अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
एतु तिस्रः परावत एतु पञ्च जनाँ अति. एतु तिस्रो ऽ ति रोचना यतो न पुनरायति शश्वतीभ्यः समाभ्यो यावत् सूर्यो असद् दिवि.. (३) इंद्र के द्वारा प्रेरित हमारा शत्रु तीनों भूमियों और निषाद आदि पांच जनों को पार कर के दूर वहां चला जाए, जहां से वापस न आए. जब तक सूर्य आकाश में रहे, तब तक वह अनेक वर्षों तक न लौटे. (३) सूक्त-७६ देवता—सायंतन अग्नि य एनं परिषीदन्ति समादधति चक्षसे. संप्रेद्धो अग्निर्जिह्वाभिरुदेतु हृदयादधि.. (१) जो राक्षस आदि इस के चारों ओर बैठते हैं तथा हिंसा करने के लिए तत्पर हो जाते हैं, उन के हृदय से उत्पन्न प्रज्वलित अग्नि उन्हें जला दे. (१) अग्नेः सांतपनस्याहमायुषे पदमा रभे. अद्धातिर्यस्य पश्यति धूममुद्यन्तमास्यतः.. (२) अधिक तपन वाले उन अग्नि देव के जीवन के लिए मैं उपक्रम करता हूं, जिन के मुख से निकलते हुए धूम को अद्धाति नाम के ऋषि देखते हैं. (२) यो अस्य समिधं वेद क्षत्रियेण समाहिताम्. नाभिह्वारे पदं नि दधाति स मृत्यवे.. (३) विजय के इच्छुक क्षत्रिय जाति के पुरुष के द्वारा स्थापित अग्नि और दीप्त करने वाली आहुतियों को जो पुरुष जानता है, वह मृत्यु का कारण बनने वाले ऐसे स्थान में पैर नहीं रखता है, जहां हाथी, बाघ आदि घूमते हैं. (३) नैनं घ्नन्ति पर्यायिणो न सन्नां अव गच्छति. अग्नेर्यः क्षत्रियो विद्वाङ्नाम गृह्णात्यायुषे.. (४) कल्याण की कामना करने वाले को शत्रु नहीं मार पाते. वह अपने समीपवर्ती शत्रुओं को भी नहीं जानता. जो क्षत्रिय इस प्रकार से महात्मा अग्नि को जानता हुआ, अग्नि का नाम चिरकाल तक जीवित रहने के लिए उच्चारण करता है, शत्रु उस का वध नहीं कर पाते. (४) सूक्त-७७ देवता—जातवेद अस्थाद् द्यौरस्थात् पृथिव्यस्थाद् विश्वमिदं जगत्. आस्थाने पर्वता अस्थ्यु स्थाम्न्यश्वां अतिष्ठिपम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
नियंता ईश्वर की आज्ञा से जिस प्रकार आकाश और पृथ्वी अपने स्थान पर स्थित हैं, उन के मध्य में स्थित जगत् भी अपने स्थान पर वर्तमान है. मेरु, मंदार आदि पर्वत भी ईश्वर के द्वारा बनाए गए स्थान पर स्थित हैं. हे नारी! उसी प्रकार मैं तुझे घर की थूनी से बांधता हूं. बांधने का प्रकार वही है, जिस प्रकार घुड़सवार दुष्ट घोड़ों को रस्सी से बांधता है. (१) य उदानट् परायणं य उदान्ण्यायनम्. आवर्तनं निवर्तनं यो गोपा अपि तं हुवे.. (२) मैं उस देवता का आह्वान करता हूं, जो पीछे गमन करने वालों में व्याप्त है. जो नीचे गमन करने वालों में व्याप्त है और जो भागने वालों के लौटने की गति को रोकता है. (२) जातवेदो नि वर्तय शतं ते सन्त्वावृतः. सहस्रं त उपावृत्तस्ताभिर्नः पुनरा कृधि.. (३) हे जातवेद अग्नि! इस भागने वाली स्त्री को घर में स्थापित करो. तुम्हारे पास इसे लौटाने के सैकड़ों उपाय हैं. तुम इसे मेरे पास लौटाने के लिए हजारों उपाय जानते हो. उन के द्वारा तुम इस स्त्री को पुनः मेरी ओर आकर्षित करो. (३) सूक्त-७८ देवता—चंद्रमा तेन भूतेन हविषा ऽ यमा प्यायतां पुनः. जायां यामस्मा आवाक्षुस्तां रसेनाभि वर्धताम्.. (१) प्रसिद्ध एवं समृद्धि करने वाले हवि से यह पति पुनः प्रजा और पशु आदि से समृद्ध हो. विवाह करने वाले पिता आदि जिस पत्नी को इस के समीप लाए थे, उस पत्नी की दधि, मधु, घृत आदि से हवन किए जाते हुए अग्नि देव वृद्धि करें. (१) अभि वर्धतां पयसा ऽ भि राष्ट्रेण वर्धताम्. रय्या सहस्रवर्चसेमौ स्तामनुपक्षितौ.. (२) यह वर एवं वधू गायों के दूध से समृद्ध हों. इन्हें गायों आदि की समृद्धि प्राप्त हो. ये पतिपत्नी असीमित तेज और धन के द्वारा पूर्ण काम बनें. (२) त्वष्टा जायामजनयत् त्वष्टा ऽ स्यै त्वां पतिम्. त्वष्टा सहस्रमायूंषि दीर्घमायुः कृणोतु वाम्.. (३) हे वर! त्वष्टा देव ने स्त्री को जन्म दिया एवं त्वष्टा ने ही तुम्हें इस स्त्री का पति बनाया है. त्वष्टा देव तुम दोनों अर्थात् पतिपत्नी की हजार वर्षों की दीर्घ आयु प्रदान करें. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-७९ देवता—संस्फान
सूक्त-७९ देवता—संस्फान अयं नो नभसस्पतिः संस्फानो अभि रक्षतु. असमातिं गृहेषु नः.. (१) हवि प्रदान करने के कारण आकाश के पालन कर्ता अग्नि धान्य की वृद्धि करते हुए हमारी रक्षा करें एवं हमारे घरों की कुठिया को कभी धान्य से रहित न बनाएं. (१) त्वं नो नभसस्पत ऊर्जं गृहेषु धारय. आ पुष्टमेत्वा वसु.. (२) हे अंतरिक्ष के पालन कर्ता अग्नि! तुम हमारे घरों में रस वाले अन्न को स्थापित करो. प्रजा, पशु एवं धन हमारे पास आएं. (२) देव संस्फान सहस्रापोषस्येशिषे. तस्य नो रास्व तस्य नो धेहि तस्य ते भक्तिवांसः स्याम.. (३) हे दानादिगुण युक्त एवं प्रजापालन में प्रवृत्त आदित्य, तुम हजार संख्या वाली प्रजाओं का पोषण करने वाले धनों के स्वामी हो. तुम उसी प्रकार का धन हमें प्रदान करो तथा उस धन का भाग हमें भोग करने के लिए दो. तुम्हारी कृपा से हम उस धन के स्वामी बनें. (३) सूक्त-८० देवता—चंद्रमा