अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२६६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
अज्ञानी है। और उनको सत्य असत्य का विवेक भी नहीं होता है। वे दम्भ में फँसते हैं, जो हठ से वस्त्रों को त्यागकर मान के वास्ते नगे रहते हैं, और शिष्यों के कान फूँकते हैं। एक से द्रव्य लेकर दूसरे को देते हैं, या नाम के वास्ते मठादिकों को बनाते हैं। जीवन्मुक्त कदापि नहीं हो सकते हैं। वे भी चेले की तरह सकामी हैं, उनके चेलों में स्त्री- पुत्रादिकों की कामना भरी है, उनके कल्याण के लिये वे चेले नंगों को गुरु बनाकर उनकी सेवा करते हैं। जिस महात्मा का चित्त विषय-भोग में है, वह अवश्य नरक को प्राप्त होता है। चाहे वह कितना ही नंगा रहे और पाखण्ड करे।
दृष्टान्त—एक महात्मा एक राजा के मन्दिर में बहुत काल तक रहे। एक दिन वे मर गए। उसी दिन राजा भी मर गया।
उस नगर के बाहर जंगल में एक तपस्वी योगी रहते थे। एक आदमी उनके पास बैठा था। तपस्वी कुछ सोच करके हँसने लगे, तब उस आदमी ने पूछा कि महाराज ! विना प्रयोजन आज आप क्यों हँसते हो ? उन्होंने कहा, हम बिना प्रयोजन नहीं हँसते हैं, किन्तु राजा के पास जो महात्मा रहते थे, वे मर गये हैं और राजा भी मर गया है। और राजा स्वर्ग में गया और महात्मा नरक में गये। क्योंकि राजा का मन महात्मा में रहता था इसी वास्ते वह स्वर्ग में गया। उसको वैराग्य बना रहता था और महात्मा का मन राजभोगों में रहता था और वैराग्य से शून्य रहता था, इसी वास्ते वे नरक को गए।
सत्रहवाँ प्रकरण । २६७
दार्ष्टान्त—चाहे कितना ही नंगा रहे, वह कदापि जीवन्मुक्त नहीं हो सकता है । जो वासना से रहित है, वही जीवन्मुक्त है ॥ १३ ॥
मूलम् ।
सानुरागां स्त्रियं दृष्ट्वा मृत्युं वा समुपस्थितम् ।
अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एवमहाशयः ॥ १४ ॥
पदच्छेदः ।
सानुरागाम्, स्त्रियम्, दृष्टवा, मृत्युम्, वा, समुपस्थितम्, अविह्वलमनाः, स्वस्थः, मुक्तः, एव, महाशयः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सानुरागाम् = | प्रीति-युक्त | अविह्वलमनाः = | व्याकुलता-रहित होता हुआ |
| स्त्रियम् = | स्त्री को | + च = | और |
| वा = | और | स्वस्थः = | शान्त होता हुआ |
| समुपस्थितम् = | समीप में स्थित | महाशयः = | महापुरुष |
| मृत्युम् = | मृत्यु को | एव = | निश्चय करके |
| दृष्टवा = | देखकर | मुक्तः = | ज्ञानी है ॥ |
भावार्थ ।
अनुराग अर्थात् प्रीति के सहित स्त्री को देख करके जिसका मन कामातुर नहीं होता है, और मृत्यु को समीप स्थित देखकर जिसका मन भय को नहीं प्राप्त होता है, किन्तु अपने आत्मा-नन्द में आनन्द रहता है, वही जीवन्मुक्त है ॥ १४ ॥
मूलम् ।
सुखे दुःखे नरे नार्यां संपत्सु च विपत्सु च ।
विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः ॥ १५ ॥
२६८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
सुखे, दुःखे, नरे, नार्याम्, सम्पत्सु, च, विपत्सु, च, विशेषः, न, एव, धीरस्य, सर्वत्र, समदर्शिनः ॥
अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । सुखे = सुख विषे | विपत्सु = विपत्तियों में दुःखे = दुःख विषे | सर्वत्र = सर्वत्र नरे = नर विषे | समदर्शिनः = समदर्शी नार्याम् = नारी विषे | धीरस्य = ज्ञानी का सम्पत्सु = सम्पत्तियों में | विशेषः = भेद नहीं है ॥
