बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
[ ४१ ]
खण्डविभागस्तु सर्वत्राऽनुगतः । अतोऽत्र धर्मसूत्रेऽपि खण्डविभागेनैव भाव्यम् । अत एव देशान्तरमुद्रितमूलपुस्तके ग्रन्थाक्षरमुद्रितमूलपुस्तके च खण्डविभाग एव प्राधान्येनाऽऽहृतः । अध्यायविभागस्तु गौणतया । हस्तलिखितमूलपुस्तके तु अध्यायविभागस्सर्वथा परित्यक्तः । अतो लिखितमुद्रितमूलपुस्तकापलभ्यमान एव खण्डादिविभागे प्राचीनतां सूत्रकाराभिमततामौचितीं च मन्वानैस्तत्संरक्षणे बद्धादरैस्स एव विभागस्समाहृतः । व्याख्यानुरोधात्तु अध्यायविभागोऽपि कृतः । स तु परं न प्रधानया, न वा सूत्रसम्बन्धेन । महीशूरपुस्तके गृह्यसूत्रेऽप्यध्यायविभागमवलम्ब्य खण्डविभागस्सर्वथा परित्यक्तस्सोऽध्येतृशिष्टपरम्पराविरोधी । पदसूच्यपि तामेवरीतिमनुसरत्यत्र ।
एवमत्र संस्करणेऽध्ययनाध्यापनादौ पूर्वसंस्करणापेक्षया विशेषोपकारमभिलषता मया परिश्रान्तम् । साफल्यं परं प्राप्तं मया न वेति विद्वन्मनांस्येव निकषोपलाः ।
अत्र च यैः पण्डितप्रवरैः पुस्तकालयाध्यक्षैरन्यैश्चाऽस्मन्निकटं पुस्तकानि प्रेषितानि सानुकम्पं स्थापितानि च यावच्छोधनसमाप्ति स्वपुस्तकालयनियमोल्लङ्घनमस्माकीनं सोढ्वाऽपि, तेषामातृण्यमशक्नुवन् सम्पादयितुं केवलं कृतज्ञतामाविष्करोमि पुनः पुनः ।
शोधनादिकार्ये सूचीनिर्माणादौ च यदस्मत्प्रियशिष्येण हिन्दूविश्वविद्यालये पूर्वमीमांसायास्सहायाध्यापकेन श्रीपट्टाभिरामशर्मणा मीमांसाचार्येण, अन्यैश्च शिष्यवरैः सुबहु परिश्रान्तमुपकृतं च, तत् सर्वथा प्रशंसनीयम् । अतस्तानाशीर्वचोभिरभिपूरयामि ।
सूत्रकारस्याऽस्य कालनिर्णयविषये आपस्तम्बाद्यपेक्षया पौर्वापर्यविषयादौ च यन्मया विचारितं यथामति, तदवसरे सति समनन्तरमेव निरूपयिष्यामि । अन्ततो विबुधवरानधीतिनश्च सानुनयमभ्यर्थये—ग्रन्थमिमं यथावदुपयुज्य सफलयन्तु मदीयं परिश्रमं प्रकाशयितुर्तुलमुत्साहं, वर्धयन्तु च तमाशीर्भिः पुनःपुनरेतादृशकार्यकरणे सर्वाङ्गीणसाहाय्यप्राप्तये इति—
| वाराणसी हनुमद्घट्टः <br> मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी <br> वि० सं० १९९१ | सुधीजनविधेयः <br> चिन्नस्वामिशास्त्री <br> ( महामहोपाध्यायः ) |
|---|
The text on this page is completely blurred, out of focus, and illegible. Please provide a clear, higher-resolution photograph or scan of the page so that it can be accurately transcribed.
विषयानुक्रम
प्रथम प्रश्न
प्रथम अध्याय
| विषय | पृ० | विषय | पृ० |
|---|---|---|---|
| धर्म वेदविहित एवं स्मार्त | १ | धातु निर्मित पदार्थों की शुद्धि | ५५ |
| शिष्ट का लक्षण | ३ | चमस की पवित्रता | ५७ |
| परिषत् के सदस्य | ४ | शुद्धि के साधन | ५७ |
| दक्षिण तथा उत्तर के धर्म | ८ | नित्य शुद्ध वस्तुएँ | ५९ |
| आर्यावर्त्त का विस्तार | १२ | पुष्प एवं फल की शुद्धता | ६० |
| सङ्कीर्णयोनियों के प्रदेश | १३ | शुद्ध वस्तुएँ | ६१ |
| देशयात्रा का प्रायश्चित्त | १४ | शुद्धि के उपाय | ६२ |
| वेदब्रह्मचर्य की अवधि | १६ | देवपूजन में श्रद्धा का महत्त्व | ६५ |
| अग्नि के आधान का काल | १८ | प्रक्षालन का नियम | ६७ |
| उपनयन संस्कार | १९ | ब्याज का नियम | ७० |
| ब्रह्मचारी के कर्त्तव्य | २१ | वर्ण की हानि | ७२ |
| पादोपसङ्ग्रहण | २३ | अशौच के नियम | ७७ |
| अभिवादन के नियम | २५ | उदकदान का विचार | ७९ |
| उच्छिष्ट-भोजन | २६ | सकुल्य | ८१ |
| गुरु का वर्णव्यतिक्रम | २७ | सम्पत्ति का उत्तराधिकार | ८२ |
| द्वितीय अध्याय | जन्म एवं मृत्यु का आशौच | ८४ | |
| उपदेशयोग्य शिष्य | ३० | अस्पृश्य व्यक्ति एवं वस्तु | ९१ |
| ब्रह्मचर्य दीर्घसत्र रूप में | ३१ | मांसभक्षण में अभक्ष्य | ९३ |
| तृतीय अध्याय | भक्ष्य पशु | ९५ | |
| स्नातक के वस्त्रादि | ३५ | भक्ष्य मत्स्य | ९६ |
| स्नातक के कर्त्तव्य | ३६ | पेय एवम् अपेय दूध | ९७ |
| चतुर्थ अध्याय | षष्ठ अध्याय | ||
| कमण्डलु का महत्त्व | ३८ | पवित्रता का महत्त्व | ९९ |
| जलग्रहण की विधि | ४१ | यज्ञिय वस्त्र | १०२ |
| पञ्चम अध्याय | भूमि की शुद्धि | १०४ | |
| शुद्धि के साधन | ४५ | पात्र की अशुद्धि | १०८ |
| यज्ञोपवीतधारण की विधि | ४६ | गोविकार की पवित्रता | ११० |
| आचमन की विधि | ४८ | सप्तम अध्याय | |
| पात्रों की शुद्धि | ५३ | यज्ञ के सामान्य नियम | ११३ |
| वस्त्रों की शुद्धि | ५५ | दीक्षित के कर्त्तव्य | १२० |
| अष्टम अध्याय | |||
| ब्राह्मण की पत्नियाँ | १२१ | ||
| सवर्ण पुत्र | १२२ |
[ ४४ ]
| विषय | पृ० | विषय | पृ० |
|---|---|---|---|
| प्रतिलोमज पुत्र | १२३ | द्वितीय अध्याय | |
| नवम अध्याय | आचार-नियम | १८० | |
| पुत्रों के प्रकार | १२५ | सम्पत्ति का विभाजन | १८१ |
| ब्रात्य सन्तान | १२७ | पुत्र के भेद | १८४ |
| दशम अध्याय | पत्नी की रक्षा का महत्त्व | १९० | |
