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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥

महोपनिषत् ] [ ११७ दावानल में जल गया है, परन्तु मृग-मरीचिका के तड़ाग में खड़ा रहकर भी मैं भोग-लिप्सा से परे हूँ । हे पिता, हे गुरो ! आप मुझे तत्व- ज्ञानात्मक बोध प्रदान करो अन्यथा मैं मान-मत्सर का त्याग कर मौन धारण पूर्वक मैं अपने मन में भगवान् का स्मरण करूँगा ॥४६—५७॥ ॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ चतुर्थोऽध्यायः निदाघ तव नास्त्यन्यज्ज्ञेयं ज्ञानवतां वर । प्रज्ञया त्वं विजानासि ईश्वरानुगृहीतया । चित्तमालिन्यसंजातं मार्जयामि भ्रमं मुने ॥१ मोक्षद्वारे द्वारपालाश्चत्वारः परिकीर्तिताः । शमो विचारः संतोषश्चतुर्थः साधुसंगमः ॥२ एकं वा सर्वयत्नेन सर्वमृत्सृज्य संश्रयेत् । एकस्मिन् वशगे यान्ति चत्वारोऽपि वशं गताः ॥३ शास्त्रैः सज्जनसंपर्कपूर्वकैश्च तपोदमैः । आदौ संसारमुक्त्यर्थं प्रज्ञामेवाभिवर्धयेत् ॥४ स्वानुभूतेश्च शास्त्रस्य गुरोश्चैवैक वाच्यता । यस्याभ्यासेन तेनात्मा सततं चावलोक्यते ॥५ संकल्पाशाऽनुसंधानवर्जनं चेत् प्रतिक्षणम् । करोषि तदचित्तत्त्वं प्राप्त एवासि पावनम् ॥६ चेतसो यदकर्तृत्वं तत् समाधानमीरितम् । तदेव केवलीभावं सा शुभा निर्वृतिः परा ॥७ चेतसा संपरित्यज्य सर्वभावात्मभावनाम् । यथा तिष्ठसि तिष्ठ त्वं मूकान्धवधिरोपमः ॥८ सर्वं प्रशान्तमजमेकमनादिमध्यमाभास्वरं स्वप्नमात्रम् चैत्यचिह्नम् ।

११८ ] [ चतुर्थ अध्याय

११८ ] [ चतुर्थ अध्याय सर्वं प्रशान्तमिति शब्दमयी च दृष्टिर्बोधार्थमेव हि मुधैव तदोमितीदम् ॥१६ सर्वं किंचिदिदं दृश्यं दृश्यते चेज्जगद्गतम् । चिन्निष्पन्दांशमात्रं तन्नान्यदस्तीति भावय ॥२० नित्यप्रबुद्धचित्तस्त्वं कुर्वन् वाऽपि जगत्क्रियाम् । आत्मकत्वं विदित्वा त्वं तिष्ठाक्षुब्धमाब्धिवत् ॥२१ निदाघ की यह बात सुनकर उनके पिता ऋषिवर ऋभु कहने लगे—"पुत्र ! तुम ज्ञानियों में श्रेष्ठ हो । अब तुम्हारे लिये जानने योग्य कुछ भी नहीं है । तुम पर भगवान की ऐसी कृपा हुई है कि तुम स्वयं अपनी बुद्धि के द्वारा ही सब विषयों के ज्ञाता हो गये हो । फिर भी चित्त की मलीनता से जो भ्रम शेष रह गया है, उसे मैं दूर कर डालूँगा । शम, विचार, सन्तोष और सत्संग यह चारों मोक्ष द्वार के द्वारपाल कहे गये हैं। यदि उनमें से एक का भी आश्रय ग्रहण कर ले तो शेष तीनों स्वयं ही वश में हो जाते हैं । जगत के पाश से मुक्त होने की कामना हो तो शास्त्रों के अध्ययन, तप, दम तथा सत्संग के द्वारा अपनी प्रज्ञा- वृद्धि करे । अपने अनुभव से शास्त्र-प्रमाण एवं गुरु के उपदेश से निरन्तर अभ्यास द्वारा आत्मचिन्तन की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है । यदि तुमने संकल्प और आशा का अनुसंधान त्याग दिया है तो कैवल्य की प्राप्ति स्वयं ही हो गई होगी । चित्त अकर्तृत्व ही चित्त-वृत्तियों का निरोध कहा गया है । इसे ही कैवल्य अवस्था अथवा पराशान्ति कहते हैं । विश्व के सब पदार्थों में आत्म-भावना का भले प्रकार त्याग कर गूँगे, अंधे और बहिरों के समान रहने से ही यह सम्भव है । शब्दमयी वैभिन्नता युक्त दृष्टि नितान्त व्यर्थ है । एक है, अजन्मा है, आदि मध्य रहित तथा तेजोमय है इत्यादि शब्द रूप चिन्तन आत्मबोध में बाधा स्वरूप हैं । यह दिखलाई पड़ने वाला सम्पूर्ण प्रपंच तत्व रूप में प्रणव ही है । यहाँ जो कुछ दिखाई पड़ता है, वह चित्तविशेष में दिखाई पड़ता है । अतः

महोपनिषत् [ ११६ यह चित् के स्पन्दन का एक अंश रूप ही है। इसलिए चित्त ही सब कुछ है। तुम सांसारिक कार्यों को करते हुये भी नित्य प्रबुद्ध चित्त से आत्मा के एकीभाव का ज्ञान प्राप्त कर प्रशान्त रहने वाले महान् सागर के समान निश्चल एवं दृढ़चित्त रहो। ऐसा करने से ही कल्याण सम्भव है ॥ १—११ ॥ तत्त्वावबोध एवासौ वासनातृणपावकः । प्रोक्तः समाधिशब्देन न तु तूष्णीमवस्थितिः ॥१२ निरिच्छे संस्थिते रत्ने यथा लोकः प्रवर्तते । सत्तामात्रे परे तत्त्वे तथैवायं जगद्गणः ॥१३ अतश्चात्मनि कर्तृत्वमकर्तृत्वं च वै मुने । निरिच्छत्वादकर्त्ताऽसौ कर्ता संनिधिमात्रतः ॥१४ ते द्वे ब्रह्मणि विन्देते कर्तृ ताकर्तृ ते । यन्नैवैष चमत्कारस्तमाश्रित्य स्थिरो भव ॥१५ तस्मान्नित्यमकर्ताऽहमिति भावनयेद्धया । परमामृतनाम्नी सा समतैवावशिष्यते ॥१६ निदाघ शृणु सत्त्वस्था जाता भुवि महागुणाः । ते नित्यमेवाभ्युदिताः मुदिताः ख इवेन्दवः ॥१७ यह आत्मज्ञान वासना रूप तिनके को जलाने वाले अग्नि के समान है। इसी को समाधि कहा गया है। केवल मौन रहना ही समाधि नहीं है। जैसे रत्न बिना किसी कामना के यों ही पड़ा रहता है तो भी उसे देखने वाले व्यक्ति उसकी ओर आकर्षित होते ही हैं, वैसे ही सत्तामात्र जो परतत्व है उसकी ओर सम्पूर्ण विश्व आकर्षित होता है। इसी आत्मा में कर्तृत्व और अकर्तृत्व दोनों ही विद्यमान हैं। कामना रहित रहने पर आत्मा 'अकर्ता है और सन्निधिमात्र से कर्ता बन जाता है। ब्रह्म में कर्तृत्व ओर अकृतृत्व दोनों की ही उपलब्धि है, तुम्हें जिसमें ऐसा चमत्कार दिखाई दे, उसी का आश्रय पकड़ लो। 'मैं सदा Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

