अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्ट्यामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२०) शत्रुओं का वध कर के लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान, स्त्री तथा वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह ऋतुओं के बंधन से मुक्त न होने पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२०) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स आर्तवानां पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्ट्यामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२१) शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए तथा जीत कर लाए हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर पुरुष हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को हम इस लोक से दूर करते हैं. वह ऋतुओं के पदार्थों के बंधन से मुक्त न हो. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२१) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स मासानां पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्ट्यामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२२) शत्रुओं का वध कर के लाए हुए पदार्थ तथा जीत कर लाए हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह मासों के पाश से न छूटने पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२२) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. सो ऽ र्धमासानां पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्ट्यायीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२३) eBook converter DEMO Watermarks*
शत्रुओं को मार कर लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह अर्धमास के बंधन से मुक्त न होने पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२३) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. सो ऽ होरात्रयोः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२४) शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए पदार्थ और जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह दिन और रात्रियों के पाश से मुक्त न होने पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२४) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. सो ऽ ह्नोः संयतोः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२५) शत्रुओं को नष्ट कर के लाए हुए पदार्थ और जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह रातदिन के संयत पाशों से मुक्त न होने पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२५) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स द्यावापृथिव्योः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२६) शत्रुओं को विदीर्ण कर के लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, प्रजा और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम ebook converter DEMO Watermarks*
वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह द्यावा पृथ्वी के पाश से छूट न सके. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२६) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजोऽस्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स इन्द्राग्न्योः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२७) शत्रुओं को मार कर लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह इंद्र और अग्नि के बंधन से मुक्त न होने पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२७) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स मित्रावरुणयोः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२८) शत्रुओं को विदीर्ण कर के लाए हुए पदार्थ और जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सब वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह मित्र और वरुण के बंधन से छूटने न पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२८) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स राज्ञो वरुणस्य पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि. (२९) शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सब वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले और अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से मुक्त करते हैं. वह राजा वरुण के पाश से मुक्त न होने पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२९) ebook converter DEMO Watermarks*
