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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

३१ आल्हखण्ड । ३४८ स्यहिकी समता का हंसा ना पै तहँ युद्ध करै विकराल १६१ कोगति वरणै तहँ हंसा कै धंसा बड़े बड़े सरदार ॥ भई प्रशंसा तहँ हंसा कै क्षत्रीडारि भागि तलवार १६२ बड़ा प्रतापी अरि परितापी सुर्खा घोड़े पर असवार ॥ गनि गनि मारै रजपूतन को क्षत्री खेलै खूब शिकार १६३ भागीं फ़ौजें मोहबेवाली आली खानदान को ज्वान ॥ आयकै गर्ज्यौ त्यहि समयामें नाहरसमरधनी मलखान १६४ अकसर मलखे के जियरे पर अरुझे बड़े बड़े सरदार ॥ जीति न पावैं मलखाने ते औमुहँ फेरिलेयँ त्यहिवार १६५ देवा बोला तब ऊदन ते ठाकुर बेंदुल के असवार ॥ अकसर मलखे के ऊपर माँ क्षत्री अरुझे तीनिहजार १६६ भागीं सेना मुहबेवाली अकसर लड़ै वीर मलखान ॥ इतना सुनिकै ऊदन चलिभा संग मचला चौंड़ियाज्वान १६७ ब्रह्मा मकरँद जगनायकजी येऊ चलतभये त्यहिवार ॥ जोगा भोगा देवा ठाकुर मन्नागूजर परम जुझार १६८ ये सब पहुँचे समरभूमि में हाथमें लिये नाँगि तलवार ॥ बलखबुखारे के क्षत्रिन को मारनलागि ढूँढ़िसरदार १६६ बड़ी कसामसि समरभूमि मै कहुँ तिलडरा भूमि ना जाय ॥ छाय लालरीगै अकाश में सबरँग ध्वजारहे फहराय २०० घोड़ा हींसैं समरभूमि में सावन यथा मेघ गहरायँ ॥ हाथी चिघरैं रणमण्डल में कायर समर न रोंकैं पायँ २०१ शूर सिपाही ईजतवाले ते तहँ मारु मारु बग्याँयँ ॥ कऊ तमंचा को धरि धमकै कोऊदेयँ गुर्ज के घाय २०२ कोऊ मारै तलवारी सों कोऊ मारैं ढाल घुमाय ॥

इन्दलहरण । ३४६ ३३ पटा बनेठी बाना जानैं तेनर मारैं गदा चलाय २०३ बलखबुखारे का अभिनन्दन मलखे साथ करै तलवार ॥ हंसा ठाकुर उदयसिंह ये दोऊ लड़ैं तहाँ सरदार २०४ सुख्खालड़िका अभिनन्दनका मकरँद नरपति राजकुमार ॥ अपने अपने दउ मुर्चा मा मारैं एक एक ललकार २०५ देवाठाकुर औ मोहन का परिगा समर बरोबरि आय ॥ बड़ी लड़ाई क्षत्रिन कीन्ह्यो कायर भागे पीठि दिखाय२०६ जितने कायर दुहुँतरफा के तरलोथिन के रहे लुकाय ॥ हेला आवै जब हाथिन का तब बिन मरे मौत है जाय २०७ कागति बरणौं मैं कायर कै मनमा बार बार पछितायँ ॥ हाय रुपैयन के लालच ते हमरे गई प्राणपर आय २०८ करत नौकरी क्यहु बनियांके हल्दी धनियां के बयपार ॥ तौ नहिं बिपदा हमपर आवत छूटत नहीं लोग परिवार २०६ कायर सोचैं यह अपने मन शूरन होयँ अनन्दाचार ॥ गिरि उठि मारैं समरभूमि में दोऊ हाथ करैं तलवार २१० छाँड़ि आसरा जिंदगानी का क्षत्रिन कीन घोरघमसान ॥ दोउदल अरुझे समरभूमिमा मारैं एकएक को ज्वान २११ कटिकटि कङ्क्षागिरैं समर में उठि उठि रुण्डकरैं तलवार ॥ मुण्डन केरे मुड़ चौरा भे औ रुण्डन के लगेपहार २१२ परीं लहासैं जो मनइन की तिनकाखावैं श्वान सियार ॥ मेला हैगा तहँ गीधन का चील्हनसीधाका व्यवहार २१३ नचैं योगिनी खप्परलीन्हे मज्जैं भूत प्रेत बैताल ॥ धरु धरु धरु धरु मारो मारो बोलै वच्छराजका लाल २१४ ऊदन ताकै ज्यहि हौदाका बैंदुल तहाँ देइ पहुँचाय ॥

