भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८४६
बृहद्गोक्षुराद्यवलेह ।
गोक्षुरकं पलशतं दशमूलं तथैव च ।
पाषाणभेदोऽष्टपलं गुडूची पलपञ्चकम् ॥ १५ ॥
एरण्डाभीवोरष्टौ च पलान्येव पृथक् दश ।
सर्वमेकत्र संकुट्य जलद्रोणे विपाचयेत् ।
पद्ममूलं चाश्वगन्धा प्रत्येकं पलविंशतिः ॥ १६ ॥
सर्वमेकत्र संकुट्य जलद्रोणे विपाचयेत् ।
पादशेषं तु संगृह्य वस्त्रपूतं समाक्षिपेत् ॥ १७ ॥
गव्याज्यं प्रस्थमेकं तु शिलाजं च तथा स्मृतम् ।
घनीभूते तु सञ्जाते द्रव्याणीमानि दापयेत् ॥ १८ ॥
तालमूली शताह्वा च त्रिकटु त्रिफला तथा ।
सूक्ष्मैला भूतकेशी च ह्रीबेरं नागकेशरम् ॥ १९ ॥
पद्मकं जातिपत्रत्वङ्मधुयष्टी सरोचना ।
जातीफलमुशीरं च त्रिवृता रक्तचन्दनम् ॥ २० ॥
धान्यकं कटुका क्षारौ नागवल्ली च शृङ्गिका ।
पुष्कराह्वं शठी दारु सीसं लौहं च वङ्गकम् ॥ २१ ॥
द्रव्याणीमानि संगृह्य प्रत्येकं पलमात्रकम् ।
स्निग्धभाण्डे निधाय–
गोखुरू १०० पल, दशमूलकी ओषधियाँ १०० पल, पाषाणभेद ८ पल गिलोय ५ पल, अण्डकी जड ८ पल, शतावर १० पल, पद्ममूल (भसींडा) २० पल और असगन्ध २० पल इन सबको एकत्र कूटकर ३२ सेर जलमें पकावे । जब ८ सेर जल शेष रहे तब उतारकर कपडेमें छानलेवे । फिर इस क्वाथमें गौका घी एक प्रस्थ (६४ तोले) और शिलाजीत एक प्रस्थ डालकर यथाविधि पाक करे । पकते पकते जब अवलेहकी समान गाढा होजाय तब उसमें मुसली, साफ, त्रिकुटा; त्रिफला, छोटी इलायची, भूतकेशीकी जड, सुगन्धवाला, नागकेशर, पद्माख, जावित्री, दारचीनी, मुलहठी, गोरोचन, जायफल, खस, निसोत, लालचन्दन, धनियाँ, कुटकी, जवाखार, सज्जी, पान, काकडासिंगी, पोहकरमूल, कचूर, देवदारु, शीसा, लोहा और वंगभस्म इन औषधियोंको चार चार तोले लेकर बारीक चूर्ण करके घीके चिकने बासनमें भरकर रखदेवे ।
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-अथ नित्यं लिह्यात्पलोन्मितम् ॥ २२ ॥
खादेद्बलाग्निं संप्रेक्ष्य पथ्यं सेवेत मानवः ।
अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रं च मूत्राघातो विबन्धता ॥ २३ ॥
प्रमेहं विंशतिं चैव शुक्रदोषस्तथैव च ।
धातुक्षयश्चोष्णवातो वातकुण्डलिकायः ॥ २४ ॥
ते सर्वे प्रशमं यान्ति भास्करेण तमो यथा ।
नातः परतरं किञ्चित्कृष्णात्रेयेण पूजितः ॥ २५ ॥
तदनन्तर नित्यप्रति प्रातःकाल उठकर ईश्वरस्मरण करके इसमेंसे चार चार तोले परिमाण अथवा अपनी अग्निके बलाबलको विचारकर भक्षण करे । इसपर हल्का और हितकारी भोजन करे । इसके सेवन करनेसे पथरी, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, विबन्ध, बीस प्रकारके प्रमेह, वीर्यदोष, धातुक्षीणता, उष्णवात और वातकुण्डलिकाम्रभृति सम्पूर्ण रोग इसप्रकार नाश होते हैं, जैसे सूर्यकी प्रभासे अन्धकार तत्काल नष्ट होजाता है। उक्त रोगोंको नष्ट करनेके लिये इससे श्रेष्ठ और कोई औषधि नहीं है । इसको कृष्णात्रेय मुनिने निर्माण किया है ॥ २२-२५ ॥
पाषाणभिन्न ।
शुद्धसूतं द्विधा गन्धं शिलाजतु रसात्पलम् ।
श्वेतपुनर्नवावासारसैः श्वेतापराजितैः ॥ २६ ॥
प्रतिदिनं त्र्यहं मर्द्य शुष्कं तद्भाण्डसम्पुटे ।
स्वेदयेद्दोलिकायन्त्रे संशुष्कं तं विचूर्णयेत् ॥ २७ ॥
रसः पाषाणभिन्नः स्याद्दिगुञ्श्चाश्मरीं हरेत ।
भूधात्रीफलविशालां पिष्ट्वा दुग्धेन पाययेत् ॥
कुलत्थक्वाथसंपीतमनुपानं सुखावहम् ॥ २८ ॥
शुद्ध पारा ४ तोले, शुद्ध गन्धक ८ तोले और शिलाजीत ४ तोले इनको एकत्रकर सफेद पुनर्नवा, अडूसेके पत्तों और सफेद अपराजिताके पत्तोंके रसमें एक एक दिन अच्छे प्रकार खरल करके सुखालेवे । फिर मिट्टीके चिकने बर्तनमें रख मुख बन्द करके दोलायन्त्रसे स्वेद देवें । पश्चात् उसको निकालकर उत्तम प्रकारसे सुखाकर खूब बारीक पीसलेवे । इस प्रकार यह पाषाणभिन्ननामक रस सिद्ध होता है । इसकी प्रतिदिन प्रातःसमय दो दो रत्ती मात्राको ले भुईंआंवला और इन्द्रायणके फलोंको दूधमें पीसकर इसमें मिलालेवे अथवा कुलथीके
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८४७
क्वाथमें मिलाकर सेवन करनेसे अश्मरीरोग शीघ्र नष्ट होता है और रोगी आनन्द होजाता है ॥ २६–२८ ॥
पाषाणवज्ररस ।
शुद्धसूतं द्विधा गन्धं रसैः श्वेतपुनर्नवैः ।
मर्द्दयित्वा दिनं खल्ले रुद्ध्वा तद्भूधरे पचेत् ॥ २९ ॥
दिनान्ते तत्समुद्धृत्य मर्दयेद् गुडसंयुतम् ।
अश्मरीं वस्तिशूलं च हन्ति पाषाणवज्रकः ॥ ३० ॥
गोरक्षकर्कटीमुलं क्वाथं कौलत्थकं तथा ।
अनुपानं प्रयोक्तव्यं बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ॥ ३१ ॥
शुद्ध पारा एक भाग और गन्धक दो भाग इन दोनोंको सफेद पुनर्नवेके रसमें एकदिन खरलकर सम्पुटमें स्थापन करके भूधरयन्त्रमें पकावे । जब अच्छे प्रकार पककर शीतल होजाय तब सायंकालमें इसको निकालकर गुड मिलाकर पुनः खरल कर लेवे । इस प्रकार सिद्ध किया हुआ यह पाषाणवज्र नामवाला रस गोरखककडीकी जडके. और कुलथीके क्वाथके साथ मिलाकर तथा वातादि दोषोंके बलाबलको विचारकर सेवन करनेसे पथरी और बस्तिशूल रोगको नष्ट करता है ॥ २९–३१ ॥
