अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
( २५ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| मधुररस का विशिष्ट वर्णन | १५६ | स्वेदक्षय के लक्षण | १६४ |
| अम्लरस का विशिष्ट वर्णन | १५६ | अन्य मलों के क्षय-लक्षण | १६४ |
| लवणरस का विशिष्ट वर्णन | १५६ | वृद्धि एवं क्षय-निर्देश | १६५ |
| तिक्त एवं कटु रसों का विशिष्ट वर्णन | १५६ | पुरीष आदि मलों का महत्त्व | १६५ |
| कषायरस का विशिष्ट वर्णन | १५६ | वात आदि के विशिष्ट स्थान | १६५ |
| रसों का वर्णन | १५६ | वातज रोग प्रतीकार | १६५ |
| रसों के ६३ भेद | १५७ | वृद्धरक्तादि की चिकित्सा | १६५ |
| रससंयोगों के असंख्य भेद | १५८ | मलों की वृद्धि एवं क्षय की चिकित्सा | १६६ |
| ( ११ ) दोषादिविज्ञानीयाध्यायः | |||
| शरीर के आधार | १६० | धातुओं की वृद्धि-क्षय | १६६ |
| प्रकृतिस्य दोषों के कर्म | १६० | वृद्धि-क्षय का कारण | १६६ |
| रस आदि धातुओं के कर्म | १६० | वृद्धि-क्षय का अन्य स्वरूप | १६७ |
| मलों के प्रमुख कर्म | १६१ | दोष, धातु, मल एवं स्रोतों की दुष्टि | १६७ |
| वातवृद्धि के लक्षण | १६१ | मलायनों का परिचय | १६७ |
| पित्तवृद्धि के लक्षण | १६१ | ओजस् का वर्णन | १६७ |
| कफवृद्धि के लक्षण | १६१ | ओजःक्षय के कारण, लक्षण एवं चिकित्सा | १६७ |
| रक्तवृद्धि के लक्षण | १६१ | ओजोवृद्धि के लक्षण | १६८ |
| मांसवृद्धि के लक्षण | १६२ | वृद्धि-क्षय का चिकित्सासूत्र | १६८ |
| मेदोवृद्धि के लक्षण | १६२ | द्वेष एवं प्रार्थना का कारण | १६८ |
| अस्थिवृद्धि के लक्षण | १६२ | अवस्थानुसार दोषों के कर्म | १६८ |
| मज्जावृद्धि के लक्षण | १६२ | दोषों को सम रखना | १६९ |
| शुक्रवृद्धि के लक्षण | १६२ | ( १२ ) दोषभेदोपाध्यायः | |
| पुरीषवृद्धि के लक्षण | १६२ | वात के प्रमुख स्थान | १७० |
| मूत्रवृद्धि के लक्षण | १६३ | पित्त के प्रमुख स्थान | १७० |
| स्वेदवृद्धि के लक्षण | १६३ | कफ के प्रमुख स्थान | १७१ |
| अन्य मलवृद्धि के लक्षण | १६३ | वात के पाँच भेद | १७१ |
| वातदोष के क्षय-लक्षण | १६३ | पाँच वातों का वर्णन | १७१ |
| पित्तदोष के क्षय-लक्षण | १६३ | उदानवायु का वर्णन | १७१ |
| कफदोष के क्षय-लक्षण | १६३ | व्यानवायु का वर्णन | १७१ |
| रसधातु के क्षय-लक्षण | १६३ | समानवायु का वर्णन | १७१ |
| रक्तधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | अपानवायु का वर्णन | १७२ |
| मांसधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | पित्त के पाँच भेद | १७२ |
| मेदोधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | पाचकपित्त का वर्णन | १७२ |
| अस्थिधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | रञ्जकपित्त का वर्णन | १७२ |
| मज्जाधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | साधकपित्त का वर्णन | १७२ |
| शुक्रधातु के क्षय-लक्षण | १६४ | आलोचकपित्त का वर्णन | १७२ |
| पुरीषक्षय के क्षय-लक्षण | १६४ | भ्राजकपित्त का वर्णन | १७३ |
| मूत्रक्षय के क्षय-लक्षण | १६४ | कफ का वर्णन | १७३ |
| अवलम्बक कफ का वर्णन | १७३ | ||
| वलेदक कफ का वर्णन | १७३ |
( २६ )
विषय
बोधक कफ का वर्णन तर्पक कफ का वर्णन श्लेषक कफ का वर्णन उपसंहार वात के चय, कोप, शम का वर्णन पित्त के चय, कोप, शम का वर्णन कफ के चय, कोप, शम का वर्णन दोषों के चय का वर्णन दोषों के प्रकोप का वर्णन चय, कोप, शम का वर्णन चय आदि का विशेष वर्णन कालस्वभाव का वर्णन दोषों की व्याप्ति एवं निवृत्ति निदान, रूप, चिकित्सा-वर्णन रोगों की उत्पत्ति के कारण दोषों के प्रकोप के कारण हीनयोग आदि का वर्णन काल का वर्णन कर्म का वर्णन उपसंहार एवं रोगमार्ग बाहरी रोगमार्ग आभ्यन्तर रोगमार्ग मध्यम रोगमार्ग वातदोष के कर्म पित्तदोष के कर्म कफदोष के कर्म दोषलक्षण निर्वाचन का हेतु चिकित्सा में अभ्यास का महत्त्व रोगों के तीन भेद रोगों का परिचय त्रिविध रोग-चिकित्सा रोगों के दो भेद रोग-भेदों के नाम स्वतन्त्र रोग परतन्त्र रोग मलों का विचार दोषों का विचार चिकित्सासूत्र उपद्रवचिकित्सा-निर्देश
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१७३ १७३ १७३ १७४ १७४ १७४ १७४ १७४ १७५ १७५ १७५ १७५ १७६ १७६ १७६ १७७ १७७ १७७ १७७ १७८ १७८ १७८ १७८ १७९ १७९ १७९ १७९ १८० १८० १८० १८० १८० १८० १८० १८० १८०
विषय
रोगनामनिर्धारण-विचार दोषों का रोगकर्तृत्व चिकित्साविधि-निर्देश दूष्य आदि ज्ञान-निर्देश रोग की गुरुता-लघुता का विचार भ्रिषणबूब की निन्दा शूल का दुष्परिणाम चिकित्सक का कर्तव्य दोषभेदों का वर्णन दोषवृद्धि के तीन भेद संसर्ग के तीन भेद संसर्ग के छः भेद समस्त दोषवृद्धि के १३ भेद १३ भेदों के उदाहरण एक भेद का निर्देश पुनः छः भेद वृद्ध दोषों का योग क्षीण दोषों का योग वृद्धि, सम, क्षय भेद से छः क्षय-वृद्धि भेद से पुनः छः ६ भेद ६२ दोषभेद ६३वों भेद दोषों के अनन्त भेद
पृष्ठांक
१८० १८० १८१ १८१ १८१ १८१ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२ १८२
( १३ ) दोषोपक्रमणीयाध्यायः
वातदोष की चिकित्सा पित्तदोष की चिकित्सा कफदोष की चिकित्सा विषयोपसंहार चिकित्सा-निर्देश चिकित्सा का समय शुद्ध प्रयोग का परिचय दोषों का स्थानान्तर गमन दोषों का कोष्ठगमन पुनः रोगोत्पादन अन्य स्थानों में दोषप्रकोप चिकित्सा-निर्देश तिर्थगत दोष-चिकित्सा चिकित्सा-विधि साम-निराम दोषों के लक्षण
( २७ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| आम का वर्णन | १८८ | स्थूलता से कृशता श्रेष्ठ | १९५ |
| आमसम्बन्धी मतान्तर | १८८ | कृशता, स्थूलता-चिकित्सा | १९५ |
| सामदोष एवं सामरोग | १८८ | कृशता चिकित्सा | १९६ |
| सामदोषों की चिकित्सा | १८८ | मांस की महत्ता | १९६ |
| दोषनिर्हरण-विधि | १८८ | स्थूलता-कृशता की चिकित्सा | १९६ |
| आसन्न दोष का निर्हरण | १८९ | ( १५ ) शोधनादिगणसंग्रहार्धध्यायः | |
| दोषनिर्हरण-निर्देश | १८९ | वमनकारक द्रव्य | १९७ |
| दोषनिर्हरण-विवेक | १८९ | विरेचनकारक द्रव्य | १९७ |
| शोधन का काल | १८९ | निर्हृणोपयोगी द्रव्य | १९८ |
| सहेतुक शोधनकाल | १८९ | शिरोविरेचनोपयोगी द्रव्य | १९८ |
| शोधन का दृष्टिकोण | १८९ | वातनाशक द्रव्य | १९८ |
| शोधन की विशिष्ट विधि | १८९ | पित्तनाशक द्रव्य | १९८ |
| औषधसेवन के १० काल | १९० | कफनाशक द्रव्य | १९८ |
| रोगानुसार औषध-सेवनकाल | १९० | जीवनीय गण | १९८ |
| ( १४ ) द्विविधोपक्रमणीयाध्यायः | विदार्यादि गण | १९८ | |
| चिकित्सा के दो भेद | १९१ | सारिवादि गण | १९९ |
| सन्तर्पण तथा अपतर्पण | १९१ | पद्माकादि गण | १९९ |
| तत्त्वों की प्रधानता | १९१ | पुरुषकादि गण | १९९ |
| स्नेहन आदि का वर्णन | १९१ | अञ्जनादि गण | १९९ |
| प्रत्येक के दो भेद | १९१ | पटोलादि गण | १९९ |
| शोधन कर्म एवं उसके भेद | १९२ | गुड्डुच्चादि गण | १९९ |
| शमन के लक्षण एवं उसके भेद | १९२ | आररब्धादि गण | १९९ |
| बृंहण के लक्षण | १९२ | असनादि गण | २०० |
| सन्तर्पण योग्य रोग-रोगी | १९२ | वर्हणादि गण | २०० |
| सन्तर्पण-चिकित्सा के उपादान | १९२ | ऊष्कादि गण | २०० |
| अपतर्पण योग्य रोग-रोगी | १९२ | वौरतर्वादि गण | २०० |
| शोधन, शमन के योग्य रोग-रोगी | १९३ | रोध्नादि गण | २०० |
| सन्तर्पण का निषेध | १९३ | अर्कादि गण | २०० |
| अपतर्पण-निर्देश | १९३ | सुरसादि गण | २०१ |
