भारतकोश
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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

वायोविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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प्रकृतिभूतस्य खल्वस्य लोके चरतः कर्माणीमानि भवति । तद्यथा धरणी धारणं, ज्वलनोज्वालनम्, आदित्य-चन्द्रनक्षत्रग्रहगणानां संतानगतिविधानम्, सृष्टिश्च भेदानाम्, अपाविसर्गः, प्रवर्तनं स्रोतसम्, पुष्पफलानां चाभि-निर्वर्तनम्, उद्भेदनं चैन्द्रिदानाम्, कृतूनां प्रविभागः प्रविभागो धातूनाम्, धातुमानसंस्थानव्यक्तिः, बीजाभिसंस्कारः शस्यभिर्वर्द्धनमधिक्रिदोपशेषणे, अवैकारिकविकाराश्रयेति ।

प्रकृपितस्य खल्वस्य लोके चरतः कर्माणीमानि भवति । तद्यथा—शिखरि शिखरावमंथनम्, उन्मथनमनोकहानाम्, सागराणाम्, उद्भेदनं सरसाम्, प्रतिसरणमापगानाम्, उत्पीडनं आकंपनं च भूमेः, आधमनमंनुदानाम्, नीहारनिर्हीर्दपांशु-सिकतामस्त्यभेकरगक्षाररूधिराश्माशनिविसर्गः, भावानां चाभावकरणम्, चतुर्गुणांतकराणां भेद्यसूर्यानलानिलानां विसर्गः ।

आगे कांकायन के प्रजापति वाद में वायु के वैदिक विवेचन के साथ साथ इन अंशों का भी तौलनिक दृष्ट्या विवेचन होगा । सारांशः—

सहि भगवान्, प्रभवश्च अन्ययश्च भूतानाम् भावा-भावकरः, सुखासुखयोर्विधाता, मृत्युः, यमः, नियंता, प्रजापतिः, अदीतिः, विश्वकर्मा, विश्वरूपः, सर्वगः,

बार्योविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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प्रकृतिभूताः पुरुषमन्यापत्रेन्द्रियं बलवर्णसुलोपपन्नमायुषा महता उपपादयति, सन्ध्यगेवाऽऽचरिता धर्मार्यकांसा इव निःश्रेयसेन महता पुरुषमिहचामुष्मिन्न लोके, विकृतास्त्वेन महता विपर्य- येणोपपादयति ऋतवःक्षय इव विकृतिमापन्ना लोकमशुभेनो- पधातकाल इति ।

इस पर से यह बिलकुल स्पष्ट है कि इस परिपद में भारद्वाज को छोड़कर अन्य सब ऋषि, पंचात्मक लोकपक्षीय नहीं थे अपितु द्विधात्मक लोकपक्ष को त्रिधात्मक बनाने वाले थे । इसमें वातपित्तश्लेष्माओं के तात्विक स्वरूप पर विचार हुआ और उनका संबंध वायुअग्निसेमसंज्ञक जागतिक धर्मों के साथ प्रस्थापित किया गया । ये समस्त ऋषि गुर्विदि गुणों को प्रधान माननेवाले थे । इनमें कांकायन और पुनर्वसु आत्रेय आत्मा को स्वतःसिद्ध कहते थे और शेष सब ऋषि आत्मा और सत्व को रसज अथवा त्रिधातुज मानते थे । पुनर्वसु आत्रेय को (और कांकायन को भी) त्रिधात्वात्मक सिद्धांत यद्यपि स्वीकृत था तथापि सर्वांश में वे उससे सहमत नहीं थे । क्योंकि इसमें आत्मा या प्रजापति का स्वतः सिद्ध अस्तित्व नहीं माना जाता था, अतः उन्होंने अन्यत्रैकान्तिक 'वचनात्' कहकर अपने मत को सुरक्षित रक्खा ।

कुछ लोग दो बार्योविदों की कल्पना करते हैं पर वह कल्पना ही है । आगे चलकर हम देखेंगे कि इस त्रिधातु-

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आयुर्वेद-दर्शन

सिद्धांत का प्रजापतिवाद में और उसका भी पुनर्वसु आत्रेय के त्रिभागात्मक सिद्धांत में किस प्रकार समन्वय हुआ। अस्तु।

