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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

२८० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


उत्पन्न हुआ। ग्राम्य और जंगली ओषधियाँ तथा पशु एवं मृग आदि भी आपसे ही प्रकट हुए हैं। देवदेव! आप ध्येय और ध्यानसे परे हैं। आपने ही ओषधियोंको उत्पन्न किया है। आप ही सात मुखोंवाले देदीप्यमान विग्रहसे युक्त काल हैं। यह स्थावर और जङ्गम तथा चर और अचर सम्पूर्ण जगत् आपसे ही प्रकट हुआ है और आपमें ही स्थित है। आप अनिरुद्ध, वासुदेव, प्रद्युम्न तथा दैत्यनाशक संकर्षण हैं। देव! आप सम्पूर्ण देवताओंमें श्रेष्ठ और समस्त विश्वके परम आश्रय हैं। कमलनयन! मेरी रक्षा कीजिये। नारायण! आपको नमस्कार है। भगवन्! विष्णो! आपको नमस्कार है। पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। सर्वलोकेश्वर! आपको नमस्कार है। कमलालय! आपको नमस्कार है। गुणालय! आपको नमस्कार है। गुणाकर! आपको नमस्कार है। वासुदेव! आपको नमस्कार है। सुरोत्तम! आपको नमस्कार है। जनार्दन! आपको नमस्कार है। सनातन! आपको नमस्कार है।

योगिगम्य परमेश्वर! आपको नमस्कार है। योगके आश्रयस्थान! आपको नमस्कार है। गोपते! श्रीपते! मरुत्पते! श्रीविष्णो! आपको नमस्कार है। जगत्पते! आप जगत्को उत्पन्न करनेवाले और ज्ञानियोंके स्वामी हैं। आपको नमस्कार है। दिवस्पते! आपको नमस्कार है। महीपते! आपको नमस्कार है। पुण्डरीकाक्ष! आप मधु दैत्यका वध करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है, नमस्कार है। कैटभको मारनेवाले नारायण! आपको नमस्कार है। सुब्रह्मण्य! आपको नमस्कार है। पीठपर वेदोंको धारण करनेवाले महामत्स्यरूप अच्युत! आपको नमस्कार है। आप समुद्रके जलको मथ डालनेवाले और लक्ष्मीको आनन्द देनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। विशाल नासिकावाले अश्वमुख भगवान् हयग्रीव! महापुरुषविग्रह! आप मधु और कैटभका नाश करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। प्रभो! आप पृथ्वीको ऊपर उठानेके लिये विशाल कच्छपका शरीर धारण करनेवाले हैं, आपने अपनी पीठपर मन्दराचलको धारण किया था। महाकूर्मस्वरूप आप भगवान्को नमस्कार है। पृथ्वीका उद्धार करनेवाले महावराहको नमस्कार है। भगवन्! आपने ही पहले-पहल वराहरूप धारण किया था, अतः आप आदिवराह कहलाते हैं। आप विश्वरूप और विधाता हैं, आपको नमस्कार है। आप अनन्त, सूक्ष्म, मुख्य, श्रेष्ठ, परमाणुस्वरूप तथा योगिगम्य हैं। आपको नमस्कार है। जो परम कारण (प्रकृति)-के भी कारण हैं, योगीश्वर-मण्डलके आश्रयस्थान हैं, जिनके स्वरूपका ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है, जो क्षीरसागरके भीतर निवास करनेवाले महान् सर्प—शेषनागकी सुन्दर शय्यापर शयन करते हैं तथा जिनके कानोंमें सुवर्ण एवं रत्नोंके बने हुए दिव्य कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं, उन आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है।

कण्डुमुनिके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर कहा—'मुनिश्रेष्ठ! तुम मुझसे जो कुछ पाना चाहते हो, उसे शीघ्र कहो।'

कण्डु बोले—जगन्नाथ! यह संसार अत्यन्त दुस्तर और रोमाञ्चकारी है। इसमें दुःखोंकी ही अधिकता है। यह अनित्य और केलेके पत्तेकी भाँति सारहीन है। इसमें न कहीं आश्रय है, न अवलम्ब। यह जलके बुलबुलोंकी भाँति चञ्चल है। इसमें सब प्रकारके उपद्रव भरे हुए हैं। यह दुस्तर होनेके साथ ही अत्यन्त भयानक है। मैं आपकी मायासे मोहित होकर चिरकालसे इस संसारमें भटक रहा हूँ, किंतु कहीं भी शान्ति नहीं पाता। मेरा मन विषयोंमें आसक्त है। देवेश! इस संसारके भयसे पीड़ित होकर आज मैं आपकी

७०- मुनियोंका भगवान्‌के अवतारके सम्बन्धमें प्रश्न और श्रीव्यासजीद्वारा उसका उत्तर

* मुनियोंका भगवान्‌के अवतारके सम्बन्धमें प्रश्न और श्रीव्यासजीद्वारा उसका उत्तर * २८१


शरणमें आया हूँ। श्रीकृष्ण ! आप इस भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये। सुरेश्वर ! मैं आपकी कृपासे आपके ही सनातन परम पदको प्राप्त करना चाहता हूँ, जहाँ जानेसे फिर इस संसारमें नहीं आना पड़ता।

श्रीभगवान् बोले— मुनिश्रेष्ठ ! तुम मेरे भक्त हो। सदा मेरी ही आराधना करते रहो। तुम्हें मेरे प्रसादसे अभीष्ट मोक्षपदकी प्राप्ति होगी। विप्रवर ! मेरे भक्त क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र तथा अन्त्यज भी परम सिद्धिको प्राप्त होते हैं; फिर तुम-जैसे तपोनिष्ठ ब्राह्मणकी तो बात ही क्या है ! चाण्डाल भी यदि उत्तम श्रद्धासे युक्त एवं मेरा भक्त हो तो उसे अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है; फिर औरोंकी तो चर्चा ही क्या है।*

व्यासजी कहते हैं— यों कहकर भक्तवत्सल भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके चले जानेपर मुनिवर कण्डु बहुत प्रसन्न हुए और समस्त कामनाओंका त्याग करके स्वस्थचित्त हो गये। समस्त इन्द्रियोंको वशमें करके ममता और अहंकारसे रहित हो एकाग्रचित्तसे भगवान् पुरुषोत्तमका ध्यान करने लगे। भगवान्‌के निर्लेप, निर्गुण, शान्त और सन्मात्र स्वरूपका चिन्तन करते हुए उन्होंने दुर्लभ मोक्ष प्राप्त कर लिया। जो महात्मा कण्डुकी कथाको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो स्वर्गलोकमें जाता है। मुनिवरो ! इस प्रकार मैंने इस कर्मभूमि तथा मोक्षदायक पुरुषोत्तमक्षेत्रका वर्णन किया, जहाँ साक्षात् भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैं। जो मनुष्य संसारजनित दुःखोंका नाश और मोक्ष प्रदान करनेवाले वरदायक भगवान् श्रीपुरुषोत्तमका भक्तिपूर्वक दर्शन, स्तवन और ध्यान करते हैं, वे समस्त दोषोंसे मुक्त हो भगवान्‌के अविनाशी धाममें जाते हैं।

मुनियोंका भगवान्‌के अवतारके सम्बन्धमें प्रश्न और श्रीव्यासजीद्वारा उसका उत्तर

मुनि बोले— पुरुषश्रेष्ठ व्यासजी ! आपने भारतवर्ष तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रके अद्भुत गुणोंका वर्णन किया। उस क्षेत्रके उत्तम माहात्म्यको सुनकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। हमारे मनमें बहुत दिनोंसे एक संदेह है। उसका निवारण करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है। हम भूतलपर श्रीकृष्ण, बलदेव और सुभद्राके अवतारका रहस्य सुनना चाहते हैं। वीरवर श्रीकृष्ण और बलभद्र किसलिये अवतीर्ण हुए थे ? वे वसुदेवके पुत्र होकर नन्दके घरमें क्यों रहे ? यह मर्त्यलोक सर्वथा निःसार है। इसमें अधिकतर दुःख ही भरा है। यह पानीके बुलबुलेकी भाँति अत्यन्त चञ्चल—क्षणभङ्गुर है। इसकी भयंकरता इतनी बढ़ी हुई है कि उसका विचार आते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसे संसारमें उन्हें जन्म ग्रहण करनेकी क्या आवश्यकता थी ? इस भूतलपर अवतीर्ण हो उन्होंने जो-जो लीलाएँ कीं, उनका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। उनका सम्पूर्ण चरित्र अद्भुत और अलौकिक है। भगवान् सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी एवं सुरश्रेष्ठ हैं और पृथ्वीको उत्पन्न करनेवाले तथा अविनाशी परमात्मा हैं। उन्होंने अपने दिव्य स्वरूपको मनुष्योंके बीचमें कैसे प्रकट किया ? जो भगवान् सम्पूर्ण जङ्गम


* मद्भक्ताः क्षत्रिया वैश्याः स्त्रियः शूद्रान्त्यजातिजाः। प्राप्नुवन्ति परां सिद्धिं किं पुनस्त्वं द्विजोत्तम॥
श्वपाकोऽपि च मद्भक्तः सम्यक् श्रद्धासमन्वितः। प्राप्नोत्यभिमतं सिद्धिमन्येषां तत्र का कथा॥ (१७८।१८५-१८६)

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  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

प्राणियोंकी गति हैं, वे मानव-शरीरमें कैसे आये? इसे देवता और दैत्य भी बड़े आश्चर्यकी बात मानते हैं। महामुने! आप भगवान् विष्णुके आश्चर्यजनक अवतारकी कथा सुनाइये। भगवान्के बल और पराक्रम विख्यात हैं। उनके तेजकी कोई माप नहीं है। वे अपने अलौकिक चरित्रोंके द्वारा आश्चर्यरूप जान पड़ते हैं। आप उनके तत्त्वका वर्णन कीजिये। भगवान् पुरुषोत्तम देवताओंकी पीड़ा दूर करनेवाले और सर्वव्यापी हैं। जगत्के रक्षक और सर्वलोकमहेश्वर हैं। संसारकी सृष्टि, पालन और संहार—सब वे ही करते हैं। वे ही सब लोकोंको सुख देनेवाले हैं। वे अक्षय, सनातन, अनन्त, क्षय और वृद्धिसे रहित, निर्लेप, निर्गुण, सूक्ष्म, निर्विकार, निरञ्जन, समस्त उपाधियोंसे रहित, सत्तामात्ररूपसे स्थित, अविकारी, विभु, नित्य, अचल, निर्मल, व्यापक, नित्यतृप्त, निरामय तथा शाश्वत परमात्मा हैं। सत्ययुगमें उनका विशुद्ध ‘हरि’ नाम सुना जाता है। देवताओंमें वे वैकुण्ठ और मनुष्योंमें श्रीकृष्ण नामसे विख्यात हैं। उन्हीं परमेश्वरकी भूत और भविष्य लीलाओंको, जिनका रहस्य अत्यन्त गहन है, हम सुनना चाहते हैं।

