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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १७ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४९९


सत्युनेर्वचनं श्रुत्वा कुशस्तं प्राह वै पुनः । लवस्य जीवनोपायं वद मह्यं भो मुने ॥३८॥
कुशस्य वचनं श्रुत्वाऽगस्तिस्तं प्राह सादरम् । विमूर्च्छितो यदा पूर्वं भरतः पथि पार्थिवैः ॥३९॥
मूर्च्छितः पतितश्चास्ति रणे रिपुशरैर्हतः मुद्गलाश्रमतः कल्याणदायिन्यो लताः शुभावहाः ॥४०॥
सौमित्रिणा तदाऽऽय त्वं मुद्गलाश्रमतः पुनः । महौषधी समानीय जीवयैनं लवं जवात् ॥४१॥
अथवा त्वं हनूमंतं प्रेषयस्वाश्रमं मुनेः । एवं यावच्च स मुनिः कथयामास तं कुशम् ॥४२॥
राघवप्लवगश्चन श्रुत्वा मुनेर्माहातिना क्षणात् । ममानीयाश्रमाच्छीघ्रंमुद्गलस्य तपोनिधेः ॥४३॥
ताभिस्तं जीवयामास लवं सैन्यसमन्वितम् ।

विष्णुदास उवाच
गुरो ऽस्यैव च मुनेर्मुद्गलस्याश्रमे कथम् ॥४४॥
मृतसंजीवनीवन्त्यादिका सन्त्योऽत्र निमंताः । कथ ना हि समीपस्था विस्मृत्य द्रोणपर्वतम् ॥४५॥
प्रेषितोऽञ्जनिपुत्रः स तेन जांबवता पुरा । अमुं मे संशयं छिंधि कृपां कृत्वा मुनीश्वर ॥४६॥

श्रीरामदास उवाच
यदा मातृविमोक्षार्थममृतस्य खगाधिपः । कलशं स्वमुखे धृत्वा नाकलोकान्समानयत् ॥४७॥
तदा तत्कलशाद्वेगाद्विंदुस्तत्रापतद्भुवि । तद्देशोमुद्गलस्यापि मुनेस्तपःप्रभावतः ॥४८॥
आसन् वल्ल्यश्च तस्यैव चाश्रमे हि द्विजोत्तम । नैना वेद शुभा कश्चिर्जीवदान्स वनेचरः ॥४९॥
द्रोणाचल स्ततस्तेन प्रेषितो वायूनन्दनः । इति त्वया यथा पृष्टं तथा ते विनिवेदितम् ॥५०॥
इदानीं शृणु शिष्य त्वं शुभा तां प्राक्तनीं कथाम् । ततो लवादिकाः सर्वे ययुस्ते स्वपुरीं मुदा ॥५१॥
नत्वा मुनिं च रामादींस्तत्पुः श्रीराघवाग्रतः । तता महोत्सवश्चासीत्पुर्यां तल्लवदर्शनात् ॥५२॥
ततो दृष्ट्वा लवं रामो जीवितं वायुजेन हि । समालिंग्य रढं प्रेम्णा परं तोषमवाप सः ॥५३॥


दिया और रामने इस आज तुम्हे दिया है ॥ ३७ ॥ मुनिकी बात सुनकर कुशने कहा अब हमें कोई ऐसा उपाय बतलाइए, जिससे लव जीवित हो जाय । ३८ ॥ वह इस समय शत्रुओंके अस्त्रोंसे घायल होकर रणभूमिम पड़ा हुआ है। कुशकी प्रार्थना सुनकर अगस्त्यने कहा—उस समय जब कि जनकपुरके मार्गमे राजाओंने भरत-को मूर्छित कर दिया था, तब मुद्गल ऋषिके आश्रमसे कल्याणदायिनी लताएं लक्ष्मण द्वारा लायी थी उसी प्रकार आज तुम मुद्गलके आश्रमसे वह लता लाकर लवको जी वित कर लो ॥ ३९-४१॥ अथवा हनुमानजीको भेज दो। ये ही वह लता ले आयगे । मुनिकी बात सुनते ही हनुमान्जी चल पड़े और थाड़ा ही दूरपर मुद्गल-ऋषिके आश्रमसे रह लता लाकर रख दी और उन्ही लताओंसे कुशने क्षणमात्रम सेना समत लवको जीवित कर लिया। इतनी कथा सुनकर विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! ये मृतसञ्जीवनी लताएं मुद्गल ऋषिके आश्रमपर आकर कैसे उग गयीं। फिर जब वे इतना समीप थी, तब लक्ष्मणकी मूर्छाके समय जाम्बवान्ने हनुमान्जीको द्रोणाचलपर क्यो भेजा—हे मुनीश्वर ! मेरे ऊपर कृपा करके मेरी इस शंकाका समाधान कीजिये ॥ ४२-४६ ॥ श्रीरामदासने कहा—जिस समय अपनी माताको छुड़ानेके लिए गरुड स्वर्गसे ओषम अमृतकलश लेकर चले तो मुद्गल ऋषिके आश्रमपर जाते ही कलशमस अमृतक एक बूंद यहाँ गिर पड़ी। इसीलिए और ऋषिके तपाबलसे उसी स्थानपर वे मृतसञ्जीवनी बल्लरियां उग गयीं। वनचर जाम्बवान् इस स्थानकी लताओंको जानते ही नहीं थे। यही कारण हनुमान्जीका द्रोणाचलपर भेजा या । ४७ ॥ ५० । जैसा तुमने प्रश्न किया, मैंने उसका उत्तर दे दिया। अच्छा, अब अपनी पुराना कथापर आ जाओ—उसे सावधान मनसे सुनो। उस औषधिसे जीवित लव आदि वीर लौटकर सहर्ष अपनी अयोध्यापुरीमे आ गये ॥ ४१-५१ ॥ रामकी सभामें पहुँचकर लव आदिने वसिष्ठजीको प्रणाम किया और रामके सामने बैठ गये । लवको देखने से उस रोज पुरीभरमें बड़ा उत्साह था। जब रामने देखा कि हनुमान्जीके पुरुषार्थसे लघ जीवित होकर

५०० आनन्दरामायणे [सर्गः १७

ततो रामो वायुजाय कङ्कणे रत्नमण्डिते। ददौ परमसंतुष्टस्ताभ्यां स शुशुभे कपिः ॥५४॥ ततो लवाय श्रीरामस्तत्परं कङ्कणं वरम्। ददावगस्त्यिना दत्तं पूर्वं यद्रत्नमण्डितम् ॥५५॥ लवस्तेनातिशुशुभे रत्नकङ्कणमण्डितः। लवस्तदा मुनिं प्राह नत्वा तं कुम्भसम्भवम् ॥५६॥ त्वया लब्धं कुतश्चेदं कङ्कणं वद मे मुने। ततस्तद्वचनं श्रुत्वाऽगस्तिः प्राह लवं मुदा ॥५७॥ एकदा दण्डकारण्येडहं स्नातुं हि गतः सरः। तस्मिन्स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा तत्र स्थितः क्षणम् ॥५८॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र खात्स्वर्गी समुपागतः। दिव्यं विमानमारूढः शतस्त्रीपरिवेष्टितः ॥५९॥ दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धादिचर्चितः। स स्वर्गी खात्समायातो यावत्तावत्सरोवरम् ॥६०॥ शवं विनिर्गतं श्रेष्ठं स्फीतं हि मर्यकण्ड्। दुर्गन्धसहितं दुष्टं प्राप्तं तत्परमप्लवम् ॥६१॥ अवरुह्य विमानाच्चाप्य स्वर्गी तच्छवं ययौ। छित्त्वा तच्छवमांसं वै भक्षयामास सादरम् ॥६२॥ ततः पीत्वा जलं स्वर्गी विमानं चारुरोह सः। निमग्नं तच्छवं चापि पुनस्तस्मिन्सरोवरे ॥६३॥ स्वर्गेण गन्तुकामं स दृष्ट्वाहं चातिविस्मितः। अब्रुवं मधुरं वाक्यं रे रे दिव्यस्वरूपधृक् ॥६४॥ क्षणं तिष्ठोत्तरं देहि कौतुकं मे मवेक्षितम्। ईदृशस्ते शवाहारः कथं स्वर्गीनवामिनः ॥६५॥ इति मद्वचनं श्रुत्वा स स्वर्गी प्राह मां तदा। सम्यक् पृष्टं त्वया ब्रह्मन् शृणु सर्व मयोच्यते ॥६६॥ सुदेवाख्यो हि वैदर्भो नृपोऽभूत्प्रवरोऽभवम्। तत्पुत्रौ श्वेतसुरथौ श्वेतोऽहं पार्थिवोऽभवम् ॥६७॥ नैव दानं मया तस्मिन् जन्मन्पत्र कृतं कदा। स्वीयराज्यमदोन्मत्तः पापकर्मरतः सदा ॥६८॥ ततोऽपुत्री त्वहं राज्ये कृत्वा तं सुरथानुजम्। वार्धके तु वनं प्राप्तस्तपस्तीव्रं समाचरम् ॥६९॥ एकदा स्नातुमुद्युक्तो निमग्नोऽहं सरोवरे। ततो मृतो दिवं प्राप्तस्त्वहं स्वीयतपोबलात् ॥७०॥

सामने बैठे हैं तो प्रेमपूर्वक वाल्मीकिको छातीसे लगा लिया और बड़े प्रसन्न हुए ॥ ५२॥ ५३॥ इसके बाद रामने हनुमान्जीको रत्नोंसे खचित दो कङ्कण दिये। जिन्हें पहनकर हनुमान्जी बहुत सुन्दर दीखने लगे। फिर रामजीने एक दूसरा कंकण जिसे अगस्त्यजीने दिया था, वह लवको दे दिया। उस बहुमूल्य कंकणको पहि- नकर लव भी अतिशय शोभायमान हुए। तब लवने अगस्त्यजी का प्रणाम करके कहा- ॥ ५४-५६ ॥ हे मुनिराज ! यह कंकण आपको कहाँ मिला था ? सो हम बतलाइये। इस प्रकार लवका प्रश्न सुनकर अगस्त्य परम प्रसन्नतापूर्वक कहने लगे ॥ ५७ ॥ एक बार मैं दण्डकारण्यमें एक सरोवरपर स्नान करने गया। वहाँ स्नान-नित्यकर्म आदि कर तीर्थपर थोड़ी देरके लिए बैठ गया ॥ ५८ ॥ इसी बीच आकाशमार्गसे एक स्व- र्गीय प्राणी सैकड़ों स्त्रियोंसे घिरा हुआ दिव्य विमानपर आरूढ़ होकर वहीं आया ॥ ५९ ॥ वह दिव्य माल्य आदि धारण किये हुए दिव्य गन्धसे चर्चित था। उस स्वर्गकि आते ही सरोवरसे एक भयानक दूषित तथा दुर्गन्धपूर्ण शव निकलकर तटपर आ लगा ॥ ६० ॥ ६१ ॥ इसके अनन्तर वह स्वर्गीय प्राणी अपने विमानमें उतरकर उस शवके पास पहुँचा और उसके मांसको उसने बड़े प्रेमसे खाया। फिर जल पिया और अपने विमानपर जा बैठा। उधर शव फिर डूब गया। उस गमनोन्मुख स्वर्गीके पास पहुंचकर मैंने उससे कहा- हे दिव्यस्वरूपधारिन् ! थोड़ी देरके लिए रुककर मेरी बातोंका उत्तर देते जाओ। तुम्हारे इस कार्यको देखकर मुझे बड़ा कौतूहल हुआ है। अच्छा हमें यह बताओ कि इस प्रकार स्वर्गीय प्राणी होकर भी तुम मुर्दा क्यों खाते हो ? ॥ ६२-६५ ॥ मेरा बात सुनकर उसने उत्तर दिया हे ब्रह्मन् ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। सुनो, मैं सब बतलाता हूँ पूर्वसमयमें विदर्भ देशके अधिपति सुदेव नामके एक राजा थे। उनके श्वेत और सुरथ नामके दो पुत्र थे। जिनमें श्वेत मैं था और राज्य भी मेरे ही हाथोंमें था ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ उस समयमें राज्यमदसे मत्त होकर मैंने कोई दान नहीं किया। हमेशा पापकर्ममें रत रहा ॥ ६८ ॥ मेरे कोई सन्तति नहीं थी। इसलिए वृद्धावस्थामें अपने छोटे भाई सुरथको मैंने राज्यासनपर बिठा दिया और जंगलमें जाकर कठोर तपस्या करने लगा। एक बार स्नान करनेके लिए एक सरोवरमें डूबने लगातो सो वहीं डूबकर मर गया। मरनेके बाद अपनी तपस्याके प्रभावसे मैं स्वर्गलोकमें पहुँचा। तपस्याके फलस्वरूप वहां

सर्गः १७ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५०१

सर्गः १७ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५०१

तपसश्च फलैस्तत्र ममासन्सर्वसंपदः अदृष्ट्वा भक्षितुं किंचिन्मया पृष्टः सुरेश्वरः । ७१॥
वर्तन्ते विविधास्तत्र मम भोगाः सुदुर्लभाः । कथं नास्तीहभक्ष्यार्थं कथं मेऽत्र सुखं भवेत् ॥७२॥
इति मद्वचनं श्रुत्वा मामिंद्रः प्राह सस्मितः । नैव दानं त्वया भूमौ कृतं राज्यमदेन हि ॥७३॥
अदत्तं लभ्यते नैव नृप पुण्यैः कदेतरैः । अतस्त्वं प्रत्यहं गत्वा विमानेन सरोवरम् ॥७४॥
भक्षयस्व शवं पुष्टं मिष्टान्नौः पोषितं च यत् चिरकालं भवेत्तच्च क्षुध यास्यात नैव तत् ॥७५॥
इतींद्रवचनं श्रुत्वा स पृष्टश्च पुनर्मया दिव्यान्नानि कथंचाहमाप्नुयां तद्वदस्व माम् ॥७६॥
इति मद्वचनं श्रुत्वा सेंद्रैः प्राह मां पुनः अधुना दण्डकारण्यं वर्तते हीनमानुषम् ॥७७॥
विन्ध्यवृद्धिनिरोधार्थमगस्तिः सुरयाचितः यदा यास्यति पन्त्या वै मुक्त्वा काशीं हि दण्डकम्॥७८।
सरस्यस्मिंस्तदा स्नात्वा स्थितं पश्यसि तं मुनिम् । तदा तस्मै कंकणं स्वं देहि तोयैः परिप्लुतः ॥७९॥
तेन कंकणदानेन दिव्यान्नंः प्राप्स्यसे नृप । इतींद्रवचनं श्रुत्वा तदारभ्य चिरं मुने । ८०.।
अत्रागत्य शवाहारः क्रियते वै सदा मया एतावत्कालपर्यंतं नात्र कश्चिन्मयेक्षितः । ८१॥
मया दृष्टस्त्वमेवात्र वेद्मि त्वां कुम्भसंभवम् । अद्य त्वया तारितोऽहं दानं स्वीकुरु मे त्विदम् ॥८२॥

#### अगस्त्य उवाच
इत्थं स्वर्गी स मामुक्त्वा ददौ कंकणमुज्ज्वलम् मद्य सार्द्धं ततः स्वर्गं ययौ स्वर्गी मुदा युतः । ८३॥
तदारभ्य शवं तोयात्सद्विहस्तन्न ययौ कदा । दिव्यान्नानि तु संप्राप नाकलोके यथामुखम् ॥८४॥
इति यत्कंकणं लब्धं मया लव पुरा वने । अर्पितं राघवायेदं तेन तच्चापि तेऽर्पितम् ॥८५॥

