भारतकोश
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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

'प्रकृतिखण्ड' १३१

गङ्गे! तुम शिवके पास जाओ और सरस्वती! तुम्हें ब्रह्माके स्थानपर चले जाना चाहिये। यहाँ मेरे भवनपर केवल सुशीला लक्ष्मीजी रह जायें; क्योंकि परम साध्वी, उत्तम आचरण करनेवाली एवं पतिव्रता स्त्रीका स्वामी इस लोकमें स्वर्गका सुख भोगता है और परलोकमें उसके लिये कैवल्यपद सुरक्षित है। जिसकी पत्नी पतिव्रता है, वह परम पवित्र, सुखी और मुक्त समझा जाता है।

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीहरि चुप हो गये। तब गङ्गा और लक्ष्मी तथा सरस्वती—तीनों देवियाँ परस्पर एक-दूसरेका आलिङ्गन करके रोने लगीं। शोक और भयने उनके शरीरको कँपा दिया था। उनकी आँखोंसे आँसू बह रहे थे। उन सबको एकमात्र भगवान् ही शरण्य दृष्टिगोचर हुए। अतः वे क्रमशः उनसे प्रार्थना करने लगीं।

सरस्वतीने कहा—नाथ! मुझ दुष्टाको पाप, ताप और शापसे बचानेके लिये कोई प्रायश्चित्त बता दीजिये; जिससे मेरा जन्म और जीवन शुद्ध हो जाय। भला, आप-जैसे महान् सच्चरित्र स्वामीके परित्याग कर देनेपर कहाँ कौन स्त्रियाँ जीवित रह सकती हैं? प्रभो! मैं भारतवर्षमें योगसाधन करके इस शरीरका त्याग कर दूँगी—यह निश्चित है।

गङ्गा बोली—जगत्प्रभो! आप किस अपराधसे मुझे त्याग रहे हैं? मैं जीवित नहीं रह सकूँगी।

लक्ष्मीने कहा—नाथ! आप सत्त्व-स्वरूप हैं। बड़े आश्चर्यकी बात है, आपको कैसे क्षोभ हो गया। आप अपनी इन पत्नियोंपर कृपा कीजिये। कारण, श्रेष्ठ स्वामीके लिये क्षमा ही उत्तम है। मैं सरस्वतीका शाप स्वीकार करके अपनी एक कलासे भारतवर्षमें जाऊँगी। परंतु प्रभो! मुझे कितने समयतक वहाँ रहना होगा और मैं पुनः कब आपके चरणोंके दर्शन प्राप्त कर सकूँगी। पापीजन मेरे जलमें स्नान और आचमन करके अपना पाप मुझपर लाद देंगे, तब उस पापसे मुक्त होकर आपके चरणोंमें आनेका अधिकार मुझे कैसे प्राप्त हो सकेगा? अच्युत! मैं अपनी एक कलासे धर्मध्वजकी पुत्री होकर जब 'तुलसी' (वृन्दा)-रूपमें स्थित हो जाऊँगी, तब मुझे पुनः कब आपके चरणकमल प्राप्त होंगे? कृपानिधे! यह तो बताइये कि जब मैं वृक्षरूपमें उसकी अधिदेवी बनकर रहने लगूँगी, तब कबतक आप मेरा उद्धार करेंगे? यदि ये गङ्गा सरस्वतीके शापसे भारतवर्षमें चली जायँगी, तब फिर किस समय शाप और पापसे छुटकारा पाकर आपको प्राप्त कर सकेंगी? गङ्गाके शापसे ये सरस्वती भी यदि भारतमें जायँगी तो कब शापसे मुक्त होकर पुनः आपके चरणकमलोंको पा सकेंगी? प्रभो! आप जो इन सरस्वतीसे कह रहे हैं कि तुम ब्रह्माके घर सिधारो अथवा गङ्गाको शिवके भवनपर जानेकी आज्ञा दे रहे हैं—आपके इन वचनोंके लिये मैं आपसे क्षमा चाहती हूँ। आप कृपा करके इन्हें ऐसा दण्ड न दें।

नारद! इस प्रकार कहकर भगवती लक्ष्मीने अपने स्वामी श्रीहरिके चरण पकड़ लिये, उन्हें प्रणाम किया और अपने केशसे भगवान्‌के चरणोंको आवेष्टित करके वे बारंबार रोने लगीं। भगवान् श्रीहरि सदा भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं। प्रार्थना सुनकर उन्होंने देवी कमलाको हृदयसे चिपका लिया और प्रसन्नमुखसे मुस्कराते हुए कहा।

भगवान् विष्णु बोले—सुरेश्वरि! कमलेक्षणे! मैं तुम्हारी बात भी रखूँगा और अपने वचनकी भी रक्षा करूँगा। साथ ही तुम तीनोंमें समता कर दूँगा, अतः सुनो। ये सरस्वती कलाके एक अंशसे नदी बनकर भारतवर्षमें जायँ, आधे अंशसे

२२- भगवती पृथ्‍वी देवी

१३२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ब्रह्माके भवनपर पधारें तथा पूर्ण अंशसे स्वयं मेरे पास रहें। ऐसे ही ये गङ्गा भगीरथके सत्प्रयत्नसे अपने कलांशसे त्रिलोकीको पवित्र करनेके लिये भारतवर्षमें जायँ और स्वयं पूर्ण अंशसे मेरे पास भवनपर रहें। वहाँ इन्हें शंकरके मस्तकपर रहनेका दुर्लभ अवसर भी प्राप्त होगा। ये स्वभावतः पवित्र तो हैं ही, किंतु वहाँ जानेपर इनकी पवित्रता और भी बढ़ जायगी। वामलोचने! तुम अपनी कलाके अंशांशसे भारतवर्षमें चलो। वहाँ तुम्हें 'पद्मावती' नदी और 'तुलसी' वृक्षके रूपसे विराजना होगा। कलिके पाँच हजार वर्ष व्यतीत हो जानेपर तुम नदीरूपिणी देवियोंका उद्धार हो जायगा। तदनन्तर तुमलोग मेरे भवनपर लौट आओगी। पद्मभवे! सम्पूर्ण प्राणियोंके पास जो सम्पत्ति और विपत्ति आती है—इसमें कोई-न-कोई हेतु छिपा रहता है। बिना विपत्ति सहे किन्हींको भी गौरव प्राप्त नहीं हो सकता। अब तुम्हारे शुद्ध होनेका उपाय बताता हूँ। मेरे मन्त्रोंकी उपासना करनेवाले बहुत-से संत पुरुष भी तुम्हारे जलमें नहाने-धोनेके लिये पधारेंगे। उस समय तुम उनके दर्शन और स्पर्श प्राप्त करके सब पापोंसे छुटकारा पा जाओगी। सुन्दरि! इतना ही नहीं; किंतु भूमण्डलपर जितने असंख्य तीर्थ हैं, वे सभी मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्श पाकर परम पावन बन जायँगे। भारतवर्षकी भूमि अत्यन्त पवित्र है। मेरे मन्त्रोंके उपासक अनगिनत भक्त वहाँ वास करते हैं। प्राणियोंको पवित्र करना और तारना ही उनका प्रधान उद्देश्य है। मेरे भक्त जहाँ रहते और अपने पैर धोते हैं, वह स्थान महान् तीर्थ एवं परम पवित्र बन जाता है—यह बिलकुल निश्चित है*। घोर पापी भी मेरे भक्तके दर्शन और स्पर्शके प्रभावसे पवित्र होकर जीवन्मुक्त हो सकता है। नास्तिक व्यक्ति भी मेरे भक्तके दर्शन और स्पर्शसे पवित्र हो सकता है।