शारीरधातुओं का तीसरा वर्गीकरण प्रायः लक्षणस्कंध से संबंध रखता है। इसका अस्पष्ट आरंभ यद्यपि ‘वातादीनां रसादीनां मलानामोजसस्तथा’ (च. सू. अ. १७) इसमें दिखाई देता है तथापि उसका संशोधित रूप ‘दोष, धातु, मल, मूलं हि शरीरम्’ (सु. सू. अ. १५) इसीमें व्यक्त हुआ है। इसमें शारीरधातुओं के दोष, धातु और मल संज्ञक तीन प्रधान विभाग किये हैं।

हिरण्याक्ष कुशिक और षड्धातु वाद

वायोंविद के बाद हिरण्याक्ष ने कहा किः—

हिरण्याक्षस्तुनेत्याह नक्षात्मा रसजस्मृतः । नार्ताद्रियं मनः संति रोगाः शब्दादिजास्तथा ॥

अर्थात् रस को पुरुषरोगोत्पादक कहना उचित नहीं है । क्योंकि आत्मा, रसज नहीं है; अर्ताद्रिय मन, रसज नहीं है और शब्दादि अर्थों के हीनमिथ्यातियोग से पैदा होने वाले रोग भी रसज नहीं हैं ।

वायोंविद आत्मा को रसज कहते थे । वायोंविद को शब्दादि अर्थों के हीनमिथ्यातियोग से रोगों का पैदा होना यद्यपि मान्य था तथापि उनका यह कथन था कि शब्दादि जन्म रोगों कि वह में सत्त्ववादी जिस सत्त्व को कारण मानते हैं वह सत्त्व भी जब कि रस से ही पैदा होता है तब रस ही इनका कारण है । हिरण्याक्ष ने वायोंविद के इन विधानों का ही प्रतिवाद किया है । प्रतिवाद के पश्चात् अब स्वकीय मत कहते हैं किः—

षड्धातुजस्तु पुरुषो रोगाः षड्धातुजास्तथा । राशिः षड्धातुजः सांख्यैराद्यैः सम्पारिकीर्तितः ॥

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आयुर्वेद-दर्शन

अर्थात् पुरुष, षड्धातुओं से पैदा होता है और रोग भी षड्धातुओं से पैदा होते हैं। आद्यसारंख्यों ने भी (सारंख्यों में इनको ‘आद्यसारंख्य’ कहा जाता था) हेतुज पुरुष को षड्धातुओं का समुदाय ही कहा है।

यज्ञःपुरुषीय परिषद् में हिरण्याक्ष यद्यपि वार्योंविद् के रसवाद का प्रतिवाद करते हुए दिखाई देते हैं तथापि ये मुख्यतः भारद्वाज के धातुपंचकवाद के प्रतिस्पर्धी हैं।

हम यहां यह कहने का साहस करते हैं कि हिरण्याक्ष जिस षड्धातुवाद का समर्थन करते हैं उसका अभ्युत्थान भी ऐतिहासिक दृष्ट्या धातुपंचकवाद में से ही हुआ होगा।

धातुपंचकवाद में आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इनको ‘अभूत’ और समस्त अचेतन सचेतन जगत् के ‘धारक’ कहा जाता था। और चेतना को इनका ही परिणाम माना जाता था। फलतः गर्भोत्पत्ति के विषय में भारद्वाज का यह कथन था किः—

गर्भस्तु खलु अंतरिक्षवाण्वगितोयभूमिविकारश्चेतनाधिष्ठान भूतः। (च. शा. अ. ४) अर्थात् गर्भ आकाशादि धातुपंचक का विकार होकर चेतना का अधिष्ठान है।

किंतु जिनको यह ज्ञात हो गया था कि चेतनाधातु ही स्वतः सिद्ध है और आकाशादिक ‘भूत’ अर्थात् पैदा हुए

हिरण्यगक्ष कुशिक और षड्धातु वाद

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हैं वे गर्भ को, शरीर को, अथवा धातुपंचक को चेतना का अधिष्ठान कहना स्वीकार नहीं करते थे अपितु चेतनाधातु को ही उनका सबका अधिष्ठान कहते थे। अतः उनका यह कथन था कि:—

