भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ
  • प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड *

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पश्चिममें सिन्धुदेश, वायव्य दिशामें कैक्यदेश, उत्तरमें मद्रदेश और ईशानमें कुलिन्द देश हैं। इस प्रकार आर्यदेशका उन्होंने भेद किया। इस देशका नामकरण महात्मा मागधके पुत्रने किया था। अनन्तर राजाने यज्ञके द्वारा बलरामजीको प्रसन्न किया, इसके फलस्वरूप बलभद्रके अंशसे शिशुनागका जन्म हुआ, उसने सौ वर्षतक राज्य किया। उसे काकवर्मा नामका पुत्र हुआ, उसने नब्बे वर्षतक राज्य किया। उसे क्षेमधर्मा नामका पुत्र हुआ, उसने अस्सी वर्ष राज्य किया। उसका पुत्र क्षेत्रौजा हुआ, उसने सत्तर वर्षतक राज्य किया। उसके वेदमिश्र नामक पुत्र हुआ, उसने साठ वर्षतक शासन किया। उसे अजातरिपु (अजातशत्रु) नामक पुत्र हुआ, उसने पचास वर्षतक राज्य किया। उसका पुत्र दर्भक हुआ, उसने चालीस वर्षतक राज्य किया। उसे उदयाश्र१ नामका पुत्र हुआ, उसने तीस वर्षतक शासन किया। उसका पुत्र नन्दवर्धन हुआ, उसने बीस वर्षतक शासन किया। नन्दवर्धनका पुत्र नन्द हुआ, उसने पिताके तुल्य वर्षांतक राज्य किया। नन्दके प्रनन्द हुआ, जिसने दस वर्ष राज्य किया। उससे परानन्द हुआ, उसने अपने पिताके तुल्य वर्षांतक ही राज्य किया। उससे समानन्द हुआ, उसने बीस वर्ष राज्य किया। उससे प्रियानन्द हुआ, उसने भी पिताके समान वर्षांतक राज्य किया। उसका पुत्र देवानन्द हुआ, उसने भी पिताके समान राज्य किया। देवानन्दका पुत्र यज्ञभंग हुआ, उसने अपने पिताके आधे वर्षांतक (दस वर्ष) राज्य किया। उसका पुत्र

मौर्यानन्द और उसका पुत्र महानन्द हुआ। दोनोंने अपने-अपने पिताके समान वर्षांतक राज्य किया।

इसी समय कलिनै हरिका स्मरण किया। अनन्तर प्रसिद्ध गौतम नामक देवताकी काश्यपसे उत्पत्ति हुई। उसने बौद्धधर्मको संस्कृतकर पट्टण नगर (कपिलवस्तु)-में प्रचार किया और दस वर्षतक राज्य किया१। उससे शक्यमुनिका जन्म हुआ, उसने भी बीस वर्षतक राज्य किया। उससे शुद्धोदन नामक पुत्र हुआ, उसने तीस वर्षतक शासन किया। उससे शक्यसिंहका जन्म हुआ। कलियुगके दो हजार वर्ष व्यतीत हो जानेके बाद शताद्विमें उसने शासन किया। कलिके प्रथम चरणमें वेदमार्गको उसने विनष्ट कर दिया और साठ वर्षतक उसने राज्य किया। उस समय प्रायः सभी बौद्ध हो गये। विष्णुस्वरूप उसके राजा होनेपर जैसा राजा था, वैसी ही प्रजा हो गयी, क्योंकि विष्णुकी शक्तिके अनुसार ही जगत्में धर्मकी प्रवृत्ति होती है। जो मनुष्य मायापति हरिकी शरणमें जाते हैं, वे उनकी कृपाके प्रभावसे मोक्षके भागी हो जाते हैं। शक्यसिंहका पुत्र बुद्धसिंह हुआ, उसने तीस वर्ष राज्य किया। उसका पुत्र (शिष्य) चन्द्रगुप्त२ हुआ, जिसने पारसीदेशके राजा सुलूब (सेल्युकस)-की पुत्रीके साथ विवाह कर यवन-सम्बन्धी बौद्धधर्मका प्रचार किया। उसने साठ वर्षतक शासन किया। चन्द्रगुप्तका पुत्र बिन्दुसार (बिम्बसार) हुआ। उसने भी पिताके समान राज्य किया। उसका पुत्र अशोक हुआ। उसी समय कान्यकुब्ज देशका एक ब्राह्मण आबू पर्वतपर

१-इसीने राजगृहसे हटाकर राजधानी गङ्गाके किनारे बसायी और उसका नाम पाटलिपुत्र या पटना पड़ा। इसके आगेके राजागण पटनासे ही भारतका शासन करते थे।

२-यहाँसे आगे अब लिच्छवि राज्यवंशका वर्णन है, जिसकी राजधानी कपिलवस्तु थी।

३-अब यहाँ फिर पाटलिपुत्रके राजवंशका वर्णन प्रारम्भ हुआ और यह चन्द्रगुप्त ही मौर्यवंशका पहला राजा था। जिसने भारतके साथ अन्य देशोंपर अधिकार किया था, जिन्हें बादमें अशोकने बौद्ध देश बना डाला। उन दिनों वे सभी देश भारतके ही उपनिवेश थे। जिसका यहाँ आगे वर्णन है। चन्द्रगुप्तने ही सेल्युकसकी पुत्रीसे शादी की थी।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

चला गया और वहाँ उसने विधिपूर्वक ब्रह्महोत्र सम्पन्न किया। वेदमन्त्रोंके प्रभावसे यज्ञकुण्डसे चार क्षत्रियोंकी उत्पत्ति हुई—प्रमर—परमार (सामवेदी), चपहानि—चौहान (कृष्णयजुर्वेदी), त्रिवेदी—गहरवार (शुक्ल यजुर्वेदी) और परिहारक (अथर्ववेदी) क्षत्रिय थे। वे सब ऐरावत-कुलमें

उत्पन्न गजोंपर आरूढ़ होते थे। इन लोगोंने अशोकके वंशजोंको अपने अधीन कर भारतवर्षके सभी बौद्धोंको नष्ट कर दिया।

अवन्तमें प्रमर—परमार राजा हुआ। उसने चार योजन विस्तृत अम्बावती नामक पुरीमें स्थित होकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया। (अध्याय ६)

महाराज विक्रमादित्यके चरित्रका उपक्रम

सूतजी बोले—शौनक! चित्रकूट पर्वतके आस-पासके क्षेत्र (प्रायः आजके पूरे बुन्देलखण्ड एवं बघेलखण्ड)—में परिहार नामका एक राजा हुआ। उसने रमणीय कलिंगर नगरमें रहकर अपने पराक्रमसे बौद्धोंको परास्त कर पूरी प्रतिष्ठा प्राप्त की। राजपूतानेके क्षेत्र (दिल्ली नगर)—में चपहानि—चौहान नामक राजा हुआ। उसने अति सुन्दर अजमेर नगरमें रहकर सुखपूर्वक राज्य किया। उसके राज्यमें चारों वर्ण स्थित थे। आनर्त (गुजरात)—देशमें शुक्ल नामक राजा हुआ, उसने द्वारकाको राजधानी बनाया।

शौनकजीने कहा—हे महाभाग! अब आप अग्रिवंशी राजाओंका वर्णन करें।

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! इस समय मैं योगनिद्राके वशमें हो गया हूँ। अब आपलोग भी भगवान्का ध्यान करें। अब मैं थोड़ा विश्राम करूँगा। यह सुनकर मुनिगण भगवान् विष्णुके ध्यानमें लीन हो गये। लम्बे अन्तरालके बाद ध्यानसे उठकर सूतजी पुनः बोले—महामुने! कलियुगके सैतीस सौ दस वर्ष व्यतीत होनेपर प्रमर नामक राजाने राज्य करना प्रारम्भ किया। उन्हें महामद (मुहम्मद) नामक पुत्र हुआ, जिसने पिताके शासन-कालके आधे समयतक राज्य किया। उसे देवापि नामक

पुत्र हुआ, उसने भी पिताके ही तुल्य वर्षांतक राज्य किया। उसे देवदूत नामक पुत्र हुआ, उसके गन्धर्वसेन नामक पुत्र हुआ, जिसने पचास वर्षांतक राज्य किया। वह अपने पुत्र शङ्खुका अभिषेक कर वन चला गया। शङ्खुने तीस वर्षांतक राज्यभार सँभाला। उसी समय देवराज इन्द्रने वीरमती नामक एक देवाङ्गनाको पृथ्वीपर भेजा। शङ्खुने वीरमतीसे गन्धर्वसेन नामक पुत्ररत्नको प्राप्त किया। पुत्रके जन्म-समयमें आकाशसे पुष्पवृष्टि हुई और देवताओंने दुंदुभी बजायी। सुखप्रद शीतल-मन्द वायु बहने लगी। इसी समय अपने शिष्योंसहित शिवदृष्टि नामके एक ब्राह्मण तपस्याके लिये वनमें गये और शिवकी आराधनासे वे शिवस्वरूप हो गये।

तीन हजार वर्ष पूर्ण होनेपर जब कलियुगका आगमन हुआ, तब शकोंके विनाश और आर्यधर्मकी अभिवृद्धिके लिये वे ही शिवदृष्टि गृह्यकोंकी निवासभूमि कैलाससे भगवान् शंकरकी आज्ञा पाकर पृथ्वीपर विक्रमादित्य नामसे प्रसिद्ध हुए। वे अपने माता-पिताको आनन्द देनेवाले थे। वे बचपनसे ही महान् बुद्धिमान् थे। बुद्धिविशारद विक्रमादित्य पाँच वर्षकी ही बाल्यावस्थामें तप करने वनमें चले गये। बारह वर्षांतक प्रयत्नपूर्वक तपस्या कर वे ऐश्वर्य-सम्पन्न हो गये। उन्होंने

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  • प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड *

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अम्बावती नामक दिव्य नगरीमें आकर बत्तीस मूर्तियोंसे समन्वित, भगवान् शिवद्वारा अभिरक्षित रमणीय और दिव्य सिंहासनको सुशोभित किया। भगवती पार्वतीके द्वारा प्रेषित एक वैताल उनकी रक्षामें सदा तत्पर रहता था। उस वीर राजाने महाकालेश्वरमें जाकर देवाधिदेव महादेवकी पूजा की और अनेक व्यूहोंसे परिपूर्ण धर्म-सभाका निर्माण किया। जिसमें विविध मणियोंसे विभूषित अनेक धातुओंके स्तम्भ थे। शौनकजी! उसने अनेक लताओंसे पूर्ण, पुष्पान्वित स्थानपर अपने

दिव्य सिंहासनको स्थापित किया। उसने वेद-वेदाङ्ग-पारंगत मुख्य ब्राह्मणोंको बुलाकर विधिवत् उनकी पूजाकर उनसे अनेक धर्म-गाथाएँ सुनीं। इसी समय वैताल नामक देवता ब्राह्मणका रूप धारण कर 'आपकी जय हो', इस प्रकार कहता हुआ वहाँ आया और उनका अभिवादन कर आसनपर बैठ गया। उस वैतालने राजासे कहा— 'राजन्! यदि आपको सुननेकी इच्छा हो तो मैं आपको इतिहाससे परिपूर्ण एक रोचक आख्यान सुनाता हूँ*' इसे आप सुनें। (अध्याय ७)