जो कमरमें तलवार बाँधकर द्वारपालकी हैसियतसे जीविका चलाते हैं, मुनीमीमात्र जिनकी जीविकाका साधन है, जो इधर-उधर चिट्ठी-पत्री पहुँचाकर अपना भरण-पोषण करते हैं तथा गाँव-गाँव घूमकर भीख माँगना ही जिनका व्यवसाय है एवं जो बैलोंको जोतते हैं, ऐसे ब्राह्मणको अधम कहा जाता है; किंतु मेरे भक्तके दर्शन और स्पर्श उन्हें पवित्र कर देते हैं। विश्वासघाती, मित्रघाती, झूठी गवाही देनेवाले तथा धरोहर हड़पनेवाले नीच व्यक्ति भी मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्शसे शुद्ध हो सकते हैं। मेरे भक्तके दर्शन एवं स्पर्शमें ऐसी अद्भुत शक्ति है कि उसके प्रभावसे महापातकी व्यक्तितक पवित्र हो सकता है। सुन्दरि! पिता, माता, स्त्री, छोटा भाई, पुत्र, पुत्री, बहन, गुरुकुल, नेत्रहीन बान्धव, सासु और श्वशुर—जो पुरुष इनके भरण-पोषणकी व्यवस्था नहीं करता, उसे महान् पातकी कहते हैं; किंतु मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्श करनेसे वह भी शुद्ध हो जाता है। पीपलके वृक्षको काटनेवाले, मेरे भक्तोंके निन्दक तथा नीच ब्राह्मणको भी मेरे भक्तका दर्शन और स्पर्श पवित्र बना देता है। घोर पातकी मनुष्य भी मेरे भक्तोंके दर्शन और स्पर्शसे पवित्र हो सकते हैं।

**श्रीमहालक्ष्मीने कहा—**भक्तोंपर कृपा करनेके लिये आतुर रहनेवाले प्रभो! अब आप उन अपने भक्तोंके लक्षण बतलाइये, जिनके दर्शन और स्पर्शसे हरिभक्तिहीन, अत्यन्त अहंकारी, अपने मुँह अपनी बड़ाई करनेवाले, धूर्त, शठ एवं साधुनिन्दक अत्यन्त अधम मानवतक तुरंत पवित्र हो जाते हैं तथा जिनके नहाने-धोनेसे सम्पूर्ण


* मद्भक्ता यत्र तिष्ठन्ति पादं प्रक्षालयन्ति च। तत्स्थानं च महातीर्थं सुपवित्रं भवेद् ध्रुवम्॥
(प्रकृतिखण्ड ६। ९४)

प्रकृतिखण्ड १३३

तीर्थोंमें पवित्रता आ जाती है; जिनके चरणोंकी धूलिसे तथा चरणोदकसे पृथ्वीका कल्मष दूर हो जाता है तथा जिनका दर्शन एवं स्पर्श करनेके लिये भारतवर्षमें लोग लालायित रहते हैं; क्योंकि विष्णुभक्त पुरुषोंका समागम सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये परम लाभदायक है। जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं हैं और न मृण्मय एवं प्रस्तरमय देवता ही देवता हैं; क्योंकि वे दीर्घकालतक सेवा करनेपर ही पवित्र करते हैं। अहो! साक्षात् देवता तो विष्णु-भक्तोंको मानना चाहिये, जो क्षणभरमें पवित्र कर देते हैं।*

**सूतजी कहते हैं—**शौनक! महालक्ष्मीकी बात सुनकर उनके आराध्य स्वामी भगवान् श्रीहरिका मुखमण्डल मुस्कानसे खिल उठा। फिर वे अत्यन्त गूढ़ एवं श्रेष्ठ रहस्य कहनेके लिये प्रस्तुत हो गये।

**श्रीभगवान् बोले—**लक्ष्मी! भक्तोंके लक्षण श्रुति एवं पुराणोंमें छिपे हुए हैं। इन पुण्यमय लक्षणोंमें पापोंका नाश करने, सुख देने तथा भुक्ति-मुक्ति प्रदान करनेकी प्रचुर शक्ति है। जिसको सद्गुरुके द्वारा विष्णुका मन्त्र प्राप्त होता है (और जो सब कुछ छोड़कर केवल मुझको ही सर्वस्व मानता है), उसीको वेद-वेदाङ्ग पुण्यात्मा एवं श्रेष्ठ मनुष्य बतलाते हैं। ऐसे व्यक्तिके जन्म लेनेमात्रसे पूर्वके सौ पुरुष, चाहे वे स्वर्गमें हों अथवा नरकमें—तुरंत मुक्तिके अधिकारी हो जाते हैं। यदि उन पूर्वजोंमेंसे किन्हींका कहीं जन्म हो गया है तो उन्होंने जिस योनिमें जन्म पाया है, वहीं उनमें जीवन्मुक्तता आ जाती है और समयानुसार वे परमधाममें चले जाते हैं। मुझमें भक्ति रखनेवाला मानव मेरे गुणोंसे सम्पन्न होकर मुक्त हो जाता है। उसकी वृत्ति मेरे गुणका अनुसरण करनेमें ही लगी रहती है। वह सदा मेरी कथा-वार्तामें लगा रहता है। मेरा गुणानुवाद सुननेमात्रसे वह आनन्दमग्न हो उठता है। उसका शरीर पुलकित हो जाता है और वाणी गद्गद हो जाती है। उसकी आँखोंमें आँसू भर आते हैं और वह अपनी सुधि-बुधि खो बैठता है। मेरी पवित्र सेवामें नित्य नियुक्त रहनेके कारण सुख, चार प्रकारकी सालोक्यादि मुक्ति, ब्रह्माका पद अथवा अमरत्व—कुछ भी पानेकी अभिलाषा वह नहीं करता। मनु, इन्द्र एवं ब्रह्माकी उपाधि तथा स्वर्गके राज्यका सुख—ये सभी परम दुर्लभ हैं; किंतु मेरा भक्त स्वप्नमें भी इनकी इच्छा नहीं करता†। ऐसे मेरे बहुत-से भक्त भारतवर्षमें निवास करते हैं। उन भक्तोंके-जैसा जन्म सबके लिये सुलभ नहीं है। जो सदा मेरा गुणानुवाद सुनते और सुनने योग्य पद्योंको गाकर आनन्दसे विह्वल हो जाते हैं, वे बड़भागी भक्त अन्य साधारण मनुष्य, तीर्थ एवं मेरे परमधामको भी पवित्र करके धराधामपर पधारते हैं।

पद्मे! इस प्रकार मैंने तुम्हारे प्रश्नका समाधान कर दिया। अब तुम्हें जो उचित जान पड़े, वह करो। तदनन्तर वे सभी देवियाँ, भगवान् श्रीहरिने जो कुछ आज्ञा दी थी, उसीके अनुसार कार्य करनेमें संलग्न हो गयीं। स्वयं भगवान् अपने सुखदायी आसनपर विराजमान हो गये।

(अध्याय ६)


* न ह्यम्भ्यानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः । ते पुनन्त्यपि कालेन विष्णुभक्ताः क्षणादहो ॥
(प्रकृतिखण्ड ६। ११०)
† न वाञ्छन्ति सुखं मुक्तिं सालोक्यादिचतुष्टयम् । ब्रह्मत्वममरत्वं वा तद्वाञ्छा मम सेवने ॥
इन्द्रत्वं च मनुत्वं च ब्रह्मत्वं च सुदुर्लभम् । स्वर्गराज्यादिभोगं च स्वप्नेऽपि च न वाञ्छति ॥
(प्रकृतिखण्ड ६। ११९-१२०)

९- गङ्गाकी उत्पत्तिका विस्तृत प्रसङ्ग

१३४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कलियुगके भावी चरित्रका, कालमानका तथा गोलोककी श्रीकृष्ण-लीलाका वर्णन

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर सरस्वती अपनी एक कलासे तो पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें पधारीं तथा पूर्ण अंशसे उन्हें भगवान् श्रीहरिके निकट रहनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ। भारतमें पधारनेसे 'भारती', ब्रह्माकी प्रेमभाजन होनेसे 'ब्राह्मी' तथा वचनकी अधिष्ठात्री होनेसे वे 'वाणी' नामसे विख्यात हुईं। श्रीहरि सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त रहते हुए भी सागरके जल-स्रोतमें शयन करते देखे जाते हैं; अतः 'सरस्' से युक्त होनेके कारण उनका एक नाम 'सरस्वान्' है और उनकी प्रिया होनेसे इन देवीको 'सरस्वती' कहा जाता है। नदीरूपसे पधारकर ये सरस्वती परम पावन तीर्थ बन गयीं। पापीजनोंके पापरूपी ईंधनको भस्म करनेके लिये ये प्रज्वलित अग्निसुरूपा हैं।

