आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
६ आल्हखण्ड । ५७० भाला मारा इकइन्ताके भाग्यौ तुरत पछाराखाय ४५ खेत छूटिगा तब चौंड़ा ते आल्हा कूच दीन करवाय ॥ डोला पहुँचा बरइन पुरवा बेला बोली बैन सुनाय ४६ नगर मोहोबा का याही है 'साँची कहौ बनाफरराय ॥ नगर मोहोवे का पुरवा यह बेला रानी परै दिखाय ४७ खबरि पायकै सुखिया बारिनि तहँ पर गई तड़ाका आय ॥ संग सहेलिन को लैके सो परछन कीन तहाँपर जाय ४८ चलिभा डोला फिरि आगे को मालिनि पुरै पहुँचा आय ॥ खबरि पायकै फुलियामालिनि सोऊ चली तड़ाका धाय ४९- संग सहेलिन को लीन्हे सो डोला पास पहुँची आय ॥ कीनि आरती सो बेला की देखिकै रूप गई सन्नाय ५० हाय ! विधाता यह का कीन्ही सुरपुर पती दीन पठवाय ॥ इतना कहिकै फुलियामालिनि दाँते अँगुरी लीन चपाय ५१ सुनिकै बातैं ये फुलिया की बेला गयो क्रोध उरछाय ॥ हुकुम लगायो इक चाकर को जूतिन देवो मूड ठठाय ५२ हुकुम पायकै सो बेला को मारन लाग तड़ाका धाय ॥ आल्हा बोले तब बेला ते यहनहिंतुम्हहिंमुनासिवआय ५३ अवै न डोला गा मोहबे का रैयानि प्रथम रहिउ पिटवाय ॥ सुनिकै बातैं ये आल्हा की बेला तुरत दीन छुड़वाय ५४ मालिनि पुरवा ते डोला चलि पहुँचा नगर मोहोबे आय ॥ खबरि पायकै बारह रानी मल्हनामहलगई सबधाय ५५ द्यावलि सुनवाँ फुलवा मल्हना द्वारे सबै पहुँची आय ॥ कीन आरती तहँ बेला की सबहिनदुःख शोकविसराय ५६ संगै लैके फिरि बेला का महलन गई तड़ाका आय ॥
[Header] बेलाताहरकामौदान । ५७१ ७
भा अति मेला तहँ नारिन का शोभा कही वूत ना जाय ५७ मुहँ दिखलाई रानी मल्हना तहँपर दीन नौलखाहार ॥ पायँ लागिकै बेला रानी कङ्कण तुरतै दीन उतार ५८ भीर मेहरियन कै हटिगै जब अक्सर बहू रही त्यहिताँय ॥ मल्हना पूँछै तब बेला ते साँची साँच देय बतलाय ५६ बालम तुम्हरे अब कैसे हैं कहँ कहँ लगे अंग किनघाय ॥ इतना सुनिकै बेला बोली दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ६० बाईं दहिनी दूउ कोखिन मा लागीं सेल कटारी घाय ॥ गाँसी खटकति है मस्तक में मैया बिपति कही ना जाय ६१ वातैं सुनिकै ये बेला की मल्हना गिरी पछारखाय ॥ कथा पुराणन की वातैं बहु बेला कहा तहाँ समुझाय ६२ कथा सुनाई गंधारी की ज्यहि के मरे एकशत पूत ॥ कथा बताई यदुनन्दन की जहाँ मरिगये सबै रजपूत ६३ कथा बखानी रघुनन्दन की नृपपद छूटि मिला बनबास ॥ कही कहानी दशकन्धर की ज्यहिके भई वंशकी नाश ६४ बेला बानी सुनि रानी सब तुरतै शोक दीन बिसराय ॥ प्रसव वेदना ज्यहि पर बीती जीतीस्वईशोक अधिकाय ६५ बेला बोली चन्द्रावलि ते ननँदी साँच देयँ बतलाय ॥ भैया अपने को सतखण्डा ननँदी मोहिं देय दिखलाय ६६ इतना सुनिकै चन्द्रावलि तहँ गै सतखण्डा तुरत लिवाय ॥ को गति बरणै सतखण्डाकै साँचो इन्द्र धाम दिखलाय ६७ चँदन किंवरिया जहाँ लागी हैं खम्भन रत्न जटित को काम ॥ कैसो सम्भ्रम मन जो होवै बैठत लहै तहाँ विश्राम ६८ बेला पहुँची जब छज्जा पर पखिन भीर दीख अधिकाय ॥
[Header] ८ आल्हखण्ड । ५७२