एवम् अनया एव युक्त्या पंचमहाभूतविकारसमुदाया- त्मको गर्भः। चेतना तु अधिष्ठान भूतः। स हि अस्य षष्ठो- धातुरुक्तः। ( च. शा. अ. ४ ) अर्थात् इस युक्ति स इतना ही सिद्ध होता है कि “ गर्भ, पंचमहाभूतों के विकारों का समुदाय ” है और यह मान्य भी है। पर वह चेतना का अधिष्ठान नहीं है बल्कि चेतना ही उसका अधिष्ठान है। क्योंकि गर्भ के जिस तरह उक्त पांच धातु हैं उसी तरह चेतना भी उसका छठा धातु है।

षड्धातुवादियों का यह सामान्य सिद्धांत है कि:—

खादयश्चेतना षष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः।

चेतनाधातुरन्येकः स्मृतः पुरुष संज्ञकः॥ ( च. शा. )

अर्थात् आकाशादि पांच और चेतना इन छः धातुओं के समुदाय को पुरुष कहते हैं। और अकेला चेतनाधातु भी ‘ पुरुष ’ संज्ञक है। तहां चेतनाधातु-पुरुष के विषय में इनका यह कथन है कि:—

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आयुर्वेद-दर्शन

सहि हेतुः कारणं निमित्तमक्षरं कर्ता संता वेदिता बोद्धा द्रष्टा धाता ब्रह्मा विश्वकर्मा विश्वरूपः पुरुषः प्रभवोऽन्ययो नित्यो गुणी ग्रहणं प्राधान्यमन्यत्वं जीवो ज्ञः प्रकृतल्लेखतानावात् विमुभूतात्माचंद्रियात्माचांतरात्माचेति । ( च. शा. अ. ४ )

इस में कतिपय विशेषणों का स्पष्टीकरण आत्मवाद के विवेचन में किया गया है। धाता, ब्रह्मा, विश्वकर्मा, विश्वरूप इत्यादि विशेषण विराट् पुरुष के अथवा लोकाभिमानी पुरुष के उपलक्ष्य में हैं। और भूतात्मा, इंद्रियात्मा, क्षेत्रज्ञ, जीवात्मा इत्यादि विशेषण देहाभिमानी पुरुष के उपलक्ष्य में हैं। तहां भूतात्मा अथवा इंद्रियात्मा को 'शरीरधात्वात्मा' भी कहते हैं। जैसा कि 'शरीरधात्वात्मा शुक्रभूतांऽगान्दगात्संभवति' । ( च. शा. अ. ४ ) क्षेत्रज्ञ, अथवा जीवात्मा कर्मानुसार एक देह को छोड़ कर ( मनोजवो देहमुपैति देहात् ) दूसरे देह में प्रवेश करता है। यथा ' क्षेत्रज्ञः.....दैव संयोगात्.....भूतात्मना सह अन्वक्षं गर्भाशयमनु-प्रविश्यावतिष्ठते । ( सु. शा. अ. ३ )

' गुणी ' यह विशेषण महत्वपूर्ण है। चक्रपाणि दत्त ने इसका अर्थ ' भूतरूपगुणवान् ' करके यह भी कहा है कि ' गुणोऽप्रवान्, प्रधानं चात्मा, तव्यतिरिक्तानि भुतानि गुणाः '। सारांश आत्मा, गुणी होकर आकाशादिक उसके ' गुण ' हैं। आगे भी ' गुणग्रहणाय ' ' गुणोपादानम् ' इत्यादि स्थलों

हिरण्यगक्ष कुशिक और षड्धातु वाद

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में षड्धातुवादियों ने गुण शब्द से आकाशादिकों को ही संबोधित किया है।

अब इन गुणों के उत्पत्ति के विषय में कहते हैं कि:—

तत्र पूर्व चेतनाधातुः सत्वकरणो गुणग्रहणाय पुनः प्रवर्तते। स गुणोपादानकाले अंतरिक्षं पूर्वतरमन्येभ्यो गुणेभ्य उपादत्ते, यथा प्रलथात्यये सिस्सृभूतान्यक्षरभूतः सत्वोपादानः पूर्वतरमाकाशं सृजति, ततो व्यक्ततरगुणान्वाग्वार्दीश्वतुरः। सर्वमपि खल्वेतत् गुणोपादानम् अणुना कालेन भवति।

