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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

२१६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

ते=तेरासाक्षी=साक्षी है
देहः=शरीर हैनिरपेक्षः=इच्छा-रहित
वा=औरसुखम्=सुख-पूर्वक
भवान्=तूचर=विचर

भावार्थ ।

तत्त्व-ज्ञान की प्राप्ति के लिये अष्टावक्रजी फिर उपदेश करते हैं ।

हे जनक ! तुम पंचभूतात्मक देह नहीं हो, क्योंकि देह जड़ है और अनित्य है, तुम नित्य हो, चैतन्य-स्वरूप हो तुम्हारा देह के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है ।

असंगोऽह्ययं पुरुष इति श्रुतेः ।

यह पुरुष अर्थात् जीवात्मा असंग है, देहादिकों के साथ सम्बंध से रहित है । इसी श्रुतिप्रमाण से तुम संयोगादिक सम्बन्धों से रहित हो और तुम कर्ता भोक्ता भी नहीं हो, क्योंकि कर्तापना और भोक्तापना ये दोनों अंतःकरण के धर्म हैं। तुम उन दोनों के भी साक्षी हो और ऐसा नियम भी है जो जिसका साक्षी होता है, वह उससे भिन्न होता है। जैसे घट का साक्षी घट से भिन्न है वैसे कर्ता भोक्ता जो अंतःकरण है, उनका साक्षी भी उनसे भिन्न है । इसमें दृष्टांत को कहते हैं—

जैसे नृत्यशाला में स्थित दीपक शाला के स्वामी को, सभावालों को और नर्तकी को तुल्य ही प्रकाश करता है । यह शरीर तो नृत्यशाला है, अहंकार उसमें सभापति है, और विषय सब सभ्य हैं, याने सभा में बैठनेवाले हैं, और बुद्धि

पन्द्रहवाँ प्रकरण । २१७

उसमें नर्तकी है, याने नाचनेवाली वेश्या है, इन्द्रियगण सब ताल बजानेवाले हैं, चेतन आत्मा साक्षी सबका प्रकाशक है । जैसे दीपक अपने स्थान में स्थित होकर सबको प्रकाश करता है, वैसे चेतन भी अचल स्थित साक्षी-रूप होकर सबको प्रकाश करता है । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! देह में जो इन्द्रिय और अहंकारादिक हैं, उनको तू अपने को साक्षी मानकर सुख-पूर्वक विचर ॥ ४ ॥

मूलम् । रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन । निर्विकल्पोऽसिबोधात्मा निर्विकारः सुखं चर ॥ ५ ॥

पदच्छेदः । रागद्वेषौ, मनोधर्मौ, न, मन, ते, कदाचन, निर्विकल्पः, असि, बोधात्मा, निर्विकारः, सुखम्, चर ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
रागद्वेषौ=राग और द्वेषते=तेरा है
मनोधर्मौ=मन के धर्म हैं+ त्वम्=तू
न ते=तेरे नहीं हैंनिर्विकल्पः=विकल्प-रहित
मनः=मननिर्विकारः=विकार-रहित
कदाचन=कभीबोधात्मा=बोधस्वरूप
=नहींअसि=है ॥

भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! राग-द्वेषादिक सब मन के धर्म हैं, तुझ आत्मा के धर्म नहीं हैं । अन्यत्र भी कहा है—

२१८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

शत्रु मित्रमुदासीनो भेदाः सर्वे मनोगताः । एकात्मत्वे कथं भेदः संभावेद्द्वैतदर्शनात् ॥ १ ॥

यह शत्रु है, यह मित्र है । शत्रु से द्वेष, मित्र से राग और उदासीनता ये सब मन के ही धर्म हैं । अद्वैतदर्शी की दृष्टि में भेद कहाँ हो सकता है, द्वैतदर्शन से ही भेद होता है ॥१॥

हे जनक ! मन का सम्बन्ध कदापि तेरे साथ नहीं है, मन के अध्यास से तुम रागादिकों में अध्यास मत करो ।

प्रश्न—रागद्वेष भी मुझ आत्मा ही के धर्म क्यों न हों ?