भावार्थ ।
जिसका चित्त सुख-दुःख में सम रहता है, अर्थात् शरीर का अतिसुख होने से जो हर्ष को नहीं प्राप्त होता है, और शरीर को खेद होने से जो शोक को नहीं प्राप्त होता है, और सम्पदा के प्राप्त होने पर जिसको हर्ष नहीं होता है, और विपदा के आने पर जिसको शोक नहीं होता है, वही जीवन्मुक्त है ॥ १५ ॥
मूलम् ।
न हिंसा नैव कारुण्यं नौद्धत्यं न च दीनता । नाश्चर्यं नैव च क्षोभः क्षीणसंसरणे नरे ॥ १६ ॥
पदच्छेदः ।
न, हिंसा, न, एव, कारुण्यम्, न, औद्धत्यम्, न, च, दीनता, न, आश्चर्यम्, न, एव, च, क्षोभः, क्षीणसंसरणे, नरे ॥
सत्रहवाँ प्रकरण । २६९
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| क्षीणसंसरणे = | क्षीण हुआ है संसार जिसका | न औद्धत्यम् = | न अनम्रता है |
| च = | और | ||
| नरे = | मनुष्य विषे | न दीनता = | न दीनता है |
| न हिंसा = | न हिंसा है | न आश्चर्य्यम् = | न आश्चर्य्य है |
| न कारुण्यम् = | न दयालुता है | न क्षोभः = | न क्षोभ है ॥ |
भावार्थ ।
जो वासना-रहित पुरुषों के साथ न द्रोह करता है और न दीन के साथ करुणा करता है, और न शारीरिक सुख के लिय किसी के आगे हाथ बढ़ाता है, और न कभी आश्चर्य को प्राप्त होता है, और न कभी क्षोभ को प्राप्त होता है, वही पुरुष जीवन्मुक्त है ॥ १६ ॥
मूलम् ।
न मुक्तो विषयद्वेष्टा न वा विषयलोलुपः ।
असंसक्तमनाः नित्यं प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते ॥ १७ ॥
पदच्छेदः ।
न, मुक्तः, विषयद्वेष्टा, न, वा, विषयलोलुपः, असंसक्तमनाः, नित्यम्, प्राप्ताप्राप्तम्, उपाश्नुते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मुक्तः = | जीवन्मुक्त | नित्यम् = | सदा |
| न विषयद्वेष्टा = | न विषय में द्वेष करने वाला | असंसक्तमनाः = | आसक्ति-रहित मन- वाला होता हुआ |
| वा = | और | प्राप्ताप्राप्तम् = | प्राप्त और अप्राप्त वस्तु को |
| न विषयलोलुपः = | न विषयों में लोभी है | उपाश्नुते = | भोगता है ॥ |
२७० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ । जो विषयों के साथ द्वेष नहीं करता है, और जो विषय- लोलुप नहीं है, किन्तु असंसक्त मनवाला है, अर्थात् जिसका मन कहीं आसक्त नहीं है । प्रारब्धवश से जो प्राप्त होता है, उसको भोगता है । जो नहीं प्राप्त होता, उसकी इच्छा नहीं करता है, वही जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥ १७ ॥
मूलम् । समाधानासमाधानहिताहितविकल्पनाः । शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः ॥ १८ ॥
पदच्छेदः । समाधानासमाधानहिताहितविकल्पनाः शून्यचित्तः, न, जानाति, कैवल्यम्, इव, संस्थितः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| शून्यचित्तः= | बाहर से शून्य चित्तवाला ज्ञानी | जानाति= | जानता है |
| समाधानासमा-<br>धानहिताहित-<br>विकल्पनाः | समाधान और अस- माधान, हित और अहित की कल्पना को | परन्तु=<br>कैवल्यम्= | परन्तु<br>मोक्ष-रूप |
| इव= | सा | ||
| न= | नहीं | संस्थितः= | स्थित है ॥ |
भावार्थ । जो समाधानता और असमाधानता को अर्थात् हित और अहित की कल्पना को नहीं जानता है, ऐसा शून्य चित्तवाला जो विदेह कैवल्य को प्राप्त हुआ है, वही जीवन्मुक्त है ॥ १८ ॥
