भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ
  • अश्वत्थ-पिप्पलतीर्थ, शनैश्चरतीर्थ, सोमतीर्थ और धान्यतीर्थकी महिमा * २०३

'माताओ! तुम गौतमीके तटपर जाओ। गौतमीके प्रसन्न होनेपर तुम्हें लोकपूजित राजाकी प्राप्ति होगी।' यह सुनकर वे वहाँ गयीं और गौतमीकी स्तुति करने लगीं।

ओषधियाँ बोलीं—भगवान् शंकरकी प्रियतमा पुण्यसलिला गौतमी! यदि आप इस भूतलपर न आतीं तो संसारके प्राणी, जो नाना प्रकारकी पापराशियोंसे तिरस्कृत एवं दुःखी हो रहे हैं, क्या करते। नदीश्वरि! भूमण्डलके मनुष्योंके सौभाग्यका अनुमान कौन कर सकता है, जिनके महापातकोंका नाश करनेवाली आप जगन्माता गङ्गा उनके लिये सदा ही सुलभ हैं। तीनों लोकोंकी वन्दनीया जगज्जननी गङ्गा! आपके वैभवको कोई नहीं जानता; क्योंकि कामदेवके शत्रु भगवान् शंकर भी आपको सदा मस्तकपर लिये रहते हैं। मनोवाञ्छित फल देनेवाली माता! तुम्हें नमस्कार है। पापोंका विनाश करनेवाली ब्रह्ममयी देवी! तुम्हें नमस्कार है। भगवान् विष्णुके चरणकमलोंसे निकली हुई गङ्गा! तुम्हें नमस्कार है। भगवान् शंकरकी जटासे प्रकट हुई गौतमी देवी! तुम्हें नमस्कार है।

इस प्रकार स्तुति करनेवाली ओषधियोंसे गङ्गाजीने कहा—'देवियो! बताओ, तुम्हें क्या दूँ?' ओषधियाँ बोलीं—'जगन्माता ! हमें अत्यन्त तेजस्वी राजाको पतिरूपमें दीजिये।' गङ्गाजीने कहा—'माता ओषधियो ! मैं अमृतरूप हूँ। तुम भी अमृतस्वरूपा हो। अतः तुम्हें तुम्हारे योग्य ही अमृतात्मा सोमको पतिरूपमें देती हूँ।' गौतमीके इस वरदानका देवताओं, ऋषियों, चन्द्रमा तथा ओषधियोंने भी अनुमोदन किया। इसके बाद वे सब अपने-अपने स्थानको चली गयीं। जिस स्थानपर ओषधियोंने समस्त पाप-संतापका निवारण करनेवाले अमृतस्वरूप राजा सोमको पतिरूपमें प्राप्त किया, वह सोमतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वहाँ स्नान और दान करनेसे पितर स्वर्गमें जाते हैं। जो प्रतिदिन इस प्रसङ्गको पढ़ता, सुनता अथवा भक्तिपूर्वक स्मरण करता है, वह दीर्घायु, पुत्रवान् और धनवान् होता है।

तदनन्तर धान्यतीर्थ है, जो मनुष्योंकी सब अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है। वह सुकाल उपस्थित करनेवाला, कल्याणप्रद तथा मनुष्योंको सब प्रकारकी आपत्तिसे मुक्त करनेवाला है। राजा सोमको पतिरूपमें पाकर ओषधियाँ बहुत प्रसन्न हुई थीं। उन्होंने सब लोगों तथा गङ्गाजीके सामने यह अभीष्ट वचन कहा—'वेदमें एक पवित्र गाथा है, जिसे वेदोंके विद्वान् जानते हैं। जिस भूमिमें फसल उगी हुई है, वह माताके समान किंवा साक्षात् माता ही है। जो गङ्गाजीके समीप उसका दान करता है, वह समस्त अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है। जो मानव खेती लगी हुई भूमि, गौ तथा ओषधियोंको ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवरूप ब्राह्मणके लिये भक्तिपूर्वक दान देता है, उसका किया हुआ सब दान अक्षय होता है तथा वह अपने सम्पूर्ण अभीष्टोंको प्राप्त कर लेता है। ओषधियाँ सोम राजाकी प्रिया हैं और सोम भी ओषधियोंके पति हैं—यह जानकर जो ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणको ओषधि (अन्न) दान करता है, वह सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको पाता और ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। ओषधियाँ राजा सोमसे बातचीत करती हुई कहती हैं—'राजन् ! हम ब्रह्मरूपिणी और प्राणरूपिणी हैं। जो हमें ब्राह्मणोंको दान करे, उसे तुम पार लगाओ। स्थावर-जङ्गमस्वरूप जितना भी जगत् है, वह सब हमलोगोंसे व्याप्त है। हव्य, कव्य, अमृत तथा जो कुछ भी भोजनके काम आता है, वह हमारा ही श्रेष्ठ अंश है—यह जानकर जो अन्नका दान करता है, राजन्! उसे पार लगाओ। राजा सोम!

७४- कठका भरद्वाजके पास विद्याध्ययनके लिये आगमन

२०४* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

जो भक्तिपूर्वक इस वैदिकी गाथाका श्रवण, स्मरण अथवा पाठ करे, उसे तुम पार लगाओ।'

गङ्गाके किनारे जिस स्थानपर राजा सोमके साथ ओषधियोंने इस वैदिकी गाथाका पाठ किया था, वह धान्यतीर्थ कहलाता है। उस दिनसे उसके कई नाम हो गये—औषध्यतीर्थ, सौम्यतीर्थ, अमृततीर्थ, वेदगाथातीर्थ और मातृतीर्थ। जो मनुष्य इन तीर्थोंमें स्नान, जप, होम, दान, पितृ-तर्पण और अन्न-दान करता है, उसका वह सब कर्म अक्षय फल देनेवाला होता है। वहाँ दोनों तटोंपर एक हजार छः सौ तीर्थ हैं, जो सब पापोंका नाश करनेवाले और सब प्रकारकी सम्पत्ति बढ़ानेवाले हैं।

वहाँ विदर्भा-संगम और रेवती-संगमतीर्थ भी हैं। अब उनका वृत्तान्त बतलाऊँगा। पुराणवेत्ता पुरुष उसे जानते हैं। महर्षि भरद्वाज एक बड़े तपस्वी महात्मा थे। उनकी बहिनका नाम रेवती था। वह कुरूपा थी। उसका स्वर बड़ा विकृत था। प्रतापी भरद्वाज गङ्गाजीके दक्षिण-तटपर बैठकर बड़ी चिन्ता करने लगे कि 'इस भयंकर आकारवाली अपनी बहिनका विवाह किसके साथ करूँ ? कोई भी तो इसे ग्रहण नहीं करता। अहो, किसीके कन्या न हो। कन्या केवल दुःख देनेवाली होती है। जिसके कन्या हो, उस प्राणीकी जीते-जी पग-पगपर मृत्यु होती रहती है।' इस प्रकार वे अपने सुन्दर आश्रमपर तरह-तरहके विचार कर रहे थे। इतनेमें ही कठनामके एक मुनि वहाँ भरद्वाज मुनिका दर्शन करनेके लिये आये। उनकी अवस्था सोलह वर्षकी थी। शरीर सुन्दर था। वे शान्त, जितेन्द्रिय और सद्गुणोंकी खान थे। कठने आते ही भरद्वाजको प्रणाम किया। भरद्वाजने उनका विधिपूर्वक पूजन किया और आश्रमपर पधारनेका कारण पूछा।

कठने कहा—'मैं विद्यार्थी हूँ और इसी उद्देश्यसे आपका दर्शन करने आया हूँ। जो उचित हो, वह कीजिये।' भरद्वाजने कठसे कहा—'महामते ! तुम्हारी जो इच्छा हो, पढ़ो। मैं पुराण, स्मृति, वेद तथा अनेक प्रकारके धर्मशास्त्र—सब जानता हूँ। तुम शीघ्र अपनी रुचि बतलाओ। कुलीन, धर्मपरायण, गुरु-सेवक तथा सुनी हुई विद्याको तत्काल धारण करनेवाला शिष्य बड़े पुण्यसे प्राप्त होता है।'

कठने कहा—ब्रह्मन् ! मैं निष्पाप, सेवापरायण, भक्त, कुलीन और सत्यवादी शिष्य हूँ। मुझे अध्ययन कराइये।

'एवमस्तु' कहकर भरद्वाजने कठको सम्पूर्ण विद्या पढ़ायी। विद्या पाकर कठ बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने भरद्वाजसे कहा—'गुरुदेव ! आपको नमस्कार है। मैं आपके मनके अनुकूल दक्षिणा देना चाहता हूँ। आप कोई दुर्लभ वस्तु भी माँग सकते हैं। बताइये, क्या दूँ? जो शिष्य अपने गुरुसे विद्या प्राप्त करके भी उन्हें मोहवश दक्षिणा नहीं देते,

५३- पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोंकी महिमा, धन्वन्तरि और इन्द्रपर भगवान्‌की कृपा

  • पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोंकी महिमा *
    २०५

वे जबतक सूर्य और चन्द्रमाकी सत्ता रहती है तबतक नरकमें पड़े रहते हैं।'

भरद्वाजने कहा—यह मेरी बहिन अभी कुमारी है; इसको विधिपूर्वक ग्रहण करो और पत्नी बनाओ। इसके प्रति प्रेमपूर्ण बर्ताव करना, यही मैं दक्षिणा माँगता हूँ।

कठने 'बहुत अच्छा' कहकर गुरुके आदेशसे विधिपूर्वक दी हुई रेवतीका पाणिग्रहण किया और उसके सुन्दर रूपकी प्राप्तिके लिये वहीं रहकर देवेश्वर शङ्करकी आराधना की। रेवतीने भी शिवकी प्रसन्नताके लिये उनका पूजन किया। इससे वह सुन्दर रूपवती हो गयी। उसका प्रत्येक अङ्ग मनोहर दिखायी देने लगा। अब उसके रूपकी कहीं समता नहीं थी। वहाँ रेवतीके स्नान करनेसे जो जलकी धारा प्रकट हुई, वह 'रेवती' नामकी नदी हुई, जो रूप और सौभाग्य प्रदान करनेवाली है। फिर कठने उसकी पुण्यरूपताकी सिद्धिके लिये नाना प्रकारके दर्भो (कुशों)-से अभिषेक किया। इससे 'विदर्भा' नामकी नदी प्रकट हुई। जो मनुष्य रेवती और गङ्गामें श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसी प्रकार जो विदर्भा और गौतमीके संगममें स्नान करता है, उसे तत्काल भोग और मोक्षकी प्राप्ति होती है। वहाँ दोनों तटोंपर सौ उत्तम तीर्थ हैं, जो सब पापोंके नाशक तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंके दाता हैं।


पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोंकी महिमा, धन्वन्तरि और इन्द्रपर भगवान्‌की कृपा

**ब्रह्माजी कहते हैं—**गौतमी गङ्गाके उत्तर-तटपर पूर्णतीर्थ है। वहाँ यदि मनुष्य अनजानमें नहा ले तो भी कल्याणका भागी होता है। पूर्णतीर्थके माहात्म्यका वर्णन कौन कर सकता है, जहाँ स्वयं चक्रधारी भगवान् विष्णु और पिनाकधारी भगवान् शंकर निवास करते हैं। पूर्वकालमें आयुके पुत्र धन्वन्तरि राजा थे। उन्होंने अश्वमेध आदि अनेक प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान किया, भाँति-भाँतिके दान दिये तथा प्रचुर भोग भोगे। फिर भोगोंकी विषमताका अनुभव करके उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ। धन्वन्तरि यह जानते थे कि पर्वतके शिखरपर, गङ्गा नदीके किनारे, समुद्रके तटपर, शिव और विष्णुके मन्दिरमें अथवा विशेषतः किसी पवित्र संगमपर किया हुआ जप, तप, होम—सब अक्षय होता है; इसलिये उन्होंने गङ्गा-सागर-संगमपर भारी तपस्या आरम्भ की।