वरुणाद्यलौह ।
द्विपलं वरुणं धात्र्यास्तदर्द्धं धात्रिपुष्पकम् ।
हरीतक्याः पलार्द्धं च पृश्निपर्णी तदर्द्धकम् ॥ ३२ ॥
कर्षमानं च लौहाभ्रं चूर्णमेकत्र कारयेत् ।
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय शाणमानं विधानवित् ॥ ३३ ॥
मूत्राघातं तथा घोरं मूत्रकृच्छ्रं च दारुणम् ।
अश्मरीं विनिहन्त्याशु प्रमेहं विषमज्वरम् ॥ ३४ ॥
बलपुष्टिकरं चैव वृष्यमायुष्यमेव च ।
वरुणाद्यमिदं लौहं चरकेण विनिर्म्मितम् ॥ ३५ ॥
बरनाकी मींग ८ तोले, आमले ८ तोले, धायके फूल ४ तोले, हरड दो तोले, पृश्निपर्णी एक तोला, लोहे और अभ्रककी भस्म एक एक कर्ष लेवे । सबको एकत्र कूटपीसकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको प्रतिदिन प्रातःकाल उठ-कर चार चार माशेकी मात्रासे सेवन करे । इसके सेवनसे घोर मूत्राघात, दारुण
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मूत्रकृच्छ्र, पथरी, प्रमेह और विषमज्वर इत्यादि विकार अल्पकालमें शमन होते हैं तथा बल, वीर्य और आयु बढ़ती है एवं शरीरकी पुष्टि होती है। इस वरुणाद्य लोहको चरकमहाराजने निर्माण किया है ॥ ३२–३५ ॥
कुलत्थाद्यघृत ।
कुलत्थसिन्धूत्थविडङ्गसारसं सशर्करं शीतलि यावशूकम् ।
बीजानि कूष्माण्डकगोक्षुराणां घृतं पचेत्तद्वरुणस्य तोये॥३६॥
दुःसाध्यसर्वाश्मरिमूत्रकृच्छ्रं सूत्राभिघातं च समूत्रबन्धम् ।
एतानि सर्वाणि निहन्ति शीघ्रं प्ररूढवृक्षानिव वज्रपातः ३७
कुलथी, सैंधानमक, वायविडङ्गके चावल, खाँड, शीतलि (शीतलीलता), जवाखार, पेठेके और गोखुरूके बीज ये प्रत्येक चार चार तोले लेवे और सबको एकत्र कूट पीसकर कल्क बनालेवे। फिर चतुर्थांशावशिष्ट बनाये हुए वरनाके क्वाथमें इस कल्कको और गौके घृतको डालकर उत्तम रीतिसे पकावे ! इस घृतको नियमबद्ध हो सेवन करनेसे दुःसाध्य पथरी, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात और मूत्रावरोधादि सर्वप्रकारके मूत्ररोग इस प्रकार नष्ट होते हैं, जैसे कि अत्यन्त मजबूत जडवाले वृक्षोंको वज्र तत्काल नष्ट करदेता है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥
वरुणघृत ।
वरुणंस्य तुलां क्षुण्णां जलद्रोणे विपाचयेत ।
पादशेषं परिस्राव्य घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ३८ ॥
वरुणं कदली बिल्वं तृणजं पञ्चमूलकम् ।
अमृता चाश्मजं देयं बीजं च त्रपुषोद्भवम् ॥ ३९ ॥
शतपर्वा तिलक्षारं पलाशक्षारमेव च ।
यूथिकायाश्च मूलानि कार्षिकाणि समावपेत् ॥ ४० ॥
बरनाकी छाल १०० पल लेकर कूटके, फिर उसको ३२ सेर जलमें पकावे । पकते २ जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर वस्त्रमें छानलेवे । इस क्वाथमें गौका घी १ प्रस्थ एवं वरनाकी छाल, केलेकी जड, बेलकी छाल, तृणपञ्चमूल, गिलोय, शुद्ध शिलाजीत, खीरेके बीज, ईखकी जड, तिलोंका खार, ढाकका क्षार और जुहीकी जड; ये प्रत्येक औषधि दो दो तोले बारीक पीसकर डालेवे और मन्दमन्द अग्निके द्वारा शनैः शनैः घृतको सिद्ध करे ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८४९
अस्य मात्रां पिबेज्जन्तुर्देशकालद्यपेक्षया ।
जीर्णे तस्मिन्पिबेत्पूर्वं गुडं जीर्णे तु मस्तुना ॥
अश्मरीं शर्करां चैव मूत्रकृच्छ्रं विनाशयेत् ॥ ४१ ॥
पश्चात् देश तथा कालको विचारकर इसकी मात्राका निरूपण करके सेवन करना चाहिये । जिस समय घृत पचजाय तब पुराने गुडको दहीके तोडके साथ मिलाकर पान करे । इससे पथरी, शर्करा और मूत्रकृच्छ्र प्रभृति अनेकों रोग दूर होते हैं ॥ ४१ ॥
पाषाणाद्यघृत ।
पाषाणभेदो वसुको वशिरोऽश्मन्तकस्तथा ।
शतावरी श्वदंष्ट्रा च बृहती कण्टकारिका ॥ ४२ ॥
कपोतवङ्कार्त्तगलकाञ्चनोशीरगुल्मकाः ।
वृक्षादनी भल्लूकश्च वरुणः शाकजं फलम् ॥ ४३ ॥
यवाः कुलत्थाः कोलानि कतकस्य फलानि च ।
ऊषकादिप्रतीवापमेषां क्वाथे शृतं घृतम् ॥ ४४ ॥
भिनत्ति वातसम्भूतामश्मरीं क्षिप्रमेव तु ।
क्षारान् यवागूः पेयांश्च कषायाणि पयांसि च ॥
भोजनानि च कुर्वीत वर्गेऽस्मिन्वातनाशने ॥ ४५ ॥
पाषाणभेद, आककी जड, गजपीपल, अश्मन्तक (अम्लोद), शतावर, गोखरू, बडी कटेरी, कटेरी, ब्राह्मी, नील फूलकी कटसरैया, कचनारकी छाल, खस, गुल्मक (लाल करवीरवृक्ष), बन्दा, सोनापाठेकी छाल, वरनाकी छाल, सागौनके फल, जौ, कुलथी, बेर और निर्मलीके फल ये सब औषधें समान भागसे मिलीहुई चार सेर लेवे। पुनः सबको ३२ सेर जलमें पकाकर चतुर्थांश जल शेष रहनेपर उतारले। पश्चा वस्त्रमें छानकर इस क्वाथमें ऊषकादिगण (खारी मिट्टी, सैंधानमक, हींग, पुष्पकसीस, धातुकसीस, गूगल, शिलाजीत और नीलाथोथा,) की ओषधियोंको समभाग मिश्रित चूर्ण एक सेर और गोघृत ४ सेर डालकर उत्तम विधिसे पकावे। जब अच्छी तरह पककर घृतमात्र शेष रहजाय तब उतारकर चिकने बासनमें भरकर रख देवे। इसके सेवनसे वातोत्पन्न पथरी तत्क्षण नष्ट भ्रष्ट होती है। इस घृतको सेवन करते समय क्षार, यवागू, पेया, क्वाथ, दूध और वातनाशक द्रव्योंका भोजन करे ॥ ४२–४५ ॥
