बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
[ ४५ ]
| विषय | पृ० | विषय | पृ० |
|---|---|---|---|
| याज्ञिक कर्मों के भेद | २४८ | पालनी, सिलोञ्छा, कपोता | ३१३ |
| वानप्रस्थ के कर्त्तव्य | २५० | वान्या वृत्ति | ३१४ |
| परिव्राजक के कर्त्तव्य | २५१ | तृतीय अध्याय | |
| ब्राह्मण की महिमा | २५५ | वानप्रस्थ के भेद | ३१५ |
| सप्तम अध्याय | वैखानस के नियम | ३१९ | |
| आत्मयज्ञ | २५९ | वनवास की प्रशंसा | ३२० |
| भोजनविधि | २६१ | चतुर्थ अध्याय | |
| भोजन की मात्रा | २६६ | ब्रह्मचारी के लिए प्रायश्चित्त | ३२१ |
| उपवास निषिद्ध | २६७ | पञ्चम अध्याय | |
| अष्टम अध्याय | अघमर्षण सूत्र का प्रयोग | ३२३ | |
| श्राद्ध की महत्ता | २६८ | अघमर्षण का महत्त्व | ३२४ |
| पंक्तिपावन ब्राह्मण | २६९ | षष्ठ अध्याय | |
| ब्राह्मणभोजन | २७१ | प्रसृतयावक | ३२६ |
| दान की विधि | २७५ | यव की प्रशस्ति | ३२७ |
| श्राद्धभोजन में ब्राह्मणों की संख्या | २७६ | सप्तम अध्याय | |
| नवम अध्याय | कूष्माण्डमन्त्र-प्रयोग | ३३१ | |
| त्रिविध ऋण | २७८ | अनुचित मैथुन का व्रत | ३३२ |
| पुत्रोत्पत्ति का महत्त्व | २७९ | व्रत में निषिद्ध कर्म | ३३३ |
| दशम अध्याय | अग्निपरिचर्या | ३३८ | |
| संन्यास के नियम | २८१ | अग्निहोत्री के लिए कर्म | ३३९ |
| ब्रह्मान्वाधान | २८६ | अष्टम अध्याय | |
| अग्निहोत्र | २८७ | चान्द्रायण व्रत | ३४१ |
| तर्पण | २९१ | लौकिक अग्नि की रक्षा | ३४२ |
| सावित्री मन्त्र का जप | २९२ | होम के मन्त्र | ३४३ |
| संन्यासी के व्रत | २९३ | स्त्री-शूद्र से भाषण निषिद्ध | ३४७ |
| आत्मयज्ञ | २९६ | चान्द्रायण के भेद | ३४९ |
| संन्यासी का भोजन | २९७ | चान्द्रायण का महत्त्व | ३५० |
| प्रणव की महिमा | ३०१ | नवम अध्याय | |
| तृतीय प्रश्न | अनश्नत्पारायण | ३५१ | |
| प्रथम अध्याय | हवन के मन्त्र | ३५२ | |
| वृत्ति | ३०३ | पारायण का पुण्य | ३५४ |
| शालीन एवं यायावर | ३०४ | दशम अध्याय | |
| द्वितीय अध्याय | पाप कर्म से दोष | ३५६ | |
| षणिप्रवर्त्तिनी वृत्ति | ३०९ | प्रायश्चित्त का विवाद | ३५७ |
| कौष्ठाली, ध्रुवा | ३१० | पाप दूर करने के साधन | ३५८ |
| संप्रक्षालनी, समूहा | ३१२ | पवित्र स्थान | ३६० |
| दान योग्य वस्तुएँ | ३६१ |
[ ४६ ]
| चतुर्थ प्रश्न | पृ० | पृ० | |
|---|---|---|---|
| प्रथम अध्याय | अतिकृच्छ्र | ३८५ | |
| भिन्न-भिन्न प्रायश्चित्त | ३६२ | कृच्छ्रातिकृच्छ्र | ३८५ |
| प्राणायाम की विधि | ३६३ | तप्तकृच्छ्र व्रत | ३८५ |
| प्राणायाम से पापमुक्ति | ३६४ | सान्तपन कृच्छ्र | ३८६ |
| विवाह की अवस्था | ३६५ | कुशोदकपान | ३८७ |
| ऋतुमती कन्या का विवाह न करने से दोष | ३६६ | पञ्चगव्य | ३८७ |
| कन्या द्वारा पतिवरण | ३६६ | महासान्तपन | ३८८ |
| कन्या का अपहरण | ३६७ | चान्द्रायण व्रत | ३८८ |
| अणघ्नी पत्नी | ३६८ | शिशु तथा यतिचान्द्रायण | ३८९ |
| योग का महत्त्व | ३६९ | तुलापुमान् व्रत | ३८९ |
| ओंकार का महत्त्व | ३७० | यावकभक्षण | ३९० |
| द्वितीय अध्याय | ब्रह्मकूर्च | ३९१ | |
| प्रायश्चित्त तथा दोष | ३७१ | भिक्षा से शुद्धि | ३९२ |
| दान लेने का प्रायश्चित्त ३७१ | ३७१ | जल पीने से पापशुद्धि | ३९२ |
| निषिद्ध भोजन का प्रायश्चित्त | ३७२ | वेद पारायण से पापशुद्धि | ३९२ |
| ब्राह्मणहत्या का प्रायश्चित्त | ३७२ | गायत्री-जप | २९३ |
| उपपातक के प्रायश्चित्त | ३७४ | षष्ठ अध्याय | |
| अघमर्षण सूक्त का महत्त्व | ३७५ | जप द्वारा पापशुद्धि | ३९४ |
| तृतीय अध्याय | इष्टियों द्वारा पापशुद्धि | ३९४ | |
| रहस्य प्रायश्चित्त | ३७६ | जप तथा दान | ३९५ |
| पापनाशक मन्त्र | ३७८ | सप्तम अध्याय | |
| चतुर्थ अध्याय | पुण्यकर्मा के लिए व्रत अनावश्यक | ३९७ | |
| प्रमाद का प्रायश्चित्त | ३७९ | गणहोम के मन्त्र | ३९९ |
| धर्मशास्त्र के उपदेश योग्य व्यक्ति | ३८१ | अष्टम अध्याय | |
| पञ्चम अध्याय | लोभ प्रेरित गणहोम का पाप | ४०४ | |
| वेद से संबद्ध कर्म | ३८२ | गणहोम का माहात्म्य | ४०५ |
| प्राजापत्य कृच्छ्र | ३८४ | धर्मशास्त्रश्रवण द्वारा दोषों की शान्ति | ४०७ |
| बालकृच्छ्र | ३८४ | परिशिष्ट | |
| विवरण में उद्धृत वाक्यों का सन्दर्भ-निर्देश | ४०९ | ||
| सूत्रों में आये हुए नामों एवं विषयों की अनुक्रमणिका | ४१६ |
बौधायन-धर्मसूत्रम्
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॥ श्रीः ॥
बौधायन-धर्मसूत्रम्
सानुवाद-श्रीगोविन्दस्वामिप्रणीतविवरणोपेतम्
प्रथमः प्रश्नः
तत्र प्रथमाध्याये प्रथमः खण्डः
उपदिष्टो धर्मः प्रतिवेदम् ॥ १ ॥
**अनु०—**धर्म का उपदेश वेद की प्रत्येक शाखा मे किया गया है ॥ १ ॥
उपदिष्टः प्रदर्शितः प्रतिवेदम् प्रतिशाखम् । अतीन्द्रियार्थप्रतिपादको नित्यो ग्रन्थराशिवेदः । तत्प्रतिपाद्यो धर्मः । यद्यप्येकैकस्यां शाखायां परिपूर्णान्यङ्गानि, तथाऽपि कल्पसूत्रान्तरै१शाखान्तरोक्तांश्चोपसंहारः क्रियत एव ॥ १ ॥
तस्याऽनु व्याख्यास्यामः ॥ २ ॥
**अनु०—**हम उसी के अनुसार धर्म की व्याख्या करेंगे ॥ २ ॥
अन्विति । पश्चादित्यर्थः ॥ २ ॥
स्मार्तो द्वितीयः ॥ ३ ॥
**अनु०—**स्मृति में प्रतिपादित धर्म दूसरे स्थान पर आता है ॥ ३ ॥
**टिप्पणी—**स्मार्त धर्म के अन्तर्गत वर्णधर्म, आश्रमधर्म, वर्णाश्रमधर्म, गुणधर्म और निमित्तधर्म पाँच प्रकार के धर्म आते हैं । ये धर्म भी साधारण और विशिष्ट दो प्रकार के हैं ।—गोविन्द स्वामी । इस सूत्र से यह भी अभिव्यक्त है कि स्मृति और श्रुति के नियमों में पारस्परिक विरोध होने पर श्रुति-नियम प्रवल होते हैं। गोविन्द के अनुसार 'स्मृति' का अर्थ 'अनुभूतविषयासम्प्रमोषाभिव्यञ्जक ग्रन्थ' है ।
१. क्तांशोप, इति क. पु.