#### श्रीरामदास उवाच
इत्यगस्त्यवचः श्रुत्वा लवः पप्रच्छ तं पुनः । किमर्थं दण्डकारण्यं तद्बभूव विजनं वद ॥८६॥

#### अगस्त्य उवाच
इक्ष्वाकुवंशसंभूतोऽभून्नृपो विन्ध्यदक्षिणे । नाम्ना दण्डकेति ख्यातः पापकर्मरतः सदा ॥८७॥

सब चीजें तो विद्यमान थीं, लेकिन खानेके लिए कुछ नहीं था। तब मैने इन्द्रसे कहा- हे देवेन्द्र ! यहाँ मेरे भोगनेके लिए तो और सब कुछ है, किन्तु खानेके लिए कुछ भी नहीं दीखता। बताइए, इस तरह मैं क्योंकर सुखी रह सकूँगा ॥ ६९-७२ ।। मेरा बातको सुनकर मुस्कराते हुए इन्द्र कहने लगे- तुमने राज्यमद वश पृथ्वीपर कोई दान नहीं किया था । बिना दिये कुछ भी नहीं मिलता। इसलिए तुम प्रतिदिन विमानसे जाकर उस मिष्टान्नसे परिपुष्ट अपने शरीरको खा जाया करा। वह बहुत दिनों तक नष्ट न होकर ज्योंका त्यों बना रहेगा ।। ७३-७५ ।। इस प्रकार इन्द्रकी बात सुनकर मैने कहा- यह बतलाइये कि मुझे स्वर्गीय अन्न किस तरह प्राप्त होगे ? मेरा बात सुनकर इन्द्रने उत्तर दिया कि अभी तो दण्डकारण्य मनुष्यविहीन है। जब विन्ध्य पर्वतकी वृद्धि रोकनेके लिए अगस्त्यजी देवताओंके प्रार्थना करनेपर काशी छोड़कर दण्डकारण्यको जायेंगे, तब तुम इसी सरोवरमें स्नान करके अपना कंकण उन ऋषिकों दे देना ।।७६-७९ ।। उस कंकणके दानसे तुम्हे स्वर्गीय अन्न मिलने लगेगा। अतएव इंद्रके आज्ञानुसार मै बहुत दिनोंसे आकर यह शव खाया करता हूँ। इतने दिन बीत गये, किन्तु यहाँ मुझ कोई नहीं दिखायी पड़ा ॥ ८० ॥ ८१ ॥ आज तुम्ही दीख रहे हो। इससे ज्ञात होता है कि तुम अगस्त्य ऋषि ही हो। आज तुमने मेरा उद्धार कर दिया। अब कृपा करके मेरे दानको स्वीकार करो ॥ ८२ ॥ अगस्त्यने कहा कि इस तरह कहकर उस स्वर्गीय प्राणीने अपने कंकण उतारकर हमें दे दिये और प्रसन्न मनसे विमानपर सवार होकर स्वर्गलोकको चला गया। तबसे वह शव उस सरोवरमें कभी नहीं उतराया और वह स्वर्गी स्वर्गलोकमें दिव्य अन्नोंको पाने लगा। हे लव ! मैने जिस कङ्कणको उस समय दण्डकारण्यमें पाया था, उसे रामको दिया और रामने आज आपको दे डाला है। श्रीरामदासने कहा- तब लवने अगस्त्यसे पूछा कि उस वनका दण्डक यह नाम क्यों पड़ा ? अगस्त्य कहने

५०१ ] आनन्दरामायणे [ सर्गः १७

एकदा स वनं यातो मृगयार्थं स्वसेनया । ततो दृष्ट्वा मृगं राजा मृगपृष्ठे ह्यद्रुदुवे ॥८८॥ एकाकी हयमारूढो देशान्देशान्तरं ययौ एवं हि गच्छतस्तस्य मृगोऽन्तर्धानमन्वगात् ।८९। ततः सोऽतितृषाक्रान्तः प्रययौ वै जलाशयम् । तत्र पीत्वा जलं स्वच्छं स राजा साममन्तके ॥९०॥ अज्ञात्वा स्वगुरोर्वेश्म भृगोराश्रममाययौ । तत्र तां वदतां सामग्न्यङ्कां भृगोः सुताम् ।९१। दृष्ट्वा चन्द्राननां राजा सोऽभूत्कामविमोहितः । ततस्तां प्रार्थयामास रम्यार्थे साऽब्रवीन्नृपम् ।९२। स्वत्रशा नून नैवाहं ताताधीनाऽस्मि साम्प्रतम् । बहिर्भूतोऽद्य गुरुरन्तस्त्वया वेद्योऽहं नृपम् ९३॥ यदि मामिच्छसि त्वं हि तर्हि तं स्वगुरुं भृगुम् । प्रार्थयित्वा मज सुखं मां पत्नीं त्वं विधाप च । ९४ । इत्युक्तोऽपि तया राजा दण्डस्तां कामपीडितः । भुक्त्वा सुखं बलादेव जगाम नगरीं निजाम् ॥९५। ततोऽरजस्का सा बाला दृष्ट्वा तातं समागतम् । श्रावन्ती सकलं वृत्तं श्रावयामास विह्वला ॥९६। तद्वृत्तं स मुनिः श्रुत्वाऽक्ष्णोः क्रुद्धो जलं कुधा । अब्रवीन्मत्सुतां बालां मां नयन् रक्तलोचनः ॥९७। दण्डेन सह दण्डस्य राज्यं वै शतयोजनम् । भस्मस्य भगवाद्दर्ष मद्वाक्याच्च समन्ततः ।९८॥ हीनोदकं तथा वास्तु तथा नष्टचरानरम् । इति तच्छापमाकर्ण्य तात सम्प्रार्थ्य बालिका ॥९९॥ प्रार्थयामास शापस्य सप्तावधिं विनयान्विता । ततो भृगुः सुतामाह यदा यास्यति कुंभजः ॥१००॥ मुनिः काश्यास्तूर्णं देशं तदाऽयं मजलो भवेत् । देशस्याऽस्य दासं हि करिष्यति मुनीश्वरः ॥१०१॥ अरण्यं दण्डकादीहि जातं तस्मान्तदा नराः । अमुं देशं वदिष्यन्ति दण्डकारण्यमेव हि ॥१०२॥ यदा भविष्यत्यग्रेऽत्र रामागमनमुत्तमम् । भविष्यन्ति तदाऽग्रेऽत्र नानाक्षेत्राणि दण्डके ॥१०३॥ रामप्रसादात् क्षेत्राणि भविष्यन्ति ततो जनाः । रामक्षेत्राभिधं सदा वदिष्यन्ति हि दण्डकम् ॥१०४॥ मुनिराप्रप्रसादाच्च देशोऽयं पुनःपुनः । भविष्यत्युत्तमं पुण्यंः सौख्यदश्च मनोरमः ॥१०५।

रुवे—इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न दण्डक नामका एक बड़ा भारी राजा था। वह सदा पापकर्मम रत रहा करता था ॥८१-८७॥ एक बार वह शिकार खेलनेके लिए अपनो सेनाके साथ वनमें गया। वहाँ एक मृगके पीछे राजाने अपना घोड़ा दौड़ाया। वह अकेला ही उस मृगके पीछे पीछे भागता हुआ देशान्तरमें आ पहुंचा और वहाँ वह मृग गायब हो गया। इसके बाद बहुत प्यासा वह राजा एक जलाशयके तटपर गया। वहाँ जल पिया, किन्तु उस यह नहीं ज्ञात हुआ कि मैं अपने गुरु भृगुके आश्रमपर पहुंच गया हूँ। वहाँ भृगुकी कन्या थी। जिसका कि अभी रजोधर्म नष्ट हुआ था उस चन्द्रमाके सदृश मुखवाली (चन्द्रानना) कन्याको देख-कर राजा काममोहित हो गया और उसके समीप जाकर रतिके लिए प्रार्थना की। कन्याने उत्तर दिया कि हे राजन् ! मैं स्वातन्त्र नहीं हूँ। इस समय मेरे ऊपर पिताका अधिकार है और भृगु (मेरे पिता) इस समय कही बाहर गये हुए हैं मैं बापको जानता हूँ ॥८८-९३। यदि आप मुझे चाहते हों तो अपने गुरु (भृगु) के जाकर कहें और मुझे अपनी पत्नी बनाकर आनन्दके साथ भोग करें। उसके ऐसा कहनेपर भी राजाने एक न सुनी और हठात् उसके साथ भोग करके अपनी नगरीको लौट गया। इसके अनन्तर जब उसके पिता भृगु घर आये तो विलाप करती हुई उस अरजस्का कन्याने सारा समाचार कह सुनाया। इस वृत्तान्तको सुनते ही भृगु मार क्रोधके लाल हो गये और अञ्जलीमें जल भरकर कन्याको सान्त्वन देते हुए उन्होंने शाप दिया कि दण्डकके साथ-साथ उसका सौ योजन राज्य चारों ओरसे जलकर भस्म हो जाय ॥९४-९८॥ उतनी जगहपर जल भी न रहे और न कोई जीव ही निवास करे इस प्रकार शाप सुनकर कन्याने विनय-पूर्वक प्रार्थना की कि अपने इस शापकी अवधि भी नियत कर दीजिये। कन्याके प्रार्थना करनेपर भृगुने कहा कि जब अगस्त्य महर्षि काशी छोड़कर विन्ध्यके उस पार चले जायेंगे। उस समय वह स्थान सजल हो जायगा और वहाँ बड़े-बड़े ऋषि निवास करेंगे। राजा दण्डकके दुराचारसे उस देशकी ऐसी दशा हुई है। इसीलिए लोग उसे दण्डकारण्य कहा करेंगे ॥९९-१०२॥ आगे चलकर जब रामचन्द्रजी इस देशमें जायेंगे तो उसमें कितने ही क्षेत्र बन जायेंगे और तबसे लोग उसो दंडकारण्यको रामक्षेत्रके नामसे पुकारेंगे ॥१०३॥ १०४॥ अगस्त्य

सर्गः १८] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५०३

देशेभ्यः सकलेभ्यश्च सुपूज्यं दण्डकं भवेत् । दण्डकेन समो देशो न भूतो न भविष्यति ॥१०६॥
इति तां बालिकांमुक्त्वा भृगुस्तस्माद्धमालयम् । ययौ तां मुनये दत्त्वा विधिना मुनिसंयुतः ॥१०७॥
भृगोः शापाच्च दण्डेन दग्धं तद्राज्यमुत्तमम् । शतयोजनमानं तदभवद्वि समंततः ॥१०८॥
मद्रामागमनारम्यं भवतः स्वस्थं नभूद् तत् । पूर्ववद्दण्डकारण्यं चराचरसमाकुलम् ॥१०९॥
इति त्वया यथा पृष्टे तया लव मयोदिते । कंकणस्य दण्डकस्य विचित्रे त्वां कथानके ॥११०॥

श्रीरामदास उवाच
इत्यगस्तिमुखाच्छ्रुत्वा लवस्तुष्टोऽभवत्तदा । नत्वा मुनिं च श्रीरामसेवायांतत्परोऽभवत् ॥१११॥
अथ रामश्चोत्सवेन तस्मै चित्रांगदाय ताम् । हेमा ददौ विवाहेन महामंगलपूर्वकम् ॥११२॥
पारिबर्हं ददौ कोटिमितं वारणादिकम् । महामहोत्सवश्चासीदयोध्यायां प्रमोगृहे ॥११३॥
ततो विसर्जयामास चोग्रबाहुं नृपं प्रभुः । मुनयः पार्थिवाश्चापि ययुः स्वं स्वं स्थलं प्रति ॥११४॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे उत्तरार्धे
हेमास्वयंवरो नाम सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥


अष्टादशः सर्गः

( राम द्वारा ब्राह्मणोंको रामनाथपुर राज्यका दान )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामस्त्वयोध्यायां रंजयामास जानकीम् । जुगोप मेदिनीं कृत्स्नां सप्तसागरमेखलाम् ॥ १ ॥
राममुद्रां विना कस्य साकेते शस्त्रधारिणः । नैवासीत्तुप्रवेशश्च रामराज्ये कदाचन ॥ २ ॥
नैवासीन्निर्गमश्चापि विना मुद्रां कदा बहिः । राममुद्रांकितं पत्र गृहीत्वा ते नृपोत्तमाः ॥ ३ ॥
समप्रगश्ने चक्रूर्म्यां कुत्राप्यकुण्ठिताः । राममुद्रास्वरूपं च ते वदामि शृणुष्व तत् । ४ ॥


मुनि तथा रामचन्द्रकी कृपासे वह देश फिर उसीका त्यों हो जायगा और वहाँके लोग सुखी ही जायेंगे। फिर वहाँ सुन्दरता दिखायी देने लगेगी वह पृथ्वीके समस्त देशोंसे पवित्र देश माना जाने लगेगा ॥ १०५ ॥ उस बालिकासे भृगुने कहा-भविष्यमे लोग कहेंगे कि दण्डकारणयके समान न कोई देश हुआ है और न होगा ॥१०६॥ ऐसा कहकर भृगुने उसे एक मुनिको सौंप दिया और स्वयं बहुतसे ऋषियोंके साथ तपस्या करनेको हिमालय-पर्वतपर चले गये। इस प्रकार भृगुके शापसे दण्डकका सौ रोजन राज्य जल-भुनकर राख हो गया । १०७ ॥ ॥ १०८ । हुम्हार और रामके आगमनसे यह फिर पूर्ववत् हो गया और उसमें विविध प्रकारके जीव-जन्तु आकर निवास करने लगे । इस प्रकार हे लव ! तुमने हमसे जो प्रश्न किये, सो दण्डकारण्य तथा इस कंकण-विषयक कथानक वह सुनाया ॥ १०९ । , ११० ॥ श्रीरामदासने कहा-इस तरह अगस्त्यकी बात सुनकर लव परम प्रसन्न हुए और अगस्त्यजीको प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रकी सेवाम लग गये ॥ १११ ॥ इसके अन्तर रामने उत्सवके साथ उस हेमा कन्याका विधिवत् ससमारोह विवाह करके चित्राङ्गदको दे दिया। उन्होंने कन्याके विवाहमें दहेजस्वरूप बहुतसे हाथा-घोडे आदि करोडोंकी सम्पत्तिका दान दिया । इसके बाद महाराज उग्रबाहुको विदा किया और निमंत्रणमें आये हुए राजे तथा ऋषिगण अपने-अपने स्थानको लौट गये ॥ ११२-११४॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'-भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे उत्तरार्धे सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥

श्रीरामदास बोले—इसके बाद रामचन्द्र सीताको प्रसन्न करते हुए सप्तसागर मेखालाबाली पृथ्वीको रक्षा करते रहे। रामके राज्यमें कोई भी शस्त्रधारी मनुष्य विना राममुद्रा-अंकित पत्र लिये नहीं आता था और बिना मुद्राके कोई बाहर भी नहीं जाने पाता था । राममुद्रासे चिन्हित पत्र लेकर संसार भरके राजे जहाँ चाहूँ

