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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सदासि रण्वो यवसेव पुष्यते होत्राभिरग्ने मनुषः स्वध्वरः. विप्रस्य वा यच्छशमान उक्थ्यो ३ वाजं ससवाँ उपयासि भूरिभिः.. (२२) हे अग्नि! तुम यज्ञ को सुंदरतापूर्वक पूर्ण करते हो. जिस प्रकार हरी घास आदि को खाने वाला पशु अपने पालने वाले को सुंदर दिखाई देता है, उसी प्रकार घृत आदि से अपनेआप को पुष्ट करने वाले यजमान के लिए तुम दर्शनीय हो जाते हो. (२२) उदीरय पितरा जार आ भगमियक्षति हर्यतो हृत्त इष्यति. विवक्ति वह्निः स्वपस्यते मखस्तविष्यते असुरो वेपते मती.. (२३) हे अग्नि! आकाशरूपी अपने पिता और पृथ्वीरूपी माता को तुम यहां के लिए प्रेरित करो. जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाश को प्रेरित करते हैं, उसी प्रकार तुम अपने तेज को प्रेरित करो. यह यजमान जिन देवताओं की कामना करता है, अग्नि स्वयं उस की कामना करते हैं. वे इच्छित पदार्थ देने की बात कहते हैं और यज्ञ के हेतु यजमान के समीप आते हैं. (२३) यस्ते अग्ने सुमतिं मर्तो अख्यत् सहसः सूनो अति स प्र शृण्वे. इषं दधानो वहमानो अश्वैरा द्युमां अमवान् भूषति द्यून.. (२४) हे अग्नि! जो यजमान तुम्हारी कृपा का दूसरों के सामने वर्णन करता है, वह तुम्हारी कृपा के कारण सभी जगह प्रसिद्ध होता है. वह अन्न, अश्व आदि से युक्त होता हुआ चिरकाल तक ऐश्वर्य से प्रतिष्ठित रहता है. (२४) श्रुधी नो अग्ने सदने सधस्थे युक्ष्वा रथममृतस्य द्रवित्नुम्. आ नो वह रोदसी देवपुत्रे माकिर्देवानाम्प भूरिह स्याः.. (२५) हे अग्नि! तुम इस देव स्थान अर्थात् यज्ञशाला में हमारा आह्वान सुनो. तुम अपने जल बरसाने वाले रथ को लाने लिए प्रस्तुत करो. जो आकाश और पृथ्वी देवताओं के पलक के समान है, उन्हें भी अपने साथ लाओ. ऐसा कोई भी देवता शेष न रहे जो यहां न आया हो. (२५) यदग्न एषा समितिर्भवाति देवी देवेषु यजता यजत्र. रत्ना च यद् विभाजासि स्वधावो भागं नो अत्र वसुमन्तं वीतात्.. (२६) हे अग्नि! तुम पूजा करने योग्य हो. जब देवताओं में स्रोतों और हवियों की संगति हो, तब तुम स्तुति करने वालों के लिए रत्न दाता बनो तथा उन्हें बहुत धन प्रदान करो. (२६) अन्वग्निरुषसामग्रमख्यदन्वहानि प्रथमो जातवेदाः. अनु सूर्य उषसो अनु रश्मीननु द्यावापृथिवी आ विवेश.. (२७) अग्नि उषा काल के साथ ही प्रकाशित होते हैं. ये दिनों के साथ भी प्रकाशित होते हैं. ये ebook converter DEMO Watermarks*

ही अग्नि सूर्य बन कर उषा की ओर अपनी किरणें प्रकाशित करते हैं. ये ही सूर्यात्मक अग्नि आकाश और पृथ्वी को सब ओर से प्रकाशित रखते हैं. (२७) प्रत्यग्निरुषसामग्रमख्यत् प्रत्यहानि प्रथमो जातवेदाः. प्रति सूर्यस्य पुरुधा च रश्मीन् प्रति द्यावापृथिवी आ ततान.. (२८) ये अग्नि उषाकाल में नित्य प्रकाशित होते तथा दिन के समय भी प्रकाश वाले रहते हैं. ये ही सूर्यात्मक अग्नि अनेक प्रकार से प्रकट होने वाली किरणों में भी प्रकाश भरते हैं. ये आकाश और पृथ्वी दोनों को प्रकाश से भर देते हैं. (२८) द्यावा ह क्षामा प्रथमे ऋतेनाभिश्रावे भवतः सत्यवाचा. देवो यन्मर्त्तान् यजथाप कृण्वन्त्सीदद्धोता प्रत्यङ् स्वमसुं यन्.. (२९) आकाश और पृथ्वी मुख तथा सत्य वाणी हैं. जब अग्नि देव यजमान के समीप आ कर यज्ञ संपन्न करने के लिए बैठे, तब ये आकाश और पृथ्वी स्तुति सुनने के योग्य हैं. (२९) देवो देवान् परिभूरृतेन वहा नो हव्यं प्रथमश्चिकित्वान्. धूमकेतुः समिधा भ्राऋजीको मन्द्रो होता नित्यो वाचा यजीयान्.. (३०) हे अग्नि! तुम प्रचंड ज्वालाओं से संपन्न हो. तुम पूज्य देवताओं को यज्ञ के द्वारा अपने वश में करते हुए तथा उन के पूजन की इच्छा करते हुए उन के पास हवि को पहुंचाओ. तुम धूम रूप ध्वजा वाले, समिधाओं से दीप्त होने वाले, देव वाहक तथा पूजा के पात्र हो. तुम हमारी हवि को देवों के समीप पहुंचाओ. (३०) अर्चामि वां वर्धयापो घृतस्नू द्यावाभूमी शृणुतं रोदसी मे. अहा यद् देवा असुनीतिमायन् मध्वा नो अत्र पितरा शिशीताम्.. (३१) हे आकाश और पृथ्वी के अधिष्ठाता देवताओ! मैं यज्ञकर्म की सिद्धि के लिए तुम्हारी स्तुति करता हूं. हे आकाश और पृथ्वी! तुम दोनों मेरी स्तुति को सुनो तथा जब ऋत्विज् अपने यज्ञ कार्य में लगा हो, तब तुम जल प्रदान के द्वारा हमारी वृद्धि करो. (३१) स्वावृग् देवस्यामृतं यदी गोरतो जातासो धारयन्त उर्वी. विश्वे देवा अनु तत् ते यजुर्गुर्दुहे यदेनी दिव्यं घृतं वाः.. (३२) अमृत के समान उपकार करने वाला जल जब किरणों से प्रकट होता है, तब ओषधियां आकाश और पृथ्वी में व्याप्त होती हैं. जब अग्नि की दीप्तियां अंतरिक्ष से टपकने वाले जल का दोहन करती हैं, तब हे अग्नि! उस जल का सब अनुगमन करते हैं जो तुम्हारे द्वारा प्रकट किया जाता है. (३२) किं स्विन्नो राजा जगृहे कदस्याति व्रतं चक्रमा को वि वेद. ebook converter DEMO Watermarks*