**व्यासजी बोले—**जो सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी, सबकी उत्पत्तिके कारण, पुराणपुरुष, सनातन, अविनाशी, चतुर्व्यूहस्वरूप, निर्गुण, गुणरूप, परम महान्, परम गुरु, वरेण्य, असीम, यज्ञाङ्ग और देवता आदिके प्रियतम हैं, उन भगवान् विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनसे लघु और जिनसे महान् दूसरा कोई नहीं है, जिन अजन्मा प्रभुने सम्पूर्ण चराचर जगत्को व्यास कर रखा है, जो आविर्भाव, तिरोभाव, दृष्ट और अदृष्टसे विलक्षण हैं, सृष्टि और संहारको भी जिनका स्वरूप बतलाया जाता है, उन आदिदेव परब्रह्म परमात्माको मैं समाधिके द्वारा प्रणाम करता हूँ। जो सम्पूर्ण विकारोंसे रहित, शुद्ध, नित्य, सदा एकरूप रहनेवाले और विजयी हैं, उन परमात्मा श्रीविष्णुको नमस्कार है। जो हिरण्यगर्भ, हरि, शंकर तथा वासुदेव कहलाते हैं, जिनसे समस्त प्राणियोंका तरण-तारण होता है, जो सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है। जो एक होते हुए भी अनेक रूपोंमें प्रकट होते हैं, स्थूल और सूक्ष्म, व्यक्त और अव्यक्त जिनके स्वरूप हैं और जो मोक्षके कारण हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जो जगन्मय हैं, जगत्की सृष्टि, पालन और संहारके मूल कारण हैं, उन परमात्मा, भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जो सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर, सम्पूर्ण विश्वके आधारभूत, समस्त प्राणियोंके भीतर विराजमान और अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले हैं, उन भगवान् पुरुषोत्तमको प्रणाम है। जो वास्तवमें अत्यन्त निर्मल ज्ञानस्वरूप होते हुए भी भ्रमपूर्ण दृष्टिके कारण भिन्न-भिन्न पदार्थोंके रूपमें स्थित दिखायी देते हैं, जिनका आदि नहीं है, जो सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर, अजन्मा, अक्षय और अविनाशी हैं, उन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार करके मैं उनके अवतारकी कथा आरम्भ करता हूँ।

पूर्वकालमें दक्ष आदि श्रेष्ठ मुनियोंके पूछनेपर कमलयोनि भगवान् ब्रह्माने जो कुछ कहा था, वही मैं भी आपलोगोंसे कहूँगा। जो अपने चारों मुखोंसे ऋक्, साम आदि चारों वेदोंका उच्चारण करते हुए तीनों लोकोंको पवित्र करते हैं, जिनका प्रादुर्भाव एकार्णवके जलसे हुआ है, असुरगण जिनके यज्ञोंका लोप नहीं कर पाते, उन भगवान् ब्रह्माजीको प्रणाम करके मैं उन्हींकी कही हुई कथा आरम्भ करता हूँ। जिन्होंने सृष्टिके उद्देश्यसे धर्म आदिको प्रकट किया है, उन अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके सम्पूर्ण मतका ही मैं वर्णन करूँगा।

  • मुनियोंका भगवान्‌के अवतारके सम्बन्धमें प्रश्न और श्रीव्यासजीद्वारा उसका उत्तर * २८३

तत्त्वदर्शी मुनियोंने जलको 'नार' कहा है। वह नार पूर्वकालमें भगवान्‌का अयन (निवासस्थान) हुआ। इसलिये वे नारायण कहलाते हैं। वे भगवान् नारायण सबको व्यास करके स्थित हैं। वे ही सगुण और निर्गुण कहलाते हैं। वे दूर भी हैं और समीप भी। उनकी 'वासुदेव' संज्ञा है। ममताका त्याग करनेपर ही उनका साक्षात्कार होता है। उनमें रूप और वर्ण आदि काल्पनिक भाव नहीं हैं। वे सदा शुद्ध, सुप्रतिष्ठित और एकरूप हैं। जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मका उत्थान होता है, तब-तब वे अपने-आपको संसारमें प्रकट करते हैं। पूर्वकालमें उन्हीं प्रजापालक भगवान्‌ने वाराहरूप धारण करके थूथनसे जलको हटाया और रसातलमें डूबी हुई पृथ्वीको अपनी एक दाढ़से कमलके फूलकी भाँति ऊपर उठा लिया। उन्होंने ही नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुका वध किया और विप्रचित्ति आदि अन्य दानवोंको भी मार गिराया। फिर वामन अवतार लेकर मायासे बलिको बाँधा और दैत्योंको जीतकर तीनों लोकोंको अपने तीन पगोंसे ही नाप लिया। वे ही भृगु-वंशमें परमप्रतापी जमदग्निकुमार परशुरामके रूपमें उत्पन्न हुए, जिन्होंने पिताके वधका बदला लेनेके लिये क्षत्रियोंका संहार कर डाला। उन्हीं भगवान्‌ने अत्रिकुमार प्रतापी दत्तात्रेयके रूपमें अवतीर्ण हो महात्मा अलर्कको अष्टाङ्गयोगका उपदेश दिया। त्रेतामें दशरथनन्दन श्रीरामके रूपमें प्रकट होकर उन्होंने ही त्रिभुवनको भय देनेवाले रावणका युद्धमें संहार किया।

प्रलयकालमें जब सारी सृष्टि एकार्णवमें निमग्न हो गयी, उस समय देवताओंके भी देवता जगत्पति श्रीविष्णु एक सहस्र युगोंतक शेषनागकी शय्यापर सोते रहे। वास्तवमें वे योगनिद्राका आश्रय ले अपनी योगमहिमामें स्थित हो गये थे। सम्पूर्ण चराचर जगत्को उन्होंने अपने उदरमें स्थापित कर रखा था। जनलोकनिवासी सिद्ध और महर्षि उनकी स्तुति करते थे। उसी समय उनकी नाभिसे एक कमल प्रकट हुआ, जो दिशारूपी पत्रोंसे सुशोभित, अग्नि और सूर्यके समान तेजोमय और पर्वतरूपी केसरोंसे अलंकृत था। सुवर्णमय मेरुगिरि उसका किञ्जल्क (केसरका मध्यभाग) था। वह कमल ही पितामह ब्रह्माजीका सुन्दर गृह था। उसीमें चार मुखोंवाले देवाधिदेव ब्रह्माजी प्रकट हुए। उस समय भगवान् विष्णुके कानोंकी मैलसे दो महाबली और महापराक्रमी दानव उत्पन्न हुए, जो ब्रह्माजीको मार डालनेके लिये उद्यत हो गये। उनका नाम मधु और कैटभ था। भगवान्‌ने समुद्ररूपी शयनगृहसे उठकर उन दोनों दुर्धर्ष दैत्योंका वध किया। ये तथा और भी भगवान्‌की असंख्य लीलाएँ हैं, जिनकी मैं गणना नहीं कर सकता। इस समय अजन्मा भगवान्‌के जिस अवतारका प्रसङ्ग चल रहा है, वह मथुरामें हुआ था। इस प्रकार भगवान्‌की जो सात्त्विक मूर्ति है, वही अवतार धारण करती है। वह प्रद्युम्न नामसे विख्यात है और सदा रक्षाकार्यमें संलग्न रहती है। वह भगवान् वासुदेवकी इच्छाके अनुसार देवता, मनुष्य और तिर्यक् योनिमें अवतीर्ण होती है और उसीके अनुकूल स्वभाव बना लेती है। भक्त पुरुषोंद्वारा पूजित होनेपर वह उनकी मनोवाञ्छित कामनाओंको भी पूर्ण करती है। इस तरह मैंने यहाँ भगवान्‌के अवतारका रहस्य बतलाया है। भगवान् विष्णु यद्यपि कृतकृत्य हैं, उन्हें कुछ करना अथवा पाना नहीं है तो भी वे लोक-कल्याणके लिये ही मानवरूपमें प्रकट हुए थे।

७१- भगवान्‌के अवतारका उपक्रम

२८४* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

भगवान्‌के अवतारका उपक्रम

व्यासजी कहते हैं— मुनिवरो! अब मैं संक्षेपसे श्रीहरिके अवतारका वर्णन करता हूँ, सुनो। भगवान् इस पृथ्वीका भार उतारनेकी इच्छासे अवतार लेते हैं। जब-जब अधर्मकी वृद्धि होती है और धर्मका ह्रास होने लगता है, तब-तब भगवान् जनार्दन अपने स्वरूपके दो भाग करके यहाँ अवतीर्ण होते हैं। साधु पुरुषोंकी रक्षा, धर्मकी स्थापना, दुष्टों तथा अन्य देव-द्रोहियोंका दमन और प्रजावर्गका पालन करनेके लिये वे प्रत्येक युगमें अवतार धारण करते हैं। पहलेकी बात है—यह पृथ्वी अत्यन्त भारसे पीड़ित हो मेरुपर्वतपर देवताओंके समाजमें गयी और ब्रह्मा आदि सब देवताओंको प्रणाम करके खेद एवं करुणामिश्रित वाणीमें अपना सब हाल सुनाने लगी—'सुवर्णके गुरु अग्नि, गौओंके गुरु सूर्य तथा मेरे गुरु सम्पूर्ण लोकोंके वन्दनीय भगवान् नारायण हैं। इस समय ये कालनेमि आदि दैत्य मर्त्यलोकमें जन्म लेकर दिन-रात प्रजाको कष्ट देते रहते हैं। सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने जिस कालनेमि नामक महान् असुरका वध किया था, वही अब उग्रसेनकुमार कंसके रूपमें उत्पन्न हुआ है। अरिष्ट, धेनुक, केशी, प्रलम्ब, नरक, सुन्दासुर, अत्यन्त भयंकर बलिकुमार बाणासुर तथा और भी जो महापराक्रमी दुरात्मा दैत्य राजाओंके घरमें उत्पन्न हुए हैं, उनकी मैं गणना नहीं कर सकती। दिव्यमूर्तिधारी देवताओ! इस समय मेरे ऊपर महाबली और गर्वीले दैत्योंकी अनेक अक्षौहिणी सेनाएँ हैं। सुरेश्वरो! मैं आपलोगोंको बताये देती हूँ कि उन दैत्योंके भारी भारसे पीड़ित होनेके कारण अब मुझमें अपनेको धारण करनेकी भी शक्ति नहीं रह गयी है। अतः आपलोग मेरा भार उतारिये।'