५०४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १८

तिर्यग्रूपं पञ्चदश रक्ता रेखाः प्रकल्पयेत् । पीता प्रथमिका पंक्तिश्चतुर्दिक्षु प्रकारयेत् ॥ ५ ॥ पंक्तिर्द्वितीया शुक्लैव सातव्या च तथाष्टमी । नवम्यैशानिदारभ्य तृतीयायां प्रकल्पयेत् ॥ ६ ॥ वक्ष्यमाणपदान्येव कृष्णानि हि समाचरेत् । आरभ्योत्तरस्यां हि समाप्तिर्दक्षिणे स्मृता ॥ ७ ॥ पश्चिमाभिमुखा स्थाप्या मुद्रा तत्रात्मसम्मुखा । पूर्वास्थेन सदा स्थेयं तदा कर्त्रा विनिश्चयात् ॥ ८ ॥ प्रथमं हि द्वितीयं च चतुर्थं पञ्चमंस्तमे । अष्टमं नवमं चैव तथैकादशमुच्यते ॥ ९ ॥ सप्तमस्तृष्ट्यां पंक्तौ हि चतुर्थं षष्ठमष्टमे । तथैकादशमं ज्ञेयं पञ्चमायाः क्रमोऽधुना ॥ १० ॥ प्रथमं हि द्वितीयं च चतुर्थं पञ्चमंस्तमे । नवमंैकादशे चापि षष्ठायाश्च क्रमोऽधुना ॥ ११ ॥ प्रथमं हि द्वितीयं च चतुर्थं षष्ठमुत्तमम् । नवमैकादशे चापि सप्तमो सकलाऽसिता ॥ १२ ॥ नवम्याः प्रथमं कृष्णं द्वितीयं हि चतुर्थकम् । षष्ठं हि सप्तमं चापि नवमं दशमं स्मृतम् ॥ १३ ॥ तथैव द्वादशं चापि दशम्याश्च क्रमोऽधुना । चतुर्थं च तथा षष्ठं सप्तमार्कं तथाऽसिते ॥ १४ ॥ एकादश्याश्च प्रथमं द्वितीयं हि चतुर्थकम् । पञ्चमंनवमान्येव दशमार्कं यथाऽसिते ॥ १५ ॥ द्वादश्याः प्रथमं कृष्णं द्वितीयं हि चतुर्थकम् । षष्ठं च सप्तमं चापि राष्टमं नवमं तथा ॥ १६ ॥ दशमार्कं तथा प्रोक्ता कृष्णा कृष्णता त्रयोदशी । एव बुद्ध्या पूरयित्वा राजा रामेति वै स्फुटम् ॥ १७ ॥ सितवर्णं शमनाममुद्रायां हि निर्गसयेत् । एवं राममुद्रिकायाः स्वरूपं ते मयोदितम् ॥ १८ ॥ एवं मुद्रांकितां रामाः शिलां विप्रेश्य आदरात् । ददौ साद्यापि भूम्यां हि रामनाथपुरेऽस्ति हि ॥ १९ ॥

विष्णुदास उवाच

किमर्थं भूसुरेभ्यश्च राघवेण समर्पिता । रामनाथपुरे पूर्वे स्वीयमुद्रांकिता शिला ॥ २० ॥ हत्सर्वं विस्तरेणैव कथयस्वाद्य मा गुरो । आश्चर्यं त्वतया प्रोक्तं श्रोतुमिच्छामि त्वन्मुखात् ॥ २१ ॥

श्रीरामदास उवाच

एकदा राघवं श्रुत्वा विप्रा अञ्चितदायिनम् । ह्योद्विबह्मपुरम्प्रान्ते दाक्षिणात्या द्विजोत्तमाः ॥ २२ ॥


आते-जाते कहीं भी उन्हें रोक नहीं थी, अब मैं तुम्हें राममुद्राका स्वरूप बताता हूँ, सो सुनो ॥ १-४ ॥ लाल रंगकी खड़ी-बेड़ी पन्द्रह रेखाएँ खींचे। उनके चारों ओरकी पहली पंक्ति पीले रंगसे रंगे ॥ ५ ॥ दूसरी और आठवीं पंक्ति सफेद ही रहने दें। इसके बाद ईशानकोणसे लेकर तीसरी रेखातक आगे कही जानेवाली पंक्तियाँ काले रंगसे लिंपे। लिखवट उत्तरकी तरफसे प्रारम्भ करके दक्षिणमें समाप्त करनी चाहिए। ६-७॥ मुद्राका मुख सदा सामने अर्थात् पश्चिमाभिमुख बनाये और स्वयं पूर्वकी ओर मुख करके बैठे। ८ । पहली, दूसरी, चौथी, छठवीं, सातवीं, आठवी, नवी, ग्यारहवीं और पाँचवीं रेखाके चौकियों तथा पहली, दूसरी, चौथी, छठवीं, नवीं, ग्यारहवी तय सातवीं चौकी यह सब काले रंगकी रहेंगी। ९-१०। फिर नवौं रेखाकी पहली, दूसरी, चौथी, छठी और आठवी चौकी का काले रंगकी रहेंगी। ६-११ फिर ग्यारहवी रेखाकी पहली, दूसरी, चौथी, छठीं, आठवीं, नवीं तथा दशवीं चौकी भी काले रंगकी रहेगी। बारहवीं रेखाकी पहली, तीसरी, दूसरी, चौथी, छठी, सातवी, आठवी, नवीं दसवीं, बारहवीं तथा तेरहवी चौकी भी काले रंगकी रहेंगी। इस प्रकार अपनी बुद्धिसे उपर्युक्त कोष्ठकोंको पूर्ण करनेसे 'राजा राम' यह शब्द साफ-साफ सफेद वर्णमें लिख जायगा ॥ १२-१७ ॥ इस तरह मैंने तुम्हें राममुद्राका स्वरूप बतलाया। इस प्रकारकी मुद्रासे चिह्नित शिला रामने ब्राह्मणोंको दानस्वरूप दी थी जो आज भी रामनाथपुरमें रहनेवाले ब्राह्मणोंके पास विद्यमान है। १८-१९॥ विष्णुदासने पूछा कि रामने रामनाथपुरवाले उन ब्राह्मणोंको वह अपनी मुद्रासे अंकित शिला किस लिये दी थी? यह सब कथा विस्तारपूर्वक हमें बतलाइये। आपने यह आश्चर्यभरी बात कह दी। इसका पूरा विवरण मैं आपके ही मुखसे सुनना चाहता हूँ। २०॥ २१॥ श्रीरामदास कहने लगे कि एक समय रामचन्द्रकी यह

सर्गः १८ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ७०५

सर्गः १८ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ७०५


ययुस्ते राघवं द्रष्टुमयोध्यायां मुदान्विताः । २३ । गन्धर्वराजगेहे स भोजनं कर्तुमुद्यतः । स्नात्वा तत्र सुहृद्गेहे सीतया बन्धुभिः सुखम् ॥२४॥ पुत्राभ्यां भोजनं कर्तुमशने संस्थितोऽभवत् । गन्धर्वराजः श्रीरामं पूजयामास सादरम् ॥ २५॥ परिवेषितानि पात्राणि सुहृत्स्त्रीभिस्तदा ऽभवत् । दिव्यान्र्नैर्मधुरैः श्रेष्ठैः पक्वान्नैर्विविधैरपि ॥२६॥ एतस्मिन्नन्तरे विप्रा रामनाथपुरस्थिताः, सुहृद्गेहे गतं रामं श्रुत्वा तत्र बभूवुस्ते ॥२७॥ गन्धर्वराजद्वारस्थैर्दूतैः श्रीरामवाय हि । भूसुराणामागमनं तदा शीघ्रं निवेदितम् ॥२८॥ तद्दूतवचनं श्रुत्वा राघवश्चातिसम्भ्रमात् । प्रत्युद्गम्य स्वयं विप्रान्ननाम शिरसा प्रभुः । २९॥ गन्धर्वराजगेहे तांश्चात्वा ऽऽसनेष्वपि हि । स्नातुमाज्ञापयन्सर्वाञ् भोजनार्थं रघूत्तमः ॥३०॥ तदा ते मन्त्रयामासुर्विप्राः सर्वे परस्परम् । भोजन-पूर्वमेवैतं याचनीयं स्ववांछितम् ॥३१॥ केचिदूचुस्तदा विप्रा निर्वत्रं च शृण्वते नोपेक्षाऽस्ति सर्वदायं ददाति द्विजवांछितम् ॥३२॥ व्रतमेवास्य रामस्य द्विजवांछितपूरणम् । एवं तान्मन्त्रयमाणांश्च रामो दृष्ट्वाऽब्रवीद्वचः ॥३३॥ ज्ञातं मयाऽभिलषितं युष्माकं मुनिपुङ्गवाः । राज्येच्छया समायाताः किमर्थं श्रमिता द्विजाः ॥३४॥ कथं न प्रेषितः शिष्यस्तदाज्ञयैव च मया । वांछाऽभविष्यद्युष्माकं पूरिता क्षणमात्रतः ॥३५॥ एवं तान्ब्राह्मणानुक्त्वा लक्ष्मणं प्राह राघवः । मया ब्रह्मपुरस्याद्य विप्रेभ्यो राज्यमर्पितम् ॥३६॥ शिलायां लिख मन्नाम दानं दत्तमिति । तथेति रामवाक्येन लक्ष्मणश्चातिसम्भ्रमात् । ३७। रङ्ककारान्समाहूय शिलामानयेतानिति । शीघ्रमाज्ञापयामास ते जग्मुर्नृपवचसा ॥३८। एतस्मिन्नन्तरे विप्राः प्रोचुस्ते राघवं मुदा । कृत्वाऽशनं लेखनीया शिला पश्चाद्रघूत्तम ॥३९॥ किमर्थं क्रियते राम त्वरा लेखनकर्मणि परिवेषितानि पात्राणि वयं चापि क्षुधार्दिताः ॥४०॥


प्रशंसा सुनकर कि वे ब्राह्मणोंकी कामना पूर्ण करते हैं। दक्षिण देशके रहनेवाले बहुतसे ब्राह्मण हजारोंकी संख्यामें एकत्रित होकर रामसे मिलने गये। उधर राम प्रसन्न मनसे गन्धर्वराजके भवनमें भोजन करने गये हुए थे। सीता तथा भ्राताओंके साथ उन्होंने वहीं ही स्नान किया था और अपने दोनों बेटोंके साथ धोकर भोजन करने बैठे थे। गन्धर्वराजने सादर रामका पूजन किया ॥ २०-२५ ॥ गन्धर्वराजके घरकी स्त्रियों तथा मित्रोने शीतान्नादि दिव्यान्न तथा विविध प्रकारके पक्वान्न आदि परसना प्रारम्भ किया ॥ २६ ॥ इसी समय रामनाथपुरके निवासी विप्रगण रामके द्वारपर आये तो उन्हें ज्ञात हुआ कि राम अपने सम्बन्धीके घर गये हैं। बस, वे लोग भी गन्धर्वराजके यहाँ जा पहुंचे और द्वारवालोंने रामको यह खबर दी कि रामनाथपुरके ब्राह्मण आये है। दूतकी बात सुनकर स्वयं राम तुरन्त उठे और उन लोगोंके पास जाकर प्रणाम किया और उन्हें गन्धर्वराजके घरमें ले गये। आसनपर बिठाकर उनसे स्नान भोजन करनेके लिये कहा ॥ २७-३० ॥ उस समय उन सबोंने मंत्रणा करके निश्चय किया कि भोजन करनेके पहले ही हम लोग अपनी माँग उपस्थित कर दें। उनमेंसे कुछने कहा कि इतनी जल्दी क्या है, राम कभी याचकोंकी उपेक्षा नहीं करते। बल्कि वे सदा ब्राह्मणोंकी याचना पूरी करनेको तैयार रहते हैं। इन रामका यही व्रत है कि ब्राह्मणोंकी माँगें पूर्ण किया करें। इस प्रकार परस्पर सलाह करते हुए ब्राह्मणोंको देखकर रामने कहा कि हम आप लोगोंकी इच्छाको जान गये हैं। आप लोग राज्यकी इच्छासे मेरे पास आये हैं। सो इसके लिए आपने इतना परिश्रम क्यों किया ? ॥ ३१-३४ ॥ आप अपने किसी शिष्यको ही भेज दिये होते तो मैं क्षणभरमें आपकी इच्छा पूर्ण कर देता ॥ ३५ ॥ इस तरह उन ब्राह्मणोंसे कहकर रामने लक्ष्मणसे कहा कि आज मैंने ब्रह्मपुरका राज्य ब्राह्मणोंको दान दे डाला है। एक शिलापर मेरा नाम लिख दो और उसमें यह भी लिखवा दो कि मैंने ब्राह्मणोंको ब्रह्मपुरका राज्य दान दे दिया है। "बहुत अच्छा" कहकर लक्ष्मणने तुरन्त पत्थर खोदनेवाले सन्तगासोंको बुलवाया और एक बड़ी शिला मँगवायी। दूत लक्ष्मणके भ्रातानुसार तुरन्त चल पडे ॥ ३६-३८ । तब उन विप्रोंने रामसे

६०६आनन्दरामायणे[ सर्गः १८

तत्तेषां वचनं श्रुत्वा फलभागान्विचारितान् । पुरस्तात्स्थापयामास विप्राणां वरमद्गतः ॥ ४१ ॥
उवाच मधुरं वाक्यं राघवः स्मितपूर्वकम् । फलानीमानि भो विप्रा भक्षयध्वं यथासुखम् ॥ ४२ ॥
लेखयित्वा शिलायां हि यदा मुद्रां करोम्यहम् । तदाऽशनादिकं कर्म सर्वमन्यत्करोम्यहम् ॥ ४३ ॥
क्षणं वित्तं क्षणं चित्तं क्षणिकं च स्वजीवितम् । यमोऽतिनिर्दयः सोऽस्ति धर्मं शीघ्रमथाचरेत् ॥ ४४ ॥
शतं विहाय भोक्तव्यं सहस्रं स्नानमाचरेत् । लक्षं त्यक्त्वा तु दातव्यं कोटिं त्यक्त्वा शिवं भजेत् ॥ ४५ ॥
कोटिविघ्नानि गीतायां दशकोटानि जाह्नवीम् । शतकोटानि जायन्ते दाने विघ्नानि भूसुराः ॥ ४६ ॥
अतः कार्या त्वरा दाने सर्वदा तु नरोत्तमैः । निद्रायाः पूर्वकाले तु निद्रायाः परतस्तथा ॥ ४७ ॥
भोजनात्पूर्वकाले तु भोजनात्परतस्तथा । क्षणे क्षणे मतिर्भिन्ना जायतेऽत्र द्विजोत्तमाः ॥ ४८ ॥
तस्मात्कार्या त्वरा दाने मतिर्या प्रथमे क्षणे । कृता क्षणेनापरे माऽभूत्येतदेव मतं मम ॥ ४९ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र हनूकर्तः शिला वरा । समानीता गण्डकीजा नवहस्ता समन्ततः ॥ ५० ॥
तस्यान्ते लेखयामासुष्टङ्ककारैः स्फुटाक्षरैः । सूर्यवंशोद्भवोऽनाथ सप्तद्वीपेश्वरेण हि ॥ ५१ ॥
त्रेतायां दाशरथिना रामराज्ञा द्विजोत्तमाः मया ब्रह्मपुरस्यैव राज्यदानं कृतं मुदा ॥ ५२ ॥
यावत्पतति खे भानुर्यावत्पश्यत्र मे कथा । यावन्प्रवर्तते वायुस्तावद्दानं ममास्त्विदम् ॥ ५३ ॥
सम्मान्योऽयं धर्मसेतुर्द्विजानां काले काले पालनीयो भवद्भिः ।
सर्वानेतान् भाविनः पार्थिवेन्द्रान् भूयो भूयो याचते रामचन्द्रः ॥ ५४ ॥
एवं विलेख्य श्रीरामः शिलायां निजमुद्रिकाम् । रामनामांकितां वायुपुत्रेणाऽपर्पयत्तदा ॥ ५५ ॥
आञ्जनेयस्य भारेण छिन्ना जाता तदाङ्किता । राजारामेति तस्यान्ते ददृशुश्च स्फुटाक्षरम् ॥ ५६ ॥