उत्तर—रागद्वेषादिक तुम्हारे धर्म नहीं हो सकते हैं, क्योंकि तुम ज्ञान-स्वरूप हो । यदि यह कहा जाय कि राग-द्वेषादिक आत्मा के ही धर्म हैं, तो वे आत्मा के स्वाभाविक धर्म हैं, या आगन्तुक धर्म हैं, या आध्यासिक धर्म हैं ।

वे स्वाभाविक धर्म तो हो नहीं सकते, क्योंकि श्रुतियों में और स्मृतियों में आत्मा को निर्धर्मक लिखा है—

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसन्नित्यमगन्धवच्चयत । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥१॥

आत्मा शब्द, स्पर्श, रूप, रसादिकों से रहित है, नाश से, गंध से भी रहित है, नित्य है, न उसका आदि है और न उसका अन्त है, महत्तत्त्व से परे है, ऐसे आत्मा को जान-कर पुरुष मृत्यु के मुख से छूट जाता है ॥ १ ॥

इस तरह की अनेक श्रुतियाँ आत्मा को निर्धर्मक बताती हैं—

पन्द्रहवाँ प्रकरण । २१९

शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा न वै बध्येत कर्हिचित् । बन्धमोक्षौ मनःसंस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ १॥

आत्मा शुद्ध है, मुक्त है, बंध से रहित है । बंध मोक्षा- दिक धर्म सब मन में ही स्थित रहते हैं । मन के शान्त होने से सब शान्त हो जाते हैं । इस तरह की अनेक स्मृतियाँ भी आत्मा को रागद्वेषादिकों से रहित बताती हैं ॥ १ ॥

यदि रागद्वेषादिक आत्मा के स्वाभाविक धर्म माने जावें, तब मोक्ष किसी को कदापि नहीं होगा, क्योंकि स्वाभाविक धर्म की निवृत्ति किसी उपाय से भी नहीं होती है, केवल आध्यासिक धर्म उपाय से नाश होता है। आध्यासिक धर्म एक के सम्बन्ध से दूसरे में प्रतीत होने लगता है । सम्बन्ध के नाश होने से उसका भी नाश हो जाता है, जैसे बिल्लौर पत्थर के समीप लाल पुष्प के रखने से उसमें लाल रंग जो कि पुष्प का धर्म है, प्रतीत होने लगता है और जब पुष्प दूर कर दिया जाता है, तो लाल रंग जो उस पत्थर में दिखाई देता था, लोप हो जाता है । आत्मा में अन्तःकरण के धर्म रागद्वेषादिक आध्या- सिक हैं, स्वाभाविक नहीं हैं, इसलिये वे दूर हो सकते हैं॥ ५ ॥

मूलम् । सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । विज्ञाय निरहंकारो निर्ममस्त्वं सुखी भव ॥ ७ ॥

पदच्छेदः । सर्वभूतेषु, च, आत्मानम्, सर्वभूतानि, च, आत्मनि, विज्ञाय, निरहंकारः निर्ममः, त्वम्, सुखी, भव ॥

२२० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः । शब्दार्थअन्वयः । शब्दार्थ ।
सर्वभूतेषु=सब भूतों मेंनिरहंकारः=अहंकार-रहित
आत्मानम्=आत्मा को=और
=औरनिर्मम्=ममता-रहित
सर्वभूतानि=सब भूतों कोत्वम्=तू
आत्मनि=आत्मा मेंसुखी=सुखी
विज्ञाय=जान करकेभव=हो

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! ब्रह्मा से लेकर चींटी पर्यंत संपूर्ण भूतों में कारण-रूप करके अनुस्यूत एक ही आत्मा को जानकर, और संपूर्ण भूत प्राणियों को आत्मा में अध्यस्त अर्थात् कल्पितमान करके अहंकार और ममता से रहित होकर तू सुख-पूर्वक विचर ।। ६ ।।

मूलम् ।

विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरंगा इव सागरे ।
तत्त्वमेव न संदेहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव ।। ७ ।।

पदच्छेदः ।

विश्वम्, स्फुरति, यत्र, इदम्, तरंगा, इव, सागरे, तत्, त्वम्, एव, न, संदेहः, चिन्मूर्ते, विज्वरः, भव ।।

