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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

२३६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अर्थात् अधिष्ठान असंग साक्षी हो करके तुम्हीं स्थित थे, और रहोगे । क्योंकि तुम्हारे में ही यह संसार रज्जुसर्पवत् कल्पित है । अब न तेरे में बन्ध है, और न मोक्ष है । तू कृतकृत्य है ॥ १८ ॥

मूलम् । मा संकल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय । उपशाम्यसुखंतिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे ॥ १९ ॥

पदच्छेदः । मा, संकल्पविकल्पाभ्याम्, चित्तम्, क्षोभय, चिन्मय, उपशाम्य, सुखम्, तिष्ठ, स्वात्मनि, आनन्दविग्रहे ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
चिन्मय=हे चैतन्यस्वरूप !उपशाम्य=मन को शान्त करके
$\begin{matrix}\textbf{संकल्प-} \ \textbf{विकल्पा-}= \ \textbf{भ्याम्}\end{matrix}\Biggr}$ संकल्प-विकल्पों से$\begin{matrix}\textbf{आनन्द-} \ \textbf{विग्रहे}\end{matrix}=आनन्द- पूरित
चित्तम=चित्त कोस्वात्मनि=अपने स्वरूप में
+ त्वम्=तूसुखम्=सुख-पूर्वक
मा क्षोभय=मत क्षोभित करतिष्ठ=स्थित हो ॥

भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे चैतन्यस्वरूप ! संकल्प और विकल्पों करके अपने चित्त को क्षुब्ध न करो, किन्तु संकल्प और विकल्प से तुम रहित होकर अपने आनन्दस्वरूप में स्थित हो ॥ १९ ॥

पन्द्रहवाँ प्रकरण । २३७

मूलम् । त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चिद्धृदि धारय । आत्मा त्वन्मुक्त एवासिकिंविमृश्य करिष्यसि ॥२०॥

पदच्छेदः । त्यज, एव, ध्यानम्, सर्वत्र, मा, किञ्चित्, हृदि, धारय, आत्मा, त्वम्, मुक्तः, एव, असि, किम्, विमृश्य, करिष्यसि ॥

अन्वयः ।शब्दार्थः ।अन्वयः ।शब्दार्थः ।
सर्वत्रएव=सब ही जगहआत्मा <br> मुक्तः = <br> एव <br> असि=$\left.\begin{aligned} &आत्मा \ &मुक्त-रूप \ &ही \end{aligned}\right}$ <br> है
ध्यानम्=मनन को
त्यज=त्याग
हृदि=हृदय में
किञ्चित्=कुछ+ त्वम्=तू
मा धारय=मत धरविमृश्य=विचार करके
त्वम्=तूकिम्=क्या
करिष्यसि=करेगा

भावार्थ । **प्रश्न—**हे गुरो ! अपने आनन्द-स्वरूप आत्मा में स्थिर होके विना ध्यान के बनता नहीं है, इसवास्ते ध्यान करना चाहिए । **उत्तर—**ध्यान का भी त्याग कर, क्योंकि ध्यान भी अज्ञानी के लिए कहा है। जिसको आत्मा का बोध नहीं हुआ है, भेद-वाला वही ध्यान करे । ध्यान करना भी मन का ही धर्म है । तू तो आत्मा है, अनात्मा नहीं, सदा मुक्त-रूप है । ध्यान के विचार से तेरे को क्या फल होगा, तू इनसे रहित है ॥२०॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां पञ्चदशं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १५ ॥

सोलहवाँ प्रकरण (आत्मोपदेश)

सोलहवाँ प्रकरण । ——:०:——

मूलम् । आचक्ष्व शृणु वा तात नानाशास्त्राण्यनेकशः । तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्व विस्मरणादृते ॥ १ ॥

