भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
३२२ भैषज्यरत्नावली । [ ज्वरातिसार-
सिद्धप्राणेश्वर रस ।
गन्धेशाभ्रं पृथग्वेदभागमन्यच्च भागिकम् ।
सर्जिटङ्कयवक्षाराः पञ्चव लवणानि च ॥ ५५ ॥
वराव्योषेन्द्रबीजानि द्विजीराग्नियमानिकाः ।
सहिङ्गु बीजसारं च शतपुष्पा सुचूर्णिता ॥ ५६ ॥
सिद्धप्राणेश्वरः सूतः प्राणिनां प्राणदायकः ।
माषकं भक्षयेदस्य नागवल्लीदलैर्युतम् ॥ ५७ ॥
उष्णोदकानुपानं च दद्यात्तत्र पलत्रयम् ।
ज्वरातिसारेऽतिसृतौ केवले वा ज्वरेऽपि च ॥ ५८ ॥
घोरे त्रिदोषजे रोगे ग्रहण्यामसृगामये ।
वातरोगे च शूले च शूले च परिणामजे ॥ ५९ ॥
शुद्धगन्धक, शुद्धपारा और अभ्रकभस्म ये प्रत्येक चार चार तोले, एवं सज्जी, सुहागा, जवाखार, सैंधानमक, साँभरनमक, विरियासंचरनमक, कचियानमक, कालानमक, हरड, आमला, बहेडा, सोंठ, पीपल, मिरच, इन्द्रजौ, जीरा, कालाजीरा, चीतेकी जड, अजवायन, हींग, वायविडंग और सोया ये प्रत्येक औषधि एकएक तोला लेवे। सबको एकत्र जलके द्वारा उत्तमप्रकारसे खरल करके एक एक माशेकी गोलियाँ बनालेवे। यह सिद्धप्राणेश्वर नामवाला रस प्राणियोंके लिये जीवनदाता है। इसकी एकएक गोली पानके साथ भक्षण करे और इसपर तीन पल प्रमाण गरम जलका अनुपान करे। इस रसको ज्वरातिसार, केवल अतिसार अथवा ज्वरमें तथा भयंकर त्रिदोषजनित रोग, ग्रहणी, रक्तविकार, वातरोग, शूल और परिणामजन्य-शूलमें प्रयोग करना चाहिये ॥ ५५–५९ ॥
कनकसुन्दररस ।
हिङ्गुलं मरिचं गन्धं पिप्पली टङ्कणं विषम् ।
कनकस्य च बीजानि समांशं विजयाद्रवैः ॥ ६० ॥
मर्दयेद्याममात्रं तु चणमात्रा वटी कृता ।
भक्षणाद्ग्रहणीं हन्ति रसः कनकसुन्दरः ॥ ६१ ॥
अग्निमान्द्यं ज्वरं तीव्रमतीसारं च नाशयेत् ।
पथ्यं दध्योदनं दद्याद्यद्वा तक्रौदनं चरेत् ॥ ६२ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २२३
सिंगरफ, मिरच, शुद्ध गन्धक, पीपल, सुहागा, शुद्ध मीठा तेलिया और धतूरेके बीज इन सबको समान भाग लेकर भाँगके रसमें एक प्रहरतक खरल कर चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । यह कनकसुन्दररस सेवन करतेही संग्रहणी, मन्दाग्नि, ज्वर और प्रबल अतीसारको नष्ट करता है । इसपर दही भात अथवा मट्ठे और भातका पथ्य देना चाहिये ॥ ६०-६२ ॥
बृहत्कनकसुन्दररस ।
शुद्धं सूतं समं गन्धं मरिचं टङ्कणं तथा ।
स्वर्णबीजं समं मर्द्यं भार्ङ्गीद्रवैर्दिनार्द्धकम् ॥ ६३ ॥
सूततुल्यं मृतं चाभ्रं रसः कनकसुन्दरः ।
अस्य गुञ्जाद्वयं हन्ति पित्तातीसारमुग्रकम् ॥ ६४ ॥
शुद्धपारा, शुद्धगन्धक, मिरच, सुहागेकी खील और धतूरेके बीज सबको समान भाग लेकर भारंगीके रसमें दो प्रहरतक खरल करे फिर उसमें पारेके बराबरभाग अभ्रकभस्म मिलादेवे तो बृहत्कनकसुन्दररस सिद्ध होता है । इसको दो दो रत्तीकी मात्रासे सेवन करनेसे अत्युग्र पित्तातिसार दूर होता है ॥ ६३॥६४ ॥
गगनसुन्दररस ।
टङ्कण दरदं गन्धमभ्रकं च समं समम् ।
दुग्धिकाय्रा रसेनैव भावयेच्च दिनत्रयम् ॥ ६५ ॥
द्विगुञ्जं मधुना देयं श्वेतसर्जस्य वल्लकम् ।
विविधं नाशयेद्रक्तं ज्वरातीसारमुल्बणम् ॥ ६६ ॥
पथ्यं तक्रं पयश्छागमामशूलं विनाशयेत् ।
अग्निवृद्धिकरो ह्येष रसो गगनसुन्दरः ॥ ६७ ॥
सुहागा, सिंगरफ, गन्धक और अभ्रक इन प्रत्येकको समान भाग लेकर दुद्धीके रसमें ३ दिनतक भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे एक एक गोली सफेद रालके दो रत्ती प्रमाण चूर्ण और शहदके साथ सेवन करनेसे विविध-प्रकारका रक्तविकार, ज्वर, अत्युग्र अतिसार और आमशूल नष्ट होता है और यह गगनसुन्दर रस विशेषकर जठराग्निकी वृद्धि करता है । इसपर मट्ठा और बकरीका दूध पथ्य है ॥ ६५-६७ ॥
कनकप्रभावटी ।
सुवर्णबीजं मरिचं मरालपादं कणा टङ्कणकं विषं च ।
गन्धं जयाद्भिर्दिवसं विमर्द्य गुञ्जाप्रमाणां वटिकां विदध्यात् ॥
२२४ भैषज्यरत्नावली । [ ज्वरातिसार-
घोरातिसारग्रहणीज्वराग्निमान्द्यं निहन्यात्कनकप्रमेयम् ।
दध्योदनं पथ्यमनुष्णवारि मांसं भजेत्तित्तिरिलावकानाम् ॥
धतूरेके बीज, मिरच, हंसपदी ( हंसराज ), पीपल, सुहागा, शुद्ध मीठा तेलिया और शुद्ध गन्धक इन सबको समान भाग लेकर भाँगके रस वा क्वाथमें एक दिन-तक खरल करके एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह कनकप्रभा वटी सेवन करतेही प्रबल अतिसार, ग्रहणी, ज्वर और अग्निमान्द्य आदि रोगोंको नष्ट करती है । इसपर दही भातका पथ्य, शीतलजल एवं तीतर और लवा पक्षीका मांसरस सेवन करना चाहिये ॥ ६८ ॥ ६९ ॥
मृतसंजीवनी वटी ।