२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ धर्मप्रमाणम्
अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः । तदभिव्यञ्जको ग्रन्थः स्मृतिशब्देनोप- चर्यते । स्मार्तः स्मृत्युपदिष्टः । अनुव्याख्याग्रहणं स्मार्तस्य धर्मस्य कल्पविधि- मन्त्रार्थवादमूलत्वप्रदर्शनार्थम् । तच्च^१ 'धन्वन्निव प्रपा असि' 'तस्माच्छ्रेयासं पापीयान् पश्चादन्वेति' इत्यादि । अत एव प्रपागुर्व्वनुगमनादीनां कर्तव्यतामव- गम्य तत्कर्तव्यता स्मृतिशास्त्रकारैरुपदिश्यते । अत एव द्वितीयः । एवं^२ चाऽस्य श्रौतधर्म^३विरोधे सति दौर्बल्यं द्रष्टव्यम् । स च स्मार्तो धर्मः पञ्चविधो भवति—^४वर्णधर्मः, आश्रमधर्मः, वर्णाश्रमधर्मः, गुणधर्मः, निमित्तधर्मश्चेति । तत्राऽपि साधारणविशिष्टधर्मभेदेन द्वैविध्यं · द्रष्टव्यम् । 'द्विजातीनामध्ययनम्' इत्यादिः साधारणधर्मो वर्णधर्मः । 'ब्राह्मणस्याऽधिकाः प्रवचनयाजनप्रतिग्रहाः' इत्यादिर्विशिष्टः । तथा आश्रमधर्मो दयादिस्साधारणः । अग्नीन्धनादिर्विशिष्टः । तथा - वर्णाश्रमधर्मोऽप्यग्नीन्धनादिस्साधारणः । बैल्वदण्डधारणादिर्विशिष्टः । अभिषेकादिगुणयुक्तस्य राज्ञो रक्षणं गुणधर्मः । ^५हिंसादिनिमित्तधर्मः । उपादे- यानुपादेयताकृतो गुणनिमित्तयोर्विशेषः ॥ ३ ॥
तृतीयः शिष्टागमः ॥ ४ ॥
अनु०—शिष्ट जनों द्वारा आचरित धर्म तीसरे स्थान पर आता है ॥ ४ ॥
टिप्पणी—इस सूत्र के अनुसार शिष्टजनों का आचरण धर्म का तीसरा स्रोत है किन्तु उसकी प्रामाणिकता श्रुति और स्मृति के बाद ही समझनी चाहिए ।
धर्म इत्यनुषज्यते । शिष्टैरागम्यत इति शिष्टागमः । शिष्टैराचरित इत्यर्थः । तत्र प्रत्यक्षश्रुतिविहितो धर्मः प्रथमो धर्मः । विप्रकीर्णमन्त्रार्थवादमूलो द्वितीयः । तृतीयस्तु प्रलीनशाखामूलः । सर्वेषां वेदमूलत्वेऽपि दौर्बल्यमर्थविप्रकर्षाद्वेदि- तव्यम् ॥ ४ ॥
१. हे अग्ने ! त्वं धन्वनि निरुदके प्रदेशे प्रपा पानीयशाला 'प्याऊ' इति भाषायां प्रसिद्धा, सेवाऽसि, इति मन्त्रखण्डस्याऽर्थः ।
२. एवन्त्वस्य, इति क. पु.
३. व्यतिक्रमे धर्मदौर्बल्यं, इति क. पु.
४. जातिमात्रोद्देशेन विधीयमानो धर्मो वर्णधर्मः । ब्रह्मचर्याद्याश्रमोद्देशेन विधी-यमानो धर्मः आश्रमधर्मः । वर्णगताश्रमोद्देशेन व्यवस्थया विधीयमानो धर्मः वर्णाश्रमधर्मः । गुणं कंचनोपादाय तदवलम्बेन विधीयमानो धर्मो गुणधर्मः । निमित्तमुपादाय विधीयमानो निमित्तधर्मः । विज्ञानेश्वरस्तु पञ्चभिरेभिस्साकं साधारणधर्मं कञ्चवोदाय षड्विधमाह ।
५. विज्ञानेश्वरस्तु—निमित्तधर्मो विहिताकरणप्रतिषिद्धसेवननिमित्तं प्रायश्चित्तम्, इति निमित्तधमं व्याख्याय साधारणधर्मोऽहिंसादिः इत्युक्तवान् ॥
प्रथमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ३
प्रथमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ३
अथ शिष्टानाह—
शिष्टाः खलु विगतमत्सराः निरहङ्काराः कुम्भीधान्या अलोलुपा दम्भदर्पलोभमोहक्रोधविवर्जिताः ॥ ५ ॥
**अनु०—**शिष्ट वे हैं जो दूसरों के गुणों से द्वेष न करते हों, अहङ्कारहीन हों, जो कुम्भीधान्य ( दस दिन के लिए अन्न का संग्रह करने वाले हों ), अलोलुप हों, और जिनमें दम्भ, दर्प, लोभ, मोह और क्रोध दुर्गुण न हों ॥ ५ ॥
खल्विति वाक्यालङ्कारार्थो निपातः । मात्सर्यं परगुणाक्षमता । अहङ्कारः अभिजनविद्यानिमित्तो गर्वः । ¹कुम्भोधान्याः दशाहं जीवनौपयिकधान्याः । अनेन च सन्तुष्टतोपलक्ष्यते । अलोलुपता वैतृष्ण्यम् । दम्भो लोकप्रत्ययार्थ धर्मध्वजोच्छ्रायः । दर्पो ²धर्मातिरेकमूलोऽतिहर्षः । लोभः प्रसिद्धः । मोहः कृत्याकृत्यविवेकशून्यता । दम्भादिविवर्जिताः ॥ ५ ॥
किञ्च—
³धर्मेणाऽधिगतो येषां वेदस्सपरिवृंहणः ।
शिष्टास्तदनुमानज्ञाः श्रुतिप्रत्यक्षहेतवः ॥ इति ॥ ६ ॥
**अनु०—**जिन्होंने इतिहास, पुराण, आदि विभिन्न प्रभेदों सहित वेद का अध्ययन तथा अर्थ का बोध धर्मानुसार प्राप्त कर लिया है, जो श्रुति को ही धर्म का प्रत्यक्ष हेतु मानते हैं, और उसके ( स्मार्त, शिष्टाचारण की श्रुति और ) अनुमान के ज्ञाता हैं ॥ ६ ॥
**टिप्पणी—**इस पद्य के अन्त में 'इति' यह सूचित करता है कि यह उद्धृत अंश है । "जो वेद से अनुमान निकालने के ज्ञान से युक्त हैं, और श्रुति से इन्द्रिय-प्रत्यक्ष प्रमाणों को प्रस्तुत करने में समर्थ हैं ।" = ब्यूह्लर कृत अंग्रेजी अनुवाद के अनुसार ।
येषामिति कृद्योगे षष्ठी 'कर्तृकर्मणोः कृति' इति । इतिहासपुराणाभ्यां सहितो वेदो ग्रन्थतोऽर्थतश्च यैरवगत इत्यर्थः । बृंहणग्रहणं स्मृतिसदाचारशास्त्राणामप्युपलक्षणार्थम् । श्रुतिप्रत्यक्षहेतवश्च श्रुतिरेव प्रत्यक्षं कारणमस्य धर्म-
१. स्वकुटुम्बपोषणे षडहंमात्रपर्याप्तधान्यः कुम्भीधान्य इति विज्ञानेश्वरो गोविन्दराजोऽपि । वर्षनिर्वाहोचितधान्यः कुम्भीधान्य इति कुल्लूकः । षाण्मासिकधान्यादिनिश्चयः इति मेधातिथिः ॥ ( मनु० ४. ७. )
२. धर्मातिरेकमूलान्मतिहर्षः इति क. पु.
