अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
| ४६ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग २ |
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| रत्नासने समावेश्य पादौ प्रक्षाल्य भक्तितः । | तब रघुनाथजीने गुरुजीको रत्नसिंहासनपर बैठा- | | तदपः शिरसा धृत्वा सीतया सह राघवः ॥२०॥ | कर उनके चरण धोये और सीताजीके सहित उस | | धन्योऽस्मीत्यब्रवीद्रामस्तव पादाम्बुधारणात् । | चरणोदकको भक्तिपूर्वक अपने शिरपर रखकर कहा- | | श्रीरामेणैवमुक्तस्तु प्रहसनमुनिरब्रवीत् ॥२१॥ | "हे मुने ! आपके चरणोदकको धारण कर आज मैं | | त्वत्पादसलिलं धृत्वा धन्योऽभूद्गिरिजापतिः । | कृतकृत्य हो गया।" भगवान् रामके इस प्रकार कहने- | | ब्रह्मापि मत्पिता ते हि पादतीर्थहताशुभः ॥२२॥ | पर मुनिवर वसिष्ठने हँसकर कहा ॥ २०-२१ ॥ "हे | | इदानीं भाषसे यत्त्वं लोकानामुपदेशकूत् । | राम ! आपके पादोदकको मस्तकपर धारण कर पार्वती- | | जानामि त्वां परात्मानं लक्ष्म्या संजातमीश्वरम् २३ | वल्लभ भगवान् शंकर धन्य-धन्य हो गये तथा मेरे | | देवकार्यार्थसिद्धयर्थं भक्तानां भक्तिसिद्धये । | पिता ब्रह्माजी भी आपके पादतीर्थका सेवन करनेसे ही | | रावणस्य वधार्थाय जातं जानामि राघव ॥२४॥ | निष्पाप हो गये हैं ॥ २२ ॥ इस समय केवल संसारको | | तथापि देवकार्यार्थं गुह्यं नोद्घाटयाम्यहम् । | यह उपदेश करनेके लिये ही कि 'गुरुके साथ किस | | यथा त्वं मायया सर्वं करोषि रघुनन्दन ॥२५॥ | प्रकार व्यवहार करना चाहिये' आप इस प्रकार | | तथैवानुविधास्येऽहं शिष्यस्त्वं गुरुरप्यहम् । | सम्भाषण कर रहे हैं। मैं भली प्रकार जानता हूँ | | गुरुर्गुरूणां त्वं देव पितॄणां त्वं पितामहः ॥२६॥ | आप लक्ष्मीके सहित प्रकट हुए साक्षात् परमात्मा विष्णु | | अन्तर्यामी जगद्यात्रावाहकस्त्वमगोचरः । | हैं॥ २३ ॥ हे राघव ! मैं जानता हूँ आपने देवताओंका | | शुद्धसत्त्वमयं देहं धृत्वा स्वाधीनसम्भवम् ॥२७॥ | कार्य सिद्ध करनेके लिये, भक्तोंको भक्ति प्रदान करनेके | | मनुष्य इव लोकेऽस्मिन् भासि त्वं योगमायया । | लिये और रावणका वध करनेके लिये ही अवतार लिया | | पौरोहित्यमहं जाने विगर्ह्यं दूष्यजीवनम् ॥२८॥ | है ॥ २४ ॥ तथापि देवताओंके कार्य-सिद्धिके लिये | | इक्ष्वाकूणां कुले रामः परमात्मा जनिष्यते । | मैं इस गुप्त रहस्यको प्रकट नहीं करता। हे रघुनन्दन ! | | इति ज्ञातं मया पूर्वं ब्रह्मणा कथितं पुरा ॥२९॥ | जिस प्रकार मायाके आश्रयसे आप सब कार्य करेंगे | | ततोऽहमाशया राम तव सम्बन्धकाङ्क्षया । | उसी प्रकार मैं भी 'तुम शिष्य हो और मैं गुरु हूँ' इस | | अकार्षं गर्हितमपि तवाचार्यत्वसिद्धये ॥३०॥ | सम्बन्धके अनुकूल व्यवहार करूँगा । किन्तु हे देव ! | | ततो मनोरथो मेऽद्य फलितो रघुनन्दन । | वास्तवमें तो आप ही गुरुओंके गुरु और पितृगणोंके | | त्वदधीना महामाया सर्वलोकैकमोहिनी ॥३१॥ | भी पितामह हैं ॥ २५-२६ ॥ आप अन्तर्यामी, | | मां यथा मोहयेन्नैव तथा कुरु रघूद्वह । | जगद्व्यवहारके प्रवर्त्तक और मन-वाणीके अविषय हैं; | | गुरुनिष्कृतिकामस्त्वं यदि देह्येतदेव मे ॥३२॥ | और स्वेच्छासे यह शुद्ध सत्त्वमय शरीर धारण कर इस | | | लोकमें अपनी योगमायासे मनुष्यके समान प्रतीत होते | | | हैं। मैं यह जानता हूँ कि पुरोहिताई अति निन्दनीय | | | और दूषित जीविका है ॥ २७-२८ ॥ तो भी जब | | | पूर्वकालमें ब्रह्माजीके कहनेसे मुझे यह मालूम हुआ कि | | | इक्ष्वाकुवंशमें परमात्मा राम अवतार लेंगे ॥ २९ ॥ तब | | | हे राम ! आपसे सम्बन्ध जोड़नेकी इच्छासे आपका | | | आचार्य बननेके लिये इस निन्दनीय पदको भी मैंने | | | स्वीकार कर लिया ॥ ३० ॥ हे रघुनन्दन ! आज मेरी | | | इच्छा पूर्ण हो गयी । अब यदि आप गुरुऋणसे | | | उऋण होना चाहते हैं तो मुझे यही दीजिये कि | | | आपके अधीन रहनेवाली आपकी सर्वलोकविमोहिनी | | | महामाया मुझे मोहित न करे ॥ ३१-३२ ॥ हे |
सर्ग २ ] अयोध्याकाण्ड ४७
| प्रसङ्गात्सर्वमप्युक्तं न वाच्यं कुत्रचिन्मया ।<br>राज्ञा दशरथेनाहं प्रेषितोऽस्मि रघूद्वह ॥३३॥<br>त्वामामन्त्रयितुं राज्ये श्वोऽभिषेक्ष्यति राघव।<br>अद्य त्वं सीतया सार्धमुपवासं यथाविधि ॥३४॥<br>कृत्वा शुचिर्भूमिरायी भव राम जितेन्द्रियः ।<br>गच्छामि राजसान्निध्यं त्वं तु प्रातर्गमिष्यसि ॥३५॥ | रघुश्रेष्ठ ! इस समय प्रसंगवश मैने ये सब बातें आपसे कह दी हैं, मैं ऐसा और कहीं भी न कहूँगा । हे राघव ! महाराज दशरथने इस बातकी सूचना देनेके लिये कि कल वे आपको राजपद्पर अभिषिक्त करेंगे—मुझे आपके पास भेजा है । आज आप सीताके सहित विधिपूर्वक उपवास और शुद्धता तथा इन्द्रियजयपूर्वक पृथिवीपर शयन करें । अब मैं राजाके पास जाता हूँ, आप कल प्रातःकाल वहाँ पधारें"॥ ३३–३५॥ |
| इत्युक्त्वा रथमारुह्य ययौ राजगुरुर्द्रुतम् ।<br>रामोऽपि लक्ष्मणं दृष्ट्वा प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥३६॥<br>सौमित्रे यौवराज्ये मे श्वोऽभिषेको भविष्यति ।<br>निमित्तमात्रमेवाहं कर्ता भोक्ता त्वमेव हि ॥३७॥<br>मम त्वं हि बहिःप्राणो नात्र कार्या विचारणा ।<br>ततो वसिष्ठेन यथा भाषितं तत्तथाकरोत् ॥३८॥ | ऐसा कह राजपुरोहित वसिष्ठजी रथपर चढ़कर तुरन्त ही चले गये । तब रामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीकी ओर देखकर हँसते हुए कहा—॥ ३६॥ "हे सुमित्रानन्दन ! कल मेरा युवराज-पदपर अभिषेक होगा, सो मैं तो केवल निमित्तमात्र ही होऊँगा, उसके कर्त्ता-भोक्ता तो तुम्हीं होगे ॥ ३७॥ क्योंकि मेरे बाह्यप्राण तो तुम्हीं हो—इसमें कोई विशेष सोच-विचारकी आवश्यकता नहीं है।" तदनन्तर वसिष्ठजी जैसा कह गये थे रघुनाथजीने वैसा ही किया ॥३८॥ |
| वसिष्ठोऽपि नृपं गत्वा कृतं सर्वं न्यवेदयत् ।<br>वसिष्ठस्य पुरो राज्ञा ह्युक्तं रामाभिषेचनम् ॥३९॥<br>यदा तदैव नगरे श्रुत्वा कश्चित्पुमान् जगौ ।<br>कौसल्यायै राममात्रे सुमित्रायै तथैव च ॥४०॥ | इधर वसिष्ठजीने भी राजा दशरथके पास आकर जो कुछ किया था सो सब सुना दिया । जिस समय महाराज दशरथ वसिष्ठजीसे रामचन्द्रजीके अभिषेकके विषयमें कह रहे थे उसी समय किसी पुरुषने यह समाचार सुनकर सम्पूर्ण नगरमें सुना दिया और राममाता कौसल्या तथा सुमित्राको भी यह सूचना दे दी ॥ ३९–४० ॥ |
| श्रुत्वा ते हर्षसम्पूर्णे ददतुर्हारमुत्तमम् ।<br>तस्मै ततः प्रीतमनाः कौसल्या पुत्रवत्सला ॥४१॥<br>लक्ष्मीं पर्यचरद्देवीं रामस्यार्थप्रसिद्धये ।<br>सत्यवादी दशरथः करोत्येव प्रतिश्रुतम् ॥४२॥<br>कैकेयीवशगः किन्तु कामुकः किं करिष्यति ।<br>इति व्याकुलचित्ता सा दुर्गां देवीमपूजयत् ॥४३॥ | उन दोनोंने सुनते ही अति हर्ष-पूर्ण हो उसे एक अत्युत्तम हार दिया । तदुपरान्त पुत्रवत्सला कौसल्याने रामचन्द्रजीकी इष्ट-सिद्धिके लिये लक्ष्मीदेवीका पूजन किया 'राजा दशरथ सत्य-वादी हैं और उनके विषयमें यह प्रसिद्ध है कि वे अपनी प्रतिज्ञाका पालन करते हैं ॥ ४१--४२ ॥ किन्तु वे कामी और कैकेयीके वशीभूत हैं; ऐसी अवस्था में क्या वे इस प्रतिज्ञाको पूर्ण कर सकेंगे ?' इस प्रकारकी चिन्तासे व्याकुल होकर वह दुर्गादेवीका पूजन करने लगीं ॥ ४३ ॥ |
| एतस्मिन्नन्तरे देवा देवीं वाणीमचोदयन् ।<br>गच्छ देवि भुवो लोकमयोध्यायां प्रयत्नतः ॥४४॥<br>रामाभिषेकविघ्नार्थं यतस्व ब्रह्मवाक्यतः । | इसी समय देवताओंने सरस्वतीदेवीसे आग्रह किया कि "हे देवि ! तुम युक्तिपूर्वक भूलोकमें अयोध्यापुरीमें जाओ ॥ ४४ ॥ और वहाँ ब्रह्माजीकी आज्ञासे रामचन्द्रजीके राज्याभिषेकमें विघ्न उपस्थित |
| ४८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मन्थरां प्रविशस्त्वादौ कैकेयीं च ततः परम् ॥४५॥<br>ततो विघ्ने समुत्पन्ने पुनरेहि दिवं शुभे ।<br>तथेत्युक्त्वा तथा चक्रे प्रविवेशाथ मन्थराम् ॥४६॥ | करो। प्रथम तो तुम मन्थरामें प्रवेश करना और फिर कैकेयीमें ॥ ४५ ॥ हे शुभे ! इस प्रकार विघ्न उपस्थित हो जानेपर तुम फिर स्वर्गलोकको लौट आना ।' इसपर सरस्वतीने 'बहुत अच्छा' कहकर वैसा ही किया और प्रथम मन्थरामें प्रवेश किया ॥ ४६ ॥ |
| सापि कुब्जा त्रिवक्रा तु प्रासादाग्रमथारुहत् ।<br>नगरं परितो दृष्ट्वा सर्वतः समलङ्कृतम् ॥४७॥<br>नानातोरणसम्बाधं पताकाभिरलङ्कृतम् ।<br>सर्वोत्सवसमायुक्तं विस्मिता पुनरागमत् ॥४८॥ | तब तीन स्थानसे टेढ़ी वह कुबड़ी मन्थरा महलकी अट्टालिकापर चढ़ी और उसने देखा कि नगर सब ओरसे सजाया गया है ॥ ४७ ॥ उसमें नाना प्रकारकी बन्दनवारें बँधी हुई हैं, चित्र-विचित्र पताकाएं सुशोभित हो रही हैं और सब ओर उत्सव हो रहे हैं । यह देखकर वह अत्यन्त विस्मिता हो नीचे उतर आयी ॥ ४८ ॥ |