कोकिल हंस मोर पारावत तीतर लवा सुवा सुखदाय ६९ शोभा देखत तहँ छज्जा की बेला बार बार पछिताय ॥ जीवत प्रीतम हमरे होते तौ सुखभोग होत अधिकाय ७० आज काल्ह दिन प्रीतम भेलैं ताते नरक सरिस दिखलाय ॥ हाय ! विधाताकी मरजी अस भारी विपति गई शिर आय ७१ प्रीतम प्यारे के सतखण्डा हम पर फाटि गिरो अरराय ॥ यह मन विनवत बेला रानी महलन गई तड़ाका आय ७२ बेला बोली फिरि मल्हनाते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ मोरि लालसा यह डोलति है चन्दन वगिया देउ दिखाय ७३ सुनिकै बातें ये बेला की पालकी तुरत लीन मँगवाय ॥ बैठि पालकी महरानी सब चन्दन बाग पहुँचिं जाय ७४ पुष्पवाटिका तहँ राजत है छाजत सबै दिनन ऋतुराज ॥ बेला चमेली औ नेवारकी पंक्तीं रहीं एक दिशि छाज ७५ बिसुनकान्ता कहुँ कहुँ फूले कहुँ कहुँ फूले सुर्ख अनार ॥ श्वेत रक्त औ मधुर गुलाबी पाटल फूले भांति अपार ७६ फुली चांदनी श्वेत वरणहैं जिन पर केलि करत बहुभृंग ॥ को गति वरणै दुपहरिया कै ज्यहिको रक्तवरण है रंग ७७ श्वेत रक्त औ मधुर गुलाबी सब विधि फूलि रहा करवीर ॥ कदली केंवँड़ा यकदिशि राजत छूटत देखि मुनिनको धीर ७८ श्वेत रक्त तहँ चन्दन छाजैं राजैं कोकिल मोर चकोर ॥ पीव पपीहा की रट सुनिकै बिरहिनि पीर होय अतिघोर ७६ यह सुख सम्पति बेला लखिकै कीन्ह्यो घोर शोर चिग्घार ॥ जितनी रानी थीं वगिया में सबहिन छांड़िदीन डिंडकार ८० मोती ऐसे आँसू ढरकें बेला हृदय शोक गा छाय ॥
तब समुझावै मलहना रानी बहुवर शोक देउ बिसराय ८१ पारस पत्थर घर तुम्हरेमा बहुवर बैठिकरो तुम राज ॥ हुकुम तुम्हारो रैयति मानी द्वैहैं सबै धर्म के काज ८२ द्यावलि बोली फिरि बेला ते रानी बचन करो परमान ॥ धर्म सनातन को याही है राखै सासु श्वशुरको मान ८३ इतना सुनिकै बेला बोली यहु दुख दून तुम्हारो दीन ॥ घर बैठार्यो दोउ पुत्रन को मोहबा बंशनाश तुम कीन ८४ इतना सुनिकै द्यावलि बोली साँची मानो कही हमार ॥ यह सब करतब है माहिल कै जिनके चुगुलिनका बैपार ८५ सवन चिरैया ना घर छोड़ै ना बनिजरा बनिजको जाय ॥ चुगुली करिकै माहिलठाकुर मोको तुरत दीन निकराय ८६ गे जगनायक जब कनउजका आवैं नहीं बनाफरराय ॥ मैं समुझायों दुउ भाइन का लाये संग कनौजीराय ८७ घाटबयालिस तेरह घाटी सब रुकववा पिथौराराय ॥ जीति पिथौरा को लखराना सबियाँ लीन्हे घाट छँड़ाय ८८ पान धरायो जब गौने का तब नहिं बीरा कऊ चबाय ॥ बीरा लीन्ह्यो जब ऊदन ने ब्रह्मा लीन्ह्यो तुरत छँड़ाय ८६ यह सब करतब है माहिल कै डार्यनि वंशनाश करवाय ॥ काल नगीचे ज्यहि के आवै त्यहिकै देवै बुद्धि नशाय ९० इतना कहतै तहँ द्यावलि के आल्हा गये तड़ाकाआय ॥ बेला बोली तहँ आल्हा ते कीरतिसागर लयो दिखाय ९१ यह मन भाई सब रानिनके पलकी चढ़ीं तड़ाकाधाय ॥ चलीं पालकी महरानिन की संगै चले बनाफरराय ६२ कीरतिसागर फिरि आई सब नौका पास लीन मँगवाय ॥
१० आल्हखण्ड । ५७४ भये खेवैया आल्हा ठाकुर पहुँचे पार तड़ाका आय ६३ अतिशुभ मंदिर ब्रह्मानंद का शोभा कही बूत ना जाय ॥ गई तड़ाका सब महरानी चकितलखै चहूँदिशिधाय ६४ पंसासारी ब्रह्मानँद की बेला नजरि परी सो आय ॥ तब अलबेला बेलारानी बोली सुनो बनाफरराय ६५ बड़े खिलारी तुम चौपरिके सो अब मोहिं देउ सिखलाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा बैठे चौपरि तहाँ दीन फैलाय ६६ बेला खेलै पंसासारी अंचल अपन उड़ावतिजाय॥ यह गति देखी आल्हा ठाकुर नीचेलीन्ह्यो शीश झुकाय६७ बहुतक रूप धरे बेला ने आल्है मोह रही करवाय ॥ चाटक नाटक करि सबहारी मोहा नहीं बनाफरराय ६८ रूप भयङ्कर दर्शवों धरिकै डाइन बैठिगई मुहबाय ॥ यहिका लखिकै आल्हा ठाकुर तुरतै खाँड़ा लीन उठाय ६९ गर्जत बोले आल्हा ठाकुर का तू मोहिं रही डरवाय ॥ देखि भयङ्कर क्षत्री डरपै कीरति जावै सबै नशाय १०० हो अपकीरति जब दुनिया में तब तो मृत्यु नीकि है जाय ॥ ऐसे वैसे हम क्षत्री ना जो अब देवैं धर्म नशाय १०१ रूप मोहनी माता जाना डाइन शत्रुरूप दिखलाय ॥ अब तू पलटै कित स्वरूप को कित तू करै समररण आय १०२ इतना सुनतै बेलारानी प्रथमै लीन्ह्यो रूप बनाय ॥ पाप तुम्हारे कछु मनमें ना साँचे शूर बनाफरराय १०३ -योंचे तुमका हम तम्बूमा अपने लाइन साथ लिवाय ॥ संग लहुरवा का लीन्ह्यो ना हमरे उमर सरिससोआय १०४ संगलकड़ियनमिलि अग्नी को ज्वाला अधिक २ अधिकाय ॥
बेलाताहरकामैयान । ५७५ ११ यामें संशय कछु नाहीं है बिप्रनमोहिं दीन बतलाय १०५ पै तहँ सज्जन औ दुर्जनका मंद औ तीक्ष्ण भेदहै भाय ॥ सज्जनक्षत्रीअमझकलियुगमा नहिंकहुँबरनघरनअधिकाय १०६ जस तुम द्यावलि के उपजेहौ कीरति रही लोक में छाय ॥ उत्तम करणी करि नर सज्जन कीरतिध्वजा देयँ फहराय १०७ धर्म नशावैं ते मरिजायैं जिन अपकीरति बहुतसुहाय ॥ साँचे याँचे तुम क्षत्री हौ कीरतिकहीलोकसबगाय १०८ धर्म पतिव्रत के शपथन ते आशिर्बाद बनाफरराय ॥ कीरति गाई जो सज्जन की गावतस्रऊ सरिसह्वै जाय १०६ सज्जन गावै गाय सुनावै पूरो अर्थ देय बतलाय ॥ जो मन भावै क्यहु सज्जन के पावै अमरलोक सो भाय ११० ऐसे कीरति के सागर तुम साँचे धर्म बनाफरराय ॥ इतना कहतै तहँ बेला के मलहनाआदि गईं सब आय १११ बैठिकै नैया सब महरानी सागर पार पहुँचीं जाय ॥ बारह ताल हते मोहबे में बेला दीख सबनको धाय ११२ बेला बोली फिरि मल्हना ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ मिलै आज्ञा मोहिं माता की लस्करजाउँ तड़ाकाधाय ११३ कीनि प्रतिज्ञा हम प्रीतम सों माता साँच देयँ बतलाय ॥ मूड़ काटिकै हम ताहरको औ स्वामीको देब दिखाय ११४ जग मर्यादा राखन हेतू सेवक भाव देब दिखलाय ॥ प्रीतम प्यारे की आज्ञा सों जीतोंसमरसगानिजभाय ११५ मोहिं विधाता की मर्जी थी अनरथ रूप दीन उपजाय ॥ अर्थ न पावा कछु देही का भइजगदेह अकारथ माय ११६ स्वारथ प्रीतम के सँग होती सो विधि दीन वियोग कराय ॥
१२ आल्हखण्ड । ५७६ जन्म अकारथ यहु दुनियामाँ कौनीभाँति काटिहौं माय ११७ नैनन योवन औ बैनन को नहिं कछु पूरभयो व्यवहार ॥ अंग न पर्शा हम प्रीतम का ना पद पूर भयो भर्त्तार ११८ सदा अभागी नर नारिन को नाहक रचा नही कर्त्तार ॥ कर्म शुभाशुभ जो लाग्यो है सोई भोगि रहा संसार ११९ यहै सोचिकै मन अपने मा आयसु देउ तड़ाका माय ॥ समय किफायत गाथा भारी आरी कहे जान है जाय १२० इतना सुनतै मल्हना रानी मनमा बार बार पछिताय ॥ दुःख विधाता हमका दीन्ह्यो गाथा कही कहाँलगजाय १२१ इतना सोचत मन अपने मा आयसु फेरि दीन हर्षाय ॥ चरण लागिकै महरानी के बेला कूच दीन करवाय १२२ संग धनाफर आल्हा ठाकुर पलकी चली तड़ाका धाय ॥ बेला बोली तहँ आल्हा ते साँची सुनो बनाफरराय १२३ दखौं चौतरा गजमोतिनि का यह मन गई लालसा छाय ॥ इतना सुनतै आल्हा ठाकुर सिरसा चले तड़ाकाधाय १२४ जहाँ चौतरा गजमोतिनि का डोला तहाँ दीन धरवाय ॥ उतरिकै डोला ते बेला तब चन्दन अक्षत फूलमँगाय १२५ कीन चबुतरा की पूजा भल मन में बार बार तहँ ध्याय ॥ सतीशिरोमणिगजमोतिनिजो साँचे शूर बनाफरराय १२६ आभा बोलै तौ चौराते ज्यहि संतोष मोहिं है जाय ॥ बोली आभा गजमोतिनि की माहिल डारे कन्त मराय १२७ सत्त विधाता मोको दीन्ह्यो सत्ती भयूँ यहां पर आय ॥ तीनि महीना सत्रह दिनमा सब महनामथ जायपटाय १२८ दिल्ली मोहबा द्वउ शहरन में राँड़ै राँड़ै परै दिखाय ॥
बेलाताहरकामैदान । ५७७ १३
आगा सुनिकै बेला बोली बहिनि साँचदेयँ बतलाय १२६ हम तो रण्डा वादिन जाना जादिन मरे बीर मलखान ॥ कीरति पायो जग मण्डल में तुमको सत्तदीन भगवान १३० करि परिकरमा फिरि चौराकी पलकी चढ़ी तड़ाकाधायै ॥ दावे लश्कर को आवति भै मनमें श्रीगणेशपदध्याय १३१ पहर अढ़ाई के अर्सामा डोला गयो फौजमें आय ॥ यह अलबेला बेला रानी प्रीतम पास पहुँचीजाय १३२ देख्यो बेला को ब्रह्मानँद आयसु तुरत दीन फरमाय ॥ मोरि लालसा यह इवालतिहै ताहरशीशदिखावोआय १३३ सुनिकै बातें ये प्रीतम की दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ बेला बोली फिरि प्रीतम ते आपन बस्त्र देउमँगवाय १३४ यामें संशय कछु नाहींहै ताहर शीश दिखाउब आय ॥ धीरज राखो अपने मनमाँ अब मैं जात तड़ाकाधाय १३५ सुनिकै बातें ये बेला की सब सामान दीन मँगवाय ॥ भइ मर्दाना बेला रानी शोभा कही बून ना जाय १३६ झीलम बख्तर बेला पहिरी शिरपर धरी बैजनी पाग ॥ को गति बरणै तहँ बेला कै मुखमेंसबै तिलनके दाग १३७ छुरी कटारी बेला बाँधी कम्मर कसी एकतलवार ॥ भाला बरछी लै हाथे मा हरनागर पर भई सवार १३८ बाजे डंका अहलंका के फौजें सबै भई तय्यार ॥ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया नाहर उदयसिंह सरदार १३६ त्यही समैया त्यहि औसर मा बेला पास पहुँचा आय ॥ ऊदन बोले तहँ बेलाते हमको लेवो साथ लिवाय १४० सुनिकै बातें ये ऊदनकी बेला बोली बचन उदार ॥ ३७
१४ आल्हखण्ड । ५७८ साथ न लेवे हम काहू को ठाकुर उदयसिंह सरदार १४१ - इतना कहिकै बेलारानी लश्कर कूच दीन करवाये ॥ बाजत डंका अह्तंकां के निर्भय चले शूरमाजाँय १४२ दिल्ली केरे फिरि डाँड़े मा लश्कर सबै पहुँचा आय ॥ गड़िगे तम्बू तहँ बेला के सवरँग ध्वजा रहे फहराय १४३ लिखीहकीकति फिरि पिरथीको कागज कलमदान मँगवाय ॥ बेला पहुँची अब मोहबे का औ घर जिया चँदेलाराय १४४ अधकर बाकी जो गौने की सो अब तुरत देउ पठवाय ॥ नहीं तो ब्रह्मान्हैं डाँड़े पर दिल्ली शहर देयँ फुँकवाय १४५ ताहर नाहर के हाथे सों अधकर तुरत देउ पहुँचाय ॥ कुशल आपनी जो तुम चाहौ मानो साँच पिथौराराय १४६ इतना लिखिकै बेलारानी धावन हाथ दीन पठवाय ॥ धावन चलिभा फिरि तम्बू ते औ दरबार पहुँचा आय १४७ लागि कचहरी पृथीराज की भारी लाग राज दरबार ॥ बैठक बैठे सब क्षत्री हैं टिहुनन घेरे नांगितलवार १४८ तहँ परवाना धावन दीन्ह्यो दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ खोलिकै चिट्ठी पिरथी पढ़िकै तुरतै गये सनाकाखाय १४६ उत्तर लिखिकै फिरि चिट्ठी का धावन तुरत दीन लौटाय ॥ ताहर बेटा को बुलवायो औसबहालकहासमुझाय १५० बेटी हमरी बैरिनि ह्वैगै ब्रह्माठाकुर दीन जियाय ॥ अधकर लेने को आये हैं सबियाँफौजलेउसजवाय १५१ जायकै पहुँँचो समरभूमि में अधकर तहाँ देउ चुकवाय ॥ मारे मारे तलवारिन के सबके देवो मूड़ गिराय १५२ अधकर तबहीं ई भरि पैहैं जैहैं भागि चँदेलेराय ॥