( च. शा. अ. ४ )

सारांश स्तुष्टि के आरंभ में और गर्भ में भी स्तुष्टिकर्ता चेतनाधातु, सत्वरूप उपादान अथवा करण से युक्त होकर सर्व प्रथम गुण ग्रहण में प्रवृत्त होता है अर्थात् गुणों को व्यक्त करता है। गुणोपादान के समय वह अन्य गुणों के पहिले आकाश-गुण को ग्रहण करता है और बाद में क्रमशः व्यक्ततर वायु आदि गुणों को ग्रहण करता है। यह गुण-ग्रहण अत्यल्प समय में हो जाता है।

धातुपंचकवादी, आकाशादिकों का नित्य द्रव्य मानते थे। उनका कहना था कि 'इन आकाशादिकों में अप्रतीघात-कत्वादि और शब्दादि गुण रहते हैं। ये गुण, इन द्रव्यों के स्वभाव हैं'। किंतु षड्धातुवादियों को चेतनाधातु, का

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आयुर्वेद-दर्शन

स्वतः सिद्ध अस्तित्व प्रतीत हो जाने के कारण वे आकाशादिकों को चेतनाधातु के 'गुण' कहते थे। अतः उक्त विधान में उन्होंने यह कहा है कि 'चेतनाधातु, आकाशादिगुणों को व्यक्त करता है। सारांश धातुपञ्चकवादी जिन गुणों को 'स्वभाव' कहते हैं उनको ही षड्धातुवादी आकाशादि नामों से संबोधित करते हैं। क्योंकि उनके मत से आकाशादिक, अभिव्यक्ति के समय गुणमात्र रहते हैं।

किंतु यहाँ यह जानना आवश्यक है कि अभिव्यक्ति के समय आकाशादिक, अप्रतीघातकत्वादि गुणमात्र रहते हैं अथवा शब्दादि गुणमात्र रहते हैं ? और इस विषय में षड्धातुवादियों का क्या कथन है ?

इस तरह देखा जाय तो षड्धातुवादी आकाशादिकों को अप्रतीघातकत्वादि गुण मात्र ( आकाश-अप्रतीघातकत्व, वायु-चलत्व, अग्नि-उष्णत्व, जल-द्रवत्व, पृथ्वी-स्वरत्व ) ही स्वीकार करते हुए प्रतीत होते हैं। क्योंकि षड्धातुवादियों का यह कथन कि 'इन गुणों की अभिव्यक्ति व्यक्त, व्यक्ततर, व्यक्ततम, इस क्रम से होती है;' वैज्ञानिक दृष्ट्या शब्दादि तन्मात्राओं में उत्तनी चरितार्थ नहीं होती जितनी कि अप्रतीघातकत्वादि लक्षणों या गुणों में। और इसी हेतु से षड्धातुवादी, गर्भगत गुणोपादन में अप्रतीघातकत्वादि गुणों के स्थान पर छिद्र, प्राण, संताप, छेद, मूर्ति

हिरण्याक्ष कुशिक और षड्धातु वाद

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इन गुणों का उल्लेख करते हैं जैसा कि उनके “पुरुषोऽयं लोकसम्मतः। यावंतो हि मूर्तिसंतो लोके भावविशेषास्तावंतः पुरुषे यावंतो पुरुषे तावंतो लोके। तस्य पुरुषस्य पृथ्वी मूर्तिः, आपः क्रेदः, तेजोऽभिंसंतापो, वायुः प्राणो, विद्यच्छिद्राणि, ब्रह्मांतरात्मा। ( च. शा. अ. ४ व ५ ) इस विधान पर से सिद्ध होता है। उक्त छिद्रादिगुण, अप्रतीघातकत्वादि गुणों के ही देहगत रूप हैं। इनका उल्लेख करना आकाशादिकों को अप्रतीघातकत्वादि गुणमात्र स्वीकार करना ही है। इतना ही नहीं तो षड्धातुवादी अब यह भी कहते हैं किः—