मित्रश्चिद्धि ष्मा जुहुराणो देवाञ्छलोको न यातामपि वाजो अस्ति.. (३३) देवताओं में क्षत्रिय संबंधी शक्ति वाले यम हमारे हव्य का कुछ भाग ग्रहण करें. कहीं हम से उस कार्य का अतिक्रमण हो गया जो यम को प्रसन्न करने में सक्षम है तो यहां देवों का आह्वान करने वाले अग्नि विराजमान हैं. वे ही हमारे अपराध को दूर करेंगे. हमारे पास स्तुति के समान हवि भी है. उस के द्वारा हम अग्नि को संतुष्ट कर के यम के अपराध से छूट सकते हैं. (३३) दुर्मन्त्वत्रामृतस्य नाम सलक्ष्मा यद् विषुरूपा भवाति. यमस्य यो मनवते सुमन्त्वग्ने तमृष्व पाह्यप्रयुच्छन्.. (३४) यहां पर यम का नाम लेना उपयुक्त नहीं है, क्योंकि उन की बहन ने उन की पत्नी बनने की इच्छा की थी. फिर भी जो इन यम की स्तुति करे, हे अग्नि! तुम उस निंदा को भुलाते हुए उस स्तोता की रक्षा करो. (३४) यस्मिन् देवा विदथे मादयन्ते विवस्वतः सदने धारयन्ते. सूर्ये ज्योतिरदधुर्मास्य १ क्तून् परि द्योतनिं चरतो अजस्रा.. (३५) जिस अग्नि के यज्ञ पूर्ण कराने वाले रूप से प्रतिष्ठित होने पर देवता प्रसन्न होते हैं तथा जिस के कारण मनुष्य सूर्यलोक में निवास करते हैं, जिस अग्नि ने ही देवताओं के प्रकाशमान तेज को तीनों लोकों में प्रतिष्ठित किया है तथा अंधकार का नाश करने वाली किरणों को जिस से लेकर चंद्रमा में स्थापित किया है, सूर्य और चंद्रमा ऐसे तेजस्वी अग्नि की निरंतर पूजा करते हैं. (३५) यस्मिन् देवा मन्मनि संचरन्त्यपीच्ये ३ न वयमस्य विद्म. मित्रा नो अत्रादितिरनागान्त सविता देवो वरुणाय वोचत्.. (३६) वरुण के जिस स्थान में देवता घूमते हैं, उस स्थान से हम परिचित नहीं हैं. देवगण उस स्थान से हमारे निर्दोष होने की बात कहें. सविता अदिति, आकाश तथा मित्र देवता भी अग्नि की कृपा से हम को निर्दोष कहें. (३६) सखाय आ शिषामहे ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे. स्तुष ऊ षु नृतमाय धृष्णवे.. (३७) हम सखा रूप इंद्र के लिए दृढ़ कार्य करने की इच्छा रखते हैं. उन शत्रुओं का मर्दन करने वाले महान नेता और वज्रधारी इंद्र की हम स्तुति करते हैं. (३७) शवसा ह्यसि श्रुतो वृत्रहत्येन वृत्रहा. मघैर्मघोनो अति शूर दाशसि.. (३८) हे वृत्र राक्षस का विनाश करने वाले इंद्र! तुम जिस प्रकार वृत्र राक्षस का हनन करने ebook converter DEMO Watermarks*

वाले रूप में प्रसिद्ध हो, उसी प्रकार अपने धन के कारण भी विख्यात हो. तुम अपना धन मुझे प्रदान करो. (३८) स्तेगो न क्षामत्येषि पृथिवीं मही नो वाता इह वान्तु भूमौ. मित्रो नो अत्र वरुणो युज्यमानो अग्निर्वने न व्यसृष्ट शोकम्.. (३९) वर्षा ऋतु में मेढक जिस प्रकार पृथ्वी को लांघ जाता है, उसी प्रकार तुम पृथ्वी को लांघ कर ऊपर जाते हो. अग्नि की कृपा से वायु हमारे लिए सुखकर हो. मित्र एवं वरुण देवता भी हमें सुख देने वाले कार्य में लगें. अग्नि जिस प्रकार तिनकों आदि को भस्म करते हैं, उसी प्रकार हमारे शोक को समाप्त करें. (३९) स्तुहि श्रुतं गर्तसदं जनानां राजानं भीममुपहत्नमुग्रम्. मृडा जरित्रे रुद्र स्तवानो अन्यमस्मत् ते नि वपन्तु सेन्यम्.. (४०) हे स्तोता! उन रुद्र देवता की स्तुति करो, जिन का निवास स्थान श्मशान में है, जो पिशाच आदि के स्वामी हैं तथा जो पराक्रमी, भय उत्पन्न करने वाले तथा समीप आ कर हिंसित करने वाले हैं. हे दुःख का नाश करने वाले इंद्र! तुम हमारी स्तुति से प्रसन्न हो कर हमें सुख प्रदान करो. तुम्हारी सेना हम को त्याग कर उन पर आक्रमण करे जो हम से द्वेष रखते हैं. (४०) सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते सरस्वतीमध्वरे तायमाने. सरस्वतीं सुकृतो हवन्ते सरस्वती दाशुषे वार्यं दात्.. (४१) मृतक संस्कार करने वाले तथा अग्नि की इच्छा करते हुए पुरुष सरस्वती का आह्वान करते हैं. हम ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों में भी सरस्वती को बुलाते हैं. देवी सरस्वती हवि प्रदान करने वाले यजमान को मनचाहा धन दें. (४१) सरस्वतीं पितरो हवन्ते दक्षिणा यज्ञमभिनक्षमाणाः. आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वमनमीवा इष आ धेह्यस्मे.. (४२) वेदी की दक्षिण दिशा में प्रतिष्ठित पितर भी सरस्वती का आह्वान करते हैं. हे पितरो! तुम इस यज्ञ में विराजमान होते हुए प्रसन्न रहो. तुम सरस्वती को प्रसन्न करो तथा हवियों को प्राप्त कर के संतुष्ट बनो. हे सरस्वती! तुम पितरों के द्वारा बुलाई गई हो. तुम हम में ऐसे अन्न को स्थापित करो जो रागरहित और हमारा इच्छित है. (४२) सरस्वति या सरथं ययाथोक्यैः स्वधाभिर्देवि पितृभिर्मदन्ती. सहस्रार्घमिडो अत्र भागं रायस्पोषं यजमानाय धेहि.. (४३) हे सरस्वती! तुम अपनेआप को तृप्त करती हुई पितरों सहित एक ही रथ पर आती हो. अनेक व्यक्तियों तथा प्रजाओं को तृप्त कर के अन्न के भाग को और अन्न के बल को मुझ ebook converter DEMO Watermarks*

यजमान को प्रदान करो. (४३) उदीरतामवर उत् परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः. असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नो ऽ वन्तु पितरो हवेषु.. (४४) अवस्था एवं गुणों में श्रेष्ठ, निकृष्ट एवं मध्यम श्रेणी के पितर भी उठें. ये पितर सोम का भक्षण करने वाले हैं. ये प्राण से उपलक्षित शरीर को प्राप्त होने वाले, अहिंसक और पदार्थ के ज्ञाता हैं. बुलाए जाने पर ये पितर हमारी रक्षा करें. (४४) आहं पितॄन्त्सुविदत्रां अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः. बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः.. (४५) मैं कल्याण करने वाले पितरों के सामने उपस्थित होता हूं. मैं यज्ञ की रक्षा करने वाले अग्नि के सामने उपस्थित होता हूं. इसलिए जो पितर बर्हिषद अर्थात् कुशाओं पर बैठने वाले हैं, वे स्वधा के साथ सोमरस पीते हैं. हे अग्नि! उन्हें मेरे समीप बुलाओ. (४५) इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो ये अपरास ईयुः. ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु दिक्षु.. (४६) जो पितर पहले पितरलोक को प्राप्त हुए थे तथा जो अब वहां गए हैं, जो अभी पृथ्वीलोक में ही हैं तथा जो भिन्नभिन्न दिशाओं में हैं, उन सभी पितरों को नमस्कार है. (४६) मातली कव्यैर्यमो अङ्गिारोभिर्बृहस्पतिर्ऋक्वभिर्वावृधानः. यांश्च देवा वावृधुर्यै च देवांस्ते नो ऽ वन्तु पितरो हवेषु.. (४७) मातलि नाम वाले पितृ देवता यजमान के द्वारा दिए गए हवि से कव्य नाम वाले पितरों के साथ वृद्धि पाते हैं. पितरों के नेता यम नाम के देव यजमान को इस हवि से अंगिरा नाम के पितरों के साथ बढ़ते हैं. मातलि आदि देवता जिन पितरों के यज्ञ में प्रबुद्ध करते हैं तथा जो कव्यादि की आहुति से प्रबुद्ध करते हैं, वे पितर आह्वान काल में हमारी रक्षा करें. (४७) स्वादुष्किलायं मधुमाँ उतायं तीव्रः किलायं रसवां उतायम्. उतो न्व १ स्य पपिवांसमिन्द्रं न कश्चन सहत आहवेषु.. (४८) यह सोमरस निश्चित रूप से स्वादिष्ट है, यह सोमरस माधुर्य गुण से युक्त है. यह सोमरस पीने में निश्चित रूप से तीखा लगता है. यह सोम उत्तम स्वाद वाला है. इस को पीने के इच्छुक इंद्र को संग्राम में कोई भी सहन नहीं कर पाता. तात्पर्य यह है कि संग्राम में इंद्र के सामने कोई भी नहीं टिक पाता है. (४८) परेयिवांसं प्रवतो महीरिति बहुभ्यः पन्थामनुपस्पशानम्. वैवस्वतं संगमनं जनानां यमं राजानं हविषा सपर्यत.. (४९) ebook converter DEMO Watermarks*