| सन्तर्पण के लाभ | १९३ | मुष्ककादि गण | २०१ |
| अपतर्पण के लाभ | १९४ | वत्सकादि गण | २०१ |
| योग, अतियोग, हीनयोग | १९४ | वचादि गण | २०१ |
| उनके लक्षण | १९४ | हरिद्रादि गण | २०१ |
| अतिस्थूलता आदि रोग | १९४ | प्रियङ्गन्वादि गण | २०१ |
| चिकित्सासूत्र | १९४ | अम्बच्छादि गण | २०२ |
| विशेष चिकित्सा | १९४ | मुस्तादि गण | २०२ |
| विडंग्गादि योग | १९४ | न्यग्रोधादि गण | २०२ |
| व्योषादियोग की फलश्रुति | १९५ | एलादि गण | २०२ |
| कृशता आदि रोग | १९५ | श्यामादि गण | २०२ |
विषय
द्रव्यग्रहण -निर्देशि
गणोक्त द्र॒व्यों के प्रयोग
(१६ ) स्नेहविधिरध्यायः
स्नेहन एवं रूक्षण-वर्णन
चार प्रकार के स्नेह
घुत की प्रधानता
स््नेहों के प्रमुख गुण
उत्तरोत्तर गुरुता
स्नेहयोगों के नाम
स्नेहनयोग्य व्यक्ति
स्नेहन के अयोग्य व्यक्ति
घृतस्नेह के योग्य व्यक्ति
तैलस्नेह के योग्य व्यक्ति
वसा-मज्जास्नेह
वसास्नेह का क्षेत्र
ऋतुभेद से स्नेह-निर्देश
दिन में स्नेहसेवन-निर्देश
शीतकाल में तैल-प्रयोग
रात्रि में घृतपान-विधान
कारण-भेद से रात्रि में घृतपान
स्नेहसेवन-विचार
स्नेहसेवन के भेद की युक्ति
स्नेहसेवन - प्रकार
, स्नेह की विचारणाएँ
विचारणा पर विचार
अच्छपेय के लाभ
स्नेहमात्रा-विचार
शोधनार्थ स्नेहमात्रा
शमनार्थ स्नेहमात्रा
बुंहणार्थ स्नेहपान- विधि
बृंहणस्नेहपान के योग्य व्यक्ति
स्नेहसेवन का प्रभाव
विविध स्नेहों के अनुपान
स्नेहपानार्थ आहार-विचार
स्नेहपानार्थ विहार-विचार
सर्वत्र त्याज्य कर्म
शमनस्नेहपान में उपचार
स्नेहपान की अवधि
सम्यक् स्निग्ध पुरुष के लक्षण
है जछ ॥
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विषय
अतिस्निग्ध के लक्षण
मिथ्या स्निग्ध के लक्षण
स्नेहव्यापत्-चिकित्सा
विरूक्षण -निर्देश
स्वेदन आदि के प्रयोग
स्नेहन के पूर्व रूक्षण विधि
असात्म्य स्नेह की शक्ति
सद्यःस्नेहन का निर्देश
सात सद्यःस्नेहन-योग
लवण के गुण
स्नेहनयोगों का निषेध
कुष्ठादि के योग्य स्नेह
क्षीण पुरुषों के योग्य स्नेह
स्नेहसेवन से लाभ
( १७ ) स्वेदविधिरध्याय:
स्वेदन के चार भेद
तापस्वेद का वर्णन
उपनाहस्वेद का वर्णन
बन्धनद्रव्य - निर्देश
ऊष्मस्वेद का वर्णन
द्रवस्वेद का वर्णन
अवगाहनस्वेद -विधि
स्वेदन-विधि
स्वेदन-विधिभेद
दोषभेद से स्वेदन
स्थानभेद से स्वेदन
अन्यत्र स्वेदन-निर्देश
स्वेदन का सम्यक् योग
स्वेदन का अतियोग
स्वेदन एवं स्तम्भन औषध
स्तम्भन के सम्यक् योग के लक्षण
स्तम्भन के अतियोग के लक्षण
स्वेदन के अयोग्य रोगी एवं रोग
स्वेदन के योग्य रोगी
अनाग्नेय स्वेदनयोग्य रोग
अनाग्नेय स्वेदों का वर्णन
स्वेदन-प्रयोग का फल
( १८ ) वमन-विरेचनविधिरध्याय:
वमन-विरेचन-व्यवस्था
पुष्ठांक
२१०
२१०
२१०
२१०
२१०
२१०
२११
२६११
२११
२११
२११
२११
९
२१२
२१३
२१३
२१३
२१४
२१४
२१४
३043.
9४७
श््
३४3
रिहत्
शत
२९५
२९६
२१६
२१६
२९६
२१६
२१७
२१७
२१८
२१८
२१९
( २९ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| वमन-निर्देश | २१९ | औषध-प्रयोग में सावधानी | २२७ |
| वमन के अयोग्य व्यक्ति | २२० | दुर्बल के दोषों पर विचार | २२७ |
| वमन आदि का निषेध | २२० | दोषनिर्हरण की आवश्यकता | २२७ |
| विरेचन के योग्य रोग | २२० | पुनः शोधन-निर्देश | २२७ |
| विरेचन के अयोग्य रोग | २२० | विरेचन में विविध विचार | २२७ |
| वमनकारक औषधद्रव्य एवं प्रयोग-विधि | २२१ | शोधन के अयोग्य रोगी | २२७ |
| वमन की प्रतीक्षा | २२१ | शोधन के भेद | २२७ |
| वमनकारक यल्ल | २२१ | स्नेहन-स्वेदन-प्रयोग | २२७ |
| वमन में औषध-प्रयोग | २२१ | मलों का उल्केशन | २२८ |
| वमन की अवधि | २२२ | स्नेहन-स्वेदन के लाभ | २२८ |
| हीनयोग में औषध-प्रयोग | २२२ | संशोधन से लाभ | २२८ |
| वमन का हीनयोग | २२२ | ( १९ ) बस्तिविधिरध्यायः | |
| वमन का सम्यगयोग | २२२ | बस्ति का वर्णन | २२९ |
| वमन का अतियोग | २२२ | बस्ति का प्रयोग | २२९ |
| वमन के पश्चात् कर्म | २२२ | बस्तिप्रयोग से लाभ | २२९ |
| स्नान एवं भोजन विधि | २२३ | बस्ति-परिचय | २३० |
| पेया आदि क्रम-निर्देश | २२३ | निरुहण के अयोग्य | २३० |
| पेया आदि से लाभ | २२३ | निरुहण एवं अनुवासन के योग्य | २३१ |
| वमन-विरेचन के वेग एवं परिमाण | २२३ | निरुहण एवं अनुवासन के अयोग्य | २३१ |
| वमन-विरेचन की अवधि एवं मान | २२४ | बस्तिनेत्र-परिचय | २३१ |
| भारमापन-विधि | २२४ | नेत्र-निरुक्ति | २३१ |
| वमन के बाद विरेचन | २२४ | नेत्र का आकार | २३१ |
| मुटुकोष्ठ का वर्णन | २२४ | नेत्र की मोटाई | २३२ |
| कूरकोष्ठ का वर्णन | २२४ | बस्तिनेत्र का छिद्र | २३२ |
| दोषानुसार विरेचन | २२४ | कर्णिका का वर्णन | २३२ |
| विरेचक उपाय | २२४ | बस्तिपुट का वर्णन | २३३ |
| पुनः विरेचन-प्रयोग | २२५ | अन्य बस्तिपुट-विधान | २३३ |
| हीनयोग के लक्षण | २२५ | निरुहणबस्ति की मात्रा | २३३ |
| समयोग के लक्षण | २२५ | अनुवासनबस्ति की मात्रा | २३३ |
| अतियोग के लक्षण | २२५ | बस्ति देने की विधि | २३३ |
| समयोग में पश्चात् कर्म | २२५ | बस्तिनेत्र के प्रवेश की विधि | २३४ |
| समयोग में भोजनविधि | २२५ | बस्ति के पश्चात् कर्म | २३४ |
| लंघन-निर्देश | २२५ | स्नेह के लौटने पर आहार | २३४ |
| लंघन का फल | २२६ | स्नेह के न लौटने पर चिकित्सा | २३४ |
| पेया आदि का आवश्यकता | २२६ | विशेष-चिकित्सा | २३४ |
| पेयासेवन का निषेध | २२६ | पुनः अनुवासन-प्रयोग | २३५ |
| वमन-विरेचन की प्रतीक्षा | २२६ | निरुहणबस्ति-प्रयोग | २३५ |
| वमन-विरेचन की चिकित्सा | २२६ | निरुहण-प्रयोगविधि | २३५ |
| मुटुविरेचन का निर्देश | २२६ | बस्तिद्रव-निर्माणविधि | २३५ |
( ३० )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| अन्य आचार्यों का मत | २३६ | वमन आदि में कालनिर्देश | २४२ |
| बस्तिद्रव्य-मिश्रणविधि | २३६ | बस्ति द्वारा दोषनिर्हरण | २४३ |
| निरुहण का पश्चात्कर्म | २३६ | बस्तिप्रयोग की प्रशंसा | २४३ |
| बस्ति के लौटने की अवधि | २३६ | सिरावेध का महत्त्व | २४३ |
| अनेक बस्ति-प्रयोग | २३६ | ( २० ) नस्यविधिरध्यायः | |
| सम्यग्योग आदि का संकेत | २३७ | नस्य का वर्णन | २४४ |
| सम्यग्योग में पश्चात् कर्म | २३७ | नस्यकर्म के भेद | २४४ |
| विकारों का शमन | २३७ | विरेचननस्य का प्रयोग | २४४ |
| पुनः अनुवासन-प्रयोग | २३७ | बृंहणनस्य का प्रयोग | २४५ |
| अनुवासन के विविध योग | २३७ | शमननस्य का प्रयोग | २४५ |
| सम्यग्योग का वर्णन | २३७ | विरेचननस्य के द्रव्य | २४५ |
| दोषानुसार बस्तिसंख्या | २३७ | बृंहणनस्य के द्रव्य | २४५ |
| आहार-विधान | २३८ | शमननस्य के द्रव्य | २४५ |
| वातदोष में बस्तिप्रयोग | २३८ | नस्य के भेद | २४५ |
| पित्तदोष में बस्तिप्रयोग | २३८ | नस्य-प्रयोगविधि | २४५ |
| कफदोष में बस्तिप्रयोग | २३८ | नस्य की मात्रा | २४६ |
| सन्निपात में बस्तिप्रयोग | २३८ | नस्य के अयोग्य व्यक्ति | २४६ |
| तीन ही बस्तियाँ | २३८ | नस्य के योग्य समय | २४६ |
| बस्तिनाम-भेद | २३८ | रोगानुसार नस्य-प्रयोग | २४६ |
| उक्त मतों की प्रामाणिकता | २३८ | नस्यसेवन की सीमा | २४६ |
| बस्तिकर्म की अवधि | २३८ | नस्य का पूर्वकर्म | २४७ |
| बस्तिकर्म का वर्णन | २३९ | नस्य-प्रयोगविधि | २४७ |
| बस्तिकाल का वर्णन | २३९ | मूच्छाशान्ति की विधि | २४७ |
| बस्तियोग का वर्णन | २३९ | स्नेहनस्य-प्रयोग | २४७ |
| स्नेह एवं निरुहण प्रयोग | २३९ | नस्यप्रयोग की प्रतीक्षा | २४७ |
