अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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साहिब बन्दगी
जब वो प्रकाश अनन्त में फैल गया तो फिर वे सत्य पुरुष स्वयं उस प्रकाश में समा गये। अब वो प्रकाश चेतन हो गया, जीवित हो गया। जिस प्रकार आत्मा के शरीर में आने से शरीर चेतन हो जाता है, उसी प्रकार वो प्रकाश भी जीवित हो उठा। प्रकाश में आने से पहले वे सत्य-पुरुष गुप्त थे जबकि प्रकाश में आकर ही वे सत्य पुरुष कहलाए और वो अद्भुत प्रकाश, जो स्वयं सत्य-पुरुष ही थे, अमर लोक कहलाया।
अभी भी सत्य-पुरुष अकेले ही थे। फिर उनकी मौज हुई और उन्होंने उस प्रकाश को अर्थात अपने ही स्वरूप को अपने में से खिटका दिया।.....अनन्त बिन्दुएँ हुईं, जो वापिस उस अद्भुत प्रकाश में आयीं। जिस प्रकार समुद्र में से पानी को मुट्ठी में या हाथों में भरकर उछालने से कई कण बिखर जाते हैं, उसी तरह उस प्रकाश में से भी अनेक कण बिखर गये। लेकिन जिस प्रकार समुद्र की बूँदें पुनः समुद्र में गिर समुद्र का ही रूप हो जाती हैं, उसी तरह वे अनन्त कण भी वापिस उस अद्भुत प्रकाश में आए, लेकिन अचरज यह था कि वे बिन्दुएँ जब वापिस प्रकाश में आयीं तो वे प्रकाशमय नहीं हुईं, क्योंकि सत्य-पुरुष ने इच्छा की कि इनका अपना अलग अस्तित्व भी रह जाए। वे ही जीव कहलाए। वे सब जीव उसी अद्भुत प्रकाश में विचरण करने लगे।
आत्माओं का उस प्रकाश में अलग अस्तित्व के साथ विचरण करना बड़े अचरज की बात थी, क्योंकि समुद्र की बूँदों का समुद्र में अपना अलग अस्तित्व नहीं होता। जिस प्रकार पानी में मछली घूमती रहती है, उसी तरह सभी जीव उस प्रकाश में घूमने लगे। यह देख परम-पुरुष बड़े खुश हुए और उन आत्माओं को बहुत प्यार करने लगे। बहुत समय ऐसे व्यतीत हो गया और सभी जीव उस अद्भुत प्रकाश में विचरण करते हुए परम आनन्द लूट रहे थे। फिर परम-पुरुष ने शब्दों से पुत्र उत्पन्न किये अर्थात जो बोल रहे थे, वो पुत्र बन रहा था।
सोलह सुत की उत्पत्ति
सोलह सुत की उत्पत्ति
दूजे शब्द जु पुरुष परकासा। निकसे कूर्म चरण गहि आसा ॥ तीजे शब्द भये जु पुरुष उच्चार। ज्ञान नाम सुत उपजे सारा ॥ टेकी चरण सम्मुख है रहेऊ। आज्ञा पुरुष द्वीप तिन्ह दएऊ ॥ चौथे शब्द भये पुनि जबही। विवेक नाम सुत उपजे तबहीं ॥ आप पुरुष किये द्वीप निवासा। पंचम शब्द सो तेज परकासा ॥ पांचव शब्द जब पुरुष उच्चार। काल निरंजन भो औतारा ॥ तेज अंग ते काल है आवा। ताते जीवन कह संतावा ॥ जीवरा अंश पुरुष का आहीं। आदि अंत कोउ जानत नाहीं ॥ छठएँ शब्द पुरुष मुख भाषा। प्रगटे सहज नाम अभिलाषा ॥ सतएँ शब्द भयो संतोष। दीन्हो दीप पुरुष परितोषा ॥ अठएँ शब्द पुरुष उच्चार। सुरति सुभाव दीप बैठारा ॥ नवमें शब्द अनंद अपारा। दशएँ शब्द छमा अनुसारा ॥ ग्यारहें शब्द नाम निष्काम। बारहें सब्द सुत जलरंगी नामा ॥ रहें सब्द अचिन्त सुत जानो। चौदहें शब्द सुत प्रेम बखानो ॥ पन्द्रहें शब्द सुत दीन दयाला। सोलहें सब्द भे धीर्य रसाला ॥ सत्रहें शब्द सुत योग संतायन। एक नाल षोडश सुत पायन ॥
जैसे ही परम-पुरुष ने इच्छा करके दूसरा शब्द पुकारा तो उससे कूर्म उत्पन्न हुआ। इसी तरह तीसरे शब्द से ज्ञान और चौथे से विवेक उत्पन्न हुआ। ये सब परम-पुरुष ने इच्छा से पैदा किए, पर आत्मा इच्छा से नहीं बनी, वो परम-पुरुष का अंश है। फिर परम पुरुष ने पांचवा शब्द तेज अंग से पुकारा। जिसके तेज से निरंजन पैदा हुआ। तो छठे शब्द से सहज की उत्पत्ति हुई, सातवें से संतोष, ग्यारहवें से निष्काम, बारहवें से जलरंगी, तेरहें से अचिन्त, चौदहें से प्रेम, पन्द्रहवें से दीनदयाल, सोलहवें से धैर्य और सत्रहवें शब्द से योग संतायन हुए। ये सब परम-पुरुष के 16 पुत्र
