रखे। अपने अन्तःकरण को पूरी तरह से शान्त रखकर बुद्धि को आत्मानन्द से परिपूर्ण किये रहे। हे नारद ! तुम अन्तः से सभी तरह की आसक्तियों का त्याग करके इस जगत् में विचरण करते रहो। 'यति' को एकाकी किसी ऐसे प्रदेश में भ्रमण नहीं करना चाहिए, जहाँ अराजकता फैली हुई हो। संन्यासी को स्तुति एवं नमस्कार आदि से दूर रहना चाहिए। श्राद्ध एवं तर्पण से योगी सदा दूर रहे। किसी सुनसान घर में या पर्वत की गुफा में निवास करे। परिव्राजक को सदैव स्वच्छन्दरूप में सर्वत्र विचरण करना चाहिए। यही उपनिषद् है ॥ ३४-४२ ॥
१६३ नारदपरिव्राजकोपनिषद् ॥ सप्तमोपदेशः ॥ अथ यतेर्नियमः कथमिति पृष्टं नारदं पितामहः पुरस्कृत्य विरक्तः सन्यो वर्षासु ध्रुवशीलोऽष्टौ मास्र्येकाकी चरन्नैकत्र निवसेद्भिक्षुर्भयात्सारङ्गवदेकत्र न तिष्ठेत्स्वगमननिरोधग्रहणं न कुर्याद्ब- स्ताभ्यां नद्युत्तरणं न कुर्यान्न वृक्षारोहणमपि न देवोत्सवदर्शनं कुर्यान्नैकान्नाशी न बाह्यदेवार्चनं कुर्यात्स्वव्यतिरिक्तं सर्वं त्यक्त्वा मधुकरावृत्त्याहारमाहरन्कृशो भूत्वा मेदोवृद्धिमकुर्वन्नाज्यं रुधिरमिव त्यजेदेकान्नान्नं पललमिव गन्धलेपनमशुद्धिलेपनमिव क्षारमन्त्यजमिव वस्त्रमुच्छिष्टपात्रमिवाभ्यङ्गं स्त्रीसङ्गमिव मित्राह्लादकं मूत्रमिव स्पृहां गोमांसमिव ज्ञातचरदेशं चण्डालवाटिकामिव स्त्रियमहिमिव सुवर्णं कालकूटमिव सभास्थलं श्मशानस्थलमिव राजधानीं कुम्भीपाकमिव शवपिण्डवदेकान्नान्नं न देहान्तरदर्शनं प्रपञ्चवृत्तिं परित्यज्य स्वदेशमुत्सृज्य ज्ञातचरदेशं विहाय विस्मृतपदार्थं पुनः प्राप्तहर्ष इव स्वमानन्दमनुस्मरन्स्वशरीराभिमानदेशविस्मरणं मत्वा स्वशरीरं शवमिव हेयमुपगम्य कारागृहविनिर्मुक्तचोरवत्पुत्राप्तबन्धुभवस्थलं विहाय दूरतो वसेत् ॥ अयत्नेन प्राप्तमाहरन्ब्रह्मार्पणवद्ध्यानानुसंधानपरो भूत्वा सर्वकर्मनिर्मुक्तः कामक्रोधलोभ- मोहमदमात्सर्यादिकं दग्ध्वा त्रिगुणातीतः षडूर्मिरहितः षड्भावविकारशून्यः सत्यवाक् शुचिरद्रोही ग्रामैकरात्रं पत्तने पञ्चरात्रं क्षेत्रे पञ्चरात्रं तीर्थे पञ्चरात्रमनिकेतः स्थिरमतिर्नानृतवादी गिरिकन्दरेषु वसेदेक एव द्वौ वा चरेत् ग्रामं त्रिभिर्नगरं चतुर्भिर्ग्राममित्येकश्चरेत् । भिक्षुश्चतुर्दशकरणानां न तत्रावकाशं दद्यादविच्छिन्नज्ञानाद्वैराग्यसंपत्तिमनुभूय मत्तो न कश्चिन्नान्यो व्यतिरिक्त इत्यात्मन्या- लोच्य सर्वतः स्वरूपमेव पश्यञ्जीवन्मुक्तिमवाप्य प्रारब्धप्रतिभासनाशपर्यन्तं चतुर्विधं स्वरूपं ज्ञात्वा देहपतनपर्यन्तं स्वरूपानुसंधानेन वसेत् ॥ १ ॥ संन्यासी के सामान्य नियम तथा कुटीचक आदि के विशेष नियम- इसके पश्चात् देवर्षि नारद जी ने पितामह ब्रह्मा जी से यह प्रश्न किया-हे ब्रह्मन् ! संन्यासी के नियम किस प्रकार के हैं ? पितामह ब्रह्मा जी ने नारद जी के इस प्रश्न को अपने समक्ष रखते हुए उत्तर देना प्रारम्भ किया। उन्होंने कहा-हे नारद ! संन्यासी विरक्त होकर मात्र चार मासीय वर्षा के दिनों में किसी एक निश्चित क्षेत्र में निवास करे और शेष आठ मास में वह अकेले ही भ्रमण करे। किसी एक स्थान विशेष पर ज्यादा दिनों तक निवास न करे, क्योंकि ऐसा करने से 'यति' के पतित होने का भय रहता है। भ्रमर की तरह से कभी एक स्थल पर न रुके। यदि कोई अन्यत्र जाने का विरोध करे, तो परिव्राजक उस विरोध को न माने। अपने हाथों अर्थात् अपने आप ही नदी तैरकर के पार न हो। वृक्षों पर भी उसे नहीं चढ़ना चाहिए। देवों के निमित्त होने वाले आयोजनों को नहीं देखना चाहिए। सदैव एक ही घर का भोजन न करे और आत्मा के अतिरिक्त अन्य बाह्य देवगणों का पूजन-अर्चन भी न करे। आत्मा के सिवाय अन्य सभी का परित्याग कर, मधुकरी-वृत्ति से भिक्षा प्राप्त भोजन करे। शरीर को कमजोर बनाकर रखे। देह में मेद (चर्बी) की वृद्धि बिल्कुल न होने दे। घी को रुधिर के समान जानकर परित्याग कर दे। एक ही परिजन के घर के अन्न को मांसवत् जानकर छोड़ देना चाहिए। इत्र अथवा चन्दन आदि के लेप को अपवित्र मल-मूत्रादि के लेप की तरह से मान करके छोड़ देना चाहिए। क्षार (साबुन, सोडा आदि के मुख्य घटक) आदि को चाण्डाल की तरह से जानकर अस्पृश्य माने। कौपीन आदि के अलावा अन्य वस्त्रों को उच्छिष्ट पात्रों के सदृश समझकर छोड़ दे। अभ्यङ्ग (तेल आदि की
उपदेश ७ मन्त्र २ १६४ मालिश करने) को स्त्री के आलिङ्गन की तरह मानकर सदैव उससे दूर रहे। मित्रों के आनन्ददायक सङ्ग को मूत्र के सदृश त्याज्य जाने। किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए अपने मन में उत्पन्न होने वाली स्पृहा (इच्छा शक्ति) को अपने लिए गोमांस के सदृश वर्जनीय मानना चाहिए। चिर परिचित एवं प्रिय स्थल को चाण्डाल का बगीचा समझना चाहिए। सुवर्ण को कालकूट के समान, सभास्थल को श्मशान भूमि की भाँति, राजधानी को कुम्भीपाक नरक के समान तथा एक जगह के अन्न (भोजन) को मृत व्यक्ति के लिए दिए हुए पिण्ड के समान जानकर त्याग देना चाहिए। शरीर को आत्मा से अलग देखना तथा प्रवृत्तियों में फँसना भी छोड़ देना चाहिए। अपने देश को छोड़कर अपने परिचित स्थलों से सदैव दूर बने रहने का प्रयास करना चाहिए। अपने आनन्दमय स्वरूप का सतत ध्यान करते हुए, इस तरह की प्रसन्नता की अनुभूति करे, जैसे कि कोई विस्मृत हुई कीमती वस्तु पुनः मिल गयी हो। जिस स्थान पर जाने से अपने शरीर में ही आत्माभिमान जाग जाये, जहाँ अपनी देह से सम्बन्ध रखने वाले लोग निवास करते हों, उस स्थान को हमेशा के लिए भूल जाना चाहिए। अपनी इस देह को भी मृत व्यक्ति की तरह से त्याज्य मानते हुए