भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

८२ 'मेष लग्न' [कुण्डली: १ 'मेष' लग्न, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२] ११५ ['मेष' लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों के फलादेश का पृथक्-पृथक् वर्णन] 'मेष' लग्न का फलादेश 'मेष' लग्न में जन्म लेने वाले जातक का शरीर इकहरा तथा कुछ लालिमा लिए गौर वर्ण का होता है। वह स्वभाव से रजोगुणी, पित्त प्रकृति वाला, उग्र, अहंकारी, चंचल, अत्यन्त चतुर, बुद्धिमान, धर्मात्मा, उदार, कुल-दीपक तथा अल्प- संततिवान् होता है। स्त्रियों के प्रति उसका स्वार्थपूर्ण अल्प लगाव अथवा द्वेष होता है। इस लग्न वाले जातक को अपनी आयु के ६, ८, १५, २१, ३६, ४४, ५६ तथा ६३वें वर्ष में धन-हानि एवं शारीरिक कष्टों का सामना करना पड़ता है। आयु के १६, २०, २८, ३४, ४१, ४८ तथा ५१वें वर्ष में उसे धन, वाहन, सौभाग्य आदि का सुख प्राप्त होता है। 'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों का स्थायी-फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डली संख्या ११६ से २२३ के बीच देखना चाहिए। गोचर-कुण्डली ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए।

८३ 'मेष' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश १—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में 'सूर्य' का स्थायी-फलादेश उदाहरण कुण्डली-संख्या ११६ से १२७ के बीच देखना चाहिए । २—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'सूर्य'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ११६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ११७ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ११८ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ११९ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १२० (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १२१ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १२२ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १२३ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १२४ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १२५ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १२६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १२७ 'मेष' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश १—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'चन्द्रमा' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १२८ से १३९ के बीच देखना चाहिए । २—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'चन्द्रमा' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस दिन 'चन्द्रमा'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १२८ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १२९ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३० (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३१ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३२

८४ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३३ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३४ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३५ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३७ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३८ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३६ 'मेष' लग्न में 'मंगल' का फलादेश १—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १४० से १५१ के बीच देखना चाहिए। २—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'मंगल'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १४० (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १४१ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १४२ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १४३ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १४४ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १४५ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १४६ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १४७ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १४८ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १४६ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १५० (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १५१ 'मेष' लग्न में 'बुध' का फलादेश १—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १५२ से १६३ के बीच देखना चाहिए। २—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—

८५ जिस महीने में 'बुध'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १५२ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १५३ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १५४ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १५५ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १५६ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १५७ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १५८ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १५९ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १६० (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १६१ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १६२ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १६३ 'मेष' लग्न में 'गुरु' का फलादेश १—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुंडली संख्या १६४ से १७५ के बीच देखना चाहिए। २—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'गुरु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १६४ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १६५ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १६६ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १६७ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १६८ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १६९ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १७० (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १७१ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १७२ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १७३ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १७४ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १७५

८६ 'मेष' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश १—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १७६ से १८७ के बीच देखना चाहिए। २—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'शुक्र'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १७६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १७७ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १७८ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १७९ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १८० (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १८१ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १८२ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १८३ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १८४ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १८५ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १८६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १८७ 'मेष' लग्न में 'शनि' का फलादेश १—'मेष' लग्न वालो को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १८८ से १९९ के बीच देखना चाहिए। २—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'शनि'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १८८ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १८९ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १९० (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १९१

८७ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १६२ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १६३ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १६४ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १६५ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १६६ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १६७ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १६८ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १६९ 'मेष' लग्न में 'राहु' का फलादेश १—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या २०० से २११ के बीच देखना चाहिए। २—'मेष' लग्न वालों को अपनी गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'राहु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या २०० (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या २०१ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या २०२ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या २०३ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या २०४ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या २०५ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या २०६ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या २०७ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या २०८ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या २०९ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या २१० (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या २११ 'मेष' लग्न में 'केतु' का फलादेश १—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी-फलादेश उदाहरण कुण्डली संख्या २१२ से २२३ के बीच देखना चाहिए :

८८ २—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली से विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या २१२ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या २१३ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या २१४ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या २१५ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या २१६ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या २१७ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या २१८ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या २१९ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या २२० (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या २२१ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या २२२ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या २२३ 'मेष' लग्न में 'सूर्य' 'मेष' लग्न वाली कुण्डली से 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : प्रथमभाव : सूर्य