॥ प्रतिसर्गपर्व, प्रथम खण्ड सम्पूर्ण ॥

  • भारतवर्षमें विक्रमादित्य अत्यन्त प्रसिद्ध दानी, परोपकारी और सर्वार्ज्ञ-सदाचारी राजा हुए हैं। स्कन्द आदि पुराणों, बृहत्कथा और द्वात्रिंशत्पुत्तलिका, सिंहासनबत्तीसी, कथासरित्सागर, पुरुष-परीक्षा आदि ग्रन्थोंमें इनका चरित्र वर्णित है। अब इधर कैम्ब्रजके इतिहासके दूसरे भागमें इनका चरित्र आया है। वैसे स्मिथ और रिफिन्स्टन आदिने अनेक विक्रमादित्योंकी चर्चा की है, पर ये महाराज विक्रमादित्य उज्जयिनीके राजा थे और कालिदास, अमरसिंह, वराहमिहिर, वैद्यराज धन्वन्तरि, घटकर्पर आदि नवरत्न इनकी ही राजसभाकी दिव्य विद्वद्भिर्भूतियाँ थे। जिनकी आगे-पीछे कोई उपमा नहीं है। राजा भोजसे लेकर बादशाह अकबरतक सभीने अपनी सभाको वैसे ही नवरत्नोंसे अलंकृत करनेका प्रयत्न किया था।

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

प्रतिसर्गपर्व

(द्वितीय खण्ड)

स्वामी एवं सेवककी परस्पर भक्तिका आदर्श*

(राजा रूपसेन तथा वीरवरकी कथा)

सूतजी बोले—महामुने! एक बार रुद्रकिंकर वैतालने सर्वप्रथम भगवान् शंकरका ध्यान किया और फिर महाराज विक्रमादित्यसे इस प्रकार कहना प्रारम्भ किया—

राजन्! अब आप एक मनोहर कथा सुनें। प्राचीन कालमें सर्वसमृद्धिपूर्ण वर्धमान नामक नगरमें रूपसेन नामका एक धर्मात्मा राजा रहता था। उसकी पतिव्रता रानीका नाम विद्वन्माला था। एक दिन राजाके दरबारमें वीरवर नामका एक क्षत्रिय गुणी व्यक्ति अपनी पत्नी, कन्या एवं पुत्रके साथ वृत्तिके लिये उपस्थित हुआ। राजाने उसकी विनयपूर्ण बातोंको सुनकर प्रतिदिन एक सहस्र स्वर्णमुद्रा वेतन निर्धारित कर महलके सिंहद्वारपर रक्षकके रूपमें उसकी नियुक्ति कर ली। कुछ दिन बाद राजाने अपने गुप्तचरोंसे जब उसकी आर्थिक स्थितिका पता लगाया तो ज्ञात हुआ कि वह अपना अधिकांश द्रव्य यज्ञ, तीर्थ, शिव तथा विष्णुके मन्दिरोंमें आराधनादि कार्योंमें तथा साधु, ब्राह्मण एवं अनाथोंमें वितरित कर अत्यल्प शेषसे अपने परिजनोंका पालन करता है। इससे प्रसन्न होकर राजाने उसकी स्थायी नियुक्ति कर दी।

एक दिन जब आधी रातमें मूसलाधार वृष्टि, बादलोंकी गरज, बिजलीकी चमक एवं झंझावातसे रात्रिकी विभीषिका सीमा पार कर रही थी, उसी समय श्मशानसे किसी नारीकी करुणकन्दन-ध्वनि

राजाके कानोंमें पड़ी। राजाने सिंहद्वारपर उपस्थित वीरवरसे इस रुदन-ध्वनिका पता लगानेके लिये कहा। जब वीरवर तलवार लेकर चला, तब राजा भी उसके भयकी आशंका तथा उसके सहयोगके लिये एक तलवार लेकर गुप्त रूपसे स्वयं उसके पीछे लग गया। वीरवरने श्मशानमें पहुँचकर एक स्त्रीको वहाँ रोते देखा और उससे जब इसका कारण पूछा, तब उसने कहा कि 'मैं इस राज्यकी लक्ष्मी—राष्ट्रलक्ष्मी हूँ—इसी मासके अन्तमें राजा रूपसेनकी मृत्यु हो जायगी। राजाकी मृत्यु हो जानेपर मैं अनाथ होकर कहाँ जाऊँगी'—इसी चिन्तासे मैं रो रही हूँ।

स्वामिभक्त वीरवरने राजाके दीर्घायु होनेका उससे उपाय पूछा। इसपर वह देवी बोली—'यदि तुम अपने पुत्रकी बलि चण्डिकादेवीके सामने दे सको तो राजाके आयुकी रक्षा हो सकती है।' फिर क्या था, वीरवर उल्टे पाँव घर लौट आया और अपनी पत्नी, पुत्र तथा लड़कीको जगाकर उनकी सम्मति लेकर उनके साथ चण्डिकाके मन्दिरमें जा पहुँचा। राजा भी गुप्त रूपसे उसके पीछे-पीछे सर्वत्र चलता रहा। वीरवरने देवीकी प्रार्थना कर अपने स्वामीकी आयु बढ़ानेके लिये अपने पुत्रकी बलि चढ़ा दी। भाईका कटा सिर देखकर दुःखसे उसकी बहिनका हृदय विदीर्ण हो गया—वह मर गयी और इसी शोकमें उसकी

  • भारतवर्षमें प्राचीन कालसे 'वैताल-पञ्चविंशतिका' या 'वैतालपचीसी' की कथाएँ, जो विक्रम-वैताल-संवादके रूपमें लोकमें अत्यन्त प्रसिद्ध हैं, उनका मूल भविष्यपुराण ही प्रतीत होता है। ये कथाएँ स्त्री-पुरुषोंके अमर्यादित एवं अनैतिक आकर्षणसे समन्वित होते हुए भी लोक-व्यवहारकी दृष्टिसे शिक्षाप्रद भी हैं। अतः उनमेंसे कुछ कथाएँ यहाँ प्रस्तुत की जा रही हैं।

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  • प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *

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माता भी चल बसी। वीरवर इन तीनोंका दाह-संस्कार कर स्वयं भी राजाकी आयुकी वृद्धिके लिये बलि चढ़ गया।

राजा छिपकर यह सब देख रहा था। उसने देवीकी प्रार्थना कर अपने जीवनको व्यर्थ बताते हुए अपना सिर काटनेके लिये ज्यों ही तलवार खींची, त्यों ही देवीने प्रकट होकर उसका हाथ पकड़ लिया और बोली—‘राजन्! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारी आयु तो सुरक्षित हो ही गयी, अब तुम अपने इच्छानुसार वर माँग लो।’ राजाने देवीसे परिजनोसहित वीरवरको जिलानेकी प्रार्थना की। ‘तथास्तु’ कहकर देवी अन्तर्धान हो गयीं। राजा प्रसन्न होकर चुपके-से वहाँसे चलकर अपने महलमें आकर लेट गया। इधर वीरवर भी चकित होता हुआ और देवीकी कृपा मानता हुआ अपने पुनर्जीवित परिवारको घरपर छोड़कर राजप्रासादके सिंहद्वारपर आकर खड़ा हो गया।

अनन्तर राजाने वीरवरको बुलाकर रातमें रोनेवाली नारीके रुदनका कारण पूछा तो वीरवरने कहा—‘राजन्! वह तो कोई चुड़ैल थी, मुझे देखते ही वह अदृश्य हो गयी। चिन्ताकी कोई बात नहीं है।’ वीरवरकी स्वामिभक्ति और धीरताको

देखकर राजा रूपसेन अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने अपनी कन्याका विवाह वीरवरके पुत्रसे कर दिया तथा उसे अपना मित्र बना लिया। इतनी कथा कहकर वैताल शान्त हो गया। वैतालने राजा विक्रमसे फिर पूछा—‘राजन्! इस कथामें परस्पर सबने एक-दूसरेके लिये स्नेहवश अपने प्राणोंका उत्सर्ग किया, पर सबसे अधिक स्नेह और त्याग किसका था? यह आप बताइये।’

राजा बोले—यद्यपि सभीने अपने-अपने कर्तव्यका अद्भुत आदर्श उपस्थित किया, फिर भी राजाका स्नेह ही सबसे अधिक मान्य प्रतीत होता है, क्योंकि वीरवर राजसेवक था, उसे अपनी सेवाके प्रतिफलमें स्वर्णमुद्राएँ मिलती थीं, अतः उसने स्वर्णप्राप्तिकी दृष्टिसे अपना उत्सर्ग किया, वीरवरकी पत्नी पतिव्रता थी, धर्मस्नेही थी, इसलिये उसने अपने प्राणोंका उत्सर्ग कर दिया। बहिनका अपने भाईमें प्रेम था, पुत्रका अपने पितामें स्नेह था, यह तो स्वभाववश होता ही है, किंतु राजा रूपसेनने महान् स्नेहका आदर्श उपस्थित किया, जो कि वे एक सामान्य सेवकके लिये भी अपना प्राणोत्सर्ग करनेको उद्यत हो गये, अतः उन्हींका स्नेहमय त्याग महान् त्याग है।

ब्राह्मण-पुत्री महादेवीकी कथा

वैतालने कहा—राजन्! उज्जयिनी नामकी नगरीमें चन्द्रवंशमें उत्पन्न महाबल नामसे विख्यात अत्यन्त बुद्धिमान् तथा वेदादि-शास्त्रोंका ज्ञाता एक राजा निवास करता था। उसका स्वामिभक्त हरिदास नामका एक दूत था। हरिदासकी पत्नी भक्तिमाला साधु पुरुषोंकी सेवामें तत्पर रहती थी। भक्तिमालाको सभी विद्याओंमें पारंगत कमलके समान नेत्रवाली अत्यन्त रूपवती एक कन्या उत्पन्न हुई, उसका नाम था महादेवी। एक दिन महादेवीने अपने

पिता हरिदाससे कहा—‘तात! आप मुझे ऐसे योग्य पुरुषको दीजियेगा, जो गुणोंमें मुझसे भी अधिक हो, अन्य किसीको नहीं।’ अपनी पुत्रीकी बात सुनकर हरिदास बड़ा प्रसन्न हुआ और ‘ऐसा ही होगा’—कहकर हरिदास राजसभामें आया और उसने राजाका अभिनन्दन किया। तदनन्तर राजाने कहा—‘हरिदास! तुम मेरे ससुर तैलंग देशके राजा हरिश्रन्द्दके पास जाओ और उनका कुशल-समाचार जानकर शीघ्र ही मुझे

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

बताओ।' हरिदास आज्ञा पाकर राजा हरिश्चन्द्रके पास गया और उसने उन्हें अपने स्वामी महाबलका कुशल-समाचार बतलाया। सारा कुशल-समाचार जानकर राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने हरिदाससे पूछा—'प्रभो! आप विद्वान् हैं, मुझे यह बतायें कि कलिका आगमन हो गया, यह कैसे मालूम होगा?