१२० ] [ चतुर्थ अध्याय

१२० ] [ चतुर्थ अध्याय अकर्त्ता हूँ, ऐसी भावना करने पर परम अमृता नाम वाली समता ही शेष रहती है । जो प्राणी सत्व में विद्यमान रहकर इस लोक में उत्पन्न हुये हैं, वही गुणवान हैं । वे आकाशस्थ चन्द्र के समान सदा हर्षित रहते हैं और वे ही उन्नतिशील हैं ॥ १२—१७ ॥ नापदि ग्लानिमायान्ति निशि हेमाम्बुजं यथा । नेहन्ते प्रकृतादन्यद्रमन्ते शिष्टवर्त्मनि ॥१८ आकृत्यैव विराजन्ते मैत्र्यादिगुणवृत्तिभिः । समाः समरसाः सौम्याः सततं साधुवृत्तयः ॥१९॥ अब्धिवद्गतमर्यादा भवन्ति विशदाशयाः । नियतिं न विमुञ्चन्ति महान्तो भास्करा इव ॥२० कोऽहं कथमिदं चेति संसारमलमाततम् । प्रविचार्यं प्रयत्नेन प्राज्ञेन सह साधुना ॥२१ नाकर्मसु नियोक्तव्यं नानार्येण सहावसेत् । द्रष्टव्यः सर्वसंहर्त्ता न मृत्युरवहेलया ॥२२ शरीरमस्थि मांसं च त्यक्त्वा रक्ताद्यशोभनम् । भृतमुक्तावली तन्तुं चिन्मात्रमवलोकयेत् ॥२३ उपादेयानुपतनं हेयैकान्त विसर्जनम् । यदेतन्मनसो रूपं तद्बाह्यं विद्धि नेतरत् ॥२४ गुरुशास्त्रोक्तमार्गेण स्वानुभूत्या च चिद्घने । ब्रह्मैवाहमिति ज्ञात्वा वीतशोको भवेन्मुनिः ॥२५ यत्र निशितासिशतपातनमुत्पलताडनवत्सोढव्यं, अग्नि- दाहो हिमसेचनमिव, अङ्गारार्वटनं चन्दनचर्चैव, निरवधिनाराच विकिरपातो निदाघविनोदनधारागृहशीकरवर्ष णमिव, स्व- शिरश्छेदः सुखनिद्रेव, मूकीकरणमाननमुद्रंक, बाधियं महानुप- चय, इव, इदं नावहेलनया भक्षितव्यं, एवं दृडवैराग्याद्बोधो भवति ॥ २५—१ ॥

महोपनिषत् [ १२१ गुरुवाक्यसमुद्भूतस्वानुभूत्याऽतिशुद्धया । यस्याभ्यासेन तेनात्मा सततं चावलोक्यते ॥२६ विनष्टदिग्भ्रमस्यापि यथापूर्वं विभाति दिक् । तथा विज्ञानविध्वस्तं जगन्नास्तीति भावय ॥२७ न धनान्युपकुर्वन्ति न मित्राणि न बान्धवाः । न कायक्लेशवैधुर्यं न तीर्थायतनाश्रयः । केवलं तन्मनोमात्रजये नासाद्यते पदम् ॥२८ सत्व में स्थित पुरुष स्वर्णिम कमल के समान रात्रि रूप विपत्ति में कुण्ठित नहीं होते । जो भोग सहज उपलब्ध हो जांय उनके सिवा अन्य वस्तु की इच्छा नहीं करते और शास्त्र के अनुकूल चलते हैं, वे सहज ही मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा आदि गुणों से विभूषित रहते हैं । वे सदा समान भाव में स्थित रहकर लगातार साधुवृत्ति में ही रहे आते हैं । वे लोक मर्यादा से परे रहकर समुद्र के समान विशाल हृदय वाले होकर सूर्य के समान नियत मार्ग पर ही गमन करते हैं । विचार करना हो तो स्वयं क्या है, विश्व प्रपंच कैसे उत्पन्न हुआ है, इस पर बुद्धिपूर्वक विचार करे । वह कभी निरर्थक कार्य को न करे और दुष्ट के संग से बचता रहे । मृत्यु सब को खा जाती है, उसके प्रति उपेक्षा-भाव न रखे । यदि उपेक्षा करनी है तो देह, अस्थि, मांस, रक्त आदि नश्वर पदार्थों के प्रति उपेक्षा करे । जैसे मोती की लड़ियों में सूत्र पिरोया जाता है, वैसे प्राणियों में पिरोये हुये चिदात्मा को देखे । देय वस्तु को त्यागे और उपादेय को ग्रहण करे । यह जान लो कि मन का स्वरूप बाहरी है, भीतरी नहीं । गुरु और शास्त्र के वचन तथा अपने अनुभव से "मैं ब्रह्म हूँ" ऐसा जान ले और शोकादि का त्याग करे । ऐसी अवस्था में तीक्ष्ण तलवार के सैकड़ों आघात कमल की कोमल मार के समान सहन करने योग्य हो जाते हैं । अग्नि के द्वारा जलाये जाने का प्रभाव शीतल जल में स्नान करने के समान सहनीय हो