पदच्छेदः । आचक्ष्व, शृणु, वा तात, नानाशास्त्राणि, अनेकशः, तथा, अपि, न, तव, स्वास्थ्यम्, सर्वविस्मरणात्, ऋते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
तात=हे प्रिय !तथा अपि=परन्तु
अनेकशः=बहुत प्रकार सेऋते=बिना
$\left.\begin{aligned} \textbf{नानाशा-} \ \textbf{स्त्राणि} \end{aligned}\right}=$अनेक शास्त्रों को$\left.\begin{aligned} \textbf{सर्ववि-} \ \textbf{स्मरणात्} \end{aligned}\right}=$सबके विस्मरण से
आचक्ष्व=कहतव=तुझको
वा=यास्वास्थ्यम्=शान्ति
शृणु=सुन=न होगी ॥

भावार्थ । तत्त्व-ज्ञान करके सम्पूर्ण प्रपञ्च और तृष्णानाश ही का नाम मुक्ति है । अब इसी वार्त्ता को आगे वर्णन करते हैं— अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे तात ! चाहे तुम अनेक शास्त्रों को

सोलहवाँ प्रकरण । २३९

अनेक बार शिष्यों के प्रति पठन कराओ, अथवा गुरु से पठन करो, पर बिना सबके विस्मरण करने से तुम्हारा कल्याण कदापि नहीं होवेगा, पञ्चदशी में भी कहा है—

ग्रन्थमभ्यस्य मेधावी विचार्य च पुनः पुनः । पलालमिव धान्यार्थी त्यजेद् ग्रन्थमशेषतः ॥ १ ॥

बुद्धिमान् पुरुष प्रथम ग्रन्थों का अभ्यास करे । फिर पुनः पुनः उनका विचार करे । पश्चात् जैसे चावल का अर्थी पुरुष चावलों को निकाल लेता है, और पयाल को फेंक देता है, वैसे ही वह भी जीवन्मुक्ति के सुख के लिये अभ्यास के पश्चात् सबका त्याग कर देवे ।

प्रश्न-सुषुप्ति में सर्व पुरुषों को स्वतः ही विस्मरण हो जाता है ? यदि सर्व वस्तुओं के विस्मरण करने से ही मुक्ति होती है, तो सब जीवों को मोक्ष हो जाना चाहिए, पर ऐसा तो नहीं देखते हैं ? इसी से सिद्ध होता है कि सर्व का विस्मरण व्यर्थ है ?

उत्तर-सुषुप्ति में यद्यपि विस्मरण हो जाता है, तथापि सबका विस्मरण नहीं होता है, क्योंकि सर्व के अन्तर्गत अज्ञान है, सो अज्ञान सुषुप्ति में बना रहता है, और जीवन्मुक्त को तो अज्ञान के सहित सम्पूर्ण अध्यस्त वस्तुओं का विस्मरण हो जाता है, इस वास्ते जीवन्मुक्ति की इच्छावाले को सर्व वस्तुओं का विस्मरण करना ही उचित है ॥ १ ॥

मूलम् । भोगं कर्मसमाधिं वा कुरु विज्ञ तथापि ते । चित्तं निरस्तसर्वाशमत्यर्थं रोचयिष्यति ॥ २ ॥

२४० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

भोगम्, कर्म, समाधिम्, वा, कुरु, विज्ञ, तथा, अपि, ते, चित्तम्, निरस्तसर्वाशम्, अत्यर्थम्, रोचयिष्यति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
विज्ञ =हे ज्ञानस्वरूपकुरु =कर
ते =तेरातथा अपि =परन्तु
चित्तम् =चित्तनिरस्तसर्वाशम् =सब आकाशाओं से रहित होता हुआ भी
भोगम् =भोगत्वाम् =तुझको
कर्म्म =कर्मअत्यर्थम् =अत्यन्त
वा =औररोचयिष्यति =लोभावेगा ॥
समाधिम् =समाधि को

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे पुत्र ! चाहे तू भोगों को भोग, चाहे तू कर्मों को कर, चाहे तू समाधि को लगा । आत्मा ज्ञान के प्रभाव करके सर्व आशाओं से रहित होकर, तेरा चित्त शान्त रहेगा अर्थात् आशाओं से रहित होकर जो जो कर्म तू करेगा, कोई भी तेरे को बन्धन का हेतु न होगा। क्योंकि आशा ही बन्धन का हेतु है, इसलिये सर्व से निराश होकर, सर्व में आसक्ति से रहित होकर जब विचरेगा, तब तू सुखी होवेगा ॥ २ ॥