नारद! तत्पश्चात् वाणीके शापसे गङ्गा अपनी कलासे धरातलपर आयीं। भगीरथके सत्प्रयत्नसे इनका शुभागमन हुआ। ये गङ्गा आ ही रही थीं कि शंकरने इन्हें अपने मस्तकपर धारण कर लिया। कारण, गङ्गाके वेगको केवल शंकर ही सँभाल सकते थे। अतएव उनके वेगको सहनेमें असमर्थ पृथ्वीकी प्रार्थनासे वे इस कार्यके लिये प्रस्तुत हो गये। फिर पद्मा अर्थात् लक्ष्मी अपनी एक कलासे भारतवर्षमें नदीरूपसे पधारीं। इनका नाम 'पद्मावती' हुआ। ये स्वयं पूर्ण अंशसे भगवान् श्रीहरिकी सेवामें उनके समीप ही रहीं। तदनन्तर अपनी एक-दूसरी कलासे वे भारतमें राजा धर्मध्वजके यहाँ पुत्रीरूपसे प्रकट हुईं। उस समय इनका नाम 'तुलसी' पड़ा। पहले सरस्वतीके शापसे और फिर श्रीहरिकी आज्ञासे इन विश्वपावनी देवीने अपनी कलाद्वारा वृक्षमयरूप धारण किया। कलिमें पाँच हजार वर्षोंतक भारतवर्षमें रहकर ये तीनों देवियाँ सरित्-रूपका परित्याग करके वैकुण्ठमें चली जायँगी। काशी तथा वृन्दावनके अतिरिक्त अन्य प्रायः सभी तीर्थ भगवान् श्रीहरिकी आज्ञासे उन देवियोंके साथ वैकुण्ठ चले जायँगे। शालग्राम, श्रीहरिकी मूर्ति पुरुषोत्तम भगवान् जगन्नाथ कलिके दस हजार वर्ष व्यतीत होनेपर भारतवर्षको छोड़कर अपने धामको पधारेंगे। इनके साथ ही साधु, पुराण, शङ्ख, श्राद्ध, तर्पण तथा वेदोक्त कर्म भी भारतवर्षसे उठ जायँगे। देवपूजा, देवनाम, देवताओंके गुणोंका कीर्तन, वेद, शास्त्र, पुराण, संत, सत्य, धर्म, ग्रामदेवता, व्रत, तप और उपवास—ये सब भी उनके साथ ही इस भारतसे चले जायँगे। (इनमें लोगोंकी श्रद्धा नहीं रह जायगी।)

प्रायः सभी लोग मद्य और मांसका सेवन करेंगे। झूठ और कपटसे किसीको घृणा न होगी। उपर्युक्त देवी एवं देवताओंके भारतवर्ष छोड़ देनेके पश्चात् शठ, क्रूर, दाम्भिक, अत्यन्त अहंकारी, चोर, हिंसक—ये सब संसारमें फैल जायँगे। पुरुषभेद (परस्पर मैत्रीका अभाव) होगा। अपने अथवा पुरुषका भेद, स्त्रीका भेद, विवाह, वाद-निर्णय, जाति या वर्णका निर्णय, अपने या पराये स्वामीका भेद तथा अपनी-परायी वस्तुओंका भेद भी आगे चलकर नहीं रहेगा। सभी पुरुष स्त्रियोंके अधीन होकर रहेंगे। घर-घरमें पुंश्चलियोंका निवास होगा। वे दुराचारिणी स्त्रियाँ सदा डाँट-फटकारकर अपने पतियोंको पीटेंगी। गृहिणी घरकी पूरी मालकिन बनी रहेगी, घरका स्वामी नौकरसे भी अधिक अधम समझा जायगा। घरमें जो बलवान् होंगे, उन्हींको कर्ता माना जायगा। भाई-बन्धु वे ही समझे जायँगे, जिनका सम्बन्ध योनि या जन्मको लेकर होगा, जैसे पुत्र, भाई आदि। (अर्थात् जरा भी दूरके सम्पर्कवालेको लोग भाई-बन्धु भी नहीं मानेंगे।) विद्याध्ययनसे सम्बन्ध रखनेवाले गुरु-

२३- तपस्यामें लीन भगीरथको गोपवेशमें भगवान् श्रीकृष्णका प्रत्यक्ष दर्शन

प्रकृतिखण्ड १३५

भाई आदिके साथ कोई बात भी नहीं करेगा। पुरुष अपने ही परिवारके लोगोंसे अन्य अपरिचित व्यक्तियोंकी भाँति व्यवहार करेंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—चारों वर्ण अपनी जातिके आचार-विचारको छोड़ देंगे। संध्या-वन्दन और यज्ञोपवीत आदि संस्कार तो प्रायः बंद ही हो जायँगे। चारों ही वर्ण म्लेच्छके समान आचरण करेंगे। प्रायः सभी लोग अपने शास्त्रोंको छोड़कर म्लेच्छ-शास्त्र पढ़ेंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—चारों वर्णोंके लोग सेवावृत्तिसे जीविका चलायेंगे। सम्पूर्ण प्राणियोंमें सत्यका अभाव हो जायगा। जमीनपर धान्य नहीं उपजेंगे। वृक्ष फलहीन हो जायँगे। गौओंमें दूध देनेकी शक्ति नहीं रहेगी। लोग बिना मक्खनके दूधका व्यवहार करेंगे। स्त्री और पुरुषमें प्रेमका अभाव होगा। गृहस्थ असत्य भाषण करेंगे। राजाओंका तेज-अस्तित्व समाप्त हो जायगा। प्रजा भयानक 'कर'के भारोंसे अत्यन्त कष्ट पायेगी। चारों वर्णोंमें धर्म और पुण्यका नितान्त अभाव हो जायगा। लाखोंमें कोई एक भी पुण्यवान् न हो सकेगा। बुरी बातें और बुरे शब्दोंका ही व्यवहार होगा। जंगलोंमें रहनेवाले लोग भी 'कर'के भारसे कष्ट भोगेंगे। नदियों और तालाबोंपर धान्य होंगे। अर्थात् समयोचित वर्षाके अभावसे अन्यत्र खेती न होनेके कारण लोग इनके तटपर ही खेती करेंगे। कलियुगमें सम्भ्रान्त कुलके पुरुषोंकी अवनति होगी।

नारद! कलिके मनुष्य अश्लीलभाषी, धूर्त, शठ और असत्यवादी होंगे। भलीभाँति जोते-बोये हुए खेत भी धान्य देनेमें असमर्थ रहेंगे। नीच वर्णवाले धनी होनेके कारण श्रेष्ठ माने जायँगे। देवभक्तोंमें नास्तिकता आ जायगी। नगरनिवासी हिंसक, निर्दयी तथा मनुष्यघाती होंगे। कलिमें प्रायः स्त्री और पुरुष—रोगी, थोड़ी उम्रवाले और युवा-अवस्थासे रहित होंगे। सोलह वर्षमें ही उनके सिरके बाल पक जायँगे। बीस वर्षमें उन्हें बुढ़ापा घेर लेगा। कलियुगमें भगवन्नाम बेचा जायगा। मिथ्या दान होगा—मनुष्य अपनी कीर्ति बढ़ानेके लिये दान देकर स्वयं पुनः उसे वापस ले लेंगे। देववृत्ति, ब्राह्मणवृत्ति अथवा गुरुकुलवृत्ति—चाहे वह अपनी दी हुई हो अथवा दूसरेकी—कलिके मानव उसे छीन लेंगे। कलियुगमें मनुष्यको अगम्यागमनमें कोई हिचक न रहेगी। कलियुगमें स्त्रियों और पतियोंका निर्णय नहीं हो सकेगा। अर्थात् सभी स्त्री-पुरुषोंमें अवैध व्यवहार होंगे। प्रजा किन्हीं ग्रामों और धनोंपर अपना पूर्ण अधिकार नहीं प्राप्त कर सकेगी। प्रायः सब लोग अप्रिय वचन बोलेंगे। सभी चोर और लम्पट होंगे। सभी एक-दूसरेकी हिंसा करनेवाले एवं नरघाती होंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—सबके वंशजोंमें पाप प्रवेश कर जायगा। सभी लोग लाख, लोहा, रस और नमकका व्यापार करेंगे। पञ्चयज्ञ करनेमें द्विजोंकी प्रवृत्ति न होगी। यज्ञोपवीत पहनना उनके लिये भार हो जायगा। वे संध्या-वन्दन और शौचसे विहीन रहेंगे। पुंश्चली, सूदसे जीविका चलानेवाली तथा कुटनी स्त्री रजस्वला रहती हुई भी ब्राह्मणोंके घर भोजन बनायेगी। अन्नोंमें, स्त्रियोंमें और आश्रमवासी मनुष्योंमें कोई नियम नहीं रहेगा। घोर कलिमें प्रायः सभी म्लेच्छ हो जायँगे।

