भारतकोश
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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

उत्तरकाण्ड - सर्ग ६: लवण-वध, वाल्मीकिका पधारना और कुशको परमार्थोपदेश

सर्ग ६ ]उत्तरकाण्ड३६३

| नाज्ञासीद्गीतवाद्यगरिमा नादर्शि नांश्रावि च ॥ | न कभी जानी, न देखी और न सुनी ही है” ॥३२॥ | | एवं स्तुवद्भिरखिलैर्मुनिभिः प्रतिवासरम् । | इसप्रकार प्रतिदिन प्रशंसा करनेवाले समस्त मुनियोंके साथ वे दोनों बालक बहुत समयतक श्रीवाल्मीकिजीके एकान्त आश्रममें सुखपूर्वक रहे ॥ ३३ ॥ | | आसाते सुखमेकान्ते वाल्मीकेराश्रमे चिरम् ॥३३॥ | | | अथ रामोऽश्वमेधादींश्चकार बहुदक्षिणान् । | . इधर परम तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने सुवर्णकी सीता बनाकर अश्वमेध आदि बहुत-से बड़ी-बड़ी दक्षिणाओं-वाले यज्ञ किये ॥३४॥ उस यज्ञशालामें यज्ञोत्सव देखनेके लिये सभी ऋषि, राजर्षि, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आदि आये थे ॥ ३५ ॥ मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिजी भी गान् करते हुए कुश और लवको साथ ले वहाँ आये और जहाँ मुनियोंके ठहरनेका स्थान था वहाँ उतरे ॥ ३६ ॥ वहाँ एक दिन एकान्तमें शान्तभावसे बैठे हुए वाल्मीकि मुनिसे उनकी समाधि खुलनेपर कुशने कथाके बीचमें ही ज्ञानशास्त्रके विषयमें पूछा ॥ ३७ ॥ | | यज्ञान् स्वर्णमयीं सीतां विधाय विपुलद्युतिः॥३४॥ | | | तस्मिन्विताने ऋषयः सर्वे राजर्षयस्तथा । | | | ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः समाजग्मुर्दिदृक्षवः॥३५॥ | | | वाल्मीकिरपि सङ्गृह्य गायन्तौ तौ कुशीलवौ । | | | जगाम ऋषियाटस्य समीपं मुनिपुङ्गवः ॥३६॥ | | | तत्रैकान्ते स्थितं शान्तं समाधिविरमे मुनिम् । | | | कुशः पप्रच्छ वाल्मीकिं ज्ञानशास्त्रं कथान्तरे॥३७॥ | | | भगवन् श्रोतुमिच्छामि सङ्क्षेपान्नृपतोऽखिलम् । | (वह बोला—) “भगवन् ! मैं आपके मुखारविन्दसे संक्षेप-में यह बात सुनना चाहता हूँ कि जीवको यह सुदृढ संसारबन्धन किस प्रकार प्राप्त होता है ? ॥ ३८ ॥ और फिर इस संसार नामक दृढ बन्धनसे उसे छुटकारा कैसे मिलता है ? हे मुने ! आप सर्वज्ञ हैं, मुझ प्रणत शिष्यसे आप यह सम्पूर्ण रहस्य कहिये” ॥ ३९ ॥ | | देहिनः संसृतिर्बन्धः कथमुत्पद्यते दृढः ॥३८॥ | | | कथं विमुच्यते देही दृढबन्धाह्वयान्मिथात् । | | | वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ मह्यं शिष्याय ते मुने ॥३९॥ | | | वाल्मीकिरुवाच | **वाल्मीकिजी बोले—**सुन, मैं तुझे संक्षेपसे साधन-के सहित बन्ध और मोक्षका सम्पूर्ण स्वरूप सुनाता हूँ। मैं जैसा कहूँ वह सब सुनकर तू उसी प्रकार आचरण कर । इससे तेरा कल्याण होगा और तू जीवन्मुक्त हो जायगा । देहहीन चेतन आत्माका यह देह ही बड़ा भारी घर है ॥ ४०-४१ ॥ इसमें उसने अहंकारको ही अपना मन्त्री बना रक्खा है। यह अहंकाररूप मन्त्री देहगेहाभिमानरूप अपने आपको चेतन आत्मामें आरोपितकर उससे एकरूप होकर अपनी सारी चेष्टाओं-का आरोप उस चिदानन्दरूप आत्मामें ही करता है। उस अहंकारसे व्याप्त हुआ देही (जीव ) उसीके संकल्प-से प्रेरित होकर संकल्परूपी बेड़ियोंसे बँधता है और फिर रात-दिन पुत्र, स्त्री और गृह आदिके लिये संकल्प-विकल्प करता रहता है ॥ ४२-४४ ॥ इस प्रकार | | शृणु वक्ष्यामि ते सर्वं सङ्क्षेपाद्बन्धमोक्षयोः । | | | स्वरूपं साधनं चापि मत्तः श्रुत्वा यथोदितम्॥४०॥ | | | तथैवाचर भद्रं ते जीवन्मुक्तो भविष्यसि । | | | देह एव महागेहमदेहस्य चिदात्मनः ॥४१॥ | | | तस्याहङ्कार एवास्मिन्मन्त्री तेनैव कल्पितः । | | | देहगेहाभिमानं स्वं समारोप्य चिदात्मनि ॥४२॥ | | | तेन तादात्म्यमापन्नः स्वचेष्टितमशेषतः । | | | विदधाति चिदानन्दे तद्वासितवपुः स्वयम् ॥४३॥ | | | तेन सङ्कल्पितो देही सङ्कल्पनिगडावृतः । | | | पुत्रदारगृहादीनि सङ्कल्पयति चानिशम् ॥४४॥ | |

३६४अध्यात्मरामायण[सर्ग ६

संकल्पयन्स्वयं देही परिशोचति सर्वदा ।<br>त्रयस्तस्याहमो देहा अधमोत्तममध्यमाः ॥४५॥<br>तमःसत्त्वरजःसंज्ञा जगतः कारणं स्थितेः ।<br>तमोरूपाद्धि सङ्कल्पाश्नित्यं तामसचेष्टया ॥४६॥<br>अत्यन्तं तामसो भूत्वा कृमिकीटत्वमाप्नुयात् ।<br>सत्त्वरूपो हि सङ्कल्पो धर्मज्ञानपरायणः ॥४७॥<br>अदूरमोक्षसाम्राज्यः सुखरूपो हि तिष्ठति ।<br>रजोरूपो हि सङ्कल्पो लोके संव्यवहारवान् ॥४८॥<br>परितिष्ठति संसारे पुत्रदारानुरञ्जितः ।<br>त्रिविधं तु परित्यज्य रूपमेतन्महामते ॥४९॥<br>सङ्कल्पं परमाप्नोति पदमात्मपरिक्षये ।<br>दृष्टीः सर्वाः परित्यज्य नियम्य मनसा मनः॥५०॥<br>सबाह्याभ्यन्तरार्थस्य सङ्कल्पस्य क्षयं कुरु ।<br>यदि वर्षसहस्राणि तपश्चरसि दारुणम् ॥५१॥<br>पातालस्थस्य भूस्थस्य स्वर्गस्थस्यापि तेऽनघ ।<br>नान्यः कश्चिदुपायोऽस्ति सङ्कल्पोपशमादृते ॥५२॥<br>अनाबाधेऽविकारे स्वे सुखे परमपावने ।<br>सङ्कल्पोपशमे यत्नं पौरुषेण परं कुरु ॥५३॥<br>सङ्कल्पतन्तौ निखिला भावाः प्रोताः कलानघ ।<br>छिन्ने तन्तौ न जानीमः क्व यान्ति विभवाः पराः ॥<br>निःसङ्कल्पो यथाप्राप्तव्यवहारपरो भव ।<br>क्षये सङ्कल्पजालस्य जीवो ब्रह्मत्वमाप्नुयात् ॥५५॥<br>अधिगतपरमार्थतामुपेत्य<br>प्रसभमपास्य विकल्पजालमुच्चैः ।<br>अधिगमय पदन्तदद्वितीयं<br>विततसुखाय समुन्नचित्तवृत्तिः ॥५६॥ | संकल्प करनेसे जीव स्वयं ही सदा शोक करता है।<br>इस अहंकारके सत्त्व, रज, तम नामक उत्तम, अधम और मध्यम तीन प्रकारके देह हैं। ये ही तीनों संसारकी स्थितिके कारण हैं। इनमेंसे तामस संकल्पसे नित्यप्रति तामसिक चेष्टाएँ करनेसे ही जीव अत्यन्त तमोगुणी होकर कीड़े-मकोड़े आदि योनियोंको प्राप्त होता है। जो सात्त्विक संकल्पवाला होता है वह धर्म और ज्ञानमें ही तत्पर रहनेके कारण मोक्ष-साम्राज्यके पास ही सुखपूर्वक रहता है। तथा राजस संकल्प होनेसे लोकव्यवहार करता हुआ संसारमें पुत्र, स्त्री आदिमें अनुरक्त रहता है। हे महामते ! जो पुरुष इन तीनों प्रकारके संकल्पोंको छोड़ देता है वह चित्तके लीन होनेपर परमपद प्राप्त कर लेता है। इसलिये तू समस्त विचारोंको छोड़कर और अपने मनसे ही मनका संयम- कर बाहर-भीतरके सम्पूर्ण संकल्पोंका क्षय कर दे। हे अनघ ! यदि तू पाताल, पृथिवी अथवा स्वर्ग आदिमें कहीं भी रहकर हजारों वर्ष कठोर तपस्या भी करे तो भी (संसार-बन्धनसे मुक्त होनेका तो) संकल्पनाशके अतिरिक्त और कोई उपाय है ही नहीं ॥ ४५–५२ ॥ इसलिये जो दुःखहीन, विकारहीन, स्वानन्दस्वरूप और परम पवित्र है उस संकल्पशान्तिके लिये तू पुरुषार्थपूर्वक पूर्ण प्रयत्न कर ॥५३॥ हे अनघ ! ये जितने भाव-पदार्थ हैं वे सब संकल्पके तागेमें पिरोये हुए हैं; जिस समय वह तागा टूट जाता है उस समय पता भी नहीं चलता कि संसारके ये परम वैभव कहाँ चले जाते हैं ? ॥ ५४ ॥ अतः संकल्प-विकल्पको छोड़कर प्रारब्ध-प्रवाहसे प्राप्त हुए व्यवहारमें तत्पर रह । संकल्पजालके क्षीण हो जानेपर जीवको ब्रह्मत्व प्राप्त हो जाता है ॥ ५५ ॥ परमार्थज्ञानसे सम्पन्न होकर तू हठपूर्वक सम्पूर्ण विकल्पजालको त्याग दे और पूर्ण आनन्दकी प्राप्तिके लिये चित्तवृत्तिको लीन करके उस अद्वितीय पदको प्राप्त कर ले ॥ ५६ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

सर्ग ७ ] उत्तरकाण्ड ३६५


सप्तम सर्ग

भगवान् रामके यज्ञमें कुश और लवका गान, सीताजीका पृथिवी-प्रवेश,
रामचन्द्रजीका माताको उपदेश।