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

३४ आल्हखण्ड । ३५० सातो लड़का अभिनन्दन के आल्हा कैदलीनकरवाय २१५ तब अभिनन्दन रिसहा ह्वैकै अपनो हाथी दीन बढ़ाय ॥ आल्हा ठाकुर पचशब्दापर राजा पास पहुँचे आय २१६ तब ललकारो अभिनन्दनने आल्हा कूच देउ करवाय ॥ जियत न जैहौ तुम सम्मुखने जोविधिआपवचावैआय २१७ इतना सुनिकै आल्हा बोले राजन साँच देयँ बतलाय ॥ बिना बियाहे हम बेटा को कैसे लौटि मोहोवे जायँ २१८ भलो आपनो जो तुम चाहौ सबकी कैद लेउ छुड़वाय ॥ हँसी खुशी सों बेटी ब्याहो काहे रारि बढ़ावो भाय २१६ बिना बियाहे हम जैबै ना बहुतन धजीधजी उड़िजाय ॥ इतना सुनिकै अभिनन्दनने मास्यो भालातुरतचलाय २२० वार बचाई तब आल्हा ने साँकरि हाथी दीन गहाय ॥ आल्हा बोले पचशब्दा ते अब गाढ़े में होउ सहाय २२१ घूमो हाथी तब आल्हा को रणमा साँकरिहा घुमाय ॥ जितने साथी अभिनन्दन के ते सब भागे पीठिदिखाय २२२ झुके सिपाही मोहवे वालै मारैं एक एक को धाय ॥ अलखे ऊदन देवा मकरँद सबियाॅलशकरदीनभगाय २२३ भागी फौजैं अभिनन्दन की इकलो रहा आप नरराज ॥ कियो लड़ाई भल इकलेई कैदी भयो फेरि महराज २२४ गंगा कीन्ही फिरि फौजन में इन्दल ब्याह द्याव करवाय। सातों लड़िकन सों महाराजा आल्हाठाकुरदीन छुड़ाय २२५ तुरतै पण्डित को बुलवायो सोऊ साइति दीन बताय ॥ भई तयारी फिरि भौरिन कै मड़ये तेरे पहुँचे जाय २२६

इन्दलहरण । ३५१ ३५ सवैया ॥ आमको खम्भगड़ो तहँ सुन्दर माड़व मालिन ठीक बनायो । कै गठि बन्धन बैठिगयो नृप स्वच्छ कुशानिज हाथ उठायो ॥ दान दयेउ कन्या अभिनन्दन वन्दन कै रघुनाथ मनायो । चन्दन अक्षत फूलनलै ललिते मनमोद गणेशचढ़ायो २२७ बड़ी खुशी सों अभिनन्दनने बेटी ब्याह दीन करवाय ॥ बिदा करायो चितरेखा को औधनदीन्ह्योखूब लुटाय २२८ भये अयाचक सब याचक गण जय जयकार रहे सब गाय ॥ बाजे डंका अहर्तंका के आल्हा कूचदीनकरवाय २२६ एक महीना के भीतर में दशहरि पुरै पहुंचे आय ॥ घरछन करिकै दरवाजे सों सुनवाँ लैगय वधूलिवाय २३० दगीं सलामी की तोपैं बहु ध्रुवना रहा रगमें छाय ॥ मनियादेवन की पूजाकरि बैठीं धाम आपने आय २३१ आल्हा बैठे फिरि महलन में ऊदन बैठे शीश नवाय ॥ माहिलठाकुर की गाथा को आल्हाठाकुर दीनसुनाय २३२ चुगुलशिरोमणि माहिलठाकुर ठाकुर रहे तहाँ सब गाय ॥ होय भलाई मम चुगुलिन में इतनाकहा ललुरवाभाय २३३ खेत छूटिगा दिन नायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ ब्याहपूर भा अब इन्दल का सुमिरौं तुम्हें शारदामाय २३४ पारलगायो महरानी तुम दानीयुगन युगन अधिकाय ॥ कोउअभिमानीजगरहिगा ना ज्यहिपरकोपकीनतुममाय २३५ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो पावत ना ललितेकहतकथाकसगाय २३६

३६ आल्हखण्ड । ३५२ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहै चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदाभरपूर २३७ माथ नवावौं पितु अपने को ह्यांते करौं तरँग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त २३८ इति श्रीलखनऊनिवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबू प्रयागनारायण जीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गत पँडरीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भव बुध कृपाशङ्कर सूनु पं० ललिताप्रसादकृत इन्द्लपाणिग्रहण बर्णनोनामद्वितीयस्तरंगः २ ॥ इन्दलहरण सम्पूर्ण शुभमस्तु ॥ इति ॥