३. श्लोकोऽयं किञ्चिदन्यथयितो मानवे दृश्यते ( मनु० १२. १०९ )
| ४ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ परिषद् |
|---|
स्येति येषां दर्शनमिति विग्रहः । अनेन मीमांसकाः कीर्तिताः । अत एव तदनुमानज्ञास्ते भवन्ति स्मार्तशिष्टागमयोश्चैत्यनुमानविद् इत्यर्थः । एवं च शाखाधिगतो यो धर्मस्सोऽनुष्ठेय इत्यभिप्रायः ॥ ६ ॥
तदभावे दशावरा परिषत् ॥ ७ ॥
अनु०—उपर्युक्त लक्षण वाले शिष्टजनों के न होने पर कम से कम दस सदस्यों की परिषत् धर्म का निर्णय करने में प्रामाणिक होती है ॥ ७ ॥
उक्तलक्षणशिष्टाभावे दशावरा परिषत् ; तया यो विधीयते सोऽनुष्ठेय इत्यर्थः ॥ ७ ॥
तच्च परकीयमतेन । स्वमतं प्रदर्शयितुमाह—
अथाप्युदाहरन्ति— चातुर्वैद्यं विकल्पी च अङ्गविद्धर्मपाठकः । आश्रमस्थास्त्रयो विप्राः पर्षदैषा दशावरा ॥ ८ ॥
अनु०—इस विषय में भी यह पद्य उद्धृत किया जाता है— चार वेदों को जानने वाले चार व्यक्ति, एक विकल्पी अर्थात् मीमांसक, वेद के अङ्गों (व्याकरणादि) का ज्ञाता, धर्मशास्त्र का पाठ करने वाला (अर्थात् धर्मशास्त्र का अर्थ जानने वाला), तीन विभिन्न आश्रमों के तीन ब्राह्मण—इनकी दस सदस्यों वाली परिषत् होती है ॥ ८ ॥
टिप्पणी—चार व्यक्तियों में प्रत्येक एक-एक वेद का ज्ञाता होता है । तीन विभिन्न आश्रमों के ब्राह्मणों ‘आश्रमस्थास्त्रयो विप्राः’ के विषय में टीकाकार गोविन्द स्वामी का मत है कि वानप्रस्थी वन में निवास करने के कारण परिषद् में नहीं आ सकता । परिव्राजक भिक्षा के लिए ग्राम में आता जाता रहता है, इसी प्रकार नैष्ठिक ब्रह्मचारी भी परिषत् में लिया जा सकता है । "चाश्रमस्थास्त्रयो मुख्याः" भी पाठ है ।
चतस्र एव विद्याश्चातुर्वैद्यं तेन तद्विदो लक्ष्यन्ते । विकल्पी मीमांसकः । अङ्गं व्याकरणादि तज्ज्ञः । धर्मपाठकः तन्मूलिका तदर्थावगतिरिति पाठग्रहणम् । तदभिज्ञ इत्यर्थः । तान् विशिनष्टि—आश्रमस्थास्त्रयो विप्राः अवानप्रस्थास्त्रयो गृह्यन्ते । वानप्रस्थानां पुनर्वनाधिवासत्वादनधिकारो धर्मोपदेशस्य । परिव्राजकोऽपि भिक्षार्थी ग्राममियादेव । तथा च गौतमः—'प्रागुपोत्तमात्रय आश्रमिणः' इति । विप्रा इति क्षत्रियवैश्ययोर्धर्मोपदेशानधिकारप्रदर्शनार्थं विप्रग्रहणम् । 'ब्राह्मणो धर्मान् प्रब्रूयात्' इति वसिष्ठवचनाच्च । 'आश्रमस्था-
प्रथमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ५
त्रयो मुख्याः' इति पाठे नैष्ठिकब्रह्मचारो गृह्यते । 'यथा धर्मस्कन्धब्राह्मणे ताननुक्रम्य 'सर्व एते पुण्यलोका भवति' इति । एवंगुणास्त्रय आश्रमिणो दशाद्वरा परिषद् भवति ॥ ८ ॥
अथाऽनुकल्पमाह—
पञ्च वा स्युस्त्रयो वा स्युरेको वा स्यादनिन्दितः ।
प्रतिवक्ता तु धर्मस्य नेतरे तु सहस्रशः ॥ ९ ॥
**अनु०—**अथवा परिषद् में पाँच या तीन सदस्य हो सकते हैं, यहाँ तक कि पातक आदि दोषों से मुक्त एक श्रेष्ठ आचरण वाला व्यक्ति भी धर्म के विषय में निर्णय दे सकता है, किन्तु उससे भिन्न आचरण वाले पातकादि दोष वाले सहस्रों व्यक्तियों के समूह को भी धर्म के विषय में प्रमाण नहीं माना जा सकता ॥ ९ ॥
इस संबन्ध में याज्ञवल्क्यस्मृति १.९ में कहा गया है :—
चत्वारो वेदधर्मज्ञाः पर्षत् त्रैविद्यमेव वा ।
सा ब्रूते यं स धर्मस्स्यादेको वाऽध्यात्मवित्तमः ॥
इसी प्रकार मनुस्मृति १२-१११–११३ में कहा गया है—
त्रैविद्यो हेतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः ।
त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिषत्स्या दशावरा ॥
ऋग्वेदविद्यजुर्विच्च सामवेदविदेव च ।
त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया धर्मसंशयनिर्णये ॥
एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद् द्विजोत्तमः ।
स विज्ञेयः परो धर्मो नाऽज्ञानादुदितोऽयुतैः ॥
सम्भवापेक्षो विकल्पः । अनिन्दितः पातकादिदोषरहितः । तृतीयो वाशब्दोऽपि शब्दस्याऽर्थे द्रष्टव्यः । आह च—
एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद्विचक्षणः । इति ॥
१. छान्दोग्ये त्रयो धर्मस्कन्धाः इत्यारभ्याऽऽम्नातं ब्राह्मणं धर्मस्कन्धब्राह्मणम् ।
२. चत्वारो वेदधर्मज्ञाः पर्षत् त्रैविद्यमेव वा । सा ब्रूते यं स धर्मस्स्यादेको वाऽध्यात्मवित्तमः ॥ इति याज्ञवल्क्यः ( या. स्मृ. १.९ )