पृथ्वीका यह वचन सुनकर सम्पूर्ण देवताओंने उसका भार उतारनेके लिये ब्रह्माजीको प्रेरित किया। तब ब्रह्माजी बोले—'देवताओ! पृथ्वी जो कुछ कहती है, वह सब ठीक है। वास्तवमें मैं, महादेवजी और तुमलोग—सब भगवान् नारायणके ही स्वरूप हैं। भगवान्‌की जो विभूतियाँ हैं, उन्हींकी परस्पर न्यूनता और अधिकता बाध्य-बाधकरूपसे रहा करती है। इसलिये आओ, हमलोग क्षीरसागरके उत्तम तटपर चलें और वहाँ श्रीहरिकी आराधना करके यह सब वृत्तान्त उनसे निवेदन करें। वे सबके आत्मा हैं, सम्पूर्ण जगत् उनका ही रूप है, वे सदा ही जगत्‌का कल्याण करनेके लिये अपने अंशसे अवतार ले धर्मकी स्थापना करते हैं।'

यों कहकर ब्रह्माजी सम्पूर्ण देवताओंके साथ क्षीरसागरके तटपर गये और एकाग्रचित्त होकर भगवान् गरुड़ध्वजकी स्तुति करने लगे।

* भगवान्‌के अवतारका उपक्रम *२८५

ब्रह्माजी बोले— सहस्रमूर्ते ! आपको बारंबार नमस्कार है। आपके सहस्रों बाँहें, अनेक मुख और अनेक चरण हैं। आप जगत्‌की सृष्टि, पालन और संहारमें संलग्न रहते हैं। अप्रमेय परमेश्वर ! आपको बारंबार नमस्कार है। भगवन् ! आप सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म, परम महान् और बड़े-बड़े गुरुओंसे भी अधिक गौरवशाली हैं। आप प्रकृति, समष्टि बुद्धि (महत्तत्त्व), अहंकार तथा वाणीके भी प्रधान मूल हैं। अपरा-प्रकृतिमय सम्पूर्ण जगत् आपका ही स्वरूप है। आप हमपर प्रसन्न होइये। देव ! यह पृथ्वी आपकी शरणमें आयी है। इस समय भूतलपर जो बड़े-बड़े असुर उत्पन्न हुए हैं, उनके द्वारा पीड़ित होनेसे इसके पर्वतरूपी बन्धन शिथिल पड़ गये हैं। आप सम्पूर्ण जगत्‌के परम आश्रय हैं। आपकी महिमा अपरम्पार है। अतः यह वसुधा अपना भार उतरवानेके लिये आपकी ही सेवामें उपस्थित हुई है। हमलोग भी यहाँ उपस्थित हुए हैं। ये इन्द्र, दोनों अश्विनीकुमार, वरुण, रुद्र, वसु, आदित्य, वायु, अग्नि तथा अन्य सम्पूर्ण देवता यहाँ खड़े हैं। देवेश्वर ! मुझे तथा इन देवताओंको जो कुछ करना हो, उसके लिये आज्ञा दीजिये। आपके ही आदेशका पालन करते हुए हमलोग सदा सम्पूर्ण दोषोंसे मुक्त रहेंगे।

ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर परमेश्वर भगवान् श्रीविष्णुने अपने श्वेत और कृष्ण—दो केश उखाड़े और देवताओंसे कहा—'मेरे ये दोनों केश ही भूतलपर अवतार ले पृथ्वीके भार और क्लेशका नाश करेंगे। सम्पूर्ण देवता भी अपने-अपने अंशसे पृथ्वीपर अवतीर्ण हो पहलेसे उत्पन्न हुए उन्मत्त दैत्योंके साथ युद्ध करें। इसमें संदेह नहीं कि नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे चूर्ण होकर सम्पूर्ण दैत्य नष्ट हो जायँगे। वसुदेवकी पत्नी जो देवकीदेवी हैं, उनके आठवें गर्भसे मेरा यह श्याम केश प्रकट होगा। भूतलपर अवतीर्ण हो यह कालनेमिके अंशसे उत्पन्न हुए कंसका वध करेगा।' यों कहकर भगवान् श्रीहरि अन्तर्धान हो गये। अदृश्य हो जानेपर उन परमात्माको प्रणाम करके सम्पूर्ण देवता मेरुपर्वतके शिखरपर चले गये और वहाँसे पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए।

एक दिन महर्षि नारदने कंससे जाकर कहा—'देवकीके आठवें गर्भसे भगवान् विष्णु उत्पन्न होंगे, जो तुम्हारा वध करेंगे।' यह सुनकर कंसको बड़ा क्रोध हुआ और उसने देवकी तथा वसुदेवको कारागृहमें बंदी बना लिया। वसुदेवने यह प्रतिज्ञा की थी कि 'देवकीके गर्भसे जो-जो पुत्र उत्पन्न होगा, उसे मैं स्वयं लाकर दे दिया करूँगा।' इसके अनुसार उन्होंने अपना प्रत्येक पुत्र कंसको अर्पित कर दिया। सुना गया है प्रथम उत्पन्न हुए छः गर्भ हिरण्यकशिपुके पुत्र थे, जिन्हें भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे योगनिद्राने क्रमशः देवकीके उदरमें स्थापित कर दिया था। योगनिद्रा भगवान् विष्णुकी महामाया है, जिसने अविद्यारूपसे सम्पूर्ण जगत्‌को मोहित कर रखा है। उससे श्रीहरिने कहा—'निद्रे ! तू मेरी आज्ञासे जा और पातालवासी छः गर्भोको एक-एक करके देवकीके गर्भमें पहुँचा दे। ये सब कंसके हाथसे मारे जायँगे। तत्पश्चात् मेरा शेष नामक अंश अपने अंशांशसे देवकीके उदरमें सातवें गर्भके रूपमें प्रकट होगा। वसुदेवजीकी दूसरी भार्या रोहिणी आजकल गोकुलमें रहती हैं। तू प्रसवकालमें वह गर्भ रोहिणीके ही उदरमें डाल देना। उसके विषयमें लोग यही कहेंगे कि 'देवकीका सातवाँ गर्भ भोजराज कंसके डरसे गिर गया।' गर्भका संकर्षण होनेसे रोहिणीका वह वीर पुत्र लोकमें 'संकर्षण' नामसे विख्यात होगा। उसके शरीरका वर्ण श्वेतगिरिके शिखरकी भाँति

७२- भगवान्‌का अवतार, गोकुलगमन, पूतना-वध, शकट-भञ्जन, यमलार्जुन-उद्धार, गोपोंका वृन्दावनगमन तथा बलराम और श्रीकृष्णका बछड़े चराना

२८६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


गौर होगा। तदनन्तर मैं देवकीके उदरमें प्रवेश करूँगा। उस समय तुझे भी यशोदाके गर्भमें अविलम्ब प्रवेश करना होगा। वर्षा-ऋतुमें श्रावणमासके* कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथिको आधी रातके समय मेरा प्रादुर्भाव होगा और तू नवमी तिथिमें यशोदाके गर्भसे जन्म लेगी। उस समय वसुदेव मेरी शक्तिसे प्रेरित होकर मुझे तो यशोदाकी शय्यापर पहुँचा देंगे और तुझे देवकीके पास लायेंगे। फिर कंस तुझे लेकर पत्थरकी शिलापर पछाड़ेगा, किंतु तू उसके हाथसे निकलकर आकाशमें ठहर जायगी। यों करनेपर इन्द्र मेरे गौरवका स्मरण करके तुझे सौ-सौ बार प्रणाम करेंगे और विनीतभावसे अपनी बहिन बना लेंगे। फिर तू शुम्भ-निशुम्भ आदि सहस्रों दैत्योंका वध करके अनेक स्थान बनाकर सारी पृथ्वीकी शोभा बढ़ायेगी। भूति, संतति, कीर्ति, कान्ति, पृथ्वी, धृति, लज्जा, पुष्टि, उषा तथा अन्य जो भी स्त्री-नामधारी वस्तु है, वह सब तू ही है। जो प्रातःकाल और अपराह्नमें तेरे सामने मस्तक झुकायेंगे और तुझे आर्या, दुर्गा, वेदगर्भा, अम्बिका, भद्रा, भद्रकाली, क्षेम्या तथा क्षेमंकरी आदि कहकर तेरी स्तुति करेंगे, उनके समस्त मनोरथ मेरे प्रसादसे सिद्ध हो जायँगे। जो लोग भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थसे तेरी पूजा करेंगे, उन मनुष्योंपर प्रसन्न होकर तू उनकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण करेगी। वे सब लोग सदा मेरी कृपासे निश्चय ही कल्याणके भागी होंगे; अतः देवि! जो कार्य मैंने तुझे बताया है, उसे पूर्ण करनेके लिये जा।'


भगवान्‌का अवतार, गोकुलगमन, पूतना-वध, शकट-भञ्जन, यमलार्जुन-उद्धार, गोपोंका वृन्दावनगमन तथा बलराम और श्रीकृष्णका बछड़े चराना

**व्यासजी कहते हैं—**देवाधिदेव श्रीहरिने पहले जैसा आदेश दिया था, उसके अनुसार जगज्जननी योगमायाने देवकीके उदरमें क्रमशः छः गर्भ स्थापित किये और सातवेंको खींचकर रोहिणीके उदरमें डाल दिया। तदनन्तर तीनों लोकोंका उपकार करनेके लिये साक्षात् श्रीहरिने देवकीके गर्भमें प्रवेश किया और उसी दिन योगनिद्रा यशोदाके उदरमें प्रविष्ट हुईं। भगवान् विष्णुके अंशके भूतलपर आते ही आकाशमें ग्रहोंकी गति यथावत् होने लगी। समस्त ऋतुएँ सुखदायिनी हो गयीं। देवकीके शरीरमें इतना तेज आ गया कि कोई उनकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता था। देवतागण स्त्री-पुरुषोंसे अदृश्य रहकर अपने उदरमें श्रीविष्णुको धारण करनेवाली माता देवकीका प्रतिदिन स्तवन करने लगे।

**देवता बोले—**देवि! तुम स्वाहा, तुम स्वधा और तुम्हीं विद्या, सुधा एवं ज्योति हो। इस पृथ्वीपर सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये तुम्हारा अवतार हुआ है। तुम प्रसन्न होकर सम्पूर्ण जगत्‌का कल्याण करो। हमारी प्रसन्नताके लिये उन परमेश्वरको अपने गर्भमें धारण करो, जिन्होंने स्वयं सम्पूर्ण जगत्‌को धारण कर रखा है।


* यहाँ श्रावणका अर्थ भाद्रपद समझना चाहिये। जहाँ अमावस्याके बाद शुक्लपक्षसे मासका आरम्भ माना जाता है, वहाँकी मास-गणनाको दृष्टिमें रखकर श्रावण मास कहा गया है। जहाँ कृष्णपक्षसे मासका आरम्भ होता है, वहाँ वह तिथि भाद्रपद मासमें ही होगी।