सत्रहवाँ प्रकरण । २७१
मूलम् ।
निर्ममोनिरहङ्कारो न किञ्चिदिति निश्चितः ।
अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ १९ ॥
पदच्छेदः ।
निर्ममः, निरहङ्कारः, न, किञ्चित्, इति, निश्चितः, अन्तर्गलितसर्वाशः, कुर्वन्, अपि, न, लिप्यते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अन्तर्गलितसर्वाशः = | अभ्यन्तर में गलित हो गई है सब आशाएँ जिसकी, ऐसा पुरुष | न किञ्चित् = | कुछ भी नहीं है |
| इति = | ऐसा | ||
| निश्चितः = | निश्चय करता | ||
| निर्ममः = | ममता-रहित है | कुर्वन् = | कर्म करता हुआ भी |
| निरहङ्कारः = | अहङ्कार-रहित है | न लिप्यते = | लिपायमान नहीं होता है |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जो विद्वान् 'अहं' मम अभिमान् से शून्य है, अर्थात् 'यह मैं हूँ' और 'यह मेरा है', इस प्रकार के अभिमान से भी जो रहित है, और अधिष्ठानचेतन से अतिरिक्त किंचित् भी सत्य नहीं है, ऐसे निश्चयवाला जो पुरुष है, वह सर्व व्यवहारों को करता हुआ भी कुछ नहीं करता है । क्योंकि उसको कर्तृत्व अभिमान नहीं है ॥ १९ ॥
२७२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् ।
मनःप्रकाशसंमोहस्वप्नजाड्यविवर्जितः ।
दशां कामपि संप्राप्तो भवेद्गलितमानसः ॥ २० ॥
पदच्छेदः ।
मनःप्रकाशसंमोहस्वप्नजाड्यविवर्जितः, दशाम्, काम, अपि, संप्राप्तः, भवेत्, गलितमानसः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| गलित-मानसः | गलित हुआ है मन जिसका, ऐसा ज्ञानी | अपि | भी |
| मनःप्रकाश-संमोहस्वप्न-जाड्यविवर्जितः | मन के प्रकाश से चित्त की शान्ति से स्वप्न और जड़ता अर्थात् सुषुप्ति से वर्जित होता हुआ | काम् | किस अनिर्वचनीय |
| दशाम् | दशा की | ||
| संप्राप्तः | प्राप्त | ||
| भवेत् | होता है ॥ |
भावार्थ ।
हे शिष्य ! गलित हो गई है अन्तःकरण की वृत्ति जिसकी, अर्थात् जिस विद्वान् के मन के सङ्कल्प विकल्पादिक नहीं फुरते हैं, और दूर हो गया है स्त्री-पुत्रादिकों से मोह जिसका, अन्तरात्मा की तरफ है चित्त का प्रवाह जिसका, और जो जड़ता से रहित है, अपने आत्मानन्द में सदैव ही स्थित है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है ॥ २० ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां सप्तदशकं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १७ ॥
—:०:—
अठारहवाँ प्रकरण (उपशम / जीवनमुक्ति)
अठारहवाँ प्रकरण ।
—:०:—
मूलम् ।
यस्य बोधोदये तावत्स्वप्नवद्भवति भ्रमः ।
तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
यस्य, बोधोदये, तावत्, स्वप्नवत्, भवति, भ्रमः, तस्मै, सुखैकरूपाय, नमः, शान्ताय, तेजसे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यस्य बोधोदये = | जिसके बोध के उदय होने पर | तस्मै = | उस |
| सुखैकरूपाय = | आनन्द-रूप | ||
| तावत् = | पहले | शान्ताय = | शान्त-रूप |
| भ्रमः = | भ्रान्ति | च = | और |
| स्वप्नवत् = | स्वप्न के समान | तेजसे = | तेजमय रूप को |
| भवति = | होती है | नमः = | नमस्कार है ॥ |
भावार्थ ।
अब अठाहरवें प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं—
इस प्रकरण में शान्ति की प्रधानता को दिखलाते हुए
