भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वृक्षके मूलमें धूप-माल्य आदिसे कुठारका पूजन कर उसका सिर पूर्वकी ओर करके सावधानीसे स्थापित करे। अनन्तर मोदक, खीर आदि भक्ष्य द्रव्य तथा सुगन्धित पुष्प, धूप, गन्ध आदिसे वृक्षकी और देवता, पितर, राक्षस, पिशाच, नाग, सुरगण, विनायक आदिकी पूजा करके रात्रिमें वृक्षका स्पर्श कर यह कहें— 'देवदेव! आप पूजामें देवोंके द्वारा परिकल्पित हैं। वृक्षराज! आपको नमस्कार है। यह विधिवत् की गयी पूजा आप ग्रहण करें। जो-जो प्राणी यहाँ निवास करते हैं, उनको भी मेरा नमस्कार है*।'
प्रभातकालमें पुनः उस वृक्षका पूजन करे तथा ब्राह्मण और भोजकको दक्षिणा देकर विशेषज्ञोंके द्वारा स्वस्तिवाचनपूर्वक वृक्षका छेदन
करे। पूर्व-ईशान और उत्तरकी ओर वृक्ष कट करके गिरे तो अच्छा है। शाखाओंके इन दिशाओंमें गिरनेपर ही वृक्षका छेदन करे अन्यथा नहीं। वृक्षका नैऋत्य, आग्नेय और दक्षिण दिशाओंमें गिरना शुभ नहीं है एवं वायव्य और पश्चिममें गिरना मध्यम है। पहले वृक्षके चारों ओरकी शाखाओंको काटनेके बाद वृक्षको कटवाये। वृक्षसे शाखाएँ सर्वथा अलग हो जायँ तथा गिरकर टूटें नहीं एवं शब्द भी नहीं हो तो उत्तम है। जिसके कटनेसे दो भाग हो जाय, जिस वृक्षसे मधुर द्रव, घी, तेल आदि निकले उसका परित्याग कर दे। इन दोषोंसे रहित अच्छा काल देखकर काष्ठका संग्रह करना चाहिये।
(अध्याय १३१)
सूर्य-प्रतिमाकी निर्माण-विधि
नारदजीने कहा—यदुशादूल! मैं सभी देवोंकी प्रतिमाका लक्षण विशेषरूपसे आदित्यकी प्रतिमाका लक्षण कहता हूँ। एक हाथ, दो हाथ, तीन हाथ अथवा साढ़े तीन हाथ लम्बी या देवालयके द्वारके प्रमाणके अनुसार भगवान् सूर्यकी प्रतिमाका निर्माण कराना चाहिये। एक हाथकी प्रतिमा सौम्य होती है, दो हाथकी धन-धान्य देती है, तीन हाथकी प्रतिमासे सभी कार्य सिद्ध होते हैं, साढ़े तीन हाथकी लम्बी प्रतिमाकी स्थापनासे राष्ट्रमें सुभिक्ष, कल्याण और आरोग्यकी प्राप्ति होती है। प्रतिमाके अग्रभाग, मध्यभाग और मूलभागमें सौम्य होनेपर उसको गान्धर्वी प्रतिमा कहते हैं। वह धन-धान्य प्रदान करती है। देवालयके द्वारका जितना विस्तार हो, उसके आठवें अंशके समान प्रतिमा बनवानी चाहिये।
भगवान् सूर्यकी प्रतिमा विशाल नेत्र, कमलके
समान मुख, रक्तवर्णके बिम्बके समान सुन्दर ओठ, रत्नजटित मुकुटसे अलंकृत मस्तक, मणि-कुण्डल, कटक, अंगद, हार आदि अलंकारोंसे सुशोभित अभ्यङ्ग धारण किये हुए, हाथोंमें प्रफुल्लित कमल और सुवर्णकी माला लिये हुए अतिशय सुन्दर सभी शुभ लक्षणोंसे समन्वित बनवानी चाहिये।
इस प्रकारकी प्रतिमा प्रजाका कल्याण करनेवाली आरोग्य-प्रदायक तथा अभय प्रदान करनेवाली होती है। हीन या कम अङ्गवाली प्रतिमा अनिष्टकारक होती है। अतः प्रतिमा सीधी और सुडौल बनवानी चाहिये।
ब्रह्माजीकी मूर्ति हाथमें कमण्डलु धारण किये कमलासनपर विराजमान तथा चार मुखोंसे संयुक्त बनवानी चाहिये। कार्तिकेयकी प्रतिमा कुमार-स्वरूप, हाथमें शक्ति लिये, अतिशय सुन्दर बनवानी चाहिये। इनकी ध्वजा मयूर-मण्डित होनी चाहिये।
- अर्चासु देवदेव त्वं देवैश्च परिकल्पितः। नमस्ते वृक्ष पूज्यं विधिवत् परिगृह्यताम् ॥ (ब्राह्मपर्व १३१।३३)
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- ब्राह्मपर्व *
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इन्द्रकी प्रतिमा चार दाँतोंसे युक्त सफेद दाँतोंवाले ऐरावत गजपर आरूढ़ तथा हाथमें वज्र धारण किये हुए बनवानी चाहिये। इस प्रकार देवोंकी प्रतिमा शुभ लक्षणोंसे युक्त और सुन्दर बनवानी चाहिये।
नारदजी बोले—साम्ब! भगवान् सूर्यकी इस प्रकारकी प्रतिमा बनवाकर ईशानकोणमें चार तोरण, पल्लव, पुष्पमाला, पताका आदिसे विभूषित कर फिर अधिवासनके लिये मण्डपका निर्माण करवाना चाहिये। काष्ठकी मूर्ति श्री, विजय, बल, यश, आयु और धन प्रदान करती है, मिट्टीकी प्रतिमा प्रजाका कल्याण करती है। मणिमयी प्रतिमा कल्याण और सुभिक्ष प्रदान करती है, सुवर्णकी प्रतिमा पुष्टि, चाँदीकी मूर्ति कीर्ति, ताम्रकी मूर्ति प्रजावृद्धि तथा पाषाणकी प्रतिमा विपुल भूमि लाभ कराती है। लोहे, शीशे एवं रंगेकी मूर्तियाँ अनिष्ट करनेवाली होती हैं, इसलिये इन धातुओंकी प्रतिमा नहीं बनवानी चाहिये।
साम्बने पूछा—नारदजी! भगवान् सूर्य सर्वदेवमय कहे गये हैं, यह उनका सर्वदेवमयत्व कैसा है? उसे कृपाकर बतलाइये।
नारदजीने कहा—साम्ब! तुमने बड़ी अच्छी बात पूछी है। अब मैं यह सब बता रहा हूँ। इसे ध्यानसे सुनो—
भगवान् सूर्य सर्वदेवमय हैं, उनके नेत्रोंमें बुध और सोम, ललाटपर भगवान् शंकर, सिरमें ब्रह्मा, कपालमें बृहस्पति, कण्ठमें एकादश रुद्र, दाँतोंमें नक्षत्र और ग्रहोंका निवास है। ओष्ठोंमें धर्म और अधर्म, जिह्वामें सर्वशास्त्रमयी महादेवी सरस्वती स्थित हैं। कर्णोंमें दिशाएँ और विदिशाएँ, तालुदेशमें ब्रह्मा और इन्द्र स्थित हैं। इसी प्रकार भूमध्यमें बारहों आदित्य, रोमकूपोंमें सभी ऋषिगण, पेटमें समुद्र, हृदयमें यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, पिशाच, दानव और राक्षसगण विराजमान हैं। भुजाओंमें नदियाँ, कक्षोंमें वृक्ष, पीठके मध्यमें मेरु, दोनों स्तनोंके बीचमें मङ्गल और नाभिमण्डलमें धर्मराजका निवास है। कटिप्रदेशमें पृथ्वी आदि, लिङ्गमें सृष्टि, जानुओंमें अश्विनीकुमार, ऊरुओंमें पर्वत, नखोंके मध्य सातों पाताल, चरणोंके बीच वन और समुद्रसहित भूमण्डल तथा दन्तान्तरोंमें कालाग्नि रुद्र स्थित हैं। इस प्रकार भगवान् सूर्य सर्वदेवमय तथा सभी देवताओंके आत्मा हैं। जैसे वायुसे विश्व व्याप्त है, वैसे ही चराचर जगत् इनसे परिव्याप्त है, क्योंकि वायु भी भगवान् सूर्यके प्रत्येक अङ्गोंमें ही स्थित रहता है। ऐसे ये भगवान् सूर्य सम्पूर्ण प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये निरन्तर तत्पर रहते हैं।
(अध्याय १३२-१३३)
सूर्य-प्रतिष्ठाका मुहूर्त और मण्डप बनानेका विधान
नारदजी बोले—साम्ब! भगवान् सूर्यकी स्थापनाके लिये प्रतिपदा, द्वितीया, चतुर्थी, पञ्चमी, दशमी, त्रयोदशी तथा पूर्णिमा—ये तिथियाँ प्रशस्त मानी गयी हैं। चन्द्रमा, बुध, गुरु और शुक्र—इन ग्रहोंके उदित एवं अनुकूल होनेपर भगवान् सूर्यकी प्रतिमाकी प्रतिष्ठा करनी चाहिये। सूर्यकी स्थापनामें तीनों उत्तरा, रेवती, अश्विनी, रोहिणी, हस्त, पुनर्वसु,
पुष्य, श्रवण और भरणी—ये नक्षत्र प्रशस्त हैं। प्रतिष्ठाके लिये यज्ञभूमि भूसी, राख, केश आदिसे रहित एवं शुद्ध होनी चाहिये। उसमें बालू, कंकड़ एवं कोयले न हों। दस हाथ लम्बा-चौड़ा मण्डप बनवाना चाहिये। उसके चारों ओर वृक्ष, उद्यान, उपवन आदि होने चाहिये। उस मण्डपमें चार हाथ लम्बी-चौड़ी वेदीका निर्माण करे। नदीके
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
संगम-स्थानसे मिट्टी अथवा बालू लाकर वहाँ बिछाये। भलीभाँति मण्डपको गोबर आदिसे उपलिस करे, पूर्व दिशामें चतुरस्त्र, दक्षिण दिशामें अर्धचन्द्र, पश्चिम दिशामें वर्तुलाकार और उत्तर दिशामें पद्मके आकारवाले चार कुण्डोंका निर्माण करे। वट, पीपल, गूलर, बेल, पलाश, शमी अथवा चन्दनके द्वारा पाँच-पाँच हाथके खंभे लगाये। शुक्ल वस्त्र, पुष्पमाला, कुश आदिके द्वारा प्रत्येक खंभेको अलंकृत करे।
मण्डपके मध्यमें अलंकृत वेदीके ऊपर कुश बिछाकर पुष्पोंसे आच्छादित करे या ढककर प्रतिमाको रखे। मण्डपके आठों दिशाओंमें क्रमशः