[Header] बेलाताहरकामदान । ५७६ १५
इतना सुनिकै ताहर चलिभे दोऊहाथजोरिशिरनाय १५३ हुकुम लगायो फिरि लश्करमें तुरतै सजन लागि सरदार ॥ झीलमबखतर पहिरिसिपाहिन हाथम लई ढालतलवार १५४ सजे बछेड़ा ताजी तुर्की मुश्की घोड़ भये तय्यार ॥ लक्खा गर्रा पचकल्यानी सुर्खा सिर्गाआदि अपार १५५ डारि रकाबै गंगा यमुनी आननदीन लगाम लगाय ॥ हथी महाउत हाथी लैके तिनका दीन भूमि बैठाय १५६ धरी अँवारी तिन हाथिन पर बहुतन हौदा दीन धराय ॥ चुम्बक पत्थर के हौदा हैं जिनमेंसेलबलौंचाखाय १५७ कोउ कोउ हाथी इकइन्ता हैं कोउ दुइदन्त श्वेत गजराज ॥ यकमिलबैके सब चिंघरत हैं मानो कोपकीन सुरराज १५८ सजिगैं फौजैं दल बादल सों ताहर गये मातु के धाम ॥ हाल बतायो सब अगमा सों करिकैचलिभादण्डप्रणाम १५९ प्यारी अपनी के महलन में ताहर गये तड़ाका धाय ॥ बैठा ठाकुर जब शय्यापर दैया बिपति कही ना जाय १६० राह कटावै मंजारी तहँ होवै छींक तड़ातड़ आय ॥ झंझा वायू डोलन लागी आयूगईजनोनगच्याय १६१ बादल छायो आसमान में कउँधालपकिलपकिरहिजाय ॥ चमकै बिजुली त्यहि समया मा दमकै आसमान हहराय १६२ थर थर थर थर थर थर कंपै झंपै आसमान त्यहिकाल ॥ दर दर दर दर दर दर दरकै फरकैनहिनअंगत्यूहिकाल १६३ मरणहि सूचित भो पत्नी को ननँदी वचन गये ठहराय ॥ उठीतड़ाका लखि अशकुनको प्रीतम गरे गई लपटाय १६४ ताहर रोंक्यो त्यहि समया मा अपनी माया मोह भुजाय ॥
१६ आल्हखण्ड । ५८० हुकुम सुनावा महराजा का सत्रियाँ हाल कहा समुझाय १६५ लौटिकै मोर्चा ते आवब जब तुम्हरो करब मनोरथ आय ॥ ऐसे कहिकै ताहर नाहर चलिभे बहुत भांनिसमुझाय १६६ आये फ़ौजन में रण नाहर डंका तुरत दीन बजवाय ॥ बाजत डंका अहर्तंका के लश्कर कूच दीन करवाय १६७ चढ़ि दलगंजन की पीठि मा मनगा श्रीगणेश पद ध्याय ॥ बन्दन कीन्ह्यो पितु चरणन का चन्दन अक्षत फूल चढ़ाय १६८ प्राण निछावरि फिरि मनते करि चलिभा दिल्ली राजकुमार ॥ गर्जत तर्जत लर्जत आवत नाहर दिल्ली का सरदार १६६ आयकै पहुँचा समर भूमि मा गरुई हाँक कहा ललकार ॥ लेय चँदेला अब अधकर को आयो दिल्ली राजकुमार १७० सुनिकै बातें ये ताहर की बेला मोहवे का सरदार ॥ असल जनाना मर्दाना जो ठाना समर आय त्यहिवार १७१ पहिले मारुइ भइँ तोपन की पाछे चलन लागि तलवार ॥ सब हथियारन में तलवारी याही धर्मरूप अवतार १७२ आरयसाही जे उत्साही गाही धर्म युद्ध के यार ॥ तौन सिपाही बेपरवाही छाँड़े प्राण आशा त्यहिवार १७३ तड़ तड़ तड़ तड़ तड़ तड़काटैँ पाटैँ मुण्डन भूमि अपार ॥ मुरि २ गिरि २ लरि २ कितन्यो जूझन लागि शूरसरदार १७४ झम् झम् झम् झम् भाला वरसैँ तरसैँ घाव देखि जिययार ॥ भम् भम् भम् भम् क्षत्री भमकैँ चमकैँ चमाचम्मतलवार १७५ गम् गम् गम् गम् ढोलक गमकैँ दमकैँ शक्ति शूल विकराल ॥ मारु मारु कै मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल १७६ जूझे क्षत्री दुहुँ तरफ़ा के नदिया बही रक्त की धार ॥