मागधी वत्सनाभं च तयोस्तुल्यं च हिङ्गुलम् ।
मृतसंजीवनी ख्याता जम्बीररसमर्दिता ॥ ७० ॥
मूलकस्य च बीजानां वटिका तुल्यरूपिणी ।
पानीया शीततोयेन ज्वरातीसारनाशिनी ॥
विषूच्यां सन्निपाते च ज्वरे चैवातिदुस्तरे ॥ ७१ ॥
पीपल १ भाग, शुद्ध वत्सनाभ १ भाग और सिंगरफ २ भाग इनको एकत्र जम्बीरीनींबूके रसमें उत्तम प्रकारसे खरलकर मूलीके बीजकी बराबर गोलियाँ बना-लेवे । एकएक गोली शीतजलके साथ सेवन करनेसे ज्वर और अतिसार ( दस्त ) शीघ्र दूर होते हैं । विषूचिका और अतिदारुण सन्निपातज्वरमें यह मृतसंजीवनी नामक वटी अतीव हितकारी है ॥ ७० ॥ ७१ ॥
आनन्दभैरव रस ।
हिङ्गुलं च विषं व्योषं टङ्कणं गन्धकं समम् ।
जम्बीररससंयुक्तं मर्दयेद्यामकद्वयम् ॥ ७२ ॥
कासश्वासातिसारेषु ग्रहण्यां सन्निपातिके ।
अपस्मारेऽनिले मेहेऽप्यजीर्णे वह्निमान्द्यके ॥
गुञ्जामात्रा प्रदातव्यो रस आनन्दभैरवः ॥ ७३ ॥
सिंगरफ, शुद्ध मीठातेलिया, त्रिकुटा, सुहागा और शुद्धगन्धक सबको सम भाग लेकर एकत्र कूटपीसकर जम्बीरीनींबूके रसमें दो प्रहरतक खरल करे फिर एकएक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह आनन्दभैरवरस सेवन करतेही खाँसी, श्वास, अति-सार, संग्रहणी, सन्निपातज्वर, अपस्मार, वातविकार, प्रमेह, अजीर्ण और मन्दाग्नि इन रोगोंको दूर करताहै ॥ ७२ ॥ ७३ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २२५
अमृतार्णवरस।
हिङ्गुलोत्थो रसो लोहं टङ्कणं गन्धकं शठी ।
धान्यकं बालकं मुस्तं पाठा जीरं घुणप्रिया ॥ ७४ ॥
प्रत्येकं तोलकं चूर्णं छागीदुग्धेन पेषयेत् ।
माषैका वटिका कार्य्या रसोऽयममृतार्णवः ॥ ७५ ॥
वटिकां भक्षयेत्प्रातर्गहनानन्दभाषिताम् ।
धान्यजीरकयूषेण विजयाशणबीजतः ॥ ७६ ॥
मधुना छागदुग्धेन मण्डेन शीतवारिणा ।
कदलीमोचकरसैः कञ्चटद्रवकेण च ॥ ७७ ॥
सिंगरफसे निकालाहुआ पारा, लोहा, सुहागा, शुद्धगन्धक, कचूर, धनियाँ, सुगन्धवाला, नागरमोथा, पाठ, जीरा और अतीस इन प्रत्येकके चूर्णको एक एक तोला लेवे। फिर सबको एकत्र बकरीके दूधमें खरल करके एकएक माशेकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे एकएक गोली नित्यप्रति प्रातःकाल भक्षण करे और ऊपरसे धनियाँ, जीरा और मूँगका यूष, भाँगका चूर्ण, सनके बीजोंका चूर्ण, शहद, बकरीका दूध, भातका माँड, शीतलजल, केलेकी जडका रस, मोचरस और जलचौलाईका रस इनमेंसे किसी एकका अनुपान करे ॥ ७४–७७ ॥
अतीसारं जयेदुग्रमेकजं द्वन्द्वजं तथा ।
दोषत्रयसमुद्भूतमुपसर्गसमन्वितम् ॥ ७८ ॥
शूलघ्नो वह्निजननो ग्रहणीर्शोविकारनुत् ।
अम्लपित्तप्रशमनः कासघ्नो गुल्मनाशनः ॥ ७९ ॥
इस रसको सेवन करनेसे अतिप्रबल अतीसार, एकदोषज द्विदोषज अथवा त्रिदोषज विकार, शूल, संग्रहणी, बवासीर, अम्लपित्त, खाँसी और गुल्मप्रभृति दुस्तर व्याधियाँ शमन होती हैं और अग्नि अत्यन्त दीपन होती है ॥ ७८।७९ ॥
कारुण्यसागररस ।
भस्म सूताद् द्विधा गन्धं तथा द्वित्वं मृताभ्रकम् ।
दिनं सार्षपतैलेन पिष्ट्वा यामं विपाचयेत् ॥ ८० ॥
रसैर्मार्कवमूलोत्थैः पिष्ट्वा यामं विपाचयेत् ।
त्रिक्षारपञ्चलवणविषव्योषाग्निजीरकैः ॥
सविडङ्गैस्तुल्यभागैरयं कारुण्यसागरः ॥ ८१ ।
१५
| २२६ | भैषज्यरत्नावली । | [ज्वरातिसार- |
|---|
पारेकी भस्म १ तोला, शुद्ध गन्धक २. तोले और अभ्रकभस्म ४ तोले लेवे। इन सबको सरसोंके तेलमें एकदिनतक खरल करके शरावसंपुटमें रख वालुकायंत्रमें एक प्रहरतक पकावे । जब पककरस्वांगशीतल होजाय तब निकाल कर भाँगरेकी जड़के रसमें एक प्रहरतक खरल कर और पूर्वोक्तविधिसे संपुटमें रखकर पकावे । पीछे स्वांगशीतल होनेपर निकालकर उसका चूर्ण कर लेवे । फिर उसमें जवाखार, सज्जी, सुहागा, कालानमक, सैंधानमक, विड़ियासंचरनमक, कचियानमक, साँभर-नमक, शुद्ध मीठातेलिया, सोंठ, मिरच, पीपल, चीता, जीरा और वायविडङ्ग इन औषधियोंके समानभाग मिश्रित चूर्णको मिलाकर खरल करे तो वह कारुण्यसागर रस सिद्ध होता है ॥ ८० ॥ ८१ ॥
माषमात्रं ददीतास्य भिषक् सर्वातिसारके ।
सज्वरे विज्वरे वापि सशूले शोणितोद्भवे ॥ ८२ ॥
निरामे शोथयुक्ते वा ग्रहण्यां सान्निपातिके ।
अनुपानं विनाप्येष कार्यसिद्धिं करिष्यति ॥ ८३ ॥
सर्वप्रकारके अतीसार, ज्वरसहित व ज्वररहित एवं शूलयुक्त रक्तातिसार, आमरहित सूजनवाली ग्रहणी और सन्निपात आदि रोगोंमें एक एक माशे परिमाण सेवन करना चाहिये, यह रस अनुपानके बिना भी आरोग्य प्रदान करता है ॥८२॥८३॥
मृतसञ्जीवनरस ।
रसगन्धौ समौ ग्राह्यौ सूतपादं विषं क्षिपेत् ।