मूलम् ।

आयासात्सकलो दुःखी नैनं जानाति कश्चन ।
अनेनैवोपदेशेन धन्यः प्राप्नोति निर्वृतिम् ॥ ३ ॥

सोलहवाँ प्रकरण । २४१

पदच्छेदः ।

आयासात्, सकलः, दुःखी, न, एनम्, जानाति, कश्चन, अनेन, एव, उपदेशेन, धन्यः, प्राप्नोति, निर्वृतिम्,

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
आयासात्=परिश्रम सेअनेनएव=इसी
सकल=सब मनुष्यउपदेशेन=उपदेश से
दुःखी=दुःखी हैधन्यः=सुकृती पुरुष
एनम्=इसकोनिर्वृतिम्=परम सुख को
कश्चन=कोईप्राप्नोति=प्राप्त होता है ॥
न जानाति=नहीं जानता है

भावार्थ ।

हे शिष्य ! सम्पूर्ण लोक शरीर के निर्वाह करने में ही दुःखी होते हैं । अर्थात् शरीर निर्वाहार्थ परिश्रम करने में ही दुःख उठाते हैं, परन्तु इस बात को नहीं जानते हैं कि परिश्रम ही दुःख का हेतु है, इसलिये महापुरुष शरीर के निर्वाह के लिये अति परिश्रम नहीं करते हैं । क्योंकि शरीर की रक्षा प्रारब्धकर्म आप ही कर लेता है, यत्न की कोई जरूरत नहीं होती है । ऐसा जानकर वे सदैव सुखी रहते हैं ॥ ३ ॥

मूलम् ।

व्यापारेखिद्यते यस्तु निमेषोन्मेषयोरपि ।
तस्यालस्यधुरीणस्य सुखं नान्यस्यकस्यचित् ॥ ४ ॥

२४२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः । व्यापारे, खिद्यते, यः, तु, निमेषयोः, अपि, तस्य, आलस्यधुरीणस्य, सुखम्, न, अन्यस्य, कस्यचित् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यः=जोआलस्य-धुरीणस्य=आलसी-धुरीण को
निमेषोन्मेषयोः=नेत्र के ढकने और खोलने केअपि=ही
व्यापारे=व्यापार सेसुखम्=सुख है
खिद्यते=खेद को प्राप्त होता हैअन्यस्य=दूसरे
तस्य=उसकस्यचित्=किसी को
न=नहीं है ॥

भावार्थ । व्यापार में अनासक्ति ही सुख का हेतु है । जो ज्ञानवान् जीवन्मुक्त पुरुष हैं, उनको नेत्र के खोलने और बंद करने में भी खेद होता है । जो ऐसा आलसी पुरुष है और सम्पूर्ण व्यापारों से रहित है, वही सुख को प्राप्त होता है । व्यापारवान् को कभी भी सुख नहीं होता है । संसार में पुरुष को जितनी ही व्यवहार विषे अधिक प्रवृत्ति है, उतना ही उसको दुःख अधिक है । और जितना ही व्यवहार-प्रवृत्ति कम है, उतना ही उसको सुख अधिक है । क्योंकि वृत्ति की वृद्धि से दुःख की प्राप्ति, और वृत्ति की निवृत्ति से सुख की प्राप्ति होती है ॥ ४ ॥

मूलम् । इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तं यदा मनः । धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत् ॥ ५ ॥

सोलहवाँ प्रकरण । २४३

पदच्छेदः । इदम्, कृतम्, इदम्, न, इति, द्वन्द्वः, मुक्तम्, यदा, मनः, धर्मार्थकाममोक्षेषु, निरपेक्षम्, तदा, भवेत् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
इदम् = यहमुक्तम् = मुक्त हो
कृतम् = किया गया हैतदा = तब
$\left. इदम् न कृतम् \right} =$ यह नहीं किया गया हैसः = वह
इति = ऐसे$\left. धर्मार्थ- काम- मोक्षेषु \right} =$ धर्म, अर्थ, काम और मोक्षविषे
द्वन्द्वः = द्वन्द्व सेनिरपेक्षम् = इच्छा-रहित
यदा मनः = जब मनभवेत् = होता है ॥