हरिदासने कहा—राजन्! जब वेदोंकी मर्यादाएँ नष्ट हो जायँ और वेदोक्त धर्म विपरीत दिखलायी देने लगेँ, तब कलिका आगमन समझना चाहिये, साथ ही कलिके प्रिय म्लेच्छगण कहे गये हैं। अधर्म ही जिसका मित्र है, ऐसे कलिके द्वारा सभी देवताओंको अपमानित किया गया हो, तब कलिका आगमन समझना चाहिये। राजन्! पापकी स्त्रीका नाम है मृषा (असत्य), उसका पुत्र दुःख कहा गया है। दुःखकी स्त्री है दुर्गति, जो कलियुगमें घर-घरमें व्याप्त रहेगी। सभी राजा क्रोधके वशीभूत हो जायँगे तथा सभी ब्राह्मण कामके दास हो जायँगे। धनिक-वर्ग लोभके वशीभूत हो जायगा तथा शूद्रजन महत्त्वको प्राप्त करेंगे। स्त्रियाँ लज्जासे रहित होंगी और सेवक स्वामीके ही प्राण हरण करनेवाले होंगे। पृथ्वी निष्फल (सत्त्वशून्य) हो जायगी। ऐसी स्थितिमें समझना चाहिये कि कलिका आगमन हो गया है, किंतु कलियुगमें जो मनुष्य भगवान् श्रीहरिकी शरणमें जायँगे, वे ही आनन्दसे रह पायेंगे, अन्य कोई नहीं।

यह सुनकर राजा हरिश्चन्द्र बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उसे बहुत-सी दक्षिणा देकर बिदा किया तथा राजा महाबलको सम्पूर्ण समाचार देकर अपने महलमें चला आया और वह विप्र भी अपने शिविरमें आ गया। उसी समय एक बुद्धिकोविद नामक बुद्धिमान् ब्राह्मण वहाँ आया और उसने अपनी विशिष्ट विद्याओंका हरिदासके

सामने प्रदर्शन किया—उस ब्राह्मणने मन्त्र जपकर देवीकी आराधना की और एक महान् आश्चर्यजनक शीघ्रग नामक विमान प्रकटकर हरिदासको दिखलाया। उसकी विद्याओंसे मुग्ध होकर हरिदासने उसे अपनी कन्याके योग्य समझकर उसका वरण कर लिया।

हरिदासका पुत्र था मुकुन्द। वह विद्याध्ययनके लिये अपने गुरुके यहाँ गया था, जब वह अपने गुरुसे विद्याओंको पढ़ चुका तो गुरुदक्षिणाके लिये प्रार्थना करने लगा। गुरुने उससे कहा—'अरे मुकुन्द! सुनो, तुम गुरुदक्षिणाके रूपमें अपनी बहिन महादेवी मेरे दैवज्ञ पुत्र धीमान्को समर्पित कर दो।' 'ठीक है'—ऐसा कहकर मुकुन्द अपने घर आ गया।

इधर हरिदासकी पत्नी भक्तिमालाने द्रौणिशिष्य वामन नामक एक विप्रका जो शब्दवेधी बाण चलानेमें कुशल एवं शस्त्रविद्याका ज्ञाता था, उसकी विद्यासे प्रभावित होकर अपनी कन्याके लिये दक्षिणा, ताम्बूल आदिके द्वारा पूजित कर उसका वरण कर लिया।

समय आनेपर पिता, पुत्र तथा माताद्वारा वरण किये गये तीनों गुणवान् ब्राह्मण महादेवी नामवाली उस कन्याको प्राप्त करनेके लिये हरिदासके यहाँ आ पहुँचे। इसी बीच एक राक्षस अपनी मायासे उस कन्या महादेवीका हरण कर विन्ध्यपर्वतपर चला गया। यह समाचार जानकर ये तीनों कन्यार्थी दुःखी होकर रोने लगे। जब उनमेंसे गुरुपुत्र धीमान् नामक दैवज्ञ विद्वान् ब्राह्मणसे कन्याका पता पूछा गया तो उसने बतलाया कि वह कन्या विन्ध्यपर्वतपर राक्षसद्वारा हरण कर ले जायी गयी है। तदनन्तर उस कन्याकी प्राप्तिके लिये द्वितीय बुद्धिकोविद नाम ब्राह्मणने अपने द्वारा बनाये गये आकाशचारी विमानपर उन दोनों

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  • प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *

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विप्रोंको बैठाकर विन्ध्यपर्वतपर पहुँचाया। तब शब्दवेधी बाणोंको चलानेमें निपुण वामन नामक तीसरे ब्राह्मणने धनुषपर बाणका संधान किया और बाणसे उस राक्षसको मार डाला। वे तीनों कन्या महादेवीको प्राप्त कर उसी विमानमें बैठकर उज्जयिनीमें वापस लौट आये।

वहाँ पहुँचकर तीनों ब्राह्मण अपने-अपने कार्यका महत्त्व बताते हुए कन्याके वास्तविक अधिकारी होनेके लिये परस्परमें विवाद करने लगे, यह निर्णय नहीं हो सका कि कन्याका विवाह किसके साथ हो।

वैतालने राजा विक्रमसे पूछा—राजन्! आप

बतलायें कि इन तीनोंमें विवाहका अर्थात् कन्या प्राप्त करनेका अधिकारी कौन है?

राजा विक्रमादित्यने कहा—जिस विद्वान् गुरुके पुत्र ज्योतिषी ब्राह्मणने कन्याका यह पता बताया कि वह राक्षसद्वारा चुराकर विन्ध्यपर्वतपर पहुँचायी गयी है, वह ब्राह्मण कन्याके लिये पितृतुल्य है और जिस दूसरे ब्राह्मण बुद्धिकोविदने अपने मन्त्रबलद्वारा उत्पन्न विमानसे महादेवी नामकी कन्याको यहाँ पहुँचाया, वह भाईके समान है, किंतु जिस वामन नामक ब्राह्मण युवकने शब्दवेधी बाणोंसे राक्षसके साथ युद्ध कर उसे मार गिराया, वही वीर ब्राह्मण इस कन्याको प्राप्त करनेका योग्य अधिकारी है।

समान-वर्णमें विवाह-सम्बन्धका औचित्य

( त्रिलोकसुन्दरीकी कथा )

वैताल पुनः बोला—राजन्! अब मैं एक दूसरी कथा सुनाता हूँ। चम्पापुरी (भागलपुर) नामकी एक प्रसिद्ध नगरी थी, वहाँ चम्पकेश नामका एक बलवान् और धनुर्धारी राजा रहता था। उसकी रानीका नाम था सुलोचना। उसके त्रिलोकसुन्दरी नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई। उसका मुख चन्द्रमाके समान, भौँहें धनुषकी प्रत्यञ्जोके समान, नेत्र मृगके समान तथा शब्द कोकिलके समान थे। राजन्! उस बालासे देवता भी विवाह करना चाहते थे, अन्य मनुष्योंकी तो बात ही क्या? उसके स्वयंवरमें लोकविश्रुत सभी राजा तथा देवराज इन्द्र, वरुण, कुबेर, धर्मराज और यम आदि देवता भी मनुष्यका शरीर धारण करके आये। उनमेंसे इन्द्रदत्तने कन्याके पिता राजा चम्पकसे कहा—‘राजन्! मैं सभी शास्त्रोंमें कुशल हूँ, रूपवान् एवं मनोरम हूँ, अतः आप अपनी पुत्रीको मुझे समर्पित कर दें।’ दूसरे धर्मदत्तने कहा—‘राजन्! मैं धनुर्विद्यामें कुशल एवं मनोरम हूँ, आप अपनी

कन्या मुझे समर्पित करें।’ तीसरेने कहा—‘राजन्! मेरा नाम धनपाल है, मैं सभी प्राणियोंकी भाषा जानता हूँ, मैं गुणवान् और रूपवान् भी हूँ। आप अपनी कन्या मुझे समर्पित कर सुखी होइये।’ चौथेने कहा—‘राजन्! मैं सर्वकला-विशारद हूँ, प्रतिदिन अपने उद्योगसे पाँच रत्न प्राप्त करता हूँ, उनमेंसे पुण्यके लिये प्रथम रत्न, होमके लिये द्वितीय रत्न, आत्माके लिये तृतीय रत्न, पत्नीके लिये चतुर्थ रत्न तथा शेष अन्तिम रत्न भोजनके लिये व्यय करता हूँ। अतः आप अपनी कन्या मुझ सर्वकला-विशारदको प्रदान करें।’

यह सुनकर राजा आश्चर्यमें पड़ गया कि अपनी कन्या मैं किसे दूँ। वह कुछ निश्चय नहीं कर पाया। अन्तमें उसने सारी बातें कन्याको बतायीं और उससे पूछा कि तुम्हें इनमेंसे कौनसा वर अभीष्ट है, पर कन्या त्रिलोकसुन्दरीने लजावश कुछ भी उत्तर नहीं दिया।

वैतालने पूछा—राजन्! अब आप बतायें कि

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

उस कन्याके योग्य वर इनमेंसे कौन था ?

