अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
जो सर्प यहां से समीप रहते हैं और जो दूर रहते हैं, वे विषहीन हो जाएं. मैं बिच्छू को हथौड़ा से मारता हूं और सांप को डंडे से मारता हूं. (९) अघाश्वस्येदं भेषजमुभयोः स्वजस्य च. इन्द्रो मे ऽ हिमघायन्तमहिं पैद्वो अरन्धयत्.. (१०) मेरे पास जो जड़ीबूटियां हैं, वे अघाश्व और स्वज दोनों प्रकार के सर्पों का विष दूर करने वाली हैं. हिंसा रूपी पाप करने वाले सांप को रोकने के हेतु इंद्र ने पैद्व को मेरे वश में किया है. (१०) पैद्वस्य मन्महे वयं स्थिरस्य स्थिरधाम्नः. इमे पश्चा पृदाकवः प्रदीध्यत आसते.. (११) स्थिर एवं स्थायी तेज वाले पैद्व को हम मानते हैं. ये पश्च और पृदाकू नामक सर्पों को शोकमग्न करते हैं. (११) नष्टासवो नष्टविषा हता इन्द्रेण वज्रिणा. जघानेन्द्रो जघ्निमा वयम्.. (१२) वज्रधारी इंद्र ने उन सर्पों के प्राण एवं विष को समाप्त कर दिया था, जिन्हें इंद्र ने मारा था. हम उन का विनाश करते हैं. (१२) हतास्तिरश्चिराजयो निपिष्टासः पृदाकवः. दर्विं करिक्रतं श्वित्रं दर्भेष्वसितं जहि.. (१३) तिरश्चिराजी सांप मार दिए गए हैं और पृदाकू नामक सांप पीस डाले गए हैं. हे दर्वी! तू दर्भों पर पड़े हुए सफेद और काले करिकृत सांपों का विनाश कर दे. (१३) कैरातिका कुमारिका सका खनति भेषजम्. हिरण्ययीभिरभ्रिभिर्गिरीणामुप सानुषु.. (१४) किरात जाति की कुमारी कुदाल से सर्पों की ओषधि खोजती है. वह पर्वतों की चोटियों पर सोने के फावड़ों से ओषधि खोदती है. (१४) आयमगन् युवा भिषक् पृश्निहापराजितः. स वै स्वजस्य जम्भन उभयोर्वृश्चिकस्य च.. (१५) कभी पराजित न होने वाला युवा वैद्य मंत्र शक्ति से संपन्न है. यह स्वज नामक सर्प और बिच्छू का विनाश कर सकता है. (१५) इन्द्रो मे ऽ हिमरन्धयन्मित्रश्च वरुणश्च. वातापर्जन्यो ३ भा.. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र, मित्र, वरुण, वायु और पर्जन्य अर्थात् बादल ने सर्प को मेरे वश में कर दिया है. (१६) इन्द्रो मे ऽ हिमरन्धयत् पृदाकुं च पृदाक्वम्. स्वजं तिरश्चिराजिं कसर्णीलं दशोनसिम्.. (१७) इंद्र ने मेरे कल्याण के हेतु पृदाकू, पृदाक्व, स्वज तिरश्चिराजी, कसर्णील एवं दशोनसि नामक सर्पों को मेरे वश में कर दिया है. (१७) इन्द्रो जघान प्रथमं जनितारमहे तव. तेषामु तृह्यमाणानां कः स्वित् तेषामसद् रसः.. (१८) हे सर्प! इंद्र ने सब से पहले तेरे जन्म देने वालों को मारा था. उन सर्पों के विनाश के समय किस सर्प में विष शेष रहा? (१८) सं हि शीर्षाण्यग्रभं पौञ्जिष्ठ इव कर्वराम्. सिन्धोर्मध्यं परेत्य व्यनिजमहेर्विषम्.. (१९) केवट जिस प्रकार पतवार को ग्रहण करता है, उसी प्रकार मैं ने सर्प शीश पकड़ लिए हैं. मैं ने सिंधु के मध्य भाग से लौट कर सर्प के विष को प्रभावहीन बना दिया है. (१९) अहीनां सर्वेषां विषं परा वहन्तु सिन्धवः. हतास्तिरश्चिराजयो निपिष्टासः पृदाकवः.. (२०) सभी नदियां सर्पों के विष को अपने जल के साथ बहा ले जाएं. तिरश्चिराजी नामक सर्प नष्ट हो गए और पृदाकू नामक सर्प पीस डाले गए. (२०) ओषधीनामहं वृण उर्वरीरिव साधुया. नयाम्यर्वतीरिवाहे निरैतु ते विषम्.. (२१) मैं अपनी उत्तम बुद्धि के द्वारा उपजाऊ भूमि पर उगी हुई जड़ीबूटियों को स्वीकार कर के उन्हें इस प्रकार प्रेरित करता हूं, जिस प्रकार वेग वाली नदियां बहती हैं. हे सर्प! उन जड़ीबूटियों से विष समाप्त हो जाए. (२१) यदग्नौ सूर्ये विषं पृथिव्यामोषधीषु यत्. कान्दाविषं कनन्ककं निरैत्वैतु ते विषम्.. (२२) अग्नि में, सूर्य में, पृथ्वी में तथा जड़ीबूटियों में जो विष है, वह तथा कंदों का विष पूर्णतया नष्ट हो जाए. (२२) ये अग्निजा ओषधिजा अहीनां ये अप्सुजा विद्युत आबभूवूः. ebook converter DEMO Watermarks*
येषां जातानि बहुधा महान्ति तेभ्यः सर्पेभ्यो नमसा विधेम.. (२३) अग्नि, जड़ीबूटियों, जल एवं सर्पों में जो विष है तथा जिन के द्वारा भयानक कर्म हुए हैं, हम उन सभी सर्पों को हव्य द्वारा तृप्त करते हैं. (२३) तौदी नामासि कन्या घृताची नाम वा असि. अधस्पदेन ते पदमा ददे विषदूषणम्.. (२४) हे जड़ीबूटी! तू तौदी और घृताची नाम वाली हो. नीचे की ओर किए गए अपने पैर के द्वारा मैं विष समाप्त करता हूं और सभी को वश में करता हूं. (२४) अङ्गादङ्गात् प्र च्यावय हृदयं परि वर्जय. अधा विषस्य यत् तेजो ऽ वाचीनं तदेतु ते.. (२५) हे रोगी! तू अपने प्रत्येक अंग से विष को टपकाता हुआ अपने हृदय की रक्षा कर. विष का जो तेज है, वह अधोगति को प्राप्त हो कर नष्ट हो जाए. (२५) आरे अभूद् विषमरीद् विषे विषमप्रागपि. अग्निर्विषमहेर्निंरधात् सोमो निरणयीत्. दंष्टारमन्वगाद् विषमहिरमृत्.. (२६) नवीन विष भी प्राचीन विष में मिल कर रुक गया है. इस प्रकार विष नष्ट हो चुका है. अग्नि ने सांप के विष को नष्ट कर दिया है. सोम सर्प के विष को दूर ले गया है. काटने वाले सांप को ही उस का विष प्राप्त हुआ, जिस से उस की मृत्यु हो गई. (२६) सूक्त-५ देवता—जल इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं स्थ. जिष्णवे योगाय ब्रह्मयोगैर्वो युनज्मि.. (१) हे जलो! तुम इंद्र के ओज, बल एवं वीर्य हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति हो तथा तुम ही इंद्र के ऐश्वर्य हो. मैं तुम्हें ब्रह्म योगों से युक्त कर के विजय दिलाने वाले योग की क्षमता वाला बनाता हूं. (१) इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं स्थ. जिष्णवे योगाय क्षत्रयोगैर्वो युनज्मि.. (२) हे जलो! तुम इंद्र के ओज, बल एवं वीर्य हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति हो ebook converter DEMO Watermarks*
