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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ आल्हखण्ड ॥ चन्दनखम्भाकायुद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ सोहत मुण्डनमाल हिये अरु भाल में चन्द्र बिराजत नीके । शूल औ शक्ति कृपाण लिये डमरू कर सोहत शम्भुबलीके ॥ खातहैं भंग धरे शिरगंग सो नंग फिरैं अरधंग सतीके । जंग जुरे न टरैं ललिते हम ध्यावत चर्ण हैं शम्भु यतीके १ सुमिरन ॥ विपत्ति विदारण जगतारण के दूनों धरौं चरणपर माथ ॥ पूर मनोरथ तुम्हहीं करिहौ स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ १ वल्कल धारे जटा सँवारे मारे बली बीर दशमाथ ॥ सो हैं स्वामी अवधपुरी के लीन्हे धनुषत्राण प्रभु हाथ २ अक्षत चन्दन औ पुष्पन सों मानस पूजन परम उदार ॥ सो मैं करिकै रघुनन्दन का जावा चहौं जगत के पार ३ तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धहौ स्वामी र... ... ... ॥

२ आल्हखण्ड । ५६६ कीरति देवो नित दुनिया में राखो मोरि जगत में लाज ४ छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ चन्दनखम्भा ऊदने लैहैं होई महाभयङ्कर मार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उदय दिवाकर भे पूरब मा किरणन कीन जगतउजियारा॥ सोय के जागे उदयसिंह जब लागे करन फौज तय्यार १ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ धरी अँवारी तिन हाथिनपर बहुतक हौदा रहे विराज २ इक इक हाथी के हौदामा दुइ दुइ भये वीर असवार ॥ सजा रिसाला घोड़नवाला आला साठि सहस त्यहिबार ३ झीलमबखतरपहिरिसिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ॥ चढ़े कनौजी तब भूरी पर ऊदन बेंदुल भे असवार ४ देवा सय्यद बनरसवाले औ जगनायक भये तयार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे विप्रन कीन वेद उच्चार ५ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग व्यवहार ॥ पहिल नगाड़ा में जिन बन्दी दुसरे फाँदि भये असवार ६ तिसर नगाड़ा के बाजत खन लाखनि कूचदीन करवाय ॥ पार उतरिकै श्रीयमुना के दिल्ली शहर गये नगच्याय ७ तीनि अनी करि तहँ सेनाकी खम्भा तुरत लीन उखराय ॥ बारहु खम्भा चन्दनवाले छकरन उपर लीन लदवाय ८ भा खलभल्ला औ हल्ला अति पायो खबरि पिथौराराय ॥ धावा कीन्ह्यो उदयसिंहने चन्दन खम्भ लीन उखराय ६ सुना पिथौरा जब वातैं ई दीन्ह्यो वीरभुगन्त पठाय ॥ १०

चन्दनखम्भाकामंदान । ५६७ ३ भा खलभल्ला औ हल्ला तब लोगन दीन्ह्यो लागलगाय ॥ मुर्चाबन्दी दुहुँ तरफा ते दूनों तरफ बीर समुहाय ११ मारन लागे तलवारी सों दूनों तरफ बरोबरि आय ॥ अपने अपने सब मुर्चनमा ज्वाननदीन्हे ज्वान गिराय १२ औ ललकारैं फिरि फिरि मारैं अद्भुत समर कहा ना जाय ॥ लिहे जँजीरें हाथी मारैं घोड़ा मारैं टाप चलाय १३ दाँतन काटैं फिरि फिरि डाटैं चाटैं रक्त भूत बैताल ॥ मारि लहाशन के भुइँ पाटैं ल्वाटैं समरशूर त्यहिकाल १४ ह्वातैं लागीं तहँ श्वानन की ज्वानन खूब कीन तलवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार १५ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ खट खट खट खट तेगा बोलै ऊना चलै बिलाइतिक्यार १६ भाला बरछी तीर तमंचा कहुँ कहुँ कड़ाबीनकी मार ॥ छुरी कटारी कउ कउ मारैं कउ कउ बीर रहे ललकार १७ कउ मुखफारैं नखन बिदारैं डारैं चीरि फारि मैदान ॥ कोऊ हारै नहिं काहू सों ज्वाननकीन घोर घमसान १८ परशूठाकुर लाखनि दिशि को अंगद नृपतिग्वालियरक्यार ॥ मुर्चाबन्दी भै दूनन कै दूनों लड़न लागि सरदार १६ अंगद मारै तलवारी सों परशू लेय ढालपर वार ॥ परशू मारै तलवारी सों अंगद रोकि लेय त्यहिवार २० बड़ी लड़ाई भै दूननमा दूनन खूब कीन तलवार ॥ वार चूकिगे अंगद राजा परशू मारिदीन त्यहि वार २१ गिरिगा राजा ग्वालियर का आयो बीर भुगन्ता ज्वान ॥ बीर भुगन्ता के मुर्चा मा परशू खूब कीन मैदान २२