| कर का अंश | १२७ | पुत्री का धन | १९२ |
| विभिन्न वर्णों के कर्म | १२८ | स्त्री की परतन्त्रता | १९२ |
| पुरोहित का महत्त्व | १२९ | स्त्री का धर्म | १९३ |
| ब्राह्मणवध का दण्ड | १३३ | व्यभिचार के प्रायश्चित्त | १९४ |
| क्षत्रियवध का दण्ड | १३३ | स्त्रियों की पवित्रता | १९७ |
| वैश्यवध का दण्ड | १३४ | विधवा-विवाह | १९८ |
| स्त्रीवध का दण्ड | १३४ | अगम्या स्त्रियाँ | १९९ |
| साक्षी के गुण | १३५ | चाण्डालीगमन का प्रायश्चित्त | २०० |
| राजा के लिए प्रायश्चित्त | १३९ | आपद्धर्म | २०१ |
| एकादश अध्याय | गृह्याग्नि का आधान | २०३ | |
| विवाह के भेद | १४० | तृतीय अध्याय | |
| श्रेष्ठ विवाह | १४२ | स्नान के नियम | २०६ |
| विवाह का महत्त्व | १४३ | स्नान के स्थान | २०७ |
| कन्याविक्रय का पाप | १४५ | स्नातक के व्रत | २०९ |
| वेदज्ञ की महिमा | १४८ | अन्न का दान | २१० |
| पर्व पर अनध्याय | १५० | धनदान का नियम | २१२ |
| द्वितीय प्रश्न | भोजन की विधि | २१३ | |
| प्रथम अध्याय | मांसभक्षण | २१४ | |
| प्रायश्चित्त | १५३ | कर्त्तव्याकर्त्तव्य | २१५ |
| भ्रूणहत्या | १५३ | निवासयोग्य स्थान | २१८ |
| ब्राह्मणवध | १५४ | अर्घ्य व्यक्ति | ३२० |
| क्षत्रिय तथा वैश्य का वध | १५६ | उत्तरीय वस्त्र | २२१ |
| गुरुपत्नीगमन का प्रायश्चित्त | १५७ | चतुर्थ अध्याय | |
| सुरापान | १५८ | सन्ध्योपासन | २२२ |
| अवकीर्णी का प्रायश्चित्त | १६३ | गायत्री जप | २२६ |
| महापातकी | १६५ | प्राणायाम | २२७ |
| पतनीयकर्म | १६८ | सन्ध्योपासना की महत्ता | २३० |
| उपपातक | १७० | पञ्चम अध्याय | |
| पतित के पुत्र का पतन | १७३ | शरीरशुद्धि | २३३ |
| विक्रयार्थ निषिद्ध वस्तुएँ | १७५ | स्नान की विधि | २३५ |
| कृच्छ्र व्रत के भेद | १७७ | तर्पण के मन्त्र | २४० |
| षष्ठ अध्याय | |||
| पञ्चमहायज्ञ | २४६ |
[ ४५ ]
| विषय | पृ० | विषय | पृ० |
|---|---|---|---|
| याज्ञिक कर्मों के भेद | २४८ | पालनी, सिलोञ्छा, कपोता | ३१३ |
| वानप्रस्थ के कर्त्तव्य | २५० | वान्या वृत्ति | ३१४ |
| परिव्राजक के कर्त्तव्य | २५१ | तृतीय अध्याय | |
| ब्राह्मण की महिमा | २५५ | वानप्रस्थ के भेद | ३१५ |
| सप्तम अध्याय | वैखानस के नियम | ३१९ | |
| आत्मयज्ञ | २५९ | वनवास की प्रशंसा | ३२० |
| भोजनविधि | २६१ | चतुर्थ अध्याय | |
| भोजन की मात्रा | २६६ | ब्रह्मचारी के लिए प्रायश्चित्त | ३२१ |
| उपवास निषिद्ध | २६७ | पञ्चम अध्याय | |
| अष्टम अध्याय | अघमर्षण सूत्र का प्रयोग | ३२३ | |
| श्राद्ध की महत्ता | २६८ | अघमर्षण का महत्त्व | ३२४ |
| पंक्तिपावन ब्राह्मण | २६९ | षष्ठ अध्याय | |
| ब्राह्मणभोजन | २७१ | प्रसृतयावक | ३२६ |
| दान की विधि | २७५ | यव की प्रशस्ति | ३२७ |
| श्राद्धभोजन में ब्राह्मणों की संख्या | २७६ | सप्तम अध्याय | |
| नवम अध्याय | कूष्माण्डमन्त्र-प्रयोग | ३३१ | |
| त्रिविध ऋण | २७८ | अनुचित मैथुन का व्रत | ३३२ |
| पुत्रोत्पत्ति का महत्त्व | २७९ | व्रत में निषिद्ध कर्म | ३३३ |
| दशम अध्याय | अग्निपरिचर्या | ३३८ | |
| संन्यास के नियम | २८१ | अग्निहोत्री के लिए कर्म | ३३९ |
| ब्रह्मान्वाधान | २८६ | अष्टम अध्याय | |
| अग्निहोत्र | २८७ | चान्द्रायण व्रत | ३४१ |
| तर्पण | २९१ | लौकिक अग्नि की रक्षा | ३४२ |
| सावित्री मन्त्र का जप | २९२ | होम के मन्त्र | ३४३ |
| संन्यासी के व्रत | २९३ | स्त्री-शूद्र से भाषण निषिद्ध | ३४७ |
| आत्मयज्ञ | २९६ | चान्द्रायण के भेद | ३४९ |
| संन्यासी का भोजन | २९७ | चान्द्रायण का महत्त्व | ३५० |
| प्रणव की महिमा | ३०१ | नवम अध्याय | |
| तृतीय प्रश्न | अनश्नत्पारायण | ३५१ | |
| प्रथम अध्याय | हवन के मन्त्र | ३५२ | |
| वृत्ति | ३०३ | पारायण का पुण्य | ३५४ |
| शालीन एवं यायावर | ३०४ | दशम अध्याय | |
| द्वितीय अध्याय | पाप कर्म से दोष | ३५६ | |
| षणिप्रवर्त्तिनी वृत्ति | ३०९ | प्रायश्चित्त का विवाद | ३५७ |
| कौष्ठाली, ध्रुवा | ३१० | पाप दूर करने के साधन | ३५८ |
| संप्रक्षालनी, समूहा | ३१२ | पवित्र स्थान | ३६० |
| दान योग्य वस्तुएँ | ३६१ |
[ ४६ ]
| चतुर्थ प्रश्न | पृ० | पृ० | |
|---|---|---|---|
| प्रथम अध्याय | अतिकृच्छ्र | ३८५ | |
| भिन्न-भिन्न प्रायश्चित्त | ३६२ | कृच्छ्रातिकृच्छ्र | ३८५ |
| प्राणायाम की विधि | ३६३ | तप्तकृच्छ्र व्रत | ३८५ |
| प्राणायाम से पापमुक्ति | ३६४ | सान्तपन कृच्छ्र | ३८६ |
| विवाह की अवस्था | ३६५ | कुशोदकपान | ३८७ |
| ऋतुमती कन्या का विवाह न करने से दोष | ३६६ | पञ्चगव्य | ३८७ |
| कन्या द्वारा पतिवरण | ३६६ | महासान्तपन | ३८८ |
| कन्या का अपहरण | ३६७ | चान्द्रायण व्रत | ३८८ |
| अणघ्नी पत्नी | ३६८ | शिशु तथा यतिचान्द्रायण | ३८९ |