+---------------+---------------+
|       \   २   /       \   १२  /
|   ३    \     /    १    \     /   ११
|         \   /    सू     \   /
+----------\ /             \ /---------+
|           X               X          |
|   ४      / \      ७      / \    १०   |
|         /   \           /   \        |
+----------/ \             \ /---------+
|   ५     /   \     ६     /   \    ९   |
|        /  ६  \         /  ८  \       |
+---------------+---------------+
               [११६]

पहले भाव में अपने मित्र मंगल की राशि में उच्चस्थ सूर्य अपने मित्र मंगल की राशि पर है, अतः जातक तेजस्वी, विद्वान्, साहसी, स्वस्थ, स्वाभिमानी तथा पराक्रमी होगा। महत्वाकांक्षा, व्यवहार-कुशलता, धैर्य आदि सद्गुण प्राप्त होंगे तथा सन्तानें भी अधिक होंगी। परन्तु सूर्य की सप्तमभाव पर नीच-दृष्टि पड़ने के कारण जातक के दाम्पत्य-सुख में कमी रहेगी। पत्नी (यदि स्त्री की जन्मकुण्डली हो तो पति) अधिक सुन्दर नहीं होगी। पति-पत्नी में मन-मुटाव भी रह सकता है। दैनिक जीविकोपार्जन के क्षेत्र में भी अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ आती रहेंगी।

८६ 'मेष' लग्न की कुण्डली से 'द्वितीयभाव' 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : द्वितीय भाव : सूर्य दूसरे भाव में अपने शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को आर्थिक कठि- नाइयों का सामना करना होगा । इस कुण्डली में सूर्य पंचमभाव का स्वामी होकर शत्रु की राशि पर बैठा है, अतः जातक के विद्याध्ययन एवं संतान पक्ष में भी कठिनाइयां आती रहेंगी । कुटुम्ब, रत्न तथा बन्धन-विषयक विवाद भी उठते रहेंगे । यहाँ से सूर्य अष्टम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है, अतः जातक की आयु दीर्घ होगी तथा उसे गुप्त अथवा आकस्मिक धन का लाभ भी होगा । 'मेष' लग्न कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित सूर्य का फलादेश मेष लग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक के बुद्धिबल एवं पराक्रम में वृद्धि होगी । सूर्य को सातवीं दृष्टि भाग्य-भवन पर होने से जातक भाग्यवान्, धर्मात्मा, दानी तथा तीर्थसेवी होगा । नवें भाव में सूर्य के मित्र तथा शुभग्रह गुरु की राशि होने के कारण जातक शुभ कार्य करने वाला तथा भगवद् भक्त होगा । तृतीय भाव से भाई तथा वाणी का तो विचार किया जाता है, अतः यह जातक भाइयों का सुख प्राप्त करेगा तथा ओजस्वी वाणी वाला होगा । 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में अपने मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक भूमि, गृह, वाहन आदि अनेक प्रकार के सुख प्राप्त करेगा । वह विद्वान् तथा विद्या द्वारा सुख प्राप्त करने वाला भी होगा। यहाँ से सूर्य सातवीं दृष्टि से अपने शत्रु शनि की राशि वाले दशम भाव को देखता है अतः जातक की अपने पिता से अनबन रहेगी तथा राजकीय मामलों में विफलताऐं आयेंगी। परंतु सूर्य से प्रभाव से कुछ-न-कुछ सम्मान अवश्य बना रहेगा ।