पीत, रक्त, कृष्ण, अञ्जनके समान नील, श्वेत, कृष्ण, हरित और चित्रवर्णकी आठ पताकाएँ आठ दिक्पालोंकी प्रसन्नताके लिये लगाये। सफेद और लाल चूर्णसे वेदीके ऊपर कमलकी आकृति बनाये। ‘वेद्या वेदिः०’ (यजु० १९।१७) इस मन्त्रसे वेदीका स्पर्श करे। ‘योगे योगेति’ (यजु० ११।१४) इस मन्त्रसे उसपर पूर्वाग्र और उत्तराग्र कुशोंको बिछाये। वहाँ उत्तम बिछावन और दो तकिर्योंसे युक्त एक शय्या एवं विविध भक्ष्य पदार्थोंको मण्डपमें रखे। एक उत्तम श्वेत छत्र वहाँ स्थापित कर विचित्र दीपमालासे मण्डलको अलंकृत करे। (अध्याय १३४)
साम्बोपाख्यानके प्रसंगमें सूर्यकी अभिषेक-विधि
नारदजी बोले— अब मैं भगवान् सूर्यके स्नपनकी विधि बताता हूँ। वेदपाठी, पवित्र आचारनिष्ठ, शास्त्रमर्मज्ञ, सूर्यभक्त भोजक अथवा अन्य ब्राह्मणोंके साथ मण्डलके ईशानकोणमें एक हाथ लम्बा-चौड़ा और ऊँचा भद्रपीठ स्थापित कर देव-प्रतिमाको प्रासादमें लाये और प्रतिमाको उस पीठपर स्थापित करे। मार्गमें ‘भद्रं कर्णोभिः०’ आदि माङ्गलिक मन्त्रोंकी ध्वनि होती रहे तथा भाँति-भाँतिके वाद्य बजते रहें। अनन्तर समुद्र, गङ्गा, यमुना, सरस्वती, चन्द्रभागा, सिन्धु, पुष्कर आदि तीर्थों, नदी, सरोवर, पर्वतीय झरनोंके जलसे भगवान् सूर्यको स्नान कराये। आठ ब्राह्मण और आठ भोजक सोनेके कलशोंके जलसे स्नान करायें। स्नानके जलमें रत्न, सुवर्ण, गन्ध, सर्वबीज, सर्वौषधि, पुष्प, ब्राह्मी, सुवर्चला (सूर्यमुखी), मुस्ता, विष्णुक्रान्ता, शतावरी, दूर्वा, मदार, हल्दी, प्रियंगु, वच आदि सभी औषधियाँ डाले। कलशोंके मुखपर वट, पीपल और शिरीषके कोमल पल्लवोंको कुशके साथ रखे। भगवान् सूर्यको अर्घ्य देकर
गायत्री-मन्त्रसे अभिमन्त्रित सोलह कलशोंसे स्नान कराये। सुवर्ण कलशके अभावमें चाँदी, ताँबा, मृत्तिकाके कलशोंसे ही स्नान करना चाहिये। इसके अनन्तर पक्के ईंटोंसे बनी हुई वेदीके ऊपर कुश बिछाकर मूर्तिको दो वस्त्र पहनाकर स्थापित करना चाहिये। उस दिन व्रत रखे। मूर्ति स्थापित करनेके पश्चात् निम्न मन्त्रोंसे प्रतिमाका अभिषेक करे—
‘देवश्रेष्ठ! ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवगण आकाश-गङ्गासे परिपूर्ण जलद्वारा आपका अभिषेक करें। दिवस्पते! भक्तिमान् मरुदण् मेघजलसे परिपूर्ण द्वितीय कलशसे आपका अभिषेक करें। सुरोत्तम! विद्याधर सरस्वतीके जलसे परिपूर्ण तृतीय कलशके द्वारा आपका अभिषेक करें। देवश्रेष्ठ! इन्द्र आदि लोकपालगण समुद्रके जलसे परिपूर्ण चतुर्थ कलशसे आपका अभिषेक करें। नागगण कमलके परागसे सुगन्धित जलसे परिपूर्ण पञ्चम कलशसे आपका अभिषेक करें। हिमवान् एवं सुवर्णशिखरवाले सुमेरु आदि पर्वतगण दक्षिण-पश्चिममें स्थित छठे कलशके जलसे आपका अभिषेक करें। आकाशचारी
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- ब्राह्मपर्व *
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ससर्पिगण पद्मपरागसे सुगन्धित सम्पूर्ण तीर्थ-जलोंसे परिपूर्ण सप्तम घटके द्वारा आपका आभिषेक करें। आठ प्रकारके मङ्गलसे समन्वित अष्टम कलशसे वसुगण आपका अभिषेक करें। हे देवदेव! आपको नमस्कार है*।'
इसी प्रकार एक ताम्रके पात्रमें पञ्चगव्य बनाकर स्नान कराये। वैदिक मन्त्रोंसे गोमूत्र, गोमय, दूध, दही, कुशोदक लेकर ताम्रके नवीन पात्रमें पञ्चगव्य बनाकर सूर्यनारायणको स्नान कराये। मन्त्रसे गन्धयुक्त जलसे स्नान कराये, अनन्तर शुद्धोदक-स्नान कराये तथा रक्त वस्त्र एवं अलंकारसे अलंकृत कर इस प्रकार आवाहन करें—
एहोहि भगवन् भानो लोकाग्नग्रहकारक।
यज्ञभागं गृहाण त्वमग्निदेव नमोऽस्तु ते॥
‘भगवन्! लोकाग्नग्रहकारक भानो! आप आये, इस यज्ञभागको ग्रहण करें, भगवान् सूर्यदेव! आपको नमस्कार है।’
तदनन्तर सुवर्णपात्रके द्वारा सूर्यदेवको अर्घ्य प्रदान करें। पहले मिट्टीके कलशसे, अनन्तर ताम्र-कलशसे फिर रजत-कलशसे और अन्तमें सुवर्णके कलशसे मन्त्रोंद्वारा अभिषेक करें। सम्पूर्ण तीर्थोंदक
और सर्वोषधिसे युक्त शुद्धको सूर्यदेवके मस्तकपर भ्रमण कराये और उसके जलसे स्नान कराये, अनन्तर पुष्प और धूप देकर जल, दूध, घृत, शहद और इक्षुरससे स्नान कराये।
इस प्रकारसे सूर्यदेवको स्नान करानेवाला पुरुष अग्निष्टोम, ज्योतिष्टोम, वाजपेय, राजसूय और अश्वमेध-यज्ञके फलको प्राप्त करता है। जो स्नानके समय सूर्यदेवका भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, वह भी पूर्वोक्त फल प्राप्त करता है। ऐसे स्थानमें स्नान कराना चाहिये जहाँ स्नानके जलका कोई लङ्घन न कर सके और स्नानके जल, दही, दूधको कुत्ता, कौआ आदि निन्दित जीव भक्षण न कर सकें।
इस प्रकारके स्नानविधिके सम्पादनके लिये जिस प्रकारके ब्राह्मण और भोजककी आवश्यकता होती है, उनका लक्षण सुनें—
वह व्यक्ति विकलाङ्ग अर्थात् न्यूनाधिक अङ्गवाला न हो। वेदादि-शास्त्रोंका ज्ञाता, सुन्दर, कुलीन और आर्यावर्त देशमें उत्पन्न हो। गुरुभक्त, जितेन्द्रिय, तत्त्ववेता और सूर्यसम्बन्धी शास्त्रोंका ज्ञाता हो। ऐसे श्रेष्ठ ब्राह्मणसे स्नान और प्रतिष्ठा करानी चाहिये। (अध्याय १३५)
भगवान् सूर्यकी प्रतिमाके अधिवासन और
प्रतिष्ठाका विधान तथा फल
नारदजी बोले—साम्ब! अब मैं अधिवासनविधि कहता हूँ। पवित्र भूमिको लीपकर पाँच रंगोंसे चतुरस्र सुन्दर मण्डलकी रचना करे। पताका, ध्वज, तोरण, छत्र, पुष्पमाला आदिसे उसे अलंकृत
- देवास्त्वामभिषिञ्चन्तु ब्रह्मविष्णुशिवादयः । व्योमगङ्गाभ्युपूर्णन कलशेन सुरोत्तम ॥ मरुतश्चाभिषिञ्चन्तु भक्तिमन्तो दिवस्पते । मेघतोयाभिपूर्णन द्वितीयकलशेन तु ॥ सारस्वतेन पूर्णन कलशेन सुरोत्तम । विद्याधराभिषिञ्चन्तु तृतीयकलशेन तु ॥ शक्राद्या अभिषिञ्चन्तु लोकपालाः सुरोत्तमाः । सागरोदकपूर्णन चतुर्थकलशेन तु ॥ वारिणा परिपूर्णन पद्मरेणुसुगन्धिना । पञ्चमेनाभिषिञ्चन्तु नागास्त्वां कलशेन तु ॥ हिमवद्भेमकूटाद्या अभिषिञ्चन्तु चाचलाः । नैर्ऋतोदकपूर्णन षष्ठेन कलशेन तु ॥ सर्वतीर्थाम्बुपूर्णन पद्मरेणुसुगन्धिना । सप्तमेनाभिषिञ्चन्तु ऋषयः सप्त खेचराः ॥ वसवश्चाभिषिञ्चन्तु कलशेनाष्टमेन वै । अष्टमङ्गलयुक्तेन देवदेव नमोऽस्तु ते ॥
(ब्राह्मपर्व १३५।२१-२८)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
कर मण्डलमें कुशा बिछाये और सूर्यदेवकी मूर्ति स्थापित करे। भगवान् सूर्यका आवाहन कर उन्हें अर्घ्य दे, मधुपर्क तथा वस्त्र, यज्ञोपवीत आदिसे पूजन करे और अव्यङ्ग अर्पण करे। जिस प्रकार देवताओंको पवित्रक अर्पण किया जाता है, वैसे ही प्रतिवर्ष श्रावण मासमें नवीन अव्यङ्गकी रचना कर सूर्यनारायणको समर्पित करना चाहिये। इनका यह पवित्रक है। नवीन अव्यङ्गके समर्पणके समय ब्राह्मणोंको भोजन कराये। भगवान्की प्रतिमाको सुगन्धित द्रव्योंसे उपलिस कर पुष्पमाला चढ़ाये तथा धूप आदि दिखाये। 'नमः शम्भवायः' (यजु० १६।४१) इस मन्त्रसे भगवान्की प्रतिमाको शय्याके ऊपर शयन कराये। सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्तिके लिये इस प्रकार पाँच दिन, तीन दिन अथवा एक ही रात्रि प्रतिमाका अधिवासन करे*।
देवालयेके ईशानकोणमें उत्तम स्थानके मध्यमें कुशा बिछाकर वहाँ शुक्ल वस्त्रोंसे सुसज्जित शय्या रखे। शय्याका सिरहाना पूर्वमुख रखा जाय। उसी शय्यापर भगवान् सूर्यकी प्रतिमाको शयन कराये। उनके दाहिने भागमें निशुभा, वाम भागमें रात्री और चरणोंके समीप दण्डनायक तथा पिङ्गलको स्थापित करे। उस रात्रिमें सूर्यनारायणके समीप जागरण करे, वन्दी-चारणसे स्तुति, नृत्य, गीत आदि उत्सव कराये। प्रभात होते ही ऋग्वेदके विधानसे प्रतिमाका उद्घोषन करे और स्वस्तिवाचनपूर्वक भगवान्की पूजा कर ब्राह्मण तथा भोजकोंको हविष्यान्न भोजन कराये तथा उन्हें दक्षिणा देकर प्रसन्न करे। अनन्तर मन्दिरके गर्भगृहमें पिण्डिकाके ऊपर सात अक्षोंसे युक्त सुवर्णका रथ स्थापित कर सूर्यनारायणको अर्घ्य देकर मङ्गल वाद्योंके साथ जलधारा गिराये। फिर उत्तम मुहूर्त और स्थिर लग्नमें प्रतिमाकी स्थापना करे। प्रतिमाका मुख नीचे-ऊपर या अगल-