श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! वाल्मीकि मुनि-
वाल्मीकिना बोधितोऽसौ कुशः सद्योगतभ्रमः।<br>अन्तर्मुक्तो बहिः सर्वमनुकुर्वंश्चचार सः ॥ १ ॥के इस प्रकार समझानेपर तुरन्त ही कुशका सारा भ्रम जाता रहा और वह अपने अन्तःकरणसे मुक्त होकर बाहरसे सम्पूर्ण क्रियाएँ करते हुए विचरने लगा ॥ १ ॥
वाल्मीकिरपि तौ प्राह सीतापुत्रौ महाधियौ।<br>यत्र तत्र च गायन्तौ पुरे वीथिषु सर्वतः ॥ २ ॥तत्र वाल्मीकिजीने जहाँ-तहाँ नगरकी गलियोंमें सब ओर गाते हुए उन दोनों महाबुद्धिमान् सीता-पुत्रोंसे कहा—॥ २ ॥
तस्याग्रे प्रगायेतां शुश्रूषुर्यदि राघवः।<br>न ग्राह्यं वै युवाभ्यां तद्यदि किञ्चित्प्रदास्यति ॥३॥“यदि महाराज रामकी सुननेकी इच्छा हो तो उनके सामने भी गाओ, परन्तु वे कुछ देने लगें तो लेना मत” ॥ ३ ॥
इति तौ चोदितौ तत्र गायमानौ विचेरतुः।<br>यथोक्तं ऋषिणा पूर्वं तत्र तत्राभ्यगायताम् ॥ ४ ॥मुनिकी ऐसी आज्ञा होनेपर वे गाते हुए विचरने लगे। ऋषिने जहाँ-जहाँ गान करनेको पहले कहा था उन्हीं-उन्हीं स्थानोंपर उन्होंने गान किया।
तं स शुश्राव काकुत्स्थः पूर्वचर्यां ततस्ततः।<br>अपूर्वपाठजातिं च गेयेन समभिप्लुताम् ॥ ५ ॥तब ककुत्स्थनन्दन रघुनाथजीने जहाँ-तहाँ अपने पूर्व-चरित्रके गाये जानेका समाचार सुना।
बाल्यो राघवः श्रुत्वा कौतूहलमुपेयिवान्।<br>अथ कर्मान्तरे राजा समाहूय महामुनीन् ॥६॥भगवान् रामको यह सुनकर कि, उन बालकोंकी गान-विधि निराले ही ढंगकी और स्वर-ताल-सम्पन्न है, बड़ा ही कुतूहल हुआ।
राज्ञश्चैव नरव्याघ्रः पण्डितांश्चैव नैगमान्।<br>पौराणिकाञ् शब्दविदो ये च वृद्धा द्विजातयः ॥७॥अतः नरशार्दूल महाराज रामने यज्ञकर्मके विश्राम-समयमें सम्पूर्ण मुनीश्वरों, राजाओं, पण्डितों, शास्त्रज्ञों, पौराणिकों, शब्दशास्त्रियों, बड़े-बूढ़ों और द्विजातियोंको बुलाया ॥ ४-७ ॥
एतान्सर्वान्समाहूय गायकौ समवेशयत्।<br>ते सर्वे हृष्टमनसो राजानो ब्राह्मणादयः ॥ ८ ॥इन सबको बुला चुकनेपर उन्होंने गानेवाले बालकोंको बुलाया। वे सब राजा और ब्राह्मण आदि प्रसन्न-चित्तसे महाराज राम और उन
रामं तौ दारको दृष्ट्वा विस्मिता ह्यनिमेषणाः।<br>अवोचन् सर्व एवेते परस्परमथागताः ॥ ९ ॥दोनों बालकोंको देखकर आश्चर्यचकित हो गये और उनकी टकटकी बँध गयी। तब वहाँ एकत्रित हुए वे सब लोग आपसमें कहने लगे—॥ ८-९॥
इमौ रामस्य सदृशौ बिम्बाद्विम्बमिवोदितौ।<br>जटिलौ यदि न स्यातां न च वल्कलधारिणौ ॥१०॥“ये दोनों तो, बिम्बसे प्रकट हुए प्रतिबिम्बके समान, श्रीरामचन्द्रजीके समान ही दिखायी देते हैं। यदि ये जटाजूट और वल्कल धारण किये न होते तो इनमें और रघुनाथजीमें कोई
विशेषं नाधिगच्छामो राघवस्यानयोस्तदा।<br>एवं संवदतां तेषां विस्मितानां परस्परम् ॥११॥अन्तर ही न जान पड़ता।” इस प्रकार, जब वे सब लोग आश्चर्यचकित होकर आपसमें विवाद कर रहे थे
उपनद्धमभूत्तूर्णं तावुभौ मुनिदारकौ।<br>ततः प्रवृत्तं मधुरं गान्धर्वमतिमानुषम् ॥१२॥उन दोनों मुनिकुमारोंने गानेकी तैयारी की और (कुछ ही देरमें) वहाँ अत्यन्त मधुर एवं अलौकिक गान होने लगा ॥ १०--१२ ॥
३६६अध्यात्मरामायण[ सर्गः ७

श्रुत्वा तन्मधुरं गीतमपराह्ने रघूत्तमः ।<br>उवाच भरतं चाभ्यां दीयतामयुतं वसु ॥१३॥<br>दीयमानं सुवर्णं तु न तज्जगृहतुस्तदा ।<br>किमनेन सुवर्णेन राजनौ वन्यभोजनौ ॥१४॥<br>इति सन्त्यज्य सन्दत्तं जग्मतुर्मु निसन्निधिम् ।<br>एवं श्रुत्वा तु चरितं रामः स्वस्यैव विस्मितः ॥१५॥<br>ज्ञात्वा सीताकुमारौ तौ शत्रुघ्नं चेदमब्रवीत् ।<br>हनूमन्तं सुषेणं च विभीषणमथाङ्गदम् ॥१६॥<br>भगवन्तं महात्मानं वाल्मीकिं मुनिसत्तमम् ।<br>आनयध्वं मुनिवरं ससीतं देवसम्मितम् ॥१७॥<br>अस्यास्तु पर्षदो मध्ये प्रत्ययं जनकात्मजा ।<br>करोतु शपथं सर्वे जानन्तु गतकल्मषाम् ॥१८॥<br>सीतां तद्वचनं श्रुत्वा गताः सर्वेऽतिविस्मिताः ।<br>ऊचुर्यथोक्तं रामेण वाल्मीकिं रामपार्षदाः ॥१९॥<br>रामस्य हृद्गतं सर्वं ज्ञात्वा वाल्मीकिरब्रवीत् ।<br>श्वः करिष्यति वै सीता शपथं जनसंसदि ॥२०॥<br>योषितां परमं दैवं पतिरेव न संशयः ।<br>तच्छ्रुत्वा सहसा गत्वा सर्वे प्रोचुर्मुनेर्वचः ॥२१॥<br>राघवस्यापि रामोऽपि श्रुत्वा मुनिवचस्तथा ।<br>राजानो मुनयः सर्वे शृणुध्वमिति चाब्रवीत् ॥२२॥<br>सीतायाः शपथं लोका विजानन्तु शुभाशुभम् ।<br>इत्युक्ता राघवेणाथ लोकाः सर्वे दिदृक्षवः ॥२३॥<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव महर्षयः ।<br>वानराश्च समाजग्मुः कौतूहलसमन्विताः ॥२४॥<br>ततो मुनिवरस्तूर्णं ससीतः समुपागमत् ।<br>अग्रतस्तमृषिं कृत्वाऽऽयान्ती किञ्चिदवाङ्मुखी २५<br>कृताञ्जलिर्बाष्पकण्ठा सीता यज्ञं विवेश तम् ।<br>दृष्ट्वा लक्ष्मीमिवायान्तीं ब्रह्माणमनुयायिनीम् ॥२६॥ | वह मधुर गान सुनकर श्रीरघुनाथजीने दिन ढलने-पर भरतजीसे कहा—"इन्हें दश सहस्र सुवर्ण-मुद्रा दो" ॥ १३ ॥ किन्तु उन बालकोंने उस दिये हुए सुवर्णको ग्रहण न किया । वे ऐसा कहकर कि 'हे राजन् ! हम तो वनके कन्द-मूल-फलादि खानेवाले हैं, हम यह द्रव्य लेकर क्या करेंगे' उस दिये हुए सुवर्णको वहीं छोड़कर मुनिके निकट चले आये । इस प्रकार भगवान् राम अपना ही चरित्र सुनकर विस्मित हो गये ॥ १४-१५ ॥ और उन्हें सीताजीके पुत्र जानकर शत्रुघ्न, हनुमान, सुषेण, विभीषण और अंगदादिसे कहा— ॥ १६ ॥ "देवंतुल्य महानुभाव मुनिश्रेष्ठ भगवान् श्रीवाल्मीकि मुनिको सीताजीके सहित लाओ ॥ १७ ॥ इस सभामें जानकीजी सबको विश्वास करानेके लिये शपथ करें, जिससे सब लोग सीताको निष्कलंक जान जायँ ।" भगवान् रामके ये वचन सुनकर उनके वे सब दूत अति आश्चर्यचकित हो वाल्मीकिजीके पास गये और जैसा श्रीरामचन्द्रजीने कहा था वह सब उनसे कह दिया ॥ १८-१९ ॥ इससे भगवान् रामका आशय जानकर श्रीवाल्मीकिजीने कहा-"सीताजी कल जनसाधारणमें शपथ करेंगी ॥ २० ॥ इसमें सन्देह नहीं, स्त्रियोंके लिये सबसे बड़ा देव पति ही है।" मुनिके ये वचन सुनकर उन सबने सहसा जाकर वे सब बातें रघुनाथजीसे कह दीं। तब श्रीरामचन्द्रजीने मुनिका सन्देश सुनकर कहा—"हे नृपतिगण और मुनिजन ! अब आप सब लोग सीताजीकी शपथ सुनें; और उससे उनका शुभाशुभ जान लें ।"<br><br>भगवान् रामके इस प्रकार कहनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, महर्षि और वानर आदि सभी लोग कुतूहलवश सीताजीकी शपथ देखनेके लिये आये॥ २१-२४ ॥ तब तुरन्त ही सीताजीके सहित मुनीश्वर भी आये । श्रीसीताजीने वाल्मीकि मुनिको आगे कर (उनके पीछे-पीछे) मुख कुछ नीचेको किये हाथ जोड़े गद्गद-कण्ठसे यज्ञशालामें प्रवेश किया । ब्रह्माजीके पीछे आती हुई लक्ष्मीजीके समान सीताजीको वाल्मीकि मुनिके पीछे आती |


[ सर्ग ९७ ] | उत्तरकाण्ड | ३६७


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वाल्मीकेः पृष्ठतः सीतां साधुवादो महानभूत् ।<br>तदा मध्ये जनौघस्य प्रविश्य मुनिपुङ्गवः ॥२७॥<br><br>सीतासहायो वाल्मीकिरिति प्राह च राघवम् ।<br>इयं दाशरथे सीता सुव्रता धर्मचारिणी ॥२८॥<br><br>अपापा ते पुरा त्यक्ता ममाश्रमसमीपतः ।<br>लोकापवादभीतेन त्वया राम महावने ॥२९॥<br><br>प्रत्ययं दास्यते सीता तदनुज्ञातुमर्हसि ।<br>इमौ तु सीतातनयाविमौ यमलजातको ॥३०॥<br><br>सुतौ तु तव दुर्धर्षो तथ्यमेतद्ब्रवीमि ते ।<br>प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो रघुकुलोद्वह ॥३१॥<br><br>अनृतं न स्मराम्युक्तं यथेमौ तव पुत्रकौ ।<br>बहून्वर्षगणान् सम्यक्तपश्चर्या मया कृता ॥३२॥<br><br>नोपाश्नीयां फलं तस्या दुष्टेयं यदि मैथिली ।<br>वाल्मीकिनैवमुक्तस्तु राघवः प्रत्यभाषत ॥३३॥<br><br>एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि सुव्रत ।<br>प्रत्ययो जनितो मह्यं तव वाक्यैरकिल्विषैः ॥३४॥<br><br>लङ्कायामपि दत्तो मे वैदेह्या प्रत्ययो महान् ।<br>देवानां पुरतस्तेन मन्दिरे सम्प्रवेशिता ॥३५॥<br><br>सेयं लोकभयाद्ब्रह्मन्नपापाऽपि सती पुरा ।<br>सीता मया परित्यक्ता भवांस्तत्क्षन्तुमर्हति ॥३६॥<br><br>ममैव जातौ जानामि पुत्रावेतौ कुशीलवौ ।<br>शुद्धायां जगतीमध्ये सीतायां प्रीतिरस्तु मे ॥३७॥<br><br>देवाः सर्वे परिज्ञाय रामाभिप्रायमुत्सुकाः ।<br>ब्राह्मणमग्रतः कृत्वा समाजग्मुः सहस्रशः ॥३८॥<br><br>प्रजाः समागमन्हृष्टाः सीता कौशेयवासिनी ।<br>उदङ्मुखी ह्यधोदृष्टिः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥३९॥देख उस जन-समाजमें बड़ा भारी साधुवाद (धन्य है, धन्य है—ऐसा शब्द) होने लगा । तब सीताजीके सहित मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिने उस जन-समूहमें घुसकर श्रीरघुनाथजीसे कहा—"हे दशरथनन्दन ! इस पतिव्रता धर्मपरायणा निष्कलङ्का सीताको तुमने कुछ समय हुआ लोकापवादसे डरकर भयंकर वनमें मेरे आश्रमके पास छोड़ दिया था ॥ २५--२९ ॥ अब वह अपना विश्वास देना चाहती है, आप उसे आज्ञा दीजिये । ये दोनों (कुश और लव) सीताके एक साथ उत्पन्न हुए पुत्र हैं ॥ ३० ॥ मैं सच कहता हूँ, ये दोनों दुर्जय-वीर आपकी ही सन्तान हैं। हे राघव ! मैं प्रजापति प्रचेता-का दशवाँ पुत्र हूँ ॥ ३१ ॥ मैंने कभी मिथ्या भाषण किया हो—ऐसा मुझे स्मरण नहीं है; वही मैं आपसे कहता हूँ कि ये बालक आपकीके पुत्र हैं। मैंने अनेकों वर्षतक खूब तपस्या की है ॥३२॥ यदि इस मिथिलेश-कुमारीमें कोई दोष हो तो मुझे उस तपस्याका कोई फल न मिले ।"<br><br>वाल्मीकिजीके इस प्रकार कहनेपर श्रीरघुनाथजी बोले—॥ ३३ ॥ "हे महाप्राज्ञ ! हे सुव्रत ! आप जैसा कहते हैं, बात ऐसी ही है । आपके निर्दोष वाक्योंसे ही मुझे तो पूर्ण विश्वास हो गया ॥ ३४ ॥ जानकी-जीने लंकामें भी देवताओंके सामने बड़ी विकट परीक्षा दी थी, इसीलिये मैंने उन्हें अपने घरमें रख लिया था ॥ ३५ ॥ किन्तु हे ब्रह्मन् ! उन्हीं सती सीताजीको, सर्वथा निर्दोष होते हुए भी, मैंने लोकनिन्दाके भयसे कुछ दिन हुए छोड़ दिया, सो आप मेरा यह अपराध क्षमा करें ॥ ३६ ॥ मैं यह भी जानता हूँ कि ये दोनों पुत्र कुश और लव मुझसेही उत्पन्न हुए हैं; संसारमें परम साध्वी सीतामें मेरी प्रीति हो" ॥ ३७ ॥<br><br>उस समय, रामजीका अभिप्राय जानकर समस्त देवगण अति उत्सुक हो ब्रह्माजीको आगे कर सहस्रोंकी संख्यामें वहाँ आये ॥ ३८ ॥ तथा बहुत-से प्रजाजन भी प्रसन्नचित्तसे वहाँ एकत्रित हो गये । तब रेशमी वस्त्र धारण किये उत्तरकी ओर मुख और नीचेको नेत्र किये खड़ी हुई श्रीसीताजीने हाथ जोड़कर कहा—