तन्मयान्येव भूतानि तद्गुणान्येवचादिशेत्।

तैश्च तद्वक्ष्णः कृत्स्नो भूतग्रामो न्यजन्यत ॥

तस्योपयोगोऽभिहितशक्तिर्त्सा प्रति सर्वदा ।

भूतेभ्यो हि परं यस्मान्नास्ति चिंता चिकित्सिते ॥

( सु. शा. अ. १ )

अर्थात् चूंकि जब कि चिकित्सा शास्त्र में सचेतन-अचेतन द्रव्यगत पंचमहाभूतों का ही विचार किया जाता है और चिकित्सा में अर्थात् शारीरधातुओं के सम-विषम करण में सर्वदा गुर्वादि गुणविशिष्टभूतग्राम का ही उपयोग होता है ( गुर्वादिगुणों के द्वारा ही साम्य-वैषम्य होता है ) तब यह कहना ही उचित है कि “ आकाशादि पंचमहाभूत, अप्रतीघातत्वादिलक्षणमय ( अभिन्यक्ति के समय तन्मात्र )

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आधुनिक-दर्शन

और छिद्र, प्राण आदि गुण विशिष्ट हैं। और इनके द्वारा तत्त्वज्ञान ही समस्त सचेतन अचेतन भूतप्राप्त पैदा हुआ है।”

पृथ्वीवादी, गुणप्रसदाख्य धातुओं का अथवा केवल गुर्बादि स्वभावों का अप्रतीघातकत्वादि गुणों में समन्वय करते थे। इन गुणों को ही वे आकाश आदि नामों से संबोधित करते थे और अभिव्याक्ति के समय आकाशादिकों को अप्रतीघातकत्वादमात्र स्वीकार करते थे।

पृथ्वीवादी, वातपित्तश्लेष्माओं के लोकगत अधिष्ठान पर विचार करते हुए वातपित्तश्लेष्माओं का अप्रतीघातकत्वादि गुणों में विशेषतः चक्षुत्त्व, उष्णत्व और द्रवत्व में समन्वय करते थे।

पृथ्वीवादानुसार आत्मा ‘गुणी’ है। आकाशादिक अपने मूलभूत अप्रतीघातकत्वादि रूपों में उसके ‘गुण’ हैं। ये गुण ‘अभूत’ नहीं हैं; बल्कि ‘भूत’ हैं। तदनुसार आकाशादिक ‘भूत’ अथवा ‘महाभूत’ कहे जाते हैं। इन महाभूतों में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंधों की प्रतीति होती है। किंतु ये ‘आत्मगुण’ नहीं हैं; अपितु ‘भौतिक गुण’ हैं। सारांश इनको ‘कार्यगुण’ माना जाता है ‘कारणगुण’ नहीं माना जाता।

पृथ्वीवादी, सत्व को आत्मा का ‘करण’ और ‘उपादान’ कहते हैं। किंतु इसको वे सातवों धातु नहीं

हिरण्यशक्ष कुशिक और षड्धातु वाद

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कहते । क्योंकि आत्मवादियों की बुद्धि, जिस प्रकार आत्मा से पैदा होकर आगे स्वयं ही अहंकार में तथा आकाशादिकों में परिणत होती है अथवा उनको जनती है उस प्रकार षड्धातुवादियों का सत्त्व, स्वयं गुणग्रहण या गुणोपादान नहीं करता । षड्धातुवादानुसार सत्त्व को इतना स्वतंत्र नहीं माना जाता । इसका मुख्य कारण यह है कि षड्धातुवादी, आत्मा के कर्तृत्व को और ज्ञातृत्व को भिन्न २ मानते हैं । उनके इस मत का निदर्शन “ निर्विकारः परस्त्वात्मा सत्त्वभूत गुणद्वियैः ” ( च. सू. अ. १ ) इस विधान पर ले होता है । इसमें सत्त्व गुणों का और भूत गुणों का अलग २ उल्लेख है । सारांश षड्धातुवादानुसार आत्मा का कर्तृत्व, गुणपंचक में व्यक्त होता है और ज्ञातृत्व, करणोपादान रूप त्रिगुणात्मक सत्त्व में । इस तरह यद्यपि आकाशादि गुणपंचक का और सत्त्व का आपस में जन्य जनक संबंध नहीं है तथापि जिस समय चेतनाधातु, गुणग्रहण में प्रवृत्त होता है तब वह करणोपादान संज्ञक सत्त्व से युक्त रहता है ।