तथा तुम ही इंद्र के ऐश्वर्य हो. मैं तुम्हें क्षत्रिय संबंधी योगों से युक्त कर के विजय दिलाने वाले योग की क्षमता वाला बनाता हूं. (२) इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं स्थ. जिष्णवे योगायेन्द्रयोगैर्वो युनज्मि.. (३) हे जलो! तुम इंद्र के ओज, बल एवं वीर्य हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति एवं तुम ही इंद्र के ऐश्वर्य हो. मैं तुम्हें इंद्र संबंधी योगों से युक्त कर के विजय दिलाने वाले योग की क्षमता वाला बनाता हूं. (३) इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं स्थ. जिष्णवे योगाय सोमयोगैर्वो युनज्मि.. (४) हे जलो! तुम इंद्र के ओज, वीर्य एवं बल हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति एवं ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हो. मैं तुम्हें जल संबंधी योग से युक्त करता हूं, जिस से मैं विजय प्राप्त कर सकूं. (४) इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं स्थ. जिष्णवे योगायाप्सुयोगैर्वो युनज्मि.. (५) हे जलो! तुम इंद्र के ओज, बल एवं वीर्य हो. तुम ही इंद्र को नवीन बनाने वाली शक्ति हो एवं तुम ही इंद्र के ऐश्वर्य हो. मैं विजय प्राप्त करने वाले योग के हेतु तुम्हें अपने समीप रखना चाहता हूं. समस्त प्राणी मेरे समीप रहें. (५) इन्द्रस्यौज स्थेन्द्रस्य सह स्थेन्द्रस्य बलं स्थेन्द्रस्य वीर्यं १ स्थेन्द्रस्य नृम्णं स्थ. जिष्णवे योगाय विश्वानि मा भूतान्युप तिष्ठन्तु युक्ता म आप स्थ.. (६) हे जलो! तुम अग्नि के भाग हो. जलों से मुक्त भाग को एवं दिव्य तेज को हम में धारण करो. अग्नि का भाग इस लोक के प्रजापति के तेज से युक्त हो. (६) अग्नेर्भाग स्थ. अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त. प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽ स्मै लोकाय सादये.. (७) हे जलो! तुम इंद्र के भाग को, जलों के वीर्य एवं दिव्य तेज को हम में स्थित करो. लोक का कल्याण करने के लिए प्रजापति का तेज हम में धारण करो. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
इन्द्रस्य भाग स्थ. अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त. प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (८) हे दिव्य प्रवाह वाले जलो! तुम इंद्र के अंश हो. तेज जल का वीर्य है. तुम हम में तेज स्थापित करो. तुम प्रजापति के निवास स्थान से पधारे हो. हम तुम्हें इस लोक में निश्चित स्थान प्रदान करते हैं. (८) सोमस्य भाग स्थ. अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त. प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (९) हे जलो! तुम सोम के भाग हो, तुम जलों का वीर्य एवं दिव्य तेज हम में धारण करो. लोक के कल्याण के लिए प्रजापति का तेज हम में स्थित हो. (९) वरुणस्य भाग स्थ. अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त. प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (१०) हे जलो! तुम वरुण के भाग हो. तुम जलों का वीर्य एवं दिव्य तेज हम में धारण करो. तुम लोक के कल्याण के लिए प्रजापति का तेज हम में स्थित हो. (१०) मित्रावरुणयोर्भाग स्थ. अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त. प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (११) हे जलो! तुम मित्र और वरुण के भाग हो. तुम जलों का वीर्य और दिव्य तेज हमें में धारण करो. तुम लोक के कल्याण के लिए प्रजापति का तेज हम में स्थित करो. (११) यमस्य भाग स्थ. अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त. प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (१२) हे जलो! तुम यम के भाग हो. तुम जलों का वीर्य और दिव्य तेज हम में धारण करो. तुम लोक कल्याण के लिए प्रजापति का तेज हम में स्थित करो. (१२) पितॄणां भाग स्थ. अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त. प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*
हे जलो! तुम पितरों के भाग हो. तुम जलों का वीर्य और दिव्य तेज हम में धारण करो. लोक के कल्याण के लिए तुम हम में प्रजापति का तेज स्थित करो. (१३) देवस्य सवितुर्भाग स्थ. अपां शुक्रमापो देवीर्वर्चो अस्मासु धत्त. प्रजापतेर्वो धाम्ना ऽस्मै लोकाय सादये.. (१४) हे जलो! तुम सविता देव के भाग हो. तुम जलों का वीर्य एवं दिव्य तेज हम में धारण करो. लोक कल्याण के निमित्त तुम हम में प्रजापति का तेज स्थित करो. (१४) यो व आपो ऽ पां भागो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजन:. इदं तमति सृजामि तं माध्यवनिक्षे. तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्म:. तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (१५) हे जलो! तुम्हारा जो जलीय भाग यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य एवं देवों से संयुक्त है, उसे मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. वह जलीय भाग मुझे पुष्ट करे. मैं इस मंत्र से होने वाले जादूटोने के द्वारा और जलरूप वस्त्र से आच्छादित कर के उन्हें नष्ट करता हूं. (१५) यो व आपो ऽ पामूर्मिरप्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजन:. इदं तमति सृजामि तं माध्यवनिक्षे. तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्म:. तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (१६) हे