| धात्रीं पप्रच्छ मात: किं नगरं समलङ्कृतम् ।<br>नानोत्सवसमायुक्ता कौसल्या चातिहर्षिता ॥४९॥<br>ददाति विप्रमुख्येभ्यो वस्त्राणि विविधानि च ।<br>तामुवाच तदा धात्री रामचन्द्राभिषेचनम् ॥५०॥<br>श्वो भविष्यति तेनाद्य सर्वतोऽलङ्कृतं पुरम् ।<br>तच्छ्रुत्वा त्वरितं गत्वा कैकेयीं वाक्यमब्रवीत् ॥५१॥ | और धायसे पूछा--- "मैया ! आज नगर क्यों सजाया गया है और महारानी कौसल्या भी नाना प्रकारसे उत्सव मनाती हुई अत्यन्त हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको विविध वस्त्राभूषण क्यों दे रही हैं ?" तब धायने उससे कहा- "कल श्रीरामजीका राज्याभिषेक होगा, इसलिये आज सब ओरसे नगर सजाया गया है ।" यह सुनते ही उसने तुरन्त ही कैकेयीके पास जाकर कहा ॥ ४९-५१ ॥ |
| पर्यङ्कस्थां विशालाक्षीमेकान्ते पर्यवस्थिताम् ।<br>किं शेषे दुर्भगे मूढे महद्भयमुपस्थितम् ॥५२॥<br>न जानीषेऽतिसौन्दर्यमानिनी मत्तगामिनी ॥५३॥<br>रामस्यानुग्रहाद्राज्ञः श्वोऽभिषेको भविष्यति । | विशालाक्षी कैकेयी उस समय एकान्तमें पलंगपर बैठी थी, उससे मन्थरा बोली--- "अयि अभागिनि मूढ़े ! कैसे सो रही हो, तुम्हारे लिये बड़ा भारी संकट उपस्थित हुआ है ॥ ५२ ॥ हे मत्तवाली चालवाली ! तुम्हें अपनी सुन्दरताका बड़ा घमण्ड है, इसलिये तुम्हें किसी बातका पता ही नहीं रहता ॥ ५३ ॥ देखो, महाराजकी कृपासे कल रामका राज्याभिषेक होनेवाला है ।" |
| तच्छ्रुत्वा सहसोत्थाय कैकेयी प्रियवादिनी ॥५४॥<br>तस्यै दिव्यं ददौ स्वर्णनूपुरं रत्नभूषितम् ।<br>हर्षस्थाने किमिति मे कथ्यते भयमागतम् ॥५५॥<br>भरतादधिको रामः प्रियकृन्मे प्रियंवदः ।<br>कौसल्यां मां समं पश्यन् सदा शुश्रूषते हि माम् ५६<br>रामाद्भयं किमापन्नं तव मूढे वदस्व मे । | यह सुनकर प्रियवादिनी कैकेयी सहसा उठ खड़ी हुई ॥ ५४ ॥ और उसे अति दिव्य रत्नजटित सुवर्णनूपुर देकर कहा, "अरी ! यह तो बड़े आनन्दकी बात है, इसमें तू संकट उपस्थित हुआ कैसे बतलाती है ? ॥ ५५ ॥ राम तो भरतकी अपेक्षा मेरा अधिक प्रिय करनेवाला और मधुरभाषी है, वह तो कौसल्या तथा मुझे समान भावसे देखता हुआ सदा ही मेरी सेवा किया करता है ॥ ५६ ॥ अरी मूर्खे ! तू यह तो बता कि तुझे रामसे क्या भय उपस्थित हुआ है ?" |
| तच्छ्रुत्वा विषसादाथ कुब्जाऽकारणवैरिणी ॥५७॥<br>शृणु मद्बचनं देवि यथार्थं ते महद्भयम् । | यह सुनकर बिना कारण वैर करनेवाली मन्थरा विषाद करने लगी ॥ ५७ ॥ और बोली, "देवि ! |
सर्ग २ ] अयोध्याकाण्ड ४९
| त्वां तोषयन् सदा राजा प्रियवाक्यान भापते ॥५८॥<br>कामुकोऽतथ्यवादी च त्वां वाचा परितोषयन् ।<br>कार्यं करोति तस्या वै राममातुः सुपुष्कलम् ॥५९॥<br>मनस्येतन्निधायैव प्रेषयामास ते सुतम् ।<br>भरतं मातुलकुले प्रेषयामास सानुजम् ॥६०॥<br>सुमित्रायाः समीचीनं भविष्यति न संशयः ।<br>लक्ष्मणो राममन्वेति राज्यं सोऽनुभविष्यति ॥६१॥<br>भरतो राघवस्याग्रे किङ्करो वा भविष्यति ।<br>विवास्यते वा नगरात्प्राणैर्वा हाप्यतेऽचिरात् ॥६२॥<br>त्वं तु दासीव कौसल्यां नित्यं परिचरिष्यसि ।<br>ततोऽपि मरणं श्रेयो यत्सपल्याः पराभवः ॥६३॥<br>अतः शीघ्रं यतस्वाद्य भरतस्याभिषेचने ।<br>रामस्य वनवासार्थं वर्षाणि नव पञ्च च ॥६४॥<br>ततो रूढोऽभये पुत्रस्तव राज्ञि भविष्यति ।<br>उपायं ते प्रवक्ष्यामि पूर्वमेव सुनिश्चितम् ॥६५॥<br>पुरा देवासुरे युद्धे राजा दशरथः स्वयम् ।<br>इन्द्रेण याचितो धन्वी सहाय्यार्थं महारथः ॥६६॥<br>जगाम सेनया सार्धं त्वया सह शुभानने ।<br>युद्धं प्रकुर्वतस्तस्य राक्षसैः सह धन्विनः ॥६७॥<br>तदाक्षकीलो न्यपतच्छिन्नस्तस्य न वेद सः ।<br>त्वं तु हस्तं समावेश्य कीलरन्ध्रेऽतिधैर्यतः ॥६८॥<br>स्थितवत्यसितापाङ्गि पतिप्राणपरीप्सया ।<br>ततो हत्वाऽसुरान्सर्वान् ददर्श त्वामरिन्दमः ॥६९॥<br>आश्चर्यं परमं लेभे त्वामालिङ्ग्य मुदान्वितः ।<br>वृणीष्व यत्ते मनसि वाञ्छितं वरदोस्म्यहम् ॥७०॥<br>वरद्वयं वृणीष्व त्वमेवं राजाऽवदत्स्वयम् ।<br>त्वयोक्तो वरदो राजन्यदि दत्तं वरद्वयम् ॥७१॥ | मेरी बात सुनो, वास्तवमें तुम्हारे लिये बड़ा संकट उपस्थित हुआ है । राजा तुम्हें सन्तुष्ट करनेके लिये ही सदा चिकनी-चुपड़ी बातें बना दिया करते हैं ॥ ५८ ॥ वे बड़े कामी और मिथ्यावादी हैं; तुम्हें इस प्रकार केवल बातोंसे ही बहलाकर रामकी माताका ही पूरा-पूरा कार्य किया करते हैं ॥ ५९ ॥ अपने मनमें यही ठानकर उन्होंने छोटे भाई शत्रुघ्नके सहित तुम्हारे पुत्र भरतको ननिहाल भेज दिया है ॥ ६० ॥ इसमें सुमित्राके लिये तो निस्सन्देह सब कुछ ठीक ही होगा, क्योंकि लक्ष्मण रामके अनुगामी हैं इसलिये वे तो राज्य ही भोगेंगे ॥ ६१ ॥ किन्तु भरतको या तो रामका दास होकर रहना पड़ेगा या उन्हें शीघ्र ही नगरसे निकाल दिया जायगा अथवा उनका प्राणाघात किया जायगा ॥ ६२ ॥ और तुम्हें दासीके समान सदा कौसल्याकी सेवा करनी पड़ेगी । इस प्रकार सौतसे अपमानित होकर रहनेकी अपेक्षा तो मरना ही अच्छा है ॥ ६३ ॥ इसलिये अब तुम शीघ्र ही भरतके राज्याभिषेक और रामके चौदह वर्षतक वनवासके लिये प्रयत्न करो ॥ ६४ ॥ हे रानी ! ऐसा होनेपर तुम्हारे पुत्र भरत निर्भय और निष्कण्टक हो जायेंगे। इसके लिये मैंने जो पहलेसे ही सोच रक्खा है वह उपाय तुम्हें बताती हूँ ॥ ६५ ॥ पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके समय स्वयं इन्द्रने धनुर्धर महारथी राजा दशरथसे सहायताके लिये प्रार्थना की थी ॥ ६६ ॥ हे सुमुखि ! उस समय सेनाके सहित वे तुम्हें साथ लेकर वहाँ गये थे। जिस समय धनुर्धर महाराज दशरथ राक्षसोंसे युद्ध करनेमें निमग्न थे उस समय उनके बिना जाने रथकी धुरीकी कील निकलकर गिर गयी, तब अत्यन्त धैर्यपूर्वक तुमने अपना हाथ उस कीलके छिद्रमें लगा दिया ॥ ६७-६८ ॥ और हे कृष्णाक्षि ! पतिकी प्राणरक्षाके लिये तुम बहुत देरतक इसी स्थितिमें रही। तदनन्तर समस्त दैत्योंको मार चुकनेपर शत्रुदमन महाराज दशरथने तुम्हें देखा ॥ ६९ ॥ तुम्हें ऐसी स्थितिमें देखकर उन्हें अति आश्चर्य हुआ और अति प्रसन्नतासे तुम्हें गले लगाकर वे बोले- "मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ, तुम्हें जो इच्छा हो सो माँग लो ॥ ७० ॥ इस समय तुम. दो वर माँग सकती हो ।" राजाके इस प्रकार कहनेपर तुमने कहा- "राजन् ! यदि आप प्रसन्नतापूर्वक मुझे दो |
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| ५० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| त्वय्येव तिष्ठतु चिरं न्यासभूतं ममानघ ।<br>यदा मेऽवसरो भूयात्तदा देहि वरद्वयम् ॥७२॥<br>तथेत्युक्त्वा स्वयं राजा मन्दिरं व्रज सुव्रते ।<br>त्वत्तः श्रुतं मया पूर्वमिदानीं स्मृतिमागतम् ॥७३॥ | वर देना चाहते हैं ॥ ७१ ॥ तो हे अनघ ! मेरी यह धरोहर बहुत समयतक आप ही रखिये, जिस समय इनका अवसर आवे उस समय आप ये दोनों वर मुझे दे दीजियेगा' ॥ ७२ ॥ तब राजाने 'बहुत अच्छा' कहकर तुमसे कहा 'हे सुव्रते ! अब घर चलो।' महारानीजी ! यह सम्पूर्ण वृत्तान्त पहले तुम्हींसे मैंने सुना था, इस समय मुझे यह स्मरण हो आया है ॥ ७३ ॥ |
| अतः शीघ्रं प्रविश्याद्य क्रोधागारं रुषान्विता ।<br>विमुच्य सर्वाभरणं सर्वतो विनिकीर्य च ।<br>भूमावेव शयाना त्वं तूष्णीमतिष्ठ भामिनि ॥७४॥<br>यावत्सत्यं प्रतिज्ञाय राजाऽभीष्टं करोति ते ।<br>श्रुत्वा त्रिवक्रयोक्तं तत्तदा केकयनन्दिनी ॥७५॥<br>तथ्यमेवाखिलं मेने दुःसङ्गाहितविभ्रमा ।<br>तामाह कैकेयी दुष्टा कुतस्ते बुद्धिरीदृशी ॥७६॥ | अतः हे भामिनि ! अब तुम शीघ्र ही रोषपूर्वक कोपभवनमें जाओ और अपने समस्त आभूषण उतारकर इधर-उधर बिखेर दो तथा जबतक सत्य प्रतिज्ञापूर्वक राजा तुम्हारा अभीष्ट कार्य करनेको तत्पर न हों तबतक चुपचाप पृथिवीपर पड़ी रहो ।”<br>त्रिवक्रा मन्थराकी ये बातें सुनकर दुःसंगवश बुद्धि भ्रष्ट हो जानेके कारण दुष्टा कैकेयीने उस समय उसका कथन सर्वथा ठीक मान लिया और उससे कहा—"तुझमें ऐसी बुद्धि कहाँसे आ गयी ? ॥७४—७६॥ |
| एवं त्वां बुद्धिसम्पन्नां न जाने वक्रसुन्दरि ।<br>भरतो यदि राजा मे भविष्यति सुतः प्रियः ॥७७॥<br>ग्रामानू शतं प्रदास्यामि मम त्वं प्राणवल्लभा ।<br>इत्युक्त्वा कोपभवनं प्रविश्य सहसा रुषा ॥७८॥<br>विमुच्य सर्वाभरणं परिकीर्य समन्ततः ।<br>भूमौ शयाना मलिना मलिनाम्बरधारिणी ॥७९॥<br>प्रोवाच शृणु मे कुब्जे यावद्रामो वनं व्रजेत् ।<br>प्राणांस्त्यक्ष्येऽथ वा वक्रे शयिष्ये तावदेव हि ॥८०॥ | अरी बाँकी सुन्दरी ! मैं तुझे इतनी बुद्धिमती नहीं जानती थी ! यदि मेरा प्रिय पुत्र भरत राजा हो गया तो मैं तुझे सौ गाँव दूँगी; तू तो मुझे प्राणोंके समान प्यारी है ।” ऐसा कहकर कैकेयीने रोषपूर्वक कोपभवनमें प्रवेश किया ॥ ७७-७८ ॥ और अपने सब वस्त्राभूषण उतारकर इधर-उधर बिखेर दिये तथा मैले-कुचैले वस्त्र पहनकर अति मलिन दशामें पृथिवीमें पड़कर बोली, “अरी कुब्जे ! सुन, जबतक राम वनको न जायेंगे, प्राण भले ही छूट जायें, मैं इसी प्रकार पड़ी रहूँगी ” ॥ ७९-८० ॥ |
| निश्चयं कुरु कल्याणि कल्याणं ते भविष्यति ।<br>इत्युक्त्वा प्रययौ कुब्जा गृहं साऽपि तथाऽकरोत् ॥ | तब कुब्जा यह समझाकर कि 'हे कल्याणि ! तुम निःसन्देह ऐसा ही करना, इससे अवश्य तुम्हारा कल्याण होगा'—अपने घर चली गयी और कैकेयीने भी वैसा ही किया ॥ ८१ ॥ |