पृथ्वी को लांघ कर दूर देश में गमन करने वाले अनेक पितरों के मार्ग पर चलने वाले विवस्वान् अर्थात् सूर्य के पुत्र मृतकों के धाम रूप यमराज को रखते हैं. (४९) यमो नो गातुं प्रथमो विवेद नैषा गव्यूतिरपभर्तवा उ. यत्रा नः पूर्वे पितरः परेता एना जज्ञानाः पथ्या ३ अनु स्वाः.. (५०) यम ने सब से पहले हमारे मार्ग को जाना. यह मार्ग अपसरण अर्थात् छुटकारे के लिए नहीं है. इस मार्ग से छुटकारा नहीं पाया जा सकता. जहां पर हमारे पूर्वज पितर गए हैं, इस मार्ग को न जानने वाले प्राणी अपनेअपने कर्मों के अनुसार जाते हैं. (५०) बर्हिषदः पितर ऊत्य १ र्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्. त आ गतावसा शांतमेनाधा नः शं योररपो दधात.. (५१) हे यज्ञ में आए हुए एवं कुशों पर बैठे हुए पितरो! तुम हमारी रक्षा करने के लिए हमारे सामने आओ. ये हवियां तुम्हारे निमित्त हैं. तुम इन का सेवन करो. तुम अपने कल्याणकारी रक्षा साधनों के साथ आओ तथा राग का शमन करने वाले तथा पाप का नाश करने वाले बल को हम में स्थापित करो. (५१) आच्या जानु दक्षिणतो निषद्येदं नो हविरभि गृणन्तु विश्वे. मा हिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद् व आगः पुरुषता कराम.. (५२) हे पितरो! घुटने सिकोड़ कर वेदी की दक्षिण दिशा में बैठे हुए तुम हमारी हवि की प्रशंसा करो. हमारे किसी भी छोटे अथवा बड़े अपराध के कारण हमारी हिंसा मत करना. मनुष्य स्वभाव के कारण हम से अपराध का होना असंभव नहीं है. (५२) त्वष्टा दुहित्रे वहतुं कृणोति तेनेदं विश्वं भुवनं समेति. यमस्य माता पर्युह्यमाना महो जाया विवस्वतो ननाश.. (५३) सिंचित वीर्य को पुरुष आदि की आकृति में बदलने वाले त्वष्टा ने अपनी पुत्री सरण्यु का विवाह किया. उसे देखने के लिए पूरा विश्व एकत्र हुआ. यम की माता सरण्यु जब सूर्य से विवाह हुआ, तब सूर्य की अधिक प्रभाव वाली पत्नी उन के समीप से अदृश्य हो गई. (५३) प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्यायैर्यैना ते पूर्वे पितरः परेताः. उभा राजानौ स्वधया मदन्तौ यमं पश्यासि वरुणं च देवम्.. (५४) हे प्रेत! जिस अर्थी को मनुष्य उठाते हैं. उस से यम के मार्ग को गमन करो. तुम्हारे पूर्व पुरुष इसी मार्ग से गए हैं. वहां देवताओं में अग्नि के समान कर्म करने वाले वरुण और यम दोनों हैं. वे हमारे द्वारा दी गई हवियों से प्रसन्न हो रहे हैं. इस लोक में तुम यम और वरुण के दर्शन करोगे. (५४) ebook converter DEMO Watermarks*

अपेत वीत वि च सर्पतातो ऽ स्मा एतं पितरो लोकमक्रन्. अहोभिरद्भिरक्तुभिर्व्यक्तं यमो ददात्यवसानमस्मै.. (५५) हे राक्षसो! तुम इस स्थान से भागो. तुम चाहे यहां पर पहले से रहते हो अथवा नए आकर रहने लगे हो, तुम यहां से चले जाओ, क्योंकि यह स्थान इस प्रेत के लिए दिन, रात और जल के सहित रहने के लिए यम ने प्रदान कियाहै. (५५) उशन्तस्त्वेधीमहुशन्तः समिधीमहि. उशन्नुशत आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे.. (५६) हे अग्नि! इस पितृ यज्ञ को संपन्न करने के लिए हम तुम्हारी कामना करते हैं तथा तुम्हारा आह्वान करते हैं. तुम भलीभांति प्रदीप्त हो कर स्वधन की इच्छा करने वाले पितरों को लिए हवि भक्षण करने आओ. (५६) द्युमन्तस्त्वेधीमहि द्युमन्तः समिधीमहि. द्युमान् द्युमत आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे.. (५७) हे अग्नि! हम तुम्हारा आह्वान करते हैं. तुम्हारी कृपा से हम यशस्वी हो गए हैं. हम तुम्हें प्रदीप्त करते हैं. तुम हमारी हवि स्वीकार कर के उसे भक्षण करने के लिए पितरों के यहां ले आओ. (५७) अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः. तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम.. (५८) प्राचीन अंगिरा ऋषि हमारे पितर हैं. नवीन स्तोक वाले अथर्वा तथा भृगु हमारे पितर हैं. ये सब सोमरस का पान करने वाले हैं. हम उन की कृपा दृष्टि में रहें. वे हम से प्रसन्न रहें. (५८) अङ्गिरोभिर्यज्ञियेरा गहीह यम वैरूपैरिह मादयस्व. विवस्वन्तं हुवे यः पिता ते ऽ स्मिन् बर्हिष्या निषद्य.. (५९) हे यम! अंगिरा नाम के यज्ञ संबंधी पितरों के साथ यहां आ कर तृप्त बनो. मैं तुम को ही नहीं, तुम्हारे पिता सूर्य को भी बुलाता हूं, जिस से वे इस कुश के आसन पर बैठ कर हवि ग्रहण करें. मैं इस प्रकार तुम्हें आहूत करता हूं. (५९) इमं यम प्रस्तरमा हि रोहाङ्गिरोभिः पितृभिः संविदानः. आ त्वा मन्त्राः कविशस्ता वहन्त्वेना राजन् हविषो मादयस्व.. (६०) हे यम! तुम अंगिरा नाम वाले पितरों के समान मति वाले बन कर कुश के इस आसन पर बैठो. महर्षियों के मंत्र तुम्हें बुलाने में समर्थ हों. तुम हवि प्राप्त कर के प्रसन्न बनो. (६०) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-२ देवता—यम तथा मंत्र में कहे