५४
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भद्रावहघृत ।
अम्बष्ठा पाटला चैव वर्षाभूद्वयमेव च ।
काशो विदारीकन्दश्च कुशमोरटगोक्षुराः ॥ ४६ ॥
पाषाणभेदी वाराही शालिमूलं शरस्तथा ।
भल्लातकं शिरीषस्य मूलमेषामथाहरेत् ॥ ४७ ॥
समभागानि सर्वाणि क्वाथयित्वा विचक्षणः ।
पादशेषकषायेण घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ४८ ॥
कल्कं दत्त्वाऽथ मतिमान् गिरिजं मधुकं तथा ।
नीलोत्पलं च काकोलीबीजं त्रपुषमेव च ॥ ४९ ॥
कूष्माण्डं च तथैर्वारुसम्भवं च समं भवेत् ।
उष्णवातं निहन्त्येतद् घृतं भद्रावहं शुभम् ॥
मूत्राघाताश्मरीमेहान्भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ५० ॥
पाठ, पाढल, श्वेत पुनर्नवा, लालपुनर्नवा, काँस, विदारीकन्द, कुश, ईखकी जड, गोखुरू, पाषाणभेद, वाराहीकन्द, शालिके चावलोंकी जड, रामसर, भिलावे और शिरीषकी जड इन सबको समान भाग लेकर चौगुने जलमें पकावे । चतुर्थांशावशिष्ट क्वाथको ग्रहण कर उसमें गोघृत १ प्रस्थ एवं भूरिछरीला, मुलहठी, नीलकमल, काकोली, खीरेके बीज, पेठेके और ककडीके बीज इनके समान भाग कल्कको डालकर उत्तम प्रकार घृतको सिद्ध करे । यह भद्रावहनामवाला उत्तम घृत उष्णवात ( सोजाक ), मूत्राघात, पथरी और प्रमेहादि व्याधियोंको शीघ्र नाश करताहै । जैसे सूर्य अन्धकारको भेद देताहै ॥ ४६-५० ॥
विदारीघृत ।
विदारी वृषको यूथी मातुलुङ्गी च भूस्तृणम् ।
पाषाणभेदं कस्तूरी वसुको वसिरोऽनिलः ॥ ५१ ॥
पुनर्नवा वचा रास्ना बला चातिबला तथा ।
कशेरुविश्वशृङ्गाटामलक्याः स्थिरादयः ॥ ५२ ॥
शरक्षुदर्भमूलं च कुशः काशस्तथैव च ।
पलद्वयं तु संहृत्य जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ५३ ॥
पादशेषे रसे तस्मिन् घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
शतावर्यास्तथा धात्र्याः स्वरसो घृतसम्मितः ॥ ५४ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहित । ८५१
षट्पलं शर्करायाश्च कार्षिकाण्यपराणि च ।
यष्ट्याह्वं पिप्पलीद्राक्षा काश्मर्यं सपरूषकम् ॥ ५५ ॥
एला दुरालमा कौन्ती कुङ्कुमं नागकेशरम् ।
जीवनीयानि चाष्टौ च दत्त्वा च द्विगुणं पयः ॥
एतत्सर्पिर्विपक्तव्यं शनैर्मृद्वग्निना बुधैः ॥ ५६ ॥
विदारीकन्द, अडूसेकी छाल, जुही, बिजौरानिंबु, गन्धतृण, पाषाणभेद, कस्तूरी, आककी जड गजपीपल, चीतेकी जड, विषखपरा, वच, रायसन, खिरेंटी, कंघी, कसेरु, भसींडे, सिंघाडे, भुईंआमला, शालपर्णी आदि, स्थिरादिगणकी समस्त ओषधियाँ, रामसर, ईखकी जड, डाभकी जड, कुशा और कास इन सबकी आठ आठ तोले लेकर कूटकर एक द्रोण ( ३२ सेर ) जलमें औटावे । जलते २ जब चौथाई भाग जल शेष रहे तब उतारकर वस्त्रमें छान लेवे । पुनः उस क्वाथमें गौका घी एक प्रस्थ, शतावरका रस एक प्रस्थ, आमलोंका रस एक प्रस्थ, सफेद बूरा या मिश्री २४ तोले एवं मुलहठी, पीपलदाख, कुम्हेर, फालसे, इलायची, धमासा, रेणुका, केशर, नागकेशर और जीवनीकगण ( ऋद्धि, वृद्धि, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, जीवक और ऋषभक ) ये सब औषधें दो दो तोले लेकर बारीक कूट पीसकर डालदेवे और गौका दूध दो प्रस्थ डालकर मन्दमन्द अग्निद्वारा यथाविधि शनैः शनैः घृतको पकावे । इस प्रकार घृतको सिद्ध करके उत्तम पात्रमें भरकर रख देवे ॥ ५१–५६ ॥
मूत्राघातेषु सर्वेषु विशेषात्पित्तजेषु च ॥ ५७ ॥
कासश्वासक्षतोरस्के धनुःस्त्रीभारकर्शिते ।
तृष्णाच्छर्दिमनःकम्पे शोणितच्छर्दने तथा ॥ ५८ ॥
रक्ते यक्ष्मण्यपस्मारे तथोन्मादे शिरोग्रहे ।
योनिदोषे रजोदोषे शुक्रदोषे सुरामये ॥ ५९ ॥
एतत्स्मृतिकरं वृष्यं वाजीकरणमुत्तमम् ।
पुत्रदं बलवर्णाढ्यं विशेषाद्वातनाशनम् ॥ ६० ॥
पानभोजननस्येषु न क्वचित्प्रतिहन्यते ।
विदारीघृतमित्युक्तं रसयनुत्तमम् ॥ ६१ ॥
यह घृत सम्पूर्ण मूत्राघात, विशेषकर पित्तज मूत्ररोग, खाँसी, श्वास, क्षत, उरःक्षत, धनुषके चढानेसे, अत्यन्त मैथुन करनेसे या अत्यन्त बोझ उठानेसे उत्पन्नहुई कृशता,
८५२ भैषज्यरत्नावली । [ अश्मरी-
प्यास, वमन, मनोव्याधि, कम्प, रुधिरकी वमन, रक्तस्राव, राजयक्ष्मा, मृगी, उन्माद, शिरोरोग, योनिदोष, रजोदोष, वीर्यदोष और स्वरभङ्गप्रभृति रोगोंमें शीघ्र उपकार करता है। स्मरणशक्ति और वीर्यको बढाता है तथा अत्यन्त वाजीकरण, पुत्रदायक, बल-वर्णवर्द्धक एवं विशेषकर वायुके विकारोंको नष्ट करनेवाला है। इस घृतको पान, भोजन और नस्यमें व्यवहार करना चाहिये। यह अत्युत्तम रसायन विदारीघृतनामसे प्रसिद्ध है ॥ ५७-६१ ॥
वरुणाद्य तैल ।
त्वक्पत्रपुष्पमूलस्य वरुणात्सत्रिकण्टकात् ।
कषायेण पचेत्तैलं वस्तिनाऽऽस्थापनेन च ॥
शर्कराश्मरिशूलघ्नं मूत्रकृच्छ्रविनाशनम् ॥ ६२ ॥