१००-कंसके कारागारमें भगवान्‌का अवतार

  • भगवान्‌का अवतार, गोकुलगमन, पूतना-वध और श्रीकृष्णका बछड़े चराना * २८७

इस प्रकार देवताओं‌द्वारा की हुई स्तुतिको सुनती हुई माता देवकीने जगत्‌की रक्षा करनेवाले कमलनयन भगवान् विष्णुको अपने गर्भमें धारण किया। तदनन्तर वह शुभ समय उपस्थित हुआ, जब कि समस्त विश्वरूपी कमलको विकसित करनेके लिये महात्मा श्रीविष्णुरूपी सूर्यदेवका देवकीरूपी प्रभातवेलामें उदय हुआ। आधी रातका समय था। मेघ मन्द-मन्द स्वरमें गरज रहे थे। शुभ मुहूर्तमें भगवान् जनार्दन प्रकट हुए। उस समय सम्पूर्ण देवता फूलोंकी वर्षा करने लगे। विकसित नील कमलके समान श्यामवर्ण, श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित वक्षःस्थलवाले चतुर्भुज बालकको उत्पन्न हुआ देख परम बुद्धिमान् वसुदेवजीने उल्लासपूर्ण वचनोंमें भगवान्‌का स्तवन किया और कंससे भयभीत होकर कहा—'शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले देवदेवेश्वर! मैंने जान लिया, आप साक्षात् भगवान् हैं; परंतु देव! आप मुझपर कृपा करके अपने इस दिव्य रूपको छिपा लीजिये। आप मेरे भवनमें अवतीर्ण हुए हैं, यह बात जान लेनेपर कंस अभी मुझे कष्ट देगा।'

देवकी बोलीं—जिनके अनन्त रूप हैं, यह सम्पूर्ण विश्व जिनका ही स्वरूप है, जो गर्भमें स्थित होकर भी अपने शरीरसे सम्पूर्ण लोकोंको धारण करते हैं तथा जिन्होंने अपनी मायासे ही बाल-रूप धारण किया है, वे देवदेव प्रसन्न हों। सर्वात्मन्! आप अपने इस चतुर्भुज रूपका उपसंहार कीजिये। दैत्योंका संहार करनेवाले देवेश्वर! आपके इस अवतारका वृत्तान्त कंस न जानने पाये।

श्रीभगवान् बोले—देवि! पूर्वजन्ममें तुमने मुझ-जैसे पुत्रको पानेकी अभिलाषासे जो मेरा स्तवन किया था, वह आज सफल हो गया; क्योंकि आज मैंने तुम्हारे उदरसे जन्म लिया है।

मुनिवरो! यों कहकर भगवान् मौन हो गये तथा वसुदेवजी भी रातमें ही उन्हें लेकर घरसे बाहर निकले। वसुदेवजीके जाते समय पहरा देनेवाले मथुराके द्वारपाल योगनिद्राके प्रभावसे अचेत हो गये थे। उस रातमें बादल वर्षा कर रहे थे। यह देख शेषनागने छत्रकी भाँति अपने फणोंसे भगवान्‌को ढँक लिया और वे वसुदेवजीके पीछे-पीछे चलने लगे। मार्गमें अत्यन्त गहरी यमुना बह रही थीं। उनके जलमें नाना प्रकारकी सैकड़ों लहरें उठ रही थीं, किंतु भगवान् विष्णुको ले जाते समय वे वसुदेवजीके घुटनोंतक होकर बहने लगीं। वसुदेवजीने उसी अवस्थामें यमुनाको पार किया। उन्होंने देखा—नन्द आदि बड़े-बूढ़े गोप राजा कंसका कर लेकर यमुनाके तटपर आये हुए हैं। इसी समय यशोदाजीने भी योगमायाको कन्यारूपमें जन्म दिया। परंतु वे योगनिद्रासे मोहित थीं; अतः 'पुत्र है या पुत्री' इस बातको जान न सकीं। प्रसूतिगृहमें और भी जो स्त्रियाँ थीं, वे सब निद्राके कारण अचेत पड़ी

१०१-कंसका वसुदेव-देवकीके पास अपने कृत्यपर खेद प्रकट करना

२८८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

थीं। वसुदेवजीने चुपकेसे अपने बालकको यशोदाकी शय्यापर सुला दिया और कन्याको लेकर तुरंत लौट आये। जागनेपर यशोदाने देखा—'मेरे नील कमलके समान श्यामसुन्दर बालक हुआ है।' इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। वसुदेवजी भी कन्याको लेकर अपने घर लौट आये और देवकीकी शय्यापर उसे सुलाकर पहलेकी भाँति बैठ रहे। इतनेमें ही बालकके रोनेका शब्द सुनकर पहरा देनेवाले द्वारपाल सहसा उठकर खड़े हो गये। उन्होंने देवकीके संतान होनेका समाचार कंससे निवेदन किया। कंसने शीघ्र ही वहाँ पहुँचकर उस बालिकाको उठा लिया। देवकी रूँधे हुए कण्ठसे 'छोड़ो, छोड़ दो इसे' यों कहकर उसे रोकती ही रह गयीं। कंसने उस कन्याको एक शिलापर दे मारा; किंतु वह आकाशमें ही ठहर गयी और आयुधोंसहित आठ बड़ी-बड़ी भुजाओंवाली देवीके रूपमें प्रकट हुई। उसने ऊँचे स्वरसे अट्टहास किया और कंससे रोषपूर्वक कहा—'ओ कंस! मुझे पटकनेसे क्या लाभ हुआ। जो तेरा वध करेंगे, वे प्रकट हो चुके हैं। देवताओंके सर्वस्वभूत वे श्रीहरि पूर्वजन्ममें भी तेरे काल थे। इन सब बातोंपर विचार करके तू शीघ्र ही अपने कल्याणका उपाय कर।' यों कहकर देवी कंसके देखते-देखते आकाशमार्गसे चली गयी। उसके शरीरपर दिव्य हार, दिव्य चन्दन और दिव्य आभूषण शोभा पा रहे थे और सिद्धगण उसकी स्तुति करते थे।

तदनन्तर कंसके मनमें बड़ा उद्वेग हुआ। उसने प्रलम्ब और केशी आदि समस्त प्रधान असुरोंको बुलाकर कहा—'महाबाहु प्रलम्ब! केशी! धेनुक! और पूतना! अरिष्ट आदि अन्य सब वीरोंके साथ तुमलोग मेरी बात सुनो। दुरात्मा देवताओंने मुझे मार डालनेका यत्न प्रारम्भ किया है। किंतु वे मेरे पराक्रमसे भलीभाँति पीड़ित हो चुके हैं। अतः मैं उन्हें वीरोंकी श्रेणीमें नहीं गिनता। दैत्यवीरो! मुझे तो कन्याकी कही हुई बात आश्चर्य-सी प्रतीत होती है। देवता मेरे विरुद्ध प्रयत्न कर रहे हैं—यह जानकर मुझे हँसी आ रही है। तथापि दैत्येश्वरो! अब हमें उन दुष्टोंका और अधिक अपकार करनेकी चेष्टा करनी चाहिये। देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुई बालिकाने यह भी कहा है कि 'भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी विष्णु, जो पूर्वजन्ममें भी मेरी मृत्युके कारण बन चुके हैं, कहीं-न-कहीं उत्पन्न हो गये।' अतः इस भूतलपर बालकोंके दमनका हमें विशेष प्रयत्न करना चाहिये। जिस बालकमें बलकी अधिकता जान पड़े, उसे यत्नपूर्वक मौतके घाट उतार देना चाहिये।'

असुरोंको ऐसी आज्ञा देकर कंस अपने घर गया और विरोध छोड़कर वसुदेव तथा देवकीसे बोला—'मैंने आप दोनोंके इतने बालक व्यर्थ ही मारे। मेरे नाशके लिये तो कोई दूसरा ही बालक

  • भगवान्का अवतार, गोकुलगमन, पूतना-वध और श्रीकृष्णका बछड़े चराना * २८९

उत्पन्न हुआ है। आपलोग संताप न करें। आपके बालकोंकी भवितव्यता ही ऐसी थी। आयु पूरी होनेपर कौन नहीं मारा जाता।' इस प्रकार सान्त्वना दे कंसने उन दोनोंके बन्धन खोल दिये और उन्हें सब प्रकारसे संतुष्ट किया। तत्पश्चात् वह अपने महलके भीतर चला गया।

बन्धनसे मुक्त होनेपर वसुदेवजी नन्दके छकड़ेके पास आये। नन्द बड़े प्रसन्न दिखायी दिये। मुझे पुत्र हुआ है, यह सोचकर वे फूले नहीं समाते थे। वसुदेवजीने भी कहा—'बड़े सौभाग्यकी बात है कि इस समय वृद्धावस्थामें आपको पुत्र हुआ है। अब तो आपलोगोंने राजाका वार्षिक कर चुका दिया होगा। जिसके लिये यहाँ आये थे, वह काम पूरा हो गया। यहाँ किसी श्रेष्ठ पुरुषको अधिक नहीं ठहरना चाहिये। नन्दजी! जब कार्य हो गया, तब आपलोग क्यों यहाँ बैठे हैं। शीघ्र ही अपने गोकुलमें जाइये। वहाँ रोहिणीके गर्भसे उत्पन्न मेरा भी एक बालक है। उसका भी अपने ही पुत्रकी भाँति लालन-पालन कीजियेगा।'

वसुदेवजीके यों कहनेपर नन्द आदि गोप छकड़ोंपर सामान लादकर वहाँसे चल दिये। उनके गोकुलमें रहते समय रातमें बालकोंकी हत्या करनेवाली पूतना आयी और सोये हुए कृष्णको लेकर अपना स्तन पिलाने लगी। पूतना रातमें जिस-जिसके मुखमें अपना स्तन डालती थी, उस-उस बालकका शरीर क्षणभरमें निर्जीव हो जाता था। श्रीकृष्णने उसके स्तनको दोनों हाथोंसे पकड़कर खूब जोरसे दबाया और क्रोधमें भरकर उसके प्राणोंसहित दूध पीना आरम्भ किया। उस राक्षसीके शरीरकी नस-नाड़ियोंके बन्धन छिन्न-भिन्न हो गये। वह जोर-जोरसे कराहती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी। मरते समय उसका शरीर बड़ा भयंकर हो गया। पूतनाका चीत्कार सुनकर समस्त ब्रजवासी भयके मारे जाग उठे। उन्होंने आकर देखा, पूतना मरी पड़ी है और श्रीकृष्ण उसकी गोदमें बैठे हैं। यह देखकर माता यशोदा थर्रा उठीं और श्रीकृष्णको शीघ्र ही गोदमें उठाकर गायकी पूँछ घुमाने आदिके द्वारा अपने बालकके ग्रह-दोषको शान्त किया। नन्दने भी गायका गोबर ले श्रीकृष्णके मस्तकमें लगाया और उनकी रक्षा करते हुए इस प्रकार बोले—'समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति करनेवाले भगवान् श्रीहरि, जिनके नाभिकमलसे सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है, तुम्हारी रक्षा करें। जिनकी दाढ़के अग्रभागपर रखी हुई यह पृथ्वी सम्पूर्ण जगत्को धारण करती है, वे वराहरूपधारी केशव तुम्हारी रक्षा करें। तुम्हारे गुदाभाग और उदरकी रक्षा भगवान् विष्णु तथा जङ्घा और चरणोंकी रक्षा श्रीजनार्दन करें। जो एक ही क्षणमें वामनसे विराट् बन गये और तीन पगोंसे सारी त्रिलोकीको नापकर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न दिखायी देने लगे, वे भगवान् वामन तुम्हारी सदा रक्षा करें। तुम्हारे सिरकी गोविन्द तथा कण्ठकी केशव रक्षा करें। मुख, बाहु, प्रबाहु (कोहनीके नीचेका भाग), मन और सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी अखण्ड ऐश्वर्यशाली अविनाशी भगवान् नारायण रक्षा करें। भगवान् वैकुण्ठ दिशाओंमें, मधुसूदन विदिशाओं (कोणों)-में, हृषीकेश आकाशमें और पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त पृथ्वीपर तुम्हारी रक्षा करें।'