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हुए, जिन्हें उन्होंने सुरति की एक नाल से पिरो दिया।
शब्दहिते भयो सुतन अकारा । शब्द ते लोक द्वीप विस्तारा ॥
अग्र अमी दिय अंश अहारा । द्वीप द्वीप अंशन बैठारा ॥
अंशन शोभा कला अनंता । होत तहाँ सुख सदा बसंता ॥
सब सुत करें पुरुष को ध्याना । अमी अहार सदा सुख माना ॥
शब्द से ही परम-पुरुष ने पुत्र उत्पन्न किये और शब्द से ही अमर-लोक के द्वीपों की रचना की। हरेक द्वीप पर अंशों को स्थान दिया और सब उस अमृत(परम-पुरुष के स्वरूप) का पान करने लगे। अंशों की शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता; वहाँ सदा आनन्द रहता है। सभी पुत्र परम-पुरुष का ध्यान करने लगे और अमृत भोजन करते हुए सुख से रहने लगे।
द्वीप करि को अनंत सोभा, नहिं बरनत सो बनै ।
अमिय कला अपार अद्भुत, सुतन शोभा को गनै ॥
पुरुष के उजियार से सुत, सबै दीप उजियार हो ।
सतपुरुष रोम प्रकाश एकहि, चन्द्र सूर्य करोर हो ॥
अमर-लोक के द्वीपों और परम-पुरुष के पुत्रों की शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता। परम-पुरुष के प्रकाश से सब द्वीप प्रकाशित रहते हैं; उनके एक रोम मात्र का प्रकाश करोड़ों सूर्यों और चन्द्रमा के बराबर है।
सतपुर आनन्द धाम, सोक मोह दुख तहाँ नहीं ।
हंसन को बिसराम, पुरुष दरस अँचवन सुधा ॥
सत्य लोक आनन्द का घर है; वहाँ दुख, मोह आदि नहीं है; वहाँ हंस सत्य पुरुष के अमृत का पान करते हैं।
काल निरंजन कीनहीं तपस्या
काल निरंजन कीन्हों तपस्या
यहि बिधि बहुत दिवस गयो बीती । ता पीछे ऐसी भई रीती ॥ धर्मराय अस कीन्ह तमासा । सो चरित्र बूझहु धर्मदासा ॥ युग सत्तर सेवा तिन कीन्हा । इक पग ठाढ़ पुरुष चित दीन्हा ॥ सेवा कठिन भाँति तिन कीन्हा । आदि पुरुष हर्षित होय चीन्हा ॥
अमर लोक में सबको आनन्द से जीवन व्यतीत करते हुए बहुत समय बीत गया। उसके बाद पाँचवाँ पुत्र निरंजन परम-पुरुष का ध्यान करने लगा। उसने 70 युग तक एक पाँव पर खड़े होकर एकाग्रचित्त परम-पुरुष का ध्यान किया। जब उसने इतना कठिन तप किया तो परम-पुरुष प्रसन्न हुए।
परम पुरुष ने कहा
पुरुष अवाज् उठी तब बानी । कहा जानि तुम सेवा ठानी ॥
परम-पुरुष ने पूछा कि इतनी घोर सेवा, तप क्यों कर रहे हो!
निरंजन ने कहा
कहै धरम तब सीस नमायी । देहु ठौर जहाँ बैठों जायी ॥
निरंजन ने कहा कि मुझे भी कहीं स्थान दे दो।
परम पुरुष ने कहा
आज्ञा किये जाहु सुत तहवाँ । मानसरोवर दीप है जहवाँ ॥
कहा-हे पुत्र! जाओ, तुम मानसरोवर द्वीप में जाकर रहो।
चले धरम तब मानसरोवर । बहुत हरषचित्त करत कलौहर ॥ मानसरोवर आये जहिया । भये आनन्द धरम पुनि तहिया ॥ बहु रि ध्यान पुरुष को कीन्हा । सत्तर युग सेवा चित दीन्हा ॥ यक पग ठाढ़ सेवा सेवा लायी । पुरुष दयाल दया उर आयी ॥
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मानसरोवर में आकर काल-निरंजन बड़ा खुश हुआ और आनन्द से रहने लगा। वहाँ वो पुनः परम-पुरुष का ध्यान करने लगा। अबकी बार उसने पुनः 70 युग तक एक पाँव पर खड़े होकर ध्यान किया। परम-पुरुष के हृदय में दया आयी।
विकस्यो पुहुप उदयो जब बानी । बोलत वचन उदयो अधरानी । जाहु सहज तुम धरम कै पास। अब कस ध्यान कीन्ह परगासा ॥
परम-पुरुष ने तब सहज को निरंजन के पास भेजा, कहा-पूछो कि अब क्यों ध्यान कर रहे हो, क्या चाहते हो!