इत एत उदारुहन् दिवस्पृष्ठान्यारुहन्. प्र भूर्जयो यथा पथा द्यामाङ्गिरसो ययुः (६१) दाह संस्कार करने वाले पुरुषों ने मृतक को पृथ्वी से उठा कर अरथी पर रखा और आकाश के उपभोग योग्य स्थानों पर चढ़ा दिया. पृथ्वी को जीतने वाले आंगिरस जिस मार्ग से गए हैं, उसी मार्ग से इसे भी आकाश में पहुंचा दिया. (६१) सूक्त-२ देवता—यम तथा मंत्र में कहे गए यमाय सोमः पवते यमाय क्रियते हविः. यमं ह यज्ञो गच्छत्यग्निदूतो अरंकृतः.. (१) यज्ञ में यम के लिए सोम को पवित्र किया जाता है. यम के लिए हवि दी जाती है. नाना प्रकार के द्रव्यों से सुशोभित किया गया यज्ञ अग्नि को दूत बना कर यम के पास जाता है. ये ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ यम को प्राप्त होते हैं. (१) यमाय मधुमत्तमं जुहोता प्र च तिष्ठत. इदं नम ऋषिभ्यः पूर्वजेभ्यः पूर्वेभ्यः पथिकृद्भ्यः.. (२) हे यजमानो! यम के लिए सोम, घृत आदि की आहुति दो. पूर्व पुरुषों तथा मंत्र द्रष्टा अंगिरा आदि ऋषियों के लिए नमस्कार हैं. (२) यमाय घृतवत् पयो राज्ञे हविर्जुहोतन. स नो जीवेष्वा यमेद् दीर्घमायुः प्र जीवसे.. (३) हे यजमानो! घृत से युक्त क्षीर रूप हवि यम के लिए अर्पण करो. वे हवि पा कर हमें जीवित मनुष्यों में रखेंगे और सौ वर्ष की आयु प्रदान करेंगे. (३) मैनमग्ने वि दहो माभि शूशुचो मास्य त्वचं चिक्षिपो मा शरीरम्. शृतं यदा करसि जातवेदो ऽ थेमेनं प्र हिणुतात् पितृंरुप.. (४) हे अग्नि! इस प्रेत को भस्म मत करो; इस की त्वचा को अन्यत्र मत फेंको. इस के लिए शोक भी मत करो. जब तुम इस हवि रूप शरीर को पका लो, तब इसे रक्षा के लिए पितरों को दो. इस प्रेत की आत्मा पितृलोक में चली जाए. (४) यदा शृतं कृणवो जातवेदो ऽ थेममेनं परि दत्तात् पितृभ्यः. यदो गच्छात्यसुनीतिमेतामथ देवानां वशनीर्भवाति.. (५) हे जातवेद अग्नि! जब तू इस प्रेत को पूरी तरह भस्म कर दे, तब इसे पितरों के लिए ebook converter DEMO Watermarks*

सौंप दे. जब इस के प्राण निकल जाते हैं, तब यह प्रेत देवों के वश में हो जाता है. (५) त्रिकद्रुकेभिः पवते षडुर्वीरिकमिद् बृहत्. त्रिष्टुब् गायत्री छन्दांसि सर्वा ता यम आर्पिता.. (६) यह सब का नियंत्रण करने वाला तथा महान यम कद्रुक नाम के तीन यंत्रों से छह उर्वियों को प्राप्त होता है. त्रिष्टुप, गायत्री आदि छंद सब का नियंत्रण करने वाले परमात्मा में स्थित हैं. (६) सूर्य चक्षुषा गच्छ वातमात्मना दिवं च गच्छ पृथिवीं च धर्मभिः. अपो वा गच्छ यदि तत्र ते हितमोषधीषु प्रति तिष्ठा शरीरैः.. (७) हे प्रेत! तू नेत्र द्वार से सूर्य को प्राप्त हो. तू आत्मा के द्वारा वायु को प्राप्त हो तथा वन्य इंद्रियों से आकाश और पृथ्वी को प्राप्त हो तथा अंतरिक्ष और जल को प्राप्त हो. यदि इन स्थानों में जाने की तेरी इच्छा हो तो जा अथवा ओषधि आदि में प्रविष्ट हो जा. (७) अजो भागस्तपसस्तं तपस्व तं ते शाचिस्तपतु तं ते अर्चिः. यास्ते शिवास्तन्वो जातवेदस्ताभिर्वहैनं सुकृतामु लोकम्.. (८) हे अग्नि! इस प्रेत का जो जन्म न लेने वाला भाग अर्थात् आत्मा है, उसे तुम अपने तप से संतप्त करो. तेरी दीप्त होती हुई ज्वाला इस प्रेत की आत्मा को तपाए. हे जातवेद अग्नि! तेरा जो ज्वलारूपी कल्याणकारी शरीर है, उस के द्वारा इस प्रेत की आत्मा को उत्तम कर्म करने वालों के लोक में ले जा. (८) यास्ते शोचयो रंहयो जातवेदो याभिरापृणासि दिवमन्तरिक्षम्. अजं यन्तमनु ताः समृण्वतामथेतराभिः शिवतमाभिः शृतं कृधि.. (९) हे जातवेद अग्नि! तेरा जो ज्वलारूपी शरीर है, उस से तू द्युलोक तथा अंतरिक्ष लोक व्याप्त करता है. तेरा ज्वलारूपी शरीर द्युलोक को जाती हुई इस प्रेत की आत्मा के पीछे जाए तथा दूसरे कल्याणकारी शरीरों के पीछे रह गई इस प्रेत की मृत देह को पूरी तरह जला दे. (९) अव सृज पुनरग्ने पितृभ्यो यस्त आहुतश्चरति स्वधावान्. आयुर्वसान उप यातु शेषः सं गच्छतां तन्वा सुवर्चाः.. (१०) हे अग्नि! हवि के रूप में जो प्रेत तुम्हें दिया गया है तथा हमारे प्रति स्वधा से संपन्न हो कर तुम्हारे द्वारा जलाया जा रहा है, उसे तुम पितृलोक के लिए छोड़ दो. उस का पुत्र आयु से संपन्न होता हुआ अपने घर को लौटे. यह प्रेत सुंदर शक्ति वाला तथा पितृलोक में निवास करने वाला हो. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

अति द्रव श्वानौ सारमेयौ चतुरक्षौ शबलौ साधुना पथा. अधा पितृन्त्सुविदत्राँ अपीहि यमेन ये सधमादं मदन्ति.. (११) हे प्रेत! तू पितृलोक को जाने वाला है. तू सरमा नाम की देवों की कुतिया के श्याम और शबल नाम वाले दोनों पुत्रों के साथ प्रसन्न रहने वाले एवं हव्य संपन्न पितरों के पास पहुंचे. (११) यौ ते श्वानौ यम रक्षितारौ चतुरक्षौ पथिषदी नृचक्षसा. ताभ्यां राजन् परि धेह्येनं स्वस्त्यस्मा अनमीवं च धेहि.. (१२) हे पितरों के प्रभु! पितर मार्ग में स्थित चार नेत्रों वाले जो कुत्ते यमपुर की रक्षा करने के हेतु तुम्हारे द्वारा नियुक्त किए गए हैं, इस प्रेत की रक्षा के लिए उन्हें सौंप दो. यह तुम्हारे लोक में रहने को आया है. इसे बाधा रहित स्थान दो. (१२) उरूणसावसुतृपावुदुम्बलौ यमस्य दूतौ चरतो जनाँ अनु. तावस्मभ्यं दृशये सूर्याय पुनर्दातामसुमद्येह भद्रम्.. (१३) बड़ीबड़ी नाक वाले प्राणियों के प्राणों से तृप्ति को प्राप्त हुए तथा प्राणों का अपहरण करने वाले महाबली यमदूत सभी जगह घूमते हैं. ये दोनों दूत सूर्य दर्शन के निमित्त पांच इंद्रियों वाले प्राण को हमारे शरीर में पुनः स्थापित करें. (१३) सोम एकेभ्यः पवते घृतमेक उपासते. येभ्यो मधु प्रधावति तांश्चिदेवापि गच्छतात्.. (१४) कुछ पितरों के लिए नदी के रूप में सोमरस बहता है. अन्य पितर घृत का उपभोग करते हैं. ब्रह्म याग में अथर्ववेद के मंत्रों का पाठ करने वालों के लिए मधु अर्थात् शहद की नदी है. हे मृतात्मा को प्राप्त प्रेत! तू उन सब को प्राप्त हो. (१४) ये चित् पूर्व ऋतसाता ऋतजाता ऋतावृधः. ऋषीन् तपस्वतो यम तपोज़ाँ अपि गच्छतात्.. (१५) जो पूर्व पुरुष सत्य से युक्त थे, जो साम से उत्पन्न हो कर सत्य की वृद्धि करते थे, हे यम के निमित्त पुरुष! उन तपोबल वाले ऋषियों को तू प्राप्त हो. (१५) तपसा ये अनाधृष्यास्तपसा ये स्वर्ययुः. तपो ये चक्रिरे महस्तांश्चिदेवापि गच्छतात्.. (१६) तप के द्वारा, यज्ञ आदि साधनों के द्वारा, दुष्कर कर्म और उपासना के द्वारा महान तप करते हुए जो पुरुष पुण्य लोकों को जाते हैं, हे पुरुष! तू उन तपस्वियों के लोकों को जा. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*