२७४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
प्रथम शान्त-रूप परमात्मा को नमस्कार करते हैं । जो आत्मा शान्त-रूप है, जिसमें सङ्कल्प-विकल्प नहीं उत्पन्न होते हैं, और जो सुख और प्रकाश-स्वरूप है, जिसके स्वरूप के ज्ञान होते ही जगद्भ्रम स्वप्न की तरह मिथ्या प्रतीत होने लगता है, उस आत्मा को नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
मूलम् ।
अर्जयित्वाऽखिलानर्थान भोगानाप्नोति पुष्कलान् ।
नहिसर्वपरित्यागमन्तरेण सुखी भवेत् ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
अर्जयित्वा, अखिलान्, अर्थान्, भोगान्, आप्नोति, पुष्कलान्, न, हि, सर्वपरित्यागम्, अन्तरेण, सुखी, भवेत् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अखिलान् | =संपूर्ण | आप्नोति | =प्राप्त होता है |
| अर्थान् | =धनों को | परन्तु | =परन्तु |
| अर्जयित्वा | =जोड़ करके | सर्वपरित्यागम् | =सबके परित्याग के |
| पुष्कलान् | =सब | अन्तरेण | =बिना |
| भोगान् | =भोगों को | सुखी | =सुखी |
| + पुरुष | =पुरुष | न भवेत् | =नहीं होता है ॥ |
| हि | =अवश्य |
भावार्थ ।
प्रश्न– धनी लोग भी तो संसार में सुखी दिखाई पड़ते हैं, उनमें और ज्ञानी में क्या भेद है ?
अठारहवाँ प्रकरण । २७५
उत्तर—अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! धनी लोग स्त्री-पुत्र धनादिक अर्थों को संग्रह करके उनको भोगते हैं, और उनके नाश होने पर अत्यन्त दुःखी होते हैं। देखो—
पृथिवीं धनपूर्णां चेदिमां सागरमेखलाम् । प्राप्नोति पुनरप्येष स्वर्गमिच्छति नित्यशः ॥ १ ॥
यदि समुद्र पर्यंत धन करके पूर्ण यह पृथिवी पुरुष को मिल भी जावे, तो भी वह स्वर्ग की नित्य ही इच्छा करता है ॥ १ ॥
संसार में धनवान् ही प्रायः करके रोगी दीखते हैं। किसी धनी को क्षुधा का, किसी को प्रमेह आदि का रोग बना ही रहता है। धनियों की परस्पर स्पर्धा बहुत रहती है। उनको राजा और चोरों से भय नित्य ही बना रहता है। चोरों के भय से रात्रि को नींद नहीं आती है। धन के संग्रह करने में और धन की रक्षा करने में उनको बड़ा क्लेश होता है। संसार में जितना दुःख धनियों को है, उतना दुःख गरीबों को नहीं है। धन करके जो विषय-भोगादिकों से सुख है, वह सुख नाशी है, तुच्छ है, इस वास्ते संपूर्ण धनादिक विषय-भोगों के त्यागे विना सुख-रूपी आत्मा की प्राप्ति कदापि नहीं होती है। जैसे वंध्या के पुत्र को असत् जान लेना ही उसका त्याग है। विना असत् जानने के उसका त्याग बनता नहीं है। क्योंकि जो वस्तु तीनों कालों में है ही नहीं, उसका त्याग कैसे किया जावे, इसलिये उसका मिथ्या जानना ही त्याग है। इसी तरह संकल्प-विकल्प-रूपी जितना जगत् है, उसको असत् जान लेना ही उसका त्याग है, इसी वार्ता को अब दिखलाते हैं ॥ २ ॥
२७६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् ।
कर्तव्यदुःखमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मनः ।
कुतः प्रशमपीयूषधारासारमृते सुखम् ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
कर्तव्यदुःखमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मनः, कुतः, प्रशम-पीयूषधारासारम्, ऋते, सुखम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| कर्तव्यदुःख-मार्तण्डज्वाला-दग्धान्तरात्मनः = | कर्म-जन्य दुःख-रूपीसूर्य के ज्वाला से भस्म हुआ है मन जिसका, ऐसे पुरुष को | प्रशमपीयूष-धारासारम् = | शान्ति-रूपी अमृत की धारा की वृष्टि |