चले सहज तब सीस नवाई । धरमराय पहुँ पहुँचे जाई ॥ कहे सहज सुन भ्राता मोरा । सेवा पुरुष मान लइ तोरा ॥ अब का माँगहु सो कह मोही । पुरुष अवाज दीन्ह यह तोही ॥
परम-पुरुष की आज्ञा पाकर उन्हें प्रणाम करके निरंजन के पास आए और कहा-हे भाई! परम-पुरुष तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हैं, इसलिए उन्होंने तुम्हारे लिए यह संदेश भिजवाया है कि अब जो माँगना चाहते हो, मुझसे कहो।
निरंजन ने कहा
अहो सहज तुम जेठे भाई । करो पुरुष सो बिनती जाई ॥ इतना ठाँव न मोहि सुहाई । अब मोहि बकसि देहु ठकुराई ॥ मोरे चित अस भौ अनुरागा । देऊ देश मोहि करहु सभागा ॥ कै मोहि देहु लोक अधिकारा । कै मोहि देहु देस यक न्यारा ॥
निरंजन ने सहज से कहा कि तुम मेरे बड़े भाई हो, तुम परम-पुरुष के पास जाकर विनती करते हुए कहना कि मैं इतने स्थान से खुश नहीं हूँ, इसलिए अब कृपा करके या तो अमर-लोक का राज्य ही मुझे दे दो या फिर अलग से एक न्यारा देश दो, जिस पर मेरा पूरा अधिकार हो।
चले सहज सुनि धर्म के बाता । जाय पुरुष सो कहे विख्याता ॥ जो कछु धर्मराय अभिलाषी । तैसे सहज सुनाये भाषी ॥
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निरंजन की बात सुनकर सहज वापिस परम-पुरुष के पास आए और जो कुछ निरंजन ने कहा, वो सुना दिया।
सुन्यो सहज के बचन जबहीं, पुरुष बैन उच्चारै ऊ।
धरम से संतुष्ट हैं हम, बचन मम हिय धारे ऊ॥
लोक तीनों ताहि दीन्हो, शून्य देश बसावहू॥
करहु रचना जाय तहवाँ, सहज वचन सुनावहू॥
परम-पुरुष ने सहज के वचन सुनकर कहा कि मैं निरंजन से बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिए उसके पास जाकर कहो कि मैंने उसे 17 असंख्य चौकड़ी युग का राज्य दिया है; वो शून्य में एक अलग देश बसा ले।
आय सहज तब वचन सुनावा। सत्य पुरुष जस कहि समुझावा॥
सुनतहिं बचन धर्म हरषाना। कल्लु क हरष कल्लु विस्मय आना॥
जब सहज ने निरंजन को परम-पुरुष की आज्ञा सुनाई तो निरंजन बहुत खुश हुआ। पर उसे कुछ आश्चर्य भी था। तो कहा-
कहे धर्म सुनु सहज पियारा। कै से रचौं करौं विस्तारा॥
पुरुष दयाल दीन्ह मोहि राजू। जानू न भेद करौं किम काजू॥
गम्य अगम्य मोहि नाहिं आयी। करो दया सो युक्ति बतायी॥
विनती करौ पुरुष सों मोरी। अहो भ्रात बलिहारी तोरी॥
किहि विधि रचूँ नौ खंड बनाई। हे भ्राता सो आज्ञा पाई॥
मो कहँ देहु साज प्रभु सोई। जाते रचना जगत की होई॥
निरंजन ने सहज से कहा कि परम-पुरुष ने मुझे तीन-लोक का राज्य तो दिया, पर मुझे रचना का भेद मालूम ही नहीं तो फिर कैसे करूँ! मुझे वो सामग्री तो दो, जिससे मैं रचना कर सकूँ।
तबही सहज लोक पगु धारा। कीन्ह दण्डवत् बारंबारा॥
सहज फिर परम-पुरुष के पास गया और दण्डवत् प्रणाम किया।
अहो सहज कस इहवाँ आऊ। सो हमसों तुम सब्द सुनाऊ॥
परम-पुरुष ने सहज से पूछा कि किस कारण से आए हो, सो मुझे बताओ।
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कह्यो सहज तब धर्म की बाता । जो कछु धर्म कही विख्याता ॥
तब सहज ने निरंजन की विनती सुना दी ।
आज्ञा पुरुष दीन्ह तेहि बारा । सुनो सहज तुम बचन हमारा ॥
कूर्म उदर आहि सब साजा । सो ले धरम करे निज काजा ॥
विनती करे कूर्म सो जायी । माँगि लेइ तेहि माथ नवायी ॥
परम-पुरुष ने सहज को आज्ञा दी, कहा कि कूर्म के पेट में रचना का सब सामान है; तुम निरंजन को कहो कि कूर्म के पास जाकर विनती करे और उससे वो सामान माँग ले ।
गये सहज पुनि धर्म के पास । आज्ञा पुरुष कीन्ह परगासा ॥
विनती करो कूर्म सो जाई । माँगि लेहु तेहि सीस नवाई ॥
जाय कूर्म ढिग सीस नवावहु । करिहैं कृपा बहुत तब पावहु ॥
सहज ने निरंजन के पास जाकर परम-पुरुष की आज्ञा सुनाई, कहा कि कूर्म के पास जाकर विनती करना और उससे माँग लेना; वो तुम्हें दे देगा ।
चलि भौ धरम हरष तब बाढ़ो । मनहिं कीन गुमान अति गाढ़ो ॥
जाय कूर्म के सन्मुख भयऊ । दंड परनाम एक नहिं कियऊ ॥
अमी स्वरूप कूर्म सुखदाई । तपत न तनि को अति शितलाई ॥
करि गुमान देख्यो जब काला । कूर्म धीर अति है बलवाला ॥
बारह पालँग कूर्म शरीरा । छै पालँग धरम बलवीरा ॥