सर्वतुल्यं मृतं ताम्रं मर्द्यं धुस्तूरजद्रवैः ॥ ८४ ॥
सर्पाक्ष्याश्च द्रवैर्यामं कषायेणाथ भावयेत् ।
धातक्यतिविषामुस्तं शुण्ठीजीरकबालकम् ॥ ८५ ॥
यमानीधान्यकं बिल्वं पाठा पथ्या कणान्वितम् ।
कुटजस्य त्वचं बीजं कपित्थं बालदाडिमम् ॥ ८६ ॥
प्रत्येकं कर्षमात्रं स्यात्कुट्टितं क्वाथयेज्जलेः ।
चतुर्गुणं जलं दत्त्वा यावत्पादावशेषितम् ॥ ८७ ॥
अनेन त्रिदिनं भाव्यं पूर्वोक्तं मर्दितं रसम् ।
रुद्ध्वा तद्वालुकायन्त्रे क्षणं मृद्वग्निना पचेत् ॥ ८८ ॥
मृतसञ्जीवनो नाम-
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २२७
शुद्ध किया हुआ पारा और गन्धक प्रत्येक एक एक ताला, शुद्ध मीठा तेलिया तीन माशे और सबकी बराबर भाग अभ्रकभस्म लेवे। इनको एकत्र कर धतूरेके पत्तोंके रसमें और सर्पाक्षीके रस अथवा क्वाथमें एक एक प्रहरतक खरल करे । फिर धायके फूल, अतीस, नागरमोथा, सोंठ, जीरा, सुगन्धवाला, अजवायन, धनियाँ, बेलगिरी, पाठ, हरड, पीपल, कुडेकी छाल, इन्द्रजौ, कैथ और कच्चाअनार इन प्रत्येक औषधियोंको एक एक तोला लेकर अच्छेप्रकारसे कूटकर सबको चौगुने जलमें पकावे । जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इस क्वाथमें पूर्वोक्त रसको तीन दिनतक भावना देवे । फिर उसको बालुकायन्त्रमें उत्तमप्रकारसे बन्दकरके मन्दमन्द अग्निसे दो घडीतक पकावे । जब पककर स्वयं शीतल होजाय तब ओषधिको निकालकर चूर्ण कर लेवे । यह रस मतसंजीवन नामसे प्रसिद्ध है ॥ ८४-८८ ॥
–अस्य गुञ्जाचतुष्टयम् ।
दातव्यमनुपानेन चासाध्यमपि साधयेत् ॥ ८९ ॥
षट्प्रकारमतीसारं साध्यासाध्यं जयेद् ध्रुवम् ।
नागरातिविषा मुस्तं देवदारु कणा वचा ॥ ९० ॥
यमानी वालकं धान्यं कुटजत्वक् हरीतकी ।
धातकीन्द्रयवौ बिल्वं पाठा मोचरसं समम् ।
चूर्णितं मधुना लेह्यमनुपानं सुखावहम् ॥ ९१ ॥
इस रसकी चारचार रत्ती प्रमाण मात्राको यथादोषानुसार अनुपानके साथ देनेसे साध्य हों अथवा असाध्य छहों प्रकारके अतिसार निश्चय नष्ट होते हैं । इस रसको सेवन करनेसे पश्चात् सोंठ, अतीस, नागरमोथा, देवदारु, पीपल, वच, अजवायन, सुगन्धवाला, धनियाँ, कुडेकी छाल, हरड, धायके फूल, इन्द्रजौ, बेलगिरी, पाठ और मोचरस इन सब औषधियोंके चूर्णको समान भाग लेकर शहदमें मिलाकर चाटे तो बडा अच्छा अनुपान होता है । इस चूर्णको शहदके साथ चाटनेसे भी अतिसार रोग दूर होता है ॥ ८९–९१ ॥
प्राणेश्वररस ।
रसान्धकमभ्रं च टङ्कणं शतपुष्पकम् ।
यमानी जीरकाख्यं च प्रत्येकं कर्षयुग्मकम् ॥ ९२ ॥
| २२८ | भैषज्यरत्नावली । | [ ज्वरातिसार- |
|---|
कर्षमेकं यवक्षारं हिङ्गु कटुकपञ्चकम् ।
विडङ्गेन्द्रयवं सर्ज्जरसं चाग्निसंज्ञितम् ॥
घृष्ट्वा च वटिका कार्या नाम्ना प्राणेश्वरो रसः ॥ ९३ ॥
शुद्धपारा, शुद्धगन्धक, अभ्रक, सुहागा, सोया, अजवायन और जीरा ये प्रत्येक दो दो कर्ष एवं जवाखार, हींग, पाँचों नमक, वायविडङ्ग, इन्द्रजौ, राल और चीता ये पृथक् पृथक् एकएक कर्ष लेवे। सबको जलके द्वारा एकत्र खरल करके चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे। इसको प्राणेश्वररस कहते हैं। यह रस ज्वरातिसाररोगनाशक है ॥ ९२ ॥ ९३ ॥
अभ्रवटिका।
अथ शुद्धस्य सूतस्य गन्धकस्याभ्रकस्य च ।
प्रत्येकं कर्षमानं तु ग्राह्यं रसगुणैषिणा ॥ ९४ ॥
ततः कज्जलिकरां कृत्वा व्योषचूर्णं प्रदापयेत् ।
केशराजस्य भृङ्गस्य निर्गुण्ड्याश्चित्रकस्य च ॥ ९५ ॥
ग्रीष्मसुन्दरकस्याथ जयन्त्याः स्वरसं तथा ।
मण्डूकपर्ण्याः स्वरसं तथा शक्राशनस्य च ॥ ९६ ॥
श्वेतापराजितायाश्च स्वरसं पर्णसम्भवम् ।
दापयेद्रसतुल्यं च विधिज्ञः कुशलो भिषक् ॥ ९७ ॥
रसतुल्यं प्रदातव्यं चूर्णं मरिचसम्भवम् ।
देयं रसार्द्धभागेन चूर्णं टङ्कणसम्भवम् ॥ ९८ ॥
शुभे शिलामये पात्रे घर्षणीयं प्रयत्नतः ।
शुष्कमातपसंयोगाद्वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ९९ ॥
शुद्ध पारा १ तोला, शुद्ध गन्धक १ तोला दोनोंकी एकत्र कज्जली बनालेवे। फिर इसमें अभ्रक, सोंठ, मिर्च और पीपल प्रत्येकका चूर्ण एक एक तोला मिलाकर कुकुरभाँगरा, भाँगरा, सिम्हालू, चीता, ग्रीष्मसुन्दर (सिरयारीका साग), अरणी, मण्डूकपर्णी, भाँग, सफेद कोइल और पान इन प्रत्येकके एक एक तोले स्वरसमें क्रमसे अलग अलग भावना देवे। पश्चात् इसमें काली मिरचोंका चूर्ण एक तोला और सुहागेकी खील छः माशे डालकर उत्तम पत्थरके खरलमें अच्छे प्रकारसे घोटे और धूपमें सुखाकर मटरकी समान गोलियाँ बनालेवे॥९४-९९॥
| चिकित्सा ] | भाषाटीकासहिता । | २२९ |
|---|