राजा बोला—रुद्रकिंकर! वह रूपवती कन्या त्रिलोकसुन्दरी धर्मदत्तके योग्य है; क्योंकि इन्द्रदत्त वेदादि शास्त्रोंका ज्ञाता है, अतः वर्णसे वह द्विज कहा जायगा। भाषा जाननेवाला तथा धन-धान्यका विस्तार करनेवाला धनपाल वणिक् कहा जायगा।

तृतीय जो कलाविद् है और रत्नोंका व्यापार करता है, वह शूद्र कहलायेगा। वैताल! सवर्णके लिये ही कन्या योग्य होती है, अतः धनुर्वेद-शास्त्रमें जो निपुण धर्मदत्त है, वह वर्णसे क्षत्रिय कहलायेगा, इसलिये उस क्षत्रिय कन्याका विवाह धर्मदत्तके साथ ही किया जाना चाहिये।

विषयी राजा राज्यके विनाशका कारण बनता है

(राजा धर्मवल्लभ और मन्त्री सत्यप्रकाशकी कथा)

वैतालने पुनः राजासे कहा—राजन्! प्राचीन कालमें रमणीय पुण्यपुर (पूना) नगरमें धर्मवल्लभ नामका एक राजा राज्य करता था। उसका मन्त्री सत्यप्रकाश था। मन्त्रीकी स्त्रीका नाम था लक्ष्मी। एक बार राजा धर्मवल्लभने मन्त्रीसे कहा—‘मन्त्रिवर! आनन्दके कितने भेद हैं? यह मुझे बताओ।’ उसने कहा—‘महाराज! आनन्द चार प्रकारके हैं—(१) ब्रह्मचर्याश्रमका आनन्द जो ब्रह्मानन्द है, वह श्रेष्ठ है। (२) गृहस्थाश्रमका विषयानन्द मध्यम है। (३) वानप्रस्थका धर्मानन्द सामान्य है और (४) संन्यासमें जो शिवानन्दकी प्राप्ति है, वह आनन्द उत्तमोत्तम है। राजन्! इनमें गृहस्थाश्रमका विषयानन्द स्त्री-प्रधान है, क्योंकि गृहस्थाश्रममें स्त्रीके बिना सुख नहीं मिलता।’

यह सुनकर राजा अपने अनुकूल धर्मपरायणा पत्नी प्राप्त करनेके लिये अन्य देशमें चला गया, किंतु उसे मनोऽनुकूल पत्नी नहीं प्राप्त हुई। तब उसने अपने मन्त्रीसे कहा—‘मेरे अनुरूप कोई स्त्री ढूँढ़ो।’ यह सुनकर मन्त्री विभिन्न देशोंमें गया। पर जब कहीं भी उसे राजाके योग्य स्त्री नहीं मिली तो वह सिन्धु देशमें आकर समुद्रकी

ओर बढ़ा। सभी तीर्थोंमें श्रेष्ठ सिन्धुको देखकर वह प्रसन्न हुआ। मन्त्री सत्यप्रकाशने समुद्रसे इस प्रकार प्रार्थना की—‘सभी रत्नोंके आलय, सिन्धुदेशके स्वामिन्! आपको नमस्कार है। शरणागतवत्सल! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, गङ्गा आदि नदियोंके स्वामी जलाधीश! आपको नमस्कार है। मेरे राजाके लिये आप उत्तम स्त्री-रत्न प्रदान करें। यदि ऐसा आप नहीं करेंगे तो मैं अपने प्राण यहीं दे दूँगा।’ नदीपति सागर यह स्तुति सुनकर प्रसन्न हो गये और उसे जलमें विदुमके पत्नोंवाले, मुक्तारूपी फलसे समन्वित एक वृक्षको दिखाया, जिसके ऊपर मनोरमा, सुकुमारी एक सुन्दरी कन्या स्थित थी। पर कुछ ही क्षणोंमें देखते-ही-देखते वह कन्या वृक्षसहित पुनः जलमें लीन हो गयी।

यह देखकर अतिशय आश्चर्यचकित होकर मन्त्री सत्यप्रकाश पुनः राजाके पास लौट आया और उसने सारी बातें राजाको सुनवाई। पुनः दोनों समुद्रके किनारे आये। राजाने भी मन्त्रीके समान ही कन्याको वृक्षपर बैठा देखा और राजाके देखते ही वह कन्या पूर्ववत् जलमें प्रविष्ट हो गयी। इस अद्भुत दृश्यको देखकर राजा भी समुद्रमें

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  • प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *

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प्रविष्ट हो गया तथा उसी कन्याके साथ पातालमें पहुँच गया और मन्त्री वापस लौट आया।

राजाने कहा—वरानने! मैं तुम्हारे लिये यहाँ आया हूँ। गान्धर्व विवाहसे मुझे प्राप्त करो। उसने हँसकर कहा—‘नृपश्रेष्ठ! जब कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तिथि आयेगी, तब मैं देवी-मन्दिरमें आकर तुम्हें मिलूँगी।’ राजा लौट आया और पुनः कृष्ण चतुर्दशीके दिन हाथमें तलवार लेकर देवीके मन्दिरमें गया। वह कन्या राजासे पूर्व ही मन्दिरमें पहुँच चुकी थी। उसी समय बकवाहन नामके एक राक्षसने आकर उस कन्याका स्पर्श किया। यह देखकर राजा क्रोधान्ध हो गया। उसने राक्षसका सिर तलवारसे काट दिया। पुनः उस कन्यासे कहा—‘भामिनि! तुम सत्य बताओ, यह कौन था और यहाँ कैसे आया?’ उसने कहा—‘राजन्! मैं विद्याधरकी कन्या हूँ। मेरा नाम मदवती है। मैं पिताजीकी प्रिय कन्या हूँ। एक बार मैं किसी समय वनमें गयी थी और भोजनके समय पिता-माताके पास घरमें नहीं पहुँच सकी थी। मेरे पिताजीने ध्यानके द्वारा सारा वृत्तान्त जान लिया, उन्होंने मुझे शाप दे दिया कि मदवती! कृष्ण चतुर्दशीको तुमको राक्षस ग्रहण करेगा।’ जब मुझे शापकी बात मालूम हुई, तब मैंने रोते हुए पिताजीसे पूछा—‘देव! मेरी इस शापसे मुक्ति कब होगी?’ उन्होंने कहा—‘पुत्री! जब कृष्ण चतुर्दशीको कोई राजा तुम्हारा वरण करेगा, तब तुम्हारे शापकी निवृत्ति हो जायगी।’

मदवतीने कहा—राजन्! आपके अनुग्रहसे आज

मैं शापसे मुक्त हो गयी हूँ। आपकी आज्ञा पाकर अब मैं अपने पिताके घर जाना चाहती हूँ। यह सुनकर राजाने कहा—‘तुम मेरे साथ मेरे घर चलो। इसके बाद मैं तुम्हें तुम्हारे पिताके पास ले चलूँगा।’ वह राजाकी बात मानकर राजाके महलमें आ गयी और राजासे उसका विवाह हो गया। उस राजाके नगरमें महान् उत्सव हुआ। मन्त्रीने देखा कि राजाके साथ एक दिव्य कन्या भी आयी है। कुछ दिनों बाद मन्त्री एकाएक मृत्युको प्राप्त हो गया।

वैतालने पूछा—राजन्! बताओ, उस मन्त्रीके मरनेमें क्या कारण है? क्या रहस्य है?

राजा विक्रमने कहा—मन्त्री सत्यप्रकाश राजाका मित्र और प्रजाका परम हितैषी था। उसके ही समुद्योगसे राजाको श्रेष्ठ मदवती नामकी विद्याधर-कन्या रानीके रूपमें प्राप्त हुई थी, किंतु मदवतीके साथ विवाहके बाद मन्त्री सत्यप्रकाशने देखा कि राजा मदवतीको पाकर विलासी होते जा रहे हैं और राज्य एवं प्रजाकी उपेक्षा करने लगे हैं। दिन-रात विषय-सुखमें ही लिस रहने लगे हैं। यह देखकर उसने समझ लिया कि अब शीघ्र ही इस राज्यका विनाश होनेवाला है; क्योंकि जब राजा विषयी एवं स्वार्थी बन जाता है, तब राज्यका नाश अवश्य होता है। ऐसी स्थितिमें मेरी मन्त्रणाएँ भी व्यर्थ सिद्ध होंगी, अतः राज्यके विनाशको मैं अपनी आँखोंसे न देख सकूँ, इसलिये पहले ही मैं अपने प्राणोंका उत्सर्ग कर देता हूँ। वैताल! यही समझकर मन्त्री सत्यप्रकाशने अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया।

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३०२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

किये गये कर्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ता है

(हरिस्वामीकी कथा)

वैतालने पुनः कहा—राजन्! चूड़ापुर नामक एक रमणीय नगरमें चूड़ामणि नामका एक राजा राज्य करता था। उसकी विशालाक्षी नामकी पतिव्रता पत्नी थी। रानीने पुत्रकी कामनासे भगवान् शंकरकी आराधना की। उनकी कृपासे उसे कामदेवके समान एक सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ, जो देवताओंके अंशसे सम्भूत था। उसका नाम रखा गया हरिस्वामी। सभी सम्पत्तियोंसे समन्वित वह हरिस्वामी पृथ्वीपर देवताके समान सुख भोगने लगा। देवलमुनिके शापसे एक देवाङ्गना मानुषीरूपमें रूपलावण्यका नामसे उत्पन्न होकर राजकुमार हरिस्वामीकी पत्नी हुई। एक समय वह सुन्दरी अपने प्रासादमें आनन्दपूर्वक शय्यापर शयन कर रही थी। उस समय सुकल नामका एक गन्धर्व आया और उसने प्रगाढ़ निद्रामें निमग्न उस रानीका अपहरण कर लिया। जब हरिस्वामी उठा, तब अपनी पत्नीको न देखकर उसे दूँदने लगा। उसके न मिलनेपर वह व्याकुल हो गया और नगर छोड़कर वनमें चला गया तथा सभी विषयोंका परित्याग कर एकमात्र भगवान् श्रीहरिके ध्यानमें लीन हो गया और भिक्षावृत्तिका आश्रय ग्रहण कर संन्यासी हो गया।

एक दिन वह संन्यासी (राजा हरिस्वामी) भिक्षा माँगनेके लिये एक ब्राह्मणके घर आया और ब्राह्मणने प्रसन्नतापूर्वक खीर बनाकर उसको दी। खीरका पात्र लेकर वह वहाँसे स्नान करने चला आया। खीरका पात्र उसने वटवृक्षपर रख दिया और स्वयं नदीमें स्नान करने लगा। उसी समय कहींसे एक सर्प आया और उसने उस खीरमें अपने मुँहसे विष उगल दिया। जब संन्यासी हरिस्वामी स्नानसे आकर खीर खाने लगा तो विषके प्रभावसे वह बेहोश

होने लगा और उस ब्राह्मणके पास आकर कहने लगा—‘अरे दुष्ट ब्राह्मण! तुम्हारे द्वारा दिये गये विषमय खीरको खाकर अब मैं मर रहा हूँ। इसलिये तुम्हें ब्रह्महत्याका पाप लेगेगा।’ यह कहकर वह संन्यासी मर गया और उसने अपनी तपस्याके प्रभावसे शिवलोकको प्राप्त किया।

वैतालने राजासे पूछा—राजन्! इनमें ब्रह्महत्याका पाप किसको लेगेगा? यह मुझे बताओ।

राजाने कहा—विषधर नागने अज्ञानवश स्वभावतः उस पायसको विषमय कर दिया, अतः ब्रह्महत्याका पाप उसे नहीं होगा।

चूँकि संन्यासी बुभुक्षित था और भिक्षा माँगने ब्राह्मणके घर आया था, ब्राह्मणके लिये वह अतिथि देवस्वरूप था। अतः अतिथिधर्मका पालन करना उसके कुल-धर्मके अनुकूल ही था। उसने श्रद्धासे खीर बनाकर संन्यासीको निवेदित किया; ऐसेमें वह कैसे ब्रह्महत्याका भागी बन सकता है? यदि वह विष मिलाकर अन्न देता, तभी ब्रह्महत्या उसे लगती, क्योंकि अतिथिका अपमान भी ब्रह्महत्याके समान ही है। अतः ब्राह्मणको ब्रह्महत्या नहीं लेगेगी। शेष बच गया वह संन्यासी। चूँकि अपने किये गये शुभाशुभ कर्मका फल अवश्य भोगना पड़ता है। अतः वह संन्यासी अपने किसी जन्मान्तरीय कर्मवश कालकी प्रेरणासे स्वतः ही मरा, उसकी मृत्यु स्वाभाविक रूपसे ही हुई। इसमें किसीका दोष नहीं। पायसका भोजन करना तो मरनेमें केवल निमित्तमात्र ही था। अतः उसे भी ब्रह्महत्या नहीं लेगेगी। इस प्रकार इन तीनोंमें किसीको भी ब्रह्महत्या नहीं लेगेगी।