इस प्रकार नन्दगोपद्वारा स्वस्तिवाचन होनेपर बालक श्रीकृष्ण छकड़ेके नीचे एक खटोलेपर सुलाये गये। गोपोंको मरी हुई पूतनाका विशाल शरीर देखकर अत्यन्त भय और आश्चर्य हुआ। एक दिनकी बात है, मधुसूदन श्रीकृष्ण छकड़ेके नीचे सोये हुए थे। उस समय वे दूध पीनेके लिये जोर-जोरसे रोने लगे। रोते-ही-रोते उन्होंने अपने दोनों पैर ऊपरकी ओर फेंकने आरम्भ किये।

१०२-शकट-भञ्जन

२९०

  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

उनका एक पैर छकड़ेसे छू गया। उसके हल्के आघातसे ही वह छकड़ा उलटकर गिर पड़ा। उसपर रखे हुए मटके और घड़े आदि टूट-फूट गये। उस समय समस्त गोप-गोपियाँ हाहाकार करती हुई वहाँ आ पहुँचीं। उन्होंने देखा—'बालक श्रीकृष्ण उत्तान सोये हुए हैं।' तब गोपोंने पूछा—'किसने इस छकड़ेको उलट दिया?' वहीं कुछ बालक खेल रहे थे। उन्होंने कहा—'इस बच्चेने ही गिराया है।' यह सुनकर गोपोंके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। नन्दगोपने अत्यन्त विस्मित होकर बालकको गोदमें उठा लिया। यशोदाने भी आश्चर्य-चकित हो टूटे-फूटे भाँड़ोंके टुकड़ों और छकड़ेकी दही, फूल, फल और अक्षतसे पूजा की।

एक दिन वसुदेवजीकी प्रेरणासे गर्गजी गोकुलमें आये और अन्य गोपोंसे छिपे-छिपे ही उन्होंने उन दोनों बालकोंके द्विजोचित संस्कार किये। उनके नामकरण-संस्कार करते हुए परम बुद्धिमान् गर्गजीने बड़े बालकका नाम 'राम' और छोटेका 'कृष्ण' रखा। थोड़े ही दिनोंमें वे दोनों बालक महाबलवान्के रूपमें प्रसिद्ध हो गये। घुटनोंके बलसे चलनेके कारण उनके दोनों घुटनों और हाथोंमें रगड़ पड़ गयी थी। वे शरीरमें गोबर और राख लपेटे इधर-उधर घूमा करते थे। यशोदा और रोहिणी उन्हें रोक नहीं पाती थीं। कभी गौओंके बाड़ेमें खेलते-खेलते बछड़ोंके बाड़ेमें निकल जाते थे। कभी उसी दिन पैदा हुए बछड़ोंकी पूँछ पकड़कर खींचने लगते थे। वे दोनों बालक एक ही स्थानपर साथ-साथ खेलते और अत्यन्त चपलता दिखाते थे। एक दिन जब यशोदा उन्हें किसी प्रकार रोक न सकीं, तब उनके मनमें कुछ क्रोध हो आया। उन्होंने अनायास ही बड़े-बड़े कार्य करनेवाले श्रीकृष्णकी कमरमें रस्सी कस दी और उन्हें ऊखलसे बाँध दिया। उसके बाद कहा—'ओ चञ्चल! तू बहुत ऊधम मचा रहा था। अब तुझमें सामर्थ्य हो तो जा।' यों कहकर गृहस्वामिनी यशोदा अपने काम-काजमें लग गयीं। जब यशोदा घरके काम-धंधेमें फँस गयीं, तब कमलनयन श्रीकृष्ण ऊखलको घसीटते हुए दो अर्जुन वृक्षोंके बीचसे जा निकले। वे दोनों वृक्ष जुड़वें उत्पन्न हुए थे। उन वृक्षोंके बीचमें तिरछी पड़ी हुई ऊखलीको ज्यों ही उन्होंने खींचा, उसी समय ऊँची शाखाओंवाले वे दोनों वृक्ष जड़से उखड़कर गिर पड़े। वृक्षोंके उखड़ते समय बड़े जोरसे कड़कड़ाहटकी आवाज हुई। उसे सुनकर समस्त ब्रजवासी कातरभावसे वहाँ दौड़े आये। आनेपर सबने देखा वे दोनों महावृक्ष पृथ्वीपर गिरे पड़े हैं। उनकी मोटी-मोटी डालियाँ और पतली शाखाएँ भी टूट-टूटकर बिखर गयी हैं। उन दोनोंके बीचमें बालक कृष्ण मन्द-मन्द मुस्करा रहा है। उसके खुले हुए मुखमें थोड़े-से दाँत झलक रहे हैं। उसकी

१०३-वत्सचारण-लीला

  • भगवान्‌का अवतार, गोकुलगमन, पूतना-वध और श्रीकृष्णका बछड़े चराना * २९१

कमरमें खूब कसकर रस्सी बँधी हुई है। उदरमें दाम (रस्सी) बँधनेके कारण ही श्रीकृष्णकी दामोदरके नामसे प्रसिद्धि हुई।

तदनन्तर नन्द आदि समस्त बड़े-बूढ़े गोप, जो बड़े-बड़े उत्पातोंके कारण बहुत डर गये थे, उद्विग्न होकर आपसमें सलाह करने लगे—'अब हमें इस स्थानपर रहनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। किसी दूसरे महान् वनमें चलना चाहिये। यहाँ नाशके हेतुभूत अनेक उत्पात देखे जाते हैं—जैसे पूतनाका विनाश, छकड़ेका उलट जाना और बिना आँधी-वर्षाके ही दोनों वृक्षोंका गिरना आदि। अतः अब हम विलम्ब न करके शीघ्र ही यहाँसे वृन्दावनको चल दें। जबतक कोई भूमिसम्बन्धी दूसरा महान् उत्पात ब्रजको नष्ट न कर दे, तबतक ही हमें उसकी व्यवस्था कर लेनी चाहिये।' इस प्रकार वहाँसे चले जानेका निश्चय करके समस्त ब्रजवासी अपने-अपने कुटुम्बके लोगोंसे कहने लगे—'शीघ्र चलो, विलम्ब न करो।' फिर तो एक ही क्षणमें छकड़ों और गौओंके साथ सब लोग वहाँसे चल दिये। बछड़ोंके चरवाहे झुंड-के-झुंड एक साथ होकर उन बछड़ोंको चराते हुए चलते थे। ब्रजका वह खाली किया हुआ स्थान अन्नके दाने बिखरे होनेके कारण क्षणभरमें कौए आदि पक्षियोंसे व्यास हो गया। लीलापूर्वक सब कार्य करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने गौओंके अभ्युदयकी कामनासे अपने शुद्ध अन्तःकरणके द्वारा नित्य वृन्दावन धामका चिन्तन किया। अतः अत्यन्त रूक्ष ग्रीष्मकालमें भी वहाँ सब ओर वर्षाकालकी भाँति नयी-नयी घास जम गयी। वृन्दावनमें पहुँचकर वह समस्त गोप-गौओंका समुदाय चारों ओरसे अर्धचन्द्राकार छकड़ोंकी बाड़ लगाकर बस गया।

तत्पश्चात् बलराम और श्रीकृष्ण बछड़ोंकी चरवाही करने लगे। गोष्ठमें रहकर वे दोनों भाई अनेक प्रकारकी बाललीलाएँ किया करते थे। मोरके पंखका मुकुट बनाकर पहनते, जंगली पुष्पोंको कानोंमें धारण करते, कभी मुरली बजाते और कभी पत्तोंको लपेटकर उन्हींके छिद्रोंसे तरह-तरहकी ध्वनि निकालते थे। दोनों काक-पक्षधारी बालक हँसते-खेलते हुए उस महान् वनमें विचरण करते थे। कभी आपसमें ही एक-दूसरेको हँसाते हुए खेलते और कभी दूसरे ग्वालबालोंके साथ बालोचित क्रीड़ाएँ करते-फिरते थे। इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर बलराम और श्रीकृष्ण सात वर्षके हो गये। जो सम्पूर्ण जगत्‌का पालन करनेवाले हैं, वे उस महाब्रजमें बछड़ोंके पालक बने हुए थे। धीरे-धीरे ग्रीष्म-ऋतुके बाद वहाँ वर्षाका समय आया। मेघोंकी घटासे सम्पूर्ण आकाश आच्छादित हो गया। निरन्तर धारावाहिक वृष्टि होनेसे सम्पूर्ण दिशाएँ एक-सी जान पड़ती थीं। पानी पड़नेसे

२९२* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

नयी-नयी घास उग आयी। स्थान-स्थानपर बीरबहूटियोंसे पृथ्वी आच्छादित हो गयी। जैसे पन्नेके फर्शपर लाल मणिकी ढेरी शोभा पाती है, उसी प्रकार बीरबहूटियोंसे ढकी हुई हरी-भरी पृथ्वी सुशोभित होती थी। जैसे नूतन सम्पत्ति पाकर उद्धत मनुष्योंके मन कुमार्गमें प्रवृत्त होने लगते हैं, उसी प्रकार वर्षाके जलसे भरी हुई नदियोंका पानी बाँध तोड़कर तटके ऊपरसे बहने लगा। संध्या होनेपर महाबली राम और श्रीकृष्ण इच्छानुसार व्रजमें लौट आते और अपने समवयस्क ग्वाल-बालोंके साथ देवताओंकी भाँति क्रीड़ा करते थे।