कलायपरिमाणां तु खादेत्तां तु प्रयत्नतः ।
दृष्ट्वा वयश्चाग्निबलं यथाव्याध्यनुपानतः ॥ १०० ॥
हन्ति कासं क्षयं श्वासं वातश्लेष्मभवं ज्वरम् ।
परं वाजीकरः श्रेष्ठो बलवर्णाभिवर्द्धकः ॥ १०१ ॥
ज्वरे चैवातिसारे च सिद्ध एष प्रयोगराट् ।
नातः परतरः श्रेष्ठो विद्यतेऽभ्ररसायनात् ॥ १०२ ॥
भोजने शयने पाने नास्त्यत्र नियमः क्वचित् ।
दधि चावश्यकं भक्ष्यं प्राह नागार्जुनो मुनिः ॥ १०३ ॥
यह रस रोगीकी अवस्था और अग्निके बलाबलको विचारकर यथादोषानुसार अनुपानके साथ सेवन कराना चाहिये। इससे खाँसी, क्षय श्वास और वात-कफजन्य ज्वर शीघ्र नष्ट होते हैं। यह अन्यन्त वाजीकरण एवं बल, वर्ण और जठराग्निकी विशेषरूपसे वृद्धि करता है। ज्वर और अतिसाररोगमें तो यह सिद्धफलप्रद औषधि है। अभ्ररसायनोंमें इससे बढ़कर अन्य उत्तम औषध नहीं है। भोजन, पान और शयनादिमें कुछ परहेज नहीं है। किन्तु इसपर दही अवश्य खाना चाहिये ऐसा नागार्जुनमुनिने कहा है ॥ १००–१०३ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां ज्वरातिसारचिकित्सा ।
अथ अतिसार-चिकित्सा ।
आमपक्वक्रमं हित्वा नातिसारे क्रिया यतः ।
अतः सर्वातिसारेषु ज्ञेयं पक्कामलक्षणम् ॥ १ ॥
आम और पक्वके क्रमको त्यागकर अतिसारमें अन्य क्रिया ही नहीं है। इस कारण सम्पूर्ण अतिसारोंमें प्रथम आम और पक्वका निश्चय करना चाहिये ॥ १ ॥
आम और पक्वके लक्षण ।
मज्जत्यामा गुरुत्वाद्विट् पक्वा तूत्प्लवते जले ।
विनाऽतिद्रवसंघातशैत्यश्लेष्मप्रदूषणात् ॥ २ ॥
अपक्व मल भारी होनेके कारण जलमें डूब जाता है और पक्व मल जलमें तैरत रहता है। किन्तु अतिद्रव (बहुत पतला) अपक्व मल भी जलके ऊपर तैरता है एवं कठिन, श्वेतवर्ण, शितल और दुष्ट कफसे दूषित पक्व मल जलमें डूब जाता है ॥ २ ॥
| २३० | भैषज्यरत्नावली । | [ अतिसार- |
|---|
आम और पक्वके अन्य लक्षण ।
शकृद् दुर्गन्धि साटोपविष्टम्भार्तिप्रसेकिनः ।
विपरीतं निरामं तु कफात् पक्वं च मज्जति ॥ ३ ॥
आमातिसारमें मल दुर्गन्धियुक्त उदरमें अफारेसहित गुड़गुड़शब्द होना' पीड़ाके साथ थोड़ा थोड़ा मलका उतरना और मुखमेंसे पानीका निकलना इत्यादि लक्षण होतेहैं । एवं आमरहित पक्वातिसारमें इन सब लक्षणोंके विपरीत लक्षण होतेहैं और कफके कारण भारी होनेसे पक्व मल जलमें डूब जाताहै ॥ ३ ॥
आम और पक्वातिसारकी चिकित्सा ।
न तु संग्रहणं दद्यात् पूर्वमामातिसारिणे ।
दोषा ह्यादौ रुद्ध्यमाना जनयन्त्यामयान् बहून् ॥ ४ ॥
शोथपाण्ड्वामयप्लीहकुष्ठगुल्मोदरज्वरान् ।
दण्डकालसकाध्मानग्रहण्यर्शोगदांस्तथा ॥ ५ ॥
क्षीणधातुबलार्तस्य बहुदोषोऽतिनिःसृतः ।
आमोऽपि स्तम्भनीयः स्यात्पाचनान्मरणं भवेत् ॥ ६ ॥
आमातिसारवाले रोगीको पहिले एकदम मलको रोकनेवाली औषधि कभी नहीं देनी चाहिये । कारण, प्रथमही अर्थात् अपक्व अवस्थामें मलको रोक देनेसे सब दोष एकत्रित होकर बँधजाते हैं और वे शोथ, पाण्डु, प्लीहा, कोढ, गुल्म, उदर, ज्वर, दण्डक, अलसक, अफारा, संग्रहणी और बवासीर आदि रोगोंको उत्पन्न करदेते हैं। किन्तु जो रोगी अधिक मलस्राव होनेसे धातुक्षीण और बलहीन हो और अनेक दोषोंसे युक्त हो ऐसे रोगीको आमकी अवस्थामें भी मलावरोधक औषधियाँ देनी चाहिये । कारण-ऐसे रोगीको पाचक औषधि देनेसे रोगीकी मृत्यु हो सकती है ॥ ४-६ ॥
आमातिसार-चिकित्सा
आमे विलङ्घनं शस्तमादौ पचनमेव वा ।
कार्यं चानशनस्यान्ते प्रद्रवं लघु भोजनम् ॥ ७ ॥
आमावस्थामें प्रथम लंघन कराने चाहिये । फिर पाचक औषधियाँ देनी चाहिये। एवं लंघन होचुकनेपर पेयादि पतले और हल्के पदार्थ पथ्यरूपसे भोजनके लिये देने चाहिये ॥ ७ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २३१
लंघनमेकं त्यक्त्वा नान्यदस्तीह भेषजं बलिनः ।
समुदीर्णं दोषचयं शमयति तत्पाचयत्यपि च ॥ ८ ॥
अतिसारमें बलवान् रोगीके लिये लंघनके सिवाय अन्य कोई औषधि हितकर नहीं है । कारण; लंघन—उत्पन्नहुए दोषोंके समूहको शमन करते हैं और उनको पचा देते हैं ॥ ८ ॥
पक्कोऽपकृदतीसारो ग्रहणीमार्दवाद्यदा ।
प्रवर्तते तदा कार्यः क्षिप्रं सांग्राहिको विधिः ॥ ९ ॥
जब पक्वातिसारमें ग्रहणीनाड़ीके अतिमन्द होजानेसे निरन्तर मल निकलता है तब तत्काल मलावरोधक औषधि देकर दस्त बन्द करदेने चाहिये ॥ ९ ॥
ह्रीबेरशृङ्गबेराभ्यां मुस्तपर्पटकेन वा ।
मुस्तोदीच्यशृतं तोयं देयं वापि पिपासवे ।
युक्तेऽन्नकाले क्षुत्क्षामं लघ्वन्यन्नानि भोजयेत् ॥ १० ॥