धौवै चहुँ दिश रहै रिसाई । किहि विधि लीजे उत्पति भाई ॥
कीन्हो रोष कोपि धर्म धीरा । जाय कूर्म के सन्मुख भीरा ॥
कीन्हो काल सीस नख घाता । उदरते निकसे पवन अघाता ॥
तीन सीस के तीनहु अंशा । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर बंशा ॥
पाँच तत्व धरती आकाश । चन्द्र सूर्य उडगन रहिवासा ॥
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निस्र्यो नीर अग्नि शशि सूर। निस्र्यो नभ ढाकन महि अस्थूला ॥ छीना सीस कूर्म को जबही। चले परसेव ठाँव पुनि तबही ॥ जबही परसेव बुंद जल दीन्हा। उंचास कोट पृथ्वी को चीन्हा ॥
निरंजन बड़े ही घमण्ड के साथ कूर्म जी के पास पहुँचा और वहाँ जाकर कोई प्रणाम नहीं किया, कोई प्रार्थना नहीं की। पर कूर्म जी शांत थे, शीतल थे, उन्हें गुस्सा नहीं आया। निरंजन ने देखा कि कूर्म तो बहुत बलवान हैं। उनका शरीर उससे दुगुना था। निरंजन क्रोधित होकर उसके चारों ओर दौड़ने लगा, सोचने लगा कि कैसे इससे उत्पत्ति का सामान ले लूँ। उसने नख से उनके शीश पर प्रहार किया और तीन शीश काट कर खा लिए। तब उनके पेट से पाँच तत्व, धरती, आकाश, सूर्य, चाँद, तारे आदि सब सूक्ष्म रूप से निकले। वो सब सामान लेकर निरंजन शून्य में आया और रचना कर डाली। पर यह निर्जीव सृष्टि थी।
कूर्म ने कहा
आदि कूर्म रह लोक मैझारा। तिन पुनि ध्यान पुरुष अनुसारा ॥ निरंकार कीन्हो बरियाया। काल कला धरि मोपहँ आया ॥ उदर बिदार कीन्ह उन मोरा। आज्ञा जानि कीन्ह नहिं थोरा ॥
उधर कूर्म जी ने परम-पुरुष से ध्यान में कहा कि निरंकार (निरंजन) ने बल का प्रयोग करके मेरा पेट फाड़ा है, पर आपकी आज्ञा जानकर मैंने उसे कुछ नहीं कहा।
परम-पुरुष ने कहा
पुरुष अवाज् कीन्ह तेहि बारा। छोट वह आहि तुम्हारा ॥
आही यही बड़न की रीती। औगुन ठाँव करहिं वह प्रीती ॥
परम-पुरुष ने कहा कि वो तुम्हारा छोटा भाई है और बड़ों की रीत यही होनी चाहिए कि छोटे चाहे उपद्रव भी करें, उन्हें माफ कर देना चाहिए, उनसे प्रेम करना चाहिए।
निरंजन का पुनः तप
निर्ंजन का पुनः तप
पुरुष ध्यान पुनि कीन्ह निर्ंजन। युग अनेक किय संयम ॥ स्वार्थ जानि सेवा तिन लाई। करि रचना बैठे पछताई ॥ धर्मराय तब कीन्ह बिचारा। कैसेलो त्रयपुर विस्तारा ॥ स्वर्ग मृत्यु कीन्हों पाताला। बिनाबीज किमि कीजै ख्याला ॥ कौन भाँति कस करब उपाई। किहि विधि रचों शरीर बनाई ॥ कर सेवा माँगों पुनि सोई। तिहुँ पुर जीवित मेरो होई ॥ एक पाँव तब सेवा कियऊ। चौंसठ युग लों ठाढ़े रहे ऊ ॥
निर्ंजन ने तीन लोक बना दिये, स्वर्ग, पाताल, मृत्यु लोक रच डाले, पर सोचा कि तीन लोक का विस्तार कैसे करूँ! क्योंकि बीज नहीं है, इसलिए शरीरों की रचना भी नहीं हो सकती और फिर यह तो निर्जीव सृष्टि है, इसमें जीव नहीं हैं; जैसे अमर लोक में हंस हैं, ऐसे इसमें नहीं हैं। यह सोच निर्ंजन ने पुनः एक पाँव पर खड़े होकर शून्य में 64 युग तक परम-पुरुष का ध्यान किया, सोचा कि सजीव तीन लोक मेरा हो जाए यानी अभी तक तीन-लोक की सृष्टि निर्जीव थी।
दयानिधि सतपुरुष साहिब, बस सुसेवा के भये। बहुरि भाष्यो सहज सेती, कहा अब याचत नये ॥ जाहु सहज निर्ंजन पहँ, देउ जो कुछ माँगई। करहि रचना पुरुष वचना, छल मता सब त्यागई ॥
परम-पुरुष फिर निर्ंजन की सेवा से अधीन हुए और सहज को उसके पास भेजा।
चले सहज सिरनाय, जबहिं पुरुष आज्ञा कियो। तहवाँ पहुँचे जाय, जहाँ निर्ंजन ठाढ़ रहो ॥
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सहज परम-पुरुष की आज्ञा पाकर निरंजन के पास आए।
देखत सहज धर्म हरषाना। सेवा बस पुरुष तब जाना।।
निरंजन ने जब सहज को आते देखा तो जान गया कि परम-पुरुष सेवा से खुश हो गये हैं।
तबै सहज अस भाषे लीन्हा। सुनहु धर्म तोहि पुरुष सब दीन्हा।।
कूर्म उदर सो जो कछु आवा। सो तोहि देन पुरुष फरमावा।।
तीन लोक राज तोहि दीन्हा। रचना रचहु होहु जनि भीना।।
कहै सहज सुनहु धर्मराया। केहि कारण अब सेवा लाया।।
सहज ने कहा-हे निरंजन! तुम्हें परम-पुरुष ने तीन लोक का राज्य दिया; कूर्म के पेट से जो निकला, वो भी तुमने ले लिया; अब क्यों तप कर रहे हो!