एक बार राजा धन्वन्तरिने राज्य करते समय एक महान् असुरको रणभूमिसे मार भगाया था। उसका नाम था तम। वह एक हजार वर्षोंतक राजाके भयसे समुद्रमें छिपा रहा। जब उसे मालूम हुआ कि राजा धन्वन्तरि विरक्त होकर वनमें चले आये हैं और उनका पुत्र राज्यसिंहासनपर आसीन हुआ है, तब वह समुद्रसे निकला और उस स्थानपर आया, जहाँ महाराज धन्वन्तरि गङ्गातटका आश्रय ले जप और होममें संलग्न तथा ब्रह्मचिन्तनमें तत्पर थे। उसने सोचा—'इस बलवान् राजाने मुझे अनेक बार नष्ट करनेका प्रयत्न किया है, अतः मैं भी क्यों न अपने इस शत्रुको नष्ट कर डालूँ।' ऐसा निश्चय करके उसने मायासे एक स्त्रीका रूप बनाया और राजाके पास आया। वह मायामयी सुन्दरी तरुणी देखनेमें बड़ी मनोहर थी। उसने हँसते हुए नाचना और गाना आरम्भ किया। उस

७५- धन्वन्तरिके द्वारा भगवान् विष्णुका स्तवन

२०६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


सुन्दरीको बहुत समयतक इस अवस्थामें देख राजाने कृपापूर्वक पूछा—'कल्याणी! तुम कौन हो? किसके लिये इस गहन वनमें निवास करती हो और किसे देखकर तुम्हें इतना उल्लास-सा हो रहा है?'

**तरुणी बोली—**राजन्! आपके रहते संसारमें दूसरा कौन है, जो मेरे उल्लासका कारण हो सके। मैं इन्द्रकी लक्ष्मी हूँ। आपको सब भोगोंसे सम्पन्न देख बारंबार आपके सामने विचरती हूँ। असंख्य पुण्यके बिना मैं सभीके लिये अत्यन्त दुर्लभ हूँ।

उसकी यह बात सुनकर राजाने वह अत्यन्त कठोर तपस्या त्याग दी और मन-ही-मन उसीका चिन्तन करने लगे। उसीके आश्रय तथा उसीके आज्ञा-पालनमें रहने लगे। जब सब तरहसे वे एकमात्र उसीकी शरणमें चले गये तब उनकी भारी तपस्याका नाश करके तम अन्तर्धान हो गया। इसी बीचमें मैं राजाको वर देनेके लिये गया। वे तपोभ्रष्ट एवं विह्वल होकर मृतकके समान रो रहे थे। मैंने अनेक प्रकारकी युक्तियोंसे महाराज धन्वन्तरिको सान्त्वना दी और कहा—राजन्! तुम्हारा शत्रु तम तुम्हें तपस्यासे भ्रष्ट करके कृतकार्य होकर चला गया। तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। प्रायः सभी तरुणी स्त्रियाँ पुरुषको पहले कुछ आनन्द और पीछे भारी संताप देती हैं, फिर वह तो मायामयी थी; अतः उसका संतापप्रद होना क्या आश्चर्यकी बात है।*

तब राजा धन्वन्तरिका भ्रम दूर हुआ। वे हाथ जोड़कर बोले—'ब्रह्मन्! क्या करूँ? तपस्याके पार कैसे जाऊँ?' मैंने उत्तर दिया—'देवाधिदेव जनार्दनकी यत्नपूर्वक स्तुति करो। उससे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी। भगवान् विष्णु वेदवेद्य पुरातन परमात्मा हैं। उन्होंने ही सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि की है। तीनों लोकोंमें उनके सिवा दूसरा कोई पुरुष ऐसा नहीं है, जो प्राणियोंके समस्त मनोरथोंकी सिद्धि कर सके।' मेरी आज्ञा मानकर राजा धन्वन्तरि गिरिराज हिमालयपर चले गये और वहाँ दोनों हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुकी स्तुति करने लगे।

**धन्वन्तरि बोले—**सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले विष्णो! आपकी जय हो। अचिन्त्य परमेश्वर! आपकी जय हो। विजयशील अच्युत! आपकी जय हो। गोपाल! आपकी जय हो। लक्ष्मीके स्वामी, जगन्मय श्रीकृष्ण! आपकी जय हो। भूतपते! आपकी जय हो। नाथ! आपकी जय हो। आप शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सर्वव्यापी गोविन्द! आपकी जय हो, जय हो। आप विश्वकी सृष्टि करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। देव! आपकी जय हो, जय हो। आप विश्वका पालन और धारण करनेवाले


* आनन्दयन्ति प्रमदास्तापयन्ति च मानवम् ॥ सर्वा एव विशेषेण किमु मायामयी तु सा। (१२२। २३-२४)

  • पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोंकी महिमा * २०७

हैं। ईश! आपकी जय हो। आप सदसत्स्वरूप हैं। माधव! आपकी जय हो। आप धर्मनिष्ठ परमात्माको नमस्कार है। कामनाओंको पूर्ण करनेवाले और कामस्वरूप केशव! आपकी जय हो। गुणोंके सागर श्रीराम! आपकी जय हो। आप पुष्टि देनेवाले और पुष्टिके स्वामी हैं। आपकी जय हो, जय हो। कल्याणदाता! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण भूतोंके पालक! आपकी जय हो। भूतेश्वर ! आपकी जय हो। आप मौन धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। कर्मफलोंके दाता! आपकी जय हो। आप ही कर्मस्वरूप हैं। पीताम्बरधारी प्रभो! आपकी जय हो। सर्वेश्वर! आपकी जय हो। आप सर्वस्वरूप हैं। आप मङ्गलस्वरूप प्रभुको नमस्कार है। नाथ! आप सत्त्वगुणके अधिनायक हैं। आपकी जय हो, जय हो। आप सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता हैं। आपको मेरा नमस्कार है। आप ही जन्मदाता हैं और आप ही जन्म लेनेवाले प्राणियोंके भीतर निवास करते हैं। आपकी जय हो। परमात्मन्! आपको नमस्कार है। मुक्तिदाता! आपकी जय हो। आप ही मुक्ति हैं। भोग प्रदान करनेवाले केशव! आपकी जय हो। लोकप्रद परमेश्वर! आपकी जय हो। पापोंका नाश करनेवाले लोकेश्वर! आपकी जय हो। भक्तवत्सल! आपकी जय हो, जय हो। चक्र धारण करनेवाले आप परमेश्वरको प्रणाम है। मानदाता! आपकी जय हो। आप ही मान हैं। विश्ववन्दित देव! आपकी जय हो। धर्मदाता! आपकी जय हो। आप धर्मस्वरूप हैं। संसारसे पार लगानेवाले परमात्मन्! आपकी जय हो। अन्नदाता! आपकी जय हो, जय हो। आप ही अन्न हैं। वाचस्पते! आपको नमस्कार है। शक्तिदाता! आपकी जय हो, आप ही शक्ति हैं। विजयका वरदान देनेवाले ईश्वर! आपकी जय

हो। यज्ञदाता! आपकी जय हो। आप ही यज्ञ हैं। आपके नेत्र पद्मपत्रकी तरह विशाल हैं। आपकी जय हो। दान देनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो। आप ही दान हैं। कैटभका नाश करनेवाले नारायण! आपकी जय हो। कीर्तिदाता! आपकी जय हो। आप ही कीर्ति हैं। मूर्तिदाता! आपकी जय हो। आप ही मूर्ति धारण करनेवाले हैं। सौख्यदाता! आपकी जय हो। आप ही सौख्यस्वरूप हैं। पावनको भी पावन बनानेवाले परमात्मन् ! आपकी जय हो। शान्तिदाता! आपकी जय हो! आप ही शान्ति हैं। भगवान् शंकरकी भी उत्पत्तिके कारण! आपकी जय हो। ज्योतिःस्वरूप! आपकी जय हो। वामन! आपकी जय हो। वित्तेश! आपकी जय हो। धूममयी पताकावाले! आपकी जय हो। सम्पूर्ण जगत्के लिये दातारूप परमेश्वर! आपको नमस्कार है। पुण्डरीकाक्ष! आप ही त्रिलोकीमें रहनेवाले जीवसमुदायका क्लेश निवारण करनेमें दक्ष हैं। कृपानिधे! विष्णो! आप मेरे मस्तकपर अपना वरद हाथ रखिये।

समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले शङ्ख-चक्र-गदाधर भगवान् विष्णुने इस प्रकार स्तुति करनेवाले धन्वन्तरिसे वर माँगनेको कहा। तब राजाने विनीत होकर कहा—'मैं देवताओंका राजा होना चाहता हूँ।' 'तथास्तु' कहकर भगवान् वहाँसे अन्तर्धान हो गये और राजा धन्वन्तरिने क्रमशः उन्नति करते हुए देवेन्द्रपद प्राप्त किया। पूर्वजन्ममें किये हुए अनेक कर्मोंके परिणामस्वरूप इन्द्रको तीन बार अपने पदसे भ्रष्ट होना पड़ा। वृत्रासुरका वध होनेपर नहुषके द्वारा इन्द्रका पद छीना गया। इसके बाद इन्द्रने सिन्धुसेनकी हत्या कर डाली। अतः उस पापसे भी उनके पदकी हानि हुई। तीसरी बार अहल्याके साथ समागम करनेके कारण तथा अन्य कारणोंसे भी उन्हें

२०८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

पदभ्रष्ट होना पड़ा। इन्द्र उन बातोंको याद करके चिन्ताजनित संतापसे उदास रहा करते थे। तदनन्तर एक दिन उन्होंने बृहस्पतिजीसे पूछा—'वागीश्वर! क्या कारण है कि बीच-बीचमें मुझे अपने राज्यसे भ्रष्ट होना पड़ता है? इस प्रकार पदभ्रष्ट होनेकी अपेक्षा तो निर्धन हो जाना ही अच्छा है। कर्मोंकी गहन गतिको कौन ठीक-ठीक जानता है। सब पदार्थोंके रहस्यको जाननेमें आपके सिवा और कोई समर्थ नहीं है।'

तब बृहस्पतिजीने इन्द्रसे कहा—'चलकर ब्रह्माजीसे पूछो। वे ही भूत, भविष्य और वर्तमानकी बातें जानते हैं। महामते! जिस कारणसे ऐसा होता है, वह सब वे बता देंगे।' ऐसा निश्चय करके वे दोनों मेरे पास आये और मुझे नमस्कार करके हाथ जोड़कर बोले—'भगवन्! किस दोषसे शचीपति इन्द्र अपने राज्यसे भ्रष्ट होते हैं? नाथ! इस संदेहका निवारण कीजिये।'