ये युध्यन्ते प्रधनेषु शूरासो ये तनूत्यजः. ये वा सहस्रदक्षिणास्तांश्चिदेवापि गच्छतात्.. (१७) जो वीर पुरुष युद्धों में शत्रुओं पर प्रहार करते हैं, जो रणक्षेत्र में शरीर का त्याग करते हैं तथा जो अन्न, दक्षिणा आदि वाले यज्ञों को पूर्ण करते हैं, उन्हें जो फल प्राप्त है, तू उन सभी फलों को प्राप्त कर. (१७) सहस्रणीथाः कवयो ये गोपायन्ति सूर्यम्. ऋषीन् तपस्वतो यम तपोजाँ अपि गच्छतात्.. (१८) जो अनंत द्रष्टा ऋषि सूर्य की रक्षा करते हैं, हे पुरुष! तू यम के पास ले जाने वाला हो कर उन तपस्वी ऋषियों के कर्म फल को प्राप्त कर. (१८) स्योनास्मै भव पृथिव्यनृक्षरा निवेशनी. यच्छास्मै शर्म सप्रथाः.. (१९) हे वेदी रूपिणी पृथ्वी! तू मरने वाले पुरुष के लिए कंटकहीन बन जा तथा इसे सभी प्रकार का सुख प्रदान कर. (१९) असंबाधे पृथिव्या उरौ लोके नि धीयस्व. स्वधा याश्चकृषे जीवन् तास्ते सन्तु मधुश्चतः.. (२०) हे मरने वाले पुरुष! तू यज्ञ आदि की वेदी के विस्तृत स्थान में प्रतिष्ठित हो. पहले तू ने जिन उत्तम हवियों को दिया है, वे तुझे मधु आदि रसों के रूप में प्राप्त हों. (२०) ह्वयामि ते मनसा मन इहेमान् गृहाँ उप जुजुषाण एहि. सं गच्छस्व पितृभिः सं यमेन स्योनास्त्वा वाता उप वान्तु शग्माः.. (२१) हे प्रेत पुरुष! मैं अपने मन के द्वारा तेरे मन को इस लोक में बुलाता हूं. जिन घरों में तेरे लिए और्ध्वदैहिक अर्थात् देह त्याग के बाद का कर्म किया जाता है, तू हमारे उन घरों में जा तथा संस्कार के बाद पिता, पितामह, प्रपितामह आदि के साथ सपिण्डीकरण की विधि के अनुसार मिल. यम के पास पहुंचा हुआ तू पितृलोक में जा कर श्रम को दूर करने वाली वायु को प्राप्त कर. (२१) उत् त्वा वहन्तु मरुत उदवाहा उदप्रुतः. अजेन कृण्वन्तः शीतं वर्षेणोक्षन्तु बालिति.. (२२) हे प्रेत! मरुद्गण तुझे व्योम में धारण करें. वायु तुझे ऊर्ध्वलोक में पहुंचाए. जल को धारण करने वाले तथा वर्षा करने वाले मेघ समीप में भी अज अर्थात् अजन्मा आत्मा सहित तुझे वर्षा के जल से सींचें. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*

उदह्रमायुरायुषे क्रत्वे दक्षाय जीवसे. स्वान् गच्छतु ते मनो अधा पितँरुप द्रव.. (२३) हे प्रेत! प्राणन अर्थात् सांस लेने और अपानन अर्थात् अपान वायु छोड़ने के व्यापार अर्थात् कार्य के लिए मैं तेरी आयु का आह्वान करता हूं. तेरा मन संस्कार से उत्पन्न नवीन शरीर को प्राप्त हो. इस के बाद तू पितरों के समीप पहुंच. (२३) मा ते मनो मासोर्माङ्गानां मा रसस्य ते. मा ते हास्त तन्व १: किं चनेह.. (२४) हे प्रेत! तेरा मन और तेरी इंद्रियां तेरा त्याग न करें. तेरे प्राण के किसी अंश का क्षय न हो. तेरे शरीर के अंगों में किसी प्रकार का विकार न हो. तेरे शरीर में रुधिर रस आदि भी पूरी मात्रा में रहें. तेरा कोई भी भाग तुझ से अलग न हो. (२४) मा त्वा वृक्षः सं बाधिष्ट मा देवी पृथिवी मही. लोकं पितृषु वित्त्वैधव्व यमराजसु.. (२५) हे प्रेत! तू जिस वृक्ष के नीचे बैठे, वह तुझे व्यथित न करे. तू जिस धरती का आश्रय ले, वह भी तुझे पीड़ा न पहुंचाए. तू यम की प्रजा रूप पितरों के स्थान पर जा कर वृद्धि प्राप्त कर. (२५) यत् ते अङ्गमतिहासितं पराचैरपानः प्राणो य उ वा ते परेतः. तत् ते संगत्यू पितरः सनीडा घासाद् घासं पुनरा वेशयन्तु.. (२६) हे प्रेत! तेरा जो अंग तेरे शरीर से अलग हो गया था, जो प्राण वापस न होने के लिए तेरे शरीर से निकल गए थे, उन सब को एक स्थान पर स्थित पितर तुझे एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रविष्ट करें. (२६) अपेमं जीवा अरुधन् गृहेभ्यस्तं निर्वहत परि ग्रामादितः. मृत्युर्यमस्यासीद् दूतः प्रचेता असून् पितृभ्यो गमयां चकार.. (२७) हे जीवित बंधुओ! इस प्रेत को घर से ले जाओ. उसे उठा कर ग्राम से बाहर ले जाओ. यम के दूत रूप मृत्यु ने इस के प्राणों को पितर के रूप में करने के लिए ले लिया है. (२७) ये दस्यवः पितृषु प्रविष्टा ज्ञातिमुखा अहुतादश्चरन्ति. परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टानस्मात् प्र धमाति यज्ञात्.. (२८) जो राक्षसों के समान पिता, पितामह आदि पितरों में मिल कर बैठ जाते हैं, माया कर के हवि का भक्षण करते हैं तथा पिंडदान करने वाले पुत्रों और पौत्रों की हिंसा करते हैं, उन मायावी राक्षसों को पितृयाग से अग्नि देव बाहर निकालें. (२८) ebook converter DEMO Watermarks*