छाल, पत्ते, फूल और जडसहित वरना और गोखुरूके बीज इनको समान भाग लेकर क्वाथ बनालेवे । फिर इस क्वाथके साथ तिलके तेलको सिद्ध करके आस्थापनवस्ति देवे तो शर्करा, पथरी, शूल और मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होते हैं ६२ ॥
शिलोद्भिदादितैल ।
शिलोद्भिदैरण्डसमास्थिराभिः पुनर्नवाभीरुरसेषु सिद्धम् ।
तैलं घृतं क्षीरमथानुपानं कालेषु कृच्छ्रादिषु संप्रयोज्यम् ॥ ६३ ॥
पुनर्नवा और शतावरके रसमें पाषाणभेद, अण्डकी जड और शालपर्णी इनका समान भाग मिश्रित चूर्ण डालकर तिलके तेल अथवा घृतको पकावे । इस तेलको दूधके साथ मिलाकर बहुत पुराने मूत्रकृच्छ्ररोगमें पान करना चाहिये । इससे उक्त रोग जल्द आराम होता है ॥ ६३ ॥
उशीराद्य तैल ।
उशीरं तगरं कुष्ठं यष्टीमधुकचन्दनम् ।
विभीतकाभयाभीरु पद्ममुत्पलशारिवे ॥ ६४ ॥
बला तुरंगगन्धा च दशमूलं शतावरि ।
विदारी चैव काकोली गुडूच्यतिबला तथा ॥ ६५ ॥
श्वदंष्ट्रा शपुष्पा च वट्यालकमधूरिके ।
एतैः कर्षमितैर्भागैस्तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ६६ ॥
सपत्रफलमूलस्य गोक्षुरस्य पलं शतम् ।
जलद्रोणे विपक्तव्यं पादांशेनावतारयेत् ॥ ६७ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहित । ८५३
तक्रं तैलसमं देयं वीरणक्वाथमाढकम् ॥ ६८ ॥
पत्र, फल और मूलसहित गोखुरू १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । पकते पकते जब चतुर्थांश जल बाकी रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इस क्वाथमें खस, तगर, कूठ, मुलहठी, लालचन्दन, बहेडा, हरड, कटेरी, कमल, नीलकमल, अनन्तमूल, श्यामालता, खिरेंटी, असगन्ध, दशमूल, शतावर, विदारी-कन्द, काकोली, गिलोय, कंघी, गोखुरू, सोया, पीली खिरेंटी और सौंफ इन औषधियोंका कल्क दो दो तोले एवं तिलका तेल १ प्रस्थ, गौका मट्ठा १ प्रस्थ और पूर्वोक्त विधिके अनुसार बनायाहुआ खसका क्वाथ १ आढक (८ सेर) मिलाकर उत्तम प्रकारसे घृतको सिद्ध करे ॥ ६४–६८ ॥
मूत्राघातं मूत्रकृच्छ्रमश्मरीं हन्ति दारुणम् । बलवर्णकरं वृष्यं वातपित्तनिषूदनम् । उशीराद्यमिदं तैलं काशिराजेन निर्मितम् ॥ ६९ ॥
यह उशीराद्यनामक तेल मूत्राघात, मूत्रकृच्छ्र और दारुण अश्मरीरोग तथा वात-पित्तजन्य रोगोंको नाश करता है । बल-वीर्यवर्द्धक तथा शरीरको कान्तियुक्त बनानेवाला है । इसको श्रीमान् महाराजा काशिराजाने बनाया है ॥ ६९ ॥
अश्मरीरोगमें पथ्य ।
वस्तिर्विरेको वमनं च लङ्घनं स्वेदोऽवगाहोऽपि च वारि- सेचनम् । यवाः कुलत्थाः प्रपुराणशालयो मद्यानि धन्वाण्डजसम्भवा रसाः ॥ ७० ॥ पुराणकूष्माण्डफलं च तल्लता गोकण्टको वारुणशाकमाद्रकम् । पाषाण- भेदी यवशूकवेणवः स्थिरा समाकर्षणमश्मनापि । एतानि सर्वाणि भवन्ति सर्वदा मुदेऽश्मरीरोग- निपीडितानाम् ॥ ७१ ॥
पिचकारी, विरेचन, वमन, लंघन, पसीना निकालना, शीतल जलमें घुसकर स्नान करना, जलसिंचन, जौ, कुलथी, पुराने शालिके चावल, मदिरा, मरुदेशके और अण्डज प्राणियोंके मांसका रस, पुराना पेठा, पेठेकी बेल, गोखुरू, वरनाके कोमल पत्तोंका शाक, अदरख, पाषाणभेद, जवाखार, बाँसके चावल, शालपर्णी और पथरीको निकालनेवाले द्रव्य ये सब वस्तुयें अश्मरीरोगसे पीडित जनोंको सर्वदा सर्वकालमें हितकारी हैं ॥ ७० ॥ ७१ ॥
८९४ भैषज्यरत्नावली । [ प्रमेह-
अश्मरीरोगमें अपथ्य ।
मूत्रस्य शुक्रस्य च वेगमम्लं विष्टम्भि रूक्षं गुरु चान्नपानम् ।
विरुद्धपानाशनमश्मरीमान् विवर्जयेत्सन्ततमप्रमत्तः ॥ ७२ ॥
मूत्र और शुक्रके अवरोध, खट्टे रस, विष्टम्भकारक, रूखे और पचनेमें भारी ऐसे अन्न तथा पान एवं प्रकृतिविरुद्ध अन्नपान करना पथरीवाले रोगीको तत्काल छोड़-देने चाहिये । क्योंकि ये सब इस रोगमें अपथ्य हैं ॥ ७२ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्याम अश्मरीचिकित्सा ॥
प्रमेहकी चिकित्सा ।
स्थूलः प्रमेही बलवानिहैकः कृशस्तथाऽन्यः परिदुर्बलश्च ।
संबृंहणं तत्र कृशस्य कार्यं संशोधनं दोषबलाधिकस्य ॥ १ ॥
प्रमेहरोगी दो प्रकारके होते हैं, जैसे—कोई स्थूल और बलवान्, कोई कृश तथा दुर्बल । इनमें कृश पुरुषोंको बृंहण (मांस और बलवर्द्धक) औषधियोंसे एवं बलवान् पुरुषोंको दोषोंकी अधिकता होनेपर वमन, विरेचनादिसे शुद्ध करे १
ऊर्ध्वं तथाऽधश्च मलेऽपनीते मेहेषु सन्तर्पणमेव कार्यम् ।
संशोधनं नार्हति यः प्रमेही तस्य क्रिया संशमनी विधेया ॥ २
प्रमेहरोगमें वमन और विरेचनादिद्वारा सम्पूर्ण दोष ऊपर तथा नीचे मार्गसे निकल जायें तब सन्तर्पण क्रिया करे । किन्तु जो प्रमेहरोगी संशोधन करने योग्य नहीं हों उनकी रोगको नष्ट करनेवाली औषधियोंसे चिकित्सा करे ॥ २ ॥
ये विष्किरा ये प्रतुदा विहङ्गास्तेषां रसैर्जाङ्गलजैर्मनोज्ञैः ।
मन्दाः कषाया रसचूर्णलेहा मसूरमुद्गा लघवश्च भक्ष्याः ॥ ३ ॥
प्रमेहरोगीको विष्किर (मुरगा, कबूतर, हंस, मोर, तीतर) और प्रतुद (गिद्ध, बाज, काकादि) पक्षियोंका मांस एवं बकरी आदि जंगली पशुओंका मांसरस तथा कषैले रसवाले पदार्थ व अल्प परिमाण क्वाथ, रस, चूर्ण, अवलेह, मसूर और मूँग आदि हल्के पदार्थ भोजन करने चाहिये ॥ ३ ॥
