भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

शान्तनु सिंह 'बिसेन'

इस पृष्ठ पर कोई पाठ (text) उपलब्ध नहीं है। यह पृष्ठ रिक्त (blank) है।

विद्याभवन प्राच्यविद्या ग्रन्थमाला
१२


महर्षिबादरायणप्रणीतम्

ब्रह्मसूत्रम्

परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमद्गोविन्दभगव-
त्पूज्यपादशिष्य श्रीमच्छङ्कराचार्यभगव-
त्पूज्यपादविरचितम्

शारीरकमीमांसाभाष्यम्


श्रीमद्वाचस्पतिमिश्रभावितभाष्यविभागो

भामती


परमहंसपरिव्राजकाचार्योदासीनवर्यस्वामिश्री-
ऋषिरामशिष्यस्वामियोगीन्द्रानन्द-
निर्मिता

भामतीव्याख्या


प्रथमो भागः


चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी-२२१००१

प्रकाशक चौखम्बा विद्याभवन ( भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक ) चौक ( बनारस स्टेट बैंक भवन के पीछे ) पो० बा० नं० १०६९, वाराणसी २२१००१ दूरभाष : 2420404

सर्वाधिकार सुरक्षित संस्करण २००५ ई मूल्य ३००-००

अन्य प्राप्तिस्थान चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन के० ३७/११७, गोपालमन्दिर लेन पो० बा० नं० ११२९, वाराणसी २२१००१ दूरभाष : ३३३४३१

*

चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान ३८ यू. ए., बंगलो रोड, जवाहरनगर पो० बा० नं० २११३ दिल्ली ११०००७ दूरभाष : २३६३९१

मुद्रक फूल प्रिन्टर्स वाराणसी

दो शब्द

प्रस्तुत ग्रन्थ की अन्तःपरिधि का अध्ययन करने से पहले इसके बाह्य कलेवर की मीमांसा आवश्यक प्रतीत होती है, क्योंकि नाम और रूप का परिवेश ही अपने में अवगुण्ठित अस्ति-भाति-प्रियतत्त्व का उपलक्षक माना जाता है, परीक्षित लक्षण लक्ष्य का सटीक परिचायक होता है। फलतः ग्रन्थ का नाम तथा उसके रचयिता का कुछ परिचय कराया जाता है—

१. ग्रन्थ और ग्रन्थकार

१. ग्रन्थ का नाम—'ब्रह्मसूत्र' इस ग्रन्थ की प्रख्यात समाख्या है। सूत्र-ग्रन्थों का नामकरण दो प्रकार से होता आया है—(१) प्रतिपाद्य विषय की दृष्टि से, जैसे 'सांख्यसूत्र,' 'न्यायसूत्र' इत्यादि। (२) ग्रन्थकार के नाम पर भी ग्रन्थ का नाम रखा जाता है, जैसे 'पाणिनिसूत्र', 'कात्यायनसूत्र', 'जैमिनिसूत्र'। ब्रह्मविषयिणी मीमांसा को 'ब्रह्मसूत्र' कहना सर्वथा न्याय-संगत है।

आदरणीय वासुदेवशरण अग्रवाल ने कुछ पाश्चात्य विचारकों के साक्ष्य पर इस ग्रन्थ का नाम 'भिक्षुसूत्र' बताया है¹। दार्शनिक वाङ्मय के प्रमुख पारखी श्री गोपीनाथ कविराज ने अपनी प्रसिद्ध ब्रह्म-सूत्र-भूमिका (पृ० २) में लिखा है कि यदि यह कल्पना सत्य है, तब वह 'भिक्षुसूत्र' 'वेदान्तसूत्र' या 'ब्रह्मसूत्र' से भिन्न नहीं होगा"। कविराज जी की इस व्यवस्था से असहमति व्यक्त करते हुए उदयवीर शास्त्री कहते हैं² कि "पाणिनि ने पञ्चशिख की सांख्यविषयक रचना का 'भिक्षुसूत्र' पद से निर्देश किया है। फलतः पाणिनि के इस सूत्र के आधार पर कविराज डा० गोपीनाथ द्वारा की गई कल्पना पूर्णरूप से सन्दिग्ध है"।

गवेषकों का बहुमत इसी पक्ष में प्रतीत होता है कि पाणिनि-सूत्र में निर्दिष्ट 'भिक्षुसूत्र' यह 'ब्रह्मसूत्र' नहीं, क्योंकि यह यदि कृष्णद्वैपायन व्यास-द्वारा रचित मान भी लिया जाय, तब भी व्यास को पाराशर्य मुख्यतः नहीं कहा जा सकता, क्योंकि 'पराशर' शब्द से गोत्रार्थ में "गर्गादिभ्यो यञ्" (पा० सू० ४।१।१०५) इस सूत्र के द्वारा यञ् प्रत्यय करने पर पाराशर्य' शब्द सम्पन्न होता है। "अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्" (पा. सू. ४।१।१६२) इस सूत्र के द्वारा पौत्र-प्रपौत्रादि की ही गोत्र संज्ञा होती है, साक्षात् पुत्र की नहीं, व्यास तो पराशर के साक्षात् पुत्र थे, अतः व्यास को पाराशर्य कहना क्योंकर सम्भव होगा ? दूसरी बात यह भी है कि वहाँ कर्मन्द के द्वारा प्रणीत अन्य भी भिक्षुसूत्र निर्दिष्ट है, अतः भिक्षुसूत्र अनेक मानने ही पड़ते हैं तब इस बादरायण-सूत्र को उस झमेले में डालने की आवश्यकता नहीं। आगे चल कर यह कहा जायगा कि तर्कपाद में आलोचित विषय और उनकी सूत्र-निर्दिष्ट परिभाषाएँ बुद्ध-काल से बहुत परवर्ती बौद्धाचार्यों-द्वारा उद्भावित हैं, अतः बुद्धकालीन पाणिनि-सूत्रों में आबद्ध भिक्षुसूत्र कोई अन्य ही होगा, जो इस समय उपलब्ध नहीं। हाँ, नागार्जुन (ई. द्वितीय शताब्दी) के द्वारा प्रतिपादित शून्यवाद का निराकरण सूत्रों में न होने के कारण उससे पूर्व किसी समय की यह रचना मानी जाती है।

२. ग्रन्थकार—इस सूत्र-ग्रन्थ का रचयिता कौन है? इस प्रश्न के उत्तर में


¹ "पाणिनिकालीन भारत" के पृष्ठ ३२६ पर लिखा है—'वेबर का मत है कि पा. सू. ४।३।११०,१११ में पाणिनि बुद्धकालीन ब्राह्मण-भिक्षुओं का उल्लेख कर रहे हैं। पाराशर्य-कृत भिक्षुसूत्र वर्तमान वेदान्तसूत्र ज्ञात होते हैं।'
² 'वेदान्त दर्शन का इतिहास' पृ० ६० पर।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्