तबै निरंजन विनती लायी। कैसे रचना रचूँ बनायी।।
पुरुषहिं कहो जोरि युग पानी। मैं सेवक दुतिया नहीं जानी।।
पुरुष सो विनती करो हमारा। दीजे खेत बीज निज सारा।।
मैं सेवक दुतिया नहीं जानू। ध्यान पुरुष का निशि दिन आनू।।
निरंजन ने कहा कि बीज ही नहीं है तो सृष्टि कैसे करू! इसलिए बीज दो और जीव भी दो, जिन पर राज्य कर सकूँ।
सहज कहो पुनि पुरुषहिं जाई। जस कछु कहो निरंजन राई।।
सहज ने परम-पुरुष के पास जाकर निरंजन की प्रार्थना सुना दी।
इच्छा कीन पुरुष तेहि बारा। अष्टं गी कन्या उपचारा।।
अष्ट बाहु कन्या होय आई। बायें अंग सो ठाढ़ रहाई।।
माथ नाई पुरुष सो कहई। अहो पुरुष आज्ञा कस अहई।।
परम-पुरुष ने तब इच्छा करके एक ऐसी कन्या (आद्य-शक्ति) की उत्पत्ति की, जिसकी आठ भुजाएँ थीं। आद्य शक्ति ने परम पुरुष से पूछा कि उसको क्यों बनाया गया है!
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तबहीं पुरुष वचन परगासा । पुत्री जाहु धरम के पास।।
देहुँ वस्तु सो लेहु सम्हारी । रचहु धर्म मिलि उत्पति वारी ।।
दीन्हो बीज जीव पुनि सोई । नाम सुहँ ग जीव कर होई ।।
जीव सोहँ गम दूसर नाही । जीव सो अंश पुरुष को आही ।।
परम-पुरुष ने अनन्त आत्माएँ देते हुए कहा कि हे पुत्री ! मानसरोवर में निरंजन के पास ये आत्माएँ लेकर जाओ और उसके साथ मिलकर सत्य सृष्टि करो । सोहँ ग जीव का ही नाम है और यह परम-पुरुष का अंश है ।
पुरुष सेवा वश भये तब अष्टगहिँ दीन्ह हो ।
मानसरोवर जाहु कहिया देहु धर्महिँ चीन्ह हो ।
अष्टँ गी कन्या हती जेहिँ रूप शोभा अति बनी ।
जाहु कन्या मानसरोवर करहु रचना अति घनी ।।
सेवा के वश होकर ही परम-पुरुष ने अष्टंगी को जीव देकर निरंजन के पास मानसरोवर में भेजा ।
चौरासी लख जीव, मूल बीज तेहि संग दे ।।
रचना रचहु सजीव, कन्या चलि सिर नाय के ।।
परम-पुरुष ने आद्य-शक्ति को जीवात्माएँ देते हुए कहा कि सत्य सृष्टि करना । (यानी आत्माओं को शरीरों में डालने की आज्ञा नहीं दी) आद्य-शक्ति परम-पुरुष को प्रणाम कर चल पड़ी ।
यह सब दीन्हो आदि कुमारी । मान सरोवर चलि भई नारी ।।
तत्छिन्न पुरुष सहज टेरावा । धावत सहज पुरुष पहिँ आवा ।।
जाही सहज धरम यह कहेहु । दीन्ही वस्तु जस तुम चहे हु ।।
मूल बीज तुम पहुँ पठवावा । करहु सृष्टि जस तुम मन भावा ।।
मानसरोवर जाहि रहाहु । ताते होई हैं सृष्टि उराहु ।।
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जब आद्य-शक्ति मानसरोवर को चली तो परम पुरुष ने तुरंत सहज को बुलाकर कहा कि निरंजन के पास जाओ और कहो कि जो वस्तु तुमने चाही थी, सो तुम्हें दे दी है, मूल बीज तुम तक पहुँचा दिया है, अब मानसरोवर को जाओ और सृष्टि करो।
चले सहज तहवाँ तब आये। धर्म धीर जहाँ ठाढ़ रहाये ॥
कहेउ सु वचन पुरुष को जबहीं। धर्मराय सिर नायो तबहीं ॥
परम-पुरुष की आज्ञा पाकर सहज निरंजन के पास आए और परम-पुरुष के वचन सुनाए।
पुरुष वचन सुन तबही गाजा। मान सरोवर आन विराजा।
आवत कामिनि देख्यो जबही। धर्मराय मन हरष्यो तबही।
कला अनन्त अंत कछु नहीं। काल मगन है निरखत ताही ॥
निरखत धरम सु भयो अधीरा। अंग अंग सब निरख शरीरा ॥
धर्मराय कन्या कह ग्रासा। काल स्वभाव सुनो धर्मदासा ॥
परम-पुरुष के वचन सुन निरंजन मानसरोवर में आकर बैठ गया। जब उसने आद्य-शक्ति को आते देखा तो बड़ा खुश हुआ। आद्य-शक्ति अनन्त कला और सैदर्य से परिपूर्ण थी, सो काल पुरुष उसे देख मग्न हो गया, कामुक हो गया। उसने शक्ति को एक हाथ में पाँव और एक हाथ में शीश की तरफ से पकड़ा और निगल गया। तब से उसका नाम काल पुरुष हुआ अथवा काल निरंजन हुआ।