जलो! तुम्हारी जो लहरें यजुर्वेद के मंत्रों से सेवा करने योग्य एवं देवों से संयुक्त हैं, मैं उन्हें अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. वे लहरें मुझे पुष्ट करें. मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल की लहरों रूपी शस्त्र से आच्छादित कर के उन्हें नष्ट करता हूं. (१६) यो व आपो ऽ पां वत्सो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजन:. इदं तमति सृजामि तं माध्यवनिक्षे. तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्म:. तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (१७) हे जलो! तुम में जो जलों का वत्स है, वह यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य है एवं देवों से संयुक्त है. मैं उसे अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जलों के वे वत्स मुझे पुष्ट करें. मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल के वत्स रूपी शस्त्र से आच्छादित कर के उन्हें नष्ट करता हूं. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*
यो व आपो ऽ पां वृषभो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजनः. इदं तमति सृजामि तं माभ्यवनिक्षे. तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (१८) हे जलो! तुम में जो वृषभ अर्थात् बैल है, वह यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य है एवं देवों से संयुक्त है. उसे मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जल का वृषभ मुझे पुष्ट करे. मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल के वृषभ रूपी शस्त्र से उन्हें नष्ट करता हूं. (१८) यो व आपो ऽ पां हिरण्यगर्भो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजनः. इदं तमति सृजामि तं माभ्यवनिक्षे. तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (१९) हे जलो! तुम्हारे मध्य जो हिरण्यगर्भ है, वह यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य है एवं देवों से संयुक्त है. उसे मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जल का हिरण्यगर्भ अंश मुझे पुष्ट करे. मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल के हिरण्यगर्भ रूपी शस्त्र से उन्हें नष्ट करता हूं. (१९) यो व आपो ऽ पामश्मा पृश्रिर्दिव्यो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्यो देवयजनः. इदं तमति सृजामि तं माभ्यवनिक्षे. तेन तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (२०) हे जलो! तुम में जो दिव्य पृश्रि अश्मा है, वह यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य है एवं देवों से संयुक्त है; उसे मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जल का दिव्य पृश्रि अश्मा अंश मुझे पुष्ट करे. मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल के दिव्य पृश्रि अश्मा रूपी शस्त्र से उन्हें नष्ट करता हूं. (२०) यो व आपो ऽ पामग्नयो ३ प्सव १ न्तर्यजुष्या देवयजनाः. इदं तानति सृजामि तान् माभ्यवनिक्षि. तैस्तमभ्यतिसृजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. तं वधेयं तं स्तृषीयानेन ब्रह्मणा ऽ नेन कर्मणा ऽ नया मेन्य.. (२१) हे जलो! तुम में जो अग्नियां हैं, वे यजुर्वेद के मंत्रों के द्वारा सेवा करने योग्य एवं देवों की संगति करने वाली हैं. उन्हें मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जलों की अग्नियां मुझे पुष्ट करें. इस मंत्र की शक्ति से होने वाले जादूटोने के द्वारा और जल रूपी अस्त्र के द्वारा मैं ebook converter DEMO Watermarks*
अपने शत्रुओं को नष्ट करता हूं. (२१) यदवाचीनं त्रैहायणादनृतं किं चोदिम. आपो मा तस्मात् सर्वस्माद् दुरितात् पान्त्वंहसः.. (२२) हम ने तीन वर्षों में जो झूठ बोला है, वह नवीन दुर्गति लाने वाला है. जल मुझे इस समस्त पाप से बचाएं. (२२) समुद्रं वः प्र हिणोमि स्वां योनिमपीतन. अरिष्टाः सर्वहायसो मा च नः किं चनाममत्.. (२३) हे जलो! मैं तुम्हें सागर की ओर जाने की प्रेरणा देता हूं. सागर तुम्हारा उत्पत्ति स्थान है. तुम उस में मिल जाओ. सभी ओर गति वाले तुम हिंसा समाप्त करने वाले हो. हमें कोई नष्ट न करे. (२३) अरिप्रा आपो अप रिप्रमस्मत्. प्रास्मदेनो दुरितं सुप्रतीकाः प्र दुष्वप्न्यं प्र मलं वहन्तु.. (२४) हे शत्रुओं का विनाश करने वाले जलो! हमारे शत्रुओं का विनाश करो. तुम हमारे पाप का विनाश करो एवं बुरे स्वप्न रूपी मैल को हम से दूर कर दो. (२४) विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहा पृथिवीसंशितो ऽ ग्नितेजाः. पृथिवीमनु वि क्रमे ऽ हं पृथिव्यास्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२५) तू विश्व का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू पृथ्वी पर आश्रित एवं अग्नि का तेज है. मैं पृथ्वी पर विक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा पृथ्वी से उसे हटाता हूं. जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, वह जीवित न रहे. प्राण उसे त्याग दें. (२५) विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहा ऽ न्तरिक्षसंशितो वायुतेजाः. अन्तरिक्षमनु वि क्रमे ऽ हमन्तरिक्षात् तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२६) तू विश्व का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू अंतरिक्ष पर आश्रित एवं विश्व का तेज है. मैं अंतरिक्ष में पराक्रम दिखाता हूं एवं उसे अंतरिक्ष से दूर भगाता हूं. जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, वह जीवित न रहे. प्राण उस का त्याग कर दें. (२६) ebook converter DEMO Watermarks*
विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा द्यौसंशितः सूर्यतेजाः. दिवमनु वि क्रमे ऽ हं दिवस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२७) तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू द्युलोक में आश्रित एवं सूर्य का तेज है. मैं द्युलोक में पराक्रम प्रदर्शित करता और उसे द्युलोक से बाहर निकालता हूं. जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, वह जीवित न रहे. प्राण उसका त्याग कर दें. (२७) विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा दिक्संशितो मनस्तेजाः. दिशो ऽ नु वि क्रमे ऽ हं दिग्भ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२८) तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू दिशाओं में स्थित है एवं मन का तेज है. मैं दिशाओं में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा दिशाओं से उसे हटाता हूं. जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिससे द्वेष करते हैं, उसका विनाश हो. प्राण उसका त्याग कर दें. (२८) विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहाशासंशितो वाततेजाः. आशा अनु वि क्रमे ऽहमाशाभ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२९) तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू आकाश में स्थित है एवं वायु का तेज है. मैं आकाश में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं और आकाश से उसे हटाता हूं. जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं, उन का विनाश हो. प्राण उन का त्याग कर दें. (२९) विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नह ऋक्संशितः सामतेजाः. ऋचो ऽनु वि क्रमे ऽहमृग्भ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३०) तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रु का विनाश करने वाला है. तू ऋचाओं में स्थित है. सोम तेरा तेज है. मैं आकाश के मध्य ऋचाओं में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं और ऋचाओं से उसे हटाता हूं. जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग कर दें. (३०) ebook converter DEMO Watermarks*
विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहा यज्ञसंशितो ब्रह्मतेजाः. यज्ञमनु वि क्रमे ऽ हं यज्ञात् तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३१) तू विष्णु का तेज एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू यज्ञ में स्थित है एवं ब्रह्म का तेज है. मैं ब्रह्म में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा ब्रह्म से उसे हटाता हूं. हम जिस से द्वेष करते हैं अथवा जो हम से द्वेष करता है, उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग कर दें. (३१) विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहौषधीशितः सोमतेजाः. ओषधीरनु वि क्रमे ऽ हमोषधीभ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३२) तुम विष्णु के पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाले हो. तुम ओषधि में आश्रित हो एवं सोम के तेज हो. मैं ओषधियों में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा ओषधियों से उसे हटाता हूं. मैं जिस से द्वेष करता हूं अथवा जो हम से द्वेष करता है. उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग करें. (३२) विष्णो क्रमो ऽ सि सपत्नहाप्सुसंशितो वरुणतेजाः. अपो ऽ नु वि क्रमे ऽ हमद्भ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३३) तुम विष्णु के पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाले हो. तुम जलों में स्थित एवं वरुण का तेज हो. मैं जलों में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा जलों से उसे हटाता हूं. मैं जिस से द्वेष करता हूं अथवा जो मुझ से द्वेष करता है, उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग करें. (३३) विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहा कृषिसंशितो ऽ न्नतेजाः. कृषिमनु वि क्रमे ऽ ह कृष्यास्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३४) तुम विष्णु के पराक्रम एवं शत्रु विनाशकर्ता हो. तुम कृषि में स्थित एवं अन्न के तेज हो. मैं कृषि में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा कृषि से उसे हटाता हूं. हम जिस से द्वेष करते हैं अथवा जो हम से द्वेष करता है, उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग करें. (३४) विष्णोः क्रमो ऽ सि सपत्नहा प्राणसंशितः पुरुषतेजाः. प्राणमनु वि क्रमे ऽ हं प्राणात् तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. ebook converter DEMO Watermarks*