पञ्चपादिकाकारादि के द्वारा बादरायण का नाम प्रस्तुत किया जाता है¹। खण्डनखण्डखाद्य- कार भी उसी का समर्थन करते हुए प्रतीत होते हैं²। श्री वाचस्पति मिश्रादि आचार्यगण वेदव्यास की चर्चा करते हैं³। इन विभिन्न वादों का सामञ्जस्य करनेवाले विद्वानों का कहना है कि दोनों नाम उन्हीं महर्षि कृष्णद्वैपायन के हैं, जिन्होंने महाभारत आदि इतिहासों और अष्टादश पुराणों की रचना की। इतना ही नहीं पातञ्जल योगसूत्रों के भाष्यकार भी वे ही हैं⁴। चिरजीवी महायोगियों का जीवन कई सहस्र वर्ष तक बना रहता है, समय-समय पर श्रद्धालु अधिकारियों को दर्शन देते रहते हैं। भगवान् आद्य शङ्कराचार्य को भी काशी में महर्षि वेदव्यास ने दर्शन देकर भाष्य-प्रणयन की प्रेरणा दी थी।

यहाँ यह विचारणीय है कि 'वेदव्यास' या 'व्यास' नाम का एक ही महापुरुष हुआ है ? अथवा अनेक ? यदि एक ही है, तब वह निश्चित कृष्णद्वैपायन व्यास है, बादरायण-व्यास कैसे ? यदि व्यास अनेक हैं, तब उनमें बादरायण व्यास का उल्लेख है ? या नहीं ? इस विषय की चर्चा करते हुए स्वयं महर्षि पराशर ने कहा है कि व्यास एक नहीं, अट्ठाईस हुए हैं—

वेदव्यासा व्यतीता ये ह्यष्टाविंशति सत्तम।
चतुर्धा यैः कृतो वेदो द्वापरेषु पुनः पुनः॥ (वि. पु. ३।३।१०)

अट्ठाईसों के क्रमशः नाम इस प्रकार हैं—

१. स्वयम्भू (ब्रह्मा)१५. त्रय्यारुण
२. प्रजापति१६. धनञ्जय
३. शुक्राचार्य१७. क्रतुञ्जय
४. बृहस्पति१८. जय
५. सविता१९. भरद्वाज
६. मृत्यु (यम)२०. गौतम
७. इन्द्र२१. हर्यात्मा
८. वसिष्ठ२२. वाजश्रवा मुनि
९. सारस्वत२३. तृणविन्दु
१०. त्रिधामा२४. ऋक्ष
११. त्रिशिख२५. शक्ति
१२. भरद्वाज२६. पराशर
१३. अन्तरिक्ष२७. जातुकर्ण
१४. वर्णी२८. कृष्णद्वैपायन

कथित अट्ठाईस व्यासों में जैसे कृष्णद्वैपायन का स्पष्ट उल्लेख है, वैसा बादरायण का नहीं,
अतः बादरायण को कृष्णद्वैपायन व्यास से भिन्न मानना अनिवार्य है।
"अपि च स्मर्यते" (ब्र. सू. २।३।४५) इस सूत्र में निर्दिष्ट स्मृति के रूप में भाष्यकार


१. पञ्चपादिका के मङ्गल-पद्यों में कहा है —

नमः श्रुतिशिरःपद्मषण्डमार्तण्डमूर्तये ।
बादरायणसंज्ञाय मुनये शमवेश्मने ॥

२. खण्डन. पृ. ८ पर कहा है—"भगवत्पादेन वा बादरायणीयेषु सूत्रेषु भाष्यं नाभाषि"।
३. भामती-मङ्गल-श्लोकों में कहा है—"वेदव्यासाय धीमते"।
४. द्र. सर्वशास्त्रनिष्णात स्वामी बालराम द्वारा व्याख्यात योग-भाष्य की भूमिका।

हिन्दीसहितभामतीसंचलितम्

ने "ममैवांशो जीवलोके" (गी. १५।७) इस गीता-पद्य को प्रस्तुत किया है। यदि गीताशास्त्र के प्रणेता भगवान् व्यास ही ब्रह्मसूत्रकार हैं, तब वे अपनी ही कृति को स्मृति के रूप में उल्लिखित करते हैं—यह समुचित प्रतीत नहीं होता, अत एव भगवद्गीता १ में जो 'ब्रह्मसूत्र' पद आया है, उसका अर्थ आचार्य शङ्कर ने किया है—"ब्रह्मणः सूचकानि वाक्यानि ब्रह्म-सूत्राणि। आत्मेत्येवोपासीत (बृह. उ. १।४।७) इत्यादिभिर्हि ब्रह्मसूत्रपदैः आत्मा ज्ञायते" (गी. १३।४)। इससे यह नितान्त स्पष्ट हो जाता है कि गीता में निर्दिष्ट 'ब्रह्मसूत्र' पद से बादरायणीय सूत्रों का ग्रहण सम्भव नहीं, क्योंकि उनकी रचना गीता के बहुत पश्चात् की गई है। स्वयं भगवान् शङ्कराचार्य "अनावृत्तिः शब्दात्" (ब्र. सू. ४।४।२२) इस सूत्र की पातनिका में कहते हैं—"भगवान् बादरायणः आचार्यः पठति"।

श्री बालगङ्गाधर तिलक ने जो अपने 'गीता-रहस्य' में व्यवस्था दी है कि 'पहले कोई विस्तृत गीता बनी, उसके अनन्तर ब्रह्मसूत्र और उसके पश्चात् संक्षिप्त गीता की रचना की गई, अत एव ब्रह्मसूत्र में गीता और गीता में ब्रह्मसूत्र का उल्लेख संगत है'। तिलक जी का वह बौद्धिक व्यायाम ऋषियों की असीम शक्ति को सीमित कर देता है। जैसे हमलोग कुछ लिख कर उसे काटते-कूटते और बढ़ाते-घटाते हैं, वैसे ऋषिगण नहीं किया करते। उनकी सधी लेखनी से जो लकीर बन गई, वह पत्थर की लकीर हो जाती थी।

बादरायण-सूत्रों में जो सांख्य, योग और पाञ्चरात्र आदि के मतवाद आलोचित हैं, उनका मूलरूप महाभारत २ में पाया जाता है, अतः महाभारत-काल के पश्चात् ही इनकी रचना सिद्ध होती है।

३. आचार्य बादरायण का समय

ऊपर के विवेचनों से इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि बौद्धों की महायानिक धारा का उद्गम हो जाने के अनन्तर ही आचार्य बादरायण के अद्वयवाद का समुदय होता है—जैमिनि और बादरायण का एक-दूसरे के सूत्रों में परस्पर उल्लेख होने के कारण दोनों समसामयिक हैं। जैमिनि का समय ई. पूर्व द्वितीय शताब्दी माना जाता है, अतः ३श्रीदास गुप्ता के अनुसार ईसा-पूर्व द्वितीय शताब्दी ही बादरायण का समय मानना उचित प्रतीत होता है। श्री उदयवीर शास्त्री का जो महान् प्रयत्न समूचे हिमालय पर्वत को पीछे ढकेलने में हो रहा है, वह तभी सफल हो सकता है, जब कि महाभारत-काल को स्थिर और ध्रुव माना जा सके, किन्तु यह एक टेढी खीर है। आचार्य बादरायण चाहे पुरातन हों या नूतन, उनका व्यक्तित्व सदैव श्रद्धास्पद और सराहनीय ही रहेगा।