बेलाताहरकामैदान । ५८१ १७ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार १७७ को गति बरणै वहि समया कै चहुँदिशि होय भड़ाभड़मार ॥ बड़ा लड़ैया ताहर नाहर यहुदल गंजनपर असवार १७८ मारत मारत रजपूतन को बेला पास पहूँचा आय ॥ जानि चँदेला फिरि ललकार्यो ठाकुर कूच जाउ करवाय १७९ ब्रह्मरूप तब बेला बोली नाहर साँचदेयँ बतलाय ॥ मोहिं झमेलाते मतलबना अधकर यहाँ देउ पहुँचाय १८० मोहिं जियावा घर बेलाने याही हेतु दीन पठवाय ॥ भिक्षुक हैकै समरभूमि में चाहै आप लेयँ छुड़वाय १८१ ऐसे अधकर यहु छुटि है ना दुइमा एक बंश रहिजाय ॥ इतना सुनिकै ताहर नाहर बोले दोऊ भुजा उठाय १८२ सँभरिकै बैठे अब घोड़े पर ठाकुर खबरदार है जाय ॥ इतना कहिकै ताहर नाहर भालामारा तुरत चलाय १८३ वार बचाई तहँ भाला की बेला खैंचिलीन तलवार ॥ ऐंचि सिरोही बेला मारी ताहर लीन ढालपर वार १८४ यहु इकवन्ता को चढ़वैया चौंड़ा आयगयो त्यहिबार ॥ रूप देखिकै सो बेला का जान्यो सबै कपटव्यवहार १८५ चुरिया खुलिगै इक बेला की सोऊ दृष्टि परी त्यहिबार ॥ चौंड़ा बोला तब ताहर ते यहुनहिंमोहबेकासरदार १८६ बहिनि तुम्हारी यह बेला है तुमते साँच बतावैं यार ॥ इतना सुनिकै ताहर ठाकुर चकितलखनलागत्यहिवार १८७ गाफिल देख्यो जब ताहरको बेला हनी तुरत तलवार ॥ घायल हैगा ताहर ठाकुर बेलाकाटिलीन शिरयार १८८ बड़ा झमेला अब को गावै बेला कूच दीन करवाय ॥
१८ आल्हखण्ड । ५८३ बाजत डंका अहंतंका के तम्बुन फेरि पहुँचौ आय १८६ लश्कर पहुँच्यो सब दिल्लीमा घर घर खबर गई यह छाय ॥ बेला मारा है ताहर को कोऊ रँधा भात ना खाय १६० रानी अगमा के महलन मा - पहुँची खबरि तड़ाका आय ॥ को गति वर्णै त्यहि समयकै विपदा गई महलमें छाय १६१ विचरै रानी रनिवास मा गिरि गिरि परै पछाराखाय ॥ रूप शील गुण वर्णन करिकै मनमा बारबार पछिताय १६२ नाहक बेला तू पैदा भइ डारे बंश नाश करवाय ॥ त्वरे वियाहेते गौने लौं जूझे सातपुत्र रणजाय १६३ दियाबैया अब महलन में कोऊ नहीं परै दिखलाय ॥ सातपुत्र की मैं महतारी सो निरवंश डरे करवाय १६४ कैसि निर्दयी बेला ह्वैगै मारेसि समर आपनो भाय ॥ इतना कहिकै रानी अगमा फिरिगिरिगई मूर्च्छाखाय १६५ छाय उदासी गै दिल्ली मा कहूँ नहिं मसातलक झन्नाय ॥ घर घर रय्यत अपने रोवै दर दर गाथ गई यहछाय १६६ बदला लीन्ह्यो चंदेले का बेला समरभूमि में आय ॥ यहि अलबेला अब गाथा को पूरणकीन यहाँते भाय १६७ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ चरि चरि गौवैं घरका डगर्सिं पक्षी चले बसेरन धाय १६८ गिरे आलसी खटिया तकितकि सन्तन धुनी दीन परचाय ॥ आशिर्वाद देऊँ मुन्शी सुत जीवो प्रागनरायणभाय १६६ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहें चन्द औ सूर ॥ पालिक ललितेके तबलौं तुम यशसों रहो सदा भरपूर २०० माथ नवावौं पितु माता को जिन बल पूरिभई यह गाय ॥
बेलाताहरकामैदान । ५८३ १६ विपति निवारण जगतारण के दूनों धरों चरणपर माथ २०१ करों तरंग यहाँसों पूरण तवपद सुमिरि भवानीकन्त ॥ रामरमामिलि दर्शन देवो इच्छा यहीमोरि भगवन्त २०२ इति श्रीलखनऊनवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलां निवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसाद कृत ताहरबधवर्णनोनामप्रथमस्तरङ्गः ॥ १ ॥ बेलाताहरकामैदानसमाप्त ॥ इति ॥