कहा कि आप पहले भोजन कर लीजिये, तब शिलालेख लिखवाइयेगा हे राम ! आप लिखनको इतनी जल्दी क्यों कर रहे हैं ? पात्राम समर्पितों कराया जा चुका है और हम लोग भी भूखे हैं। ३९ ॥ ४० ॥ इनकी बात सुनी तो रामने शोकके बाद विविध प्रकारके फल मंगवाकर उनके सामने रखवा दिये और कहा-हे विप्रगण ! आप लोग सुखसे यह फल खाइए । हम तो शिला लिखवाकर और उनपर अपनी मुहर अंकित कर देनेके बाद ही भोजन करेंगे ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ धन क्षणस्थायी है, चित्तवृत्ति क्षणिक है, अपना जीवन भी क्षणभंगुर है और यमराज बड़ा निर्दयी है। इसलिये जितने शीघ्र हो सके, धार्मिक काम पूरा कर डाले । ४४ ॥ सौ काम सामने हों तो उन्हें त्यागकर पहिले भोजन करना चाहिए, सहस्र कामोंको त्यागकर पहले स्नान करना चाहिए, लाख कामोंको त्याग करके पहले दान करना चाहिए एवं करोड़ों कर्मोंको छोड़कर पहिले शिवका भजन करना चाहिए ॥ ४५ ॥ हे विप्रो ! गीताका पाठ करते समय एक करोड़, गङ्गास्नानपर दस करोड़ विघ्न और दानकर्ममें सौ करोड़ विघ्न आकर उपस्थित होते हैं ॥ ४६ ॥ इसलिये सज्जनोंको चाहिए कि दानमें सर्वदा शीघ्रता करें । निद्राके पूर्वकालमे, निद्रासे उठनेके बाद, भोजनके पहले और भोजनके बाद क्षण क्षणमें बुद्धि बदला करती है । इसलिए प्रथम क्षणमें जैसी अपनी बुद्धि हो गयी हो उसके अनुसार दानकर्म शीघ्र कर डालना चाहिये । यह मेरा निजी मत है । ४७-४९ ॥ उसी समय हनुमाननि नौ हाथकी लम्बी-चौड़ी गण्डकी नदीकी एक अच्छी-सी शिला लाकर रामके सामने रख दी ॥ ५० ॥ इसके अनन्तर सन्तगाळोने साफ-साफ अक्षरोंमें उस शिलापर सादकर लिखा कि सूर्यवंशमें उत्पन्न और सप्तद्वीपके अधीश्वर महाराज दशरथका पुत्र मैं राजा राम प्रसन्नतापूर्वक ब्रह्मपुरका राज्य दान करके ब्राह्मणोंको दे रहा हूँ ॥ ५१ । ५२ ॥ जब तक कि आकाशमें सूर्य देवता तपत रहे, जब तक संसारमें मेरा नाम रहे और जब तक कि पवन चलता रहे, तब तक मेरा यह दान दान माना जाय ॥ ५३ ॥ मेरे आगे जो राजे होनेवाले हैं, उनसे मैं राम बार-बार यही भीख मांगता हूँ कि 'ब्राह्मणोंके इस धर्मसेतुको आप लोग सदा रक्षा करते रहिएगा' ॥ ५४ ॥ इस प्रकार लिखवाकर रामने हनुमानजीके द्वारा उसपर अपनी रामनामांकित मुहर लगवा दी ॥ ५५ ॥ हनुमानजीके भारसे शिलापर रामकी मुहर खुद गयी और उसमे "राजा राम" यह शब्द साफ-

सर्गः १८ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५०७


रामनाथेन यद्दत्तं पुरदानं द्विजोत्तमान् । रामनाथपुरं चेति तदारभ्य प्रथां गतम् ॥५७॥
तस्य ब्रह्मपुरमिति नाम प्राथमिकं स्मृतम् । रामनाथपुरं चेति तस्यैवाख्याऽपरा स्मृता ॥५८॥
शिलामारोपितं द्रव्यं दक्षिणार्थं निधाय सः । तां शिलां पूज्य विप्रेभ्यः श्रीरामः सीतया ददौ ॥५९॥
ततोऽब्रवीद्वायुपुत्रं भोजनोत्तरं त्वया । विमानेन शिला नेया रामनाथपुरं द्विजैः ॥६०॥
कम्बुकण्ठं ततः पत्रं लेखयामास राघवः । ब्राह्मणानां त्वया कार्यं साहाय्यं सर्वदेति वै ॥६१॥
ततस्तुष्टा द्विजाः सर्वे ददुराशीः सहस्रशः । चकार भोजनं रामस्ततस्तैः परिवेष्टितः ॥६२॥
ततः सर्वे विमानेन ययुर्विप्राः पुरं प्रति तान्दृष्ट्वा मारुतिश्चापि विमानेन ययौ पुनः ॥६३॥
एवं चकार दानानि सप्तद्वीपान्तरेषु हि । सहस्रशो रामचन्द्रेस्तेषां संख्या न विद्यते ॥६४॥
रामनाथपुरस्थास्ते विप्राः कालांतरेण वै दुष्टराज्यभयादग्रे तां शिलां भयविह्वलाः ॥६५॥
तडाके प्रक्षिपिष्यन्ति ततः कष्टं भजन्ति ते । मर्तुकान् द्विजान्दृष्ट्वा तटाकान्मारुतिः पुनः ॥६६॥
बहिर्निष्कास्यति शिलामग्रे कालान्तरेण हि ।

विष्णुदास उवाच
किं कष्टं भूसुरानग्रे भविष्यति स्वजीविते ॥६७॥
यतस्ते त्यक्तुकामाश्च भविष्यन्ति वदस्व तत् ।

श्रीरामदास उवाच
अग्रे कश्चिद्दुष्टराजा भविष्यत्यवनीतले , ६८॥
स ताडयिष्यत्य विप्रांश्च तद्राज्यहरणेच्छया वदिष्यति कलौ गजा युष्माकं दानमर्पितम् ॥६९॥
यदि रामेण तद्दानपत्रं मे दृष्टिगोचरम् । करणीयं न चेच्छीघ्रं यावत्काल पुरोद्भवम् । ७०॥
युष्माभिर्वसु यद्भुक्तं तत्सर्वं दीयतां मम । नोचेत्सर्वान्वधिष्यामि भूसुराणां यदस्त्वहम् ॥७१॥
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे श्रुत्वेदं नृपतेर्वचः । भयभीता मंत्रयित्वा नृपं प्रोचुस्त्वरान्विताः ॥७२॥


साफ दिखायी देने लगा ॥ ५६ ॥ रामने ब्राह्मणोंको वह पुर दान दिया था, इसीसे उसका रामनाथपुर नाम पड़ गया । ५७ ॥ पहले उसका ब्रह्मपुर नाम था। जबसे रामने उनको दान दे दिया, तभीसे रामनाथपुर उसकी संज्ञा हुई । ५८ ॥ उस शिलाक तोल कर द्रव्य दक्षिणाके निमित्त रखकर सीताके साथ रामने उन विप्रोंकी पूजा की और वह शिला उनको दे दी ॥ ५९ ॥ इसके बाद रामने हनुमान्जीसे कहा कि भोजन कर लेनेके बाद इन ब्राह्मणोंके साथ जाकर यह शिला गामनाथपुरमें पहुँचा आना ॥ ६० ॥ इसके बाद रामने कम्बुकण्ठको एक पत्र लिखवाकर उन ब्राह्मणोंको दिया ; जिसमे लिखा था कि आप सदा इन ब्राह्मणोंकी सहायता करते रहें ॥ ६१ ॥ तदनन्तर प्रसन्न मनसे विप्रोंने आशीर्वाद दिया और रामने इन सबके साथ बैठकर भोजन किया ॥ ६२ ॥ इसके अनन्तर वे सब विप्र पुष्पक विमानपर बैठकर अपने आश्रमको चले और रामसे पूछकर हनुमान्जी भी विमानपर बैठकर उनके साथ-साथ गये ॥ ६३ ॥ इस तरह सातो द्वारोंमें रामने हजारों दान किये । ठीक तरहसे जिनकी सही संख्या नहीं जानी जा सकती ॥ ६४ । रामनाथपुरमें रहनेवाले वे विप्र भविष्यमें दुष्ट राजाओके भयसे उस शिलाको तालाबमें फेंक देंगे, जिससे उनको बड़ा कष्ट प्राप्त होगा। जब वे मरनेपर उतारू हो जायेंगे तो हनुमान्जी उस शिलाको फिर निकालेंगे ।६५। विष्णुदासने पूछा कि ब्राह्मणोंको आगे चलकर अपने जीवनमें कौन-सा कष्ट उठाना पड़ेगा । ६६ ॥ ६७ ॥ जिसके लिये उन्हें वह शिला त्यागनी पडेगी, सो कहिये श्रीरामदासने कहा कि पृथ्वीतलमें आगे चलकर एक कोई दुष्ट राजा होगा ॥ ६८ ॥ वह कलियुगी राजा उन ब्राह्मणोंको मारकर उनका राज्य छीननेकी इच्छासे कहेगा कि यदि रामने तुमको यह राज्य दान करके दिया है तो वह दानपत्र दिखाओ। नहीं तो इतने दिनों तक इस राज्यकी जितनी आय तुम लोगोंने ली है, वह सब लाकर दे दो । नहीं तो मैं सबको मार डालूँगा। क्योंकि ब्राह्मणोंके लिए मैं

५०८आनन्दरामायणे[सर्गः १८

मासेनेकेन पत्रं ते दर्शयिष्यामहे वयम् । ततो मुमोच तान्राजा तेऽपि तूष्णीं पुरं ययुः ॥७२॥
तटाकस्य तटं भित्त्वा प्रवाहाः शतशस्ततः । मोचयामासुः सर्वत्र नांतं तस्य जलस्य ते ॥७३॥
ददृशुः सकला विप्रास्ततस्ते प्राणसंकटम् । साग्न्या तत्र निराहारा निषेदुः सङ्गमस्तटे ॥७४॥
राघवं परमात्मानं चिंतयामासुरादरात् । एवं मासे व्यतिक्रांन्ते वर्षं कृत्वाऽमनो नृपात् ॥७६॥
भयात्प्राणांस्त्यक्तुकामाश्चासन्स्तस्मिन जलाशये । तदा तेषां स्त्रियः पुत्राश्चक्रुः कोलाहलं महत् ॥७७॥
तान्सर्वात्सांत्वयामासुर्नानानीत्युत्तरैर्द्विजाः । स्वयं स्नात्वा द्विजाः सर्वे ददुर्दानान्यनेकशः ॥७८॥
चक्रुः प्रदक्षिणाः सप्त तटाकायोत्तराणनाः । ऊर्ध्वदीर्घस्वरेणैव प्रबद्धकरांसंपुटाः ॥७९॥
हे राम जानकीकांत त्वद्दानादीदृशी गतिः । प्राप्ताऽस्माकं सुताग्रस्त्वं सर्वान्पश्य रघूत्तम ॥८०॥
पुरोद्भवं तु यद्द्रव्यं पूर्वजैर्भुक्तमेव तत् । एतावत्कालपर्यन्तमद्यतन्निराधुना कुतः ॥८१॥
तत्प्रदेयमसंरूयातमतस्त्यक्ष्याम जीवितम् । इत्युक्त्वा ब्राह्मणाः सर्वे निमील्य नयनानि ते ॥८२॥
चिंतयामासुः स्वीयेष्टां देवतां मरणोन्मुखाः । एतस्मिन्नन्तरे तत्र देवागारे हनूमतः ॥८३॥
पाषाणमूर्तेः प्रकटाः संबभूवाऽञ्जनीसुतः । दीर्घस्वरेण तान् प्राह भूमण्डलसमाद्रुतिः ॥८४॥
यूयं मा जीवितान्यद्य त्यजध्वं ब्राह्मणोत्तमाः । आगतो राघवस्याहं दामाऽञ्जनेयमुद्भवः ॥८५॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा द्विजास्ते विस्मयान्विताः । उन्मील्य नयनान्यग्रे ददृशुर्मारुतनन्दनम् ॥८६॥
दीर्घबाहुं महाघोरं पिंगकेशविराजितम् । जरठं पर्वताकारं रामनामप्रभाषणम् ॥८७॥
तं दृष्ट्वा ते द्विजाः सर्वे प्रणेमूर्हृष्टमानसाः । कथयामासुस्त सर्वं स्वीयं वृत्तं सविस्तरम् ॥८८॥
ततः स मारुतिर्वेगात्सरसस्तां शिलां बहिः । निष्कास्य विप्रवर्येस्तैः शिलां पूत्वा स्वयं कपिः ॥८९॥


समराज हूँ ॥६९-७१॥ राजाकी ऐसी बात सुनकर ब्राह्मण भयभीत हो तथा परस्पर सलाह करके उससे बोले कि एक महीने में आपका वह दानपत्र लाकर दिखायेंगे। यह सुनकर राजाने ब्राह्मणोंको छोड़ दिया और वे चुपचाप लोटकर अपने-अपने घर चले गये ॥७२-७३॥ वहाँ पहुंचकर उन्होंने उस तड़ागका बांध तोड़ दिया। जिससे सैकड़ों सोते वह निकले और चारों ओर फैलकर वहनेपर भी तड़ागका जल नहीं चुका। जब ब्राह्मणोंने देखा कि अब प्राण सङ्कटमें आ गया है तो सस्त्रीक सब उसीके एक ऊंचे किनारेपर उपवास करते हुए बैठ गये और परमात्मा रामचन्द्रजीका ध्यान करने लगे। इस प्रकार एक महीना बीत जानेपर जब उन विप्रोंने सोचा कि अब वह दुष्ट राजा हमकों मार डालेगा तो सबने अपने प्राण त्यागनेके लिए तैयार हो गये। उस समय उनके घरकी स्त्रियां तथा बच्चे अत्यधिक दुखित होनेके कारण सब के सब चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगे ॥७४-७७॥ तब उन्होंने स्त्रिया बच्चोंको अनेक प्रकारका नीतिमयी बात सुनाकर सान्त्वना दी। स्वयं उन विप्रोंने स्नान करके नाना प्रकारके दान दिये। फिर उन्होंने उस तलावकी सात परिक्रमा की और उत्तरकी ओर मुख करके खड़े हो गये हाथ जोड़कर ऊंचे स्वरसे वे कहने लगे हे राम ! हे जानकीकान्त ! तुम्हारे दिये हुए दानसे आज हमारी यह दुर्दशा हो रही है हे रघूत्तम ! अब तुम हमलोगोंको मरा हुआ समझो ॥७८-८०॥ पूर्वकल्पमें हमारे पूर्वजोंने जो धन इस राज्यसे पाया, वह सब उन्हीं लोगोंने खर्च कर दिया। अब हम कहाँसे असंख्य धन लाकर इस राजाको दें, इतना धन जुटाना हमारी शक्तिसे बाहर है। अतएव हम अपने शरीरको त्याग देंगे। इतना कहकर उन मरणोन्मुख विप्रोने नेत्र मूंद लिये और अपने इष्टदेवका ध्यान करने लगे। उसी समय पासके देवालयमें पाषाणमयी मूर्तिसे हनुमान्जी प्रकट हुए और जोर-जोरसे चिल्लाकर कहने लगे—॥८१-८४॥ हे ब्राह्मणो ! तुम लोग अपने प्राण मत त्यागो, रामचन्द्रजीका सेवक अञ्जनीपुत्र मैं हनुमान् आगया, इस प्रकार उनकी बात सुनकर विस्मित भयेसे उन सबोंने नेत्र खोलकर हनुमान्जीको देखा ॥८५॥८६॥ उस समय उन हनुमान्जीका लम्बा तथा भयानक हाथ था, पीले-पीले केश थे, बूढ़ी अवस्था थी, पर्वताकार शरीर था और वे निरन्तर रामनामका उच्चारण करते जाते थे ॥८७॥ उनको देखा तो प्रसन्न चित्तसे उन ब्राह्मणोंने प्रणाम किया और विस्तारपूर्वक अपने