जैमिनि-सूत्रों में केवल बादरायण का ही उल्लेख नहीं, अपितु बादरायण-सूत्र चर्चित आचार्यों का बहुत साम्य है, अतः दोनों के सूत्रों में निर्दिष्ट व्यक्तियों की नामावलि प्रस्तुत की जाती है—

४. जैमिनि सूत्र-निर्दिष्ट आचार्य—बादरायण (१।१।५), बादरि (३।१।३, ६।१।२७, ८।३।६, ९।२।२०), आश्मरथ्य (६।५।१६, १६।२।१), आत्रेय (४।३।१८, ५।२।१८, ६।१।२६),


१. "ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः" (गी० १३।४)
२. सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा।
ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै॥ (म. भा. शान्ति ३४९।६४)
३. इण्डियन फिलासफी का हिन्दी रूपान्तर भाग १ पृ. ४२६
४. शाण्डिल्य सूत्रों में बादरायण के लिए कहा है—
"आत्मैकपरां बादरायणः" (शां. सू. ३०)

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्

कार्ष्णाजिनि (४।३।१५, ६।७।२६), ऐतिशायन (३।२।४३, ३।४।२४, ६।१।६), कामुकायन (११।१।५६, ११।१।६१), कार्षापण (४।३।१७, ६।७।३५), लाबुलायन (६।७.३७), आलेखन (६।५।१७, १६।२।१) ।

५. बादरायण-सूत्र-उद्धृत आचार्य-जैमिनि (१।२।२८, १।२।३१, १।३।३१, १।४।१८, ३।२।४०, ३।४।२-७, ३।४।१८, ३.४.४०, ४।३।१२, ४।४.५, ४।४।११), बादरि (१।२।३०, ३।१।११, ४।३।७, ४।४।१०), आश्मरथ्य (१।२।२६, १।४।२०), आत्रेय (३।४।४४), काशकृत्स्न (१।४।२२), कार्ष्णाजिनि (३।१।२९), औडुलोमि (१।४।२१, १।४ ४५, ४।४।६) ।

२. भाष्यकार भगवान् शङ्कर

आज-कल ७८८ ई० से लेकर ८२० ई० तक का समय आचार्य शङ्कर का माना जाता है, क्योंकि आचार्य शङ्कर के समकालिक एवं प्रधान शिष्य श्री सुरेश्वराचार्य ने बौद्धाचार्य श्री धर्मकीर्ति का उल्लेख किया है। धर्मकीर्ति का समय ६०० ई० से लेकर ६५० ई० तक माना जाता है। अन्य विद्वानों का यह मत है कि आचार्य शङ्कर धर्मकीर्ति और दिङ्नाग के मध्य में हुए हैं, क्योंकि आचार्य ने अपने भाष्य में दिङ्नाग के प्रमाणसमुच्चय से एक वाक्य उद्धृत किया है²- 'सहोपलम्भनियमादभेदः' । किंतु प्रत्यक्ष के लक्षण में धर्मकीर्ति ने जो 'अभ्रांत' पद जोड़ा है, वह शां. भाष्य में उद्धृत नहीं । यद्यपि मठाम्नायों की परम्परा से उक्त समय का मेल नहीं खाता, तथापि श्री गोपीनाथ कविराज-जैसे इतिहासवेत्ता आस्तिक पुरुषों ने कहा है— "गोडपादाचार्य तक गुरु-परम्परा को ऐतिहासिक काल के अन्तर्गत मानने में कोई मत-भेद नहीं है, परन्तु गौडपाद के गुरु शुकदेव तथा उनके गुरु व्यास—इसी क्रम से प्राचीन गुरु-परम्परा वर्तमान ऐतिहासिक विचार के बहिर्भूत है" (ब्र. सू. भूमिका पृ. १९) ।

३. भामतीकार श्रीवाचस्पतिमिश्र

सर्वतन्त्रस्वतन्त्र श्री वाचस्पतिमिश्र ने तो न्यायसूचीनिबन्ध में अपने समय का उल्लेख कर ही दिया है⁴। उसके अनुसार ८९८ वि. संवत् या ८४१ ई. निश्चित होता है। भामती व्याख्या सम्भवतः इनकी अन्तिम रचना है, जैसा कि अपनी रचनाओं का क्रम-निर्देश स्वयं मिश्रजी ने भामती के अन्त में किया है—

यन्न्यायकर्णिकातत्त्वसमीक्षातत्त्वबिन्दुभिः ।
यन्न्यायसांख्ययोगानां वेदान्तानां निबन्धनैः ॥

सबसे पहले श्री मण्डनमिश्र के विधिविवेक की व्याख्या न्याय-कर्णिका की रचना की गई, उसके पश्चात् ब्रह्म-सिद्धि की व्याख्या तत्त्वसमीक्षा, तत्त्वबिन्दु (स्वतन्त्र भाट्टपक्षीय शाब्द-ग्रन्थ)। न्याय में उद्योतकर-वार्तिक की व्याख्या तात्पर्यटीका, सांख्य में ईश्वरकृष्ण-कृत कारिकाओं की व्याख्या सांख्यतत्त्वकौमुदी, योग में पातञ्जल सूत्रों के व्यास-भाष्य की व्याख्या तत्त्ववैशारदी—इन ग्रन्थरत्नों का निर्माण हुआ। सबसे अन्त में ब्रह्मसूत्र-शाङ्करभाष्य की व्याख्या भामती की रचना की गई।


१. "त्रिष्वेव त्वविनाभावादिति यद् धर्मकीर्तिना ।
प्रत्यज्ञायि प्रतिज्ञेयं हीयेतासौ न संशयः ॥" (बृह० वा० ४।३।७५३)
२. ब्र० सू० भा० २।२।२८ में उद्धृत वाक्य से भिन्न यह पद्य है—
सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः ।
भेदश्च भ्रान्तिविज्ञानेर्दृश्येतेन्दाविवाद्वये ॥ (प्र० वा० २।३९)
४. न्यायसूचीनिबन्धोऽयमकारि सुधिया मुदे ।
श्रीवाचस्पतिमिश्रेण वस्वङ्कवसुवत्सरे ॥

हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्

'भामती' नाम के विषय में कुछ लोगों का कहना है कि मिश्रजी की पत्नी का नाम भामती था, कुछ मिश्र जी की कन्या का नाम बताते हैं और कुछ विद्वानों का कहना है कि 'भामा' नाम की नगरी में रहने के कारण श्रीवाचस्पतिमिश्र ने अपनी व्याख्या का नाम भामती रखा है। कुछ हो, यह एक अमर कीर्ति है उस कीर्ति पुञ्ज की, जिसकी चका-चौन्ध समूचे दार्शनिक विश्व में व्याप्त है ।

१—भामती और भास्कर-भाष्य श्री वाचस्पति मिश्र ने भेदाभेदवादी आचार्य भास्कर की विशेषरूप में आलोचना की है, क्योंकि भास्कराचार्य ने अपने ब्रह्मसूत्र-भाष्य के प्रणयन का मुख्य उद्देश्य शाङ्कर-भाष्य का निराकरण ही माना है—