त्रैविद्यो हेतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः । त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिषत्स्याद् दशावरा ॥ ऋग्वेदविद्यजुर्विच्च सामवेदविदेव च । त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया धर्मसंशयनिर्णये ॥ एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद्द्विजोत्तमः । स विज्ञेयः परो धर्मो नाऽज्ञानादुदितोऽयुतैः ॥ इति मनुः ( म. स्मृ. १२. १११–११३ )
| ६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ परिषत् |
|---|
अपिशब्दादेकेन न वाच्यम्। वक्ष्यति च 'बहुद्वारस्य धर्मस्य' ( १.१३ ) इति। तुशब्दोऽवधारणार्थः ॥ ९ ॥
'अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् । सहस्रशस्समेतानां परिषत्त्वं न विद्यते ॥ इति ॥ १० ॥
**अनु०—**व्रतहीन, मन्त्र को न ग्रहण करने वाले, केवल जाति के नाम पर जीविका निर्वाह करनेवाले, सहस्र व्यक्तियों के समूह को भी परिषत् के लक्षण से युक्त नहीं माना जाता है ॥ १० ॥
'नेतरे तु सहस्रशः' इति² सामर्थ्ये सिद्धे सत्यारम्भादत्यन्तापद्यव्रतादीननुगृह्णाति । आह च— जातिमात्रोपजीवी च कामं स्याद् ब्राह्मणब्रुवः । धर्मप्रवक्ता नृपतेर्न तु शूद्रः कथञ्चन ॥ इति ॥ १० ॥
'नेतरे तु सहस्रशः' इत्युक्तम्, तत्रैव निन्दामाह— यथा दारुमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । ब्राह्मणश्चाऽनधीयानस्त्रयस्ते नामधारकाः ॥ ११ ॥
**अनु०—**जैसा काठ का हाथी या चमड़े का कृत्रिम मृग होता है वैसा ही वेदाध्ययन न करने वाला ब्राह्मण भी होता है और ये तीनों केवल जाति का नाम ही धारण करते हैं ॥ ११ ॥
स्पष्टम् ॥ ११ ॥
अत्यन्तापद्यपि एकोद्दिष्टभोक्तृवत् वक्तृणामपि दोषोऽस्तीति दर्शयितुमाह— यद्वदन्ति तमोमूढा मूर्खा धर्ममजानतः । तत्पापं शतधा भूत्वा वक्तॄन् समधिगच्छति ॥ १२ ॥
**अनु०—**अज्ञान रूपी अन्धकार से घिरे हुए, धर्म को न जानने वाले मूर्ख जिस (पाप कर्म के विषय में किसी प्रायश्चित्त) का विधान करते हैं वह पाप सौ-गुना हो कर उस ढोंगी धर्मवक्ता के ऊपर ही आ पड़ता है ॥ १२ ॥
१. प्राजापत्यादिभिः कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिश्च व्रतं रहिताः अव्रताः। अनधीतवेदाः अमन्त्राः। सूत्रमिदं खण्डान्त एव पठितं मूलपुस्तकयोः। पापेभ्यो विप्रमुच्यत इत्यंशस्य द्विरुक्तिरपि दृश्यते।
२. सामान्ये सति इति. क पु.
प्रथमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ७
प्रथमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ७
व्यवहारं प्रायश्चित्तादिकं वा यद्वदन्ति तमसा अन्धकारेणाऽऽविष्टा अजा- नतः अजानन्तः यस्मिन् पापकर्मणि एभिः प्रायश्चित्तं विहितमिति शेषः ॥१२॥
‘एको वा स्यादनिन्दितः’ ( १.१.९ ) इति यदुक्तं, तत्राऽऽह—
बहुद्वारस्य धर्मस्य सूक्ष्मा दुरनुगा गतिः ।
तस्मान्न वाच्यो ह्येकेन बहुज्ञेनाऽपि संशये ॥ १३ ॥
अनु०— ( श्रुति, स्मृति, सदाचार आदि प्रमाणों पर आश्रित ) धर्म के अनेक द्वार हैं । उसका मार्ग अत्यन्त सूक्ष्म और कठिन है । इसलिए संशय होने पर एक व्यक्ति को अकेले निर्णय नहीं देना चाहिए, भले ही वह अनेक विद्याओं का ज्ञाता क्यों न हो ॥ १३ ॥
अनेकश्श्रुतिस्मृतिसदाचारप्रमाणकत्वाद्धर्मस्य बहुद्वारत्वम् । अत एव चाऽस्य सूक्ष्मत्वं दुरनुगत्वं च । तथा हि—
शाखानां विप्रकीर्णत्वात् पुरुषाणां प्रमादतः ।
नानाप्रकरणस्थत्वात् सूक्ष्मा दुरनुगा गतिः ॥
तस्मात् इत्युपसंहारः ॥ १३ ॥
बहवः पुनः—
धर्मशास्त्ररथारूढा वेदखड्गधरा द्विजाः ।
क्रीडार्थमपि¹ यद् ब्रूयुस्स धर्मः परमःस्मृतः ॥ १४ ॥
अनु०-- धर्मशास्त्र-रूपी रथ पर चलने वाले, वेद-रूपी खड्ग को धारण करने वाले द्विज खेल में ही जो कुछ कह दे वह परम धर्म माना जाता है ॥ १४ ॥
शिष्टानां प्राबल्यं प्रदर्शयितुं धर्मशास्त्राणि वेदांश्च रथायुधैरुपमीयन्ते ॥१४॥
शिष्टैर्हि वर्णाश्रमादयो व्यवस्थापिताः । तेषु पापं न लिप्यत इत्याह—
यथाऽश्मनि स्थितं तोयं मारुतोऽर्कः प्रणाशयेत् ।
तद्वत्कर्त्तरि यत्पापं जलवत् संप्रलीयते ॥ १५ ॥
अनु०-- जिस प्रकार पत्थर के ऊपर एकत्र जल को वायु और सूर्य सुखा कर नष्ट कर देते हैं उसी प्रकार ( शिष्ट वचन के अनुसार ) करने वाले का जो भी पाप होता है, वह जल के समान नष्ट हो जाता है ॥ १५ ॥