सर्गः १८ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५०९


जगाम दृष्ट्वाज्ञांतं दर्शयामास तां शिलाम् । समुद्रः कण्ठबद्धां लिपिं राजाऽपरो द्विजः ॥ ९०॥
तं तदा रोपयामास शृङ्गाग्रं वायुजो भुवि । तस्मिंश्च तटाके ह्यत्र विप्राः स्थिताः पुरा ॥९१॥
नृपं मोचयितुं ये ये सन्तापाः समागताः , तांश्चापि वायुपुत्रेणैव शमायितः ॥९२॥
द्विजहृत्तापशमनाद्भूत्तदाप्रभृतीदं तीर्थं नाम्ना तापशमं यत्र भ्रान्त्युद्भवत्पुनः ॥९३॥
राज्यदानेन रामस्यौदार्यं लोकान्वयोजितुम् । उक्तस्तीर्थसमीपस्थः शम्भुः संस्थापितः शुभः ॥९४॥
उद्धारेश्वरवेति नाम्ना मूर्तिः प्रकीर्त्तिता ।
स्नानं दिना तस्मिंस्तु नृणां तापत्रयं न हि ॥९५॥
ततः प्राह पुनर्विप्रान्हनूमांस्तुष्टमानसः । भूम्यन्तर्गुहां कृत्वा गुहां तत्र स्थाप्या भवेत् शिला ॥९६।
न भयं वोऽस्तु भो विप्रा युष्माकंसाधनाम्यहम् । तिष्ठाऽत्र न भेः कार्यं स्मरध्वं रघुनन्दनम् ॥९७॥
इत्युक्त्वा गुहरूपेऽभून्मूर्त्त्याऽभूद्द्विजपुंगवाः ।
तां शिलां स्थापयामासुर्गुहामध्ये प्रयत्नतः ॥९८॥
ततस्तुष्टा द्विजाः सर्वे जग्मुः स्वं स्वं गृहं प्रति । तदाऽऽरभ्य न केनापि तद्राज्यं हृतं कदा ॥९९॥
एवं शिष्य मया प्रोक्ता कथा भाया तवाग्रतः । पूर्ववद्राज्यं दृष्ट्वा कौतुकञ्चैव सादरम् ॥१००।
अद्यापि तत्र तैर्विप्रैस्तद्राज्यं भुज्यते सदा ।
ये ये जाता नृपा भूम्या रामाज्ञां मानयन्ति ते ॥१०१॥
एवं नाना कौतुकानि राघवेण कृतानि हि पुत्राभ्यां सीतयाऽथ भ्रातृभिर्बन्धुभिः सह ॥१०२॥
इति श्रीमत्कोटिरत्नचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे अभिषेककाण्डे
रामसाम्राज्यवर्णनं नामाष्टादशः सर्गः ॥ १८॥


सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥८८॥ इसके अनन्तर हनुमान्जीने उस शिलाको निकालकर उनके आगे रख दी और ब्राह्मणोंने उसे उस दुष्ट राजाके गलेमें बाँध दिया, समुद्रके सदृश लिखित उस शिलाको देखकर राजा बहुत चकराया ॥८९-९०॥ तब हनुमान्जीने उस राजाको पकड़कर उस सरोवरके तटपर ले गये और शृंगाग्रपर बैठा दिया, राजाको छुड़ानेके लिये जो सिपाही उनके पास आये, हनुमान्जीने अपनी लम्बी पूंछके द्वारा ही उन सबका सन्ताप हरण किया ॥९१-९२॥ ब्राह्मणोंका सन्ताप हेतु मारुतिने उस सरोवरपर हरण किया, इसलिये उस सरोवरका 'तापशमन' नाम पड़ गया ॥ ९३ ॥ राज्यदानसे रामकी उदारता संसारको दिखानेके लिए उसी स्थानपर हनुमान्जीने उद्धारेश्वर नामक शिवलिंगकी स्थापना की ॥ ९४ ॥ उस सरोवरमें स्नान करनेसे मनुष्योंके दैहिक, दैविक और भौतिक ये तीनों ताप दूर हो जाते हैं ॥ ९५ ॥ इसके बाद हनुमान्जीने उन प्रसन्नचित्त विप्रोंसे कहा- पृथिवीमें एक गुफा बनाकर उसमें यह शिला रख दो ॥ ९६ ॥ हे विप्रो, तुमको किसी प्रकारका भय नहीं है। मैं सदा तुम्हारे पास रहूँगा। तुम सब सर्वदा भगवान् रामका स्मरण करते रहो। इतना कहकर सेवक समक्ष हनुमान्जी अपनी उसी पाषाणमयी प्रतिमामें लीन हो गये। जैसा कि हनुमान्जीने बतलाया था, विप्रोंने गुफा खोदकर बड़े यत्नसे वह शिला उसीके अन्दर रख दी ॥ ९७-९८ ॥ इसके अनन्तर प्रसन्न मनसे वे ब्राह्मण लौटकर अपने-अपने घरोंको चले गये तबसे किसी राजाने उनके राज्यका हरण नहीं किया। श्रीरामदास कहते हैं- हे शिष्य ! मैंने भावी वृत्तान्त तुम्हें कह सुनाया। आज भी वे ही ब्राह्मण उस राज्यका उपभोग कर रहे हैं। पृथ्वीतलपर जितने राजे हुए, वे बराबर रामकी आज्ञाको मानते आये हैं। इस प्रकार अवधेश राम अपने पुत्रों, सीता तथा भाइयोंके साथ नाना प्रकारके कौतुक करते रहे ॥ ९९-१०२ । इति श्रीमत्कोटिरत्न-चरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित भाषाटीकासहित राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे अष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥

५१० आनन्दरामायणे [ सर्गः १९

एकोनविंशः सर्गः

( रामकी दिनचर्या )

श्रीरामदास उवाच

शृणु शिष्य वदाम्यद्य रामराज्ञः शुभावहा । दिनचर्या राज्यकाले कृता लोकान् हि शिक्षितुम् ॥ १ ॥
प्रभाते गायकैर्गीतैर्बोधितो रघुनन्दनः । नववाद्यनिनादांश्च सुभ्रं शुश्राव सीतया ॥ २ ॥
ततो ध्यात्वा शिवं देवीं गुरुं दशरथं सुरान् । पुण्यतीर्थानि मानुषं देवताभवनानि च ॥ ३ ॥
नानाक्षेत्राण्यरणानि पर्वतान्सागरांस्तथा । नदींश्चैव ह्रदां: पुण्यांस्ततः सीतां ददर्श सः ॥ ४ ॥
प्रणमन्ती समुत्थाप्य धृत्वा सीताकरं प्रभुः मञ्चकादवतीर्याथ दासीभिः परिवेष्टितः ॥ ५ ॥
बहिः कत्तां शनैर्गत्वा सम्पाद्यावश्यकं प्रभुः । ययौ पुनः प्रदाशीभिः क्रीडाशालां पृथक्तमः ॥ ६ ।
कृत्वा शौचविधिं रामो दन्तशुद्धिं चकार स । ततः स्नानं कदा गेहे सरय्यां वाऽकरोत् प्रभुः ॥ ७ ॥
आरुह्य शिविकायां स भूसुरैर्यानमन्वितैः । वेष्टितः सरयूं गन्त्वा यानं मुक्त्वा तटे प्रभुः ॥ ८ ॥
पद्भ्यामेव शनैर्गत्वा सरयूं प्रणिपत्य च । सरय्वाः पुरतः स्थाप्य नारिकेलं सदक्षिणम् ॥ ९ ॥
सतांबूलं पुनर्नत्वा स्तुत्वा सम्यक् प्रसाद्य च । स्नात्वा यथाविधानेन ब्रह्मघोषपुरःसरम् ॥ १० ।
प्रातः सन्ध्यां ततः कृत्वा ब्रह्मयज्ञं विधाय च । दत्त्वा दानान्यनेकानि ययौ गेहं रथेन हि ॥ ११ ।
रुक्मवन्धैर्वेष्टितैन रौप्यरत्नमयेन च । सुस्नातसूततुरगयुक्तेन जनितेन च ॥ १२ ॥
हुत्वा होमं विधानेन शिवं सम्पूज्य सादरम् । कौसल्यां च सुमित्रां च कैकेयीं च समर्चयत् ॥ १३ ।
कामधेनुं कल्पवृक्षं पारिजातं तु पुष्करम् । चिन्तामणिं कौस्तुभं च पूज्य सीतायुतो हरिः ॥ १४ ।
मुनिश्रेष्ठं वटं बिल्वमश्वत्थं तुलसीं तथा । शमीं पलाशं दूर्वां च राजवृक्षमपूजयत् ॥ १५ ॥
मातृं सम्पूज्य तं नन्वा सम्पूज्य द्वारदेवताम् गोमृगान्ध्यारणांश्च रथं शस्त्राणि भूसुरान् ॥ १६ ॥
कोष्ठागाराणि कोशांश्च पाकशालामपूजयत् । सिंहासने तथा छत्रं चामरे व्यजने तथा ॥ १७ ॥


श्रीरामदास बोले—हे शिष्य ! सुनो, अब मैं रामचन्द्रजीकी दिनचर्या बताता हूँ। जिसे वे सबको शिक्षा देनेके लिए किया करते थे। राम प्रतिदिन प्रातःकाल गायकके गीत तथा बाजोंके मीठे स्वर सुनकर सीताके साथ जागते थे। इसके अनन्तर शिव, देवी, गुरु, देवताओ, दशरथ, पवित्र तीर्थों, माताओ, देव-मन्दिरों, अनेक प्रकारके क्षेत्रों, अरण्यो, पर्वतों सरोबरो, नदी और नदियोका स्मरण करके सीताको देखते थे ॥ १-४ ॥ प्रणाम करती हुई सीताको उठाकर राम उनका हाथ पकड़ हुए मञ्चसे उतरते थे फिर बहुत-सी दासियों-से घिरे हुए जाते और आवश्यक कार्योंका संपादन करते थे । इसके बाद दासियोंके साथ-साथ क्रीड़ाशालाको जाते और वहाँ शौचविधि करनेके पश्चात् दन्तशुद्धि करते थे, इसके अनन्तर कभी घरपर और कभी सरयूमें जाकर स्नान करते थे ॥ ५-७ ॥ जब सरयूस्नानको जाते तो पाल्कीपर सवार हो तथा बहुतसे ब्राह्मणोंस परिवेष्टित होकर जाते और तटपर पहुंचते ही पाल्कीस उतर जात एवं पैदल चलकर सरयूके आगे पानदक्षिणा-युक्त नारियल रखकर प्रणाम और प्रार्थना करते थे । फिर ब्राह्मणोंके वेदघोषके साथ स्नान करते थे। इसके बाद प्रातःकालीन सन्ध्या तथा ब्रह्मयज्ञ करके ब्राह्मणोंको विविध प्रकारके दान देते और रथपर सवार होकर महलोंको लौटते थे ॥ ८-११ ॥ उस रथमें स्थान-स्थानपर सुवर्णसूत्रके बन्धन लगे रहते और श्वेतवर्णके वस्त्र लटकरते रहते थे। सरयूमे सारथी तथा घोड़े नहाये रहते थे और उस रथमेसे एक प्रकारकी ध्वनि निकलती रहती थी ॥ १२ ॥ इसके अनन्तर विधानपूर्वक हवन करके राम सादर शिवजोका पूजन करने और कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयीकी पूजा करते थे ॥ १३ । फिर कामधेनु, कल्पवृक्ष, पारिजात, पुण्यकविमान, चिन्तामणि, कौस्तुभ आदिकी सीताके साथ-साथ राम पूजा करते थे। पश्चात् अगस्त्य, वट, बिल्व, पीपल, तुलसी, शमी, पलाश, दूर्वा, राजवृक्ष तथा सूर्यभगवान्‌की पूजा करके द्वारदेवताको नमस्कार और पूजन करते थे। तदनन्तर

सर्गः १९ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) [ ५११


संप्पूज्य मुकुटं रामः पूजयामास मञ्चकम् । दीपिकां दर्पणं पूज्य पुस्तकादीनपूजयत् ॥१८॥
पुनः संपूज्य स्वगुरुं पूर्वं विप्रेषु पूजितम् । उच्चासनस्थितं नत्वा कथां शुश्राव सन्मुखात् ॥१९॥
पुत्राभ्यां बन्धुभिः पत्न्या पण्डितैः परिवेष्टितः । ततः प्रप्रार्थितो रामः सीतया स मुहुर्मुहुः ॥२०॥
विप्रादिभ्योऽप्यथाहारं चकार स्वयमात्मनः । कामधेनूद्भवैरन्नैः कल्पवृक्षसमुद्भवैः ॥२१॥
मणित्रयविनिर्मैथ वह्नी शांतकृतेरपि । ततो भुक्त्वा हि तांबूलं बिभ्रद्रामोगिराभवः ॥२२॥
वस्त्राणि कटिं दिव्यवस्त्रैः शय्याोपरि दधात नः । एतस्मिन्नन्तरे पूर्वं समाहूतो ययौ भिषक् ॥२३॥
गणकोऽपि राघवस्य प्रत्युद्गम्यातिमानितौ । निषेदतु राघवस्य पूजयामास तौ प्रभुः ॥२४॥
ततो भिषक् सुखं स्थित्वा राघवस्य नदाज्ञया । ददर्श दक्षिणकरे नाडीं रामस्य सादरम् ॥२५॥
रत्नमुद्राकंकणाद्यैः शोभितस्योज्ज्वलस्य च । काष्ठ्यांगुष्ठमूले या धमनी जीवसाक्षिणी ॥२६॥
तच्चेष्टया सुखं दुःखं ज्ञायते च भिषग्वरैः । अतन्तो वैद्यवर्य्यः स सूक्ष्मबुद्ध्या व्यलोकयत् ॥२७॥
रामकर्णे विहस्याह रात्रचाव्राजिः श्रमः । तद्वैद्यवचनं श्रुत्वाऽकुतोद्रामः स्मिताननम् ॥२८॥
ततो वैद्याय तांबूलं ददौ रामः सदक्षिणम् । ततः स गणकः प्राह विस्तार्य सुस्फुटाक्षरम् ॥
पञ्चाङ्गपत्रं चित्रं च राघवाग्रे स्थितः सुधीः ॥२९॥
विघ्नेश्वरो ब्रह्माहर्य्यीशा सुरा भानुः शशी भूमिमुतो बुधः गुरुः ।
गुरुश्च शुक्रः शनिशहुकेतवः सर्वे सदा मंगलदा भवतु ते ॥३०॥
लक्ष्मीः स्यादनया तिथिश्रवणतो शतायुषं चोऽयूह्निर् नक्षत्रं कृतपापनाशनहरं योगो वियोगारहः ।
सर्वाभीष्टकरं तथैव करणं पंचांगमेतःस्फुटं श्रोतव्यं प्रतिवामरे द्विजमुखाच्छ्रेयस्करं मंगलम् ॥३१॥
स्वस्ति श्रीराघवायान्नि तिथिश्च दशमी सिता । भानुवारः सुनक्षत्रं पुष्याख्यं श्चद्य वर्तते ॥३२॥