जाता है। आग के अङ्गारों पर लेटना भी ऐसा लगता है जैसे चन्दन का लेप कर लिया हो। देह पर निरन्तर होने वाली घातक वाण वर्षा भी गर्मी को शान्त करने वाली शीतल जल के फुब्बारे के समान मन प्रसन्न करने वाली हो जाती है। सिर का कट जाना सुखदायिनी निद्रा के समान होता है। गूँगा हो जाना मौनावलम्बन के समान और बहिरा हों जाना उन्नति के समान सुखप्रद होता है। परन्तु ऐसी अवस्था उपेक्षा से नहीं मिल सकती। इसकी प्राप्ति वैराग्य से उत्पन्न हुये आत्मज्ञान द्वारा ही सम्भव है। गुरुशास्त्र के वचनों और अपने अनुभव के आधार पर जो मानसिक पवित्रता प्राप्त होती है, उसी के द्वारा निरन्तर आत्म साक्षात्कार होते रहना सम्भव है। जैसे भभूड़े के नष्ट होने पर दिशा का ज्ञान पुनः होने लगता है, वैसे ही विज्ञान द्वारा ध्वस्त हुये विश्व की स्थिति नहीं रहती। धन, मित्र, बन्धु, पुत्र-परिजन आदि मनुष्य का उपकार नहीं कर सकते। शारीरिक क्लेश के नष्ट होने से अथवा तीर्थस्थान में वास कर लेने मात्र से ही मनुष्य लाभान्वित नहीं हो सकता, वह तो चिन्मात्र में लय होकर ही परमपद पा सकता है ॥ १८—२८ ॥

यानि दुःखानि या तृष्णा दुःसहा ये दुराधय । शान्तचेतःसु तत् सर्वं तमोऽर्केष्विव नश्यति ॥२९ मातरीव परं यान्ति विषमाणि मृदूनि च । विश्वासमिह भूतानि सर्वाणि शमशालिनि ॥३० न रसायनपानेन न लक्ष्म्यालिङ्गितेन च । न तथा सुखमाप्नोति शमेनान्तर्यथा जनः ॥३१ श्रुत्वा स्पृष्ट्वा भुक्त्वा च दृष्ट्वा ज्ञात्वा शुभाशुभम् । न हृष्यति ग्लायति यः स शान्त इति कथ्यते ॥३२ तुषारकरबिम्बाच्छं मनो यस्य निराकुलम् । मरणोत्सवयुद्धेषु स शान्त इति कथ्यते ॥३३ तपस्विषु बहुज्ञेषु याज्ञकेषु नृपेषु च ।

महोपनिषद् [ १२३ ] बलवत्सु गुणाढ्येषु शमवानेव राजते ॥३४॥ संतोशामृतपानेन ये शान्तास्तृप्तिमागताः । आत्माराम महात्मानस्ते महापदमागताः ॥३५॥ अप्राप्तं हि परित्यज्य संप्राप्ते समतां गतः । अदृष्टखेदाखेदो यः संतुष्ट इति कथ्यते ॥३६ नाभिनन्दत्यसंप्राप्तं भुङ्क्ते यथेप्सितम् । यः स सौम्यसमाचारः सन्तुष्ट इति कथ्यते ॥३७ रमते धीर्ययाप्राप्ते साध्वीवान्तः पुराजिरे । सा जीवन्मुक्ततोदेति स्वरूपानन्दायिनी ॥३८ यथाक्षणं यथाशास्त्रं यथादेशं यथासुखम् । यथासंभवसत्सङ्गममं मोक्षपथक्रमम् । तावद्विचारयेत् प्राज्ञो यावद्विश्रान्तमात्मनि ॥३९ तुर्यविश्रान्तियुक्तस्य निवृत्तस्य भवार्णवात् । जीवतोऽजीवताश्चैव गृहस्थस्याथवा यतेः ॥४० नाकृतेन कृतेनार्थो न श्रुतिस्मृतिविभ्रमैः । निर्मन्थर इवाम्भोधिः तिष्ठति यथास्थितः ॥४१ संसार में जितने दुःख, जितनी तृष्णायें और दुश्चिन्ताएं हैं, वे सब शान्त मन वाले पुरुष में, सूर्य की किरणों से अन्धकार दूर होने के समान ही नष्ट हो जाती हैं, जैसे माता का पुत्र विश्वास करते हैं, वैसे ही शम वाले पुरुष का सभी मृदु एवं कठोर प्राणी पूर्ण विश्वास करते हैं । जो सुख मनुष्य को शांति से प्राप्त होता है, वैसा सुख लक्ष्मी के आलिंगन द्वारा अथवा अमृत का पान करने पर भी नहीं मिल सकता । शांत मनुष्य वही है जो शुभ-अशुभ को सुनकर भी हर्ष विषाद नहीं करता और भूखा रहने पर या भोजन कर लेने पर दुःख-सुख को नहीं मानता । जिसका मन चन्द्रमा के समान अत्यन्त निर्मल है और जो उत्सव, युद्ध अथवा मृत्यु में भी हर्ष-शोक द्वारा अधीर नहीं होता वहीं