सूत्राभिप्रायसंवृत्या स्वाभिप्रायप्रकाशनात् ।
व्याख्यातं यैरिदं शास्त्रं व्याख्येयं तन्निवृत्तये ॥ (भास्कर. पृ. १)

यहाँ 'यैः' पद से आचार्य शङ्कर का ही ग्रहण किया गया है। आचार्य शङ्कर से पहले भी आचार्य बोधायन और आचार्य उपवर्षादि के बृहत्काय वृत्ति-ग्रन्थ थे, जिनमें ब्रह्मसूत्रों की विशद व्याख्या की गई थी, किन्तु उनमें विशुद्ध अद्वैतवाद का सम्भवतः प्रतिपादन नहीं था। आचार्य शङ्कर के द्वारा उनकी अवहेलना अनिवार्य थी। वही अवहेलना आचार्य भास्कर और परवर्ती अन्य आचार्यों के मस्तिष्क में अद्वयवाद के प्रति भयङ्कर विस्फोट उत्पन्न करती आ रही है। आचार्य उपवर्ष और द्रविड़ाचार्यादि ने भी बोधायन की वृत्ति को कुछ संक्षेप और अर्थान्तर की ओर मोड़ दिया था, अत एव आचार्य रामानुज ने कहा है — "भगवद्बोधायनकृतां विस्तीर्णां ब्रह्मसूत्रवृत्तिं पूर्वाचार्याः संचिक्षिपुः, तन्मतानुसारेण सूत्राक्षराणि व्याख्यायन्ते' (श्रीभा. पृ. १)।

प्रकृत में आचार्य भास्कर के द्वारा किए गए शाङ्कर भाष्य के निराकरण-प्रकारों का दिग्दर्शन कराना आवश्यक है, जिससे वाचस्पति मिश्र की भास्करीय आलोचना प्रशस्त हो सके—

१— "अक्षरमम्बरान्तधृतेः" (ब्र. सू. १।३।१०) इस सूत्र की व्याख्या में आचार्य भास्कर लिखते हैं— 'केचिद् अक्षरशब्दस्य वर्णे प्रसिद्धत्वादक्षरमोंकार इति पूर्वपक्षयन्ति,..... तदेतदधिकरणेनासम्बद्धम्" (भास्कर. पृ. ५४)। यहाँ 'केचित्' पद से भास्कर ने आचार्य शङ्कर का ग्रहण कर उनके पूर्वपक्ष को असंगत ठहराया है। वाचस्पतिमिश्र ने वहीं पर भास्करीय वक्तव्य का अनुवाद करके खण्डन किया है—"ये तु प्रधानं पूर्वपक्षयित्वा...'" (भामती पृ. ४४३)।

२. आचार्य भास्कर ने जीव और ईश्वर के भेदाभेद का उपपादन करते हुए कहा है—"ननु भेदाभेदौ कथं परस्पर विरुद्धौ सम्भवेताम् ? नैष दोषः—

प्रमाणतश्चेत् प्रतीयते को विरोधोऽयमुच्यते ।
विरोधे चाविरोघे च प्रमाणं कारणं मतम् ॥

(भास्कर. पृ. १०३)। आचार्य वाचस्पति कहते हैं—"अथ त्वगृह्यमाणविशेषतया..." (भामती पृ. ५१८)। मिश्र जी का भाव स्पष्ट करते हुए वहीं कल्पतरुकार ने कहा है— "भेदाभेदव्यवस्था चेत्"। श्री अप्पयदीक्षित ने इस ग्रन्थ का अवतरण दिया है— "भास्कर ग्रन्थेषु विरुद्धयोरपि समवलयोरपि भेदाभेदयोर्संकरोपपादनं कृतम्, तन्निरस्यति"।

३—श्री भास्कराचार्य ने जीव को ईश्वर का अंश बताते हुए एक लम्बा-सा वक्तव्य दिया है— "तदंशो जीवोऽस्ति....." (भास्कर. पृ. १४०)। आचार्य वाचस्पति ने उस वक्तव्य

८                ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्

का अनुवाद करके खण्डन किया है—"ये तु काशकृत्स्नीयमेव मतमास्थाय जीवं परमात्मनोऽशमाचख्युः" ( भामती. पृ. ५२२ ) ।

४. श्री भास्कराचार्य ने परिणामवाद का समर्थन करते हुए कहा है—"सूत्रकारः श्रुत्यनुकारी परिणामपक्षं सूत्रयाम्बभूव । अयमेव छान्दोग्ये वाक्यकारवृत्तिकाराभ्यां समाश्रितः, तथा च वाक्यम्—परिणामस्तु दध्यादिवदिति । विगीतं विच्छिन्नमूलं माहायानिकबौद्धगाथायितं मायावादं व्यावर्णयन्तो लोकान् व्यामोहयन्ति" ( भास्कर. पृ. ८५ ) । वाचस्पति मिश्र ने आचार्य ब्रह्मनन्दी के उक्त वाक्य का आशय बताते हुए कहा है—"इयं चोपादानपरिणामादिभाषा न विकाराभिप्रायेण, अपितु यथा सर्पस्योपादानं रज्जुरेवं ब्रह्म जगदुपादानम्" ( भामती० पृ० ५३० ) ।

२—भामती व्याख्या

व्याख्या तो सम्पूर्ण भामती की प्रकाशित हो रही है, किन्तु ग्रन्थके कलेवर को अप्रत्याशित बृंहण से बचाने के लिए पूरे ग्रन्थ को दो भागों में प्रकाशित करना ही उचित समझा गया। प्रथम अध्याय के चार पाद एवं द्वितीय अध्याय के प्रथम पाद को मिलाकर सवा छः सौ पृष्ठ के लगभग हो गए हैं, आगे सम्भवतः इतना ही शेष है। प्रकाशन कार्य की विलम्बता से बहुत से प्रतीक्षकों का धैर्य भी टूट रहा है, अतः पञ्च पाद का यह प्रथम भाग प्रकाशित कर दिया गया है। द्वितीय भाग का प्रकाशन भी चालू है, उसके पूरा होने में कुछ समय तो लग ही जायगा।

पूरे ग्रन्थ का मुद्रण हो जाने के पश्चात् ही भूमिकादि पूर्वाङ्ग एवं परिशिष्टात्मक उत्तराङ्गों का सम्पादन सम्भव हो पाता है, अतः यहाँ मूल ग्रन्थ, भाष्य एवं भामती के रचयिता का स्वल्प परिचय ही दिया गया है, ग्रन्थ के विषय में शेष वक्तव्य द्वितीय भाग के आरम्भ में दिया जायगा।