अथ आल्हाखण्ड ॥ आल्हानिकासी ॥ सवैया ॥ राम औ श्याम अकाम भजै सो तजै जगके सब पातकभाई । बामन पद प्रक्षालनके जलसों भइ गंग पुराणन गाई ॥ ज्ञात सबै बिख्यात सबय ललिते ज्यहि भांति धरापरआई । गाई बताई न जाय कछू अब कीरति गंग धरापर छाई १ सुमिरन ॥ ध्याय भवानी शिवशंकर को सुमिरन करै गंगको भाय ॥ सो तरिजावै भवसागर सों पावै अमर रूपको जाय १ गावै नित प्रति रघुनन्दन को नरपुर फेरि न जन्मै आय ॥ बड़ा महातम रघुनन्दन कत नारद वालमीकि कहगाय २ गीधअजामिल शबरीगणिका चारो कीरति रहे बताय ॥ कलियुग तुलसीकी समताको दूसर कौन बतावा जाय ३ ॥

२ आल्हखण्ड । ३५४ तैसे कीरति यदुनन्दन की द्वापर फैलिगई अधिकाय ॥ सूर औ मीराबाई कलियुग पायो स्वाद भूमिमें आय ४ ललिते चक्खन को ललचायो गायो आल्हा छन्द बनाय ॥ कहौं निकासी अब आल्हा कै सुमिरन देवनको बिसराय ५ अथ कथाप्रसंग ॥ एक समइया की बातैं हैं यारो मानो कही हमार ॥ लिल्ही घोड़ीपर चढ़ि बैठो माहिल उरई का सरदार १ तिकृतिकृतिकृतिकूटिटुईहाँकत दिल्ली शहर पहुँचा जाय ॥ लागिकचहरी दिल्लीपति की जिनका कही पिथौराराय २ आवत दीख्यो तिन माहिलका अपने पास लीन बैठाय ॥ बड़ी खातिरी करि माहिल कै पूँछन लाग पिथौराराय ३ काहे आये उरई वाले आपन हाल देउ बतलाय ॥ इतना सुनिकै माहिल बोले साँची सुनो पिथौराराय ४ मलखे सुलखे आल्हा ऊदन इनका दीखे देश डेराय ॥ आज बनाफर की समता को ठाकुर आन नहीं दिखलाय ५ चार चौहदी के डाँड़े पर मलखे किलालीन बनवाय ॥ जो कछु चाहैं आल्हा ऊदन सो सब करिकै देयँ दिखाय ६ कौन दूसरिहा है आल्हा का सम्मुख बात करै जो जाय ॥ मान न रहिगे क्यहु नरेश के चारो बढ़े बनाफरराय ७ हमका मानैं भल मामा करि खातिर करैं रोज अधिकाय ॥ हमहूं जानत हैं ब्रह्मा सम राजन साँच दीन बतलाय ८ अधिक पियारे पै तिनते तुम मानो कही पिथौराराय ॥ तुम्हें लरिकईं सों जानत हौं सीधो सादो आप स्वभाव ६ तिनकी धरती का स्वामी मैं त्यहिका पास लियो बैठाय ॥

आल्हानिकासी । ३५५ २ तुम अस राजा को दुनियामें ज्यहितेप्रीतकरौअधिकाय १० इतना सुनिकै पिरथी बोले माहिल उरई के सरदार ॥ यतन बताओ यहि समया में जासों जायँ बनाफर हार ११ इतना सुनिकै माहिल बोले मानो कही पिथौराशय ॥ पाँच बछेड़ा मोहबे वाले तिनका आप लेउ मँगवाय १२ बेंदुल हंसामनि हरनागर पपिहा और कबूतरि पाँच ॥ उड़न बछेड़ा ये पाँचों हैं इनबल लड़ैं बनाफर साँच १३ पाँचो घोड़न के पाये ते साँचो विजय होय महराज ॥ जीति न पैहौ तिन पाँचो ते साँचोसाँच पाँच शिरताज १४ इतना सुनिकै पिरथीपतिने तुरतै लीन्ही कलम उठाय ॥ लिखिकै चिट्ठी परिमालिकको औ माहिलको दीनसुनार १५ सुनिकै चिट्ठी पिरथीपतिकै माहिल बड़ा खुशी हैजाय ॥ तुरतै धावन को बुलवायो पिरथी चिट्ठी दीन पठाय १६ लैके चिट्ठी धावन चलिभा पहुँचा नगर मोहोबे आय ॥ जहाँ कचहरी परिमालिक कै धावन तहाँ पहुँचा जाय १७ कीन दण्डवत महराजा को चिट्ठी फेरि दीन पकराय ॥ लैके चिट्ठी पृथीराज की आँकुइआँकुनजरिकैजाय १८ तुरत बुलायो निज धावन को की आल्हा को लाउ बुलाय ॥ इतना सुनिकै धावन चलिभा दशहरिपुरै पहुँचा जाय १६ तुम्हें बुलावत महराजा हैं यह आल्हा ते कह्यो सुनाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा ऊदन पहुँचे नगर मोहोबे आय २० जहाँ कचहरी परिमालिक की दोनों गये बनाफरराय ॥ हाथ जोरिकै आल्हा ऊदन ठाढ़े भये शीश को नाय २१ आल्हा बोले परिमालिक ते राजन् साँच देउ बतलाय ॥