बगल, तिरछा न हो, वरन् सीधा और सम रहे। भगवान् सूर्यकी प्रतिमाके दक्षिणभागमें और वामभागमें क्रमशः निशुभा और रात्रीकी प्रतिमा स्थापित करे। अनन्तर मोदक, शष्कुली, पायस, कुशर आदिसे इन्द्रादि दस दिव्यालोंका आवाहन तथा पूजन कर उन्हें बलि समर्पित करे।
इसके अनन्तर स्तुतियों तथा विविध उपचारोंसे सूर्यदेवका पूजन कर ब्राह्मणों और भोजकोंको भोजन कराये और उन्हें दक्षिणा दे। इस प्रकार भक्तोंद्वारा भक्तिपूर्वक प्रतिमाकी स्थापना किये जानेपर, वह उनकी सभी प्रकार कल्याण, मङ्गल और सुख-समृद्धिकी वृद्धि करती है और उसमें भगवान् सूर्यका नित्य सान्निध्य रहता है। सूर्यकी स्थापना करनेवाला व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है और उसे सात जन्मोंतक आधि-व्याधियाँ भी नहीं सतातीं। तीन दिनोंतक प्रतिष्ठाके उत्सवोंमें सम्मिलित रहनेवाला व्यक्ति सूर्यलोकको जाता है। सूर्यनारायणकी प्रतिमाकी स्थापना करनेसे दस अश्वमेध तथा सौ वाजपेय-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। मन्दिरकी ईंट जबतक चूर्ण नहीं हो जाती, तबतक मन्दिर बनवानेवाला पुरुष स्वर्ग-सुख भोगता है। सूर्य-मन्दिरके जीर्णोद्धार करनेका पुण्य इससे भी अधिक है। जो पुरुष मन्दिरका निर्माण कराकर प्राणियोंकी सृष्टि, स्थिति एवं प्रलयके हेतुभूत सुरश्रेष्ठ भगवान् सूर्यकी प्रतिमा स्थापित करता है, वह संसारके सब सुखोंको भोगकर सौ कल्पोंतक सूर्यलोकमें निवास करता है। मन्दिरमें इतिहास-पुराणका पाठ भी करना चाहिये।
इसी प्रकार अन्य देवताओंकी प्रतिमाओंका भी शय्याधिवास तथा उद्घोषन करे और शुभ मुहूर्तमें उन प्रतिमाओंको यथास्थान पिण्डिकापर स्थापित कर पूजन करे। (अध्याय १३६-१३७)
- पाक्षरात्र-आगमों तथा विविध प्रतिष्ठा-ग्रन्थोंमें अधिवासनकी विस्तृत विधियाँ निर्दिष्ट हैं।
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- ब्राह्मपर्व *
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ध्वजारोपणका विधान और फल
नारदजी बोले—साम्ब! अब मैं ब्रह्माजीद्वारा वर्णित ध्वजारोपणकी विधि बतलाता हूँ। पूर्वकालमें देवता और असुरोंमें जो भीषण युद्ध हुआ, उसमें देवताओंने अपने-अपने रथोंपर जिन-जिन चिह्नोंकी कल्पना की, वे ही उनके ध्वज कहलाये। उनका लक्षण इस प्रकार है—ध्वजका दण्ड सीधा, व्रणरहित और प्रासादके व्यासके बराबर लम्बा होना चाहिये अथवा चार, आठ, दस, सोलह या बीस हाथ लम्बा होना चाहिये। ध्वजाका दण्ड बीस हाथसे अधिक लम्बा न हो और सम पर्वोवाला हो। उसकी गोलाई चार अङ्गुल होनी चाहिये।
ध्वजके ऊपर देवताको सूचित करनेवाला चिह्न बनवाना चाहिये। भगवान् विष्णुके ध्वजपर गरुड, शिवजीकी ध्वजापर वृष, ब्रह्माजीकी ध्वजापर पद्म, सूर्यदेवकी ध्वजापर व्योम, सोमकी पताकापर नर, बलदेवकी पताकापर फालसहित हल, कामदेवकी पताकापर मकरध्वज, इन्द्रकी ध्वजापर हस्ती, दुर्गाकी ध्वजापर सिंह, उमादेवीकी ध्वजापर गोधा, रैवतकी ध्वजापर अश्व, वरुणकी ध्वजापर कच्छप, वायुकी ध्वजापर हरिण, अग्निकी ध्वजापर मेघ, गणपतिकी ध्वजापर मूषकका तथा ब्रह्मर्षियोंकी पताकापर कुशका चिह्न बनाना चाहिये। जिस देवताका जो वाहन हो, वही ध्वजापर भी अङ्कित रहता है।
विष्णुकी ध्वजाका दण्ड सोनेका और पताका पीतवर्णकी होनी चाहिये, वह गरुडके समीप रखनी चाहिये। शिवजीका ध्वजदण्ड चाँदीका और श्वेत वर्णकी पताका वृषके समीप स्थापित करे। ब्रह्माका ध्वजदण्ड ताँबेका और पद्मवर्णकी पताका कमलके समीप रखे। सूर्यनारायणका ध्वजदण्ड सुवर्णका और व्योमके नीचे पँचरंगी पताका होनी चाहिये, जिसमें किंकिणी लगी रहे एवं पुष्पमालाओंसे संयुक्त हो। इन्द्रका ध्वजदण्ड
सोनेका और हस्तीके समीप अनेक वर्णकी पताका होनी चाहिये। यमका ध्वजदण्ड लोहेका और महिषके समीप कृष्णवर्णकी पताका रखनी चाहिये। कुबेरका ध्वजदण्ड मणिमय और मनुष्य-पादके समीप रक्त वर्णकी पताका रखे। बलदेवका ध्वजदण्ड चाँदीका और तालवृक्षके नीचे श्वेतवर्णकी पताका रखनी चाहिये। कामदेवका ध्वजदण्ड त्रिलौह (सोना, चाँदी और ताँबा-मिश्रित)–का और मकरके समीप रक्तवर्णकी पताका स्थापित करनी चाहिये। कार्तिकेयका ध्वजदण्ड त्रिलौहका और मयूरके समीप चित्रवर्णकी पताका एवं गणपतिका ध्वजदण्ड ताम्रका अथवा हस्तिदन्तका एवं मूषकके समीप शुक्लवर्णकी पताका और मातृकाओंके ध्वजदण्ड अनेक रूपोंके तथा अनेक वर्णोंकी अनेक पताकाएँ होनी चाहिये। रेवन्तकी पताका अश्वके समीप लालवर्णकी, चामुण्डाका ध्वजदण्ड लौहका और मुण्डमालाके समीप नीले वर्णकी ध्वजा होनी चाहिये। गौरीका ध्वजादण्ड ताम्रका और इन्द्रगोप (बीरबहूटी कीट)–के समान अतिशय रक्तवर्णकी ध्वजा होनी चाहिये। अग्निका ध्वजदण्ड सुवर्णका और मेघके समीप अनेक वर्णकी पताका होनी चाहिये। वायुका ध्वजदण्ड लौहका और हरिणके समीप कृष्णवर्णकी पताका होनी चाहिये। भगवतीका ध्वजदण्ड सर्वधातुमय, उसके ऊपर सिंहके समीप तीन रंगकी पताका होनी चाहिये।
इस प्रकार ध्वजका पहिले निर्माण कर उसका अधिवासन करे। लक्षणके अनुसार वेदीका निर्माण करे, कलशकी स्थापना कर सर्वौषधि-जलसे ध्वजको स्नान कराये। वेदीके मध्यमें उसे खड़ाकर सभी उपचारोंसे उसकी पूजा करे और उसे पुष्पमाला पहिनाये, दिव्यालोंको बलि देकर एक राततक अधिवासन करे। दूसरे दिन भोजन कराकर शुभ
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मुहूर्तमें स्वस्तिवाचन आदि मङ्गल-कृत्य सम्पन्न कर ध्वजको मन्दिरके ऊपर आरूढ़ करे। ध्वजारोहणके समय अनेक प्रकारके वाद्योंको बजाये, ब्राह्मणगण वेद-ध्वनि करें। इस प्रकार देवालयपर ध्वजारोहण कराना चाहिये। ध्वजारोहण करानेवालेकी सम्पत्तिकी सदा वृद्धि होती रहती है और वह परम गतिको प्राप्त करता है। ध्वजरहित मन्दिरमें असुर निवास करते हैं, अतः ध्वजरहित मन्दिर नहीं रखना चाहिये। ध्वजारोहणके समय इन मन्त्रोंको पढ़ना चाहिये— एहोहि भगवन् देव देववाहन वै खग॥ श्रीकरः श्रीनिवासश्च जय ज्ञेरोपशोभित। व्योमरूप महारूप धर्मात्मस्तत्त्वं च वै गतेः॥
सानिध्यं कुरु दण्डेऽस्मिन् साक्षी च ध्रुवतां व्रज। कुरु वृद्धिं सदा कर्तुः प्रासादास्यार्कवल्लभ॥ ॐ एहोहि भगवन्नीश्वरविनिर्मित उपरिचरवायुमार्गानुसारिच्छ्रीनिवास रिपुध्वंस यक्षनिलय सर्वदेवप्रियं कुरु सानिध्यं शान्तिं स्वस्त्ययनं च मे। भयं सर्वविघ्ना व्यपसरन्तु॥
(ब्राह्मपर्व १३८।७३—७६)
स्वच्छ दण्डमें पताकाको प्रतिष्ठित करे तथा पताकाका दर्शन करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक जो रविका ध्वजारोपण करता है, वह श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर सूर्यलोकको प्राप्त करता है।
(अध्याय १३८)
साम्बोपाख्यानमें मगोंका वर्णन
साम्बने कहा—नारदजी! आपकी कृपासे मुझे सूर्यभगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुआ, उत्तम रूप भी प्राप्त हुआ, किंतु मेरा मन चिन्तासे आकुल है, इस मूर्तिका पूजन और रक्षण कौन करेगा? इसे आप बतानेकी कृपा करें।
नारदजी बोले—साम्ब! इस कार्यको कोई भी ब्राह्मण स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि देवपूजा अर्थात् देवधनसे अपना निर्वाह करनेवाले ब्राह्मण देवलक कहे जाते हैं। जो लोग लोभवश देवधन और ब्राह्मणधनको ग्रहण करते हैं, वे नरकमें जाते हैं, अतः कोई भी ब्राह्मण देवताका पूजक नहीं बनना चाहता। तुम भगवान् सूर्यकी शरणमें जाओ और उन्हींसे पूछो कि कौन उनका विधि-विधानसे पूजन करेगा? अथवा राजा उग्रसेनके पुरोहितसे कहो, सम्भव है कि वे इस कार्यको स्वीकार कर लें।
नारदजीकी इस बातको सुनकर जाम्बवतीपुत्र साम्ब उग्रसेनके पुरोहित गौरमुखके पास गये और उन्होंने उन्हें सादर प्रणामकर कहा—‘महाराज!