इस प्रकार जब सम्यक् प्रकारसे कलियुग आ जायगा, तब सारी पृथ्वी म्लेच्छोंसे भर जायगी। तब विष्णुयशा नामक ब्राह्मणके घर उनके पुत्ररूपसे भगवान् कल्कि प्रकट होंगे। सुप्रसिद्ध पराक्रमी ये कल्कि भगवान् नारायणके अंश हैं। ये एक बहुत ऊँचे घोड़ेपर चढ़कर अपनी विशाल तलवारसे म्लेच्छोंका विनाश करेंगे और तीन रातमें ही पृथ्वीको म्लेच्छशून्य कर देंगे। यों वसुधाको म्लेच्छरहित करके वे स्वयं अन्तर्धान हो जायँगे। तब एक बार पृथ्वीपर

१३६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अराजकता फैल जायगी। डाकू सर्वत्र लूट-पाट मचाने लगेंगे। तदनन्तर मोटी धारसे असीम जल बरसने लगेगा। लगातार छः दिन-रात वर्षा होगी। पृथ्वीपर सर्वत्र जल-ही-जल दिखायी पड़ेगा। पृथ्वी प्राणी, वृक्ष, गृहसे शून्य हो जायगी। मुने ! इसके बाद बारह सूर्य एक साथ उदय होंगे, जिनके प्रचण्ड तेजसे पृथ्वी सूख जायगी।

यों होनेपर दुर्धर्ष कलियुग समाप्त हो जायगा, तब तप और सत्त्वसे सम्पन्न धर्मका पूर्णरूपसे प्राकट्य होगा। उस समय तपस्वियों, धर्मात्माओं और वेदज्ञ ब्राह्मणोंसे पुनः पृथ्वी शोभा पायेगी। घर-घरमें स्त्रियाँ पतिव्रता और धर्मात्मा होंगी। धर्मप्राण न्यायपरायण क्षत्रियोंके हाथमें राज्यका प्रबन्ध होगा। वे सभी ब्राह्मणोंके भक्त, मनस्वी, तपस्वी, प्रतापी, धर्मात्मा और पुण्यकर्मके प्रेमी होंगे। वैश्य व्यापारमें तत्पर रहेंगे। वे मनमें धार्मिक भावना रखते हुए ब्राह्मणोंके प्रति श्रद्धा रखेंगे। शूद्र धर्मपर आस्था रखते हुए पवित्रतापूर्वक सेवा करेंगे। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके वंशज भगवती जगदम्बा शक्तिके परम उपासक होंगे। उनके द्वारा देवीके मन्त्रका निरन्तर जप होने लगेगा। सब लोग देवीके ध्यानमें तत्पर रहेंगे। समयानुसार व्यवहार करनेवाले पुरुषोंमें श्रुति, स्मृति और पुराणका पूर्ण ज्ञान प्राप्त रहेगा। इसीको सत्ययुग कहते हैं। इस युगमें धर्म पूर्णरूपसे रहता है। त्रेतामें धर्म तीन पैरसे, द्वापरमें दो पैरसे और कलिमें केवल एक पैरसे रहता है। घोर कलि आनेपर तो यह सम्पूर्ण पैरोंसे हीन हो जाता है !

विप्र ! सात दिन हैं। सोलह तिथियाँ कही गयी हैं। बारह महीने और छः ऋतुएँ होती हैं। शुक्ल और कृष्ण—दो पक्ष तथा उत्तरायण एवं दक्षिणायन—दो अयन होते हैं। चार पहरका दिन होता है और चार पहरकी रात होती है। तीस दिनोंका एक महीना होता है। संवत्सर तथा इडावत्सर आदि भेदसे पाँच प्रकारके वर्ष समझने चाहिये। यही कालकी संख्याका नियम है। जैसे दिन आते-जाते रहते हैं, ऐसे ही चारों युगोंका भी आना-जाना लगा रहता है। मनुष्योंका एक वर्ष पूरा होनेपर देवताओंका एक दिन-रात होता है। कालकी संख्याके विशेषज्ञ पुरुषोंका सिद्धान्त है कि मनुष्योंके तीन सौ साठ युग व्यतीत होनेपर देवताओंका एक युग बीतता है। इस प्रकारके इकहत्तर दिव्य युगोंको एक मन्वन्तर कहते हैं। एक इन्द्र एक मन्वन्तरपर्यन्त रहते हैं। यों अट्ठाईस इन्द्र बीत जानेपर ब्रह्माका एक दिन-रात होता है। इस मानसे एक सौ आठ वर्ष व्यतीत होनेपर ब्रह्माकी आयु पूरी हो जाती है। इसीको प्राकृत प्रलय समझना चाहिये। उस समय पृथ्वी नहीं दिखायी पड़ती। पृथ्वीसहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जलमें लीन हो जाते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव और ऋषि आदि सभी परात्पर श्रीकृष्णमें लीन हो जाते हैं। उन्हींमें प्रकृति भी लीन हो जाती है। मुने ! इसीको प्राकृत प्रलय कहते हैं। इस प्रकार प्राकृत प्रलय हो जानेपर ब्रह्माकी आयु समाप्त हो जाती है। मुनिवर ! इतने सुदीर्घ कालको परमात्मा श्रीकृष्णका एक निमेष कहते हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णके एक निमेषमें सम्पूर्ण विश्व और अखिल ब्रह्माण्ड नष्ट हो जाते हैं। केवल गोलोक, वैकुण्ठ तथा पार्षदोंसहित श्रीकृष्ण ही शेष रहते हैं। श्रीकृष्णका निमेषमात्र ही प्रलय है, जिसमें सारा ब्रह्माण्ड जलमग्न हो जाता है। निमेषकालके अनन्तर फिर सृष्टिका क्रम चालू हो जाता है। यों सृष्टि और प्रलय होते रहते हैं। कितने कल्प गये और आये—इसकी संख्या कौन जान सकता है ? नारद ! सृष्टियों, प्रलयों, ब्रह्माण्डों और ब्रह्माण्डमें रहनेवाले ब्रह्मादि प्रधान प्रबन्धकोंकी संख्याका परिज्ञान भला किस पुरुषको हो सकता है ?

परमात्मा श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंके एकमात्र ईश्वर हैं, जो प्रकृतिसे परे हैं। उनका विग्रह सत्, चित् और आनन्दमय है। ब्रह्मा प्रभृति

प्रकृतिखण्ड १३७


देवता, महाविराट् और स्वल्पविराट्—सभी उन परम प्रभु परमात्माके अंश हैं। प्रकृति भी उन्हींका अंश कही गयी है। वे श्रीकृष्ण दो रूपोंमें विभक्त हो जाते हैं—एक द्विभुज और दूसरे चतुर्भुज। चतुर्भुज श्रीहरि वैकुण्ठमें विराजते हैं और स्वयं द्विभुज श्रीकृष्णका गोलोकमें निवास है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त समस्त चराचर जगत् (प्राकृत सर्गके अन्तर्गत) है। जो-जो प्राकृतिक सृष्टि है, वह सब नश्वर ही है। इस प्रकार सृष्टिके कारणभूत परब्रह्म परमात्मा नित्य, सत्य, सनातन, स्वतन्त्र, निर्गुण, निर्लिप्त और प्रकृतिसे परे हैं; उनकी न कोई लौकिक उपाधि है और न कोई भौतिक आकार। भक्तोंपर अनुग्रह करना उनका स्वरूप है—सहज स्वभाव है। वे अत्यन्त कमनीय हैं। उनकी अङ्गकान्ति नूतन जलधरके समान है। उनके दो भुजाएँ हैं। हाथमें मुरली है। गोपों-जैसा वेष और किशोर अवस्था है। वे सर्वज्ञ, सर्वसेव्य, परमात्मा एवं ईश्वर हैं। तुम उनके स्वरूपको ऐसा ही जानो।