१ आल्हखण्ड । ३५६ कौनसी विपदा तुमपर आई जो सेवकको लीन बुलाय २१ इतना सुनिकै राजा बोले साँची सुनो बनाफरराय ॥ बेंदुल हंसामनि हरनागर पपिहा और कबूतरि भाय २३ पाँचो घोड़ा पिरथी माँगे, सो अब दीन चही पहुँचाय ॥ चिट्ठी आई महराजा की धावन बैठ बनाफरराय २४ इतना सुनिकै आल्हा बोले राजन साँच देयँ बतलाय ॥ अपने घोड़ा हम देबे ना चहु चढ़िआवै पिथौराराय २५ लड़ि भिड़ि लेबे हम पिरथी ते देबे समरभूमि समुझाय ॥ जियत न पाई कोउ घोड़नको साँची सुनो चँदेलेराय २६ इतना सुनिकै राजा बोले मानो कही बनाफरराय ॥ रारि मिटावो दै घोड़न को यामें भलापरै दिखलाय २७ घोड़ा अइहैं नहिं दिल्ली को मोहबा तुरत लेउँ लुटवाय ॥ ऐसी चिट्ठी पृथीराज की सो पढ़िलेउ बनाफरराय २८ घोड़ा पैहैं जो पिरथी, ना मोहवा तुरत गाँसिहैं आय ॥ कितन्यो घोड़ा लड़ि मरिहैं ऐसे पाँच देउ पठवाय २९ अंकुश विषका तुम गाड़ो ना मानो कही बनाफरराय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ३० काह हकीकति है पिरथी कै मोहवानगर मँझावें आय ॥ दतिया जीति उरैछा जीत्यों जीत्यो सेतुबंधलों जाय ३१ जीति पेशावर मुलतानाली बूँदी थर थर थर्राय ॥ राज्य कमायूंका लै लीन्ह्यों झंडाअटक दिह्योंगड़वाय ३२ जितनी तिरिया हैं मेवात में संध्या समय नित्त पछितायें ॥ काह हकीकति है पिरथी कै दिल्ली काल्हिलेउँ लुटवाय ३३ एक पिथौरा कै गिनती ना लाखन चढ़ें पिथौरा आय ॥

आल्हानिकासी । ३५७ ५ मैं हनिडारों तलवारी सों साँची सुनो चँदेलेराय ३४ सुनिकै बातें बघऊदन की जरि बरि गये रजापरिमल ॥ दशहरि पुरवाको खाली करु बेटा देशराज के लाल ३५ गऊ रक्त सम जल तू जानै भोजन गऊ माँस अनुमान ॥ करै मेहरिया कै संगति जो होवै बहिनी संग समान ३६ होउ पातकी तुम कलियुग में जो नहिं करो बचन परमान ॥ इतना सुनिकै आल्हा ऊदन तुरतै चले वहाँ ते ज्वान ३७ अपने अपने फिरि घोड़नपर दूनों भाय भये असवार ॥ तुरतै रूपन को बुलवायो बोले उदयसिंह सरदार ३८ बा हजार जो हमरी फौजैं तिनमाँ खबरि सुनायोजाय ॥ करैं तयारी सब नर नाहर अबहीं कूच देयँ करवाय ३६ इतना सुनिकै रुपना चलिभा सबका खबरि सुनाई जाय ॥ इक हरकारा को पठवायो औ देवा को लीन बुलाय ४० हाल बतायो आल्हा ठाकुर जो कछु कह्यो चँदेलेराय ॥ इतना सुनिकै देवा बोला दादा साँच देयँ बतलाय ४१ हमहूं रहिबे ना मोहबे मा साथै चलैं तुम्हारे भाय ॥ सवन चिरैया ना घर छोड़ै ना बनिजरावनिजकोजाय ४२ यह नहिं चहिये परिमालिकको ऐसे समय निकोरैंभाय ॥ लिखी गोसइयाँ की को मेटै साथै चलब बनाफरराय ४३ कौन देशमें अब चलि बसिहौ हमको साँच देउ बतलाय ॥ सुनिकै बातें ये देवाकी बोले तुरत बनाफरराय ४४ बैरी हमरे सब राजा हैं जावैं कौन देशकोभाय ॥ तुमहूँ ऊदन सम्मत करिकै ठीहा ठीक देउ ठहराय ४५ इतना सुनिकै ऊदन बोले दादा साँच देयँ बतलाय ॥