अतिसारके रोगीको प्यास लगनेपर सुगन्धवाला और सोंठ अथवा नागरमोथा और पित्तपापडा या नागरमोथा और सुगन्धवाला इनमेंसे किसी एक प्रयोगके द्वारा सिद्ध कियाहुआ जल पीनेको देना चाहिये और लंघनके बाद अत्यन्त भूख लगनेपर हलके अन्नादिकोंका भोजन कराना चाहिये ॥ १० ॥
औषधसिद्धाः पेया लाजानां सक्तवोऽतिसारहिताः ।
वस्त्रप्रस्रुतमण्डः पेया च मसूरंयूषश्च ॥ ११ ॥
शालपर्णी आदि या धान्यपंचकादि अथवा औषधियोंके द्वारा सिद्ध कीहुई पेया, खीलोंके सत्तू, कपडेमें छानाहुआ माँड, पेया और मसूरका यूष अतिसाररोगमें हितकारी है ॥ ११ ॥
गुर्वी पिष्टि खराऽत्यर्थं लघ्वी सैव विपर्य्ययात् ।
सक्तूनामाशु जीर्येत मृदुत्वादवलेहिका ॥ १२ ॥
खीलोंके सत्तूओंमें थोडा जल डालकर उसका पिण्डा या गोलासा बनाकर खानेसे वह अत्यन्त कठिन और गुरुपाकी (देरमें पचनेवाला) होजाता है । किन्तु खीलोंके सत्तूओंको अधिक जलमें घोलकर अवलेहकी समान खानेसे वे शीघ्रही पच जाते हैं ॥ १२ ॥
धान्योदीच्यशृतं तोयं तृष्णादाहातिसारनुत् ।
आभ्यामेव सपाठाभ्यां सिद्धमाहारमाचरेत् ॥ १३ ॥
| २३२ | भैषज्यरत्नावली । | [ अतिसार- |
|---|
अतिसारके रोगीको धनियां और सुगन्धवाला इन औषधियोंके द्वारा पकायाहुआ जल पान करानेसे एवं धनियां, सुगन्धवाला और पाठ इनके द्वारा सिद्ध कीहुई पेया सेवन करानेसे तृषा, दाह और अतिसार नष्ट होता है ॥ १३ ॥
स्तो कं स्तोकं विबद्धं वा सशूलं योऽतिसार्य्यते ।
अभयापिप्पलीकल्कैः सुखोष्णैस्तं विरेचयेत् ॥ १४ ॥
जिस अतिसारके रोगीके बारंबार थोडा २ अथवा अत्यन्त बँधाहुआ और पीडासहित मल निकलता हो तो उसको हरड और पीपलका बारीक चूर्ण मन्दोष्ण जलके साथ पान कराना चाहिये ॥ १४ ॥
नागरातिविषामुस्तैरथवा धान्यनागरैः ।
तृष्णाशूलातिसारघ्नं पाचनं दीपनं लघु ॥ १५ ॥
सोंठ, अतीस और नागरमोथा अथवा धनियां और सोंठ यह दोनों क्वाथ तृषा, शूल और अतिसारको नष्ट करनेवाले, पाचक, अग्निप्रदीपक और हल्के हैं ॥ १५ ॥
पाठावत्सकबीजानि हरीतक्योमहौषधम् ।
एतदामसमुत्थानमतीसारं सवेदनम् ॥
कफात्मकं सपित्तं च वर्चो बध्नाति च ध्रुवम् ॥ १६ ॥
पाठ, इन्द्रजौ, हरड और सोंठ इनका बनायाहुआ क्वाथ पीडासहित आमजन्य अतिसार और कफ तथा पित्तसंयुक्त मलको निस्सन्देह बाँध देता है ॥ १६ ॥
पयस्युत्क्वाथ्य मुस्ता वा विंशतिर्भेदकाह्वया ।
क्षीरावशिष्टं तत् पीतं हन्यादामं सवेदनम् ॥ १७ ॥
नागरमोथेकी बीस जडोंको आठगुने बकरीके दूध और दूधसे चौगुने जलम पकावे । जब पककर दूधमात्र शेष रहजाय तब उसको उतारकर छानलेवे । उस दूधंको शीतल करके पान करनेसे वेदनासहित आमातिसार दूर होता है ॥ १७ ॥
धान्यपञ्चकसंसिद्धो धान्यविश्वकृतोऽथवा ।
आहारो भिषजा योज्यो वातश्लेष्मातिसारिणाम् ॥
वातपित्ते पञ्चमूल्या कफे वा पञ्चकोलकैः ॥ १८ ॥
वातकफातिसारवाले रोगियोंको धान्यपञ्चकके साथ अथवा केवल धनिये और सोंठके साथ पेया बनाकर भोजनके लिये देनी चाहिये । एवं वातपित्तातिसारमें स्वल्पपंचमूलकी औषधियोंके साथ और कफके अतिसारमें पञ्चकोलकी औषधियोंके साथ पेया प्रस्तुत कर भोजनके लिये देनी चाहिये ॥ १८ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २३३
धान्यपञ्चक और धान्यचतुष्क ।
धान्यकं नागरं मुस्तं बालकं बिल्वमेव च ।
आमशूलविबन्धघ्नं पाचनं वह्निदीपनम् ॥
इदं धान्यचतुष्कं स्यात् पैत्ते शुण्ठीं विना पुनः ॥ १९ ॥
धनियाँ, सोंठ, नागरमोथा, सुगन्धवाला और बेलगिरी इनका क्वाथ पान करनेसे आमशूल और विबन्ध नष्ट होता है । यह क्वाथ पाचक और अग्निको दीपन करनेवाला है, इसको धान्यपंचक क्वाथ कहते हैं । किन्तु पित्तातिसारमें इस धान्यपंचकमेंसे सोंठको निकालकर शेष चारों औषधियोंका क्वाथ बनाकर देना चाहिये । इसको धान्यचतुष्क कहते हैं ॥ १९ ॥
स्वल्प शालपर्ण्यादि ।
शालपर्णीबलाबिल्वैः पृश्निपर्ण्या च साधिता ।
दाडिमाम्ला हिता पेया पित्तश्लेष्मातिसारिणाम् ॥ २० ॥
शालपर्णी, खिरेंटी, बेलगिरी और पृश्निपर्णी इनके द्वारा सिद्ध की हुई पेया दाडिमिका रस मिलाकर पित्तकफातिसारवाले रोगीको पिलानी चाहिये ॥ २० ॥
बृहच्छालपर्ण्यादि ।
शालपर्णी पृश्निपर्णी बृहती कण्टकारिका ।
बलाश्वदंष्ट्राबिल्वानि पाठानागरधान्यकम् ॥
एतदाहारसंयोगे हितं सर्वातिसारिणाम् ॥ २१ ॥
शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बडीकटेरी, कटेरी, खिरेँटी, गोखरू, बेलगिरी, पाठ, सोंठ और धनियाँ इन सब औषधियोंके द्वारा बनायी हुई पेया सब प्रकारके अतिसाररोगमें हितकारी है ॥ २१ ॥
वत्सकादि ।
वत्सकातिविषाशुण्ठीबिल्वहिङ्गुयवाम्बुदैः ।
चित्रकेण युतैः क्वाथ आमातीसारनाशनः ॥ २२ ॥