| बस्तियों का प्रयोगक्रम | २३९ | धूमपान-प्रयोग | २४७ |
| बस्ति की त्रिदोषनाशकता | २३९ | स्नेहननस्य का सम्यग्योग | २४८ |
| मात्राबस्ति का वर्णन | २३९ | लूक्षनस्य का हीनयोग | २४८ |
| मात्राबस्ति-सेवन | २४० | स्नेहननस्य का अतियोग | २४८ |
| मात्राबस्ति की विशेषता | २४० | विरेचननस्य का सम्यग्योग | २४८ |
| उत्तरबस्ति का वर्णन | २४० | मिथ्यायोग, हीनयोग के लक्षण | २४८ |
| उत्तरबस्ति में नेत्र का प्रमाण | २४० | प्रतिमर्शनस्य-प्रयोग | २४८ |
| स्नेहमात्रा का प्रमाण | २४० | प्रतिमर्शनस्य का निषेध | २४८ |
| उत्तरबस्ति-प्रयोगविधि | २४१ | प्रतिमर्शनस्य के काल | २४८ |
| उत्तरबस्ति की संख्या | २४२ | प्रतिमर्शनस्य के लाभ | २४९ |
| स्त्रियों में उत्तरबस्ति | २४२ | अवस्था का विचार | २४९ |
| बस्तिनेत्र का परिमाण | २४२ | नस्य में तेल का प्रयोग | २४९ |
| स्नेहमात्रा का निर्देश | २४२ | मर्श-प्रतिमर्श में फलभेद | २४९ |
| उत्तरबस्ति-प्रयोगविधि | २४२ | अणुतेल का वर्णन | २५० |
( ३१ )
विषय
स्नेहनस्य से लाभ
( २१ ) धूमपानविधिरध्यायः
धूमपानविधि का वर्णन धूम के भेद तथा प्रयोग धूमपान का निषेध धूमपान से हानि धूमपानजनित रोगों की चिकित्सा त्रिविध धूम के सेवनकाल धूमनेत्र का वर्णन धूमनेत्र की लम्बाई धूमपान की विधि नासिका एवं मुख से धूमपान धूम का निर्हरण नासिका से धूम न निकालें तीन बार धूमपान करें धूमपान की संख्या मृदुधूम के द्रव्य मध्यधूम के द्रव्य तीक्ष्णधूम के द्रव्य धूमवर्ति-निर्माणविधि कासघ्न धूमपान-विधि धूमपान के लाभ
( २२ ) गण्डूषादिविधिरध्यायः
गण्डूष के भेद गण्डूषों के प्रयोग स्निग्ध-गण्डूष शमन-गण्डूष शोधन-गण्डूष रोपण-गण्डूष गण्डूषों में द्रव्यप्रयोग रोगानुसार गण्डूषप्रयोग स्वस्थ के लिए गण्डूष घी या दूध का गण्डूष मधुगण्डूष-प्रयोग काज़ी के गण्डूष क्षाराम्लगण्डूष सुवोष्णोदकगण्डूष गण्डूष-प्रयोगविधि गण्डूषधारण-अवधि
पृष्ठांक
विषय
२५० गण्डूष एवं कवल परिभाषा कवलधारण के लाभ २५१ प्रतिसारण के भेद २५१ प्रतिसारण का प्रयोग २५२ मुखालेप के तीन भेद २५२ मुखालेप का उपयोग २५२ मुखालेप का प्रमाण २५२ लेपसम्बन्धी निर्देश २५२ मुखालेप में अपथ्य २५२ मुखालेप का निषेध २५३ मुखालेप का सम्यग्योग २५३ मुखालेप के ६ योग २५३ मुखालेप से लाभ २५३ मूर्धतैल के ४ भेद २५३ उत्तरोत्तर गुणवत्ता २५३ अभ्यंग का प्रयोग २५४ परिषेक का प्रयोग २५४ पिचु का प्रयोग २५४ बस्ति का प्रयोगस्थल २५४ शिरोबस्ति-सेवनविधि २५४ शिरोबस्ति-धारणकाल २५५ पश्चात्-कर्म २५५ शिरोबस्तिसेवन-अवधि २५६ कर्णपूर्ण का काल २५६ मात्राकाल की परिभाषा २५६ मूर्धतैल का फल
( २३ ) आश्र्वोतनाञ्जनविधिरध्यायः
२६३ आश्र्वोतन का वर्णन २६३ दोषानुसार आश्र्वोतन २६३ आश्र्वोतन-विधि २६४ आश्र्वोतन का निषेध २६४ आश्र्वोतन के लाभ २६४ अंजनप्रयोग के लाभ २६४ अंजन के तीन भेद २६५ लेखन अंजन-परिचय २६५ रोपण अंजन-परिचय २६५ प्रसादन अंजन-परिचय २६५ प्रत्यञ्जन २६५ अञ्जनशलाका
पृष्ठांक
२५८ २५८ २५८ २५९ २५९ २५९ २५९ २५९ २५९ २६० २६० २६० २६० २६१ २६१ २६१ २६१ २६१ २६१ २६२ २६२
( ३२ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| अज्ञनों की त्रिविध कल्पना | २६५ | यन्त्रों की विविधता | २७५ |
| अज्ञनों की मात्रा | २६५ | स्वस्तिकयन्त्र-परिचय | २७५ |
| तीक्ष्ण अज्ञनों की मात्रा | २६५ | सन्दशयन्त्र-परिचय | २७५ |
| अज्ञनप्रयोग-निर्देश | २६६ | सन्दशयन्त्र के भेद | २७५ |
| अन्य आचार्यों का मत | २६६ | मुजुण्डायन्त्र का वर्णन | २७५ |
| तीक्ष्णाज्ञन का रात्रिप्रयोग | २६६ | ताल्ययन्त्र-परिचय | २७६ |
| उष्णकाल में तीक्ष्णाज्ञन-निषेध | २६६ | नाडीयन्त्र-परिचय | २७६ |
| लौह एवं नेत्र की समानता | २६६ | कण्ठशल्यावलोकनी नाड़ी | २७६ |
| तीक्ष्ण अज्ञन का निषेध | २६६ | द्विकर्ण, चतुष्कर्ण नाडीयन्त्र | २७६ |
| अज्ञन के अयोग्य व्यक्ति | २६७ | विविध नाडीयन्त्र | २७६ |
| निषिद्ध अज्ञन का वर्णन | २६७ | शल्यनिर्घातनी नाड़ी | २७७ |
| अज्ञन-प्रयोगविधि | २६७ | अशौयन्त्र-परिचय | २७७ |
| नेत्रप्रक्षालन-विधि | २६७ | शमीयन्त्र-परिचय | २७७ |
| नेत्रशोधन-विधि | २६७ | भगन्दर-यन्त्र | २७७ |
| नेत्रशोधन में हेतु | २६७ | घ्राणयन्त्र-परिचय | २७७ |
| तीक्ष्णाज्ञन या धूमपान | २६८ | अंगुलित्राणक यन्त्र | २७७ |
| प्रत्यञ्जन का वर्णन | २६८ | योनिव्रणेश्मण यन्त्र | २७८ |
| ( २४ ) तर्पणपुटपाकविधिरध्यायः | नाडीव्रण के यन्त्र | २७८ | |
| तर्पणविधि-वर्णन | २६९ | नाडीयन्त्र | २७८ |
| तर्पण की दूसरी विधि | २६९ | अन्य अनेक यन्त्र | २७८ |
| स्नेह-धारणकाल | २७० | भृंगानाडीयन्त्र | २७८ |
| तर्पण का पश्चात् कर्म | २७० | तुम्बीयन्त्र-परिचय | २७९ |
| दोषानुसार तर्पण | २७० | घटीयन्त्र-परिचय | २७९ |
| तर्पण के विविध योग | २७० | शलाकायन्त्र | २७९ |
| पुटपाक का वर्णन | २७१ | एषणी शलाका | २७९ |
| दोषानुसार पुटपाक-प्रयोग | २७१ | स्रोतःशल्यहारिणी शलाका | २७९ |
| स्नेहन पुटपाक के द्रव्य | २७१ | छः शंकुयन्त्र | २८० |
| लेखन पुटपाक के द्रव्य | २७१ | व्युहन शंकुयन्त्र | २८० |
| प्रसादन पुटपाक के द्रव्य | २७१ | चालन शंकुयन्त्र | २८० |
| पुटपाक-रचनाविधि | २७२ | आहार्य शंकुयन्त्र | २८० |
| धारणकाल-अवधि | २७२ | गर्भशंकुयन्त्र | २८० |
| उष्णशीत-प्रयोगभेद | २७२ | अश्मरीहरण यन्त्र | २८० |
| पश्चात्-कर्म | २७२ | दन्तपातन यन्त्र | २८० |
| योगों का निर्देश | २७२ | प्रमार्जनी शलाकायन्त्र | २८० |
| तर्पण एवं पुटपाक का निषेध | २७२ | पायुयन्त्र | २८० |
| तर्पण एवं पुटपाक की अवधि | २७२ | घ्राण एवं कर्णयन्त्र | २८१ |
| नेत्ररक्षा की आवश्यकता | २७३ | कर्णशोधन-यन्त्र | २८१ |
| ( २५ ) यन्त्रविधिरध्यायः | विविध शलाकायन्त्र | २८१ | |
| यन्त्रों का वर्णन | २७४ | अनुयन्त्रों का वर्णन | २८१ |
( ३३ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| यन्त्रों के विविध कर्म | २८२ | जौक रखने एवं लगाने की विधि | २९० |
| कंकमुख यन्त्र | २८२ | दुष्टरक्तग्रहण-दुष्टान्त | २९० |
| ( २६ ) शस्त्रविधिरध्यायः | जौक छड़ाने की स्थिति | २९० | |
| शस्त्रों का वर्णन | २८३ | जौक का उपचार | २९१ |
| मण्डलमशस्त्र | २८४ | रक्तमद से रक्षा | २९१ |
| वृद्धिपत्रशस्त्र | २८४ | रक्तवमन का सम्यग्योग | २९१ |
| उत्पल, अर्धघंटाकर शस्त्र | २८४ | रक्तवमन का अतियोग | २९१ |
| सर्पवक्त्र-शस्त्र | २८४ | रक्तवमन का मिथ्यायोग | २९१ |
| १. एषणी-शस्त्र | २८४ | जलौका-पालनविधि | २९१ |
| २. एषणी-शस्त्र | २८४ | जलौकावचारण का पश्चात् कर्म | २९१ |
| वेतस-शस्त्र | २८५ | रक्तावरोधक उपचार | २९१ |
| शरारिमुख, त्रिकूर्चक शस्त्र | २८५ | रक्तघ्रावण का फल | २९२ |
| कुशपत्रक एवं आटामुख शस्त्र | २८५ | पुनः रक्तघ्रावण | २९२ |
| अन्तर्मुख-शस्त्र | २८५ | अलाबूयन्त्र निषिद्ध | २९२ |
| ब्रीहिमुख-शस्त्र | २८५ | अलाबूयन्त्रप्रयोग विहित | २९२ |
| कुठारी-शस्त्र | २८५ | शृंगयन्त्रप्रयोग-निषेध | २९२ |
| ताम्रशलाका-शस्त्र | २८५ | शृंगयन्त्रप्रयोग-निर्देश | २९२ |
| अंगुली-शस्त्र | २८६ | प्रच्छानकर्म-निर्देश | २९२ |
| बडिशा-शस्त्र | २८६ | प्रच्छान आदि का विकल्प | २९२ |
| करपत्र-शस्त्र | २८६ | जलौका-प्रयोग | २९२ |
| कर्तरी-शस्त्र | २८६ | तुम्बी एवं शृंगी यन्त्र | २९३ |