६० 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में स्वक्षेत्री सूर्य के प्रभाव से जातक बड़ा विद्वान्, बुद्धिमान्, यशस्वी तथा सन्तान-सुख से परि- पूर्ण रहेगा। यहाँ से सूर्य की सप्तम दृष्टि अपने शत्रु शनि की राशि वाले ग्यारहवें भाव पर पड़ती है, अतः आय के साधनों में रुकावटें आती रहेंगी तथा आर्थिक लाभ के लिए विशेष प्रयत्न करना पड़ेगा। इस ग्रह स्थिति का जातक कटुभाषी तथा अह- कारी होता है, जिसके कारण लोग परोक्ष में उसकी निन्दा भी करते हैं। १२० 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश छठे भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक अपने शत्रुओं पर निरन्तर विजय प्राप्त करता रहेगा। पंचमभाव का स्वामी षष्ठभाव मेष लग्न : षष्ठभाव : सूर्य में होने के कारण विद्याध्ययन में कुछ कठिनाइयां तो आयेंगी, परन्तु जातक परम विद्वान् तथा बुद्धिमान भी होगा। सूर्य की सप्तदृष्टि व्ययस्थान में पड़ने के कारण जातक बाहरी संबंधों से लाभ एवं सफलता पाने वाला, विदेशों में सम्मानित तथा अधिक खर्च करने वाला भी होगा। इसे सन्तानपक्ष से कुछ चिन्ताएं अवश्य बनी रहेंगी। शत्रुपक्ष कठिनाइयां खड़ी करता रहेगा, परन्तु यह हारेगा तो। १२१ 'मेष' लग्न कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में अपने शत्रु शुक्र की राशि में स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को अपने स्वास्थ्य एवं स्त्री के विषय में निरन्तर कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। सप्तम उच्चदृष्टि से मित्र मंगल की राशि वाले लग्नभाव को देखने के कारण जातक लंबे कद का तेजस्वी तथा स्वाभिमानी होगा। वह युक्ति एवं बुद्धिबल से अपना काम निकालने में प्रवीण होगा। सूर्य के पंचमेश होने के कारण जातक का विद्या तथा सन्तान का पक्ष भी कमजोर रहेगा तथा जीवन-यापन के क्षेत्र में भी कठिनाइयां आती रहेंगी। १२२

६१ 'मेष' लग्न कुण्डली से 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्व एवं गुप्त धन सम्बन्धी लाभ तो होगा परन्तु आठवाँ घर मृत्यु-भवन होने से विद्या एवं संतान पक्ष में कमजोरी रहेगी । दैनिक जीवन में भी कठिनाइयाँ आती रहेंगी । सातवीं दृष्टि से शत्रु के द्वितीय भाव को देखने के कारण जातक को धन एवं कुटुम्ब विषयक असन्तोष भी निरन्तर बना रहेगा । कुल मिलाकर जीवन संघर्षपूर्ण रहेगा । 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : नवमभाव : सूर्य नववें भाव में अपने मित्र गुरु की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक श्रेष्ठ विद्या, बुद्धि एवं ज्ञान का स्वामी होगा । यह धर्म, धर्मज्ञ शास्त्रों का ज्ञाता, ईश्वर भक्त, यशस्वी, भाग्यवान, दयालु, दानी तथा तीर्थसेवी भी होगा । भाग्योन्नति के क्षेत्र में निरन्तर, सफलताएँ मिलती रहेंगी । सातवीं दृष्टि से अपने मित्र बुध की राशि वाले तृतीय भाव को देखने के कारण जातक के परा- क्रम, भाई-बहन, साहस तथा योग्यताओं में वृद्धि होगी । सूर्य की यह स्थिति बहुत श्रेष्ठ है । 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में अपने शत्रु शनि की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को अपने पिता, व्यव- साय, राज्य नौकरी तथा प्रतिष्ठा के क्षेत्र में कुछ कमियों शिकार होना पड़ता है, परन्तु यह विदेशी भाषा एवं का राजभाषा का श्रेष्ठ जानकार होता है । सातवीं दृष्टि से अपने मित्र चन्द्रमा की राशि से चौथे भाव को देखने से माता, भूमि, भवन का श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता है । ऐसा जातक अपने बुद्धिबल से राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्रों में सफलताएँ प्राप्त करता है ।