१२४ ] चतुर्थ अध्याय

१२४ ] चतुर्थ अध्याय पुरुष शान्तचित्त कहा जाता है। याज्ञिकों तपस्वियों, बहुश्रुतों, राजाओं, गुणवानों तथा वनवासियों में भी वही शोभा पाता है जो शम से युक्त है। आत्मा में रमण करने वाले महात्मा वही होते हैं जो सन्तोष रूपी अमृत को पीकर शान्त और तृप्त होते हैं। उन्हीं को परमपद की प्राप्ति होती है। सन्तुष्ट वही कहा जाता है जो सम्प्राप्त वस्तु में समान भाव रखता तथा अप्राप्त वस्तु की लालसा नहीं करता और जो सुख-दुख को नहीं देखता। प्राप्त वस्तु के भोग में सन्तुष्ट रहने वाला, अप्राप्त वस्तु की चिन्ता न करने वाला पुरुष समान भाव का आचरण करता है, वही सन्तुष्ट है। जैसे साध्वी नारी अपने घर के आंगन में रहती हुई सुख मानती है, वैसे ही जो प्राप्त हो जाय उसी में सुख मानती हुई बुद्धि रमण करती है, वही अत्यन्त आनन्ददायिनी अवस्था जीवन्मुक्त कही जाती है। जब तक आत्म-विश्रान्ति की प्राप्ति न हो जाय तब तक समय के अनुसार, देश के अनुरूप और शास्त्र के अनुकूल यथासम्भव सत्सङ्ग करते हुए मोक्ष-मार्ग का विचार करता रहे। तुरीयावस्था की विश्रान्ति से युक्त तथा संसार समुद्र से निवृत्त जो पुरुष है, वह गृहस्थ हो या सन्यासी, चाहे सांसारिक जीवन में रहे या न रहे, उसे श्रुति-स्मृति के भ्रम जाल में पड़ने की आवश्यकता नहीं रहती। वह तो उत्पलवहीन समुद्र के समान आत्म-स्थित रहकर ही सब कुछ प्राप्त कर लेता है ॥२६-४१॥ सर्वात्मवेदनं शुद्धं यदोदेति तदात्मकम् । भाति प्रसृतिदिक्कालाबह्यं चिद्रूपदेहकम् ॥४२ एवामात्मा यथा यत्र समुल्लासमुपागतः । निष्ठात्याशु तथा तत्रतद्रूपश्च विराजते ॥४३ यदिदं दृश्यते सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम् । तत् सुषुप्ताविव स्वप्नः कल्पान्ते प्रविनश्यति ॥४४ ऋतमात्मा परं ब्रह्म सत्या मित्यादिका बुधैः । कल्पिता व्यवहारार्थं यस्य संज्ञा महात्मनः ॥४५॥

महोपनिषत् ] [ १२५ यथा कटकशब्दार्थ पृथग्भावो न काञ्चनात्, न हेम कटकात्तद्वज्जगच्छब्दार्थता परा ॥४६ तेनेयमिन्द्रजालश्रीर्जगती प्रवितन्यते । द्रष्टुर्द्द श्यस्य सत्ताऽन्तर्बन्ध इत्यभिधीयते ॥४७ द्रष्टा दृश्यवशाद्बद्धो दृश्याभावे विमुच्यते । जगत्त्वमहमित्यादिसर्गात्मा दृश्यमुच्यते ॥४८ मनसैवेन्द्रजालश्रीर्जगती प्रवितन्यते । यावदेतत् सम्भवति तावन्मोक्षो न विद्यते ॥४६ ब्रह्मणा तन्यते विश्वं मनसैव स्वयंभुवा । मनोमयमतो विश्वं वन्नाम परिदृश्यते ॥५० न बाह्ये नापि हृदये सद्रूपं विद्यते मनः । यदर्थप्रतिभानं तन्मन इत्यभिधीयते ॥५१ संकल्पनं मनो विद्धि संकल्पस्तन्न विद्यते । यत्र संकल्पनं तन्न मनोऽस्तीत्यवगम्यताम् ॥५२ संकल्पनमनसी भिन्ने न कदाचन केन चित् । संकल्पजाते गलिते स्वरूपमवशिष्यते ॥५३ अह त्वं जगदित्यादौ प्रशान्ते दृश्यसंभ्रमे । स्यात्तादृशी केवलता दृश्ये सत्तामुपागते ॥५४ महाप्रलयसम्पत्तौ ह्यसत्ताँ समुपागथे । अशेषदृश्ये सर्गादौ शान्तमेवावशिष्यते ॥५५ अस्त्यनस्तमितो भास्वानजो देवो निरामयः । सर्वदा सर्वकृत् सर्वः परमात्मेत्युदाहृतः ॥५६ यतो वाचो निवर्तन्ते यो भक्तैरवगम्यते । यस्य चात्मादिकाः संज्ञाः कल्पिता न स्वभावतः ॥५७ परायों को अपना देखने वाली सर्वात्ममयी वेदना का जब आविर्भाव होता है तब दिशा और काल के रूप में विस्मृत हुआ विश्व

१२६ ] [ चतुर्थ अध्याय

१२६ ] [ चतुर्थ अध्याय चिद्रूपात्मक ही लगता है। इस प्रकार आत्मा जहाँ जिस रूप में उल्लास को प्राप्त होता है, वहाँ उसी रूप में अवस्थित होकर तद्रूप में स्थित हो जाता है। सुषुप्ति में विलीनावस्था को प्राप्त हुये स्वप्न की भाँति यह सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम दृश्य-जगत प्रलय काल में नष्ट हो जाता है। ज्ञानीजन इस आत्मा को परब्रह्म, सत्य स्वरूप तथा यज्ञ स्वरूप बतलाते हैं। जैसे कङ्कण शब्द की स्वर्ण से पृथक कुछ सत्ता नहीं है, वैसे जगत भी परब्रह्म है, उसकी पृथक् कोई सत्ता नहीं है । परब्रह्म ने ही अपने इस रूप को जगत रूप माया में परिवर्तित किया है । द्रष्टा जब दृश्य में अन्तर्भूत हो जाय तभी बन्धन हो जाता है। दृश्य के वशी- भूत होकर ही द्रष्टा बन्धन में पड़ता है और दृश्य के न होने पर ही मोक्ष है। संसार की 'तेरा-मेरा' रूप भाव वाली सृष्टि ही दृश्य है। संसार में सम्पूर्ण प्रपञ्च रूप माया मन के द्वारा ही प्रवृद्ध होती है । जब तक मानसिक कल्पना नष्ट नहीं होती, तब तक मुक्ति का मार्ग दिखाई नहीं देता। स्वयं आविर्भूत ब्रह्मा ने इस विश्व की मानसिक कल्पना द्वारा रचना की है। इस लिये यह दिखाई पड़ने वाला विश्व मनोमय ही समझना चाहिये । बाह्याभ्यन्तर कहीं भी यह मन सद्रूप में अनावस्थित है। विषयों का बोध होना ही मन कहा गया है । संकल्प ही मन का स्वरूप है क्योंकि वह संकल्प में ही रम रहा है। अतः संकल्प को ही मन समझना चाहिये । आज तक कोई भी संकल्प और मन को पृथक नहीं कर सका। सभी संकल्पों के विनष्ट होने पर आत्मस्वरूप ही शेष रहता है। विश्व 'मैं' और 'तू' इत्यादि इस दिखाई पड़ने वाले प्रपञ्च के प्रशान्त होने पर जब दृश्य का परतत्व हो जाता है तभी कैवल्य की प्राप्ति मानी जाती है। महाप्रलय काल में जब दृश्य में सत्ता का अभाव हो जाता है, तब केवल शान्त आत्मा ही अवस्थित रहता है। जो आत्मरूपी सूर्य अस्त को कभी प्राप्त नहीं होता तथा जो सब दोषों से परे, देव स्वरूप है, जिसमें जाकर वाणी लौट जाती है, उस सर्वकर्त्ता और सर्व रूप के ज्ञाता मुक्त पुरुष ही है । जिनकी आत्मा एवं रूपों की