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यत्र=जिस स्थान में$\left.\begin{aligned} &\textbf{तरंग इव} \ &\textbf{सागरे} \end{aligned}\right} =$ समुद्र विषे तरंगों की तरह
इदम्=यह
विश्वम्=संसारस्फुरति=स्फुरण होता है

पन्द्रहवाँ प्रकरण । २२१

तत=सो | चिन्मूर्ते=हे चैतन्य-रूप त्वमेव=तू ही है | विज्वर=संताप-रहित न संवेह=इसमें संदेह नहीं | भव=हो ॥

भावार्थ ।

हे जनक ! जिस अधिष्ठान चेतन में यह सारा जगत् समुद्र में तरंग की तरह अभिन्न स्फुरण हो रहा है, वही चेतन तुम्हारा आत्मा है, इसवास्ते हे जनक ! तुम विगतज्वर होकर ऐसा अनुभव करो कि मैं चैतन्य-स्वरूप हूँ और संतापों से रहित हूँ ॥ ७ ॥

मूलम् ।

श्रद्धत्स्व तात श्रद्धत्स्व नात्र मोहं कुरुष्व भोः ।
ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः ॥ ८ ॥

पदच्छेदः ।

श्रद्धत्स्व, तात, श्रद्धत्स्व, न, अत्र, मोहम्, कुरुष्व, भोः, ज्ञानस्वरूपः, भगवान्, आत्मा, त्वम्, प्रकृतेः, परः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
तात=हे सौम्य !त्वम्=तू
भोः=हे प्रियज्ञानस्वरूपः=ज्ञान-रूप
$\left.\begin{aligned} &श्रद्धत्स्व \ &श्रद्धत्स्व \end{aligned}\right} = श्रद्धा कर श्रद्धा कर$भगवान्=ईश्वर
आत्मा=परमात्मा
अत्र=इसमेंप्रकृतेः=प्रकृति से
मोहम्=मोहपरः=परे हैं
न कुरुष्व=मत कर

२२२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे तात ! आत्मा की चिद्रूपता में अहंभावना और विपरीतभावना-रूपी मोह को मत प्राप्त हो, क्योंकि आत्मा ज्ञान-स्वरूप है और प्रकृति से भी परे है। प्रश्न—चित्-पद का क्या अर्थ है ? और ज्ञान-पद का क्या अर्थ है ? उत्तर—साधनान्तर नैरपेक्ष्येण स्वयं प्रकाशमान तया इतरपदार्थविभासकं यत् तच्चित् । जो अपने से भिन्न किसी और साधन की अपेक्षा न करके अपने प्रकाश से इतर पदार्थों को प्रकाश करे, उसी का नाम चित् है । अज्ञाननाशकत्वे सति स्वात्मबोधकत्वं ज्ञानम् । जो अज्ञान को नाश करके अपने आत्मा के स्वरूप को प्रकाशित करे, उसका नाम आत्म-ज्ञान है । अर्थप्रकाशो हि ज्ञानम् । जो पदार्थ को प्रकाशित करे उसी का नाम ज्ञान है, सोई आत्मा चेतन-रूप ज्ञान-स्वरूप है । अब जड़ और चेतन के भेद को सुगम रीति से दिखलाते हैं— जो अपने को जाने और अपने से भिन्न भी सब पदार्थों को जाने, वही चेतन कहलाता है और जो अपने को न जाने और अपने से भिन्न भी किसी पदार्थ को न जाने, वह जड़ कहलाता है, सो आत्मा चेतन है । क्योंकि अपने को जानता है और अपने से भिन्न सम्पूर्ण घट पटादिक जड़ पदार्थों को भी जानता है, इसी से आत्मा चेतन है और आत्मा से भिन्न

पन्द्रहवाँ प्रकरण । २२३

संपूर्ण घट-पटादिक पदार्थ जड़ हैं। घट-पटादिक अपने को नहीं जानते हैं और अपने से भिन्न आत्मा को भी नहीं जानते हैं इसी से वे सब जड़ हैं, हे शिष्य ! तुम ज्ञान और चैतन्य-स्वरूप हो ॥ ८ ॥