| योग का महत्त्व | ३६९ | तुलापुमान् व्रत | ३८९ |
| ओंकार का महत्त्व | ३७० | यावकभक्षण | ३९० |
| द्वितीय अध्याय | ब्रह्मकूर्च | ३९१ | |
| प्रायश्चित्त तथा दोष | ३७१ | भिक्षा से शुद्धि | ३९२ |
| दान लेने का प्रायश्चित्त ३७१ | ३७१ | जल पीने से पापशुद्धि | ३९२ |
| निषिद्ध भोजन का प्रायश्चित्त | ३७२ | वेद पारायण से पापशुद्धि | ३९२ |
| ब्राह्मणहत्या का प्रायश्चित्त | ३७२ | गायत्री-जप | २९३ |
| उपपातक के प्रायश्चित्त | ३७४ | षष्ठ अध्याय | |
| अघमर्षण सूक्त का महत्त्व | ३७५ | जप द्वारा पापशुद्धि | ३९४ |
| तृतीय अध्याय | इष्टियों द्वारा पापशुद्धि | ३९४ | |
| रहस्य प्रायश्चित्त | ३७६ | जप तथा दान | ३९५ |
| पापनाशक मन्त्र | ३७८ | सप्तम अध्याय | |
| चतुर्थ अध्याय | पुण्यकर्मा के लिए व्रत अनावश्यक | ३९७ | |
| प्रमाद का प्रायश्चित्त | ३७९ | गणहोम के मन्त्र | ३९९ |
| धर्मशास्त्र के उपदेश योग्य व्यक्ति | ३८१ | अष्टम अध्याय | |
| पञ्चम अध्याय | लोभ प्रेरित गणहोम का पाप | ४०४ | |
| वेद से संबद्ध कर्म | ३८२ | गणहोम का माहात्म्य | ४०५ |
| प्राजापत्य कृच्छ्र | ३८४ | धर्मशास्त्रश्रवण द्वारा दोषों की शान्ति | ४०७ |
| बालकृच्छ्र | ३८४ | परिशिष्ट | |
| विवरण में उद्धृत वाक्यों का सन्दर्भ-निर्देश | ४०९ | ||
| सूत्रों में आये हुए नामों एवं विषयों की अनुक्रमणिका | ४१६ |
बौधायन-धर्मसूत्रम्
The text on this image is too blurred and faint (washed out/ghosted) to be legibly transcribed.
॥ श्रीः ॥
बौधायन-धर्मसूत्रम्
सानुवाद-श्रीगोविन्दस्वामिप्रणीतविवरणोपेतम्
प्रथमः प्रश्नः
तत्र प्रथमाध्याये प्रथमः खण्डः
उपदिष्टो धर्मः प्रतिवेदम् ॥ १ ॥
**अनु०—**धर्म का उपदेश वेद की प्रत्येक शाखा मे किया गया है ॥ १ ॥
उपदिष्टः प्रदर्शितः प्रतिवेदम् प्रतिशाखम् । अतीन्द्रियार्थप्रतिपादको नित्यो ग्रन्थराशिवेदः । तत्प्रतिपाद्यो धर्मः । यद्यप्येकैकस्यां शाखायां परिपूर्णान्यङ्गानि, तथाऽपि कल्पसूत्रान्तरै१शाखान्तरोक्तांश्चोपसंहारः क्रियत एव ॥ १ ॥
तस्याऽनु व्याख्यास्यामः ॥ २ ॥
**अनु०—**हम उसी के अनुसार धर्म की व्याख्या करेंगे ॥ २ ॥
अन्विति । पश्चादित्यर्थः ॥ २ ॥
स्मार्तो द्वितीयः ॥ ३ ॥
**अनु०—**स्मृति में प्रतिपादित धर्म दूसरे स्थान पर आता है ॥ ३ ॥
**टिप्पणी—**स्मार्त धर्म के अन्तर्गत वर्णधर्म, आश्रमधर्म, वर्णाश्रमधर्म, गुणधर्म और निमित्तधर्म पाँच प्रकार के धर्म आते हैं । ये धर्म भी साधारण और विशिष्ट दो प्रकार के हैं ।—गोविन्द स्वामी । इस सूत्र से यह भी अभिव्यक्त है कि स्मृति और श्रुति के नियमों में पारस्परिक विरोध होने पर श्रुति-नियम प्रवल होते हैं। गोविन्द के अनुसार 'स्मृति' का अर्थ 'अनुभूतविषयासम्प्रमोषाभिव्यञ्जक ग्रन्थ' है ।
१. क्तांशोप, इति क. पु.
२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ धर्मप्रमाणम्
अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः । तदभिव्यञ्जको ग्रन्थः स्मृतिशब्देनोप- चर्यते । स्मार्तः स्मृत्युपदिष्टः । अनुव्याख्याग्रहणं स्मार्तस्य धर्मस्य कल्पविधि- मन्त्रार्थवादमूलत्वप्रदर्शनार्थम् । तच्च^१ 'धन्वन्निव प्रपा असि' 'तस्माच्छ्रेयासं पापीयान् पश्चादन्वेति' इत्यादि । अत एव प्रपागुर्व्वनुगमनादीनां कर्तव्यतामव- गम्य तत्कर्तव्यता स्मृतिशास्त्रकारैरुपदिश्यते । अत एव द्वितीयः । एवं^२ चाऽस्य श्रौतधर्म^३विरोधे सति दौर्बल्यं द्रष्टव्यम् । स च स्मार्तो धर्मः पञ्चविधो भवति—^४वर्णधर्मः, आश्रमधर्मः, वर्णाश्रमधर्मः, गुणधर्मः, निमित्तधर्मश्चेति । तत्राऽपि साधारणविशिष्टधर्मभेदेन द्वैविध्यं · द्रष्टव्यम् । 'द्विजातीनामध्ययनम्' इत्यादिः साधारणधर्मो वर्णधर्मः । 'ब्राह्मणस्याऽधिकाः प्रवचनयाजनप्रतिग्रहाः' इत्यादिर्विशिष्टः । तथा आश्रमधर्मो दयादिस्साधारणः । अग्नीन्धनादिर्विशिष्टः । तथा - वर्णाश्रमधर्मोऽप्यग्नीन्धनादिस्साधारणः । बैल्वदण्डधारणादिर्विशिष्टः । अभिषेकादिगुणयुक्तस्य राज्ञो रक्षणं गुणधर्मः । ^५हिंसादिनिमित्तधर्मः । उपादे- यानुपादेयताकृतो गुणनिमित्तयोर्विशेषः ॥ ३ ॥
तृतीयः शिष्टागमः ॥ ४ ॥
अनु०—शिष्ट जनों द्वारा आचरित धर्म तीसरे स्थान पर आता है ॥ ४ ॥
टिप्पणी—इस सूत्र के अनुसार शिष्टजनों का आचरण धर्म का तीसरा स्रोत है किन्तु उसकी प्रामाणिकता श्रुति और स्मृति के बाद ही समझनी चाहिए ।
धर्म इत्यनुषज्यते । शिष्टैरागम्यत इति शिष्टागमः । शिष्टैराचरित इत्यर्थः । तत्र प्रत्यक्षश्रुतिविहितो धर्मः प्रथमो धर्मः । विप्रकीर्णमन्त्रार्थवादमूलो द्वितीयः । तृतीयस्तु प्रलीनशाखामूलः । सर्वेषां वेदमूलत्वेऽपि दौर्बल्यमर्थविप्रकर्षाद्वेदि- तव्यम् ॥ ४ ॥
१. हे अग्ने ! त्वं धन्वनि निरुदके प्रदेशे प्रपा पानीयशाला 'प्याऊ' इति भाषायां प्रसिद्धा, सेवाऽसि, इति मन्त्रखण्डस्याऽर्थः ।
२. एवन्त्वस्य, इति क. पु.