उत्तरकाण्ड - सर्ग ७: कुश-लवका गान, सीताजीका पृथिवी-प्रवेश, माताको उपदेश

३६८अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

रामादन्यं यथाऽहं वै मनसापि न चिन्तये ।<br>तथा मे धरणी देवी विवरं दातुमर्हति ॥४०॥ | ॥ ३९ ॥ "यदि मैं भगवान् रामके अतिरिक्त अन्य पुरुषका मनसे भी चिन्तन नहीं करती तो पृथिवीदेवी मुझे आश्रय दें" ॥ ४० ॥ तथा शपन्त्याः सीतायाः प्रादुरासीन्महाद्भुतम् ।<br>भूतलाद्दिव्यमत्यर्थं सिंहासनमनुत्तमम् ॥४१॥<br>नागेन्द्रैर्ध्रियमाणं च दिव्यदेहै रविप्रभम् ।<br>भूदेवी जानकीं दोर्भ्यां गृहीत्वा स्नेहसंयुता ॥४२॥<br>स्वागतं तासुवाचैनामासने संन्यवेशयत् ।<br>सिंहासनस्थां वैदेहीं प्रविशन्तीं रसातलम् ॥४३॥<br>निरन्तरा पुष्पवृष्टिर्दिव्या सीतामवाकिरत् ।<br>साधुवादश्च सुमहान् देवानां परमाद्भुतः ॥४४॥<br>ऊचुश्च बहुधा वाचो ह्यन्तरिक्षगताः सुराः ।<br>अन्तरिक्षे च भूमौ च सर्वे स्थावरजङ्गमाः ॥४५॥<br>वानराश्च महाकायाः सीताशपथकारणात् ।<br>केचिच्चिन्तापरास्तस्य केचिद्ध्यानपरायणाः॥४६॥<br>केचिद्रामं निरीक्षन्तः केचित्सीतामचेतसः ।<br>मुहूर्तमात्रं तत्सर्वं तूष्णीं भूतमचेतनम् ॥४७॥ | श्रीसीताजीके इस प्रकार शपथ करते ही भूमितलसे एक अति अद्भुत, परम दिव्य और अत्यन्त श्रेष्ठ सिंहासन प्रकट हुआ ॥ ४१ ॥ उस सूर्यके समान् तेजस्वी सिंहासनको दिव्यशरीरधारी नागराजोंने धारण किया हुआ था। तब पृथिवीदेवीने जानकीजीको अपनी दोनों भुजाओंसे प्रेमपूर्वक ग्रहण कर उनका स्वागत किया और उन्हें आसनपर बिठा लिया। जब श्रीसीताजी सिंहासनपर बैठकर रसातलको जाने लगीं तो उनपर दिव्य पुष्पोंकी निरन्तर वर्षा होने लगी और देवताओंके मुखसे साधुवादका अति अद्भुत और महान् घोष होने लगा ॥ ४२--४४ ॥ आकाशमें स्थित देवगण नाना प्रकारके वचन बोलने लगे । सीताजीके शपथ करनेसे आकाश और पृथिवीतलके समस्त स्थावर-जंगम प्राणियों और बड़े-बड़े डीलवाले वानरोंमेंसे कोई चिन्ता करने लगे, कोई ध्यानस्थ हो गये ॥ ४५-४६ ॥ तथा कोई रामजीकी और कोई सीताजीकी ओर देखकर अचेत हो गये । एक मुहूर्तके लिये वह सारा समाज स्तब्ध और चेतनाशून्य हो गया ॥ ४७॥ सीताप्रवेशनं दृष्ट्वा सर्वं संमोहितं जगत् ।<br>रामस्तु सर्वं ज्ञात्वैव भविष्यत्कार्यगौरवम् ॥४८॥<br>अजानन्निव दुःखेन शुशोच जनकात्मजाम् ।<br>ब्रह्मणा ऋषिभिः सार्धं बोधितो रघुनन्दनः ॥४९॥<br>प्रतिबुद्ध इव स्वप्नाच्चकारानन्तराः क्रियाः ।<br>विससर्ज ऋषीन् सर्वानृत्विजो ये समागताः॥५०॥<br>तान् सर्वान् धनरत्नाद्यैस्तोषयामास भूरिशः ।<br>उपादाय कुमारौ तावयोध्यागमत्प्रभुः ॥५१॥<br>तदादि निःस्पृहो रामः सर्वभोगेषु सर्वदा ।<br>आत्मचिन्तापरो नित्यमेकान्ते समुपस्थितः॥५२॥<br>एकान्ते ध्याननिरते एकदा राघवे सति ।<br>ज्ञात्वा नारायणं साक्षात्कौसल्या प्रियवादिनी ॥५३॥ | सीताजीका पृथिवी-प्रवेश देखकर सारा संसार मोहित हो गया । भगवान् राम आगामी कार्यका सम्पूर्ण महत्व जानते थे तथापि अनजानके समान सीताजीके लिये शोक करने लगे । तब ऋषियोंके सहित ब्रह्माजीने रघुनाथजीको समझाया ॥ ४८-४९ ॥ तदनन्तर उन्होंने सोकर उठे हुएके समान यज्ञका अवशेष कर्म समाप्त किया और यज्ञके ऋत्विक् होकर जो ऋषिगण आये थे उन सबको रत्न और धन आदिसे भली प्रकार सन्तुष्टकर विदा किया। फिर प्रभु राम उन दोनों कुमारोंको साथ लेकर अयोध्यापुरीमें आये ॥ ५०-५१ ॥ तबसे श्रीरामचन्द्रजी सब भोगोंसे विरक्त होकर निरन्तर आत्मचिन्तन करते हुए एकान्तमें रहने लगे ॥ ५२ ॥<br>एक दिन जब श्रीरघुनाथजी एकान्तमें ध्यानमग्न थे, प्रियभाषिणी श्रीकौसल्याजीने उन्हें साक्षात् नारायण

सर्ग ७ ]उत्तरकाण्ड३६९
भक्त्याऽऽगत्य प्रसन्नं तं प्रणता प्राह हृष्टधीः ।<br>राम त्वं जगतामादिरादिमध्यान्तवर्जितः ॥५४॥जानकर अति भक्तिभावसे उनके पास आ उन्हें प्रसन्न जान अति हर्षसे विनयपूर्वक कहा—“हे राम ! तुम संसारके आदिकारण हो, तथा स्वयं आदि, अन्त और मध्यसे रहित हो ॥ ५३-५४॥
परमात्मा परानन्दः पूर्णः पुरुष ईश्वरः ।<br>जातोऽसि मे गर्भगृहे मम पुण्यातिरेकतः ॥५५॥तुम परमात्मा, परानन्दस्वरूप, सर्वत्र पूर्ण, जीवरूपसे शरीररूप पुरमें शयन करनेवाले और सबके स्वामी हो; मेरे प्रबल पुण्यके उदय होनेसे ही तुमने मेरे गर्भसे जन्म लिया है ॥५५॥
अवसाने ममाप्यद्य समयोऽभूद्रघूत्तम ।<br>नाद्याप्यबोधजः कृत्स्नो भवबन्धो निवर्तते ॥५६॥हे रघुश्रेष्ठ ! अब अन्त-समयमें मुझे आज ही (आपसे कुछ पूछनेका) समय मिला है, अभीतक मेरा अज्ञानजन्य संसार-बन्धन पूर्णतया नहीं टूटा ॥५६॥
इदानीमपि मे ज्ञानं भवबन्धनिर्वर्तकम् ।<br>यथा संक्षेपतो भूयात्तथा बोधय मां विभो ॥५७॥हे विभो! मुझे संक्षेपमें कोई ऐसा उपदेश दीजिये जिससे अब भी मुझे भवबन्धनका काटनेवाला ज्ञान हो जाय” ॥५७॥
निर्वेदवादिनीमेवं मातरं मातृवत्सलः ।<br>दयालुः प्राह धर्मात्मा जराजर्जरितां शुभाम् ॥५८॥माताके इस प्रकार वैराग्यपूर्ण वचन कहनेपर मातृ-भक्त, दयामय, धर्मपरायण भगवान् रामने जराजर्जरित शुभलक्षणा कौसल्याजीसे कहा—॥ ५८ ॥
मार्गास्त्रयो मया प्रोक्ताः पुरा मोक्षाप्तिसाधकाः।<br>कर्मयोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च शाश्वतः ॥५९॥“मैंने पूर्व-कालमें मोक्षप्राप्तिके साधनरूप तीन मार्ग बतलाये हैं—कर्मयोग, ज्ञानयोग और सनातन भक्तियोग ॥ ५९ ॥
भक्तिर्विभिद्यते मातस्त्रिविधा गुणभेदतः ।<br>स्वभावो यस्य यस्तेन तस्य भक्तिर्विभिद्यते ॥६०॥हे मातः ! (साधकके) गुणानुसार भक्तिके तीन भेद हैं। जिसका जैसा स्वभाव होता है उसकी भक्ति भी वैसे ही भेदवाली होती है ॥६०॥
यस्तु हिंसां समुद्दिश्य दम्भं मात्सर्यमेव वा ।<br>भेददृष्टिश्च संरम्भी भक्तो मे तामसः स्मृतः ॥६१॥जो पुरुष हिंसा, दम्भ या मात्सर्यके उद्देश्यसे भक्ति करता है, तथा जो भेददृष्टिवाला और क्रोधी होता है वह तामस भक्त कहा गया है ॥ ६१ ॥
फलाभिसन्धिर्भोगाथीं धनकामो यशस्तथा ।<br>अर्चादौ भेदबुद्ध्या मां पूजयेत्स तु राजसः॥६२॥जो फलकी इच्छावाला, भोग चाहनेवाला तथा धन और यशकी कामनावाला होता है और भेदबुद्धिसे प्रतिमा आदिमें मेरी पूजा करता है वह रजोगुणी होता है ॥ ६२ ॥
परस्मिन्नर्पितं यस्तु कर्मनिर्हरणाय वा ।<br>कर्तव्यमिति वा कुर्याद्भेदबुद्ध्या स सात्त्विकः । ६३।तथा जो पुरुष परमात्माको अर्पण किये हुए कर्म-सम्पादन करनेके लिये अथवा 'करना चाहिये' इसलिये भेदबुद्धिसे कर्म करता है वह सात्त्विक है ॥ ६३ ॥
मद्गुणाश्रयणादेव मय्यनन्तगुणालये ।<br>अविच्छिन्ना मनोवृत्तिर्यथा गङ्गाम्बुनोऽम्बुधौ ।<br>तदेव भक्तियोगस्य लक्षणं निर्गुणस्य हि ॥६४॥जिस प्रकार गङ्गाजीका जल समुद्रमें अविच्छिन्न-भावसे लीन रहता है उसी प्रकार मनोवृत्तिका मेरे गुणों-के आश्रयसे मुझ अनन्त-गुणधाममें निरन्तर लीन हो जाना ही मेरे निर्गुण-भक्तियोगका लक्षण है ॥ ६४ ॥
अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिर्मयि जायते ।मेरे प्रति जो निष्काम और अखण्ड भक्ति उत्पन्न होती है
३७०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
सा मे सालोक्यसामीप्यसार्ष्ट्रिसायुज्यमेव वा ॥६५॥<br>ददात्यपि न गृह्णन्ति भक्ता मत्सेवनं विना ।<br>स एवात्यन्तको योगो भक्तिमार्गस्य भामिनि ६६<br>मद्भावं प्राप्नुयात्तेन अतिक्रम्य गुणत्रयम् ॥६७॥<br><br>महता कामहीनेन स्वधर्माचरणेन च ।<br>कर्मयोगेन शस्तेन वर्जितेन विहिंसनात् ।<br>मद्दर्शनस्तुतिमहापूजाभिः स्मृतिवन्दनैः ॥६८॥<br>भूतेषु मद्भावनया सङ्गेनासत्यवर्जनैः ।<br>बहुमानेन महतां दुःखिनाम नुकम्पया ॥६९॥<br>स्वसमानेषु मैत्र्या च यमादीनां निषेवया ।<br>वेदान्तवाक्यश्रवणान्मम नामानुकीर्तनात् ॥७०॥<br>सत्सङ्गेनाऽऽर्जवेनैव ह्यहमः परिवर्जनात् ।<br>काङ्क्षया मम धर्मस्य परिशुद्धान्तरो जनः ॥७१॥<br>मद्गुणश्रवणादेव याति मामञ्जसा जनः ॥७२॥<br>यथा वायुवशाद्गन्धः स्वाश्रयाद्घ्राणमाविशेत् ।<br>योगाभ्यासरतं चित्तमेवमात्मानमाविशेत् ।<br>सर्वेषु प्राणिजातेषु ह्यहमात्मा व्यवस्थितः ॥७३॥<br>तमज्ञात्वा विमूढात्मा कुरुते केवलं बहिः ।<br>क्रियोत्पन्नैरनेकभेदैर्द्रव्यैर्ने माम्ब तोषणम् ॥७४॥<br>भूतावमानिनाऽर्चाय्यामर्चितोऽहं न पूजितः॥७५॥<br>तावन्मामर्चयेद्देवं प्रतिमादौ स्वकर्मभिः ।<br>यावत्सर्वेषु भूतेषु स्थितं चात्मनि न स्मरेत् ॥७६॥<br>यस्तु भेदं प्रकुरुते स्वात्मनश्च परस्य च ।<br>भिन्नदृष्टेर्भयं मृत्युस्तस्य कुर्यान्न संशयः ॥७७॥वह साधकको सालोक्य, सामीप्य, सार्ष्टि और सायुज्य* चार प्रकारकी मुक्ति देती है; किन्तु उसके देनेपर भी वे भक्तजन मेरी सेवाके अतिरिक्त और कुछ ग्रहण नहीं करते । हे मात: ! भक्तिमार्गका आत्यन्तिक योग यही है ॥ ६५-६६ ॥ इसके द्वारा भक्त तीनों गुणोंको पार कर मेरा ही रूप हो जाता है ॥ ६७ ॥<br><br>(अब इस निर्गुण भक्तिका साधन बतलाता हूँ-)<br>अपने धर्मका अत्यन्त निष्काम भावसे आचरण करनेसे, अत्युत्तम हिंसारहित कर्म-योगसे, मेरे दर्शन, स्तुति, महापूजा, स्मरण और वन्दनसे ॥६८॥ प्राणियोंमें मेरी भावना करनेसे, असत्यके त्याग और सत्सङ्गसे, महापुरुषोंका अत्यन्त मान करनेसे, दुःखियोंपर दया करनेसे ॥६९॥ अपने समान पुरुषोंसे मैत्री करनेसे यम-नियमादिका सेवन करनेसे, वेदान्तवाक्योंका श्रवण करनेसे, मेरा नाम-सङ्कीर्तन करनेसे ॥७०॥ सत्सङ्ग और कोमलतासे, अहङ्कारका त्याग करनेसे और मेरे भागवत-धर्मोंकी इच्छा करनेसे जिसका चित्त शुद्ध हो गया है, वह पुरुष मेरे गुणोंका श्रवण करनेसे ही अति सुगमतासे मुझे प्राप्त कर लेता है ॥७१-७२॥ जिस प्रकार वायुके द्वारा गन्ध अपने आश्रयको छोड़कर घ्राणेन्द्रियमें प्रविष्ट होता है उसी प्रकार योगाभ्यासमें लगा हुआ चित्त आत्मामें लीन हो जाता है । समस्त प्राणियोंमें आत्मारूपसे मैं ही स्थित हूँ ॥७३॥ हे मात: ! उसे न जानकर मूढ-पुरुष बाह्य भावना करता है, किन्तु क्रियासे उत्पन्न हुए अनेक पदार्थोंसे भी मेरा सन्तोष नहीं होता ॥ ७४ ॥ अन्य जीवोंका तिरस्कार करनेवाले प्राणियोंसे प्रतिमामें पूजित होकर भी मैं वास्तवमें पूजित नहीं होता ॥७५॥ मुझ परमात्मदेवका अपने कर्मोंद्वारा प्रतिमा आदिमें तभीतक पूजन करना चाहिये जबतक कि समस्त प्राणियोंमें और अपने आपमें मुझे स्थित न जाने ॥७६॥ जो अपने आत्मा और परमात्मामें भेद-बुद्धि करता है उस भेददर्शीको मृत्यु अवश्य भय उत्पन्न करती है, इसमें सन्देह नहीं ॥७७॥ इस-