इन्द्रजौ, अतीस, सोंठ, बेलगिरी, हींग, जौ, नागरमोथा और लाल चीता इनका क्वाथ आमातिसारको नष्ट करता है ॥ २२ ॥
पथ्यादि ।
पथ्यादारुवचामुस्तनागरातिविषायुतैः ।
आमातीसारनाशार्थे क्वाथमेतत् पिबेन्नरः ॥ २३ ॥
२३४ भैषज्यरत्नावली । [अतिसार-
आमवातिसारको शमन करनेके लिये रोगी हरड, देवदारु, वच, नागरमोथा सोंठ और अतीस इनका बनाया हुआ काथ पान करे ॥ २३ ॥
यमान्यादि ।
यमानीनागरोशीरधनिकातिविषाघनैः ।
बालबिल्वद्विपर्णीभिर्दीपनं पाचनं भवेत् ॥ २४ ॥
अजवायन, सोंठ, खस, धनियां, अतीस, नागरमोथा, कच्चे बेलकी गिरी, शालपर्णी और पृश्निपर्णी इनका क्वाथ सेवन करनेसे अग्निदीपन और आम परिपक्व होती है ॥ २४ ॥
कलिङ्गादि ।
कलिङ्गऽतिविषा हिङ्गु पथ्या सौवर्चलं वचा ।
शूलस्तम्भविवन्धघ्नं पेयं दीपनपाचनम् ॥ २५ ॥
इन्द्रजौ, अतीस, हींग, हरड, कालानमक और बच इनका बनाया हुआ क्वाथ शूल, स्तम्भ और विबन्धको नष्ट करता है । तथा दीपन और पाचन है ॥ २५ ॥
कञ्चटादि ।
कञ्चटदाडिमजम्बूशृङ्गाटकपत्रह्रीबेरम् ।
जलधरनागरसहितं गङ्गामपिवेगिनीं रुन्ध्यात् ॥ २६ ॥
जल चौलाईके पत्ते, अनारके पत्ते, जामुनके पत्ते, सिंघाडेके पत्ते, सुगन्धवाला, नागरमोथा और सोंठ इनका क्वाथ गंगाके समान वेगवाले अतिसारको भी रोक देता है ॥ २६ ॥
कुटजादि ।
कुटजं दाडिमं मुस्तं धातकी बिल्वबालकम् ।
लोध्रचन्दनपाठाश्च कषायं मधुना पिबेत् ॥ २७ ॥
सामे शूले च रक्ते च पिच्छास्रावे च शस्यते ।
कुटजादिरिति ख्यातः सर्वातीसारनाशनः ॥ २८ ॥
कुडेकी छाल, अनारका बक्कल, नागरमोथा, धायके फूल, बेलगिरी, सुगन्धवाला, लोध, लालचन्दन और पाठ इनके मन्दोष्ण क्वाथको शहद मिलाकर पान करनेसे आम, शूल, रक्तस्राव और मलकी पिच्छिलता दूर होती है । यह कुटजादिनामसे प्रसिद्ध प्रयोग सर्वप्रकारके अतिसाररोगको नष्ट करता है ॥ २७ ॥ २८ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २३६
त्र्यूषणादिचूर्ण ।
त्र्यूषणातिविषाहिङ्गुबलासौवर्चलाभयाः ।
पीत्वोष्णेनाम्भसा हन्यादामातीसारमुद्धतम् ॥ २९ ॥
अथवा पिप्पलीमूलं पिप्पलीद्वयचित्रकात् ।
सौवर्चलवचाव्योषहिङ्गुप्रतिविषाभयाः ॥
पिबेच्छ्लेष्मातिसारार्त्तश्चूर्णिताश्चोष्णवारिणा ॥ ३० ॥
सोंठ, पीपल, मिरच, अतीस, हींग, खिरेंटी, कालानमक और हरड इन सबके समान भाग मिश्रित चूर्णको गरमजलके साथ पान करनेसे प्रबल आमातिसाररोग नष्ट होता है अथवा पीपलामूल, पीपल, गजपीपल और चीता एवं कालानमक, बच, त्रिकुटा, हींग, अतीस और हरड इनको समान भाग लेकर चूर्ण बनाकर उष्णजलके साथ पान करनेसे कफातिसार दूर होता है ॥ २९ ॥ ३० ॥
शुण्ठ्यादिचूर्ण ।
शुण्ठीप्रतिविपाहिङ्गुमुस्ताकुटजचित्रकैः ।
चूर्णंमुष्णाम्बुना पीतमामातीसारनाशनम् ॥ ३१ ॥
सोंठ, अतीस, हींग, नागरमोथा, इन्द्रजौ और चीता इनका चूर्ण उष्ण जलके साथ सेवन करनेसेही आमातिसार नष्ट होता है ॥ ३१ ॥
वातातीसार-चिकित्सा ।
पञ्चमूलीबलाविश्वधान्यकोत्पलबिल्वजाः ।
वातातिसारिणे देयास्तक्रेणान्यतमेन वा ॥ ३२ ॥
वातज अतिसारवाले रोगीको पञ्चमूल एवं खिरेंटी, सोंठ, धनियाँ, कुमोदिनी (नीलोफर) और बेलगिरी इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जल मिलेहुए घोलमें पकाकर देना चाहिये ॥ ३२ ॥
पूतिकादि ।
पूतिको मागधी शुण्ठी बला धान्यं हरीतकी ।
पक्त्वाऽम्बुना पिबेत् सायं वातातीसारशान्तये ॥३३॥
दुर्गंध करञ्ज, पीपल, सोंठ, खिरेंटी, धनियाँ और हरड इनका क्वाथ बनाकर सायंकालमें सेवन करनेसे वातजन्य अतीसार शान्त होताहै ॥ ३३ ॥
| २३६ | भैषज्यरत्नावली । | [ अतिसार- |
|---|
पथ्यादि ।
पथ्या दारु वचा शुण्ठी मुस्ता चातिविषा लता ।
क्वाथ एषां हरेत् पीतो वातातीसारमुल्बणम् ॥ ३४ ॥
हरड, देवदारु, वच, सोंठ, नागरमोथा, अतीस और गिलोय इनके क्वाथको पान करनेसे प्रबल वातातीसार नष्ट होता है ॥ ३४ ॥
वचादि ।
वचा चातिविषा मुस्तं बीजानि कुटजस्य च ।
श्रेष्ठः कषाय एतेषां वातातीसारशान्तये ॥ ३५ ॥
वच, अतीस, नागरमोथा और इन्द्रजौ इनका क्वाथ वातातिसारको शमन करनेके लिये देना चाहिये ॥ ३५ ॥
पित्तातीसार-चिकित्सा ।
मधुकादि ।
मधुकं कट्फलं लोध्रं दाडिमस्य फलत्वचौ ।
पित्तातिसारे मध्वक्तं पाययेत् तण्डुलाम्बुना ॥ ३६ ॥
पित्तज अतिसारमें मुलहठी, कायफल, लोध, अनारका कच्चा फल और बकल इनके समान भाग चूर्णको चावलोंके पानी और मधुके साथ मिलाकर सेवन कराना चाहिये ॥ ३६ ॥
बिल्वादि ।
बिल्वशक्रयवाम्भोदबालकातिविषाकृतः ।
कषायो हन्त्यतीसारं सामं पित्तसमुद्भवम् ॥ ३७ ॥