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  • प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *

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जीवन-दानका आदर्श

(जीमूतवाहन और शङ्खुचूड़की कथा)

रुद्रकिंकर वैतालने राजा विक्रमादित्यसे कहा—महाराज! कान्यकुब्ज (कन्नौज)-में दानशील, सत्यवादी एवं देवी-पूजनमें तत्पर एक ब्राह्मण रहता था। वह प्रतिग्रहसे प्राप्त द्रव्यका दान कर देता था। एक बार शारदीय नवदुर्गाका व्रत आया। उसे दानमें कुछ भी द्रव्य प्राप्त नहीं हो सका, अतः वह बहुत चिन्तित हो गया, सोचने लगा, कौन-सा उपाय करूँ, जिससे मुझे द्रव्यकी प्राप्ति हो। मैंने दुर्गा-पूजामें कन्याओंको निमन्त्रित किया है, अब उन्हें कैसे भोजन कराऊँगा। वह इसी चिन्तामें निमग्न हो रहा था कि देवीकी कृपासे उसे अनायास पाँच मुद्राएँ प्राप्त हो गयीं और उसीसे उसने व्रत सम्पन्न किया। उसने नौ दिनोंतक निराहार व्रत किया था। उस व्रतके प्रभावसे मरकर उसने देवस्वरूपको प्राप्त किया। फलतः वह विद्याधरोंका स्वामी जीमूतकेतु हुआ। वह हिमालय पर्वतके रम्य स्थानमें रहता था। वहाँ वह भक्तिपूर्वक कल्पवृक्षकी पूजा भी करता था। उस वृक्षके प्रभावसे उसे सभी कलाओंमें कुशल जीमूतवाहन नामका एक पुत्र प्राप्त हुआ।

पूर्वजन्ममें वह जीमूतवाहन मध्यदेशका शूरसेन नामक राजा था। किसी समय वह राजा शूरसेन आखेटके लिये महर्षि वाल्मीकिकी निवासभूमि उत्पलावर्त नामक वनमें आया। वहाँ चैत्र शुक्ला नवमीको उसने विधिवत् रामजन्मका श्रीरामनवमी-उत्सव किया। उसने महर्षि वाल्मीकिकी कुटीमें रात्रि-जागरण भी किया। राममयी गाथाके श्रवणजन्म पुण्यके प्रभावसे वह शूरसेन राजा ही जीमूतकेतुके पुत्र-रूपमें जीमूतवाहन नामक विद्याधर हुआ।

उस महात्मा जीमूतवाहनने भी कल्पवृक्षकी श्रद्धापूर्वक पूजा की। एक वर्षके भीतर ही प्रसन्न

होकर उस वृक्षने उससे वर माँगनेको कहा। इसपर जीमूतवाहनने कहा—‘महावृक्ष! मेरा नगर आपकी कृपासे धन-धान्य-सम्पन्न हो जाय। कल्पवृक्षने नगरको पृथ्वीमें सर्वश्रेष्ठ कर दिया। वहाँ कोई भी ऐसा नहीं था जो कल्पवृक्षके प्रभावसे राजाके समान न हो गया हो। अनन्तर वे पिता और पुत्र दोनों तपस्याके लिये वनमें चले गये और अतिशय रमणीय मलयाचलपर कठोर तपस्या करने लगे।’

राजन्! एक दिन राजा मलयध्वजकी पुत्री कमलाक्षी शिवकी पूजाके लिये अपनी सखियोंके साथ शिव-मन्दिरमें आयी। उसी समय जीमूतवाहन भी पूजाके लिये मन्दिरमें पहुँचा। सभी अलंकारोंसे अलंकृत दिव्य राजकन्याको देखकर उसे प्राप्त करनेकी इच्छा जीमूतवाहनको जाग्रत् हुई तथा इसके लिये उसने प्रार्थना भी की। अन्तमें कन्याके पिता मलयध्वजने जीमूतवाहनसे उसका विवाह करा दिया।

राजा मलयध्वजका पुत्र विश्वावसु एक दिन अपने बहनोंई जीमूतवाहनके साथ गन्धमादन पर्वतपर गया। वहाँ उसने नर-नारायणको प्रणाम किया। उसी शिखरपर भगवान् विष्णुका वाहन गरुड आया। उस समय शङ्खुचूड़ नागकी माता, जहाँ जीमूतवाहन था वहाँ विलाप कर रही थी। स्त्रीके करुणक्रन्दनको सुनकर दीनवत्सल जीमूतवाहन दुःखी होकर शीघ्र ही वहाँ पहुँचा। वृद्धाको आश्वासन देकर उसने पूछा—‘तुम क्यों रो रही हो? तुम्हें क्या कष्ट है?’ वह बोली—‘देव! आज मेरा पुत्र गरुडका भक्ष्य बनेगा, उसके वियोगके कारण दुःखसे व्याकुल होकर मैं रो रही हूँ।’ यह सुनकर राजा जीमूतवाहन गरुड-शिखरपर गया। गरुड उसे अपना भक्ष्य समझकर पकड़कर आकाशमें ले गया। जीमूतवाहनकी

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३०४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

पत्नी कमलाक्षी आकाशमें गरुडके द्वारा भक्षण किये जाते हुए अपने पतिको देखकर दुःखसे रोने लगी। परंतु बिना कष्टके खाये जाते उस जीमूतवाहनको मानव-रूपमें देखकर गरुड डर गया और जीमूतवाहनसे कहने लगा—‘तुम मेरे भक्ष्य क्यों बन गये?’ इसपर उसने कहा—‘शङ्खचूड नागकी माता बड़ी दुःखी थी, उसके पुत्रकी रक्षाके लिये मैं तुम्हारे पास आया।’ जब यह घटना शङ्खचूड नागको मालूम हुई तो दुःखी होकर वह शीघ्र ही गरुडके पास आया और कहने लगा—‘कृपासागर! आपके भोजनके लिये मैं उपस्थित हूँ। महामते! इस दिव्य मनुष्यको छोड़कर मुझे अपना आहार बनाइये।’ जीमूतवाहनकी महानता और परोपकारकी भावना देखकर गरुड अत्यन्त प्रसन्न हो गया और उसने विद्याधर जीमूतवाहनको तीन वर दिये। ‘अब मैं आगेसे कभी शङ्खचूडके वंशजोंको नहीं खाऊँगा। श्रेष्ठ जीमूतवाहन! तुम विद्याधरोंकी नगरीमें श्रेष्ठ राज्य प्राप्त करोगे और एक लाख वर्षतक आनन्दका उपभोग कर वैकुण्ठ प्राप्त करोगे।’ इतना कहकर गरुड अन्तर्हित हो गया और जीमूतवाहनने पितासे राज्य प्राप्त किया

तथा अपनी पत्नी कमलाक्षीके साथ राज्य-सुख भोगकर अन्तमें वह वैकुण्ठलोकको चला गया।

वैतालने राजासे पूछा—भूपते! अब आप बताइये कि शङ्खचूड तथा जीमूतवाहन—इन दोनोंमें किसको महान् फल प्राप्त हुआ और दोनोंमें कौन अधिक साहसी था?

राजा बोला—वैताल! शङ्खचूडको ही महान् फल प्राप्त हुआ; क्योंकि उपकार करना तो राजाका स्वभाव ही होता है। राजा जीमूतवाहनने शङ्खचूडके लिये यद्यपि अपना जीवन देकर महान् त्याग एवं उपकार किया, उसीके फलस्वरूप गरुडने प्रसन्न होकर उसे राज्य एवं वैकुण्ठ-प्राप्तिका वर प्रदान किया, तथापि राजा होनेसे जीमूतवाहनका जीवन-दान (नागकी रक्षा करना) कर्तव्यकोटिमें आ जाता है। अतः उसका त्याग शङ्खचूडके त्याग एवं साहसके सामने महत्त्वपूर्ण नहीं प्रतीत होता, परंतु शङ्खचूडने निर्भय होकर अपने शत्रु गरुडको अपना शरीर समर्पित कर एक महान् धर्मात्मा राजाके प्राण बचाये थे। अतः शङ्खचूड ही सबसे बड़े फलका अधिकारी प्रतीत होता है। वैताल राजाके इस उत्तरसे संतुष्ट हो गया।

साधनामें मनोयोगकी महत्ता

(गुणाकरकी कथा)

वैतालने पुनः कहा—राजन्! उज्जयिनीमें महासेन नामका एक राजा था। उसके राज्यमें देवशर्मा नामका एक ब्राह्मण रहता था। देवशर्माका गुणाकर नामक एक पुत्र था, जो द्यूत, मद्य आदिका व्यसनी था। उस दुष्ट गुणाकरने पिताका सारा धन द्यूत आदिमें नष्ट कर दिया। उसके बन्धुओंने उसका परित्याग कर दिया। वह पृथ्वीपर इधर-उधर भटकने लगा। दैवयोगसे गुणाकर एक सिद्धके

आश्रममें आया, वहाँ कपदी नामके एक योगीने उसे कुछ खानेको दिया, किंतु भूखसे पीड़ित होते हुए भी उसने उस अन्नको पिशाच आदिसे दूषित समझकर ग्रहण नहीं किया। इसपर उस योगीने उसके आतिथ्यके लिये एक यक्षिणीको बुलाया। यक्षिणीने आकर गुणाकरका आतिथ्य-स्वागत किया। तदनन्तर वह कैलास-शिखरपर चली गयी। उसके वियोगसे विह्वल होकर गुणाकर पुनः

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  • प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *

३०५

योगीके पास आया। योगीने यक्षिणीको आकृष्ट करनेवाली विद्या गुणाकरको प्रदान की और कहा—‘वत्स! तुम चालीस दिनतक जलमें स्थित रहकर आधी रातमें इस शुभ मन्त्रका जप करो। ऐसा करनेपर यदि तुम मन्त्र सिद्ध कर लोगे तो मन्त्रकी शक्तिके प्रभावसे वह यक्षिणी तुम्हें प्राप्त हो जायगी। गुणाकरने वैसा ही किया, किंतु वह यक्षिणीको प्राप्त नहीं कर सका। अन्तमें विवश होकर योगीकी आज्ञासे अपने घर लौट आया। उसने अपने माता-पिताको नमस्कार कर वह रात्रि बितायी। दूसरे दिन प्रातः वह गुणाकर सन्यासियोंके एक मठमें गया और वहाँ शिष्य-रूपमें रहने लगा। पञ्चाग्रिके मध्यमें स्थित होकर उसने पवित्र हो यक्षिणीको प्राप्त करनेके लिये कपदीद्वारा बताये गये मन्त्रका पुनः जप करना प्रारम्भ किया, पर यक्षिणी फिर भी नहीं आयी, जिससे उसे बड़ा कष्ट हुआ।’

वैतालने ज्ञानविशारद राजासे पूछा—‘महाभाग! गुणाकर अपनी प्रिया यक्षिणीको क्यों नहीं प्राप्त कर सका?’