सं विशन्त्विह पितरः स्वा नः स्योनं कृण्वन्तः प्रतिरन्त आयुः. तेभ्यः शकेम हविषा नक्षमाणा ज्योग् जीवन्तः शरदः पुरूचीः. (२९) हमारे गोत्र में उत्पन्न पिता, पितामह आदि सभी पितर भलीभांति यज्ञ में आ कर बैठें तथा हमें सुखी बनाएं. वे हमारी आयु की वृद्धि करें. हम भी आयु प्राप्त कर के हवियों द्वारा पितरों को पूजते हुए चिरकाल तक जीवित रहें. (२९) यां ते धेनुं निपृणामि यमु ते क्षीर ओदनम्. तेना जनस्यासो भर्ता यो ऽ त्रासदजीवनः. (३०) हे प्रेत! मैं तेरे निमित्त गोदान करता हूं. मैं तेरे लिए दूध से बना जो भात देता हूं, उस के द्वारा तू यमलोक में अपने जीवन को पुष्ट करने वाला हो. (३०) अश्वावतीं प्र तर या सशेवार्क्षाकं वा प्रतरं नवीयः. यस्त्वा जघान वध्यः सो अस्तु मा सो अन्यद् विदत् भागधेयम्.. (३१) हे प्रेत! मैं नए वन मार्ग में रीछ आदि दुष्ट पशुओं से बचता हुआ पार हो जाऊं. तू हमें अश्वावती नदी के उस पार उतार दे. यह नदी हमें सुख देने वाली हो. जिस ने तेरा वध किया है, वह वध के योग्य होता हुआ उपभोग के योग्य पदार्थ न पा सके. (३१) यमः परो ऽ वरो विवस्वान् ततः परं नाति पश्यामि किं चन. यमे अध्वरो अधि मे निविष्टो भुवो विवस्वानन्वाततान.. (३२) सूर्य के पुत्र यम अपने पिता से भी अधिक तेजस्वी हैं. मैं किसी भी प्राणी को यम से श्रेष्ठ नहीं पाता हूं. तेरा यज्ञ उन श्रेष्ठ यम में व्याप्त हो रहा है. यज्ञ की सिद्धि के लिए ही सूर्य ने भूखंडों को विस्तृत किया है. (३२) अपागूहन्नमृतां मर्त्येभ्यः कृत्वा सवर्णांमदधुर्विवस्वते. उताश्विनावभरद् यत् तदासीदजहादु द्वा मिथुना सरण्यूः. (३३) मरणधर्मा मनुष्यों से देवताओं ने अपनेअपने अविनाशी रूप अदृश्य कर लिए. उन्होंने सूर्य को अन्य वर्ण वाली स्त्री बना कर दी. सरण्यु ने घोड़ी का रूप धारण कर के अश्विनीकुमारों का पालन किया. त्वष्टा की पुत्री सरण्यु ने सूर्य का घर छोड़ते समय यमयमी के जोड़े को घर पर ही छोड़ा था. (३३) ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिताः. सर्वांस्तानग्न आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे.. (३४) जो पिता भूमि में गाड़े जा कर, जो काठ के समान त्यागे जा कर तथा जो अग्नि दाह के संस्कार के द्वारा ऊपर स्थित पितृलोक को प्राप्त हुए हैं, इस प्रकार के पितरो! हवि भक्षण के ebook converter DEMO Watermarks*

लिए यहां आओ. (३४) ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते. त्वं तान् वेत्थ यदि ते जातवेदः स्वधया यज्ञं स्वधितिं जुषन्ताम्.. (३५) जो पितर अग्नि के द्वारा संस्कृत हुए, जो गाड़ने आदि के द्वारा संस्कृत हुए और जो पिंड, पितृयाग आदि से तृप्त हुए आकाश में निवास करते हैं, हे अग्नि! तुम उन्हें भलीभांति जानते हो. वे अपनी संतानों के द्वारा किए जाने वाले पितृयाग आदि का सेवन करें. (३५) शं तप माति तपो अग्ने मा तन्वं १ तपः. वनेषु शुष्मो अस्तु ते पृथिव्यामस्तु यद्धरः.. (३६) हे अग्नि! इस प्रेत के शरीर को अधिक मत जलाओ. जिस प्रकार इसे सुख मिले, वैसा करो. शोषण करने वाली तुम्हारी ज्वालाएं जंगल में जाएं तथा रस का हरण करने वाला तेज पृथ्वी में रहे. तुम हमारे शरीरों को भस्म मत करो. (३६) ददाम्यस्मा अवसानमेतद् य एष आगन् मम चेहभूदिह. यमश्चिकित्वान् प्रत्येतदाह ममैष राय उप तिष्ठतामिह.. (३७) यम का वचन—यह आया हुआ पुरुष मेरा हो तो मैं उसे स्थान दूं. अब यह मेरे पास आया है. यदि यह मेरा स्तवन करता रहे तो यहां रह सकता है. (३७) इमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (३८) हम इस श्मशान को नापते हैं, क्योंकि ब्रह्मा ने हमें सौ वर्ष की आयु प्रदान की है. इसलिए बीच में ही श्मशान हमें अपने कर्म के द्वारा प्राप्त न हो. (३८) प्रेमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (३९) हम इस श्मशान को अच्छी प्रकार नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच में ही श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (३९) अपेमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४०) हम इस श्मशान के नाप संबंधी दोषों को हटाते हुए नापते हैं, जिस से हमें सौ से पहले बीच में ही दूसरा मृतक कर्म प्राप्त न हो. (४०) वी ३ मां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४१) ebook converter DEMO Watermarks*

हम इस श्मशान भूमि को विशेष प्रकार से नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच में ही दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४१) निरिमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४२) हम दोष रहित करते हुए इस श्मशान को नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच में ही दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४२) उदिमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४३) उत्कृष्ट साधन वाली नाप से हम इस श्मशान को नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच में ही दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४३) समिमां मात्रां मिमीमहे यथापरं न मासातै. शते शरत्सु नो पुरा.. (४४) इस श्मशान भूमि को हम भलीभांति नापते हैं, जिस से हमें सौ वर्ष से पहले बीच में ही दूसरा श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४४) अमासि मात्रां स्व रगामायुष्मान् भूयासम्. यथापरं न मासातै शते शरत्सु नो पुरा.. (४५) मैं ने श्मशान की भूमि को नाप लिया है, उसी नाप के द्वारा मैं इस प्रेत को स्वर्ग भेज चुका हूं. उस कर्म से ही मैं सौ वर्ष की आयु प्राप्त करूं तथा सौ वर्ष से पहले बीच में ही मुझे अन्य श्मशान कर्म प्राप्त न हो. (४५) प्राणो अपानो व्यान आयुश्चक्षुर्द्दशये सूर्याय. अपरिपेरेण पथा यमराज्ञः पितॄन् गच्छ.. (४६) प्राण, अपान, व्यान, आयु तथा चक्षु—सब आदित्य के दर्शन करने वाले हों. हे पुरुष! तू भी यमराज के प्रत्यक्ष मार्ग के द्वारा पितरों को प्राप्त हो. (४६) ये अग्रवः शशमानाः परेयुर्हित्वा द्वेषांस्यनपत्यवन्तः. ते द्यामुरुदित्याविदन्त लोकं नाकस्य पृष्ठे अधि दीध्यानाः.. (४७) जो पितर संतान रहित होने पर भी पापों का त्याग करते हुए परलोक में गए, वे अंतरिक्ष को लांघ कर स्वर्ग के ऊपरी भाग में निवास करते हैं तथा पुण्य का फल प्राप्त करते हैं. (४७) उदन्वती द्यौरवमा पीलुमतीति मध्यमा. तृतीया ह प्रद्यौरिति यस्यां पितर आस्ते.. (४८) सब से नीचे उदंचती नाम का द्युलोक है, जिस में जल रहता है. उस के ऊपर अर्थात् ebook converter DEMO Watermarks*