६ आल्हखण्ड । ३५८ देश देश में कीनलड़ाई संकटपरा आजदिन आय ४६ जयचंदराजा कनउजवाला सोई एक मित्र दिखराय ॥ दूसर कोऊ अस छत्री ना जो विपदामें होय सहाय ४७ इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर मनमाँ ठीक लीन ठहराय ॥ चलिकै रहिये अब कनउजमें साँची कही लहूरूवाभाय ४८ हमहूँ चाहत रहें कनउज को तुमहूँ दीन स्वई बतलाय ॥ यह मनभाई भल देवा के दशहरिपुरै पहुँचे आय ४६ बड़े प्रेमसों द्यावलिदौरी पूँछी कुशल दुवारेआय ॥ आल्हाबोले तब द्यावलिते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ५० मोहिं निकारयो परिमालिकने अनुचितअनुचितकसमखवाय॥ आजु न रहिबे हम दशहरिपुर माता साँच दीन बतलाय ५१ द्यावलिबोली फिरि आल्हाते काहे कह्यो चँदेलेराय ॥ बात बताओ जो पूरी तुम तौ फिरि कूच देयँ करवाय ५२ इतना सुनिकै आल्हाठाकुर सबियाँ कथा गये तहँगाय ॥ हाल जानिकै द्यावलि माता महलनहुकुमदीनफरमाय ५३ सुनवाँ फुलवा चित्तरेखा तीनों होवैं बेगितयार ॥ मोहिं निकारयो परिमालिक ने कीन्ह्योतनको नाहिंविचार ५४ इतना सुनिकै बाँदी दौरी महलन खबरि जनाईजाय ॥ सुनवाँ फुलवा चित्तरेखा तीनों गईं सनाकालाय ५५ होश छूटिगे ठकुरानिन के यहुका रंग भंग भो आय ॥ तबतो गाथा सब आल्हाकी बाँदी तहाँ दीन समुझाय ५६ तब ठकुरानी मनसानी सब अपनो हर्ष शोक बिसराय ॥ डोलामँगवायो चऊदन ने सोऊ गयो तहाँपरआय ५७ कई तयारी फिरि जल्दी सों सबदिन कूच दीन करवाय ॥

आल्हानिकासी । ३५६ बाजे डंका अदहंतंका के हाहाकार शब्दगा छाय ५८ आगे आल्हा हैं पपिहापर ऊदन बेंदुलपर असवार ॥ हंसामनि घोड़े के ऊपर इन्दल आल्हाकेर कुमार ५९ आय कै पहुँचे सब मोहबे में मल्हना महल पहुँचे जाय ॥ बड़ी खुशाली सों महरानी आदरभावकीन अधिकाय ६० खबरि पायकै सब रानी फिरि मल्हना महल पहुँचीं आय ॥ रोवनलागीं सब रानी तहँ दारुण बिपतिकहीना जाय६१ मल्हनाबोली फिरि आल्हा ते साँची सुनो बनाफरराय ॥ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है जो अब कूचदेउ करवाय ६२ घाटि न जाना हम ब्रह्मासों चारो आय बनाफरराय ॥ कहा न मानो अब काहूको बैठो धाम आपने जाय ६३ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ अब नहिं रहिबे हम मोहबे माँ माता साँचदीन बतलाय ६४ गऊरक्त सम जलको जानै भोजन गऊमाँस सममान ॥ करै मेहरिया कै संगति जो होवै बहिनी संगसमान ६५ ऐसी बातें महराजा की माता काहगई बौराय ॥ जो हम बिलमैं अब मोहबेमाँ तौ सब क्षत्री धर्म नशाय ६६ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है राखो हमें फेरि जो माय ॥ दर्शन द्वैगे सब मातन के अब हम कूच द्यहूँ करवाय६७ इतना कहिकै ऊदन ठाकुर डोला तुरत लीन मँगवाय ॥ औ ललकारा फिरि माता का अब तुम कूच देउ करवाय ६८ सुनि सुनि बातें उदयसिंह की मल्हना बार बार पछिताय ॥ तुरतै धावन को बुलवायो सिरसागढ़ै दीन पठवाय ६९ लागि कचहरी मलखाने कै धावन वहाँ पहुँचा जाय ॥