वृक्ष, अश्व, हथी, रथ, आम्र, बाणुल, कङ्गार काम, पालकी, सिंहासन, छत्र, चमर, व्यजन, मुकुट, मच, दीपिका और दर्पणको पूजा करके पुस्तकादिका पूजन करते थे ॥१४-१८॥ फिर ऊँचे आसनपर बैठे अपने गुरुकी पूजा और नमस्कार करके उनके पूज्य कथा सुनते थे ॥१९॥ इसके अनन्तर अपने भ्राताओं, पुत्रों और पण्डितके साथ बार बार सीताके प्रार्थना करनेपर ब्राह्मणों के साथ स्वयं कल्पवृक्ष, कामधेनु और तीनों मणियोंस उत्पन्न तथा अग्निका तृप्त मंत्रका भोजन करके पान खाते थे। तदनन्तर सुन्दर कपडे पहिन तथा दिव्य वस्त्रसे कमर कसके भान्ति भान्तिने अन्य वस्त्र धारण करते थे। इनके बाद पहलेही ही बुलाये हुए वैद्य तथा ज्योतिषी आये। उनको आते देखकर राम उठ खड़े होते और दो पग आगे बढ़कर स्वागत करके उन्हें लाते एवं अभिमान सम्म न करते थे। वे आकर सामने बैठ जाते और राम उनकी पूजा करते थे ॥२०-२४॥ इसके बाद वैद्य आनन्दपूर्वक बैठकर रामके आज्ञानुसार रत्न, मुद्रा तथा कंकण आदिसे सुशोभित उनके दाहिने हाथकी नाडी देखता था। हाथके अंगूठेकी नीचेवाली जो जीवसाक्षिणी नामकी नाडी है, उसे देखकर वैद्यगण प्राणीके सुखदुःख जान लिया करते हैं। इसलिए वह वैद्य अपनी सूक्ष्म बुद्धिसे देखता और कानमें कहता कि 'रातको ज्यादा मेहनत किये हैं न?' वैद्यकी बात सुनकर राम मुस्करा देते थे ॥ २५-२८॥ इसके बाद राम दक्षिणाके साथ वैद्यजीको पान देते थे। तदनन्तर ज्योतिषीजी स्वच्छ अक्षरो और चित्रोंसे सुसज्जित पंचांग फैलाकर रामके सामने बैठते और इस प्रकार मङ्गलाचरण तथा पञ्चांगश्रवणका माहात्म्य सुनाते थे। विघ्नेश्वर (गणेशजी), ब्रह्मा, महेश, समस्त देवता, सूर्य, शनि, चन्द्रमा, मङ्गल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, राहु, केतु आदि सारे ग्रह आपके मंगलदाता हों ॥ २९ ॥ ३० ॥ तिथिके सुननेसे लक्ष्मी प्राप्त होती है, वारके श्रवणसे आयु बढ़ती है, नक्षत्रश्रवण युक्तकृत पापोंके समूहको नष्ट करता है, योग अपने प्रियजनके वियोगसे बचाता तथा करण सब प्रकारकी मन कामना पूर्ण करता है। अतएव ब्राह्मणके मुखसे प्रतिदिन इनका श्रवण करना चाहिए। क्योंकि यह प्राणियोका सब प्रकारसे कल्याण करता है ॥ ३१ ॥ स्वस्तिश्री रामचन्द्रजी ! आज शुक्लपक्षका दशमी तिथि है, रविवारहै, पुष्यनामक सुनक्षत्र है,

५१२ आनन्दरामायणे [सर्गः १९

ऐन्द्रयोगो महान्द्य सत्राऽयं वर्णं शुभम् कर्कीटस्थोऽथ चन्द्रोऽस्ति द्वितीयेऽन्तेऽधुनेम ॥३२॥ मासोऽयं चैत्रमासोऽस्ति वसन्तश्च प्रपद्यते। सदा कुरुष्व राज्यं त्वं चिरं निहतकण्टके ॥३३॥ सर्वेऽपि सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयाः। ततोऽद्यापि पठन्त्युच्चैर्द्वादशाम्राश्वलायनान् ॥३४॥ एवं ज्योतिर्विदा गीतं पप्रच्छ रघुनन्दनः। दत्वा तेभ्यो दक्षिणां दद्यात्सार्द्धवस्त्रांस्तदाऽह्लादम् ॥३५॥ ततो गद्यं ययौ वेतन्ब्राह्मणेभ्यो मनोरथान् समग्रे... दंष्ट्रान्स्नातानूपुष्पदान्गन्धवेदयत् ॥३६॥ शमनान्सकलेभ्यश्च दत्त्वाऽभिष्टान्वरं प्रभुः। पुनस्नापयदात्मानं गन्धाद्भिर्गन्धवर्चस्करैः ॥३७॥ एतस्मिन्नन्तरे रामं नापितः प्रयतो जवात्। मुकुरं दर्शयामास रत्नमन्वन्तमोजिनम् ॥३८॥ स्वादर्श ददर्श मुखं रघुनन्दनः। सुश्रोत्रं च सुबिम्बं च रक्तनेत्रसुशोभितम् ॥३९॥ अनुत्तानं मांसलं च स्फुरद्रक्त... । कम्बुग्रीव्यकण्ठं च सुरदं पद्म विभ्रतामुखम् ॥४०॥ प्रसन्नदृक् दृशौ यस्य सुभ्रू त्रिवली... । रत्नग्रन्थान्सुमुकुटं मकुटेन विभूषितम् ॥४१॥ एवं मुखं निरीक्ष्याथ तुतोष विमलं प्रभुः। अयं ययौ नृपमणिर्भूषयन्वैच प्रभुः पुरः ॥४२॥ नत्वा रामं दूतमुखे हविषाऽऽदाय... । ततो रामः शिविकायां स्थित्वा गेहाद्वहिर्ययौ ॥४३॥ ददर्श मागधांश्च बहिश्चरस्थितान् प्रभुः। प्रणम्ये मागधा रामं नत्वा दीर्घस्वरेण वै ॥४४॥ सूर्यवंशभवान्सर्वान्नृपान्संवर्णयन्मुदा । ततस्ते वन्दिनः सर्वे तुष्टुवु रघुनन्दनम् ॥४५॥ नानात्कृतचरित्रैर्व... नम्नमुखे । ततस्ते चारणा गानं प्रचक्रुर्मुदितमनाः ॥४६॥ नटा वेश्याश्च ननृतुर्नानावाद्यपुरःसराः। अन्ये चक्रुर्विनोदांश्च यैः सन्तुष्येच्च राघवः ॥४७॥ ततो निनेदुर्वाद्यानि नववाद्यस्वरा अपि। ततस्तृतीयकक्षायां ददर्श नृपनन्दनः ॥४८॥ वारणेन्द्रांश्च तुरगान् शिविकाश्च रथांस्तथा। नानालंकारयुक्तांश्च वरवस्त्रैः समन्वितान् ॥४९॥

ऐन्द्रयोग है और कर्क राशिमें वैसा चन्द्रमा आजके [दिन] दूसरे स्थानपर है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ यह चैत्रका महीना है, वसन्त ऋतु है आप मंगलपूर्वक राज्य करें और बहुत दिनोंतक इस पृथ्वीतलपर रहें। सब सुखी हों, सब नीरोग हों, सदा आपका मङ्गलमय दिन होय और कोई किसी प्रकारका दुःख न देय । ३४ ॥ ३५ ॥ इस प्रकार ज्योतिषीके कहे श्लोकोंका मत और उस पश्चात् दक्षिणा देकर विदा करते थे ॥ ३५ ॥ इसके बाद वेदके साथ भली भाँसकी शास्त्रीय पूजाका माहात्म्य कर सबको प्रसन्न करता था ॥ ३६ ॥ उन ब्राह्मणोंको वहीं वस्त्रदिश्य सब योग्यौप बाँटकर राजा स्वयं स्नान करते थे ॥ ३७ ॥ इसके अनन्तर नाई आया। यह सुवर्णके चौखटसे सुसज्जित दर्पण रामको दिखाता था ॥ ३८ ॥ उस दर्पणमें रामचन्द्रजी अपना सुन्दर, मुस्कराहट युक्त और कमलके समान नेत्रोंवाला अपना मुख देखने थे ॥ ४० ॥ वह मुख छोटी सी नासिकासे युक्त, बड़ा सुन्दर, गोलाकार, अच्छे अच्छे दन्त-रंगों तथा मणिरत्नोंके युगलके अतिशय शोभायमान एवं तेजोमय था ॥ ४१ ॥ दोनों कपोल ऊंचे थे, सुन्दर भ्रौ त्रिवली अर्थात तीन रेखाएं माथेमें पड़ी थीं। वे सुवर्ण और रत्नोंसे सुशोभित मुकुट मस्तकपर धारण किये थे । ४२ ॥ इस प्रकार अपना मुखमण्डल देखकर राम बहुत प्रसन्न होते थे। इसके पश्चात् एक सेवक आया, जिसके हाथोंमें मखमली रूई भरा रहता था। वह धूपदानी रामके सम्मुख रख तथा नमस्कार करके दूतोंके वस्त्रमें प्रभुके सामने बैठ जाया करता था। इसके अनन्तर शिविकामें बैठकर राम घरसे बाहर निकलते थे ॥ ४३ ।। ४४ । बाहरके आँगनमें बागेजन खड़े रहते थे उन्हें राम देखते थे और जब राम को वे देखते तो प्रणाम करके ऊँचे स्वरसे रामके पूर्वपुरुषोंका यश गाने लगते और फिर रामकी स्तुति करते थे ॥ ४५ ॥ ४६ । वे उनके किये रावणवध आदि चरित्रोंका विशद वर्णन करने थे। तदनन्तर चारणगण प्रसन्नमुख होकर नाना गाने और नट तथा वेश्याय नानाप्रकार उस बाजोके तालपर नाचने लगती थीं। कितने ही लोग विनोद करने लगे जिससे कि राम प्रसन्न हों ॥ ४७ । ४८ ॥ इसके बाद कितने ही प्रकारके बाज बजने लगते थे । तब राम दूसरे आँगनसे तीसरेमें पहुँचते थे ॥ ४९ ॥ वहाँ बहुतसे हाथी, घोड़े, पालकियां और

सर्गः १९ ] राघवानन्दम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१३


ततश्च रत्नकक्षायां नृपान्पौरान्सुहृज्जनान् । समागतान्ददर्शनार्थं ददर्श रघुनन्दनः ॥५१॥
ततः पञ्चमकक्षायां पुष्पञ्च पुष्पवाटिकाः । दूतन्ददर्श भोगांश्च शस्त्रहस्तान्सहस्रशः ॥५२॥
दशां च षष्ठकक्षायामश्वाष्ट्राञ्छतशस्तथा । वीरान्ददर्श भोगांश्च प्रबद्धकरसम्पुटान् ॥५३॥
ततः सप्तमकक्षायां ययौ रामः सभां प्रति । शिबिकायाश्चावतीर्य शनैः सिंहासनं ययौ ॥५४॥
सभ्यं कृत्वा नमस्कृत्य सोपानैः स शनैः प्रभुः । सिंहासनमारुरोह वरच्छत्रसुशोभितम् ॥५५॥
दधार छत्रं सौमित्रिश्चामरं भरतस्तदा । शत्रुघ्नो व्यजनं रम्यं पादुके वायुनन्दनः ॥५६॥
सुग्रीवो जलपात्रं च ह्यदर्शं विभीषणः । दधार हस्ते ताम्बूलपात्रं स वालिनन्दनः ॥५७॥
वस्त्रकोशं जाम्बवांश्च दधार वेगवत्तरः । तस्थौ सिंहासने रामः स गृहीतोपबर्हणः ॥५८॥
तस्थौ पृष्ठे लक्ष्मणश्च भरतः सव्यपार्श्वके । शत्रुघ्नोऽथौ वामपार्श्वे पुरतो वायुनन्दनः ॥५९॥
वायव्यकोणे राक्षसस्य सुग्रीवः सन्धिरोऽभवत् । ईशान्य राक्षसेन्द्रः स आग्नेय्यामाङ्गदः स्थितः ॥६०॥
नैर्ऋत्यां जाम्बवांश्चापि दीर्घाः सर्व्व समन्ततः । राघवस्याग्रतो नृपाः सर्वे स्थिताः सम्बद्धपाणयः ॥६१॥
पार्श्वयोस्ते राघवस्य प्रोच्चस्थाने मुनीश्वराः । पुरतो ननृतुः सर्व्वा वारवेश्याः सहस्रशः ॥६२॥
उभौ वीरास्ततो दूताः समाया संस्थिताः क्रमात् । निषेदुहूँनयः सर्वे रामपुत्रौ निषेदतुः ॥६३॥
रात्रिमित्रा निषेदुस्ते तथा राजाज्ञया नृपाः । ये ये मुख्या निषेदुस्ते तथा देशाः सुहृज्जनाः ॥६४॥
अन्योऽन्ये ते स्थिता एव न निषेदुः प्रभोः पुरः । तेषां मध्ये रामचन्द्रः शुशुभेऽनुपमस्तदा ॥६५॥
सेवकाया न निषेदुः सुमन्त्र एव उत्थितवान् । एवं स्थित्वा सभायां स कृत्वा कार्याण्यनेकशः ॥६६॥
नानाकार्येषु बन्धूंश्च पुत्रानाज्ञाप्य राघवः । दृष्ट्वा नाना कौतुकानि पूर्ववद्गृहमाययौ ॥६७॥
तदा निनेदुर्वादित्राणि गोमुखादीन्यनेकशः । श्रुत्वा वाद्यनिनादांश्च जानकी सम्भ्रमात्पुरः ॥६८॥


रथ खड़े रहते थे। जिनमें अनेक प्रकारके जल्लार लगे रहते और उनसे कपड़ोंका बोहार पड़ा रहता था। ।। ५० ।। इसके बाद उस आँगनमें ठहरते आये हुए उन राजाओं, पुरवासियों और मित्रोंको देखते थे जो वहाँ रामकी प्रतीक्षा में पहले ही से उपस्थित रहा करते थे । ५१ ।। फिर पाँचवीं चौकमे पुष्पकमिश्रान, पुष्पवाटिका तथा वस्त्र धारण किये हजारों सिपा'हियोंको देखते थे ।। ५२ ।। फिर छठीं चौकमे जाकर हाथ जोड़े हुए हजारों वाकसवार वीरोंको देखते थे । ५३ ।। इसके बाद सातवीं चौकमें पहुंचकर अपनी राजसभा में जाते थे। यहाँ पालकीसे उतरकर सिंहासनके पास जाते थे ।। ५४ ।। दृष्टियों और सिंहासनको प्रणाम करके शनैः शनैः सीढ़ियोंसे चढ़कर सिंहासनपर बैठत थे वो वह सिंहासन धवल सुशोभित रहता था ।। ५५ ।। रामके बैठ जाने- पर लक्ष्मण छत्र लेते, भरत चमर लेते, पंखा शत्रुघ्नजी लेकर खड़े होते और हनुमान्‌जी रामकी चरणपादुका लिये रहते थे। इनके सिवाय सुग्रीव जलकी झारी, विभीषण एक सुन्दर-सा दर्पण, अङ्गद ताम्बूलका पात्र और वस्त्रकी सन्दूक जाम्बवान् लिये रहते थे। राम पीठपर तकिया लगाकर सिंहासनपर बैठते और उनके पीछे लक्ष्मण, दाहिनी ओर भरत, बायीं ओर शत्रुघ्न, सामने पवनकुमार, वायव्य कोणमें सुग्रीव, ईशान कोणमें विभीषण और आग्नेय कोणमे अङ्गद खड़े रहते थे। ५६-६० ॥ नैर्ऋत्य कोणमे जाम्बवान् रहते और बहुतसे पुरवासी चारों ओर खड़े रहते थे। रामचन्द्रजीके आगे सब राजे हाथ जोड़-जोड़कर खड़े रहा करत थे ॥ ६१ ॥ रामके दाहिने बायें दोनों ओर एक ऊँचे आसनपर मुनिगण बैठते थे। सामने हजारों वेश्यायें नाचती थीं ॥ ६२ ॥ इसके बाद वीरगण और फिर दूतगण खड़े रहा करते थे। समस्त ऋषीश्वर तथा दोनों राजकुमार भी आकर अपने-अपने आसनपर बैठ जाते थे ॥ ६३ ॥ रामके मित्र तथा राजे रामके आज्ञा- नुसार बैठते थे। जो नगरके मुख्य निवासी थे वे तथा मित्रगण भी बैठते थे ।। ६४ ।। इनके सिवाय और लोग रामके सामने नहीं बैठते थे, उन्हें खड़े ही रहना पड़ता था। उन सबके बीचमें रामकी एक अनुपम शोभा होती थी । ६५ ।। सेवक आदिम से कोई भी नही बैठता था। उनमें से केवल सुमन्त्र बैठते थे। इस प्रकार सभा मे बैठ और नाना प्रकारके राजकार्य करके भाइयों और बेटोंको कितने ही काम सौंपकर विविध प्रकार-