| नख-शस्त्र | २८६ | सिरावेध-प्रयोग | २९३ |
| दन्तलेखनक-शस्त्र | २८६ | रक्तघ्रावण-विधिविकल्प | २९३ |
| सूचीशस्त्र | २८६ | रक्तघ्रावण में उपद्रव एवं शान्ति | २९३ |
| कूर्च-शस्त्र | २८७ | ( २७ ) सिराव्यधविधिरध्यायः | |
| खजशस्त्र | २८७ | शुद्धरक्त का वर्णन | २९४ |
| मृथिका-शस्त्र | २८७ | रक्तदूषक तत्त्व | २९४ |
| आराशस्त्र | २८७ | रक्तज रोग | २९५ |
| कर्णबिधनी सूची | २८७ | सिरावेध का निर्देश | २९५ |
| अनुशस्त्रों का परिगणन | २८८ | सिरावेध-विधि | २९५ |
| शस्त्रकर्मों का वर्णन | २८८ | रोगविशेष में सिरावेध | २९५ |
| शस्त्रों के आठ दोष | २८८ | कर्णरोग में सिरावेध | २९५ |
| शस्त्रग्रहण-विधि | २८८ | नासारोग में सिरावेध | २९६ |
| शस्त्रकोष का विस्तार | २८९ | पीनसरोग में सिरावेध | २९६ |
| जौकों का प्रयोग | २८९ | मुखरोग में सिरावेध | २९६ |
| त्याज्य जौकों का वर्णन | २८९ | जत्रुध्वंरोगों में सिरावेध | २९६ |
| त्याज्य जौकों का निषेध | २८९ | उन्मादरोग में सिरावेध | २९६ |
| गह्म जौकों का वर्णन | २९० | अपस्माररोग में सिरावेध | २९६ |
| त्याज्य जौकों के लक्षण | २९० | विद्रधि एवं पाश्चर्वशूल में सिरावेध | २९६ |
३ अ० भू०
( ३४ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| तृतीयकज्वर में सिरावेध | २९६ | पुनः सिरावेध | ३०२ |
| चतुर्थकज्वर में सिरावेध | २९६ | अधिक रक्तघ्राव का निषेध | ३०२ |
| प्रवाहिकारोग में सिरावेध | २९६ | भृंगयन्त्र का प्रयोग | ३०२ |
| शुक्र एवं शिशुनरोगों में सिरावेध | २९८ | रक्तशुद्धि के उपाय | ३०२ |
| गलगण्डरोग में सिरावेध | २९७ | स्तम्भनक्रिया-निर्देश | ३०२ |
| गुग्घसीरोग में सिरावेध | २९७ | रक्तस्सम्भन-उपचार | ३०२ |
| अपचीरोग में सिरावेध | २९७ | रक्तघ्रावण का पश्चात् कर्म | ३०२ |
| प्रमुख वातरोगों में सिरावेध | २९७ | रक्तघ्रावण में पथ्य | ३०३ |
| पादवाह आदि में सिरावेध | २९७ | रक्तशुद्धि के लक्षण | ३०३ |
| विश्वनाचीरोग में सिरावेध | २९७ | ( २८ ) शल्याहरणविधिर्ध्यायः | |
| अन्यत्र सिरावेध-निर्देश | २९७ | शल्य की गतिर्था | ३०४ |
| सिरायन्त्रण-विधि | २९७ | अन्तःशल्य के लक्षण | ३०४ |
| सिरावेधन-विधि | २९८ | त्वचागत शल्य के लक्षण | ३०४ |
| कुठारिका-प्रयोग | २९८ | मांसगत शल्य के लक्षण | ३०५ |
| उपनासिका-सिरावेध | २९८ | पेशीगत शल्य के लक्षण | ३०५ |
| जिह्वासिरावेध | २९८ | स्नायुगत शल्य के लक्षण | ३०५ |
| ग्रीवासिरावेध | २९८ | सिरागत शल्य के लक्षण | ३०५ |
| बाहुसिरावेध | २९९ | स्रोतोगत शल्य के लक्षण | ३०५ |
| पाशर्वस्थ सिरावेध | २९९ | धमनीगत शल्य के लक्षण | ३०५ |
| लिंग का सिरावेध | २९९ | अस्थिसन्धिगत शल्य के लक्षण | ३०५ |
| जंघासिरावेध | २९९ | अस्थिगत शल्य के लक्षण | ३०६ |
| पादसिरावेध | २९९ | सन्धिगत शल्य के लक्षण | ३०६ |
| सिरावेध-निर्देश | २९९ | कोष्ठगत शल्य के लक्षण | ३०६ |
| वेध का परिमाण | २९९ | मर्मागत शल्य के लक्षण | ३०६ |
| सम्यक् वेध का वर्णन | २९९ | सामान्य निर्देश | ३०६ |
| दुर्बेध आदि का वर्णन | २९९ | शल्यव्रण का रोपण | ३०६ |
| रक्त न बहने के कारण | ३०० | पुनः पीड़ाकर्तृत्व | ३०६ |
| रक्तघ्रावण के उपाय | ३०० | शल्यज्ञान के उपाय | ३०७ |
| रक्तघ्राव-वर्णन | ३०० | मांसगत शल्य | ३०७ |
| घ्रावण-उपायों का निषेध | ३०० | पेशी आदिगत शल्य | ३०७ |
| मूच्छ्छा में कर्तव्य | ३०० | अस्थिगत शल्य | ३०७ |
| वातदूषित रक्त के लक्षण | ३०० | सन्धिगत शल्य | ३०७ |
| पित्तदूषित रक्त के लक्षण | ३०१ | स्नायु आदिगत शल्य | ३०७ |
| कफदूषित रक्त के लक्षण | ३०१ | मर्मागत शल्य | ३०७ |
| द्वन्द्वज रक्त के लक्षण | ३०१ | सामान्य निर्देश | ३०७ |
| त्रिदोषज रक्त के लक्षण | ३०१ | शल्य के स्वरूपों का अनुमान | ३०७ |
| सिरावेध में रक्त का परिमाण | ३०१ | शल्यनिर्हरण के उपाय | ३०८ |
| विविध चिकित्सा | ३०१ | अर्वाचीन आदि शल्य | ३०८ |
| उपचार-विधि | ३०१ | तिर्यग्गत शल्य | ३०८ |
( ३५ )
विषय
निर्घातन के अयोग्य शल्य विशाल्यन्त शल्याहरण-निषेध शल्यनिर्हरण-विधि दृश्यशल्यनिर्हरण अदृश्यशल्यनिर्हरण संदेशवन्त्र-प्रयोग तालयन्त्र-प्रयोग नाडीयन्त्र-प्रयोग शेषयन्त्र-प्रयोग निर्हुत शल्य का पश्चात्कर्म सिरा, स्नायुगत शल्य हृदयगत शल्य शल्याहरण की अन्य विधि अस्थिगत शल्य दूसरी विधि तीसरी विधि चौथी विधि पाँचवीं विधि छठी विधि सातवीं विधि आठवीं विधि नवीं विधि दसवीं विधि पक्वाशयगत शल्य वात आदि शल्य कण्ठस्रोतोगत शल्य जतुशल्यनिर्हरण अन्य शल्यनिर्हरण गले में फँसे हुए शल्य को निकालना आँख एवं व्रण में पड़े शल्य को निकालना उदरगत जल निकालने की विधि कर्णगत जल एवं क्रिमि निकालने की विधि शरीर में शल्य का विलयन विलीन न होने वाले शल्य शल्यनिर्हरणोपाय शल्यनिर्हरण-निर्देश
पृष्ठांक
३०८ ३०८ ३०९ ३०९ ३०९ ३०९ ३०९ ३०९ ३०९ ३०९ ३१० ३१० ३१० ३१० ३१० ३१० ३१० ३१० ३१० ३११ ३११ ३११ ३११ ३११ ३११ ३११ ३१२ ३१२ ३१२ ३१२ ३१३ ३१३ ३१४
विषय
आमशोथ के लक्षण पच्यमान व्रणशोथ के लक्षण पक्वशोथ के लक्षण व्रण में वात आदि के लक्षण अतिपक्व व्रण के लक्षण गम्भीर पाक का वर्णन दारण एवं पाटन लेप शस्त्रकर्म का निषेध शस्त्रकर्म का विधान अनिश्चितकारी वैद्य की निन्दा शस्त्रकर्म के पूर्वकर्म आहार एवं मरुपापन का निषेध शस्त्रप्रयोग-विधि महान् व्रणशोथ में कर्तव्य प्रशस्त शल्यचिकित्सक तिर्यक्छेदन-विधि पश्चात्कर्म-निर्देश पट्टी आदि का निर्देश व्रणरक्षा-विधान औषधधारण-निर्देश आचार-निर्देश दिन में सोने का निषेध अन्य निषिद्ध कर्म व्रणरोगी का आहार लाभ एवं हानि त्याज्य आहार व्रणोपचारार्थ उपदेश पुनः प्रशालन आदि कर्म विकेशिका-वर्णन इनके दुष्परिणाम विकेशिका का सद्उपयोग विरुद्धव्रण का उपचार सद्योव्रण के उपचार सीवनकर्म का निषेध सीवनकर्म-विधि सीवन का पश्चात् कर्म सीवनकर्म का निर्देश बन्धनद्रव्यों का वर्णन बन्धनभेदों का निर्देश
पृष्ठांक
३१५ ३१५ ३१६ ३१६ ३१६ ३१६ ३१६ ३१७ ३१७ ३१७ ३१७ ३१८ ३१८ ३१८ ३१९ ३१९ ३१९ ३२० ३२० ३२० ३२० ३२१ ३२१ ३२१ ३२१ ३२२ ३२२ ३२२ ३२२ ३२२ ३२३ ३२३ ३२४
( २९ ) शस्त्रकर्मविधिरध्यायः
व्रण के उपचार व्रणशोथ-चिकित्सा
३१५ ३१५
( ३६ )
| विषय | पृष्ठांक | विषय | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| पुनः बन्धभेद-निर्देश | ३२४ | दुर्दग्ध के लक्षण | ३३२ |
| ब्रणबन्धन आवश्यक | ३२५ | पुनः क्षार-प्रयोग | ३३२ |
| ब्रणबन्धन से लाभ | ३२५ | अतिदग्ध के लक्षण | ३३२ |
| पवदान-उपक्रम | ३२५ | अतिदग्ध गुद के लक्षण | ३३२ |
| ब्रणबन्धन का निषेध | ३२६ | अतिदग्ध नासा के लक्षण | ३३२ |
| ब्रणज क्रिमियों का वर्णन | ३२६ | श्रोत्रादि दग्ध के लक्षण | ३३२ |
| रोपण में शीघ्रता का निषेध | ३२६ | क्षार का शमन कर्म | ३३३ |
| रोपण के पश्चात् कर्म | ३२७ | क्षारप्रयोग से हानि-लाभ | ३३३ |
| चिकित्सा-निर्देश | ३२७ | अश्विकर्म की प्रधानता | ३३३ |
| ( ३० ) क्षाराश्विकर्मविधिरध्यायः | अश्विकर्म का प्रयोग | ३३३ | |
| क्षार-प्रशंसा | ३२८ | त्वचारोगों में अश्विकर्म | ३३३ |
| पानीयक्षार-प्रयोग | ३२८ | मांसरोगों में अश्विकर्म | ३३३ |
| अन्यत्र क्षार-प्रयोग | ३२८ | सिरादि रोगों में अश्विकर्म | ३३४ |
| क्षारप्रयोग का निषेध | ३२९ | अश्विकर्म का निषेध | ३३४ |
| मध्यम क्षारनिर्माण की विधि | ३२९ | सम्यग्दग्ध का पश्चात् कर्म | ३३४ |
| क्षारगालन-विधि | ३३० | सम्यग्दग्ध का लक्षण | ३३४ |