अन्तरिक्षेण पतति विश्वा भूतावचाकशत्. शुनो दिव्यस्य यन्महस्तेना ते हविषा विधेम.. (१) कौआ, कबूतर आदि घात करने की इच्छा से बारबार देखते हुए इस पुरुष के शरीर पर गिरते हैं. हे अग्नि! इस दोष को शांत करने के लिए हम स्वर्ग में रहने वाले श्वान के तेज की हवि से तुम्हारी सेवा करते हैं. (१) ये त्रयः कालकाञ्जा दिवि देवा इव श्रिताः. तान्तसर्वान्ह्व ऊतये ऽ स्मा अरिष्टतातये.. (२) कालकांज नाम के जो तीन असुर उत्तम कर्मों के कारण देवों के समान स्वर्ग में वर्तमान हैं, मैं इस पुरुष की रक्षा के लिए तथा कौए, कबूतर आदि पक्षियों के आघात संबंधी दोष की भीति के निमित्त सभी कालकांज असुरों का आह्वान करता हूं. (२) अप्सु ते जन्म दिवि ते सधस्थं समुद्रे अन्तर्महिमा ते पृथिव्याम्. शुनो दिव्यस्य यन्महस्तेना ते हविषा विधेम.. (३) हे अग्नि, वाडवाग्नि के रूप में तुम्हारा जन्म सागर में हुआ था तथा सूर्य के रूप में तुम्हारी स्थिति आकाश में रही है. सागर और धरती के मध्य तुम्हारी महिमा देखी जाती है. हे ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-८१ देवता—आदित्य
अग्नि! हम हवि के द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं. (३) सूक्त-८१ देवता—आदित्य यन्ता ऽ सि यच्छसे हस्तावेप रक्षांसि सेधसि. प्रजां धनं च गृह्णानः परिहस्तो अभूदयम्.. (१) हे अग्नि! तुम गर्भ को नष्ट करने वाले राक्षस आदि को वश में करने में समर्थ हो, इसीलिए अपने दोनों हाथ फैलाओ तथा उन के द्वारा गर्भ का नाश करने वाले राक्षसों का विनाश करो. पुत्र आदि रूप प्रजा और उन के भोग के लिए धन प्रदान करते हुए अग्नि अपने हाथ फैला कर रक्षा करें. (१) परिहस्त वि धारय योनिं गर्भाय धातवे. मय्यिदि पुत्रमा धेहि तं त्वमा गमयागमे.. (२) हे कंकण! तुम गर्भ धारण करने के लिए गर्भाशय को विस्तृत करो. हे पत्नी! तुम अपने गर्भाशय में पुत्र को धारण करो तथा पति के आगमन पर मेरे मनचाहे पुत्र को जन्म दो. (२) यं परिहस्तमबिभरदितिः पुत्रकाम्या. त्वष्टा तमस्या आ बध्नाद् यथा पुत्रं जनादिति.. (३) पुत्र की इच्छा से देवता अदिति ने जिस कंकण को धारण किया, वही कंकण त्वष्टा देव मेरी इस पत्नी के हाथ में बांधें, जिस से यह पुत्र को जन्म दे सके. (३) सूक्त-८२ देवता—इंद्र आगच्छत आगतस्य नाम गृह्णाम्यायत:. इन्द्रस्य वृत्रघ्नो वन्वे वासवस्य शतक्रतो:.. (१) मैं अपने समीप आए हुए इंद्र को प्रसन्न करने वाले नाम वृत्र हंता का उच्चारण करता हूं. विवाह की इच्छा वाला मैं वृत्र का वध करने वाले, वसुओं द्वारा उपासना किए गए और शक्ति की प्रसिद्धि करने वाले सौ कर्मों के स्वामी इंद्र की उपासना अभिमत फल को पाने के लिए करता हूं. (१) येन सूर्या सावित्रीमश्विनोहतुः पथा. तेन मामब्रवीद् भगो जायामा वहतादिति.. (२) जिस प्रकार अश्विनीकुमारो ने सविता की पुत्री सूर्या से विवाह किया, उसी प्रकार से भग ने मुझ से कहा कि पत्नी ले आओ. (२) eBook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-८३ देवता—सूर्योदय
यस्ते ऽ ङ्कुशो वसुदानो बृहन्निन्द्र हिरण्ययः. तेना जनीयते जायां मह्यं धेहि शचीपते.. (३) हे इंद्र! तुम्हारा जो हाथ आकर्षक धन धारण करने वाला एवं स्वर्ण से युक्त हैं. हे शची के पति! उसी हाथ से पत्नी के इच्छुक मुझ को पत्नी प्रदान करो. (३) सूक्त-८३ देवता—सूर्योदय अपचितः प्र पतत सुपर्णो वसतेरिव. सूर्यः कृणोतु भेषजं चन्द्रमा वो ऽ पोच्छतु.. (१) हे गंडमालाओ! जिस प्रकार बाज पक्षी अपने निवास स्थान से उड़ता है, उसी प्रकार तुम मेरे शरीर से निकल जाओ. सूर्य मेरी चिकित्सा करें और चंद्रमा मेरे शरीर से तुम्हें दूर करें. (१) अन्यैका श्येन्येका कृष्णैका रोहिणी द्वे. सर्वासामग्रभं नामावीरघ्नीरपेतन.. (२) एक गंडमाला लाल रंग की, दूसरी श्वेत वर्ण की तथा तीसरी काले रंग की है. इन के अतिरिक्त दो गंडमालाएं लाल रंग की हैं. मैं इन सब को प्रसन्न करने वाले नाम का उच्चारण करता हूं. इस से प्रसन्न हो कर तुम इस पुरुष को त्याग कर अन्यत्र चली जाओ. (२) असूतिकारामण्यपचित् प्र पतिष्यति. ग्लौरितः प्र पतिष्यति स गलुन्तो नशिष्यति.. (३) पीब बहाने वाली तथा घाव के रूप वाली गंडमाला इस पुरुष के शरीर से दूर जाएगी. इस के घाव के कारण होने वाला दुःख नष्ट हो जाएगा तथा चंद्रमा गंडमालाओं की पीड़ा को शेष नहीं रखेगा. (३) वीहि स्वामाहुतिं जुषाणो मनसा स्वाहा मनसा यदिदं जुहोमि.. (४) हे घाव रोग के अभिमानी देव! तुम अपनी आहुति का भक्षण करो. सेवा किए जाते हुए तुम आहुति का भक्षण करो. मैं भी मन से यह हवि देता हूं. (४) सूक्त-८४ देवता—निर्ऋति यस्यास्त आसनि घोरे जुहोम्येषां बद्धानामवसर्जनाय कम्. भूमिरिति त्वाभिप्रमन्वते जना निर्ऋतिरिति त्वाहं परि वेद सर्वतः.. (१) हे रोगाभिमानिनी पाप की देवी! घाव के रोगों से उत्पन्न बंधनों से छूटने के लिए मैं ebook converter DEMO Watermarks*