५१४आनन्दरामायणे[ सर्गः १९

प्रत्युद्गम्य तोयहस्ता तन्प्रतीक्षां चकार सा । रामोऽपि पूर्वलोकान्नमस्कृत्यत्वनुक्रमात् ॥ ६९॥
प्रविशन्मकलानात्रो ददौ ताम्मान्स्वनोपयत् । ततोऽग्रे बन्धुभिर्गेहं पृथाभ्यां संविवेश सः ॥७०॥
ददर्श जानकीं रामः पीतकौशेयधारिणीम् । साऽपि शर्म ययौ सीता लज्जायाऽवनतानना ॥७१॥
वक्रनेत्रकटाक्षैश्च मोहयन्ती रघूत्तमम् । नानालङ्कारसंयुक्ता वन्नूपुरनिःस्वना ॥७२॥
ततो रामो जलं स्पृष्ट्वा धृत्वा सीताकरं मुदा । लक्ष्मणादीन्विमृज्यैवं सीतागेहं विवेश सः ॥७३॥
बहिर्दृष्टं श्रुतं वाऽथ यद्यत्कौतुकमुत्तमम् । तन्मवं जानकीं प्राह तोषयामास तां मुहुः ॥७४॥
ततः सर्वान् समाहूय भोजनार्थं समुद्यतः । स्नानं कृत्वा स मध्याह्नकर्म चक्रे रघूत्तमः ॥७५॥
तर्पयित्वा पितॄंश्चापि नैवेद्यान् शम्भवे ददौ । वैश्वदेवं ततः कृत्वा बलिदानं विधाय सः ॥७६॥
दत्त्वा भूतबलिं चापि पितॄंश्चापि स्वधेति च । बहिस्त्यक्त्वा काकबलिं त्वतिथीन्पूजयन्मादरात् ॥७७॥
यतींश्च ब्राह्मणान्पूज्य हेमपात्रेषु राघवः । परिविष्टेषु जानक्या त्रिपदासु धृतेषु च ॥७८॥
तैः सर्वैर्भोजनं चक्रे स्नुषाभिर्विजितो मुदा । करशुद्धिं ततः कृत्वा भुक्त्वा ताम्बूलमुत्तमम् ॥७९॥
ददौ तेभ्यो दक्षिणाश्च विप्रेभ्यो रघुनायकः । गत्वा शतपदं रामो निद्राशालां ययौ शनैः ॥८०॥
एतस्मिन्नन्तरे सीता भुक्त्वा रामान्तिकं ययौ । वीजयामास राघवं मञ्चकस्थं पुरःस्थिता ॥८१॥
चकार निद्रां श्रीरामो मञ्चके सीतया सह । ता दास्यो वीजयामासुर्दिव्यालङ्कारभूषिताः ॥८२॥
ततः प्रबुद्धा सा सीता प्रबुद्धोऽभूद्रमापतिः । सारिभिः सीतया क्रीडां तथा बुद्धिवलेन हि ॥८३॥
नानाकृत्रिमसैन्यैश्चाकरोदश्चैरपि प्रभुः । ततो द्राक्षाषण्डपाधो जल्यन्त्रादिकौतुकम् ॥८४॥
दृष्ट्वा पक्षिकुलान्सर्वान्पञ्जरस्थान्ददर्श सः । गत्वा सोपानमार्गेण प्रासादाग्रे पुरीं निजाम् ॥८५॥


के कौतुक देखनेके बाद पहिलेकी तरह अपने घरको लौट आते थे । ६६ ॥ ६७ ॥ उस समय गोमुखादि बाजे बजने लगते थे । उन बाजोंको सुनकर घबड़ायी हुई सीता हाथमे जलकी झारी लेकर रामके आनेकी प्रतीक्षा करने लगती थी, राम भी पहली तरह साता चोक शोधकर ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ प्रसन्न हुए सब लोगोंको प्रसन्न करते आते थे । फिर भाई तथा गुरुंके साथ आगे बहन हुए उस भवनमे आते थे । ७० ॥ वहाँ पीले रङ्गके रेशमी कपड़े पहने सोमको देखते और सीता भी लज्जाके मारे सिर झुक़ाये अपने तिर्छे नेत्रकटाक्षास रामका मुग्ध करतो हुई सामने जाती थीं । उस समय सीताके अलङ्कारों और नूपुरोंकी अनेक प्रकारकी झनकार सुनायी पड़ती थी ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ इसके बाद राम जल लेकर हाथ-पैर धोत, कुल्ला करके और सीताका हाथ अपने हाथसे पकड़कर उठते थे । तब लक्ष्मण आदिको बिदा करके सीताके महलामें जाते थे । ७३ ॥ वहाँपर बाहर जो कुछ कौतुक देख रहेत वह सब एक-एक करके सीताको सुनाने हुए उन्हें प्रसन्न करते थे ॥ ७४ ॥ इसके बाद सब लोगोंको भोजनका बुलावा भेजत और स्वयं स्नान करके मध्याह्नकालीन कर्म करते थे ॥ ७५ ॥ पितरोंका तर्पण करके शिवजीके लिये नैवेद्य अर्पण करते थे । फिर बलिर्वैश्वदेव करत और काकबलि आदि देते थे ॥ ७६ ॥ तदनन्तर भूतबलि देकर पितरोंको 'स्वधा' शब्दका उच्चारण करके तृप्त करते, काकबलि बाहर निकाल देते और उसके बाद आदरपूर्वक अतिथियोंका सत्कार करते थे ॥ ७७ ॥ ब्राह्मणों और यतियोंका पूजन कर लेनेके पश्चात् सामने तिपाईपर रखे हुए सुवर्णके पात्रोंमें जानकीके हाथों परोसे अनेक प्रकारके पकवानोंको सब लोगोंके साथ खाते थे । उस समय सब पुत्रवधुयें उन लोगोंका पंखा झला करती थी । भोजन करनेके पश्चात् हाथ धोते और उत्तम ताम्बूल खाकर ब्राह्मणोंको दक्षिणा देते थे । फिर सौ पग चलकर अपनी निद्राशालामें पहुँच जाते थे । ७८-८० ॥ इसी बीच सीता भी भोजन करके रामके पास पहुँच जाती और वहाँ मञ्चके ऊपर बैठे हुए रामके पास बैठकर पंखा झलने लगती थीं ॥ ८१ ॥ बादमें राम सीताके साथ शय्यापर शयन करते थे, तब दासियाँ उनपर पंखा झलने लगती थीं ॥ ८२ ॥ कुछ देर शयन करनेके बाद सीता उठ जातीं और राम भी जाग जाते थे । तब राम सीताके साथ बुद्धिवलसे कुछ देरतक चौसर आदिके खेल खेलते थे । फिर अङ्गरको झाड़ीके नीचे बने

सर्गः १९ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१५

सर्गः १९ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१५


जनागमान्वितां दृष्ट्वा दृष्ट्वेष्यांडिरिङ्गिताम् । शनैर्ययौ प्रभुर्गोष्ठं नानाधेनूर्ददर्श सः ॥८६॥ तां सम्प्रेक्ष्य गृहं मातुः स्वदासीपरिवेष्टिताम् । द्वारान्निर्गत्य ययौ रामस्तत्र ते लक्ष्मणादयः ॥८७॥ चक्रुः प्रणामं श्रीरामे तैः सहैव शनैः शनैः । वाजिशालां ययौ रामो दृष्ट्वा तत्र स वाजिनः ॥८८॥ गजशालामुष्ट्रशालां दृष्ट्वा रामः शनैः शनैः । ददर्श शस्त्रागारांश्च व्याघ्रशालां प्रभुर्ययौ ॥८९॥ दृष्ट्वाऽथ शिविकाशालां माहिषेयीं विलोक्य च । महिषादृष्टवानां च रथशालां ददर्श सः ॥९०॥ आरुह्य स्यन्दने रामः शनैः सर्वैरनिर्ययौ । सप्तकक्षाः समुल्लङ्घ्य तत्रस्थाः पूर्ववज्जनैः ॥९१॥ सर्वैर्युक्तब्रह्मचर्य्यां तां श्रेष्ठां कक्षां ददर्श सः । तत्र यन्त्राणि श्रेष्ठानि शतघ्नीः सङ्कटस्थिताः ॥९२॥ तृणकाष्ठादिमत्तानि दूतस्थानान्यपश्यत । ततो नवमकक्षायां ददर्श रघुनन्दनः ॥९३॥ शस्त्रपाणीन्गजान्स्थांश्च तुङ्गस्थाननेकशः । रक्षयन्ति हि ये सर्वे स्वीयं गेहं त्वहर्निशम् ॥९४॥ एवं स नवरक्षाश्च समुल्लङ्घ्य रघूत्तमः । बहिः समाचनो दृष्ट्वा परिखाः सजला नव ॥९५॥ शनैः पश्यन्नयोध्यां तां राजमार्गं मुदान्वितः । शीघ्रं ययौ पुरद्वारं ददर्श द्वाररक्षकान् ॥९६॥ नवकक्षास्त्वयोध्यायाः समुल्लङ्घ्य शनैः प्रभुः । परिखाश्च नरापश्वनौषयन्त्रादिसंरिताः ॥९७॥ ततो नानावनारामकौतुकानि रघूत्तमः । पश्यन्म बन्धुपुत्रैश्च सरय्वास्तीरमाययौ ॥९८॥ तत्र स्थित्वा सुनीकायां क्रीडां कृत्वा कियत्क्षणम् । नद्यास्तटे सभायां म तन्व्यों सैन्यवृतः प्रभुः ॥९९॥ यत्रापि वारयोषितां पश्यन्कल्याणनि राघवः । कियत्कालमतिक्रम्य ययौ शीघ्रं ततः पुरम् ॥१००॥ ततः शनैः सभां गत्वा पूर्वकिङ्करसंयुतः । लक्ष्मणाद्यैः सेवितश्च तव्यां सिंहासनेोपरि ॥१०१॥ ततः कृत्वा ह्यनेकानि नानाकार्याणि राघवः । आज्ञाप्य बन्धुपुत्रांश्च पूर्ववन्म गृहं ययौ ॥१०२॥


फौवार आदि दखत थे ॥ ८३ ॥ ८४ ॥ फिर पोकराम पान हुए पौलपका दखत थ। सन्चभूत होकर मार्गमे सर्वोच्य प्रासादपर चढ़ जाते और बट्टभि वनों और बगीचास अलंकृत, बावली तथा गंजोसे अतिरंजित अपनी अयोध्यापुरीको देखत थ। फिर बार-वारे गोशालास जात और वहांपर गौओका देख्या करते थे। ८५ ॥ ॥ ८६ ॥ इसके अनन्तर दासियो सम्त सीताका घर नल दन और म्वयं पाहरका आर जाते थे। वही लक्ष्मण आदि भ्राता रामका संविभ्रम प्रणाम करत थ ॥ ८७ ॥ फिर उनका साथ लेकर राम धीरे-धीरे अश्वशालाका जाते । वहाँ पाशेका देखकर ॥ ८८ ॥ गजशाला और उष्ट्रशालाका देखत हुए अस्त्रशाला तथा व्याघ्रशालाका अवलोकन करते थे ॥ ८६ ॥ फिर शिविकाशाला और महिषीशालाम जाकर शिविकाओं तथा भैंसोको देखकर बाद रथशाला दखत थे ॥ ९० ॥ तत्पश्चात् एक रथपर सवार होकर बनै बनै बाहरकी तरफ जाया करते थे । सातवे महलके सातों चौकाका लाघत एव पहनेक तरह उपस्थित सब लोगी दखत हुए आठवें फाटकवाले आँगनम पहुंचते थ। वहाँपर लट्टध्याय काम आनवाल कितन ही यन्त्र तथा बहुत-सी तोपे रक्खी रहती थी ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ उण्टे दक्सर दूतके निवासस्थान तथा तृण काष्ठ दिके सग्रहभवनका देखनेके अनन्तर नव आँगनम पहुंचते थे ॥ ९३ ॥ वहीं यह दखत थे कि हाथम शस्त्र लिये पाठ और हाथोपर सवार होकर सिपाही रात-दिन अपने अपने स्थानो की रक्षा कर रहे है ॥ २४ ॥ इस प्रकार नया कक्षाओका लांघकर कोटके चारों ओर जलसे भरी बाहरकी नौ साइरोका देखत थे ॥ ९५ ॥ इसके बाद राजमार्गम चलकर अयोध्याको देखत हुए शीघ्र पुरद्वारपर पहुँचत और वहाँपर रहनेवाले द्वाररक्षकोभी देख-रेख करते थे ॥ ९६ ॥ फिर अयोध्याकी नौ कक्षाओंको लांघकर जल और अग्निस परिपूर्ण नौ परिखाएँ और अनेक बाग-बगीचेके कौतुक देखते हुए अपने भाइयो और पुत्रोके साथ सरयूके तीर पहुंचते थे ॥ ९७। ९८ ॥ वहीं एक अच्छी नौकापर बैठ तथा कुछ देरतक तैर करके सेनके शिबिरमे जाते और सैनिकोके साथ सभा में बैठते थे ॥ ९९ ॥ वहाँ कुछ समय तक वेश्याओक नृत्य देखकर पुरमें लोट आया करते थे ॥ १०० ॥ तदनन्तर सभामे जाते ओर पूर्वमे जो कह भये है, उन सबके साथ लक्ष्मणादि भ्राताओसे संवित होकर सिंहासनपर बैठते थे ॥ १०१ ॥ वहाँ कनक कार्योंको करनेके पश्चात् भइओं और पुत्रोको अपने-अपने घर जाने-

५१६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२

सायंकाले ततः संध्यां कृत्वा हुत्वा यथाविधि । गंधाद्यैरुपचारैश्च शिवं सम्पूज्य भक्तितः ॥१०३॥ कृतोपहारं निर्वेद्य पुत्राभ्यां बन्धुभिः सह । शिविकायां पुनः स्थित्वा देवयानेषु च ॥१०४॥ साकेतस्थेषु श्रीरामोगत्वा नत्वा शिवादिकान् । नानाविधान्देवगणान् फलैः पुष्पैर्ह्यपूजयत् ॥१०५॥ देवालयेषु सर्वेषु सुराणां तेषु राघवः । शृण्वन्नानाकीर्तनानि वारस्त्रीनर्तनान्यपि ॥१०६॥ पश्यन्नानाकौतुकानि परां मुदमवाप सः । वाहना रूढ देवान् मपश्यत्कौतु कानि च ॥१०७॥ ततो ययौ ब्राह्मणेन दृढमार्गेण राघवः । रत्नदीपप्रकाशैश्च विवेश निजमंदिरम् ॥१०८॥ क्षणे नानागथाभिश्च वार्त्ताभिः पुत्रबन्धुभिः । सार्द्धयामां निशां नीत्वा रतिगेहे विवेश सः ॥१०९॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र सीताऽग्रे रतिमन्दिरे । पुष्पशय्यादि सम्पाद्य तन्प्रतीक्षां चकार सा ॥११०॥ तावदायांतमालोक्य सहसोत्थाय जानकी । धृत्वा हस्ते रामचंद्रं रतिशालां निनाय सा ॥१११॥ सर्वा विसर्ज्य दासीश्च मुक्ताजालान्यनेकशः । समततो विमुच्याथ तस्थौ रामः स मंचके । ११२॥ ततस्तां मैथिलीं धृत्वा मंचके संन्यवेशयत् । नाना क्रीडां विधायाथ तस्थौ रामः स मंचके ॥११३॥ ततस्तुष्टं रमानाधं जानकी लज्जिताऽब्रवीत् । राम राजोदवत्राक्ष किंचिन्पृच्छामि मे वद ॥११४॥ कुशजन्मानन्तरं हि कथं गर्भो मयान वै । धार्यते कारणं स्वस्य किमस्ति तद्वदस्व माम् ॥११५॥ तत्सीतावचनं श्रुत्वा सस्मित प्राह राघवः । हे सीते कञ्जनयने सम्यक् पृष्टं त्वया मम । ११६॥ तत्सर्वं ते वदाम्यद्य तच्छृणुष्व सुमध्यमे । किमर्थं च बहून् पुत्रांस्त्वमत्र वाञ्छसि प्रिये ।॥११७॥ सदृशे बहवः पुत्रा न योग्यास्त्वत्र वै भुवि । कुर्दकस्य दुराचारात्कुलस्य लांछनं भवत् ॥११८॥ अतएव ममेच्छा न बहुपुत्रेषु मैथिलि । मदिच्छया त्वया गर्भो धार्यते न कदाचन ॥११९॥ पुत्रस्त्वेकः प्रतीक्ष्यो हि यः कुल भूपयेद्गुणैः । किं भ्रात्रा बहवः पुत्रा दुष्टास्ते कुमयो यथा । १२० ।