राजा बोला—रुद्रकिंकर! साधककी सिद्धिके लिये तीन आवश्यक गुण होने चाहिये—मन, वाणी तथा शरीरका ऐकात्म्य। मन और वाणीकी एकतासे किया गया कर्म परलोकमें सुखप्रद होता है। वाणी

और शरीरसे किया गया कार्य सुन्दर होता है। वह इस जन्ममें आंशिक फल देता है और परलोकमें अधिक फलप्रद होता है। मन और शरीरके द्वारा किया गया कर्म दूसरे जन्ममें सिद्धि प्रदान करता है; परंतु मन, वाणी और शरीर—इन तीनोंकी तन्मयतासे सम्पादित कर्म इस जन्ममें ही शीघ्र फल प्रदान करता है और अन्तमें मोक्ष भी प्रदान करता है। अतः साधकको कोई भी कार्य अत्यन्त मनोयोगसे करना चाहिये।

गुणाकरने यद्यपि दो बार बड़े कष्टपूर्वक मन्त्रका जप किया, किंतु दोनों ही बारकी साधनामें मनोयोगकी कमी रही। जलके भीतर तथा पञ्चाग्रि-सेवन आदिमें शरीरका योग रहा और वाणीसे जप भी होता रहा, किंतु गुणाकरका मन मन्त्रमें न लगकर यक्षिणीमें लगा हुआ था। इसी कारण उसे मन्त्र-शक्तिपर विश्वास भी न हो सका। शरीर और वाणीका योग होते हुए भी मनका योग न रहनेके कारण गुणाकर यक्षिणीको प्राप्त न कर सका, किंतु कर्म तो उसने किया ही था, फलतः परलोकमें वह यक्ष हुआ और यक्ष होकर यक्षिणीको प्राप्त किया। इससे यह सिद्ध हुआ कि किसी भी कार्यकी पूर्ण सिद्धिके लिये मन, वाणी और शरीर—इन तीनोंका ही योग आवश्यक है। इनमें भी मनका योग परम आवश्यक है।

संतानमें समान-भाव रखें

(मझले पुत्रकी कथा)

वैतालने पुनः कहा—राजन्! चित्रकूटमें रूपदत्त नामका एक विख्यात राजा रहता था। एक दिन वह एक मृगका पीछा करते हुए एक वनमें प्रविष्ट हो गया। मध्याह्नकालमें वह एक सरोवरके पास पहुँचा और वहाँ उसने अपनी सखीके साथ कमल-

पुष्पोंका चयन करती हुई एक सुन्दर मुनि-कन्याको देखा। उसके श्रेष्ठ रूपको देखकर राजाने उसे अपनी रानी बनानेका निश्चय किया। वह कन्या भी राजाको देखकर प्रसन्न हुई। दोनों परस्पर प्रीतिपूर्वक एक-दूसरेको देखने लगे। उसकी सखीसे

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

राजाने जब उस कन्याका पता पूछा, तब उसने कहा कि यह एक मुनिकी धर्मपुत्री है। उसी समय उस कन्याके पिता वहाँ आ पहुँचे। मुनिको देखकर राजाने विनयपूर्वक उनसे पूछा—‘मुने! उत्तम धर्म क्या है?’ इसपर महामनीषी मुनि बोले—‘राजन्! असहायका पालन-पोषण, शरणागतकी रक्षा और दया करना यही मुख्य धर्म है। भयभीतको अभय-दान देनेके समान कोई दान नहीं है। उदण्डोंको दण्ड देना चाहिये। पूज्यजनोंकी पूजा करनी चाहिये। गौ एवं ब्राह्मणमें नित्य आदरभाव रखना चाहिये। दण्ड देनेमें समानभाव रखना चाहिये, पक्षपात नहीं करना चाहिये। देवताकी पूजामें छल-छद्म एवं कपटको छोड़कर श्रद्धा-भक्तिरूपी सत्यका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। गुरु एवं श्रेष्ठ जनोंकी पूजामें इन्द्रिय-निग्रह एवं समाहितचित्तताका विशेष ध्यान रखना चाहिये। दान देते समय मृदुताका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। थोड़े-से भी हुए निन्द्य कर्मको बहुत बड़ा अपराध समझकर सर्वथा उससे विरत रहना चाहिये*।’

ऐसा कहकर उस मुनिने अपनी कन्याका विवाह राजकुमारके साथ कर दिया। राजा उसे लेकर अपनी राजधानीकी ओर चला। मार्गमें उसने एक वटवृक्षके नीचे विश्राम किया। उसी समय उसकी पत्नीको खा जानेके लिये एक राक्षस वहाँ आया और कहने लगा कि ‘तुम दोनोंने मेरा स्थान अपवित्र कर दिया है, अतः मैं तुम लोगोंको खा जाऊँगा।’ राजाके क्षमा माँगनेपर उसने पुनः कहा—‘यदि तुम किसी सात वर्षके ब्राह्मण-

बालकको मेरे खानेके लिये प्रस्तुत करो तो मैं तुम्हें छोड़ दूँगा।’ राजा राक्षसको वचन देकर अपनी पत्नीके साथ महलमें चला आया।

दूसरे दिन राजाने मन्त्रियोंको सब समाचार कह सुनाया। मन्त्रियोंके परामर्शपर राजाने एक ब्राह्मणको एक लक्ष स्वर्ण-मुद्राएँ देकर उसके मध्यम पुत्रको राक्षसको समर्पित करनेके लिये राजी कर लिया। उस ब्राह्मणपुत्रने भी पिताके लिये अपना बलिदान देना स्वीकार कर लिया। यथासमय उसे लेकर सभी राक्षसके पास पहुँचे। ज्यों ही बलिदानका समय आया, त्यों ही वह ब्राह्मणका बालक पहले हँसा और फिर उच्च स्वरसे रोने लगा।

वैतालने पूछा—‘राजन्! बताओ कि मृत्युके समय वह ब्राह्मण-बालक पहले क्यों हँसा और बादमें फिर क्यों रोया?’

राजाने कहा—‘वैताल! बड़ा पुत्र पिताको प्रिय होता है और छोटा पुत्र माताको प्रिय होता है। इसलिये माता-पितासे अपनेको उपेक्षित जानकर और अन्य कोई शरण्य न देखकर बड़ी आशासे मध्यम पुत्रने राजाकी शरण ग्रहण की, परंतु अपनी पत्नीका प्रिय चाहनेवाले उस निर्दयी राजा रूपदत्तके हाथमें मृत्युरूपी तलवार देखकर उस ब्राह्मणकुमारको पहले हँसी आ गयी और फिर मेरा यह उत्तम शरीर अधम राक्षसको प्राप्त होगा, यह सोचकर वह दुःखी होकर उच्च स्वरसे रोता हुआ पश्चात्ताप करने लगा। वैताल राजाके इस उत्तरसे बहुत प्रसन्न हुआ।

  • तमुवाच मुनिर्धीमान् दयाधर्मप्रपोषणम् । निर्भयस्य समं दानं न भूतं न भविष्यति ॥ अनहनि दण्डमादद्यादहंपूजाफलं भजेत् । मित्रता गोह्निजे नित्यं समता दण्डनिग्रहे ॥ सत्यता सुरपूजार्थां दमता गुरुपूजने । मृदुता दानसमये संतुष्टिनिन्द्यकर्मणि ॥ (प्रतिसर्गपर्व २।१९।५-७)

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  • प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *

३०७

पढ़ो कम, समझो ज्यादा

(चार मूर्खोंकी कथा)

वैतालने राजासे पुनः कहा—राजन्! रमणीय जयपुरमें वर्धमान नामका एक राजा था। उसके गाँवमें वेदवेदाङ्गपारंगत विष्णुस्वामी नामका एक ब्राह्मण निवास करता था। वह राधा-कृष्णका भक्त था। उसके चार पुत्र थे, जो विभिन्न व्यसनोंमें लगे रहते थे। वे जैसा निन्दित कर्म करते थे, वैसा ही उनका नाम भी निन्दित ही हो गया। पहला पुत्र दूतकर्मा था, दूसरा व्यभिचारी, तीसरा विषयी और चौथा नास्तिक था। संयोगसे दुर्भाग्यवश वे सभी निर्धन हो गये। एक बार वे सभी अपने पिता विष्णुशर्माके पास गये। उन लोगोंने विनयपूर्वक उन्हें नमस्कार किया और कहा—‘पिताजी! हमलोगोंकी लक्ष्मी कैसे नष्ट हो गयी?’ पिताने कहा—‘दूतकर्मन्! दूतकर्म धनको नष्ट कर देता है। यह पापका मूल है। दूतकर्मसे व्यभिचार, चौर्य और निर्दयता आदि उत्पन्न होते हैं। यह महान् दुष्परिणामकारी है। दूतकर्म करनेके कारण तुम्हारे द्रव्यका नाश हुआ।’ यह सुनकर उसने कहा—‘पितृचरण! आप मुझे कृपया धन-प्राप्तिका सही मार्ग बतायें।’ पिताने कहा—‘तीर्थ और व्रतके प्रभावसे तुम्हारे पाप नष्ट हो जायँगे। तुम अपने माता-पिताकी बातोंपर ध्यान दो, उनका कहना मानो।’ तदनन्तर पिताने द्वितीय पुत्रसे कहा—‘पुत्र! तुम व्यभिचारी हो। वेश्याका संग बड़ा अशुभ है। तुम इस अशुभ कर्मको त्यागकर ब्रह्मचर्यपूर्वक ब्रह्मपरायण हो। ब्रह्मचर्यव्रत धारण करो।’ तृतीय पुत्र विषयीसे कहा—‘मांस और मदिरा सदा पापकी वृद्धिके कारण हैं, इनके द्वारा तुम चौर्य-कर्म करोगे और नरकगामी होगे, इसलिये

तुम ऐश्वर्यसम्पन्न जगत्पति, सर्वोत्तम भगवान् विष्णुके निमित्त द्रव्योंको समर्पितकर मौन होकर भोजन करो’ और अपने नास्तिक पुत्रसे कहा—‘तुम देवनिन्दा आदि नास्तिकभावको छोड़कर शुद्ध आस्तिकमार्गका अवलम्बन करो, आत्मा शुद्ध-बुद्ध एवं नित्य है और महादेवी चण्डिका महाशक्ति हैं। सभी प्राणियोंके हृदय-गुहामें स्थित देवतागण परमात्माके अङ्ग हैं। उनका ज्ञान प्राप्तकर पापकी शान्तिके लिये उनकी पूजा करो।’