मैंने सूर्यभगवान्का एक विशाल मन्दिर बनवाया है, उसमें समस्त परिवार तथा परिच्छदों एवं पत्नियोंसहित उनकी प्रतिमा स्थापित की है और अपने नामसे वहाँ एक नगर भी बसाया है। आपसे मेरा यह विनम्र निवेदन है कि आप उन्हें ग्रहण करें।’
गौरमुखने कहा—साम्ब! मैं ब्राह्मण हूँ और आप राजा हैं। आपके द्वारा दिये गये इस प्रतिग्रहको लेनेपर मेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हो जायगा। दान लेना ब्राह्मणका धर्म है, किंतु देवप्रतिग्रह ब्राह्मणको नहीं लेना चाहिये। आप यह दान किसी मगको दे दें, वही सूर्यदेवकी पूजाका अधिकारी है।
साम्बने पूछा—महाराज! मग कौन हैं? कहाँ रहते हैं? किसके पुत्र हैं? इनका क्या आचार है। आप कृपाकर बतायें।
गौरमुख बोले—मग भगवान् सूर्य (अग्नि) तथा निक्षुभाके पुत्र हैं। पूर्वजन्ममें निक्षुभा महर्षि ऋग्विजहकी अत्यन्त सुन्दर पुत्री थी। एक बार उससे अग्निका उल्लङ्घन हो गया। फलस्वरूप
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- ब्राह्मपर्व *
१६७
भगवान् सूर्य (अग्निस्वरूप) रुष्ट हो गये। बादमें अग्निरूप भगवान् सूर्यके द्वारा निक्षुभाका जो पुत्र हुआ, वही मग कहलाया। भगवान् सूर्यके वरदानसे ये ही अग्निवंशमें उत्पन्न अव्यङ्गको धारण करनेवाले मग सूर्यके परम भक्त हुए और सूर्यकी पूजाके लिये नियुक्त हुए। भगवान् सूर्यकी पूजा करनेवाले मग शाकद्वीपमें निवास करते हैं, आप भगवान् सूर्यके पूजकके रूपमें उन्हें प्राप्त करनेके लिये शाकद्वीप जायँ।
अनन्तर साम्बने द्वारका जाकर अपने पिता भगवान् श्रीकृष्णको सब समाचार सुनाया। फिर वे उनकी आज्ञा प्राप्तकर गरुडपर सवार हो शीघ्र ही शाकद्वीप पहुँच गये। वहाँ जाकर उन्होंने अतिशय तेजस्वी महात्मा मर्गोंको सूर्यभगवान्की आराधनामें संलग्न देखा। साम्बने उन्हें सादर प्रणामकर उनकी प्रदक्षिणा की।
साम्बने कहा—आपलोग धन्य हैं। आप सबका दर्शन सबके लिये कल्याणकारी है, आपलोग सदा भगवान् सूर्यकी आराधनामें लगे हुए हैं। मैं भगवान् श्रीकृष्णका पुत्र हूँ, मेरा नाम साम्ब है।
मैंने चन्द्रभागा नदीके तटपर सूर्यदेवकी मूर्तिकी स्थापना की है। उनकी आज्ञाके अनुसार उनकी विधिवत् आराधनाके निमित्त शाकद्वीपसे जम्बूद्वीपमें ले जानेके लिये मैं आपकी सेवामें उपस्थित हुआ हूँ। मेरी सविनय प्रार्थना है कि आपलोग कृपाकर जम्बूद्वीपमें पधारें और भगवान् सूर्यकी पूजा करें।
मर्गोंने कहा—‘साम्ब! इस बातकी जानकारी भगवान् सूर्यने हमें पहले ही दे दी है।’
यह सुनकर साम्ब बहुत प्रसन्न हुए और गरुडपर उन्हें बैठाकर वहाँसे मित्रवन (मूलस्थान—मुल्लान) ले आये। सूर्यभगवान् मर्गोंको वहाँ उपस्थित देखकर बहुत प्रसन्न हुए और साम्बसे बोले—‘साम्ब! अब तुम चिन्ता छोड़ दो, ये मग मेरी विधिवत् पूजा सम्पन्न करेंगे।’
इस प्रकार साम्बने शाकद्वीपसे अव्यङ्ग धारण करनेवाले मर्गोंको लाकर धन-धान्यसे परिपूर्ण इस साम्बपुरको उन्हें समर्पित कर दिया। वे सब भगवान् सूर्यकी सेवामें तत्पर हो गये और साम्ब भी सूर्यदेव एवं मर्गोंको प्रणामकर आनन्दचित्तसे द्वारका लौट आये। (अध्याय १३९—१४१)
अव्यङ्गका लक्षण और उसका माहात्म्य
एक बार साम्बने महर्षि व्यासेसे मर्गोंद्वारा धारण किये जानेवाले अव्यङ्गके* विषयमें जिज्ञासा की।
व्यासजीने कहा—साम्ब! मैं तुम्हें अव्यङ्गके विषयमें बताता हूँ, उसे सुनो! देवता, ऋषि, नाग, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष और राक्षस ऋतु-क्रमसे भगवान् सूर्यके रथके साथ रहते हैं। यह रथ वासुकि नामक नागसे बँधा रहता है। किसी समय वासुकि नागका कंचुक (केंचुल) उतरकर गिर पड़ा। नागराज वासुकिके शरीरसे उत्पन्न उस निर्मौक (केंचुल)-को भगवान् सूर्यने सुवर्ण और
रत्नोंसे अलंकृतकर अपने मध्य भागमें धारण कर लिया। इसीलिये भगवान् सूर्यके भक्त अपने देवकी प्रसन्नताके लिये अव्यङ्ग धारण करते हैं। उसके धारण करनेसे भोजक पवित्र हो जाते हैं और उनपर सूर्यभगवान्का अनुग्रह भी होता है।
इस अव्यङ्गको सर्पके केंचुलकी तरह मध्यमें पोला अर्थात् खाली रखना चाहिये। यह एक वर्णका होना चाहिये। कपासके सूतसे बना अव्यङ्ग दो सौ अङ्गुलका उत्तम, एक सौ बीस अङ्गुलका मध्यम और एक सौ आठ अङ्गुलका
- अहैरङ्गात् समुत्पन्नो ह्यव्यङ्गस्तु ततः स्मृतः ॥ (ब्राह्मपर्व १४१।१५)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
कनिष्ठ होता है, अतः इससे छोटा नहीं होना चाहिये। यज्ञोपवीतकी तरह आठवें वर्षमें अव्यङ्ग धारण करना चाहिये। भोजकोंके लिये यह मुख्य संस्कार है। इसके धारण करनेसे वह सभी क्रियाओंका अधिकारी होता है। यह अव्यङ्ग सर्वदेवमय, सर्ववेदमय, सर्वलोकमय और सर्वभूतमय है। इसके मूलमें विष्णु, मध्यमें ब्रह्मा और अन्तमें शशाङ्कमौलि भगवान् शिव निवास करते हैं। इसी
तरह ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद क्रमशः मूल, मध्य और अग्रभागमें रहते हैं, अथर्ववेद ग्रन्थमें स्थित रहता है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश और भूलोक, भुवलोक तथा स्वलोक आदि सातों लोक अव्यङ्गमें निवास करते हैं। सूर्यभक्त भोजकको सभी समय अव्यङ्ग धारणकर भगवान् सूर्यकी उपासना करनी चाहिये।
(अध्याय १४२)
साम्बोपाख्यानमें भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करने और धूप दिखानेकी महिमा
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! इस प्रकार व्यासजीके द्वारा अव्यङ्गके विषयमें जानकारी प्राप्त कर साम्ब नारदजीके पास वापस लौट आये और उन्होंने उनसे सब वृत्तान्त बताकर पूछा—‘देवर्षि! भोजकोंको भगवान् सूर्यको स्नान, अर्घ्य, आचमन, धूप आदि किस प्रकार समर्पित करना चाहिये?’ इसका आप कृपाकर वर्णन करें।
नारदजी बोले—साम्ब! संक्षेपमें मैं वह विधि बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो। सर्वप्रथम शौचादिसे निवृत्त होकर आचमनपूर्वक नदीमें या जलाशय आदिमें स्नान करना चाहिये। अनन्तर स्वर्णदान कर तीन बार आचमन करे। शुद्ध वस्त्र पहनकर पवित्री धारणकर पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख हो आचमन करना चाहिये। तदनन्तर दो बार मार्जन और तीन बार अभ्युक्षण करे। आचमनके बिना की गयी क्रिया निष्फल होती है एवं इसके बिना पुरुष शुद्ध भी नहीं होता। वेदमें कहा गया है कि देवता पवित्रताको ही चाहते हैं। आचमन करनेके बाद मौन होकर देवालयमें जाना चाहिये। आसनपर बैठकर प्राणायाम कर सिरको कपड़ेसे आच्छादित करे तथा विविध पुष्पोंसे सूर्यभगवान्की पूजा करे। व्याहृतिपूर्वक गायत्री-मन्त्रसे गुगुलका धूप दे। फिर
भगवान् सूर्यके मस्तकपर पुष्पाञ्जलि अर्पित करे।
रक्त चन्दन, पद्म, करवीर, कुंकुम आदिको जलमें मिलाकर ताम्रके पात्रसे भगवान् सूर्यको अर्घ्य देना चाहिये। अर्घ्यपात्रको हाथमें उठाकर भगवान् सूर्यका आवाहन करे तथा दोनों जानुओंपर बैठकर भगवान् सूर्यका अपने हृदयमें ध्यान करते हुए नीचे लिखे मन्त्रसे अर्घ्य प्रदान करे—
एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां देव गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥
तदनन्तर इस प्रकार प्रार्थना करे— अर्चितस्तव्यं यथाशक्त्या मया भक्त्या विभावसो। ऐहिकामुष्मिकीं नाथ कार्यसिद्धिं ददस्व मे॥
(ब्राह्मपर्व १४३।४७)
तीनों काल स्नानकर इस प्रकार जो भगवान् सूर्यकी आराधना करता है और धूप देता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है और उसे धन, पुत्र तथा आरोग्यकी भी प्राप्ति हो जाती है एवं अन्तमें वह भगवान् सूर्यमें लीन हो जाता है। उत्तम पुष्पोंके न मिलनेपर पत्रोंसे ही पूजन करे। धूप ही दे या भक्तिपूर्वक जल ही सूर्यको समर्पित करे। यदि यह भी न हो सके तो प्रणाम ही करे। प्रणाम करनेमें असमर्थ हो तो मानसी पूजा करे।
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- ब्राह्मपर्व *
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यह विधि द्रव्यके अभावमें करनी चाहिये, द्रव्य रहनेपर विधिपूर्वक सभी सामग्रियोंसे पूजन करे। भक्तिपूर्वक सूर्यभगवान्की पूजा देखनेवालेको भी
अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है और सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। धूप-दानके समय सूर्यका दर्शन करनेपर उत्तम गति प्राप्त होती है। (अध्याय १४३)
सूर्यमण्डलस्थ पुरुषका वर्णन
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! एक बार व्यासजी शङ्खु-चक्र-गदाधारी नारायण भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनके लिये द्वारका आये। महातेजस्वी श्रीकृष्णने पाद्य, अर्घ्य, आचमन आदिसे उनका पूजन कर आसनपर उन्हें बैठाया और प्रणाम कर सम्बद्धारा लाये गये भोजकोंकी महिमा तथा उनकी सूर्यभक्तिके विषयमें जिज्ञासा प्रकट की।
भगवान् वेदव्यास बोले—भोजक भगवान् सूर्यके अनन्य उपासक हैं और अन्तमें ये भगवान् सूर्यकी दिव्य तेजस्वी कलामें प्रविष्ट होते हैं। भगवान् भास्करकी तीन कलाएँ हैं। सूर्यनारायणकी प्रथम कला अग्निमें स्थित है, उससे सभी कर्मोंकी सिद्धि होती है। दूसरी प्रकाशिका कला आकाशमें स्थित है। तीसरी कला सूर्यमण्डलमें है। सवितादेवका यह मण्डल अजर एवं अव्यय है। इस मण्डलके मध्यमें सदसदात्मक वह परमात्मा पुरुषरूपमें स्थित है। वह पुरुष क्षर-अक्षररूपमें है, इसको महासूर्य कहते हैं। इसके निष्कल और सकल दो