६२ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में अपने शत्रु शनि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को अर्थ-लाभ के लिए विशेष परिश्रम तो करना पड़ता है, परन्तु लाभ भी अत्यधिक होता है। ग्यारहवें भाव में पापग्रह शक्तिशाली माना जाता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले पञ्चमभाव से देखने के कारण जातक को विद्या, बुद्धि तथा संतान का भी विशेष लाभ होता है। ऐसा जातक अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए कटुभाषी भी होता है तथा उसी से लाभ भी उठाता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश मेष लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में अपने मित्र गुरु की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक का बाहरी स्थानों से श्रेष्ठ सम्बन्ध होता है, परन्तु व्यय की अधिकता भी बनी रहती है। उसे अपना खर्च चलाने के लिए बुद्धिबल का अधिक प्रयोग करना पड़ता है। सन्तान एवं विद्या पक्ष की हानि तथा चिन्ता के योग भी उपस्थित होते हैं। सातवीं दृष्टि से अपने मित्र बुध की राशि वाले षष्ठभाव को देखने के कारण जातक को शत्रुपक्ष पर विजय प्राप्त होती है, परन्तु वह मानसिक चिंताओं का शिकार भी बना रहता है। 'मेष' लग्न में 'चन्द्रमा' 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मेष लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में अपने मित्र मंगल की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक मानसिक तथा पारिवारिक सुख-शांति प्राप्त करता है। सातवीं दृष्टि से शुक्र की राशि वाले सप्तम भाव को देखने के कारण स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता प्राप्त होती है। ऐसे जातक का दाम्पत्य-जीवन सुखी तथा शारीरिक स्वास्थ्य उत्तम रहता है।

६३ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मेष लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित उच्च के चन्द्रमा के प्रभाव से जातक बड़ा धनी तथा ऐश्वर्यशाली होता है। उसे कौटुम्बिक सुख भी यथेष्ट मिलता है, परन्तु माता के पक्ष में स्थित त्रुटि का अनुभव भी होता है। सातवीं नीच दृष्टि से मित्र मंगल की राशि वाले आठवें भाव को देखने के कारण जातक की आयु, स्वास्थ्य तथा पुरातत्त्व विषयक त्रुटियों का सामना करना पड़ता है। उसका दैनिक जीवन भी कुछ अशान्तिपूर्ण बना रहता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मेष लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है तथा उसे भाई-बहिनों का सुख मिलता है। चौथे घर का स्वामी होने के कारण चन्द्रमा जातकको भूमि, भवन, वाहन आदि का सुख भी देता है। सातवीं दृष्टि से मित्र गुरु की राशि से नवें भाव को देखने के कारण जातक धर्मात्मा, उदार, दानी, विद्वान्, भाग्यवान् तथा यशस्वी भी होता है। कुल मिला कर इस ग्रह स्थिति वाला जातक जीवन में अनेक प्रकार की सफलताएँ प्राप्त करता रहता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मेष लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में स्वराशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को माता, भूमि, भवन, सम्पत्ति आदि का पूर्ण सुख प्राप्त होता है तथा मनोरंजन के साधन निरंतर उपलब्ध होते रहते हैं। सातवीं दृष्टि से शत्रु शनि की राशि वाले दशम भाव को देखने के कारण जातक का अपने पिता से वैमनस्य रहता है तथा राज्य एवं सम्मान के क्षेत्र में कमी बनी रहती है। कुल मिला कर-ऐसा जातक सब प्रकार से सपन्न होते हुए भी यशस्वी सम्मानित नहीं हो पाता।