के० ३७/२ ठठेरीबाजारस्वामी योगीन्द्रानन्द
वाराणसीन्यायाचार्य मीमांसातीर्थ

हिन्दीव्याख्यासहितभामतीसंवलितस्य

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यस्य

विषयानुक्रमणी


समन्वयाख्यप्रथमाध्यायस्य

(१) प्रथमे पादे—पृष्ठाङ्कः
१. मङ्गलश्लोकाः
२. अध्यासविचारः—
३. अध्यासानुपपत्तिशङ्का
४. तस्या निरासः१०
५. अध्यासस्य लक्षणम्१७
६. आत्मख्यातिः२५
७. अख्यातिः२५
८. अन्यथाख्यातिः२९
९. आत्मन्यविषये कथमध्यासः ?३३
१०. आत्मा नैकान्तेनाविषयः३८
११. अध्यास एवाविद्या४१
१२. अविद्यावद्विषयाणि प्रमाणानि४३
१३. विविधानि पातकानि४६
१४. ब्रह्मजिज्ञासाधिकरणम्—५५
१५. अथशब्दार्थविचारः५७
१६. आनन्तर्यार्थविचारः६५
१७. ज्ञाने कर्मोपयोगः७०
१८. अतःशब्दार्थविचारः८५
१९. जिज्ञासापदार्थः९०
२०. ब्रह्म प्रसिद्धमप्रसिद्धं वा ?९१
२१. तत्त्वमर्थविचारः९५
२२. जन्माद्यधिकरणम्—९७
२३. ब्रह्मलक्षणविचारः९७
२४. ईश्वरानुमानविचारः१०२
२५. शास्त्रयोनित्वाधिकरणम्—१०९
२६. वेदकर्तृत्वविचारः१११
२७. शास्त्रकर्तृत्वविचारः११३

१० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्

२८. समन्वयाधिकरणम्-- ११५
२९. वेदान्तसमन्वयः ११५
३०. कार्यार्थत्वविचारः १२०
३१. सिद्धार्थत्वविचारः १२१
३२. ब्रह्मणः प्रतिपत्तिविधिविषयत्वशङ्का १२५
३३. तस्या निराकरणम् १३३
३४. कूटस्थनित्यत्वादिविचारः १३६
३५. सम्यग्रूपज्ञानविचारः १४३
३६. शास्त्रमविद्यावद्भेदवारकम् १४७
३७. मोक्षस्योपाद्यत्वादिविचारः १४६
३८. ज्ञानं न मानसी क्रिया १५३
३९. वेदान्तेषु लिङाद्यर्थविचारः १५४
४०. औपनिषदः पुरुषः १५७
४१. ब्रह्मणोऽविनाशित्वम् १६१
४२. कर्मविबोधमात्रे न वेदस्य तात्पर्यम् १६३
४३. वेदान्तेषु सिद्धार्थोपदेशः १६४
४४. निषेधवाक्येषु कार्याभावः १६६
४५. देहादावात्माभिमानो गौणः १७७
४६. जीवतोऽशरीरत्वम् १७९
४७. उपनिषदामैदम्पर्यम् १८०
४८. ईक्षत्यधिकरणम्-- १८४
४९. प्रधानस्य जगदुपादानत्वशङ्का १८५
५०. तस्या भङ्गः १९०
५१. प्रधानस्य न सच्छब्दार्थता २००
५२. सर्वज्ञ ईश्वरो जगतः कारणम् २०५
५३. आनन्दमयाधिकरणम्-- २०६
५४. प्रधानस्यानन्दमयत्वशङ्का २०६
५५. जीवस्यानन्दमयत्वशङ्का २०७
५६. ब्रह्मण एवानन्दमयत्वम् २११
५७. अन्तरधिकरणम्-- २२३
५८. आदित्यपुरुषस्य जीवत्वाशङ्का २२३
५९. आदित्यपुरुषो ब्रह्मैव २२५
६०. आकाशाधिकरणम् २२८
६१. नामाद्याधारमाकाशं ब्रह्मैव २२८
६२. प्राणाधिकरणम् -- २३५
६३. प्राणदेवताया वायुरूपत्वशङ्का २३५
६४. ब्रह्मलिङ्गत्वान् प्राणो ब्रह्म २३७
६५. ज्योतिरधिकरणम्-- २४१
६६. ज्योतिषः तैजसत्वम् २४१

हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ११

६७. ज्योतिरिह ब्रह्म २४५
६८. प्रतर्दनाधिकरणम्— २५५
६६. प्रज्ञात्मा प्राणो देवतादिरूपः २५७
७०. प्राणशब्दं ब्रह्मैव २५८

(२) द्वितीये पादे—

७१. सर्वत्र प्रसिद्धधिकरणम्— २६५
७२. मनोमयत्वादिभिरुपास्यं ब्रह्म २६९
७३. अत्रधिकरणम्— २७६
७४. अत्ता परमात्मैव २७७
७५. गुहाधिकरणम्— २७९
७६. ऋतं पिबन्तौ जीवपरमात्मानौ २७९
७७. अन्तराधिकरणम् २८७
७८. अक्षिपुरुषो ब्रह्म २८७
७६. अन्तर्याम्यधिकरणम् २९७
८०. सर्वान्तर्यामी परमात्मैव ३०३
८१. अदृश्यत्वाधिकरणम्-- ३०३
८२. अदृश्यत्वादिगुणकः परमेश्वरः ३०५
८३. भूतयोनिः परमात्मा ३०७
८४. वैश्वानराधिकरणम्— ३१२
८५. वैश्वानरः परमेश्वरः ३१३

(३) तृतीये पादे—

८६. द्युभ्वाद्यधिकरणम्— ३२३
८७. द्युलोकादेरधिकरणं ब्रह्म ३२३
८८. भूमाधिकरणम् - ३३२
८९. भूमा ब्रह्मैव ३३३
९०. अक्षराधिकरणम्— ३४०
९१. अक्षरशब्दं ब्रह्म ३४२
९२. प्रशासनं ब्रह्मणः कर्म ३४५
९३. ईक्षतिकर्मव्यपदेशाधिकरणम्— ३४६
९४. अभिध्यातव्यं ब्रह्म ३४७
९५. दहराधिकरणम्--- ३४८
९६. दहराकाशं ब्रह्मैव ३५२
९७. अनुकृत्यधिकरणम्— ३७४
६८. ब्रह्मभानस्यैव भाण्वादावनुकरणम्— ३७६
६६. प्रमिताधिकरणम् ३७९
१००. अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ब्रह्म ३८०
१०१. देवताधिकरणम्— ३८४
१०२. देवादीनामपि ज्ञानेऽधिकारः ३८५
१०३. देवानां विग्रहादिमत्त्वम् ३८६

१९ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्
१०४.देवविग्रहादेः शब्दव्यङ्ग्यत्वम्३९०
१०५.स्फोटवादनिरासः४०१
१०६.वेदानाम्नादित्वम्४०६
१०७.जैमिनिमतविरोधः४११
१०८.वादरायणमतेन तस्य निरासः४१७
१०९.अर्थबादानामुपयोगः४१९
११०.अपशूद्राधिकरणम्—४२८
१११.ब्रह्मविद्यायां शूद्रानधिकारः४३१
११२.कम्पनाधिकरणम्—४४०
११३.जगदेजयितुप्राणो ब्राह्मौ४४१
११४.ज्योतिरधिकरणम्—४४३
११५.ज्योतिशब्दं ब्रह्म४४४
११६.अर्थान्तरत्वव्यपदेशाधिकरणम्—४४७
११७.नामादिधारकमाकाशं ब्रह्मैव४४८
११८.सुषुप्त्युत्क्रान्त्यधिकरणम् —४४९
११९.विज्ञानमयशब्दं ब्रह्म४५०