भेद हैं। तत्त्वोंके साथ सभी भूतोंमें अवस्थित वह परमात्मा सकल कहा जाता है और तत्त्वहीन होनेपर निष्कल। तृण, गुल्म, लता, वृक्ष, सिंह, वृक, हाथी, पक्षी, देवता, सिद्ध, मनुष्य, जल-जन्तु आदि सभीकी अन्तरात्मामें वह व्याप्त है। जब वह परमात्मा दूसरी कलामें स्थित होता है, तब वृष्टि आदि करता है। तीसरी तैजस कलामें स्थित होकर अपने भक्तोंको मोक्ष देता है, जिस मोक्षपदको प्राप्तकर वह परम शान्ति प्राप्त करता है।
वह परमात्मा ओंकारस्वरूप है, ओंकारकी साढ़े तीन मात्राएँ हैं, इनमें अर्धमात्रा मकारका जो ध्यान करता है, उसको सदसदात्मक ज्ञान होता है। सूर्यनारायणका रूप मकार है, मकारका ध्यान करनेसे ही ये मग कहे जाते हैं। धूप, माल्य आदिसे सूर्यनारायणका पूजन कर वे विविध पदार्थोंका भोजन कराते हैं, अतः उनकी भोजक संज्ञा है। (अध्याय १४४)
भगवान् व्यासद्वारा योग-ज्ञानका वर्णन
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महामुने! कृपाकर आप भोजकोंके सभी ज्ञानोंकी उपलब्धिका वर्णन करें।
व्यासजीने कहा—यह शरीर अस्थियोंपर ही खड़ा है, स्नायुओंसे बँधा, चमड़ेसे ढका एवं रक्त-मांससे उपलिस है। मल-मूत्र आदि दुर्गन्धयुक्त पदार्थोंसे
भरा है। यह समस्त रोगोंका घर है और इसमें (भीतर) वृद्धावस्था और शोक छिपे हैं, जो अपने-अपने समयपर प्रकट होते रहते हैं। यह शरीर रजोगुण आदि गुणोंसे भरा है, अनित्य है और इसमें भूतसंघोंका आवास बना है। अतः इसमें आसक्तिका सर्वथा परित्याग कर देना चाहिये*।
- अस्थिस्थूलं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् । चर्मावनद्धं दुर्गन्धिपूर्णं मूत्रपुरीषयोः ॥ जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम् । रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत् ॥ (ब्राह्मपर्व १४५। २-३)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वृक्षोंके नीचे निवास करना, भोजनके लिये मिट्टीका भिक्षापत्र रखना, साधारण वस्त्र पहनना और किसीसे सहायता न लेना तथा सभी प्राणियोंमें समभाव रखना—यही जीवनमुक्त पुरुषके लक्षण हैं।
जैसे तिलमें तैल, गायमें दूध, काष्ठमें अग्नि स्थित है, वैसे ही परमात्मा समस्त प्राणियोंमें स्थित है। ऐसा समझकर उनकी प्रासिका उपाय करना चाहिये। प्रथम प्रमथन स्वभाववाले तथा चञ्चल मनको प्रयत्नपूर्वक वशमें कर बुद्धि और इन्द्रियोंको वैसे ही रोकना चाहिये, जैसे पिंजरेमें पक्षियोंको रोका जाता है। इन संयत इन्द्रियोंके द्वारा इस शरीरको अमृतकी धाराके समान तृप्ति होती है१। प्राणायामसे शारीरिक दोष, धारणासे पूर्वजन्माजित तथा वर्तमानतकके सभी पाप, प्रत्याहारसे संसर्गजनित दोष एवं ध्यानसे जैविक दोषोंका त्यागकर ईश्वरीय गुणोंको प्राप्त करना चाहिये। जैसे आगके तापमें रखनेसे धातुओंके दोष दग्ध हो जाते हैं, वैसे ही प्राणायामके द्वारा साधकके इन्द्रियजनित दोष दग्ध हो जाते हैं। जैसे एक हाथसे दूसरे हाथको दबाया जाता है, वैसे ही अपनी शुद्ध बुद्धिके द्वारा मनको एवं चित्तको शुद्ध कर पवित्र भावनाओंके द्वारा दुर्व्यसनोंको शान्तकर मन-बुद्धिको अत्यन्त पवित्र
कर लेना चाहिये। अतः चित्तकी शुद्धिके लिये प्रयास करना चाहिये। चित्तकी शुद्धि होनेसे शुभ और अशुभ कर्मोंका ज्ञान होता है। शुभ और अशुभ कर्मोंसे छुटकारा प्राप्त कर साधक निर्द्वन्द्व, निर्मम, निष्परिग्रह और निरहंकार होकर मोक्षको प्राप्त कर लेता है२।
सूर्यका पूर्वाह्नमें रक्तवर्ण, ऋग्वेदस्वरूप तथा राजसरूप होता है। मध्याह्नमें शुक्लवर्ण, यजुर्वेदस्वरूप एवं सात्त्विक रूप होता है। सायंकालमें कृष्णवर्ण, सामवेदस्वरूप तथा तामसरूप होता है। इन तीनोंसे भिन्न ज्योतिःस्वरूप, सूक्ष्म और निरञ्जनस्वरूप चतुर्थ स्वरूप है। पद्मासनमें बैठकर सुषुम्णा नाडी-मार्गमें चित्तको स्थिर कर प्रणवसे पूरक, कुम्भक और रेचकरूप प्राणायाम कर पैके अँगूठेके अग्रभागसे लेकर मस्तकपर्यन्त न्यास करे। नाभिमें अग्रिका, हृदयमें चन्द्रमाका और मस्तकमें अग्रिशिखाका न्यास करना चाहिये। इन सबसे ऊपर सूर्यमण्डलका न्यास करे—यह चतुर्थ स्थान है, इस स्थानको मोक्षकी इच्छा करनेवाले पुरुषको अवश्य जानना चाहिये। ऋषिगण-सूर्यभगवान्के इसी तृतीय स्थानमें मनको लीनकर मुक्त हो जाते हैं। मग भी इसी स्थानका ध्यान कर मोक्षके भागी होते हैं। इस ज्ञानको सुनाकर भगवान् वेदव्यास बदरिकाश्रमकी ओर चले गये। (अध्याय १४५)
१-तिले तैलं गवि शौरं काष्ठे पावकसंततिः। उपायं चिन्तयेदस्य धिया धीरः समाहितः॥
प्रमाथि च प्रयत्नेन मनः संयम्य चञ्चलम्। बुद्धीन्द्रियाणि संयम्य शकुनानिव पंजरे॥ (ब्राह्मपर्व १४५।५-६)
२-इन्द्रियैर्नियतैर्दृष्टिर्धाराभिरिव तृष्यते। सततममृतस्यैव जनार्दन महामते॥
प्राणायामैर्दहदोषान् धारणाभिश्च किल्विषम्। प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान्॥
ध्यायमानस्य दह्यन्ते चान्ते दोषा यथाग्निना। तथेन्द्रियकृता दोषा दह्यन्ते प्राणनिग्रहात्॥
चित्तं चित्तेन संशोध्य भावं भावेन शोधयेत्। मनस्तु मनसा शोध्य बुद्धिं बुद्ध्या तु शोधयेत्॥
चित्तस्यातिप्रसादेन भाति कर्म शुभाशुभम्।
शुभाशुभविनिर्मुक्तो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः। निर्ममो निरहंकारस्ततो याति परां गतिम्॥
(ब्राह्मपर्व १४५।७-११)
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* ब्राह्मपर्व * । १७१
उत्तम एवं अधम भोजकोंके लक्षण
राजा शतानीकने पूछा—मुने! भगवान् सूर्यकी पूजा करनेवाले भोजक दिव्य, उनसे उत्पन्न एवं उन्हें अत्यन्त प्रिय हैं। इसलिये वे पूज्य हुए किंतु वे अभोज्य कैसे कहलाते हैं, इस विषयमें आप बतलायें ?
सुमन्तु मुनिने कहा—राजन् ! मैं इस विषयमें भगवान् वासुदेव तथा कृतवर्माके द्वारा हुए संवादको अत्यन्त संक्षेपमें बतला रहा हूँ। किसी समय नारद और पर्वत—ये दोनों मुनि साम्बपुर गये। वहाँ उन्होंने भोजकोंके यहाँ भोजन किया, अनन्तर वे दोनों विमानपर आरूढ़ हो द्वारकापुरीमें आ गये। उनके विषयमें कृतवर्माको शंका हुई कि सूर्यके पूजक होनेसे भोजकोंका अन्न अग्राह्य है, फिर नारद तथा पर्वत—इन दोनोंने उनका अन्न कैसे ग्रहण किया? इसपर वासुदेवने कृतवर्मासे कहा—जो भोजक अव्यङ्ग धारण नहीं करते और बिना अव्यङ्गके तथा बिना स्नान किये भगवान् सूर्यकी पूजा करते हैं और शूद्रका अन्न ग्रहण करते हैं तथा देवार्चाका परित्याग कर कृषि-कार्य करते हैं, जिनके जातकर्मार्दि संस्कार नहीं हुए हैं, शङ्ख धारण नहीं करते, मुण्डित नहीं रहते—वे भोजकोंमें अधम हैं। ऐसे भोजकद्वारा किये गये देवार्चन, हवन, स्नान, तर्पण, दान तथा ब्राह्मण-भोजन आदि सत्कर्म भी निष्फल होते हैं। इसीसे अशुचि होनेके कारण वे अभोज्य कहे गये हैं। भगवान् सूर्यके नैवेद्य, निर्माल्य, कुंकुम आदि शूद्रोंके हाथ बेचनेवाले, भगवान् सूर्यके धनको अपहृत करनेवाले भोजक उन्हें प्रिय नहीं हैं तथा वे भोजकोंमें अधम हैं। जो भोजक भगवान्को भोग लगाये बिना भोजन कर लेते हैं, उनका वह भोजन उन्हें नरक प्राप्त करानेवाला बन जाता है। अतः भगवान् सूर्यको अर्पण करके ही नैवेद्य भक्षण करना चाहिये, इससे शरीरकी शुद्धि होती है।
वासुदेवने पुनः बतलाया—कृतवर्मन् ! भोजकोंकी प्रियताके विषयमें भगवान् सूर्यने अरुणको जो बतलाया, उसे आप सुनें—
जो भोजक पर-स्त्री तथा पर-धनका हरण करते हैं, देवताओं तथा वेदोंके निन्दक हैं, वे मुझे अप्रिय हैं, उनके द्वारा की गयी पूजा तथा प्रदान किये गये अर्घ्यको मैं ग्रहण नहीं करता। जो भगवती महाश्वेताका यजन नहीं करते एवं सूर्य-मुद्राओंको नहीं जानते तथा मेरे पार्षदोंका नाम नहीं जानते, वे मेरी पूजा करनेके अधिकारी नहीं हैं और न मेरे प्रिय हैं।
इसके विपरीत देव, द्विज, मनुष्य, पितरोंकी पूजा करनेवाले, मुण्डित सिरवाले, अव्यङ्ग धारण करनेवाले, शङ्ख-ध्वनि करनेवाले, क्रोधरहित, तीनों कालमें स्नान एवं पूजन करनेवाले भोजक मुझे अत्यन्त प्रिय हैं एवं मेरे पूजनके अधिकारी हैं। जो रविवारके दिन षष्ठी तिथि पड़नेपर नक्तव्रत तथा सप्तमी एवं संक्रान्तिमें उपवास करते हैं एवं मुझमें विशेष भक्ति रखते हुए मेरे भक्त ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं तथा देव, ऋषि, पितर, अतिथि और भूत-यज्ञ—इन पाँचोंका अनुष्ठान करते हैं, एकभुक्त होकर सूर्यपूजा करते हैं तथा सांवत्सरिक, पार्वण, एकोद्दिष्ट आदि श्राद्ध सम्पन्न करते हैं और उन तिथियोंमें दान देते हैं, वे भोजक मुझे अत्यन्त प्रिय हैं तथा जो भोजक माघ मासकी सप्तमीको करवीर-पुष्प, रक्त चन्दन, मोदकका नैवेद्य, गुग्गुल, धूप, दूध, शङ्खादि वाद्य-ध्वनि, पताका तथा छत्रादिसे मेरी पूजा करते हैं, घृतकी आहुति देकर हवन
१७२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
करते हैं तथा पुराणवाचक ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं, वे मुझे प्रिय हैं। इतना कहकर भगवान् सूर्यदेव सुमेरु गिरिकी ओर बढ़ गये।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! अधिक कहनेसे क्या लाभ, क्योंकि जैसे वेदसे श्रेष्ठ अन्य कोई शास्त्र नहीं, गङ्गाके समान कोई नदी नहीं,
अश्वमेधके समान कोई यज्ञ नहीं, पुत्र-प्राप्तिके समान कोई सुख नहीं, माताके समान कोई आश्रय नहीं और भगवान् सूर्यके समान कोई देवता नहीं, वैसे ही भोजकोंके समान भगवान् सूर्यके अन्य कोई प्रिय नहीं हैं।
(अध्याय १४६-१४७)
भगवान् सूर्यके कालात्मक चक्रका वर्णन