भावार्थ । सम्पूर्ण तृष्णा के नाश होने पर शीतोष्णादि-जन्य सुख-दुःख भी पुरुष को नहीं सता सकते हैं, इसी वार्त्ता को अब कहते हैं—

इस काम को मैंने कर लिया है, और इस काम को मैंने नहीं किया है, इस तरह के द्वन्द्वों से जब पुरुष का मन शून्य हो जाता है, तब वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की इच्छा नहीं करता है । ऐसा जो सम्पूर्ण द्वन्द्वों से और सब इच्छाओं से रहित पुरुष है, वहीँ जीवन्मुक्ति के सुख को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥

मूलम् । विरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलुपः । ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान् ॥ ६ ॥

२४४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

विरक्तः, विषयद्वेष्टा, रागी, विषयलोलुपः, ग्रहमोक्ष- विहीनः, तु, न, विरक्तः, न, रागवान् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ । अन्वयः । शब्दार्थ । विषयद्वेष्टा= { विषय का द्वेषी ग्रह- \ { ग्रहण और विरक्तः=विरक्त है मोक्ष-= { त्याग-रहित विषयलोलुपः= { विषय का लोभी विहीनः / { पुरुष रागी=रागी है न रिक्तः=न विरक्त है न रागवान्= { और न रागवान् है ॥

भावार्थ ।

अब इस वार्ता को कहते हैं कि सकामी पुरुष से निष्काम पुरुष विलक्षण है—

मुमुक्षु होकर जो स्त्री-पुत्रादिक विषयों में द्वेष करता है, अर्थात् द्वेषदृष्टि करके उनको अङ्गीकार नहीं करता है, किन्तु त्याग देता है, उसका नाम विरक्त है । और जो विषयों की कामना करके विषयों में लोलुप चित्तवाला है, उसका नाम रागी है । और जो पुरुष विषयों के ग्रहण और त्याग की इच्छा से रहित है, वह विरक्त सरक्त से विलक्षण अर्थात् ग्रहण-त्याग से रहित जीवन्मुक्त है ॥ ६ ॥

मूलम् ।

हेयोपादेयता तावत्संसारविटपाङ्कुरः । स्पृहा जीवति यावद्वै निर्विचारदशास्पदम् ॥ ७ ॥

सोलहवाँ प्रकरण । २४५

पदच्छेदः ।

हेयोपादेयता, तावत्, संसारविटपाङ्कुरः, स्पृहा, जीवति, यावत्, वै, निर्विचारदशास्पदम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यावत् =जब तकजीवति =जीता है
स्पृहा =तृष्णा+ च =और
यावत् =जब तकहेयोपादेयता =त्याज्य और ग्राह्य भाव
निर्विचारदशास्पदम् =अविवेक दशा की स्थिति हैसंसारविटपाङ्कुरः =संसार-रूपी वृक्ष का अङ्कुर है ॥
तावत् =तब तक

भावार्थ ।

विचारशून्यदशा आस्पदीभूत का नाम तृष्णा है अर्थात् जिस काल में कोई विचार न हो, केवल भोगों की इच्छा ही उत्पन्न हो, उसका नाम तृष्णा है । अतः जो तृद्धालु पुरुष है, वह जब तक जीता है, ग्रहण-त्याग करता ही रहता है । संसार-रूपी वृक्ष का अङ्कुर उत्पन्न करनेवाली तृष्णा ही है, सो तृष्णा जीवन्मुक्तों में नहीं रहती है । यदि प्रारब्धकर्म के वश से जीवन्मुक्त में ग्रहण-त्याग का व्यवहार होता भी रहे, तो भी उसकी कोई हानि नहीं है ॥ ७ ॥

मूलम् ।

प्रवृत्तौ जायते रागो निवृत्तौ द्वेष एव हि । निर्द्वन्द्वो बालवद्धीमानेवमेव व्यवस्थितः ॥ ८ ॥