उसमें आसक्त नहीं होना चाहिए। जिस प्रकार जेलखाने से मुक्त हुआ मनुष्य (चोर) शर्म के कारण अपनी जन्मस्थली पर न जाकर अन्यत्र कहीं दूर जाकर निवास करने लगता है, उसी प्रकार परिव्राजक जहाँ उसके पुत्र और माता-पिता आदि समस्त गुरुजन निवास करते हों, उस स्थल को छोड़कर वहाँ से सदैव के लिए दूर ही अपना निवास-स्थल बनाना चाहिए। बिना प्रयास के ही जो भी कुछ प्राप्त हो जाये, वही आहार (भोजन) ग्रहण कर लेना चाहिए। निरन्तर ब्रह्ममय स्वरूप ॐकार के ध्यान में संलग्न होकर अन्य दूसरे सभी तरह के कर्म-बन्धनों से मुक्त हो जाना चाहिए। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मात्सर्य आदि को जलाकर सत, रज, तम आदि तीन गुणों से परे हो जाना चाहिए। भूख-प्यास आदि छः प्रकार की ऊर्मियों का प्रभाव योगी में नहीं होना चाहिए। जन्म, वृद्धि आदि षड्भाव विकारों से भी अपना सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए। सर्वदा सत्यमय वाणी बोले, शरीर एवं मन से पूर्ण पवित्र रहे और किसी भी मनुष्य आदि से द्रोह न करे। ग्राम में एक रात्रि, नगर में पाँच रात्रि, किसी धार्मिक पुण्य स्थली में पाँच रात्रि एवं तीर्थ में भी पाँच रात्रि से ज्यादा नहीं ठहरना चाहिए। परिव्राजक कहीं पर भी अपने लिए घर न बनाये। बुद्धि को सदैव परमात्मा के ध्यान में लगाये रखे। कभी व किसी भी स्थिति में असत्य वाणी न बोले। पर्वत की गुफाओं में अपना निवास बनाये। सदैव एकाकी ही भ्रमण करे। परिव्राजक (चौमासे के समय) वर्षाकालीन चार मास में दो व्यक्तियों को अपने साथ रख सकता है। तीन के साथ रहने पर तो गाँव जैसा ही हो जाता है और चार आदमियों के साथ उस स्थल पर नगर जैसा ही बस जाता है। अतः परिव्राजक एकाकी ही रहे। अपने चौदह करणों (इन्द्रियों) को अलग-अलग विषयों के ध्यान का अवकाश नहीं देना चाहिए एवं अपने से भिन्न अन्य किसी को मान्यता न दे। किसी भी अन्य दूसरे पदार्थ की तनिक भी भावना न करते हुए सभी का अवलोकन अपनी आत्मा के अनुरूप ही करे। अपने स्वरूप का साक्षात्कार करता हुआ जीवन से मुक्ति प्राप्त कर ले। अपने स्वरूप का विवेक हो जाने पर भी जब तक मृत्यु न आ जाये, तब तक अपने स्वरूप का ही ध्यान करता रहे। परिव्राजक का यह परमदायित्व है कि वह अपनी अन्तरात्मा का सम्यक् रूप से चिन्तन करते हुए कालयापन करे॥ १ ॥ त्रिषवणस्नानं कुटीचकस्य बहूदकस्य द्विवारं हंसस्यैकवारं परमहंसस्य मानसस्नानं तुरीयातीतस्य भस्मस्नानमवधूतस्य वायव्यस्नानम्॥ २ ॥ कुटीचक-संन्यासी के लिए तीनों समय (प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकाल) का स्नान करने का नियम है। बहूदक-संन्यासी प्रातः काल एवं सायंकाल (दो संध्याओं) में स्नान करे। हंस नामक संन्यासी के लिए दिन में केवल एक ही बार स्नान करने का विधान बतलाया गया है। परमहंस नाम वाले संन्यासी को केवल मानसिक स्नान ही करना चाहिए। तुरीयातीत के लिए भस्म-स्नान कहा गया है अर्थात् वह सम्पूर्ण देह में केवल भस्म