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.. (३०) शत्रुओं को मार कर लाए हुए पदार्थ और जीत कर लाए हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सब वीर पुरुष हमारे हैं. (३०) तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.. (३१) हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. (३१) स मृत्योः पड्वीशात् पाशान्मा मोचि.. (३२) वह मृत्यु के पाशों से कभी मुक्त न हो. (३२) तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराज्चं पादयामि.. (३३) हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (३३) सूक्त-९ देवता—प्रजापति जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमभ्यष्ठां विश्वाः पृतना अरातीः.. (१) शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. हम शत्रुओं की सेना पर अधिकार करें. (१) तदग्निराह तदु सोम आह पूषा मा धात् सुकृतस्य लोके.. (२) अग्नि और सोम इसी बात को कह रहे हैं. पूषा देव हमें पुण्य लोक में प्रतिष्ठित करें. (२) अगन्म स्व १: स्वरगन्म सं सूर्यस्य ज्योतिषागन्म.. (३) हमें स्वर्ग प्राप्त है, जो लोक सूर्य की ज्योति से उत्तम बना है, हम उसे प्राप्त करें. (३) वस्योभूयाय वसुमान् यज्ञो वसु वंशिषीय वसुमान् भूयासं वसु मयि धेहि.. (४) मैं सत्कार पाने के योग्य हूं. मैं परमधनी बनने के लिए धन पर अधिकार कर सकूं. हे देव! मेरे धन को पुष्ट करो. (४) eBook converter DEMO Watermarks*
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सूक्त-१ देवता—आदित्य
सत्रहवां कांड सूक्त-१ देवता—आदित्य विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्. सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्. ईड्यं नाम ह्व इन्द्रमायुष्मान् भूयासम्. (१) सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने वाले, स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त करने वाले इंद्र रूप सूर्य को मैं प्रातः, मध्याह्न तक संध्या के कर्मों के द्वारा बुलाता हूं. उन इंद्र रूप सूर्य की कृपा से मैं अधिक आयु वाला बनूं. (१) विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्. सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्. ईड्यं नाम ह्व इन्द्रं प्रियो देवानां भूयासम् (२) सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने वाले, स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त करने वाले इंद्र रूप सूर्य को बुलाता हूं. उन इंद्र की कृपा से मैं संतान आदि का प्रिय बनूं. (२) विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्. सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्. ईड्यं नाम ह्व इन्द्रं प्रियः प्रजानां भूयासम् (३) मैं सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने वाले, स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त करने वाले इंद्र रूप सूर्य को मैं बुलाता हूं. उन इंद्र रूप सूर्य की कृपा से मैं प्रजाओं का प्रिय बनूं. (३) विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्. सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्. ईड्यं नाम ह्व इन्द्रं प्रियः पशूनां भूयासम् (४) सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने वाले, ebook converter DEMO Watermarks*
स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त करने वाले इंद्र रूप सूर्य का मैं प्रातः, सायं तथा मध्याह्न के कर्मों के द्वारा आह्वान करता हूं. उन की कृपा से मैं गाय, भैंस आदि पशुओं का प्रिय बनूं. (४) विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्. सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्. ईड्यं नाम ह्व इन्द्रं प्रियः समानानां भूयासम् (५) सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने वाले, स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त करने वाले सूर्य को मैं प्रातः, मध्याह्न और संध्या के कर्मों के द्वारा बुलाता हूं. उन इंद्र रूप सूर्य की कृपा से मैं अपने समान लोगों का प्रिय बनूं. (५) उदिह्युदिहि सूर्य वर्चसा माभ्युदिहि. द्विषंश्च मह्यं रध्यतु मा चाहं द्विषते रधं तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (६) हे सूर्य देव! आप उदित हैं और उदित हो कर अपने तेज से मुझे प्रकाशित करें. जो लोग मुझ से द्वेष करते हैं. वे मेरे वश में हो जाएं. मैं किसी भी प्रकार उन के वशीभूत न बनूं. हे व्यापनशील सूर्य देव! आप का पराक्रम सीमारहित है आप मुझे अमुक रूपों वाले अर्थात् गाय, घोड़ा, भैंस आदि पशुओं से पूर्ण करं तथा परमव्योम में जो अमृत है, उस में मुझे स्थापित करें. (६) उदिह्युदिहि सूर्य वर्चसा माभ्युदिहि. याश्चं पश्यामि याश्चं न तेषु मा सुमतिं कृधि तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (७) हे सूर्य देव! तुम उदय होओ. हे अपने तेज से दूसरों को दबाने वाले सूर्य देव! तुम उदय होओ. मैं जिन को देख रहा हूं और जिन्हें नहीं देख रहा हूं, उन के विषय में मुझे शोभन बुद्धि वाला बनाओ. हे व्यापनशील सूर्य! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अंतहीन हैं. तुम मुझे अनेक रूपों वाले अर्थात् गाय, अश्व, भैंस आदि पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो अमृत है उस में मुझे स्थापित करो. (७) मा त्वा दभन्त्सलिले अप्स्व १ न्तर्ये पाशिन उपतिष्ठन्त्यत्र. हित्वाशस्तिं दिवमारुक्ष एतां स नो मृड सुमतौ ते स्याम तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (८) हे पाशों को धारण करने वाले सूर्य! राक्षस तुम्हें जलों में प्रवेश करने से न रोकें. तुम उस ebook converter DEMO Watermarks*
निंदा को त्याग कर आकाश में आरोहण करो. तुम मुझ पर कृपा करो. हम तुम्हारी शोभन बुद्धि में रहें. हे व्याप्त होने वाले सूर्य! यहां तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनेक हैं. तुम गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से हमें पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (८) त्वं न इन्द्र महते सौभागायादब्धेभिः परि पाह्यक्तुभिस्तवैद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (९) हे परम ऐश्वर्य संपन्न सूर्य! ऐश्वर्य को प्राप्त करने के हेतु तुम बहुत से पराक्रम करते हो. तुम व्याधि, चोर, भूत, राक्षस, अग्निदाह आदि की हिंसा से रहित दिवसों के द्वारा हमारी रक्षा करो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से मुझे पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में मुझे स्थापित करो. (९) त्वं न इन्द्रोतिभिः शिवाभिः शांतमो भव. आरोहंस्त्रिदिवं दिवो गृणानः सोमपीतये प्रियधामा स्वस्तये तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१०) हे इंद्र! तुम अपनी मंगलमयी रक्षाओं के द्वारा हमारे लिए अधिक सुखकारी बनो. तुम अंतरिक्ष संबंधी स्वर्ग पर चढ़ते हुए सोम याग में सोमरस पीने के लिए आओ. हे प्रिय निवास स्थानों वाले इंद्र! तुम हमारे कल्याण के निमित्त पधारो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो और परम व्योम में जो सुधा है. उस में हमें स्थापित करो. (१०) त्वमिन्द्रासि विश्वजित् सर्ववित् पुरुहूतस्त्वमिन्द्र. त्वमिन्द्रेमं सुहवं स्तोममेरयस्व स नो मृड सुमतौ ते स्याम तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (११) हे इंद्र! तुम विश्वविजयी एवं सभी को जीतने वाले हो. हे इंद्र! तुम बहुतों के द्वारा यज्ञों में बुलाए जाने वाले हो. हे इंद्र! तुम इस समय की जाती हुई शोभन ज्ञान की साधन स्तुतियों के लिए हमें प्रेरित करो. तुम हमारी रक्षा करो. हम तुम्हारी उत्तम बुद्ध में रहें अर्थात् हमारे प्रति तुम्हारी श्रेष्ठ भावना हो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा हमें परम व्योम में स्थित सुधा में स्थापित करो. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
अदब्धो दिवि पृथिव्यामुतासि न त आपुर्महिमानमन्तरिक्षे. अदब्धेन ब्रह्मणा वावृधानः स त्वं न इन्द्र दिवि षञ्छर्म यच्छ तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१२) हे इंद्र! तुम द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में तथा पृथ्वी पर किसी के द्वारा हिंसित नहीं हो. तात्पर्य यह है कि इन दोनों स्थानों पर कोई भी तुम्हारा विरोध करने का साहस नहीं करता है. आकाश में तुम्हारी महिमा को सहन करने में कोई समर्थ नहीं है. जिस की सामर्थ्य कुंठित नहीं होती है, ऐसे मंत्रों के द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हुए तुम हमारी रक्षा करो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें गाय, घोड़ा आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१२) या त इन्द्र तनूरप्सु या पृथिव्यां यान्तरग्नौ या त इन्द्र पवमाने स्वर्विदि. ययेन्द्र तन्वा३न्तरिक्षं व्यापिथ तया न इन्द्र तन्वा३ शर्म यच्छ तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१३) हे परम ऐश्वर्य वाले सूर्य! तुम्हारी जो विभूतियां जलों में, पृथ्वी पर, आकाश में हैं तथा तुम्हारी जो विभूति अंतरिक्ष में गतिशील वायु में है, हे इंद्र उन विभूतियों अथवा मूर्तियों के द्वारा हमें सुख प्रदान करो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें गाय, भैंस आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में स्थित जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१३) त्वामिन्द्र ब्रह्मणा वर्धयन्तः सत्रं नि षेदुर्ऋषयो नाथमानास्तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१४) हे ऐश्वर्य वाले सूर्य! अंगिरा आदि प्राचीन ऋषि अपने मंत्रों के स्तोत्र आदि के द्वारा अपने सोमरस आदि के रूप वाले हवि से तुम्हारी वृद्धि करते हुए नियम से निवास करते रहें. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ये शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो एवं परमव्योम में व्याप्त जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१४) त्वं तृतं त्वं पर्येष्युत्सं सहस्रधारं विदथं स्वर्विदं तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१५) हे इंद्र! तुम विस्तृत अंतरिक्ष को व्याप्त करते हो. तुम अनेक धाराओं वाले जल को व्याप्त करते हो. तुम ज्ञान के साधन यज्ञ पर अधिकार करते हो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य ebook converter DEMO Watermarks*