तुम्हारे भयानक मुख में हवि डालता हूं तथा घाव को धोने के लिए यह हवि ओषधि युक्त जल प्रयोग करता हूं. तुम्हें ज्ञानहीन जन पृथ्वी समझते हैं. तुम्हारा स्वरूप जानता हुआ मैं सभी प्रकार निर्ऋति अर्थात् सभी रोगों का कारण जानता हूं. (१) भूते हविष्मती भवैष ते भागो यो अस्मासु. मुञ्चेमानमूनेनसः स्वाहा.. (२) हे सर्वत्र विद्यमान निर्ऋति! तुम हमारे द्वारा दिया हुआ आज्य स्वीकार करो. यह तुम्हारा भाग्य है जो इस समय हम ने निश्चित् किया है. तुम हमें रोग के कारण पाप से बचाओ. हमारा यह हवि उत्तम आहुति वाला हो. (२) एवो ष्व १ स्मन्निर्ऋते ऽ नेहा त्वमयस्मयान् वि चृता बन्धपाशान्. यमो मह्यं पुनरित् त्वां ददाति तस्मै यमाय नमो अस्तु मृत्यवे.. (३) हे पाप देवता निर्ऋति! तुम हमें बाधा न पहुंचाती हुई अत्यंत दृढ़ बंधन वाले रस्सी के फंदों को हम से दूर करो. ये फंदे रोगात्मक हैं. हे रोगी! यमराज तुम्हें मेरे लिए देते हैं. मृत्यु के देवता उस यम को नमस्कार है. (३) अयस्मये द्रुपदे बेधिष इहाभिहितो मृत्युभिर्ये सहस्रम्. यमेन त्वं पितृभिः संविदान उत्तमं नाकमधि रोहयेमम्.. (४) हे निर्ऋति! लोहे की श्रृंखलाओं से अथवा लकड़ी के बने चरण बंधन से जब तुम किसी पुरुष को बांधती हो, तब वह इस लोक में मृत्यु के द्वारा बद्ध हो जाता है. प्रसिद्ध ज्वर आदि रोग और राक्षस, पिशाच आदि मृत्यु के हजारों कारण हैं. हे निर्ऋति! तुम मृत्यु के देव यम से और देवता, पितर आदि से तालमेल कर के इस पुरुष को उत्तम सुख प्रदान करो. (४) सूक्त-८५ देवता—वनस्पति वरणो वारयाता अयं देवो वनस्पतिः. यक्ष्मो यो अस्मिन्नाविष्टस्तमु देवा अवीवरन्.. (१) यह दिव्य गुण युक्त वरण नाम की वनस्पति से बनी हुई मणि राजयक्ष्मा रोग का निवारण करे. इस पुरुष में जिस यक्ष्मा रोग का निवास है, उस रोग का निवारण इंद्र आदि देव करें. (१) इन्द्रस्य वचसा वयं मित्रस्य वरुणस्य च. देवानां सर्वेषां वाचा यक्ष्मं ते वारयामहे.. (२) हे रोगी पुरुष! तेरे हाथ में वरण वृक्ष से बनी हुई मणि बांधने वाले हम सब इंद्र, मित्र और वरुण की आज्ञा से यक्ष्मा रोग का निवारण करते हैं. हम सभी देवों की आज्ञा से तेरे यक्ष्मा रोग को तेरे शरीर से निकालते हैं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-८६ देवता—एक वृष
यथा वृत्र इमा आपस्तस्तम्भ विश्वधा यतीः. एवा ते अग्निना यक्ष्मं वैश्वानरेण वारये.. (३) त्वष्टा का पुत्र वृत्रासुर जिस प्रकार स्थावर और जंगम विश्व का पोषण करने वाले इन मेघों के जलों की गति रोकता है, हे रोगी! मैं वैश्वानर अग्नि की सहायता से तेरे यक्ष्मा रोग का उसी प्रकार निवारण करता हूं. (३) सूक्त-८६ देवता—एक वृष वृषेन्द्रस्य वृषा दिवो वृषा पृथिव्या अयम्. वृषा विश्वस्य भूतस्य त्वमेकवृषो भव.. (१) यह पुरुष इंद्र की कृपा से सेचन समर्थ हो. यह द्युलोक एवं पृथ्वीलोक में श्रेष्ठ बने. हे श्रेष्ठता के इच्छुक पुरुष! तू संसार के सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बन. (१) समुद्र ईशे स्रवतामग्निः पृथिव्या वशी. चन्द्रमा नक्षत्राणामीशे त्वमेकवृषो भव.. (२) सागर बहने वाले जलों का स्वामी है. अग्नि देव पृथ्वी के स्वामी हैं. चंद्रमा नक्षत्रों का स्वामी है. तुम सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बनो. (२) सम्राडस्यसुराणां ककुन्मनुष्याणाम्. देवानामधर्धभागसि त्वमेकवृषो भव.. (३) हे इंद्र! तुम असुरों के स्वामी हो. तुम बैल की ठाट के समान सभी मनुष्यों में उन्नत बनो. हे इंद्र! सभी देव मिल कर तुम्हारे बराबर होते हैं. हे श्रेष्ठता के इच्छुक मनुष्य! तू इंद्र की कृपा से सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बन. (३) सूक्त-८७ देवता—ध्रुव आ त्वाहार्षमन्तर भूर्ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलत्. विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधि भ्रशत्.. (१) हे राजन्! हम तुम्हें अपने राष्ट्र में लाए हैं! तुम हमारे मध्य हमारे स्वामी बनो. तुम चंचलता रहित हो कर राज्य के अधिकार पर दृढ़ बनो. सभी प्रजाएं तुम्हें चाहें. यह राष्ट्र तुम्हारे अधिकार से भ्रष्ट न हो. (१) इहैवैधि मा स प च्योष्ठाः पर्वत इवाविचाचलत्. इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठेह राष्ट्रमु धारय.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे राजन्! तुम इसी राज्य सिंहासन पर सदा वर्तमान रहो. इस से कभी वंचित न बनो. तुम पर्वत के समान निश्चल हो कर इंद्र के समान इसी राष्ट्र में स्थिर रहो. तुम अपने इस राष्ट्र को धारण करो. (२) इन्द्र एतमदीधरद् ध्रुवं ध्रुवेण हविषा. तस्मै सोमो अधि ब्रवदयं च ब्रह्मणस्पतिः.. (३) स्थिरता प्रदान करने वाले हमारे द्वारा दिए हुए हवि से संतुष्ट इंद्र ने इस राष्ट्र में इस राजा को स्थिर रूप से स्थापित किया है. सोम ने इस राजा को अपना कहा है. वेद राशि का पालन करने वाले ब्रह्म देव यही कहें. (३) सूक्त-८८ देवता—ध्रुव ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवं विश्वमिदं जगत्. ध्रुवासः पर्वता इमे ध्रुवो राजा विशामयम्.. (१) आकाश जिस प्रकार स्थित है, यह पृथ्वी जिस प्रकार