कीनो ग्रास काल अन्याई। तब कन्या चित विस्मय लाई ॥
ततछन कन्या कीन्ह पुकारा। काल निरंजन कीन्ह अहारा ॥
जैसे ही निरंजन ने उसे निगला, उसने परम-पुरुष को पुकार की, कहा कि काल-निरंजन ने मुझे खा लिया है।
तबही धर्म सहज लग आई। सहज शून्य तब लीन्ह छुड़ाई ॥
फिर निरंजन सहज के पास गया और उसे भी वहाँ से भगा दिया, क्योंकि तप के कारण उसमें ताकत आ गयी थी।
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पुरुष ध्यान कूर्म अनुसार। मोसन काल कीन्ह अधिकारा ॥ तीन शीश मम भच्छन कीन्हो। हो सतपुरुष दया भल चीन्हो ॥ यही चरित्र पुरुष भल जानी। दीनहो शाप सो कहों बखानी ॥ लच्छ जीव नित ग्रासन करहू। सवा लच्छ नित प्रति बिस्तरहू ॥
परम-पुरुष को ध्यान आया कि इसने पहले भी कूर्म का पेट फाड़कर पाँच तत्व का बीज निकाला था और अब इसने आद्य-शक्ति को निगल लिया है। परम-पुरुष को बुरा लगा, उन्होंने निरंजन को शाप दे दिया, कहा कि एक लाख जीवों को तू रोज़ निगलेगा तो भी तेरा पेट नहीं भरेगा और सवा लाख को उत्पन्न करेगा।
पुनि कीन्ह पुरुष तिवान, तिहि छन मेटि डारो काल हो। कठिन काल कराल जीवन। बहुत करइ बिहाल हो ॥ यहि मेटत सबै मितिहैं, बचन डोल अडोलसां ॥
परम-पुरुष ने विचार किया कि मैं काल पुरुष को मिटा देता हूँ, क्योंकि यह तो जीवों को बड़ा कष्ट देगा, पर फिर ध्यान आया कि मैंने तो इसे 17 असंख्य चौकड़ी युग का राज्य दिया है, यदि मिटा दिया तो एक तो मेरा शब्द कट जायेगा और फिर सभी 16 पुत्रों को एक नाल में पियेरा है, यदि एक को मिटाया तो सभी मिट जायेंगे।
डोलै बचन हमार, जो अब मेटा धरम को। वचन करो प्रतिपाल, देश मोर अब ना लहैं ॥
उसे मिटाने से शब्द कट जाता था, इसलिए शाप दिया कि अब मेरे देश में नहीं आ सकेगा, मेरा दर्शन नहीं कर सकेगा।
जोगजीत कहैं तबहि बुलावा। धर्म चरित सब कहि समुझाया ॥ जोगजीत तुम बेगि सिधारो। धर्मराय को मारि निकारो ॥ मानसरोवर रहन न पावै। अब यहि देस काल नहिं आवै ॥ धर्म के उदर माहिं है नारी। तासो कहो निज शब्द सम्हारी ॥
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उदर फारि के बाहर आवे । कूर्म उदर विदार फल पावै ॥
धर्मराय सों कहो विलोई । वहै नारि अब तुम्हरी होई ॥
जाकर रहो धर्म वहि देशा । स्वर्ग मृत्यु पाताल नरे शा ॥
परम-पुरुष ने योगजीत (कबीर साहिब) को बुलाया। वास्तव में परम-पुरुष खुद ही योगजीत हुए। उन्होंने स्वयं को मथ ज्ञानी पुरुष कबीर साहिब को निकाला और कहा कि निरंजन को मानसरोवर से निकाल दो, अब वो मेरे देश में कभी भी नहीं आयेगा। उसके पेट में आद्य-शक्ति है, उससे कहना कि मेरा ध्यान करके उसके पेट को फाड़ बाहर आ जाए ताकि निरंजन ने जो कूर्म का पेट फाड़ा था, उसे उसका फल मिल जाए और निरंजन से कहना कि वो स्त्री अब तुम्हारी हो गयी, तुमने जहाँ स्वर्ग लोक, मृत्यु लोक और पाताल लोक की रचना की है, वहाँ जाकर रहो।
जोगजीत चल भे सिर नाई । मानसरोवर पहुँचे जाई ॥
जोगजीत को देखा जबहीं । अति भो काल भयंकर तबहीं ॥
पूछा काल कौन तुम आहू । कौन काज तुम यहाँ सिधाहू ॥
परम-पुरुष को प्रणाम कर योगजीत मानसरोवर में आए। जब निरंजन ने योगजीत को देखा तो बड़ा क्रोध किया, भयंकर हो गया, पूछा-कौन हो? और यहाँ क्यों आए हो?