कालिय नागका दमन

**व्यासजी कहते हैं—**एक दिनकी बात है—श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलरामजीको साथ लिये बिना ही वृन्दावनके भीतर गये और ग्वाल-बालोंके साथ विचरने लगे। जंगली पुष्पोंका हार पहननेके कारण वे बड़े सुन्दर दिखायी देते थे। घूमते-घूमते श्रीकृष्ण चञ्चल लहरोंसे सुशोभित यमुनाके तटपर गये, जो तटपर लगे हुए फेनोंके रूपमें मानो सब ओर हास्यकी छटा बिखेर रही थी। उस यमुनामें एक कालिय नागका कुण्ड था, जो विषाग्निके कणोंसे दूषित होनेके कारण अत्यन्त भयंकर हो गया था। श्रीकृष्णने उस भयानक कुण्डको देखा। उसकी फैलती हुई विषाग्निसे तटके बड़े-बड़े वृक्ष दग्ध हो गये थे। वायुके आघातसे जो जलमें हिलोर उठती थी और उससे जो जलके छींटे चारों ओर पड़ते थे, उनका स्पर्श हो जानेपर पक्षी जलकर भस्म हो जाते थे। वह महाभयंकर कुण्ड मृत्युका दूसरा मुख था। उसे देखकर भगवान् मधुसूदनने सोचा—‘इस कुण्डके भीतर दुष्टात्मा कालिय नाग रहता है, जिसका विष ही शस्त्र है। इसने यहाँ सागरगामिनी यमुनाका सारा जल दूषित कर दिया है। प्याससे पीड़ित मनुष्य अथवा गौएँ इस जलका उपयोग नहीं कर सकते। अतः मुझे नागराज कालियका दमन करना चाहिये, जिससे सदा भयभीत रहनेवाले व्रजवासी यहाँ सुखपूर्वक विचर सकें। मैंने मनुष्यलोकमें इसीलिये अवतार धारण किया है कि इन कुमार्गगामी दुरात्माओंको दण्ड देकर राहपर लाऊँ। वहाँ पास ही बहुत-सी शाखाओंसे सम्पन्न कदम्बका वृक्ष है। उसीपर चढ़कर जीवोंका नाश करनेवाले इस सर्पके कुण्डमें कूदूँगा।’

ऐसा निश्चय करके भगवान्ने अच्छी तरह कमर कस ली और वे वेगपूर्वक नागराजके कुण्डमें कूद पड़े। उनके कूदनेसे वह महान् कुण्ड क्षुब्ध हो उठा। पानीकी ऐसी हिलोर उठी कि बहुत दूरके वृक्ष भी भीग गये। सर्पकी विषाग्निद्वारा तपे हुए जलसे भीगनेके कारण वे सभी वृक्ष सहसा जल उठे। चारों दिशाओंमें आगकी लपटें फैल गयीं। उस नागकुण्डमें पहुँचकर श्रीकृष्णने अपनी भुजाओंपर ताल ठोंकी। उसका शब्द सुनकर नागराज उनके पास आया। उसके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे। उसके फणोंसे विषाग्निकी लपटें निकल रही थीं। और भी बहुत-से विषैले नाग उसे घेरे हुए थे। सैकड़ों नागपत्नियाँ भी वहाँ उपस्थित थीं, जो मनोहर हार पहनकर बड़ी शोभा पा रही थीं। उनके अङ्गोंके हिलने-डुलनेसे कानोंके चञ्चल कुण्डल झिलमिला रहे थे। सर्पोंने श्रीकृष्णको अपने शरीरमें लपेट लिया और वे विषकी ज्वालासे भरे हुए मुखोंद्वारा उन्हें डसने लगे। श्रीकृष्णको कुण्डमें पड़कर नागके फणोंसे पीड़ित होते देख ग्वाल-बाल व्रजमें दौड़े आये और शोकाकुल

१०४-कालिय नागके बन्धनमें श्रीकृष्ण

* कालिय नागका दमन * २९३

होकर रोते हुए बोले—‘व्रजवासियो! श्रीकृष्ण कालियह्रदमें डूबकर मूर्च्छित हो गये हैं। नागराज उन्हें खाये लेता है। तुम जल्दी आओ, विलम्ब न करो।’

यह बात सुनकर मानो गोपोंपर वज्र टूट पड़ा। समस्त गोप और यशोदा आदि गोपियाँ तुरंत कालियह्रदपर दौड़ी आयीं। ‘हाय, हाय, प्यारे कृष्ण कहाँ हैं?’ इस प्रकार विलाप करती हुई गोपियाँ अत्यन्त व्याकुल हो उठीं और यशोदाके साथ गिरती-पड़ती हुई वहाँ आयीं। नन्दगोप, अन्य गोपगण तथा अद्भुत पराक्रमी बलराम भी श्रीकृष्णको देखनेके लिये तुरंत यमुनातटपर जा पहुँचे। पुत्रका मुँह देखकर नन्दगोप और माता यशोदा दोनों जड़वत् हो गये।

अन्यान्य गोपियाँ भी शोकसे आतुर हो रोती हुई श्रीकृष्णकी ओर देखने लगीं। वे भयसे कातर हो गद्गद वाणीमें प्रेमपूर्वक बोलीं—‘हम सब लोग यशोदाके साथ नागराजके महान् कुण्डमें प्रवेश करें। अब व्रजमें लौटना हमारे लिये उचित नहीं है। भला, सूर्यके बिना दिन और चन्द्रमाके बिना रात कैसी। दूधके बिना गौएँ और श्रीकृष्णके बिना व्रज किस कामका। हम श्रीकृष्णके बिना गोकुलमें नहीं जायँगी।’

गोपियोंके ये वचन सुनकर रोहिणीनन्दन महाबली बलरामने देखा—गोपगण बहुत दुःखी हैं। इनकी आँखें आँसुओंसे भीगी हुई हैं। नन्दजी भी पुत्रके मुखपर दृष्टि लगाये अत्यन्त कातर हो रहे हैं और यशोदा अपनी सुध-बुध खो बैठी हैं। तब उन्होंने अपनी संकेतमयी भाषामें श्रीकृष्णको उनके माहात्म्यका स्मरण दिलाते हुए कहा—‘देवदेवेश्वर! तुम क्यों इस प्रकार मानवभाव व्यक्त कर रहे हो। क्या इस बातको नहीं जानते कि तुम इन मानवोंसे भिन्न साक्षात् परमात्मा हो? तुम्हीं इस जगत्के केन्द्र हो। देवताओंका आश्रय भी तुम्हीं हो। तुम्हीं त्रिभुवनकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले त्रयीमय परमेश्वर हो। हम दोनों इस समय यहाँ अवतीर्ण हुए हैं। इस व्रजमें ये गोप-गोपियाँ ही हमारे बान्धव हैं। ये सब-के-सब तुम्हारे लिये दुःखी हो रहे हैं। फिर क्यों अपने इन बन्धुओंकी उपेक्षा करते हो। तुमने मनुष्यभाव अच्छी तरह दिखा लिया। बालोचित चपलता दिखानेमें भी कोई कमी नहीं की। अब यह खेल रहने दो और दाँतोंसे ही अस्त्र-शस्त्रोंका काम लेनेवाले इस दुरात्मा नागका दमन करो।’

बलरामजीके द्वारा इस प्रकार स्मरण दिलाये जानेपर श्रीकृष्णके होठ मन्द मुसकानसे खिल उठे। उन्होंने अँगड़ाई लेकर अपने शरीरको साँपोंके बन्धनसे छुड़ा लिया और दोनों हाथोंसे उसके बीचके फणको नीचे झुकाकर वे उसीपर चढ़ गये और शीघ्रतापूर्वक पैर चलाते हुए नृत्य करने लगे। श्रीकृष्णके चरणोंके आघातसे उस नागके

१०५-कालिय नागके फणोंपर भगवान्‌का नृत्य

२९४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


फणमें कई घाव हो गये। वह जिस फणको ऊपर उठाता, उसीको भगवान् अपने पैरोंसे झुकाकर दबा देते थे। श्रीकृष्णके द्वारा कुचले जानेसे नागको चक्कर आने लगा। वह मूर्च्छित होकर डंडेकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके मस्तक और गर्दन टेढ़े हो गये थे। मुखसे रक्तकी अजस्र धारा बह रही थी। यह देखकर नागराजकी पत्नियाँ भगवान् मधुसूदनकी शरणमें गयीं।

नागपत्नियाँ बोलीं—देवदेवेश्वर! हमने आपको पहचान लिया। आप सबके ईश्वर और सबसे उत्तम हैं। अचिन्त्य परमज्योतिःस्वरूप जो ब्रह्म है, उसीके अंशभूत आप परमेश्वर हैं। देवता भी जिन स्वयम्भू प्रभुकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं, उन्हींके स्वरूपका वर्णन हम-जैसी साधारण स्त्रियाँ कैसे कर सकती हैं। सम्पूर्ण पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायुरूप यह ब्रह्माण्ड जिनके छोटे-से अंशका भी अंश है, उस भगवान्की स्तुति हम कैसे कर सकती हैं। जगन्नाथ! हम बड़े कष्टमें पड़ गयी हैं। आप हमपर कृपा करें। यह नाग अब प्राण त्यागना चाहता है। हमें पतिकी भिक्षा दें।

उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर कालिय नागको कुछ आश्वासन मिला। यद्यपि उसका शरीर अत्यन्त शिथिल हो गया था तो भी वह धीरे-धीरे बोला—‘देवदेव! मुझपर प्रसन्न हों। नाथ! आपमें अणिमा आदि आठ ऐश्वर्य स्वाभाविक हैं। आपसे बढ़कर अन्यत्र कहीं भी उनकी स्थिति नहीं है। ऐसे आप परमेश्वरकी मैं क्या स्तुति करूँगा। आप पर हैं। पर (मूल प्रकृति)-के भी आदि कारण हैं। परकी प्रवृत्ति भी आपसे ही हुई है। परात्मन्! आप परसे भी पर हैं। फिर मैं कैसे आपकी स्तुति कर सकता हूँ। ईश्वर! आपने जाति, रूप और स्वभावसे मुझे जैसा बनाया है, उसके अनुसार ही मैंने यह चेष्टा की है। देवदेव! यदि इन सबके विपरीत कोई चेष्टा करूँ तो मुझे दण्ड देना उचित हो सकता है। क्योंकि आपका ऐसा ही आदेश है तथापि आप जगत्के स्वामी हैं। आपने मुझको जो दण्ड दिया है, उसे मैंने सहर्ष स्वीकार किया; क्योंकि आपसे मिला हुआ दण्ड भी वरदान है। अब मेरे लिये दूसरे वरकी आवश्यकता नहीं है। अच्युत! आपने मेरे बलका नाश किया, मेरे विषको भी हर लिया और पूर्णरूपसे मेरा दमन भी कर दिया। अब एकमात्र जीवन रह गया है। उसे छोड़ दीजिये और कहिये, आपकी क्या सेवा करूँ?’