६४ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश पाँचवें भाव में अपने मित्र सूर्य की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक बड़ा विद्वान्, बुद्धिमान एवं सन्ततिवान होता है। मेष लग्न : पंचमभाव : चन्द्र सातवीं दृष्टि से अपने शत्रु शनि की राशि वाले ग्यारहवें भाव को देखने के कारण उसे आय के साधनों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, परन्तु उन्हें वह अपने धैर्य एवं शांत स्वभाव से सहन कर लेता है। कुल मिला कर ऐसी ग्रह स्थिति का व्यक्ति धीर, गंभीर, शांत, योग्य, विद्वान्, सन्तोषी, माता से सुखी, भू-सम्पत्ति का स्वामी, परन्तु व्यव- साय एवं लाभ के क्षेत्र में कठिनाइयां उठाने वाला होता है। १३२ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश छठे भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक शत्रुपक्ष में शांति का अनुभव करता है तथा विपत्तियों पर अपने धैर्य एवं विनम्रता मेष लग्न : षष्ठभाव : चन्द्र के बल पर विजय प्राप्त करता है। उसके घरेलू वाता- वरण में भी अशांति एवं कमियां बनी रहती हैं। सातवीं दृष्टि से अपने मित्र गुरु की राशि वाले बारहवें भाव को देखने के कारण जातक शुभ कार्यों में व्यय करता है तथा बाहरी स्थानों में लाभ एवं सुख भी प्राप्त करता है। कुल मिला कर ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक विनम्र, धैर्यवान, शुभकर्म करने वाला तथा घरेलू जीवन में त्रुटियों का शिकार बना रहने वाला होता है। १३३ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश सातवें भाव में अपने सामान्य मित्र शुक्र की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक स्त्री-सुख एवं भोग-विलास को प्राप्त करने वाला, सुन्दर, एवं भूमि तथा सम्पत्ति का सुख पाने वाला होता है। मेष लग्न : सप्तमभाव : चन्द्र सातवीं दृष्टि से अपने मित्र मंगल की राशि वाले पहले भाव को देखने के कारण जातक शारीरिक, सौन्दर्य, सम्मान, मनोरंजन, सुख आदि को प्राप्त करता है। कुल मिला कर ऐसी ग्रह स्थित वाला जातक सुन्दर, विलासी, यशस्वी तथा व्यावसायिक एवं सुख के क्षेत्र में सफलता पाने वाला होता है।

६५ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मेष लग्न : अष्टमभाव : चन्द्र आठवे भाव में अपने मित्र मंगल की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा अचल सम्पत्ति के पक्ष में हानि उठानी पड़ती है। उसे पुरातत्त्व तथा आयु संबंधी संकट भी उठाने पड़ते हैं तथा घरेलू-सुखशान्ति में भी कमी रहती है। सातवीं उच्चदृष्टि से शुक्र की राशि वाले द्वितीय भाव को देखने के कारण जातक को धन प्राप्ति के योग निरन्तर मिलते रहते हैं तथा वह धन एवं सुख को अर्जित करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील भी बना रहता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मेष लग्न : नवमभाव : चन्द्र नवेंभाव में अपने मित्र गुरु की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक धर्म-कर्म, दान, पुण्य, तीर्थ- यात्रा आदि की ओर अधिक आकर्षित रहता है। उसे माता, भूमि तथा सम्पत्ति का सुख भी प्राप्त होता है। सातवीं दृष्टि से चन्द्रमा अपने मित्र बुध की राशि वाले तृतीयभाव को देखता है। अतः जातक के भाई-बहिनों का सुख प्राप्त होगा तथा पराक्रम में भी वृद्धि बनी रहेगी। कुल मिलाकर इस ग्रह-स्थिति का जातक सौभाग्यशाली, धन-सम्पत्तिवान, भाई-बहिनों से युक्त तथा धार्मिक आचार- विचारों वाला होता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश 'मेष' लग्न : दशमभावः चन्द्र दसवें भाव में अपने शत्रु शनि की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक का अपने पिता से वैमनस्य रहता है, परन्तु उसे राज्य में सम्मान की प्राप्ति होती है और वह अपने परिश्रम एवं अध्यवसाय द्वारा व्यवसाय में भी सफलता प्राप्त करता है। सातवीं दृष्टि से चन्द्रमा अपनी राशि वाले चतुर्थ भाव की देखता है, अतः उसे माता, भूमि, भवन, सम्पत्ति आदि का अच्छा सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति अपने परिश्रम द्वारा अपना मकान बनवाता तथा सुख प्राप्त करता है।