बीच में पीलुमती नाम का द्युलोक है, जिस में नक्षत्र आदि रहते हैं. सब से ऊपर तीसरा प्रद्यौ नाम का द्युलोक है, जिस के इसी तीसरे भाग में पितर निवास करते हैं. (४८) ये नः पितुः पितरो ये पितामहा य आविविशुरुर्व १ न्तरिक्षम्. य आक्षियन्ति पृथिवीमुत द्यां तेभ्यः पितृभ्यो नमसा विधेम.. (४९) हमारे पिता के जन्मदाता पितर, पितामह के जन्मदाता पितर, वे पितर जो विशाल अंतरिक्ष में प्रविष्ट हुए हैं तथा जो पितर स्वर्ग अथवा पृथ्वी पर निवास करते हैं, हम इन सभी लोकों में निवास करने वाले पितरों का नमस्कारों के द्वारा पूजन करते हैं. (४९) इदमद् वा उ नापरं दिवि पश्यसि सूर्यम्. माता पुत्रं यथा सिचाभ्ये नं भूम ऊर्णुहि.. (५०) हे मृतक! हम श्राद्ध आदि में जो कुछ देते हैं, वही तेरा जीवन है. तेरे जीवन का अन्य कोई साधन नहीं है. इस श्मशान को प्राप्त हुआ तू सूर्य के दर्शन करता है. हे पृथ्वी! जिस प्रकार माता अपने पुत्र को आंचल से ढकती है. उसी प्रकार तुम इस मृतक को अपने तेज से ढक लो. (५०) इदमद् वा उ नापरं जरस्यन्यदितो ऽ परम्. जाया पतिमिव वाससाभ्ये नं भूम ऊर्णुहि.. (५१) जीर्ण होते हुए इस शरीर ने जो भोजन किया था, उस के अतिरिक्त इस के लिए कुछ भी अनुकूल नहीं है. इस के लिए इस श्मशान के अतिरिक्त कोई अन्य स्थान भी नहीं है. हे भूमि! श्मशान को प्राप्त हुए पितर को तुम उसी प्रकार ढक लो, जिस प्रकार पत्नी वस्त्र से अपने पति को ढकती है. (५१) अभि त्वोर्णोमि पृथिव्या मातुरुस्त्रेण भद्रया. जीवेषु भद्रं तन्मयि स्वधा पितृषु सा त्वयि. (५२) हे मृतक! सब की मंगलमयी माता पृथ्वी के वस्त्र से मैं तुझे ढकता हूं. जीवित अवस्था में दान करने के लिए जो सुंदर वस्तु प्राणी के पास होती है, वह मुझ संस्कार करने वाले के पास हो. स्वधाकार जो अन्न पितरों में होता है, वह तुझ में हो. (५२) अग्नीषोमा पथिकृता स्योनं देवेभ्यो रत्नं दधथुर्वि लोकम्. उप प्रेष्यन्तं पूषणं यो वहात्यज्ज्योयानैः पथिभिस्तत्र गच्छतम्.. (५३) हे अग्नि एवं सोम! तुम पुण्यलोक के मार्ग का निर्माण करते हो. तुम ने सुख देने वाले स्वर्गलोक की रचना की है. जो लोक सूर्य को अपने में धारण करता है, इस प्रेत को सरल मार्गों द्वारा उस लोक में पहुंचाओ. (५३) ebook converter DEMO Watermarks*

पूषा त्वेतश्च्यावयतु प्र विद्वाननष्टपशुर्भुवनस्य गोपाः. स त्वैतेभ्यः परि ददत् पितृभ्योऽग्निर्देवेभ्यः सुविदत्रियेभ्यः.. (५४) हे प्रेत! पशुओं की हिंसा न करने वाले पशुपालक पूषा तुझे यहां से उस स्थानों से ले जाएं. प्राणियों की रक्षा करने वाले ये दोनों तुझे पितरों को अर्पण करें. अग्नि देव तुझे ऐश्वर्य वाले देवताओं को सौंपें. (५४) आयुर्विश्वायुः परि पातु त्वा पूषा त्वा पातु प्रपथे पुरस्तात्. यत्रासते सुकृतो यत्र त ईयुस्तत्र त्वा देवाः सविता दधातु.. (५५) जीवन का अभिमानी देवता आयु तेरा रक्षक हो. पूषा देव तेरे उस मार्ग की रक्षा करें जो पूर्व की ओर जाता हो. हे प्रेत! पुण्य आत्माओं के निवास रूप स्वर्ग में सविता देव तुझे पहुंचाएं. (५५) इमौ युनज्मि ते वह्नी असुनीताय वोढवे. ताभ्यां यमस्य सादनं समितींश्चाव गच्छतात्.. (५६) हे मृतक! भार ढोने वाले इन बैलों को मैं तेरे लिए छोड़ रहा हूं. मैं इन्हें प्राणों का वहन करने के लिए बैलगाड़ी में जोड़ता हूं. बैलों से युक्त इस गाड़ी के द्वारा तू यम के घर को प्राप्त हो. (५६) एतत् त्वा वासः प्रथमं न्वागन्नपैतदूह यदिहाबिभः पुरा. इष्टापूर्तमनुसंक्राम विद्वान् यत्र ते दत्तं बहुधा विबन्धुषु.. (५७) हे मृतक! तू अपने पहने हुए मुख्य वस्त्र को त्याग. जिन इच्छाओं की पूर्ति के लिए तूने अपने बांधवों को धन दिया था, उस इष्ट कर्म के फल के रूप बावड़ी, कुआं, तालाब आदि को प्राप्त हो. (५७) अग्नेर्वर्म परि गोभिर्व्ययस्व सं प्रोर्णुष्व मेदसा पीवसा च. नेत् त्वा धृष्णुर्हरसा जर्हृषाणो दधृग् विधक्षन् परीङ्खयातै.. (५८) हे प्रेत! इंद्रियों संबंधी अवयवों से तू अग्नि का पाप निवारक कवच पहन. अपने भीतर विद्यमान स्थूल चरबी से ये अग्नि तुझे अधिक भस्म करने की इच्छा रखते हुए इधरउधर न गिराएं. (५८) दण्डं हस्तादाददानो गतासोः सह श्रोत्रेण वर्चसा बलेन. अत्रैव त्वमिह वयं सुवीरा विश्वा मृधो अभिमातीर्जयेम.. (५९) ब्राह्मण के हाथ से बांस के दंड को ग्रहण करता हुआ मैं कानों के तेज तथा उस से प्राप्त बल से युक्त रहूं. हे प्रेत! तू इस चिता में ही रह. हम इस पृथ्वी पर सुख से रहते हुए अपने

सूक्त-३ देवता—यम

शत्रुओं तथा उन के उपद्रवों को दबाएं. (५९) धनुर्हस्तादाददानो मृतस्य सह क्षत्रेण वर्चसा बलेन. समागृभाय वसु भूरि पुष्टमर्वाङ् त्वमेह्युप जीवलोकम्.. (६०) मृतक क्षत्रिय के हाथ से धनुष ग्रहण करता हुआ मैं तेज और बल से युक्त होऊं. हे धनुष! तू इस जीवित लोक में ही हमारे सामने आ तथा हमें देने के लिए धन ला. (६०) सूक्त-३ देवता—यम इयं नारी पतिलोकं वृणाना नि पद्यत उप त्वा मर्त्य प्रेतम्. धर्मं पुराणमनुपालयन्ती तस्यै प्रजां द्रविणं चेह धेहि.. (१) यह स्त्री धर्म का पालन करने के लिए तेरे दान आदि की इच्छा करती हुई तेरे समीप आती है. इस प्रकार तेरा अनुकरण करने वाली इस स्त्री को तू अगले जन्म में भी संतान वाली बनाना. (१) उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि. हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ.. (२) हे नारी! तू इस प्राणहीन पति के पास बैठी है. अब तू इस के पास से उठ. तू अपने पति से उत्पन्न हुए पुत्र, पौत्र आदि को प्राप्त हो गई है. (२) अपश्यं युवतिं नीयमानां जीवां मृतेभ्यः परिणीयमानाम्. अन्धेन यत् तमसा प्रावृतासीत् प्राक्तो अपाचीमनयं तदेनाम्.. (३) मैं तरुण अवस्था वाली जीवित गौ को मृतक के समीप ले जाई जाती हुई देखता हूं. यह भी अज्ञान से ढकी हुई है, इसलिए मैं इसे शव के पास से हटा कर अपने सामने लाता हूं. (३) प्रजानत्यघ्न्ये जीवलोकं देवानां पन्थामनुसंचरन्ती. अयं ते गोपतिस्तं जुषस्व स्वर्गं लोकमधि रोहयैनम्.. (४) हे गौ! तू पृथ्वीलोक को भलीभांति जानती तथा यज्ञ मार्ग को देखती है. तू दूध, दही आदि से युक्त हो कर जा. तू अपने उस स्वामी का सेवन कर जो गायों का स्वामी है. तू इस मृतक को स्वर्ग की प्राप्ति करा. (४) उप द्यामुप वेतसमवत्तरो नदीनाम्. अग्ने पित्तमपामसि.. (५) जल में उगी हुई काई और बेंत में जल का सार अंश है जो उन का रक्षक है. हे अग्नि! तू जल संबधी पित्त है. इसलिए मैं तुझे बेंत की शाखा, नदी के फेन और दूब आदि से शांत ebook converter DEMO Watermarks*