इन्हींके दिये हुए ज्ञानसे विराट् पुरुष (विष्णु)-के नाभिकमलसे उत्पन्न ज्ञानस्वरूप ब्रह्मा अखिल ब्रह्माण्डकी सृष्टि करते हैं तथा सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता मृत्युञ्जय शिव संहारका कार्य सँभालते हैं। उन्हींके दिये ज्ञानसे तथा उन्हींके लिये किये गये तपके प्रभावसे वे उनके समान ही महान् एवं सर्वेश्वर हुए हैं। उन परमात्मा श्रीकृष्णके ज्ञानके प्रभावसे ही भगवान् विष्णु महान् विभूतिसे सम्पन्न, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, सर्वव्यापी, सबके रक्षक, सम्पूर्ण सम्पत्ति प्रदान करनेमें समर्थ, सर्वेश्वर तथा समस्त जगत्‌के अधिपति हुए हैं। उन्हींके ज्ञानसे, उन्हींके लिये की गयी तपस्यासे तथा उन्हींके प्रति भक्ति और उन्हींकी सेवासे प्रकृति सर्वशक्तिमती महामाया और सर्वेश्वरी हुई है। उन्हींके ज्ञान, भजन, तपस्या एवं सेवा करनेसे देवमाता सावित्री वेदोंकी अधिष्ठात्री देवी और वेदमाता हुई हैं, वेदज्ञा तथा द्विजोंकी पूजनीया हो गयी हैं। परमात्मा श्रीकृष्णकी सेवा और तपका ही प्रभाव है कि सरस्वतीको समस्त विद्याकी अधिष्ठात्री माना जाता है। अखिल विद्वान् उनकी उपासना करते हैं। सनातनी महालक्ष्मी धन और सस्यकी अधिष्ठात्री देवी तथा सब सम्पत्तियोंको देनेमें समर्थ हुई हैं। इन्हींकी उपासिका होनेसे दुर्गाको सब लोग पूजते हैं और वे सर्वेश्वरी सबकी कामनाएँ पूर्ण कर देती हैं। इतना ही नहीं, वे दुर्गतिनाशिनी दुर्गा इन्हींकी कृपासे समस्त गाँवोंकी ग्रामदेवी, सम्पूर्ण सम्पत्ति देनेमें समर्थ, सबके द्वारा स्तुत्य और सर्वज्ञ हुई हैं। उन्होंने सर्वेश्वर शिवको जो पतिरूपमें प्राप्त किया है, वह उनकी श्रीकृष्ण-सेवाका ही फल है।

श्रीकृष्णके वामभागसे प्रकट हुई श्रीराधा श्रीकृष्णकी प्रेमसे आराधना और सेवा करके ही उनके प्रेमकी अधिष्ठात्री तथा उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हुई हैं। श्रीकृष्णकी सेवासे ही उन्होंने सबसे अधिक मनोहर रूप, सौभाग्य, मान, गौरव तथा श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें स्थान—उनका पत्नीत्व प्राप्त किया है। पूर्वकालमें राधाने शतशृङ्ग पर्वतपर एक सहस्र दिव्य युगोंतक निराहार रहकर तपस्या की। इससे वे अत्यन्त कृशकाय हो गयीं। श्रीकृष्णने देखा, राधा चन्द्रमाकी एक कलाके समान अत्यन्त कृश हो गयी हैं, अब इनके शरीरमें साँसका चलना भी बंद हो गया है, तब वे प्रभु करुणासे द्रवित हो उन्हें छातीसे लगाकर फूट-फूटकर रोने लगे। उन्होंने राधाको वह सारभूत वर दिया, जो अन्य सब लोगोंके लिये दुर्लभ है। वे बोले—'प्राणवल्लभे! तुम्हारा स्थान मेरे वक्षःस्थलपर है, तुम यहीं रहो। मुझमें तुम्हारी अविचल प्रेम-भक्ति हो। सौभाग्य, मान, प्रेम और गौरवकी दृष्टिसे तुम मेरे लिये सबसे श्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रियतमा बनी रहो। संसारकी समस्त युवतियोंमें तुम्हारा सबसे ऊँचा स्थान है। तुम

२४- भगवती गङ्गाका ध्यान-चित्रण

१३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सबसे अधिक महत्त्व तथा गौरव प्राप्त करो। मैं सदा तुम्हारे गुण गाऊँगा, पूजा करूँगा। तुम सदा मुझे अपने अधीन समझो। मैं तुम्हारी प्रत्येक आज्ञाका पालन करनेके लिये बाध्य रहूँगा।' ऐसा कहकर जगदीश्वर श्रीकृष्णने उन्हें सचेत किया और अपनी उन प्राणवल्लभाको सौतके कष्टसे मुक्त कर दिया।

जिन-जिन देवताओंकी जो-जो देवियाँ पतिद्वारा सम्मानित हुई हैं, उनके उस सम्मानमें श्रीकृष्णकी आराधना ही कारण है। मुने! जिनकी जैसी तपस्या है, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त हुआ है। देवी दुर्गाने सहस्र दिव्य वर्षोंतक हिमालयपर तप करते हुए श्रीकृष्ण-चरणोंका ध्यान किया। इससे वे सबकी पूजनीया हो गयीं। सरस्वती श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये लाख दिव्य वर्षोंतक गन्धमादन पर्वतपर तपस्या करके सबकी वन्दनीया हुई हैं। लक्ष्मी सौ दिव्य युगोंतक पुष्करतीर्थमें तपस्यापूर्वक श्रीकृष्णकी आराधना करके समस्त सम्पदाओंको देनेमें समर्थ हुई हैं। सावित्री मलयाचलपर साठ हजार दिव्य वर्षोंतक तप एवं श्रीकृष्ण-चरणोंका चिन्तन करके द्विजोंकी पूजनीया हो गयी हैं।

मुने! पूर्वकालमें ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवने सौ मन्वन्तरोंतक श्रीकृष्ण-प्रीतिके लिये तपस्या करके सृष्टि, पालन और संहारका अधिकार प्राप्त किया था। धर्म सौ मन्वन्तरोंतक तप करके सर्वपूज्य हुए। नारद! शेषनाग, सूर्यदेव, इन्द्र तथा चन्द्रमाने भी एक-एक मन्वन्तरतक भक्तिपूर्वक श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये तप किया था। वायुदेवता सौ दिव्य युगोंतक भक्तिभावसे तपस्या करके सबके प्राण, सबके द्वारा पूजनीय तथा सबके आधार बन गये। इस प्रकार श्रीकृष्ण-प्रीतिके लिये तपस्या करके सब देवता, मुनि, मानव, राजा तथा ब्राह्मण लोकमें पूजित हुए हैं। इस प्रकार मैंने तुमसे यह पुराण तथा आगमका सारभूत सारा तत्त्व सुना दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय ७)


पृथिवीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग, ध्यान और पूजनका प्रकार तथा स्तुति एवं पृथिवीके प्रति शास्त्रविपरीत व्यवहार करनेपर नरकोंकी प्राप्तिका वर्णन

नारदजीने कहा— भगवन् ! आपने बतलाया है कि श्रीकृष्णके निमेषमात्रमें ब्रह्माकी आयु पूरी हो जाती है। उनका सत्ताशून्य हो जाना ही 'प्राकृतिक प्रलय' कहा जाता है। उस समय पृथ्वी अदृश्य हो जाती है। सम्पूर्ण विश्व जलमें डूब जाता है। सब-के-सब परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णमें लीन हो जाते हैं। तब उस समय पृथ्वी छिपकर कहाँ रहती है और सृष्टिके समय वह पुनः कैसे प्रकट हो जाती है ? धन्या, मान्या, सबकी आश्रयरूपा एवं विजयशालिनी होनेका सौभाग्य उसे पुनः कैसे प्राप्त होता है ? प्रभो! अब आप पृथिवीकी उत्पत्तिके मङ्गलमय चरित्रको सुनानेकी कृपा कीजिये।