मूलम् । गुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च । आत्मा न गन्ता नागन्ता किमेनमनुशोचसि ॥ १ ॥

पदच्छेदः । गुणैः, संवेष्टितः, देहः तिष्ठति, आयाति, याति, च, आत्मा, न, गन्ता, न, आगन्ता, किम्, एनम्, अनुशोचसि ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
गुणैः=गुणों सेआत्मा=जीवात्मा
संवेष्टितः=लिपटा हुआ=न
देहः=शरीरगन्ता=जानेवाला है
तिष्ठति=स्थित है=न
+ सः=वहआगन्ता=आनेवाला है
आयाति=आता हैकिम्=किस वास्ते
=औरएनम्=इसके निमित्त
याति=जाता हैअनुशोचसि=तू शोचता है ॥

भावार्थ । हे शिष्य ! इन्द्रियादिकों करके संवेष्टित होकर यह लिंग-शरीर इस लोक में स्थित रहता है। फिर कुछ काल के बाद लोकान्तर को चला जाता है। फिर वहाँ से चला आता है। आत्मा न लोकान्तर को, न देशान्तर को जाता है, न वहाँ से आता है और स्थूल शरीर जन्म लेता और

२२४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

मरता है। उसके धर्मों को आत्मा में मानकर तू शोच करने के योग्य नहीं है। क्योंकि वह तेरे विषे अध्यस्त है। अध्यस्त वस्तु के नाश होने से तुझ अधिष्ठान का नाश नहीं हो सकता है।

प्रश्न— आपने कहा है कि आत्मा लोकान्तर को नहीं जाता किंतु लिङ्ग-शरीर ही लोकान्तर और देशान्तर को जाता है, सो विना आत्मा के लिङ्ग-शरीर का गमनागमन नहीं बन सकता है ? लिङ्ग-शरीर जड़ है उसमें सुख दुःख का भोगना भी नहीं हो सकता ?

उत्तर— गमनागमन परिच्छिन्न वस्तु में होता है, व्यापक में नहीं होता है। लिंग-शरीर परिच्छिन्न है इसवास्ते इसी का गमनागमन होता है। आत्मा व्यापक है उसका गमना- गमन नहीं हो सकता है, व्यापक जल से भरे हुए घट का देशान्तर में ले जाना हो सकता है, व्यापक आकाश का नहीं, क्योंकि आकाश तो सब जगह मौजूद है। जहाँ पर घट जावेगा वहाँ पर आकाश का प्रतिबिम्ब उसमें पड़ेगा। वैसे ही जहाँ जहाँ लिंग-शरीर जाता है, वहाँ उसमें आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ता है। उस चेतन के प्रतिबिम्ब करके युक्त अन्तःकरण सुख दुःखादिकों का भोक्ता और कर्त्ता भी कहा जाता है। उसमें ज्ञान-शक्ति और इच्छा-शक्ति भी हो जाती है। उसी अन्तःकरण प्रतिबिम्बित चेतन का नाम ही जीव हो जाता है।

जीव का लक्षण पञ्चदशीकार ने ऐसा किया है कि लिंग-शरीर, उसमें चेतन का प्रतिबिम्ब और उसका आश्रय अधिष्ठान चेतन, तीनों का नाम जीव है। माया और माया

पन्द्रहवाँ प्रकरण । २२५

में प्रतिबिम्ब, और माया का अधिष्ठान चेतन तीनों का नाम ईश्वर है। जीव और ईश्वर का भेद उपाधियों करके है, वास्तव में भेद नहीं है। जैसे घटाकाश और मठाकाश का उपाधि- कृत भेद है, वैसे जीव और ईश्वर का भी उपाधिकृत भेद है, वास्तव में भेद नहीं है । उपाधियाँ कल्पित हैं अर्थात् मिथ्या हैं। चेतन नित्य है, सोई चेतन तुम्हारा रूप आप है, ऐसा जानकर तुम शोक करने के योग्य नहीं हो ॥ ९ ॥