(४) चतुर्थ पादे—

१२०.आनुमानिकाधिकरणम्—४५४
१२१.अव्यक्तपदं शरीरम्४५६
१२२.अव्यक्तपदं न प्रधानपरम्४६६
१२३.चमसाधिकरणम्—४७६
१२४.अजापदं न प्रधानपरम्४७७
१२५.अजापदं भूतप्रकृतिपरम्४७७
१२६.संख्योपसंग्रहाधिकरणम्४८०
१२७.पञ्चजनशब्दः प्राणादिपरः४८१
२२८.कारणत्वाधिकरणम्—४९१
१२६.सृष्टिक्रमविवादेऽपि स्रष्टर्यविवादः४९३
१३०.बालाक्यधिकरणम्—४९८
१३१.पुरुषाणां कर्त्ता ब्रह्मैव५०१
१३२.जैमिनिमतम्५०५
१३३.वाक्यान्वयाधिकरणम्—५०७
१३४.द्रष्टव्यत्वादिरूपेण ब्रह्मण एव निर्देशः५०७
१३५.प्रकृत्यधिकरणम्—५२४
१३६.अभिन्ननिमित्तोपादानं ब्रह्म५२५
१३७.सर्वव्याख्यानाधिकरणम्२३०
१३८.परमाण्वादिकारणवादनिरासः५३१

हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् १३

अविरोधाख्यद्वितीयोध्यायस्य

(१) प्रथमे पादे—

१.स्मृत्यधिकरणम्—५३३
२.सांख्यस्मृतिविरोधपरिहारः५३३
३.योगप्रत्युक्त्यधिकरणम्—५४१
४.योगशास्त्रविरोधनिरासः५४१
५.विलक्षणत्वाधिकरणम्—५४५
६.सांख्यतर्कविरोधोद्धारः५४५
७.शिष्टापरिग्रहाधिकरणम्—५६२
८.कणादादितर्कविरोधापसारणम्—५६५
९.भोक्त्रापत्त्यधिकरणम्—५६६
१०.भोक्त्रादिविभागो लोकवत्५६६
११.आरम्भणाधिकरणम्—५६७
१२.कार्यस्य कारणव्यतिरेकेणाभावः५६८
१३.ब्रह्मभेदाभेदनिरासः५७६
१४.असत्यात् सत्यस्योत्पत्तिः५७७
१५.कार्यकारणयोरभेदः५८५
१६.सत्कार्यवादः५८६
१७.समवायनिरासः५९१
१८.सत्कार्यवादः५९३
१९.इतरव्यपदेशाधिकरणम्—५९८
२०.स्रष्टुर्हिताकरणदोषनिरासः५९९
२१.उपसंहारदर्शनाधिकरणम्—६००
२२.असहायस्यैव ब्रह्मणः स्रष्टृत्वम्६०१
२३.कृत्स्नप्रसक्त्यधिकरणम्—६०३
२४.निरवयवस्यैवोपादानत्वम्६०४
२५.सर्वोपेताधिकरणम्—६०८
२६.एकरसस्यापि ब्रह्मणो विचित्रा सृष्टिः६०८
२७.न प्रयोजनवत्त्वाधिकरणम्—६०९
२८.लीलामात्रा सृष्टिः६०९
२९.वैषम्यनैर्घृण्याधिकरणम्—६१३
३०.जीवकर्मापेक्षा सृष्टिः६१३
३१.अनादिः संसारः६१५
३२.सर्वधर्मोपपत्त्यधिकरणम्—६१७
३३.निर्गुणस्यैव ब्रह्मणः स्रष्टृत्वम्६१७

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्,
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा,
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि॥
( श्रीमद्भा० १।१।१। )

तत्सद्ब्रह्मणे नमः।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्


समन्वयाध्याये प्रथमे

प्रथमः पादः


भामती

अनिर्वाच्याविद्याद्वितयसचिवस्य प्रभवतो विवर्त्ता यस्यैते वियदनिलतेजोऽबवनयः।
यतश्चाभूद्विश्वं चरमचरमुच्चावचमिदं नमामस्तद्ब्रह्मापरिमितसुखज्ञानममृतम् ॥ १ ॥


भामती-व्याख्या

सहस्रधारके यस्मिन्नृषयो नो मनीषिणः।
पुनन्ति स्वं वचस्तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः ॥ १ ॥

यदावृत्याविद्या परिणतिविवर्त्ता विजयते,
अनिर्वाच्या चित्रा सदसदभिलापाप्रलपिता।
यदेवानादृत्य प्रकिरति विमुक्तिं मतिमतां,
तदेव ब्रह्माहं कथमपि नमस्यामि मननात् ॥ २ ॥

अश्रौततन्त्रकान्तारे श्रौतदर्शनविस्तरे।
श्रीवाचस्पतिमिश्राणां समं नृत्यति भारती ॥ ३ ॥

प्रसादो वदने यस्या हृदि गाम्भीर्यमद्भुतम्।
भाष्याभिरूपतामेति व्याख्या सैषेव भामती ॥ ४ ॥

भामतीपतिरेकाकी बभूवास्या रहस्यवित्।
वयं तु केवलमस्या वीक्षितं वीक्षितुं क्षमाः ॥ ५ ॥


स्वभावतः अनिर्वाच्य (सत् और असत् से भिन्न) एवं मूलाविद्या और तूलाविद्या के भेद से दो प्रकार की अविद्या (भावरूप अज्ञान) के सहयोग से ब्रह्म के 'आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी'—ये पाँच भूत विवर्त (अतात्त्विक कार्य) हो जाते हैं। इतना ही नहीं जिस ब्रह्म से समस्त चराचर (चल और अचल) प्रपञ्च समुद्भूत हो जाता है, उस असीम सुख-सिन्धु और शाश्वत ज्ञानरूप ब्रह्म को हम (वाचस्पति मिश्र) नमस्कार करते हैं। [इस शिखरिणी छन्द में ब्रह्म का द्वितीय-सूत्र-सूचित जगज्जन्मादिकर्तृत्वरूप तटस्थ लक्षण तथा सच्चिदानन्दत्वरूप स्वरूप लक्षण प्रस्तुत किया गया है] ॥ १ ॥

इसी ब्रह्म के द्वारा श्वास-प्रश्वास के समान ऋगादि वेद, दृष्टिपातमात्र के समान आकाशादि पाँच महाभूत एवं एक सहज मुस्कान के समान समग्र स्थावर-जङ्गम जगत्

२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १. पां. १ सू. १

भामती

निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्च भूतानि ।
स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः ॥ २ ॥
षड्भिरङ्गैरुपेताय विविधैरव्ययैरपि ।
शाश्वताय नमस्कुर्मो वेदाय च भवाय च ॥ ३ ॥
मार्तण्डतिलकस्वामिमहागणपतीन् वयम् ।
विश्ववन्द्यान् नमस्यामः सर्वसिद्धिविधायिनः ॥ ४ ॥