बेलकी गिरी, इन्द्रजौ, नागरमोथा, सुगन्धवाला और अतीस इनका बना हुआ क्वाथ पान करनेसे पित्तसे उत्पन्न हुआ आमातिसार नष्ट होता है ॥ ३७ ॥
कट्फलादि ।
कट्फलातिविषाम्भोदवत्सकं नागरान्वितम् ।
शृतं पित्तातिसारघ्नं दातव्यं मधुसंयुतम् ॥ ३८ ॥
कायफल, अतीस, नागरमोथा, इन्द्रजौ और सोंठ इनका क्वाथ बनाकर मधुके साथ पान करनेसे पित्तातीसार दूर होता है ॥ ३८ ॥
किराततिक्तादि ।
किराततिक्तकं मुस्तं वत्सकं सरसाञ्जनम् ।
पित्तातीसाररोगघ्नं सक्षौद्रं वेदनापहम् ॥ ३९ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २३७
चिरायता, नागरमोथा, इन्द्रजौ और रसौंत इनके क्वाथमें शहद मिलाकर सेवन करनेसे पीडासहित पित्तातिसार शमन होता है ॥ ३९ ॥
अतिविषादि ।
सक्षौद्राऽतिविषां पिष्ट्वा वत्सकस्य फलं त्वचम् ।
तण्डुलोदकसंयुक्तं पेयं पित्तातिसारनुत् ॥ ४० ॥
अतीस, कुडेकी छाल और इन्द्रजौ इनके समान भाग मिश्रित चूर्णको चावलोंके जल और शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे पित्तातिसार नष्ट होताहै ॥ ४० ॥
श्लेष्मातीसार-चिकित्सा ।
पथ्यादि ।
पथ्याग्निकटुकापाठावचामुस्तकवत्सकैः ।
सनागरैर्जयेत्क्वाथः कल्को वा श्लैष्मिकीं स्रुतिम् ॥ ४१ ॥
हरड, चीता, कुटकी, पाठ, वच, नागरमोथा, इन्द्रजौ, और सोंठ इनका क्वाथ अथवा कल्क कफके अतीसारको जीतता है ॥ ४१ ॥
चव्यादि ।
चव्यं सातिविषं मुस्तं बालबिल्वं सनागरम् ।
वत्सकत्वक्फलं पथ्या छर्दिश्लेष्मातिसारनुत् ॥ ४२ ॥
चव्य, अतीस, नागरमोथा, कच्चे बेलकी गिरी, सोंठ, कुडेकी छाल, इन्द्रजौ और हरड, इनका क्वाथ पान करनेसे वमन और कफजनित अतिसार दूर होताहै ॥ ४२ ॥
पाठादिचूर्ण ।
पाठा वचा त्रिकटुकं कुष्ठं कटुकरोहिणी ।
उष्णाम्बुना विनिघ्नन्ति श्लेष्मातीसारमुल्बणम् ॥ ४३ ॥
पाठ, वच, सोंठ, पीपल, कालीमिरच, कूठ और कुटकी इनका चूर्ण उष्ण जलके साथ पान करनेसे भयंकर कफातिसार दूर होताहै ॥ ४३ ॥
हिंग्वादिचूर्ण ।
हिङ्गु सौवर्चलं व्योषमभयाऽतिविषा वचा ।
पीतमुष्णाम्बुना चूर्णं श्लेष्मातीसारनाशनम् ॥ ४४ ॥
हींग, कालानमक, सोंठ, पीपल, मिरच, हरड, अतीस और वच इनके चूर्णको गरम जलके साथ पान करनेसे कफातिसार नष्ट होताहै ॥ ४४ ॥
२३८ भैषज्यरत्नावली । [ अतिसार-
पथ्यादिचूर्ण ।
पथ्या पाठा वचा कुष्ठं चित्रकं कटुरोहिणी । चूर्णमुष्णाम्बुना पीतं श्लेष्मातीसारनाशनम् ॥ ४५ ॥
हरड, पाठ, वच, कूठ, चीता और कुटकी इन प्रत्येकके समान भाग चूर्णको गरम जलके साथ पान करनेसे कफज अतिसार नष्ट होताहै ॥ ४५ ॥
द्वन्द्वजातीसार-चिकित्सा ।
द्विदोषलक्षणैर्विद्यादतीसारं द्विदोषजम् । तेषां चिकित्सा प्रोक्तैव विशिष्टा च निगद्यते ॥ ४६ ॥
जिस अतिसारमें दो दोषोंके मिलेहुए लक्षण होते हैं उसको द्विदोषज अतिसार कहते हैं । उनकी स्वतन्त्ररूपसे चिकित्सा पहिले लिखी जाचुकी है । अब यहाँ द्विदोषज अतिसारकी विशेषरूपसे चिकित्सा लिखीजाती है ॥ ४६ ॥
वातपित्तातिसार-चिकित्सा ।
कालिङ्गादि ।
कलिङ्गकवचामुस्तं दारु सातिविषं समम् । कल्कं तण्डुलतोयेन पिबेत पित्तानिलामयी ॥ ४७ ॥
वात और पित्तके अतिसारवाले रोगीको इन्द्रजौ, वच, नागरमोथा, देवदारु और अतीस इन सबको समान भाग लेकर चावलोंके जलके साथ पीस कर कल्क बनाकर पान करना चाहिये ॥ ४७ ॥
पित्तश्लेष्मातिसार-चिकित्सा ।
मुस्तादि ।
मुस्ता सातिविषासूर्वा वचा च कुटजः समः । एषां कषायः सक्षौद्रः पित्तश्लेष्मातिसारहृत् ॥ ४८ ॥
नागरमोथा, अतीस, मूर्वा, वच और कुडेकी छाल इनको समान भाग लेकर और यथाविधिसे क्वाथ बनाकर उसमें शहद डालकर पान करनेसे पित्त और कफातीसार दूर होताहै ॥ ४८ ॥
समङ्गादि ।
समङ्गा धातकी बिल्वमास्रास्थ्यम्भोजकेशरम् । बिल्वं मोचरसं लोध्रं कुटजस्य फलत्वचौ ॥ ४९ ॥ पिबेत्तण्डुलतोयेन कषायं कल्कमेव वा । श्लेष्मपित्तातिसारघ्नं रक्तं वाथ नियच्छति ॥ ५० ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १३९
लज्जावन्ती, धायके फूल, बेलगिरी, आमकी गुठलीकी गिरी और कमलकेशर अथवा बेलगिरी, मोचरस, लोध, कुडेकी छाल और इन्द्रजौ इनके क्वाथ या कल्कको चावलोंके जलके साथ पान करनेसे पित्त-कफातिसार और रक्तज अतिसार शीघ्र दूर होता है ॥ ४९ ॥ ५० ॥
कुटजादि ।
कुटजातिविषामुस्तं हरिद्रापर्णिनीद्वयम् ।
सक्षौद्रशर्करं शस्तं पित्तश्लेष्मातिसारिणाम् ॥ ५१ ॥
पित्त कफातिसारवाले रोगियोंको कुडेकी छाल, अतीस, नागरमोथा, हल्दी, दारुहल्दी, शालपर्णी और पृश्निपर्णी इनके क्वाथमें शहद और मिश्री डालकर पान करनेसे शीघ्र लाभ होता है ॥ ५१ ॥