२४६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेद: । प्रवृत्तौ, जायते, रागः, निवृत्तौ, द्वेषः एव, हि, निर्द्वन्द्वः, बालवत्, धीमान्, एवम्, एव, व्यवस्थितः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
प्रवृत्तौ = प्रवृत्ति मेंनिवृत्तौ = निवृत्ति में
रागः = रागद्वेषः = द्वेष
= औरजायते = होता है
एव हि = इसलियेएवम् एव = जैसे होवे, वैसा ही
धीमान् = बुद्धिमान् पुरुषव्यवस्थितः = स्थित रहे ॥
निर्द्वन्द्वः = द्वन्द्व-रहित

भावार्थ ।

विषयों में जब राग पूर्वक प्रवृत्ति होती है, तब पूर्व से उत्तरोत्तर विषयों में राग ही उत्पन्न होता है। और जब विषयों में द्वेष-पूर्वक निवृत्ति होती है, तब पूर्व से उत्तरोत्तर विषयों में द्वेष-दृष्टि ही उत्पन्न होती है। इसी में एक दृष्टान्त कहते हैं—

"एक राजा दूसरे देश को गया। उसको वहाँ पर कई एक वर्ष बीत गये। पीछे, उसकी रानी अति कामातुर होकर अपने मकान पर से इधर-उधर ताकती थी। एक सराफ का लड़का, युवा अवस्था को प्राप्त, बड़ा सुन्दर अपने कोठे पर खड़ा था। उसको देखकर रानी का मन उसकी तरफ चला गया। रानी ने अपनी लौंड़ी को उसके बुलाने के लिये भेजा। लौंडी उसको बुला लाई। रानी उससे बात चीत करने लगी। थोड़ी देर में लौंडी ने आकर कहा कि राजा साहब आ गये। तब उस लड़के ने कहा कि मुझको कहीं छिपाओ। रानी ने उसको पाखाने के नल में खड़ा कर दिया। इतने में राजा भीतर आ गये और नौकर से कहा, जल्दी पानी

सोलहवाँ प्रकरण । २४७

लाओ, हम पाखाने जावेंगे। नौकर पानी लाया, राजा पाखाने गये। राजा साहब को दस्त पतले आते थे, इस कारण नल की मोहरी पर बैठकर जो पाखाना उन्होंने फिरा तो नीचे उस लड़के के ऊपर जाकर गिरा। उसका शिर, मुँह और सब कपड़े मैले से भर गये। राजा पाखाना फिरकर चले गये, तब लौंडी ने उसको किसी गंदी नाली के रास्ते से निकाल दिया। उस लड़के ने नदी पर जाकर स्नान किया और सब कपड़े साफ करके अपने घर को गया।

दूसरे दिन फिर रानी ने लौंडी को उसके बुलाने के लिये भेजा। तब लड़के ने कहा कि एक दिन मैं रानी के पास गया और केवल दस-पाँच बातें मैंने उससे कीं तब उसका फल यह हुआ कि अपने सिर पर दूसरे का मैला पड़ा। जो रोज रोज उससे सम्बन्ध करता है, न मालूम उसकी क्या गति होगी। मुझको तो वह पाखाना न भूला है, न भूलेगा। मैं अब कदापि न जाऊँगा। इस प्रकार की जब विषय-भोग में दोष-बुद्धि होती है, तब फिर कदापि उसकी विषयभोग में राग-पूर्वक प्रवृत्ति नहीं होती है। ऐसे ही विद्वान् भी बालक की तरह शुभ-अशुभ के चिन्तन से रहित होकर केवल प्रारब्ध-वश से कदाचित् प्रवृत्त होता है, कदाचित् निवृत्त भी हो जाता है, परन्तु रागद्वेष करके न तो वह प्रवृत्त होता है, और न वह निवृत्त होता है ॥ ८ ॥

मूलम् । हातुमिच्छति संसारं रागी दुःखजिहासया । वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति ॥ ९ ॥