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! एक बार महातेजस्वी साम्बने अपने पिता भगवान् श्रीकृष्णके हाथमें ज्वाला-मालाओंसे प्रदीप्त सुदर्शनचक्रको देखकर पूछा—‘देव! आपके हाथमें जो यह सूर्यके समान चक्र दिखलायी दे रहा है, यह आपको कैसे प्राप्त हुआ तथा भगवान् सूर्यके चक्रको कमलकी उपमा कैसे दी गयी है? इसे आप बतायें।’
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाबाहो! तुमने अच्छी बात पूछी है, इसे मैं संक्षेपमें बतला रहा हूँ। मैंने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक दिव्य हजार वर्षोंतक भगवान् सूर्यकी आराधना कर इस चक्रको प्राप्त किया है। भगवान् भास्कर आकाशमें विचरण करते रहते हैं, जिनके रथ-चक्रके नाभिमण्डलमें चन्द्र आदि ग्रह अवस्थित हैं। अरोंमें द्वादश आदित्य बतलाये गये हैं, पृथ्वी आदि तत्त्व मार्गमें पड़नेवाले तत्त्व हैं, इन तत्त्वोंसे यह कालात्मक चक्र व्याप्त है। भगवान् सूर्यने अपने इस चक्रके समान ही दूसरा चक्र मुझे प्रदान किया है।
इस कमलरूप चक्रके षड्दल ही छः ऋतुएँ हैं। कमलके मध्यमें जो पुरुष अधिष्ठित हैं, वे ही भगवान् सूर्य हैं। जो भूत, भविष्य तथा वर्तमान तीन काल कहे गये हैं, वे चक्रकी तीन नाभिओं
हैं। बारह महीने अरे तथा पक्ष परिधियाँ हैं, नेमियाँ दक्षिणायन तथा उत्तरायण दो अयन हैं, नक्षत्र, ग्रह तथा योग आदि भी इसी चक्रमें अवस्थित हैं। स्थूल और सूक्ष्मके भेदसे यह चक्र सर्वत्र व्याप्त है।
दुष्टोंका दमन करनेके लिये मैंने इस चक्रको आराधनाके द्वारा भगवान् सूर्यसे प्राप्त किया है। इसलिये ग्रहों और तत्त्वोंसे समन्वित इस चक्रकी मैं निरन्तर पूजा करता रहता हूँ। जो चक्रमें स्थित भगवान् सूर्यकी भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह तेजमें भगवान् सूर्यके समान हो जाता है। सप्तमीको जो भगवान् सूर्यका चक्र अङ्कित कर उनकी रक्तचन्दन, करवीर-पुष्प, कुंकुम, रक्त कमल, धूप, दीप, नैवेद्य चामर, छत्र एवं फल आदिसे पूजा करता है तथा विविध नैवेद्योंका भोग लगाता है, पुण्य कथाओंका श्रवण करता है, वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार जो संक्रान्ति तथा ग्रहण आदिमें चक्रकी पूजा करता है, उसके ऊपर सभी ग्रह प्रसन्न हो जाते हैं, वह सम्पूर्ण रोगों और दुःखोंसे रहित हो जाता है तथा समस्त ऐश्वर्योंसे युक्त होकर चिरजीवी होता है। (अध्याय १४८)
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- ब्राह्मपर्व *
१७३
सूर्यचक्रका निर्माण और सूर्य-दीक्षाकी विधि
साम्बने पूछा— भगवन्! भगवान् सूर्यके चक्रका और उसमें स्थित पद्मका कितने विस्तारमें किस प्रकार निर्माण करना चाहिये तथा नेमि, अर और नाभिका विभाग किस प्रकार करना चाहिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—साम्ब! चक्र चौंसठ अङ्गुलका और नेमि आठ अङ्गुलकी बनानी चाहिये। नाभिका विस्तार भी आठ अङ्गुलका होना चाहिये और पद्म नाभिका तीन गुना अर्थात् चौबीस अङ्गुलका होना चाहिये। कमलमें नाभि, कर्णिका और केसर भी बनाने चाहिये। नाभिसे कमलकी ऊँचाई अधिक होनी चाहिये। वहीँपर द्वारके कोणमें कमल-पुष्पके मुखकी कल्पना करनी चाहिये। ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्रके लिये चार द्वारोंकी कल्पना करनी चाहिये। द्वारोंको बनानेके पश्चात् ब्रह्मा आदि देवताओंका उनके नाम-मन्त्रोंसे भक्तिपूर्वक आवाहन कर पूजन करना चाहिये।
अर्क-मण्डलकी पूजाके लिये इस यज्ञ-क्रियाके अनुरूप दीक्षित होना चाहिये, भगवान् सूर्यने इसे मुझसे पूर्वकालमें कहा था।
साम्बने पूछा— भगवन्! सूर्यचक्र-यज्ञके लिये देवताओंने किन मन्त्रोंको कहा है? तथा यज्ञके स्वरूप और क्रमको भी आप बतानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—सौम्य! सूर्यनारायणके चक्रमें कमल बनाकर पूर्वकी भाँति हृदयमें स्थित भगवान् सूर्यका 'खखोलक' नामसे कमलकी कर्णिका-दलोंमें नाममन्त्रपूर्वक चतुर्थ्यन्त विभक्ति और क्रिया लगाते हुए 'नमः' लगाकर अङ्गन्यास एवं हृदयादि न्यास तथा पूजन करना चाहिये। हवन करते समय नामके अन्तमें 'स्वाहा' शब्दका प्रयोग करना चाहिये। यथा—'ॐ खखोलकाय स्वाहा।' 'ॐ खखोलकाय विबहे दिवाकराय धीमहि।
तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्॥' इन चौबीस अक्षरोंवाली सूर्यगायत्रीका जप सभी कर्मोंमें करना चाहिये, अन्यथा कर्मोंका फल प्राप्त नहीं होता। यह सूर्यगायत्री ब्रह्मगोत्रवाली सर्वतत्त्वमयी तथा परम पवित्र है एवं भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय है, इसलिये प्रयत्नपूर्वक मन्त्रके ज्ञान और कर्मकी विधिको जानना चाहिये। इससे अभीष्ट मनोरथ सिद्ध होता है।
साम्बने पूछा— भगवन्! आदित्य-मण्डलमें किसकी, किस कार्यके लिये और कैसी दीक्षा होनी चाहिये? इसे बतायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और कुलीन शूद्र, पुरुष अथवा स्त्री भी सूर्य-मण्डलमें दीक्षाके अधिकारी हैं। सूर्यशास्त्रके जाननेवाले सत्यवादी, शुचि, वेदवेत्ता ब्राह्मणको गुरु बनाना चाहिये और भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम करना चाहिये। षष्ठी तिथिमें पूर्वोक्त विधिके अनुसार अग्नि-स्थापन कर विधिपूर्वक सूर्य तथा अग्निकी पूजा करके हवन करना चाहिये। तदनन्तर गुरु पवित्र शिष्यको कुशों और अक्षतोंके द्वारा उसके प्रत्येक अङ्गमें सूर्यकी भावना कर उसका स्पर्श करे। शिष्य वस्त्रादिसे अलंकृत होकर पुष्प, अक्षत, गन्ध आदिसे भगवान् सूर्यकी पूजा करे तथा बलि भी दे। आदित्य, वरुण, अग्नि आदिका अपने हृदयमें ध्यान करे। घी, गुड़, दधि, दूध, चावल आदि रखकर तीन बार जलसे अग्निको सिंचितकर अग्निमें पुनः हवन करे। उसके बाद गुरु शिष्टाचारस्वरूप शिष्यको दातून दे। वह दातून दूधवाले वृक्षका हो और उसकी लम्बाई बारह अङ्गुल होनी चाहिये। दातून करनेके पश्चात् उसे पूर्व-दिशामें फेंक देना चाहिये, उस दिशामें देखे नहीं। पूर्व, पश्चिम और ईशान कोणकी ओर मुख
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
करके दातून करना शुभ होता है और अन्य दिशाओंमें दातून करना अशुभ माना गया है।
निन्दित दिशामें दन्तधावनसे जो दोष लगता है, उसकी शान्तिके लिये पूजन-अर्चन करना चाहिये। पुनः गुरु शिष्यके अङ्गोंका स्पर्श करे। सूर्यगायत्रीका जपपूर्वक उसके आँखोंका स्पर्श करे। इन्द्रियसंयमके लिये शिष्यसे संकल्प कराये। तदनन्तर आशीर्वाद देकर उसे शयन करनेकी आज्ञा दे। दूसरे दिन आचमनकर सूर्यको प्रातःकाल नमस्कारकर अग्नि-स्थापन करे और हवन करे। स्वप्नमें कोई शुभ संवाद सुने अथवा दिनमें यदि कोई अशुभ लक्षण दिखायी पड़े तो सूर्यनारायणको एक सौ आहुति दे। स्वप्नमें यदि देवमन्दिर, अग्नि, नदी, सुन्दर उद्यान, उपवन, पत्र, पुष्प, फल, कमल, चाँदी आदि और वेदवेत्ता ब्राह्मण, शौर्यसम्पन्न राजा, धनाढ्य क्षत्रिय, सेवामें संलग्न कुलीन शूद्र, तत्त्वको जाननेवाला, सुन्दर भाषण देनेवाला अथवा उत्तम वाहनपर सवार, वस्त्र, रत्न आदिकी प्राप्ति, वाहन, गाय, धान्य आदि उपकरण अथवा समृद्धिकी प्राप्ति आदि स्वप्नमें दिखायी दे तो उस स्वप्नको शुभ मानना चाहिये। शुभ कर्म दिखायी पड़े तो सब कार्य शुभ ही होते हैं। अनिष्टकारक स्वप्न दिखायी
पड़नेपर सप्तमीको सूर्यचक्र लिखकर सूर्यदेवकी पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मणों तथा गुरुको संतुष्ट करना चाहिये। आदित्यमण्डल पवित्र और सभीको मुक्ति प्रदान करनेवाला है। इसलिये अपने मनमें ही आदित्यमण्डलका ध्यान कर एक सौ आहुति देनी चाहिये। इस क्रमसे दीक्षा-विधि और मन्त्रका अनुसरण करते हुए आदित्यमण्डलपर पुष्पाञ्जलि प्रदान करे। इससे व्यक्तिके कुलका उद्धार हो जाता है। सूर्यप्रोक्त पुराणादिका श्रवण करना चाहिये। पूजनके बाद विसर्जन करे। सूर्यका दर्शन करनेके पश्चात् ही भोजन करना चाहिये। प्रतिमाकी छायाका और न ही ग्रह-नक्षत्र-योग और तिथिका लङ्घन करना चाहिये। सूर्य अयन, ऋतु, पक्ष, दिन, काल, संवत्सर आदि सभीके अधिपति हैं और वे सभीके पूज्य तथा नमस्कार करने योग्य हैं। सूर्यकी स्तुति, वन्दना और पूजा सदा करनी चाहिये। मन, वाणी और कर्मसे देवताओंकी निन्दाका परित्याग करना चाहिये। हाथ-पाँव धोकर, सभी प्रकारके शोकको त्यागकर शुद्ध अन्तःकरणसे सूर्यको नमस्कार करना चाहिये। इस प्रकार संक्षेपसे मैंने सूर्य-दीक्षाकी विधिको कहा है, जो सुखभोग और मुक्तिको प्रदान करनेवाली है। (अध्याय १४९)
भगवान् आदित्यकी सत्तावरण-पूजन-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—वत्स! अब मैं दिवाकर भगवान् सूर्यनारायणकी पूजा-विधि बतलाता हूँ। एक वेदीपर अष्टदल-कमलयुक्त मण्डल बनाकर उसमें कालचक्रकी कल्पना करनी चाहिये। उसे बारह अरोंसे युक्त होना चाहिये। ये ही सर्वात्मा, सभी देवताओंमें श्रेष्ठ, उज्ज्वल किरणोंसे युक्त खखोल्लक नामक भगवान् सूर्यदेव हैं। इसमें हजार किरणोंसे युक्त चतुर्बाहु भगवान् सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। इनके पश्चिममें अरुण, दक्षिणमें निशुभा
देवी, दक्षिणमें ही रेवन्त तथा उत्तरमें पिंगलकी पूजा करनी चाहिये और वहीं संज्ञाकी भी पूजा करनी चाहिये। अग्निकोणमें लेखककी, नैऋत्यमें अश्विनीकुमारोंकी और वायव्यकोणमें वैवस्वत मनुकी तथा ईशानकोणमें लोकपावनी देवी यमुनाकी पूजा करनी चाहिये। द्वितीय आवरणमें पूर्वमें आकाशकी, दक्षिणमें देवीकी, पश्चिममें गरुडकी और उत्तरमें नागराज ऐरावतकी पूजा शुभ होती है। अग्निकोणमें हेलि, नैऋत्यकोणमें प्रहेलि, वायव्यमें
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- ब्राह्मपर्व *