जोगजीत अस कहै पुकारी । अहो धर्म तुम ग्रासेहु नारी ॥
आज्ञा पुरुष दीन्ह यह मोही । इहिते बेगि निकारो तोही ॥
जोगजीत कन्या को कहिया । नारि काहे उदर महँ रहिया ॥
उदर फारि अब आवहु बाहर । पुरुष तेज सुमिरो तोहि ठाहर ॥
योगजीत ने कहा कि तुमने आद्य-शक्ति को निगल लिया है, परम-पुरुष की आज्ञा से मैं यहाँ आया हूँ, तुम्हें यहाँ से निकालना है। तब योगजीत ने कन्या से कहा कि इसके पेट में क्यों बैठी हो, परम-पुरुष की सुरति करके इसका पेट फाड़कर बाहर आ जाओ।
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साहिब बन्दगी
सुनिके धर्म क्रोध उर जरे ऊ । जोगजीत सो सन्मुख भिरे ऊ ॥ जोगजीत तब कीन्हें ध्याना । पुरुष प्रताप तेज उर आना ॥ पुरुष आज्ञा भई तेहि काला । मारहु सुरति लिलार कराला ॥ जोगजीत पुनि तैसो कीन्हा । जस आज्ञा पुरुष तेहि दीन्हा ॥
यह सुन निरंजन क्रोधित होकर लड़ने के लिए योगजीत के सम्मुख आया। योगजीत ने तब परम-पुरुष का ध्यान करके उनके तेज को लिया और निरंजन पर सुरति फेंकी, जिससे वो बेहोश होकर गिर पड़ा।
गहि भुजा फटकार दीन्हों, परे उ लोक ते न्यार हो ॥ भयो त्रासित पुरुष डरते, बहुरि उठे उ सम्हार हो ॥ निरसि कन्या उदर ते, पुनि देख धर्महि अति डरी ॥ अब नहिं देखों देस वह, कहो कौन विधि कहँवा परी ॥
तब योगजीत ने उसकी भुजा पकड़कर उसे अमर-लोक से नीचे शून्य में फेंक दिया। वहाँ योगजीत के डर से संभल कर उठा और उसके पेट से कन्या बाहर निकल आयी। निरंजन को देख कन्या डरने लगी और सोचने लगी कि यहाँ कैसे आ गयी! अब उस देश में नहीं जा पाऊँगी।
कामिनि रही सकाय, त्रासित काल डर अधिक । रही सो सीस नवाय, आस पास चितवत खड़ी ॥
आद्य शक्ति काल निरंजन से डरने लगी और शीश नवाकर वहीं पास में खड़ी हो गयी।
निरंजन ने कहा
कहे धर्म सुनु आदि कुमारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी ॥ पुरुष रचा तोहि हमरे काजा । इक मति होय करहु उपराजा ॥ हम हैं पुरुष तुमहिं हो नारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी ॥
निरंजन ने शक्ति से कहा कि हे कुमारी! मुझसे मत डरो; परम-पुरुष ने तुम्हें मेरे काम के लिए रचा है, इसलिए दोनों मिलकर राज्य करते हैं। मैं पुरुष हूँ और तुम मेरी नारी हो; मुझसे मत डरो।
अनुरागसागर वाणी
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आद्य शक्ति ने कहा
कहे कन्या कैसे बोलहु बानी । भ्राता जेठ प्रथम हम जानी ॥ कन्या कहैं सुनो हो ताता । ऐसी विधि जनि बोलहु बाता ॥ अब मैं पुत्री भई तुम्हारी । ताते उदर माँझ लियो डारी । जेठ बंधु प्रथमहि के नाता । अब तो अहो हमारे ताता ॥ निरमल दृष्टि अब चितवहु मोही । नहीं तो पाप होय अब तोही ॥
आद्य शक्ति ने कहा कि यह कैसी बात बोल रहे हो । पहले नाते से तो तुम मेरे बड़े भाई हो चुके हो, क्योंकि परम-पुरुष के बच्चे हैं हम और दूसरे नाते से मैं तुम्हारी पुत्री हो गयी हूँ, क्योंकि तुमने मुझे पेट में डाल लिया था और वहीं से मैं निकली हूँ, इसलिए तुम मेरे पिता हो गये हो । अब तुम मुझे निर्मल दृष्टि से देखो अन्यथा तुम्हें पाप लगेगा ।
निरंजन ने कहा
कहे निरंजन सुनो भवानी । यह मैं तोहि कहों सहिदानी ॥ पाप पुण्य डर हम नहीं डरता । पाप पुण्य के हमहीं करता ॥ पाप पुण्य हमहीं से होई । लेखा मोर न लेहैं कोई ॥ पाप पुण्य हम करम पसारा । जो बाझे सो होय हमारा ॥ ताते तोहि कहों समुझाई । सिख हमार लो सीस चढ़ाई ॥ पुरुष दीन तोहि हम कहैं जानी । मानहु कहा हमार भवानी ॥
निरंजन ने कहा कि मैं पाप-पुण्य से नहीं डरता हूँ, क्योंकि पाप-पुण्य का कर्ता मैं ही हूँ, मेरे पाप-पुण्य का हिसाब लेने वाला कोई नहीं है और आगे मैं पाप-पुण्य कर्मों का जाल ही फैलाऊँगा और जो इनमें उलझ जायेगा, वो कहीं नहीं जा पायेगा, हमारा ही रहेगा ।
विहँसी कन्या सुन अस बाता । इक मति होय दोह रंगराता ॥ हरस वचन बोली मृदु बानी । नारी नीच बुधि रति विधि ठानी ॥ रहस वचन सुन धरम हरषाना । भोग करन को मन में आना ॥
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साहिब बन्दगी