२४८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

हातुम्, इच्छति, संसारम्, रागी, दुःखजिहासया, वीत- राग, हि, निर्दुःख, तस्मिन्, अपि, न, खिद्यति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
रागी =रागवान् पुरुषहि =निश्चय करके
दुःखजि-<br>हासया =दुःख की निवृत्ति की इच्छा सेनिर्दुःख =दुःख से मुक्त होता हुआ
तस्मिन् =संसार विषे
संसारम् =संसार कोअपि =भी
हातुम् =त्यागनान खिद्यति =नहीं खेद को प्राप्त होता है
इच्छति =चाहता है
वीतरागः =राग-रहित पुरुष

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे शिष्य ! जो पुरुष विषयों में रागवाला है, वही विषय के सम्बन्ध से उत्पन्न हुआ जो दुःख है, उसके त्याग की इच्छा करता हुआ संसार के त्यागने की इच्छा करता है और जो वीतराग पुरुष है, वह संसार के बने रहने पर भी खेद को नहीं प्राप्त होता है, सो पञ्च- दशी में भी कहा है:—

रागो लिंगमबोधस्य चित्तव्यायामभूमिषु ।
कुतो वैशाद्वलस्तस्य यस्याग्निः कोटरे तरोः ॥१॥

जिस वृक्ष के कोटर में याने जड़ के बिल में अग्नि लगी है, उस

सोलहवाँ प्रकरण । २४९

वृक्ष को हरियाली याने उसके हरे पत्ते कदापि उत्पन्न नहीं होते हैं । दाष्ट्रान्त में जिस पुरुष के चित्त में अज्ञान का चिह्न बना है, उसको शान्ति कदापि नहीं होती है ॥ ९ ॥

मूलम् । यस्याभिमानो मोक्षेऽपि देहेऽपि ममता तथा । न च योगी न वा ज्ञानी केवलं दुःखभागसौ ॥ १० ॥

पदच्छेदः । यस्य, अभिमानः, मोक्षे, अपि, देहे, अपि, ममता, तथा, न, च, योगी, न, वा, ज्ञानी, केवलम्, दुःखभाक्, असौ ।

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यस्य=जिसकोअभिमानः=अभिमान है
मोक्षे=मोक्षविषे=न
=औरज्ञानी=ज्ञानी है
देहे=देहविषे=और
अपि=भी=न
तथा=वैसा हीयोगी वा=योगी है
ममता=ममता हैकेवलम्=केवल
असौ=वहदुःखभाक्=दुःख का भागी है ॥

भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि मैं ज्ञानी हूँ, मैं त्रिकालदर्शी हूँ, मैं मुक्त हूँ इस प्रकार का जिसको अभिमान है, वह ज्ञानी नहीं है । जो कहता है मैं योगाभ्यासी हूँ, मैं नित्य ही

२५० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

धोती, नेती, वस्ती आदिक क्रिया करता हूँ, वह भी योगी नहीं है, किन्तु वह केवल दुःख का भोगनेवाला है ॥ १० ॥

मूलम् ।

हरो यद्युपदेष्टा ते हरिः कमलजोऽपि वा । तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणादृते ॥ ११ ॥

पदच्छेदः ।

हरः, यदि, उपदेष्टा, ते, हरिः, कमलजः, अपि, वा, तथा, अपि, न, तव, स्वास्थ्यम्, सर्वविस्मरणात्, ऋते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदि= अगरतथापि= तो भी
ते= तेरासर्वविस्मरणात् ऋते= बिना सबके विस्मरण के याने त्याग के
उपदेष्टा= उपदेशक
हरः= शिव है
हरि= विष्णु हैतव= तुझको
वा= अथवास्वास्थ्यम्= शान्ति
कमलजः= ब्रह्मा है= नहीं होगी ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! चाहे तुमको महादेव उपदेश करें या विष्णु उपदेश करें या ब्रह्मा उपदेश करें, तुमको सुख कदापि न होगा । जब विषयों का त्याग करोगे, तभी शान्ति और आनन्द को प्राप्त होगे । आत्मतत्त्व के उपदेश के पहिले विषयों का त्याग बहुत जरूरी है ॥११॥

इति श्री अष्टावक्रगीतायां षोडशकं प्रकरणं समाप्तम् ॥१६॥

—:०:—

सत्रहवाँ प्रकरण (ज्ञानी-स्वरूप)