उनका यह प्रश्न सुनकर मैंने बहुत देरतक विचार किया। तत्पश्चात् बृहस्पतिसे कहा—'ब्रह्मन्! खण्डधर्म नामक दोषके कारण इन्द्रको राज्यपदसे च्युत होना पड़ता है। देश-काल आदिके दोषसे, श्रद्धा और मन्त्रका अभाव होनेसे, यथावत् दक्षिणा न देनेसे, असत् वस्तुका दान करनेसे और विशेषतः देवता तथा ब्राह्मणोंकी अवहेलनाके पातकसे जो देहधारियोंका अपना धर्म खण्डित हो जाता है, उससे अत्यधिक मानसिक संतापका सामना करना पड़ता है तथा पदकी हानि भी अनिवार्य हो जाती है। क्षोभपूर्ण चित्तसे किया हुआ धर्म भी अनिष्टका ही कारण होता है। उससे कार्यकी सिद्धि नहीं होती। अपना धर्म पूर्ण न होनेपर कौन-सा अनिष्ट नहीं होता।' यों कहकर मैंने उनके पूर्वजन्मका वृत्तान्त भी बतलाया। 'पूर्वजन्ममें इन्द्र राजा आयुके पुत्र धन्वन्तरि थे। उनकी तपस्यामें तम नामक राक्षसने विघ्न डाल दिया, फिर भगवान् विष्णुने उस विघ्नका निवारण किया। इस तरह इनके पूर्वजन्मोंमें ऐसे वृत्तान्त अनेक हो सकते हैं। उन्हींके फलसे इन्हें कभी-कभी अपने राज्यसे वञ्चित रहना पड़ता है।'

मेरी बात सुनकर इन्द्र और बृहस्पति दोनोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने फिर मुझसे ही पूछा—'सुरश्रेष्ठ! खण्डधर्मत्व दोषका निवारण कैसे होगा?' तब मैंने पुनः सोचकर कहा—'सुनो; एक उपाय बताता हूँ, जो समस्त दोषोंका हारक, समस्त सिद्धियोंका कारक और दुःखमय संसार-सागरसे समस्त प्राणियोंका तारक है। जिनके चित्तमें संताप रहता है, उनको इसी उपायकी शरण लेनी चाहिये। यह समस्त जीवोंको शान्ति प्रदान करनेवाला है। वह उपाय है—गौतमी देवीके तटपर जाकर भगवान् विष्णु और शिवकी स्तुति करना।' यह सुनकर वे उसी समय गौतमीके तटपर गये और स्नान करके बड़ी प्रसन्नताके साथ भगवान् विष्णु और शिवकी स्तुति करने लगे। इन्द्रने श्रीविष्णुकी स्तुति की और बृहस्पतीने श्रीशिवकी।

इन्द्र बोले—मत्स्य, कूर्म और वाराहरूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णुको बारंबार नमस्कार है। नरसिंहदेव तथा वामनको भी नमस्कार है। हयग्रीवरूपधारी भगवान्‌को नमस्कार है। त्रिविक्रम! आपको नमस्कार है। श्रीराम, बुद्ध और कल्किरूप भगवान्‌को नमस्कार है। परमेश्वर! आप अनन्त एवं अच्युत हैं। आपको नमस्कार है। परशुरामरूपधारी! आपको नमस्कार है। मैं इन्द्र, वरुण और यम आपके ही स्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। त्रिलोकीरूपधारी देवता परमेश्वरको नमस्कार है। भगवन्! आप अपने मुखमें सरस्वतीको धारण करते हैं और सर्वज्ञ हैं। आप लक्ष्मीवान्

७६- इन्द्रको शिव और विष्णुका वरदान

  • पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोंकी महिमा * २०९

हैं। अतएव लक्ष्मीको वक्षःस्थलपर धारण करते हैं। पाप-ताप आपको छू भी नहीं सकते। आपकी बाँहें, जङ्घा तथा चरण अनेक हैं। कान, नेत्र तथा मस्तक भी बहुत हैं। आप ही वास्तवमें सुखी हैं। आपको पाकर बहुत-से जीव सुखी हो गये। हरे! आप करुणाके सागर हैं। मनुष्योंको तभीतक निर्धनता, मलिनता और दीनताका सामना करना पड़ता है, जबतक वे आपकी शरणमें नहीं जाते।

बृहस्पति बोले— ईश! आप परम सूक्ष्म, ज्योतिर्मय, अनन्त, ओंकारमात्रसे अभिव्यक्त होनेवाले, प्रकृतिसे परे, चित्स्वरूप, आनन्दमय और पूर्णरूप हैं। मुमुक्षु पुरुष आपका स्वरूप ऐसा ही बतलाते हैं। भगवन्! जिनके हृदयमें एक भी कामना नहीं है अथवा जो सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर चुके हैं, वे भी पञ्चमहायज्ञोंद्वारा आपकी आराधना करते हैं और उसके फलस्वरूप आपके दिव्य धाम अथवा दिव्य स्वरूपमें, जो संसार-सागरसे परे है, प्रवेश कर जाते हैं। शम्भो! वे निष्काम अथवा आसकाम पुरुष समत्वबुद्धिके द्वारा सब प्राणियोंमें आपका दर्शन करके क्षुधा-पिपासा, शोक-मोह और जरा-मृत्युरूप छः ऊर्मियोंके प्राप्त होनेपर शान्तभावसे रहते, ज्ञानके द्वारा कर्मफलोंको त्याग देते और ध्यानके द्वारा आपमें प्रवेश कर जाते हैं। मुझमें न जातिके धर्म हैं न वेद-शास्त्रका ज्ञान है। न ध्यानका अभ्यास है और न मैं समाधि ही लगाता हूँ। केवल शान्तचित्त भगवान् शिवको, जो रुद्र, शिव और सोम आदि नामोंसे पुकारे जाते हैं, भक्तिके साथ प्रणाम करता हूँ। भगवन्! आपके चरणोंमें भक्ति रखनेसे मूर्ख मनुष्य भी आपके मोक्षमय स्वरूपको प्राप्त कर लेता है। ज्ञान, यज्ञ, तप, ध्यान तथा बड़े-बड़े फल देनेवाले होम आदि कर्मोंका सर्वोत्तम फल यही है कि भगवान् सोमनाथमें निरन्तर भक्ति बनी रहे। जगदाधार शिव ! सब जीवोंके लिये सदा देखे और सुने हुए प्रिय फलकी, स्वर्गकी तथा मोक्षकी प्राप्तिके लिये आपकी यह भक्ति ही सीढ़ी है। धीर पुरुष आपके चरणोंकी प्राप्तिरूपी फलके लिये दूसरी किसी सीढ़ीको नहीं बतलाते। दयालो! इसलिये आपके प्रति मेरी भक्ति बनी रहे। आपके श्रीविग्रहकी सेवाका सौभाग्य प्राप्त होता रहे। दूसरा कोई उपाय नहीं है। ईश्वर! यद्यपि हमलोग पापी हैं, तथापि आप अपनी महिमाकी ओर देखकर हमपर कृपा कीजिये। आप स्थूल, सूक्ष्म, अनादि, नित्य, पिता, माता, असत् और सत्स्वरूप हैं—श्रुतियों और पुराणोंने इस प्रकार जिनका स्तवन किया है, उन परमेश्वर सोमनाथको मैं प्रणाम करता हूँ।

इन दोनोंकी स्तुतियोंसे भगवान् विष्णु और शिव बहुत प्रसन्न हुए और बोले—‘तुम दोनों अत्यन्त दुर्लभ अभीष्ट वर माँगो।’ तब इन्द्रने कहा—‘भगवन्! मेरा राज्य बार-बार अधिकारमें आता और छिन जाता है। जिस पापके कारण

५४- श्रीरामतीर्थकी महिमा

२१० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

ऐसा होता है, वह पाप नष्ट हो जाय। यदि आप दोनों देवेश्वर अत्यन्त प्रसन्न हों तो मेरा सब कुछ सदा स्थिर रहे।' यह सुनकर भगवान् शिव और विष्णुने मुसकराते हुए इन्द्रके वाक्यका अनुमोदन किया और इस प्रकार कहा—'यह गोदावरी नदी ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीनों देवताओंसे सम्बन्ध रखनेवाला महान् तीर्थ है। यहाँ सबके मनोरथ पूर्ण होते हैं। तुम दोनों यहाँ श्रद्धापूर्वक स्नान करो। इन्द्रके मङ्गलके लिये तथा इनके वैभवकी स्थिरताके लिये बृहस्पति हम दोनोंका स्मरण करते हुए इन्द्रका अभिषेक करें तथा उस समय निम्नाङ्कित मन्त्र भी पढ़ें—

इह जन्मनि पूर्वस्मिन् यत्किंचित् सुकृतं कृतम्।
तत् सर्वं पूर्णतामेतु गोदावरि नमोऽस्तु ते॥
(१२२। ९१)

'गोदावरि ! मैंने इस जन्ममें अथवा पूर्वजन्ममें जो कुछ भी पुण्यकर्म किया हो, वह सब पूर्णताको प्राप्त हो। आपको नमस्कार है।'

जो इस प्रकार स्मरण करके गौतमी गङ्गामें स्नान करता है, उसका धर्म हम दोनोंकी कृपासे परिपूर्ण होता है तथा वह साधक अपने पूर्वजन्मके दोषसे भी मुक्त होकर पुण्यवान् हो जाता है।'

इन्द्र और बृहस्पतिने 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान्‌की आज्ञा स्वीकार की और दोनों प्रसन्न होकर उस कार्यमें लग गये। देवगुरुने इन्द्रका महाभिषेक किया। उससे एक नदी प्रकट हुई, जो पुण्या और मङ्गला कहलायी। उस नदीके साथ जो गङ्गाजीका संगम हुआ, वह बड़ा ही पवित्र एवं कल्याणकारक है। इन्द्रकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर जगन्मय भगवान् विष्णु प्रत्यक्ष प्रकट हुए और उनसे इन्द्रने त्रिलोकीका राज्य प्राप्त किया। अतः ('इन्द्रं गामविन्दयत्'—इस व्युत्पत्तिके अनुसार) भगवान् वहाँ गोविन्दके नामसे विख्यात हुए, क्योंकि इन्द्रने उनसे त्रिलोकमयी गौ प्राप्त की थी। देवगुरु बृहस्पतिने जहाँ इन्द्रके राज्यकी स्थिरताके लिये महादेवजीका स्तवन किया, वहाँ वे सिद्धेश्वर नामसे निवास करते हैं। सिद्धेश्वर नामक शिवलिङ्गकी सम्पूर्ण देवता भी पूजा करते हैं। तबसे वह तीर्थ गोविन्दतीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वहीं मङ्गला-संगम, पूर्णतीर्थ, इन्द्रतीर्थ और बार्हस्पत्यतीर्थ भी हैं। उन तीर्थोंमें जो स्नान, दान अथवा किंचिन्मात्र भी पुण्यका उपार्जन किया जाता है, वह सब अक्षय होता है। वहाँका श्राद्ध पितरोंको अत्यन्त प्रिय है। जो मनुष्य प्रतिदिन इस तीर्थके माहात्म्यको सुनता, पढ़ता और स्मरण करता है, उसे खोये हुए राज्यकी प्राप्ति होती है। नारद! वहाँ गौतमीके दोनों तटोंपर सैंतीस हजार तीर्थ रहते हैं, जो सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाले हैं।