स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३५) तुम विष्णु के पराक्रम एवं शत्रुविनाशकर्ता हो. तुम प्राणों में स्थित हो एवं पुरुष तुम्हारा तेज है. हम प्राणों में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करते हैं और उसे प्राण से दूर करते हैं. जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग कर दें. (३५) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमभ्यष्ठां विश्वाः पृतना अरातीः. इदमहमामुष्यायणस्यामुष्याः पुत्रस्य वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराज्चं पादयामि.. (३६) जीते हुए पदार्थ हमारे हैं और लाए हुए सभी पदार्थ भी हमारे हैं. शत्रुओं की सभी सेनाएं और शत्रु पराजित हो गए हैं. अमुक गोत्र में उत्पन्न एवं अमुक माता का पुत्र यह मेरा शत्रु है. मैं इस के वर्च, तेज, प्राण एवं आयु को घेरता हूं तथा इस शत्रु को पराजित करता हूं. (३६) सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते दक्षिणामन्वावृतम्. सा मे द्रविणं यच्छतु सा मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (३७) जो मार्ग दक्षिण में फैला हुआ है और जिसे सूर्य ने आवृत किया हुआ है, मैं उस मार्ग का अनुगमन करता हूं. यह दक्षिण दिशा मुझे धन एवं ब्रह्म तेज प्रदान करे. (३७) दिशो ज्योतिष्मतीरभ्यावर्ते. ता मे द्रविणं यच्छन्तु ता मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (३८) मैं प्रकाश से पूर्व दिशाओं का अनुवर्तन करता हूं. वे दिशाएं मुझे धन प्रदान करें एवं ब्रह्म तेज दें. (३८) सप्तऋषीनभ्यावर्ते. ते मे द्रविणं यच्छन्तु ते मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (३९) मैं सप्त ऋषियों का अनुवर्तन करता हूं. वे मुझे धन प्रदान करें एवं ब्रह्म तेज दें. (३९) ब्रह्माभ्यावर्ते. तन्मे द्रविणं यच्छतु तन्मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (४०) मैं ब्रह्म का अनुवर्तन करता हूं. वह मुझे धन प्रदान करे और ब्रह्म तेज दे. (४०) ब्राह्मणाँ अभ्यावर्ते. ते मे द्रविणं यच्छन्तु ते मे ब्राह्मणवर्चसम्.. (४१) मैं ब्राह्मणों के अनुकूल आचरण करता हूं. वे ब्राह्मण मुझे धन एवं ब्रह्म तेज प्रदान करे. (४१) यं वयं मृगयामहे तं वधै स्तृणवामहै. ebook converter DEMO Watermarks*
व्यात्ते परमेष्ठिनो ब्रह्मणापीपदाम तम्.. (४२) हम जिसे खोज रहे हैं, उसे वध के साधन अर्थात् आयुधों के द्वारा नष्ट करें. हम मंत्र बल से उसे परमेष्ठी अर्थात् ब्रह्म की दाढ़ के नीचे डाल दें. (४२) वैश्वानरस्य दंष्ट्राभ्यां हेतिस्तं समधादभि. इयं तं प्सात्वाहूतिः समिद् देवी सहीयसी.. (४३) वैश्वानर अर्थात् अग्नि की जो दाढ़ आयुध के समान है, हम शत्रु को उस में धारण करते हैं अर्थात् रखते हैं. उस शत्रु का नाश कर के अग्नि में जो समिधा डाली जाती है, वह दिव्य समिधा शत्रु को दूर भगाने में समर्थ है. (४३) राज्ञो वरुणस्य बन्धो ऽ सि. सो ३ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमन्ने प्राणे बधान.. (४४) तू राजा वरुण के बंधन में पड़ा है. वे इस गोत्र वाले एवं अमुक माता के पुत्र को अन्न और प्राण के बंधन में बांधते हैं. (४४) यत् ते अन्नं भुवस्पत आक्षियति पृथिवीमनु. तस्य नस्त्वं भुवस्पते संप्रयच्छ प्रजापते.. (४५) हे पृथ्वी के स्वामी! तुम्हारा जो अन्न पृथ्वी पर बिखरा हुआ है, वह पृथ्वी के स्वामी प्रजापति हमें प्रदान करें. (४५) अपो दिव्या अचायिषं रसेन समपृक्ष्महि. पयस्वानग्न आगमं तं मा सं सृज वर्चसा.. (४६) हे दिव्य जलो! मैं तुम से याचना करता हूं. तुम मुझे अपने रस से संयुक्त करो. हे अग्नि देव! मैं अन्न ले कर आ रहा हूं. तुम मुझे तेज से युक्त बनाओ. (४६) सं मा ऽ ग्ने वर्चसा सृज सं प्रजया समायुषा. विद्युर्मे अस्य देवा इन्द्रो विद्यात् सह ऋषिभिः.. (४७) हे अग्नि देव! तुम मुझे तेज से युक्त करो एवं संतान प्रदान करो. समस्त देव मेरे इस भाव को जानें. ऋषियों के साथ-साथ इंद्र भी मेरे इस भाव को जानें. (४७) यदग्ने अद्य मिथुना शपातो यद्वाचस्तृष्टं जनयन्त रेभाः. मन्योर्मनसः शरव्या ३ जायते या तया विध्य हृदये यातुधानान्.. (४८) हे अग्नि देव! जो लोग एकत्र हो कर हमें गालियां दे रहे हैं तथा जो बोलने वाले दोष पूर्ण वाणी का उच्चारण कर रहे हैं, जो शत्रु अपने क्रोधपूर्ण हृदयों के कारण तुम्हारे बाणों के लक्ष्य ebook converter DEMO Watermarks*
बन रहे हैं, अपने ज्वाला रूप बाणों से उन के हृदयों को भेद दो. (४८) परा शृणीहि तपसा यातुधानान् परा ऽग्ने रक्षो हरसा शृणीहि. परा ऽर्चिषा मूरेदेवांछृणीहि परासु तृपः शोशुचतः शृणीहि.. (४९) हे अग्नि देव! अपनी ज्वालाओं से इन राक्षसों को दूर भगा दो एवं इन्हें नष्ट कर दो. तुम अपनी लपटों से मूर्खों को दूर भगा दो. जो दूसरों के प्राणों को नष्ट कर के संतुष्ट होते हैं, तुम उन का संहार करो. (४९) अपामस्मै वज्रं प्र हरामि चतुर्भृष्टिं शीर्षभिद्याय विद्वान्. सो अस्याङ्गानि प्र शृणातु सर्वा तन्मे देवा अनु जानन्तु विश्वे.. (५०) इन मंत्रों को जानने वाला मैं इस शत्रु का सिर तोड़ने के लिए उस वज्र का प्रहार करता हूं, जो जलों के चारों ओर विनाश करने वाला है. वह वज्र इस शत्रु के सभी अंगों को काट दे. मेरा यह कर्म समस्त देव अनुकूलता से जानें अर्थात् उचित समझें. (५०) सूक्त-६ देवता—वनस्पतिफला मणि अरातीयोर्भ्रातृव्यस्य दुर्हृदो द्विषतः शिरः. अपि वृश्चाम्योजसा.. (१) बंधुओं में जो मेरा शत्रु, दुष्ट हृदय वाला और द्वेष करने वाला है, उस का शीश भी मैं वेग से तोड़ता हूं. (१) वर्म मह्यमयं मणिः फालाज्जातः करिष्यति. पूर्णो मन्थेन माग मद् रसेन सह वर्चसा.. (२) फाल से उत्पन्न यह मणि मेरे लिए कवच बन कर रक्षा करेगी. मंथन की सामर्थ्य एवं रस बल से युक्त होने के कारण समर्थ यह मणि मेरे पास आई है. (२) यत् त्वा शिक्कः परा ऽ वधीत् तक्षा हस्तेन वास्या. आपस्त्वा तस्माज्जीवलाः पुनन्तु शुचयः शुचिम्.. (३) कुशल बढ़ई जो तुझे औजार सहित हाथ से मारता है अर्थात् छील कर तेरा निर्माण करता है, इसी कारण जीवन देने वाले एवं पवित्र जल तुझे शुद्ध करें और पवित्र बनाएं. (३) हिरण्यस्रगयं मणिः श्रद्धां यज्ञं महो दधत्. गृहे वसतु नो ऽ तिथिः.. (४) सुवर्ण की माला से युक्त यह मणि श्रद्धा, यज्ञ एवं तेज को धारण करती हुई हमारे घर में अतिथि बन कर निवास करे. (४) तस्मै घृतं सुरां मध्वन्नमन्नं क्षदामहे. ebook converter DEMO Watermarks*