१६ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मेष लग्न : एकादशभावः चन्द्र ग्यारहवें भाव में अपने शत्रु शनि की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक अपने मनोबल के प्रभाव से अपनी आय के साधनो को बढ़ाता तथा सुखी जीवन बिताता है। सामान्यतः उसे आय के साधनो में कुछ कठिनाइयां आती रहती है। सातवीं दृष्टि से चन्द्रमा अपने मित्र की राशि वाले पंचम भाव को देखता है, अतः जातक विद्वान् बुद्धिमान् तथा सन्ततिवान् होता है। कुल मिलाकर ऐसी ग्रह स्थिति वाला व्यक्ति विद्या बुद्धि के द्वारा अपनी उन्नति करता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश मेषलग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में अपने मित्र गुरु की राशि में स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक शुभ कार्यों तथा शान-शौकत मे खर्च करने वाला तथा बाहरी स्थानों से सम्बन्ध रखने वाला होता है। सातवीं दृष्टि से चन्द्रमा अपने मित्र बुध की राशि वाले षष्ठभाव को देखता है, अतः जातक शत्रु पक्ष पर शान्ति से विजय पायेगा तथा अपनी बुद्धिमत्ता से हर प्रकार के झगड़ों को निपटाने में सफल हुआ करेगा। कुल मिला कर ऐसी ग्रहस्थिति का व्यक्ति सुखी तथा सन्तुष्ट जीवन बिताने वाला एवं शत्रुपक्ष पर अपनी शालीनता से विजय पाने वाला होता है। 'मेष' लग्न में 'मंगल' 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मेष लग्नः प्रथमभावः मंगल पहलेभाव में स्वराशि स्थित मंगल के प्रभाव से जातक पुष्ट शरीर वाला आत्म-बली तथा साहसी होता है। आठवें भाव का स्वामी होने तथा उसे पूर्ण दृष्टि के कारण मंगल जातक को कभी-कभी रोगों का शिकार भी बना देता है परन्तु आयु लम्बी देता है। सातवीं दृष्टि से शुक्र की राशि वाले सप्तम भवन को भी देखता है। अतः जातक को अपनी पत्नी तथा व्यवसाय के मामले में कुछ हानि भी उठानी पड़ती है।

६७ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश दूसरे भाव में अपने शत्रु शुक्र की राशि मेष लग्न: द्वितीयभाव: मंगल में स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की धन-संचय में कमी तथा शरीर में कष्ट का सामना करना पड़ता है । चतुर्थ दृष्टि से पंचमभाव को देखने के कारण जातक विद्या तथा संतान के पक्ष में कुछ कठिनाइयों का सामना करता है । सातवीं दृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण दीर्घायु एवं पुरातत्त्व का लाभ देता है। आठवीं दृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण भाग्योन्नति में भी रुकावटें डालता रहता है। २४१ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश तीसरे भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर मेष लग्न : तृतीयभाव : मंगल स्थित मंगल के प्रभाव से जातक पराक्रमी तथा साहसी होता है, परन्तु मंगल के षष्ठमेशी होने के कारण भाई-बहिन के सुख में कमी आ जाती है । चौथी दृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण जातक शत्रुजयी होता है और हिम्मत से काम लेकर उन पर अपना प्रभाव डालता है। सातवीं दृष्टि के मित्र बुध की राशि वाले नवमभाव को देखने के कारण भाग्योन्नति करता है तथा आठवीं दृष्टि से शत्रु शनि की राशि वाले दशमभाव को देखने के कारण राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयाँ भी उपस्थित करता रहता है । २४२ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश चौथे भाव में अपने मित्र चन्द्रमा की राशि पर मेष लग्न : चतुर्थभाव : मंगल स्थित नीच के मंगल के प्रभाव से जातक को माता के -सुख, भूमि, भवन तथा सुख के क्षेत्र में कमी रहती है । चौथी दृष्टि से शत्रु शुक्र की राशि वाले सप्तमभाव को देखने के कारण स्त्री के सुख में कमी रहती है । सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु शनि की राशि वाले दशमभाव को देखने के कारण पिता एवं राज्य द्वारा लाभ होता है । आठवीं दृष्टि के शत्रु शनि की राशि वाले ग्यारहवें भाव को देखने के कारण लाभ प्राप्ति २४३ के लिए जातक को अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है ।