भामती-व्याख्या

अनायास ही रचा गया है। जैसे उसके सङ्कल्प मात्रसे विशाल विश्व की सृष्टि हो जाती है, वैसे ही उसका सुषुप्ति (गाढ़ निंद्रा) में सो जानामात्र महाप्रलय कहलाता है। [इस पद्य के द्वारा तृतीय सूत्र-प्रोक्त शास्त्रयोनित्व का स्पष्टीकरण “अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद् यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदः” (बृह० उ० २।४।१०) इस श्रुति के प्रकाश में किया गया है। इससे ब्रह्म में सर्वज्ञता फलित होती है] ॥ २ ॥

छः अङ्ग और विविध अव्ययों से परिपूर्ण भगवान् शङ्कर और वेद को हम (वाचस्पति मिश्र) नमस्कार करते हैं। [भगवान् शङ्कर के छः अङ्ग शिवपुराण (विद्येश्वर-सं. १६।१२) में वर्णित हैं—
सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः ।
अचिन्त्यशक्तिश्च विभोर्विधिज्ञा षडाहुरङ्गानि महेश्वरस्य ॥
इसी प्रकार भगवान् वेद के छः अङ्ग मुण्डकोपनिषत् (१।१।५) में कहे गये हैं—“शिक्षा कल्पो व्याकरणं छन्दो ज्योतिषम् ।” भगवान् शङ्कर के दश अव्ययों का वर्णन वायु पुराण में किया गया है—
ज्ञानं विरागतैश्वर्यं तपः सत्यं क्षमा धृतिः ।
स्रष्टृत्वमात्मसंबोधो ह्यधिष्ठातृत्वमेव च ॥
वेद में ‘च, ह, वा’ आदि अव्ययपदों का प्रयोग अत्यन्त प्रसिद्ध है] ॥ ३ ॥

मार्तण्ड (भगवान् सूर्य), तिलकस्वामी (भाल में तिलक लगाना जिन्हें अत्यन्त प्रिय है, ऐसे स्वामी कार्तिकेय) और महागणपति को हम (वाचस्पति मिश्र) नमस्कार करते हैं। ये सब देवगण विश्व-वन्द्य हैं, इनकी पूजा करने से सिद्धि प्राप्त होती है [जैसा कि याज्ञ-वल्क्यस्मृति (१।२९४) में कहा गया है—
आदित्यस्य सदा पूजां तिलक स्वामिनस्तथा ।
महागणपतेश्चैव कुर्वन् सिद्धिमाप्नुयात् ॥ ] ॥ ४ ॥

वैष्णवी ज्ञान शक्ति के अवताररूप ब्रह्मसूत्रों के रचयिता, सर्वज्ञ महर्षि वेदव्यास को हमारा (वाचस्पति मिश्र का) नमस्कार है। [महर्षि पराशर ने अपने समय तक हुए अट्ठाईस वेदव्यासों को भगवान् विष्णु का अवतार बताते हुए अपने पितामह महर्षि वसिष्ठ को आठवें द्वापर का व्यास, अपने पिता महर्षि शक्ति को पच्चीसवां, अपने को छब्बीसवां तथा अपने पुत्र कृष्णद्वैपायन को अट्ठाईसवां व्यास कहा है—
द्वापरे द्वापरे विष्णुर्व्यासरूपी महामुने ।
वेदमेकं सुबहुधा कुरुते जगतो हितः ॥ (विष्णुपु० ३।३।५)
तस्मादस्मत्पिता शक्तिर्व्यासस्तस्मादहं मुने ॥
जातुकर्णोऽभवन्मत्तः कृष्णद्वैपायनस्ततः ।
अष्टाविंशतिरित्येते वेदव्यासाः पुरातनाः ॥ (विष्णुपु० ३।३।१६)

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३


भामती

ब्रह्मसूत्रकृते तस्मै वेदव्यासाय वेधसे ।
ज्ञानशक्त्यवताराय नमो भगवतो हरेः ॥ ५ ॥
नत्वा विशुद्धविज्ञानं शङ्करं करुणाकरम् ।
भाष्यं प्रसन्नगम्भीरं तत्प्रणीतं विभज्यते ॥ ६ ॥
आचार्यकृतिनिवेशनमप्यवधूतं वचोऽस्मदादीनाम् ।
रथ्योदकमिव गङ्गाप्रवाहपातः पवित्रयति ॥ ७ ॥

अथ यदसन्दिग्धमप्रयोजनं च न तत्प्रेक्षावत्प्रतिपित्सागोचरः, यथा समनस्केन्द्रियसन्निकृष्टः स्फीतालोकमध्यवर्ती घटः करटदन्ता वा, तथा चेदं ब्रह्मेति व्यापकविरुद्धोपलब्धिः । तथाहि 'बृहत्त्वाद् बृंह-


भामती-व्याख्या

कृष्णद्वैपायन के पश्चात् आगामी द्वापर में द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा को उनतीसवाँ व्यास कहा गया है ] ॥ ५ ॥

विमलप्रज्ञ एवं करुणा-सागर भगवान् शङ्कराचार्य को नमस्कार करके उनके द्वारा प्रणीत प्रसन्न [ सुगम पदावलि एवं गम्भीर चिन्तन प्रस्तुत करनेवाले ] भाष्य ( ब्रह्मसूत्र के शाङ्कर भाष्य ) का व्याख्यान किया जा रहा है । [ प्रसाद नाम का शब्दालङ्कार काव्यादर्श में वर्णित है—

श्लेषः प्रसादः समता माधुर्यं सुकुमारता ।
अर्थव्यक्तिरुदारत्वमोजः कान्तिसमाधयः ॥ ( काव्या० १।४१ )

सुगम और सुप्रसिद्ध पदावलि का प्रयोग ही प्रसाद गुण माना जाता है । श्री पद्मपादाचार्य ने भी शाङ्कर भाष्य में प्रसाद गुण का उल्लेख किया है—

"भाष्यं प्रसन्नगम्भीरं तद्व्याख्यां श्रद्धयारभे" ( पञ्चपा० पृ० १ ) ] ॥ ६ ॥

जैसे गङ्गा में मिल जाने मात्र से गली-कूचों का अपवित्र जल पवित्र हो जाता है, वैसे ही भाष्य के साथ हमारी ( वाचस्पतिमिश्र की ) भामती नाम की व्याख्या का सम्बन्ध हो जाने मात्र से हमारी अपवित्र वाणी भी पवित्र हो जाती है ॥ ७ ॥