| धीरोऽत्यन्तदयान्वितोऽपि सुगुणा-<br> चारान्वितो वाऽथवा<br>नीतिज्ञो विधिवाददेशिकपरो<br> विद्याविवेकोऽथवा । | सच है, कोई पुरुष अत्यन्त धैर्यवान्, दयालु, सद्गुणी, सदाचारी, नीतिज्ञ, कर्त्तव्यनिष्ठ और गुरुका भक्त, अथवा विद्या-विवेक-सम्पन्न भी क्यों न हो यदि निरन्तर अत्यन्त पाप-बुद्धि दुष्ट पुरुषोंका संग करेगा तो अवश्य ही क्रमशः उन्हींकी |
अयोध्याकाण्ड - सर्ग ३: राजा दशरथका कैकेयीको वर देना
'सर्ग ३] अयोध्याकाण्ड ५१
दुष्टानामतिपापभाविताधियां सङ्गं सदा चेद्भजे- त्तद्बुद्ध्या परिभावितो व्रजति तत् साम्यं क्रमेण स्फुटम् ॥८२॥ अतः सङ्गः परित्याज्यो दुष्टानां सर्वदैव हि । दुःसङ्गी च्यवते स्वार्थाद्यथेयं राजकन्यका ॥८३॥
बुद्धिसे प्रभावित होकर उन्हींके समान हो जायगा ॥८२॥ इसलिये सदा ही दुष्ट पुरुषोंका संग छोड़ना चाहिये, क्योंकि दुःसंगसे पुरुष इस राजकन्या (कैकेयी) के समान ही पुरुषार्थच्युत हो जाता है ॥८३॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥२॥
तृतीय सर्ग राजा दशरथका कैकेयीको वर देना।
श्रीमहादेव उवाच
ततो दशरथो राजा रामाभ्युदयकारणात् । आदिश्य मन्त्रिप्रकृतीः सानन्दो गृहमविशत् ॥१॥
तत्रादृष्ट्वा प्रियां राजा किमेतदिति विह्वलः । या पुरा मन्दिरं तस्याः प्रविष्टे मयि शोभना ॥२॥ हसन्ती मामुपायाति सा किं नैवाद्य दृश्यते । इत्यात्मन्येव संचिन्त्य मनसाऽतिविदूयता ॥३॥ पप्रच्छ दासीनिकरं कुतो वः स्वामिनी शुभा। नायाति मां यथापूर्वं मत्प्रिया प्रियदर्शना ॥४॥
ता ऊचुः क्रोधभवनं प्रविष्टा नैव विद्महे । कारणं तत्र देव त्वं गत्वा निश्चेतुमर्हसि ॥५॥
इत्युक्तो भयसन्त्रस्तो राजा तस्याः समीपगः । उपविश्य शनैर्देहं स्पृशन्ववै पाणिनाब्रवीत् ॥६॥
किं शेपे वसुधापृष्ठे पर्यङ्कादीन् विहाय च । मां त्वं खेदयसे भीरु यतो मां नावभाषसे ॥७॥ अलङ्कारं परित्यज्य भूमौ मलिनवाससा । किमर्थं ब्रूहि सकलं विधास्ये तव वाञ्छितम् ॥८॥
श्रीमहादेवजी बोले-तदनन्तर महाराज दशरथने रामचन्द्रजीके अभ्युदयके लिये प्रजावर्ग और मन्त्रियोंको (माङ्गलिक कार्योंके लिये) आज्ञा देकर आनन्दपूर्वक अपने रनिवासमें प्रवेश किया ॥१॥ वहाँ अपनी प्रिया कैकेयीको न देखकर वे अत्यन्त विह्वल होकर मन-ही-मन कहने लगे, 'क्या कारण है, जो पहले अपने महलमें घुसते ही सदा हँसती हुई मेरे सामने आती थी वह सुमुखी आज दिखायी ही नहीं दे रही है?' अपने चित्तमें अत्यन्त दुःख मानकर इसी प्रकार सोचते-सोचते ॥२-३॥ उन्होंने दासियोंसे पूछा-'आज तुम्हारी शुभलक्षणा स्वामिनी कहाँ है? वह प्रियदर्शना प्रिया आज पूर्ववत् मेरे सामने क्यों नहीं आती ?' ॥४॥
दासियोंने कहा- "देव ! कारण तो मालूम नहीं, किन्तु आज वे कोप-भवनमें गयी हुई हैं; आप स्वयं ही वहाँ जाकर सब हाल जान लीजिये" ॥५॥
दासियोंके इस प्रकार कहनेपर राजा भयभीत होकर उसके पास गये और वहाँ बैठकर उसके शरीरपर धीरे-धीरे हाथ फेरते हुए बोले-॥६॥ "अयि भीरु ! आज पलंग आदिको छोड़कर इस प्रकार पृथिवीपर क्यों पड़ी हो ? तुम हमसे कुछ बोलती नहीं हो, इससे हमें बड़ा खेद हो रहा है ॥७॥ समस्त वस्त्राभूषण छोड़कर तुम मलिन वस्त्र पहने हुए पृथिवीपर क्यों पड़ी हो ? तुम्हारी जो इच्छा हो सो कहो,
| ५२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ३ |
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को वा तवाहितं कर्ता नारी वा पुरुषोऽपि वा ।
स मे दण्ड्यश्च वध्यश्च भविष्यति न संशयः ॥ ९ ॥
ब्रूहि देवि यथा प्रीतिस्तदवश्यं ममाग्रतः ।
तदिदानीं साधयिष्ये सुदुर्लभमपि क्षणात् ॥ १० ॥
जानासि त्वं मम स्वान्तं प्रियं मां खवशे स्थितम् ।
तथापि मां खेदयसे वृथा तव परिश्रमः ॥ ११ ॥
ब्रूहि कं धनिनं कुर्यां दरिद्रं ते प्रियङ्करम् ।
धनिनं क्षणमात्रेण निर्धनं च तवाहितम् ॥ १२ ॥
ब्रूहि कं वा वधिष्यामि वधार्हो वा विमोक्ष्यते ।
किमत्र बहुनोक्तेन प्राणान्दास्यामि ते प्रिये ॥ १३ ॥
मम प्राणात्प्रियतरो रामो राजीवलोचनः ।
तस्योपरि शपे ब्रूहि त्वद्विष्टं तत्करोम्यहम् ॥ १४ ॥
इति ब्रुवाणं राजानं शपन्तं राघवोपरि ।
शनैर्विमृज्य नेत्रे सा राजानं प्रत्यभाषत ॥ १५ ॥
यदि सत्यप्रतिज्ञोऽसि शपथं कुरुषे यदि ।
याच्ञां मे सफलां कर्तुं शीघ्रमेव त्वमर्हसि ॥ १६ ॥
पूर्वं देवासुरे युद्धे मया त्वं परिरक्षितः ।
तदा वरद्वयं दत्तं त्वया मे तुष्टचेतसा ॥ १७ ॥
तद्द्वयं न्यासभूतं मे स्थापितं त्वयि सुव्रत ।
तत्रैकेन वरेणाशु भरतं मे प्रियं सुतम् ॥ १८ ॥
एभिः संभृतसंभारैर्यौवराज्येऽभिषेचय ।
अपरेण वरेणाशु रामो गच्छतु दण्डकान् ॥ १९ ॥
मुनिवेषधरः श्रीमान् जटावल्कलभूषणः ।
चतुर्दश समास्तत्र कन्दमूलफलाशनः ॥ २० ॥
पुनरायातु तस्यान्ते वने वा तिष्ठतु स्वयम् ।
प्रभाते गच्छतु वनं रामो राजीवलोचनः ॥ २१ ॥
| मैं सब पूर्ण करूँगा ॥ ८ ॥ तुम्हारा अनिष्ट करनेवाला कौन है ? वह स्त्री हो अथवा पुरुष अवश्य मेरे दण्डका पात्र होगा । यही नहीं, उसका वध भी किया जा सकता है ॥ ९ ॥ हे देवि ! जिस प्रकार तुम्हारी प्रसन्नता हो वह मुझसे अवश्य कहो । वह कार्य अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी मैं इसी समय एक क्षणमें ही पूरा कर दूँगा ॥ १० ॥ तुम मेरे हृदयको जानती ही हो, मैं तुम्हारा अत्यन्त प्रिय और तुम्हारे वशीभूत हूँ । फिर भी तुम मुझे खिन्न करती हो ? तुम्हारा यह परिश्रम व्यर्थ है ॥ ११ ॥ बताओ, तुम्हारा प्रिय करनेवाले किस कंगालको मैं धनी कर दूँ अथवा तुम्हारे अप्रियकारी किस धनपतिको एक क्षणमें ही कंगाल बना दूँ ? ॥ १२ ॥ बताओ, किस अवध्यको मार डालूँ और किस वध्यको छोड़ दूँ ? हे प्रिये ! इस विषयमें और अधिक क्या कहूँ, मैं तुम्हें अपने प्राण भी दे सकता हूँ ॥ १३ ॥ कमल-नयन राम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं । मैं उन्हींकी शपथ करके कहता हूँ कि तुम्हें जो कुछ प्रिय हो मैं वही करूँगा” ॥ १४ ॥<br><br>महाराज दशरथके रामकी सौगन्ध खाकर इस प्रकार कहनेपर कैकेयीने धीरे-धीरे अपने आँसू पोंछकर राजासे कहा—॥ १५ ॥ “राजन् ! यदि आप सत्य-प्रतिज्ञ हैं और शपथ भी करते हैं तो शीघ्र ही मैं जो कुछ माँगूँ उसे सफल कर देना चाहिये ॥ १६ ॥ पूर्वकालमें देवासुर-संग्राममें मैंने आपकी रक्षा की थी उस समय प्रसन्न होकर आपने मुझे दो वर देनेको कहा था ॥ १७ ॥ हे सुव्रत ! मैंने वे दोनों वर आपके पास धरोहरके रूपमें रख दिये थे । अब उनमेंसे एक वरसे तो तुरन्त ही मेरे प्रिय पुत्र भरतको इस एकत्रित की हुई सामग्रीसे युवराज-पदपर अभिषिक्त कीजिये और दूसरेसे तुरन्त ही राम दण्डक-वनको चले जायें ॥ १८–१९ ॥ वहाँ श्रीमान् रामको जटा-वल्कलादि धारण कर कन्द-मूल-फल खाते हुए मुनिवेषसे चौदह वर्षतक रहना चाहिये ॥ २० ॥ उसके पश्चात् अपनी इच्छासे चाहे वे अयोध्यामें लौट आवें अथवा वनहीमें रहें किन्तु कमलनयन राम कल सबेरे ही अवश्य वनको चले जायें ॥ २१ ॥ यदि इसमें कुछ देरी होगी तो आपके सामने ही मैं अपने प्राण छोड़ दूँगी ।
| सर्ग ३ ] | अयोध्याकाण्ड | ५३ |
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| यदि किञ्चिद्विलम्बेत प्राणांस्त्यक्ष्ये तवाग्रतः।<br>भव सत्यप्रतिज्ञस्त्वमेतदेव मम प्रियम् ॥२२॥ | आप अपनी प्रतिज्ञा सत्य कीजिये, मेरा प्रिय कार्य बस यही है” ॥२२॥ |
| श्रुत्वैतद्दारुणं वाक्यं कैकेय्या रोमहर्षणम्।<br>निपपात महीपालो वज्राहत इवाचलः ॥२३॥ | कैकेयीके ऐसे रोमाञ्चकारी कठोर वचन सुनकर महाराज दशरथ वज्राहत पर्वतके समान गिर पड़े ॥२३॥ |
| शनैरून्मील्य नयने विमृज्य परया भिया।<br>दुःस्वप्नो वा मया दृष्टो ह्यथवा चित्तविभ्रमः ॥२४॥ | तत्पश्चात् धीरे-धीरे नेत्र खोलकर अति भयपूर्वक आँसू पोंछे और मन-ही-मन कहने लगे— 'मैंने यह कोई दुःस्वप्न देखा है या मेरे चित्तको भ्रम हो गया है?' ॥२४॥ |
| इत्यालोक्य पुरः पत्नीं व्याघ्रीमिव पुरः स्थिताम्।<br>किमिदं भाषसे भद्रे मम प्राणहरं वचः ॥२५॥ | इसी समय अपने सामने सिंहिनीके समान बैठी हुई रानी कैकेयीको देखकर कहने लगे—"हे भद्रे ! मेरे प्राणोंको हरनेवाले तुम ये क्या वचन बोल रही हो ? ॥२५॥ |
| रामः कमपराधं ते कृतवान्कमलेक्षणः।<br>ममाग्रे राघवगुणान्वर्णयस्यनिशं शुभान् ॥२६॥ | कमलनयन रामने तुम्हारा क्या अपराध किया है ? तुम तो अहर्निश मेरे सामने रामके शुभ गुण गाया करती थी ॥ २६ ॥ |
| कौसल्यां मां समं पश्यन् शुश्रूषां कुरुते सदा।<br>इति ब्रुवन्ती त्वं पूर्वमिदानीं भाषसेऽन्यथा ॥२७॥ | तुम तो पहले कहा करती थी कि 'राम मुझे और कौसल्याको समान जानकर सदा ही मेरी सेवा किया करते हैं।' फिर इस समय तुम यह उलटी बात कैसे कह रही हो ? ॥२७॥ |