३. व्यतिक्रमे धर्मदौर्बल्यं, इति क. पु.
४. जातिमात्रोद्देशेन विधीयमानो धर्मो वर्णधर्मः । ब्रह्मचर्याद्याश्रमोद्देशेन विधी-यमानो धर्मः आश्रमधर्मः । वर्णगताश्रमोद्देशेन व्यवस्थया विधीयमानो धर्मः वर्णाश्रमधर्मः । गुणं कंचनोपादाय तदवलम्बेन विधीयमानो धर्मो गुणधर्मः । निमित्तमुपादाय विधीयमानो निमित्तधर्मः । विज्ञानेश्वरस्तु पञ्चभिरेभिस्साकं साधारणधर्मं कञ्चवोदाय षड्विधमाह ।
५. विज्ञानेश्वरस्तु—निमित्तधर्मो विहिताकरणप्रतिषिद्धसेवननिमित्तं प्रायश्चित्तम्, इति निमित्तधमं व्याख्याय साधारणधर्मोऽहिंसादिः इत्युक्तवान् ॥
प्रथमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ३
प्रथमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ३
अथ शिष्टानाह—
शिष्टाः खलु विगतमत्सराः निरहङ्काराः कुम्भीधान्या अलोलुपा दम्भदर्पलोभमोहक्रोधविवर्जिताः ॥ ५ ॥
**अनु०—**शिष्ट वे हैं जो दूसरों के गुणों से द्वेष न करते हों, अहङ्कारहीन हों, जो कुम्भीधान्य ( दस दिन के लिए अन्न का संग्रह करने वाले हों ), अलोलुप हों, और जिनमें दम्भ, दर्प, लोभ, मोह और क्रोध दुर्गुण न हों ॥ ५ ॥
खल्विति वाक्यालङ्कारार्थो निपातः । मात्सर्यं परगुणाक्षमता । अहङ्कारः अभिजनविद्यानिमित्तो गर्वः । ¹कुम्भोधान्याः दशाहं जीवनौपयिकधान्याः । अनेन च सन्तुष्टतोपलक्ष्यते । अलोलुपता वैतृष्ण्यम् । दम्भो लोकप्रत्ययार्थ धर्मध्वजोच्छ्रायः । दर्पो ²धर्मातिरेकमूलोऽतिहर्षः । लोभः प्रसिद्धः । मोहः कृत्याकृत्यविवेकशून्यता । दम्भादिविवर्जिताः ॥ ५ ॥
किञ्च—
³धर्मेणाऽधिगतो येषां वेदस्सपरिवृंहणः ।
शिष्टास्तदनुमानज्ञाः श्रुतिप्रत्यक्षहेतवः ॥ इति ॥ ६ ॥
**अनु०—**जिन्होंने इतिहास, पुराण, आदि विभिन्न प्रभेदों सहित वेद का अध्ययन तथा अर्थ का बोध धर्मानुसार प्राप्त कर लिया है, जो श्रुति को ही धर्म का प्रत्यक्ष हेतु मानते हैं, और उसके ( स्मार्त, शिष्टाचारण की श्रुति और ) अनुमान के ज्ञाता हैं ॥ ६ ॥
**टिप्पणी—**इस पद्य के अन्त में 'इति' यह सूचित करता है कि यह उद्धृत अंश है । "जो वेद से अनुमान निकालने के ज्ञान से युक्त हैं, और श्रुति से इन्द्रिय-प्रत्यक्ष प्रमाणों को प्रस्तुत करने में समर्थ हैं ।" = ब्यूह्लर कृत अंग्रेजी अनुवाद के अनुसार ।
येषामिति कृद्योगे षष्ठी 'कर्तृकर्मणोः कृति' इति । इतिहासपुराणाभ्यां सहितो वेदो ग्रन्थतोऽर्थतश्च यैरवगत इत्यर्थः । बृंहणग्रहणं स्मृतिसदाचारशास्त्राणामप्युपलक्षणार्थम् । श्रुतिप्रत्यक्षहेतवश्च श्रुतिरेव प्रत्यक्षं कारणमस्य धर्म-
१. स्वकुटुम्बपोषणे षडहंमात्रपर्याप्तधान्यः कुम्भीधान्य इति विज्ञानेश्वरो गोविन्दराजोऽपि । वर्षनिर्वाहोचितधान्यः कुम्भीधान्य इति कुल्लूकः । षाण्मासिकधान्यादिनिश्चयः इति मेधातिथिः ॥ ( मनु० ४. ७. )
२. धर्मातिरेकमूलान्मतिहर्षः इति क. पु.