| ऋते = | बिना | ||
| सुखम् = | सुख | ||
| कुतः = | कहाँ |
भावार्थ ।
कर्तव्य-रूपी जितने कर्म हैं, उनसे जन्य जो दुःख हैं, वही एक सूर्य की तप्तरूपा अग्नि है । उस अग्नि करके जिसका मन दग्ध हो रहा है, उसको शान्ति-रूपी अमृत-जल के बिना कदापि सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती है ॥ ३ ॥
मूलम् ।
भवोऽयं भावनामात्रो न किञ्चित्परमार्थतः ।
नास्त्यभावः स्वभावानां भावाभावविभाविनाम् ॥ ४ ॥
अठारहवाँ प्रकरण । २७७
पदच्छेदः ।
भवः, अयम्, भावनामात्रः, न, किञ्चित्, परमार्थतः, न, अस्ति, अभावः, स्वभावानाम्, भावाभावविभाविनाम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अयम् = | यह | हि = | क्योंकि |
| भवः = | संसार | भावाभावविभाविनाम् = | $\left{\begin{matrix} भाव-रूप और \ अभाव-रूप पदार्थों \ में स्थित हुए \end{matrix}\right.$ |
| भावनामात्रः = | $\left{\begin{matrix} भावना-मात्र है \ अर्थात् संकल्प- \ मात्र है । \end{matrix}\right.$ | स्वभावानाम् = | स्वभावों का |
| परमार्थतः = | परमार्थ से | अभावः = | अभाव |
| किञ्चित् = | कुछ | न अस्ति = | नहीं होता है ॥ |
| न = | नहीं है |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! यह जगत् संकल्प-मात्र है । परमार्थ-दृष्टि से तो आत्मा से अतिरिक्त कोई भी वस्तु भाव-रूप अर्थात् सत्य-रूप नहीं है, आत्मा ही सत्य-रूप है, और संपूर्ण प्रपंच अभाव-रूप है अर्थात् असत्य-रूप है ।
प्रश्न—अभाव-रूप प्रपंच भी कालादिकों के वश से भाव स्वभाववाला हो जावेगा ?
उत्तर—भाव-रूप और अभाव-रूप में स्थित स्वभावों का अभाव-रूप कदापि नहीं हो सकता है अर्थात् भाव पदार्थ का अभाव कदापि नहीं होता है और अभाव पदार्थ का भाव कदापि नहीं होता है। जैसे मनोराज के और स्वप्न के पदार्थों का कदापि भाव नहीं होता है, वैसे प्रपंच के पदार्थों का कदापि
२७८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भाव नहीं होता है। जैसे मनोराज स्वप्न के पदार्थ सब संकल्प मात्र हैं, वैसे जाग्रत् के पदार्थ भी सब संकल्प-मात्र हैं। संकल्प के दूर होने से संसार-रूपी ताप भी दूर हो जाता है। संकल्पों का नाश ही मोक्ष का हेतु है ॥ ४ ॥
मूलम् ।
न दूरं न च संकोचाल्लब्धमेवात्मनः पदम् । निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम् ॥ ५ ॥
पदच्छेदः ।
न, दूरम्, न, च, संकोचात्, लब्धम्, एव, आत्मनः, पदम्, निर्विकल्पम्, निरायासम्, निर्विकारम्, निरञ्जनम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| आत्मनः = | आत्मा का | संकोचात् लब्धम् न=$ | संकोच से प्राप्त नहीं है अर्थात् परिच्छिन्न नहीं है |
| पदम् = | स्वरूप | निर्विकल्पम् = | संकल्प-रहित है |
| दूरम् = | दूर | निरायासम् = | प्रयत्न-रहित है |
| न = | नहीं है | निर्विकारम् = | विकार-रहित है |
| च = | और | निरञ्जनम् = | दुःख रहित है ॥ |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**संकल्प के दूर करने-मात्र से कैसे आत्मा-रूपी अमृत की प्राप्ति होती है ?