६८ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश पांचवें भाव में मित्र सूर्य की राशि पर 'मेष लग्न : पंचमभाव : मंगल स्थित मंगल के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के पक्ष में कठिनाइयाँ आती हैं। चौथी दृष्टि से स्वराशि के अष्टमभाव को देखने के कारण जातक की आयु तथा पुरातत्व का साथ देता है। सातवीं दृष्टि से सम-शनि की राशि के ग्यारहवें भाव को देखने से कुछ कठिनाइयो के साथ लाभ के योग उपस्थित करता है तथा आठवीं दृष्टि से मित्र गुरु के बारहवें भाव को देखने के कारण खर्च अधिक कराता है तथा बाहरी स्थानों से आजीविका के सम्बन्ध बनाता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश छठे भाव में मित्र बुध की राशि में मेष लग्न : षष्ठभाव : मंगल स्थित मंगल के प्रभाव से जातक शत्रुजयी, साहसी तथा निर्भय होता है। चौथी दृष्टि से शनि की राशि के दसवें भाव को देखने के कारण भाग्यो- न्नति में कठिनाइयाँ देता है। सातवीं दृष्टि से मित्र गुरु की राशि के बारहवें भाव को देखने के कारण खर्च अधिक तथा बाहरी स्थानों से लाभ कराता है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि वाले प्रथमभाव को देखने के कारण जातक को शरीर से स्वस्थ, स्वाभिमानी तथा प्रवल प्रभाव वाला बनाये रखता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश सातवें भाव में शुक्र की राशि में स्थित मेष लग्न : सप्तमभाव : मंगल मंगल के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में कठिनाइयाँ आती हैं। चौथी उच्च दृष्टि से शनि की राशि के दशमभाव को देखने के कारण पिता एवं राज्य द्वारा उन्नति के साधन तथा यश देता है। सातवी दृष्टि से स्वराशि वाले प्रथमभाव को देखने से जातक के शरीर को स्वस्थ तथा प्रभावशाली बनाता है। आठवीं दृष्टि से शुक्र की राशि वाले द्वितीयभाव को देखने के कारण जातक को धन तथा कुटुम्ब वृद्धि के लिए अधिक परिश्रम करने पर भी न्यून सफलता देता है।

६६ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मेष लग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव में स्वराशि स्थित मंगल के प्रभाव से जातक दीर्घायु तथा पुरातत्त्व का लाभ प्राप्त करता है, परन्तु लग्न का स्वामी भी होने के कारण शारीरिक सौन्दर्य में कमी देता है। चतुर्थ दृष्टि से शनि की राशि वाले एकादश भाव को देखने के कारण आय के क्षेत्र में कठिनाइयों के साथ सफलता देता है। सातवीं दृष्टि से शत्रु शुक्र की राशि वाले द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के बारे में चिन्ता बनी रहती है। आठवीं मित्रदृष्टि के तृतीयभाव के देखने के कारण जातक के पराक्रम को बढ़ाता है, परन्तु अष्टमेश होने के कारण भाई-बहिन के सुख में कमी भी लाता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश नवें भाव में मित्र राशिस्थ मंगल के मेष लग्न : नवमभाव : मंगल प्रभाव से जातक के भाग्य की उन्नति होती है, परन्तु मंगल के अष्टमेश होने के कारण कुछ कठिनाइयाँ भी आती रहती हैं। चौथी मित्र- दृष्टि से बारहवें भाव को देखने से खर्च की अधिकता तथा बाहरी स्थानों से सम्बन्ध रहता है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीय भाव को देखने के कारण जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु मंगल के अष्टमेश भी होने के कारण भाई-बहिन के सुख में कमी आती है। आठवीं नीच दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने के कारण माता, भूमि, भवन आदि के सुख में कमी बनी रहती है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' में स्थित 'मंगल' का फलादेश मेष लग्न : दशमभाव : मंगल दसवें भाव में शनि की राशि पर स्थित उच्च मंगल के प्रभाव के जातक अपने पिता से शत्रुता रखता है, परन्तु व्यवसाय एवं राज्य के क्षेत्र में उन्नति करता है। चौथी दृष्टि से स्वक्षेत्री प्रथम- भाव को देखने के कारण शारीरिक प्रभाव में उन्नति देता है। सातवीं नीचदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी आती है। आठवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में जातक को विशेष सफलता प्राप्त होती है।