३. श्लोकोऽयं किञ्चिदन्यथयितो मानवे दृश्यते ( मनु० १२. १०९ )
| ४ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ परिषद् |
|---|
स्येति येषां दर्शनमिति विग्रहः । अनेन मीमांसकाः कीर्तिताः । अत एव तदनुमानज्ञास्ते भवन्ति स्मार्तशिष्टागमयोश्चैत्यनुमानविद् इत्यर्थः । एवं च शाखाधिगतो यो धर्मस्सोऽनुष्ठेय इत्यभिप्रायः ॥ ६ ॥
तदभावे दशावरा परिषत् ॥ ७ ॥
अनु०—उपर्युक्त लक्षण वाले शिष्टजनों के न होने पर कम से कम दस सदस्यों की परिषत् धर्म का निर्णय करने में प्रामाणिक होती है ॥ ७ ॥
उक्तलक्षणशिष्टाभावे दशावरा परिषत् ; तया यो विधीयते सोऽनुष्ठेय इत्यर्थः ॥ ७ ॥
तच्च परकीयमतेन । स्वमतं प्रदर्शयितुमाह—
अथाप्युदाहरन्ति— चातुर्वैद्यं विकल्पी च अङ्गविद्धर्मपाठकः । आश्रमस्थास्त्रयो विप्राः पर्षदैषा दशावरा ॥ ८ ॥
अनु०—इस विषय में भी यह पद्य उद्धृत किया जाता है— चार वेदों को जानने वाले चार व्यक्ति, एक विकल्पी अर्थात् मीमांसक, वेद के अङ्गों (व्याकरणादि) का ज्ञाता, धर्मशास्त्र का पाठ करने वाला (अर्थात् धर्मशास्त्र का अर्थ जानने वाला), तीन विभिन्न आश्रमों के तीन ब्राह्मण—इनकी दस सदस्यों वाली परिषत् होती है ॥ ८ ॥
टिप्पणी—चार व्यक्तियों में प्रत्येक एक-एक वेद का ज्ञाता होता है । तीन विभिन्न आश्रमों के ब्राह्मणों ‘आश्रमस्थास्त्रयो विप्राः’ के विषय में टीकाकार गोविन्द स्वामी का मत है कि वानप्रस्थी वन में निवास करने के कारण परिषद् में नहीं आ सकता । परिव्राजक भिक्षा के लिए ग्राम में आता जाता रहता है, इसी प्रकार नैष्ठिक ब्रह्मचारी भी परिषत् में लिया जा सकता है । "चाश्रमस्थास्त्रयो मुख्याः" भी पाठ है ।
चतस्र एव विद्याश्चातुर्वैद्यं तेन तद्विदो लक्ष्यन्ते । विकल्पी मीमांसकः । अङ्गं व्याकरणादि तज्ज्ञः । धर्मपाठकः तन्मूलिका तदर्थावगतिरिति पाठग्रहणम् । तदभिज्ञ इत्यर्थः । तान् विशिनष्टि—आश्रमस्थास्त्रयो विप्राः अवानप्रस्थास्त्रयो गृह्यन्ते । वानप्रस्थानां पुनर्वनाधिवासत्वादनधिकारो धर्मोपदेशस्य । परिव्राजकोऽपि भिक्षार्थी ग्राममियादेव । तथा च गौतमः—'प्रागुपोत्तमात्रय आश्रमिणः' इति । विप्रा इति क्षत्रियवैश्ययोर्धर्मोपदेशानधिकारप्रदर्शनार्थं विप्रग्रहणम् । 'ब्राह्मणो धर्मान् प्रब्रूयात्' इति वसिष्ठवचनाच्च । 'आश्रमस्था-
प्रथमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ५
त्रयो मुख्याः' इति पाठे नैष्ठिकब्रह्मचारो गृह्यते । 'यथा धर्मस्कन्धब्राह्मणे ताननुक्रम्य 'सर्व एते पुण्यलोका भवति' इति । एवंगुणास्त्रय आश्रमिणो दशाद्वरा परिषद् भवति ॥ ८ ॥
अथाऽनुकल्पमाह—
पञ्च वा स्युस्त्रयो वा स्युरेको वा स्यादनिन्दितः ।
प्रतिवक्ता तु धर्मस्य नेतरे तु सहस्रशः ॥ ९ ॥
**अनु०—**अथवा परिषद् में पाँच या तीन सदस्य हो सकते हैं, यहाँ तक कि पातक आदि दोषों से मुक्त एक श्रेष्ठ आचरण वाला व्यक्ति भी धर्म के विषय में निर्णय दे सकता है, किन्तु उससे भिन्न आचरण वाले पातकादि दोष वाले सहस्रों व्यक्तियों के समूह को भी धर्म के विषय में प्रमाण नहीं माना जा सकता ॥ ९ ॥
इस संबन्ध में याज्ञवल्क्यस्मृति १.९ में कहा गया है :—
चत्वारो वेदधर्मज्ञाः पर्षत् त्रैविद्यमेव वा ।
सा ब्रूते यं स धर्मस्स्यादेको वाऽध्यात्मवित्तमः ॥
इसी प्रकार मनुस्मृति १२-१११–११३ में कहा गया है—
त्रैविद्यो हेतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः ।
त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिषत्स्या दशावरा ॥
ऋग्वेदविद्यजुर्विच्च सामवेदविदेव च ।
त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया धर्मसंशयनिर्णये ॥
एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद् द्विजोत्तमः ।
स विज्ञेयः परो धर्मो नाऽज्ञानादुदितोऽयुतैः ॥
सम्भवापेक्षो विकल्पः । अनिन्दितः पातकादिदोषरहितः । तृतीयो वाशब्दोऽपि शब्दस्याऽर्थे द्रष्टव्यः । आह च—
एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद्विचक्षणः । इति ॥
१. छान्दोग्ये त्रयो धर्मस्कन्धाः इत्यारभ्याऽऽम्नातं ब्राह्मणं धर्मस्कन्धब्राह्मणम् ।
२. चत्वारो वेदधर्मज्ञाः पर्षत् त्रैविद्यमेव वा । सा ब्रूते यं स धर्मस्स्यादेको वाऽध्यात्मवित्तमः ॥ इति याज्ञवल्क्यः ( या. स्मृ. १.९ )
त्रैविद्यो हेतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः । त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिषत्स्याद् दशावरा ॥ ऋग्वेदविद्यजुर्विच्च सामवेदविदेव च । त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया धर्मसंशयनिर्णये ॥ एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद्द्विजोत्तमः । स विज्ञेयः परो धर्मो नाऽज्ञानादुदितोऽयुतैः ॥ इति मनुः ( म. स्मृ. १२. १११–११३ )
| ६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ परिषत् |
|---|
अपिशब्दादेकेन न वाच्यम्। वक्ष्यति च 'बहुद्वारस्य धर्मस्य' ( १.१३ ) इति। तुशब्दोऽवधारणार्थः ॥ ९ ॥
'अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् । सहस्रशस्समेतानां परिषत्त्वं न विद्यते ॥ इति ॥ १० ॥
**अनु०—**व्रतहीन, मन्त्र को न ग्रहण करने वाले, केवल जाति के नाम पर जीविका निर्वाह करनेवाले, सहस्र व्यक्तियों के समूह को भी परिषत् के लक्षण से युक्त नहीं माना जाता है ॥ १० ॥
'नेतरे तु सहस्रशः' इति² सामर्थ्ये सिद्धे सत्यारम्भादत्यन्तापद्यव्रतादीननुगृह्णाति । आह च— जातिमात्रोपजीवी च कामं स्याद् ब्राह्मणब्रुवः । धर्मप्रवक्ता नृपतेर्न तु शूद्रः कथञ्चन ॥ इति ॥ १० ॥
'नेतरे तु सहस्रशः' इत्युक्तम्, तत्रैव निन्दामाह— यथा दारुमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । ब्राह्मणश्चाऽनधीयानस्त्रयस्ते नामधारकाः ॥ ११ ॥
**अनु०—**जैसा काठ का हाथी या चमड़े का कृत्रिम मृग होता है वैसा ही वेदाध्ययन न करने वाला ब्राह्मण भी होता है और ये तीनों केवल जाति का नाम ही धारण करते हैं ॥ ११ ॥
स्पष्टम् ॥ ११ ॥
अत्यन्तापद्यपि एकोद्दिष्टभोक्तृवत् वक्तृणामपि दोषोऽस्तीति दर्शयितुमाह— यद्वदन्ति तमोमूढा मूर्खा धर्ममजानतः । तत्पापं शतधा भूत्वा वक्तॄन् समधिगच्छति ॥ १२ ॥
**अनु०—**अज्ञान रूपी अन्धकार से घिरे हुए, धर्म को न जानने वाले मूर्ख जिस (पाप कर्म के विषय में किसी प्रायश्चित्त) का विधान करते हैं वह पाप सौ-गुना हो कर उस ढोंगी धर्मवक्ता के ऊपर ही आ पड़ता है ॥ १२ ॥
१. प्राजापत्यादिभिः कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिश्च व्रतं रहिताः अव्रताः। अनधीतवेदाः अमन्त्राः। सूत्रमिदं खण्डान्त एव पठितं मूलपुस्तकयोः। पापेभ्यो विप्रमुच्यत इत्यंशस्य द्विरुक्तिरपि दृश्यते।
२. सामान्ये सति इति. क पु.