यह सुनकर वे चारों पुत्र अपने पिताके द्वारा निर्दिष्ट साधनोंमें प्रवृत्त हो गये और सुन्दर ज्ञानकी प्राप्तिके लिये सर्वेश्वर शिवकी आराधना भी करने लगे। भगवान् शंकरने वर्षभरमें उन्हें संजीवनी विद्या प्रदान कर दी। वे संजीवनी विद्या प्राप्त कर एक वनमें आये और वहाँ बिखरी व्याघ्रकी अस्थियोंपर विद्याकी परीक्षा करने लगे। प्रथम पुत्रने मरे हुए व्याघ्रकी अस्थियोंको एकत्र करके उसपर मन्त्रपूत जल छिड़का। उस मन्त्रके प्रभावसे वे अस्थियाँ पंजररूप हो गयीं। दूसरे व्यभिचारी पुत्रने उसपर मन्त्रपूत जल छिड़का, जिसके प्रभावसे वह पंजर मांस और रुधिरसे सम्पन्न हो गया। विषयी पुत्रने उसके ऊपर अभिमन्त्रित जल छिड़का। फलस्वरूप त्वचा और प्राण उसमें आ गये। सोये हुए व्याघ्रको जीवित करनेके लिये नास्तिक पुत्रने जल छिड़का। मन्त्रके प्रभावसे जीवित होनेपर उस व्याघ्रने उन सभीका भक्षण कर लिया।

वैतालने राजासे पूछा—राजन्! अब आप बतायें कि उन चारोंमें सबसे बड़ा मूर्ख कौन था? राजा बोले—जिसने मरे हुए व्याघ्रको जिलाया,

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३०८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

वही सबसे बड़ा मूर्ख है। इस उत्तरसे वैताल अत्यन्त प्रसन्न हो गया।

वैतालने पुनः राजासे कहा— राजा विक्रमादित्य! भगवान् शंकरकी आज्ञासे ही मैं तुम्हारे पास आया था। अनेक प्रकारके प्रश्नोत्तरोंके द्वारा मैंने तुम्हारी परीक्षा ली और तुमने सबका बुद्धिमतापूर्ण उत्तर दिया। इससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारी भुजाओंमें मेरा निवास रहेगा, जिससे तुम पृथ्वीके समस्त शत्रुओंको जीत लोगे। दस्युओंके द्वारा सभी पुरियाँ, विविध क्षेत्र, नगर आदि नष्ट कर दिये गये हैं। इसलिये शास्त्रमें बताये गये परिमाणके आधारपर पुनः उनकी रचना करवाओ और न्यायपूर्वक पृथ्वीका शासन करो। तुम्हारे राज्यमें

पुनः धर्मकी स्थापना होगी।

इतना कहकर वह वैताल देवीकी आराधनाका निर्देश देकर वहीं अन्तर्हित हो गया। राजा विक्रमादित्यने मुनियोंकी आज्ञासे अश्वमेध-यज्ञ किया और वह चक्रवर्ती राजा हुआ। धर्मपूर्वक राज्य करते हुए अन्तमें राजा विक्रमादित्यने स्वर्गलोक प्राप्त किया*।

राजा विक्रमादित्यके स्वर्गगमनको जानकर शौनकादि महर्षियोंने लोमहर्षण सूतजी महाराजसे पुनः इतिहास एवं पुराणकी पुण्यमयी कथाओंका श्रवण किया और फिर आनन्दित होते हुए वे सभी अपने-अपने स्थानोंकी ओर चले गये।

(अध्याय १—२३)

  • इन्हीं राजा विक्रमादित्यने विक्रम-संवत्का प्रवर्तन किया था, जो भारतका मुख्य संवत् है।

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  • प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *

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सत्यनारायणव्रत-कथा

[भारतवर्षमें सत्यनारायणव्रत-कथा अत्यन्त लोकप्रिय है और जनता-जनार्दनमें इसका प्रचार-प्रसार भी सर्वाधिक है। भारतीय सनातन परम्परामें किसी भी माङ्गलिक कार्यका प्रारम्भ भगवान् गणपतिके पूजनसे एवं उस कार्यकी पूर्णता भगवान् सत्यनारायणकी कथा-श्रवणसे समझी जाती है। वर्तमान समयमें भगवान् सत्यनारायणकी प्रचलित कथा स्कन्दपुराणके रेवाखण्डके नामसे प्रसिद्ध है, जो पाँच या सात अध्यायोंके रूपमें उपलब्ध है। भविष्यपुराणके प्रतिसर्गपर्वमें भी भगवान् सत्यनारायणव्रत-कथाका उल्लेख मिलता है, जो छः अध्यायोंमें प्राप्त है। यह कथा स्कन्दपुराणकी कथासे मिलती-जुलती होनेपर भी विशेष रोचक एवं श्रेष्ठ प्रतीत होती है। सत्यनारायणव्रत-कथाकी प्रसिद्धिके साथ अनेक शंका-समाधान भी इसपर होते रहते हैं तथा लोग यह भी पूछते हैं कि साधु वणिक, काष्ठविक्रेता, शतानन्द ब्राह्मण, उल्कामुख, तुङ्गध्वज आदि राजाओंने कौन-सी कथाएँ सुनी थीं और वे कथाएँ कहाँ गयीं तथा इस कथाका प्रचार कबसे हुआ? इस सम्बन्धमें यही जानना चाहिये कि कथाके माध्यमसे मूल सत्-तत्त्व परमात्माका ही इसमें निरूपण हुआ है, जिसके लिये गीतामें 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः' आदि शब्दोंमें यह स्पष्ट किया गया है कि इस मायामय दुःखद संसारकी वास्तविक सत्ता ही नहीं है। परमेश्वर ही त्रिकालाबाधित सत्य है और एकमात्र वही ज्ञेय, ध्येय एवं उपास्य है। ज्ञान-वैराग्य और अनन्य भक्तिके द्वारा वही साक्षात्कार करनेके योग्य है। भागवत (१०।२।२६)-में भी कहा गया है—

सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये।

सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः॥

यहाँ भी सत्यव्रत और सत्यनारायणव्रतका तात्पर्य उन शुद्ध सच्चिदानन्द परमात्मासे ही है। इसी प्रकार निम्नलिखित श्लोकमें—

अन्तर्भवैऽनन्त भवन्तमेव ह्यतत्प्यजन्तो मृगयन्ति सन्तः।

असन्तमव्यन्त्यहिमन्तरेण सन्तं गुणं तं किमु यन्ति सन्तः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।२८)

—संसारमें मनीषियोंद्वारा सत्य-तत्त्वकी खोजकी बात निर्दिष्ट है, जिसे प्राप्तकर मनुष्य सर्वथा कृतार्थ हो जाता है और सभी आराधनाएँ उसीमें पर्यवसित होती हैं। निष्काम-उपासनासे सत्यस्वरूप नारायणकी प्राप्ति हो जाती है।

अतः श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूजन, कथा-श्रवण एवं प्रसाद आदिके द्वारा उन सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्मा भगवान् सत्यनारायणकी उपासनासे लाभ उठाना चाहिये।—सम्पादक]

कथाका उपक्रम—

व्यासजी बोले—एक समयकी बात है, नैमिषारण्यमें शौनकादि ऋषियोंने पौराणिक श्रीसूतजीसे विनयपूर्वक पूछा—'भगवन्! संसारके कल्याणके लिये आप यह बतलानेकी कृपा करें कि चारों युगोंमें कौन पूजनीय और कौन सेवनीय है तथा कौन सबके अभीष्ट मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है? मानव अनायास ही किसकी आराधनाद्वारा अपनी मङ्गलमयी कामनाको प्राप्त कर सकता

है? ब्रह्मन्! आप ऐसे सत्य उपायको बतलायें जो मनुष्योंकी कीर्तिको बढ़ानेवाला हो।' शौनकादि ऋषियोंद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर श्रीसूतजी भगवान् सत्यनारायणकी प्रार्थना करने लगे—

नवाम्भोजनेत्रं रमाकेलिपात्रं चतुर्बाहुचामीकरं चारुगाम्रम्। जगत्त्राणहेतुं रिपौ धूम्रकेतुं सदा सत्यनारायणं स्तौमि देवम्॥

(प्रतिसर्गपर्व २।२४।४)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

( श्रीसूतजीने प्रार्थना करते हुए कहा— )

‘प्रफुल्लित नवीन कमलके समान नेत्रवाले, भगवती लक्ष्मीके क्रीडापात्र, चतुर्भुज, सुवर्णकान्तिके समान सुन्दर शरीरवाले, संसारकी रक्षा करनेके एकमात्र मूल कारण तथा शत्रुओंके लिये धूम्रकेतुस्वरूप भगवान् सत्यनारायणदेवकी मैं स्तुति करता हूँ।’ श्रीरामं सहलक्ष्मणं सकरुणं सीतान्वितं सात्त्विकं

वैदेहीमुखपद्मलुब्धमधुरं पौलस्त्यसंहारकम्।

वन्दे वन्द्यपदाम्बुजं सुरवरं भक्तानुकम्पाकरं

शत्रुघ्नैन हनूमता च भरतेनासेवितं राघवम्॥

(प्रतिसर्गपर्व २।२४।५)

‘जो भगवान् करुणाके निधान हैं, जिनके चरणकमल वन्दनीय हैं, जो भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले हैं, जो लक्ष्मणजीके साथ रहते हैं और माता श्रीसीतासे समन्वित हैं तथा माता वैदेही श्रीजनकनन्दिनीजीके मुख-कमलकी ओर स्निग्धभावसे देखते रहते हैं, उन शत्रुघ्न, हनुमान् तथा भरतसे सेवित, पुलस्त्यकुलका संहार करनेवाले, सत्स्वरूप सुरश्रेष्ठ राघवेन्द्र श्रीरामचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ।’

सूतजीने कहा— ऋषियो! अब मैं आपसे श्रेष्ठ राजाओंके चरित्रोंसे सम्बद्ध एक इतिहासका वर्णन करता हूँ, उसे आपलोग श्रवण करें। यह पवित्र आख्यान कलियुगके सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला, कामनाओंको पूर्ण करनेवाला, देवताओंद्वारा आभासित, ब्राह्मणोंद्वारा प्रकाशित, विद्वानोंको आनन्दित करनेवाला तथा विशेष रूपसे सत्संगके चर्चस्वरूप है*।

ऋषियो! एक समय योगी देवर्षि नारदजी सबके कल्याणकी कामनासे विविध लोकोंमें भ्रमण करते हुए इस मृत्युलोकमें आये। यहाँ

उन्होंने देखा कि अपने-अपने किये गये कर्मोंके अनुसार संसारके प्राणी नाना प्रकारके क्लेशों एवं दुःखोंसे दुःखी हैं और विविध आधि एवं व्याधिसे ग्रस्त हैं। यह देखकर उन्होंने सोचा कि कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे इन प्राणियोंके दुःखका नाश हो। ऐसा विचारकर वे विष्णुलोकमें गये। वहाँ उन्होंने शङ्खु, चक्र, गदा, पद्म और वनमालासे अलंकृत, प्रसन्नमुख, शान्त, सनक-सनन्दन तथा सनत्कुमारदिसे संस्तुत भगवान् नारायणका दर्शन किया। उन देवाधिदेवका दर्शन कर नारदजी उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे—‘वाणी और मनसे जिनका स्वरूप परे है और जो अनन्तशक्तिसम्पन्न हैं, आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं, ऐसे महान् आत्मा निर्गुणस्वरूप आप परमात्माको मेरा नमस्कार है। सभीके आदिपुरुष लोकोपकारपरायण, सर्वत्र व्याप्त, तपोमूर्ति आपको मेरा बार-बार नमस्कार है।’