* वैकुण्ठादि भगवान्‌के लोकोंको प्राप्त करना 'सालोक्य' मुक्ति है। हर समय भगवान्‌हीके निकट रहना 'सामीप्य' है, भगवान्‌के समान ऐश्वर्य लाभ करना 'सार्ष्टि' है और भगवान्‌में लीन हो जाना 'सायुज्य' है।

सर्ग ७]उत्तरकाण्ड३७१


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मामन्तः सर्वभूतेषु परिच्छिन्नेषु संस्थितम् ।<br>एकं ज्ञानेन मानेन मैत्र्या चार्चेदभिन्नधीः ॥७८॥लिये अभेददर्शी भक्त समस्त परिच्छिन्न प्राणियोंमें स्थित मुझ एकमात्र परमात्माका ज्ञान, मान और मैत्री आदिसे पूजन करे ॥७८॥
चेतसैवानिशं सर्वभूतानि प्रणमेत्सुधीः ।<br>ज्ञात्वा मां चेतनं शुद्धं जीवरूपेण संस्थितम् ॥७९॥इस प्रकार मुझ शुद्ध चेतनको ही जीवरूपसे स्थित जानकर बुद्धिमान् पुरुष अहर्निश सब प्राणियोंको चित्तसे ही प्रणाम करे ॥७९॥
तस्मात्कदाचिन्नैक्षेत भेदमीश्वरजीवयोः ।<br>भक्तियोगो ज्ञानयोगो मया मातरुदीरितः ॥८०॥<br>आलम्ब्यैकतरं वापि पुरुषः शुभमृच्छति ।इसलिये जीव और ईश्वरका भेद कभी न देखे । हे मातः ! मैंने तुमसे यह भक्तियोग और ज्ञानयोगका वर्णन किया ॥८०॥ इनमेंसे एकका भी अवलम्बन करनेसे पुरुष आत्यन्तिक शुभ प्राप्त कर लेता है ।
ततो मां भक्तियोगेन मातः सर्वहृदि स्थितम् ।<br>पुत्ररूपेण वा नित्यं स्मृत्वा शान्तिमवाप्स्यसि ॥८१॥अतः हे मातः ! मुझे सब प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित जानते हुए अथवा पुत्ररूपसे भक्तियोगके द्वारा नित्यप्रति स्मरण करते रहनेसे तुम शान्ति प्राप्त करोगी” ॥८१॥
श्रुत्वा रामस्य वचनं कौसल्याऽऽनन्दसंयुता ॥८२॥<br>रामं सदा हृदि ध्यात्वा छित्त्वा संसारबन्धनम् ।<br>अतिक्रम्य गतीस्तिस्रोऽप्यवाप परमां गतिम् ॥८३॥भगवान् रामके ये वचन सुनकर कौसल्याजी आनन्दसे भर गयीं ॥८२॥ और हृदयमें निरन्तर श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान करती हुई संसार-बन्धनको काटकर (जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति) तीनों प्रकारकी अवस्थाओंको पारकर परम गतिको प्राप्त हुईं ॥८३॥
कैकेयी चापि योगं रघुपतिगदितं पूर्वमेवाधिगम्य<br>श्रद्धाभक्तिप्रशान्ता हृदि रघुतिलकं भावयन्ती गतासुः ।<br>गत्वा स्वर्गं स्फुरन्ती दशरथसहिता मोदमानावतस्थे<br>माता श्रीलक्ष्मणस्याप्यतिविमलमतिः प्राप भर्तुः समीपम् ॥८४॥कैकेयीने भी रघुनाथजीद्वारा पहले (चित्रकूट पर्वतपर) कहे हुए योगको हृदयंगम कर श्रद्धा और भक्ति-भावसे शान्तिपूर्वक हृदयमें रघुकुलतिलक भगवान् रामका ध्यान करते हुए प्राणत्याग किया और स्वर्गलोकमें जाकर दशरथजीके साथ सुशोभित हो आनन्दपूर्वक रहने लगीं । इसी प्रकार श्रीलक्ष्मणजीकी माता अत्यन्त विमल बुद्धिवाली सुमित्राने भी अपने पतिका सामीप्य प्राप्त किया ॥ ८४ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

३७२ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ८]


अष्टम सर्ग

कालका आगमन, लक्ष्मणजीका परित्याग और उनका स्वर्गगमन।


श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
अथ काले गते कस्मिन् भरतो भीमविक्रमः ।<br>युधाजिता मातुलेन ह्याहूतोऽगात्ससैनिकः ॥ १ ॥<br><br>रामाज्ञया गतस्तत्र हत्वा गन्धर्वनायकान् ।<br>तिस्रः कोटीः पुरे द्वे तु निवेश्य रघुनन्दनः ॥ २ ॥<br><br>पुष्करं पुष्करावत्यां तक्षं तक्षशिलाह्वये ।<br>अभिषिच्य सुतौ तत्र धनधान्यसुहृद्वृतौ ॥ ३ ॥<br><br>पुनरागत्य भरतो रामसेवापरोऽभवत् ।<br>ततः प्रीतो रघुश्रेष्ठो लक्ष्मणं प्राह सादरम् ॥ ४ ॥<br><br>उभौ कुमारौ सौमित्रे गृहीत्वा पश्चिमां दिशम् ।<br>तत्र भिल्लान्विनिर्जित्य दुष्टान् सर्वापकारिणः ॥ ५ ॥<br><br>अङ्गदश्चित्रकेतुश्च महासत्त्वपराक्रमौ ।<br>द्वयोर्द्वे नगरे कृत्वा गजाश्वधनरत्नकैः ॥ ६ ॥<br><br>अभिषिच्य सुतौ तत्र शीघ्रमागच्छ मां पुनः ।<br>रामस्याज्ञां पुरस्कृत्य गजाश्वबलवाहनः ॥ ७ ॥<br><br>गत्वा हत्वा रिपून् सर्वान् स्थापयित्वा कुमारकौ ।<br>सौमित्रिः पुनरागत्य रामसेवापरोऽभवत् ॥ ८ ॥हे पार्वति ! कुछ काल बीतनेपर उग्रपराक्रमी भरतजी अपने मामा युधाजित्-द्वारा बुलाये जानेपर भगवान् रामकी आज्ञा लेकर सेनासहित उनके यहाँ गये। वहाँ पहुँचकर रघुकुलनन्दन भरतजीने तीन करोड़ प्रमुख गन्धर्वोंको मार कर दो नगर बसाये ॥१-२॥ उन्होंने पुष्करावतीमें पुष्कर और तक्षशिलामें तक्ष नामक अपने दोनों पुत्रोंको अभिषिक्त कर और उन्हें धन-धान्य तथा मित्र-मण्डलसे सम्पन्न कर वे लौट आये और भगवान् रामकी सेवामें तत्पर हो गये। तब रघुनाथजीने प्रसन्न होकर आदरपूर्वक लक्ष्मणजीसे कहा—॥३-४॥ "हे सुमित्रानन्दन ! तुम अपने दोनों कुमारोंको लेकर पश्चिम दिशामें जाओ और वहाँ सबका अपकार करनेवाले दुष्ट भिल्लोंको जीतकर दोनोंके लिये दो नगर बसाओ और उनमें महाबलवान् और पराक्रमी अङ्गद तथा चित्रकेतुका हाथी, घोड़े, धन और रत्नादि उपकरणोंसे राजतिलक कर फिर तुरन्त ही मेरे पास लौट आओ।" भगवान् रामकी इस आज्ञाको शिरोधार्य कर लक्ष्मणजी हाथी-घोड़े आदि दल-बलके सहित गये और समस्त शत्रुओंको मारकर दोनों कुमारोंको राजपदपर नियुक्त कर लौट आये तथा फिर रामसेवामें तत्पर हो गये ॥५-८॥
ततस्तु काले महति प्रयाते<br>रामं सदा धर्मपथे स्थितं हरिम् ।<br>द्रष्टुं समागादृषिवेषधारी<br>कालस्ततो लक्ष्मणमित्युवाच ॥ ९ ॥<br><br>निवेदयस्वातिबलस्य दूतं<br>मां द्रष्टुकामं पुरुषोत्तमाय ।<br>रामाय विज्ञापनमस्ति तस्य<br>महर्षिमुख्यस्य चिराय धीमन् ॥ १० ॥<br><br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सौमित्रिस्त्वरयान्वितः ।<br>आचचक्षेऽथ रामाय स सम्प्राप्तं तपोधनम् ॥ ११ ॥<br><br>एवं ब्रुवन्तं प्रोवाच लक्ष्मणं राघवो वचः ।<br>शीघ्रं प्रवेश्यतां तात मुनिः सत्कारपूर्वकम् ॥ १२ ॥तदनन्तर बहुत-सा काल व्यतीत होनेपर सर्वदा धर्ममार्गका अवलम्बन करनेवाले भगवान् रामका दर्शन करनेके लिये ऋषिवेष धारण कर काल आया और लक्ष्मणजीसे यों बोला—॥९॥ "हे बुद्धिमान् ! तुम पुरुषोत्तम महाराज रामसे निवेदन करो कि महर्षि अतिबलका दूत आपके दर्शनकी इच्छासे आया है। मुझे उन्हें बहुत देरतक उन महर्षिश्रेष्ठका सन्देश सुनाना है" ॥१०॥ उसके ये वचन सुनकर लक्ष्मणजीने तुरन्त ही श्रीरघुनाथजीसे कहा कि 'एक तपोधन आये हैं' ॥११॥ लक्ष्मणजीके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने उनसे कहा—"भैया, मुनिराजको तुरन्त ही बड़े सत्कारपूर्वक भीतर ले आओ" ॥१२॥