श्रीरामतीर्थकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं— नारद! रामतीर्थ भ्रूणहत्याका नाश करनेवाला है। उसकी महिमाके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। इक्ष्वाकुवंशमें दशरथ नामके क्षत्रिय राजा हुए, जो सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात थे। वे इन्द्रकी ही भाँति बलवान्, बुद्धिमान् और शूरवीर थे तथा बलिकी भाँति अपने पिता-पितामहोंके राज्यका पालन करते थे। महाराज दशरथके तीन रानियाँ थीं—कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी। वे तीनों कुलीन, सौभाग्यशालिनी, रूपवती और सुलक्षणा थीं। राजा दशरथ जब अयोध्याके राजसिंहासनपर आसीन थे और ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजी उनके

  • श्रीरामतीर्थकी महिमा * २११

पुरोहितके पदपर प्रतिष्ठित थे, उस समय देशमें न रोग थे न मानसिक चिन्ताएँ। न तो अनावृष्टि होती थी और न अकाल ही पड़ता था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रोंको और चारों आश्रमोंको भी पृथक्-पृथक् बड़ा सुख मिलता था। एक समयकी बात है, देवताओं और दानवोंमें राज्यके लिये युद्ध छिड़ गया। न तो उसमें देवताओंकी जीत होती थी और न दैत्यों एवं दानवोंकी ही। वह युद्ध कई दिनोंतक लगातार चलता रहा। इसी बीचमें आकाशवाणी हुई—‘राजा दशरथ जिनका पक्ष ग्रहण करेंगे, वे ही विजयी होंगे, दूसरे नहीं।’ यह सुनकर देवता और दानव दोनों अपनी विजयके लिये राजाके पास चले। देवताओंकी ओरसे वायु शीघ्र जा पहुँचे और राजासे बोले—‘महाराज! देव-दानव-संग्राममें आपको चलना चाहिये। वहाँ यह आकाशवाणी सुनायी दी है कि जिस ओर राजा दशरथ रहेंगे, उसी पक्षकी जीत होगी; अतः आप देवताओंका पक्ष ग्रहण कीजिये, जिससे देवता विजयी हों।’

वायुकी यह बात सुनकर राजा दशरथने कहा—‘वायुदेव! आप सुखपूर्वक पधारें। मैं अवश्य चलूँगा।’ वायुके चले जानेपर दैत्यगण राजाके पास आये और बोले—‘भगवन्! हमारी सहायता कीजिये। महाराज ! विजय आपपर ही अवलम्बित है, अतः आप दैत्यराजकी सहायता करें।’ राजा बोले—‘वायुदेवने पहले मुझसे प्रार्थना की है और मैंने देवताओंकी सहायता करनेका वचन दे दिया है; अतः दैत्य और दानव लौट जायें।’ राजा दशरथने वैसा ही किया। स्वर्गमें पहुँचकर उन्होंने दैत्यों, दानवों तथा राक्षसोंके साथ लोहा लिया। उस समय नमुचिके भाइयोंने देवताओंके देखते-देखते तीखे बाण मारकर राजाके रथकी धुरी तोड़ डाली। राजा बड़े वेगसे युद्धमें लगे थे। उन्हें धुरी टूटनेका पता न लगा। नारद! उस युद्धमें रानी कैकेयी भी राजाके पास ही बैठी थी। उसे रथकी अवस्थाका पता लग गया, परंतु उसने राजाको इस बातकी सूचना नहीं दी। धुरी टूटी देख उसने उसकी जगह अपना हाथ ही लगा दिया। यह बड़ा अद्भुत कार्य था। रथियोंमें श्रेष्ठ महाराज दशरथने कैकेयीके हाथसे थामें हुए रथके द्वारा दैत्यों और दानवोंपर विजय पायी, फिर देवताओंसे अनेक वर पाकर उनकी अनुमति ले वे पुनः अयोध्या लौट आये। आते समय मार्गके बीचमें जब महाराज दशरथने अपनी प्रिया कैकेयीकी ओर दृष्टिपात किया, तब उसका वह साहसपूर्ण कार्य देखकर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। नारद! इस कार्यसे प्रसन्न होकर राजाने कैकेयीको वर दिये। रानी कैकेयीने भी राजाकी आज्ञा स्वीकार करके इस प्रकार कहा—‘महाराज! आपके दिये हुए ये वर आपके ही पास रहें [आवश्यकता पड़नेपर ले लूँगी]।’*

राजा दशरथ पुरस्कारमें अनेक आभूषण देकर अपनी प्रिया कैकेयीके साथ अपने नगरको गये। विजयी होनेसे वे बहुत प्रसन्न थे। तदनन्तर बहुत समयके बाद मुनीश्वर ऋष्यशृङ्गकी कृपासे देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये राजा दशरथके चार देवोपम पुत्र हुए। कौसल्यासे राम, कैकेयीसे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भरत तथा सुमित्रासे लक्ष्मण और शत्रुघ्न


* स तु मध्ये महाराजो मार्गे वीक्ष्य तदा प्रियाम्। कैकेय्याः कर्म तद् दृष्ट्वा विस्मयं परमं गतः॥
ततस्तस्यै वरान् प्रादात्प्रींस्तु नारद सा अपि। अनुमान्य नृपोक्तं कैकेयी वाक्यमब्रवीत्॥
त्वयि तिष्ठन्तु राजेन्द्र त्वया दत्ता वरा अमी॥
(१२३।२९-३१)

२१२

  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

हुए। वे सभी पुत्र बुद्धिमान्, प्रिय तथा राजाके आज्ञाकारी थे। एक बार महर्षि विश्वामित्र आये और उन्होंने यज्ञकी रक्षाके लिये राजासे राम और लक्ष्मणको माँगा। विश्वामित्र उनके महत्त्वको जानते थे।

राजा दशरथ बोले—मुने! इस बुढ़ापेमें किसी तरह दैवयोगसे मेरे ये बालक उत्पन्न हुए हैं, जो मेरे मनको आनन्द देनेवाले हैं। मैं अपना शरीर और यह राज्य दे दूँगा, किन्तु इन पुत्रोंको न दे सकूँगा।

उस समय वसिष्ठने राजा दशरथसे कहा—‘राजन्! रघुवंशियोंने किसीकी प्रार्थनाको ठुकराना नहीं सीखा है।’ उनके यों कहनेपर राजाने किसी तरह श्रीराम और लक्ष्मणसे कहा—‘पुत्रो! तुम ब्रह्मर्षि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करो।’ यों कहकर उन्होंने अपने दोनों पुत्र विश्वामित्रजीको सौंप दिये। राम और लक्ष्मणने ‘बहुत अच्छा’ कहकर राजा दशरथको नमस्कार किया और यज्ञकी रक्षाके लिये विश्वामित्रजीके साथ प्रसन्नतापूर्वक चल दिये। तब महर्षि विश्वामित्रने उन दोनों भाइयोंको माहेश्वरी महाविद्या, धनुर्वेद, शस्त्रविद्या, अस्त्रविद्या, लोकविद्या, रथविद्या, गजविद्या, अश्वविद्या, गदाविद्या तथा मन्त्रद्वारा अस्त्रोंके आवाहन और विसर्जनकी शिक्षा दी। इस प्रकार सम्पूर्ण विद्याएँ प्राप्तकर श्रीराम और लक्ष्मणने वनवासियोंका हित करनेके लिये वनमें ताड़काको मार डाला और हाथमें धनुष लेकर यज्ञकी रक्षा करने लगे। तत्पश्चात् महायज्ञ पूर्ण होनेपर मुनिवर विश्वामित्र दोनों राजकुमारोंके साथ राजा जनकसे मिलने गये। वहाँ लक्ष्मणसहित श्रीरामने राजाओंकी मण्डलीमें अपने गुरुसे सीखी हुई अद्भुत धनुर्विद्याका परिचय दिया। इससे प्रसन्न होकर राजा जनकने अपनी अयोनिजा कन्या लक्ष्मीस्वरूपा सीताका श्रीरामके साथ विवाह कर दिया। इसी प्रकार लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नका विवाह भी राजा जनकके ही घर हुआ। तदनन्तर दीर्घकाल व्यतीत होनेपर राजा दशरथ समस्त प्रजा और गुरुकी अनुमतिसे श्रीरामको राज्य देने लगे। उस समय मन्थणारूपी दुर्देवसे प्रेरित होकर रानी कैकेयी ईर्ष्यासे व्याकुल हो उठी। उसने श्रीरामके राज्याभिषेकमें विघ्न डाला और उन्हें वनवास भेजनेके लिये कहा। साथ ही उसने वही राज्य भरतके लिये माँगा, परंतु राजाने स्वीकार नहीं किया। पिताके सत्यकी रक्षाके लिये श्रीराम स्वयं ही घोर जङ्गलमें चले गये। सीता और लक्ष्मणने भी उन्हींका साथ दिया। श्रीरामने अपने सद्गुणोंके कारण सत्पुरुषोंके शुद्ध हृदयमें घर बना लिया था। जब श्रीराम राज्यकी तृष्णासे रहित और वनवासके लिये दीक्षित हो लक्ष्मण और सीताके साथ चले गये, तब राम, लक्ष्मण और गुणशालिनी सीताका स्मरण करके महाराजको बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये। इधर श्रीरामचन्द्रजी चलते-चलते चित्रकूटमें आये। वहीं उन्होंने तीन वर्ष व्यतीत किये। फिर वहाँसे दक्षिण दिशाकी ओर चलकर वे क्रमशः दण्डकारण्यमें पहुँचे, जो समस्त देशोंमें पवित्र और तीनों लोकोंमें विख्यात है। वह महान् वन दैत्योंसे सेवित होनेके कारण बड़ा भयंकर था। ऋषियोंने भयभीत होकर उसे छोड़ दिया था। श्रीरामने वहाँ दैत्यों और राक्षसोंको मारकर दण्डकवनको ऋषि-मुनियोंके रहनेयोग्य बना दिया। फिर पाँच योजन आगे जाकर वे धीरे-धीरे गौतमीके तटपर पहुँचे। भगवान् शिवकी जो पुञ्जीभूत एवं अनिर्वचनीय पराशक्ति है, वही जलस्वरूपमें प्रकट हुई गौतमी नदी है—ऐसा संत-महात्माओंका कथन है।

  • श्रीरामतीर्थकी महिमा * २१३

गौतमी ब्रह्मा, विष्णु और शिवके लिये भी माननीय तथा वन्दनीय है।

श्रीराम बोले—अहो, गङ्गाका कैसा अद्भुत प्रभाव है! तीनों लोकोंमें इनकी कहीं उपमा नहीं है। हम धन्य हैं कि इन त्रिभुवनपावनी गङ्गाका दर्शन पा सके।

यों कहकर श्रीरामने बड़े हर्षके साथ महादेवजीकी स्थापना की और यत्नपूर्वक षोडशोपचारसे छत्तीस कलाओंवाले महादेवजीकी आवरणसहित पूजा करके हाथ जोड़ उनकी स्तुति करने लगे।