मूलम् देहस्तिष्ठतु कल्पान्तं गच्छत्वद्यैव वा पुनः । क्व वृद्धिः क्व चवा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः ॥ १० ॥

पदच्छेदः । देहः, तिष्ठतु, कल्पान्तम्, गच्छतु, अद्य, एव, वा पुनः, क्व, वृद्धिः, क्व, च, वा, हानिः, तव, चिन्मात्ररूपिणः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
पुनः=चाहेचिन्मात्र-रूपिणः=चैतन्य-रूपवाले का
देहः=शरीर
कल्पान्तम्=कल्प के अन्त तकक्व=कहाँ
तिष्ठतु=स्थिर रहेवृद्धिः=वृद्धि है
वा=चाहेच=और
अद्यएव=अभीक्व=कहाँ
गच्छतु=नाश होहानि=हानि है ॥
तव=तुझ

भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! द्रष्टा द्रव्य से पृथक्

२२६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

होता है, यह नियम है। देह द्रव्य है, तुम द्रष्टा हो। देह के साथ तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं है। चाहे यह तुम्हारा स्थूल देह कल्प पर्यंत स्थिर रहे, चाहे अभी गिर जाय। देह के स्थिर रहने से तुम्हारी स्थिति नहीं है और देह के गिर जाने से तुम्हारा नाश नहीं है। देह की वृद्धि से तुम्हारी वृद्धि नहीं, क्योंकि देह से तुम परे हो। देह मिथ्या है, तुम सत्य हो। देह को भी तुम सत्ता स्फूर्ति देनेवाले हो। देह के भी तुम साक्षी हो, ऐसा निश्चय करके तुम जीवन्मुक्त होकर विचरो ॥ १० ॥

मूलम् ।

त्वय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः ।
उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिनर्वा क्षतिः ॥ ११ ॥

पदच्छेदः ।

त्वयि, अनन्तमहाम्भोधौ, विश्ववीचिः, स्वभावतः, उदेतु, वा, अस्तम्, आयातु, न, ते, वृद्धिः, न, वा, क्षतिः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अनन्तमहाम्भोधौ=अपार महा- समुद्र विषेअस्तम्=अस्त को
आयातु=प्राप्त होते हैं
विश्ववीचिः=विश्व-रूप तरंगपरन्तु=परन्तु
स्वभावतः=स्वभाव सेते=तेरी
उदेतु=उदय होते हैं ।वृद्धिः न=न वृद्धि है
या=औरवा=और
न क्षतिः=न नाश है ॥

पन्द्रहवां प्रकरण । २२७

भावार्थ ।

हे जनक ! तुम्हारा स्वरूप अनन्त चिन्मात्र-रूपी समुद्र है । उसमें अविद्या और कामुक कर्मों से यह विश्व-रूपी लहरी उत्पन्न हुई है । तुम्हारे स्वरूप में यह विश्व-रूपी लहरी उदय हो, अथवा अस्त हो, तुम्हारी कोई हानि-लाभ नहीं है, क्योंकि तुम अधिष्ठान चेतन हो, अधिष्ठान को उसी विषे कल्पित वस्तु हानि नहीं कर सकती है । जो कभी हुई ही नहीं है, वह दूसरे को क्या हानि कर सकती है ॥ ११ ॥

मूलम् ।

तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत् । अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ १२ ॥

पदच्छेदः ।

तात, चिन्मात्ररूपः, असि, न, ते, भिन्नम्, इदम्, जगत्, अतः, कस्य, कथम्, कुत्र, हेयोपादेयकल्पना ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
तात=हे तात !अतः=इसलिये
चिन्मात्ररूपः=चैतन्य-रूपकस्य=किसकी
असि=तू हैकथम्=क्योंकर
ते=तेराच=और
इदम्=यहकुत्र=कहाँ
जगत्=जगत्हेयोपादेयकल्पना=त्याज्य और ग्राह्य की कल्पना है ॥
भिन्नम्=तुझसे भिन्न
न=नहीं है