सर्ग ८ ] उत्तरकाण्ड [ ३७३


लक्ष्मणस्तु तथेत्युक्त्वा प्रावेशयत तापसम्।<br>स्वतेजसा ज्वलन्तं तं घृतसिक्तं यथाऽनलम् ॥१३॥तब लक्ष्मणजी 'बहुत अच्छा' कह घृताहुतिसे प्रज्वलित हुए अग्निके समान अपने तेजसे देदीप्यमान उस तपस्वीको भीतर ले आये ॥१३॥
सोऽभिगम्य रघुश्रेष्ठं दीप्यमानः स्वतेजसा।<br>मुनिर्मधुरवाक्येन वर्धस्वेत्याह राघवम् ॥१४॥अपनी कान्तिसे प्रकाशमान उस मुनिने श्रीरघुनाथजीके पास पहुँचनेपर उनसे अति मधुर वाणीमें 'आपका अभ्युदय हो' इस प्रकार कहा ॥१४॥
तस्मै स मुनये रामः पूजां कृत्वा यथाविधि।<br>पृष्ट्वाऽनामयमव्यग्रो रामः पृष्टोऽथ तेन सः ॥१५॥तब श्रीरामचन्द्रजीने उस मुनिकी विधिपूर्वक पूजा की और फिर शान्त भावसे रामचन्द्रजीने मुनिसे और मुनिने रामचन्द्रजीसे कुशल पूछी ॥१५॥
दिव्यासने समासीनो रामः प्रोवाच तापसम्।<br>यदर्थमागतोऽसि त्वमिह तत्प्रापयस्व मे ॥१६॥तदनन्तर दिव्यासनपर विराजमान महाराज रामने मुनिसे कहा—"आप जिसलिये यहाँ पधारे हैं वह (सन्देश) मुझसे कहिये" ॥१६॥
वाक्येन चोदितस्तेन रामेणाह मुनिर्वचः।<br>द्वन्द्वमेव प्रयोक्तव्यमनालक्ष्यं तु तद्वचः ॥१७॥भगवान् रामके इस वाक्यसे प्रेरित होकर मुनिने कहा—"यह बात हम दोनोंके बीच ही कही जा सकती है और किसीको प्रकट न होनी चाहिये ॥१७॥
नान्येन चैतच्छ्रोतव्यं नाख्यातव्यं च कस्यचित्।<br>शृणुयाद्वा निरीक्षेत यः स वध्यस्त्वया प्रभो ॥१८॥उसे न तो कोई सुने और न वह किसीसे कही जाय। यदि उसे कोई सुने अथवा देखे तो हे प्रभो ! आपको उसे मारना होगा" ॥ १८ ॥
तथेति च प्रतिज्ञाय रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।<br>तिष्ठ त्वं द्वारि सौमित्रे नायात्वत्र जनो रहः ॥१९॥तब रामचन्द्रजीने 'बहुत अच्छा' कह लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! तुम द्वारपर रहो, इस एकान्त स्थानमें मेरे पास कोई न आवे ॥१९॥
यद्यागच्छति को वापि स वध्यो मे न संशयः।<br>ततः प्राह मुनिं रामो येन वा त्वं विसर्जितः ॥२०॥<br><br>यत्ते सनीप्सितं वाक्यं तद्वदस्व समाग्रतः ॥२१॥यदि यहाँ कोई भी आया तो इसमें सन्देह नहीं, वह अवश्य मेरे हाथसे मारा जायगा।" फिर उन्होंने मुनिसे कहा—"तुम्हें जिसने भेजा है और तुम्हारे मनमें जो बात है वह सब मुझसे कहो" ॥२०-२१॥
ततः प्राह मुनिर्वाक्यं शृणु राम यथातथम्।<br>ब्रह्मणा प्रेषितोऽस्मीश कार्यार्थे तेऽन्तिकं प्रभो।<br><br>अहं हि पूर्वजो देव तव पुत्रः परन्तप ॥२२॥तब मुनिने कहा—"हे राम ! जो वास्तविक बात है सो सुनिये। हे ईश ! हे प्रभो ! मुझे एक कार्यके लिये ब्रह्माजीने आपके पास भेजा है। हे देव ! हे शत्रुदमन ! मैं आपका ज्येष्ठ पुत्र हूँ ॥२२॥
मायासङ्गमजो वीर कालः सर्वहरः स्मृतः।<br>ब्रह्मा त्वामाह भगवान् सर्वदेवर्षिपूजितः ॥२३॥<br><br>रक्षितुं स्वर्गलोकस्य समयस्ते महामते।<br>पुरा त्वमेक एवासीर्लोकान् संहृत्य मायया ॥२४॥हे वीर ! मायाके साथ आपका सङ्गम होनेपर मैं प्रकट हुआ था। मैं सबका नाश करनेवाला हूँ और काल नामसे प्रसिद्ध हूँ। समस्त देवर्षियोंसे पूजित भगवान् ब्रह्माजीने आपके लिये कहा है कि 'हे महामते ! अब आपका स्वर्गलोककी रक्षा करनेका समय है। पूर्वकालमें समस्त लोकोंका संहार कर एकमात्र आप ही रह गये थे ॥ २३-२४ ॥
भार्यया सहितस्त्वं मामादौ पुत्रमजीजनः।फिर आपने अपनी भार्या मायाके संयोगसे सबसे पहले अपने
३७४अध्यात्मरामायण[सर्ग ८

तथा भोगवतं नागमनन्तमुदकेशयम् ॥२५॥
मायया जनयित्वा त्वं द्वौ ससत्त्वौ महाबलौ ।
मधुकैटभौ दैत्यौ हत्वा मेदोऽस्थिसञ्चयम् ॥२६॥
इमां पर्वतसम्बद्धां मेदिनीं पुरुषर्षभ ।
पद्मे दिव्यार्कसङ्काशे नाभ्यामुत्पाद्य मामपि ॥२७॥
क्षां विधाय प्रजाध्यक्षं मयि सर्वं न्यवेदयत् ।
सोऽहं संयुक्तसम्भारस्त्वामवोचं जगत्पते ॥२८॥
रक्षां विधत्स्व भूतेभ्यो ये मे वीर्यापहारिणः ।
ततस्त्वं कश्यपाज्जातो विष्णुर्वामनरूपधृक् ॥२९॥
हतवानसि भूभारं वधाद्रक्षोगणस्य च ।
सर्वांस्तूत्सार्यमाणासु प्रजासु धरणीधर ॥३०॥
रावणस्य वधाकाङ्क्षी मर्त्यलोकमुपागतः ।
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ॥३१॥
कृत्वा वासस्य समयं त्रिदशेष्वात्मनः पुरा ।
स ते मनोरथः पूर्णः पूर्णे चायुषि ते नृषु ॥३२॥
कालस्तापसरूपेण त्वत्समीपमुपागमत् ।
ततो भूयश्च ते बुद्धिर्यदि राज्यमुपासितुम् ॥३३॥
तत्तथा भव भद्रं ते एवमाह पितामहः ।
यदि ते गमने बुद्धिर्देवलोकं जितेन्द्रिय ॥३४॥
सनाथा विष्णुना देवा भवन्तु विगतज्वराः ॥३५॥

चतुर्मुखस्य तद्वाक्यं श्रुत्वा कालेन भाषितम् ।
हसन् रामस्तदा वाक्यं कृत्स्नस्यान्तकमब्रवीत् ।
श्रुतं तव वचो मेऽद्य ममापीष्टतरं तु तत् ॥३६॥
सन्तोषः परमो ज्ञेयस्त्वदागमनकारणात् ।
त्रयाणामपि लोकानां कार्यार्थं मम सम्भवः॥३७॥
भद्रं तेऽस्त्वगमिष्यामि यत एवाहमागतः ।


पुत्र मुझको तथा जलमें शयन करनेवाले अनन्त नामक फणधारी शेषनागको रचा ॥२५॥ इस प्रकार मायासे हमें उत्पन्न कर आपने महाबली और बड़े शूरवीर दो मधुकैटभ नामक दैत्योंको मारा तथा उनके मेद और अस्थियोंके समूहरूप इस पर्वतादिसे युक्त पृथिवीको रचा। हे पुरुषश्रेष्ठ ! फिर अपनी नाभिसे प्रकट हुए दिव्य सूर्यके समान तेजस्वी कमलसे मुझे उत्पन्न कर और मुझे ही प्रजापति बनाकर सृष्टि-रचनाका सारा भार मुझे ही सौंप दिया । हे जगत्पते ! इस प्रकार भार ग्रहण करनेपर मैं आपसे बोला-॥२६-२८॥ “जो प्राणी मेरे वीर्य (प्रजा) का नाश करनेवाले हैं उनसे रक्षा कीजिये।” तब आप कश्यपजीके यहाँ वामनरूपधारी विष्णुभगवान् होकर प्रकट हुए ॥२९॥ और राक्षसोंका नाश करके आपने पृथिवीका भार उतारा । हे धरणीधर ! (इस समय भी) सारी प्रजा-को उच्छिन्न होते देख आप रावणका वध करनेके लिये मर्त्यलोकमें पधारे थे। यहाँ रहनेके लिये आपने पूर्वकालमें देवताओंमें ग्यारह सहस्र वर्षका समय निश्चित किया था, सो आपकी मानव-शरीरकी आयु पूर्ण होनेके साथ ही आपका वह मनोरथ पूर्ण हो चुका है ॥३०-३२॥ अब, तापसरूपसे काल आपके पास आया है। यदि अभी आपका विचार कुछ दिन और राज्य करनेका हो तो आपका शुभ हो, वैसा ही कीजिये'-ऐसा पितामह ब्रह्माजीने कहा है। हे जितेन्द्रिय ! यदि आपका विचार भी देवलोक चलनेका हो तो (आप) विष्णुभगवान्‌से सनाथ होकर देवगण निश्चिन्त हो जायें” ॥३३-३५॥

कालके मुखसे ब्रह्माजीके ये वचन सुनकर रामजी हँसे और सबका अन्त करनेवाले कालसे बोले- “मैंने तुम्हारी सब बातें सुन लीं । वे मुझे भी अत्यन्त इष्ट हैं ॥ ३६ ॥ तुम्हारे आनेके कारण मुझे बड़ा सन्तोष हुआ है। मेरा अवतार तीनों लोकोंका कार्य करनेके लिये ही हुआ करता है ॥३७॥ तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जहाँसे आया था वहीं फिर