श्रीराम बोले—मैं पुराणपुरुष शम्भुको नमस्कार करता हूँ। जिनकी असीम सत्ताका कहीं पार या अन्त नहीं है, उन सर्वज्ञ शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। अविनाशी प्रभु रुद्रको नमस्कार करता हूँ। सबका संहार करनेवाले शर्वको मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ। अविनाशी परमदेवको नमस्कार करता हूँ। लोकगुरु उमापतिको प्रणाम करता हूँ। दरिद्रताका विनाश करनेवाले शिवको नमस्कार करता हूँ। रोगोंका अपहरण करनेवाले महेश्वरको प्रणाम करता हूँ। जिनका रूप चिन्तनका विषय नहीं है, उन कल्याणमय शिवको नमस्कार करता हूँ। विश्वकी उत्पत्तिके बीजभूत भगवान् भवको प्रणाम करता हूँ। जगत्‌का पालन करनेवाले परमात्माको नमस्कार करता हूँ। संहारकारी रुद्रको बारंबार प्रणाम करता हूँ। पार्वतीजीके प्रियतम अविनाशी प्रभुको नमस्कार करता हूँ। नित्य, क्षर-अक्षरस्वरूप शंकरको प्रणाम करता हूँ। जिनका स्वरूप चिन्मय है और अप्रमेय है, उन भगवान् त्रिलोचनको मैं मस्तक झुकाकर बारंबार नमस्कार करता हूँ। करुणा करनेवाले भगवान् शिवको प्रणाम करता हूँ तथा संसारको भय देनेवाले भगवान् भूतनाथको सर्वदा नमस्कार करता हूँ। मनोवाञ्छित फलोंके दाता महेश्वरको प्रणाम करता हूँ। भगवती उमाके स्वामी श्रीसोमनाथको नमस्कार करता हूँ। तीनों वेद जिनके तीन नेत्र हैं, उन त्रिलोचनको प्रणाम करता हूँ। त्रिविध मूर्तिसे रहित सदा शिवको नमस्कार करता हूँ। पुण्यमय शिवको प्रणाम करता हूँ। सत्-असत्‌से पृथक् परमात्माको नमस्कार करता हूँ। पापोंका अपहरण करनेवाले भगवान् हरको प्रणाम करता हूँ। जो सम्पूर्ण विश्वके हितमें लगे रहते हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार करता हूँ। जो बहुत-से रूप धारण करते हैं, उन भगवान् शंकरको प्रणाम करता हूँ। जो संसारके रक्षक तथा सत् और असत्‌के निर्माता हैं, उन्हें नमस्कार करता हूँ। जो सम्पूर्ण विश्वके स्वामी हैं, उन विश्वनाथको प्रणाम करता हूँ। हव्य-कव्यस्वरूप यज्ञेश्वरको नमस्कार करता हूँ। सम्पूर्ण लोकोंका सर्वदा कल्याण करनेवाले जो भगवान् शिव आराधना करनेपर उत्तम गति एवं सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करते हैं, उन दानप्रिय इष्टदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। भगवान् सोमनाथको प्रणाम करता हूँ। जो स्वतन्त्र न रहकर भक्तोंके पराधीन रहते हैं, उन विजयशील उमानाथको मैं नमस्कार करता हूँ। विघ्नराज गणेश तथा नन्दीके स्वामी पुत्रप्रिय भगवान् शिवको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ। संसारके दुःख और शोकका नाश करनेवाले देवता भगवान् चन्द्रशेखरको मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ। जो स्तुति करने योग्य और मस्तकपर गङ्गाको धारण करनेवाले हैं, उन महेश्वरको नमस्कार करता हूँ। देवताओंमें श्रेष्ठ उमापतिको प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा आदि ईश्वर, इन्द्र आदि देवता तथा असुर भी जिनके चरण-कमलोंकी पूजा करते हैं, उन भगवान्‌को मैं नमस्कार करता हूँ। जिन्होंने पार्वतीदेवीके मुखसे निकलनेवाले वचनोंपर दृष्टिपात करनेके लिये मानो तीन नेत्र धारण कर रखे हैं,

५५- पुत्रतीर्थकी महिमा

२१४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


उन भगवान्को प्रणाम करता हूँ। पञ्चामृत, चन्दन, उत्तम धूप, दीप, भाँति-भाँतिके विचित्र पुष्प, मन्त्र तथा अन्न आदि समस्त उपचारोंसे पूजित भगवान् सोमको मैं नमस्कार करता हूँ।

तदनन्तर भगवान् शंकरने प्रकट होकर श्रीराम और लक्ष्मणसे कहा—'तुम्हारा कल्याण हो, वर माँगो।'

**श्रीराम बोले—**सुरश्रेष्ठ! महेश्वर! जो लोग इस स्तोत्रके द्वारा भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करें, उनके सम्पूर्ण कार्य सिद्ध हो जायँ। शम्भो! जिनके पितर नरकके समुद्रमें डूबे हों, उनके वे पितर यहाँ पिण्ड आदि देनेसे पवित्र हो स्वर्गलोकमें चले जायँ। जन्मभरके कमाये हुए मानसिक, वाचिक और शारीरिक पाप यहाँ स्नान करनेमात्रसे तत्काल नष्ट हो जायँ। जो लोग यहाँ याचकोंको भक्तिपूर्वक थोड़ा भी दान दें, वह सब अक्षय होकर दाताओंके लिये उत्तम फल देनेवाला हो।

यह सुनकर शंकरजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने 'एवमस्तु' कहकर श्रीरामचन्द्रकी बातका अनुमोदन किया। सुरश्रेष्ठ भगवान् शिवके अन्तर्धान हो जानेपर श्रीराम अपने अनुगामियोंके साथ धीरे-धीरे उस प्रदेशमें गये, जहाँसे गोदावरी नदी प्रकट हुई हैं। तबसे वह तीर्थ श्रीरामतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। जहाँ लक्ष्मणने स्नान और शंकरका पूजन किया, वह लक्ष्मणतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ और जहाँ सीताने स्नानादि किया, वह सीतातीर्थके नामसे कहलाया। सीतातीर्थ नाना प्रकारकी समस्त पापराशिको निर्मूल करनेमें समर्थ है। जिसके चरणोंसे त्रिभुवनपावनी गङ्गा प्रकट हुईं, उन्होंने ही जहाँ स्नान किया, उस तीर्थकी विशिष्टताके विषयमें क्या कहा जा सकता है। अतः श्रीरामतीर्थके समान कहीं कोई भी तीर्थ नहीं है।

पुत्रतीर्थकी महिमा

**ब्रह्माजी कहते हैं—**गौतमी-तटपर जो विख्यात पुत्रतीर्थ है, वह पुण्यतीर्थ कहलाता है। उसकी महिमाके श्रवणमात्रसे मनुष्य सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है। नारद! मैं उसके स्वरूपका वर्णन करता हूँ, सावधान होकर सुनो। जब दिति एवं दनुके पुत्र दैत्य और दानवोंका देवताओंद्वारा क्षय होने लगा, तब दिति पुत्र-वियोगके दुःखसे मनमें स्पर्धा लेकर अपनी बहन दनुके पास आयी और इस प्रकार कहने लगी—'भद्रे! हम दोनोंके ही पुत्र क्षीण होते जा रहे हैं। हम संसारमें कौन ऐसा गुरुतर कार्य करें, जिससे हमारा यह संकट दूर हो। देखो, अदितिका वंश कितना संगठित और उत्तम है। उसका कभी क्षय नहीं होता। वह उत्तम राज्य, सुयश और विजय-लक्ष्मीसे सुशोभित है। अदितिकी संतानोंका वैभव और अभ्युदय देखकर मैं दुबली होती जा रही हूँ। सम्भव है, जीवित न रह सकूँ। अदितिके महान् ऐश्वर्यपर दृष्टि डालते ही मैं अवर्णनीय दुरवस्थाका अनुभव करने लगती हूँ। दावानलमें प्रवेश कर जाना भी सुखद है, किंतु स्वप्नमें भी सौतकी समृद्धि नहीं देखी जाती।

**दनु बोली—**भद्रे! तुम अपने गुणोंसे पतिदेव कश्यपजीको संतुष्ट करो। यदि स्वामी संतुष्ट हो गये तो तुम सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लोगी।

'बहुत अच्छा' कहकर दितिने सब प्रकारसे कश्यपजीको संतुष्ट किया। तब प्रजापति भगवान् कश्यपने दितिसे कहा-'सुव्रते! तुम्हें क्या दूँ? तुम कोई अभीष्ट वर माँगो।' यह सुनकर दितिने स्वामीसे कहा—'नाथ! मुझे ऐसा पुत्र दीजिये, जो

  • पुत्रतीर्थकी महिमा * २१५

अनेक गुणोंसे सम्पन्न, विश्वविजयी और जगद्वन्द्य हो तथा जिसके जन्म लेनेसे मैं संसारमें वीरजननी कहला सकूँ।' कश्यपजीने कहा—'देवि! मैं तुम्हें एक श्रेष्ठ व्रतका उपदेश करता हूँ, जो बारह वर्षोंतक पालन करनेके बाद फल देता है। उसके बाद आकर तुम्हारे मनके अनुकूल गर्भका आधान करूँगा, क्योंकि व्रत आदिके द्वारा निष्पाप हो जानेपर ही सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होते हैं।'

पतिका यह वचन सुनकर दितिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने कश्यपजीको नमस्कार करके उनके बताये हुए व्रतका विधिपूर्वक पालन किया। जो लोग तीर्थोंकी सेवा, सुपात्रोंको दान तथा व्रतका पालन आदि नहीं करते, वे अपनी अभीष्ट वस्तुओंको कैसे प्राप्त कर सकते हैं। दितिका व्रत पूरा होनेपर कश्यपजीने गर्भाधान किया और एकान्तमें अपनी प्रिय पत्नी दितिसे कहा—'शुचिस्मिते! तपस्वी मुनि भी विहित कर्मकी अवहेलना करनेसे मनोवाञ्छित पदार्थ नहीं पा सकते। अतः तुम्हें कोई निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये। दोनों संध्याओंके समय सोना, कहीं जाना अथवा बाल खोले रहना निषिद्ध है। संध्याकाल भूतोंसे व्याप्त रहता है। अतः उस समय छींकना, जँभाई लेना तथा भोजन करना भी मना है। ये सब कार्य सदा ओटमें ही करने चाहिये। विशेषतः हँसना तो दूसरोंके सामने हो ही नहीं। संध्याकालमें कभी कमरेके भीतर न रहे। प्रिये! मूसल, ऊखल, सूप, पीढ़ा और ढक्कन आदिको दिन या रातमें कभी न लाँघना। उत्तरकी ओर सिरहाना करके तथा संध्याकालमें कभी न सोना। झूठ न बोलना। दूसरोंके घर न जाना। पतिके सिवा और किसी पुरुषपर कहीं भी दृष्टि न डालना। यदि निरन्तर इन नियमोंका पालन करती रहोगी तो तुम्हारा पुत्र त्रिभुवनके ऐश्वर्यका भागी होगा।' दितिने स्वामीके समक्ष प्रतिज्ञा की—'मैं इन नियमोंका ठीक-ठीक पालन करूँगी।' फिर कश्यपजी देवताओंके यहाँ चले गये। इधर दितिका पुण्यजनित बलवान् गर्भ दिनोंदिन बढ़ने लगा। इन सब बातोंको मय नामक दैत्य अपनी मायाके बलसे जानता था। उसकी इन्द्रसे मित्रता थी। दोनोंमें बड़ा प्रेम था। उसने इन्द्रके पास एकान्तमें जाकर विनयपूर्वक कहा—'दिति और दनुने विशेष अभिप्रायसे कश्यपजीको संतुष्ट किया है। दितिका गर्भ दिनोंदिन बढ़ता है, उसमें नाना प्रकारकी शक्तियाँ हैं।'

**नारदजीने पूछा—**देवेश्वर! महाबली मय नामक दैत्य तो नमुचिका प्रिय भ्राता है और नमुचि इन्द्रके हाथसे मारा गया था। फिर उसकी अपने भाईके शत्रुसे मित्रता कैसे हुई?