श्रीभगवान् बोले—‘सर्प! अब तुम्हें यहाँ यमुनाजलमें कदापि नहीं रहना चाहिये। अपने भृत्य और परिवारके साथ समुद्रके जलमें चले जाओ। नाग! तुम्हारे मस्तकपर मेरे चरणचिह्न देखकर नागोंके शत्रु गरुड़ तुमपर प्रहार नहीं करेंगे।’

यों कहकर भगवान् श्रीहरिने नागराजको छोड़ दिया। वह भी श्रीकृष्णको प्रणाम करके समुद्रको

७४- धेनुक और प्रलम्बका वध तथा गिरियज्ञका अनुष्ठान

* धेनुक और प्रलम्बका वध तथा गिरियज्ञका अनुष्ठान * २९५

चला गया। उसने सबके देखते-देखते सेवक, संतान, बन्धु-बान्धव और पत्नियोंके साथ सदाके लिये वह कुण्ड त्याग दिया। सर्पके चले जानेपर गोपोंने दौड़कर श्रीकृष्णको छातीसे लगा लिया, मानो वे मरकर पुनः लौट आये हों। उनके नेत्रोंसे आँसू निकलकर श्रीकृष्णके मस्तकपर गिरने लगे।

कुछ गोप विस्मित होकर श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे। यमुना नदीका जल विषसे रहित हो गया—यह देख समस्त गोपोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। गोपियाँ श्रीकृष्णकी मनोहर लीलाओंका गान करने लगीं और ग्वाल-बाल उनके गुणोंकी प्रशंसा करने लगे। उन सबके साथ श्रीकृष्ण व्रजमें आये।


धेनुक और प्रलम्बका वध तथा गिरियज्ञका अनुष्ठान

**व्यासजी कहते हैं—**एक दिन बलराम और श्रीकृष्ण साथ-साथ गौएँ चराते हुए वनमें विचरने लगे। घूमते-घूमते वे परम रमणीय ताड़के वनमें जा पहुँचे। वहाँ धेनुक नामक दानव गदहेके रूपमें सदा निवास करता था। मनुष्यों और गौओंका मांस ही उसका भोजन था। फलकी समृद्धिसे पूर्ण मनोहर तालवनको देखकर ग्वाल-बाल वहाँके फल लेनेको ललचा उठे और बोले—'भैया राम! ओ कृष्ण! धेनुकासुर सदा इस भूभागकी रक्षा करता है। इसीलिये ये ताड़ोंके सुगन्धित फल लोगोंने छोड़ रखे हैं। हम इन्हें प्राप्त करना चाहते हैं। यदि आपलोगोंको जँचे तो इन फलोंको गिराइये।' ग्वाल-बालोंकी यह बात सुनकर बलराम और श्रीकृष्णने बहुत-से तालफल पृथ्वीपर गिराये। गिरते हुए फलोंका शब्द सुनकर वह गर्दभाकार दुष्ट दैत्य क्रोधमें भरा हुआ आया। आते ही उसने अपने दोनों पिछले पैरोंसे बलरामजीकी छातीमें प्रहार किया। बलरामजीने उसके दोनों पैर पकड़ लिये और उसे आकाशमें घुमाना आरम्भ किया। घुमानेसे आकाशमें ही उसके प्राणपखेरू उड़ गये। फिर वेगसे बलरामजीने उसे एक महान् ताल-वृक्षपर दे मारा। जैसे आँधी बादलोंको उड़ा देती है, उसी प्रकार उस दैत्यने गिरते-गिरते अपने शरीरके आघातसे बहुतेरे फल गिरा दिये।

उसके मारे जानेपर और भी बहुत-से गर्दभाकार दैत्य आये, किंतु श्रीकृष्ण और बलभद्रने उन सबको खेल-खेलमें ही उठाकर वृक्षोंपर फेंक दिया। एक ही क्षणमें पके हुए ताड़के फलों और गर्दभाकार दैत्योंके शरीरसे सारी पृथ्वी पट गयी। इससे उस स्थानकी बड़ी शोभा होने लगी। तबसे उस तालवनमें गौएँ बाधारहित होकर नयी-नयी घास चरने लगीं।

अनुचरोंसहित धेनुकासुरके मारे जानेपर वह मनोहर तालवन समस्त गोप-गोपियोंके लिये सुखदायक हो गया। इससे वसुदेवके दोनों पुत्र बलराम और श्रीकृष्ण प्रसन्न हुए। वे दोनों महात्मा छोटे-छोटे सींगोंवाले बछड़ोंकी भाँति शोभा पा रहे थे। कंधेपर गाय बाँधनेकी रस्सी लिये, वनमालासे विभूषित हो वे दूर-दूरतक गौएँ चराते और उनके नाम ले-लेकर पुकारते थे। श्रीकृष्णका वस्त्र सुनहरे रंगका था और बलरामजीका नीले रंगका। उन्हें धारण किये वे दोनों भाई दो इन्द्रधनुषों एवं श्वेत-श्याम मेघोंकी भाँति शोभा पाते थे। लोकमें बालकोंके जो-जो खेल प्रचलित हैं, उन सबके द्वारा परस्पर क्रीड़ा करते हुए वनमें विचरते थे। समस्त लोकनाथोंके नाथ होकर भी वे इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए और मानवधर्ममें तत्पर रहकर मनुष्ययोनिको गौरवान्वित करते थे।

२९६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

मानव-जातिके गुणोंसे युक्त भाँति-भाँतिके खेल खेलते हुए वनमें घूमते थे। कभी झूला झूलकर और कभी आपसमें कुश्ती लड़कर महाबली श्रीराम और श्रीकृष्ण व्यायाम करते थे। उन दोनोंको खेलते देख प्रलम्ब नामक दानव उन्हें पकड़ ले जानेकी इच्छासे वहाँ आया। उसने ग्वाल-बालोंके वेषमें अपने वास्तविक रूपको छिपा रखा था। मनुष्य न होते हुए भी मनुष्यका रूप धारण करके दानवोंमें श्रेष्ठ प्रलम्ब ग्वाल-बालोंकी उस मण्डलीमें बेखटके जा मिला। वह राम और कृष्ण दोनोंको उठा ले जानेका अवसर ढूँढ़ने लगा। उसने कृष्णको तो सर्वथा अजेय समझा। अतः रोहिणीनन्दन बलरामको ही मारनेका निश्चय किया।

तदनन्तर उन ग्वाल-बालोंमें हरिणाक्रीडन नामक खेल आरम्भ हुआ। यह बालकोंका वह खेल है, जिसमें दो-दो बालक एक साथ हिरणकी तरह उछलते हुए किसी निश्चित लक्ष्यतक जाते हैं। आगे पहुँचनेवाला विजयी होता है। हारा हुआ बालक विजयीको अपनी पीठपर बिठाकर नियत स्थानतक ले आता है। इस खेलमें सब लोग सम्मिलित हुए। दो-दो बालक एक साथ उछलते हुए चले। श्रीदामाके साथ श्रीकृष्ण, प्रलम्बके साथ बलराम तथा अन्य ग्वाल-बालोंके साथ दूसरे-दूसरे बालक कूद रहे थे। श्रीकृष्णने श्रीदामाको और बलरामने प्रलम्बको जीत लिया। इसी प्रकार श्रीकृष्णपक्षके अन्य बालकोंने भी अपने साथियोंको हरा दिया। अब वे हारे हुए बालक एक-दूसरेको अपनी पीठपर लादे हुए भाण्डीर-वटतक आये और पुनः वहाँसे लौट चले। किन्तु दानव प्रलम्ब बलरामको अपने कंधेपर चढ़ाकर शीघ्र ही उड़ चला! वह चलता ही गया। कहीं रुका नहीं। जब वह बलरामजीका भार नहीं सह सका, तब बड़े क्रोधमें आकर वर्षाकालके मेघकी भाँति उसने अपने शरीरको बढ़ा लिया। बलरामजीने देखा, उस दैत्यका रंग जले हुए पर्वतके समान है। उसके गलेमें बहुत बड़ा हार लटक रहा था। मस्तकपर बहुत बड़ा मुकुट था। आँखें गाड़ीके पहिये-जैसी घूम रही थीं। उसके पैर रखनेसे धरती डगमगाने लगती थी। उसका रूप बड़ा ही भयंकर था। ऐसे राक्षसके द्वारा अपनेको हरे जाते देख बलरामने श्रीकृष्णसे कहा—'कृष्ण! कृष्ण! इधर तो देखो, ग्वाल-बालोंके वेषमें छिपा हुआ कोई दैत्य मुझे हरकर लिये जाता है। इसकी विकराल मूर्ति पर्वतके समान दिखायी देती है। मधुसूदन! बताओ, इस समय मुझे क्या करना चाहिये। यह दुरात्मा बड़ी उतावलीके साथ भागा जाता है।'

यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्णके ओठ मन्द मुसकानसे खिल उठे। वे रोहिणीनन्दन बलरामके बल और पराक्रमको जानते थे। अतः उनसे बोले—'सर्वात्मन्! यह क्या बात है, आप तो स्पष्टरूपमें मनुष्यकी-सी चेष्टा करने लगे। आप सम्पूर्ण गुह्य पदार्थोंमें गुह्यसे भी गुह्य हैं। जरा अपने उस स्वरूपका तो स्मरण कीजिये, जो सम्पूर्ण जगत्‌का कारण, कारणोंका भी पूर्ववर्ती, अद्वितीय आत्मा और प्रलयकालमें भी स्थित रहनेवाला है। विश्वात्मन्! आप और मैं दोनों ही इस संसारके एकमात्र कारण हैं और पृथ्वीका भार उतारनेके लिये यहाँ दो रूपोंमें प्रकट हैं। अप्रमेयात्मन्! आप अपने स्वरूपको स्मरण कीजिये और इस दानवको मार डालिये। तत्पश्चात् मानुष-भावका आश्रय लेकर बन्धुजनोंका हित कीजिये।'

महात्मा श्रीकृष्णके द्वारा इस प्रकार अपने स्वरूपका स्मरण कराये जानेपर महाबली बलरामने हँसकर प्रलम्बासुरको दबाया और क्रोधसे लाल

१०६-बलरामद्वारा प्रलम्बासूरका वध

* धेनुक और प्रलम्बका वध तथा गिरियज्ञका अनुष्ठान *२९७

आँखें करके उसके मस्तकपर एक मुक्का मारा। उनके इस प्रहारसे प्रलम्बके दोनों नेत्र बाहर निकल आये, मस्तिष्क फट गया और वह दैत्य मुँहसे खून उगलता हुआ पृथ्वीपर गिरकर मर गया। अद्भुत कर्म करनेवाले बलदेवजीके द्वारा प्रलम्बको मारा गया देख ग्वाल-बाल ‘बहुत अच्छा हुआ, बहुत अच्छा हुआ’ कहते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे। इस प्रकार प्रलम्बासूरके मारे जानेपर ग्वाल-बालोंके मुखसे अपनी प्रशंसा सुनते हुए बलरामजी श्रीकृष्णके साथ पुनः गौओंके समूहमें आये।