१६५ नारदपरिव्राजकोपनिषद् (विभूति) ही धारण कर ले और अवधूत नामक संन्यासी के लिए वायव्य स्नान अर्थात् वह सम्पूर्ण देह में वायु के संस्पर्श से ही पवित्र हो जाता है। उसको जल-स्नान की कोई विशेष आवश्यकता नहीं रहती है ॥ २ ॥ ऊर्ध्वपुण्ड्रं कुटीचकस्य त्रिपुण्ड्रं बहूदकस्य ऊर्ध्वपुण्ड्रं त्रिपुण्ड्रं हंसस्य भस्मोद्धूलनं परमहंसस्य तुरीयातीतस्य तिलकपुण्ड्रमवधूतस्य न किंचित्। तुरीयातीतावधूतयोः ॥ ३ ॥ कुटीचक संन्यासी को मस्तक पर ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिए। बहूदक को त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिए, हंस नामक संन्यासी ऊर्ध्वपुण्ड्र अथवा त्रिपुण्ड्र एवं परमहंस नाम वाले संन्यासी को केवल भस्म (विभूति) धारण करनी चाहिए। तुरीयातीत के लिए तिलक पुण्ड्र का नियम बतलाया गया है और अवधूत संन्यासी के लिए किसी भी तरह का विशेष चिह्न आवश्यक नहीं है॥ ३ ॥ ऋतुक्षौरं कुटीचकस्य ऋतुद्वयक्षौरं बहूदकस्य न क्षौरं हंसस्य परमहंसस्य च न क्षौरम्। अस्ति चेदयनक्षौरं तुरीयातीतावधूतयोर्न क्षौरम् ॥ ४ ॥ कुटीचक संन्यासी को दो-दो मास में क्षौर-कर्म कराना चाहिए। बहूदक को चार-चार मास में क्षौर कर्म करना चाहिए। हंस एवं परमहंस अपनी इच्छानुसार यदि चाहें, तो छः-छः महीने के अन्तराल से क्षौर कर्म करवा सकते हैं। अवधूत तथा तुरीयातीत परिव्राजक के लिए क्षौर-कर्म कराना आवश्यक नहीं है ॥ ४ ॥ कुटीचकस्यैकान्नं माधूकरं बहूदकस्य हंसपरमहंसयोः करपात्रं तुरीयातीतस्य गोमुखं अवधूतस्याजगरवृत्तिः ॥ ५ ॥ कुटीचक के लिए एक ही जगह के अन्न (भोजन) ग्रहण करने का विधान है। बहूदक-संन्यासी को मधुकरी-वृत्ति से अर्थात् भिक्षा द्वारा प्राप्त अन्न ही ग्रहण करना चाहिए। हंस एवं परमहंस के लिए हाथ ही भोजन ग्रहण करने का पात्र होता है। ये संन्यासी कर-पात्री कहलाते हैं। उस (करपात्री) संन्यासी के हाथ में जो कुछ भी आ जाए, उतना ही खा कर संतोष करना चाहिए। तुरीयातीत को गो-मुख वृत्ति अर्थात् उस संन्यासी के मुख में अन्य दूसरा कोई मुनष्य जो कुछ भी फल-फूल दे, उसे गाय के सदृश मुँह फैलाकर ले लेना चाहिए। अवधूत संन्यासी के लिए अजगर वृत्ति अर्थात् ईश्वरेच्छा अथवा दूसरे अन्य लोगों की इच्छानुसार जो कुछ भी मिल जाये, उसी पर संतोष कर लेना चाहिए॥ ५ ॥ शाटीद्वयं कुटीचकस्य बहूदकस्यैकशाटी हंसस्य खण्डं दिगम्बरं परमहंसस्य एककौपीनं वा तुरीयातीतावधूतयोर्जातरूपधरत्वं हंसपरमहंसयोरजिनं न त्वन्येषाम् ॥ ६ ॥ कुटीचक को अपने पास दो वस्त्र रखने का नियम है, बहूदक अपने पास केवल एक चादर रखे तथा हंस नामक संन्यासी को वस्त्र का एक टुकड़ा रखने का विधान है। परमहंस दिगम्बर (वस्त्ररहित) रहे या फिर एक कौपीन मात्र ही स्वीकार करे। तुरीयातीत और अवधूत को तो वस्त्ररहित ही रहने का नियम है। हंस एवं परमहंस के लिए मृग-चर्म धारण करने का नियम है, अन्य संन्यासियों के लिए मृगचर्म अनिवार्य नहीं है ॥ ६ ॥ कुटीचकबहूदकयोर्देवार्चनं हंसपरमहंसयोर्मानसार्चनं तुरीयातीतावधूतयोः सोहंभावना ॥ ७ ॥ कुटीचक एवं बहूदक-परिव्राजकों के लिए प्रत्यक्षरूप में देवताओं के पूजन का नियम है। हंस एवं परमहंस के लिए मानसिक पूजन का अधिकार है। तुरीयातीत और अवधूत के लिए केवल 'सोऽहमस्मि' अर्थात् वह ब्रह्म मैं स्वयं ही हूँ, ऐसी भावना करनी चाहिए ॥ ७ ॥ कुटीचकबहूदकयोर्मन्त्रजपाधिकारो हंसपरमहंसयोर्ध्यानाधिकारस्तुरीयातीतावधूतयोर्न त्वन्याधिकारस्तुरीयातीतावधूतयोर्महावाक्योपदेशाधिकारः परमहंसस्यापि। कुटीचकबहूदक- हंसानां नान्यस्योपदेशाधिकारः ॥ ८ ॥
उपदेश ८ मन्त्र १ १६६ कुटीचक और बहूदक-योगियों को मंत्रादि के जप का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। हंस एवं परमहंस नामक योगी एकमात्र ध्यान के ही अधिकारी हैं। तुरीयातीत और अवधूत को अपने स्वरूपानुसंधान के अतिरिक्त अन्य किसी भी तरह के कार्य का अधिकार नहीं है। इन तीनों तुरीयातीत, अवधूत एवं परमहंस को ही एक मात्र ‘तत्त्वमसि', 'अयमात्मा ब्रह्म' आदि महावाक्यों के उपदेश का अधिकार है। कुटीचक, बहूदक एवं हंस नामक संन्यासी दूसरे अन्य लोगों को उपदेश प्रदान करने के अधिकारी नहीं हैं॥ ८॥ कुटीचकबहूदकयोर्मानुषप्रणवः हंसपरमहंसयोरन्तरप्रणवः । तुरीयातीतावधूतयोर्ब्रह्म प्रणवः ॥९ कुटीचक एवं बहूदक को मानुष प्रणव अर्थात् साधारण-बाह्य प्रणव (ॐ कार) का ध्यान करने का नियम है। हंस और परमहंस को आन्तरिक (मानसिक) प्रणव का तथा तुरीयातीत और अवधूत नामक संन्यासियों को ब्रह्मस्वरूप प्रणव का ध्यान करने का नियम बतलाया गया है॥ ९॥ कुटीचकबहूदकयोः श्रवणं हंसपरमहंसयोर्मननं तुरीयातीतावधूतयोर्निदिध्यासः । सर्वेषामात्मानुसन्धानं विधिरिति ॥ १०॥ कुटीचक एवं बहूदक को श्रवण करने का अधिकार प्राप्त है। हंस एवं परमहंस का मुख्य साधन चिन्तन-मनन और तुरीयातीत एवं अवधूत का मुख्य साधन निदिध्यासन करना है। इन सभी का एकमात्र लक्ष्य अपनी आत्मा का अनुसंधान करना ही होता है॥ १०॥ एवं मुमुक्षुः सर्वदा संसारतारकं तारकमनुस्मरञ्जीवन्मुक्तो वसेदधिकारविशेषेण कैवल्य- प्राप्त्युपायमन्विष्येद्यतिरित्यपनिषत् ॥ ११ ॥ इस प्रकार सभी को मुक्ति के लिए सतत प्रयत्न करते रहना चाहिए और सांसारिक विषय-वासनाओं से मुक्ति दिलाने वाले तारक मंत्र (ॐ कार) का चिन्तन करते हुए जीवन्मुक्त होकर विचरण करते रहना चाहिए। उसे अधिकार विशेष के आधार पर निरन्तर कैवल्य प्राप्ति के उपाय के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए॥ ११॥ ॥ अष्टमोपदेशः ॥ अथ हैनं भगवन्तं परमेष्ठिनं नारदः पप्रच्छ संसारतारकं प्रसन्नो ब्रूहीति। तथेति परमेष्ठी वक्तुमुपचक्रमे ओमिति ब्रह्मेति व्यष्टिसमष्टिप्रकारेण। का व्यष्टिः का समष्टिः संहारप्रणवः सृष्टिप्रणवश्चान्तर्बहिश्चोभयात्मकत्वात्रिविधो ब्रह्मप्रणवः । अन्तःप्रणवो व्यावहारिकप्रणवः । बाह्यप्रणव आर्षप्रणवः। उभयात्मको विराट्रणवः। संहारप्रणवो ब्रह्मप्रणवोऽर्धमात्राप्रणवः ॥१॥ इसके पश्चात् भगवान् ब्रह्माजी से देवर्षि नारद ने पुनः प्रश्न किया- 'हे भगवन्! जन्म-मरण के चक्र से पार लगाने वाला कौन सा मंत्र है? मैं आपकी शरण में आया हूँ, कृपया बताने का अनुग्रह करें।' भगवान् ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कहकर उपदेश देना शुरू किया। 'हे वत्स नारद ! 'ॐकार' ही तारक मंत्र है, यही ब्रह्म का स्वरूप है। व्यष्टि और समष्टि दोनों तरह से ही ॐकार का ध्यान करना चाहिए। देवर्षि नारद ने पुनः प्रश्न किया- 'पितामह ! व्यष्टि और समष्टि का अभिप्राय क्या है? कृपया बताने का अनुग्रह करें। तदनन्तर प्रजापति ब्रह्मा जी ने कहा- 'व्यष्टि और समष्टि ब्रह्म-प्रणव के अंग-अवयव हैं। एक ही ब्रह्म-प्रणव के तीन भेद माने जाते हैं- प्रथम संहार-प्रणव, द्वितीय सृष्टि-प्रणव और तृतीय उभयात्मक-प्रणव। उभयात्मक प्रणव के दो रूप अन्तः एवं बाह्य हैं। इस कारण उसे उभयात्मक कहते हैं। अन्तः प्रणव का स्वरूप अगले मंत्र में कहेंगे। उपर्युक्त
१६७ नारदपरिव्राजकोपनिषद्
ब्रह्म-प्रणव का एक भेद व्यावहारिक प्रणव है। व्यष्टि प्रणव का द्वितीय नाम बाह्य-प्रणव है। इन चारों के अतिरिक्त एक आर्ष-प्रणव भी है। वही विराट् प्रणव के नाम से बतलाया गया है। संहार प्रणव ब्रह्मादि से प्रतिष्ठित होने के कारण ही ब्रह्म-प्रणव कहा गया है। स्थूल आदि भेद से परिपूर्ण अकारादि चार मात्राएँ जिस ॐकार का स्वरूप हैं, उसी मात्रा चतुष्टयात्मक प्रणव को अर्द्धमात्रा प्रणव भी कहा जाता है ॥ १ ॥ ओमिति ब्रह्म। ओमित्येकाक्षरमन्तःप्रणवं विद्धि। स चाष्टधा भिद्यते। अकारोकारमका- रार्धमात्रानादबिन्दुकलाशक्तिश्चेति। तत्र चत्वार अकारश्चायुतावयवान्वित उकारः सहस्रावय- वान्बितो मकारः शतावयवोपेतोऽर्धमात्राप्रणवोऽनन्तावयवाकारः। सगुणो विराट्प्रणवः संहारो निर्गुणप्रणव उभयात्मकोत्पत्तिप्रणवो यथाप्लुतो विराट्प्लुत प्लुतःसंहारः ॥ २ ॥ अब अन्तः प्रणव के स्वरूप का वर्णन करते हैं। यह प्रणव (ॐ) ही ब्रह्म है। 