ध्रुव दिखाई देती है. यह दिखाई देता हुआ विश्व जिस प्रकार ध्रुव है तथा ये सभी पर्वत जिस प्रकार स्थिर हैं, प्रजाओं का स्वामी यह राजा भी उसी प्रकार स्थिर हो. (१) ध्रुवं ते राजा वरुणो ध्रुवं देवो बृहस्पतिः. ध्रुवं त इन्द्रश्चाग्निश्च राष्ट्रं धारयतां ध्रुवम्.. (२) हे राजन्! राजा वरुण तुम्हारे राज्य को स्थिर करें. प्रकाश करते हुए बृहस्पति तुम्हारे राष्ट्र को ध्रुव बनाएं. इंद्र और अग्नि तुम्हारे राष्ट्र को स्थिर बनाएं. (२) ध्रुवो ऽ च्युतः प्र मृणीहि शत्रूनूछत्रूयतो ऽ धरान् पादयस्व. सर्वा दिशः संमनसः सध्रीचीर्ध्रुवाय ते समितिः कल्पतामिह.. (३) हे राजन्! तुम इस राष्ट्र में स्थिर और अच्युत रह कर शत्रुओं का विनाश करो तथा शत्रुओं के समान आचरण करने वाले अन्य जनों को भी अधोमुख गिराओ. सभी दिशाएं सौमनस्य वाली बन कर तुम्हारी सेवा में लगें. तुम्हारा यह आयोजन सभी दिशाओं में तुम्हें स्थिरता प्रदान करने में समर्थ हो. (३) सूक्त-८९ देवता—मंत्रों में बताए गए इदं यत् प्रेण्यः शिरो दत्तं सोमेन वृष्ण्यम्. ततः परि प्रजातेन हार्दिं ते शोचयामसि.. (१) मुझ प्रेम प्राप्त करने वाले का जो यह शक्ति प्रदान करने वाला शीश है, वह मुझे सोम ने
दिया है. उन के द्वारा उत्पन्न विशेष स्नेह से मैं तुम्हारे मन को संताप युक्त करता हूं. (१) शोचयामसि ते हार्दि शोचयामसि ते मनः. वातं धूम इव सध्य १ ङ् मामेवान्वेतु ते मनः.. (२) हे पति और पत्नी! मैं तुम दोनों के हृदयों को परस्पर प्रेम उत्पन्न कर के संतप्त करता हूं. मैं तुम्हारे मन को उसी प्रकार संतप्त करता हूं, जिस प्रकार धुआं वायु का अनुगमन करता है. तुम्हारा मन इसी प्रकार मेरा अनुगामी हो. (२) मह्यं त्वा मित्रावरुणो मह्यं देवी सरस्वती. मह्यं त्वा मध्यं भूम्या उभावन्तौ समस्यताम्.. (३) हे पत्नी! मित्र और वरुण देव तुम्हें मुझ से मिलाएं. सरस्वती देवी तुम्हें मुझ से मिलाएं. धरती पर स्थित सभी प्राणी तुम्हें मुझ से मिलाएं तथा इस भूमि के ऊपर और नीचे के प्रदेश तुम्हें मुझ से मिलाएं. (३) सूक्त-९० देवता—रुद्र यां ते रुद्र इषुमास्यदङ्गेभ्यो हृदयाय च. इदं तामद्य त्वद् वयं विषूचीं वि वृहामसि.. (१) हे रोगी! तेरे हाथ, पैर और हृदय आदि अंगों को बेधने के लिए रुद्र देव ने जो बाण अपने धनुष पर चढ़ा कर फेंका है, आज मैं उस का प्रतिकार करने के लिए उस बाण को तुझ से विमुख करने के लिए शरीर से दूर फेंकता हूं. (१) यास्ते शतं धमनयो ऽ ङ्गान्यनु विष्ठिताः. तासां ते सर्वासां वयं निर्विषाणि ह्वयामसि.. (२) हे शूल रोगी! तेरे हाथ, पैर आदि अंगों में जो सैकड़ों धमनी नाड़ियां स्थित हैं, उन के लिए मैं विषरहित एवं शूलहीन ओषधियां बनाता हूं. (२) नमस्ते रुद्रास्यते नमः प्रतिहितायै. नमो विसृज्यमानायै नमो निपतितायै.. (३) हे व्याधि रूप अस्त्र चलाने वाले रुद्र! तुम को नमस्कार है. धनुष पर चढ़े हुए तुम्हारे बाण को नमस्कार है. धनुष से छोड़े जाते हुए तुम्हारे बाण को नमस्कार है. लक्ष्य पर गिरने वाले तुम्हारे बाण को नमस्कार है. (३) सूक्त-९१ देवता—यक्ष्मा का विनाश ebook converter DEMO Watermarks*
इमं यवमष्टायोगैः षड्योगेभिरचर्कृषुः. तेना ते तन्वो ३ रपो ऽ पाचीनमप व्यये.. (१) ओषधि के रूप में प्रयोग में लाए जाते हुए जौ को आठ बैलों वाले तथा छः बैलों वाले हल से जोत कर उत्पन्न किया गया है. हे रोगी! उस जौ से मैं तेरे शरीर के रोग के कारण पाप को दूर करता हूं. (१) न्यग्् वातो वाति न्यक् तपति सूर्यः. नीचीनमघ्न्या दुहे न्यग् भवतु ते रपः.. (२) वायु जिस प्रकार नीचे चलती है, सूर्य जिस प्रकार नीचे तपते हैं, जिस प्रकार गायों से नीचे की ओर दूध काढ़ा जाता है, हे रोगी! उसी प्रकार तेरे रोग का कारण पाप शांत हो जाए. (२) आप इद् वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः. आपो विश्वस्य भेषजीस्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्.. (३) सभी ओषधियां जल का विकार हैं. इस प्रकार जल ही रोग निवारण के लिए उत्तम ओषधि है. जल सारे संसार के लिए ओषधि रूप है, वे ही जल तेरे लिए रोग निवारक ओषधि बनें. (३) सूक्त-९२ देवता—बाजि अर्थात् घोड़ा वातरंहा भव वाजिन् युज्यमान इन्द्रस्य याहि प्रसवे मनोजवाः. युञ्जन्तु त्वा मरुतो विश्ववेदस आ ते त्वष्टा पत्सु जवं दधातु.. (१) हे रथ के जुए में जुते हुए अश्व! तू वायु के समान तेज चलने वाला बन. इंद्र की प्रेरणा होने पर तू मन के समान वेग से गंतव्य पर पहुंच. सारे संसार को जानने वाले उनचास मरुद्गण तुझ से मिल जाएं एवं त्वष्टा देव तेरे चरणों को वेग प्रदान करें. (१) जवस्ते अर्वन् निहितो गुहा यः श्येने वात उत यो ऽ चरत् परीत्तः. तेन त्वं वाजिन् बलवान् बलेनाजिं जय समने पारयिष्णुः.. (२) हे अश्व! तेरा वेग असाधारण स्थान गुफा में छिपा है. तेरा जो वेग बाज पक्षी और वायु में सुरक्षित है, तू उसी वेगशाली बल से बलवान हो कर हमें संग्राम में सफलता दिला. (२) तनूष्टे वाजिन् तन्वं१ नयन्ती वाममस्मभ्यं धातवु शर्म तुभ्यम्. अहुतो महो धरुणाय देवो दिवीव ज्योतिः स्वमा मिमीयात्.. (३) हे वेगवान अश्व! सवार के शरीर को युद्धभूमि में पहुंचाता हुआ तेरा शरीर हमें धन प्राप्त ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-९३ देवता—यम