अर्थात् शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गौ, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा हमें परम व्योम में स्थित सुधा में स्थापित करो. (१५) त्वं रक्षसे प्रदिशश्चतस्रस्त्वं शोचिषा नभसी वि भासि. त्वमिमा विश्वा भुवनानु तिष्ठस ऋतस्य पन्थामन्वेषि विद्वांस्तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१६) हे सूर्य! तुम चारों दिशाओं की रक्षा करते हो और अपनी किरणों से आकाश को प्रकाशित करते हो. तुम इन सभी भुवनों को प्रकाशित करते हो. तुम सत्य अथवा यज्ञ की स्थिति जानते हुए उन के मार्गों को क्रम से व्याप्त करते हो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें धेनु, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो एवं परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१६) पञ्चभिः पराङ्तपस्येकयार्वाङशस्तिमेषि सुदिने बाधमानस्तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१७) हे सूर्य! तुम अपनी पांच किरणों से ऊपर की ओर मुख करके तपते हो तथा अपनी एक किरण से नीचे की ओर मुख करके पृथ्वी पर तपते हो. पाला, बादल आदि से रहित दिन की याचना करने पर तुम अपनी किरण से पृथ्वी पर तपते हो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ही शक्तियां अनंत हैं. तुम गौ, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से हमें पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१७) त्वमिन्द्रस्त्वं महेन्द्रस्त्वं लोकस्त्वं प्रजापतिः. तुभ्यं यज्ञो वि तायते तुभ्यं जुह्वति जुह्वतस्तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१८) हे ऐश्वर्य शाली सूर्य! तुम स्वर्ग के स्वामी एवं महत्त्वपूर्ण गुण से युक्त हो. स्वर्ग आदि लोक तुम ही हो तथा तुम ही प्रजाओं के स्वामी हो. तुम्हारे लिए यज्ञ विस्तृत किए गए. (१८) असति सत् प्रतिष्ठितं सति भूतं प्रतिष्ठितम्. भूतं ह भव्य आहितं भव्यं भूते प्रतिष्ठितं तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१९) यह दृश्यमान जगत् निराकार ब्रह्म में प्रतिष्ठित है. इस दृश्यमान जगत् में पृथ्वी आदि पांच तत्त्व प्रतिष्ठित हैं. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ही शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गौ, अश्व आदि सभी रूप के पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा स्थित है, उस में हमें स्थापित करो. (१९) ebook converter DEMO Watermarks*
शुक्रो ऽ सि भ्राजो ऽ सि. स यथा त्वं भ्राजता भ्राजो ऽ स्येवाहं भ्राजता भ्राज्यासम्.. (२०) हे सूर्य! तुम शुक्ल अर्थात् अत्यधिक उज्ज्वल हो तथा तुम दीप्तिशाली हो. तुम जिस प्रकार की ज्योति से पूर्ण रहते हो, मैं तुम्हारे उसी ज्योति पूर्ण भाव की उपासना करता हूं. (२०) रुचिरसि रोचो ऽ सि. स यथा त्वं रुच्या रोचो ऽ स्येवाहं पशुभिश्च ब्राह्मणवर्चसेन च रुचिषीय.. (२१) हे सूर्य! तुम दीप्ति रूप हो तथा दूसरों को दीप्ति वाला बनाते हो. तुम जिस प्रकार दीप्ति से दीप्ति मग्न हो, उसी प्रकार मैं पशुओं तथा ब्राह्मणोचित तेज से संपन्न बनूं. (२१) उद्यते नम उदयते नम उदिताय नमः. विराजे नमः स्वराजे नमःसम्राजे नमः.. (२२) हे सूर्य! उदय होते हुए तुम को नमस्कार है तथा उदय के पश्चात ऊपर उठते हुए तुम को नमस्कार है. हे विराट् रूप वाले सूर्य! तुम को नमस्कार है! स्वयं प्रकाशित होने वाले तुम को नमस्कार है. अतिशय रूप से प्रकाशित होने वाले तुम को नमस्कार है. (२२) अस्तंयते नमो ऽ स्तमेष्यते नमो ऽ स्तमिताय नमः. विराजे नमः स्वराजे नमः सम्राजे नमः.. (२३) अस्त होने वाले, अस्त हो रहे और अस्त हो चुके सूर्य देव को मेरा नमस्कार है. विशेष तेजवान को नमस्कार है, शोभनीय तेज वाले को नमस्कार है तथा उत्तम तेज वाले को नमस्कार है. (२३) उदगादयमादित्यो विश्वेन तपसा सह. सपत्नान् मह्यं रन्धयन् मा चाहं द्विषते रधं तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (२४) यह सूर्य पूर्ण विश्व को संतप्त करने वाली किरणों के साथ उदय हुए हैं. ये मेरे शत्रुओं को मेरे वश में करते हैं तथा मुझे किसी शत्रु के वशीभूत नहीं बनाते. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ही शक्तियां अनंत हैं. तुम मुझे गाय, भैंस आदि सभी पशुओं से पूर्ण करो और परम व्योम में जो सुधा है, उस में मुझे स्थित करो. (२४) आदित्य नावमारुक्षः शतारित्रां स्वस्तये. अहर्मत्यपीपरो रात्रिं सत्राति पारय.. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे आदित्य अर्थात् अदिति पुत्र सूर्य! तुम रथ के लक्षणों वाली नाव पर सवार हो. वह नाव सौ डांडों वाली है. उस नाव पर तुम्हारे चढ़ने का प्रयोजन सभी का कल्याण है. इस प्रकार की नाव पर आरूढ़ तुम मुझे अनेक आध्यात्मिक, अधिभौतिक तथा अधिदैविक विविध बाधाओं से पार कर के रात्रि और दिन के मध्य मार्गों के पार पहुंचाओ. (२५) सूर्य नावमारुक्षः शतारित्रां स्वस्तये. रात्रिं मात्मपीपरो ऽ हः सत्राति पारय.. (२६) सूर्य देव सब के कल्याण के लिए सौ डांडों वाली नाव पर सवार होते हैं. यह नाव रथ के लक्षणों वाली है. हे सूर्य! रात्रि में मुझे कोई बाधा न पहुंचाए तथा दिन के तीनों सत्रों अर्थात् प्रातः, मध्याह्न और संध्या से मुझे पार करो. (२६) प्रजापतेरावृतो ब्रह्मणा वर्मणाहं कश्यपस्य ज्योतिषा वर्चसा च. जरदष्टिः कृतवीर्यो विहायाः सहस्रायुः सुकृतश्रयेयम्.. (२७) वर्षा आदि के द्वारा प्रजाओं का पालन करने से सूर्य प्रजापति हैं. मैं प्रजापति सूर्य के कवच से तथा कश्यप ऋषि की ज्योति और तेज से घिरा हुआ हूं, सुरक्षित हूं. मैं जीर्ण अर्थात् वृद्ध हो कर भी दृढ़ अंगों वाला हूं तथा अनेक प्रकार के भोगों को भोगता हूं. मैं दीर्घ आयु प्राप्त करता हुआ तथा लौकिक और वेदों का कार्य करता हुआ सूर्य देव की कृपा का पात्र रहूं. (२७) परीवृतो ब्रह्मणा वर्मणाहं कश्यपस्य ज्योतिषा वर्चसा च. मा मा प्रापन्निषवो दैव्य या मा मानुषीरवसृष्टा वधाय.. (२८) मैं कश्यप रूपी सूर्य के मंत्र रूपी कवच से ढका हुआ हूं तथा सत्य और रक्षा करने वाली किरणों से आच्छादित हूं. इसलिए मनुष्य और देवता मेरी हिंसा करने के लिए जिन आयुधों का प्रयोग करते हैं, वे मुझे प्रभावित नहीं कर सकेंगे. (२८) ऋतेन गुप्त ऋतुभिश्च सर्वैभूतेन गुप्तो भव्येन चाहम्. मा मा प्राप्त पाप्मा मोत मृत्युरन्तर्दधे ऽ हं सलिलेन वाचः.. (२९) सत्य, सूर्यरूपी ब्रह्म और सभी ऋतुएं मेरी रक्षा कर रही हैं. इस कारण पाप मेरे समीप नहीं आ सकता जो नरक में निवास का कारण बनता है, मैं उसी प्रकार अदृश्य रहता हूं, जिस प्रकार अभिमंत्रित जल में छिपे प्राणी किसी को दिखाई नहीं देते. मैं पापों से सुरक्षित होने के लिए अपनेआप को अभिमंत्रित और पवित्र करता हूं. (२९) अग्निर्मा गोप्ता परि पातु विश्वत उद्यन्सूर्यो नुदतां मृत्युपाशान्. व्युच्छन्तीरुषसः पर्वता ध्रुवाः सहस्रं प्राणा मय्या यतन्ताम्.. (३०) अपने आश्रितों के रक्षक अग्नि देव मेरी रक्षा करें. उदय होते हुए सूर्य मृत्यु के पाशों से ebook converter DEMO Watermarks*
मेरी रक्षा करें. उषा मृत्यु के पाशों को मुझ से दूर रखें. मैं आयु की कामना करता हूं. मुझ में प्राण स्थित रहें. मेरी इंद्रियां चेष्टा करती रहें. (३०)
सूक्त-१ देवता—मंत्रों में कहे गए
अठारहवां कांड सूक्त-१ देवता—मंत्रों में कहे गए ओ चित् सखायं सख्या ववृत्यां तिरः पुरू चिदर्णवं जगन्वान्. पितुर्नपातमा दधीत वेधा अधि क्षमि प्रतरं दीध्यानः.. (१) यमी का कथन—मैं समान प्रसिद्धि वाले मित्र यम को आदर भाव के अनुकूल बनाती हूं. समुद्र तट के समीप वाले द्वीप में चलते हुए यम अपने पुत्र को मुझ में स्थापित करें. हे यम! तुम्हारी प्रसिद्धि सभी लोकों में है. तुम सदा तेज से दीप्त रहो. (१) न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत् सलक्ष्मा यद् विषुरूपा भवाति. महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन्.. (२) यम का कथन—मैं तेरा सोदर अर्थात् एक ही पेट से उत्पन्न हुआ तेरा मित्र हूं. पर मैं भाई और बहन के समागम संबंधी मित्र भाव की इच्छा नहीं करता हूं. तू एक उदर से उत्पन्न हो कर भी मेरी पत्नी बनने की कामना करती है. मैं ऐसे मित्रभाव को स्वीकार नहीं करता हूं. शत्रुओं को दबाने वाले महाबली रुद्र के पुत्र मरुद्गण भी इस की निंदा करेंगे. (२) उशन्ति घा ते अमृतास एतदेकस्य चित् त्यजसं मर्त्यस्य. नि ते मनो मनसि धाय्यस्मे जन्युः पतिस्तन्व१मा विविश्याः.. (३) यमी—हे यम! मरुद्गण उस मार्ग की इच्छा करते हैं, जिस का मैं ने तुम से निवेदन किया है. इसलिए तुम अपने मन को मेरी ओर लगाओ. फिर तुम संतान को उत्पन्न करने वाले मेरे पति बनते हुए भाई के भाव को छोड़ कर मुझ में प्रविष्ट हो जाओ. (३) न यत् पुरा चकृमा कद्ध नूनमृतं वदन्तो अनृतं रपेम. गन्धर्वो अप्स्वप्या च योषा सा नौ नाभिः परमं जामि तन्नौ.. (४) यम—हे यमी! असत्य बात को हम सत्य भाषण करने वाले किस प्रकार सत्य कहें? जल को धारण करने वाले सूर्य भी आकाश में अपनी पत्नी के सहित स्थित हैं. इसलिए एक ही माता और पिता वाले हम दोनों उन्हीं के सामने तेरी इच्छा पूर्ण करने में समर्थ न होंगे. (४) गर्भे नु नौ जनिता दम्पति कद्देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः. नकिरस्य प्र मिनन्ति व्रतानि वेद नावस्य पृथिवी उत द्यौः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