महोपनिषत् [ १२७ कल्पना जाती है, वे स्वभावतः रूप रहित ब्रह्म ही परमात्मा कहे जाते हैं ॥४२-५७॥ चित्ताकाशं चिदाकाशमाकाशं च तृतीयकम् । द्वाभ्यां शून्यतरं विद्धि चिदाकाशं महामुने ॥५८ देशाद्देशान्तरप्राप्तौ संविदो मध्यमेव यत् । निमेषेण चिदाकाशं तद्विद्धि मुनिपुङ्गव ॥५६ तस्मिन् निरस्तनिःशेषसंकल्प स्थितिमेषि चेत् । सर्वात्मकं पदं शान्तं तदा प्राप्नोष्संशयः ॥६० उदितौदार्यसौन्दर्यनेराग्यरसगर्भिणी । आनन्दस्यन्दिनी यैषा समाधिरभिधीयते ॥६१ दृश्यासंभवबोधेन रागद्वेषादित्तानवे । रतिरर्बलोदिता याऽसौ समाधिरभिधीयते ॥६२ दृश्यासंभवबोधो हि ज्ञानं ज्ञेयं चिदात्मकम् । तदेव केवलीभावं ततोऽन्यत् सकलं मृषा ॥६३ मत्त ऐरावती बद्धः सर्पपीकोणकोटरे । मशकेन कृतं युद्धं सिंहीघैर्रणुकोटरे ॥६४ पद्माक्षे स्थापितो मेरुर्निगीर्णो भृङ्गसूनुना । निदाघ विद्धि तादृक् त्वं जगदेतद्भ्रमात्मकम् ॥६५ चित्तमेव हि संसारो रागादिक्लेशदूषितम् । तदेव तैर्विनिमुक्तं भवान्त इति कथ्यते ॥६६ मनसा भाव्यमानो हि देहतां याति देहकः । देहवासनया मुक्तो देहधर्मेन लिप्यते ॥६७ कल्पं क्षणीकरोत्यन्तः क्षणं नयति कल्पताम् । मनोविलासः संसार इति मे निश्चिता मतिः ॥६८ आकाश तीन माने गये हैं । चिताकाश, चिदाकाश और भौतिक- आकाश । चिदाकाश इन सब में सूक्ष्मतर है । एक देश से दूसरे देश को:

१२८ [] [ चतुर्थ अध्याय

१२८ [] [ चतुर्थ अध्याय गमन करने पर जो मध्य में चित्त का व्यवधान है, उसके निमेष से चिदाकाश ही शेष रहता है । उसी चिदाकाश में समस्त संकल्पों को सत्ताहीन करके स्थित होने पर सर्वात्मक शान्त पद की प्राप्ति हो जाती है । चिदाकाश में अवस्थित होने पर उदारता और वैराग्य से सम्पन्न सर्वानन्दमयी अवस्था की उपलब्धि ही समाधि कही जाती है । उस समय दृश्य पदार्थों की शून्यता का बोध होने पर राग-द्वेषादि दोषों के नष्ट होने पर समाधि अवस्था प्राप्त होती है । उस समय अभ्यास की शक्ति से एकाग्र चित्त में रमण करने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है । दृश्य की सत्ता के अभाव का बोध ही ज्ञान है । उसे ही चिदात्मक ज्ञेयत्व कहते हैं । उसे ही आत्म कैवल्य मानना चाहिये, उससे भिन्न सब प्रपंच मिथ्या हैं। जैसे एक धूलिकण के बिल में मच्छरों का सिंहों के साथ युद्ध करना सम्भव नहीं है और मदोन्मत्त ऐरावत का सरसों के एक कोण छिद्र में बांधा जाना सम्भव नहीं है तथा कमल की पंखुड़ी में स्थित सुमेर का भ्रमर के बालक द्वारा निगला जाना मिथ्या गाथा है, वैसे ही यह विश्व अस्तित्व में नहीं आ सकता, इसकी सत्ता भ्रमात्मक है । राग-द्वेष आदि से दोषयुक्त हुआ चित्त ही संसार रूप है, उसके दोषों से मुक्त हो जाने पर ही मोक्ष की प्राप्ति होना कहा जाता है । मन जब देह की भावना करता है तब आत्मा देहात्मक बनता है और जब देह रूप वासना का लोप हो जाता है, तब वह देह धर्म से लिप्त नहीं होता । मन ही कल्प को क्षण तथा क्षण को कल्प बना देता है । अतः मेरे विचार से यह विश्व मन की कल्पना मात्र ही है ॥५८-६८॥ नाविरतो दुश्चरितान्नाशांतो नासमाहितः । नाशांतमानसो वाऽपि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥६६ तद्ब्रह्मानन्दमद्वन्द्वं निर्गुणं सत्यचिद्धनम् । विदित्वा स्वात्मनो रूपं न बिभेति कदाचन ॥७० परात् परं यन्महतो महान्तं स्वरूपतेजोमयमशाश्वतं शिवम् ।

महोपनिषत् [ १२६ कविं पुराणं पुरुषं सनातनं सर्वेश्वरं सर्वदैवैरूपास्यम् ॥७१ अहं ब्रह्मेति नियत मोक्षहेतुर्महात्मनाम् । द्वे पदे बन्धमोक्षाय निर्ममेति ममेति च । ममेति बध्यते जन्तुर्निर्ममेति विमुच्यते ॥७२ जीवेश्वरादिरूपेण चेतनाचेतनात्मकम् । ईक्षणादिप्रवेशान्ता सृष्टिरीशेन कल्पिता । जाग्रदादिविमोक्षान्तः संसारो जीवकल्पितः ॥७३ त्रिणाचिकादियोगान्ता ईश्वरभ्रान्तिमाश्रिताः । लोकायतादिसांख्यान्ता जीव विभ्रान्तिमाश्रिताः ॥७४ तस्मान्मुमुक्षुभिर्नैव मतिर्जीवेशवादयोः । कार्या किंतु ब्रह्मतत्व निश्चयेन विचार्यताम् ॥७५ अविशेषेण सर्वं तु यः पश्यति चिन्द्वयात् । स एव साक्षाद्विज्ञानी स शिवः स हरिविधिः ॥७६ दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम् । दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥७७ उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनिःशेषकर्मणः । योगिनः सहजावस्था स्वयमेवोपजायते ॥७८ यदा ह्येवैष एतस्मिन्नल्पमप्यन्तरं नरः । विजानाति तदा तस्य भयं स्यान्नात्र संशयः ॥७९ सर्वगं सच्चिदानन्दं ज्ञानचक्षुर्निरीक्षते । अज्ञानचक्षुर्नेक्षेत भास्वतं भानुमन्धवत् ॥८० प्रज्ञानमेव तद्ब्रह्म सत्यप्रज्ञानलक्षणम् । एवं ब्रह्मपरिज्ञानादेव मर्त्योऽमृतो भवेत् ॥८१ भिद्यते हृदयग्रन्थिश्च्छिद्यन्ते सर्व संशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥८२