'इस अन्तः प्रणव को ही एकाक्षर रूप मंत्र जानो।' यह आठ भागों में विभाजित है। इस ॐकार (प्रणव) के अकार, उकार, मकार, अर्धमात्रा, नाद, बिन्दु, कला और शक्ति ही आठ भेदों के रूप हैं। यह प्रणव मात्र चार-चार मात्राओं से ही संयुक्त नहीं है, उसकी एक-एक मात्रा भी कई-कई भेदों से युक्त है। केवल अकार ही दस सहस्र अंग- अवयवों से परिपूर्ण है। उकार के एक सहस्र तथा मकार के एक सौ अंग हैं। ऐसे ही अर्ध मात्रा-प्रणव भी अनन्त अंग-अवयवों से युक्त है। विराट् प्रणव सगुण एवं संहार प्रणव निर्गुण माना गया है। सृष्टि प्रणव सगुण- निर्गुण दोनों से ही सम्बन्धित है। विराट् प्रणव अकारादि चार मात्राओं की समष्टि वाला कहा गया है और संहार प्रणव प्लुत-प्लुत अर्थात् चतुर्थ मात्राओं से युक्त अर्धमात्रा स्वरूप है॥ २॥ विराट्प्रणवः षोडशमात्रात्मकः षट्त्रिंशत्तत्वातीतः। षोडशमात्रात्मकत्वं कथमित्युच्यते। अकारः प्रथमोकारो द्वितीया मकारस्तृतीयार्धमात्रा चतुर्थी नादः पञ्चमी बिन्दुः षष्ठी कला सप्तमी कलातीताष्टमी शान्तिर्नवमी शान्त्यतीता दशमी उन्मन्येकादशी मनोन्मनी द्वादशी पुरी त्रयोदशी मध्यमा चतुर्दशी पश्यन्ती पञ्चदशी परा षोडशी पुनश्चतुःषष्टिमात्रा प्रकृतिपुरुषद्वैविध्य- मासाद्याष्टाविंशत्युत्तरभेदमात्रास्वरूपमासाद्य सगुणनिर्गुणत्वमुपेत्यैकोऽपि ब्रह्मप्रणवः ॥ ३ ॥ विराट् प्रणव सोलह मात्राओं से संयुक्त होता है। इस प्रणव को ३६ प्रकार के तत्त्वों से भी परे कहा गया है। 'अ' कार इस ॐ कार की प्रथम मात्रा है। 'उकार' द्वितीय, मकार तृतीय, चतुर्थ अर्द्धमात्रा, पञ्चम नाद, षष्ठ बिन्दु, सप्तम कला, अष्टम कलातीता, नवम शांति, दशम शान्त्यतीता, एकादश उन्मनी, द्वादश मनोन्मनी, त्रयोदश पुरी (बैखरी), चतुर्दश मध्यमा, पश्यन्ती पञ्चदश एवं षोडश परा मात्रा है। यह सोलह मात्राओं से संयुक्त ब्रह्म-प्रणव ओत, अनुज्ञात, अनुज्ञा एवं अविकल्प रूप चतुर्विध तुरीय से भिन्न न होने के कारण फिर से चौंसठ मात्राओं से युक्त हो जाता है। यह प्रणव ही प्रकृति एवं पुरुष रूप से पुनः दो भेदों को पाकर एक सौ अट्ठाईस मात्राओं से युक्त स्वरूप को ग्रहण करता है। इस तरह एक होकर भी ब्रह्म-प्रणव दृष्टि-भेद से अनेकविध साकार एवं निराकार स्वरूप को प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ॥ सर्वाधारः परंज्योतिरेष सर्वेश्वरो विभुः । सर्वदेवमयः सर्वप्रपञ्चाधारगर्भितः ॥ ४ ॥ सर्वाक्षरमयः कालः सर्वागममयः शिवः । सर्वश्रुत्युत्तमो मृग्यः सकलोपनिषन्मयः ॥ ५ ॥ भूतं भव्यं भविष्यद्यत्त्रिकालोदितमव्ययम् । तदप्योंकारमेवायं विद्धि मोक्षप्रदायकम् ॥ ६ ॥ तमेवात्मानमित्येतद्ब्रह्मशब्देन वर्णितम् । तदेकममृतमजरमनुभूय तथोमिति ॥ ७ ॥ सशरीरं समारोप्य तन्मयत्वं तथोमिति । त्रिशरीरं तमात्मानं परं ब्रह्म विनिश्चिनु ॥ ८ ॥