१. अपिशब्दात् किमुत्यं प्रतीयते । यदि विचार्य ब्रूयुः, तर्हि किं वक्तव्यमिति ।
| ८ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ देशाचारः |
|---|
अथैनामघिनोऽप्यवस्थां परिज्ञाय प्रायश्चित्तं विधीयत इत्याह—
शरीरं बलमायुश्च वयः कालं च कर्म च ।
समीक्ष्य धर्मविद्बुद्ध्या प्रायश्चित्तानि निर्दिशेत् ॥ १६ ॥
अनु०--शरीर, बल, आयु, अवस्था, समय और कर्म का पूरी तरह से विचार करके ही धर्मज्ञाता विवेकपूर्वक प्रायश्चित्त का विधान करे ॥ १६ ॥
शरीरं वातप्रकृतिकं पित्तप्रकृतिमित्यादि । आयुः ज्ञानं अयतेर्गत्यर्थादौणादिकः उण्प्रत्ययः । वयः बाल्यादिलक्षणम् । कालः शीतोष्णादिलक्षणः । कर्म प्रायश्चित्तस्य निमित्तभूतं सानुबन्धं हिंसादि ॥ १६ ॥
इति प्रथमप्रश्ने प्रथमाध्याये प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥
प्रथमाध्याये द्वितीयः खण्डः
श्रौतस्मार्तशिष्टागम इति त्रिविधो धर्मो व्याख्यातः । तथा तत्र तत्र व्यवस्थिततया शिष्टाचारितानां धर्माणां—
पञ्चधा विप्रतिपत्तिर्दक्षिणतस्तथोत्तरतः ॥ १ ॥
अनु०--दक्षिण और उत्तर में पाँच विषयों में पारस्परिक विरोध है ॥ १ ॥
टिप्पणी--गोविन्दस्वामी ने व्याख्या में दक्षिण से नर्मदा और विन्ध्य के बीच के भूप्रदेश का तथा उत्तर से विन्ध्य से लेकर हिमालय तक का प्रदेश बताया है ।
दक्षिणेन नर्मदामुत्तरेण¹ कन्यातीर्थम् । उत्तरतस्तु दक्षिणेन हिमवन्तमुदग्विन्ध्यस्य । एतद्देशप्रसूतानां शिष्टानां परस्परं पञ्चधा विप्रतिपत्तिः विसंवादः 'यान् पदार्थान् अनुतिष्ठन्ति दाक्षिणात्याः न तानुदीच्याः । यानुदीच्या न तान् दाक्षिणात्याः' इति ॥ १ ॥
तत्र प्रथमम्—
यानि दक्षिणतस्तानि व्याख्यास्यामः ॥ २ ॥
अनु०—इनमें जो आचरण विशेषतः दक्षिण में प्रचलित हैं उनकी हम व्याख्या करेंगे ॥ २ ॥
²निगदव्याख्यातमेतत् ॥ २ ॥
१. कन्याकुमारी इति दक्षिणसमुद्रतीरे प्रसिद्धं स्थानम् ।
२. पाठमात्रेणार्थोऽवगम्यते । नाऽत्र व्याख्यानापेक्षेत्यर्थः ।
द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ९
द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ९
तत्रेमान्युदाहरणानि-- यथैतदनुपेतेन सह भोजनं स्त्रिया सह भोजनं पर्युषितभोजनं मातुलपितृष्वसृदुहितृगमनमिति ॥ ३ ॥
अनु०—ये विशिष्ट आचरण ये हैं:-जिनका यज्ञोपवीत नहीं हुआ है उनके साथ भोजन करना, पत्नी के साथ भोजन, बासी अन्न का भोजन, मामा की पुत्री से विवाह, बुआ ( पिता की बहन ) की पुत्री से विवाह ॥ ३ ॥
मातुलदुहितृगमनं पितृष्वसृदुहितृगमनमिति सम्बन्धः । ऋज्वन्यत् ॥३॥
अथोत्तरतः ऊर्णाविक्रयः शीधुपानमुभयतोदद्भिर्व्यवहारः आयुधीयकं समुद्रसंयानमिति ॥ ४ ॥
अनु०--उत्तर में जो आचरण विशिष्ट हैं, वे हैं—ऊन बेचने का व्यापार मदिरा-पान, उन पशुओं का विक्रय, जिनके मुख में ऊपर और नीचे दोनों ओर दाँत होते हैं, अस्त्र-शस्त्र का व्यापार तथा समुद्र की यात्रा ॥ ४ ॥
ऊर्णायास्तद्विकारस्य च कम्बलादेर्विक्रयः । उभयतो दन्ता अश्वादयः । व्यवहारः विक्रयादिः आयुधीयकं शस्त्रधारणम् समुद्रसंयानं नावा द्वीपान्तरगमनम् ॥ ४ ॥
इतरदितरस्मिन् कुर्वन् दुष्यतीतरदितरस्मिन् ॥ ५ ॥
अनु०—जिस प्रदेशों में जो आचरण प्रचलित हैं उससे भिन्न प्रदेश में उन आचरणों का व्यवहार दोष उत्पन्न करता है ॥ ५ ॥
टि०—दक्षिण की विशिष्ट रीतियों का उत्तर में आचरण करना दोष उत्पन्न करता है। उत्तर के विशिष्ट कर्मों का दक्षिण में आचरण दोषजनक होता है। इस सम्बन्ध में भट्टकुमारिल के दो वाक्यों को गोविन्दस्वामी ने उद्धृत किया है। "स्वमातुलसुतां प्राप्य दाक्षिणात्यस्तु तुष्यति" "अहिच्छत्रब्राह्मण्यस्सुरां पिबन्ति"।
इतरत् अनुपेतेन सह भोजनादि, इतरस्मिन्नुत्तरापथे कुर्वन् दुष्यति तत्रत्यैश्शिष्टैः दूष्यत इत्यर्थः । एवमूर्णाविक्रयादीनि कुर्वन्नितरत्र । तस्मादनुपेतेन सह भोजनादीनि दाक्षिणात्यैश्शिष्टैराचर्यमाणत्वात् दोषाभावाच्च तैरेव कर्तव्यानि । ऊर्णाविक्रयादीनि चोदीच्यैरेव । तदेतद्भट्टकुमारिलैर्निरूपितम्
(१) स्वमातुलसुतां प्राप्य दाक्षिणात्यस्तु तुष्यति ॥ इति ॥
१. शूद्रान्नभोजनेनाऽपि तुष्यन्त्यन्ये द्विजातयः । इति पूर्वार्धम् ।