कराए तथा तुझे सुख पहुंचाता हुआ दौड़े. तू खाली स्थान में फैले गांव, जनपद आदि को धारण करने के लिए सीधा चलता हुआ इस प्रकार अपने स्थान को जा, जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश अपने स्थान पर पहुंचता है. (३) सूक्त-९३ देवता—यम यमो मृत्युरघमारो निर्ऋथो बभ्रुः शर्वो ऽ स्ता नीलशिखण्डः. देवजनाः सेनयोत्तस्थिवांसस्ते अस्माकं परि वृञ्जन्तु वीरान्.. (१) पापियों की हिंसा के लिए यम, मृत्यु, अघमार, निर्ऋति, बभ्रु, शर्व एवं नीलशिखंड आदि देवगण, अपने परिवार जनों के साथ अपनेअपने स्थान से चल दिए हैं. वे हमारे पुत्र, पौत्र आदि को छोड़ दें. (१) मनसा होमैर्हरसा घृतेन शर्वायास्त्र उत राज्ञे भवाय. नमस्येभ्यो नम एभ्यः कृणोम्यन्यत्रास्मदघविषा नयन्तु.. (२) शर्व के लिए, क्षेत्र के लिए एवं उन सब के स्वामी महादेव के लिए मैं मन से, तेज से, घृत और आज्यों से नमस्कार करता हूं. ये सभी नमस्कार के योग्य हैं. प्रसन्न हो कर ये पाप रूपी विष से पूर्ण कृत्याओं को हम से दूर ले जाएं. (२) त्रायध्वं नो अघविषाभ्यो वधाद् विश्वे देवा मरुतो विश्ववेदसः. अग्नीषोमा वरुणः पूतदक्षा वातापर्जन्ययोः सुमतौ स्याम.. (३) हे सब कुछ जानने वाले मरुदगण एवं विश्वे देव! तुम कृत्याओं की मारक शक्ति से हमारी रक्षा करो. हम अग्नि, सोम, वरुण, शुद्ध बलशाली मित्र, वायु एवं पर्जन्य के कृपा पात्र रहें. (३) सूक्त-९४ देवता—सरस्वती सं वो मनांसि सं व्रता समाकूतीर्नमामसि. अमी ये विव्रता स्थन तान् वः सं नमयामसि.. (१) हे उदास मन वाले लोगो! मैं तुम्हारे परस्पर विरुद्ध हृदयों को एक विषय पर सहमत करता हूं. मैं तुम्हारे कर्मों एवं संकल्पों को भी एक रूप बनाता हूं. पहले तुम सब परस्पर विरुद्ध कर्म करने वाले थे. मैं तुम सब को समान मन वाला बनाता हूं. (१) अहं गृभ्णामि मनसा मनांसि मम चित्तमनु चित्तेभिरेत. मम वशेषु हृदयानि वः कृणोमि मम यातमनुवर्त्मान एत.. (२) हे परस्पर विरोधी मन वाले लोगो! मैं तुम्हारे हृदयों को अपने हृदय के अधीन बनाता हूं. ebook converter DEMO Watermarks*
तुम सब भी अपने हृदयों को मेरे हृदय का अनुगमन करने वाला बनाओ. तुम्हारे हृदय मेरे वश में हों एवं तुम सब मेरा अनुगमन करो. (२) ओते मे द्यावापृथिवी ओता देवी सरस्वती. ओतौ म इन्द्रश्चाग्निश्चर्ध्यास्मेदं सरस्वति.. (३) धरती और आकाश सदा मेरे सम्मुख और परस्पर संबद्ध रहें. देवी सरस्वती भी मेरे अभिमुख और अनुकूल रहे. इंद्र और अग्नि मेरे अनुकूल रहें. हे सरस्वती देवी! इस समय हम समृद्ध हों. (३) सूक्त-९५ देवता—वनस्पति अश्वत्थो देवसदनस्तृतीयस्यामितो दिवि. तत्रामृतस्य चक्षणं देवाः कुष्ठमवन्वत.. (१) तीसरे आकाश में देवों का स्थान पीपल है. वहां देवों ने अमृत के गुण वाले वनस्पति कूठ को जाना. (१) हिरण्ययी नौरचरद्धिरण्यरबन्धना दिवि. तत्रामृतस्य पुष्पं देवाः कुष्ठमवन्वत.. (२) देवों ने सोने के बंधनों वाली स्वर्ग की नाभि के द्वारा कूठ वनस्पति को प्राप्त किया, जो अमृत का पुरुष है. (२) गर्भो अस्योषधीनां गर्भो हिमवतामृत. गर्भो विश्वस्य भूतस्येमं मे अगदं कृधि.. (३) हे अग्नि! तुम वर्षा से उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों के भीतर स्थित हो तथा शीतल स्पर्श वाली वनस्पतियों में भी स्थित हो. तुम संसार के सभी प्राणियों में स्थित हो. तुम मेरे इस मनुष्य को रोग रहित बनाओ. (३) सूक्त-९६ देवता—वनस्पति, सोम या ओषधयः सोमराज्ञीर्बह्वीः शतविचक्षणाः. बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१) जिन वृक्षों और वनस्पतियों के राजा सोम हैं तथा जो रस, वीर्य आदि के विपाक के कारण सैकड़ों प्रकार की दिखाई देती हैं, बृहस्पति देव के द्वारा उन रोगों की ओषधि के रूप में नियत वे वनस्पतियां हमें पाप से बचाएं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
मुञ्चन्तु मा शपथ्या ३ दथो वरुण्या दुत. अथो यमस्य पड्वीशाद् विश्वस्माद् देवकिल्बिषात्.. (२) जल अथवा ओषधियां मुझे ब्राह्मणों के क्रोध से उत्पन्न पाप से बचाएं तथा वरुण देव द्वारा निश्चित असत्य भाषण आदि पाप से भी बचाएं. वे हमें यम के उस फंदे से बचाएं जो पैरों को बांधता है. वे मुझे सभी देवों से संबंधित पापों से बचाएं. (२) यच्चक्षुषा मनसा यच्च वाचोपारिम जाग्रतो यत् स्वपन्तः. सोमस्तानि स्वधया नः पुनातु.. (३) हमने आंखों के द्वारा, मन के द्वारा, वाणी के द्वारा जागते हुए अथवा सोते हुए जो पाप किए हैं. पितृलोक के स्वामी सोमदेव पितरों को लक्ष्य कर के किए गए पितृ कर्म के द्वारा हमें पवित्र करें. (३) सूक्त-९७ देवता—मित्र, वरुण अभिभूर्यज्ञो अभिभूरग्निरभिभूः सोमो अभिभूरिन्द्रः. अभ्य १ हं विश्वाः पृतना यथासान्येवा विधेमाग्निहोत्रा इदं हविः.. (१) विजय की कामना करने वाले हम लोगों के द्वारा