यमी—हे यम! संतान उत्पन्न करने वाले देव ने हम दोनों को माता के उदर में ही दांपत्य बंधन में बांध दिया है. उस देव के कर्म का जो फल है, उसे कौन निष्फल कर सकता है. त्वष्टा देव के गर्भ में ही हमारे दंपती बनाने वाले कर्म को आकाश और पृथ्वी दोनों जानते हैं. इस कारण यह असत्य नहीं है. (५) को अद्य युङ्क्ते धुरि गा ऋतस्य शिमीवतो भामिनो दुर्हणायून्. आसन्निषून् हृत्स्वसो मयोभून् य एषां भृत्यामृणधत् स जीवात्.. (६) यम—हे यमी! सत्य का भार वहन करने के निमित्त अपनी वाणी रूप वृषभ को कौन नियुक्त कर सकता है. कर्मठ, तेजस्वी, क्रोध और लज्जा से हीन तथा अपने शब्दों से श्रोताओं के हृदय में बैठने वाला जो पुरुष सत्य वचनों से ही वृद्धि करता है, वह उस के फल के कारण दीर्घजीवी होता है. (६) को अस्य वेद प्रथमस्याह्नः क ईं ददर्श क इह प्र वोचत्. बृहन्मित्रस्य वरुणस्य धाम कदु ब्रव आहनो वीच्या नॄन्.. (७) यमी—हे यम! हमारे प्रथम दिन को कौन जान रहा है और कौन देख रहा है? फिर कौन पुरुष इस बात को दूसरों से कह सकेगा? दिन मित्र देवता का स्थान है. ये दोनों ही विशाल हैं. इसलिए मेरी इच्छा के प्रतिकूल मुझे क्लेश देने वाले तुम अनेक कर्मों वाले मनुष्यों के संबंध में ऐसा किस प्रकार कहते हो. (७) यमस्य मा यम्यं १ काम आगन्त्समाने योनौ सहशेय्याय. जायेव पत्ये तन्वं रिरिच्यां वि चिद् वृहेव रथ्येव चक्रा.. (८) मेरी इच्छा है कि पति को अपना शरीर अर्पण करने वाली पत्नी के समान यम को अपनी देह अर्पित करूं. वे दोनों पहिए के समान मार्ग में एकदूसरे से मिलते हैं. मैं उसी प्रकार की हो जाऊं. (८) न तिष्ठन्ति न नि मिषन्त्येते देवानां स्पश इह ये चरन्ति. अन्येन मदाहनो याहि तूयं तेन वि वृह रथ्येव चक्रा.. (९) यम—हे यमी! देवदूत लगातार विचरण करते रहते हैं. इसलिए हे मेरी धर्म बुद्धि को नष्ट करने की इच्छा करने वाली! तू मुझे छोड़ कर किसी अन्य को अपना पति बना तथा शीघ्र जा कर रथ के पहिए के समान संयुक्त हो जा. (९) रात्रीभिरस्मा अहभिर्दशस्येत् सूर्यस्य चक्षुर्मुहुरुन्मिमीयात्. दिवा पृथिव्या मिथुना सबन्धू यमीर्यमस्य विवृहादजामि.. (१०) यमी—यम के निमित्त यजमान दिनरात आहुति दें. प्रकाश करने वाला सूर्य का तेज नित्यप्रति इस के निमित्त उदय हो. आकाश और पृथ्वी जिस प्रकार आपस में मिले हुए हैं. ebook converter DEMO Watermarks*
उसी प्रकार मैं इस के भ्रातृत्व से अलग होती हुई इस से मिल जाऊं. (१०) आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि. उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्.. (११) यम—संभव है, आगे चल कर ऐसे ही दिन और रात आएं, जब बहन अपने बंधु भाव को छोड़ कर पत्नी का रूप प्राप्त करने लगेगी. पर अभी ऐसा नहीं हो रहा है. इसलिए हे यमी! तू स्त्री में गर्भ धारण करने में समर्थ किसी अन्य पुरुष की ओर अपना हाथ बढ़ा और मुझे छोड़ कर उसी को अपना पति बनाने की इच्छा कर. (११) किं भ्रातासद् यदनाथं भवाति किमु स्वसा यन्निॠतिर्निगच्छात्. काममूता बह्वे ३ तद् रपामि तन्वा मे तन्वं १ सं पिपृग्धि.. (१२) यमी—वह भाई कैसा है, जिस के विद्यमान रहते हुए उस की बहन अपनी चाही हुई कामना से हीन रह जाए. वह कैसी बहन है, जिस के सामने ही उस का भाई काम संतप्त हो. इसी कारण तुम मेरी इच्छा के अनुसार आचरण करो. (१२) न ते नाथं यम्यत्राहमस्मि न ते तनूं तन्वा ३ सं पपृच्याम्. अन्येन मत् प्रमुदः कल्पयस्व न ते भ्राता सुभगे वष्ट्येतत्.. (१३) यम—हे यमी! मैं तेरी इस कामना को पूर्ण करने वाला नहीं हो सकता. मैं तेरी देह को स्पर्श नहीं कर सकता. इसलिए तू अब मुझे छोड़ कर किसी अन्य पुरुष से इस प्रकार का संबंध स्थापित कर. मैं तुझे पत्नी बनाने की कामना नहीं करता हूं. (१३) न वा उ ते तनूं तन्वा ३ सं पपृच्यां पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात्. असंयदेतन्मनसो हृदो मे भ्राता स्वसुः शयने यच्छयीय.. (१४) यम—हे यमी! मैं तेरे शरीर का स्पर्श नहीं कर सकता. धर्म के जानने वाले भाई और बहन के ऐसे संबंध को पाप कहते हैं. यदि मैं ऐसा करूं तो यह कर्म मेरे हृदय, मन और प्राण का नाश कर देगा. (१४) बतो बतासि यम नैव ते मनो हृदयं चाविदाम. अन्या किल त्वां कक्ष्येव युक्तं परि ष्वजातै लिबुजेव वृक्षम्.. (१५) यमी—हे यम! तेरी दुर्बलता पर मैं दुखी हूं. तेरा मन मुझ में नहीं लगा है. मैं अभी तक तेरे मन को नहीं समझ सकी. तू किसी अन्य स्त्री से संबंधित होगा. (१५) अन्यम् षु यम्यन्य उ त्वां परि ष्वजातै लिबुजेव वृक्षम्. तस्य वा त्वं मन इच्छा स वा तवाधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम्.. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*