१३० ] [ चतुर्थ अध्याय

१३० ] [ चतुर्थ अध्याय जो मनुष्य एकाग्रचित्त अथवा शान्त मन वाला नहीं है तथा जो विपरीत आचरण में विरक्त नहीं हुआ है, उसे आत्मबोध कभी नहीं हो सकता। उत्कृष्ट कैवल्य ज्ञान ही आत्मसाक्षात्कार का एकमात्र साधन है। उस निर्गुण, सत्यस्वरूप, द्वन्द्वातीत चिद्घन और आनन्दमय ब्रह्म को अपना ही रूप मान लेने वाला पुरुष कभी भयभीत नहीं होता। "मैं वह ब्रह्म हूँ जो सदा देवताओं का भी उपास्य देव है, जो श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठतर, महान से भी महान, शाश्वत, कल्याणमय, परमतेजोमय, सर्वज्ञ, सनातन एवम् पुराण पुरुष है।" इस प्रकार की भावना ही मोक्ष प्राप्ति का श्रेष्ठ कारण है। ममता बन्धन का कारण है और ममता का परित्याग ही मोक्ष है। यही दो कारण प्राणी के लिये बन्धन अथवा मुक्ति स्वरूप हैं। ब्रह्म संकल्प से लेकर संकल्प त्याग पर्यन्त यह सम्पूर्ण जड़चेतनात्मक सृष्टि की कल्पना ईश्वर ने की है और जाग्रत अवस्था से मोक्ष प्राप्ति पर्यन्त समस्त संसार प्राणी के द्वारा ही कल्पित हुआ है। कठोपनिषद् के अन्तर्गत त्रिणाचिकेतनाग्नि से श्वेताश्वर के योग पर्यन्त के ज्ञान का आधार ईश्वरीय भ्रान्ति है और चार्वाक के मत से लेकर कपिल को सांख्य सिद्धान्त तक की दार्शनिकता का आधार जीव की भ्रान्ति है। इसलिये जो पुरुष मुक्ति की कामना करता है, वह जीव और ईश्वर के वादविवाद में अपनी बुद्धि को भ्रमित न करे। उसे तो दृढ़तापूर्वक ब्रह्मतत्त्व का ही मनन करना चाहिये। ज्ञानी पुरुष वही है जो दिखाई देने वाले सम्पूर्ण विश्व को निर्विशेष चित् रूप मानता हो। शिव, ब्रह्मा और विष्णु भी वही है। विषयों का त्याग जितना दुर्लभ है, उतना ही दुर्लभ तत्त्वज्ञान प्राप्त करना है। सद्गुरु की कृपा के बिना सहजावस्था की प्राप्ति सम्भव नहीं है। जिसने अपनी बोधप्रद शक्ति को जगा लिया है और सब कर्मों का त्याग कर डाला है, ऐसा योगी स्वयं ही सहजावस्था को प्राप्त हो जाता है। जब तक इसमें किंचित भी भिन्नता रहती है, तब तक उसे भय ही भय है। सर्वमय सच्चिदानन्द के दर्शन की अभिलाषा हो तो ज्ञान के चक्षुओं से उनके दर्शन किये जा

महोपनिषत् ] [ १३१ सकते हैं । जिसके पास ज्ञान के चक्षु नहीं, उस अन्धे मनुष्य को प्रकाश- मान सूर्य के दर्शन न होने के समान ही परब्रह्म के दर्शन नहीं होते । वही ब्रह्म प्रज्ञान रूप है, सत्य का लक्षण भी प्रज्ञान ही है । मरणधर्मा मनुष्य ब्रह्म के ज्ञान से ही अमरत्व को पाता है । वह ब्रह्म कार्य कारण रूप है, उसका साक्षात्कार होते ही प्राणी के सब संशय दूर होते और कर्मों का क्षय हो जाता है तथा इसी से हृदय-ग्रन्थियां भी स्वयं खुल जाती हैं ॥६१-८२॥ अनात्मतां परित्यज्य निर्विकारो जगत्स्थितौ । एकनिष्ठतयाऽन्तःस्थसंविमात्रपरो भव ॥८३ मरुभूमौ जलं सर्वं मरुभूमात्रमेव तत् । जगत्त्रयमिदं सर्वं चिन्मात्रं स्वविचारतः ॥८४ लक्ष्यालक्ष्यगतिं त्यक्त्वा यस्तिष्ठेत् केवलात्मना । शिव एव स्वयं साक्षादयं ब्रह्मविदुत्तमः ॥८५ अधिष्ठानमनौपम्यमवाङ् मनसगोचरम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं च तदव्ययम् ॥८६ सर्वं शक्तेर्महेशस्य विलासो हि मनो जगत् । संयमासंयमाभ्यां च संसार शान्तिमन्वगात् ॥८७ हे पुत्र ! सांसारिक स्थिति में निर्विकार भाव से अनात्म के त्यागपूर्वक, आत्म चैतन्य में ही रमते रहो । जैसे मरुभूमि में भ्रमपूर्वक दिखाई देने वाला जल केवल स्थल ही रहता है, वैसे ही जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्तावस्थां वाला यह सम्पूर्ण संसार आत्म चिंतन द्वारा चिन्मय की समझना चाहिये । श्रेष्ठ ज्ञानी एवं शिव रूप वही प्राणी है जो लक्ष्यालक्ष बुद्धि का त्याग कर केवल आत्मनिष्ठ हो जाता है । संयम और असंयम के द्वारा सांसारिक प्रपञ्च शान्त हो जाता है, क्योंकि यह विश्व सर्व शक्तिमान महान् ब्रह्म का मनोविलास ही है । इसका अधि- ष्ठान अनुपम है, सूक्ष्मातिसूक्ष्म तथा अव्यय स्वरूप है ॥८३-८७॥