४ आल्हखण्ड । ५६८ वार चूकिगे परशू ठाकुर गस्यो वीर सुगन्ता ज्वान ॥ चन्दन खम्भा के मुर्च्चा मा परशू जूझिगये मैदान २३ ऐंड़ा बेंडा ऊदन मारैं सीधा हनैं कनौजीराय ॥ अगलबगल में जगनायकजी बहु रणशूर ढहावत जायें २४ रानी अगमा के महलन के फाटक ऊपर कनौजीराय ॥ सँग जगनायक ऊदन ठाकुर येऊ गये तड़ाका धाय २५ मुर्च्चाबन्दी है बिसहिनि में तहँ पर गये पिथौराराय ॥ सुनी हकीकति लाखनिराना द्वारे जाय गये बिरझाय २६ बदला लेवे संयोगिनि का तब फिरि धरब अगारी पाँय ॥ लैकै डोला अब अगमा का कनउज शहर देहुँ पहुँचाय २७ तौ तौ लड़िका रतीभान का नहिं ई मुच्छ डरौं मुड़वाय ॥ तब जगनायक बोलन लागे मानो कही कनौजीराय २८ जैसे जानैं हम मल्हना को अगमा तैसि हमारी माय ॥ यह गति नाहीं क्यहु ठाकुरकी डोला आजु लेय निकराय २९ जितनी फौजें चन्देले की सो सब साथ हमारे भाय ॥ हमरो तुम्हरो मुर्च्चा द्वै है साँची सुनो कनौजीराय ३० यामें संशय कछु परि है ना तुमते ठीक दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें जगनायक की बोला तुरत बनाफरराय ३१ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है भैने सुनो चँदेलेकेर ॥ रतीभान के ये लरिका हैं नाती बेनचकवै केर ३२ घाट बयालिस पिरथी रोंके तब तुम गये हमारे पास ॥ बन्दि छुड़ाई इन मोहबे की काटी तहाँ यमनकी पाश ३३ आजु कनौजी सब लायक हैं हमरे माननीय शिरताज ॥ तुमहूँ प्यारे जगनायक जी विग्रहकेर नहीं कछुकाज ३४

चन्दनखम्भाकामैदान । ५६६ तुम्हरे लाखनि के मुर्चामा कटिहैं पायँ आपने भाय ॥ .होय लड़ाई घर अपने मा दुशमनशोरहोय अधिकाय ३५ हुकुम जो पावैं लखरानाका महलन जायँ तड़ाकाधाय ॥ डोला लावैं हम अगमा का राखैं टेक कनौजिराय ३६ सुनिकै बातैं बघऊदन की लाखनि हुकुम दीन फरमाय ॥ चला बनाफर तब जल्दी सों महलन अटा तड़ाकाजाय ३७ रूप देखिकै बघऊदन का रानी गई सनाका खाय ॥ हाथ मेहरियन पर डार्यो ना मानो कही बनाफरराय ३८ पूत सुपूते ग्वालिवाले कीरति छायरही चहुँओर ॥ महल हमारे जो तुम लूटै कीरतिजाय सबै यहि ठोर ३६ फेंट बँधैया कोउ नाहीं है ना कोउ गहनयोग तलवार ॥ साँची बातैं हमरी मानो ठाकुर उदयसिंह सरदार ४० सुनिकै बातैं महरानी की दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ ब्वला बेंदुला का चढ़वैया रानी साँच देयँ बतलाय ४१ जैसे माता मल्हना रानी तैसे आप हमारी माय ॥ यहु महराजा कनउजवाला द्वारे आय गयो बिरझाय ४२ डोला लेबे हम अगमा का तब अब धरब अगारी पाँय ॥ बदला लेबे संयोगिनि का तब छाती का डाह बुताय ४३ तहँ जगनायक खूब बिगरे थे तिनहुन दीन तहाँ समुझाय ॥ अब समुझावत महरानी हैं बाँदी आप देउ पठवाय ४४ यह मनभाई महरानी के सुन्दरि बाँदी लीन बुलाय ॥ कपड़ा गहना सब आपनदै डोला उपर दीन बैठाय ४५ चलिभा डोला रंगमहल ते संगे चले बनाफरराय ॥ जहाँ कनौजी की भूरीथी डोला तहाँ पहुँचा आय ४६