देवर्षि नारदकी स्तुति सुनकर भगवान् विष्णु बोले—‘देवर्षि! आप किस कारणसे यहाँ आये हैं? आपके मनमें कौन-सी चिन्ता है? महाभाग! आप सभी बातें बतायें। मैं उचित उपाय कहूँगा।

नारदजीने कहा—प्रभो! लोकोंमें भ्रमण करता हुआ मैं मृत्युलोकमें गया था, वहाँ मैंने देखा कि संसारके सभी प्राणी अनेक प्रकारके क्लेश-तापोंसे दुःखी हैं। अनेक रोगोंसे ग्रस्त हैं। उनकी वैसी दुर्दशा देखकर मेरे मनमें बड़ा कष्ट हुआ और मैं सोचने लगा कि किस उपायसे इन दुःखी प्राणियोंका उद्धार होगा? भगवन्! उनके कल्याणके लिये आप कोई श्रेष्ठ एवं सुगम उपाय बतलानेकी कृपा करें। नारदजीके इन वचनोंको सुनकर भगवान् नारायणने साधु-साधु शब्दोंसे उनका अभिनन्दन

  • कलिकल्पविनाशं कामसिद्धिप्रकाशं सुरवरमुखभासं भूसुरेण प्रकाशम्।

विबुधवृषिबिलासं साधुचर्याविशेषं नृपतिवरचरित्रं भोः शृणुव्येतिहासम्॥ (प्रतिसर्गपर्व २।२४।६)

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  • प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *

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किया और कहा—‘नारदजी! जिस विषयमें आप पूछ रहे हैं, उसके लिये मैं आपको एक सनातन व्रत बतलाता हूँ।’

भगवान् नारायण सत्ययुग और त्रेतायुगमें विष्णुस्वरूपमें फल प्रदान करते हैं और द्वापरमें अनेक रूप धारणकर फल देते हैं, परंतु कलियुगमें सर्वव्यापक भगवान् सत्यनारायण प्रत्यक्ष फल देते हैं, क्योंकि धर्मके चार पाद हैं—सत्य, शौच, तप और दान। इनमें सत्य ही प्रधान धर्म है। सत्यपर ही लोकका व्यवहार टिका है और सत्यमें ही ब्रह्म प्रतिष्ठित है, इसलिये सत्यस्वरूप भगवान् सत्यनारायणका व्रत परम श्रेष्ठ कहा गया है।

नारदजीने पुनः पूछा—भगवन्! सत्यनारायणकी पूजाका क्या फल है और इसकी क्या विधि है? देव! कृपासागर! सभी बातें अनुग्रहपूर्वक मुझे बतायें।

श्रीभगवान् बोले—नारद! सत्यनारायणकी पूजाका फल एवं विधि चतुर्मुख ब्रह्मा भी बतलानेमें समर्थ नहीं हैं, किंतु संक्षेपमें मैं उसका फल तथा विधि बतला रहा हूँ, आप सुनें—

सत्यनारायणके व्रत एवं पूजनसे निर्धन व्यक्ति धनाढ्य और पुत्रहीन व्यक्ति पुत्रवान् हो जाता है। राज्यच्युत व्यक्ति राज्य प्राप्त कर लेता है, दृष्टिहीन व्यक्ति दृष्टिसम्पन्न हो जाता है, बंदी बन्धनमुक्त हो जाता है और भयार्त व्यक्ति निर्भय हो जाता है। अधिक क्या? व्यक्ति जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, उसे वह सब प्राप्त हो जाती है। इसलिये मुने! मनुष्य-जन्ममें भक्तिपूर्वक सत्यनारायणकी अवश्य आराधना करनी चाहिये। इससे वह अपने अभिलषित वस्तुको निःसंदेह शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है।

इस सत्यनारायणव्रतके करनेवाले व्रतीको चाहिये

कि वह प्रातः दन्तधावनपूर्वक स्नानकर पवित्र हो जाय। हाथमें तुलसी-मंजरीको लेकर सत्यमें प्रतिष्ठित भगवान् श्रीहरिका इस प्रकार ध्यान करे—

नारायणं सान्द्रघनावदातं चतुर्भुजं पीतमहार्हवाससम्। प्रसन्नवक्त्रं नवकञ्जलोचनं सन्नन्दनाद्यैरुपसेवितं भजे ॥ करोमि ते व्रतं देव सायंकाले त्वदर्चनम्। श्रुत्वा गाथां त्वदीयां हि प्रसादं ते भजाम्यहम्॥

(प्रतिसर्गपर्व २।२४।२६-२७)

‘सघन मेघके समान अत्यन्त निर्मल, चतुर्भुज, अतिश्रेष्ठ पीले वस्त्रको धारण करनेवाले, प्रसन्नमुख, नवीन कमलके समान नेत्रवाले, सनक-सनन्दनादिसे उपसेवित भगवान् नारायणका मैं सतत चिन्तन करता हूँ। देव! मैं आपके सत्यस्वरूपको धारणकर सायंकालमें आपकी पूजा करूँगा। आपके रमणीय चरित्रको सुनकर आपके प्रसाद अर्थात् आपकी प्रसन्नताका मैं सेवन करूँगा।’

इस प्रकार मनमें संकल्पकर सायंकालमें विधिपूर्वक भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करनी चाहिये। पूजामें पाँच कलश रखने चाहिये। कदली-स्तम्भ और बंदनवार लगाने चाहिये। स्वर्णमण्डित भगवान् शालग्रामको पुरुषसूक्त (यजु० ३१।१—१६) द्वारा पञ्चामृत आदिसे भलीभाँति स्नान कराकर चन्दन आदि अनेक उपचारोंसे भक्तिपूर्वक उनकी अर्चना करनी चाहिये। अनन्तर भगवान्को निम्न मन्त्रका उच्चारण करते हुए प्रणाम करना चाहिये—

नमो भगवते नित्यं सत्यदेवाय धीमहि।

चतुःपदार्थदत्रे च नमस्तुभ्यं नमो नमः॥

(प्रतिसर्गपर्व २।२४।३०)

‘षडैश्वर्यरूप भगवान् सत्यदेवको नमस्कार है, मैं आपका सदा ध्यान करता हूँ। आप धर्म, अर्थ,

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

काम और मोक्ष—इस चतुर्विध पुरुषार्थको प्रदान करनेवाले हैं, आपको बार-बार नमस्कार है।'

इस मन्त्रका यथाशक्ति जपकर १०८ बार हवन करे। उसके दशांशसे तर्पण तथा उसके दशांशसे मार्जन कर भगवान्की कथाको सुनना चाहिये, जो छः अध्यायोंमें उपनिबद्ध है। भगवान्की इस कथामें सत्य-धर्मकी ही मुख्यता है। कथा-श्रवणके अनन्तर भगवान्के प्रसादको चार भागोंमें विभक्तकर उसे भलीभाँति वितरण करे। प्रथम भाग आचार्यको दे, द्वितीय भाग अपने कुटुम्बको, तृतीय भाग श्रोताओंको और चतुर्थ भाग अपने लिये रखे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन कराये एवं स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। देवर्षि! इस विधिसे सत्यनारायणकी

पूजा करनी चाहिये। श्रद्धा-भक्तिपूर्वक सत्यनारायणकी पूजा करनेवाला व्रती सभी अभीष्ट कामनाओंको इसी जन्ममें प्राप्त कर लेता है। इस जन्ममें किये गये पुण्यफलको दूसरे जन्ममें भोगा जाता है और दूसरे जन्ममें किये गये कर्मोंका फल मनुष्यको यहाँ भोगना पड़ता है। श्रद्धापूर्वक किया गया सत्यनारायणका व्रत सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है।

नारदजीने कहा—भगवन्! आज ही आपकी आज्ञासे भूमण्डलमें इस सत्यदेव-व्रतको मैं प्रतिष्ठित करूँगा। यह कहकर नारदजी तो पृथ्वीपर व्रतका प्रचार करने चले गये और भगवान् नारायणदेव अन्तर्धान हो काशीपुरीमें चले आये। (अध्याय २४)

[ सत्यनारायणव्रत-कथाका प्रथम अध्याय ]

सत्यनारायणव्रत-कथामें शतानन्द ब्राह्मणकी कथा

सूतजी बोले—ऋषियो! भगवान् नारायणने स्वयं कृपापूर्वक देवर्षि नारदजीद्वारा जिस प्रकार इस व्रतका प्रचार किया, अब मैं उस कथाको कहता हूँ, आपलोग सुनें—

लोकप्रसिद्ध काशी नगरीमें एक श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मण रहते थे, जो विष्णुव्रतपरायण थे, वे गृहस्थ थे, दीन थे तथा स्त्री-पुत्रवान् थे। वे भिक्षा-वृत्तिसे अपना जीवन-यापन करते थे। उनका नाम शतानन्द था। एक समय वे भिक्षा माँगनेके लिये जा रहे थे। उन विनीत एवं अतिशय शान्त शतानन्दको मार्गमें एक वृद्ध ब्राह्मण दिखायी दिये, जो साक्षात् हरि ही थे। उन वृद्ध ब्राह्मणवेषधारी श्रीहरिने ब्राह्मण शतानन्दसे पूछा—'द्विजश्रेष्ठ! आप किस निमित्तसे कहाँ जा रहे हैं?' शतानन्द बोले—'सौम्य! अपने पुत्र-कलत्रादिके भरण-पोषणके लिये धन-याचनाकी

कामनासे मैं धनिकोंके पास जा रहा हूँ।'

नारायणने कहा—द्विज! निर्धनताके कारण आपने दीर्घकालसे भिक्षावृत्ति अपना रखी है, इसकी निवृत्तिके लिये सत्यनारायणव्रत कलियुगमें सर्वोत्तम उपाय है। इसलिये मेरे कथनके अनुसार आप कमलनेत्र भगवान् सत्यनारायणके चरणोंकी शरण-ग्रहण करें, इससे दारिद्र्य, शोक और सभी संतापोंका विनाश होता है तथा मोक्ष भी प्राप्त होता है।

करुणामूर्ति भगवान्के इन वचनोंको सुनकर ब्राह्मण शतानन्दने पूछा—'ये सत्यनारायण कौन हैं?'

ब्राह्मणरूपधारी भगवान् बोले—नानारूप धारण करनेवाले, सत्यव्रत, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले तथा निरञ्जन वे देव इस समय विप्रका रूप धारणकर तुम्हारे सामने आये हैं। इस महान् दुःखरूपी संसार-सागरमें पड़े हुए प्राणियोंको तारनेके

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