२२८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे तात ! तुम चैतन्यस्वरूप हो । तुम्हारे में हेय और उपादेय अर्थात् त्याग और ग्रहण किसी वस्तु का भी नहीं बनता है, क्योंकि तुम्हारे से भिन्न यह जगत् नहीं है । कल्पित वस्तु अधिष्ठान से भिन्न नहीं होती है । उसका हेय और उपादेय कैसे हो सकता है ॥१२॥

मूलम् ।

एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि ।
कुतो जन्म कुतः कर्म कुतोऽहंकार एवच ॥ १३ ॥

पदच्छेदः ।

एकस्मिन्, अव्यये, शान्ते, चिदाकाशे, अमले, त्वयि, कुतः, जन्म, कुतः, कर्म, कुतः, अहंकारः, एव, च ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
एकस्मिन् =तुझ एकजन्म कुतः =जन्म कहाँ है
अमले =निर्मलकर्म कुतः =कर्म कहाँ है
अव्यये =अविनाशीच एव =और
शान्ते =शान्तअहंकारः कुतः =अहंकार कहाँ से है ।।
चिदाकाशे =चैतन्य-रूप आकाश में

भावार्थ ।

हे जनक ! सजातीय और विजातीय स्वगत-भेद से शून्य, नाश और विकार से रहित, चिदाकाश निर्मल तुम्हारे स्वरूप में न जन्म है, न मरण है, न कोई कर्म है, न अहंकार

पन्द्रहवां प्रकरण । २२९

है, ये सब द्वैत में ही होते हैं । द्वैत तुम्हारा रूप तीनों कालों में नहीं है इसा से तुम्हारे जन्म और विकार के अभाव होने से कर्तृत्वादिकों का भी अभाव है । शुद्ध होने से तुम्हारे में अहंकार का भी अभाव है । तुम्हारा स्वरूप ज्यों का त्यों एकरस है ॥ १३ ॥

मूलम् ।

यत्तवं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे ।
किं पृथग्भासते स्वर्णात्कटकांगदनूपुरम् ॥ १४ ॥

पदच्छेदः ।

यत्, त्वम्, पश्यसि, तत्र, एकः, त्वम्, एव, प्रतिभासते, किम्, पृथक्, भासते, स्वर्णात्, कटकांगदनूपुरम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यत्जिसकोकिम्क्या
त्वम्तूकटकांगदनू पुरम्कँगना बाजू और घुँघुरू
पश्यसिदेखता हैस्वर्णात्सुवर्ण से
तत्रउस विषेपृथक्पृथक्
एकःएकभासतेभासता है ॥
त्वम् एवतू ही
प्रतिभाससेभासता है

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जो कार्य तुम देखते हो, सो-सो कारण-रूप ही है । छांदोग्य के छठे प्रपाठक में अरुण ऋषि ने अपने श्वेतकेतु पुत्र के प्रति कहा है । जब श्वेतकेतु

२३० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

बारह वर्ष का हुआ, तब उद्दालक ने कहा कि हे श्वेतकेतो ! तू गुरुकुल में निवास करके सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन कर । क्योंकि हमारे कुल में ऐसा कोई भी नहीं हुआ है, जिसने ब्रह्मचर्य को धारण करके वेदों का अध्ययन न किया हो ।

पिता की आज्ञा को पाकर श्वेतकेतु गुरु के पास गया और ब्रह्मचर्य को धारण करके बारह वर्ष तक वेदों का अध्ययन करता रहा । जब कि सब वेदों को पढ़ चुका, तब गुरु की आज्ञा लेकर घर को चला । रास्ते में उसके चित्त में अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरा पिता मेरे बराबर विद्या में नहीं है, उनको प्रणाम करने की क्या जरूरत है । वह जब घर में आया, तब उसने पिता को प्रणाम नहीं किया । पिता जान गये, इसको विद्या का मद हुआ है । इस अहंकार को दूर करना चाहिए । पिता ने कहा कि हे श्वेतकेतो ! तुमने उस उपदेश को भी गुरु से श्रवण किया, जिस उपदेश करके अश्रुत भी श्रुत हो जाता है, अज्ञात भी ज्ञात हो जाता है । तब श्वेतकेतु ने कहा कि हे पिता ! उस उपदेश को तो मैंने नहीं श्रवण किया । यदि गुरु हमारे जानते होते, तो वह हमसे अवश्य कहते । क्योंकि जितनी विद्याएँ वे जानते थे, उन सबको मेरे प्रति कहा । अब आपही कृपा करके उस उपदेश को मेरे प्रति कहिए । पुत्र को नम्र देखकर अरुण ऋषि उपदेश करते हैं—