६ आल्हाखण्ड । ६०० देखिकै डोला लाखनिराना तुरतै कूचदीन करवाय ॥ चलिभा डोला जब फाटकते पहुँचा तुरत बजारे आय ४७ ऊदन बोले तब लाखनि ते मानो कही कन्नौजीराय ॥ कऊ दुसरिहा अब तुम्हरो ना डोला आप देउ लौटाय ४८ कीरति गैहैं सब दुनिया मा ओ महराज कन्नौजीराय ॥ इतना सुनिकै लाखनिराना डोला तुरत दीन लौटाय ४६ आयग तिसहिन ते तुरतै तब यहु महराज पिथौराशाय ॥ सुनी हकीकति सबलाखनिकी हाथी तुरत लीन सजवाय ५० आदिभयङ्कर के ऊपर चढ़ि बैठ्यो शम्भु शिवाक्रोध्याय ॥ चौंड़ा धाँधू अगल बगलभे डंका तुरत दीन बजवाय ५१ बाजत डंका अह्तंका के राजन कूच दीनकरवाय ॥ भारी लस्कर महाराजा का पहुँचा समरभूमि में जाय ५२ यहु महाराजा तब गाजाअति राजा गहरूदीन ललकार ॥ मारो मारो ओ रजपूतो हमरे समरशूर सरदार ५३ जान न पावैं मोहबेवाले अब शिरकाटि देउ भुइँडारि ॥ गरूई गाजैं सुनि राजाकी बाजैं घूमि घूमि तलवारि ५४ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी लाल ॥ भरि भरि खप्पर नचैं योगिनी मज्जैं भूत प्रेत बैताल ५५ श्वान शृगालन की बनिआई कागन लागी कारि बजार ॥ गिद्ध औ चील्हनके झुण्डनका मुण्डन उपर लाग दरबार ५६ बहैं लहाशैं तहँ मनइन की तापर चढ़े काग औ कङ्क ॥ उठिउठिलड़ि २ गिरि २ कितन्यो मरिगे समर राव औ रङ्क ५७ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया ठाकुर उदयसिंह निरशंक ॥ मारति आवै रजपूतन को लीन्हे सङ्ग सिपाही बङ्क ५८

भयो सामना फिरि धाँधू का दूनों लड़न लाग सरदार ॥ छोड़ बेंदुला पर ऊदन हैं धाँधू हाथी पर असवार ५९ पैंड़ लगायो रस बेंदुल के हौदा उपर पहुँचा जाय ॥ गुर्ज चलाई तब धाँधू ने ऊदन लैगे वार बचाय ६० ढाल कि औझड़ ऊदन मारी धाँधू गिरे मूर्च्छा खाय ॥ भागो हाथी जब धाँधू का देवी गयो मरहटाआय ६१ औ ललकारा उदयसिंह को ठाकुर खबरदार है जाय ॥ वार हमारी ते बचिहौना जो बिधि आपुबचायै आय६२ इतना कहिकै देवी मरहटा तुरतै खैंचि लीन तलवार ॥ ऐंचि कै मारा बघऊदन के ऊदन लीन ढालपर वार ६३ फिरि ललकारा उदयसिंह ने नाहर होउ तुरत हुशियार ॥ यह कहि मारा तलवारी को देवी जूझिगयो त्यहिबार ६४ जूझिग देवी जब खेतन मा चौंड़ा गरु करै ललकार ॥ लडै चौंड़िया रण खेतनमा दूनों हाथ करै तलवार ६५ मीरासय्यद बनरस वाले येऊ घोर करैं घमसान ॥ कोगति बरणै तहँ देवा कै ठाकुर मैनपुरी चौहान ६६ फिरिफिरि मारै औ ललकारै रणमा कठिन करै तलवार ॥ धूरी हथिनी के हौदा ते राजा कनउज का सरदार ६७ हनि हनि मारै रजपूतन का अद्भुत युद्ध करै त्यहिबार ॥ कोगतिवरणै तहँ धाँधू कै हाथी उपर जवान असवार ६८ करि खलभल्ला औ हल्लाअति दूनों हाथ करै तलवार ॥ लड़ै इकल्ला यहू लल्लाअति ठाकुर उदयसिंह सरदार ६६ बड़ी लड़ाई त्यहि समया भै चन्दन खम्भा के मैदान ॥ ना मुह फेरैं कनउज वाले ना ई दिल्ली के चौहान ७०