यम—हे यमी! रस्सी जिस प्रकार घोड़े से मिलती है, बेल जैसे पेड़ से लिपट जाती है, उसी प्रकार तू किसी अन्य पुरुष से मिल. तुम दोनों परस्पर अनुकूल मन वाले बनो. इस के बाद तू अत्यधिक कल्याण वाले पुत्र को प्राप्त कर. (१६) त्रीणि च्छन्दांसि कवयो वि येतिरे पुरुरूपं दर्शतं विश्वचक्षणम्. आपो वाता ओषधयस्तान्येकस्मिन् भुवन आर्पितानि.. (१७) देवताओं ने संसार को ढकने का प्रयत्न किया. जल तत्त्व देखने में प्रिय लगने वाला तथा विश्व को देखने वाला है, वायु तत्त्व भी दर्शनीय और विश्व द्रष्टा है. ओषधि तत्त्व भी इसी प्रकार का है. इन तीनों तत्त्वों को देवताओं ने पृथ्वी का भरणपोषण करने के लिए प्रतिष्ठित किया है. (१७) वृषा वृष्णे दुदुहे दोहसा दिवः पयांसि यह्वो अदितेरदाभ्यः. विश्वं स वेद वरुणो यथा धिया स यज्ञियो यजति यज्ञियाँ ऋतून्.. (१८) महान अग्नि देव यजमान के निमित्त पाश आदि के द्वारा जल की वर्षा करते हैं. वे अपनी बुद्धि के माध्यम से सब को ऐसे जान लेते हैं, जैसे वरुण देव अपनी बुद्धि से सब को जानते हैं. ये ही अग्नि यज्ञ में देवों की पूजा करते हैं जो पूजा करने के योग्य हैं. (१८) रपद् गन्धर्वीरप्या च योषणा नदस्य नादे परि पातु नो मनः. इष्टस्य मध्ये अदितिर्नि धातु नो भ्राता नो ज्येष्ठः प्रथमो वि वोचति.. (१९) जल धारण करने वाले सूर्य की वाणी और अंतरिक्ष में विचरने वाली सरस्वती मेरे द्वारा अग्नि की स्तुति कराएं तथा मेरे स्तुति रूप नाद में मन की रक्षा करे. इस के बाद देवमाता अदिति मुझे फल के मध्य स्थापित करें. बंधु के समान हितकारी अग्नि मुझे उत्तम यजमान बनाएं. (१९) सो चिन्नु भद्रा क्षुमती यशस्वत्युषा उवास मनवे स्वर्वती. यदीमुशन्तमुशतामनु क्रतुमग्निं होतारं विदथाय जीजनन्.. (२०) अध्वर्यु जनों ने देवताओं का आह्वान कर के अग्नि को देवों के हेतु हव्य वहन के लिए प्रकट किया है. तभी कल्याणमयी मंत्र रूप वाणी तथा सूर्य से संबंध रखने वाली उषा यज्ञ आदि की सिद्धि के लिए प्रकट होती है. (२०) अध त्यं द्रप्सं विभ्वं विचक्षणं विराभरदिषिरः श्येनो अध्वरे. यदि विशो वृणते दस्ममार्या अग्निं होतारमध धीरजायत.. (२१) जब सोम के लाए जाने के बाद यह को पूरा करने वाली अग्नि का वरण किया जाता है, तब सोम और अग्नि के सिद्ध होने पर अग्निष्टोम आदि कर्म भी पूर्ण होते हैं. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*
सदासि रण्वो यवसेव पुष्यते होत्राभिरग्ने मनुषः स्वध्वरः. विप्रस्य वा यच्छशमान उक्थ्यो ३ वाजं ससवाँ उपयासि भूरिभिः.. (२२) हे अग्नि! तुम यज्ञ को सुंदरतापूर्वक पूर्ण करते हो. जिस प्रकार हरी घास आदि को खाने वाला पशु अपने पालने वाले को सुंदर दिखाई देता है, उसी प्रकार घृत आदि से अपनेआप को पुष्ट करने वाले यजमान के लिए तुम दर्शनीय हो जाते हो. (२२) उदीरय पितरा जार आ भगमियक्षति हर्यतो हृत्त इष्यति. विवक्ति वह्निः स्वपस्यते मखस्तविष्यते असुरो वेपते मती.. (२३) हे अग्नि! आकाशरूपी अपने पिता और पृथ्वीरूपी माता को तुम यहां के लिए प्रेरित करो. जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाश को प्रेरित करते हैं, उसी प्रकार तुम अपने तेज को प्रेरित करो. यह यजमान जिन देवताओं की कामना करता है, अग्नि स्वयं उस की कामना करते हैं. वे इच्छित पदार्थ देने की बात कहते हैं और यज्ञ के हेतु यजमान के समीप आते हैं. (२३) यस्ते अग्ने सुमतिं मर्तो अख्यत् सहसः सूनो अति स प्र शृण्वे. इषं दधानो वहमानो अश्वैरा द्युमां अमवान् भूषति द्यून.. (२४) हे अग्नि! जो यजमान तुम्हारी कृपा का दूसरों के सामने वर्णन करता है, वह तुम्हारी कृपा के कारण सभी जगह प्रसिद्ध होता है. वह अन्न, अश्व आदि से युक्त होता हुआ चिरकाल तक ऐश्वर्य से प्रतिष्ठित रहता है. (२४) श्रुधी नो अग्ने सदने सधस्थे युक्ष्वा रथममृतस्य द्रवित्नुम्. आ नो वह रोदसी देवपुत्रे माकिर्देवानाम्प भूरिह स्याः.. (२५) हे अग्नि! तुम इस देव स्थान अर्थात् यज्ञशाला में हमारा आह्वान सुनो. तुम अपने जल बरसाने वाले रथ को लाने लिए प्रस्तुत करो. जो आकाश और पृथ्वी देवताओं के पलक के समान है, उन्हें भी अपने साथ लाओ. ऐसा कोई भी देवता शेष न रहे जो यहां न आया हो. (२५) यदग्न एषा समितिर्भवाति देवी देवेषु यजता यजत्र. रत्ना च यद् विभाजासि स्वधावो भागं नो अत्र वसुमन्तं वीतात्.. (२६) हे अग्नि! तुम पूजा करने योग्य हो. जब देवताओं में स्रोतों और हवियों की संगति हो, तब तुम स्तुति करने वालों के लिए रत्न दाता बनो तथा उन्हें बहुत धन प्रदान करो. (२६) अन्वग्निरुषसामग्रमख्यदन्वहानि प्रथमो जातवेदाः. अनु सूर्य उषसो अनु रश्मीननु द्यावापृथिवी आ विवेश.. (२७) अग्नि उषा काल के साथ ही प्रकाशित होते हैं. ये दिनों के साथ भी प्रकाशित होते हैं. ये ebook converter DEMO Watermarks*