किया हुआ यज्ञ शत्रुओं का पराभव करने वाला हो. यज्ञों को पूर्ण करने वाले अग्नि एवं यज्ञ के साधन सोम शत्रुओं को पराजित करें. इंद्र एवं सभी शत्रु सेनाओं को पराजित करने के इच्छुक हम शत्रु की सभी सेनाओं को जिस प्रकार पराजित करें, उसी के निमित्त संग्राम में विजय के इच्छुक हम हवि का हवन करते हैं. (१) स्वधा ऽ स्तु मित्रावरुणा विपश्चिता प्रजावत् क्षत्रं मधुनेह पिन्वतम्. बाधेथां दूरं निर्ऋतिं पराचैः. कृतं चिदेनः प्र मुमुक्तमस्मत्.. (२) हे मेधावी मित्र और वरुण! तुम्हारे लिए दिया गया वह हवि रूप अन्न तुम्हें तृप्ति दे. तुम इस राजा पर प्रजाओं से युक्त बल एवं मधुर रस सींचो. तुम पराजय करने वाली पाप देवी निर्ऋति को हम से विमुख कर के दूर देश में ले जाओ. तुम हमारे शत्रुओं के द्वारा किया हुआ पाप हम से दूर ले जाओ. (२) इमं वीरमनु हर्षध्वमुग्रमिन्द्रं सखायो अनु सं रभध्वम्. ग्रामजितं गोजितं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा.. (३) हे सैनिको! अधिक बलशाली एवं परम ऐश्वर्य युक्त इस वीर राजा की वीरता से प्रसन्न बनो एवं इस के लिए युद्ध हेतु तत्पर रहो. हे मरुतो! गांवों को एवं शत्रुओं की गायों को जीतने वाले तथा हाथ में वज्र धारण करने वाले इंद्र की वीरता से प्रसन्न बनो. इंद्र शत्रुओं को जीतने ebook converter DEMO Watermarks*
वाले, जयशील एवं अपने बल से शत्रुओं की हिंसा करने वाले हैं. (३) सूक्त-९८ देवता—इंद्र इन्द्रो जयाति न परा जयाता अधिराजो राजसु राजयातै. चर्कृत्य ईड्यो वन्द्यश्चोपसद्यो नमस्यो भवेह.. (१) इस संग्राम में इस राजा की सहायता के लिए आए हुए इंद्र विजयी हों. वह किसी से पराजित न हों. सभी राजाओं के स्वामी इंद्र इन राजाओं में सुशोभित हों. शत्रुओं को अत्यधिक काटने वाले ये स्तुत्य एवं वंदनीय हैं. हे सब के द्वारा सेवा करने योग्य इंद्र! तुम इस संग्राम में हमारे द्वारा पूजित बनो. (१) त्वमिन्द्राधिराजः श्रवस्युस्त्वं भूरभिभूतिर्जनानाम्. त्वं दैवीर्विश इमा वि राजायुष्मत् क्षत्रमजरं ते अस्तु.. (२) हे इंद्र! तुम राजाओं के राजा एवं यशस्वी हो. तुम अपने तेज से सभी प्राणियों को पराजित करते हो. ये देव संबंधिनी प्रजाएं तुम्हें शोभा देती है. हे राजन्! तुम्हारा बल चिरकाल तक जीवन से युक्त एवं वृद्धावस्था से विहीन हो. (२) प्राच्या दिशस्त्वमिन्द्रासि राजोतोदीच्या दिशो वृत्रहञ्छत्रुहोऽसि. यत्र यन्ति स्रोत्यास्तज्जितं ते दक्षिणतो वृषभ एषि हव्यः.. (३) हे इंद्र! तुम पूर्व दिशा के राजा हो. हे वृत्र राक्षस को मारने वाले इंद्र! तुम उत्तर दिशा के भी स्वामी तथा शत्रुओं के हंता हो. हमारी इच्छाएं पूर्ण करने वाले तुम हमारे द्वारा बुलाए जाने पर युद्ध के समय हमारे दक्षिण भाग में वर्तमान रहो. (३) पालनकर्ता इंद्र की भुजाएं हम अपने चारों ओर धारण करते हैं, वे सब ओर से हमारी रक्षा करें. हे सब के प्रेरक और राजा सोमदेव! मुझे संग्राम में कष्ट न होने वाला और शोभन विजयवाला बनाओ. (४) सूक्त-९९ देवता—इंद्र अभि त्वेन्द्र वरिमतः पुरा त्वांहूरणाद्धुवे. ह्वयाम्युग्रं चेत्तारं पुरुणामानमेकजम्.. (१) हे इंद्र! विस्तीर्ण शरीर के कारण मैं तुझे संग्रामों में बुला रहा हूं. मैं संग्राम में पराजय से बचने के लिए तुम्हारा आह्वान पहले ही करता हूं. हे इंद्र! तुम अत्यधिक शक्तिशाली, जय के उपाय जानने वाले, अनेक शत्रुओं को जीतने वाले एवं अकेले ही युद्ध जीतने वाले हो. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
यो अद्य सेन्यो वधो जिघांसन् न उदीरते. इन्द्रस्य तत्र बाहू समन्तं परि दद्म:... (२) इस समय शत्रुओं की सेनाओं के आयुध हमें मारने के लिए उठ रहे हैं. इस वध से हमारी रक्षा के लिए इंद्र की भुजाएं सर्वत्र सहायता करें. हे राजन्! हे सविता! हे सोम! विनाश से बचने के लिए मुझे संग्राम में उत्तम विजय प्रदान करो. (२) परि दद्म इन्द्रस्य बाहू समन्तं त्रातुस्त्रायतां नः. देव सवितः सोम राजन्सुमनसं मा कृणु स्वस्तये.. (३) पालनकर्ता इंद्र की भुजाएं हम अपने चारों ओर धारण करते हैं, वे सब ओर से हमारी रक्षा करें. हे सबके प्रेरक और राजा सोम देव! मुझे संग्राम ने नष्ट न होने वाला और शोभन विजय वाला बनाओ. (३) सूक्त-१०० देवता—वनस्पति देवा अदुः सूर्यो अदाद् द्यौरदात् पृथिव्यदात्. तिस्रः सरस्वतीरदुः सचित्ता विषदूषणम्.. (१) इंद्र आदि सभी देवों ने एकमत हो कर मुझे स्थावर और जंगम विष को दूर करने वाली ओषधि प्रदान की है. सूर्य, आकाश एवं पृथ्वी ने मुझे विष नाशक ओषधि दी है. इड़ा, सरस्वती और भारती—इन तीन देवियों ने एकमत हो कर मुझे विष नाशक ओषधि प्रदान की है. (१) यद् वो देवा उपजीका आसिञ्चन् धन्वन्युदकम्. तेन देवप्रसूतेनेदं दूषयता विषम्.. (२) हे देवो! तुम से संबंधित और वल्मीक का निर्माण करने वाले उपजीक नामक प्राणियों ने जलहीन स्थान में तुम्हारा वरदान पा कर जो जल बरसाया, देवों द्वारा दिए हुए उस जल से, इस विष का प्रभाव नष्ट करो. (२) असुराणां दुहितासि सा देवानामासि स्वसा. दिवस्पृथिव्याः संभूता सा चकर्थारसं विषम्.. (३) हे वल्मीक की मिट्टी! तुम देव विरोधी असुरों की पुत्री और देवों की बहन हो. आकाश और धरती से उत्पन्न वल्मीक की यह मिट्टी स्थावर और जंगम प्राणियों से उत्पन्न विष को प्रभावहीन करे. (३) सूक्त-१०१ देवता—बृहस्पति ebook converter DEMO Watermarks*