८ आल्हखण्ड । ६०२ फिरि फिरि मारैं औ ललकारैं दोऊ बड़े लड़ैता ज्वान ॥ ऊंचे खाले कायर भागे छोड़िकै समर भूमि मैदान ७१ शूर सिपाही ईजति वाले आली खानदान के ज्वान ॥ बढ़ि बढ़ि मारैं तलवारी सों अपने धरे गदोरी प्रान ७२ आदि भयङ्कर को चढ़वैया यहु महराज पिथौराराय ॥ चौड़ा धाँधू को ललकारा चन्दन तुरत लेउ उल्टाय ७३ जान न पावैं मोहवे वाले सबकी कटा देउ करवाय ॥ सुनिकै बातें महाराजा की बोला तहाँ बनाफरराय ७४ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है ओ महराज बीर चौहान ॥ जैसे नौकर चन्देले के तैसे आप करो परमान ७५ नहीं बरोबरि कोउ तुम्हरे है ज्यहिपर आप चढ़े महराज ॥ बेला बेला दुहुँ तरफाते ज्यहिते भये दुःखके साज ७६ हमें पठायो है बेलाने चन्दन लेन हेतु महराज ॥ पहिले बगिया को कटवायो पाछे कीन भयङ्कर काज ७७ सची होई चंदेले सँग राखी दुहूँ कुल न की लाज ॥ हम समुझावा भल बेला को की तुम करो मोहोबे राज ७८ अनरथ भायो मन बेला के खम्भन हेतु दीन पठशाय ॥ ना चढ़िआये जयचँद राजा ना चढ़िये चँदेलेराय ७६ तुम्हें मुनासिब अब याही है राजन कूच देउ करवाय ॥ इतना सुनिकै महाराजा तहँ हाथी तुरत लीन लौटाय ८० भाग्यो लश्कर फिरि पिरथी का सबदलतितिर बितिर है जाय ॥ लादि कै खम्भा तहँ छकरन में लाखनि कूचदीनकरवाय ८१ पार उतरि कै श्री यमुना के तम्बुन फेरि पहुंचे आय ॥ खेतलूटिगा दिननायक सों झंडागड़ा निशाकोआय ८२

चन्दनखम्भाकामदान । १९०२ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुंशी सुत जीवो प्रागनारायणभाय ८३ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललितेके तबलों तुम यशसों रहौ सदाभरपूर ८४ माथ नवावों पितु माता को जिन बल पूरिसई यह गाथ ॥ तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धु हौ स्वामी रामचन्द्र रघुनाथ ८५ माथ तुम्हारो है दुनिया मा दूसर नहीं हमारो नाथ ॥ सत्य शपथ यह धर्म कर्म की स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ ८६ सुमिरि भवानी शिवशंकर को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥ राम रमामिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त ८७ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण- जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृतचन्दनखम्भयुद्ध वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ चन्दनखम्भाकामैदान समाप्त ॥ इति ॥

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॥ श्री गणेशाय नमः ॥ अथ आल्हखण्ड ॥ बेलाकेसतीहोनेकेसमयकायुद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ भक्तन हेतु सबयं तनुधारि सदा बिपदा सुरसाधुहरी । हिरणाकश्यप दुःख दियउ तब रूपकियो नरसिंह हरी ॥ प्रह्लाद विभीषण औ हनुमान महानन में इन रेखपरी । अँवरीष औ अंगद की समता ललिते जगमें अब कौनकरी १ सुमिरन ॥ तुम्हैं विनायक मैं सुमिरत हौं गणपति गणाध्यक्ष महराज ॥ बिघन हरण लम्बोदर स्वामी पूरणकरो हमारे काज १ हे जगतारण भवभय हारण स्वामी एकदन्त महराज ॥ विपति विदारण सब सुखकारण राखनहार जगतमें लाज २ तुमहीं ब्रह्मा औ विष्णु हौ तुमहीं शम्भु सुरासुर काल ॥ तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धु हौ स्वामी शिवाशम्भु के बाल ३

२ आल्हखण्ड । ६०६ तुम्हैं मनावैं औ ध्यावैं हम गावैं सदा तुम्हारी गाथ ॥ यह वरपावैं गणनायक जी दर्शन देयँ मोहिं रघुनाथ ४ छूटि सुमिरनी गणनायक कै शाका सुनो शूरमन केर ॥ सत्ती होई बेला रानी ठानी युद्ध पिथौरा फेर ५ अथ कथाप्रसंग ॥ खम्भ आयगे जब चन्दन के बेला करनलागि अनुमान ॥ मोहवा दिल्ली के डाँड़े पर हमरो होय सती अस्थान १ यहै विचारत मन धारत सो आरत हृदय भई अधिकाय ॥ तबलों लाखनि को सँग लैकै आये तहाँ बनाफरराय २ बेला बोली तब ऊदन ते मानो साँच लहुरवाभाय ॥ मोहवा दिल्ली के डाँड़े पर हमरो सरादेउ रचवाय ३ इतना सुनिकै ऊदनठाकुर चन्दन तहाँ दीनपहुँचाय ॥ चारि चहद्दी के डाँड़े पर बेला सरादीन रचवाय ४ कनउज मोहवे की फौजें सब ऊदनतुरत लीन सजवाय ॥ सरा रचायो जहँ बेला का सबदल दीन्ह्यों तहाँ टिकाय ५ जितनी रैयति परिमालिक कै देखन हेतु गई सब आय ॥ बेलारानी त्यहि औसर मा भूषण वसन सजे अधिकाय ६ को गति वरणै तहँ बेला कै षोड़श पूरकीन शृंगार ॥ लाश संगलै चन्देले की सरपर गई सती त्यहिबार ७ गाहरिकारा ह्याँ दिल्ली मा राजै खबरि जनाई जाय ॥ खबरि पायकै पृथीराज ने अपनी फौज लीन सजवाय ८ को गति वरणै त्यहि समया कै मानो इन्द्र अखाड़े जाय ॥ आदिभयङ्कर के ऊपर चढ़ि मनमें शम्भु शिवापद ध्याय ९ चाँड़ा धाँधू वीर भुगन्ता लैकै कूच दीन करवाय ॥