वातश्लेष्मातिसार-चिकित्सा ।
चित्रकादि ।
चित्रकातिविषामुस्तं बला बिल्वं सनागरम् ।
वत्सकत्वक्फलं पथ्या वातश्लेष्मातिसारनुत् ॥ ५२ ॥
चीता, अतीस, नागरमोथा, खिरटी, बेलगिरी, सोंठ, कुडेकी छाल, इन्द्रजौ और हरड इनका क्वाथ वात और कफके अतिसारको नष्ट करता है ॥ ५२ ॥
त्रिदोषातिसार-चिकित्सा ।
वराहस्नेहमांसाम्बुसदृशं सर्वरूपिणम् ।
कृच्छ्रसाध्यमतीसारं विद्याद् दोषत्रयोद्भवम् ॥ ५३ ॥
त्रिदोषातिसारमें वातादि तीनों दोषोंके लक्षण प्रकट होते हैं। इसमें मल सूअरकी चर्बी और मांस मिश्रित जलकी समान होता है । यह त्रिदोषज अतीसार अत्यन्त कष्टसाध्य होता है ॥ ५३ ॥
समङ्गादि-कषाय ।
समङ्गाऽतिविषा मुस्ता विश्वं ह्रीबेरधातकी ।
कुटजत्वक्फलं बिल्वं क्वाथः सर्वातिसारनुत् ॥ ५४ ॥
लज्जावन्ती, अतीस, नागरमोथा, सोंठ, सुगन्धवाला, धायके फूल, कुडेकी छाल, इन्द्रजौ और बेलगिरी इनका क्वाथ पान करनेसे सर्व प्रकारका अतीसार दूर होता है ॥ ५४ ॥
पञ्चमूलीबलाबिल्वगुडूचीमुस्तनागरैः ।
२४० | भैषज्यरत्नावली । | [ अतिसार-
पञ्चमूली-बलादि ।
पञ्चमूलीबलाबिल्वगुडूचीमुस्तनागरैः ।
पाठाभूनिम्बबर्हिष्ठकुटजत्वक्फलैः शृतम् ॥ ५५ ॥
सर्वजं हन्त्यतीसारं ज्वरं चापि तथा वमिम् ।
सशूलोपद्रवं श्वासं कासं चापि सुदुस्तरम् ॥ ५६ ॥
पञ्चमूल (पित्ताधिक्यमें स्वल्प पंचमूल और वात-कफाधिक्यमें बृहत्पंचमूल लेना चाहिये), खिरैंटी, बेलगिरी, गिलोय, नागरमोथा, सोंठ, पाठ, चिरायता, सुगन्ध-वाला, कुडेकी छाल और इन्द्रजौ इनका क्वाथ शीतल करके पान करनेसे त्रिदोषज अतिसार, ज्वर, वमन, शूल आदि उपद्रवोंसहित दुस्तर श्वास और कास-विकार दूर होते हैं ॥ ५६ ॥
पुटपक्वौषधप्रयोगविधि ।
अवेदनं सुसंपक्वं दीप्ताग्नेः सुचिरोत्थितम् ।
नानावर्णमतीसारं पुटपाकैरूपाचरेत् ॥ ५७ ॥
यदि प्रदीप्ताग्निवाले रोगीके बहुत दिनोंका पुराना, पीडारहित, परिपक्व और अनेक वर्णका अतिसार (रोग) हो तो उसकी अतिसाररोगमें कहीहुई पुटपाककी औषधियोंसे चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ५७ ॥
कुटज-पुटपाक ।
स्निग्धं घनं कुटजवल्कलजन्तवजग्ध-
मादाय तत्क्षणमतीव च कुट्टयित्वा ।
जम्बूपलाशपुटतण्डुलतोयसिक्तं
बद्धं कुशेन च बहिर्घनपङ्कलिप्तम् ॥ ५८ ॥
सुस्विन्नमेतदवपीड्य रस गृहीत्वा
क्षौद्रेण युक्तमतिसारवते प्रदद्यात् ।
कृष्णात्रिपुत्रमतिपूजित एष योगः
सर्वातिसारहरणे स्वयमेव राजा ॥ ५९ ॥
१ "स्वरसस्य गुरुत्वेन पुटपाकं पलं पिबेत् । पुटपाकस्य पाकोऽयं बहिराङ्गारवर्णता ॥"
पुटपाककी विधि यह है कि-जब पुटपाकका बाहरसे लालरंग होजाय, तब उसको पका हुआ जान-कर निकाल लेवे । फिर उसमेसे रसको निकालकर एकएक पलकी मात्रासे पानकरे ।
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । २४१
चिकनी मोटी और जिसको कीड़ोंने न खाया हो, ऐसी कुड़ेकी जड़की छालको लेकर तत्क्षण खूब बारीक कूटकर चावलोंके जलमें पीसलेवे । फिर उसको जामुनके पत्तोंमें लपेटकर और कुशासे बाँधकर उसके ऊपर गाढ़ी मिट्टीका लेप करके सुखालेवे । पश्चात् जब पककर शीतल होजाय तब उसमेंसे रसको निकाल लेवे । इस रसमें शहद मिलाकर अतिसारवाले रोगीको सेवन कराना चाहिये । यह प्रयोग सर्वप्रकारके अतिसाररोगको नष्ट करनेके लिये सम्पूर्ण योगोंका राजा है । यह योग कृष्णात्रेयमुनिका कहा हुआहै । ॥ ५८ ॥ ५९ ॥
श्योनाकपुटपाक ।
त्वक्पिण्डं दीर्घवृत्तस्य काश्मरीपत्रवेष्टितम् ।
मृदाऽवलिप्तं सुकृतमङ्गारेष्ववकूलयेत् ॥ ६० ॥
स्विन्नमुद्धृत्य निष्पीड्य रसमादाय यत्नतः ।
शीतीकृतं मधुयुतं पाययेदुदरामये ॥ ६१ ॥
अरलूकी जड़की छालको कूट पीसकर गोलासा बनालेवे । फिर उसको कुम्मेरके पत्तोंमें लपेटकर और ऊपरसे मिट्टीका लेप कर मन्द मन्द अग्निसे पुटपाक करना चाहिये । जब पककर शीतल होजाय तब औषधिको निकालकर उसमेंसे रसको निचोड़ लेवे । उस रसको उचित मात्रासे शहदमें मिलाकर उदररोगोंमें सेवन करानेसे शीघ्र लाभ होता है ॥ ६० ॥ ६१ ॥
दाडिम-पुटपाक ।
दाडिमस्य फलं पिष्ट्वा पचेत् पुटविधानतः ।
तद्रसं मधुसंमिश्रं पिबेत् सर्वातिसारनुत् ॥ ६२ ॥
कच्चे अनारके फलको पीसकर पूर्वोक्त विधिसे पुटपाक करे । फिर उसके रसको निकालकर दो तोले परिमाण लकर मधुके साथ मिश्रितकर सेवन करनेसे सब प्रकारका अतीसार नष्ट होता है ॥ ६२ ॥
कुटज-लेह ।
शतं कुटजमूलस्य क्षुण्णं तोयार्मणे पचेत् ।
क्वाथे पादावशेषेऽस्मिन् लेहं पूते पुनः पचेत् ॥ ६३ ॥
सौवर्चलयवक्षारविडसैन्धवपिप्पली ।
धातकीन्द्रयवाजाजीचूर्णं दत्त्वा पलद्वयम् ॥ ६४ ॥
१६