| मुदु क्षार बनाने की विधि | ३३० | दुर्दग्ध आदि के लक्षण | ३३४ |
| तीक्ष्ण क्षार बनाने की विधि | ३३० | अग्निदग्ध के भेद | ३३४ |
| तीक्ष्ण, मध्य, मुदु क्षारों के प्रयोग | ३३० | तुच्छ(त्य) दग्ध के लक्षण | ३३४ |
| क्षार के १० गुण | ३३० | दुर्दग्ध के लक्षण | ३३५ |
| क्षार का सम्यक् योग | ३३१ | अतिदग्ध के लक्षण | ३३५ |
| क्षारप्रयोग की विधि | ३३१ | अग्निदग्ध की चिकित्सा | ३३५ |
| अशोर् पर क्षार-प्रयोग | ३३१ | दुर्दग्ध की चिकित्सा | ३३५ |
| वर्त्मरोगों पर क्षार-प्रयोग | ३३१ | सम्यग्दग्ध-चिकित्सा | ३३५ |
| नासाशर्ष पर क्षार-प्रयोग | ३३१ | अतिदग्ध-चिकित्सा | ३३५ |
| कर्णाशर्ष पर क्षार-प्रयोग | ३३१ | स्नेहदग्ध-चिकित्सा | ३३५ |
| क्षार का पश्चात् कर्म | ३३१ | शस्त्र आदि का प्रयोग | ३३५ |
| क्षारदग्ध ब्रण का रोपण | ३३२ | विविध सूत्रों का वर्णन | ३३६ |
| सम्यग्दग्ध के लक्षण | ३३२ |
॥ श्रीः ॥
श्रीमद्वाग्भटविरचितम्
अष्टाङ्गहृदयम्
‘निर्मल’ भिधया हिन्दीव्याख्यया विशेषवक्तव्यादिभिश्च विभूषितम्
सूत्रस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
मङ्गलाचरणम्
रागादिरोगान् सततानुपस्नानशेषकायप्रसृतानशेषान् । औत्सुक्यमोहारतिदाञ्चघान योऽपूर्ववैद्याय नमोऽस्तु तस्मै ॥ १ ॥
व्याख्याकर्तृर्मङ्गलाचरणम्
धन्वन्तरि पशुपतिं गिरिजां गणेशं नत्वाऽधुना चरकसुश्रुतवाग्भटादीन् ।
स्मृत्वा भिषगुरुवरान् यशसा समुद्धान् श्रीलालचन्द्रचरणान् प्रणतोऽस्मि शश्वत् ॥ १ ॥
युगानुरूपसन्दर्भसंज्ञया सफलकृतम् । अष्टाङ्गहृदयं येन वाग्भटं तं स्मराम्यहम् ॥ २ ॥
कृपाकटाक्षतो येषां प्रवृत्तोऽस्म्यलघीरपि । टीकायां वाग्भटस्यास्य वन्दे तान् गुरुपुङ्गवान् ॥ ३ ॥
अष्टाङ्गहृदये टीकाः प्राप्यन्ते पूर्वसूरिणाम् । तथाप्यभिनवां कुर्वं ‘निर्मलं’ विश्वार्थदाम् ॥ ४ ॥
तारादत्ततनुजस्य ब्रह्मानन्दत्रिपाठिनः । अनया टीकया भूयात् सन्तोषो विदुषां सताम् ॥ ५ ॥
यदि कथमपि किञ्चिद् बुद्धिदोषात् प्रमादान्मनुजसुलभभावाट्टीकने वाग्भटस्य ।
स्खलनमिह भवेच्चैन्मक्तुं तत्क्षमन्तां प्रमुतयुगकराब्जो याचतेऽयं त्रिपाठी ॥ ६ ॥
जो राग आदि रोग सदा मानव मात्र के पीछे लगे रहते हैं, जो सम्पूर्ण शरीर में फैले रहते हैं और जो उत्सुकता, मोह तथा अरति (बैबेनी) को उत्पन्न करते रहते हैं, उन सबको जिसने नष्ट किया उस अपूर्व वैद्य को हमारा (ग्रन्थकार का) नमस्कार हो ॥ १ ॥
बक्तव्य—रागादिरोगान्—राग, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, ईर्ष्या आदि को मानसिक रोग कहा गया है। इन मानसिक रोगों में मन आदि का आधार देह है, अतः ये रोग आधारारधेयभाव से मन के साथ-ही-साथ देह को भी पीड़ित करते हैं। जैसे तपा हुआ लोहे का गोला जिस कड़ाही आदि पात्र में रखा रहेगा उसे भी तपाता है, ठीक उसी प्रकार राग आदि मानसिक रोग मन के साथ देह को भी पीड़ित करते हैं। शुद्ध चित्त वाले पुरुष को ये रागादि रोग नहीं होते।
२
अष्टाङ्गहृदय
अशेषकायप्रसुतान्—नैसा कि ऊपर कहा गया है कि रागादि दोषों का प्रभाव मन तथा शरीर दोनों पर पड़ता है, अतएव ये उत्सुकता ( इन्द्रियों के विषयों को ग्रहण करने की प्रबल अभिलाषा ), मोह ( यह कार्य करना चाहिए या नहीं—इसका ज्ञान न होना ) तथा अरति ( किसी एक स्थान पर खड़ा होना या बैठने की इच्छा का न होना अर्थात् बेचैनी )—इन कारणों से मानव की मानसिक एवं शारीरिक स्थिति विषम हो जाती है, क्योंकि ये रोग सम्पूर्ण शरीर में फैले रहते हैं, इस वाक्य से समस्त शरीरधारियों व सभी रोगों का ग्रहण किया गया है।
‘औत्सुक्य’ शब्द की ऊपर व्याख्या की गयी है, तदनुसार श्रीकृष्ण द्वारा गीता में दिया सन्देश भी यहाँ स्मरणीय है—‘ध्यायतो विषयान् पुंसः...बुद्धिनाशात् प्रणशयति’॥ ( गीता २।६२-६३ ) अर्थात् इन्द्रिय सम्बन्धी विषयों को प्राप्त करने की जब मानव चिन्ता करता है तो सर्वप्रथम उसके वास्तविक मार्ग में रुकावट आती है अर्थात् राग ( रजोगुण ) का उदय होता है, इससे कामवासना का जन्म होता है, असफलता मिलने पर क्रोध की उत्पत्ति होती है। क्रोध के बाद सम्मोह ( चित्त में अनेक विकारों का उदय ) होता है, सम्मोह से स्मृतिविभ्रम, स्मृतिविभ्रम से बुद्धि ( विवेकशक्ति ) का नाश हो जाता है और बुद्धिनाश से मानव के इस लोक तथा परलोक सभी का नाश हो जाता है। यही विनाशकर्म है ‘रागादि रोगों’ का।
अपूर्ववैद्याय—श्री अरुणदत्त कहते हैं—‘पूर्वभ्यः प्रथमः’ अर्थात् सर्वप्रथम या सर्वथेष्ठ वैद्य, जिसने अपने राग आदि दोषों को नष्ट करके फिर प्राणिमात्र को रोगों से मुक्त होने के उपायों का सद्पुदेश दिया, उसे श्रीवाग्भट ग्रन्थारम्भ में प्रणाम करते हैं।
वाग्भट नाम से ‘अष्टांगसंग्रह’ तथा ‘अष्टांगहृदय’ दोनों ग्रन्थ जुड़े हैं। इस दृष्टि से जब हम अष्टाङ्ग-संग्रह-सूत्रस्थान के प्रथम मंगलाचरण पद्य ‘तुष्णादेव्यं...बुद्धाय तस्मै नमः’ का अवलोकन करते हैं, तो हमें ‘धम्मपद’ यमक वर्ग के एक पद्य का स्मरण हो आता है, जो इस प्रकार है—
‘अलपापि संहितां भाषम’गो धर्मस्य भवत्यनुधर्मचारी। रागद्वेषं प्रहाय मोहं सत्यक् प्रजानन् सुविमुक्तचित्तः॥ अनुपादददिह वाऽमुत्र वा स भगवान् श्रामण्यस्य भवति’।
अर्थात् जो मनुष्य थोड़ी-सी भी धर्मसंहिता को पढ़कर उसके अनुसार स्वयं धर्म का आचरण करने लगता है और जो राग-द्वेष आदि मानसिक विकारों का परित्याग करके सांसारिक कर्मों को भलीभाँति जानता हुआ भी उनका ग्रहण न करता हुआ विमुक्त ( उन कर्मों के प्रति अनासक्तभाव से ) रहता है, वह इस लोक तथा परलोक में धम्मणता का अधिकारी बनकर बन्धनों ( रागादि रोगों ) से मुक्त रहता है। इसी के आगे अष्टांगसंग्रह का दूसरा पद्य भी प्रायः इसी आशय का है—‘रागादिरोगाः...पितामहदादीन्’। पद्य का आशय इस प्रकार है—जिसने अपने तथा संसार के प्राणियों के स्वाभाविक राग आदि सब रोगों को जड़ से उखाड़ कर दूर फेंक दिया, उस एक मात्र वैद्य को तथा आयुर्वेदशास्त्र को जानने वाले अथवा उसके प्रवर्तक ब्रह्मा आदि को मैं प्रणाम करता हूँ। यहाँ भी पितामह आदि के पूर्वकथित ‘तमेकवैद्यं’ शब्द ‘अपूर्ववैद्य’ का स्मारक है, अथवा हम यह भी कह सकते हैं कि उक्त अष्टांगसंग्रहोक्त पद्य की भाषा को बदल कर ही अष्टांगहृदय यह पद्य कहा गया है।
अथात आयुष्कामीयमध्यायं व्याख्यास्यामः।
अब हम यहाँ से आयुष्कामीय ( आयु की कामना करने वालों के लिए जो हितकर है, उस ) अध्याय की व्याख्या करेंगे।
वक्तव्य—‘अथातः’ पद में प्रयुक्त ‘अथ’ मंगलवाचक शब्द है। ग्रन्थारम्भ में मंगल( कल्याण )वाचक शब्दों के प्रयोग का उद्देश्य यह होता है कि उस शास्त्र की पूर्ति तथा उसके अध्ययनकर्ताओं की अभोष्ट
आयुष्कामीयाध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
३
सिद्धि निर्विघ्न हो जाती है। जैसा कि कहा गया है—‘अकारश्चाथशब्दश्च द्रावैतौ ब्रह्मणः पुरा। कण्ठं भित्त्वा विनिर्याती तेनेमौ मङ्गली स्मृतौ’॥
आयुष्कामीयम् —आयुः (दीर्घायुः पूर्णायुः च) कामयन्ते ये ते आयुष्कामाः, तेष्यो हितः अध्यायः आयुष्कामीयः। अर्थात् दीर्घायु अथवा पूर्णायु की कामना करने वालों के लिए जो हितकर अध्याय है, उसे ‘आयुष्कामीय’ अध्याय कहा जाता है। यहाँ प्रयुक्त ‘आयुः’ शब्द की व्याख्या महर्षि आत्रेय के अनुसार इस प्रकार है—‘शरीरिन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो धारि जीवितम्। नित्यगन्धानुबन्धश्च पययिरायुःकृत्ते’॥ (च.सू. १।४१)