श्यामाककोद्रवोद्दालगोधूमचणकाढकी ।
कुलत्थाऽत्र हिता भोज्या पुराणा मेहिनां सदा ॥
जाङ्गलं तिक्तशाकं च यवान्नं चंक्रमो मधु ॥ ४ ॥
चिकित्सा ] | भाषाटीकासहिता । | ६५५
बहुत पुराने समेके चावल, कोदों, वनकोदों, गेहूँ, चने, अरहर और कुलथी ये सब अन्न प्रमेहरोगियोंको खाने चाहिये । एवं जङ्गली पशु-पक्षियोंका मांसरस, कडुवै शाक, जौके बने अन्न और शहद इनका सेवन तथा परिभ्रमण करना इस रोगमें विशेष हितप्रद हैं ॥ ४ ॥
रूक्षमुद्वर्त्तनं गाढं व्यायामो निशि जागरः ।
यच्चान्यच्छ्लेष्मपित्तघ्नं बहिरन्तश्च तद्धितम् ॥ ५ ॥
रूखे (बेसन आदि) पदार्थोंकी शरीरपर खूब जोरसे मालिश करना, दण्ड-कसरत, भ्रमण, रातमें जागना और शारीरिक अथवा मानसिक क्रियाद्वारा जो कफ-पित्तको नष्ट करे ऐसे पदार्थ प्रमेहरोगियोंको हितकारी हैं ॥ ५ ॥
सर्वमेहहरो धात्र्या रसः क्षौद्रनिशायुतः ।
कषायस्त्रिफलादारुमुस्तकैर्वाथवा कृतः ॥
त्रिफलादारुदार्ब्यब्दक्वाथः क्षौद्रेण मेहहा ॥ ६ ॥
आंवलोंके रसमें शहद और हल्दीका चूर्ण मिलाकर सेवन करे तो सर्वप्रकार का प्रमेह नष्ट होता है अथवा त्रिफला, देवदारु और नागरमोथा इनके क्वाथमें शहद और हल्दीका चूर्ण डालकर पान करे किंवा हरड, बहेडा, आमला देवदारु, दारुहल्दी और नागरमोथा इनके क्वाथको मधु मिश्रितकर भक्षण करनेसे प्रमेह दूर होता है ॥ ६ ॥
त्रिफलालौहशिलाजतुपथ्याचूर्णं च लीढमेकैकम् ।
मधुनाऽमरास्वरस इव सर्वान्मेहान्निवारयति ॥
पीतः सारो गुडूच्यास्तु मधुना तत्प्रमेहहुत् ॥ ७ ॥
त्रिफलेका चूर्ण लोहभस्म, शिलाजीत और हरडोंका चूर्ण इनमेंसे किसी एकको शहदमें मिलाकर चाटे अथवा केवल गिलोयका रस और मधु एकत्र मिलाकर सेवन करनेसे सर्वप्रकारके प्रमेहरोग निवृत्त होते हैं । गिलोयके सार (गूदा) को शहदमें मिलाकर पीतेही प्रमेह नष्ट होता है ॥ ७ ॥
शतावर्या रसं रोगी क्षीरेण सह यः पिबेत् ।
प्रमेहा विंशतिस्तस्य क्षयं यान्ति न संशयः ॥ ८ ॥
शतावरके रस और दूधको एकत्र मिलाकर पान करे तो बीसों प्रकारके प्रमेह तत्काल नाश होते हैं । इसमें किञ्चिन्मात्र सन्देह नहीं है ॥ ८ ॥
आमदुग्धं समजलं यः पिबेत्प्रातुरुत्थितः ।
निस्संशयं शुक्रमेहः पुराणस्तस्य नश्यति ॥ ९ ॥
८५६ भैषज्यरत्नावली । [ प्रमेह-
नित्यप्रति प्रातःकाल उठकर कच्चा दूध और शीतल जल समान भाग मिलाकर पान करनेसे पुराना शुक्रप्रमेहरोग निश्चय नष्ट होताहै ॥ ९ ॥
पलाशपुष्पत्तोलैकं सितायाश्चार्द्धतोलकम् । पिष्टं शीताम्भसा पीतं मेहं हन्ति न संशयः ॥ १० ॥
टेसूके फूल एक तोला और मिश्री ६ माशे इन दोनोंको शीतल जलमें पीसकर पीवे तो प्रमेह दूर होता है ॥ १० ॥
स्फाटिकं चूर्णमादाय नारिकेलोदरे क्षिपेत् । तत्फलं पङ्कमध्ये तु स्थापयेदेकरात्रकम् ॥ ११ ॥ प्रातरानीय सजलं चूर्णं पेयं प्रयत्नतः । अनेन चिरकालीनो मेहो नश्यति निश्चितम् ॥ १२ ॥
फिटकिरीके चूर्णको नारियलमें भरकर कीचडमें गाड देवे और एक रात्रितक गडा रहनेदेवे । फिर प्रातःसमय निकालकर उसमेंसे फिटकिरीके चूर्णको ले जलमें पीसकर पान करे । इससे बहुत पुराना प्रमेहरोग निश्चय नाशहो ॥ ११ ॥ १२ ॥
व्यायामजातमखिलं भजन्मेहान् व्यपोहति । पादत्रच्छत्ररहितो भिक्षाशी मुनिवद्यतः ॥ १३ ॥ योजनानां शतं गच्छेदधिकं वा निरन्तरम् । मेहाञ्जेतुं वने वापि नीवारामलकाशनः ॥ १४ ॥
व्यायाम (दण्ड-कसरत अथवा किसी प्रकारका परिश्रम) करनेसे सब प्रमेह दूर होते हैं । जूता, खडाऊँ और छत्तरीको त्याग (अर्थात् नंगे पाँव नंगे शिर) मुनियोंके समान संयतेन्द्रिय होकर भिक्षा माँगकर भोजन करे और ४०० कोसतक अथवा इससे भी अधिक दूरतक निरन्तर भ्रमण करे एवं वनवासी होकर नीवार व आमलोंका भोजन कर निर्वाह करता हुआ प्रमेहोंको जीते अर्थात् इस प्रकारके कृत्य करनेसे प्रमेह शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ १३ ॥ १४ ॥
माक्षिकं धातुमप्येवं युञ्ज्यादस्याप्ययं गुणः ॥ १५ ॥
पूर्वोल्लिखित शिलाजीतके प्रयोगके नियमानुसारही शुद्ध की हुई सोनामाखीके चूर्णको सेवन करनेसे प्रमेहरोग शमन होता है। यह धातु भी शिलाजीतके समान गुणोंवाली है ॥ १५ ॥
फलत्रिकादि ।
फलत्रिकं दारुनिशां विशालां मुस्तां च निःक्वाथ्य
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८५७
निशांशकल्कम् । पिबेत्कषायं मधुसंप्रयुक्तं सर्वप्रमेहेषु समुच्छ्रितेषु ॥ १६ ॥
हरड, बहेडा, आमला, दारुहल्दी, इन्द्रायन और नागरमोथा इनका यथाविधि क्वाथ बनालेवे । उसमें हल्दीका चूर्ण और शहद डालकर पीवे तो दारुण सर्व प्रमेहरोगोंमें शीघ्र लाभ होता है ॥ १६ ॥
विडङ्गादि ।
विडङ्गसर्जार्जुनकट्फलानां कदम्बलोध्राशनवृक्षकाणाम् ।
क्वाथश्च तोयेन हितो नराणां कफप्रमेहं विनिहन्ति तेषाम् १७
वायविडङ्ग, शालवृक्षकी छाल, अर्जुनवृक्षकी छाल, कायफल, कदम्बवृक्षकी छाल, लोध और पीतशाल इनका एकत्र क्वाथ बनाकर पीनेसे कफोत्तपन्न प्रमेह रोग नष्ट होता है ॥ १७ ॥
मुस्तादि ।