बेलासती अन्तमैदान । ६०७ ३ भारी लश्कर महराजाका गर्जत चला समरको जाय १० थोड़े अरसा मा महराजा आये सरापास नगच्याय ॥ बाजै बाजा ह्याँ सती के हाहाकार शब्दगा छाय ११ बोला पिथौरा हाथी परते ओ महराज कनौजीराय ॥ बंश चँदेले के जो होवै सो सर देवै आगि लगाय १२ जायँ नगीचे नहिं ऊदन अब हैं अकुलीन बनाफरराय ॥ सुनिकै बातें पृथीराज की बोला तुरत लहुरवाभाय १३ हमै आज्ञा है बेला कै की सरदेवो आगिलगाय ॥ इतना कहिकै उदयसिंह ने दीन्ह्यो चितातुरतदँदकाय १४ यह गति दीख्यो पृथीराजने तुरतै हुक्म दीन फरमाय ॥ जान न पावैं मोहेबे वाले सब के देवो मूंड़ गिराय १५ हुकुम पायकै पृथीराज का चौंड़ा धाँधू उठे रिसाय ॥ बीर भुगन्ता गर्जन लाग्यो मारन लाग तड़ाका धाय १६ सय्यद देवा ऊदन ठाकुर इनहुन खैंचिलीन तलवार ॥ को गति वरणै त्यहि समया कै लागी होन भड़ामड़मार १७ हौदा हौदा यकमिल ह्वैगे घोड़न भिड़ी रानमें रान ॥ पहिया रथ के रथमा भिड़िगे तीरन भिड़िगे तीर्रकमान १८ मर मर मर मर ढालैं बोलैं खन खन तूण बाण चिल्लायँ ॥ सन् सन् सन् सन् गोली बरसें कायर भागैं समर पराय १६ घम् घम् घम् घम् बजैं नगारा मारा मारा परै सुनाय ॥ झलझलझलझलझीलम झलकैं नीलम रंग परै दिखराय २० चम् चम् चम् चम् तेगा चमकैं दमकैं छुरी कटारी भाय ॥ कोगति वरणै त्यहि समया कै अद्भुत समर कहानाजाय २१ फिरैं भुशुण्डा बिन मुण्डा के रुण्डा करैं खूब तलवार ॥

४ आल्हखण्ड । ६०८ मुण्डन केरे मुड़ धौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार २० मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ॥ कायर भागे समर भूमि ते अपने डारि डारि हथियार २३ भूरा सय्यद का मुर्चा भा दूनों लड़न लागि सरदार ॥ दूनों मारैं तलवारी सों दूनों लेयँ ढाल पर वार २४ उसरिन उसरिन दूनों खेलैं जैसे कुवाँ भरै पनिहारि ॥ वार चूकिया भूरा जबहीं सय्यद हना तुरत तलवारि २५ मूड़ बिसानी सो भूरा के तुरतै गिरा भरहराखाय ॥ भूरा जूझयो जब खेतन में आयो तुरत भुगन्ता धाय २६ सो ललकारयो फिरि सय्यदको अब रण सावधान है जाय ॥ धोखे भूरा के भूल्यो ना अबहीं यमपुर देउँ दिखाय २७ इतना कहिकै वीर भुगन्ता तुरतै लीन्ह्यो तीर चढ़ाय ॥ खैंचि कमानिया ते मारत भा सय्यद लैगे वार बचाय २८ घोड़ बढ़ायो फिरि सय्यद ने लैकै गुर्ज पहुंच्यो जाय ॥ वीर भुगन्ता को ललकारा क्षत्री खबरदार है जाय २६ वार हमारी ते बचि है ना दोजख अबै देउँ पहुँचाय ॥ इतना कहिकै क्रोधिन हैकै सय्यद मारयो गुर्ज घुमाय ३० वार बचाई वीर भुगन्ता फिरित्यहिखैंचिली न तलवार ॥ ऐँचि कै मारा वीर भुगन्ता जूझयो बनरस का सरदार ३१ सय्यद जूझयो जब मुर्चा में तब चढ़ि अयो कनौजीराय ॥ गंगा ठाकुर तिन पाछे करि आगे गयो तड़ाकाधाय ३२ वीर भुगन्ता औ गंगा का परिगासमर बरोबरि आय ॥ लखै पिथौरा औ कनौजिया अद्भुतसमर कहा ना जाय ३३ आदिभयङ्कर पर पिरथी है लाखनि भूरी पर असवार ॥