अध्यायम् —पदसमुदाय का नाम ‘वाक्य’ है। यथा—‘मुत्तिडन्तचयो वाक्यम्’। वाक्यों के समूह का नाम ‘प्रकरण’ है, प्रकरण-समुदाय को ही ‘अध्याय’ कहते हैं, अध्याय-समूह को ‘स्थान’ कहते हैं। सूत्रस्थान आदि अन्य स्थानों के समूह को ‘तन्त्र’ कहते हैं। जैसे—चरकतन्त्र, सुश्रुततन्त्र आदि। काव्यालंकार में इस प्रकार की वाक्यरचना को उत्तरालंकार कहते हैं। यथा—‘उत्तरवचनश्रवणादुत्सयनं यत्र पूर्ववचनानाम्। क्रियते तदुत्तरं स्यादिति’। चरक ने अपनी संहिता में इस प्रकार के आशय से सम्पन्न अध्याय का नाम ‘दीर्घजीवतीय’ रखा है।
व्याख्यास्यामः —यद्यपि ‘अष्टांगहृदय’ नामक तन्त्र का तन्त्रकार एक (वाग्भट) ही है, फिर यहाँ बहुवचन के प्रयोग की क्या आवश्यकता है? इसका व्याकरणसम्मत समाधान इस प्रकार है—‘अस्मदो द्रव्योश्च (१।२।५९)—एकत्वे द्वित्वे च विवक्षितेऽस्मदो बहुवचनं वा स्यात्’। जैसे—हम जा रहे हैं अथवा मैं जा रहा हूँ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः।
इस विषय में आत्रेय आदि महर्षियों ने इस प्रकार कहा था।
वक्तव्य —महर्षि वाग्भट का कथन है कि प्रस्तुत तन्त्र में जो कुछ भी कहा गया है, वह महर्षि आत्रेय तथा धन्वन्तरि आदि महर्षियों के वचनों के अनुसार ही कहा गया है। ये आप्त पुरुष थे, क्योंकि प्रामाणिकता आप्तपुरुषों के वचनों में ही होती है। इसीलिए हमने उक्त महर्षियों के वचनों का अनुसरण किया है, अतएव हमारे इस तन्त्र में भी कोई अप्रामाणिक विषय नहीं आया है, इसलिए हम (वाग्भट) भी आप्त (प्रामाणिक) हैं। इसीलिए अष्टांगसंग्रह में वाग्भट ने कहा है—‘न मात्रामात्रमप्यत्र किञ्चिदागमवर्जितम्’। (अ.सं. १।२२) अर्थात् इस ग्रन्थ में मात्रा (ज, अ, बिन्दु, विसर्ग) आदि भी आगम (शास्त्र) से अतिरिक्त नहीं है अर्थात् जो भी कहा या लिखा गया है, वह सब शास्त्रानुकूल ही है। इस कथन के द्वारा महर्षि ने अपने को तथा अपने ग्रन्थ को प्रामाणिक सिद्ध किया है।
आयुः कामयमानेन धर्मासुखसाधनम्। आयुर्वेदोपदेशेषु विधेयः परमादरः॥२॥
आयुर्वेद का प्रयोजन —धर्म, अर्थ, सुख (काम) नामक इन तीन पुरुषार्थों का साधन (प्राप्ति का उपाय) आयु है, अतः आयु (सुखायु) की कामना करने वाले पुरुष को आयुर्वेदशास्त्रों में निर्दिष्ट उपदेशों में परम (विशेष) आदर करना चाहिए॥२॥
वक्तव्य —शास्त्रों में उपदेश दो प्रकार के मिलते हैं—एक विधानात्मक (इन्हें करना चाहिए) और दूसरे निषेधात्मक (इन्हें नहीं करना चाहिए)। इस प्रकार के उपदेशों के प्रति समाज का आदर भाव होना चाहिए अर्थात् इस प्रकार आप्त (विश्वसनीय अतएव प्रामाणिक महर्षि) वचनों की उपेक्षा करने से सुखायु की प्राप्ति नहीं हो पाती है। हमें तो हितायु, सुखायु तथा दीर्घायु की कामना करनी है, अतः महर्षियों के त्रिकालसत्य उपदेशात्मक वचनों के प्रति परम आदर करना ही चाहिए।
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अष्टाङ्गहृदये
महर्षि चरक ने 'आयुर्वेद' शब्द की व्याख्या करते हुए कहा है—'हिताऽहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताऽहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते' ॥ (च.सू. १।४१) जिस शास्त्र में आयु, अहित आयु, सुख आयु तथा दुःख आयु का वर्णन हो एवं आयु के हित-अहित के लिए आहार-विहार तथा औषधों का वर्णन हो और आयु के मान (प्रमाण) का निर्देश किया गया हो; साथ ही आयु का भी वर्णन हो, उसे 'आयुर्वेद' कहते हैं। हित, अहित, सुख तथा दुःख आयु का वर्णन च.सू. ३०।२०-२५ में विस्तार से देखें।
धर्मायुर्वेदसुखसाधनम्— 'धर्म'—आजकल धर्माचार्य इस शब्द की अनेक व्याख्याएँ प्रस्तुत करते हैं, किन्तु आयुर्वेदशास्त्रसम्मत व्याख्या इस प्रकार है—'ध्रियते लोकः अनेन इति धर्मः'। जिससे लोक का धारण-पोषण होता है। 'अर्थ'—'अर्थ्यते याच्यते इति अर्थः' अर्थात् जिसे समाज प्राप्त करना चाहता है। यथा—धन-सम्पत्ति तथा जीवनोपयोगी समस्त साधन। सुख —यह दो प्रकार का होता है, एक सुख वह है जिससे तत्काल सुख की प्रतीति होती है और दूसरा सुख वह होता है जिसे 'आत्यन्तिक' कहते हैं, वह सुख है—मोक्षप्राप्ति। अथवा इस सुख को ऐहिक (इस लोक से सम्बन्धित) तथा पारलौकिक (परलोक से सम्बन्धित) रूप से समझा जा सकता है। तत्काल मिलने वाले सुख की महर्षि चरक ने निन्दा की है। देखें—च.सू. २८।४०। गीता में भी कहा गया है—'ये तु संस्पर्शजा भोगा दुःखयोन्य एव ते' ॥ (५।२२)
आयुर्वेदोपदेशेषु —प्राचीन काल से ही आयुर्वेदशास्त्र सम्बन्धी अनेक संहिताएँ विद्यमान हैं, उनमें विविध प्रकार के उपदेश मिलते हैं, उन सभी के प्रति व्यावहारिक आदरभाव रखना चाहिए। यही यहाँ उक्त वाक्य में प्रयुक्त बहुवचन की सार्थकता है।
ब्रह्मा स्मृत्याऽऽयुषो वेदं प्रजापतिमजिग्रहत्। सोऽग्निनौ तौ सहप्राक्षं सोऽत्रिपुत्रादिकात्मनीन् ॥ तेऽग्निवेशादिकांस्ते तु पृथक् तन्त्राणि तेनिर।
आयुर्वेदावतरण —ब्रह्माजी ने सबसे पहले आयुर्वेदशास्त्र का स्मरण (ध्यान) करके उसे दक्षप्रजापति को ग्रहण कराया अर्थात् पढ़ाया था। दक्षप्रजापति ने अश्विनीकुमारों को पढ़ाया था, अश्विनीकुमारों ने देवराज इन्द्र को पढ़ाया था, उन्होंने अत्रिपुत्र (पुनर्वसु आत्रेय) आदि महर्षियों को पढ़ाया था; आत्रेय आदि ने अग्निवेश, भेड़, जतुकर्ण, पराशर, हारीत, क्षारपाणि आदि को पढ़ाया था और फिर अग्निवेश आदि महर्षियों ने अलग-अलग तन्त्रों (आयुर्वेदशास्त्रों) की विस्तार के साथ रचना की ॥ ३ ॥
वक्तव्य —यह वाग्भटोक्त आयुर्वेद की अवतरणिका है। आयुर्वेदशास्त्र में ये अवतरणिकाएँ भिन्न-भिन्न रूपों में उपलब्ध होती हैं। पुराणों में भी ये स्वतन्त्र रूप से देखने को मिलती हैं। चरक-चिकित्सा-स्थान अ० १ पाद ४।३ में कहा है कि एक बार देवराज इन्द्र के पास आयुर्वेद सम्बन्धी उपदेश सुनने के लिए भृगु, अंगिरा, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, अगस्त्य, पुलस्त्य, वामदेव, असित, गौतम आदि अनेक महर्षि गये थे। सुश्रुत-सूत्रस्थान १।३ में देवराज इन्द्र से धन्वन्तरि आदि ने आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था। उस काल में श्रुति (श्रवण करना) तथा स्मृति (स्मरण करना) ये ही विद्याप्राप्ति तथा संग्रह के उपाय थे।
आयुषो वेदं —'आयुषः सम्बन्धी वेदः आयुर्वेदः', यहाँ सम्बन्ध का अर्थ है—पाल्य-पालक भाव। जैसा कि आचार्य ने अष्टांगसग्रह में कहा है—'आयुषः पालकं वेदमुपवेदमथर्वणः'। (अ.सं.सू. १।१०) अर्थात् अथर्ववेद का ही उपवेद यह आयुर्वेद है, जो आयु की रक्षा के उपदेशों का उपदेष्टा है।
तेभ्योऽतिविप्रकीर्णेभ्यः प्रायः सारतरोच्ययः ॥४॥ क्रियतेऽष्टाङ्गहृदयं नातिसङ्घेपविस्तरम्।
आयुष्कामायाध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
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अष्टांगहृदय का स्वरूप—महर्षि वामभट का कथन है कि द्धर-उधर बिखरे हुए उन प्राचीन तन्त्रों में से उत्तम-से-उत्तम ( सार ) भाग को लेकर यह उच्च्य ( संग्रह ) किया गया है। प्रस्तुत संग्रह-ग्रन्थ का नाम है—‘अष्टांगहृदय’। इसमें प्राचीन तन्त्रों में वर्णित विषय न अत्यन्त संक्षेप से और न अत्यन्त विस्तार से ही कहे गये हैं। ॥४॥