मुस्ताफलत्रिकनिशासुरदारुमूर्वा इन्द्राह्वलोध्रसलिलेन कृतः कषायः ।
पाने हितः सकलमेहभवे गदे च मूत्रग्रहेषु सकलेषु नियोजनीयः ॥ १८ ॥
नागरमोथ, त्रिफला, हल्दी, देवदारु, मूर्वा, इन्द्रवारुणी और लोध इनको समान भाग लेकर यथानियम क्वाथ बनालेवे । इस क्वाथ को सेवन करनेसे समस्त प्रमेह व सर्वप्रकारके मूत्रजनित विकार नाश होते हैं ॥ १८ ॥
शिलाजतुप्रयोग ।
शालसारादितोयेन भावितं यच्छिलाजतु ।
पिबेत्तेनैव संशुद्धदेहः पिष्टं यथाबलम् ॥ १९ ॥
जाङ्गलानां रसैः सार्द्धं तस्मिञ्जीर्णे च भोजनम् ।
कुर्याद्दिवं तुलां यावदुपयुञ्जीत मानवः ॥ २० ॥
मधुमेहं विहायादौ शर्करामश्मरीं तथा ।
वपुर्वर्णबलोपेतः शतं जीवत्यनामयः ॥ २१ ॥
शालसारादिगणकी औषधियोंके क्वाथसे शिलाजीतको भावना देवे, फिर धूपमें सुखाकर बारीक चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको वमन विरेचनादिसे शुद्ध शरीरवाला रोगी अपनी अग्निके बलाबलको विचारकर उक्त शालसारादिगणके क्वाथमें मिलाकर सेवन करे । जब यह औषधि जीर्ण ( हज्म ) होजाय तब जङ्गली पशुप-
४५८ | भैषज्यरत्नावली । | [ प्रमेह -
क्षियोंके मांसरसके साथ भोजन करे। इसको प्रतिदिन प्रातःसमय एक एक तोला सेवन करे और जब सौ पल परिमाण औषधि भक्षण करचुके तब छोडदेवे। यह औषधि मधुमेहको छोडकर अन्य सर्वप्रकारके प्रमेहरोग, शर्करा और पथरीरोगको नष्ट करती है। इसका सेवन करनेवाला रोगी आरोग्य होकर और आयु, बल, वर्ण करके युक्त सौ वर्षपर्यन्त जीता है॥
कुशावलेह।
कुशः काशो वीरणश्च कृष्णेक्षुः खग्गडस्तथा।
एषां दशपलान्भागान्जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ २२ ॥
अष्टभागावशेषं तु कषायमवतारयेत् ।
खण्डप्रस्थं समादाय लेहवत्साधु साधयेत् ॥ २३ ॥
अवतार्य ततः पश्चाच्चूर्णानीमानि दापयेत् ।
मधुकं कर्कटीबीजं कर्कारु त्रपुषं तथा ॥ २४ ॥
शुभामलकपत्राणि त्वगेला नागकेशरम् ।
वरुणाऽमृता प्रियंगू प्रत्येकमक्षसम्मितम् ॥ २५ ॥
कुशा, काँस, खस, कालीईख और खग्गड (तृण विशेष) इन सबकी मूलकों चालीस चालीस तोले लेकर एक द्रोण जलमें पकावे। पकते पकते जब आठवाँ भाग जल शेष रहे तब उतारकर छानलेवे। फिर इस क्वाथमें एक प्रस्थ उत्तम खाँड डालकर विधिपूर्वक पाक करे। जब अवलेहकी समान होजाय तब चूल्हेपरसे उतारकर उसमें मुलहठी, ककडीके बीज, पेठेके बीज, खीरेके बीज, वंशलोचन, आमले, तेजपात, दारचीनी, नागकेशर, वरनाकी छाल, गिलोय और फूलप्रियंगू ये प्रत्येक दो दो तोले चूर्ण करके डालदेवे।। सबको एकत्र मिलाकर उत्तम चिकने पात्रमें भरकर रखदेवे ॥ २२-२५ ॥
प्रमेहान्विंशतिं हन्ति मूत्राघातांस्तथाऽश्मरीम् ।
वातिकान्पैत्तिकांश्चापि श्लैष्मिकान्सान्निपातिकान् ॥
हन्त्यरोचकमत्युग्रं बलपुष्टिकरं परम् ॥ २६ ॥
यह अवलेह नित्यप्रति उचित मात्रासे सेवन करनेसे बीसों प्रकारके प्रमेह, मूत्राघात, अश्मरी, वातज, पित्तज, कफात्मक और सन्निपातज विकार और अत्युग्र अरुचिको शीघ्र नष्ट करता है। एवं शरीरमें अत्यन्त बलकी वृद्धि तथा पुष्टि करता है ॥ २६ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८६९
सालसारादिलेह ।
सालसारादिवर्गस्य क्वाथे तु घनतां गते ।
दन्तीलोध्रशिवाकान्तलौहताम्ररजः क्षिपेत् ॥
घनीभूतमदग्धं च प्राश्य मेहान्व्यपोहति ॥ २७ ॥
सालसारादिगणकी समस्त औषधियोंको चौगुने जलमें पकावे और चतुर्भाग जल अवशिष्ट रहनेपर उतारकर छानलेवे । फिर दोबारा इस क्वाथको पकावे और पकते २ जब अवलेहकी भाँति गाढ़ा पडजाय तब चूल्हेसे नीचे उतारकर उसमें दन्तीमूल, लोध, हरड, कान्तलोहभस्म और अभ्रकभस्म इन औषधियोंका एकत्र मिलाहुआ चूर्ण सालसारादिवर्गकी औषधियोंके चतुर्थांशकी बराबर लेकर डालदेवे । जब अच्छे प्रकार पककर शीतल होजाय तब नियमानुसार इसका सेवन करे । इससे सर्वप्रकारके प्रमेह दूर होते हैं ॥ २७ ॥
वङ्गावलेह ।
वङ्गस्य भस्म द्विपलं लेहयेन्मधुना सह ।
ततो गुडसमं गन्धं भक्षयेत्कर्षमात्रकम् ॥ २८ ॥
गुडूचीसत्त्वमथवा शर्करासहितं तथा ।
सर्वमेहहरो ज्ञेयो वङ्गावलेह उत्तमः ॥ २९ ॥
वंगभस्म ८ तोले लेकर शहदमें मिलाकर चाटे । पश्चात् शुद्ध गन्धक और गुड एक एक तोला परिमाण एकत्र मिश्रित कर सेवन करे अथवा गिलोयके सत्त्वको खांडके साथ भक्षण करे तो यह वंगावलेह सर्वप्रकारके प्रमेहोंको नष्ट करता है ॥ २८ ॥ २९ ॥
विडंगादि लौह ।
विडङ्गत्रिफलामुस्तैः कणया नागरेण च ।
जीरकाभ्यां युतो हन्ति प्रमेहानतिदारुणान् ।
लौहो मूत्रविकारांश्च सर्वानैव विनाशयेत् ॥ ३० ॥
वायविडंग, त्रिफला, नागरमोथा, पीपल, सोंठ, जीरा और कालाजीरा इन सबको समान भाग ले एकत्र चूर्ण करलेवे और सब चूर्णकी बराबर भाग लोहभस्म मिलाकर खूब बारीक पीसलेवे । इसके सेवनसे समस्त दारुण प्रमेह और अन्यान्य सम्पूर्ण मूत्रविकार नाश होते हैं ॥ ३० ॥
मेहकालानलरस ।
भस्मसूतं मृतं वङ्गं तुल्यं क्षौद्रेण मर्दयेत् ।
| ८६० | भैषज्यरत्नावली । | [ प्रमेह- |
|---|
द्विगुञ्जं भक्षयेन्नित्यं मेहं हन्ति चिरोत्थितम् ॥