उत्तरकाण्ड - सर्ग ८: कालका आगमन, लक्ष्मणजीका परित्याग और स्वर्गगमन

सर्ग ८ ] | उत्तरकाण्ड | ३७५


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मनोरथस्तु सम्प्राप्तो न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥३८॥<br><br>मत्सेवकानां देवानां सर्वकार्येषु वै मया ।<br>स्थातव्यं मायया पुत्र यथा चाह प्रजापतिः ॥३९॥पहुँच आऊँगा; मेरा सारा मनोरथ पूर्ण हो गया, इसमें मुझे कुछ विचारना नहीं है ॥३८॥ हे पुत्र ! देवगण मेरे सेवक हैं; मुझे, जैसा कि ब्रह्माजीने कहा है, मायासे उनके सब कार्योंमें अवश्य तत्पर रहना चाहिये" ॥३९॥
एवं तयोः कथयतोर्दुर्वासा मुनिरभ्यगात् ।<br>राजद्वारं राघवस्य दर्शनापेक्षया द्रुतम् ॥४०॥उनके इस प्रकार वार्तालाप करते समय मुनिवर दुर्वासाजी रघुनाथजीके दर्शनकी इच्छासे शीघ्रताके साथ राजद्वारपर पहुँचे ॥४०॥
मुनिर्लक्ष्मणमासाद्य दुर्वासा वाक्यमब्रवीत् ।<br>शीघ्रं दर्शय रामं मे कार्यं मेऽत्यन्तमाहितम् ॥४१॥वहाँ दुर्वासा मुनिने लक्ष्मणजीके पास आकर कहा—"मुझे तुरन्त ही महाराज रामसे मिलाओ, मेरा उनसे एक अत्यन्त आवश्यक कार्य आ पड़ा है" ॥४१॥
तच्छ्रुत्वा प्राह सौमित्रिर्मुनिं ज्वलनतेजसम् ।<br>रामेण कार्यं किं तेऽद्य किं तेऽभीष्टं करोम्यहम् ॥४२॥यह सुन श्रीलक्ष्मणजीने उन अग्निके समान तेजस्वी मुनिसे कहा—"इस समय महाराज रामसे आपको क्या काम है ? आपकी क्या इच्छा है ? उसे मैं ही पूरा करूँगा ॥४२॥
राजा कार्यान्तरे व्यग्रो मुहूर्तं सम्प्रतीक्ष्यताम् ।<br>तच्छ्रुत्वा क्रोधसन्तप्तो मुनिः सौमित्रिमब्रवीत् ॥४३॥इस समय महाराज एक और कार्यमें संलग्न हैं, कुछ देर ठहरिये।" यह सुनते ही मुनिने क्रोधसे व्याकुल होकर लक्ष्मणजीसे कहा—॥४३॥
अस्मिन् क्षणे तु सौमित्रे न दर्शयसि चेद्दिदृक्षुम् ।<br>रामं सविषयं वंशं भस्मीकुर्यां न संशयः ॥४४॥"लक्ष्मण ! यदि इसी क्षण तुमने मुझे भगवान् रामसे न मिलाया, तो इसमें सन्देह नहीं, मैं देशके सहित तुम्हारे वंशको अभी भस्म कर डालूँगा' ॥४४॥
श्रुत्वा तद्वचनं घोरमृषेर्दुर्वाससो भृशम् ।<br>स्वरूपं तस्य वाक्यस्य चिन्तयित्वा स लक्ष्मणः ॥<br>सर्वनाशाद्वरं मेऽद्य नाशो ह्येकस्य कारणात् ।<br>निश्चित्यैवं ततो गत्वा रामाय प्राह लक्ष्मणः ॥४६॥दुर्वासा ऋषिका यह भयङ्कर वाक्य सुनकर लक्ष्मणजीने उसके स्वरूपका भलीभाँति विचार किया और यह निश्चय कर कि एकके कारण सबके नाशसे तो (अकेले) मेरा नष्ट होना ही अच्छा है, उन्होंने रामचन्द्रजीके पास जाकर सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥४५-४६॥
सौमित्रेर्वचनं श्रुत्वा रामः कालं व्यसर्जयत् ।<br>शीघ्रं निर्गम्य रामोऽपि ददर्शात्रेः सुतं मुनिम् ॥४७॥लक्ष्मणजीके वचन सुनकर रामचन्द्रजीने कालको विदा किया और शीघ्र ही बाहर आ अत्रिनन्दन दुर्वासाजीसे मिले ॥४७॥
रामोऽभिवाद्य सम्प्रीतो मुनिं पप्रच्छ सादरम् ।<br>किं कार्यं ते करोमीति मुनिमाह रघूत्तमः ॥४८॥रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने मुनिको प्रणाम कर चित्तमें प्रसन्न हो उनसे आदरपूर्वक पूछा । रामने मुनिसे कहा—"हे मुने ! मैं आपका क्या कार्य करूँ ?" ॥४८॥
तच्छ्रुत्वा रामवचनं दुर्वासा राममब्रवीत् ।<br>अद्य वर्षसहस्राणामुपवाससमापनम् ॥४९॥<br><br>अतो भोजनमिच्छामि सिद्धं यत्ते रघूत्तम ।श्रीरामके ये वचन सुनकर दुर्वासाजीने कहा—"आज मेरा एक हजार वर्षका उपवास समाप्त हुआ है ॥४९॥ इसलिये हे रघुश्रेष्ठ ! आपके यहाँ जो भोजन तैयार हो मुझे उसीकी इच्छा है।" मुनिके ये वचन सुन

३७६. अध्यात्मरामायण [ सर्ग ८


राम्रो मुनिवचः श्रुत्वा सन्तोषेण समन्वितः ॥५०॥
स सिद्धमन्नं मुनये यथावत्समुपाहरत् ।
मुनिर्भुक्त्वाऽन्नममृतं सन्तुष्टः पुनरभ्यगात् ॥५१॥
स्वमाश्रमं गते तस्मिन् रामः सस्मार भाषितम् ।
कालेन शोकदुःखार्तो विमनाश्चातिविह्वलः ॥५२॥
अवाङ्मुखो दीनमना न शशाकाभिभाषितुम् ।
मनसा लक्ष्मणं ज्ञात्वा हतप्रायं रघूद्वहः ॥५३॥
अवाङ्मुखो बभूवाथ तूष्णीमेवाखिलेश्वरः ।
ततो रामं विलोक्याह सौमित्रिर्दुःखसम्प्लुतम् ॥५४॥
तूष्णीम्भूतं चिन्तयन्तं गर्हन्तं स्नेहबन्धनम् ।
मत्कृते त्यज सन्तापं जहि मां रघुनन्दन ॥५५॥
गतिः कालस्य कलिता पूर्वमेवेदृशी प्रभो ।
त्वयि हीनप्रतिज्ञे तु नरको मे ध्रुवं भवेत् ॥५६॥
मयि प्रीतिर्यदि भवेद्यद्यनुग्राह्यता तव ।
त्यक्त्वा शङ्कां जहि प्राज्ञ मा मा धर्मं त्यज प्रभो ॥५७॥
सौमित्रिणोक्तं तच्छ्रुत्वा रामश्चलितमानसः ।
आहूय मन्त्रिणः सर्वान् वसिष्ठं चेदमब्रवीत् ॥५८॥
मुनेरागमनं यत्तु कालस्यापि हि भाषितम् ।
प्रतिज्ञामात्मनश्चैव सर्वमावेदयत्प्रभुः ॥५९॥
श्रुत्वा रामस्य वचनं मन्त्रिणः सपुरोहिताः ।
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे राममक्लिष्टकारिणम् ॥६०॥
पूर्वमेव हि निर्दिष्टं तव भूभारहारिणः ।
लक्ष्मणेन वियोगस्ते ज्ञातो विज्ञानचक्षुषा ॥६१॥
त्यजाशु लक्ष्मणं राम मा प्रतिज्ञां त्यज प्रभो ।
प्रतिज्ञाते परित्यक्ते धर्मो भवति निष्फलः ॥६२॥


रामचन्द्रजीने सन्तुष्ट हो उन्हें विधिपूर्वक सिद्ध (पकाया हुआ) अन्न दिया और मुनि उस अमृततुल्य अन्नको खाकर तृप्त होकर चले गये ॥५०-५१॥

जब दुर्वासा मुनि अपने आश्रमको चले गये तो रघुनाथजीको कालके कहे हुए वचनोंका स्मरण हुआ। इससे वे शोक और दुःखसे आर्त्त तथा अति उदास और व्याकुल हो गये ॥५२॥ रघुकुल-भूषण रामने मन-ही-मन लक्ष्मणको मरा हुआ-सा मान लिया किन्तु वे दीन चित्तसे नीचेको मुख किये बैठे रहे, उनसे कुछ कह न सके ॥५३॥ सर्वेश्वर भगवान् राम नीचा मुख किये चुपचाप रह गये। तब रघुनाथजीको अत्यन्त दुःखातुर, मौन, चिन्तित और स्नेह-बन्धनकी निन्दा करते देख लक्ष्मणजीने कहा—"हे रघुनन्दन ! मेरे लिये सन्ताप न कीजिये, मुझे शीघ्र ही मार डालिये ॥५४-५५॥ प्रभो ! मैंने पहले ही निश्चय कर लिया था, कालकी गति ऐसी ही है। आपके प्रतिज्ञा-भङ्ग करनेसे तो मुझे भी अवश्य नरक भोगना पड़ेगा ॥५६॥ अतः यदि आपकी मुझपर प्रीति है और यदि मैं अनुग्रह करनेयोग्य हूँ तो हे मतिमान् रामजी ! शङ्का छोड़कर मुझे मार डालिये। प्रभो ! धर्मका त्याग न कीजिये ॥५७॥

लक्ष्मणजीका यह कथन सुनकर श्रीरघुनाथजीका चित्त चञ्चल हो गया। उन्होंने सब मन्त्रियोंको बुलाकर यह सब वृत्तान्त वसिष्ठजीको सुनाया ॥५८॥ प्रभु रामने दुर्वासा मुनिका आगमन, कालका भाषण और अपनी प्रतिज्ञा ये सब बातें उनसे कह दीं ॥५९॥ रामचन्द्रजीका कथन सुन पुरोहित वसिष्ठजीके सहित समस्त मन्त्रियोंने सब कार्य लीलाहीसे करनेवाले भगवान् रामसे हाथ जोड़कर कहा—॥६०॥ "प्रभो! पृथिवीका भार उतारनेवाले आपका लक्ष्मणजीसे पहले ही वियोग होना निश्चित है—यह बात हमने ज्ञान-दृष्टिसे जान ली है ॥६१॥ अतः हे राम ! तुरन्त ही लक्ष्मणजीको त्याग दीजिये, प्रभो ! अपनी प्रतिज्ञा भङ्ग न कीजिये क्योंकि प्रतिज्ञा-भङ्ग करनेसे सारा धर्म निष्फल हो जाता है ॥६२॥ और हे राम ! सम्पूर्ण धर्मका

सर्ग ८ ] उत्तरकाण्ड ३७७


धर्मे नष्टेऽखिले राम त्रैलोक्यं नश्यति ध्रुवम् ।<br>त्वं तु सर्वस्य लोकस्य पालकोऽसि रघूत्तम ।<br>त्यक्त्वा लक्ष्मणमेवैकं त्रैलोक्यं त्रातुमर्हसि ॥ ६३॥<br>रामो धर्मार्थसहितं वाक्यं तेषामनिन्दितम् ॥ ६४॥<br>...णमध्ये समाश्रुत्य प्राह सौमित्रिमञ्जसा ।<br>यथेष्टं गच्छ सौमित्रे माभूद्धर्मस्य संशयः ॥ ६५॥<br>परित्यागो वधो वापि सतामेवोभयं समम् ।<br>एवमुक्ते रघुश्रेष्ठे दुःखव्याकुलितेक्षणः ॥ ६६॥<br>रामं प्रणम्य सौमित्रिः शीघ्रं गृहमगात्स्वकम् ।<br>ततोऽगात्सरयूतीरमाचम्य स कृताञ्जलिः ॥ ६७॥<br>नव द्वाराणि संयम्य मूर्ध्नि प्राणमधारयत् ।<br>यदक्षरं परं ब्रह्म वासुदेवाख्यमव्ययम् ॥ ६८॥<br>पदं तत्परमं धाम चेतसा सोऽभ्यचिन्तयत् ।<br>वायुरोधेन संयुक्तं सर्वे देवाः सहर्षयः ॥ ६९॥<br>साग्नयो लक्ष्मणं पुष्पैस्तुष्टुवुश्च समाकिरन् ।<br>अदृश्यं विबुधैः कैश्चित्सशरीरं स वासवः ॥ ७०॥<br>गृहीत्वा लक्ष्मणं शक्रः स्वर्गलोकमथागमत् ।<br>ततो विष्णोश्चतुर्भागं तं देवं सुरसत्तमाः ।<br>सर्वे देवर्षयो दृष्ट्वा लक्ष्मणं समपूजयन् ॥ ७१॥नाश हो जानेपर निश्चय ही त्रिलोकीका नाश हो जाता है । हे रघुश्रेष्ठ ! आप तो सम्पूर्ण लोकोंके रक्षक हैं; अतः अकेले लक्ष्मणजीको ही त्यागकर आपको त्रिलोकीकी रक्षा करनी चाहिये" ॥ ६३॥<br><br>रघुनाथजीने सभामें उनके धर्मार्थयुक्त और निर्दोष वचन सुनकर तुरन्त ही लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो वहाँ चले जाओ, जिससे धर्ममें संशय उपस्थित न हो ॥ ६४-६५॥ सत्पुरुषोंके लिये त्याग और वध दोनों समान ही हैं।" रघुश्रेष्ठ भगवान् रामके ऐसा कहनेपर लक्ष्मणजीकी आँखें दुःखसे डबडबा आयीं और वे शीघ्र ही उन्हें प्रणाम कर अपने घर आये । वहाँसे वे सरयूतटपर पहुँचे और आचमन करनेके अनन्तर उन्होंने हाथ जोड़ अपने नवों इन्द्रियगोलकोंको रोककर प्राणोंको ब्रह्मरन्ध्रमें स्थिर किया । फिर जो वासुदेव नामक अव्यय और अविनाशी परब्रह्म पद है, उस परमधामका चित्तमें ध्यान किया । इस प्रकार प्राणनिरोध करनेपर ऋषियों तथा अग्निके सहित समस्त देवताओंने लक्ष्मणजीपर पुष्प बरसाये और उनकी स्तुति की । इसी समय इन्द्र किसी भी देवताको दिखायी न देते हुए उन्हें सशरीर लेकर स्वर्गलोकमें चले आये । तब विष्णुभगवान्‌के चतुर्थांशरूप उन लक्ष्मणदेवको देखकर समस्त देवताओं और देवर्षियोंने उनका पूजन किया ६६-७१॥ भगवान्
लक्ष्मणे हि दिवमागते हरौ<br>$\hspace{2cm}$सिद्धलोकगतयोगिनस्तदा ।<br>ब्रह्मणा सह समागमन्मुदा<br>$\hspace{2cm}$द्रष्टुमाहितमहाहिरूपकम् ॥ ७२॥लक्ष्मणजीके स्वर्ग पधारनेपर ब्रह्माजीके सहित सिद्धलोकनिवासी समस्त योगीजन अति प्रसन्न होकर महासर्प (शेष) रूपधारी श्रीलक्ष्मणजीका दर्शन करनेके लिये आये ॥ ७२॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

३७८अध्यात्मरामायण[सर्ग ९]