सत्रहवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।

तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यासफलं तथा ।
तृप्तःस्वच्छेन्द्रियो नित्यमेकाकीरमते तु यः ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

तेन, ज्ञानफलम्, प्राप्तम्, योगाभ्यासफलम्, तथा, तृप्तः, स्वच्छेन्द्रियः, नित्यम्, एकाकी, रमते, तु, यः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यः=जो पुरुषतेन=उसी करके
नित्यम्=नित्यज्ञानफलम्=ज्ञान का फल
तृप्तः=तृप्त हैतथा=और
स्वच्छेन्द्रियः=शुद्ध इन्द्रियवाला हैयोगाभ्यासफलम्= योगके अभ्यास का फल
=औरप्राप्तम्=पाया गया है ॥
एकाकी=अकेला
रमते=रमता है

भावार्थ ।

अब विंशति श्लोकों करके सत्रहवें प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं। रइतपुरुषों की प्रवृत्ति ब्रह्म-विद्या में कराने के लिये और आत्मज्ञान का फल दिखाने के वास्ते गुरु प्रथम ज्ञान की दशा को दिखाते हैं ।

२५२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

उसी पुरुष को आत्मज्ञान का फल प्राप्त हुआ है और

उसी पुरुष को योगाभ्यास का फल भी प्राप्त हुआ है, जिसने विषयभोगों से रहित होकर अपने आपमें ही तृप्ति पाई है । वही स्वच्छ इन्द्रियोंवाला है अर्थात् उसकी इन्द्रियों में विषयभोग की कामना रञ्चकमात्र नहीं है, जो नित्य अकेला विचरता है और अपने आप स्थित है । दत्तात्रेयजी ने भी कहा है । वासो बहूनां कलहो भवेद्वार्त्ता द्वयोरपि । एकाकी विचरेद्विद्वान् कुमार्या इव कङ्कणः ॥ १ ॥ दत्तात्रेयजी एक ब्राह्मण के घर भिक्षा माँगने गये । घर में एक कुमारी कन्या थी और कोई न था । उस कन्या ने कहा, महाराज ! आप ठहरें, मैं धान कूट और चावल निकालकर आपको देती हूँ । जब वह कन्या धान कूटने लगी तब उसके हाथ में जो काँच की चूड़ियाँ थीं, वे छन्-छन् शब्द करने लगीं । उनके शब्द होने से कन्या को बड़ी लज्जा आई । उसने एक-एक करके उन चूड़ियों को उतार दिया । जब एक ही चूड़ी बाकी रह गई, तब शब्द होना बंद हो गया । तब दत्तात्रेयजी ने विचार करके कहा कि जहाँ बहुत से पुरुषों का एकत्र रहना होता है, वहाँ लड़ाई-झगड़ा जरूर होता है । और जहाँ दो पुरुष इकट्ठे रहते हैं, वहाँ पर गपशप होती है, श्रवण मननादिक नहीं होते हैं । इसवास्ते विद्वान् को चाहिये कि कुमारी कन्या के कङ्कण की तरह अकेला होकर संसार में विचरे । जिस विद्वान् को जीवन्मुक्ति के सुख की लेने की इच्छा होती है,