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उर्वशी और ईशानकोणमें विनतादेवीकी पूजा करनी चाहिये। तृतीयावरणमें पूर्वमें शुक्र, पश्चिममें शनि, उत्तरमें बृहस्पति, ईशानमें बुध और मण्डलके अग्रिकोणमें चन्द्रमाकी पूजा करनी चाहिये। नैऋत्यकोणमें राहु तथा वायव्यकोणमें केतुकी पूजा करनी चाहिये। चौथे आवरणमें लेखक, शाण्डिलीपुत्र, यम, विरूपाक्ष, वरुण, वायुपुत्र, ईशान तथा कुबेर आदिकी उन-उनकी दिशाओंमें पूजा करनी चाहिये। पाँचवें आवरणमें पूर्वादि क्रमसे महाश्वेता, श्री, ऋद्धि, विभूति, धृति, उन्नति, पृथ्वी तथा महाकीर्ति आदि देवियोंकी पूजा करनी चाहिये तथा इन्द्र, विष्णु, अर्यमा, भग, पर्जन्य,
विवस्वान्, अर्क, त्वष्टा आदि द्वादश आदित्योंकी पूजा छठे आवरणमें करनी चाहिये। सिर, नेत्र, अस्त्र-शस्त्रसे युक्त रथसहित सूर्यकी सातवें आवरणमें पूजा करनी चाहिये। यक्ष, गन्धर्व, मासाधिपति तथा संवत्सर आदिकी भी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद भगवान् भास्करका पुष्प, गन्ध आदिसे विधिपूर्वक पूजन कर—‘ॐ खखोल्लाक्य नमः’ इस मूल मन्त्रसे अपने अङ्गोंका स्पर्श अर्थात् हृदयादिन्यास करते हुए पूजन करना चाहिये। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इस विधिसे सूर्यकी नित्य अथवा दोनों पक्षोंकी ससमीके दिन पूजन करता है, वह परमपदको प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १५०)
सौरधर्मका वर्णन
राजा शतानीकने पूछा—मुने! भगवान् सूर्यका माहात्म्य कीर्तिवर्धक और सभी पापोंका नाशक है। मैंने भगवान् सूर्यनारायणके समान लोकमें किसी अन्य देवताको नहीं देखा। जो भरण-पोषण और संहार भी करनेवाले हैं वे भगवान् सूर्य किस प्रकार प्रसन्न होते हैं, उस धर्मको आप अच्छी तरह जानते हैं। मैंने वैष्णव, शैव, पौराणिक आदि धर्मोंका श्रवण किया है। अब मैं सौरधर्मको जानना चाहता हूँ। इसे आप मुझे बतायें।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! अब आप सौरधर्मके विषयमें सुने।
यह सौरधर्म सभी धर्मोंमें श्रेष्ठ और उत्तम है। किसी समय स्वयं भगवान् सूर्यने अपने सारथि अरुणसे इसे कहा था। सौरधर्म अन्धकाररूपी दोषको दूरकर प्राणियोंको प्रकाशित करता है और यह संसारके लिये महान् कल्याणकारी है। जो व्यक्ति शान्तचित्त होकर सूर्यकी भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह सुख और धन-धान्यसे परिपूर्ण हो जाता है। प्रातः, मध्याह्न और सायं—त्रिकाल
अथवा एक ही समय सूर्यकी उपासना अवश्य करनी चाहिये। जो व्यक्ति सूर्यनारायणका भक्तिपूर्वक अर्चन, पूजन और स्मरण करता है, वह सात जन्मोंमें किये गये सभी प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो भगवान् सूर्यकी सदा स्तुति, प्रार्थना और आराधना करते हैं, वे प्राकृत मनुष्य न होकर देवस्वरूप ही हैं। षोडशाङ्ग-पूजन-विधिको स्वयं सूर्यनारायणने कहा है, वह इस प्रकार है—
प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करना चाहिये। जप, हवन, पूजन, अर्चनादि कर सूर्यको प्रणाम करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मण, गाय, पीपल आदिकी पूजा करनी चाहिये। भक्तिपूर्वक इतिहास-पुराणका श्रवण और ब्राह्मणोंको वेदाभ्यास करना चाहिये। सबसे प्रेम करना चाहिये। स्वयं पूजनकर लोगोंको पुराणादि ग्रन्थोंकी व्याख्या सुनानी चाहिये। मेरा नित्य-प्रति स्मरण करना चाहिये। इस प्रकारके उपचारोंसे जो अर्चन-पूजन-विधि बतायी गयी है, वह सभी प्रकारके लोगोंके लिये उत्तम है। जो कोई इस प्रकारसे भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करता है, वही
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मुनि, श्रीमान्, पण्डित और अच्छे कुलमें उत्पन्न है। जो कोई पत्र, पुष्प, फल, जल आदि जो भी उपलब्ध हो उससे मेरी पूजा करता है उसके लिये न मैं अदृश्य हूँ और न वह मेरे लिये अदृश्य है। मुझे जो व्यक्ति जिस भावनासे देखता है, मैं भी उसे उसी रूपमें दिखायी पड़ता हूँ। जहाँ मैं स्थित हूँ, वहीं मेरा भक्त भी स्थित होता है। जो मुझ सर्वव्यापीको सर्वत्र और सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित
देखता है, उसके लिये मैं उसके हृदयमें स्थित हूँ और वह मेरे हृदयमें स्थित है। सूर्यकी पूजा करनेवाला व्यक्ति बड़े-बड़े राजाओंपर विजय प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति मनसे मेरा निरन्तर ध्यान करता रहता है, उसकी चिन्ता मुझे बराबर बनी रहती है कि कहीं उसे कोई दुःख न होने पाये। मेरा भक्त मुझको अत्यन्त प्रिय है। मुझमें अनन्य निष्ठा ही सब धर्मोंका सार है। (अध्याय १५१)
ब्रह्मादि देवताओंद्वारा भगवान् सूर्यकी स्तुति एवं वर-प्राप्ति
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! भगवान् सूर्यकी भक्ति, पूजा और उनके लिये दान करना तथा हवन करना सबके वशकी बात नहीं है तथा उनकी भक्ति और ज्ञान एवं उसका अभ्यास करना भी अत्यन्त दुर्लभ है। फिर भी उनके पूजन-स्मरणसे इसे प्राप्त किया जा सकता है। सूर्य-मन्दिरमें सूर्यकी प्रदक्षिणा करनेसे वे सदा प्रसन्न रहते हैं। सूर्यचक्र बनाकर पूजन एवं सूर्यनारायणका स्तोत्र-पाठ करनेवाला व्यक्ति इच्छित फल एवं पुण्य तथा विषयोंका परित्याग कर भगवान् सूर्यमें अपने मनको लगा देनेवाला मनुष्य निभीक होकर उनकी निश्चल भक्ति प्राप्त कर लेता है।
राजा शतानीकने पूछा—द्विजश्रेष्ठ! मुझे भगवान् सूर्यकी पूजन-विधि सुननेकी बड़ी ही अभिलाषा है। मैं आपके ही मुखसे सुनना चाहता हूँ। कृपाकर कहिये कि सूर्यकी प्रतिमा स्थापित करनेसे कौन-सा पुण्य और फल प्राप्त होता है तथा सम्मार्जन करने और गन्ध आदिके लेपनसे किस पुण्यकी प्राप्ति होती है। आरती, नृत्य, मङ्गल-गीत आदि कृत्योंके करनेसे कौन-सा पुण्य प्राप्त होता है। अर्घ्यदान, जल एवं पञ्चामृत आदिसे स्नान, कुश, रक्त पुष्प, सुवर्ण, रत्न, गन्ध, चन्दन, कपूर आदिके द्वारा पूजन, गन्धादि-विलेपन, पुराण-श्रवण एवं
वाचन, अव्यङ्ग-दान और व्योमरूपमें भगवान् सूर्य तथा अरुणकी पूजा करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह बतलानेकी कृपा करें।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! प्रथम आप भगवान् सूर्यके महनीय तेजके विषयमें सुनें। कल्पके प्रारम्भमें ब्रह्मादि देवगण अहंकारके वशीभूत हो गये। तमरूपी मोहने उन्हें अपने वशमें कर लिया। उसी समय उनके अहंकारको दूर करनेके लिये एक महनीय तेज प्रकट हुआ, जिससे यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त हो गया। अन्धकार-नाशक तथा सौ योजना विस्तारयुक्त वह तेजःपुञ्ज आकाशमें भ्रमण कर रहा था। उसका प्रकाश पृथ्वीपर कमलकी कर्णिकाकी भाँति दिखलायी दे रहा था। यह देख ब्रह्मादि देवगण परस्पर इस प्रकार विचार करने लगे—हम लोगोंका तथा संसारका कल्याण करनेके लिये ही यह तेज प्रादुर्भूत हुआ है। यह तेज कहाँसे प्रादुर्भूत हुआ, इस विषयमें वे कुछ न जान सके और इस तेजने सभी देवगणोंको आश्चर्यचकित कर दिया। तेजाधिपति उन्हें दिखायी भी नहीं पड़े। ब्रह्मादि देवताओंने उनसे पूछा—देव! आप कौन हैं, कहाँ हैं, यह तेजकी कैसी शक्ति है? हम सभी लोग आपका दर्शन करना चाहते हैं। उनकी प्रार्थनासे प्रसन्न हो भगवान् सूर्यनारायण अपने विराट्-रूपमें प्रकट हो गये।
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| * ब्राह्मपर्व * | १७७ |
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उस महनीय तेजःस्वरूप भगवान् भास्करकी देवगण पृथक्-पृथक् वन्दना करने लगे।
ब्रह्माजीकी स्तुतिका भाव इस प्रकार है$^१$— हे देवदेवेश! आप सहस्रों किरणोंसे प्रकाशमान हैं। कोणवल्लभ! आप संसारके लिये दीपक हैं, आपको नमस्कार है। अन्तरिक्षमें स्थित होकर सम्पूर्ण विश्वको प्रकाशित करनेवाले भगवान् भास्कर, विष्णु, कालचक्र, अमित तेजस्वी, सोम, काल, इन्द्र, वसु, अग्नि, खग, लोकनाथ तथा एकचक्रवाले रथसे युक्त—ऐसे नामोंवाले आपको नमस्कार है। आप अमित तेजस्वी एवं संसारके कल्याण तथा मङ्गलकारक हैं, आपका सुन्दर रूप अन्धकारको नष्ट करनेवाला है, आप तेजकी निधि हैं, आपको नमस्कार है। आप धर्मादि चतुर्वर्गस्वरूप हैं तथा अमित तेजस्वी हैं, क्रोध-लोभसे रहित हैं, संसारकी स्थितिमें कारण हैं, आप शुभ एवं मङ्गलस्वरूप हैं तथा शुभ एवं मङ्गलके प्रदाता हैं, आप परम शान्तस्वरूप हैं तथा ब्राह्मण एवं ब्रह्मरूप हैं, ऐसे हे परब्रह्म परमात्मा जगत्पते! आप मेरे ऊपर प्रसन्न होइये, आपको नमस्कार है।
ब्रह्माजीके बाद शिवजीने महातेजस्वी सूर्यनारायणको प्रणामकर उनकी स्तुति की—
विश्वकी स्थितिके कारण-स्वरूप भगवान् सूर्यदेव! आपकी जय हो। अजेय, हंस, दिवाकर, महाबाहु, भूधर, गोचर, भाव, खग, लोकप्रदीप, जगत्पति, भानु, काल, अनन्त, संवत्सर तथा शुभानन! आपकी जय हो। कश्यपके आनन्दवर्धन, अदितिपुत्र, सप्ताश्ववाहन, सतेश, अन्धकारको दूर करनेवाले, ग्रहोंके स्वामी, कान्तीश, कालेश, शंकर, धर्मादि चतुर्वर्गके स्वामी! आपकी जय हो। वेदाङ्गरूप, ग्रहरूप, सत्यरूप, सुरूप, क्रोधादिके विनाशक, कल्माषपक्षिरूप तथा यतिरूप! आपकी जय हो। प्रभो! आप विश्वरूप, विश्वकर्मा, ओंकार, वषट्कार, स्वाहाकार तथा स्वधारूप हैं और आप ही अश्वमेधरूप, अग्नि एवं अर्यमारूप हैं, संसाररूपी सागरसे मोक्ष दिलानेवाले हे जगत्पते! मैं संसार-सागरमें डूब रहा हूँ, मुझे अपने हाथका अवलम्बन दीजिये, आपकी जय हो$^२$।