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॥ श्री गणेशाय नमः ॥ अथ आल्हखण्ड ॥ चन्दनबगियाका युद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ ता पद पङ्कज प्रेम नितै सो इतै हम चाहत शारदरानी । ध्यावत तोहिं मनावत गावत पावत मोद महेश भवानी ॥ हे सुखदे वसुदे यशुदे तब भाग कहौं तौ कहाँलों बखानी । गावत गीत यही ललिते फलिते पदपङ्कज जे रतिमानी १ सुमिरन ॥ मैं पद बन्दों जगदम्बा के अम्बाचरण कमल धरि माथ ॥ करि अवलम्बा श्रीदुर्गा का गावा चहौं यहाँ कछु गाथ १ मोहिं भरोसा महरानी का दानी तीनिलोककी माय ॥ सब सुखखानी दुर्गा रानी पूरण कृपा करो अब आय २ जनकनन्दिनी के पद बन्दों जिन बल चला जाउँ भवपार ॥ नैया डगमग डगमग होवै बूडन चहै सदा मँझधार ३ नहीं खेवैया कोउ नैया को मैया तुम्हीं लगावै पार ॥
आल्हाखण्ड । ५८६ दैया दैया करि मरि जावै ज्यहिनहिंचरणकमलआधार४ छूटि सुमिनी गै देवी कै शाक्ता सुनो शूरमन क्यार ॥ चन्दन वगिया को कटवाई ठाकुर उदयसिंह सरदार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ ब्रह्मा ठाकुर त्यहि समया मा साँचो मरणहार दिखलाय ॥ गाँसी खटकति है मस्तक में कोखिन सेल्ल कटारी घाय १ बेला रानी त्यहि समया मा लै शिर तहाँ पहुँची जाय ॥ जहाँ चँदेला सुख शय्या मा करहत रहै बाण के घाय २ धरि शिर दीनह्यो तहँ ताहर को बोली हाथ जोरि शिरनाय ॥ कीनि आज्ञा पूरण स्वामी मारा समर आपनो भाय ३ सुनिकै बातैं ये बेला की देखन लाग चँदेलाराय ॥ जब शिर दीख्यो सो ताहरका तब मनमोद भयो अधिकाय ४ ब्रह्मा बोले फिरि बेला ते प्यारी साँच देयँ बतलाय ॥ मैके ससुरे सब सुख तुम्हरे चाहौ रहौ तहाँ तुम जाय ५ नहीं भरोसा अब जीवनका प्यारी प्राणरहे नगच्याय ॥ इतना कहिकै ब्रह्मा ठाकुर सुरपुर गयो तड़ाकाधाय ६ बेला गिरिकै रोवन लागी कारण करनलागि अधिकाय ॥ जो मैं जनतिउँ यह गति होई काहे हनति समर में भाय ७ हाय ! विधाताकी मर्जी यह हमरे बूत सही ना जाय ॥ चटक चूनरी ना मैली भै ना हम धरा सेज पै पाँय ८ खबरि पहुँकिगै यह महलन में रानी गिरीं भरहरा खाय ॥ हाहाकार परा मोहबे मा कोऊ रँधा भात ना खाय ६ ऊदन लाखनि दोऊ आये जहँपर मरा चँदेलाराय ॥ ने समुझायै भल बेलाको रानी शोक देउ विसराय १०
चन्दनबागकेरमेदान । ५८७ ३ पारस पत्थरहै मोहबेमा लोहा छुवत सोन हैजाय ॥ राजपाट लै सब मोहबेकै तुमसुखभोगकरोअधिकाय ११ इतना सुनिकै बेला बोली मानो साँच बनाफरराय॥ जल्दी जावो तुम दिल्लीको चन्दनबाग कटावो जाय १२ बिना पियोरे इक प्रीतम के सबसुखनरकसरिस दिखराय ॥ नाशकरनको हम उपजीर्थी दूनों बंश डरे मरवाय १३ अब सुखसोवैं कस मोहबेमा दिल्ली जाउ बनाफरराय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले बेला साँचदेयँ बतलाय१४ अब नहिं जावैं हम दिल्लीको कीन्हे कोप पिथौराराय ॥ जान आपनो सबको प्यारो जलथल जीवजन्तुजेमाय १५ पगिया अरझी नहिं बगिया में सोई चन्दनदेयँ मँगाय ॥ औरो चन्दन बहु दुनिया में सोकहुछकरनलवों लदाय १६ पै अब दिल्ली को जैहौं ना बेला साँच देउँ बतलाय ॥ इतना सुनिकै बेला बोली मानो कही बनाफरराय १७ शाप तड़ाका अब मैं देहौं ऊदन तुरत भस्म हैजाय ॥ बातें सुनिकै ये बेला की कम्पितभयो लखुरवाभाय १८ लाखनि बोले तब ऊदन ते चंदन चलो देयँ कटवाय ॥ आखिर देही यह रहिहै ना अब यश लेउ बनाफरराय १९ इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची कहौ कनौजीराय ॥ जल्दी चलिये अब दिल्लीको चन्दनबाग लेयँ कटवाय २० सम्मत करिकै ऊदन लाखनि डंका तुरत दीन बजवाय ॥ बाजे डंका अहर्तका के हाहाकार शब्दगा छाय २१ भूरी सजिकै लखराना की तुरतै गई तड़ाका आय ॥ फूलमती पद वन्दन करिकै त्यहिपर बैठ कनौजीराय २२