| १० | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ देशाचारः |
|---|
'तथा हि—अहिच्छत्रब्राह्मण्यस्सुरां पिबन्ति ।। इति च ॥ ५ ॥'
ननु किमिति व्यवस्था ? यावता मूलश्रुतिरेषामविशेषेण कल्प्यते यथा ^२होलाकादीनाम् । यथा वा बौधायनीयं धर्मशास्त्रं कैश्चिदेव पाठ्यमानं सर्वाधिकारं भवति । गौतमयोगोभिलोये छन्दोगैरेव पठ्येते, वासिष्ठं तु बह्वृचैः, अथ च सर्वाधिकारणि । यथा वाऽन्यानि शास्त्राणि यथा वा गृह्यशास्त्राणि सर्वाधिकारणि, तद्वदनुपनीतसहभोजनादीन्यपि समानि कस्मान्न भवन्तोत्याशङ्कयाऽऽह—
तत्र तत्र देशप्रामाण्यमेव स्यात् ॥ ६ ॥
अनु०--इन विशिष्ट विषयों में उसी प्रदेश के नियम को प्रमाण मानना चाहिए ॥ ६ ॥
एवं व्यवस्थितविषयैव मूलश्रुतिः कल्प्यते । किन्नामाऽनुपपत्तिं कल्पयतीत्यभिप्रायः । तस्माद्व्यवस्थितविषयमेवाऽनुष्ठानं तद्वर्जनं च ।
मिथ्यैतदिति गौतमः ॥ ७ ॥
अनु०--किन्तु यह मिथ्या है, ऐसा धर्मसूत्रकार गौतम का मत है ॥ ७ ॥
टि०--गौतम आदि सूत्रकारों ने इन विशिष्ट स्थानीय आचरण नियमों को प्रामाणिकता नहीं प्रदान की है, वे उन धर्मों को तभी प्रमाण मानते हैं जब वे श्रुति सम्मत धर्म के अविरुद्ध हों । प्रायः सूत्रकारों ने यहाँ उल्लिखित विशिष्ट स्थानीय आचारों के विषय में भी प्रायश्चित्त की व्यवस्था की है । गोविन्दस्वामी ने अपनी टीका में कतिपय नियमों को उद्धृत किया है ।
गौतमग्रहणमादरार्थम्, नाऽऽत्मीयं मतं पर्युदसितुम् । स होवमाह—'देशजातिकुलधर्माश्चाऽऽम्नायैरविरुद्धाः प्रमाणम्' । तद्विरुद्धो देशादिधर्मो न कर्तव्यः । तद्विरुद्धश्चाऽयम् । आह च गृत्समदः-'अनुपनीतसहभोजने द्वादशरात्रमुच्छिष्टभोजने द्विगुणम्' इति । प्रायश्चित्तविधानान्निषेधः कल्प्यते । तथा 'स्त्रिया सह भोजने त्रिरात्रोपवासो घृतप्राशनं चेति' । तथा 'पर्युषितभोजने अहोरात्रोपवासः' इति संवर्तः । तथा मातुलदुहितृगमनेऽप्याह—
१. तन्त्रवार्तिके शिष्टाकोपाधिकरणे—अद्यत्वेऽप्याहिच्छत्रमथुरानिवासिब्राह्मणीनां सुरापानम्, इति वाक्यमस्ति । तदेवात्राऽनूदितमिति मन्यामहे ।
२. होलाकादयो देशविशेषेष्वनुष्ठीयमाना अपि न व्यवस्थाविषयाः । किन्तु सर्वैरप्यनुष्ठेया इति व्यवस्थापितं होलाकाधिकरणे पूर्वमीमांसायाम् । ( १.३.८. ) होलाका नाम फाल्गुनपोर्णमास्यां क्रियमाण उत्सवविशेषः ।
द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ११
द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः ११
सखिभार्यां समारुह्य मातुलस्याऽऽत्मजां तथा ।
चान्द्रायणं द्विजः कुर्याच्छ्वश्रमपि तथैव च ॥ इति ॥
तथा विवाहेऽपि—
पञ्चमीं मातृबन्धुभ्यः सप्तमीं पितृबन्धुतः ॥ इति ॥
आह च—
पैतृष्वसेयीं भगिनीं स्वस्त्रीयां मातुरेव च ।
मातुश्च भ्रातृरात्रां च गत्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥
एवमूर्णाविक्रयादिष्वप्याम्नायविरोधः प्रसिद्धः । ऊर्णा तावदपण्येषु पठिता । शीधुपाने गौतमः—‘नित्यं मद्यमपेयं ब्राह्मणस्य’ इति । तथोभयदन्तव्यवहारे वसिष्ठः—‘अश्वलवणमपण्यम्’ इति प्रकृत्य ‘ग्राम्यपशूनामेकशफाः केशिनश्च’ इत्याह । तथा च श्रुतिः—‘य उभयादत्प्रतिगृह्णात्यश्वं वा पुरुषं वा वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत्’ इति प्रायश्चित्तम् । तथाऽऽयुधीयकेऽपि ‘परीक्षार्थोऽपि ब्राह्मण आयुधं नाऽऽददीत’ इति । स्वयमेव पतनीयेषु समुद्रसंयानं (२.१.४१) वक्ष्यति । एवमादीन्यालोच्याऽऽम्नायैरविरुद्धाः प्रमाणमित्युक्तम् । अतो ‘मिथ्यैतदिति गौतमः’ इत्युपपन्नं भवति ॥ ७ ॥
एतदेव स्वमतमित्याह—
'उभयं चैव नाऽऽद्रियेत ॥ ८ ॥
अनु०— ( उत्तर और दक्षिण ) दोनों ही प्रदेशों के विशिष्ट रिवाजों का आचरण नहीं करना चाहिए ॥ ८ ॥
च-शब्दः पक्षव्यावृत्त्यर्थः । अनुपेतादि सहभोजनमूर्णाविक्रयादि चोभयमपि न कर्तव्यमित्यभिप्रायः ॥ ८ ॥
कस्मादित्याह—
शिष्टस्मृतिविरोधदर्शनात्² शिष्टागमविरोधदर्शनाच्च ॥ ९ ॥
अनु०— क्योंकि ये आचरण ( मनु आदि ) शिष्ट जनों की स्मृतियों के विरुद्ध हैं तथा शिष्ट जनों की परम्परा के विरुद्ध हैं ॥ ९ ॥
टि०— यह सूत्र कहीं कहीं खण्डित मिलता है । गोविन्दस्वामी ने शिष्ट का अर्थ मनु से लिया है । "शिष्टो हि मनुः" ।
१. उभयं त्वेव नाद्रियेत । तुशब्दः पक्ष. इति. ग. पु.