२५- शिवजीके संगीतसे रासमण्डलमें श्रीकृष्ण और राधाका द्रवभागको प्राप्त होना

प्रकृतिखण्ड १३९


भगवान् नारायण बोले—नारद! श्रुति कहती है कि सम्पूर्ण सृष्टियोंके आरम्भमें श्रीकृष्णसे ही सबकी उत्पत्ति होती है और समस्त प्रलयोंके अवसरपर प्राणी उन्हींमें लीन भी हो जाते हैं। अब पृथ्वीके जन्मका प्रसङ्ग सुनो। कुछ लोग कहते हैं, यह आदरणीया पृथ्वी मधु और कैटभके मेदसे उत्पन्न हुई है। इसका भाव यह है कि उन दैत्योंके जीवनकालमें पृथ्वी स्पष्ट दिखलायी नहीं पड़ती थी। वे जब मर गये, तब उनके शरीरसे मेद निकला—वही सूर्यके तेजसे सूख गया। अतः 'मेदिनी' इस नामसे पृथ्वी विख्यात हुई। इस मतका स्पष्टीकरण सुनो। पहले सर्वत्र जल-ही-जल दृष्टिगोचर हो रहा था। पृथ्वी जलसे ढकी थी। मेदसे केवल उसका स्पर्श हुआ। अतः लोग उसे 'मेदिनी' कहने लगे। मुने! अब पृथ्वीके सार्थक जन्मका प्रसङ्ग कहता हूँ। यह चरित्र सम्पूर्ण मङ्गल प्रदान करनेवाला है।

मैं पुष्करक्षेत्रमें था। महाभाग धर्मके मुखसे जो कुछ सुन चुका हूँ, वही तुमसे कहूँगा। महाविराट् पुरुष अनन्तकालसे जलमें विराजमान रहते हैं—यह स्पष्ट है। समयानुसार उनके भीतर सर्वव्यापी समष्टि मल प्रकट होता है। महाविराट् पुरुषके सभी रोमकूप उसके आश्रय बन जाते हैं। मुने! उन्हीं रोमकूपोंसे पृथ्वी निकल आती है। जितने रोमकूप हैं, उन सबमेंसे एक-एकसे जलसहित पृथ्वी बार-बार प्रकट होती और छिपती रहती है। सृष्टिके समय प्रकट होकर जलके ऊपर स्थिर रहना और प्रलयकाल उपस्थित होनेपर छिपकर जलके भीतर चले जाना—यही इसका नियम है। अखिल ब्रह्माण्डमें यह विराजती है। वन और पर्वत इसकी शोभा बढ़ाये रहते हैं। यह सात समुद्रोंसे घिरी रहती है। सात द्वीप इसके अङ्ग हैं। हिमालय और सुमेरु आदि पर्वत तथा सूर्य एवं चन्द्रमा प्रभृति ग्रह इसे सदा सुशोभित करते हैं। महाविराट्की आज्ञाके अनुसार ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवता प्रकट होते एवं समस्त प्राणी इसपर रहते हैं। पुण्यतीर्थ तथा पवित्र भारतवर्ष-जैसे देशोंसे सम्पन्न होनेका इसे सुअवसर मिलता है। यह पृथ्वी स्वर्णमय भूमि है। इसपर सात स्वर्ग हैं। इसके नीचे सात पाताल हैं। ऊपर ब्रह्मलोक है। ब्रह्मलोकसे भी ऊपर ध्रुवलोक है।

नारद! इस प्रकार इस पृथ्वीपर अखिल विश्वका निर्माण हुआ है। ये निर्मित सभी विश्व नश्वर हैं। यहाँतक कि 'प्राकृत प्रलय' का अवसर आनेपर ब्रह्मा भी चले जाते हैं। उस समय केवल महाविराट् पुरुष विद्यमान रहते हैं। कारण, सृष्टिके आरम्भमें ही परब्रह्म श्रीकृष्णने इन्हें प्रकट करके इस कार्यमें नियुक्त कर दिया है। सृष्टि और प्रलय प्रवाहरूपसे नित्य हैं—इनका क्रम निरन्तर चालू रहता है। ये समयपर नियन्त्रण रखनेवाली अदृष्ट शक्तिके अधीन होकर रहते हैं। प्रवाहक्रमसे पृथ्वी भी नित्य है। वाराहकल्पमें यह मूर्तिमान् रूपसे विराजमान हुई थी और देवताओंने इसका पूजन किया था। मुनि, मनु, गन्धर्व और ब्राह्मण—प्रायः सभी इसकी पूजामें सम्मिलित हुए थे। उस समय भगवान्का वाराहावतार हुआ था। श्रुतिके मतसे यह पृथ्वी उनकी पत्नीके रूपमें विराजमान हुई। इससे मङ्गलका जन्म हुआ और मङ्गलसे घटेशकी उत्पत्ति हुई।

नारदने पूछा—प्रभो! देवताओंने वाराहकल्पमें पृथ्वीकी किस रूपसे पूजा की थी? सबको आश्रय प्रदान करनेवाली इस साध्वी देवीकी उस कल्पमें स्वयं भगवान् वाराहने तथा अन्य सबने भी पूजा की थी। भगवन्! इसके पूजनका विधान, जलके नीचेसे इसके ऊपर उठनेका क्रम एवं मङ्गलके जन्मका कल्याणमय प्रसङ्ग विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् नारायण बोले—नारद! बहुत पहलेकी बात है। उस समय वाराहकल्प चल

१४०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

रहा था। ब्रह्माके स्तुति करनेपर भगवान् श्रीहरि हिरण्याक्षको मारकर पृथ्वीको रसातलसे निकाल ले आये। उसे जलपर इस प्रकार रख दिया, मानो तालाबमें कमलका पत्ता हो। उसीपर ब्रह्माने सम्पूर्ण मनोहर विश्वकी रचना की। पृथ्वीकी अधिष्ठात्री एक परम सुन्दरी देवीके रूपमें थी। उसे देखकर भगवान् श्रीहरिके मनमें प्रेम हो गया। भगवान् वाराहकी कान्ति ऐसी थी, मानो करोड़ों सूर्य हों। उन्होंने अपना रूप परम मनोहर बना लिया तथा रतिके योग्य एक शय्या तैयार की। फिर उस देवीके साथ एक दिव्य वर्षतक वे एकान्तमें रहे। इसके बाद उन्होंने उस सुन्दरी देवीका संग छोड़ दिया और खेल-ही-खेलमें वे अपने पूर्व वाराहरूपसे विराजमान हो गये। उन्होंने परम साध्वी देवी पृथ्वीका ध्यान और पूजन किया। धूप, दीप, नैवेद्य, सिन्दूर, चन्दन, वस्त्र, फूल और बलि आदि सामग्रियोंसे पूजा करके भगवान्ने उससे कहा।

श्रीभगवान् बोले— शुभे! तुम सबको आश्रय प्रदान करनेवाली बनो। मुनि, मनु, देवता, सिद्ध और दानव आदि सबसे सुपूजित होकर तुम सुख पाओगी। अम्बुवाँचीके अतिरिक्त दिनमें गृहप्रवेश, गृहारम्भ, वापी एवं तड़ागके निर्माण अथवा अन्य गृहकार्यके अवसरपर देवता आदि सभी लोग मेरे वरके प्रभावसे तुम्हारी पूजा करेंगे। जो मूर्ख तुम्हारी पूजा नहीं करना चाहेंगे, उन्हें नरकमें जाना पड़ेगा।

उस समय पृथ्वी गर्भवती हो चुकी थी। उसी गर्भसे तेजस्वी मङ्गल नामक ग्रहकी उत्पत्ति हुई। भगवान्की आज्ञाके अनुसार उपस्थित सम्पूर्ण व्यक्ति पृथ्वीकी उपासना करने लगे। कण्वशाखामें कहे हुए मन्त्रोंको पढ़कर उन्होंने ध्यान किया और स्तुति की। मूलमन्त्र पढ़कर नैवेद्य अर्पण किया। यों त्रिलोकीभरमें पृथ्वीकी पूजा और स्तुति होने लगी।

नारदजीने कहा— भगवन्! पृथ्वीका किस प्रकार ध्यान किया जाता है, इसकी पूजाका प्रकार क्या है और कौन मूलमन्त्र है? सम्पूर्ण पुराणोंमें छिपे हुए इस प्रसङ्गको सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है। अतः बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् नारायण कहते हैं— मुने! सर्वप्रथम भगवान् वाराहने इस पृथ्वीकी पूजा की। उनके पश्चात् ब्रह्मा उसके पूजनमें संलग्न हुए। तदनन्तर सम्पूर्ण प्रधान मुनियों, मनुओं और मानवोंद्वारा इसका सम्मान हुआ। नारद! अब मैं इसका ध्यान, पूजन और मन्त्र बतलाता हूँ, सुनो। 'ॐ ह्रीं श्रीं वसुधायै स्वाहा' इसी मन्त्रसे भगवान् विष्णुने इसका पूजन किया था। ध्यानका प्रकार यह है— 'पृथ्वी देवीके श्रीविग्रहका वर्ण स्वच्छ कमलके समान उज्ज्वल है। मुख ऐसा जान पड़ता है, मानो शरत्पूर्णिमाका चन्द्रमा हो। सम्पूर्ण अङ्गोंमें ये चन्दन लगाये रहती हैं। रत्नमय अलंकारोंसे इनकी अनुपम शोभा होती है। ये समस्त रत्नोंकी