ही अग्नि सूर्य बन कर उषा की ओर अपनी किरणें प्रकाशित करते हैं. ये ही सूर्यात्मक अग्नि आकाश और पृथ्वी को सब ओर से प्रकाशित रखते हैं. (२७) प्रत्यग्निरुषसामग्रमख्यत् प्रत्यहानि प्रथमो जातवेदाः. प्रति सूर्यस्य पुरुधा च रश्मीन् प्रति द्यावापृथिवी आ ततान.. (२८) ये अग्नि उषाकाल में नित्य प्रकाशित होते तथा दिन के समय भी प्रकाश वाले रहते हैं. ये ही सूर्यात्मक अग्नि अनेक प्रकार से प्रकट होने वाली किरणों में भी प्रकाश भरते हैं. ये आकाश और पृथ्वी दोनों को प्रकाश से भर देते हैं. (२८) द्यावा ह क्षामा प्रथमे ऋतेनाभिश्रावे भवतः सत्यवाचा. देवो यन्मर्त्तान् यजथाप कृण्वन्त्सीदद्धोता प्रत्यङ् स्वमसुं यन्.. (२९) आकाश और पृथ्वी मुख तथा सत्य वाणी हैं. जब अग्नि देव यजमान के समीप आ कर यज्ञ संपन्न करने के लिए बैठे, तब ये आकाश और पृथ्वी स्तुति सुनने के योग्य हैं. (२९) देवो देवान् परिभूरृतेन वहा नो हव्यं प्रथमश्चिकित्वान्. धूमकेतुः समिधा भ्राऋजीको मन्द्रो होता नित्यो वाचा यजीयान्.. (३०) हे अग्नि! तुम प्रचंड ज्वालाओं से संपन्न हो. तुम पूज्य देवताओं को यज्ञ के द्वारा अपने वश में करते हुए तथा उन के पूजन की इच्छा करते हुए उन के पास हवि को पहुंचाओ. तुम धूम रूप ध्वजा वाले, समिधाओं से दीप्त होने वाले, देव वाहक तथा पूजा के पात्र हो. तुम हमारी हवि को देवों के समीप पहुंचाओ. (३०) अर्चामि वां वर्धयापो घृतस्नू द्यावाभूमी शृणुतं रोदसी मे. अहा यद् देवा असुनीतिमायन् मध्वा नो अत्र पितरा शिशीताम्.. (३१) हे आकाश और पृथ्वी के अधिष्ठाता देवताओ! मैं यज्ञकर्म की सिद्धि के लिए तुम्हारी स्तुति करता हूं. हे आकाश और पृथ्वी! तुम दोनों मेरी स्तुति को सुनो तथा जब ऋत्विज् अपने यज्ञ कार्य में लगा हो, तब तुम जल प्रदान के द्वारा हमारी वृद्धि करो. (३१) स्वावृग् देवस्यामृतं यदी गोरतो जातासो धारयन्त उर्वी. विश्वे देवा अनु तत् ते यजुर्गुर्दुहे यदेनी दिव्यं घृतं वाः.. (३२) अमृत के समान उपकार करने वाला जल जब किरणों से प्रकट होता है, तब ओषधियां आकाश और पृथ्वी में व्याप्त होती हैं. जब अग्नि की दीप्तियां अंतरिक्ष से टपकने वाले जल का दोहन करती हैं, तब हे अग्नि! उस जल का सब अनुगमन करते हैं जो तुम्हारे द्वारा प्रकट किया जाता है. (३२) किं स्विन्नो राजा जगृहे कदस्याति व्रतं चक्रमा को वि वेद. ebook converter DEMO Watermarks*
मित्रश्चिद्धि ष्मा जुहुराणो देवाञ्छलोको न यातामपि वाजो अस्ति.. (३३) देवताओं में क्षत्रिय संबंधी शक्ति वाले यम हमारे हव्य का कुछ भाग ग्रहण करें. कहीं हम से उस कार्य का अतिक्रमण हो गया जो यम को प्रसन्न करने में सक्षम है तो यहां देवों का आह्वान करने वाले अग्नि विराजमान हैं. वे ही हमारे अपराध को दूर करेंगे. हमारे पास स्तुति के समान हवि भी है. उस के द्वारा हम अग्नि को संतुष्ट कर के यम के अपराध से छूट सकते हैं. (३३) दुर्मन्त्वत्रामृतस्य नाम सलक्ष्मा यद् विषुरूपा भवाति. यमस्य यो मनवते सुमन्त्वग्ने तमृष्व पाह्यप्रयुच्छन्.. (३४) यहां पर यम का नाम लेना उपयुक्त नहीं है, क्योंकि उन की बहन ने उन की पत्नी बनने की इच्छा की थी. फिर भी जो इन यम की स्तुति करे, हे अग्नि! तुम उस निंदा को भुलाते हुए उस स्तोता की रक्षा करो. (३४) यस्मिन् देवा विदथे मादयन्ते विवस्वतः सदने धारयन्ते. सूर्ये ज्योतिरदधुर्मास्य १ क्तून् परि द्योतनिं चरतो अजस्रा.. (३५) जिस अग्नि के यज्ञ पूर्ण कराने वाले रूप से प्रतिष्ठित होने पर देवता प्रसन्न होते हैं तथा जिस के कारण मनुष्य सूर्यलोक में निवास करते हैं, जिस अग्नि ने ही देवताओं के प्रकाशमान तेज को तीनों लोकों में प्रतिष्ठित किया है तथा अंधकार का नाश करने वाली किरणों को जिस से लेकर चंद्रमा में स्थापित किया है, सूर्य और चंद्रमा ऐसे तेजस्वी अग्नि की निरंतर पूजा करते हैं. (३५) यस्मिन् देवा मन्मनि संचरन्त्यपीच्ये ३ न वयमस्य विद्म. मित्रा नो अत्रादितिरनागान्त सविता देवो वरुणाय वोचत्.. (३६) वरुण के जिस स्थान में देवता घूमते हैं, उस स्थान से हम परिचित नहीं हैं. देवगण उस स्थान से हमारे निर्दोष होने की बात कहें. सविता अदिति, आकाश तथा मित्र देवता भी अग्नि की कृपा से हम को निर्दोष कहें. (३६) सखाय आ शिषामहे ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे. स्तुष ऊ षु नृतमाय धृष्णवे.. (३७) हम सखा रूप इंद्र के लिए दृढ़ कार्य करने की इच्छा रखते हैं. उन शत्रुओं का मर्दन करने वाले महान नेता और वज्रधारी इंद्र की हम स्तुति करते हैं. (३७) शवसा ह्यसि श्रुतो वृत्रहत्येन वृत्रहा. मघैर्मघोनो अति शूर दाशसि.. (३८) हे वृत्र राक्षस का विनाश करने वाले इंद्र! तुम जिस प्रकार वृत्र राक्षस का हनन करने ebook converter DEMO Watermarks*