**उत्तर—**आत्मा किसी की दूर नहीं है और आत्मा परिच्छिन्न भी नहीं है, क्योंकि सर्वत्र व्यापक है, इसी वास्ते आत्मा नित्य ही प्राप्त है । मन के संकल्प के वश से अज्ञानी पुरुष आत्मा को अप्राप्त की नाईं मानते हैं ।
अठारहवाँ प्रकरण । २७९
जैसे किसी पुरुष के कंठ में स्वर्ण का भूषण पड़ा है, तथापि उसके भ्रम के वश से ऐसा ज्ञान होता है कि मेरा भूषण कहीं खो गया है । यद्यपि वह भूषण उसको प्राप्त भी है, परन्तु भ्रम करके अप्राप्त की तरह प्रतीत होता है । वैसे ही यह आत्मा सर्व पुरुषों को नित्य प्राप्त भी है, पर अपने स्वरूप के अज्ञान होने से संकल्पों के वश से अप्राप्त की तरह हो रहा है । आत्मा विकल्पों से अतीत है अर्थात् मन के विकल्पों के अभाव हो जाने से जाना जाता है । एवं वह विकारों से भी रहित है, और उपाधियों से शून्य है और सदैव एकरस है ॥ ५ ॥
मूलम् । व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रतः वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः ॥ ६ ॥
पदच्छेदः । व्यामोहमात्रविरतौ, स्वरूपादानमात्रतः, वीतशोकाः, विराजन्ते, निरावरणदृष्टयः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| व्यामोहमात्र-विरतौ = | विशेष मोह के निवृत्त होने पर | वीतशोकाः = | शोक से रहित |
| निरा-<br>वरण=<br>दृष्टयः | आवरण रहित दृष्टिवाले अर्थात् ज्ञानी पुरुष | ||
| स्वरूपादान-मात्रतः = | अपने स्वरूप के ग्रहणमात्र से ही | विराजन्ते = | शोभायमान होते हैं ॥ |
भावार्थ । **प्रश्न—**जब आत्मा नित्य ही प्राप्त है, तब फिर शास्त्र के
२८० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
विचार की और आचार्य के उपदेश की क्या आवश्यकता है ? उत्तर—अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! अज्ञान- रूपी मोह का आवरण सबके अन्तःकरण में हो रहा है । उस आवरण करके आत्मा का साक्षात्कार किसी को नहीं होता है । उस आवरण के दूर करने के लिये गुरु और शास्त्र की आवश्यकता है । जैसे दश पुरुषों ने एक नदी के पार उतर करके कहा कि सबको गिनती कर लो, कोई नदी में बह तो नहीं गया है । उनमें से एक पुरुष जब गिनती करने लगा, तब उसने अपने को छोड़कर औरों को गिना, तब नव आदमी गिनती में आए । उसने कहा, दशवाँ पुरुष नदी में बह गया है । फिर दूसरे ने गिना, तब उसने भी अपने को छोड़ करके ही गिना, तब भी नव ही पुरुष पाए गए । इसी तरह हरएक ने अपने को छोड़ करके गिना और एक कम पाया । तब उन सबको निश्चय होगया कि दशवाँ पुरुष नदी में बह गया, तां फिर वे सब मिलकर रोने लगे । उधर से एक बुद्धिमान् पुरुष आया, जसने उनको रोते देखकर पूछा, तुम क्यों रोते हो ? उन्होंने कहा, हम दश आदमी नदी से पार उतरे, उनमें से एक आदमी नदी में बह गया है । उनकी वार्ता को सुनकर उस आदमी ने जब उनको गिना, तब वे दश पूरे थे । उसने जाना ये सब मूर्ख हैं । तब उनसे कहा, हमारे सामने तुम फिर गिनो । उसके सामने जब एक उनमें से गिनने लगा, तब उसने अपने को न गिना, और कहा केवल नव हैं । तब उसने कहा, दशवाँ तू है । तब उसको ज्ञान हुआ कि हम सब पूरे हैं, कोई भी बहा नहीं ।