कही हकीकति सब आल्हाकी धावन हाथ जोरि शिर नाय ७० सुनिकै बातें धावन मुख की मलखे घोड़ी लीन मँगाय ॥ मल्हना केरे फिरि महलन ते आल्हा कूच दीन करवाय ७१ बाजे डंका अहतंका के कनउज चले बनाफरराय ॥ ब्याकुल रैयत भै गोहबे कै काहू धीर धरा ना जाय ७२ भोजन कीन्ह्यो कोउ तादिनना सोवन रात दीन बिसराय ॥ जहँ तहँ गाथा बघऊदन की घर घर रहे नारिनर गाय ७३ चढ़ा कबूतरी पर मलखाने मारग मिला तुरतही आय ॥ कुशल पूँछिकै आल्हा ठाकुर आपनिकुशलदीन बतलाय ७४ जो कछु भाषा परिमालिक ने आल्हा सत्य सत्य गे गाय ॥ मलखे बोले तब आल्हा ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ७५ चलिकै रहिये तुम सिरसा में करिहै काह चँदेलोराय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले दादा साँच देयँ बतलाय ७६ अब नहिं टिकिहैं हम सिरसा में चहु तुम कोटिनकरो उपाय ॥ राज्य छोड़िकै परिमालिक की जयचँद पुरी जायँ हम भाय ७७ जब सुधिआवै नृप बातन कै तब मन पीर होय अधिकाय ॥ बात के मारे जो मरिहै ना मरिहै काह लात के घाय ७८ आज तो घोड़ा पिरथी मांगा काल्हिको तिरिया लेत मँगाय ॥ यहु मर्दाना को बाना ना आपन घोड़ देयँ पठवाय ७६ इतना सुनिकै मलखे बोले मानो कही बनाफरराय ॥ सयन चिरैया ना घर छोड़ै नाव निजराव निजको जाय ८० अस गति नाहीं है पिरथी की तुम्हरे घोड़ लेयँ मँगवाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर बोले फेरि बचन समुझाय ८१ लिखी विधाता की मिटिहैना सिरसा लौटिजाउ मलखान ॥

आल्हानिकासी । ३६१ ६ काह हकीकतिहै मानुष के सुख दुख देनहार भगवान ८२ बातें सुनिकै ये आल्हा की मलखे ठीक लीन ठहराय ॥ क्यहु समुझायेते मनिहैं ना आल्हाउदयसिंह दोउ भाय ८३ मिला भेंट करि सब काहू सों मलखे कूच दीन करवाय ॥ जायकै पहुंचे सिरसागढ़ में महलन खबरि बताई जाय ८४ नदी बेतवा को उतरत भे दूनों भाय बनाफरराय ॥ ढाई दिनके फिरि अर्सा में झावर गये बनाफर आय ८५ बिजुली चमकै कउँधा लपकै कहुँ कहुँ मेघ रहे गहराय ॥ मेढ़ुक बोलैं चौगिर्दा ते वीछी साँपनकी अधिकाय ८६ नचैं मुरैला कहुँ जंगल में झींगुर कहुं करैं झनकार ॥ किह्यो बसेरा तटयमुना के नाहर उदयसिंह त्यहिबार ८७ बनी रसोई रजपूतन की सबहिन जेंव लीन ज्यौनार ॥ भोर भुरहरे मुर्गा बोलत उतरे घाट कालपी क्यार ८८ तहँते चलिकै परडुल पहुंचे दूनों भाय बनाफरराय ॥ दिना द्वैक रहि त्यहि थान में तहँते कूच दीन करवाय ८९ जायकै पहुँचे अस .... में जहँ पानीको कष्टाय ॥ इन्दल बेंदुल दोउ प्यासे भे इनके ..... । ११० रहा न बीरा तहँ पानन का जो बनाफरराय ॥ ताकि व्यविरया इन्दल बेंदुल पानी .... ल्हुरवाभाय ११५ आधा पानी आधी माटी जाब तिन्हैं लीन लुटवाय ॥ हाय मुसीबत अस परिगैहै सेहुको अन्नदीन छिरकाय ११६ सुनवाँ रोई त्यहि समया में बुताफलहू दीन चलाय ॥ फाटै छाती नहिं द्यावलि कै चिं वापू रहे मचाय ११७ आल्हा सोचैं त्यहि समया में ऊदन छप्पर दीन गिराइ ॥