बेलासतीअन्त मैदान। ६०६ ५ तेहा राखे रजपूती का कीन्हे जंग केर श्रृंगार ३४ भाला बरछी दूनों लीन्हे दूनों लिये ढाल तलवार ॥ पाग बैजनी शिरपर धारे कनउज दिल्ही के सरदार ३५ कलँगी सोहैं दोउ पगियन में दोउन हीरा करैं बहार ॥ रूप उजागर सबगुण आगर कनउज दिल्हीके सरदार ३६ तेहेदारी की समता है समता राज काज ब्यवहार ॥ समता वय में नहिं लाखनिकी थोरी उमर केर सरदार ३७ गंगा मामा कुड़हरिवाले तिनते कहा तहाँ ललकार ॥ मारो मारो अब जल्दीते मामा काह लगाई बार ३८ इतना सुनिकै गंगा ठाकुर अपनी खैंचि लीन तलवार ॥ बीरभुगन्ता तब मारत भा गंगा लीन ढालपरवार ३६ ऐंचि सिरोही गंगामारा तुरतै दीन्ह्यो मूड गिराय ॥ वीरभुगन्ता के जूझतखन धाँधू गयो तड़ाकाआय ४० धाँधू गंगा का मुर्चाभा अद्भुत समर कहा ना जाय ॥ दूनों मारैं तलवारी से दूनों लेवैं वार बचाय ४१ कोऊ काहू ते कमती ना दोउ रण परा बरोबरिआय ॥ वार चूकिगे गंगा ठाकुर धाँधू मारा गुर्ज घुमाय ४२ परिगै मस्तक सो गंगा के तुरतै गिरा भरहरा खाय ॥ गिरिगे गंगा जब हाथी पर तुरतै अटा कनौजीराय ४३ लाखनि धाँधू का मुर्चा भा दोऊ लड़न लागिसरदार ॥ दोऊ मारैं तलवारी सों दोऊ लेयँ ढाल पर वार ४४ कोऊ काहू ते कमती ना दोऊ करैं भड़ाभड़ मार ॥ भौंरानँद पर धाँधू ठाकुर लाखनि भूरी पर असवार ४५ दोउ हौदा यकमिल हैगे दोऊ करैं समर ललकार ॥ ११

६ आल्हखण्ड । ६१० छुरी कटारी भाला बरछी होवै कड़ाबीन की मार ४६ तीर तमंचा गुर्ज चलावैं दोऊ समर शूर त्यहि बार ॥ वार चूकिगे धाँधू ठाकुर मारा कनउज के सरदार ४७ धाँधू जूझ्यो जब मुर्चा में आयो तुरत पिथौगराय ॥ आदिभयङ्करज्यहि दिशिदावै त्यहिदिशिहटतफौजसब जाय ४८ को गति बरणै पृथीराज की नाहर समरथनी चौहान ॥ ज्यहि दिशि दाबै समर भूमिमें त्यहिदिशिहोतजात मैदान ४६ सुफना बोल्यो हाँ लाखनि ते ओ महराज कनौजीराय ॥ आदिभयङ्कर दाबे आवै यहु महराज पिथौराराय ५० कोऊ सहायक अब तुम्हरो ना स्वामी आप एक यहिकाल ॥ इत उत फिरिकै चहुँदिशि देखा नहिंकोउदेखिपरै महिपाल ५१ करै आतमा की रक्षा नर धन औ स्त्री संग बिहाय ॥ धन सों स्त्री की रक्षा कर यह मर्याद नीति की आय ५२ त्यहिते तुमका समुझाइत है ओ महराज कनौजीराय ॥ इतना सुनिकै लाखनि बोले सुफना काह गये बौराय ५३ कहा न माना चंदेलेका हटका मातु हमारी आय ॥ अब नहिं भागैं हम मुर्चा ते चहु तन धजी २ उड़िजाय ५४ रही न देही रामचन्द्र कै रहिनहिं गये कृष्ण महराज ॥ यशै इकेलै बाकी रहिगा सो कस तजैं समरमें लाज ५५ रही न देही क्यहु मानुष की सबजग नाशवान दिखलाय ॥ त्यहिते हाथी जहँ पिरथी का सुफना चलौ तहाँपर धाय ५६ प्राण निछावरि रण करि देबे तौ यशरही जगत में छाय ॥ जो अब भागैं समर भूमि ते कायर कहैं लोक सबगाय ५७ सुनिकै बातें लखराना की सुफना हाथी दीन बढ़ाय ॥