अठारहवाँ प्रकरण । २८१
दाष्ट्रान्त ।
अज्ञान के वश होकर जो अपने आत्मा को तीर्थों में और पर्वतों में खोजता फिरता है, वह दशवें पुरुष की तरह अपने को नहीं जानता है । जब गुरु उसको उपदेश करता है, तब वह जानता है कि सुख-रूप आत्मा मैं हूँ । इसलिये गुरु और शास्त्र की भी आवश्यकता है ।
तात्पर्य यह है कि जिसने गुरु और शास्त्र के उपदेश को श्रवण करके अपने स्वरूप का निश्चय कर लिया है, उसके अन्तःकरण में फिर मोह-रूपी आवरण कदापि नहीं रहता है, किन्तु वह संसार में शोभा को प्राप्त होता है ।। ६ ।।
मूलम् ।
समस्तं कल्पनामात्रमात्मा मुक्तः सनातनः । इति विज्ञाय धीरोहि किमभ्यस्यति बालवत् ॥७॥
पदच्छेदः ।
समस्तम्, कल्पनामात्रम्, आत्मा, मुक्तः, सनातनः, इति, विज्ञाय, धीरः, हि, किम्, अभ्यस्यति, बालवत् ।।
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| समस्तम् = सब जगत् | इति = ऐसा |
| कल्पनामात्रम् = कल्पना-मात्र है | विज्ञाय = ज्ञान करके |
| आत्मा = आत्मा | धीरः = पंडित |
| मुक्तः = मुक्त है | बालवत् = बालकों की नाई |
| च = और | किम् = क्या |
| सनातनः = सनातन है | अभ्यस्यति = अभ्यास करता है ॥ |
२८२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
संपूर्ण जगत् मन की कल्पना-मात्र है ।
शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा न वै बध्येत कर्हिचित् ।
बन्धमोक्षौ मनःसंस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ १ ॥
आत्मा शुद्ध है, नित्यमुक्त है, कदापि वह बंधायमान नहीं है, बंध और मोक्ष मन में स्थित है, उस मन के शान्त होने से बंध और मोक्ष भी शान्त हो जाते हैं ॥ १ ॥
आत्मा नित्यमुक्त है, सनातन है, ऐसा निश्चय करके विद्वान् ज्ञानी बालक की नाईं चेष्टा करता है ॥ ७ ॥
मूलम् ।
आत्मा ब्रह्मेति निश्चित्य भावाभावौ च कल्पितौ ।
निष्कामः किं विजानाति किं ब्रूते च करोति किम् ॥८॥
पदच्छेदः ।
आत्मा, ब्रह्म, इति, निश्चित्य, भावाभावौ, च, कल्पितौ, निष्कामः, किम्, विजानाति, किम्, ब्रूते, च, करोति, किम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| आत्मा = | जीवात्मा | इति = | ऐसा |
| ब्रह्म = | ब्रह्म है | निश्चित्य = | निश्चय करके |
| च = | और | निष्कामः = | कामना-रहित पुरुष |
| भावाभावौ = | भाव और अभाव | किम् = | क्या |
| कल्पितौ = | कल्पित है | विजानाति = | जानता है |
अठारहवां प्रकरण । २८३
| च=और | |
| किम्=क्या | किम्=क्या |
| ब्रूते=कहता है | करोति=करता है |
भावार्थ । त्वं पद का अर्थ जो जीवात्मा है, और तत्पद का अर्थ जो ब्रह्म है, दोनों के अभेद को निश्चय करके भाव और अभाव अर्थात् भाव जो घटादि पदार्थ हैं, और उनका जो अभाव है, ये दोनों अधिष्ठानचेतन में कल्पित हैं । इस प्रकार समस्त जगत् को तुच्छ जानकर जिस विद्वान् की अविद्या नष्ट हो गई है, वह जिसके जानने की और कथन करने की इच्छा करता है, किंतु किसी की भी नहीं करता है, वह न किसी कार्य को करता है । क्योंकि अब उसमें कर्तृत्वाभिमान नहीं है ।। ८ ।।