**ब्रह्माजी बोले—**पूर्वकालमें नमुचि दैत्योंका राजा था, उसका इन्द्रके साथ बड़ा भयंकर वैर हुआ। एक समयकी बात है—इन्द्र युद्ध छोड़कर कहीं जा रहे थे। यह देखकर दैत्यराज नमुचि भी उनके पीछे लग गया। उसे आगे देख इन्द्र भयसे व्याकुल हो गये और ऐरावत हाथीको छोड़कर समुद्रके फेनमें घुस गये। फिर वज्रमें फेन लपेटकर उस फेनसे ही इन्द्रने अपने शत्रुका संहार कर डाला। जब नमुचिकी मृत्यु हो गयी तब उसके छोटे भाई मयने अपने बड़े भाईके घातकका विनाश करनेके लिये बड़ी भारी तपस्या की। उसने अनेक प्रकारकी माया प्राप्त की, जो देवताओंके लिये अत्यन्त भयंकर थी। उसने सम्पूर्ण लोकोंको शरण देनेवाले भगवान् विष्णुसे भी वर प्राप्त किया। मय दानी और प्रियभाषी था। उसने इन्द्रको जीतनेके लिये अग्नि और ब्राह्मणोंका पूजन आरम्भ किया। वह याचकोंको मुँहमाँगी वस्तुएँ देने लगा। वन्दीजन सदा उसकी स्तुति करते थे। इन्द्रने वायुसे अपने मायावी शत्रु मयकी गति-विधि जान ली। तब वे

२१६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

ब्राह्मणका वेष बनाकर उसके पास गये और बोले—'दैत्यराज ! मैं याचक हूँ, मुझे मनोवाञ्छित वर दीजिये। मैंने सुना है—आप दाताओंके सिरमौर हैं। अतः आपके पास आया हूँ।' मयने उन्हें ब्राह्मण जानकर कहा—'दिया हुआ ही समझो। सामने याचकको पाकर दाता यह विचार नहीं करते कि थोड़ा दूँ या अधिक।' उसके यों कहनेपर इन्द्र बोले—'मैं तुम्हारे साथ मित्रता चाहता हूँ।' यह सुनकर मय दैत्यने कहा—'विप्रवर! ऐसे वरसे क्या लाभ। आपके साथ मेरा वैर तो है नहीं।' तब इन्द्रने अपने वास्तविक रूपको प्रकट किया। इन्द्रको पहचानकर मयके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। 'सखे! यह क्या बात है? तुम तो वज्रधारी हो। तुम्हारे योग्य यह कार्य नहीं है।' इन्द्रने हँसकर मयको हृदयसे लगाया और कहा—'विद्वान् पुरुष किसी भी उपायसे अपने अभीष्ट कार्यकी सिद्धि करते हैं।' तबसे मयके साथ इन्द्रकी गहरी मैत्री हो गयी। मय सदाके लिये इन्द्रका हितैषी हो गया। उसने इन्द्रभवनमें जाकर सब बातें बतायीं, साथ ही इन्द्रको माया भी प्रदान की। इन्द्रने प्रसन्न होकर पूछा—'मय! बताओ, अब मुझे क्या करना चाहिये?'

मयने कहा—अगस्त्यके आश्रमपर जाओ। वहीं गर्भवती दिति रहती है। उसकी सेवा करते हुए आश्रममें कुछ दिन निवास करो; फिर अवसर देखकर वज्र हाथमें लिये दितिके गर्भमें प्रवेश कर जाओ और वज्रसे उस बढ़ते हुए गर्भके टुकड़े-टुकड़े कर डालो। इससे तुम्हारे उस शत्रुका अस्तित्व ही मिट जायगा।

इन्द्रने 'बहुत अच्छा' कहकर मयकी प्रशंसा की और विनीतकी भाँति माता दितिके पास गये। वहाँ जाकर दैत्यमाताकी सेवा-शुश्रूषामें लग गये। उनके मनमें क्या है, इस बातको दिति नहीं जानती थीं। उनके गर्भमें जो मुनिका अमोघ तेज था, वह किसीके लिये भी दुर्धर्ष था। इन्द्र गर्भके भीतर प्रवेश करनेकी इच्छासे अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए बहुत समयतक वहाँ रहे। एक दिन दिति संध्याकालमें उत्तरकी ओर सिरहाना करके सो रही। इन्द्रने मनमें कहा—'यही अच्छा अवसर है।' यों कहकर वे वज्र हाथमें ले दितिके उदरमें प्रवेश कर गये। गर्भमें जो बालक था, वह आयुध लिये मारनेकी इच्छासे आये हुए इन्द्रको देखकर भी भयभीत न हुआ और बोला—'वज्रधारी इन्द्र! मैं तुम्हारा भाई हूँ। तुम मेरी रक्षा क्यों नहीं करते? क्या मुझे मारना चाहते हो? युद्धके बिना अन्य अवसरपर किसीको मारनेसे बढ़कर दूसरा कोई पातक नहीं है। मैं गर्भसे निकलूँ, तब मुझसे युद्ध कर लेना। यहाँ आकर इस प्रकार मारना तुम्हारे लिये उचित नहीं होगा। बड़े लोग विपत्तिमें पड़नेपर भी कुमार्गपर पैर नहीं रखते। मैंने न तो अभी विद्या पढ़ी है, न शस्त्र चलाना सीखा है और न आयुधोंका ही संग्रह किया है। तुम विद्वान् हो। तुम्हारे हाथमें वज्र शोभा पा रहा है। क्या मुझे मारते समय तुम्हें लज्जा नहीं आती? कुलीन पुरुष कभी भी कुत्सित कर्म नहीं करते। मुझे मारनेसे तुम्हें क्या मिलेगा, यश अथवा पुण्य? गर्भमें आये हुए प्राणी इच्छानुसार मारे जा सकते हैं, किंतु इसमें कौन-सा पुरुषार्थ है। भाई! यदि तुम्हें युद्धसे प्रेम है और मुझसे ही भिड़ना चाहते हो तो निःसंदेह चले आओ।' यों कहकर वह बालक भी इन्द्रकी ओर मुक्का तानकर खड़ा हो गया और बोला—'इन्द्र! मुझे मारनेसे तुम बालघाती, ब्रह्मघाती तथा विश्वासघाती कहलाओगे। यही तुम्हें फल मिलेगा। फिर किसलिये मुझे मारनेको उद्यत हुए हो। सम्पूर्ण चराचर जगत् जिसकी आज्ञाके अधीन चल रहा

  • पुत्रतीर्थकी महिमा * २१७

हो, वह मुझ-जैसे बालककी हत्या करे— इसमें कौन-सा यश और क्या पुरुषार्थ है?'

गर्भका बालक यों ही कहता रहा, किंतु इन्द्रने अपने वज्रसे उस बालकके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। सच है, क्रोधान्ध और लोभी मनुष्योंको किसीपर भी दया नहीं आती। इतनेपर भी गर्भस्थ बालककी मृत्यु नहीं हुई। सभी टुकड़े जीवित बालकोंके रूपमें परिणत हो गये और दुःखसे रोते हुए बोले—'क्यों मारते हो, हम तुम्हारे भाई हैं।' किंतु इन्द्रने एक न सुनी, उन खण्डोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले। वे भी जीवित होकर बोले—'इन्द्र! हमें न मारो। हम तुमपर विश्वास करते हैं, माताके गर्भमें पड़े हैं और तुम्हारे ही भाई हैं।' परंतु कौन सुनता था। जिनकी बुद्धि द्वेषसे नष्ट हो गयी है, उनके चित्तमें करुणाका एक कण भी नहीं रह जाता। गर्भके सभी टुकड़े हाथ-पैर तथा नूतन जीवसे युक्त हो गये! उनमें किसी प्रकारका विकार नहीं रह गया। उनकी संख्या एकसे बढ़कर उनचास हो गयी। यह देखकर इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। वे सब-के-सब रो रहे थे। इन्द्रने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—'मा रुत' (मत रोओ)। इनके ऐसा कहनेसे उनका नाम मरुत् हो गया। वे गर्भमें ही अत्यन्त बलवान् और महापराक्रमी हो गये थे। उन्होंने गर्भके भीतरसे ही मुनिवर अगस्त्यको, जिनके आश्रममें माता टिकी हुई थी, पुकारकर कहा—'मुने! हमारे पिता आपके भाई हैं। वे आपकी मैत्रीका बहुत आदर करते हैं। हम यह भी जानते हैं कि आपके मनमें हमलोगोंके प्रति बड़ा स्नेह है; तथापि आपके रहते हुए यह वज्रधारी इन्द्र ऐसे कार्यमें प्रवृत्त हुआ है, जिसे कोई चाण्डाल भी नहीं करता।' गर्भके बालकोंकी वह पुकार सुनकर अगस्त्य मुनि दौड़े हुए आये। उन्होंने दितिको जगाया। वे गर्भकी वेदनासे पीड़ित थीं। उस समय अगस्त्यने अत्यन्त कुपित होकर शचीपति इन्द्रको शाप दिया—'इन्द्र! संग्राममें शत्रु तुम्हारी पीठ देखेंगे।' दितिने भी गर्भमें समाये हुए इन्द्रको रोषपूर्वक शाप दिया—'तूने बच्चोंको मारकर कोई पुरुषार्थ नहीं किया है; अतः मैं शाप देती हूँ कि तू राज्यसे भ्रष्ट हो जायगा।' इसी समय वहाँ प्रजापति कश्यपजी भी आ पहुँचे। अगस्त्यके मुखसे इन्द्रकी यह कुत्सित चेष्टा सुनकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ।

कश्यपजीने कहा— बेटा! गर्भके बाहर निकलो। तुमने यह क्या पाप कर डाला। उत्तम कुलमें उत्पन्न पुरुष कभी पापमें मन नहीं लगाते।

पिताका आदेश सुनकर वज्रधारी इन्द्र गर्भसे बाहर निकले। उस समय लज्जाके मारे उनका मुँह नीचा हो रहा था। वे बोले—'पिताजी! जिस साधनसे मेरा कल्याण हो, वह बताइये। मैं उसे अवश्य करूँगा।' तब कश्यपजी लोकपालोंके साथ मेरे पास आये और सब बातें बताकर पूछने लगे—'दितिके गर्भकी शान्ति, गर्भस्थ बालकोंकी इन्द्रके साथ मित्रता, उन बालकोंकी नीरोगता, इन्द्रकी निर्दोषता तथा अगस्त्यके दिये हुए शापका क्रमशः उद्धार कैसे हो?' तब मैंने कश्यपसे कहा—'प्रजापते! तुम वसुओं, लोकपालों तथा इन्द्रको साथ लेकर शीघ्र ही गौतमी नदीके तटपर जाओ और वहाँ स्नान करके सबके साथ महादेवजीकी स्तुति करो। फिर शिवकी कृपासे सब कल्याण ही होगा।' 'अच्छा, ऐसा ही करूँगा' यों कहकर कश्यप मुनि गौतमी नदीके तटपर गये और देवेश्वर भगवान् शिवकी स्तुति करने लगे। समस्त दुःखोंको दूर करनेके लिये दो ही देवता समर्थ बताये गये हैं—एक तो परम पवित्र गौतमी नदी और दूसरे करुणानिधि शिव।