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

१२ आल्हखण्ड । ३६४ तेलि तँबोली कलवारन की दुर्गति भई तहांपर आय ११८ लैलै टेंटुवा बनियां चलिभे मनमें बार बार पछिताय ॥ हाय रुपैया बैरी द्वैगा ह्वाँ अबगई प्राणपर आय ११६ भा खलभल्ला औ हल्ला अति पहुंचे बहुत राज दरबार ॥ रोय रोयकै बनियाँ बोलै राजन मानो कही हमार १२० अजयपाल औ रतीभान भे एकते एक शूर सरदार ॥ ऐसि दुर्दशा भै कबहूंना जैसी भई आय यहिवार १२१ ऊदन आये मोहबे वाले तिन सब लीन बजारलुटाय ॥ इतना सुनिकै जयचँद राजा लाखनिरानालीनबुलाय १२२ कहि समुझावा लखराना को तोपन आगिदेउ लगवाये ॥ सुनिकै बातें महराजा की लाखनिचला शीशकोनाय १२३ सवैया ॥ चर्खन में सब तोप चढ़ाय औ फौज तयार कियो लखराना । बाजत डंक निशंक तहाँ औ यथा घन सावन को गहराना ॥ विज्जु छटासों कटा करवे कहँ चमकत खड्ग तहाँ मरदाना । मौहर बाजत हाव किये लखिते यह भाव न जात बखाना १२४ भई तयारी समरभूमि की छत्रिनबांधि लीन हथियार ॥ मीराताल्हन बनरस वाला पहुंचा तबै राजदरबार १२५ किह्यो बन्दगी महराजा को औ यह हाल कह्योसमुझाय ॥ गरि मचायो नहिं कनउज में आल्हाऊदन लेउ बसाय १२६ मोर्चा फेरा इन पिरथी त द्वारे हाथी दीन पछार ॥ बड़े लड़ैया द्यावलिवाले इनसे हारि गई तलवार १२७ जयचंद बोले तब सय्यद ते नाहर बनरस के सरदार ॥

[Header] आल्हानिकासी। ३६५ १३

जौंरा भौंरा दुइ हाथिन को हमरे द्वारे देयँ पछार १२८ खता माफ करि हम आल्हाकै औ कनउज माँ लेंय बसाय ॥ इतना सुनिकै सय्यद् बोले धावन पठै लेउ बुलवाय १२६ तब महराजा कनउज वाला तुरतै धावन दीन पठाय ॥ खबरि सुनाई त्यहि आल्हा को तुमको राजा रहे बुलाय १३० मीरासय्यद् तहँ बैठे हैं तिनहिन हमें दीन पठवाय ॥ इतना सुनिकै आल्हाऊदन दोऊ भाय बनाफरराय १३१ अपनी अपनी असवारिनचढ़ि तहँते कूच दीन करवाय ॥ जौंरा भौंरा मस्ता हाथी जयचंद द्वारेदीन ढिलाय १३२ आल्हा ऊदन दोऊ भाई पहुंचे तुरत द्वारपर आय ॥ जयचंद बोले तब आल्हाते मानो कही बनाफरराय १३३ हथी पछारो जो द्वारे पर तौ तकसीर माफ द्वैजाय ॥ इतना सुनिकै उदयसिंहने मनमांसुमिरिशारदामाय १३४ ताकिकै मस्तक इक हाथी के भाला हना लघुरवा भाय ॥ पैठिग भांला त्यहि हाथी के तुरतै गिरा पछारा खाय १३५ दन्त पकारकै फिरि दूसरे के ऊदन दीन्ह्यो द्वार लिटाय ॥ देखि वीरता उदयसिंह की जयचंद बहुतगयो हर्षाय १३६ बाँह पकरिकै फिरि आल्हा कै औ दरबार पहुँचा जाय ॥ कीनि खातिरी भल ऊदन की खालीमहलदीनकरवाय १३७ लै कै लश्कर तब कनउज मां बसिगे तहां बनाफरराय ॥ खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डागड़ानिशाकोआय १३८ परे आलसी खटिया तकितकि सन्तन धुनी दीन परचाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनरायण भाय १३६ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहै चन्द औ सूर ॥

१४ · आल्हखण्ड । ३६६ मान्त्रिक ललिते के तवलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १४० माथ नवावौं पितु अपनेको ह्याँ ते करौं तरंग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छायही मोरि भगवन्त १४१ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी,आई,ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजवाबूप्रयाग नारायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भवद्वुकृपाशङ्करसूनु पं०ललिताप्रसादकृत आल्हा कन्नौजवासवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ आल्हा निकासी सम्पूर्ण ॥ इति ॥

अथ आल्हाखण्ड ॥ लाखनिका विवाह अथवा बूँदी की लड़ाई ॥ सवैया ॥ फूलन कारिखै हमदन कै दशस्यन्दन के सुत को यश गावैं । र्तना सुनिकै ॐ रघुनन्दन बन्दन कै अतिही सुखपावैं ॥ कहा आयो चरण सदा प्रभुकी करणी बरणी नहिं जावै । क्षेम संदेश नप करियो ललिते पदपङ्कज नित्त मनावै १ सुमिरन ॥ फूलमती कनउज की देवी जिनयशप्रकटआजयहिकाल॥ करैं मनोरथ पूरण सबके ध्यावैं जवान वृद्ध चहुकाल १ हैं महरानी सब सुखदानी रक्षाकरैं बिकट कलिकाल ॥ अवलम्बा तिनअम्बाका लाखनि ब्याह बखानों हाल २ सहाई अब माई तुम जाते चलाजाउँ भवपार ॥ बूड़े भवसागर में माता तुम्हीं निवाहन हार ३ पार लगायो जस ऊदन का तैसे पारकरो यहिबार ॥ माता भ्राता अरु ताता ये स्वारथ मित्र सबै संसार ४