| राज्यं गृहाण पुत्राय रामस्तिष्ठतु मन्दिरे ।<br>अनुगृहीष्व मां वामे रामान्नास्ति भयं तव ॥२८॥ | तुम अपने पुत्रके लिये राज्य ले लो, किन्तु रामको घर ही रहने दो। हे वामे ! तुम मुझपर कृपा करो, रामसे तुम्हें कोई भय न करना चाहिये" ॥ २८ ॥ |
| इत्युक्त्वाऽश्रुपरीताक्षः पादयोर्निपपात ह।<br>कैकेयी प्रत्युवाचेदं साऽपि रक्तान्तलोचना॥२९॥ | ऐसा कहकर महाराज दशरथ नेत्रोंमें जल भरकर कैकेयीके चरणोंमें गिर पड़े । तब उस कैकेयीने आँखें लाल करके यों कहा—॥ २९॥ |
| राजेन्द्र किं त्वं भ्रान्तोऽसि उक्तं तद्भाषसेऽन्यथा।<br>मिथ्या करोषि चेत्स्वीयं भाषितं नरको भवेत् ॥३०॥ | “राजेन्द्र ! क्या तुम्हारी बुद्धिमें भ्रम हो गया है जो अपने कथनके विपरीत बोल रहे हो; याद रखो, यदि तुमने अपनी प्रतिज्ञा भंग कर दी तो तुम्हें नरक भोगना पड़ेगा ॥ ३० ॥ |
| वनं न गच्छेदयदि रामचन्द्रः<br>प्रभातकालेऽजिनचीरयुक्तः।<br>उद्बन्धनं वा विषभक्षणं वा<br>कृत्वा मरिष्ये पुरतस्तवाहम् ॥३१॥ | सुनो, यदि कल प्रातःकाल ही मृगचर्म और वल्कल-वस्त्र धारण कर राम वनको न गये तो मैं तुम्हारे सामने ही फाँसी लगाकर या विष खाकर मर जाऊँगी ॥ ३१ ॥ |
| सत्यप्रतिज्ञोऽहमितीह लोके<br>विडम्ब्यसे सर्वसभान्तरेषु।<br>रामोपरि त्वं शपथं च कृत्वा<br>मिथ्याप्रतिज्ञो नरकं प्रयाहि ॥३२॥ | तुम संसारमें सभी सभाओंमें 'मैं सत्यप्रतिज्ञ हूँ' ऐसा कहकर लोगोंको धोखेमें डाला करते हो, अब तुम रामकी शपथ करके की हुई प्रतिज्ञाको भी तोड़ रहे हो, अतः तुम्हें नरकमें जाना पड़ेगा” ॥ ३२ ॥ |
| इत्युक्तः प्रियया दीनो मग्नो दुःखार्णवे नृपः।<br>मूर्च्छितः पतितो भूमौ विसंज्ञो मृतको यथा ॥३३॥ | अपनी प्रियाके ऐसे कठोर वचन सुनकर महाराज दशरथ दुःख-समुद्रमें डूबकर बड़े व्याकुल हो गये, |
| ५४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ३ |
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एवं रात्रिर्गता तस्य दुःखात्संवत्सरोपमा ।
अरुणोदयकाले तु वन्दिनो गायका जगुः ॥३४॥
निवारयित्वा तान् सर्वान्कैकेयी रोषमास्थिता ।
ततः प्रभातसमये मध्यकक्षमुपस्थिताः ॥३५॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या ऋषयः कन्यकास्तथा ।
छत्रं च चामरं दिव्यं गजो वाजी तथैव च ॥३६॥
अन्याश्च वारमुख्या याः पौरजानपदास्तथा ।
वसिष्ठेन यथाऽऽज्ञप्तं तत्सर्वं तत्र संस्थितम् ॥३७॥
स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च रात्रौ निद्रां न लेभिरे ।
कदा द्रक्ष्यामहे रामं पीतकौशेयवाससम् ॥३८॥
सर्वाभरणसम्पन्नं किरीटकटकोज्ज्वलम् ।
कौस्तुभाभरणं श्यामं कन्दर्पशतसुन्दरम् ॥३९॥
अभिषिक्तं समायातं गजारूढं स्मिताननम् ।
श्वेतच्छत्रधरं तत्र लक्ष्मणं लक्षणान्वितम् ॥४०॥
रामं कदा वा द्रक्ष्यामः प्रभातं वा कदा भवेत् ।
इत्युत्सुकधियः सर्वे बभूवुः पुरवासिनः ॥४१॥
नेदानीमुत्थितो राजा किमर्थं चेति चिन्तयन् ।
सुमन्त्रः शनकैः प्रायाद्यत्र राजाऽवतिष्ठते ॥४२॥
वर्धयन् जयशब्देन प्रणमन्शिरसा नृपम् ।
अतिखिन्नं नृपं दृष्ट्वा कैकेयीं समपृच्छत ॥४३॥
देवि कैकेयि वर्धस्व किं राजा दृश्यतेऽन्यथा।
तमाह कैकेयी राजा रात्रौ निद्रां न लब्धवान्॥४४॥
राम रामेति रामेति राममेवानुचिन्तयन् ।
प्रजागरेण वै राजा ह्यस्वस्थ इव लक्ष्यते ।
राममानय शीघ्रं त्वं राजा द्रष्टुमिहेच्छति ॥४५॥
और मृतकके समान मूर्छित और संज्ञाशून्य होकर पृथिवीपर गिर पड़े ॥ ३३ ॥ इस प्रकार अत्यन्त दुःखके कारण उनकी वह रात्रि एक वर्षके समान बीती । इधर सूर्योदय होते ही गायक और वन्दीजन स्तुति-गान करने लगे ॥ ३४ ॥ किन्तु कैकेयीने अत्यन्त रोषमें भरकर उन सबको उसी समय रोक दिया । तदनन्तर प्रातःकाल होनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ऋषिगण, कन्याएँ, दिव्य छत्र और चँवर तथा हाथी और घोड़े आदि सभी अभिषेकोपयोगी वस्तुएँ मध्य-द्वारपर उपस्थित की गयीं ॥ ३५–३६ ॥ इनके अतिरिक्त वसिष्ठजीकी आज्ञानुसार मुख्य-मुख्य वारांगनाएँ तथा पुरवासी और जनपदवासी भी वहाँ उपस्थित हो गये ॥ ३७ ॥ उस रात स्त्री, बालक और वृद्ध किसीको भी नींद नहीं आयी । सभीको यही चटपटी लगी रही कि हम रेशमी पीताम्बर पहने भगवान् रामको कब देखेंगे ? ॥ ३८ ॥ जो समस्त आभूषणोंसे सुसज्जित, उज्ज्वल किरीट और कटक पहने हुए हैं तथा कौस्तुभमणिसे विभूषित और सैकड़ों कामदेवोंके समान सुन्दर श्याम-वर्ण हैं एवं सर्व-सुलक्षण-सम्पन्न श्रीलक्ष्मणजीने जिनके ऊपर श्वेत छत्र लगाया हुआ है ऐसे श्रीरामको राज्याभिषेकके अनन्तर मन्द मुसकानके सहित हाथीपर चढ़कर आते हुए हम कब देखेंगे ? वह मङ्गलप्रभात कब होगा ? इस प्रकार सभी पुरवासियोंका चित्त अति उत्कण्ठित हो रहा था ॥ ३९–४१ ॥
इसी समय मन्त्रिवर सुमन्त्र यह सोचकर कि ‘महाराज अभीतक कैसे नहीं उठे’ धीरेसे जहाँ राजा दशरथ थे वहाँ गये ॥ ४२ ॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने जय-जयकार कर राजाको शिर झुकाकर प्रणाम किया और उन्हें अत्यन्त खिन्न देखकर कैकेयीसे पूछा—॥ ४३ ॥ “देवि कैकेयि ! आपका अभ्युदय हो, कहिये आज महाराज अनमने कैसे दिखायी देते हैं ?” इसपर कैकेयीने कहा—“आज महाराजको रात्रिमें बिलकुल नींद नहीं आयी ॥ ४४ ॥ रात्रिभर रामका चिन्तन करते हुए ‘राम राम राम’ ही रटते रहे हैं । इस प्रकार जागते रहनेके कारण ही राजा कुछ अस्वस्थ दिखायी देते हैं । महाराज रामको देखना चाहते हैं, इसलिये तुम शीघ्र ही उन्हें लिवा लाओ” ॥ ४५ ॥
अयोध्याकाण्ड - सर्ग ४: भगवान् रामका मातासे विदा होना तथा वन-गमनकी तैयारी
.सर्ग ३] अयोध्याकाण्ड ५५
| सुमन्त्र उवाच.<br>अश्रुत्वा राजवचनं कथं गच्छामि भामिनि ।<br>तच्छ्रुत्वा मन्त्रिणो वाक्यं राजा मन्त्रिणमब्रवीत् ॥४६॥<br>सुमन्त्र रामं द्रक्ष्यामि शीघ्रमानय सुन्दरम् ।<br>इत्युक्तस्त्वरितं गत्वा सुमन्त्रो राममन्दिरम् ॥४७॥<br>अवारितः प्रविष्टोऽथ त्वरितं राममब्रवीत् ।<br>शीघ्रमागच्छ भद्रं ते राम राजीवलोचन ॥४८॥<br>पितुर्गेहं मया सार्धं राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति ।<br>इत्युक्तो रथमारुह्य सम्भ्रमाच्चरितो ययौ ॥४९॥<br>रामः सारथिना सार्धं लक्ष्मणेन समन्वितः ।<br>मध्यकक्षे वसिष्ठादीन् पश्यन्नेव त्वरान्वितः ॥५०॥<br>पितुः समीपं सङ्गम्य ननाम चरणौ पितुः ।<br>राममालिङ्गितुं राजा समुत्थाय ससम्भ्रमः ॥५१॥<br>बाहू प्रसार्य रामेति दुःखान्मध्ये पपात ह ।<br>हाहेति रामस्तं शीघ्रमालिङ्ग्याङ्के न्यवेशयत् ॥५२॥<br>राजानं मूर्च्छितं दृष्ट्वा चुक्रुशुः सर्वयोषितः ।<br>किमर्थं रोदनमिति वसिष्ठोऽपि समाविशत् ॥५३॥<br>रामः पप्रच्छ किमिदं राज्ञो दुःखस्य कारणम् ।<br>एवं पृच्छति रामे सा कैकेयी राममब्रवीत् ॥५४॥<br>त्वमेव कारणं ह्यत्र राज्ञो दुःखोपशान्तये ।<br>किञ्चित्कार्यं त्वया राम कर्तव्यं नृपतेर्हितम् ॥५५॥<br>कुरु सत्यप्रतिज्ञस्त्वं राजानं सत्यवादिनम् ।<br>राज्ञा वरद्वयं दत्तं मम सन्तुष्टचेतसा ॥५६॥<br>त्वदधीनं तु तत्सर्वं वक्तुं त्वां लज्जते नृपः ।<br>सत्यपाशेन सम्बद्धं पितरं त्रातुमर्हसि ॥५७॥<br>पुत्रशब्देन चैतद्धि नरकात्त्रायते पिता ।<br>रामस्तयोदितं श्रुत्वा शूलेनाभिहतो यथा ॥५८॥<br>व्यथितः कैकेयीं प्राह किं मामेवं प्रभाषसे । | **सुमन्त्र बोले-**हे भामिनि ! महाराजकी आज्ञा पाये बिना मैं कैसे जा सकता हूँ ? मन्त्रीका यह वचन सुनकर महाराज बोले—॥४६॥ "सुमन्त्र ! मैं मनोहर-मूर्ति रामको देखूँगा। तुम उन्हें शीघ्र ही ले आओ।” राजाके ऐसा कहते ही सुमन्त्र तुरन्त रामके महलको गये ॥ ४७ ॥ और बिना रोक-टोकके तुरन्त भीतर जाकर रामसे कहा—"कमल-नयन राम ! तुम्हारा कल्याण हो, तुम शीघ्र ही मेरे साथ पिताजीके घर चलो, महाराज तुम्हें देखना चाहते हैं।" यह सुनते ही राम चकित-से होकर तुरन्त ही रथपर चढ़कर चले ॥ ४८-४९ ॥ सारथी और लक्ष्मणके सहित भगवान् रामने मध्यद्वारपर विराजमान वसिष्ठादि गुरुजनोंका केवल दर्शनमात्रसे ही सत्कार कर जल्दीसे पिताजीके पास पहुँच उनके चरणोंमें प्रणाम किया । उस समय रामको गले लगानेके लिये ज्यों ही उठकर महाराज दशरथने आवेगके साथ हाथ बढ़ाये कि वे बीचहीमें दुःखपूर्वक 'हा राम ! हा राम !' कहते हुए गिर पड़े । तब रामचन्द्रजीने हाहाकार करते हुए अति शीघ्रतासे उन्हें गले लगाकर अपनी गोदमें बैठा लिया ॥ ५०-५२ ॥<br><br>महाराजको मूर्च्छित देखकर रनिवासकी समस्त महिलाएँ रोने लगीं । तब यह सोचकर कि 'यह रुदन क्यों हो रहा है ?' वहाँ वसिष्ठजी भी चले आये ॥ ५३ ॥ भगवान् रामने कैकेयीसे पूछा—"महाराजके इस दुःखका क्या कारण है ?" उनके इसप्रकार पूछनेपर कैकेयी बोली—॥५४॥ "हे राम ! महाराजके इस दुःखके कारण तुम्हीं हो; तुम्हें उनके दुःखके शान्त करनेके लिये उनका कुछ प्रिय कार्य करना होगा ॥ ५५ ॥ तुम सत्यप्रतिज्ञ हो, महाराजको भी सत्यवादी बनाओ । उन्होंने प्रसन्न होकर मुझे दो वर दिये हैं ॥ ५६ ॥ किन्तु उनकी सफलता तुम्हारे ही अधीन है । महाराजको तो तुमसे कहनेमें संकोच मालूम होता है; किन्तु तुम्हें सत्यपाशमें बँधे हुए अपने पिताजीकी अवश्य रक्षा करनी चाहिये ॥ ५७ ॥ क्योंकि 'पुत्र' शब्दका अभिप्राय ही यह है कि पिता-की नरकसे रक्षा की जाय ।”<br><br>कैकेयीकी ये बातें सुनकर रामने मानों शूलसे विद्ध हुएके समान व्यथित होकर कहा—"मातः ! आज |