की आज्ञा देकर स्वयं भी अपने घर चले जात थे ॥१०२॥ सायंकालके समय विधिवृर्वक सन्ध्या और हवन करके धूप-दीप-गन्धादि उपचारोंस भक्तिपूर्वक शिवजीकी पूजा करते थे । १०३ । फिर भोजन करके पुत्रों तथा बान्धवोंके साथ पालकीमें बैठकर देवताओंके मन्दिर को जाते थे ॥१०४॥ साकेतपुरी (अयोध्या) के सब मन्दिरोंमें जाकर शिवाटिक देवताओंको नमस्कार करके फल-फूलसे पूजन करते थे ॥१०५॥ उन्हीं देवालयोंमें थोड़ी देर तक हरिकीर्तन सुनने तथा गणिकाओंका नृत्य देखने थे ॥१०६॥ इस प्रकार विविध कौतुकोंको देखकर राम बहुत प्रसन्न होते थे। तदनन्तर देवताओंका सवारोक कौतुक देखते थे। १०७॥ इसके बाद सवारीपर बैठकर रत्नके बने दीपकोंके प्रकाशमें चलते हुए राजमार्गेसे अपने घर जाते थे ॥ १०८ फिर पुत्रों तथा भ्राताओंके साथ कुछ देरतक इधर उधरकी बात करते और डेढ़ पहर रात बीतनेक बाद रतिशालामें प्रविष्ट होते थे। १०९। उधर सीता अपना रतिशालामे फूलोंकी शय्या बिछाकर रामके आनेकी प्रतीक्षा करती रहती थीं ॥ ११० ॥ वे शमको आते देखती तो तुरन्त आगे बढ़ती और उनका हाथ पकड़कर रतिशालाके भीतर ले जाती थी ॥ १११ ॥ वहाँ सीताका सेवाम उपस्थित दासियोंको बिदा करके रामचन्द्र कमरेकी सारी खिड़कियां खोलकर शय्यापर बैठते थे ॥ ११२ । इसके बाद सीताका हाथ पकड़कर उन्हें भो बैठाते और विविध क्रीड़ा करके सीताको प्रसन्न करने लग जाते थे । ११३ ॥ इस प्रकार प्रसन्न रामको देख-कर एक दिन सीताने लज्जित भावसे कहा- हे राजोवपत्राक्ष राम ! मैं आपसे यह पूछना चाहती हूँ कि कुशके जन्म लेनेके बाद फिर मेरे गर्भ क्यों नही रहता ? इसका कारण बतलाइये ॥ ११४-११५ ॥ इस प्रकार सीता का प्रश्न सुनकर मुस्कुराते हुए राम कहने लगे-हे कञ्जनयनी सीते ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। मैं सब कारण बतलाता हूं । ११६ ॥ हे सुमध्यमे ! तुम सावधान होकर सुनो । हे प्रिये ! पहले मुझे यह बतलाओ कि तुम अधिक पुत्र क्या चाहती हो ? ॥ ११७ ॥ इस संसारके अच्छे कुलम अधिक पुत्र होना ठीक नहीं है। बहुतरे पुत्रोंमें यदि एक पुत्र भी दुराचारी निकल गया तो सारे कुलपर लाञ्छन लग जाता है ॥ ११८ । इसलिये हे मैथिलि ! मुझे अधिक पुत्नोंकी इच्छा नहीं है। मेरी इच्छा न रहनेके कारण ही तुम्हें गर्भ नहीं रहता ॥११९॥

सर्गः १९ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१७


दौहित्रार्था कदाचित्तु यथा नेत्रे भुजौ यथा । यथा तौ मणिसूनू च यथाऽहं लक्ष्मणस्तथा ॥१२१॥
तथापि अङ्कौ द्वौ पुत्रौ माऽभूद्भूयोऽपि सन्ततिः । अतः परं पुनः संविन्न जाता दुहितापि वा ॥१२२॥
एकादपि कारणं तत्र कियदिति तदुच्यते मया । तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा जानकीं प्राह राघवः ॥१२३॥
स्वकन्या च मया कस्मै देयाऽत्र जगत्त्रये । मत्समो नृपः कोऽत्र मन्त्रीशाऽर्कनिखण्डनात् ॥१२४॥
यस्य पादौ नृपाः सर्वे शिरसा नम्रतां गताः । को योग्यः सन्न मे जामातुश्चरणेऽमृतात् ॥१२५॥
मद्दानवाणां चरणीं विनाऽहं यस्य वै ददाम् । अतस्त्वं सर्वलोकेऽस्मिन्मातृणाम् परा प्रिये ॥१२६॥
कुशादीनां तु याः कन्याश्चामन्द्रे कन्यकेव नित्यशः । किं यावन्मदङ्गात् प्राप्ताऽसि भुवि ले ॥१२७॥
आश्चर्यं विष्णुमायायास्त्रैलोक्यजननीमिति । पदत्रं दिव्यं काम्यं रूपञ्चेह परात्परम् ॥१२८॥
पौरुषं दृश्यते यच्च तत्त्वं सर्वं समाहितम् । अत्र त्वां पृच्छामि ये च मे पुत्रदुहितारस्त्व ॥१२९॥
यष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् । इति यद्वचनं माने मामन्यं विद्धि नो वरम् ॥१३०॥
एकः स तनयो धन्यः कुलं यस्त्वेषयेन्नृषु । कुलेन्धनाय ते पुत्राः शतशो दुष्टमार्गगाः ॥१३१॥
इति यद्वचनं दीने वसिष्ठे तत्स्मृतं नृपैः । अन्यच्चे कारणं वच्मि यस्मान्न बहवः सुताः ॥१३२॥
मया नैवार्पितास्त्वत्र तच्छृणुष्व शुचिस्मिते । विनोदान्न वदाम्यद्य माऽन्यथा कुरु मद्द्वचः ॥१३३॥
बहुपुत्रैश्च नारीणां तारुण्यं व्याहन्यते न हि । मय्यतो नह तारुण्यच्छेदिनी बहुसन्ततिः ॥१३४॥
न मयाऽत्रापिता भीते शुभं विद्धीति मे प्रिये । यदीच्छाऽस्त्येव बहूनां ने तनयानां विदेहजे ॥१३५॥
तर्हि वै द्वापरे कृष्णरूपेण द्वापरूपिणे । दश पुत्रान् प्रदास्यामि तदा तेषां सुखं भव ॥१३६॥

केवल एक ऐसे पुत्रकी इच्छा करना चाहिए कि जो अपने अनोखे गुणसे कुलको विभूषित कर सके। काठोंकी तरह व्यर्थ जन्म लेनेवाले बहुतसे दुष्ट पुत्रोंसे क्या लाभ ॥१३०॥ बस, ये दोनों चिरञ्जीव रहे। ये मेरे दो नेत्र, दो भुजा, चन्द्र, सूर्य और हमारे तथा लक्ष्मणके सदृश हैं। तुम्हारे दो बेटा तो हो गये हैं, अब और सन्तति न हो यही ठीक है। फिर सात न कहा—अग्रिम हमारा कोई कन्या क्यों नहीं हुई ? ॥१२१॥ १२२। इसका क्या कारण है ? सो हमसे कहिये। सीताका यह प्रश्न सुनकर रामने कहा कि यदि तुम्हारा कन्या होती तो मैं किसको देता ? संसारमें कौन ऐसा है, जो मेरा जामाता बन सके ? हमारे बराबर कौन राजा है, जो सातों द्वीपोंका अधीश्वर है ॥१२३॥ १२४॥ जिसके चरणोंको नृप मस्तक झुकाकर प्रणाम कर सकें। संसारमें कौन ऐसा वर मिल सकता है कि सिवा इसके जिसके पैर से अमृत द्रायता हुआ था। इसी कारण मैंने पुत्रीकी इच्छा नहीं की ॥१२५॥१२६॥ फिर कुश आदिके जो कन्याएँ उत्पन्न हुई हैं, वे क्या तुम्हारी नहीं हैं ? हे सीते ! यौवन के मदसे तुम पागल तो नहीं हो गयीं हो ? ॥१२७॥ आश्चर्यकी बात है कि माता होकर भी ऐसी कटपटाती बात कर रही हो। इस संसारमें जितना स्वास्थ्य दिखता है, वह सब तुम्हारे ही अंगसे प्राप्तमान हुआ है ॥१२८॥ संसारमें जितना भी पुरुषरूप है, वह पर प्रधान उत्पन्न हुआ है। यहाँ जितने पुरुष रूप हैं, वे सब तुम्हारे लड़के और लड़कियाँ हैं ॥१२९॥ शास्त्रमें भी यह बात कही गयी है कि ‘एक ही नहीं, मनुष्यको कई पुत्र उत्पन्न करनेकी इच्छा रखनी चाहिए। सम्भव है कि उनमेंसे कोई ऐसा सपूत निकल आये, जो गयामें श्राद्ध करके कुलका उद्धार करे।’ यह एक साधारण बात है। यह कोई श्रेष्ठ उक्ति नहीं कही जा सकती ॥१३०॥ मेरा रायमें तो अपने कुलका विस्तार करनेवाला केवल एक पुत्र ही। दूषित मार्गपर चलनेवाले काँटेकी तरह उत्पन्न सैकड़ों बेटोंसे कोई लाभ नहीं ॥१३१॥ मैं जिस बातको कह रहा हूँ, बहुवस विद्वानों ने उसे श्रेष्ठ माना है। दूसरा कारण यह बतलाता हूँ कि मैंने तुमसे कई पुत्र क्यों नहीं उत्पन्न किये। हे शुचिस्मिते ! मैं विनोदवश इस बातको कह रहा हूँ। इसे व्यर्थ मत जाने देना, ठीकसे समझना ॥१३२॥ बहुत पुत्रोंके होनेसे स्त्रीका तरुनाई नहीं रह जाती। बहुत सन्तान होनेसे तुम्हारे यौवनका नाश हो जाता ॥१३३॥ १३४॥ यही सोचकर मैंने अधिक सन्तति नहीं उत्पन्न की। यह युक्त स्वरूप जानना। हे विदेहजे ! फिर भी बहुत सन्तान पानेकी ही तुम्हारी इच्छा हो तो द्वापरमें कृष्णरूपसे मैं तुम्हें...

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५१८ आनन्दरामायणे [ सर्गः २०

कन्यामपि तथैकां तेऽहं दास्यामि न संशयः । तदा ते बहुपुत्रैश्च तारुण्यं स्वास्यते न हि ॥ १३७॥ अत स्त्रीणां सहस्राणि षोडशैकशतं पुनः । तथा मुख्याष्टम्यश्च नार्यस्त्वया सह करीम्यहम् ॥१३८॥ तदा बहूनां पुत्राणां स्नुषाणां त्वं सुखं भज । अहं चापि बहुस्त्रीणां तदा सौख्यं भजामि वै ॥१३९॥ इति रामवचः श्रुत्वा तदा सीता स्मितानना । राघव हर्षिता प्राह वाक्चातुर्यं कृतः प्रभो ॥१४०॥ एतल्लक्ष्ण त्वया राम येन रञ्जयसीह माम् । एवं प्रोक्ता मया शिष्य दिनचर्या रमापतेः ॥१४१॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे रामदिनचर्यावर्णनं नामैकोनविंशः सर्गः ॥ १९ ॥


विंशः सर्गः

( भगवान्के विविध अवतार )

श्रीरामदास उवाच

अथैकदा वसिष्ठं हि प्रभाते क्षत्रवोद्भवः । किञ्चित् प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं वद मुनीश्वर । १ ॥
सर्वं यद्यपि जानामि वाल्मीकेश्च प्रसादतः । तथापि लोकान्सकलान् ज्ञातुं पृच्छामि तेऽद्य हि ॥२।
यदाऽस्माभिर्निद्रायां हि सर्वैर्निद्रा विधीयते । तदा संश्रूयते कर्णे भस्मचक्रस्य वै ध्वनिः ॥ ३ ॥
अमुं मत्संशयं छिन्धि परं कौतूहलं गुरो । लवस्येति वचः श्रुत्वा वसिष्ठस्तमथाब्रवीत् ॥ ४ ॥
बह्व्यश्च ब्रह्महत्याश्च रावणेन कृताः पुरा । येन देहेन सोऽद्यापि लंकायां ज्वलते लव ॥ ५ ॥
रात्रौ रामहस्तेन वधान्मुक्तिं गतः क्षणात् । रामचिंतनपुण्येन वैरबुद्ध्या कृतेन च ॥ ६ ॥
आत्मना सकलं पापं तेन दग्धं पुरैव हि । देहेन न कृतं तस्य देवानां नमनं पुरा ॥ ७ ॥
सम्मार्जनादिकं कर्म देवागारेऽपि नो कृतम् । न कृता तीर्थयात्रा हि तेन देहेन भक्तितः ॥ ८ ॥


दस बेटे दूँगा । उस समय तुम बहुत सन्तानका भी सुख भोग लेना । १३५ ॥ १३६ ॥ उस समय मै तुम्हे एक कन्या भी दूँगा । इसमे कोई संशय नही है । किन्तु इतना अवश्य होगा कि अधिक सन्तान होनेसे तुम्हारा यौवन ढल जायगा । १३७ ॥ इसी कारण मुझे सोलह हजार एक सौ स्त्रियोके साथ विवाह करना पड़ेगा और तुम्हारे साथ आठ मेरो मुख्य स्त्रियो भी होंगी ॥ १३८ ॥ उस समय तुम बहुतसे पुत्रो और बहुओंका सुख भोगीयो और मै भी बहुतसी स्त्रियोका सुख भोग दूँगा ॥ १३९ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर स हाते मुसकाकर कहा— हे प्रभो ! तुमने बातचीत करनेका इतना चतुराई कहाँस सीखा ? जिससे इस तरह मेरा मनोरंजन कर रहे हो । इस तरह रामने बहुत देर तक आपसमे बातें की और दोनों एक दूसरेका आलिङ्गन करके आधी रातके समय सो गये । हे शिष्य ! मैने इस प्रकार तुम्हे रामचन्द्रकी दिनचर्या सुनायी । १४० ॥ १४१ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पण्डितरामतेजशास्त्रिकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासहितं राज्यकाण्डे उत्तरार्धे एकोनविंशः सर्गः ॥१९॥

श्रीरामदास कहने लगे—एक दिन सबेरे लवने वसिष्ठसे कहा कि हे मुनीश्वर ! मै आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ उसे आप बताइए । १ । यद्यपि वाल्मीकिजीकी कृपासे मै सब कुछ जानता हूँ । फिर भी संसारी लोगोंको ज्ञान प्राप्त करानेके लिए आज आपसे पूछ रहा हूँ ॥ २ ॥ जब कि रात्रिमें हम लोग सोते हैं, तब कानमें कोंकणीकी तरह किसकी ध्वनि सुनायी देती है ॥ ३ ॥ मेरे इस संशयका निवारण करिए । इसका मुझे बड़ा कौतूहल है । लवकी बात सुनकर वसिष्ठने कहा— ॥ ४ ॥ रावणने जिस देहसे बहुत सी ब्रह्महत्याएं की थीं हे लव ! वह देह आज भी लंकामे जल रही है ॥ ५ ॥ रामके हाथो वध होने, रामका स्मरण करने और उनके साथ वैरबुद्धि रखनेसे रावण क्षण भरमें मुक्त हो गया । आत्माके सारे पापोंको वह पहले ही जला