यथा—सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृण्मयं विज्ञातं स्याद्वाचा- रम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥ १ ॥

हे सौम्य ! जैसे एक मृत्तिका के पिण्ड करके सम्पूर्ण मृत्तिका के

पन्द्रहवां प्रकरण । २३१

कार्य मृत्तिका-रूप ही जाने जाते हैं । क्योंकि कारण से कार्य का भेद नहीं होता है । जितना नाम का विषय-विकार है, केवल वाणी का कथन-मात्र ही है, केवल मृत्तिका ही सत्य है ॥ १ ॥

यथा सौम्यैकेन लोहमणिना सर्व्वं लोहमयं विज्ञातं स्याद्वा-चारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम् ॥ २ ॥

हे सौम्य ! जैसे स्वर्ण के ज्ञान से जितने कटक कुण्डलादिक्ष उसके कार्य हैं, सब स्वर्ण-रूप ही हैं । क्योंकि कार्य कारण से भिन्न नहीं होता है । और जितने स्वर्ण के कार्य नाम के विषय हैं, वे सब वाणी करके कथन-मात्र मिथ्या हैं । उन सब विषे अनुगत स्वर्ण ही सत्य है ॥ २ ॥

इस तरह हे पुत्र ! अनेक श्रुति-वाक्यों से जब तू बोधित होगा, तब तुझको मालूम होगा कि तू ही कार्य-कारणरूप से स्थित है, तूही सच्चिदानन्द ज्ञान-स्वरूप आत्मा है ॥१४॥

मूलम् ।

अयं सोऽहमयं नाहं विभागमिति सन्त्यज ।
सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसंकल्पःसुखीभव ॥ १५ ॥

पदच्छेदः ।

अयम्, सः, अहम्, अयम्, न, अहम्, इति, सन्त्यज, सर्वम्, आत्मा, इति, निश्चित्य, निःसङ्कल्पः, सुखीभव ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अयम्=यहअयम्=यह
सः=वहअहम्=मैं
अहम्=मैं=नहीं हूँ
अस्मि=हूँइति=ऐसे

२३२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

विभागम्=विभाग कोत्वम्=तू
सन्त्यज=छोड़ देनिःसङ्कल्पः=सङ्कल्प-रहित होता हुआ
आत्मा=आत्मा है
इति=ऐसा
निश्चित्य=निश्चय करकेसुखीभव=सुखी हो ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! "यह वह है, मैं हूँ, मैं यह नहीं हूँ" इस भेद को त्यागकर "सर्वरूप आत्मा ही है" ऐसा निश्चय कर । यदि ऐसा करेगा, तो सुखी होगा, क्योंकि द्वैतदृष्टि से ही पुरुष को भय होता है । एक अद्वैत अपने आपसे किसी को भी भय नहीं होता है । द्वैतदृष्टि ही दुःख का कारण है । उसका त्याग करके तुम सुखी हो । जैसे एकान्त देश विषे स्थित पुरुष को तब तक आनन्द रहता है, जब तक उसके अन्तःकरण में भूत की भावनावृत्ति नहीं उत्पन्न होती है । ज्यों ही भूतद्वैतवृत्ति उत्पन्न हुई, त्यों ही वह भयको प्राप्त होता है, वैसे ही जब तक तेरे दिल में यह कल्पना है कि मैं और हूँ, जगत् और है, तभी तक दुःख और भय तुझको है, नहीं तो तू अद्वैत आनन्द-स्वरूप है ॥ १५ ॥

मूलम् ।

त्ववैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः ।
त्वत्तोऽन्यो नास्तिसंसारीनासंसारीचकश्चन ॥ १६ ॥