५६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ३
पित्रर्थे जीवितं दास्ये पिबेयं विषमुल्बणम् ॥५९॥
सीतां त्यक्ष्येऽथ कौसल्यां राज्यं चापि त्यजाम्यहम्
अनाज्ञप्तोऽपि कुरुते पितुः कार्यं स उत्तमः ॥६०॥
उक्तः करोति यः पुत्रः स मध्यम उदाहृतः ।
उक्तोऽपि कुरुते नैव स पुत्रो मल उच्यते ॥६१॥
अतः करोमि तत्सर्वं यन्मामाह पिता मम ।
सत्यं सत्यं करोम्येव रामो द्विर्नाभिभाषते ॥६२॥
इति रामप्रतिज्ञां सा श्रुत्वा वक्तुं प्रचक्रमे ।
राम त्वदभिषेकार्थं संभाराः संभृताश्च ये ॥६३॥
तैरेव भरतोऽवश्यमभिषेच्यः प्रियो मम ।
अपरेण वरेणाशु चीरवासा जटाधरः ॥६४॥
वनं प्रयाहि शीघ्रं त्वमद्यैव पितुराज्ञया ।
चतुर्दश समास्तत्र वस मुन्यन्नभोजनः ॥६५॥
एतदेव पितुस्तेऽद्य कार्यं त्वं कर्तुमर्हसि ।
राजा तु लज्जते वक्तुं त्वामेवं रघुनन्दन ॥६६॥
श्रीराम उवाच
भरतस्यैव राज्यं स्यादहं गच्छामि दण्डकान् ।
किन्तु राजा न वक्तीह मां न जानेऽत्र कारणम् ॥६७॥
श्रुत्वैतद्रामवचनं दृष्ट्वा रामं पुरः स्थितम् ।
प्राह राजा दशरथो दुःखितो दुःखितं वचः ॥६८॥
स्त्रीजितं भ्रान्तहृदयमुन्मार्गपरिवर्तिनम् ।
निगृह्य मां गृहाणेदं राज्यं पापं न तद्भवेत् ॥६९॥
एवं चेदनृतं नैव मां स्पृशेद्रघुनन्दन ।
इत्युक्त्वा दुःखसन्तप्तो विललाप नृपस्तदा ॥७०॥
हा राम हा जगन्नाथ हा मम प्राणवल्लभ ।
मां विसृज्य कथं घोरं विपिनं गन्तुमर्हसि ॥७१॥
इति रामं समालिङ्ग्य मुक्तकण्ठो रुरोद ह ।
विमृज्य नयने रामः पितुः सजलपाणिना ॥७२॥
हमसे ऐसी बातें क्यों करती हों ? पिताजीके लिये मैं जीवन दे सकता हूँ, भयंकर विष पी सकता हूँ ॥ ५८-५९ ॥ और सीता, कौसल्या तथा राज्यको भी छोड़ सकता हूँ । जो पुत्र पिताकी आज्ञाके बिना ही उनका अभीष्ट कार्य करता है वह उत्तम है ॥ ६० ॥ जो पिताके कहनेपर करता है वह मध्यम होता है और जो कहनेपर भी नहीं करता वह पुत्र तो विष्ठाके समान है ॥ ६१ ॥ अतः पिताजीने मेरे लिये जो कुछ आज्ञा की है उसे मैं अवश्य पूर्ण करूँगा, यह सर्वथा सत्य है; राम एक मुखसे दो बात कभी नहीं कहता" ॥ ६२ ॥
रामकी ऐसी प्रतिज्ञा सुनकर कैकेयीने इस प्रकार कहना आरम्भ किया, “हे राम ! तुम्हारे अभिषेकके लिये जो कुछ सामग्री एकत्रित की गयी है ॥ ६३ ॥ उसके द्वारा निश्चय ही मेरे प्रिय पुत्र भरतका अभिषेक होना चाहिये । (यहाँ मेरा प्रथम वर है) । दूसरे वरके अनुसार पिताकी आज्ञासे आज तुरन्त ही तुम वल्कल-वस्त्र और जटा धारणकर वनको जाओ और वहाँ मुनिजनोचित भोजन करते हुए चौदह वर्ष-तक रहो ॥ ६४-६५ ॥ वत्स, तुम्हारे पिताका यही कार्य है, जो तुम्हें करना चाहिये । किन्तु राजा इन सब बातोंको तुमसे कहनेमें संकोच करते हैं” ॥६६॥
श्रीरामचन्द्रजी बोले-माता ! भरत आनन्दसे यह राज्य भोगें और मैं भी अभी दण्डकारण्यको जाता हूँ । किन्तु इसका कारण मालूम नहीं होता कि महाराज मुझसे क्यों नहीं कहते ? ॥ ६७ ॥
रामके ये वचन सुनकर और उन्हें अपने सामने बैठे देखकर दुःखातुर महाराज दशरथने इस प्रकार अति दुःखभरे वचन कहे ॥ ६८ ॥ "राम ! मुझ स्त्री-परवश, भ्रान्तचित्त, कुमार्गगामी पापात्माको बाँधकर यह राज्य ले लो; इससे तुम्हें कोई पाप न लगेगा ॥ ६९ ॥ हे रघुनन्दन ! ऐसा होनेपर मुझे भी असत्य स्पर्श न करेगा।" ऐसा कह राजा दशरथ दुःखातुर होकर विलाप करने लगे ॥ ७० ॥ 'हा राम ! हा जगन्नाथ ! हा प्राणप्यारे ! मुझे छोड़कर तुम घोर वनमें जाना कैसे उचित समझ रहे हो ?' ॥ ७१ ॥
ऐसा कहकर उन्होंने रामको गले लगा लिया और जी खोलकर रोने लगे । तब रामने हाथमें जल लेकर
| [ सर्ग ३ ] | अयोध्याकाण्ड | ५७ |
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| आश्वासयामास नृपं शनैः स नयकोविदः ।<br>किमत्र दुःखेन विभो राज्यं शासतु मेऽनुजः ॥७३॥<br><br>अहं प्रतिज्ञां निस्तीर्य पुनर्यास्यामि ते पुरम् ।<br>राज्यात्कोटिगुणं सौख्यं मम राजन्वने सतः ॥७४॥<br><br>त्वत्सत्यपालनं देवकार्यं चापि भविष्यति ।<br>कैकेय्याश्च प्रियो राजन्वनवासो महागुणः ॥७५॥<br><br>इदानीं गन्तुमिच्छामि व्येतु मातुश्च हृज्ज्वरः ।<br>सम्भाराश्चोपहीयन्तामभिषेकार्थमाहृताः ॥७६॥<br><br>मातरं च समाश्वास्य अनुनीय च जानकीम् ।<br>आगत्य पादौ वन्दित्वा तव यास्ये सुखं वनम्॥७७॥<br><br>इत्युक्त्वा तु परिक्रम्य मातरं द्रष्टुमाययौ ।<br>कौसल्याऽपि हरेः पूजां कुरुते रामकारणात् ॥७८॥<br><br>होमं च कारयामास ब्राह्मणेभ्यो ददौ धनम् ।<br>ध्यायते विष्णुमेकाग्रमनसा मौनमास्थिता ॥७९॥<br><br>अन्तःस्थमेकं घनचित्प्रकाशं<br>निरस्तसर्वातिशयस्वरूपम् ।<br>विष्णुं सदानन्दमयं हृदब्जे<br>सा भावयन्ती न ददर्श रामम् ॥८०॥ | पिताके आँसू पोंछे ॥ ७२ ॥ और नीतिकुशल रामजीने धीरे-धीरे उन्हें ढाढस बँधाया। वे कहने लगे—"प्रभो ! यदि मेरे छोटे भाई भरत राज्यशासन करें तो इसमें दुःखकी क्या बात है ? ॥ ७३ ॥ मैं भी इस प्रतिज्ञाका पालन कर फिर आपके पास अयोध्या लौट ही आऊँगा । और हे राजन् ! वनमें रहनेसे तो मुझे राज्यसे भी करोड़ गुना सुख होगा ॥ ७४ ॥ इसमें आपके सत्यकी रक्षा होगी, देवताओंका कार्य सिद्ध होगा और कैकेयीका भी हित होगा; अतः हे राजन् ! वनवासमें सब प्रकार महान् गुण है ॥ ७५ ॥ अब मैं शीघ्र ही जाना चाहता हूँ; माता कैकेयीकी हार्दिक व्यथा शान्त हो । अभिषेकके लिये एकत्रित की हुई यह सामग्री अलग रख दी जाय ॥ ७६ ॥ माता कौसल्याको सान्त्वना देकर और जानकीको समझा-बुझाकर मैं अभी आता हूँ और आपके चरणोंकी वन्दना-कर आनन्दपूर्वक वनको. जाता हूँ" ॥ ७७ ॥<br><br>ऐसा कह उन्होंने पिताकी परिक्रमा की और मातासे मिलनेके लिये आये । इस समय माता कौसल्या रामके मंगलके लिये श्रीविष्णुभगवान्की पूजा कर रही थीं ॥ ७८ ॥ उन्होंने कुछ पहले हवन कराके ब्राह्मणों-को बहुत-सा धन दिया था और इस समय वह मौन धारणकर एकाग्रचित्तसे श्रीविष्णुभगवान्का ध्यान कर रही थीं ॥ ७९ ॥ अपने हृदयमें अन्तर्यामी, चिद्घन-स्वरूप, तेजोमय, निरतिशयस्वरूप, सदानन्दमय भगवान् विष्णुका ध्यान करती रहनेके कारण उन्होंने श्रीरामचन्द्र-जीको नहीं देख पाया ॥ ८० ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे
तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
| ५८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ४ |
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चतुर्थ सर्ग
भगवान् रामका मातासे विदा होना तथा सीता और लक्ष्मणके सहित वनगमनकी तैयारी करना।
श्रीमहादेव उवाच
ततः सुमित्रा दृष्ट्वैनं रामं राज्ञीं ससम्भ्रमा ।
कौसल्यां बोधयामास रामोऽयं समुपस्थितः ॥ १ ॥
श्रुत्वैव रामनामैषा बहिर्दृष्टिप्रवाहिता ।
रामं दृष्ट्वा विशालाक्षमालिङ्ग्याङ्के न्यवेशयत् ॥ २ ॥
मूर्ध्ववघ्राय पस्पर्श गात्रं नीलोत्पलच्छवि ।
भुङ्क्ष्व पुत्रेति च प्राह मिष्टमन्नं क्षुधार्दितः ॥ ३ ॥
रामः प्राह न मे मातर्भोजनावसरः कुतः ।
दण्डकागमने शीघ्रं मम कालोऽद्य निश्चितः ॥ ४ ॥
कैकेयीवरदानेन सत्यसन्धः पिता मम ।
भरताय ददौ राज्यं ममाप्यारण्यमुत्तमम् ॥ ५ ॥
चतुर्दश समास्तत्र ह्युषित्वा मुनिवेषधृक् ।
आगमिष्ये पुनः शीघ्रं न चिन्तां कर्तुमर्हसि ॥ ६ ॥
तच्छ्रुत्वा सहसोद्विग्ना मूर्च्छिता पुनरुत्थिता ।
आह रामं सुदुःखार्ता दुःखसागरसम्प्लुता ॥ ७ ॥
यदि राम वनं सत्यं यासि चेन्नय मामपि ।
त्वद्विहीना क्षणार्द्धं वा जीवितं धारये कथम् ॥ ८ ॥
यथा गौर्बालकं वत्सं त्यक्त्वा तिष्ठेन्न कुत्रचित् ।
तथैव त्वां न शक्नोमि त्यक्तुं प्राणात्प्रियं सुतम् ॥ ९ ॥
भरताय प्रसन्नश्चेद्राज्यं राजा प्रयच्छतु ।
किमर्थं वनवासाय त्वामाज्ञापयति प्रियम् ॥ १० ॥
कैकेय्या वरदो राजा सर्वस्वं वा प्रयच्छतु ।
त्वया किमपराद्धं हि कैकेय्या वा नृपस्य वा ॥ ११ ॥
पिता गुरुर्यथा राम तवाहमाधिका ततः ।
पित्राज्ञप्तो वनं गन्तुं वारयेयमहं सुतम् ॥ १२ ॥
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वती ! तब महारानी सुमित्राने रामको देखकर सम्भ्रमपूर्वक महारानी कौसल्याको चेत कराकर बताया कि राम खड़े हुए हैं ॥ १ ॥ रामका नाम सुनते ही उनकी बहिर्दृष्टि हुई और उन्होंने विशालनयन रामको देख गले लगाकर गोदमें बैठा लिया ॥ २ ॥ तथा उनका शिर सूँघकर उनके नील-कमल-सदृश श्याम शरीरपर हाथ फेरा और कहा—"बेटा, भूख लगी होगी कुछ मिष्टान्न खा लो" ॥ ३ ॥
रामजी बोले—"माता ! मुझे भोजन करनेका समय नहीं है क्योंकि आज मेरे लिये यह समय शीघ्र ही दण्डकारण्य जानेके लिये निश्चित किया गया है ॥ ४ ॥ मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिताजीने माता कैकेयीको वर देकर भरतको राज्य और मुझे अति उत्तम वनवास दिया है ॥ ५ ॥ वहाँ मुनिवेषसे चौदह वर्ष रहकर मैं शीघ्र ही लौट आऊँगा; आप किसी प्रकारकी चिन्ता न करें" ॥ ६ ॥