* सौरमानसे आर्द्रा नक्षत्रके प्रथम चरणमें पृथ्वी ऋतुमती रहती है। इतने समयका नाम अम्बुवाची है।

१०- श्रीराधाजीका गङ्गापर रोष, श्रीकृष्णके प्रति राधाका उपालम्भ, श्रीराधाके भयसे गङ्गाका श्रीकृष्णके चरणोंमें छिप जाना, जलाभावसे पीड़ित देवताओंका गोलोकमें जाना, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे राधाका प्रसन्न होना तथा गङ्गाका प्रकट होना, देवताओंके प्रति श्रीकृष्णका आदेश तथा गङ्गाके विष्णुपत्नी होनेका प्रसङ्ग

प्रकृतिखण्ड १४१ आधारभूता और रत्नगर्भा हैं। रत्नोंकी खानें इनको गौरवान्वित किये हुए हैं। ये विशुद्ध चिन्मय वस्त्र धारण किये रहती हैं। इनके मुखपर मुस्कान छायी रहती है। सभी लोग इनकी वन्दना करते हैं। ऐसी भगवती पृथ्वीकी मैं आराधना करता हूँ।' इसी प्रकार ध्यान करनेसे सब लोगोंद्वारा पृथ्वीकी पूजा सम्पन्न होती है। विप्रेन्द्र ! अब कण्वशाखामें प्रतिपादित इनकी स्तुति सुनो। भगवान् विष्णु बोले- विजयकी प्राप्ति करानेवाली वसुधे ! मुझे विजय दो। तुम भगवान् यज्ञवराहकी पत्नी हो। जये ! तुम्हारी कभी पराजय नहीं होती है। तुम विजयका आधार, विजयशील और विजयदायिनी हो। देवि ! तुम्हीं सबकी आधारभूमि हो। सर्वबीजस्वरूपिणी तथा सम्पूर्ण शक्तियोंसे सम्पन्न हो। समस्त कामनाओंको देनेवाली देवि ! तुम इस संसारमें मुझे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तु प्रदान करो। तुम सब प्रकारके शस्योंका घर हो। सब तरहके शस्योंसे सम्पन्न हो। सभी शस्योंको देनेवाली हो तथा समयविशेषमें समस्त शस्योंका अपहरण भी कर लेती हो। इस संसारमें तुम सर्वशस्यस्वरूपिणी हो। मङ्गलमयी देवि ! तुम मङ्गलका आधार हो। मङ्गलके योग्य हो। मङ्गलदायिनी हो। मङ्गलमय पदार्थ तुम्हारे स्वरूप हैं। मङ्गलेश्वरि ! तुम जगत्में मुझे मङ्गल प्रदान करो। भूमे ! तुम भूमिपालोंका सर्वस्व हो, भूमिपालपरायणा हो तथा भूपालोंके अहंकारका मूर्तरूप हो। भूमिदायिनी देवि ! मुझे भूमि दो* । नारद ! यह स्तोत्र परम पवित्र है। जो पुरुष पृथ्वीका पूजन करके इसका पाठ करता है, उसे अनेक जन्मोंतक भूपाल-सम्राट् होनेका सौभाग्य प्राप्त होता है। इसे पढ़नेसे मनुष्य पृथ्वीके दानसे उत्पन्न पुण्यके अधिकारी बन जाते हैं। पृथ्वी- दानके अपहरणसे, दूसरेके कुएँको बिना उसकी आज्ञा लिये खोदनेसे, अम्बुवाची योगमें पृथ्वीको खोदनेसे और दूसरेकी भूमिका अपहरण करनेसे जो पाप होते हैं, उन पापोंसे इस स्तोत्रका पाठ करनेपर मनुष्य छुटकारा पा जाता है, इसमें संशय नहीं है। मुने ! पृथ्वीपर वीर्य त्यागने तथा दीपक रखनेसे जो पाप होता है, उससे भी पुरुष इस स्तोत्रका पाठ करनेसे मुक्त हो जाता है। नारदजी बोले - भगवन् ! पृथ्वीका दान करनेसे जो पुण्य तथा उसे छीनने, दूसरेकी भूमिका हरण करने, अम्बुवाचीमें पृथ्वीका उपयोग करने, भूमिपर वीर्य गिराने तथा जमीनपर दीपक रखनेसे जो पाप बनता है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! मेरे पूछनेके अतिरिक्त अन्य भी जो पृथ्वीजन्य पाप हैं, उनको उनके प्रतीकारसहित बतानेकी कृपा करें। भगवान् नारायण बोले - मुने ! जो पुरुष भारतवर्षमें किसी संध्यापूत ब्राह्मणको एक बित्ता भी भूमि दान करता है, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। फसलोंसे भरी-पूरी भूमिको ब्राह्मणके लिये अर्पण करनेवाला सत्पुरुष उतने ही वर्षोंतक भगवान् विष्णुके धाममें विराजता है, जितने उस जमीनके रजःकण हों। जो गाँव, भूमि और धान्य ब्राह्मणको देता है, उसके पुण्यसे

  • विष्णुरुवाच - यज्ञशूकरजाया त्वं जयं देहि जयावहे। जयेऽजये जयाधारे जयशीले जयप्रदे ॥ सर्वाधारे सर्वबीजे सर्वशक्तिसमन्विते । सर्वकामप्रदे देवि सर्वेष्टं देहि मे भवे ॥ सर्वशस्यालये सर्वशस्याढ्ये सर्वशस्यदे। सर्वशस्यहरे काले सर्वशस्यात्मिके भवे ॥ मङ्गले मङ्गलाधारे मङ्गल्ये मङ्गलप्रदे । मङ्गलार्थे मङ्गलेशे मङ्गलं देहि मे भवे ॥ भूमे भूमिपसर्वस्वे भूमिपालपरायणे । भूमिपाहंकाररूपे भूमिं देहि च भूमिदे ॥ (प्रकृतिखण्ड ८। ५३-५७)
१४२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

दाता और प्रतिगृहीता—दोनों व्यक्ति सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर वैकुण्ठधाममें स्थान पाते हैं। जो साधु पुरुष भूमिदानके लिये दाताको उत्साहित करता है, उसे अपने मित्र एवं गोत्रके साथ वैकुण्ठमें जानेका सौभाग्य प्राप्त होता है।

अपनी अथवा दूसरेकी दी हुई ब्राह्मणकी भूमि हरण करनेवाला व्यक्ति सूर्य एवं चन्द्रमाकी स्थितिपर्यन्त 'कालसूत्र' नामक नरकमें स्थान पाता है। इतना ही नहीं, इस पापके प्रभावसे उसके पुत्र और पौत्र आदिके पास भी पृथ्वी नहीं ठहरती। वह श्रीहीन, पुत्रहीन और दरिद्र होकर घोर रौरव नरकमें गिरता है। जो गोचरभूमिको जोतकर धान्य उपार्जन करता है और वही धान्य ब्राह्मणको देता है तो इस निन्दित कर्मके प्रभावसे उसे देवताओंके वर्षसे सौ वर्षतक 'कुम्भीपाक' नामक नरकमें रहना पड़ता है। गौओंके रहनेके स्थान, तड़ाग तथा रास्तेको जोतकर पैदा किये हुए अन्नका दान करनेवाला मानव चौदह इन्द्रकी आयुतक 'असिपत्र' नामक नरकमें रहता है। जो कामान्ध व्यक्ति एकान्तमें पृथ्वीपर वीर्य गिराता है, उसे वहाँकी जमीनमें जितने रजःकण हैं, उतने वर्षोंतक 'रौरव' नरकमें रहना पड़ता है। अम्बुवाचीमें भूमि खोदनेवाला मानव 'कृमिदंश' नामक नरकमें जाता और उसे वहाँ चार युगोंतक रहना पड़ता है। जो दूसरेके तड़ागमें पड़ी हुई कीचड़को निकालकर शुद्ध जल होनेपर स्नान करता है, उसे ब्रह्मलोकमें स्थान मिलता है। जो मन्दबुद्धि मानव भूमिपतिके पितरोंको श्राद्धमें पिण्ड न देकर श्राद्ध करता है, उसे अवश्य ही नरकगामी होना पड़ता है।