पन्द्रहवां प्रकरण । २३३

पदच्छेदः ।

तव, एव, अज्ञानतः, विश्वम्, त्वम्, एकः, परमार्थतः, त्वत्तः, अन्यः, न, अस्ति, संसारी, न, असंसारी, च, कश्चन ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
तव एव=तेरे हीत्वम्=तू
अज्ञानतः=अज्ञान सेएकः=एक है
विश्वम्=विश्व हैअतः=इसलिये
अन्यः=दूसरात्वत्तः=तुझसे
कश्चन=कोईअस्ति=है
न संसारी=न संसारी जीवन असंसारी=न संसारी ईश्वर
च=और
परमार्थतः=परमार्थ सेअस्ति=है ॥

भावार्थ ।

हे शिष्य ! तुम्हारे ही अज्ञान से यह जगत् प्रतीत होता है और तुम्हारे ही आत्मज्ञान से यह नाश होता है ।

**प्रश्न—**अज्ञान का स्वरूप क्या है ? और ज्ञान का स्वरूप क्या है ?

**उत्तर—**अनादिभावत्वे सति ज्ञाननिवर्त्यत्वमज्ञानम् ।

जो अनादि हो, और भावरूप हो, अर्थात् अभावरूप न हो, और ज्ञान करके निवृत्त हो जाते, उसी का नाम अज्ञान है ॥ १ ॥

अज्ञाननाशकत्वे सति स्वात्मबोधकत्वं ज्ञानम् ।

२३४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

जो अज्ञान का नाशक हो, और अपने आत्मा के स्वरूप का बोधक हो, उसी का नाम ज्ञान है ॥ २ ॥

ज्ञान के उदय होने पर परमार्थ से हे शिष्य ! तुम एक ही हो, संसारी और असंसारी भेद तेरे नहीं हैं ॥१६॥

मूलम् ।

भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी ।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति ॥१७॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
इदम्=यहनिर्वासनः=वासना-रहित
विश्वम्=संसारस्फूर्तिमात्रः=स्फूर्ति-मात्र है
भ्रान्ति-मात्रम्=भ्रान्ति-मात्र हैन किञ्चित् इव=कुछ न हुए को नाई अर्थात् वासना- रहित होकर
=और
न किञ्चित्=कुछ नहीं है
इति=ऐसा
निश्चयी=निश्चय करनेवाला पुरुषशाम्यति=शान्ति को प्राप्त होता है ॥

भावार्थ ।

हे शिष्य ! यह जगत् सब भ्रान्ति करके स्थित हो रहा है । इस जगत् की अपनी सत्ता किञ्चिन्मात्र भी नहीं है । ऐसा निश्चय करके तुम वासना से रहित होकर आनन्द-पूर्वक संसार में विचरो ॥ १७ ॥

पन्द्रहवाँ प्रकरण । २३५

मूलम् ।

एक एव भवाम्भोधावासाद्स्ति भविष्यति ।
न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृतकृत्यः सुखं चर ॥१८॥

पदच्छेदः ।

एकः, एव, भवाम्भोधौ, आसीत्, अस्ति, भविष्यति, न, ते, बन्धः, अस्ति, मोक्षः, व, कृतकृत्यः, सुखम्, चर ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
भवाम्भोधौ =संसाररूपी समुद्र मेंभविष्यति =तू ही होवेगा
एकः =एकते =तेरा
आसीत् =तू ही हुआबन्धः =बंध
च =औरवा =और
अस्ति =तू ही हैमोक्षः =मोक्ष
+च =औरन =नहीं है
कृतकृत्यः =कृतार्थ होता हुआत्वम् =तू
सुखम् =सुखपूर्वक
चर =विचर

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! इस संसार-रूपी समुद्र में तू सदा अकेला एक आप ही था, और रहेगा ।
**प्रश्न—**जब मैं ही भवसागर में था, और रहूँगा, तब तो मुझको मोक्ष कदापि नहीं होगा ? किन्तु सदैव बन्ध में ही रहूँगा ?
**उत्तर—**हे पुत्र ! अभी तक तुम अपने आपको न जानकर बन्ध और मोक्ष के एरफेर में पड़े थे, अब तुम अपने को जान गये हो और भवसागर में अनुस्यूत-रूप करके