इस तरह नाना प्रकारकी लीलाएँ करते हुए बलराम और श्रीकृष्ण वनमें विहार करते रहे। इतनेमें ही वर्षा बीत गयी और शरद्-ऋतुका आगमन हुआ। जलाशयोंमें कमल खिलने लगे, आकाश और नक्षत्र निर्मल हो गये। ऐसे समयमें समस्त व्रजवासी इन्द्रोत्सवका आयोजन करने लगे। उन्हें उत्सवके लिये अत्यन्त उत्सुक देख परम बुद्धिमान् श्रीकृष्णने बड़े-बूढ़े गोपोंसे कौतूहलवश पूछा—‘यह इन्द्रोत्सव क्या वस्तु है, जिससे आपलोगोंको इतना हर्ष हुआ है?’ श्रीकृष्णको अत्यन्त आदरपूर्वक प्रश्न करते देख नन्द गोपने कहा—‘बेटा! देवराज इन्द्र मेघ और जलके स्वामी हैं। उन्हींसे प्रेरित होकर मेघ जलमय रसकी वृष्टि करते हैं। उस वृष्टिसे ही अन्न पैदा होता है, जिसे हम तथा अन्य देहधारी खाकर जीवन-निर्वाह करते और देवता आदिको भी तृप्त करते हैं। ये दूध और बछड़ोंवाली गौएँ इन्द्रके बढ़ाये हुए अन्नसे ही संतुष्ट हो हृष्ट-पुष्ट रहती हैं। जहाँ वर्षा करनेवाले मेघ होते हैं, वहाँ बिना खेतीकी भूमि नहीं दिखायी देती, कोई ऋणग्रस्त नहीं रहता और वहाँ एक भी भूखसे पीड़ित मनुष्य नहीं दृष्टिगोचर होता। मेघ सूर्यकी किरणोंद्वारा इस पृथ्वीका जल ग्रहण करते और फिर सम्पूर्ण लोकोंकी भलाईके लिये उसे बरसा देते हैं। अतः वर्षाकालमें सब राजालोग, हम तथा अन्य देहधारी भी बड़ी प्रसन्नताके साथ उत्सव मनाते और देवराज इन्द्रकी पूजा करते हैं।’

इन्द्रपूजाके विषयमें नन्दगोपका ऐसा कथन सुनकर भगवान् दामोदरने इन्द्रको कुपित करनेके उद्देश्यसे कहा—‘पिताजी! हमलोग न तो खेती करते हैं और न व्यापारसे ही जीविका चलाते हैं। हमारे देवता तो ये गौएँ ही हैं। क्योंकि हम सब लोग वनवासी हैं। आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति—ये चार प्रकारकी विद्याएँ हैं। इनमेंसे वार्ताका सम्बन्ध हमलोगोंसे है। अतः उसका वर्णन सुनिये। कृषि, वाणिज्य और पशुपालन—इन तीन वृत्तियोंपर वार्ता अवलम्बित रहती है। कृषि किसानोंकी वृत्ति है और वाणिज्य क्रय-विक्रय करनेवाले वैश्योंकी। हमलोगोंकी सबसे प्रधान वृत्ति है—गोपालन। इस प्रकार ये वार्ताके तीन भेद हैं। उपर्युक्त चार विद्याओंमेंसे

१०७-गिरिराजरूपमें पूजा-ग्रहण

२९८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

जो जिस विद्यासे निर्वाह करता है, वही उसके लिये महान् देवता है। उसे उसीकी पूजा-अर्चा करनी चाहिये। वही उसके लिये उपकारक है। जो मनुष्य एकका दिया हुआ फल भोगता और किसी दूसरेकी पूजा करता है, वह इस लोक या परलोकमें—कहीं भी कल्याणका भागी नहीं होता। हमारे इस व्रजकी जो प्रख्यात सीमाएँ हैं, उनका पूजन होना चाहिये। सीमाके भीतर वन है और वनके भीतर सम्पूर्ण पर्वत हैं, जो हमारे लिये परम आश्रय हैं। अतः हमें गिरियज्ञ और गोयज्ञ आरम्भ करना चाहिये। इन्द्रसे हमारा क्या लाभ होता है। हमारे लिये तो गौएँ और गिरिराज ही देवता हैं। ब्राह्मण मन्त्रयुक्त यज्ञको प्रधानता देते हैं। किसानोंके यहाँ सीरयज्ञ (हल-पूजन) होता है और हम-जैसे वन एवं पर्वतोंमें रहनेवाले लोग गिरियज्ञ और गोयज्ञका अनुष्ठान करें तो उत्तम है। इसलिये मेरा विचार तो यह है कि आपलोग भाँति-भाँतिकी पूजा-सामग्रियोंसे गिरिराज गोवर्धनकी पूजा करें। सम्पूर्ण व्रजका दूध एकत्र किया जाय और उससे ब्राह्मणों तथा अन्य याचकोंको भोजन कराया जाय। इस प्रकार गोवर्धनका पूजन, होम और ब्राह्मण-भोजन हो जानेपर गौओंका शरद्-ऋतुमें प्राप्त होनेवाले पुष्पोंद्वारा शृङ्गार किया जाय और वे गिरिराजकी परिक्रमा करें। गोपगण! यही मेरी सम्मति है। यदि आपलोग प्रेमपूर्वक यह यज्ञ करेंगे तो इसके द्वारा गौएँ और गिरिराज गोवर्धन प्रसन्न होंगे। साथ ही मुझे भी बड़ी प्रसन्नता होगी।'

श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर नन्द आदि व्रजवासियोंके मुख हर्षसे प्रफुल्लित हो उठे। वे बोले—'बहुत ठीक, बहुत ठीक। बेटा! तुमने जो अपना मत प्रकट किया है, वह बहुत सुन्दर है। हमलोग वही करेंगे। अब गिरियज्ञका ही आरम्भ किया जाय।' यों कहकर ब्रजवासियोंने गिरियज्ञका

अनुष्ठान किया। गिरिराज गोवर्धनको दही और खीर आदिकी बलि चढ़ायी। सैकड़ों-हजारों ब्राह्मणोंको भोजन कराया। फिर गायों और साँड़ोंकी पूजा की गयी और उनके द्वारा गिरिराजकी परिक्रमा करायी गयी। साँड़ जलसे भरे मेघकी भाँति गर्जना करते थे। भगवान् श्रीकृष्ण दूसरे रूपमें पर्वतके शिखरपर जा बैठे और मैं ही मूर्तिमान् गिरिराज हूँ—यों कहकर गोपोंद्वारा अर्पित किये हुए नाना प्रकारके अन्नोंका भोग लगाने लगे तथा अपने कृष्णरूपसे ही गोपोंके साथ पर्वत-शिखरपर चढ़कर उन्होंने अपने द्वितीय शरीर गिरिराजका पूजन भी किया। तदनन्तर गिरिराजरूपमें प्रकट हुए भगवान् अन्तर्धान हो गये और गोपगण उनसे मनोवाञ्छित वरदान पाकर गिरियज्ञकी समाप्ति करके पुनः अपने व्रजमें लौट आये।

७५- इन्द्रके द्वारा भगवान्‌का अभिषेक, श्रीकृष्ण और गोपियोंकी बातचीत, रासलीला और अरिष्टासुरका वध

* इन्द्रके द्वारा भगवान्‌का अभिषेक, रासलीला और अरिष्टासुरका वध * २९९

इन्द्रके द्वारा भगवान्‌का अभिषेक, श्रीकृष्ण और गोपोंकी बातचीत, रासलीला और अरिष्टासुरका वध

व्यासजी कहते हैं—इन्द्रयज्ञमें बाधा पड़नेसे देवराज इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने मेघोंके संवर्तक नामक गणसे कहा—'बादलो! मेरी बात सुनो और मैं जो भी आज्ञा दूँ, उसे बिना विचारे शीघ्र पूरा करो। खोटी बुद्धिवाले नन्दगोपने अन्य ग्वालोंके साथ श्रीकृष्णके बलपर उन्मत्त हो मेरे यज्ञको बंद कर दिया है। इसलिये उनकी जो सबसे बड़ी आजीविका हैं और जिनका पालन करनेके कारण वे गोप कहलाते हैं, उन गौओंको मूसलाधार वृष्टिसे पीड़ित करो। मैं भी पर्वत-शिखरके समान ऊँचे ऐरावतपर सवार हो वायुके संयोगसे तुमलोगोंकी सहायता करूँगा।' देवराजकी ऐसी आज्ञा पाकर मेघोंने गौओंका संहार करनेके लिये बड़ी भयंकर आँधी और वर्षा आरम्भ की। एक ही क्षणमें पृथ्वी, दिशाएँ और आकाश धारावाहिक वृष्टिके कारण एक हो गये। वर्षाके साथ ही वायु भी बड़े वेगसे चल रही थी। इससे काँपती हुई गौएँ प्राण त्यागने लगीं। कुछ गौएँ अपने अङ्कमें बछड़ोंको छिपाकर खड़ी थीं। जलकी तेज धारा बहनेसे कितनी ही गायोंके बछड़े बह गये। बछड़ोंका मुख अत्यन्त दयनीय हो रहा था। वायुके वेगसे उनकी गर्दन काँप रही थी। मानो वे आर्त होकर मन्द स्वरमें श्रीकृष्णसे त्राहि-त्राहिकी पुकार कर रही थीं। भगवान्‌ने देखा—गौओं, गोपियों और ग्वालोंसे भरा हुआ सम्पूर्ण ब्रज अत्यन्त पीड़ित हो रहा है। तब उन्होंने उनकी रक्षाके लिये इस प्रकार विचार किया—'जान पड़ता है यह सब देवराज इन्द्रकी करतूत है। अपना यज्ञ बंद होनेसे वे हमलोगोंके विरोधी हो गये हैं। इस समय मुझे समस्त ब्रजकी रक्षा करनी चाहिये। यह गोवर्धन पर्वत बड़ी-बड़ी शिलाओंसे युक्त है। इसीको अपने बलसे उखाड़कर मैं ब्रजके ऊपर छत्रकी भाँति धारण करूँगा।'

ऐसा निश्चय करके श्रीकृष्णने गोवर्धन पर्वतको उखाड़ लिया और उसे लीलापूर्वक एक ही हाथसे धारण किया। पर्वत उखाड़नेके बाद जगदीश्वर श्रीकृष्णने गोपोंसे कहा—'मैंने वर्षासे बचनेका उपाय कर दिया। तुम सब लोग इसके नीचे आ जाओ और जहाँ वायुका झोंका न लगे, ऐसे स्थानोंमें यथायोग्य बैठ जाओ। किसी प्रकारका भय न करो। पर्वतके गिरनेकी आशङ्का बिलकुल छोड़ दो।' भगवान्‌के यों कहनेपर समस्त गोप छकड़ोंपर बर्तन-भाँड़े लादे गौओंके साथ उसके नीचे आ गये। वर्षाकी धारासे पीड़ित हुई गोपियाँ भी वहीं आ गयीं। श्रीकृष्णने गोवर्धन पर्वतको स्थिरतापूर्वक धारण कर रखा था। वह तनिक