नवम सर्ग

महाप्रयाण।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
लक्ष्मणं तु परित्यज्य रामो दुःखसमन्वितः ।<br>मन्त्रिणो नैगमांश्चैव वसिष्ठं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥हे पार्वति ! लक्ष्मणजीको त्याग देनेपर रघुनाथजीने अत्यन्त दुःखातुर हो मन्त्रियों, वेदवेत्ताओं और वसिष्ठजीसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
अभिषेक्ष्यामि भरतमधिराज्ये महामतिम् ।<br>अद्य चाहं गमिष्यामि लक्ष्मणस्य पदानुगः ॥ २ ॥“आज महामति भरतको राजतिलक कर मैं भी लक्ष्मणके मार्गका अनुसरण करूँगा” ॥ २ ॥
एवमुक्ते रघुश्रेष्ठे पौरजानपदास्तदा ।<br>द्रुमा इवच्छिन्नमूला दुःखार्ताः पतिता भुवि ॥ ३ ॥रघुनाथजीके इस प्रकार कहनेपर पुरवासी तथा देशवासी लोग दुःखातुर होकर जड़से कटे हुए वृक्षके समान पृथिवीपर गिर पड़े ॥ ३ ॥
मूर्च्छितो भरतो चापि श्रुत्वा रामाभिभाषितम् ।<br>गर्हयामास राज्यं स प्राहेदं रामसन्निधौ ॥ ४ ॥रामजीका कथन सुनकर भरतजीको भी मूर्च्छा आ गयी। उन्होंने रघुनाथजीके निकट राज्यकी निन्दा करते हुए इस प्रकार कहा— ॥ ४ ॥
सत्येन च शपे नाहं त्वां विना दिवि वा भुवि ।<br>काङ्क्षे राज्यं रघुश्रेष्ठ शपे त्वत्पादयोः प्रभो ॥ ५ ॥“हे रघुश्रेष्ठ ! मैं सत्यकी शपथ करके कहता हूँ, हे प्रभो ! मुझे आपके चरणोंकी सौगन्ध है कि आपके बिना मुझे स्वर्ग-लोक या भूर्लोक कहींके भी राज्यकी इच्छा नहीं है ॥ ५ ॥
इमौ कुशलवौ राजन्नभिषिञ्चस्व राघव ।<br>कोशलेषु कुशं वीरमुत्तरेषु लवं तथा ॥ ६ ॥हे महाराज राम ! इन कुश और लवको ही राजतिलक कीजिये—अवधमें वीरवर कुशको और उत्तरमें लवको राजा बनाइये ॥ ६ ॥
गच्छन्तु दूतास्त्वरितं शत्रुघ्नानयनाय हि ।<br>अस्माकमेतद्गमनं खर्वासय शृणोतु सः ॥ ७ ॥शीघ्र ही शत्रुघ्नको लानेके लिये दूत जाने चाहिये, जिससे वह भी हमारे स्वर्ग-वासके लिये जानेका वृत्तान्त सुन ले” ॥ ७ ॥
भरतेनोदितं श्रुत्वा पतितास्ताः समीक्ष्य तम् ।<br>प्रजाश्च भयसंविग्ना रामविश्लेषकातराः ॥ ८ ॥<br>वसिष्ठो भगवान् राममुवाच सदयं वचः ।<br>पश्य तातादरात्सर्वाः पतिता भूतले प्रजाः ॥ ९ ॥भरतजीका कथन सुन उनकी ओर देखकर सम्पूर्ण प्रजा भयभीत तथा रामजीके वियोगसे व्याकुल हो पृथिवीपर गिर पड़ी। तब भगवान् वसिष्ठजीने रघुनाथजीसे करुणायुक्त वचन कहा— “हे तात ! सारी प्रजा पृथिवीपर पड़ी हुई है उसे कृपा-दृष्टिसे देखो ॥ ८-९ ॥
तासां भावानुगं राम प्रसादं कर्तुमर्हसि ।<br>श्रुत्वा वसिष्ठवचनं ताः समुत्थाप्य पूज्य च ॥ १० ॥<br>सस्नेहो रघुनाथस्ताः किं करोमीति चाब्रवीत् ।<br>ततः प्राञ्जलयः प्रोचुः प्रजा भक्त्या रघूद्वहम् ॥ ११ ॥हे राम ! इनके प्रेम-भावानुसार तुम्हें भी इनपर कृपा करनी चाहिये।” वसिष्ठजीके ये वचन सुनकर रघुनाथजीने उन सबोंको उठाया और उनका सत्कार कर उनसे प्रेमपूर्वक पूछा— “कहो, मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ ?” तब प्रजाजन हाथ जोड़कर रघुनाथजीसे भक्तिपूर्वक बोले ॥ १०-११ ॥
गन्तुमिच्छसि यत्र त्वमनुगच्छामहे वयम् ।<br>अस्माकमेषा परमा प्रीतिर्धर्मोऽयमक्षयः ॥ १२ ॥“आप जहाँ जाना चाहते हैं हम भी वहीं आपका अनुगमन करेंगे। यही हमारी सबसे बड़ी प्रसन्नता और अक्षय धर्म है ॥ १२ ॥
तवानुगमने राम हृद्गता नो दृढा मतिः ।<br>पुत्रदारादिभिः सार्धमनुयामोऽद्य सर्वथा ॥ १३ ॥<br>तपोवनं वा स्वर्गं वा पुरं वा रघुनन्दन ।हे राम ! हमारे हृदयमें आपका अनुगमन करनेका ही दृढ़ विचार है। अतः हे रघुनन्दन ! आप तपोवन, नगर, स्वर्ग आदि कहीं

सर्ग ९ ] उत्तरकाण्ड ३७९

ज्ञात्वा तेषां मनोदाढर्यं कालस्य वचनं तथा ॥१४॥ भक्तं पौरजनं चैव बाढमित्याह राघवः । कृत्वैवं निश्चयं रामस्तस्मिन्नेवाहनि प्रभुः ॥१५॥ अस्थापयामास च तौ रामभद्रः कुशीलवौ । अष्टौ रथसहस्राणि सहस्रं चैव दन्तिनाम् ॥१६॥ षष्टिं चाश्वसहस्राणामेकैकस्मै ददौ बलम् । बहुरत्नों बहुधनौ हृष्टपुष्टजनावृतौ ॥१७॥ अभिवाद्य गतौ रामं कृच्छ्रेण तु कुशीलवौ । शत्रुघ्नानयने दूतान्प्रेषयामास राघवः ॥१८॥ ते दूतास्त्वरितं गत्वा शत्रुघ्नाय न्यवेदयन् । कालस्यागमनं पश्चादत्रिपूत्रस्य चेष्टितम् ॥१९॥ लक्ष्मणस्य च निर्याणं प्रतिज्ञां राघवस्य च । पुत्राभिषेचनं चैव सर्वं रामचिकीर्षितम् ॥२०॥ श्रुत्वा तद्भूतवचनं शत्रुघ्नः कुलनाशनम् । व्यथितोऽपि धृतिं लब्ध्वा पुत्रावाहूय सत्वरः । अभिषिच्य सुबाहुं वै मथुरायां महाबलः ॥२१॥ यूपकेतुं च विदिशानगरे शत्रुसूदनः । अयोध्यां त्वरितं प्रागात्स्वयं रामदिदृक्षया ॥२२॥ ददर्श च महात्मानं तेजसा ज्वलनप्रभम् । दुकूलयुगसंवीतं ऋषिभिश्चाक्षयैर्वृतम् ॥२३॥ अभिवाद्य रमानांथं शत्रुघ्नो रघुपूङ्गवम् । प्राञ्जलिर्धर्मसहितं वाक्यं प्राह महामतिः ॥२४॥ अभिषिच्य सुतौ तत्र राज्ये राजीवलोचन । तवानुगमने राजन्विद्धि मां कृतनिश्चयम् ॥२५॥ त्यक्तुं नार्हसि मां वीर भक्तं तव विशेषतः । शत्रुघ्नस्य दृढां बुद्धिं विज्ञाय रघुनन्दनः ॥२६॥ सज्जीभवतु मध्याह्ने भवानित्यब्रवीद्वचः । अथ क्षणात्समुत्पेतुर्वानराः कामरूपिणः ॥२७॥ ऋक्षाश्च राक्षसाश्चैव गोपुच्छाश्च सहस्रशः । ऋषीणां देवतानां च पुत्रा रामस्य निर्गमम् ॥२८॥

भी जायें अब हम स्त्री-पुत्रादिके सहित सर्वथा आपका ही अनुसरण करेंगे ।" तब रघुनाथजीने उनके मन की दृढता और कालका वचन समझकर उन भक्त पुरवासियोंसे 'बहुत अच्छा, ऐसा ही करो' यह कह दिया । फिर, ऐसा निश्चय कर प्रभु रामने उसी दिन कुश और लवको (अपने-अपने राज्यपर) भेजा । उनमेंसे प्रत्येकको आठ हजार रथ, एक हजार हाथी और साठ हजार घोड़े दिये तथा बहुत-से रत्न, धन और हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंको साथ कर दिया ॥१३-१७॥ कुश और लव रामजीको प्रणाम करके बड़ी कठिनतासे चले । इसी समय रघुनाथजीने शत्रुघ्नजीको लानेके लिये दूत भेजे ॥१८॥

उन दूतोंने तुरन्त ही जाकर कालका आगमन, दुर्वासा- जीकी करतूत, लक्ष्मणजीका महाप्रयाण, रघुनाथजीकी प्रतिज्ञा, पुत्रोंका अभिषेक और अब राम क्या करना चाहते हैं- ये सब समाचार शत्रुघ्नजीसे निवेदन कर दिये ॥१९-२०॥ इस प्रकार दूतोंके मुखसे अपने कुलके नाशका समाचार सुनकर शत्रुघ्नजी अति व्याकुल हुए, किन्तु फिर धैर्य धारण कर तुरन्त ही अपने दोनों पुत्रोंको बुलाया; और उनमेंसे महाबली सुबाहुं- को मथुराके और यूपकेतुको विदिशा नगरीके राज्य- पर अभिषिक्त कर स्वयं बड़ी शीघ्रतासे रघुनाथेजीके दर्शनके लिये अयोध्याको चले ॥ २१-२२ ॥

वहाँ पहुँचनेपर उन्होंने अपने तेजसे अग्निके समान देदीप्यमान महात्मा रामको दो वस्त्र धारण किये और चिरजीवी ऋषियोंसे घिरे हुए देखा ॥२३॥ महामति शत्रुघ्नजीने लक्ष्मीपति श्रीरघुनाथजीको प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर ये धर्मयुक्त वाक्य कहे-॥२४॥ "हे कमलनयन ! मैं अपने राज्यपर दोनों पुत्रोंका अभिषेक कर आया हूँ; हे राजन् ! अब मैंने भी आपही- का अनुगमन करनेका निश्चय कर लिया है- ऐसा आप जानें ॥२५॥ हे वीर ! मैं आपका भक्त हूँ, अतः आपको मुझे छोड़ना न चाहिये ।" शत्रुघ्नका दृढ़ निश्चय जान श्रीरघुनाथजीने कहा-'तुम आज दोपहरके समय तैयार रहो ।'

इसी समय इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानर, रीछ, राक्षस और गोपुच्छ वानर हजारोंकी संख्यामें आ कूदे, तथा ऋषि और देवताओंके पुत्ररूप वे समस्त वानर और राक्षसगण रघुनाथजीका निर्याण

३८०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ९

श्रुत्वा प्रोचु रघूश्रेष्ठं सर्वे वानरराक्षसाः ।
तवानुगमने विद्धि निश्चिताथीन्न्र्हिनः प्रभो ॥२९॥
एतस्मिन्नन्तरे रामं सुग्रीवोऽपि महाबलः ।
यथावदभिवाद्याह राघवं भक्तवत्सलम् ॥३०॥
अभिषिच्याङ्गदं राज्ये आगतोऽस्मि महाबलम् ।
तवानुगमने राम विद्धि मां कृतनिश्चयम् ॥३१॥
श्रुत्वा तेषां दृढं वाक्यं ऋक्षवानररक्षसाम् ।
विभीषणमुवाचेदं वचनं मृदु सादरम् ॥३२॥
धरिष्यति धरा यावत्प्रजास्तावत्प्रशाधि मे ।
वचनाद्राक्षसं राज्यं शापितोऽसि ममोपरि ॥३३॥
न किंचिदुत्तरं वाच्यं त्वया मत्कृतकारणात् ।
एवं विभीषणं तूक्त्वा हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥३४॥
मारुते त्वं चिरञ्जीव ममाज्ञां मा मृषा कृथाः ।
जाम्बवन्तमथ प्राह तिष्ठ त्वं द्वापरान्तरे ॥३५॥
मया सार्धं भवेद्युद्धं यत्किञ्चित्कारणान्तरे ।
ततस्तान् राघवः प्राह ऋक्षराक्षसवानरान् ।
सर्वानैव मया सार्धं प्रयातेति दयान्वितः ॥३६॥
उतः प्रयाते रघुवंशनाथो
विशालवक्षाः सितकञ्जनेत्रः ।
पुरोधसं प्राह वसिष्ठमार्यं
यान्त्वग्निहोत्राणि पुरो गुरो मे ॥३७॥
ततो वसिष्ठोऽपि चकार सर्वं
प्रास्थानिकं कर्म महद्विधानात् ।
क्षौमाम्बरो दर्भपवित्रपाणि-
र्महाप्रयाणाय गृहीतबुद्धिः ॥३८॥
निष्क्रम्य रामो नगरात्सिताभ्रा-
च्छशीव यातः शशिकोटिकान्तिः ।
रामस्य सव्ये सितपद्महस्ता
पद्मा गता पद्मविशालनेत्रा ॥३९॥
पार्श्वेऽथ दक्षेऽरुणकञ्जहस्ता
श्यामा ययौ भूरपि दीप्यमाना ।