प्रथमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ७
प्रथमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ७
व्यवहारं प्रायश्चित्तादिकं वा यद्वदन्ति तमसा अन्धकारेणाऽऽविष्टा अजा- नतः अजानन्तः यस्मिन् पापकर्मणि एभिः प्रायश्चित्तं विहितमिति शेषः ॥१२॥
‘एको वा स्यादनिन्दितः’ ( १.१.९ ) इति यदुक्तं, तत्राऽऽह—
बहुद्वारस्य धर्मस्य सूक्ष्मा दुरनुगा गतिः ।
तस्मान्न वाच्यो ह्येकेन बहुज्ञेनाऽपि संशये ॥ १३ ॥
अनु०— ( श्रुति, स्मृति, सदाचार आदि प्रमाणों पर आश्रित ) धर्म के अनेक द्वार हैं । उसका मार्ग अत्यन्त सूक्ष्म और कठिन है । इसलिए संशय होने पर एक व्यक्ति को अकेले निर्णय नहीं देना चाहिए, भले ही वह अनेक विद्याओं का ज्ञाता क्यों न हो ॥ १३ ॥
अनेकश्श्रुतिस्मृतिसदाचारप्रमाणकत्वाद्धर्मस्य बहुद्वारत्वम् । अत एव चाऽस्य सूक्ष्मत्वं दुरनुगत्वं च । तथा हि—
शाखानां विप्रकीर्णत्वात् पुरुषाणां प्रमादतः ।
नानाप्रकरणस्थत्वात् सूक्ष्मा दुरनुगा गतिः ॥
तस्मात् इत्युपसंहारः ॥ १३ ॥
बहवः पुनः—
धर्मशास्त्ररथारूढा वेदखड्गधरा द्विजाः ।
क्रीडार्थमपि¹ यद् ब्रूयुस्स धर्मः परमःस्मृतः ॥ १४ ॥
अनु०-- धर्मशास्त्र-रूपी रथ पर चलने वाले, वेद-रूपी खड्ग को धारण करने वाले द्विज खेल में ही जो कुछ कह दे वह परम धर्म माना जाता है ॥ १४ ॥
शिष्टानां प्राबल्यं प्रदर्शयितुं धर्मशास्त्राणि वेदांश्च रथायुधैरुपमीयन्ते ॥१४॥
शिष्टैर्हि वर्णाश्रमादयो व्यवस्थापिताः । तेषु पापं न लिप्यत इत्याह—
यथाऽश्मनि स्थितं तोयं मारुतोऽर्कः प्रणाशयेत् ।
तद्वत्कर्त्तरि यत्पापं जलवत् संप्रलीयते ॥ १५ ॥
अनु०-- जिस प्रकार पत्थर के ऊपर एकत्र जल को वायु और सूर्य सुखा कर नष्ट कर देते हैं उसी प्रकार ( शिष्ट वचन के अनुसार ) करने वाले का जो भी पाप होता है, वह जल के समान नष्ट हो जाता है ॥ १५ ॥
१. अपिशब्दात् किमुत्यं प्रतीयते । यदि विचार्य ब्रूयुः, तर्हि किं वक्तव्यमिति ।
| ८ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ देशाचारः |
|---|
अथैनामघिनोऽप्यवस्थां परिज्ञाय प्रायश्चित्तं विधीयत इत्याह—
शरीरं बलमायुश्च वयः कालं च कर्म च ।
समीक्ष्य धर्मविद्बुद्ध्या प्रायश्चित्तानि निर्दिशेत् ॥ १६ ॥
अनु०--शरीर, बल, आयु, अवस्था, समय और कर्म का पूरी तरह से विचार करके ही धर्मज्ञाता विवेकपूर्वक प्रायश्चित्त का विधान करे ॥ १६ ॥
शरीरं वातप्रकृतिकं पित्तप्रकृतिमित्यादि । आयुः ज्ञानं अयतेर्गत्यर्थादौणादिकः उण्प्रत्ययः । वयः बाल्यादिलक्षणम् । कालः शीतोष्णादिलक्षणः । कर्म प्रायश्चित्तस्य निमित्तभूतं सानुबन्धं हिंसादि ॥ १६ ॥
इति प्रथमप्रश्ने प्रथमाध्याये प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥
प्रथमाध्याये द्वितीयः खण्डः
श्रौतस्मार्तशिष्टागम इति त्रिविधो धर्मो व्याख्यातः । तथा तत्र तत्र व्यवस्थिततया शिष्टाचारितानां धर्माणां—
पञ्चधा विप्रतिपत्तिर्दक्षिणतस्तथोत्तरतः ॥ १ ॥
अनु०--दक्षिण और उत्तर में पाँच विषयों में पारस्परिक विरोध है ॥ १ ॥
टिप्पणी--गोविन्दस्वामी ने व्याख्या में दक्षिण से नर्मदा और विन्ध्य के बीच के भूप्रदेश का तथा उत्तर से विन्ध्य से लेकर हिमालय तक का प्रदेश बताया है ।
दक्षिणेन नर्मदामुत्तरेण¹ कन्यातीर्थम् । उत्तरतस्तु दक्षिणेन हिमवन्तमुदग्विन्ध्यस्य । एतद्देशप्रसूतानां शिष्टानां परस्परं पञ्चधा विप्रतिपत्तिः विसंवादः 'यान् पदार्थान् अनुतिष्ठन्ति दाक्षिणात्याः न तानुदीच्याः । यानुदीच्या न तान् दाक्षिणात्याः' इति ॥ १ ॥
तत्र प्रथमम्—
यानि दक्षिणतस्तानि व्याख्यास्यामः ॥ २ ॥
अनु०—इनमें जो आचरण विशेषतः दक्षिण में प्रचलित हैं उनकी हम व्याख्या करेंगे ॥ २ ॥
²निगदव्याख्यातमेतत् ॥ २ ॥
१. कन्याकुमारी इति दक्षिणसमुद्रतीरे प्रसिद्धं स्थानम् ।
२. पाठमात्रेणार्थोऽवगम्यते । नाऽत्र व्याख्यानापेक्षेत्यर्थः ।
द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ९
द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ९
तत्रेमान्युदाहरणानि-- यथैतदनुपेतेन सह भोजनं स्त्रिया सह भोजनं पर्युषितभोजनं मातुलपितृष्वसृदुहितृगमनमिति ॥ ३ ॥
अनु०—ये विशिष्ट आचरण ये हैं:-जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ है उनके साथ भोजन करना, पत्नी के साथ भोजन, बासी अन्न का भोजन, मामा की पुत्री से विवाह, बुआ ( पिता की बहन ) की पुत्री से विवाह ॥ ३ ॥