४ आल्हाखण्ड । ५८८ ऊदन बैठे रस बेंदुलपर मन में ध्याय शारदामाय ॥ सजे सिपाही सब ठाढ़े थे तुरतै कूच दीन करवाय २३ बाजत डंका अहतंका के यमुना पास पहुँचे जाय ॥ पार उतरिकै श्री यमुना के दिल्लीशहर गये नगच्याय २४ चन्दन बगिया जहँ पिरथीकी तहँ पर गये बनाफरराय ॥ चन्दन बढ़ई को बुलवायो चन्दन सबै दीन गिरवाय २५ तब तो माली हल्ला करिकै चलिभे जहां पिथौराराय ॥ लगी कचहरी महराजा की शोभा कही बून ना जाय २६ ठाढ़े माली तहँ बिनवत हैं दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ ऊदन आये हैं मोहवे ते चन्दनबाग डरी कटवाय २७ कहा न माना क्यहु मालीका ओ महराज पिथौराराय ॥ सुनिकै बातें ये माली की चौंड़ा धाँधू लीन बुलाय २८ कहि समुझावा तिन दूननते यहु महराज पिथौराराय ॥ जितने आये हैं बगिया में सबकी कटा देउ करवाय २६ इतना सुनिकै चौंड़ा धाँधू दूनों लीन फौज सजवाय ॥ चढ़ि इकवन्ता भौंरानँदपर दूनों कूच दीन करवाय ३० भारीलश्कर इत लाखनि का उत यहु गयो चौंड़ियाआय ॥ चन्दन छकड़ा चौंड़ा घेरे औ यह बोला भुजा उठाय ३१ कौन बहादुर है मोहवे मा चन्दनबाग लीन कटवाय ॥ हुकुम पिथौरा का नाहीं है लकड़ी एक यहाँ से जाय ३२ सुनिकै बातें ये चौंड़ा की सम्मुख गये बनाफरराय ॥ हमीं बहादुर हैं मोहवे के चन्दनबाग लीन कटवाय ३३ मोहिं ठकुरानी बेला रानी मोहवे वाली दीन पठाय ॥ सच्ची ह्वैहै लै ब्रह्मा को चौंड़ा साँच दीन बतलाय ३४
चन्दनबागकेरमैदान। ५८६ ५ दुनिया जानति है ऊदन को जिनके लड़न क्यार बयपार ॥ दूसर धंधा कछु कीन्हे ना चौड़ा मानु कही यहि बार ३५ अटक पारलौं झंडा गड़िगा बाजी सेतबन्धलौं टाप ॥ दतिया बूंदी जालंधर औ हमरी भई कमायूँ थाप ३६ चन्दन जैहैं सब मोहबे को चाहे फौज देउ कटवाय ॥ रुकिहै चन्दन अब चौड़ाना तुमते साँच दीन बतलाय ३७ इतना सुनिकै जरा चौंड़िया तुरतै लीन्ह्यो गुर्ज उठाय ॥ ऐंचि कै मारा सो ऊदन के लैगा बेंदुल वार बचाय ३८ बचा डुलरूवा द्यावलिवाला हौदा ऊपर पहुँचाजाय ॥ कलश सूवरण हौदावाले सो धरती मा दीन गिराय ३६ झुके सिपाही दुहुँतरफा के लागी चलन तहाँ तलवार ॥ पैग पैग पै पैदल गिरिगे दुइ दुइ पैग गिरे असवार ४० मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ४१ बिजयसिंह है बिकानेर को बिरसिंह गाँजर को सरदार ॥ दोऊ मारैं दोउ ललकारैं दोऊ समरधनी तलवार ४२ कोऊ हारै नहिं काहू सों दोउ रण परा बरोबरि आय ॥ दोऊ ठाकुर हैं हाथी पर दोऊ देयँ सेलके घाय ४३ वार चूकिगे बिरसिंह ठाकुर मारा विजयसिंह सरदार ॥ जूझिगे बिरसिंह समरभूमि में हिरसिंह आयगयोत्यहिबार ४४ सँभरो ठाकुर अब हौदापर कीन्ह्यो विजयसिंह ललकार ॥ सुनिकै बातें विजयसिंह की हिरसिंह खैंचिली नितलवार ४५ ऐंचिकै मारा विजयसिंह को सो तिन लीन ढालपर वार ॥ रिसहा ठाकुर बिकानेर को सोत्यहि मारा फेरि कटार ४६