रस, शुक्र, आत्मेवादि अन्य गमोत्पादक भावों का भूत पंचक में अतर्भाव करने के हेतु से षड्धातुवादी कहते हैं कि:—मातृजादयोप्यस्य महाभूतविकारा एव । तत्र अस्य आकाशात्मकं शब्दः, श्रोत्रं, लाघवं, सौक्ष्म्यं, विवेकश्च । वाय्वात्मकं स्पर्शः, स्पर्शनं च रौक्ष्यं, प्रेरणं, धातुव्यूहत्वं, चैष्टाश्च शारिरीयः ।

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आयुर्वेद-दर्शन

अग्न्यात्मकं रूपं, दर्शनं, प्रकाशः, पत्तिकौण्यं च । अवात्मकं रसो, रसनं, शैत्यं, मार्दवः, स्नेहः, छेदश्च । पृथिव्यात्मकं गंधो, व्रणं, गौरवं, शैर्यं, मूर्तिश्च । ( च. शा. अ. ४ )

पद्मवृत्तवादिओं के मत से इंद्रिय और इंद्रियार्थ दोनों ही पांचभौतिक होने के कारण उनका उक्त विधान में पंचीकरण किया गया है । इसीका स्पष्टीकरण अन्यत्र इस प्रकार किया गया है कि “ यतोऽभिहितं तत्संभवद्वयसमूहो-भूतादिरुक्तः, भौतिकानि च इंद्रियाण्यायुर्वेदे वक्ष्यंते तथैंद्रियाथाः” ( सु. शा. अ. १ ) अर्थात् जब कि उस कर्मपुरुष को पैदा करने वाला शुक्लशोणितान्तर्गत गुणप्रसादाख्य द्वयसमुदाय पांच-भौतिक है तब आयुर्वेद में इंद्रियों और इंद्रियार्थों को भातिक ही कहा जाता है । और इसी हेतु से यह कहा गया है कि ‘ तत्र यद्यदात्मकमिन्द्रियं विशेषात्तदात्मकमेवार्थमनुगृह्णाति, तत्स्वभावाद्विसुत्वाच्च ’ । ( च. सू. अ. ८ ) अथवा:—

इंद्रियेणेंद्रियार्थं तु स्वं स्वं गृह्णाति मानवः । नियतं तुल्ययोनित्वात्मान्येनान्यमिति स्थितिः ।

( सु. शा. अ. १ )

यहां यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि जो संप्रदाय, श्रुतत्व में ही कर्तृत्व का समन्वय करते हैं उनकी यह दलील रहती है कि “ चूंकि जब कि इंद्रियों के द्वारा शब्दा-

हरिण्याक्ष कुशिक और षड्धातुवाद

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दिगुणों का ही ग्रहण होता है और अप्रतीघातकत्वादिक केवल स्पर्शक्षेय हैं तब आकाशादिकों का शब्दादि तन्मात्राओं में और उनका भी ज्ञान में समन्वय करना उचित है”। किंतु जो संप्रदाय ज्ञातृत्व और कर्तृत्व को भिन्न २ मानते हैं वे इस दलील को स्वीकार नहीं करते।

मालूम होता है कि षड्धातुवादी ‘कृत’कर्म के पक्षपाती थे जैसा कि कर्मवाद के प्रकरण में उद्घुत किये गये अंशों पर से सिद्ध होता है। पुनर्भव विषयक प्रमाणचतुष्टय इनका ही है। हरिण्याक्ष कुशिक, बात-कलाकलीय परिषद् में अनुपस्थित थे।

कौशिक का परंपरावाद.