अचानक ऐसी बात सुनकर माता कौसल्या दुःखसे अचेत हो गयीं और फिर चेत होनेपर दुःखसागरमें उछलती-डूबती दुःखातुर होकर रामसे कहने लगीं ॥ ७ ॥ "राम ! यदि सचमुच ही तुम वनको जाते हो तो मुझे भी साथ ले चलो; तुम्हारे बिना मैं आधे क्षण भी कैसे जीवित रह सकती हूँ ? ॥ ८ ॥ जिस प्रकार गौ अपने अल्पवयस्क बछड़ेको छोड़कर अन्यत्र नहीं रह सकती उसी प्रकार मैं भी तुझ अपने प्राणप्रिय पुत्रको नहीं छोड़ सकती ॥ ९ ॥ यदि राजा भरतसे प्रसन्न हैं तो उन्हें राज्य भले ही दें परन्तु तुझ प्रियपुत्रको वनवासकी आज्ञा क्यों देते हैं ? ॥ १० ॥ कैकेयीको वर देकर चाहे महाराज अपना सर्वस्व दे डालें, (इसमें कोई आपत्ति नहीं) किन्तु तुमने राजा अथवा कैकेयीका क्या बिगाड़ा है ? ॥ ११ ॥ हे राम ! जिस प्रकार पिता तुम्हारे गुरु हैं उसी प्रकार मैं भी तो उनसे अधिक तुम्हारी गुरु हूँ ! यदि पिताने तुमसे वन जानेको कहा है तो मैं तुम्हें रोकती हूँ ॥ १२ ॥ यदि मेरे वाक्यका
| सर्ग ४ ] | अयोध्याकाण्ड | ५९ |
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| यदि गच्छसि मद्वाक्यमुल्लङ्घ्य नृपवाक्यतः ।<br>तदा प्राणान्परित्यज्य गच्छामि यमसादनम् ॥१३॥ | उल्लङ्घन कर तुम राजाकी आज्ञासे वनको चले जाओगे तो मैं अपना प्राण छोड़कर यमपुरको चली जाऊँगी” ॥ १३ ॥ |
| लक्ष्मणोऽपि ततः श्रुत्वा कौसल्यावचनं रुषा ।<br>उवाच राघवं वीक्ष्य दहन्निव जगत्त्रयम् ॥१४॥ | तब लक्ष्मणने भी कौसल्याके वचन सुनकर रामजीकी ओर देखकर रोषसे त्रिलोकीको दग्ध करते हुए-से कहा ॥ १४ ॥ “मैं उन्मत्त, भ्रान्तचित्त और कैकेयीके |
| उन्मत्तं भ्रान्तमनसं कैकेयीवशवर्तिनम् ।<br>बद्ध्वा निहन्मि भरतं तद्वन्धून्मातुलानपि ॥१५॥ | वशवर्ती राजा दशरथको बाँधकर भरतको उनके सहायक मामा आदिके सहित मार डालूँगा ॥ १५ ॥ आज |
| अद्य पश्यन्तु मे शौर्यं लोकान्प्रदहतः पुरा ।<br>राम त्वमभिषेकाय कुरु यत्नमरिन्दम ॥१६॥<br>धनुष्पाणिरहं तत्र निहन्यां विघ्नकारिणः । | सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध करनेवाले कालानलके समान मेरे पौरुषको पहले वे सब लोग देख लें । हे शत्रुदमन राम ! आप अभिषेककी तैयारी कीजिये ॥१६॥ उसमें विघ्न उपस्थित करनेवालोंको मैं हाथमें धनुष-बाण लेकर मार डालूँगा ।” |
| इति ब्रुवन्तं सौमित्रिमालिङ्ग्य रघुनन्दनः ॥१७॥<br>शूरोऽसि रघुशार्दूल ममात्यन्तहिते रतः ।<br>जानामि सर्वं ते सत्यं किन्तु तत्समयो नहि॥१८॥ | लक्ष्मणजीके इस प्रकार कहनेपर रघुनाथजीने उन्हें गले लगाकर कहा ॥ १७ ॥ “हे रघुश्रेष्ठ ! तुम बड़े शूरवीर और मेरे परम हितकारी हो । तुम जो कुछ कहते हो वह मैं सब सत्य मानता हूँ, किन्तु यह उसका समय नहीं है ॥ १८ ॥ यह जो कुछ राज्य और देह |
| यदिदं दृश्यते सर्वं राज्यं देहादिकं च यत् ।<br>यदि सत्यं भवेत्तत्र आयासः सफलश्च ते ॥१९॥ | आदि दिखायी देता है वह सब यदि सत्य होता तो अवश्य तुम्हारा परिश्रम सफल होता ॥ १९ ॥ किन्तु |
| भोगा मेघवितानस्थविद्युल्लेखेव चञ्चलाः ।<br>आयुरप्यग्निसन्तप्तलोहस्थजलविन्दुवत् ॥२०॥ | ये भोग तो मेघरूपी वितानमें चमकती हुई बिजलीके समान चञ्चल हैं और आयु अग्निमें तपाये हुए लोहेपर पड़ी हुई जलकी बूँदके समान क्षणिक है॥ २० ॥ |
| यथा व्यालगलस्थोऽपि भेको दंशानपेक्षते ।<br>तथा कालाहिना ग्रस्तो लोको भोगानशाश्वतान् २१ | जिस प्रकार सर्पके मुँहमें पड़ा हुआ भी मेंढक मच्छरोंको ताकता रहता है उसी प्रकार लोग कालरूप सर्पसे ग्रस्त हुए भी अनित्य भोगोंको चाहते रहते हैं ॥२१॥ कैसा |
| करोति दुःखेन हि कर्मतन्त्रं<br>शरीरभोगार्थमहर्निशं नरः ।<br>देहस्तु भिन्नः पुरुषात्समीक्ष्यते<br>को वात्र भोगः पुरुषेण भुज्यते ॥२२॥ | आश्चर्य है कि शरीरके भोगोंके लिये ही मनुष्य रात-दिन अति कष्ट सहकर नाना प्रकारकी क्रियाएँ करता रहता है । यदि यह समझ ले कि शरीर आत्मासे भिन्न है तो फिर भला पुरुष कैसे किसी भोगको भोग सकता है ? ॥ २२ ॥ पिता, माता, पुत्र, भाई, स्त्री और बन्धु- |
| पितृमातृसुतभ्रातृदारबन्ध्वादिसङ्गमः ।<br>प्रपायामिव जन्तूनां नद्यां काष्ठौघवच्चलः ॥२३॥ | बान्धवोंका संयोग प्याऊपर एकत्रित हुए जीवों अथवा नदी-प्रवाहसे इकट्ठी हुई लकड़ियोंके समान चञ्चल है ॥ २३ ॥ यह निस्सन्देह दिखायी पड़ता है कि |
| छायेव लक्ष्मीश्चपला प्रतीता<br>तारुण्यमम्बूर्विवदध्रुवं च।<br>स्वप्नोपमं स्त्रीसुखमायुरल्पं<br>तथापि जन्तोरभिमान एषः ॥२४॥ | लक्ष्मी छायाके समान चञ्चल, यौवन जल-तरंगके समान अनित्य है, स्त्री-सुख स्वप्नके समान मिथ्या और आयु अत्यन्त अल्प है तथापि प्राणियोंका इनमें कितना अभिमान है ? ॥२४॥ यह संसार सदा रोगादि-संकुल |
| ६० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| संसृतिः स्वप्नसदृशी सदा रोगादिसङ्कुला ।<br>गन्धर्वनगरप्रख्या मूढस्तामनुवर्तते ॥२५॥ | तथा स्वप्न और गन्धर्व-नगरके समान मिथ्या है, मूढ़-जन ही इसको सत्य मानकर इसका अनुकरण करते हैं ॥२५॥ |
| आयुष्यं क्षीयते यस्मादादित्यस्य गतागतैः ।<br>दृष्ट्वाऽन्येषां जरामृत्यू कथञ्चिन्नैव बुध्यते ॥२६॥ | नित्य सूर्यके उदय और अस्त होनेसे आयु क्षीण हो रही है तथा नित्य ही दूसरोंकी वृद्धावस्था और मृत्यु होती देखी जाती है तो भी मूढ़ पुरुषको किसी प्रकार चेत नहीं होता ॥२६॥ |
| स एव दिवसः सैव रात्रिरित्येव मूढधीः ।<br>भोगाननुपतत्येव कालवेगं न पश्यति ॥२७॥ | नित्यप्रति उसी प्रकार दिन और रात होते हैं किन्तु मूढ़मति पुरुष भोगोंके पीछे ही दौड़ता है, कालकी गतिको नहीं देखता ॥२७॥ |
| प्रतिक्षणं क्षरत्येतदायुरामघटाम्बुवत् ।<br>सपत्ना इव रोगौघाः शरीरं प्रहरन्त्यहो ॥२८॥ | कच्चे घड़ेमें भरे हुए जलके समान आयु प्रतिक्षण क्षीण हो रही है और रोग-समूह शत्रुओंके समान शरीरको सुकाये डालते हैं ॥२८॥ |
| जरा व्याघ्रीव पुरतस्तर्जयन्त्यवतिष्ठते ।<br>मृत्युः सहैव यात्येष समयं सम्प्रतीक्षते ॥२९॥ | वृद्धावस्था सिंहिनीके समान डराती हुई सामने खड़ी है और यह मृत्यु भी उसके साथ ही चलती हुई (अन्त) समयकी प्रतीक्षा कर रही है ॥२९॥ |
| देहेऽहंभावमापन्नो राजाऽहं लोकविश्रुतः ।<br>इत्यस्मिन्मनुते जन्तुः कृमिविड्भस्मसंज्ञिते ॥३०॥ | किन्तु देहमें अहं-भावना करनेवाला जीव इस कृमि, विष्ठा और भस्मरूप शरीरको ही 'मैं लोक-प्रसिद्ध राजा हूँ' ऐसा मानता है ॥३०॥ |
| त्वगस्थिमांसविण्मूत्ररेतोरक्तादिसंयुतः ।<br>विकारी परिणामी च देह आत्मा कथं वद ॥३१॥ | हे लक्ष्मण ! तुम कुछ सोचकर बताओ कि जिसके आश्रयसे तुम संसारको दग्ध करना चाहते हो वह त्वचा, अस्थि, मांस, विष्ठा, मूत्र, शुक्र और रुधिर आदिसे बना हुआ विकारी और परिणामी देह आत्मा किस प्रकार हो सकता है ! |
| यमास्थाय भवाँल्लोकं दग्धुमिच्छति लक्ष्मण ।<br>देहाभिमानिनः सर्वे दोषाः प्रादुर्भवन्ति हि ॥३२॥ | हे भाई ! इस देहाभिमानसे युक्त पुरुषोंमें ही सम्पूर्ण दोष प्रकट हुआ करते हैं ॥३१-३२॥ |
| देहोऽहमिति या बुद्धिरविद्या सा प्रकीर्तिता ।<br>नाहं देहश्चिदात्मेति बुद्धिर्विद्येति भण्यते ॥३३॥ | 'मैं देह हूँ' इस बुद्धिका नाम ही अविद्या है और 'मैं देह नहीं, चेतन-आत्मा हूँ' इसको विद्या कहते हैं ॥३३॥ |
| अविद्या संसृतेर्हेतुर्विद्या तस्या निवर्तिका ।<br>तस्माद्यत्नः सदा कार्यो विद्याभ्यासे मुमुक्षुभिः ।<br>कामक्रोधादयस्तत्र शत्रवः शत्रुसूदन ॥३४॥ | अविद्या जन्म-मरणरूप संसारकी कारण है और विद्या उसको निवृत्त करनेवाली है; अतः मोक्ष-कामियोंको सदा विद्योपार्जनका प्रयत्न करना चाहिये । हे शत्रुदमन ! काम-क्रोध आदि इस साधनमें विघ्न करनेवाले शत्रु हैं ॥३४॥ |
| तत्रापि क्रोध एवालं मोक्षविघ्नाय सर्वदा ।<br>येनाविष्टः पुमान्हन्ति पितृभ्रातृसुहृत्सखीन् ॥३५॥ | उनमें भी मोक्षमें विघ्न उपस्थित करनेके लिये तो एकमात्र क्रोध ही पर्याप्त है, जिसका आवेश होनेसे पुरुष पिता, माता, सुहृद् और बन्धुओंका भी वध कर डालता है ॥३५॥ |
| क्रोधमूलो मनस्तापः क्रोधः संसारबन्धनम् ।<br>धर्मक्षयकरः क्रोधस्तस्मात्क्रोधं परित्यज ॥३६॥ | मनके सन्तापका मूल क्रोध ही है और क्रोध ही संसारका बन्धन तथा धर्मका क्षय करनेवाला है । इसलिये तुम क्रोधको छोड़ दो ॥३६॥ |
| क्रोध एष महान् शत्रुस्तृष्णा वैतरणी नदी ।<br>सन्तोषो नन्दनवनं शान्तिरेव हि कामधुक् ॥३७॥ | यह क्रोध महान् शत्रु है, तृष्णा वैतरणी नदी है, सन्तोष नन्दनवन है और शान्ति ही कामधेनु है ॥३७॥ |
| तस्मात्क्षान्तिं भजस्वाद्य शत्रुरेवं भवेन्न ते । | इसलिये तुम शान्ति धारण करो, इससे (क्रोधरूपी) शत्रु का तुमपर प्रभाव न होगा । |
| देहेन्द्रियमनःप्राणबुद्ध्यादिभ्यो विलक्षणः ॥३८॥ | आत्मा |
सर्ग ४ ] अयोध्याकाण्ड ६१