१०० 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश 'मेष' लग्न : एकादशभाव : मंगल ग्यारहवें भाव में शनि की राशिस्थ मंगल के प्रभाव से जातक की आय में वृद्धि होती रहती है, परन्तु अष्टमेश दोष होने के कारण कुछ कठिनाइयां भी आती हैं। चौथी दृष्टि से शत्रु की राशि वाले द्वितीयभाव में देखने के कारण धन तथा कुटुम्ब सम्बन्धी असन्तोष रहता है। सातवीं दृष्टि से मित्रराशि के पञ्चमभाव को देखने से सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र में कमी बनी रहती है। आठवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुपक्ष पर प्रभाव बढ़ता है तथा जातक बड़ा साहसी होता है। 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश मेष लग्न : द्वादशभाव : मंगल बारहवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित मंगल के प्रभाव से जातक बाहरी स्थानों में भ्रमण करने वाला तथा अत्यधिक खर्च करने वाला होता है। उसके शारीरिक सौंदर्य में भी कमी रहती है। चौथी मित्र दृष्टि से तृतीयभाव को देखने के कारण जातक पराक्रमी होता है, परन्तु मंगल के अष्टमेश होने के कारण भाई-बहिनों के सुख में कमी आ जाती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से छठे भाव को देखने के कारण जातक शत्रु पक्ष में प्रबल रहता है। आठवीं दृष्टि से शुक्र की राशि वाले सप्तम भाव को देखने से स्त्री-सुख में कमी आती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयां आती रहती हैं। 'मेष' लग्न में 'बुध' 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मेष लग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में मित्र राशिस्थ बुध के प्रभाव से जातक पुरुषार्थी होता है, परन्तु बुध के षष्ठेश दोष के कारण रोग-पीड़ित भी रहता है। इसी कारण भाई-बहिनों के सुख में भी कुछ कमी आ जाती है। सातवीं मित्रदृष्टि से सातवें भाव को देखने के कारण व्यवसाय के क्षेत्र में तो परिश्रम द्वारा सफलता प्राप्त होती है, परन्तु स्त्री-सुख में कुछ कठिनाइयों के बाद ही सफलता मिल पाती है।

१०१ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मेष लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में मित्र राशिस्थ बुध के प्रभाव से जातक के धन एवं पुरुषार्थ में वृद्धि तो होती है, परन्तु बुध के अष्टमेश होने के कारण धनप्राप्ति के क्षेत्र में कठिनाइयों तथा हानि का सामना भी करना पड़ता है। बुध के तृतीयेश होने के कारण भाई-बहिन के सुख में भी कमी आ जाती है। सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव की देखने के कारण जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा उसे पुरातत्त्व सम्बन्धी लाभ भी होते हैं। १५३ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मेषलग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में स्वराशिस्थ बुध के प्रभाव से जातक अत्यन्त पराक्रमी तथा हिम्मती होता है, परन्तु षष्ठेश होने के कारण जहाँ शत्रुओं पर विजय दिलाता है, वहीं भाई-बहिन के सुख में कमी भी ले आता है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने के कारण जातक अपने ही पराक्रम से भाग्य की वृद्धि करता है तथा कुछ कमी के साथ धर्म-पालन की ओर भी प्रेरित करता रहेगा। ऐसी ग्रह स्थिति वाला जातक विवेकी, परिश्रमी तथा पराक्रमी होता है। १५४ 'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश मेषलग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक की माता, भूमि, भवन तथा सुख के पक्ष में कुछ कमियां बनी रहती हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव की देखने के कारण जातक को पिता एवं राज्य पक्ष द्वारा सम्मान तथा सफलतायें मिलती हैं। ऐसी ग्रह स्थिति का जातक यशस्वी होता है तथा प्रत्येक क्षेत्र में कुछ परेशानियों के बाद ही सफलता प्राप्त करता है। १५५