कौशिकः—षड्धातुवाद का खंडन करते हुए कौशिक ने यह कहा कि:—

तदुक्तवन्तं कुशिकमाह तच्चोति कौशिकः ।

कस्मान्मातापितृभ्यां हि विना षड्धातुजो भवेत् ॥

पुरुषः पुरुषाद्वौर्गोश्चादश्चः प्रजायते ।

पिन्ध्या मेहादयश्चोक्ता रोगास्तावत्रकारणम् ॥

अर्थात् केवल षड्धातुसमुदाय से—इनका मिश्रण बना देने से पुरुष की अथवा रोगोंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । यदि हो सकती है तो वह बिना माता पिता के ही क्यों नहीं होती ? और यह तो प्रत्यक्ष है कि पुरुष से पुरुष, गौ से गौ अथ से अथ इस तरह समस्त जीव जाति अपनी पितृपरंपरा से पैदा होती है । प्रमेह आदि रोग भी पैतृक दिखाई देते हैं । सारांश पुरुष और रोगों की उत्पत्ति में माता-पिता ही कारण हैं ।

परंपरावादी इतने पक्के नास्तिक थे कि उनका खंडन स्वभाववादी और यहच्छावादी जैसे नास्तिकों ने भी किया है । क्योंकि भारतद्वज ने इस पर यह आपत्ति बतलाई थी

कौशिकका परंपरावाद

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कि “ यदि च मनुष्यो मनुष्य प्रभवः, कस्मात् जडांधकुञ्ज- मूकवासनमिन्मिण व्यंगोन्मत्तकुण्डिकिलासिन्धो जाताः पितृ- सदृशरूपा न भवति ? ” किंतु भारद्वाज के इस कथन से परंपरावाद पर कुछ प्रकाश नहीं पड़ता। आत्मवादियों ने इतके मत को उद्घृत करते हुए यह कहा है कि “ मातापितृ परंपरा से पैदा होने वाले पुरुषों में यद्यपि सारूष्य रहता है और इस कारण उनको पूर्व सदृश भी कहा जाता है तथापि वे पूर्व के नहीं हैं; क्योंकि उनकी पैदाइश प्रतिसमय नवीन नवीन होती है। सारांश प्रत्येक प्राणी आत्मतत्त्वरहित पंच- विकारसमुदायमात्र होने के कारण और इस समुदाय का परिणाम ही ‘ सत्त्व ’ होने के कारण चेतना धातुपुरुष, न कुछ करता, न कुछ भोगता और न अस्तित्व ही रखता है”। किंतु यह मत भी कौशिक के परंपरावाद से मेल नहीं खाता। कर्मधादियों ने मातापितृ वाद का खंडन करत हुए यह कहा है कि “ इस तरह जिनकी बुद्धि है उनके मत से चतुर्विधा योनि है ही नहीं ! ” अर्थात् पितृ परंपरावादियों का सिद्धांत औद्भिज और स्वेदज योनियों में जिनमें कि मातापितृसंबंध का अभाव है, चरितार्थ नहीं होता। किंतु इस पर से भी कौशिक के परंपरावाद पर पर्याप्त प्रकाश नहीं पड़ता।

आस्तिकों में भी ‘ बुद्धिपूर्वकसर्ग ’ के नाम से एक परंपरावाद प्रचलित है जिसमें ब्रह्मा से मन्वादिकों की,

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आयुर्वेद-दर्शन

मरीच्यादि महर्षियों की और देवासुरमनुष्यों की वंशपरंपरा का विवेचन किया जाता है ।

कौशिक रसपरिषद् में और वातकलाकठीयपरिषद् में उपस्थित नहीं थे ।

भद्रकाप्य का कर्मवाद.

भद्रकाप्यः— कौशिक का प्रतिवाद करते हुए भद्रकाप्य ने कहा कि :—

भद्रकाप्यस्तु नेत्याह नक्षत्रोऽध्यात्रजायते । मातापित्रोरपि च ते प्रागुत्पत्तिं युज्यते ॥

अर्थात् पुरुष और रोगों की उत्पत्ति में केवल माता-पिता को कारण कहना उचित नहीं है। यदि मातापिता ही कारण हों तो अंधे मातापिताओं से अंधा बालक पैदा होना चाहिये किंतु प्रलक्ष में यह हगोचर नहीं होता। सिवाय कल्प पूर्व अवस्था में जब कि मातापिता का अस्तित्व ही नहीं रहता; आपके कथनानुसार उत्पत्ति असंभव है। वास्तविक बात यह है कि:—

कर्मजस्तु मता जंतुः कर्मजास्तस्य चामयाः । नद्यते कर्मणो जन्म रोगाणां पुरुषस्य च ॥