आ वृषायस्व श्वसिहि वर्धस्व प्रथयस्व च. यथाङ्गं वर्धतां शेपस्तेन योषितमिज्जहि.. (१) हे पुरुष! तू सांड़ के समान गर्भाधान समर्थ हो एवं जीवित रहे. तेरे अंगों का विकास हो और तेरा शरीर विस्तीर्ण हो. जैसे तेरी जननेंद्रिय बढ़े, वैसे ही तू संभोग की इच्छुक नारी के समीप जा. (१) येन कृशं वाजयन्ति येन हिन्वन्त्यातुरम्. तेनास्य ब्रह्मणस्पते धनुरिवा तानया पस:.. (२) जिस रस के द्वारा वीर्यरहित पुरुष को प्रजनन समर्थ बनाया जाता है, जिस रस के द्वारा रोगी पुरुष को प्रसन्न किया जाता है, हे मंत्रसमूह के पालक देव! उसी रस विशेष से इस पुरुष की इंद्रिय को धनुष के समान विस्तृत करो. (२) आहं तनोमि ते पसो अधि ज्यामिव धन्विनि. क्रमस्वर्श इव रोहितमनवग्लायता सदा.. (३) हे वीर्य के इच्छुक! हम तेरी पुरुषेंद्रिय को धनुष की डोरी के समान विस्तृत करते हैं. तू गर्भाधान में समर्थ बैल के समान प्रसन्न मन से अपनी पत्नी पर आक्रमण कर. (३) सूक्त-१०२ देवता—अश्विनीकुमार यथायं वाहो अश्विना समैति सं च वर्तते. एवा मामभि ते मनः समैतु सं च वर्तताम्.. (१) हे अश्विनीकुमारो! भलीभांति सिखाया हुआ घोड़ा जिस प्रकार सवार की इच्छा के अनुसार चलता है और उस के अधीन रहता है. हे कामिनी! उसी प्रकार तेरा मन मुझ कामुक को लक्ष्य कर के आए और मेरे अधीन रहे. (१) आहं खिदामि ते मनो राजाश्वः पृष्ट्यामिव. रेष्मच्छिन्नं यथा तृणं मयि ते वेष्टतां मनः.. (२) हे कामिनी! मैं तेरे मन को इस प्रयोग के द्वारा उसी प्रकार अपने अनुकूल बनाता हूं, जिस प्रकार श्रेष्ठ अश्व लगाम को चबाता है. हे कामिनी! वायु के द्वारा छिन्नभिन्न तिनका जिस प्रकार घूमता है, उसी प्रकार तेरा मन मेरे अधीन हो कर भ्रमण करे. (२) आज्जनस्य मदुघस्य कुष्ठस्य नलदस्य च. तुरो भगस्य हस्ताभ्यामनुरोधनमुद्धरे.. (३) हे नारी! मैं सौभाग्यकारी देव के शीघ्रता करते हुए हाथों के द्वारा त्रिककुद पर्वत पर ebook converter DEMO Watermarks*
उत्पन्न नीलांजन, मधूक वृक्ष की लकड़ी, कूठ नामक वनस्पति और खस को पीस कर बनाए गए उबटन से तेरे शरीर पर लेप करता हूं. (३) सूक्त-१०३ देवता—बृह्मणस्पति संदानं वो बृहस्पतिः संदानं सविता करत्. संदानं मित्रो अर्यमा संदानं भगो अश्विना.. (१) हे शत्रु सेनाओ! बृहस्पति देव इन फेंके हुए पाशों के द्वारा तुम्हारा बंधन करें. सब के प्रेरक सविता देव तुम्हारा बंधन करें. मित्र तथा अर्यमा देव तुम्हारा बंधन करें. भग और अश्विनीकुमार तुम्हारा बंधन करें. (१) सं परमान्त्समवमानथो सं द्यामि मध्यमान्. इन्द्रस्तान् पर्यहार्दाम्ना तानग्ने सं द्या त्वम्.. (२) मैं शत्रु की दूर देश वर्तिनी तथा समीप वर्तिनी सेनाओं को पाशों के द्वारा बांधता हूं. मैं समीप और दूर के मध्य स्थान में वर्तमान सेनाओं को भी पाशों से बांधता हूं. इस प्रकार की सेनाओं एवं सेनापतियों को संग्राम के स्वामी इंद्र त्याग दें. हे अग्नि! इंद्र द्वारा त्यागे हुए इन क्षत्रियों को तुम पाशों से बांधो. (२) अमी ये युधमायन्ति केतून् कृत्वानीकशः. इन्द्रस्तान् पर्यहार्दाम्ना तानग्ने सं द्या त्वम्.. (३) हमारे प्रति प्रसन्न बने हुए इंद्र देव और अग्नि देव हमारे उन शत्रुओं को बंधन में बांधें. (३) सूक्त-१०४ देवता—इंद्र आदानेन संदानेनामित्रान्ा द्यामसि. अपाना ये चैषां प्राणा असुनासून्त्समच्छिदन्.. (१) आदान नाम के पाश यंत्र विशेष के द्वारा तथा संधान नाम के पाश यंत्र के द्वारा हम शत्रुओं को बांधते हैं. इन शत्रुओं की प्राण एवं अपान वायु को मैं अपने प्राण के द्वारा भलीभांति छिन्न करता हूं. (१) इदमादानमकरं तपसेन्द्रेण संशितम्. अमित्रा ये ऽ त्र नः सन्ति तानग्न आ द्या त्वम्.. (२) मैं ने तप के द्वारा बांधने का साधन यह पाश यंत्र निर्मित किया है. इसे इंद्र ने पहले ही तेज कर दिया है. इस संग्राम में हमारे जो शत्रु हैं, हे अग्नि! उन सब को पाश बंधन से बांधो. ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-१०५ देवता—कास