१३२ [ चतुर्थ अध्याय

१३२ [ चतुर्थ अध्याय

मनोव्याधेश्चिकित्साऽर्थमुपायं कथयामि ते । यद्यत् स्वाभिमतं वस्तु तत्त्यजन् मोक्षमश्नुते ॥८८ स्वायत्तमेकान्तहितं स्वेप्सितत्यागवेदनम् । यस्य दुष्करतां यातं धिक् तं पुरुषकीटकम् ॥८९ स्वपौरुषैकसाध्येन स्वेप्सितत्यागरूपिणा । मनः प्रशममात्रेण विना नास्ति शुभा गतिः ॥९० असंकल्पनशस्त्रेण छिन्नं चित्तमिदं यदा । सर्वं सर्वगतं शान्तं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥९१ भवभावनया मुक्तो युक्तः परमया धिया । धारयात्मानमव्यग्रो ग्रस्तचित्तं चितः पदम् ॥९२ परं पौरुषमाश्रित्य नीत्वा चित्तमचित्तताम् । ध्यानतो हृदयाकाशे चिति चिच्चक्रधारया । मनो मारय निःशङ्कं त्वां प्रबध्नन्ति नारयः ॥९३ अयं सोऽहमिदं तन्मे एतावन्मात्रकं मनः ॥ तदभावनमात्रेण दात्रेणेव विल्रूयते ॥९४ छिन्नाभ्रमण्डलं व्योम्नि तथा शरदि धूयते । वातेनाकल्पकेनैव तथाऽन्तर्धूर्यते मनः ॥९५ कल्पान्तपवना वान्तु वान्तु चैकत्वमर्णवाः । तपन्तु द्वादशादित्या नास्ति निर्मनसः क्षतिः ॥९६ असंकल्पनमात्रैकसाध्ये संकल्पासद्धिते । असंकल्पातिसाम्राज्ये तिष्ठावष्टब्धतत्पदः ॥९७ न हि चञ्चलताहीनं मनः क्वचन दृश्यते । चंचलत्वं मनोधर्मो वह्नेर्धर्मो यथोष्णता ॥९८ एषा हि चंचला स्पन्दशक्तिश्चित्तत्वसस्थिता । तां विद्धि मानसीं शक्तिं जगदाडम्बरात्मिकाम् ॥९९ यत्तु चंचलताहीनं तन्मनोऽमृतमुच्यते ।

महोपनिषत् ] [ १३३ तदेव च तपः शास्त्रसिद्धान्ते मोक्ष उच्यते ॥१०० तस्य चंचलता यैषा त्वविद्या वासनात्मिका । वासनाऽपरनाम्नीं तां विचारेण विनाशय ॥१०१ मन में उत्पन्न हुए विकार का उपाय मैं तुम्हारे प्रति कहता हूँ। जिन-जिन वस्तुओं की प्राप्ति के लिये यह मन चञ्चल हो उन-उन वस्तुओं का त्याग कर देना मोक्ष का एक सरल साधन है। जिसके लिए इच्छित वस्तु के त्याग की भावना, एकान्त प्रियता और आत्मा की आधीनता दुष्कर है, वह पुरुष रूप कीड़ा धिक्कार का ही पात्र है । अपनी इच्छित वस्तु का अपने प्रयत्न से त्याग करना ही मन की शान्ति का श्रेष्ठ उपाय है। इसके सिवा अन्य गति नहीं है। संकल्प शून्यता रूपी अस्त्र जब इस चित्त को काट डालता है, तब सर्वरूप, सर्व अन्त- र्यामी परब्रह्म प्राप्त होते हैं। इसलिए प्रपंच की भावना का त्याग कर श्रेष्ठ बुद्धि वाले होओ और मन को नियन्त्रित कर चिन्मात्र में स्थित हो जाओ। वैराग्य के आश्रम और अभ्यास के सहारे चित्त को अचित्ता- वस्था में स्थित कर हृदयाकाश में ध्यान करे और चेतन में निरत चित्त रूपी चक्र की तीक्षण धार से मन का दमन कर डाले। ऐसा करने से शंका नष्ट हो जायेगी और काम आदि शत्रु बन्धन में न डाल सकेंगे। तेरा मेरा की भावना ही मन है और जब इनका त्याग कर दिया जाता है तब मन का स्वतः नाश हो जाता है। जैसे शरद् ऋतु में छिन्न भिन्न हुए बादल वायु की ठोकरें खाकर आकाश में ही लय हो जाते हैं, वैसे ही सद्विचारों के द्वारा मन भी लीन हो जाता है। मन से रहित पुरुष को कोई हानि नहीं हो सकती, चाहे सम्पूर्ण समुद्र एक होकर सर्वत्र जलमयी सृष्टि ही क्यों न कर दें, चाहे प्रलयकालीन उपन्चासों पवन वेग पूर्वक क्यों न बहने लगें, चाहे बारहों आदित्य मिलकर घोर उष्णता क्यों न उत्पन्न कर डालें। केवल संकल्पहीनता ही सम्पूर्ण सिद्धियों का साधन है। अतः संकल्पहीनता में मग्न होकर रहो । जैसे अग्नि का