गुञ्जामूलं पिबेच्चानु क्षीरैरेव प्रशाम्यति ॥ ३१ ॥
शुद्ध पारेकी भस्म और वङ्गभस्म पृथक् २ एक एक तोला लेकर शहदके साथ खरल करलेवे। इसमेंसे प्रतिदिनं प्रातःकाल दो रत्तीभर भक्षण करे और ऊपरसे गुञ्जा (लताविशेष) की जडको पीसकर दूधमें मिलाकर पीवे तो बहुत दिनोंका पुराना प्रमेह शमन होता है ॥ ३१ ॥
पञ्चाननरस।
सूतं गन्धं मृतं लौहं मृतमभ्रं समांशिकम् ।
सर्वेषां द्विगुणं वङ्गं मधुना मर्दयेद्दिनम् ॥ ३२ ॥
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय शीततोयं पिबेदनु ।
प्रमेहान्विंशतिं हन्ति मूत्राघातं तथाऽश्मरीम् ॥
मूत्रकृच्छ्रं हरेदुग्रमयं पञ्चाननो रसः ॥ ३३ ॥
शुद्ध पारा, गन्धक, लोहभस्म और अभ्रकभस्म ये सब समान भाग और सबसे दुगुनी वङ्गभस्म लेकर एकदिनतक शहदमें यथाविधि खरल करे। फिर इसको नित्यप्रति प्रातःकाल उठकर दो दो रत्तीप्रमाण खाय और ऊपरसे शीतल जल पान करे। यह पञ्चानन रस बीसों प्रकारके प्रमेह, मूत्राघात, अश्मरी और अत्युग्र मूत्रकृच्छ्ररोगको नष्ट करता है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥
चन्द्रकला।
सूताभ्रवङ्गायसभस्म सर्वमेतत्समानं परिभावयेत्तु ।
गुडूचिकाशाल्मलिकाकषायैर्निष्कार्द्धमानां मधुना ततश्च ।
बद्धा गुडीं चन्द्रकलेतिसंज्ञां मेहेषु सर्वेषु नियोजयेच्च ॥३४॥
रससिन्दूर, अभ्रक, वङ्ग और लोहभस्म इन सबको समान भाग लेकर गिलोय और सेमलकी जडके काथमें भावना देवे। पश्चात् मधुके सहयोगसे खरल करके एक एक तोलेकी गोलियाँ बनालेवे। चन्द्रकलानामवाला यह रस सर्वप्रकारके प्रमेहोंमें प्रयोग करनेसे शीघ्र लाभ होता है ॥ ३४ ॥
मेहमुद्गरवटिका।
रसाञ्जनं विडं दारु बिल्वगोक्षुरदाडिमम् ।
प्रत्येकं तोलकं देयं लौहचूर्णं तु तत्समम् ॥ ३५ ॥
पलैकं गुग्गुलुं दत्त्वा घृतेन वटिकां कुरु ।
प्रमेहान्विंशतिं हन्ति साध्यासाध्यमथापि वा ॥ ३६ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८६१
मूत्रकृच्छ्रं तथा पाण्डुं धातुस्थं च ज्वरं जयेत् ।
हलीमकं रक्तपित्तं वातपित्तकफोद्भवम् ॥ ३७ ॥
ग्रहणीमामदोषं च मन्दाग्नित्वमरोचकम् ।
एतान्सर्वाञ्जिहन्त्याशु वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ ३८ ॥
रसौंत, बिडनमक, देवदारु, बेलगिरी, गोखरूके बीज और पका हुआ अनार ये प्रत्येक एक एक तोला और इनके समस्त चूर्णकी बराबर लोहभस्म तथा गूगल ४ तोले लेवे। पुनः सबको एकत्र कूटपीसकर घृतके द्वारा खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियाँ प्रस्तुत करे। तदनन्तर प्रत्यह प्रातःसमय एक एक गोली भक्षण करे तो साध्य व असाध्य बीसों प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, पाण्डु, धातुगत ज्वर, हलीमक, रक्तपित्त, वातज, पित्तज, कफजन्यरोग, संग्रहणी, आमवात, मन्दाग्नि और अरुचि ये सब रोग तत्काल नाश होते हैं ॥ ३५-३८ ॥
शुक्रमातृकावटी ।
गोक्षुरबीजं त्रिफला पत्रमेला रसाञ्जनम् ।
धान्यकं चविका जीरं तालीशं टङ्कदाडिमौ ॥ ३९ ॥
प्रत्येकार्द्धपलं दत्त्वा गुग्गुलोः कर्षमेव च ।
रसाभ्रगन्धलौहानां प्रत्येकं च पलं क्षिपेत् ॥ ४० ॥
सर्वमेकीकृतं वैद्यो दण्डयोगेन मर्दयेत् ।
घृतभाण्डे तु संस्थाप्य माषमेकं च भक्षयेत् ॥ ४१ ॥
अनुपानं प्रदातव्यं जातिभेदात्पृथक् पृथक् ।
दाडिमस्य रसेनैव च्छागदुग्धेन वाऽम्भसा ॥ ४२ ॥
गोखरूके बीज, त्रिफला, तेजपात, इलायची, रसौंत, धनियाँ, चव्य, जीरा, तालीसपत्र, सुहागा और अनारदाना ये हर एक औषधि दो दो तोले, गूगल १ तोला, शुद्ध पारा ४ तोले, अभ्रक ४ तोले, शुद्ध गन्धक ४ तोले तथा लोहभस्म ४ तोले लेवे। सबको एकत्र करके जल डालकर लोहेके दण्डेसे अच्छे प्रकार खरल करे। फिर घीके चिकने बासनमें भरकर रख देवे। इसमेंसे हररोज प्रातःकाल एक एक माशा खावे। इसपर अनारका रस, बकरीका दूध और शीतल जल इन अनु-पानोंको प्रमेहके दोषानुसार पृथक् पृथक् विचारकर देवे ॥ ३९-४२ ॥
| ८६२ | भैषज्यरत्नावली । | [ प्रमेह- |
|---|
प्रमेहान्विंशतिं हन्ति वातपित्तकफोद्भवान् ।
द्वन्द्वजान्सन्निपातोत्थान् मूत्रकृच्छ्राश्मरीगदान् ॥
बलवर्णाग्निजननी ज्वरदोषनिषूदिनी ॥ ४३ ॥
यह वटी वातके, पित्तके और कफके रोग अथवा द्विदोषज और त्रिदोषजन्य बीसों प्रकारके प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र और अश्मरी आदि रोगोंको बहुत जल्द आराम करती है तथा ज्वरको नष्टकर बल कान्ति और उदराग्निको बढाती है ॥ ४३ ॥
वेदविद्यावटी ।
पारदाभ्रककान्तानां नागभस्म समं समम् ।
दिनं ब्राह्मीरसैर्मर्द्यं वालुकायन्त्रगं पुनः ॥ ४४ ॥
उद्धृत्य चूर्णयेच्छ्लक्ष्णं जारिताभ्रं शिलाजतु ।
ताप्यं मण्डूरवैक्रान्तं कासीसं तुल्यमेव च ॥ ४५ ॥
सर्वं सर्वसमं चूर्णं कल्पयेच्च ततः पुनः ।
मुस्तचन्दनपुन्नागनारिकेलस्य मूलकम् ॥ ४६ ॥
कपित्थरजनीदार्बीचूर्णं सर्वसमं भवेत् ।
जम्बीराणां द्रवैर्मर्द्यं द्वियामं वटकीकृतम् ॥ ४७ ॥
वेदविद्यावटी नाम्ना भक्षणात्सर्वमेहजित् ।