(२) ऐनान् द्यतामिन्द्राग्नी सोमो राजा च मेदिनौ. इन्द्रो मरुत्वानादानममित्रेभ्यः कृणोतु नः.. (३) हमारे द्वारा दिए गए हवि से प्रसन्न होने वाले इंद्र और अग्नि हमारे इन शत्रुओं को बांधें तथा राजा सोम इन्हें बांधें. मरुद्गणों के सहित इंद्र हमारे शत्रुओं का पाश बंधन करें. (३) सूक्त-१०५ देवता—कास यथा मनो मनस्केतैः परापतत्याशुमत्. एवा त्वं कासे प्र पत मनसोऽनु प्रवाव्यम्.. (१) जिस प्रकार मन के द्वारा जाने जाते हुए दूरस्थ विषयों के साथ पुरुष शीघ्रता से ध्रुव मंडल तक जाता है, उसी प्रकार हे खांसी और कफ रोग वाली कृत्व! तू मन के वेग से पुरुष के शरीर से निकल कर दूर देश में चली जा. (१) यथा बाणः सुसंशितः परापतत्याशुमत्. एवा त्वं कासे प्र पत पृथिव्या अनु संवतम्.. (२) जिस प्रकार अच्छी तरह तेज किया हुआ बाण धनुष से छूट कर शीघ्र ही भूमि को छेदता हुआ गिरता है. हे खांसी! तू उसी प्रकार बाण से बिंधी हुई पृथ्वी को लक्ष्य कर के इस पुरुष से दूर चली जा. (२) यथा सूर्यस्य रश्मयः परापतन्त्याशुमत्. एवा त्वं कासे प्र पत समुद्रस्यानु विक्षरम्.. (३) जिस प्रकार सूर्य की किरणें लोक परलोक तक शीघ्र जाती हैं. हे खांसी! तू उस देश को लक्ष्य कर के चली जा, जिस देश में सागर के जल के विविध प्रवाह हैं. (३) सूक्त-१०६ देवता—दूर्वा आयने ते परायणे दूर्वा रोहतु पुष्पिणीः. उत्सो वा तत्र जायतां हृदो वा पुण्डरीकवान्.. (१) हे अग्नि! तुम्हारे अभिमुख जाने में अथवा पराङ्मुख जाने में हमारे देश में पुष्प युक्त कोमल दूर्वा उत्पन्न हो. हमारे घर और खेत में पानी के सोते उत्पन्न हों तथा कमलों वाला सरोवर निर्मित हो. (१) अपामिदं नयनं समुद्रस्य निवेशनम्. ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-१०७ देवता—विश्वजित्
मध्ये ह्रदस्य नो गृहाः पराचीना मुखा कृधि.. (२) हमारा वह घर जल का स्थान एवं सागर का निवेश बने. हमारे घर गहरे तालाबों के मध्य में हों. हे अग्नि! तुम अपने ज्वाला रूपी मुख हमारी ओर से फेर लो. (२) हिमस्य त्वा जरायुणा शाले परि व्ययामसि. शीतह्रदा हि नो भुवो ऽ निष्कृणोतु भेषजम्.. (३) हे शाला! हम तुझे हिमालय के शीतल जल से इस प्रकार घेरते हैं, जिस प्रकार जरायु गर्भ को तथा शैवाल जल को घेरता है. हे शाला! तू हमारे लिए शीतल जल वाली बन जा. हमारी प्रार्थना सुन कर अग्नि हमारे घरों को जलने से बचाने वाली ओषधि बनें. (३) सूक्त-१०७ देवता—विश्वजित् विश्वजित् त्रायमाणायै मा परि देहि. त्रायमाणे द्विपाच्च सर्वं नो रक्ष चतुष्पाद यच्च नः स्वम्.. (१) हे विश्वजित् देव! जगत् का पालन करने वाली देवी के लिए रक्षा के हेतु मुझ स्वस्त्ययन इच्छुक को दो. हे त्रायमाणा नामक देवी! हमारे दो पैरों वाले सभी पुत्र, पौत्र आदि की रक्षा करो तथा मेरे सभी चौपायों की भी रक्षा करो. (१) त्रायमाणे विश्वजिते मा परि देहि. विश्वजिद् द्विपाच्च सर्वं नो रक्ष चतुष्पाद यच्च नः स्वम्.. (२) हे पालन करने वाली देवी त्रायमाणा! मुझे विश्वजित् नाम के देवता को दे दो. हे सब को जीतने वाले! हमारे दो पैरों वाले पुत्र, पौत्र आदि और सभी चौपायों की रक्षा करो. (२) विश्वजित् कल्याण्यै मा परि देहि. कल्याणि द्विपाच्च सर्वं नो रक्ष चतुष्पाद यच्च नः स्वम्.. (३) हे विश्वजित्! मुझे सर्वमंगलकारिणी देवी को दे दो. हे कल्याणी! हमारे सभी दो पैरों वाले पुत्र, पौत्र आदि और चौपायों की रक्षा करो. (३) कल्याणि सर्वविदे मा परि देहि. सर्वविद् द्विपाच्च सर्वं नो रक्ष चतुष्पाद यच्च नः स्वम्.. (४) हे कल्याणी! मुझे सब कुछ जानने वाले देव को दे दो. हे सर्वहित! हमारे सभी दो पैरों वाले पुत्र, पौत्र आदि और चौपायों की रक्षा करो. (४) सूक्त-१०८ देवता—मेधा, अग्नि ebook converter DEMO Watermarks*
त्वं नो मेधे प्रथमा गोभिरश्वेभिरा गहि. त्वं सूर्यस्य रश्मिभिस्त्वं नो असि यज्ञिया.. (१) हे देव और मनुष्य आदि के द्वारा उपासना की जाती हुई मेधा देवी! तुम हमें देने के लिए गाय और अश्वों के साथ आओ. तुम सूर्य की किरणों के समान अपनी व्याप्ति की सामर्थ्य के साथ हमारे समीप आओ. तुम हमारे लिए यज्ञ के योग्य हो. (१) मेधामहं प्रथमां ब्रह्मणवतीं ब्रह्मजूतामृषिष्टुताम्. प्रपीतां ब्रह्मचारिभिर्देवानामवसे हुवे.. (२) मैं वेदों से युक्त एवं देव, मनुष्य आदि के द्वारा पूजी जाती हुई मेधा देवी का आह्वान करता हूं. ब्राह्मणों के द्वारा सेवित, ऋषियों के द्वारा स्तुति की गई और ब्रह्मचारियों द्वारा सेवित मेधा देवी को मैं इंद्र आदि की रक्षा पाने के लिए बुलाता हूं. (२) यां मेधामृभवो विदुर्यां मेधामसुरा विदुः. ऋषयो भद्रां मेधां यां विदुस्तां मय्या वेशयामसि.. (३) ऋभु नाम के देव जिस मेधा को जानते थे, जिस मेधा को राक्षस जानते थे तथा वसिष्ठ आदि ऋषि वेद शास्त्र विषयक जिस मेधा को जानते थे, उसे हम अपने में स्थापित करते हैं. (३) यामृषयो भूतकृतो मेधां मेधाविनो विदुः. तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कृणु.. (४) जिस मेधा को पृथ्वी आदि तत्त्वों का निर्माण करने में समर्थ, मंत्र द्रष्टा एवं प्रसिद्ध ऋषि जानते हैं. हे अग्नि! उसी मेधा के द्वारा तुम मुझे मेधावी बनाओ. (४) मेधां सायं मेधां प्रातर्मेधां मध्यन्दिनं परि. मेधां सूर्यस्य रश्मिभिर्वचसा वेशयामहे.. (५) मैं प्रातःकाल, सायंकाल और मध्याह्न काल में मेधा देवी की स्तुति करता हूं. मैं सूर्य की किरणों के साथ दिन में स्तुति वचनों के द्वारा उस महानुभावा मेधा को अपने में स्थापित करता हूं. (५) सूक्त-१०९ देवता—पिप्पली पिप्पली क्षिप्तभेषज्यु ३ तातिविद्धभेषजी. तां देवाः समकल्पयन्नियं जीवितवा अलम्.. (१) पिप्पली अर्थात् पीपल ने सभी ओषधियों का तिरस्कार कर दिया है तथा सभी रोगों को ebook converter DEMO Watermarks*