बक्तव्य—अन्य ( इसके पहले लिखी गयी ) संहिताएँ या तो अत्यन्त संक्षिप्त रही हैं; जैसे—रविगुप्त विरचित ‘सिद्धसारतन्त्र’, यह आज तक प्रकाशित नहीं हो पाया तथा अत्यन्त विस्तृत, जैसे—अष्टांगसंग्रह आदि। उसके बाद लिखा गया यह ‘अष्टांगहृदय’ ग्रन्थ ऐसा है जैसा मानव-शरीर में ‘हृदय’ होता है, ऐसा स्वयं ग्रन्थकार ने इसी ग्रन्थ के उत्तरस्थान (४०८९) में कहा है—‘हृदयमिव हृदयमेतत्’। अतिविस्तृत ग्रन्थ सरलता से सबके समझ में नहीं आता है, अतएव यह ग्रन्थ सर्वसामान्य के लिए बुद्धिगम्य होगा, सोचकर ही इसकी रचना की गयी है। अन्य प्राचीन संहिताओं की तुलना में ‘अष्टांगहृदय’ का प्रचार-प्रसार भी अधिक है।
कायबालग्रहोर्ध्वार्द्धशल्यदंष्ट्राजरावुषान् ॥५॥
अष्टावङ्गानि तस्याहुश्चिकित्सा येषु संभिता।
आयुर्वेद के आठ अंग—१. कायचिकित्सा, २. बालतन्त्र (कौमारभृत्य), ३. ग्रहचिकित्सा (भूतविद्या), ४. ऊर्ध्वगचिकित्सा (शालाक्यतन्त्र), ५. शल्यचिकित्सा (शल्यतन्त्र), ६. दंष्ट्राविषचिकित्सा (अगदतन्त्र), ७. जराचिकित्सा (रसायनतन्त्र) तथा ८. वृषचिकित्सा (वाजीकरण-तन्त्र) —ये आठ अंग कहे गये हैं। इन्हीं अंगों में सम्पूर्ण चिकित्सा आश्रित है ॥५॥
बक्तव्य—वामभट का यह पद्य अतिसंक्षेप का उदाहरण कहा जा सकता है, यद्यपि अन्य अंगों का अर्थ भले ही हम खींच-तान कर लगा लें, किन्तु ‘दंष्ट्रा’ शब्द से प्राणिज विष के बाद स्थावर विष तथा गरविष का अर्थ निकालना अत्यन्त दुष्कर कर्म है। आचार्य अरुणदत्त ‘दंष्ट्रा’ का अर्थ ‘पीडाकरणसामान्य’ करते हैं। यह किसी भी विष से सम्भव है। यदि ‘दंष्ट्रा’ शब्द को विष मात्र का उपलक्षण स्वीकार कर लिया जाय तो कुछ काम चल सकता है। आठों अंगों की गणना ऊपर कर दी गयी है, अब यहाँ उन अंगों का परिचय प्रस्तुत है।
(१) कायचिकित्सा—‘चिञ् चयने’ धातु से ‘घञ्’ प्रत्यय तथा ‘च’ के स्थान पर ‘क’ करने से इसकी निष्पत्ति होती है। ‘चीयते अस्त्रादिभिः’ इति कायः ‘अथवा’ ‘चीयते प्रशस्तदोषधातुमैः’ इति कायः दोनों ही व्युत्पत्तियाँ यहाँ अपेक्षित हैं। इसी में सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करने वाले आमाशय तथा पक्वाशय से उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि समस्त रोगों की शान्ति का उपाय किया जाता है। अतः इसे कायचिकित्सा नामक प्रथम अंग कहते हैं। यह ‘काय’ यौवन आदि अवस्थाओं वाला है। इस अंग के प्रधान तन्त्र ‘अग्निवेशतन्त्र’ (चरकसंहिता), भेलसंहिता तथा हारीतसंहिता आदि हैं।
(२) बालतन्त्र या कौमारभृत्य—बालकों के शरीर में परिपूर्ण बल तथा धातुओं आदि का अभाव होने के कारण इस अंग का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है। क्योंकि इनकी सभी प्रकार की औषधियाँ भिन्न प्रकार की होती हैं। दूध भी इन्हें माता या धात्री (धाय = उम्माता) का देने की प्राचीन काल से व्यवस्था है, जिसका वर्णन साहित्यिक ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है। यहाँ एक शंका होती है कि बालकों की भाँति वृद्धों की चिकित्सा का भी स्वतन्त्र उपदेश आचार्यों ने क्यों नहीं किया? इसका समाधान इस प्रकार है—वृद्धावस्था पूर्ण युवावस्था के बाद में आती है, अतः इसकी चिकित्सा का अधिकांश अंग कायचिकित्सा में ही समाविष्ट हो जाता है और जो कुछ अंश शेष रह जाता है, उसके निराकरण के लिए ७वें रसायनतन्त्र की व्यवस्था की गयी है। इस विषय का प्राचीन ग्रन्थ केवल ‘काश्यपसंहिता’ है, जो सम्प्रति खण्डित उपलब्ध
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अष्टाङ्गहृदये
होती है। इसके अतिरिक्त चरक-शारीर अध्याय ८ तथा चरक-चिकित्सास्थान अध्याय ३०, सुश्रुत-शारीरस्थान अध्याय १० एवं सुश्रुत-उ.त.अ. २७ से ३७ तक देखें।
(३) ग्रहचिकित्सा (भूतविद्या) —इसमें देव, असुर, पूतना आदि ग्रहों से गृहीत (आविष्ट) प्राणियों के लिए शान्तिकर्म की व्यवस्था की जाती है। इनमें बालग्रह तथा स्कन्दग्रहों का भी समावेश है, साथ ही इनकी शान्ति के उपायों की भी चर्चा की गयी है। इस विषय का आज कोई प्राचीन स्वतन्त्र तन्त्र उपलब्ध नहीं है। केवल चरकसंहिता-निदानस्थान ७१०-१६, चरक-चि. ९।१६-२१ और सुश्रुतसंहिता-उत्तरतन्त्र अध्याय २७ से ३७ तक तथा अध्याय ६० में भूतविद्या का वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त सुश्रुतसंहिता-सूत्रस्थान अध्याय ५।१७-३३ तक शस्त्रकर्म करने के बाद रक्षोच्च मन्त्रों द्वारा रोगी की रक्षा का विधान कहा गया है। खेद है कि युगों से गुरु-परम्परा से चली आने वाली यह विद्या आज शोचनीय दशा को पहुँच गयी है, आज भी इसकी सुरक्षा के उपाय नहीं किये जा रहे हैं।
(४) ऊर्ध्वार्ङ्गचिकित्सा (शालाक्यतन्त्र) —ऊर्ध्वजगृत आँख, मुख, कान, नासिका आदि में आधारित रोगों की शलाका आदि द्वारा की जाने वाली चिकित्सा ही इस अंग का प्रधान क्षेत्र है। शालाक्यतन्त्र के नाम से आज कोई ग्रन्थ स्वतन्त्र रूप से नहीं मिलता। सुश्रुतसंहिता के उत्तरतन्त्र के अध्याय १ से १९ तक में उत्तमांग (शिरःप्रदेश) में स्थित नेत्ररोगों का, २० तथा २१वें अध्यायों में कर्णरोगों का, २२ से २४ तक नासारोगों का और २५ एवं २६वें अध्यायों में शिरोरोगों का वर्णन किया है। सुश्रुत-निदानस्थान में मुखरोगों का वर्णन तथा सुश्रुत-चिकित्सास्थान अध्याय २२ में मुखरोगों की चिकित्सा का उल्लेख किया है। चरक-चिकित्सास्थान अध्याय २६ में श्लोक १०४ से ११७ तक नासारोगनिदान, ११८ में शिरोरोगनिदान, ११९ से १२३ तक मुखरोगनिदान, १२७-१२८ में कर्णरोगनिदान तथा १२९ से १३१ तक नेत्ररोगनिदान का वर्णन मिलता है। वैसे भी शालाक्यतन्त्र पर अधिकारपूर्वक कुछ कहना यह चरक की प्रतिज्ञा के विरुद्ध विषय था। जैसा कि उन्होंने कहा है—'पराधिकारे तु न विस्तरोक्तिः शस्तेति तेनाऽयत्र न नः प्रयासः'। अतएव वे इसके विस्तार में नहीं गये।
(५) शल्यतन्त्र —उक्त आयुर्वेद के आठ अंगों में यही अंग सबसे प्रधान है। क्योंकि प्रथम देवासुर-संग्राम में युद्ध में हुए घावों की सद्यःपूरति के लिए इसी की आवश्यकता पड़ी थी। उस समय देववैद्य अश्विनी-कुमारों ने इस तन्त्र का समुचित प्रयोग कर दिखाया था। आज भी शल्यचिकित्सा-कुशल चिकित्सक उनका प्रतिनिधित्व करते ही हैं। देखें-सु.सू. १।१७ तथा १८। भगवान् धन्वन्तरि का अवतार शल्य आदि अंगों की पुनः प्रतिष्ठा के लिए ही हुआ था। देखें-सु.सू. १।२१। कायचिकित्सा-प्रधान चरकसंहिता में भी अर्थ, उदर तथा गुल्म आदि रोगों में शल्यकर्मविशेषज्ञ से सहायता लेने का संकेत है। मूलतः शल्यतन्त्र में यन्त्र, शस्त्र, धार, अग्नि के प्रयोगों का निर्देश मिलता है।
(६) दण्डाविषचिकित्सा (अगदतन्त्र) —महर्षि वाग्भट द्वारा रचित दोनों संहिताओं (संग्रह तथा हृदय) में अष्टांग रूपी आयुर्वेद का विभाजक सूत्र अविकल रूप से प्राप्त होता है। इससे हम इस निर्णय पर पहुँचते हैं कि इन्होंने सुश्रुतसंहिता को आदर्श मानकर 'सर्पकीटलूता' आदि में प्रथम परिगणित 'सर्प' शब्द को प्रमुख मानकर 'दण्डा' शब्द का प्रयोग किया होगा, क्योंकि 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' यह सूत्र सर्वत्र अपनाया जाता है और सभी प्रकार के विषों में 'पीडाकरणसामान्य' गुण तो होता ही है।
अगदतन्त्र उसे कहते हैं जिसमें सर्प आदि जंगम तथा वत्सनाभ आदि स्थावर विषों के लक्षणों का एवं विविध प्रकार के मिश्रित विषों (गरविषों) का वर्णन तथा उन-उनके शान्ति (शमन) के उपायों का वर्णन हो।
आयुष्कामीयाध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
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सामान्य रूप से 'अगद' शब्द औषध का पर्याय है। इसकी व्याख्या इस प्रकार मिलती है—'न गदः अस्मात्' अथवा 'गदविरुद्धम्'। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ भी 'अगद' शब्द का अर्थ रोग को दूर करना ही रहा होगा। अस्तु।