२ आल्हखण्ड । ३६वां साँचौँ माता अरु त्राता तुम धाता सृष्टि माँझ यहिकाल ॥ लखियै ऐसे नर दुर्बल को माता जानु आपनो बाल ५ छूटि सुमिरनी गै देवीकै लाखनिब्याहसुनोयहिकाल ॥ गंगाधर बूँदी का राजा ता घर ब्याह होयगो हाल ६ अथ कथाप्रसंग ॥ कुसुमा बेटी गंगाधरकी राजा बूँदी का सरदार ॥ खेलत देखा सो बेटी का यौवन जानिपरा त्यहिबार १ लाग विचारन मन अपने मा बेटी ब्याहन के अनुसार ॥ नव अरु आठ दशै वर्षनमा ज्योतिपशास्त्रदीनअधिकार २ फिरि तौ गिनती ना कन्याकी यह मन कीन्ह्यो खूब विचार ॥ म्वती जवाहर दो बेटाथे तिनका बोलिलीन त्यहिबार ३ हाल बतावा मन अपने का राजा बार [बार समझाय] ॥ घरवर नीको जहँ तुम देखो त्यहिघर टीका [दीजो जाय] एक मोहोवे तुम जायो ना तहँपर रहें [बनाफर राय] ॥ जाति बनाफर की हीनी है हल्ला देश दे[श महँ] काय ५ इतना कहिकै महराजा ने सबियाँ सामा दीन मँगाय ॥ चला जवाहर तब बूँदी ते राजै बार बार शिरनाय ६ तीनिलाख को टीका लै कै दील्लीशहर पहुँचा जाय ॥ हाल जानिकै पृथीराज ने टीका तुरत दीन लौटाय ७ चौरीगढ़ में वीरशाह घर पहुंचा फेरि जवाहरजाय ॥ सोऊ जादूकी शंका ते टीका तुरत दीन लौटाय ८ तहँतेचलिकै फिरिविसहिनगा जहँपर बसैं बिसेनेराय ॥ लागि कचहरी गजराजा की शोभा कही बूत ना जाय ६ सोने सिंहासनपर सोहत है राजा बिसहिन का सरदार ॥

लाखनिका विवाह । ३६६ ३

दीन जबाहिर तहँ चिट्ठी को, राजा पढ़नलाग त्यहिबार १० पढ़िकै चिट्ठी गंगाधरकै टीका तुरत दीन लौटाय ॥ तबै जबाहिर मन खिसियाने पहुँचे फेरि कनौजै जाय ११ लागि कचहरी तहँ जयचँदकै भारी लाग राज दरबार ॥ आल्हा ऊदन तहँ बैठे हैं बैठे बड़े बड़े सरदार १२ दीन जबाहिर तहँ चिट्ठी को जयचँद आँकु आँकु पढ़िलीन ॥ पढ़िकै चिट्ठी वापस दीन्ह्यो हाँहूँ कछू नहीं नृप कीन १३ तबै जबाहिर यह बोलत भा दोऊ हाथजोरि शिरनाय ॥ लाखनि काँरे हैं तुम्हरे घर यह हम आयनपताल गाय १४ आयसु पावैं महाराजा को तौ हम टीका देयँ चढ़ाय ॥ इतना सुनिकै जयचँद बोले तुमते साँचदेयँ बतलाय १५ ब्याह न करिबे हम तुम्हरे घर डाँपर जादू को अधिकाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय १६ टीका आयो घर तुम्हरे है राजन लीजै आप चढ़ाय ॥ कौन दुसरिहा नृप तुम्हरो है ज्यहिभयकरौ कनौजीराय १७ औरो बोले त्यहि समया मा साँची कहौ बनाफरराय ॥ सम्मत सब का जयचँद लै कै तब पण्डितते कहा सुनाय १८ देखो साइति यहि समया मा टीका लीनजाय चढ़वाय ॥ सुनिकै वातैं महाराजा की पंडित साइति दीन बताय १९ पाख अँधरिया तिथि तेरसिऔ फागुन मास सुनो महराज ॥ भौरिन केरी शुभ साइति है ह्वैहैं सुफल आपके काज २० पै यहि बिरिया शुभ साइति में टीका आप लेउ चढ़वाय ॥ इतना सुनिकै महराजा ने महलन खबरिदीन पठवाय २१ खबरि पायके महरानी ने चौका तुरत लीन लिपवाय ॥ २४