मातुलदुहितृगमनं पितृष्वसृदुहितृगमनमिति सम्बन्धः । ऋज्वन्यत् ॥३॥
अथोत्तरतः ऊर्णाविक्रयः शीधुपानमुभयतोदद्भिर्व्यवहारः आयुधीयकं समुद्रसंयानमिति ॥ ४ ॥
अनु०--उत्तर में जो आचरण विशिष्ट हैं, वे हैं—ऊन बेचने का व्यापार मदिरा-पान, उन पशुओं का विक्रय, जिनके मुख में ऊपर और नीचे दोनों ओर दाँत होते हैं, अस्त्र-शस्त्र का व्यापार तथा समुद्र की यात्रा ॥ ४ ॥
ऊर्णायास्तद्विकारस्य च कम्बलादेर्विक्रयः । उभयतो दन्ता अश्वादयः । व्यवहारः विक्रयादिः आयुधीयकं शस्त्रधारणम् समुद्रसंयानं नावा द्वीपान्तरगमनम् ॥ ४ ॥
इतरदितरस्मिन् कुर्वन् दुष्यतीतरदितरस्मिन् ॥ ५ ॥
अनु०—जिस प्रदेशों में जो आचरण प्रचलित हैं उससे भिन्न प्रदेश में उन आचरणों का व्यवहार दोष उत्पन्न करता है ॥ ५ ॥
टि०—दक्षिण की विशिष्ट रीतियों का उत्तर में आचरण करना दोष उत्पन्न करता है। उत्तर के विशिष्ट कर्मों का दक्षिण में आचरण दोषजनक होता है। इस सम्बन्ध में भट्टकुमारिल के दो वाक्यों को गोविन्दस्वामी ने उद्धृत किया है। "स्वमातुलसुतां प्राप्य दाक्षिणात्यस्तु तुष्यति" "अहिच्छत्रब्राह्मण्यस्सुरां पिबन्ति"।
इतरत् अनुपेतेन सह भोजनादि, इतरस्मिन्नुत्तरापथे कुर्वन् दुष्यति तत्रत्यैश्शिष्टैः दूष्यत इत्यर्थः । एवमूर्णाविक्रयादीनि कुर्वन्नितरत्र । तस्मादनुपेतेन सह भोजनादीनि दाक्षिणात्यैश्शिष्टैराचर्यमाणत्वात् दोषाभावाच्च तैरेव कर्तव्यानि । ऊर्णाविक्रयादीनि चोदीच्यैरेव । तदेतद्भट्टकुमारिलैर्निरूपितम्
(१) स्वमातुलसुतां प्राप्य दाक्षिणात्यस्तु तुष्यति ॥ इति ॥
१. शूद्रान्नभोजनेनाऽपि तुष्यन्त्यन्ये द्विजातयः । इति पूर्वार्धम् ।
| १० | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ देशाचारः |
|---|
'तथा हि—अहिच्छत्रब्राह्मण्यस्सुरां पिबन्ति ।। इति च ॥ ५ ॥'
ननु किमिति व्यवस्था ? यावता मूलश्रुतिरेषामविशेषेण कल्प्यते यथा ^२होलाकादीनाम् । यथा वा बौधायनीयं धर्मशास्त्रं कैश्चिदेव पाठ्यमानं सर्वाधिकारं भवति । गौतमयोगोभिलोये छन्दोगैरेव पठ्येते, वासिष्ठं तु बह्वृचैः, अथ च सर्वाधिकारणि । यथा वाऽन्यानि शास्त्राणि यथा वा गृह्यशास्त्राणि सर्वाधिकारणि, तद्वदनुपनीतसहभोजनादीन्यपि समानि कस्मान्न भवन्तोत्याशङ्कयाऽऽह—
तत्र तत्र देशप्रामाण्यमेव स्यात् ॥ ६ ॥
अनु०--इन विशिष्ट विषयों में उसी प्रदेश के नियम को प्रमाण मानना चाहिए ॥ ६ ॥
एवं व्यवस्थितविषयैव मूलश्रुतिः कल्प्यते । किन्नामाऽनुपपत्तिं कल्पयतीत्यभिप्रायः । तस्माद्व्यवस्थितविषयमेवाऽनुष्ठानं तद्वर्जनं च ।
मिथ्यैतदिति गौतमः ॥ ७ ॥
अनु०--किन्तु यह मिथ्या है, ऐसा धर्मसूत्रकार गौतम का मत है ॥ ७ ॥
टि०--गौतम आदि सूत्रकारों ने इन विशिष्ट स्थानीय आचरण नियमों को प्रामाणिकता नहीं प्रदान की है, वे उन धर्मों को तभी प्रमाण मानते हैं जब वे श्रुति सम्मत धर्म के अविरुद्ध हों । प्रायः सूत्रकारों ने यहाँ उल्लिखित विशिष्ट स्थानीय आचारों के विषय में भी प्रायश्चित्त की व्यवस्था की है । गोविन्दस्वामी ने अपनी टीका में कतिपय नियमों को उद्धृत किया है ।
गौतमग्रहणमादरार्थम्, नाऽऽत्मीयं मतं पर्युदसितुम् । स होवमाह—'देशजातिकुलधर्माश्चाऽऽम्नायैरविरुद्धाः प्रमाणम्' । तद्विरुद्धो देशादिधर्मो न कर्तव्यः । तद्विरुद्धश्चाऽयम् । आह च गृत्समदः-'अनुपनीतसहभोजने द्वादशरात्रमुच्छिष्टभोजने द्विगुणम्' इति । प्रायश्चित्तविधानान्निषेधः कल्प्यते । तथा 'स्त्रिया सह भोजने त्रिरात्रोपवासो घृतप्राशनं चेति' । तथा 'पर्युषितभोजने अहोरात्रोपवासः' इति संवर्तः । तथा मातुलदुहितृगमनेऽप्याह—
१. तन्त्रवार्तिके शिष्टाकोपाधिकरणे—अद्यत्वेऽप्याहिच्छत्रमथुरानिवासिब्राह्मणीनां सुरापानम्, इति वाक्यमस्ति । तदेवात्राऽनूदितमिति मन्यामहे ।
२. होलाकादयो देशविशेषेष्वनुष्ठीयमाना अपि न व्यवस्थाविषयाः । किन्तु सर्वैरप्यनुष्ठेया इति व्यवस्थापितं होलाकाधिकरणे पूर्वमीमांसायाम् । ( १.३.८. ) होलाका नाम फाल्गुनपोर्णमास्यां क्रियमाण उत्सवविशेषः ।
द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ११
द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ११
सखिभार्यां समारुह्य मातुलस्याऽऽत्मजां तथा ।
चान्द्रायणं द्विजः कुर्याच्छ्वश्रमपि तथैव च ॥ इति ॥
तथा विवाहेऽपि—