भगवान् विष्णुने सूर्यनारायणको श्रद्धा और
१-नमस्ते देवदेवेश सहस्रकिरणोज्ज्वल। लोकदीप नमस्तेऽस्तु नमस्ते कोणवल्लभ॥
भास्कराय नमो नित्यं खखोल्काय नमो नमः। विष्णवे कालचक्राय सोमायामिततेजसे॥
नमस्ते पञ्चकालाय इन्द्राय वसुरेतसे। खगाय लोकनाथाय एकचक्ररथाय च॥
जगद्धिताय देवाय शिवायामिततेजसे। तमोघ्नाय सुरूपाय तेजसां निधये नमः॥
अर्थाय कामरूपाय धर्मायामिततेजसे। मोक्षाय मोक्षरूपाय सूर्याय च नमो नमः॥
क्रोधलोभविहीनाय लोकानां स्थितिहेतवे। शुभाय शुभ्ररूपाय शुभदाय शुभात्मने॥
शान्ताय शान्तरूपाय शान्तयेऽस्मासु वै नमः। नमस्ते ब्रह्मरूपाय ब्राह्माणाय नमो नमः॥
ब्रह्मदेवाय ब्रह्मरूपाय ब्रह्मणे परमात्मने। ब्रह्मणे च प्रसादं वै कुरु देव जगत्पते॥ (ब्राह्मपर्व १५३।५०-५७)
२-जय भाव जयाजेय जय हंस दिवाकर। जय शम्भो महाबाहो खग गोचर भूधर॥
जय लोकप्रदीपाय जय भानो जगत्पते। जय कालजयानन्त संवत्सर शुभानन॥
जय देवादितेः पुत्र कश्यपानन्दवर्धन। तमोघ्न जय सतेश जय सप्ताश्ववाहन॥
ग्रहेश जय कान्तीश जय कालेश शङ्कर। अर्थकामेश धर्मेश जय मोक्षेश शर्मद॥
जय वेदाङ्गरूपाय ग्रहरूपाय वै नमः। सत्याय सत्यरूपाय सुरूपाय शुभाय च॥
क्रोधलोभविनाशाय कामनाशाय वै जय। कल्माषपक्षिरूपाय यतिरूपाय शम्भवे॥
विश्वाय विश्वरूपाय विश्वकर्मार्य वै जय। जयोंकार वषट्कार स्वाहाकार स्वधामय॥
जयाश्वमेधरूपाय चाग्निरूपार्यमाय च। संसारार्णवपीताय मोक्षद्वारप्रदाय च॥
संसारार्णवमग्नस्य मम देव जगत्पते। हस्तावलम्बनो देव भव त्वं गोपतेऽद्धुत॥ (ब्राह्मपर्व १५३।६०-६८)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
भक्तिपूर्वक प्रणाम कर उनकी स्तुति की, भाव इस प्रकार है—
भूतभावन देवदेवेश! आप दिवाकर, रवि, भानु, मार्तण्ड, भास्कर, भग, इन्द्र, विष्णु, हरि, हंस, अर्क—इन रूपोंमें प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्कार है। लोकगुरो! आप विभु, त्रिनेत्रधारी, त्र्यक्षराम्भक, त्र्यङ्गात्मक, त्रिमूर्ति, त्रिगति हैं, आप छः मुख, चौबीस पाद तथा बारह हाथवाले हैं, आप समस्त लोकों तथा प्राणियोंके अधिपति हैं, देवताओं तथा वणोंके भी आप ही अधिपति हैं, आपको नमस्कार है। जगत्स्वामिन्! आप ही ब्रह्मा, रुद्र, प्रजापति, सोम, आदित्य, ओंकार, बृहस्पति, बुध, शुक्र, अग्नि, भग, वरुण, कश्यपात्मज हैं। आपसे ही यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है, देवता, असुर तथा मानव आदि सभी आपसे ही उत्पन्न हैं, अनघ! कल्पके आरम्भमें संसारकी उत्पत्ति, पालन एवं संहारके लिये ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव उत्पन्न हुए हैं, आपको नमस्कार है। प्रभो! आप ही वेदरूप, दिवसस्वरूप, यज्ञ एवं ज्ञानरूप हैं। किरणोज्ज्वल! भूतेश! गोपते! संसारमें निमग्न हुए हमपर आप प्रसन्न होइये, आप वेदान्त एवं यज्ञ-कलात्मक रूप हैं, आपकी जय हो, आपको नित्य नमस्कार है *।
ब्रह्मादि देवताओंकी स्तुतिसे भगवान् सूर्य बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु
तथा महादेवको अपनी अखण्ड भक्ति तथा अपना अनुग्रह प्राप्त करनेका वर प्रदान करते हुए कहा— हे विष्णो! आप देव, दानव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व आदि सभीपर विजय प्राप्त कर अजेय रहेंगे। सम्पूर्ण संसारका पालन करते हुए आपकी मेरे ऊपर अचल भक्ति बनी रहेगी। ब्रह्मा भी इस जगत्की सृष्टि करनेमें समर्थ होंगे और मेरे प्रसादसे शंकर भी इस संसारका संहार कर सकेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है। मेरी पूजाके फलस्वरूप आपलोग ज्ञानियोंमें उत्कृष्ट स्थान प्राप्त कर लेंगे।
भगवान् सूर्यके इन वचनोंको सुनकर महादेवजी बोले—भगवन्! हमलोग आपकी आराधना किस प्रकार करें, उसे आप बतायें। हमें आपकी परम पूजनीय मूर्ति तो दिखायी नहीं दे रही है, केवल प्रकाशकी आकृति और मात्र तेज ही दिखायी पड़ रहा है, यह तेज आकारविहीन होनेके कारण हृदयमें स्थान नहीं पा रहा है। जबतक मन किसी विषय-वस्तुमें नहीं लगता, तबतक किसी भी व्यक्तिकी भक्ति या इच्छा उस विषय-वस्तुको प्राप्त करनेकी नहीं होती। जबतक भक्ति उत्पन्न नहीं होगी, तबतक पूजन आदि करनेमें कोई भी समर्थ नहीं होगा। इसलिये आप साकाररूपमें प्रकट हों, जिससे कि हमलोग उस साकाररूपका पूजन-अर्चन कर सिद्धिको प्राप्त करनेमें समर्थ हो जायें।
- नमामि देवदेवेशं भूतभावनमव्ययम् । दिवाकरं रविं भानुं मार्तण्डं भास्करं भगम् ॥ इन्द्रं विष्णुं हरिं हंसमर्कं लोकगुरुं विभुम् । त्रिनेत्रं त्र्यक्षं त्र्यङ्गं त्रिमूर्तिं त्रिगतिं शुभम् ॥ षण्मुखाय नमो नित्यं त्रिनेत्राय नमो नमः । चतुर्विंशतिपादाय नमो द्वादशपाणये ॥ नमस्ते भूतपतये लोकानां पतये नमः । देवानां पतये नित्यं वणानां पतये नमः ॥ त्वं ब्रह्मा त्वं जगन्नाथो रुद्रस्त्वं च प्रजापतिः । त्वं सोमस्त्वं तथादित्यस्त्वमोकारक एव हि ॥ बृहस्पतिर्बुधस्त्वं हि त्वं शुक्रस्त्वं विभावसुः । यमस्त्वं वरुणस्त्वं हि नमस्ते कश्यपात्मज ॥ त्वया तत्तमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् । त्वत्त एव समुत्पन्नं सदेवासुरमानुषम् ॥ ब्रह्मा चार्ह च रुद्रश्च समुत्पन्नो जगत्पते । कल्पादी तु पुरा देव स्थितये जगतोऽनघ ॥ नमस्ते वेदरूपाय अहोरूपाय वै नमः । नमस्ते ज्ञानरूपाय यज्ञाय च नमो नमः ॥ प्रसीदास्मासु देवेश भूतेश किरणोज्ज्वल । संसाराण्यवमग्नानां प्रसादं कुरु गोपते । वेदान्ताय नमो नित्यं नमो यज्ञकलाय च ॥
(ब्राह्मपर्व १५३।७१-८०)
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- ब्राह्मपर्व *
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भगवान् सूर्यने कहा—महादेवजी! आपने बड़ी अच्छी बात पूछी है—आप दत्तचित्त होकर सुनें। इस जगत्में मेरी चार प्रकारकी मूर्तियाँ हैं जो सम्पूर्ण संसारको व्यवस्थित करती हुई सृजन, पालन, पोषण तथा संहार आदिमें प्रत्येक समय संलग्न रहती हैं। मेरी प्रथम मूर्ति राजसी मूर्ति है, जो ब्राह्मी शक्तिके नामसे प्रसिद्ध है, वह कल्पके आदिमें संसारकी सृष्टि करती है। द्वितीय सात्त्विकी मूर्ति विष्णुस्वरूपिणी है, जो संसारका पालन और दुष्टोंका विनाश करती है। तृतीय मूर्ति तामसी है, जो भगवान् शंकरके नामसे विख्यात है, वह हाथमें त्रिशूल धारण किये कल्पके अन्तमें विश्व-सृष्टिका संहार करती है। मेरी चतुर्थ मूर्ति सत्त्वादि गुणोंसे अतीत तथा उत्तम है, वह स्थित रहते हुए भी दिखायी नहीं पड़ती। उस अदृश्य शक्तिके द्वारा यह समस्त संसार विस्तारको प्राप्त हुआ है। ओंकार ही मेरा स्वरूप है। यह सकल तथा निष्कल और साकार एवं निराकार दोनों रूपोंमें है। यह सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त रहते हुए भी सांसारिक कर्म-फलोंसे लिस नहीं रहती, जलमें पद्मपत्रकी भाँति अलिस रहती है। यह प्रकाश आपलोगोंके अज्ञानको दूर करने तथा संसारमें प्रकाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है। आपलोग मेरे इस अस्पृष्ट (निलिस) रूपकी आराधना करें।
कल्पके अन्तमें मेरे आकाशरूपमें सभी देवताओंका लय हो जाता है। उस समय केवल आकाशरूप ही रहता है। पुनः मुझसे ही ब्रह्मादि देवगण तथा चराचर उत्पन्न होते हैं। हे त्रिलोचन! मैं सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त हूँ। इसलिये
मेरे व्योमरूपकी आराधना आपसहित ब्रह्मा, विष्णु भी करें। त्रिलोचन! आप गन्धमादनपर दिव्य सहस्र वर्षांतक तपस्या करके परम शुभ षडङ्ग-सिद्धिको प्राप्त करें। जनार्दन! आप मेरे व्योमरूपकी श्रद्धा और भक्तिपूर्वक आराधना कलापग्राममें निवास कर करें। जगत्पति ब्रह्मा भी अन्तरिक्षमें जाकर लोकपावन पुष्करतीर्थमें मेरी आराधना करें। इस प्रकार आराधना करनेके पश्चात् कदम्बके समान गोलाकार, रश्ममालासे युक्त मेरी मूर्तिके आपलोग दर्शन करेंगे।
इस प्रकार सूर्यनारायणके वचनको सुनकर भगवान् विष्णुने उन्हें प्रणाम कर कहा—देव! हम सभी लोग उत्तम सिद्धि प्राप्त करनेके लिये आपके परम तेजस्वी व्योमरूपका पूजन-अर्चन कर किस विधिसे आराधना करें। परमपूजित! कृपया आप उस विधिको बतलाकर मुझसहित ब्रह्मा और शिवपर दया कीजिये, जिससे हमलोगोंको परम सिद्धि प्राप्त होनेमें कोई विघ्न-बाधा न पहुँच सके।
भगवान् सूर्य बोले—देवताओंमें श्रेष्ठ वासुदेव! आप शान्तचित्त होकर सुनिये। आपका प्रश्न उचित ही है। मेरे अनुपम व्योमरूपकी आपलोग आराधना करें। मेरी पूजा मध्याह्नकालमें भक्तिपूर्वक सदैव करनेसे इच्छित भक्तिकी प्राप्ति हो जाती है। भगवान् सूर्यके इस वाक्यको सुनकर ब्रह्मादि देवताओंने प्रणामकर कहा—‘देव! आप धन्य हैं, हमलोगोंको आपने अपने तेजसे प्रकाशित किया है, हमलोग कृतकृत्य हो गये। आपके दर्शनमात्रसे ही सभी लोगोंको ज्ञान प्राप्त हुआ है तथा तम, मोह, तन्त्रा आदि सभी क्षणमात्रमें ही दूर हो गये हैं। हमलोग
१-अन्य पुराणों तथा सांख्य, वेदान्त आदि दर्शनोंके अनुसार आकाशका मनस्तत्त्वमें, मनका अहंतत्त्वमें और अहंका महतत्त्वमें, महतत्त्वका अव्यक्त-तत्त्वमें और अव्यक्तका सत्-तत्त्वमें लय होता है, जो संकल्प-विकल्पमें शून्य होता है और पुनः सृष्टिके समय सत्-तत्त्वमें कलनाके साथ अव्यक्त, महत्, मन, अहंकारके बाद आकाशकी उत्पत्ति होती है।
२-योगवासिष्ठमें सबको व्योमके ही अन्तर्गत स्थित मानकर हृद-व्योम-उपासना (दहर-उपासना)-का निर्देश है और ब्रह्मसूत्रके ‘आकाशस्तल्लिङ्गात्’ इस सूत्रमें आकाश शब्दका अर्थ परमात्मा माना गया है।
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