करता हूं. (५) यं त्वमग्ने समदहस्तमु निर्वापया पुनः. क्याम्बूरत्र रोहतु शाण्डदूर्वा व्यल्कशा.. (६) हे अग्नि! जिस पुरुष को तुम ने भस्म किया है, उसे सुखी करो. इस स्थान पर दुःखनाशक दूब घास उग सके, उस के लिए यहां कितना जल डालना चाहिए? (६) इदं त एकं पर ऊ त एकं तृतीयेन ज्योतिषा सं विशस्व. संवेशने तन्वा ३ चारुरेधि प्रियो देवानां परमे सधस्थे.. (७) हे प्रेत! यह गार्हपत्य अग्नि तुझे परलोक पहुंचाने वाली ज्योति है. न रुकने वाली पवन दूसरी तथा आहवनीय अग्नि तीसरी ज्योति है. तू आहवनीय अग्नि से मिल तथा अग्नि में प्रवेश करने के कारण देव शरीर को प्राप्त कर के बढ़. इस के बाद तू इंद्र आदि देवताओं का प्रिय पात्र होगा. (७) उत्तिष्ठ प्रेहि प्र द्रवौकः कृणुष्व सलिले सधस्थे. तत्र त्वं पितृभिः संविदानः सं सोमेन मदस्व सं स्वधाभिः.. (८) हे प्रेत! तू इस स्थान से उठ और चल. शीघ्रता से चलता हुआ तू अंतरिक्ष को अपना निवास स्थान बना तथा पितरों से मिल कर सोमरस का पान करता हुआ हर्षित हो. (८) प्र च्यवस्व तन्वं १ सं भरस्व मा ते गात्रा वि हायि मो शरीरम्. मनो निविष्टमनुसंविशस्व यत्र भूमेर्जुषसे तत्र गच्छ.. (९) हे प्रेत! तू अपने शरीर के सब अंगों को एकत्र कर. तेरा कोई भी अंग यहां न छूट जाए. तेरा मन जिन स्वर्ग आदि स्थानों में रमा है, तू वहां प्रवेश कर. तू जिस भूमि से प्रेम करता है, उसी भूमि को प्राप्त हो. (९) वर्चसा मां पितरः सोम्यासो अञ्जन्तु देवा मधुना घृतेन. चक्षुषे मा प्रतरं तारयन्तो जरसे मा जरदृष्टिं वर्धन्तु.. (१०) सोमरस पीने के अधिकारी पितर मुझे तेजस्वी बनाएं. विश्वे देव मुझे मधुर घृत से युक्त करें. मैं दीर्घकाल तक देखता रहूं, इसलिए तू मुझे रोगों से मुक्त करते हुए बढ़. (१०) वर्चसा मां समनक्त्वग्निर्मेधां मे विष्णुर्न्य नक्त्वासन्. रयिं मे विश्वे नि यच्छन्तु देवाः स्योना मापः पवनैः पुनन्तु.. (११) अग्नि देव मुझे तेजस्वी बनाएं तथा विष्णु मेरे मुख में बुद्धि को भलीभांति स्थापित करें. विश्वे देव मुझे सुख देने वाले धन का स्वामी बनाएं. जल अपने शुद्ध साधन वायु के द्वारा मुझे ebook converter DEMO Watermarks*

पवित्र करें. (११) मित्रावरुणा परि मामधातामादित्या मा स्वरवो वर्धयन्तु. वर्चो म इन्द्रो न्यनक्तु हस्तयोरूर्जरदष्टिं मा सविता कृणोतु.. (१२) दिवस के अभिमानी देवता मित्र अर्थात् सूर्य तथा रात्रि के अभिमानी देव वरुण मुझे वस्त्र आदि प्रदान करें. आदित्य देव हम सब की वृद्धि करते हुए हमारे शत्रुओं को संतप्त बनाएं. इंद्र मुझे भुजाओं का बल दें तथा सविता मुझे दीर्घ आयु वाला बनाएं. (१२) यो ममार प्रथमो मर्त्यानां यः प्रेयाय प्रथमो लोकमेतम्. वैवस्वतं संगमनं जनानां यमं राजानं हविषा सपर्यत.. (१३) यम मरणधर्मा मनुष्यों में उत्पन्न हुए थे. सब से पहले उन्हीं की मृत्यु हुई थी. इस के पश्चात ये दूसरे लोक में पहुंचे. यम सूर्य के पुत्र हैं. सभी प्राणी मृत्यु के पश्चात इन्हीं के पास जाते हैं. हे ऋत्विजो! इन यम का पूजन करो जो सब को पाप और पुण्य के अनुसार फल देते हैं. (१३) परा यात पितर आ च यातायं वो यज्ञो मधुना समक्तः. दत्तो अस्मभ्यं द्रविणेह भद्रं रयिं च नः सर्ववीरं दधात.. (१४) हे पितरो! तुम हमारे पितृयाग नामक कर्म से संतुष्ट हो कर अपने स्थान की ओर जाओ. हम जब तुम्हारा पुनः आह्वान करें, तब आना. हम ने तुम्हें मधु और घृत से युक्त यज्ञ दिया है. तुम इस यज्ञ को स्वीकार कर के हमारे घर में मंगलमय ऐश्वर्य तथा पुत्रों, पौत्रों, पशुओं आदि को स्थापित करो. (१४) कण्वः कक्षीवान् पुरुमीढो अगस्त्यः श्यावाश्वः सोभर्यर्चननाः. विश्वामित्रो ऽ यं जमदग्निरत्रिरवन्तु नः कश्यपो वामदेवः.. (१५) पूजा के योग्य कण्व, कक्षीवान, पुरुमीढ, अगस्त्य, श्यावाश्व, सौभरि, विश्वामित्र, जमदग्नि, अग्नि, कश्यप तथा वामदेव नाम वाले अनेक ऋषि हमारे रक्षक हैं. (१५) विश्वामित्र जमदग्ने वसिष्ठ भरद्वाज गोतम वामदेव. शर्द्दिनों अत्रिरग्रभीन्नमोभिः सुसंशासः पितरो मृडता नः.. (१६) हे विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ, भारद्वाज, गौतम, वामदेव नामक महर्षियो! तुम हमें सुख प्रदान करो. महर्षि अत्रि ने हमारे घर रक्षा करना स्वीकार कर लिया है. हे पितरो! तुम हमारे नमस्कार आदि के द्वारा पूजने के योग्य हो. तुम भी हमें सुख प्रदान करो. (१६) कस्ये मृजाना अति यन्ति रिप्रमायुर्दधानाः प्रतरं नवीयः. आप्यायमानाः प्रजया धनेनाध स्याम सुरभयो गृहेषु.. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*