पञ्चमीं मातृबन्धुभ्यः सप्तमीं पितृबन्धुतः ॥ इति ॥
आह च—
पैतृष्वसेयीं भगिनीं स्वस्त्रीयां मातुरेव च ।
मातुश्च भ्रातृरात्रां च गत्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
एवमूर्णाविक्रयादिष्वप्याम्नायविरोधः प्रसिद्धः । ऊर्णा तावदपण्येषु पठिता । शीधुपाने गौतमः—‘नित्यं मद्यमपेयं ब्राह्मणस्य’ इति । तथोभयदन्तव्यवहारे वसिष्ठः—‘अश्वलवणमपण्यम्’ इति प्रकृत्य ‘ग्राम्यपशूनामेकशफाः केशिनश्च’ इत्याह । तथा च श्रुतिः—‘य उभयादत्प्रतिगृह्णात्यश्वं वा पुरुषं वा वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत्’ इति प्रायश्चित्तम् । तथाऽऽयुधीयकेऽपि ‘परीक्षार्थोऽपि ब्राह्मण आयुधं नाऽऽददीत’ इति । स्वयमेव पतनीयेषु समुद्रसंयानं (२.१.४१) वक्ष्यति । एवमादीन्यालोच्याऽऽम्नायैरविरुद्धाः प्रमाणमित्युक्तम् । अतो ‘मिथ्यैतदिति गौतमः’ इत्युपपन्नं भवति ॥ ७ ॥
एतदेव स्वमतमित्याह—
'उभयं चैव नाऽऽद्रियेत ॥ ८ ॥
अनु०— ( उत्तर और दक्षिण ) दोनों ही प्रदेशों के विशिष्ट रिवाजों का आचरण नहीं करना चाहिए ॥ ८ ॥
च-शब्दः पक्षव्यावृत्त्यर्थः । अनुपेतादि सहभोजनमूर्णाविक्रयादि चोभयमपि न कर्तव्यमित्यभिप्रायः ॥ ८ ॥
कस्मादित्याह—
शिष्टस्मृतिविरोधदर्शनात्² शिष्टागमविरोधदर्शनाच्च ॥ ९ ॥
अनु०— क्योंकि ये आचरण ( मनु आदि ) शिष्ट जनों की स्मृतियों के विरुद्ध हैं तथा शिष्ट जनों की परम्परा के विरुद्ध हैं ॥ ९ ॥
टि०— यह सूत्र कहीं कहीं खण्डित मिलता है । गोविन्दस्वामी ने शिष्ट का अर्थ मनु से लिया है । "शिष्टो हि मनुः" ।
१. उभयं त्वेव नाद्रियेत । तुशब्दः पक्ष. इति. ग. पु.
२. ‘शिष्टागमविरोधदर्शनात्’ इति नास्ति घ. पुस्तके सूत्रमिदमनुवदत्सु ग्रन्थान्तरेषु च ।
| १२ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ देशाचारः |
|---|
शिष्टाममविरोधस्तावत् स्वयमुदितः 'पञ्चधा विप्रतिपत्तिः' ( १. २१. ) इत्यत्र । स्मृतिविरोधश्चाऽनुपनीतादिसहभोजने प्रायश्चित्तविधानात् । शिष्टस्मृतिविरोधः मनुविरोधः । शिष्टो हि मनुः । तद्विरोधश्च । तत्स्मृतिः शिष्टस्मृतिः । शिष्टस्मृतिविरोधः सोऽपि दर्शित एव । एकसूत्रतां त्वेके मन्यन्ते । यथा होलाकादयो व्यवस्थितदेशविषया अप्यन्यव्यवस्थिताः कर्तव्याः । इत्थमिमेऽपीत्यस्य चोद्यस्य व्यवस्थितदेशश्रुत्यनुमानमुक्तं 'तत्र तत्र देशप्रामाण्यमेव स्यात्' (१.२६.) इति तत्राह—'उभयं चैव नाऽऽद्रियेत शिष्टस्मृतिविरोधदर्शनात्' इति । स च विरोध उक्तः । तस्मादविरुद्धत्वाद्वोलाकाद्यनुष्ठानं सर्वाधिकारकम् । इह विरोधादनुपनीतसहभोजनादिवर्जनं सर्वाधिकारमिति विशेषः । आहुश्च न्यायविदः 'विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम्' इति ॥ ५ ॥
अथ शिष्टदेशानाह—
'प्रागदर्शनात् प्रत्यक्कालकवनाद्दक्षिणेन हिमवन्तमुदक्पारियात्रमेतदार्यावर्तं तस्मिन् य आचारस्स प्रमाणम्' ॥ १० ॥
अनु०—( सरस्वती नदी के ) लुप्त होने के स्थान से पूर्व की ओर कालकवन नाम के वन से पश्चिम हिमालय पर्वत से दक्षिण का और पारियात्र पर्वत से उत्तर का भूभाग आर्यावर्त है, इस भूभाग में जो आचार-नियम प्रचलित है वही प्रमाण है ।
**टि०—**द्रष्टव्य मनु० २।२२ 'आ समुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात् । तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्तं विदुर्बुधाः ।'
तत्राऽपि शिष्टस्मृतिविरोधेऽनपेक्ष्यमेव ॥ १० ॥
१. अदर्शनः सरस्वत्या नद्या यत्र देशेऽन्तर्धानं स देशः । आर्यावर्तलक्षणं मनुनोक्तम्—आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात् । तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्तं विदुर्बुधाः ॥ इति ॥ ( मनु० २-२२ ) शूद्राणामनिरवसितानाम् ( २. ४. १० ) इति पाणिनिसूत्रे भगवान् पतञ्जलिः 'कः पुनरार्यावर्तः ?' इति प्रश्नमुत्थाप्य तत्समाधानत्वेन "प्रागादर्शात् प्रत्यक्कालकवनाद् दक्षिणेन हिमवन्तमुदक्पारियात्रम्" इतीदमेव सूत्रमुददीधरत् इति प्रतिभाति । तत्रा "ऽऽदर्शादयः पर्वतविशेषाः" इति कैयटेन व्याख्यातम् । परन्तु बहुषु बौधायनधर्मसूत्रपुस्तकेषु हस्तलिखितेषु मुद्रितेषु च "प्रागदर्शनात्" इत्येव पाठस्समुपलभ्यते । अतः 'यत्प्राग्विनशनादपि' इति मनुवचनानुरोधेन च सूत्रे "अदर्शनात्" इत्येव पाठस्समुचितः, तस्य च यत्र सरस्वती नदी अदर्शनं गता स देशः विनशनाख्य एवाऽयं इत्युचितं प्रतिभाति ।