[Header] बेलासती अन्त मैदान । ६११ ७

आवत देख्यो लखराना को बोल्यो तुरत पिथौराराय ५८ आवो आवो लाखनिराना हमरे संग मिलौ तुम आय ॥ हमरी सरवरि को तुमहीं हौ ओ महराज कनौजीराय ५६ नीच बनाफर उदयसिंह है तासँग काहगयो बौराय ॥ सोलह रानिन के इकलौता नाहक प्राण गँवायो आय ६० अबै मामिला कछु बिगरा ना मानो कही कनौजीराय ॥ हमै सोच है इक कनउज का की निर्वंश राज है जाय ६१ बृद्ध चँदेले जयचँदराजा मानो कही कनौजीराय ॥ सात पुत्र रण खेतन जूझे हमखोवंश नाश भय आय ६२ अस नहिं चाहें जस हम हैंगे मानो कही कनौजीराय ॥ उमिरि तुम्हारी अतियोरी है कच्ची बुद्धि गयो बौराय ६३ दोष हमारो सब कोउ दैहें बालक हना पिथौराराय ॥ त्यहिते तुमका समुझाइत है कच्ची बुद्धि कनौजीराय ६४ हमरी तुम्हरी कछु अटनस ना जो रण प्राण गँवावो आय ॥ काह बिगारा हम जयचँद का कच्ची बुद्धि कनौजीराय ६५ सुखनहिंदेख्यो कछु दुनियाका नाहक प्राण गँवावो आय ॥ अब नहिंकैहैं कछुलाखनिहम कच्ची बुद्धि कनौजीराय ६६ ताहर नाहर की समता हौ कच्ची बुद्धि गयो बौराय ॥ जो नहिं आवो हमरे दल में तौ अब कूच जाउकरवाय ६७ पारस पैहौ जो दल ऐहौ कनउज गये प्राण रहिजायँ ॥ इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो कही पिथौराराय ६८ तुम्हरी बातें सब साँची हैं सो हम जानि दीन विमराय ॥ पै अब बदला संयोगिनि का लेबे समर भूमि में आय ६६ यामें संशय कछु नाहीं है मानो साँच पिथौराराय ॥

८ आल्हखण्ड । ६१२ घर घर दिल्ली को लुटवैबै तब छाती का डाह बुताय ७० इतना कहिकै लाखनिराना तुरतै लीन्यो तीर उठाय ॥ खैंचि कमनियांते छाँड़त भे गौरा पारवती को ध्याय ७१ आवत दीख्यो शर लाखनिको राजा काटि तड़ाका दीन ॥ बड़े क्रोधसों पृथ्वीराजा दूसर बाण हाथमें लीन ७२ शर संधान्यो बड़े वेगसों मार्यो तुरत पिथौराराय ॥ खण्डन कीन्ह्यो त्यहि लखराना आपो मार्यो तीर चलाय ७३ ताहि पिथौरा खण्डन करिकै यकइस मारे बाण रिसाय ॥ तिनको खण्डन लाखनिकीन्ह्यो राजा गये मनै शर्माय ७४ यहु महराजा कनउज वाला आला वंश चंदेलाराय ॥ धेला एको ज्यहि डर नाहीं हाथिन हेला दीन गिराय ७५ बड़ बड़ मेला रजपूतन के रणमा लाखनि दीन हटाय ॥ फूल चमेला औ बेला जस तस अलबेला कनौजीराय ७६ उठै सुगंधै जस बेला में तस यशगयो जगतमें छाय ॥ बाण लागि गा लखराना के हौदा उपर गये मुरझाय ७७ जूझि कनौजी गे खेतन में सुमिरिकै मित्र बनाफरराय ॥ कड़कै धड़कै औ फड़कै अति मेचा आसमान थहराय ७८ प्रलयकाल की बेला आई जब मरिगये कनौजीराय ॥ ऐसे अशकुन के देखत खन ऊदन गये सनाकाखाय ७६ चित्त न लागै कछु मुर्चा में व्याकुल सुमिरि कनौजीराय॥ यहां चौंडिया धरि धरि धमकै ऊदन लेवैं वार बचाय ८० हाथ चौंड़िया पर छाँड़ै ना ब्याकुल चित्त रहे अकुलाय ॥ तहिले धावन इक चौंड़ाते लाखनि हाल बतावाआय ८१ सुना बनाफर उदयसिंह यह की मरिगये कनौजीराय ॥