[ "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" ( ब्र. सू. १।१।१ ) इस सूत्र के द्वारा भगवान् सूत्रकार कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ब्रह्म की सहज-सिद्ध जिज्ञास्यता दिखा कर ब्रह्म-विचार का प्रस्ताव रख रहे हैं । उसकी व्याख्या में भगवान् भाष्यकार अध्यास का उपपादन ( आक्षेपपूर्वक स्वरूप-निरूपण ) कर रहे हैं । आपाततः प्रतीयमान सूत्र और भाष्य की इस असमञ्जसता को दूर करते हुए भामतीकार ब्रह्म की जिज्ञास्यता के साथ अध्यास का अन्वय-व्यतिरेक दिखाने के लिए एक सामान्य व्याप्ति प्रदर्शित कर रहे हैं— ] जो वस्तु असन्दिग्ध ( सन्देह-रहित ) और निष्प्रयोजन होती है, वह प्रेक्षक ( विचार में समर्थ ) मनीषिणों का जिज्ञासा का विषय नहीं होती, जैसे सजग पुरुष की आँखों के सामने प्रखर प्रकाश में रखा घट-जैसा असन्दिग्ध और काक-दन्त के समान निरर्थक पदार्थ, प्रकृत में ब्रह्म तत्त्व भी वैसा ही असन्दिग्ध और निष्प्रयोजन है—इस प्रकार यहाँ जिज्ञास्यता (विचारणीयता) की व्यापकीभूत सन्दिग्धता एवं सप्रयोजनता के विरोधी असन्दिग्धत्व एवं निष्प्रयोजनत्व की उपलब्धि ( सिद्धि ) है, अतः ब्रह्म की विचारणीयता कदापि न्यायोचित नहीं ठहराई जा सकती [ प्रसिद्ध बौद्ध ग्रन्थकार श्री धर्मकीर्ति ने अपने न्यायबिन्दु में सद्धेतु के तीन भेद कहे हैं—"अनुपलब्धिः स्वभावः कार्यं चेति" ( न्या० बिं० १।११ ) । अनुपलब्धि हेतु के ग्यारह भेदों में एक व्यापकविरुद्धोपलब्धि भी वर्णित है—"व्यापकविरुद्धोपलब्धिर्यथा नात्र तुषारस्पर्शो [वह्नेरिति]" (न्या० बिं० २।३८) । श्री वाचस्पतिमिश्र ने यहाँ उसी का प्रयोग प्रदर्शित किया है ] ।

ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

णत्वाद्ब्रह्मत्वमेव ब्रह्मेति गीयते' । स चायमाकीटपतङ्गेभ्य आ च देवर्षिभ्यः प्राणभृन्मात्रस्येदङ्कारास्पदेभ्यो देहेन्द्रियमनोबुद्धिविषयेभ्यो विवेकेनाहमिति असन्दिग्धाविपर्य्यस्तापरोक्षानुभवसिद्ध इति न जिज्ञासास्पदं, न हि जातु कश्चिदत्र सन्दिग्धेऽहं वा नाहं वेति, न च विपर्य्यस्यति नाहमेवेति । न चाहं कृशः स्थूलो गच्छामीत्यादिदेहधर्मसामानाधिकरणदर्शनात् देहालम्बनोऽयमहङ्कार इति साम्प्रतम् । तदालम्बनत्वे हि योऽहं बाल्ये पितरावन्वभवं स एव स्थाविरे प्रणप्तॄननुभवामीति प्रतिसन्धानं न भवेत् । न हि बालस्थविरयोः शरीरयोरस्ति मनागपि प्रत्यभिज्ञानगन्धो येनैकत्वमध्यक्षवसीयेत । तस्माद्येषु व्यावर्तमानेषु यदनुवर्त्तते तत्तेभ्यो भिन्नं, यथा कुसुमेभ्यः सूत्रम् । तथा च बालादिशरीरेषु व्यावर्तमानेष्वपि परस्परमहङ्कारास्पदमनुवर्त्तमानं तेभ्यो भिद्यते ।

अपि च स्वप्नान्ते दिव्यं शरीरभेदमास्थाय तदुचितान् भोगान् भुञ्जान एव प्रतिबुद्धो मनुष्यशरीरमात्मानं पश्यन्नाहं देवो मनुष्य एवेति देवशरीरे बाध्यमानेऽप्यहमास्पदमबाध्यमानं शरीराद्भिन्नं प्रति-

भामती-व्याख्या

ब्रह्म में असन्दिग्धता का उपपादन—
विष्णुपुराण ( ३।२२ ) में कहा गया है—"बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च तद्ब्रह्मेत्यभिधीयते ।” अर्थात् बृहत् ( व्यापक ) या बृंहण ( अपने शरीरादि की वृद्धि का कारण ) होने से जीवात्मा ही ब्रह्म कहलाता है, वह तो कीड़े-मकोड़ों से लेकर देवों और ऋषियों तक सभी प्राणियों को देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शब्दादिरूप इदंकारास्पद बाह्य पदार्थों से भिन्न 'अहम्'—इस प्रकार अपरोक्ष अनुभव के द्वारा अवगत है, अतः वह 'आत्मा क्या है?' इस प्रकार की जिज्ञासा का विषय नहीं हो सकता । इस ( आत्मा ) के विषय में न तो कोई प्राणी 'अहं वा नाहं वा ?' ऐसा सन्देह ही करता है और न 'नाहमेव' ऐसा विपरीत निश्चय । यदि कहा जाय कि 'अहं कृशः, स्थूलः, गच्छामि'—इत्यादि अनुभूतियों के द्वारा कृशत्व, स्थूलत्व और गमनादि क्रियारूप शरीर के धर्मों और अहन्त्वरूप आत्मा के धर्मों का एक अधिकरण में रहना सिद्ध होता है, अतः साधारण मनुष्य शरीर को ही आत्मा मानता है, शरीरादि से भिन्न आत्मा का अनुभव नहीं करता । तो वह कहना उचित नहीं, क्योंकि शरीर को 'अहम्'—इस प्रकार की प्रतीति का विषय नहीं माना जा सकता, अन्यथा अहंपदार्थ में पूर्व और पर काल की एकता का अवगाहन करनेवाली प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकेगी—'योऽहं बाल्यावस्थायां पितृ-पितामहादिकमनुभूतवान्, स एवाहं वृद्धावस्थायां पुत्रपौत्रादिकमनुभवामि ।” इसका कारण यह है कि बाल्य और वृद्धावस्था के शरीर एक नहीं रहते, स्पष्ट रूप से भिन्न हो जाया करते हैं, अतः शरीर से भिन्न ही अहंपदार्थ का होना निश्चित है । यदि बाल और वृद्ध शरीरों में कुछ भी एकरूपता होती, तब उसे अहंपदार्थ माना जा सकता था, किन्तु वैसा सम्भव नहीं। यह निश्चित व्याप्ति है कि जिन बाल्यकाल के शरीरादि पदार्थों के वृद्धावस्था में व्यावृत ( निवृत्त ) हो जाने पर भी जो अहंपदार्थ अनुवृत्त रहता है, वह शरीरादि व्यावृत हो जाने वाले पदार्थों से भिन्न होता है, जैसे एक धागे में पिरोए हुए फूल एक-दूसरे के स्थान से व्यावृत होते ( हटते ) जाते हैं, किन्तु धागा सर्वत्र अपनी एकता बनाए रखता है, अतः फूलों से धागा भिन्न तत्त्व होता है । वैसे ही बाल्य और वृद्धावस्था के शरीर परस्पर व्यावृत हैं, किन्तु अहंकारास्पद आत्मतत्त्व सर्वत्र अनुगत होने के कारण शरीरादि से भिन्न स्थिर होता है ।

केवल शरीरों की बाल्यादि अवस्थाओं के व्यावृत होने पर ही अहंकारास्पद पदार्थ की अनुवृत्ति नहीं देखी जाती, अपि तु एक व्यक्ति अपने स्वप्न में देव-शरीर पाकर देव-सुलभ