सत्रहवाँ प्रकरण । २५३

वह अकेला ही रहता है। इसी वास्ते संन्यासी को बहुत पुरुषों के मध्य में रहना और बहुतों को संग रखना भी मना किया है । दक्षस्मृतिः— त्रयी ग्रामः समाख्यात ऊर्ध्वं तु नगरायते । नगरं हि न कर्त्तव्यं ग्रामो वा मैथुनं तथा ॥ १ ॥ एतत्तत्रयं तु कुर्वाणः स्वधर्माच्च्यवते यतिः । राजवार्त्तादि तेषां तु भिक्षावार्त्ता परस्परम् ॥ २ ॥ जहाँ पर तीन भिक्षु मिल करके रहें, उसका नाम ग्राम है । जहाँ पर तीन से अधिक रहें, उसका नाम नगर है । इसवास्ते भिक्षु विद्वान् नगर और ग्राम को न बनावें, और न दूसरे के साथ रहें, किन्तु अकेले ही विचरा करें । जो भिक्षु ग्राम, नगर या मिथुन को करता है अर्थात् दो, तीन और अधिकों के साथ रहता है, वह अपने धर्म से प्रच्युत हो जाता है ॥ १ । २ ॥ सत्कारमानपूजार्थं दण्डकाषायधारणः । स संन्यासी न वक्तव्यः संन्या सी ज्ञानतत्परः ॥ १ ॥ सत्कार, मान और पूजा के अर्थ जो भिक्षु दण्ड और काषायवस्त्रों को धारण करता है, वह संन्यासी नहीं है, जो आत्मज्ञानपरायण होकर अकेला वासना रहित होकर ही रहता है, वही शान्ति को प्राप्त होता है, दूसरा नहीं ॥१॥ मूलम् । न कदाचिज्जगत्यस्मिंस्तत्त्वज्ञो हन्त खिद्यति । यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम् ॥ २ ॥

२५४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

न, कदाचित्, जगति, अस्मिन्, तत्त्वज्ञः, हन्त, खिद्यति, यतः, एकेन, तेन, इदम्, पूर्णम्, ब्रह्माण्डमण्डलम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
तत्त्वज्ञः=तत्त्वज्ञानीयतः=क्योंकि
अस्मिन्=इसतेन एकेन=उसी एक से
जगति=जगत विषेइदम्=यह
न कदाचित्=कभी नहींब्रह्माण्डमण्डलम्=ब्रह्माण्ड-मण्डल
खिद्यते=खेद को प्राप्त होतापूर्णम्=पूर्ण है
हन्त=यह बात ठीक है

भावार्थ

हे शिष्य ! इस संसार मण्डल में तत्त्ववित् ज्ञानी कभी भी खेद को प्राप्त नहीं होता है । क्योंकि वह जानता है कि मुझ एक करके ही यह सारा जगत् व्याप्त हो रहा है । खेद दूसरे से होता है, सो दूसरा उसकी दृष्टि में है नहीं ॥ २ ॥

मूलम् ।

न जातु विषयः केऽपि स्वारामं हर्षयन्त्यमी । सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभन्निम्बपल्लवाः ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

न, जातु, विषयः, के, अपि, स्वारामम्, हर्षयन्ति, अभी, सल्लकीपल्लवप्रीतम्, इव, इभम्, निम्बपल्लवाः ॥

सत्रहवाँ प्रकरण । २५५

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
अमी=येसल्लकीपल्लवप्रीतम्=सल्लकी के पत्तों से प्रसन्न हुए
के अपि=कोई भी
विषयः=विषयइभम्=हाथी को
न जातु=कभी नहींनिम्बपल्लवाः=नीम के पत्ते
स्वारामम्=स्वात्मारामको
हर्षयन्ति=हर्षित करते हैंन हर्षयन्ति=नहीं हर्षको प्राप्त करते
इव=जैसे

भावार्थ ।

हे शिष्य । जो पुरुष अपने आत्मा में ही रमण करे, उसका नाम आत्माराम है । वह आत्माराम कदापि विषयों की प्राप्ति होने से और उनके भोगने से हर्ष को नहीं प्राप्त होता है । क्योंकि वह विषयों को तुच्छ जानता है । अर्थात् विषय-जन्य सुख को वह मिथ्या जानता है और विषय-भोग भी उस आत्माराम को हर्ष-युक्त नहीं कर सकते हैं । क्योंकि अपनी सत्ता से रहित हैं । जैसे सल्लकी जो मधुर रसवाली बेलि है, उस बेलि के पत्ते जिस हस्ती ने खाए हैं उसको कटु-रसवाले नीम के पत्ते हर्ष को प्राप्त नहीं कर सकते हैं वैसे जिसने आत्मानन्द का अनुभव किया है, उसको विषयानन्द नहीं आनन्दित कर सकता है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

यस्तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्यधिवासितः ।
अभुक्तेषु निराकाङ्क्षी तादृशो भवदुर्लभः ॥ ४ ॥