बेलासती अन्त मैदान । ६१३ ऊदन बोले तब चौंड़ा ते मानो कही चौंड़ियाराय ८२ मरिगे लाखनि जो मोर्चा में तौ नहिं जियैं बनाफरराय ॥ बिना इकेले लखराना के मरिहैं कौन साथक्यहि आय ८३ मित्र कनौजी अस मरिगे जब जीहै कौन समर तब भाय ॥ मारु चौंड़िया अब जल्दी सों हमरो शोक मोख मिटिजाय ८४ इतना कहिकै उदयसिंह ने तुरतैं खैंचिलीन तलवार ॥ ऐंड़ लगावा रसबेंदुल के हौदा उपर गयो त्यहिवार ८५ काटि महावत औ हाथी को आपन शीश दीन पकराय ॥ काटि शीश तब चौंड़ा लीन्ह्यो औ धड़ गिरा धरणिमें आय ८६ ऊदन देवा जगनायक जी सब कोउ मरे समर में आय ॥ चौंड़ा पिरथी आल्हा इन्द्दल रहिगे शेष चारि ये भाय ८७ ऊदन जूझे समरभूमि में आल्हा चले तड़ाका धाय ॥ देवी शारदा का वरदानी अम्मर कहै लोक सब गाय ८८ सुना बनाफर जब कानन ते की मरिगये लहुरवा भाय ॥ पकरि बनाफर तब चौंड़ा को मर्दन कीन देह में लाय ८६ मींजि माँजिकै त्यहि चौंड़ाको आगे हाथी दीन बढ़ाय ॥ आदिभयङ्कर जहँ ठाढ़ो थो आल्हा तहाँ पहूंचे जाय ६० पकरिकै बाहू तहँ पिरथी की आल्हा बाँधिलीनत्यहिठायँ ॥ नील डरायो नृप आँखिन में बंधन तुरत दीन छुड़वाय ६१ खबरि मोहोबे औ दिल्ली गै की रण बचे तीन जन भाय ॥ आल्हा इन्द्दल पिरथी राजा और न चौथकउदिखलाय ६२ सुनवाँ फुलवा द्यावलि माता सुनतै चलीं तड़ाकाधाय ॥ सुनवाँ बोली समर भूमि में आल्हा डार्यो बन्धु मराय ६३ आल्हा मुखते सुनि सुनवाँ के मनमा ठीक लीन ठहराय ॥

१० आल्हखण्ड । ६१४ धर्म न रहै क्यहु कलियुगमा सब बिन धर्म जगतह्वैजाय ६४ यहै सोचिकै आल्हा ठाकुर इन्दल बोले बचन सुनाय ॥ माता तुम्हरी नाम हमारो लीन्ह्यो सुनो बनाफरराय ६५ दुर्गति होई अब कलियुग मा ताते देयँ पूत बतलाय ॥ करो तयारी बन कजरी की अपनो मया मोह बिसराय ६६ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर हाथी चढ़े तड़ाका धाय ॥ इन्दल बैठे फिरि घोड़े पर साथै कूच दीन करवाय ६७ इन्दल इन्दल कै गुहरायो सुनवाँ चली पछारी धाय ॥ पूँछ पकरिकै पचशब्दा कै सुनवाँ गजैघसीटतिजाय ६८ ऐंचि खड्ग को आल्हा ठाकुर तुरतै दीन्ह्यो पूँछ गिराय ॥ बिना पूँछ का पचशब्दा फिरि कजरी बनै पहूँचा जाय ६६ रही न आशा क्यहु जीवनकी सबहिन दीन्ही देहजराय ॥ प्राण आपने नारी तजि कै सुरपुर गईं तड़ाका धाय १०० सुनवाँ फुलवा चित्तररेखा व्यावुलिसहित मरींसबआय ॥ मोहबा दिल्ली दुउ शहरन में राँड़न झुंडभये अधिकाय १०१ छाय उदासी गै दोऊ दिशि बिपदा कही बूत ना जाय ॥ रानी मल्हना मोहबे वाली मनमासोचिसोचिरहिजाय १०२ तुम्हें विधाता अस चाही ना जैसी बिपति दीन अधिकाय ॥ दुःखित ह्वैकै महरानी फिरि पारस पत्थर लीन उठाय १०३ जाय सिरायो सो सागर में चन्दन अक्षत फूल चढ़ाय ॥ धूप दीप औ कीन आरती मेवा मिश्री भोग लगाय १०४ हवन ब्राह्मण को भोजन दै बोली हाथ जोरि शिरनाय ॥ जो कोउ राजा हो मोहवे में पारस रह्यो तासु घरआय १०५ इतना कहिकै रानी मल्हना महलन फेरि पहूँची आय ॥