मधु धात्रीरसं चानु क्षौद्रैर्वापि गुडूचिका ॥ ४८ ॥
शुद्ध पारा, अभ्रक, कान्तलोह और शीशा इनकी भस्मको बराबर २ लेवे । फिर सबको ब्राह्मीके रसमें एक दिनभर उत्तम विधिसे खरल करके वालुकायन्त्रमें रखकर पकावे । जब पककर शितिल होजाय तब उसको निकालकर बारीक पीस-लेवे । तदनन्तर इस चूर्णके साथ अभ्रकभस्म, शिलाजीत, सोनामाखी, मण्डूरभस्म, वैक्रान्तमणिभस्म, और हीराक्सीस इन सबको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर मिलावे एवं नागरमोथा, लालचन्दन, पुन्नागवृक्षकी जड, नारियलकी जड, कैथ, हल्दी और दारुहल्दी इनके समानांश मिलित चूर्णको लेवे । पुनः सबको एकत्रकर जम्बीरीनींबूके स्वरसमें दो प्रहरतक उत्तम प्रकारसे खरलकर तीन तीन मासेकी गोली बनालेवे । इस वेदविद्यानामवाली वटीको प्रतिदिन प्रातःकाल आमलोंके रस और शहद अथवा गिलोयके रस एवं शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे सर्वप्रकारके प्रमेह दूर होते हैं ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ८६३
वंगाष्टक ।
रसं गन्धं मृतं लौहं मृतरूप्यं च खर्परम् ।
मृताभ्रकं मृतं ताम्रं सर्वतुल्यं च वङ्गकम् ॥ ४९ ॥
पुटेद्गजपुटे विद्वान् स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ।
रक्तिद्वयप्रमाणे न मधुना लेहयेन्नरम् ॥
निशाचूर्णं क्षौद्रयुतं पिबेद्धात्रीरसं ह्यनु ॥ ५० ॥
शुद्ध पारा, गन्धक, लोहभस्म, खपरिया धातु, अभ्रकभस्म और ताँबैकी भस्म ये प्रत्येक समान भाग एवं वङ्गभस्म सबकी बराबर लेवे । इन सबको एकत्र खरल कर गजपुटमें स्थापन करके पकावे । जब स्वाङ्गशीतल होजाय तब निकाल कर बारीक पीसलेवे । इस रसको प्रतिदिन सुबहके समय दो रत्ती प्रमाण मधुमें मिलाकर चाटे अथवा हल्दीके चूर्ण और शहदके साथ मिलाकर खाय, पीछेसे आमलों के रसको पीवे ॥ ४९ ॥ ५० ॥
वङ्गाष्टकमिदं ख्यातं महादेवप्रकाशितम् ।
प्रमेहान्विशतिं हन्ति आमदोषं विषूचिकाम् ॥ ५१ ॥
विषमज्वरगुल्मार्शोमूत्रातीसारपित्तजित् ।
वीर्यवृद्धिं करोत्याशु सोमरोगनिबर्हणम् ॥ ५२ ॥
इस वङ्गाष्टकनामक रसको श्रीमहान्देवजीने प्रकट कियाहै । यह बीसों प्रमेहोंको एवं आमवात, विषूचिका, विषमज्वर गुल्म, बवासीर, मूत्राविकार, अतिसार और पित्तजन्य रोगोंको शीघ्र जीतता है इसी प्रकार अत्यन्त वीर्यकी वृद्धि करता है और स्त्रियोंके सोमरोगको नष्ट करता है ॥ ५१ ॥ ५२ ॥
मेहवज्र ।
भस्म सूतं मृतं कान्तं लौहभस्म शिलाजतु ।
शुद्धताप्यं शिला व्योषं त्रिफला बिल्वजीरकम् ॥ ५३ ॥
कपित्थं रजनीचूर्णं भृङ्गराजेन भावयेत् ।
त्रिंशद्वारं विशोष्याथ लिह्याच्च मधुना सह ॥ ५४ ॥
निष्कमात्रं हरेन्मेहान्मूत्रकृच्छ्रं सुदारुणम् !
महानिम्बस्य बीजं च षड्निष्कं पेषितं च यत् ॥ ५५ ॥
पलतण्डुलतोयेन घृतनिष्कद्वयेन च ।
एकीकृत्य पिबेच्चानु हन्ति मेहं चिरोत्थितम् ॥ ५६ ॥
| ८६४ | भैषज्यरत्नावली । | [ प्रमेह- |
|---|
शुद्ध पारेकी भस्म, कान्तलोहकी भस्म, शिलाजीत, सोनामाखी, मैनसिल, सोंठ, मिर्च, पीपल, त्रिफला, बेलागिरी, जीरा, कैथ और हल्दी इन औषधियोंको समान भाग लेकर कूटपीसकर चूर्ण करलेवे। पश्चात् इस चूर्णको भाङ्गेके रसमें तीस बार भावना देकर सुखा लेवे। तदनन्तर नित्यप्रति प्रातःकाल इस चूर्णको एक एक तोला परिमाण शहदमें मिलाकर सेवन करे। ऊपरसे बकायनके बीजोंका चूर्ण २४ माशे लेकर चार तोले चावलोंके धोवनमें पीसे। फिर उसमें ८ माशे गोघृत डाल-कर पान करे तो यह मेहवज्ररस बहुत पुराने प्रमेहों तथा दारुण मूत्रकृच्छ्रादि रोगोंको अल्पकालमें दूर करता है ॥ ५६ ॥
चन्द्रप्रभावटिका ।
वेल्लव्योषफलत्रिकं त्रिलवणं द्विक्षारचव्यानल-
श्यामापिप्पलिमूलमुस्तक शठीमाक्षीकधातुत्वचः ।
षड्ग्रन्थामरदारुवारणकणाभूनिम्ब्दन्ती निशा-
पत्रैलातिविषाः पिचुप्रतिमिता लौहस्य कर्षाष्टकम् ॥ ५७ ॥
त्वक्क्षीरी पलिका पुराद्दश पलान्यष्टौ शिलाजन्मनो
मानात्कर्षसमा कृतेति गुडिका संयोज्य सर्वे भिषक् ।
तत्रैव प्रतिवासरं सह घृतक्षौद्रेण लिह्यादिमां
तक्रं मस्तु च गोघृतं मधुरसं पश्चात्पिबेन्मात्रया ॥ ५८ ॥
वायविडङ्ग, सोंठ, मिरच, पीपल, त्रिफला, सेंधानमक, कालानमक, विडनमक, जवाखार, सज्जी, चव्य, चीता, कालीसर, पीपलामूल, नागरमोथा, कचूर, सोना-माखी, दारचीनी, वच, देवदारु, गजपीपल, चिरायता, दन्ती, हल्दी, पत्रज, इलायची और अतीस ये प्रत्येक औषधि दो दो तोले और लोहभस्म १६ तोले, वंशलोचन ४ तोले, शुद्ध गूगल ४० तोले एवं शिलाजीत ३२ तोले लेवे। इन सबको एकत्र बारीक कूटपीसकर जलमें खरल करके दो दो तोलेकी गोलियाँ बनालेवे। इस वटीको प्रतिदिन प्रातःसमय घृत और शहदमें मिलाकर सेवन करे। इसपर मट्ठा, दहीका तोड, गौका घी और मधु इनमेंसे किसी एकको उचित मात्रासे सेवन करे तो इससे प्रमेह और मूत्रकृच्छ्ररोग नष्ट होते हैं ॥ ५७ ॥ ५८ ॥
चन्द्रप्रभावटी ।
चन्द्रप्रभावचामुस्ताभूनिम्बसुरदारवः ।
हरिद्राऽतिविषा दार्वी पिप्पलीमूलचित्रकम् ॥ ५९ ॥