धर्म उष्णता है, वैसे ही मन का धर्म चंचलता है, इसलिये सर्वत्र चञ्चल मन ही दृष्टिगोचर होता है। यही चञ्चल स्वभाव वाली स्पन्दन शक्ति चित्त का धर्म है। इस शक्ति को विश्व प्रपञ्च का ही रूप जाने। चञ्चलता रहित मन ही तप है, वह अमृत स्वरूप है, शास्त्र उसे मोक्ष कहते हैं। मन की चञ्चलता ही अविद्या है, वासना उसका लक्षण है। वह वासना ही शत्रु के समान है। विचार वान् पुरुषों का कर्तव्य है कि वे उस वासना को ही नष्ट करने का प्रयत्न करे ॥८८-१०१॥ पौरुषेण प्रयत्नेन यस्मिन्नेव पदे मनः। योज्यते तत् पदं प्राप्य निर्विकल्पो भवानघ ॥१०२ अतः पौरुषमाश्रित्य चित्तमाक्रम्य चेतसा। विशोकं पदमालम्ब्य निरातङ्कः स्थिरो भव ॥१०३ मन एव समर्थं हि मनसो दृढनिग्रहे। अराज्ञा कः समर्थः स्याद्राज्ञो निग्रहकर्मणि ॥१०४ तृष्णाग्राहगृहीतानां संसारावर्णवपातिनाम् । आवर्तेरूह्यमानानां दूरं स्वमन एव नौः ॥१०५ मनसैव मनश्छित्त्वा पाशं परमबन्धनम् । भवादुत्तारयात्मानं नासावन्येन तार्यते ॥१०६ या यादेति मनोनाम्नी वासना वासितान्तरा । तां तां परिहरेत् प्राज्ञस्ततोऽविद्याक्षयो भवेत् ॥१०७ भोगैकवासनां त्यक्त्वा त्यज त्वं भेदवासनाम्। भावाभावौ ततस्त्यक्त्वा निर्विकल्पः सुखी भव ॥१०८ एष एव मनोनाशस्त्वविद्यानाश एव च। तत्तत् संवेद्यते किंचित् तत्रास्थापरिवर्जनम् । अनास्थैव हि निर्वाणं दुःखमास्थापरिग्रहः ॥१०६ अविद्या विद्यमानैव नष्टप्रज्ञेषु दृश्यते। नाम्नैवांगीकृताकाशे सम्यग्वेत्रास्य सा कुतः ॥११०

महोपनिषद् [०. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ १३५ तावत् संसारभृगुषु स्वात्मना सह देहिनम् । आन्दोलयति नीरन्ध्रदुःखकण्टकथालिषु ॥१११ अविद्या यावदस्यास्तु नोत्पन्ना क्षयकारिणी । स्वयमात्मावलोकेच्छा मोहसं क्षयकारिणी ॥११२ अस्याः परं प्रपश्यन्त्याः रुवात्मनाशः प्रजायते । दृष्टे सर्वगते बोधे स्वयं ह्येषा विलीयते ॥११३ इच्छामात्रमविद्येयं तन्नाशो मोक्ष उच्यते । स चांसंकल्पमात्रेण सिद्धो भवति वै मुने ॥११४ हे मुने ! जिस उद्देश्य में [अपने मन को लगाओ उसे प्राप्त करने के लिए निर्विकल्प समाधि को पावो । चित्त को चित्त से वशीभूत करो और शोक रहित रहते हुए आतंक से दूर रहकर शान्ति प्राप्त करो । विषयों से रहित मन ही मन का पूर्ण विरोध कर सकता है । जो राजा राज्य पर आसीन है, वही किसी राजा को पराजित करने में सफलता प्राप्त करता है । जो तृष्णारूपी [ग्राह द्वारा ग्रहण किए हुए हैं, जो संसार सागर में गिरकर किनारे पर आने से असमर्थ हो चुके हैं तथा भँवर जाल में पड़ गये हैं, उनकी रक्षा के कार्य में विषय-विकारों से शून्य मन ही समर्थ है । वही नौका रूप होकर उन्हें पार लगा सकता है । हे मुने ! ऐसे अत्यन्त सामर्थ्य वाले मन के द्वारा इस घोर बन्धन रूप मान- सिक पाश को खण्ड-खण्ड कर डालो और स्वयं ही इस संसार समुद्र से पार हो जाओ क्योंकि दूसरा कोई इस समुद्र से पार नहीं कर सकता । जब जब अन्तःकरण को अच्छादित करने वाली मन रूपी वासना का प्रादुर्भाव हो, तब तब उसका त्याग करना बुद्धिमान पुरुष का कर्त्तव्य है। ऐसा करने से अविद्या रूप अन्धकार नष्ट हो जाता है। प्रथम भोग रूप वासना त्यागनी चाहिए, फिर भेद रूप वासना और उसके पश्चात् भाव अभाव दोनों का ही त्याग कर देना उचित है, इससे हे पुत्र ! तुम विकल्प रहित और सुखी होओ । मन का नाश ही अविद्या का Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

१३६ ] [ चतुर्थ अध्याय

१३६ ] [ चतुर्थ अध्याय नाश होना है। मन के द्वारा जो कुछ भी अनुभव में आवे, उसमें चित्त को मत रमने दो। आस्था का त्याग करना ही मुक्ति है और आस्था के आश्रित रहना ही साक्षात् दुःख है। जो प्रज्ञावान हैं, उनमें अविद्या का स्पर्श भी नहीं होता। उनसे अविद्या दूर ही रहती है। यह प्रज्ञाहीन पुरुषों में ही विद्यमान रहती है। [यह संसार रूपी भ्रमजाल दुःख रूप कंटकों से ओत-प्रोत है और इसे नष्ट करने वाली आत्मसाक्षात्कार की इच्छा जब तक बलवती नहीं होती, तब तक अविद्या इन देहों को निरन्तर भ्रमाती रहती है। जब वह अविद्या परतत्व की ओर से देखती है, तब वह स्वयं ही विनष्ट हो जाती है। सर्वात्मबोध के दर्शन होते ही अविद्या स्वयं ही छिप जाती है। उस अविद्या का स्वरूप केवल इच्छा का नष्ट होना ही मोक्ष कहा गया है। परन्तु इच्छा नष्ट तभी होती है जब संकल्पों का नाश हो जाय अन्यथा इच्छानाश सम्भव नहीं है ॥१०३-११४॥ मनागपि मनोव्योम्नि वासनारजनीक्षये। कालिका तनुतामेति चिदादित्यावलोकनात् ॥११५ चैत्यानुपांत रहितं सामान्येन च सर्वगम् । यच्चित्तत्वमनाख्येयं स आत्मा परमेश्वरः ॥११६ सर्वं च खल्विदं ब्रह्म नित्यचिद्घनमक्षतम् । कल्पनाऽन्या मनोनाम्नी विद्यते न हि काचन ॥११७ न जायते न म्रियते किंचिदत्र जगत्त्रये । न च भावविकाराणां सत्ता क्वचन विद्यते ॥११८ केवलं केवलाभासं सर्वसामान्यमक्षतम् । चैत्यानुपातरहितं चिन्मात्रमिह विद्यते ॥११९ तस्मिन् नित्ये तते शुद्धे चिन्मात्रे निरुपद्रवे । शान्ते शमसमाभोगे निर्विकारे चिदात्मनि ॥१२० यैषा स्वभावाभिमतं स्वयं सकं प्य धावति ।