पुरुष और रोग कर्म से पैदा होते हैं। बिना कर्म के दोनों की उत्पत्ति नहीं होती।

आगे भारद्वाज ने भद्रकाप्य के कर्मवाद का जिस भाषा में प्रतिवाद किया है उसपर से यह ज्ञात होता है कि

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आयुर्वेद-दर्शन

कुछ संप्रदाय कर्म को 'अकृत' मानते थे तो कुछ 'कृत'। तहाँ भद्रकाण्य, कर्म को 'अकृत' मानने वाले संप्रदायों में से एक हैं। सिवाय भद्रकाण्य के रसपरिषद्ग्रन्थ भाषण पर से यह भी विदित होता है कि भद्रकाण्य का स्मृष्टिविज्ञान प्रकृतिपुरुषवादात्मक होगा। प्रकृति को अनादिस्वतःसिद्ध मानने वाले, 'कर्म' को अकृत मानते भी हैं। क्योंकि उनकी दृष्टि से कर्म और प्रकृति एक ही पदार्थ है।

चरकसंहिता में अकृत कर्मवाद का इससे अधिक उल्लेख उपलब्ध नहीं होता किंतु कृत कर्मवाद का होता है। चरकसंहिता के त्रिसंक्षिपिणीयाध्यायमें "परलोकैषणा" पर विचार करते हुए यह कहा गया है कि—

अथ तृतीयां परलोकैषणामापद्येत । संशयश्चात्र—कथं भविष्याम इतश्च्युता नवेति, कृतः संशयः पुनः ? इति उच्यते ! संतिष्ठेके प्रत्यक्षपराः परोक्षत्वात् पुनर्भवस्य नास्तिक्य माश्रिताः संति च आगम प्रत्यादेव पुनर्भव भिच्छन्ति, श्रुति भेदाश्च ।

मातरं पितरं चैके मन्यते जन्मकारणम् । स्वभावं परनिर्माणं यदच्छांचापरेजनाः ॥

इत्यतः संशयः किंनु खल्वस्ति पुनर्भवो नवेति ?

तत्र बुद्धिमान् नास्तिक्य बुद्धिं ज्ञाता विचिकित्सां च । कस्मात् प्रत्यक्षं हि अल्पम्, अनल्पमप्रत्यक्षमस्ति, यदागमा-

भद्रकाव्य का कर्मवाद

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नुमानयुक्तिभिरुपलभ्यते । यैरेवतावादिद्वियैः प्रत्यक्षमुपलभ्यते, नान्येव संति चाप्रत्यक्षाणि ॥

सतां च रूपाणामतिसंश्रिष्टार्घादतिविप्ररूपांदावरणात्करणद्वैर्वैल्यान्मनोऽनवस्थात्तात्समानाभिहाराद्भिभभाद्विति सौदम्न्याच्च प्रत्यक्षानुपलब्धिः तस्माद् अपरीक्षितमेतदुच्यते ' प्रत्यक्षमेवास्तितान्यदस्तीति ' । श्रुतयः श्रैता न कारणं युक्ति- विरोधात् ।

आत्मा मातुः पितुर्वा यः सोऽपत्यं यदि संचरेत् । द्विविधं संचरेदात्मा सर्वो वाऽवयवेन वा ॥ सर्वश्रेत्संचेरन्मातुः पितुर्वा मरणं भवेत् । निरंतरं नावयवः कश्चित्स्वस्वस्य चात्मनः ॥ बुद्धिर्मनश्च निर्णीते यथैवात्मा तथैव ते । येषां चैषा मतिस्तेषां योनिर्नास्ति चतुर्विधा ॥ विद्यात्स्वाभाविक् षण्णां धातूनां यत्स्वलक्षणम् । संयोगे च विभागे च तेषां कर्मैव कारणम् ॥ अनादश्वेतनाधातोनैष्यते परनिर्मितिः । पर आत्मा सचेद्वेतुरिष्टोस्तु परनिर्मितिः ॥ न परीक्षा न परीक्ष्यं न कर्ता कारणं न च । न देवा नृपयः सिद्धाः कर्म कर्मफलं न च ॥ नास्तिकस्यास्ति नैवात्मा यद्वच्छोपहतात्मनः । पातकेश्वः परं चैतत्पातकं नास्तिक ग्रहः ॥