[हिन्दी अनुवाद]

सुनकर उनसे कहने लगे—"प्रभो ! आप हमें भी अपने पीछे चलनेके लिये कटिबद्ध समझें" ॥२६—२९॥
इतनेहीमें महाबली सुग्रीवने भी यथावत् प्रणाम करके भक्तवत्सल रघुनाथजीसे कहा—॥३०॥ "हे राम ! मैं महाबली अंगदको राजतिलक कर आपके साथ चलने का निश्चय करके आया हूँ—ऐसा आप जानें" ॥३१॥

तब उन रीछ, वानर और राक्षसोंके ऐसे दृढ़ वाक्य सुनकर श्रीरघुनाथजीने विभीषणसे आदरपूर्वक इस प्रकार मधुर वचन कहा—॥३२॥ "मैं तुम्हें अपनी शपथ कराता हूँ, जबतक पृथिवी प्रजा धारण करे तबतक मेरे कहने- से तुम राक्षसोंका राज्य करो ॥३३॥ तुम मेरे लिये ऐसा करो, अब इस विषयमें कुछ और उत्तर न देना।
विभीषणसे इस प्रकार कह फिर वे हनुमान्जीसे बोले—॥३४॥ "हे मारुते ! तुम चिरकालतक जीवित रहो, मेरी (पूर्व) आज्ञाको मिथ्या मत करो।" फिर जाम्बवान्‌से कहा—"तुम द्वापरके अन्ततक रहो ॥३५॥ किसी कारणवश मेरे साथ तुम्हारा युद्ध होगा।" फिर श्रीरघुनाथजीने शेष सब रीछ, वानर और राक्षसोंसे दयापूर्वक कहा—"तुम सब लोग मेरे साथ चलो" ॥३६॥

दूसरे दिन सबेरे ही विशालहृदय कमलनयन भगवान् रामने पूज्य पुरोहित वसिष्ठजीसे कहा—"हे गुरो ! मेरे आगे अग्निहोत्रकी आहवनीयादि अग्नियाँ चलें" ॥३७॥ तब वसिष्ठजीने बड़े विधिपूर्वक समस्त प्रास्थानिक कर्म किये। उस समय करोड़ों चन्द्रमाओं- के समान कान्तिमान् भगवान् राम रेशमी वस्त्र धारण किये, कुशाकी पवित्री हाथमें पहने तथा महाप्रयाणमें चित्त लगाये नगरसे इस प्रकार निकले जैसे श्वेत बादलोंमेंसे चन्द्रमा निकलता हो। उनके बायीं ओर हाथमें श्वेत कमल लिये कमलके समान विशाल नेत्रवाली लक्ष्मीजी चलीं ॥३८-३९॥ तथा दायीं ओर हाथमें लाल कमल लिये अत्यन्त दीप्तिशालिनी श्यामवर्णा पृथिवी

उत्तरकाण्ड - सर्ग ९: महाप्रयाण

सर्ग ९] उत्तरकाण्ड ३८१


शास्त्राणि शस्त्राणि धनुश्च बाणां<br>जग्मुः पुरस्ताद्धृतविग्रहास्ते ॥४०॥<br>वेदाश्च सर्वे धृतविग्रहाश्च<br>ययुश्च सर्वे मुनयश्च दिव्याः ।<br>माता श्रुतीनां प्रणवेन साध्वी<br>ययौ हरिं व्याहृतिभिः समेता ॥४१॥चली । भगवान्‌के आगे सम्पूर्ण शास्त्र, शस्त्र और उनके धनुष-बाण मूर्तिमान् होकर चले ॥ ४० ॥ इसी प्रकार समस्त वेद, समस्त दिव्य मुनिजन तथा ॐकार और व्याहृतियोंके सहित वेदमाता गायत्री—ये सब भी शरीर धारण कर श्रीहरिके साथ चले ॥ ४१ ॥
गच्छन्तमेवानुगता जनास्ते<br>सपुत्रदाराः सह बन्धुवर्गैः ।<br>अनावृतद्वारमिवापवर्गं<br>रामं व्रजन्तं ययुराप्तकामाः ।<br>सान्तःपुरः सानुचरः सभार्यः<br>शत्रुघ्नयुक्तो भरतोऽनुयातः ॥४२॥इस प्रकार रघुनाथजीके चलनेपर अपने बन्धु-बान्धव और स्त्री-पुत्रादिके सहित समस्त पुरजन इस प्रकार चले मानो सफलमनोरथ हो स्वर्गके खुले द्वारको जाते हों । फिर रनवास, सेवकगण, स्त्री और शत्रुघ्नके सहित भरतजी भी चले ॥ ४२ ॥
गच्छन्तमालोक्य रमासमेतं<br>श्रीराघवं पौरजनाः समस्ताः ।<br>सवालवृद्धाश्च ययुर्द्विजाग्र्याः<br>सामात्यवर्गाश्च समन्त्रिणो ययुः ॥४३॥रघुनाथजीको लक्ष्मीजीके सहित जाते देख बालक और वृद्धोंके सहित समस्त पुरजन तथा अमात्य और मन्त्रियोंके सहित समस्त ब्राह्मणगण चले ॥ ४३ ॥
सर्वे गताः क्षत्रमुखाः प्रहृष्टा<br>वैश्याश्च शूद्राश्च तथा परे च ।<br>सुग्रीवमुख्या हरिपुङ्गवाश्च<br>स्नाता विशुद्धाः शुभशब्दयुक्ताः ॥४४॥उनके पश्चात् मुख्य-मुख्य क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्य अन्त्यजादि सभी लोग अति हर्षपूर्वक चले । फिर सुग्रीवादि श्रेष्ठ वानरगण स्नानादिसे शुद्ध हो ('श्रीरामचन्द्रजीकी' जय आदि) मंगलमय शब्द करते हुए चले ॥४४॥
न कश्चिदासीद्भवदुःखयुक्तो<br>दीनोऽथवा बाह्यसुखेषु सक्तः ।<br>आनन्दरूपानुगता विरक्ता<br>ययुश्च रामं पशुभृत्यवर्गैः ॥४५॥(उनमेंसे) कोई भी संसार-दुःखसे दुःखी, दीन अथवा बाह्य विषयोंमें आसक्त नहीं था । वे सभी परमानन्दरूप भगवान् रामके अनुगामी संसारसे उपराम होकर अपने पशु और नौकर-चाकरोंके सहित रघुनाथजीके साथ चले गये ॥ ४५ ॥
भूतान्यदृश्यानि च यानि तत्र<br>ये प्राणिनः स्थावरजङ्गमाश्च ।<br>साक्षात्परात्मानमनन्तशक्तिं<br>जग्मुर्विरक्ताः परमेकमीशम् ॥४६॥जो प्राणी कभी दिखलायी नहीं पड़ते थे तथा जितने स्थावर और जंगम जीव थे वे सभी संसारसे विरक्त होकर एकमात्र परमेश्वर अनन्तशक्ति साक्षात् परमात्मा रामके साथ चले ॥ ४६ ॥
नासीदयोध्यानगरे तु जन्तुः<br>कश्चित्तदा राममना न यातः ।<br>शून्यं बभूवाखिलमेव तत्र<br>पुरं गते राजनि रामचन्द्रे ॥४७॥उस समय अयोध्यामें ऐसा कोई जीव नहीं था जो भगवान् राममें चित्त लगाकर उनका अनुगामी न हुआ हो । महाराज रामचन्द्रके कूच करते ही वह सारा नगर सूना हो गया ॥ ४७ ॥
ततोऽतिदूरं नगरात्स गत्वा<br>दृष्ट्वा नदीं तां हरिनेत्रजाताम् ।<br>ननन्द रामः स्मृतपावनोऽतो<br>ददर्श चाशेषमिदं हृदिस्थम् ॥४८॥नगरसे बहुत दूर निकल जानेपर श्रीरघुनाथजीने विष्णुभगवान्‌के नेत्रसे प्रकट हुई (सरयू) नदी देखी । उसे देखकर भगवान् बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें अपने विशुद्ध स्वरूपकी स्मृति हो आयी; अतः वे इस सम्पूर्ण जगत्‌को अपने हृदयमें स्थित देखने लगे ॥ ४८ ॥
३८२अध्यात्मरामायण[ सर्ग ९
अथागतस्तत्र पितामहो महान्<br>देवाश्च सर्वे ऋषयश्च सिद्धाः ।<br>विमानकोटीभिरपारपारं<br>समावृतं खं सुरसेविताभिः ॥४९॥<br>रविप्रकाशाभिरभिस्फुरत्स्वं<br>ज्योतिर्मयं तत्र नभो बभूव ।<br>स्वयंप्रकाशैर्महतां महद्भिः<br>समावृतं पुण्यकृतां वरिष्ठैः ॥५०॥इसी समय, वहाँ पितामह ब्रह्माजी तथा अन्य समस्त देवता, ऋषि और सिद्धगण आये । उस समय जिनमें देवगण विराजमान थे ऐसे सूर्यके समान तेजस्वी करोड़ों विमानोंसे अनन्तपार आकाश खचाखच भर गया । (उनके प्रकाशसे) प्रज्वलित होकर वह स्वयं भी देदीप्यमान हो उठा । (इनके अतिरिक्त पुण्यलोकोंसे आये हुए) पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ तथा महात्माओंमें महान् स्वयंप्रकाशमय दिव्य पुरुषोंसे भी आकाश मानो ढँक गया ॥४९-५०॥
ववुश्च वाताश्च सुगन्धवन्तो<br>ववर्ष वृष्टिः कुसुमावलीनाम् ।<br>उपस्थिते देवमृदङ्गनादे<br>गायत्सु विद्याधरकिन्नरेषु ॥५१॥<br>रामस्तु पद्भ्यां सरयूजलं सकृ-<br>त्स्पृष्ट्वा परिक्रामदनन्तशक्तिः ॥५२॥उस समय सुगन्धमय वायु चलने लगा और कुसुमसमूहोंकी (निरन्तर) वर्षा होने लगी । तब देवताओंका मृदंगनाद और विद्याधर तथा किन्नरोंका गान होते हुए अनन्तशक्ति भगवान् रामने एक बार सरयूजलका स्पर्श (आचमन) कर चरणोंसे उसकी परिक्रमा की ॥ ५१-५२ ॥
ब्रह्मा तदा प्राह कृताञ्जलिस्तं<br>रामं परात्मन् परमेश्वरस्त्वम् ।<br>विष्णुः सदानन्दमयोऽसि पूर्णो<br>जानासि तत्त्वं निजमैशमेकम् ।<br>तथापि दासस्य ममाखिलेश<br>कृतं वचो भक्तपरोऽसि विद्वन् ॥५३॥उस समय,ब्रह्माजी हाथ जोड़कर भगवान् रामसे कहने लगे—"हे परमात्मन् ! आप सबके स्वामी, नित्यानन्दमय, सर्वत्र परिपूर्ण और साक्षात् विष्णुभगवान् हैं। अपने एकमात्र ईश्वरीय तत्त्वको आप ही जानते हैं। तथापि हे अखिलेश्वर ! आपने मुझ दासका निवेदन पूर्ण कर दिया, (सो ठीक ही है, क्योंकि) हे विद्वन् ! आप भक्तवत्सल हैं॥ ५३ ॥
त्वं भ्रातृभिर्वैष्णवमेवमाद्यं<br>प्रविश्य देहं परिपाहि देवान् ।<br>यद्वा परो वा यदि रोचते तं<br>प्रविश्य देहं परिपाहि नस्त्वम् ॥५४॥हे प्रभो ! अब आप भाइयोंसहित अपने आदिविग्रह विष्णुदेहमें प्रविष्ट होकर देवताओंकी रक्षा कीजिये, अथवा यदि आपको कोई और शरीर प्रिय हो तो उसीमें प्रवेश करके हम सबका पालन कीजिये ॥ ५४ ॥
त्वमेव देवाधिपतिश्च विष्णु-<br>र्जानान्ति न त्वां पुरुषा विना माम् ।<br>सहस्रकृत्वस्तु नमो नमस्ते<br>प्रसीद देवेश पुनर्नमस्ते ॥५५॥आप ही देवाधिपति विष्णुभगवान् हैं। इस बातको मेरे सिवा और कोई पुरुष नहीं जानता। हे देवेश ! आपको हजारों बार नमस्कार है, आप प्रसन्न होइये, आपको पुनः-पुनः नमस्कार है" ॥ ५५ ॥
पितामहप्रार्थनया स रामः<br>पश्यत्सु देवेषु महाप्रकाशः ।<br>मुष्णंश्च चक्षूंषि दिवौकसां तदा<br>बभूव चक्रादियुतश्चतुर्भुजः ॥५६॥तब पितामह ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे महातेजोमय भगवान् राम सब देवताओंके देखते-देखते उनकी दृष्टिको चुराते हुए चक्रादि आयुधोंसे युक्त चतुर्भुजरूप हो गये ॥ ५६ ॥ लक्ष्मणजी अद्भुत फणा धारण कर भगवान्-