२. ‘शिष्टागमविरोधदर्शनात्’ इति नास्ति घ. पुस्तके सूत्रमिदमनुवदत्सु ग्रन्थान्तरेषु च ।
| १२ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ देशाचारः |
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शिष्टाममविरोधस्तावत् स्वयमुदितः 'पञ्चधा विप्रतिपत्तिः' ( १. २१. ) इत्यत्र । स्मृतिविरोधश्चाऽनुपनीतादिसहभोजने प्रायश्चित्तविधानात् । शिष्टस्मृतिविरोधः मनुविरोधः । शिष्टो हि मनुः । तद्विरोधश्च । तत्स्मृतिः शिष्टस्मृतिः । शिष्टस्मृतिविरोधः सोऽपि दर्शित एव । एकसूत्रतां त्वेके मन्यन्ते । यथा होलाकादयो व्यवस्थितदेशविषया अप्यन्यव्यवस्थिताः कर्तव्याः । इत्थमिमेऽपीत्यस्य चोद्यस्य व्यवस्थितदेशश्रुत्यनुमानमुक्तं 'तत्र तत्र देशप्रामाण्यमेव स्यात्' (१.२६.) इति तत्राह—'उभयं चैव नाऽऽद्रियेत शिष्टस्मृतिविरोधदर्शनात्' इति । स च विरोध उक्तः । तस्मादविरुद्धत्वाद्वोलाकाद्यनुष्ठानं सर्वाधिकारकम् । इह विरोधादनुपनीतसहभोजनादिवर्जनं सर्वाधिकारमिति विशेषः । आहुश्च न्यायविदः 'विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम्' इति ॥ ५ ॥
अथ शिष्टदेशानाह—
'प्रागदर्शनात् प्रत्यक्कालकवनाद्दक्षिणेन हिमवन्तमुदक्पारियात्रमेतदार्यावर्तं तस्मिन् य आचारस्स प्रमाणम्' ॥ १० ॥
अनु०—( सरस्वती नदी के ) लुप्त होने के स्थान से पूर्व की ओर कालकवन नाम के वन से पश्चिम हिमालय पर्वत से दक्षिण का और पारियात्र पर्वत से उत्तर का भूभाग आर्यावर्त है, इस भूभाग में जो आचार-नियम प्रचलित है वही प्रमाण है ।
**टि०—**द्रष्टव्य मनु० २।२२ 'आ समुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात् । तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्तं विदुर्बुधाः ।'
तत्राऽपि शिष्टस्मृतिविरोधेऽनपेक्ष्यमेव ॥ १० ॥
१. अदर्शनः सरस्वत्या नद्या यत्र देशेऽन्तर्धानं स देशः । आर्यावर्तलक्षणं मनुनोक्तम्—आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात् । तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्तं विदुर्बुधाः ॥ इति ॥ ( मनु० २-२२ ) शूद्राणामनिरवसितानाम् ( २. ४. १० ) इति पाणिनिसूत्रे भगवान् पतञ्जलिः 'कः पुनरार्यावर्तः ?' इति प्रश्नमुत्थाप्य तत्समाधानत्वेन "प्रागादर्शात् प्रत्यक्कालकवनाद् दक्षिणेन हिमवन्तमुदक्पारियात्रम्" इतीदमेव सूत्रमुददीधरत् इति प्रतिभाति । तत्रा "ऽऽदर्शादयः पर्वतविशेषाः" इति कैयटेन व्याख्यातम् । परन्तु बहुषु बौधायनधर्मसूत्रपुस्तकेषु हस्तलिखितेषु मुद्रितेषु च "प्रागदर्शनात्" इत्येव पाठस्समुपलभ्यते । अतः 'यत्प्राग्विनशनादपि' इति मनुवचनानुरोधेन च सूत्रे "अदर्शनात्" इत्येव पाठस्समुचितः, तस्य च यत्र सरस्वती नदी अदर्शनं गता स देशः विनशनाख्य एवाऽयं इत्युचितं प्रतिभाति ।
द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः १३
द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः १३
'गङ्गायमुनयोरन्तरमित्येके ॥ ११ ॥
अनु०—कुछ आचार्यों के अनुसार गंगा और यमुना नदियों के बीच का भूप्रदेश आर्यावर्त है ॥ ११ ॥
आर्यावर्तत्वे विकल्पः ॥ ११ ॥
अथाऽप्यत्र भाल्लविनो गाथामुदाहरन्ति ॥ १२ ॥
अनु०—इस सम्बन्ध में भाल्लविन् शाखा के अनुयायी एक गाथा भी उद्धृत करते हैं ॥ १२ ॥
टि०—गोविन्द स्वामी की टीका में भाल्लवियों को सामवेद की एक शाखा का बताया गया है ।
आर्यावर्तान्तरप्रदर्शनार्थं भाल्लविनः छन्दोगविशेषाः । गाथा श्लोकः ॥१२॥
तमाह— पश्चात् सिन्धुर्विसरणी सूर्यस्योदयनं पुरः । यावत्² कृष्णो विधावति तावद्धि ब्रह्मवर्चसमिति ॥ १३ ॥
अनु०—पश्चिम में लुप्त होनेवाली नदी पूर्व में सूर्य के उदय का स्थान —इनके बीच जहाँ तक कृष्णमृग पाया जाता है, वहाँ तक ( अध्ययन, ज्ञान, अनुष्ठान से उत्पन्न ) ब्रह्मतेज भी पाया जाता है ॥ १३ ॥
टि०—'सिन्धुः विसरणी' का सामान्यतः लुप्त होनेवाली नदी अर्थ किया गया है, किन्तु 'विकरणी' या 'विकरण' पाठ भी मिलता है जिसका अर्थ विभाजन करनेवाली नदी है । 'सिन्धु-विसरणी' से सरस्वती का अर्थ लेना अधिक संगत प्रतीत होता है ।
कृष्णः कृष्णमृगः । ब्रह्मवर्चसं अध्ययनज्ञानानुष्ठानाभिजनसम्पत् । म्लेच्छ-देशस्त्वतः परम् ॥ १३ ॥
तदाह- अवन्तयोऽङ्गमगधाः सुराष्ट्रा दक्षिणापथाः । उपावृत्सिन्धुसौवीरा एते संकीर्णयोनयः ॥ १४ ॥
१. अस्य च मूलम्—तैत्तिरीयारण्यके द्वितीयप्रपाठकान्तिमानुवाकस्यं "नमो गङ्गायमुनयोर्मुनिभ्यश्च नमः" इति वाक्यमिति विभावयामः ॥
२. कृष्णा विधावन्तीति क. पु. अत्र वासिष्ठान्यपि सूत्राणि प्रायश इमान्येवा-ऽनुकुर्वन्ति ।
१४ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ अगम्यदेशाः
**अनु०—**अवन्ति, अङ्ग, मगध, सुराष्ट्र, दक्षिणापथ, उपावृत्, सिन्धु देशों के निवासी तथा सौवीर संकीर्णयोनि (मिश्रित उत्पत्तिवाले) होते हैं ॥ १४ ॥
**टि०—**इस गाथा का भाव यह है कि इन देशों में जो नियम या आचार प्रचलित है वे प्रामाणिक नहीं हैं, क्योंकि इन देशों के निवासियों की उत्पत्ति शुद्ध नहीं है।
^१स्त्रीषु व्यवस्था नाऽस्तीति यावत् । अवन्त्यादिषु कल्याणचारो नाऽस्ति ॥ १४ ॥
किञ्च–केचिद्देशाः प्रवेशार्हा अपि न भवन्ति । तत्प्रवेशे प्रायश्चित्तविधा-नात् । तत्र दूरोत्सारितमाचारग्रहणमित्याह—
आरट्टान् कारस्करान् पुण्ड्रान् सौवीरान् वंगान् कलिङ्गान् प्रानूनानिति च गत्वा पुनस्तोमेन यजेत सर्वपृष्ठया वा ॥ १५ ॥
**अनु०—**आरट्ट, कारस्कर, पुण्ड्र, सौवीर, वंग, कलिग, प्रानून—इनमें से किसी प्रदेश की यात्रा करने पर (प्रायश्चित्तस्वरूप) पुनस्तोम या सर्वपृष्ठा इष्टि करनी चाहिए ॥ १५ ॥
**टि०—**इस सूत्र के अनुसार उपर्युक्त प्रदेशों में प्रवेश करना पापजनक या दोष का कारण होता है और उसके लिए प्रायश्चित्त करना होता है । अवन्ती प्रयाग से पश्चिमोत्तर प्रदेश, अंग पूर्वी बंगाल, मगध बिहार, सौराष्ट्र दक्षिणी काठियावाड़ का प्रदेश है । सौवीर सम्भवतः पश्चिमी-दक्षिणी पंजाब के निवासी थे ।
आरट्टों का निवासस्थान पंजाब था, कारस्कर सम्भवतः दक्षिण भारतीय थे । कलिग कृष्णा नदी के मुहाने और उड़ीसा के बीच का प्रदेश है । उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण ७।१८ में तथा महाभारत में भी है । इस विषय में ब्यूह्लैर के अंग्रेजी अनुवाद की टिप्पणी द्रष्टव्य है ।
^२पुनस्तोमो नाम एकाहः । इष्टप्रथमसोमस्यैव प्रायश्चित्तमेकाहकाण्डोक्तं द्रष्टव्यम् । 'यदि पद्धयामेव विशेषं कुर्वीतैष ह वै पद्धयां पापं करोत्यारट्टान् कारस्करान् पुण्ड्रान् सौवीरान् वा गच्छति' इति । ^३सर्वपृष्ठेष्टिस्त्वाहिताग्नि-
१. स्त्रीपुंसयोरिति, ग. पु.