मूलम् । अयं सोऽहमयं नाहमिति क्षीणा विकल्पनाः । सर्वमात्मेति निश्चित्य तूष्णींभूतस्य योगिनः ॥ ९ ॥
पदच्छेदः । अयम्, सः, अहम्, अयम्, न, अहम्, इति, क्षीणाः, विकल्पनाः, सर्वम्, आत्मा, इति, निश्चित्य, तूष्णींभतस्य, योगिनः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वम्=सब | निश्चित्य=निश्चय करके | ||
| आत्मा=आत्मा है | तूष्णींभतस्य=चुपचाप हुए | ||
| इति=ऐसा | यागिनः=योगी की |
२८४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| इति=ऐसी | अयम्=यह |
| विकल्पना=कल्पनाएँ कि | अहम्=मैं |
| अयम्=यह | न=नहीं हूँ |
| स=वह | क्षीणाः=क्षीण हो जाती है |
| अहम्=मैं हूँ |
भावार्थ ।
जिस विद्वान् ने ऐसा निश्चय किया है कि सर्वरूप आत्मा ही है । वह बाह्य शरीरादिकों के व्यापार से रहित हो जाता है, और वही जीवन्मुक्त भी कहा जाता है । कहा भी है—
वृत्तिहीनं मनः कृत्वा क्षेत्रज्ञं परमात्मनि ।
एकीकृत्य विमुच्येत योगोऽयं मुख्य उच्यते ॥ १ ॥
क्षेत्रज्ञ अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा में जो ध्येयाकारवृत्ति हुई थी, उस वृत्ति के नष्ट होने पर दानों की एकता को निश्चय करके ही पुरुष मुक्त हो जाता है, अर्थात् जिस काल में मन नाना प्रकार की कल्पना से रहित हो जाता है, उसी काल में वह मुक्त कहा जाता है ॥ ९ ॥
मूलम् ।
न विक्षेपो न चैकाग्र्यं नातिबोधो न मूढ़तः ।
न सुखं न चवा दुःखमुपशान्तस्य योगिनः ॥ १० ॥
पदच्छेदः ।
न, विक्षेपः, न च, एकाग्रचम्, न, अतिबोधः, न मूढ़तः, न, सुखम्, न, च, वा, दुःखम्, उपशान्तस्य, योगिनः ॥
अठारहवाँ प्रकरण । २८५
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| उपशान्तस्य=शान्त हुए | न अतिबोधः=न बोध है |
| योगिनः=योगी को | न मूढ़ता=न मूर्खता है |
| न विक्षेपः=न विक्षेप है | न सुखम्=न सुख है |
| च=और | वा=और |
| न एकाग्रत्वम्=न एकाग्र- ता है | न दुःखम्=न दुःख है ॥ |
भावार्थ ।
अब संकल्प से रहित मन के स्वरूप को दिखाते हैं । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जिसका मन संकल्प-विकल्प से रहित हो गया है, उसको न विक्षेप होता है, और न वह एकाग्रता के लिये उद्यम करता है । क्योंकि जिसको विक्षेप होता है, वही निरोध के लिये यत्न करता है । उसको पदार्थों का अत्यन्त ज्ञान या मूढ़ता नहीं होती है, और न उसको विषयजन्य सुख या दुःख होता है । क्योंकि वह केवल आत्मानन्द में मग्न है ॥ १० ॥
मूलम् ।
स्वराज्ये भैक्ष्यवृत्तौ च लाभालाभे जने वने ।
निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः ॥११॥
पदच्छेदः ।
स्वराज्ये, भैक्ष्यवृत्तौ, च, लाभालाभे, जने, वने, निर्वि- कल्पस्वभावस्य, न, विशेषः, अस्ति, योगिनः ॥