सुश्रुत का सम्पूर्ण कल्पस्थान अगदतन्त्र है, जैसा कि सुश्रुत-सूत्रस्थान (३।२८) में कहा गया है—'अष्टौ कल्पाः समाख्याता विषभेषजकल्पनात्' ॥ इति। चूँकि इस कल्पस्थान में विषचिकित्सा की ही कल्पना की गयी है, अतः इसका नाम कल्पस्थान है। इस सन्दर्भ में चरक-चिकित्सास्थान का 'विषचिकित्सित' नामक २३वाँ अध्याय भी अवलोकनीय है।
(७) जराचिकित्सा (रसायनतन्त्र)—उक्त अगदतन्त्र के बाद रसायनतन्त्र के प्रस्तुतीकरण का औचित्य प्रतिपादित करते हुए श्री अरुणदत्त कहते हैं कि रसायनों के प्रयोग से विष का भी प्रभाव दूर हो जाता है। रसायन शब्द का विशेष परिचय देखें—च.चि. १।७-८।
रसायनतन्त्र उसे कहा गया है जो वयःस्थापन (कुरु समय के लिए पुनः यौवन को स्थिर करने में सहायक) होता है, आयु को बढ़ाता है, मेधा (धारणाशक्तियुक्ता धीः) अर्थात् जो धारणाशक्ति तथा सभी प्रकार के बल को बढ़ाने एवं रोगों का विनाश करने में समर्थ हो। इस प्रकार का भी कोई प्राचीन स्वतन्त्र ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता। इसकी पूर्ति के लिए देखें—चरक-चिकित्सास्थान अध्याय १ के चारों पाद तथा सु.चि.अ. २७ से ३०।
(८) वृषचिकित्सा (बाजीकरणतन्त्र)—'अवाजी वाजीव अत्यर्थ मैथुने शक्तः क्रियते येन तद् वाजीकरणम्'। वाजीकरणतन्त्र उसे कहते हैं जो अल्प मात्रा वाले शुक्र का सन्तर्पण करता है, दूषित शुक्र को शुद्ध करता है, क्षीण शुक्र को बढ़ाता है और सूखे हुए शुक्र के उत्पादन के उपायों का निर्देश करता है। लिंग में प्रहर्यता को उत्पन्न कर नर-नारी में सन्तानोत्पादनशक्ति को पैदा करता है। 'वर्षति इति वृषः' इस अभिप्राय से भले ही इस तन्त्र को 'वृषचिकित्सा' कहा जाय, अन्यथा वृष (साँड़) जिन चेष्टाओं के बाद सोच-सोचकर मैथुन में प्रवृत्त होता है, उसे सुश्रुत ने सौगन्धिक नामक नपुंसक कहा है। देखें—सु.शा. १।३९, जैसे—साँड़ तथा कुत्ता।
इस विषय से सम्बन्धित भी कोई प्राचीन ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है। इसके लिए केवल च.चि. २ तथा च.चि. ३०।१२६ से २०३ तक के पद्य एवं सु.शा. २ तथा सु.चि. २६ सम्पूर्ण का अवलोकन करें। वाजीकरण के लिए 'वृष' एवं 'बाजी' शब्दों का प्रयोग हुआ है। वृष का अर्थ है—'वर्षतीति वृषः' अर्थात् जो योनि में वीर्य की वर्षा करें। किन्तु वह वृष (साँड़) वाजी (घोड़े) के समान वेग वाला नहीं होता, अतः अधिकांश क्षेत्रों में 'वाजीकरण' शब्द ही प्रसिद्ध है।
सावधान—रसायन एवं वाजीकरण प्रयोगों का उपयोग केवल स्वास्थ्यवर्धन एवं प्रजोत्पादन के लिए ही होना चाहिए, दुग्धचार या दुग्धवृत्ति के लिए कभी भी इनका प्रयोग न करें; ऐसा करने से हानि भी हो सकती है। साथ ही इनका प्रयोग योग्य चिकित्सक की देख-रेख में ही करें। इनके सेवनकाल में जितेन्द्रिय होना अति आवश्यक है, तभी पूरा लाभ मिलता है।
चिकित्सा येषु संश्रिता—ऊपर दिये गये आठ अंगों के साथ चिकित्सा शब्द का सम्बन्ध है। चरकसंहिता में चिकित्सा शब्द को इस प्रकार परिभाषित किया गया है—'चतुर्णां भिषगादीनां शस्तानां धातुवैकृते। प्रवृत्तिः धातुसात्पर्याथ चिकित्सेत्यभिधीयते' ॥ (च.सू. १।५)
रोग या रोगों की शान्ति के लिए चिकित्सक द्वारा जो-जो उपाय किये जाते हैं उन सबका सम्मिलित नाम 'चिकित्सा' है। इसमें जो 'चतुर्णां भिषगादीनां शस्तानां' पद्यांश दिया गया है, इसके
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अष्टाङ्गहृदये
अनुसार वैद्य, औषधोपयोगी द्रव्य, उपस्थाता (परिचारक) तथा रोगी—ये सब अपने-अपने प्रशस्त गुणों से युक्त हों तभी उचित चिकित्सा हो सकती है। सुश्रुत के अनुसार—“वत्स सुश्रुत! इह खलु आयुर्वेद-प्रयोजनम्—व्याध्युपमृष्टानां व्याधिपरिमोक्षः स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं च”। (सु.सू. १।१४) अर्थात् आयुर्वेद के दो प्रयोजन हैं—रोगियों को रोग से मुक्ति दिलाना और स्वस्थ की स्वास्थ्य रक्षा। महर्षि वाग्भट ने स्वस्थवृत्त का वर्णन अ, २ से ७ तक और रोगशान्ति का वर्णन सम्पूर्ण ग्रन्थ में किया है।
वायुः पित्तं कफश्चेति त्रयो दोषाः समासतः॥६॥
दोषों का वर्णन —आयुर्वेदशास्त्र में संक्षेपतः तीन ही दोष माने जाते हैं; यथा—१. वात, २. पित्त तथा कफ॥६॥
वक्तव्य —इन बात आदि दोषों का विशेष परिचय अष्टाङ्गहृदय-सूत्रस्थान के ग्यारहवें ‘दोषादिविज्ञान’ नामक अध्याय में देखें। सुश्रुत-सूत्रस्थान (१।२२) में कहा गया गया है कि पृथिवी, जल, तेज, वायु तथा आकाश इन पाँच महाभूतों के संयोग का नाम पुरुष है और चरक-शरीरस्थान (१।१६) में ‘खादयश्चेतना षष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः’। अर्थात् उक्त पञ्चमहाभूत और चेतना धातु (चेतना का आधार मन सहित आत्मा) कहा गया है। यही आशय सुश्रुत का भी है। (मोक्ष-विषयक शास्त्र में २५ तत्त्वों के संयोग को पुरुष संज्ञा दी गयी है, अस्तु।) यही चिकित्स्य पुरुष है।
पञ्चमहाभूतों में आकाशतत्त्व अवाकाश (खाली स्थान) के रूप में शरीर में रहता है और पृथिवीतत्त्व आधारस्वरूप है, अतएव ये दोनों निष्क्रिय (निश्चेष्ट) हैं, अर्थात् इन दोनों में किसी प्रकार की क्रिया नहीं होती है। शेष तत्त्वों का विवरण इस प्रकार है—जलतत्त्व ‘कफ’ है, अग्नितत्त्व ‘पित्त’ है और वायुतत्त्व ही ‘वात’ है। अब आगे इनके विकृत तथा अविकृत रूपों की चर्चा की जायेगी।
आयुर्वेदशास्त्र में प्राणिमात्र का नाम ‘पुरुष’ है। यह वनस्पति (पुष्परहित फल वाले वृक्ष), वानस्पत्य (फूल-फल वाले वृक्ष), वीरुध (शाखा-प्रशाखा युक्त लता) तथा औषधियों का; हाथी, घोड़ा, गाय, भैंस आदि पशु एवं पक्षियों का भी उपदेश देता है, परन्तु इन सबमें पुरुष (मानव) प्रधान है। जैसा कि मनु ने कहा है—‘भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः। बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठाः……’॥ (मनु. १।१६)
त्रयो दोषाः समासतः —वाग्भट ने सुश्रुत द्वारा स्वीकृत ‘रक्त’ भी दोष है, इसका यहाँ खण्डन किया है, अपितु ये ‘आम’ को दोष स्वीकार करते हैं। ध्यान दें—‘दोषेण भस्मनेवाग्नी छत्तेऽन्नं न विपच्यते। तस्मादादोषपचनाज्ज्वरितानुपवासयेत्’॥ (अ.हृ.चि. १।१०) यहाँ ‘दोषेण’ पद के स्थान पर अनेक संस्करणों में ‘आमेन’ पाठ मिलता है। वास्तव में यहाँ चर्चा ‘आमदोष’ की है। इस प्रकार के सयुक्तिक विचारों या प्रसंगोचित परिवर्तनों को चरक ने उस-उस आचार्य का ‘बुद्धेविशेषः’ कहा है।
विकृताऽविकृता देहं ज्यन्ति ते बर्त्यन्ति च।
विकृत-अविकृत दोष —ये तीनों वात आदि दोष विकृत (असम अर्थात् बड़े हुए अथवा क्षीण हुए) शरीर का विनाश कर देते हैं और अविकृत (समभाव में स्थित) जीवनदान करते हैं अथवा स्वास्थ्य-सम्पादन करने में सहायक होते हैं।
वक्तव्य —प्राचीन टीकाकारों ने ‘विकृताः’ का अर्थ ‘स्वभावप्रच्युताः’ किया है, जो उचित है। तथापि दोषों का अपना स्वभाव क्या है, यह कहना थोड़ा कठिन है, क्योंकि ये मनुष्यों के आहार-विहार पर निर्भर रहते हैं और ऋतु-परिवर्तन आदि पर भी। आप ध्यान दें—वात-पित्त-कफ का नाम केवल दोष ही नहीं है, अपितु इन्हें ‘धातु’ तथा ‘मल’ भी कहा गया है। देखें—‘शरीरदूषणाद् दोषा धातवो देहधारणात्। वातपित्तकफा ज्ञेया मल्लिनीकरणात्मलाः’॥ हमारे शरीर में इन वात आदि की स्थिति इस प्रकार है—जब