आद्य शक्ति तब हँसते हुए उसके साथ एकमत हो गयी, उसकी बात मान ली और मीठी बाणी बोलकर गुप्त बात कही और निरंजन के साथ रहने का निश्चय कर लिया।
भग न कन्या के हती। अस चरित कीन्ह निरंजना।
नख घात किये भग द्वार तत छिन, घाट उत्पति गंजना॥
नख रेश शोनिता चला। तिहुँको सब खास आरंभनी।
आदि उत्पति सुनहु धर्मनि, कोउ नहिं जानत जम मनी॥
त्रियवार कीन्ही रति तबै, भये ब्रह्मा विष्णु महेश हो।
जेठे विधि विष्णु लघु तिहि, तीजे शम्भू सेष हो॥
उत्पति आदि प्रकाश, यह विधि तेहि प्रसंग भो॥
कीन्हो भोग विलास, इक मति कन्या काल है॥
तेहि पीछे ऐसा भो लेखा। धर्मदास तुम करौ विवेका॥
अग्नि पवन जल महि अकाश। कूर्म उदर ते भयो प्रकाश॥
पाँचों अंस ताहि सन लीन्हा। गुण तीनों सीसन सों कीन्हा॥
यहि विधि भये तत्व गुण तीनों। धर्मराय तब रचना कीनो॥
साहिब धर्मदास से कहते हैं कि कूर्म जी के पेट से पाँच तत्व निकले थे और उसके तीन शीश निरंजन ने खा लिये थे, उन्हीं से तीन गुण-रजगुण (ब्रह्मा जी), सत्गुण (विष्णु जी), और तमगुण (शिवजी) हुए। पाँच तत्व और तीन गुणों से निरंजन ने सब रचना की।
त्रिदेव की उत्पत्ति
त्रिदेव की उत्पत्ति
गुन तत सम कर देविहिं दीन्हा। आपन अंस उत्पन कीन्हा।। बुन्द तीन कन्या भग डारा। ता सँग तीनों अंस सुधारा।। पाँच तत्व गुण तीनों दीन्हा। यहि विधि जग की रचना कीन्हा।। प्रथम बुन्द ते ब्रह्मा भयऊ। रज गुण पंच तत्व तेहि दयऊ।। दूजो बुन्द बिस्तु जो भयऊ। सतगुण पंच तत्व तिन पयऊ।। तीजे बुन्द रुद्र उत्पाने। तमगुण पंच तत्व तेहि साने।। पंच तत्व गुण तीन खमीरा। तीनों जन को रच्यो शरीरा।।
तीन गुण और पाँच तत्वों को मिलाकर निरंजन ने अपने पुत्र उत्पन्न किये और इस तरह पाँच तत्व और तीन गुण देकर जगत की रचना की। प्रथम रजगुण के साथ पाँच तत्व दिये, जिससे ब्रह्मा जी हुए और सतगुण के साथ पाँच तत्व दिये तो विष्णु जी हुए और तमगुण के साथ पाँच तत्व देने से शिवजी हुए। इस तरह पाँच तत्व और तीन गुण से तीनों शरीरों की रचना की।
कहै धर्म कामिनि सुन बानी। जो मैं कहूँ लेहू सो मानी।। जीव बीज आहै तुव पासा। सो ले रचना करहु प्रकाशा।। कहै निरंजन पुनि सुनु रानी। अब अस करहु आदि भवानी।। त्रय सुत सौंप तोहि दीना। अब हम पुरुष सेवा चित लीन्हा।। राज करहु तुम लै तिहुँवारा। भेद न कहियो काहु हमारा।। मोर दरश त्रय सुत नहिं पैहैं। जो मुहि खोजत जन्म सिरैहैं।। ऐसो मता दिदैहो जानी। पुरुष भेद नहिं पावै प्रानी।। त्रय सुत जबहिं होहिं बुधवाना। सिंधु मंथन दे पटहु निदाना।।
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साहिब बन्दगी
निरंजन ने कहा कि जीव और बीज तुम्हारे पास हैं और ये तीनों पुत्र भी तुम्हें सौंपता हूँ। अब मैं निराकार रूप में शून्य में समाऊँगा और मन बनकर हर जीव के साथ रहूँगा और तुम तीनों पुत्रों के साथ राज्य करना। निरंजन ने कहा कि तुम मेरा भेद किसी से नहीं कहना, मेरा दर्शन तीनों पुत्रों में से कोई नहीं कर सकेगा, चाहे मुझे खोजते हुए जन्म क्यों न गँवा दै, और मेरा कोई भेद भी न जान पाए। जब ये बड़े हो जाएँ तो इन्हें समुद्र मंथन के लिए भेजना।
मन ही सरूपी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई। पांच पचीस तीन का पिंजड़ा, जामें तोहि राखा भरमाई॥
निरंजन मन बनकर गुप्त हुआ
निरंजन मन बनकर गुप्त हुआ
कहे उ बहुत बुझाय देविहि, गुप्त भये तब आहि हो। शून्य गुफहि निवास कीन्हो, भेद लह को ताहि हो ॥ वह गुप्त भा पुनि संग सबकैं, मन निरंजन जानिये। मन पुरुष ध्यान उच्छे द देवै, आपु परगट आनिये ॥
निरंजन गुप्त होकर शून्य में समा गया और मन रूप में सबके साथ हो गया। यही मन परम पुरुष का ध्यान नहीं करने देता है।
जीव सतावे काल, नाना कर्म लगाय के। आप चलावे चाल, कष्ट देय पुनि जीव को ॥
काल स्वयं ही चाल चलकर जीवों से कर्म करवाता है और फिर स्वयं ही उन्हें कष्ट देता है।
गुप्त भयो है संग सबके। मन ही निरंजन जानिये ॥
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