स नः पितेव पुत्रेभ्यः श्रेयः श्रेयश्चिकित्सतु भूयोभूयः श्वः श्वोः देवेभ्यो मणिरेत्य.. (५) हम इस अतिथि के लिए घृत, मदिरा, शहद और अन्न देते हैं. जिस प्रकार पिता पुत्र को परम कल्याण देता है, उसी प्रकार यह मणि मुझे कल्याण दे. यह मणि देवों के समीप से मेरे पास आ कर बारबार और प्रतिदिन मुझे सुख प्रदान करे. (५) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे. तमग्निः प्रत्यमुञ्चत सो अस्मै दुह आज्यं भूयोभूयः श्वः श्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (६) यह मणि फाल से उत्पन्न, घृत टपकाने वाली, बल युक्त एवं खदिर अर्थात् खैर वृक्ष की लकड़ी से बनी है. बृहस्पति ने बल प्राप्ति के लिए इसे बांधा था. अग्नि ने यह मणि मुझे दी है. हे यजमान! यह मणि तुझे बारबार और प्रतिदिन बल प्रदान करे, जिस से तू प्रतिदिन एवं बारबार शत्रुओं का विनाश कर सके. (६) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे. तमिन्द्रः प्रत्यमुञ्चत्तौजसे वीर्याय कम्. सो अस्मै बलमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (७) यह मणि फाल से उत्पन्न, घृत टपकाने वाली, बल युक्त एवं खदिर अर्थात् खैर वृक्ष की लकड़ी से बनी है. बृहस्पति ने बल प्राप्ति के लिए इसे बांधा था. इंद्र ने बल, वीर्य और सुख प्रदान करने हेतु इस मणि को मुझे दिया है. हे यजमान! यह मणि बारबार और प्रतिदिन तुझे बल प्रदान करे. उस बल की सहायता से तू शत्रुओं का विनाश करे. (७) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे. तं सोमः प्रत्यमुञ्चत महे श्रोत्राय चक्षसे. सो अस्मै वर्च इद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (८) बृहस्पति ने जिस फाल से उत्पन्न, घी टपकाने वाली, शक्तिशालिनी एवं खैर वृक्ष की लकड़ी से बनी मणि को बल प्राप्त करने के लिए बांधा था, उसे सोम ने महत्त्व, सुनने की शक्ति और उत्तम दृष्टि पाने के लिए मुझे प्रदान किया है. हे यजमान! यह मणि तुझे बारबार एवं प्रतिदिन तेज प्रदान करे, जिस की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर सके. (८) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे. तं सूर्यः प्रत्यमुञ्चत तेनेमा अजयद् दिशः. सो अस्मै भूतिमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (९) बृहस्पति ने फाल से उत्पन्न, घी टपकाने वाली, शक्तिशालिनी एवं खैर वृक्ष की लकड़ी ebook converter DEMO Watermarks*
से बनी मणि को बल प्राप्ति के लिए बांधा था. उसे सूर्य ने मुझे दिया था. इस से मैं ने इन सभी दिशाओं को जीत लिया था. हे यजमान! यह मणि तेरे लिए प्रतिदिन और बार-बार ऐश्वर्य प्रदान करे, जिस की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर सके. (९) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे. तं बिभ्रच्चन्द्रमा मणिमसुराणां पुरो ऽ जयद् दानवानां हिरण्ययी:. सो अस्मै श्रियमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१०) बृहस्पति ने फाल से उत्पन्न, घी टपकाने वाली, शक्तिशालिनी एवं खैर वृक्ष की लकड़ी से बनी मणि को बल प्राप्ति के लिए बांधा था. उसे धारण करते हुए चंद्रमा ने असुरों के नगरों एवं दानियों के स्वर्ण को जीत लिया था. यह मणि इस यजमान के लिए बारबार एवं प्रतिदिन श्री प्रदान करे. हे यजमान! उस की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर. (१०) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे. सो अस्मै वाजिनं दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि. (११) बृहस्पति ने जिस को यह मणि वायु के समान शीघ्र गति प्राप्त करने के लिए बांधी, उस के लिए यह मणि प्रतिदिन एवं बारबार घोड़े प्रदान करे. हे यजमान! उन की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर. (११) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे. तेनेमां मणिना कृषिमश्विनावभि रक्षतः. स भिषग्भ्यां महो दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१२) बृहस्पति देव ने जिसे यह मणि वायु के समान शीघ्र गति प्राप्त करने के लिए बांधी, उसी मणि के द्वारा अश्विनीकुमार इस कृषि की रक्षा करें. इस ने अश्विनीकुमारों का बारबार एवं प्रतिदिन महत्त्व प्रदान किया. हे यजमान! इस मणि की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर. (१२) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे. तं बिभ्रत् सविता मणिं तेनेदमजयत् स्वः. सो अस्मै सूनृतां दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१३) बृहस्पति देव ने जिस को यह मणि वायु के समान वेग प्राप्त करने के लिए बांधी थी, उसे धारण करते हुए सविता देव ने स्वर्ग को विजय किया. उस ने यजमान के लिए सत्य प्रदान किया. हे यजमान! इस से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर. (१३) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे. तमापो बिभ्रतीर्मणिं सदा धावन्त्यक्षिताः. ebook converter DEMO Watermarks*