२. अथैष पुनस्तोमः “यो बहु प्रतिगृह्य गरगीरिव मन्येत स एतेन यजेत” ( तां. ब्रा. १९.४. १) ( का. श्रौ. २२.१०.१६) इत्यनेन यो विहितस्सोमयाग एकाहा-त्मकः सः । एकसुत्याकस्सोमयाग एकाह इत्युच्यते ।
३. बृहत्, रथन्तर वैरूप, नैराज, शाक्वर, रैवताख्यानि, षट् सामानि पृष्ठाख्य-स्तोत्रसाधनभूतानि । तत्प्रतिपाद्यगुणविशिष्ट इन्द्रो देवताऽस्या इष्टेरिति कृत्वा इष्टि-रियं सर्वपृष्ठेष्टिरिति कथ्यते ।
द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः १५
द्वितीयः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः १५
मात्रस्य। सा च 'य इन्द्रियकामो वीर्यकामस्स्या'दित्यत्र विहिता। अनाहिता- ग्नेस्तु वक्ष्यति—'प्रतिषिद्धदेशगमन' इति ॥ १५ ॥
पुनरप्याहिताग्नेरेव देशान्तरगमने प्रायश्चित्तमाह—
अथाऽप्युदाहरन्ति—
पद्भ्यां स कुरुते पापं यः कलिङ्गान् प्रपद्यते । ऋषयो निष्कृतिं तस्य प्राहुर्वैश्वानरं हविः ॥ १६ ॥
अनु०—इसी विषय में एक और गाथा कही जाती है—जो कलिङ्ग देश की यात्रा करता है वह पैरों से पाप करता है, उसके प्रायश्चित्त के लिए ऋषियों ने वैश्वानरी इष्टि का विधान किया है ॥ १६ ॥
टि०—कलिङ्गगमन के लिए १५ के अन्तर्गत उद्धृत गाथा में पुनस्तोम या सर्वपृष्ठ इष्टि का प्रायश्चित्त बताया गया है, उसका अन्य विकल्प वैश्वानरी इष्टि भी है । गोविन्दस्वामी ने एक विशिष्टता प्रदर्शित की है कि आरट्ट आदि में न केवल प्रवेश के लिए अपितु वहाँ के लोगों के साथ बोलने, उठने-बैठने के लिए भी प्रायश्चित्त करना होता है, किन्तु कलिग में यात्रामात्र के लिए ही प्रायश्चित्त करना होता है ।
वैश्वानरं हविः वैश्वानरेष्टिः । एषा च कलिङ्गगमने सर्वपृष्ठया सह विकल्प्यते । अथ वा—आरट्टादिषु न गमनादेव प्रायश्चित्तं किं तर्हि सम्भाषण-सहासनादिभिरपि । कलिङ्गे पुनर्गमनमात्रमिति विशेषः ॥ १६ ॥
अथाऽप्याह—
बहूनामपि दोषाणां कृतानां दोषनिर्णये । पवित्रेष्टिं प्रशंसन्ति सा हि पावनमुत्तममिति ॥ १७ ॥
अनु०—अनेक दोषों या पापों के करने पर दूर करने के लिए पवित्रेष्टि की ही प्रशंसा की गयी हैं ? वही सर्वाधिक पवित्र करनेवाली इष्टि है ।
निर्णये नितरां नये अपनोदने । पवित्रेष्टिश्च यज्ञप्रायश्चित्तेषु प्रसिद्धा ॥१७॥
अथैतत्प्रसङ्गादाह—
'वैश्वानरीं व्रातपतीं पवित्रेष्टिं तथैव च ।
१. वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत् ( तै. सं. २.२.६ ) इति विहितेष्टिर्वैश्वानरी । अग्नये व्रतपतये पुरोडाशमष्टाकपालं निर्वपेद्य आहिताग्निसन्नव्रत्यमिव चरेत्
| १६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् |
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ऋतावृतौ प्रयुञ्जानः पापेभ्यो विप्रमुच्यते ²पापेभ्यो विप्रमुच्यत इति ॥ १८ ॥
**अनु०—**जो वैश्वानरी इष्टि, व्रातपती इष्टि तथा पवित्रेष्टि को क्रमशः प्रत्येक ऋतु में करता है वह सभी पापों से पूर्णतः मुक्त हो जाता है ।
पवित्रेष्ट्याः पूर्वत्र ग्रहणं प्रशंसार्थम् । इह तु ऋतावृतार्विति कालविधानार्थम् । आसामेकैकस्या एव प्रयोगः । द्विरुच्चारणमादरार्थं विशेषज्ञापनार्थं वा ॥ १८ ॥
इति प्रथमप्रश्ने प्रथमाध्याये द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥
प्रथमाध्याये तृतीयः खण्डः
ब्रह्मचर्यमुपायच्छेत् गुरुशुश्रूषणं तथा ।
समिद्भैक्षगुरूक्तानां प्रायश्चित्तं विधीयते ॥
अथ ब्रह्मचर्यं प्रस्तूयते—तच्च समिदाधानं •भिक्षाचरणमाचार्योक्तकरणं स्वाध्यायाध्ययनं चेति । तच्चैतत् 'ब्राह्मणो वै ब्रह्मचर्यमुपयच्छंश्चतुर्धा भूतानी' ( १.४.७ ) त्यत्र स्पष्टीकरिष्यति । तत्कियन्तं कालं चरितव्यमित्यत आह—
अष्टाचत्वारिंशद्वर्षाणि पौराणं वेदब्रह्मचर्यम् ॥ १ ॥
**अनु०—**वेद के अध्ययन के लिए ब्रह्मचर्य की अवधि पुराने लोगों ने अड़तालीस वर्ष की निर्धारित की है ।
**टि०—**यज्ञोपवीत के बाद अड़तालीस वर्ष का ब्रह्मचर्य वेदाध्ययन के लिए निर्धारित था । पुराण से कृतयुगपुरुष, मनु आदि का अर्थ लिया जाता है । द्र०—गोविन्दस्वामी । अथवा पुराण से वेद का अर्थ लेंगे और वे 'तत्र भवं पौराणम्' अथवा इतिहास पुराण से उत्पन्न ।
( तै. सं. २.२.२.२ ) इति विहितेष्टिव्रातपती । अग्नये पवमानाय पुरोडाशमष्टाकपालं निर्वपेत्, अग्नये पावकाय, अग्नये शुचये, इतीष्टित्रयम्, पूर्वोक्ताभ्यां वैश्वानरी, व्रातपतीभ्यां सहेष्टिपञ्चकं पवित्रेष्टिरित्युच्यते ।
२. द्विरुक्तिरध्यायसमाप्तिसूचिकेति युक्तं वदितुम् ।