२१८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

**कश्यप बोले—*देवेश्वर शंकर! मेरी रक्षा कीजिये। लोकवन्दित परमेश्वर! मेरी रक्षा कीजिये। सबको पवित्र करनेवाले वागीश! रक्षा कीजिये। सर्पोंका आभूषण पहननेवाले शिव! रक्षा कीजिये। धर्मस्वरूप वृषभपर सवारी करनेवाले देवता! रक्षा कीजिये। तीनों वेद जिनके नेत्र हैं, ऐसे भगवान् त्रिलोचन! रक्षा कीजिये। गोधर लक्ष्मीश! रक्षा कीजिये। गजचर्मका वस्त्र धारण करनेवाले शर्व! रक्षा कीजिये। त्रिपुरहर! रक्षा कीजिये। अर्द्धचन्द्रसे विभूषित नाथ! रक्षा कीजिये। यज्ञेश्वर सोमनाथ! रक्षा कीजिये। मनोवाञ्छित फलोंके दाता! रक्षा कीजिये। करुणाधाम! रक्षा कीजिये। मङ्गलदाता! रक्षा कीजिये। सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत परमात्मन्! रक्षा कीजिये। पालन करनेवाले वासव! रक्षा कीजिये। भास्कर! वित्तेश! रक्षा कीजिये। ब्रह्मवन्दित शिव! रक्षा कीजिये। विश्वेश्वर! रक्षा कीजिये। सिद्धेश्वर! रक्षा कीजिये। पूर्ण परमेश्वर! आपको नमस्कार है। करुणासागर शिव! भयंकर संसाररूपी दुर्गम प्रदेशमें विचरनेके कारण जिनका चित्त उद्विग्न हो रहा है, ऐसे जीवोंके लिये आप ही शरण हैं।

इस प्रकार स्तुति करनेवाले कश्यपजीके समक्ष भगवान् शंकर प्रकट हुए और उनसे वर माँगनेके लिये कहा। कश्यपजीने विनीत होकर भगवान् शिवसे इन्द्रकी समस्त चेष्टाओंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया। साथ ही यह भी बताया कि मेरे पुत्रोंका जो नाश हो रहा है, उनमें परस्पर शत्रुता बढ़ रही है, इन्द्रको पाप और शापकी प्राप्ति हुई है, यह सब शान्त हो जाय। यह सुनकर भगवान् शंकरने कहा—'आपके जो उनचास पुत्र मरुद्गण हैं, वे सब सौभाग्यशाली और इन्द्रके साथ सदा यज्ञके भागी होंगे। जिस-जिस यज्ञमें इन्द्रका भाग होगा, उसमें उनसे भी पहले मरुद्गणोंका भाग होगा—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। मरुद्गणोंके साथ रहनेपर कभी कोई इन्द्रको जीत नहीं सकता। फिर तो वे ही सदा विजयी रहेंगे।' इतना कहकर शंकरजीने मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यसे कहा—'मुने! तुम शचीपति इन्द्रपर क्रोध न करो। महामते! शान्त हो जाओ। मरुद्गण अमर हो गये।' फिर दितिसे भी शिवजीने कहा—'देवि! मेरे एक ऐसा पुत्र हो, जो तीनों लोकोंके ऐश्वर्यसे सुशोभित रहे—इस बातका चिन्तन करती हुई तुम तपस्यामें प्रवृत्त हुई थी। तुम्हारा वह मनोरथ अब सफल हो गया। तुम्हारे ये पुत्र अधिक गुणशाली, बलवान् और शूरवीर हैं। अतः अब तुम अपनी मानसिक चिन्ता छोड़ दो। सुन्दरी! तुम संशयरहित होकर अन्य वर भी माँगो।'

**दिति बोलीं—**भगवान्! लोकमें यही बड़ी बात समझी जाती है कि माता-पिताको पुत्रका दर्शन हो। विशेषतः माताके लिये यह बहुत ही प्रिय बात है। इसमें भी रूप, सम्पत्ति, शौर्य और पराक्रमसे सम्पन्न एक भी पुत्र हो तो बड़े भाग्यकी बात है। फिर यदि बहुत-से उत्तम और गुणवान् पुत्र प्राप्त हों तो क्या कहना। मेरे पुत्र आपके प्रभावसे विजयी और बली हुए। वे वास्तवमें इन्द्रके भाई और प्रजापतिके पुत्र हैं। देव! जहाँ अगस्त्य और गौतमी गङ्गाके प्रसादके साथ-साथ आपका भी प्रसाद प्राप्त हो, वहाँ शुभ होनेमें क्या संदेह है। यद्यपि मैं कृतार्थ हो गयी, तथापि भक्तिपूर्वक आपसे कुछ निवेदन करती हूँ। देव! मेरी बात सुनें और संसारका कल्याण


* गौ अर्थात् वृषभ (नन्दी)-को धारण करनेसे 'गोधर' और लक्ष्मीस्वरूपा पार्वतीके स्वामी होनेसे 'लक्ष्मीश' हैं। अथवा गोधरका अर्थ भूधर (गिरिराज हिमालय) है, उनकी लक्ष्मीस्वरूपा कन्याके स्वामी होनेके कारण शिव 'गोधर लक्ष्मीश' हैं।

५६- यम, आग्नेय, कपोत और उलूक-तीर्थकी महिमा

* यम, आग्नेय, कपोत और उलूक-तीर्थकी महिमा * २१९

करें। देववन्द्य! संतानकी प्राप्ति संसारमें दुर्लभ है। विशेषतः माताके लिये पुत्रका होना और भी प्रिय है। पुत्र भी यदि गुणवान्, धनवान् और आयुष्मान् हुआ, तब तो कहना ही क्या है। इहलोक और परलोकमें उत्तम फलकी इच्छा रखनेवाले सभी प्राणियोंको गुणवान् पुत्रकी प्राप्ति सदा ही अभीष्ट है। अतः यहाँ स्नान करनेसे इस दुर्लभ फलकी प्राप्ति हो सके—ऐसा अनुग्रह कीजिये।

भगवान् शंकर बोले—निःसंतान होना बहुत बड़े पापका फल है। स्त्री या पुरुष—कोई भी यदि निःसंतान हो तो यहाँ स्नान करनेमात्रसे उसके इस दोषका नाश हो जाता है। जो इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसे यहाँ स्नान करनेका फल प्राप्त होगा। जो तीन मासतक यहाँ स्नान और दान करता है, उसे पुत्रकी प्राप्ति होती है। पुत्रहीन स्त्री यहाँ स्नान करके पुत्र पा सकती है। ऋतुस्नाता स्त्री यदि यहाँ आकर स्नान करे तो उसे अनेकों पुत्र प्राप्त होते हैं। वह तीन महीनेके भीतर ही गर्भवती हो जाती है। जो पितृदोषसे तथा धन अपहरण करनेके दोषसे पुत्र-लाभसे वञ्चित हैं, उनके लिये यह गौतमी नदी परम उद्धारका कारण है। यहाँ पितरोंको पिण्डदान देने, तर्पण करने तथा कुछ सुवर्ण-दान करनेसे निश्चय ही पुत्र होता है। जो धरोहर हड़प लेते, रत्नोंकी चोरी करते तथा पितरोंका श्राद्ध-कर्म छोड़ देते हैं, उनके वंशकी वृद्धि नहीं होती।* जो पाप करके उसका प्रायश्चित्त किये बिना ही मर जाते हैं, उन सबकी यही गति होती है। जो तीर्थोंका सेवन करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं, उन्हें श्रेष्ठ संतानकी प्राप्ति होती है। जो दिति और गङ्गाके संगममें स्नान करके अनादि, अपार, अजय, सच्चिदानन्दमय, लिङ्गस्वरूप, ज्योतिर्मय तथा अनामय महादेव भगवान् सिद्धेश्वरका अनेक उपचारोंसे भक्तिपूर्वक पूजन करता है, चतुर्दशी और अष्टमीको इस स्तोत्रद्वारा स्तुति करता है तथा यहाँ गङ्गाके तटपर ब्राह्मणोंको अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्ण देता और भोजन कराता है, उसे अनेक पुत्र प्राप्त होते हैं। वह सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त करके अन्तमें भगवान् शिवके धाममें जाता है। जो इस स्तोत्रके द्वारा कहीं भी मेरी छः महीने स्तुति करता है, उसे पुत्र प्राप्त होता है। यदि उसकी स्त्री वन्ध्या हो तो भी वह निःसंदेह पुत्रवती होती है।

तबसे उस तीर्थका नाम पुत्रतीर्थ हो गया। वहाँ स्नान-दान आदि करनेसे समस्त कामनाओंकी पूर्ति होती है। मरुद्गणोंके साथ मैत्री होनेके कारण उसे मित्रतीर्थ भी कहते हैं। यहाँ स्नान करनेसे इन्द्र निष्पाप हुए थे, इसलिये वह इन्द्रतीर्थ या शक्रतीर्थ भी कहलाता है। जहाँ इन्द्रको अपनी खोयी हुई लक्ष्मी प्राप्त हुई, वह कमलातीर्थ कहलाया। ये सब तीर्थ समस्त अभीष्ट पदार्थोंको देनेवाले हैं। भगवान् शिव यह कहकर कि 'यहाँ सब कामनाएँ पूर्ण होंगी' अन्तर्धान हो गये और कश्यप आदि सब लोग कृतकृत्य होकर जैसे आये थे, वैसे लौट गये।

यम, आग्नेय, कपोत और उलूक-तीर्थकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं— यमतीर्थ पितरोंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। वह प्रत्यक्ष और परोक्ष—सब प्रकारकी अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है। सम्पूर्ण देवता और मुनि उस तीर्थका सेवन करते हैं। मैं उसके प्रभावका वर्णन करता हूँ, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। एक बलवान् कपोत था, जो


* ये न्यासाद्यपहर्तारो रत्नापह्रवकारकाः। श्राद्धकर्मविहीनाश्च तेषां वंशो न वर्द्धते॥ (१२४।१३०)

२२० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

अनुह्लादके नामसे विख्यात था। उसकी पत्नी हेति नामकी यक्षिणी थी, जो इच्छानुसार रूप धारण कर सकती थी। अनुह्लाद मृत्युके पुत्रका पुत्र था और हेति मृत्युकी पुत्रीकी पुत्री थी। समयानुसार उन दोनोंके भी अनेक पुत्र-पौत्र हुए। पक्षियोंका राजा उलूक अनुह्लादका प्रबल शत्रु था। गङ्गाके उत्तर-तटपर कपोतका आश्रम था और दक्षिण किनारे पक्षिराज उलूक रहता था। उलूक भी अपने पुत्र-पौत्रोंके साथ निवास करता था। कपोत और उलूक दोनों बहुत समयतक एक-दूसरेके विरोधी होकर युद्ध करते रहे। दोनों ही अपने पुत्र-पौत्रोंको साथ लेकर लड़ते थे। यह बलवान् शत्रुओंके साथ बलवानोंका युद्ध था। उनमेंसे उलूक अथवा कपोत—किसीकी भी जय-पराजय नहीं होती थी। कपोतने यमराज तथा अपने पितामह मृत्युकी आराधना करके याम्यास्त्र प्राप्त किया, अतः वह सबसे अधिक शक्तिशाली हो गया। इसी प्रकार उलूक भी अग्निकी आराधना करके अत्यन्त बलवान् हो गया। वर पाकर दोनों ही उन्मत्त हो गये थे, अतः फिर उनमें बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया। उसमें उलूकने कपोतके ऊपर आग्नेयास्त्रका प्रहार किया। कपोतने भी उलूकपर यमपाश तथा यमदण्डका प्रयोग किया। कपोतकी स्त्री हेति बड़ी पतिव्रता थी। उस महायुद्धमें अपने स्वामीके निकट अग्निको प्रज्वलित देख वह दुःखसे विह्वल हो गयी। विशेषतः पुत्रोंको अग्निसे आवृत देख उसकी व्याकुलता और भी बढ़ गयी। उसने अग्निदेवके पास जाकर नाना प्रकारकी उक्तियोंसे स्तवन करना आरम्भ किया।