| आत्मा शुद्धः स्वयंज्योतिरविकारी निराकृतिः ।<br>यावद्देहेन्द्रियप्राणैर्भिन्नत्वं नात्मनो विदुः ॥३९॥<br>तावत्संसारदुःखौघैः पीड्यन्ते मृत्युसंयुताः ।<br>तस्मात्त्वं सर्वदा भिन्नमात्मानं हृदि भावय ॥४०॥<br>बुद्ध्यादिभ्यो बहिः सर्वमनुवर्तस्व मा खिदः ।<br>भुञ्जन्प्रारब्धमखिलं सुखं वा दुःखमेव वा ॥४१॥<br>प्रवाहपतितं कार्यं कुर्वन्नपि न लिप्यसे ।<br>बाह्ये सर्वत्र कर्तृत्वमावहन्नपि राघव ॥४२॥<br>अन्तःशुद्धस्वभावस्त्वं लिप्यसे न च कर्मभिः ।<br>एतन्मयोदितं कृत्स्नं हृदि भावय सर्वदा ॥४३॥<br>संसारदुःखैरखिलैर्बाध्यसे न कदाचन ।<br>त्वमप्यम्ब मयादिष्टं हृदि भावय नित्यदा ॥४४॥<br>समागमं प्रतीक्षस्व न दुःखैः पीड्यसे चिरम् ।<br>न सदैकत्र संवासः कर्ममार्गानुवर्तिनाम् ॥४५॥<br>यथा प्रवाहपतितप्लवानां सरितां तथा ।<br>चतुर्दशसमा सङ्ख्या क्षणार्द्धमिव जायते ॥४६॥<br>अनुमन्यस्व मामम्ब दुःखं सन्त्यज्य दूरतः ।<br>एवं चेत्सुखसंवासो भविष्यति वने मम ॥४७॥ | देह, इन्द्रिय, मन, प्राण और बुद्धि आदिसे पृथक् तथा शुद्ध स्वयंप्रकाश, अविकारी और निराकार है । जबतक मनुष्य देह, इन्द्रिय और प्राण आदिसे आत्माकी भिन्नता नहीं जानते तबतक वे मृत्युपाशमें बँधकर सांसारिक दुःखसमूहसे पीडित होते रहते हैं । इसलिये तुम सर्वदा अपने हृदयमें बुद्धि आदिसे आत्माको भिन्न अनुभव करो, इस सम्पूर्ण बाह्य व्यवहारका अनुवर्तन करो; और सुख अथवा दुःखरूप जैसा प्रारब्ध हो उसीको भोगते हुए चित्तमें खेद न मानो ॥ ३८-४१ ॥ हे रघुपूत्र ! बाहरसे ( इन्द्रिय आदिद्वारा ) कर्तृत्व प्रकट करते हुए जो कार्य प्रारब्धवश उपस्थित हो उसे करते रहनेसे भी तुम बन्धनमें नहीं पड़ोगे ॥४२॥ भीतरसे राग-द्वेषरहित और शुद्धस्वभाव रहनेके कारण तुम कर्मोंसे लिप्त न होगे। मेरे इस सम्पूर्ण कथनपर तुम सर्वदा अपने हृदयमें विचार करो ॥ ४३ ॥ ऐसा करनेसे तुम सम्पूर्ण सांसारिक दुःखोंसे कभी बाधित न होगे । हे मात: ! तुम भी मेरे इस कथनपर नित्य विचार करना ॥ ४४ ॥ और मेरे फिर मिलनेकी प्रतीक्षा करती रहना । तुम्हें अधिक काल दुःख न होगा। कर्मबन्धनमें बँधे हुए जीवोंका सदा एक ही साथ रहना-सहना नहीं हुआ करता ॥ ४५ ॥ जैसे नदीके प्रवाहमें पड़कर बहती हुई डोंगियाँ सदा साथ-साथ ही नहीं चलतीं । माता ! यह चौदह वर्षकी अवधि आधे क्षणके समान बीत जायगी, आप अब दुःखको दूर करके हमें वन जानेकी अनुमति दीजिये । आपके ऐसा करनेसे मैं वनमें सुखपूर्वक रह सकूँगा ॥ ४६-४७ ॥ |
| इत्युक्त्वा दण्डवन्मातुः पादयोरपतच्चिरम् ।<br>उत्थाप्याङ्के समावेश्य आशीर्भिरभ्यनन्दयत्॥४८॥ | ऐसा कह श्रीरामचन्द्रजी बहुत देरतक दण्डके समान माताके चरणोंमें पड़े रहे । तदनन्तर माताने उन्हें उठाकर गोदमें बैठा लिया और आशीर्वाद देकर उनकी प्रशंसा की ॥ ४८ ॥ वे बोलीं-“तुम्हारे |
| सर्वे देवाः सगन्धर्वा ब्रह्मविष्णुशिवादयः ।<br>रक्षन्तु त्वां सदा यान्तं तिष्ठन्तं निद्रया युतम्॥४९॥ | चलते, बैठते अथवा सोते समय गन्धर्वों-सहित ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिक सम्पूर्ण देवगण तुम्हारी सर्वदा रक्षा करें" ॥ ४९ ॥ |
| इति प्रस्थापयामास समालिङ्ग्य पुनः पुनः ।<br>लक्ष्मणोऽपि तदा रामं नत्वा हर्षाश्रुगद्गदः ॥५०॥<br>आह राम ममान्तस्थः संशयोऽयं त्वया हृतः । | इस प्रकार बारम्बार हृदयसे लगाकर माताने रामको विदा किया । तब लक्ष्मणजीने भी रामजीसे आँखोंमें आनन्दाश्रु भरकर गद्गद वाणीसे कहा-“हे राम ! आपने मेरा आन्तरिक सन्देह दूर कर दिया, अब मैं |
| .६२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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यास्यामि पृष्ठतो राम सेवां कर्तुं तदादिश ॥५१॥
अनुगृह्णीष्व मां राम नोचेत्प्राणांस्त्यजाम्यहम् ।
तथेति राघवोऽप्याह लक्ष्मणं याहि माचिरम्॥५२॥
प्रतस्थे तां समाधातुं गतः सीतापतिर्विभुः ।
आगतं पतिमालोक्य सीता सुस्मितभाषिणी ॥५३॥
स्वर्णपात्रस्थसलिलैः पादौ प्रक्षाल्य भक्तितः ।
पप्रच्छ पतिमालोक्य देव किं सेनया विना ॥५४॥
आगतोऽसि गतः कुत्र श्वेतच्छत्रं च ते कुतः ।
वादित्राणि न वाद्यन्ते किरीटादि विवर्जितः ॥५५॥
सामन्तराजसहितः सम्भ्रमान्नागतोऽसि किम् ।
इति स सीतया पृष्टो रामः सस्मितमब्रवीत् ॥५६॥
राज्ञा मे दण्डकारण्ये राज्यं दत्तं शुभेऽखिलम् ।
अतस्तत्पालनाथार्थाय शीघ्रं यास्यामि भामिनि ।५७।
अद्यैव यास्यामि वनं त्वं तु श्वश्रूसमीपगा ।
शुश्रूषां कुरु मे मातुर्न मिथ्यावादिनो वयम् ॥५८॥
इति ब्रुवन्तं श्रीरामं सीता भीताऽब्रवीद्वचः ।
किमर्थं वनराज्यं ते पित्रा दत्तं महात्मना ॥५९॥
तामाह रामः कैकेय्यै राजा प्रीतो वरं ददौ ।
भरताय ददौ राज्यं वनवासं समानघे ॥६०॥
चतुर्दश समास्तत्र वासो मे किल याचितः ।
तया देव्या ददौ राजा सत्यवादी दयापरः ॥६१॥
अतः शीघ्रं गमिष्यामि मा विघ्नं कुरु भामिनि।
श्रुत्वा तद्रामवचनं जानकी प्रीतिसंयुता ॥६२॥
अहमग्रे गमिष्यामि वनं पश्चात्त्वमेष्यसि ।
इत्याह मां विना गन्तुं तव राघव नोचितम् ॥६३॥
हिन्दी अनुवाद
आपकी सेवा करनेके लिये आपके पीछे-पीछे चलूँगा, आप इसके लिये आज्ञा दीजिये ॥ ५०-५१ ॥ हे प्रभो ! आप मुझपर कृपा कीजिये, नहीं तो मैं प्राण छोड़ दूँगा।” तब रघुनाथजीने भी लक्ष्मणसे कहा—'बहुत अच्छा, चलो देरी न करो' ॥ ५२ ॥
तदनन्तर सीतापति भगवान् राम सीताजीको समझानेके लिये चले और अपने महलमें पहुँचे तब मन्द-मुसकानपूर्वक बोलनेवाली श्रीसीताजीने पतिदेवको आते देख एक सुवर्ण-पात्रमें जल लेकर भक्तिपूर्वक उनके चरण धोये और स्वामीकी ओर देखते हुए पूछा—"देव ! इस समय सेनाके बिना ही आप कैसे आये हैं ? आप प्रातःकाल कहाँ गये थे ? आपका श्वेत छत्र कहाँ है ? बाजोंका बजना क्यों बन्द हो गया है और आप किरीटादि राजोचित आभूषणोंसे रहित क्यों हैं ? ॥ ५३-५५ ॥ आप मन्त्री और राजाओंके सहित बड़े ठाट-बाटसे क्यों नहीं आये ?”
सीताजीके इस प्रकार पूछनेपर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकाकर कहा ॥ ५६ ॥ "हे शुभे ! पिताजीने मुझे दण्डकारण्यका सम्पूर्ण राज्य दिया है, अतः हे भामिनि ! मैं शीघ्र ही उसका प्रबन्ध करनेके लिये वहाँ जाऊँगा ॥ ५७ ॥ मैं आज ही वनको जा रहा हूँ; तुम अपनी सासुके पास जाकर उनकी सेवा-शुश्रूषामें रहो । मैं झूठ नहीं बोलता" ॥ ५८ ॥
रामचन्द्रजीके इस प्रकार कहनेपर सीताजीने भयभीत होकर कहा—"आपके महात्मा पिताजीने आपको वनका राज्य क्यों दिया है ?” ॥ ५९ ॥
तब रामचन्द्रजीने उनसे कहा—"हे अनघे ! महाराजने प्रसन्नतापूर्वक कैकेयीको वर देकर भरतको राज्य और मुझे वनवास दिया है ॥ ६० ॥ देवी कैकेयीने मेरे लिये चौदह वर्षतक वनमें रहना माँगा था, सो सत्यवादी दयालु महाराजने देना स्वीकार कर लिया है ॥ ६१ ॥ अतः हे भामिनि ! मैं शीघ्र ही वहाँ जाऊँगा, तुम इसमें किसी प्रकारका विघ्न खड़ा न करना।” रामचन्द्रजीके ऐसे वचन सुनकर सीताजीने प्रसन्नतापूर्वक कहा—"पहले मैं वनको जाऊँगी उसके पीछे आप आना । हे राघव ! मुझे छोड़कर आपको वनमें जाना उचित नहीं है” ॥ ६२-६३ ॥
| सर्ग ४ ] | अयोध्याकाण्ड | ६३ |
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तामाह राघवः प्रीतः स्वप्रियां प्रियवादिनीम् ।<br>कथं वनं त्वां नेष्येऽहं बहुव्याघ्रमृगाकुलम् ॥६४॥<br>राक्षसा घोररूपाश्च सन्ति मानुषभोजिनः ।<br>सिंहव्याघ्रवराहाश्च सञ्चरन्ति समन्ततः ॥६५॥<br>कद्वम्लफलमूलानि भोजनार्थं सुमध्यमे ।<br>अपूपानि व्यञ्जनानि विद्यन्ते न कदाचन ॥६६॥<br>काले काले फलं वाऽपि विद्यते कुत्र सुन्दरि ।<br>मार्गो न दृश्यते क्वापि शर्कराकण्टकान्वितः ॥६७॥<br>गुहागह्वरसम्बाधं झिल्लीदंशादिभिर्युतम् ।<br>एवं बहुविधं दोषं वनं दण्डकसंज्ञितम् ॥६८॥<br>पादचारेण गन्तव्यं शीतवातातपादिमत् ।<br>राक्षसादीन्वने दृष्ट्वा जीवितं हास्यसेऽचिरात् ॥६९॥<br>तस्माद्भद्रे गृहे तिष्ठ शीघ्रं द्रक्ष्यसि मां पुनः ।<br>रामस्य वचनं श्रुत्वा सीता दुःखसमन्विता ॥७०॥<br>प्रत्युवाच स्फुरद्वक्त्रा किञ्चित्कोपसमन्विता ।<br>कथं मामिच्छसे त्यक्तुं धर्मपत्नीं पतिव्रताम् ॥७१॥<br>त्वदनन्यामदोषां मां धर्मज्ञोऽसि दयापरः ।<br>त्वत्समीपे स्थितां राम को वा मां धर्षयेद्वने ॥७२॥<br>फलमूलादिकं यद्यत्तव भुक्तावशेषितम् ।<br>तदेवामृततुल्यं मे तेन तुष्टा रमाम्यहम् ॥७३॥<br>त्वया सह चरन्त्या मे कुशाः काशाश्च कण्टकाः ।<br>पुष्पास्तरणतुल्या मे भविष्यन्ति न संशयः ॥७४॥<br>अहं त्वां क्लेशये नैव भवेयं कार्यसाधिनी ।<br>बाल्ये मां वीक्ष्य कश्चिद्वै ज्योतिःशास्त्रविशारदः ॥<br>प्राह ते विपिने वासः पत्या सह भविष्यति ।<br>सत्यवादी द्विजो भूयाद्गमिष्यामि त्वया सह ॥७६॥ | तब रघुनाथजीने प्रसन्न होकर अपनी प्रिया प्रियवादिनी जानकीसे कहा—"मैं तुम्हें अनेकों व्याघ्रादि वन्य-पशुओंसे पूर्ण वनमें कैसे साथ ले चलूँ ॥ ६४ ॥ वहाँ मनुष्योंको खानेवाले भयंकर राक्षस रहते हैं और सब ओर सिंह, व्याघ्र तथा शूकर आदि हिंस्र-जीव फिरते हैं ॥ ६५ ॥ हे सुन्दर कमरवाली ! वहाँ भोजनके लिये कडुए और खट्टे फल-मूलादि ही मिलते हैं; किसी प्रकारके पूए आदि व्यञ्जन वहाँ कभी नहीं मिलते ॥ ६६ ॥ हे सुन्दरि ! वे फल भी सदा नहीं मिलते, किसी-किसी समय कहीं मिलते हैं । उस वनमें कहीं-कहीं तो धूलि और काँटोंसे ढके रहनेके कारण मार्ग भी दिखायी नहीं देता ॥ ६७ ॥ वह दण्डकारण्य ऐसे ही अनेकों दोषोंसे भरा हुआ है । उसमें अनेकों गुफाएँ और गडढे हैं तथा वह झिल्ली और डाँसोंसे भरा हुआ है ॥ ६८ ॥ ऐसे वनमें शीत, वायु और घाम आदिके समय भी पैदल ही चलना पड़ता है । मुझे सन्देह है कि तुम वनमें राक्षसादिको भयंकर मूर्त्ति देखकर तुरन्त ही प्राणत्याग कर बैठोगी ॥ ६९ ॥ इसलिये हे भद्रे ! तुम घर ही रहो, मुझे शीघ्र ही फिर देख पाओगी ।"<br>रामके ये वचन सुनकर सीताने दुःखातुर होकर कुछ क्रोधसे ओंठ काँपते हुए कहा—"मुझ पतिव्रता धर्मपत्नीको आप घर क्यों छोड़ना चाहते हैं ? ॥ ७०-७१ ॥ आप धर्मज्ञ और दयालु हैं फिर अपनी अनन्यभक्ता और दोषहीना मुझ पत्नीको क्यों छोड़ते हैं ? हे राम ! वनमें भी आपके पास रहते हुए मेरा कोई क्या बिगाड़ सकता है ? ॥ ७२ ॥ जो भी फल-मूलादि आपके खानेसे बचेंगे वे ही मेरे लिये अमृतके समान होंगे । उनसे सन्तुष्ट होकर मैं आनन्दपूर्वक रहूँगी ॥ ७३ ॥ इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपके साथ विचरते हुए मेरे लिये कुश-कास और कण्टकादि भी फूलोंके समान होंगे ॥ ७४ ॥ मैं आपको किसी प्रकारका कष्ट न दूँगी, बल्कि आपके कार्यमें सहायिका होऊँगी । बाल्यावस्थामें एक ज्योतिषशास्त्र-विशारद महात्माने मुझे देखकर कहा था कि तू अपने पतिके साथ वनमें रहेगी । उन ब्राह्मण महोदयका वाक्य सत्य हो, मैं अवश्य आपके साथ वनमें चलूँगी ॥ ७५-७६ ॥ एक बात और कहती हूँ, उसे सुनकर आप मुझे वनको ले चलिये । आपने बहुत-से |
| ६४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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अन्यत्किञ्चित्प्रवक्ष्यामि श्रुत्वा मां नय काननम्।
रामायणानि बहुशः श्रुतानि बहुभिर्द्विजैः ॥७७॥
सीतां विना वनं रामो गतः किं कुत्राचिद्वद ।
अतस्त्वया गमिष्यामि सर्वथा त्वत्सहायिनी ॥७८॥
यदि गच्छसि मां त्यक्त्वा प्राणांस्त्यक्ष्यामि तेऽग्रतः
इति तं निश्चयं ज्ञात्वा सीताया रघुनन्दनः ॥७९॥
अब्रवीद्देवि गच्छ त्वं वनं शीघ्रं मया सह ।
अरुन्धत्यै प्रयच्छाशु हारानाभरणानि च ॥८०॥
ब्राह्मणेभ्यो धनं सर्वं दत्त्वा गच्छामहे वनम् ।
इत्युक्त्वा लक्ष्मणेनाशु द्विजानाहूय भक्तितः ॥८१॥
ददौ गवां वृन्दशतं धनानि
वस्त्राणि दिव्यानि विभूषणानि ।
कुटुम्बवद्भ्यः श्रुतशीलवद्भ्यो
मुदा द्विजेभ्यो रघुवंशकेतुः ॥८२॥
अरुन्धत्यै ददौ सीता मुख्यान्याभरणानि च ।
रामो मातुः सेवकेभ्यो ददौ धनमनेकधा ॥८३॥
स्वक्रान्तःपुरवासिभ्यः सेवकेभ्यस्तथैव च ।
पौरजानपदेभ्यश्च ब्राह्मणेभ्यः सहस्रशः ॥८४॥
लक्ष्मणोऽपि सुमित्रां तु कौसल्यायै समर्पयत् ।
धनुष्पाणिः समागत्य रामस्याग्रे व्यवस्थितः ॥८५॥
रामः सीता लक्ष्मणश्च जग्मुः सर्वे नृपालयम् ॥८६॥
श्रीरामः सह सीतया नृपपथे गच्छन् शनैः सानुजः
पौरान् जानपदान्कुतूहलदृशः सानन्दमुद्वीक्षयन् ।
श्यामः कामसहस्रसुन्दरवपुः कान्त्या दिशो भासयन् ।
पादन्यासपवित्रिताऽखिलजगत् प्रापालयं तत्पितुः ॥८७॥
हिन्दी अनुवाद
ब्राह्मणोंके मुखसे बहुत-सी रामायणें सुनी होंगी ॥७७॥ बताइये, इनमेंसे किसीमें भी क्या सीताके बिना रामजी वनको गये हैं ? अतः मैं आपकी पूर्णतया सहायिका होकर अवश्य आपके साथ चलूँगी ॥७८॥ यदि आप मुझे छोड़कर चले जायँगे तो मैं अभी आपके सामने ही अपने प्राण छोड़ दूँगी।"
तब रघुनाथजीने सीताका ऐसा दृढ़ निश्चय देखकर कहा—"देवि ! तुम शीघ्र ही मेरे साथ वनको चलो; ये हार आदि सम्पूर्ण आभूषण वसिष्ठजीकी स्त्री अरुन्धतीको दे दो ॥७९-८०॥ हम अपना सम्पूर्ण धन ब्राह्मणोंको देकर वनको चलेंगे।"
ऐसा कह भगवान् रामने लक्ष्मणजीद्वारा भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको बुलवाया ॥८१॥ और उन रघुकुलकेतु भगवान् रामने प्रसन्नतापूर्वक सैकड़ों गौओंके झुण्ड, बहुत-सा धन, दिव्य वस्त्र और आभूषण कुटुम्बी तथा विद्वान् और शीलसम्पन्न ब्राह्मणोंको दिये ॥८२॥
सीताजीने अपने मुख्य-मुख्य आभूषण अरुन्धतीजीको दे दिये तथा अपनी माताके सेवकोंको भी रामने बहुत-सा धन दिया ॥८३॥ इसी प्रकार अपने अन्तःपुरवासी सेवकों, पुरवासियों, देशवासियों तथा ब्राह्मणोंको भी उन्होंने बहुत-सा धन दिया ॥८४॥
इधर श्रीलक्ष्मणजीने भी अपनी माता सुमित्राको कौसल्याजीको सौंप दिया और आप हाथमें धनुष लेकर रामके सामने आकर खड़े हो गये । तदनन्तर राम, लक्ष्मण और सीता सब महाराज दशरथके पास चले ॥८५-८६॥
सहस्रों कामदेवोंके समान सुन्दर श्याम शरीरवाले भगवान् राम सीता और छोटे भाई लक्ष्मणके सहित अपनी कान्तिसे दशों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए धीरे-धीरे राजमार्गसे चले । उस समय जो पुरवासी और जनपदवासी लोग कुतूहलवश आनन्दमयी दृष्टिसे उनकी ओर देख रहे थे उनके देखते हुए और अपने चरण-स्पर्शसे सम्पूर्ण संसारको पवित्र करते हुए वे अपने पिताके घर पहुँचे ॥८७॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे
चतुर्थः सर्गः ॥४॥
अयोध्याकाण्ड - सर्ग ५: भगवान्का वनगमन
[ सर्ग ५ ] | अयोध्याकाण्ड | ६५
पञ्चम सर्ग
भगवान्का वनगमन
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले—जानकी और लक्ष्मणके सहित |
|---|---|
| आयान्तं नागरा दृष्ट्वा मार्गे रामं सजानकिम् ।<br>लक्ष्मणेन समं वीक्ष्य ऊचुः सर्वे परस्परम् ॥ १ ॥<br>कैकेय्या वरदानादि श्रुत्वा दुःखसमावृताः ।<br>बत राजा दशरथः सत्यसन्धं प्रियं सुतम् ॥ २ ॥<br>स्त्रीहेतोरत्यजत्कामी तस्य सत्यवता कुतः ।<br>कैकेयी वा कथं दुष्टा रामं सत्यं प्रियङ्करम् ॥ ३ ॥<br>विवासयामास कथं क्रूरकर्माऽतिमूढधीः ।<br>हे जना नात्र वस्तव्यं गच्छामोऽद्यैव काननम् ॥ ४॥<br>यत्र रामः सभार्यश्च सानुजो गन्तुमिच्छति ।<br>पश्यन्तु जानकीं सर्वे पादचारेण गच्छतीम् ॥ ५ ॥<br>पुंभिः कदाचिद्दृष्टा वा जानकी लोकसुन्दरी ।<br>साऽपि पादेन गच्छन्ती जनसङ्घेष्वनावृता ॥ ६ ॥<br>रामोऽपि पादचारेण गजाश्वादि विवर्जितः ।<br>गच्छति द्रक्ष्यथ विभुं सर्वलोकैकसुन्दरम् ॥ ७॥<br>राक्षसी कैकेयीनाम्नी जाता सर्वविनाशिनी ।<br>रामस्यापि भवेद्दुःखं सीतायाः पादयानतः ॥ ८ ॥<br>बलवान्विधिरेवात्र पुंप्रयत्नो हि दुर्बलः । | श्रीरामचन्द्रजीको मार्गमें आते देख और कैकेयीके वरदानादिका समाचार सुन समस्त नगरवासी दुःखार्तुर होकर आपसमें कहने लगे—“हाय ! कामवश राजा दशरथने अपने सत्यपरायण प्रिय पुत्रको स्त्रीके कहनेसे क्यों छोड़ दिया ? उसकी सत्यता कहाँ चली गयी ? और दुष्टा कैकेयीने भी सत्यवादी और प्रियकारी रामको क्यों वनवास दिया ? वह ऐसी क्रूरकर्मा और हतबुद्धि क्यों हो गयी ? भाइयो ! अब हमें यहाँ न रहना चाहिये; हम भी आज ही वनको चलेंगे, जहाँ स्त्री और छोटे भाईके सहित श्रीराम जाना चाहते हैं। देखो तो, आज जानकीजी पैदल चल रही हैं ॥ १-५ ॥ हाय ! जिस त्रिलोकसुन्दरी जानकीको पहले कभी किसी पुरुषने शायद ही देखा हो, वही आज बिना किसी परदेके जनसमूहमें पैदल चल रही हैं ॥ ६ ॥ भाइयो ! इन सर्वलोकैकसुन्दर भगवान् रामकी ओर भी देखो; ये भी आज बिना हाथी-घोड़ेके पैदल ही जा रहे हैं ॥ ७ ॥ यह कैकेयी-नामकी राक्षसी सबका नाश करनेके लिये उत्पन्न हुई है। भाई ! इन सीताजीके पैदल चलनेसे रामजीको भी तो बड़ा दुःख होता होगा ॥ ८ ॥ किन्तु किया क्या जाय ? इसमें दैव ही प्रबल है, पुरुषका प्रयत्न सर्वथा असमर्थ है ।” |
| इति दुःखाकुले वृन्दे साधूनां मुनिपुङ्गवः ॥ ९ ॥<br>अब्रवीद्वामदेवोऽथ साधूनां सङ्घमध्यगः ।<br>मानुशोचथ रामं वा सीतां वा वच्मि तत्त्वतः ॥ १० ॥<br>एष रामः परो विष्णुरादिनारायणः स्मृतः ।<br>एषा सा जानकी लक्ष्मीर्योगमायेति विश्रुता ॥ ११ ॥<br>असौ शेषस्तमन्वेति लक्ष्मणाख्यश्च साम्प्रतम् ।<br>एष मायागुणैर्युक्तस्तत्तदाकारवानिव ॥ १२ ॥<br>एष एव रजोयुक्तो ब्रह्माऽभूद्विश्वभावनः ।<br>सत्त्वाविष्टस्तथा विष्णुस्त्रिजगत्प्रतिपालकः ॥ १३॥ | इस प्रकार साधु-समाजको दुःखार्तुर देख मुनिवर वामदेव उनके बीचमें आकर कहने लगे—“मैं आप-लोगोंको वास्तविक बात बताता हूँ, आप इन राम और सीताके लिये किसी प्रकारकी चिन्ता न करें ॥ ९-१० ॥ ये राम आदिनारायण भगवान् विष्णु हैं और ये जानकीजी योगमाया नामसे विख्यात श्रीलक्ष्मीजी हैं ॥ ११ ॥ इस समय जो लक्ष्मण नाम धारणकर इनका अनुगमन कर रहे हैं ये शेषजी हैं। ये पुरुषोत्तम भगवान् ही मायाके गुणोंसे युक्त होकर विभिन्न आकारवाले-से प्रतीत हुआ करते हैं ॥ १२ ॥ रजोगुणसे युक्त होकर ये ही विश्वरचयिता ब्रह्माजी हुए हैं और सत्त्वगुणविशिष्ट होनेपर ये ही त्रिलोक- |
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