सो आभ्यो ऽ मृतमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१४) बृहस्पति ने वायु के समान वेग प्राप्त करने के लिए जिस को यह मणि बांधी, उस मणि को धारण करने वाले जल सदा अविनाशी हो कर दौड़ते है अर्थात् बहते हैं. इस मणि ने जलों के लिए बारबार और प्रतिदिन अमृत प्रदान किया. हे यजमान! इस मणि की सहायता से तुम शत्रुओं का विनाश करो. (१४) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे. तं राजा वरुणो मणिं प्रत्यमुञ्चत शंभुवम्. सो अस्मै सत्यमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१५) जिस मणि को बृहस्पति देव ने वायु के समान वेग प्राप्त करने के लिए बांधा, उसी सुखदायी मणि को राजा वरुण ने हमें दिया है. वह मणि इस यजमान के लिए प्रतिदिन और बारबार सत्य प्रदान करे. हे यजमान! इस की सहायता से तुम अपने शत्रु का विनाश करो. (१५) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे. तं देवा बिभ्रतो मणिं सर्वांल्लोकान् युधा ऽ जयन्. स एभ्यो जितिमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१६) बृहस्पति देव ने जिस मणि को वायु के समान वेग प्राप्त करने के लिए बांधा था, उसी मणि को धारण करने वाले देवों ने युद्ध के द्वारा सभी लोकों को जीत लिया. वह मणि इस यजमान के लिए विजय प्रदान करे. हे यजमान! इस की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर. (१६) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्वाताय मणिमाशवे. तमिमं देवता मणिं प्रत्यमुञ्चन्त शंभुवम्. स आभ्यो विश्वमिद् दुहे भूयोभूयः श्वः श्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (१७) बृहस्पति ने वायु के समान वेग प्राप्त करने के लिए जिस मणि को बांधा, देवों ने उसी सुखदायी मणि को मुझे दिया है. इस मणि ने देवों के लिए बारबार और प्रतिदिन सत्य प्रदान किया है. हे यजमान! इस मणि की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर. (१७) ऋतवस्तमबध्नतार्तवास्तमबध्नत. संवत्सरस्तं बद्ध्वा सर्वं भूतं वि रक्षति.. (१८) वसंत आदि ऋतुओं ने इस मणि को बांधा और ऋतुओं से उत्पन्न चैत्र आदि मासों ने इस मणि को बांधा है. संवत्सर इसी मणि को बांध कर समस्त प्राणियों की रक्षा करता है. (१८) अन्तर्देशा अबध्नत प्रदिशस्तमबध्नत. प्रजापतिस्सृष्टो मणिर्द्विषतो मे ऽ धरां ebook converter DEMO Watermarks*
अंक:... (१९) आग्नेय, ईशान आदि अंतर्दिशाओं ने इस मणि को बांधा तथा पूर्व आदि दिशाओं ने भी इस को बांधा. प्रजापति के द्वारा निर्मित यह मणि मेरे शत्रुओं को पराजित करे. (१९) अथर्वाणो अबध्नताथर्वणा अबध्नत. तैर्मेदिनो अङ्गिरसो दस्यूनां बिभिदुः पुरस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (२०) अथर्वा ऋषियों ने इस मणि को बांधा तथा उन की संतान आथर्वणों ने भी इस मणि को बांधा. उन की अर्थात् अथर्वा ऋषियों और उन की संतान की सहायता से शक्तिशाली बने अंगिरा गोत्र वालों ने लुटेरों के नगरों का विनाश कर दिया. हे यजमान! इस मणि की सहायता से तू अपने शत्रुओं को मार. (२०) तं धाता प्रत्यमुञ्चत स भूतं व्यकल्पयत्. तेन त्वं द्विषतो जहि.. (२१) इस मणि को विधाता ने हमें दिया. विधाता ने इस मणि की सहायता से समस्त प्राणियों की रचना की. हे यजमान! इस मणि की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर. (२१) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्. स मा ऽ यं मणिरागमद् रसेन सहवर्चसा... (२२) बृहस्पति ने असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को देवों के हाथों में बांधा था, वही मणि रस और तेज के साथ मेरे पास आई है. (२२) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्. स मा ऽ यं मणिरागमत् सह गोभिरजाविभिरन्नेन प्रजया सह.. (२३) बृहस्पति ने असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को देवों के हाथों में बांधा था, वही मणि गायों, बकरियों, भेड़ों, अन्न एवं संतान के साथ मुझे प्राप्त हुई है. (२३) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्. स मा ऽ यं मणिरागमत् सह व्रीहियवाभ्यां महसा भूत्या सह.. (२४) बृहस्पति ने असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को देवों के हाथों में बांधा था, वही मणि गेहूं, जौ एवं महान विभूति के साथ मुझे प्राप्त हुई है. (२४) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्. स मा ऽ यं मणिरागन्मन्धोर्घृतस्य धारया कीलालेन मणिः सह.. (२५) असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को बृहस्पति ने देवों के हाथों में बांधा था, वही मणि मधु एवं घृत की धाराओं तथा मदिरा की धाराओं के साथ मुझे प्राप्त हुई है. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*
यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्. स मा ऽ यं मणिरागमदूर्जया पयसा सह द्रविणेन श्रिया सह.. (२६) बृहस्पति देव ने असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को देवों के हाथों में बांधा था, वही मणि ऊर्जा, दूध एवं शोभा के साथ मुझे प्राप्त हुई है. (२६) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्. स मा ऽ यं मणिरागमत् तेजसा त्विष्या सह यशसा कीर्त्या सह.. (२७) बृहस्पति ने असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को देवों के हाथों में बांधा था, वही मणि तेज, प्रकाश, यश एवं कीर्ति के साथ मुझे प्राप्त हुई है. (२७) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्देवेभ्यो असुरक्षितिम्. स मा ऽ यं मणिरागमत् सर्वाभिर्भूतिभिः सह.. (२८) बृहस्पति ने असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को देवों के हाथों में बांधा था, वही मणि मुझे समस्त विभूतियों के साथ प्राप्त हुई है. (२८) तमिमं देवता मणिं मह्यं ददतु पुष्टये. अभिभुं क्षत्रवर्धनं सपत्नदम्भनं मणिम्... (२९) देव वही मणि मुझे पुष्टि के लिए प्रदान करें. वह मणि शत्रु नाशक, क्षात्र शक्ति बढ़ाने वाली एवं शत्रु का विनाश करने वाली है. (२९) ब्रह्मणा तेजसा सह प्रति मुञ्चामि मे शिवम्. असपत्नः सपत्नहा सपत्नान् मेऽधरां अकः.. (३०) ब्रह्म तेज के साथ मैं इस मणि को धारण करता हूं. यह मणि मेरे लिए कल्याणकारी है. इस मणि का कोई शत्रु नहीं है. शत्रुघातक इस मणि ने मेरे शत्रुओं की अवनति की है. (३०) उत्तरं द्विषतो मामयं मणिः कृणोतु देवजाः. यस्य लोका इमे त्रयः पयो दुग्धमुपासते. स मा ऽ यमधि रोहतु मणिः श्रेष्ठ्याय मूर्धतः.. (३१) देवों से उत्पन्न इस मणि ने मुझे शत्रुओं की अपेक्षा उत्तम स्थिति में रखा. इस मणि से दुहे सार रूप दूध का तीनों लोक सेवन करते हैं. यह मणि मुझे श्रेष्ठ स्थान पर आरोपित करे. (३१) यं देवाः पितरो मनुष्या उपजीवन्ति सर्वदा. स मायमधि रोहतु मणिः श्रेष्ठ्याय मूर्धतः.. (३२) ebook converter DEMO Watermarks*
देव, मनुष्य और पितर सदा जिस मणि के सहारे जीवित रहते हैं, वह मणि मुझे श्रेष्ठ स्थान पर आरोपित करे. (३२) यथा बीजमुर्वरायां कृष्टे फालेन रोहति. एवा मयि प्रजा पशवो ऽ न्नमन्नं वि रोहतु.. (३३) जिस प्रकार हल के फाल से जुती हुई उपजाऊ भूमि में बीज उगता है, उसी प्रकार मुझे पुत्र, पौत्र आदि संतान, अन्न और पशु प्राप्त हों. (३३) यस्मै त्वा यज्ञवर्धन मणे प्रत्यमुचं शिवम्. तं त्वं शतदक्षिण मणे श्रेष्ठ्याय जिन्वतात्.. (३४) हे यज्ञ बढ़ाने वाली मणि! तू कल्याणकारिणी है. मैं तुझे जिस को बांधूं, तू उस को श्रेष्ठता प्रदान कर. (३४) एतमिध्मं समाहितं जुषाणो अग्ने प्रति हर्य होमैः. तस्मिन् विदेम सुमतिं स्वस्ति प्रजां चक्षुः पशून्त्समिद्धे जातवेदसि ब्रह्मणा.. (३५) हे अग्नि! इस मणि को प्राप्त होते हुए तुम हवनों से समृद्धि प्राप्त करो. इस प्रज्वलित अग्नि में ब्रह्म ज्ञान के द्वारा उत्तम बुद्धि, कल्याण, संतान, आंखें तथा पशुओं को प्राप्त करो. (३५) सूक्त-७ देवता—स्कंभ, अध्यात्म कस्मिन्नङ्गे तपो अस्याधि तिष्ठति कस्मिन्नङ्ग ऋतमस्याध्याहितम्. क्व व्रतं क्व श्रद्ध ऽ स्य तिष्ठति कस्मिन्नङ्गे सत्यमस्य प्रतिष्ठितम्.. (१) इस मनुष्य के किस अंग में तपस्या करने की शक्ति स्थित है? इस मनुष्य के किस अंग में सत्य भाषण की क्षमता स्थित है? इस मनुष्य के किस अंग में व्रत अर्थात् दृढ़ निश्चय और श्रद्धा, किस अंग में स्थित रहती है? इस मनुष्य के किस अंग में सत्य प्रतिष्ठित है? (१) कस्मादङ्गाद् दीप्यते अग्निरस्य कस्मादङ्गात् पवते मातरिश्वा. कस्मादङ्गाद् वि मिमीते ऽ धि चन्द्रमा मह स्कम्भस्य मिमानो अङ्गम्.. (२) इस परमेश्वर के किस अंग से अग्नि दीप्त होती है? इस के किस अंग से वायु चलती है? चंद्रमा का निर्माण इस के किस अंग से हुआ है? वह चंद्रमा इस विश्वाधार से किस अंग को नापता है? (२) कस्मिन्नङ्गे तिष्ठति भूमिरस्य कस्मिन्नङ्गे तिष्ठत्यन्तरिक्षम्. ebook converter DEMO Watermarks*
कस्मिन्नङ्गे तिष्ठत्याहिता द्यौः कस्मिन्नङ्गे तिष्ठत्युत्तरं दिवः.. (३) इस परमात्मा के किस अंग में भूमि स्थित रहती है? इस के किस अंग में अंतरिक्ष होता है? यह दृढ़ द्यौ इस के किस अंग में स्थित है? ऊंचा स्वर्ग इस के किस अंग में स्थित है? (३) क्व १ प्रेप्सन् दीप्यत ऊर्ध्वो अग्निः क्व १ प्रेप्सन् पवते मातरिश्वा. यत्र प्रेप्सन्तीरभियन्त्यावृतः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (४) ऊपर की ओर चलने वाली अग्नि, कहां जाने की इच्छा से प्रज्वलित होती है? वायु कहां जाने की इच्छा करती हुई चलती हैं? आवागमन के चक्कर में पड़े हुए प्राणी जहां जाने की इच्छा से गतिशील हैं, उस जगदाधार का वर्णन करो कि वह कौन है. (४) क्वार्धमासाः क्व यन्ति मासाः संवत्सरेण सह संविदानाः. यत्र यन्त्यृतवो यत्रार्तवाः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (५) संवत्सर के साथ मिलते हुए अर्धमास अर्थात् पक्ष एवं मास कहां चले जाते हैं? ये ऋतुएं और ऋतुओं से संबंधित पदार्थ कहां चले जाते हैं? उस परमात्मा के विषय में बताओ कि वह क्या है? (५) क्व १ प्रेप्सन्ती युवती विरूपे अहोरात्रे द्रवतः संविदाने. यत्र प्रेप्सन्तीरभियन्त्यापः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (६) परस्पर विरोधी रूप वाले युवा दिन और युवती रात कहां जाने की इच्छा से एकमत हो कर जाते हैं. जल जहां जाने की इच्छा से चले आ रहे हैं, उसी परमात्मा के विषय में बताओ कि वह कौन है? (६) यस्मिंस्तस्तब्ध्वा प्रजापतिर्लोकान्त्सर्वां अधारयत्. स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (७) जिस में स्थित रह कर प्रजापति समस्त लोकों को धारण करता है, उस परमात्मा के विषय में बताओ कि वह कौन है? (७) यत् परममवमं यच्च मध्यमं प्रजापतिः ससृजे विश्वरूपम्. कियता स्कम्भः प्र विवेश तत्र यन्न प्राविशत् कियत् तद् बभूव.. (८) प्रजापति ने उत्तम, अधम और मध्यम के रूप में संसार की सभी वस्तुओं और प्राणियों को बनाया है. इस संसार के कितने पदार्थ प्रजापति में प्रवेश कर चुके हैं? जो प्रवेश नहीं करता, वह कौन है? (८) कियता स्कम्भः प्र विवेश भूतं कियद् भविष्यदन्वाशये ऽस्य. ebook converter DEMO Watermarks*