हेति बोली—जिनका रूप और दान प्रत्यक्ष है, सम्पूर्ण पदार्थ जिनके आत्मस्वरूप हैं और देवता जिनके द्वारा हवनीय पदार्थोंका भोजन करते हैं, उन यज्ञभोक्ता स्वाहापति अग्निको मैं नमस्कार करती हूँ। जो देवताओंके मुख, देवताओंके हविष्यको वहन करनेवाले, देवताओंके होता और देवताओंके दूत हैं, उन आदिदेव भगवान् अग्निकी मैं शरण लेती हूँ। जो शरीरके भीतर प्राणरूपमें स्थित हैं और बाहर अन्नदातारूपमें विद्यमान हैं तथा जो यज्ञके साधन हैं, उन धनंजय (अग्निदेव)-की मैं शरण लेती हूँ।*

अग्नि बोले—पतिव्रते! मेरा यह अस्त्र अमोघ है; अतः जिस लक्ष्यपर इसका विश्राम हो सके, उसको बताओ।

कपोतीने कहा—अग्निदेव! आपका अस्त्र मुझपर ही विश्राम करे, मेरे पुत्र और पतिपर नहीं। मुझे मारकर आप सत्यवादी हों। आपको नमस्कार है।

अग्निदेवने कहा—पतिव्रते! तुम्हारे सुवचन और पतिभक्तिसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। तुम्हारे स्वामी और पुत्रोंका अनिष्ट नहीं होगा। मैं उनकी रक्षाका वचन देता हूँ। यह मेरा आग्नेयास्त्र तुम्हारे पतिको, पुत्रोंको तथा तुमको भी नहीं जलायेगा; अतः तुम सुखपूर्वक लौट जाओ।

इसी बीचमें उलूकीने भी अपने पतिको देखा।


* रूपं न दानं न परोक्षमस्ति यस्यात्मभूतं च पदार्थजातम्।
अश्नन्ति हव्यानि च येन देवाः स्वाहापतिं यज्ञभुजं नमस्ये॥
मुखभूतं च देवानां देवानां हव्यवाहनम्। होतारं चापि देवानां देवानां दूतमेव च॥
तं देवं शरणं यामि आदिदेवं विभावसुम्।
अन्तःस्थितः प्राणरूपो बहिश्चान्नप्रदो हि यः। यो यज्ञसाधनं यामि शरणं तं धनंजयम्॥
(१२५।१५—१७)

७७- अग्नि और यमका कपोत और उलूकमें प्रेम कराना

* यम, आग्नेय, कपोत और उलूक-तीर्थकी महिमा *
२२१

वे यमपाशमें बँधकर यमदण्डसे ताड़ित हो रहे थे। सती-साध्वी उलूकी यह देखकर बहुत दुःखी हुई और भयसे व्याकुल हो यमराजके पास गयी।

**उलूकी बोली—*देव! मनुष्य आपसे भयभीत होकर भागते हैं, आपसे डरकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं। आपके ही भयसे धीर पुरुष उत्तम बर्ताव करते हैं और आपके ही डरसे कर्मोंके अनुष्ठानमें लगते हैं। आपसे भय पाकर लोग उपवास करते और गाँव छोड़कर वनमें जाते हैं। आपके ही डरसे सौम्यभाव ग्रहण करते और आपके ही भयसे सोमपान करते हैं। आपसे भयभीत पुरुष ही अन्नदान और गोदानमें प्रवृत्त होते हैं और आपसे डरकर ही मुमुक्षु ब्रह्मवादकी चर्चा करते हैं।

इस प्रकार स्तुति करती हुई उलूकीसे दक्षिण दिशाके स्वामी यमराजने कहा—‘तुम्हारा कल्याण हो। तुम वर माँगो। मैं तुम्हें मनके अनुकूल वर दूँगा।’ यमराजकी यह बात सुनकर पतिव्रता उलूकीने उनसे कहा—‘सुरश्रेष्ठ! मेरे स्वामी आपके पाशमें बँधे हैं और आपके ही दण्डसे पीड़ित हो रहे हैं। आप उससे मेरे पति और पुत्रोंकी रक्षा करें।’ उसकी यह कातर वाणी सुनकर यमराजको बड़ी दया आयी। उन्होंने बार-बार कहा—‘सुमुखि! मेरे ये पाश और दण्ड किसपर पड़ें? इनके लिये स्थान बताओ।’ उसने कहा—‘जगदीश्वर! आपके पाश मुझे ही बाँधें और आपका दण्ड भी मुझपर ही पड़े।’

**यमराजने कहा—**शुभे! तुम्हारे पुत्र, पति और तुम सब लोग निश्चिन्त होकर जीवन व्यतीत करो।

यों कहकर यमराजने अपने पाश समेट लिये और अग्निदेवने आग्नेयास्त्रका निवारण कर दिया। इतना ही नहीं, उन दोनों देवताओंने मिलकर कपोत और उलूकमें प्रेम करा दिया। फिर पक्षियोंसे कहा—‘तुमलोग इच्छानुसार वर माँगो।’ दोनों पक्षी बोले—‘भगवन्! हमने आपके वैरके कारण आपलोगोंका दुर्लभ दर्शन प्राप्त किया। हम तो पापयोनि पक्षी हैं। वरदान लेकर क्या करेंगे तथापि यदि आपलोग प्रेमपूर्वक वर देना ही चाहते हैं तो हमलोग उस कल्याणमय वरको अपने लिये नहीं चाहते। देवेश्वरो! जो अपने लिये याचना करता है, वह शोकका पात्र है। जो सदा परोपकारके लिये उद्यत रहता है, उसीका जीवन सफल है। अग्नि, जल, सूर्य, पृथ्वी और नाना प्रकारके धान्योंका तथा विशेषतः संत-महात्माओंका


* त्वद्धीता अनुद्रवन्ते जनास्त्वद्धीता ब्रह्मचर्यं चरन्ति। त्वद्धीताः साधु चरन्ति धीरास्त्वद्धीताः कर्मनिष्ठा भवन्ति॥
त्वद्धीता अनाशकमाचरन्ति ग्रामादरण्यमभि यच्चरन्ति।
त्वद्धीताः सौम्यतामाश्रयन्ते त्वद्धीताः सोमपानं भजन्ते। त्वद्धीताश्चान्नगोदाननिष्ठास्त्वद्धीता ब्रह्मवादं वदन्ति॥
(१२५। २३-२४)

५७- तपस्तीर्थ, इन्द्रतीर्थ और वृषाकपि एवं अब्जकतीर्थकी महिमा

२२२* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

उपयोग सदा दूसरोंके भलेके लिये ही होता है। क्योंकि ब्रह्मा आदि देवता भी एक दिन मृत्युको प्राप्त होते हैं, देवेश्वरो! यह जानकर स्वार्थ-सिद्धिके लिये परिश्रम करना व्यर्थ है। विधाताने प्राणियोंके जन्मके साथ ही उनके लिये जो विधान रच दिया है, वह कभी बदल नहीं सकता। अतः जीव व्यर्थ ही क्लेश उठाते हैं।* इसलिये हम जगत्‌के कल्याणके लिये ही कुछ याचना करते हैं। हमारी यह याचना सबके लिये गुणदायक है। आप दोनों इसका अनुमोदन करें। गङ्गाके दोनों तटोंपर जो हमारे आश्रम हैं, वे तीर्थरूपमें परिणत हो जायें। वहाँ कोई पापी या पुण्यात्मा जिस किसी तरह जो कुछ भी स्नान, दान, जप, होम और पितरोंका पूजन आदि करें, वह सब अक्षय पुण्य देनेवाला हो।

यमराज बोले— जो लोग गौतमीके उत्तर-तटपर यमस्तोत्रका पाठ करेंगे, उनके वंशमें सात पीढ़ियोंतक किसीकी अकालमृत्यु नहीं होगी। वे पुरुष सदा सब प्रकारकी सम्पत्तियोंके भागी होंगे। जो जितात्मा पुरुष प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह अट्ठासी हजार व्याधियोंसे कभी पीड़ित न होगा। इस तीर्थमें तीन मासतक स्नान करनेसे सती-साध्वी स्त्री गर्भवती होगी। वन्ध्या भी छः महीनेतक स्नान करनेसे गर्भवती होगी। गर्भिणी स्त्री एक सप्ताह स्नान करे तो वह वीर पुत्रकी जननी होगी और उसका पुत्र भी सौ वर्षकी आयुवाला, धनवान्‌, बुद्धिमान्‌, शूरवीर तथा पुत्र-पौत्रोंका विस्तार करनेवाला होगा। इस तीर्थमें पिण्ड आदि देनेसे पितरोंकी मुक्ति हो जायगी। कोई भी मनुष्य इसमें स्नान करनेसे मन, वाणी तथा शरीरजन्य पापसे मुक्त हो जायगा।

अग्निदेवने कहा— जो लोग नियमपूर्वक रहते हुए दक्षिण-तटपर मेरे स्तोत्रका पाठ करेंगे, उन्हें मैं आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, लक्ष्मी तथा रूप प्रदान करूँगा। जो कोई मानव कहीं भी इस स्तोत्रका पाठ करेगा अथवा लिखकर भी इसे घरमें रख देगा, उसको तथा उसके घरको कभी भी अग्निसे भय न होगा। जो मनुष्य पवित्र होकर अग्निटीर्थमें स्नान और दान करेगा, उसे निश्चय ही अग्निष्टोम-यज्ञका फल मिलेगा।

तबसे वह तीर्थ याम्यतीर्थ, आग्नेयतीर्थ, कपोततीर्थ, उलूकतीर्थ और हेत्यूलूकतीर्थके नामसे विद्वानोंमें प्रसिद्ध हुआ। वहाँ तीन हजार तीन सौ नब्बे तीर्थ हैं और उनमेंसे प्रत्येक तीर्थ मोक्ष देनेवाला है। उन तीर्थोंमें स्नान करनेसे मनुष्य पवित्र होते, पुत्र और धन पाते तथा अन्तमें स्वर्गलोकको जाते हैं।

तपस्तीर्थ, इन्द्रतीर्थ और वृषाकपि एवं अब्जकतीर्थकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं— तपस्तीर्थ बहुत बड़ा तीर्थ है। वह तपस्याकी वृद्धि करनेवाला, समस्त अभिलषित वस्तुओंका दाता, पवित्र तथा पितरोंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। उस तीर्थमें जो पापनाशक घटना घटी है, उसे बतलाता हूँ; सुनो। ऋषियोंमें अग्नि और जलकी श्रेष्ठताको लेकर परस्पर संवाद


* आत्मार्थं यस्तु याचेत स शोच्यो हि सुरेश्वरौ। जीवितं सफलं तस्य यः परार्थोद्यतः सदा॥
अग्निरापो रविः पृथ्वी धान्यानि विविधानि च। परार्थं वर्तनं तेषां सतां चापि विशेषतः॥
ब्रह्मादयोऽपि हि यतो युज्यन्ते मृत्युना सह। एवं ज्ञात्वा तु देवेशौ वृथा स्वार्थपरिश्रमः॥
जन्मना सह यत्पुंसां विहितं परमेष्ठिना। कदाचिन्नान्यथा तद्वै वृथा क्लिश्यन्ति जन्तवः॥
(१२५। ३६-३९)