दीपक, शिवलिङ्ग, भगवतीकी मूर्ति, शङ्ख, यन्त्र, शालग्रामका जल, फूल, तुलसीदल, जपमाला, पुष्पमाला, कपूर, गोरोचन, चन्दनकी लकड़ी, रुद्राक्षकी माला, कुशकी जड़, पुस्तक और यज्ञोपवीत—इन वस्तुओंको भूमिपर रखनेसे मानव नरकमें वास करता है। गाँठमें बँधे हुए यज्ञसूत्रकी पूजा करना सभी द्विजातिवर्णोंके लिये अत्यावश्यक है। भूकम्प एवं ग्रहणके अवसरपर पृथ्वीको खोदनेसे बड़ा पाप लगता है। इस मर्यादाका उल्लङ्घन करनेसे दूसरे जन्ममें अङ्गहीन होना पड़ता है। इसपर सबके भवन बने हैं, इसलिये यह 'भूमि' कहलाती है। कश्यपकी पुत्री होनेसे 'काश्यपी' तथा स्थिररूप होनेसे 'स्थिरा' कही जाती है। महामुने! विश्वको धारण करनेसे 'विश्वम्भरा', अनन्तरूप होनेसे 'अनन्ता' तथा पृथुकी कन्या होनेसे अथवा सर्वत्र फैली रहनेसे इसका नाम 'पृथ्वी' पड़ा है।

(अध्याय ८-९)


गङ्गाकी उत्पत्तिका विस्तृत प्रसङ्ग

नारदजीने कहा— वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन्! पृथ्वीका यह परम मनोहर उपाख्यान सुन चुका। अब आप गङ्गाका विशद प्रसङ्ग सुनानेकी कृपा कीजिये। प्रभो! सुरेश्वरी, विष्णुस्वरूपा एवं स्वयं विष्णुपदी नामसे विख्यात गङ्गा सरस्वतीके शापसे भारतवर्षमें किस प्रकार और किस युगमें पधारीं? किसकी प्रार्थना एवं प्रेरणासे उन्हें वहाँ जाना पड़ा? पापका उच्छेद करनेवाला यह पवित्र एवं पुण्यप्रद प्रसंग मैं सुनना चाहता हूँ।

भगवान् नारायण कहते हैं— नारद! श्रीमान् सगर एक सूर्यवंशी सम्राट् हो चुके हैं। मनको मुग्ध करनेवाली उनकी दो रानियाँ थीं—वैदर्भी और शैब्या। उनकी पत्नी शैब्यासे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। कुलको बढ़ानेवाले उस सुन्दर पुत्रका नाम असमञ्जस पड़ा। उनकी दूसरी पत्नी वैदर्भीने पुत्रकी कामनासे भगवान् शंकरकी उपासना की।

प्रकृतिखण्ड १४३

शंकरके वरदानसे उसे भी गर्भ रह गया। पूरे सौ वर्ष व्यतीत हो जानेपर उसके गर्भसे एक मांसपिण्डकी उत्पत्ति हुई। उसे देखकर वह बहुत ही दुःखी हुई और उसने भगवान् शिवका ध्यान किया। तब भगवान् शंकर ब्राह्मणके वेषमें उसके पास पधारे और उन्होंने उस मांसपिण्डको साठ हजार भागोंमें बाँट दिया। वे सभी टुकड़े पुत्ररूपमें परिणत हो गये। उनके बल और पराक्रमकी सीमा नहीं रही। उनके परम तेजस्वी कलेवरने ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालीन सूर्यकी प्रभाका मानो हरण कर लिया था; परंतु वे सभी तेजस्वी कुमार कपिलमुनिके शापसे जलकर भस्म हो गये। यह दुःखद समाचार सुनकर राजा सगरकी आँखें निरन्तर जल बहाने लगीं। वे बेचारे घोर जंगलमें चले गये। तब उनके पुत्र असमञ्जसने गङ्गाको ले आनेके लिये तपस्या आरम्भ कर दी। वे बहुत कालतक तपस्या करते रहे। अन्तमें कालने उन्हें अपना ग्रास बना लिया। असमञ्जसके पुत्रका नाम अंशुमान् था। गङ्गाको ले आनेके लिये लम्बे समयतक तपस्या करनेके पश्चात् वे भी कालके गालमें चले गये।

अंशुमान्‌के पुत्र भगीरथ थे। भगीरथ भगवान्‌के परम भक्त, विद्वान्, श्रीहरिमें अटूट श्रद्धा रखनेवाले, गुणवान् तथा वैष्णव पुरुष थे। गङ्गाको ले आनेका निश्चय करके उन्होंने बहुत समयतक तपस्या की। अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णके उन्हें साक्षात् दर्शन हुए। उस समय भगवान्‌के श्रीविग्रहसे ग्रीष्मकालीन करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाश फैल रहा था। उनके दो भुजाएँ थीं। वे हाथमें मुरली लिये हुए थे। उनकी किशोर अवस्था थी। वे गोपके वेषमें पधारे थे। भक्तोंपर कृपा करनेके लिये उन्होंने यह रूप धारण किया था। मुने! भगवान् श्रीकृष्ण परिपूर्णतम परब्रह्म हैं। वे चाहे जैसा रूप बना सकते हैं। उस समय ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि उनकी स्तुति कर रहे थे और मुनियोंने उनके सामने अपने मस्तक झुका रखे थे। सदा निर्लिप्त, सबके साक्षी, निर्गुण, प्रकृतिसे परे तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले उन भगवान् श्रीकृष्णका मुख मुस्कानसे सुशोभित था। विशुद्ध चिन्मय वस्त्र तथा दिव्य रत्नोंसे निर्मित आभूषण उनके श्रीविग्रहको सुशोभित कर रहे थे। उनकी यह दिव्य झाँकी पाकर भगीरथने बार-बार उन्हें प्रणाम किया और स्तुति भी की। लीलापूर्वक उन्हें भगवान्‌से अभीष्ट वर भी मिल गया। वे चाहते थे कि मेरे पूर्वज तर जायँ। परम आनन्दके साथ उन्होंने भगवान्‌की दिव्य स्तुति की थी।

भगवान् श्रीहरिने गङ्गाजीसे कहा—सुरेश्वरि! तुम सरस्वतीके शापसे अभी भारतवर्षमें जाओ और मेरी आज्ञाके अनुसार सगरके सभी पुत्रोंको पवित्र करो। तुमसे स्पर्शित वायुका संयोग पाकर ही वे सभी राजकुमार मेरे धाममें चले जायँगे। उनका भी विग्रह मेरे-जैसा ही हो जायगा और वे दिव्य रथपर सवार होंगे। उन्हें मेरे पार्षद होनेका सुअवसर प्राप्त होगा। वे सर्वदा आधि-व्याधिसे मुक्त रहेंगे। उनके जन्म-जन्मान्तरके पापोंकी समस्त पूँजी समाप्त हो जायगी। श्रुतिमें

१४४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कहा गया है कि भारतवर्षमें मनुष्योंद्वारा उपार्जित करोड़ों जन्मोंके पाप गङ्गाकी वायुके स्पर्शमात्रसे नष्ट हो जाते हैं। स्पर्श और दर्शनकी अपेक्षा गङ्गादेवीमें मौसलस्नान* करनेसे दसगुना पुण्य होता है। सामान्य दिनमें भी स्नान करनेसे मनुष्योंके अनेकों जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। पर्वों तथा विशेष पुण्य-तिथियोंपर स्नान करनेका विशेष फल कहा गया है। सामान्यतः गङ्गामें स्नान करनेकी अपेक्षा चन्द्रग्रहणके अवसरपर स्नान करनेसे अनन्त गुना अधिक पुण्य कहा गया है। सूर्यग्रहणमें इससे दसगुना अधिक समझना चाहिये। इससे सौगुना पुण्य अर्धोदयके समय स्नान करनेसे मिलता है।

नारद! इस प्रकार गङ्गा और भगीरथके सामने कहकर देवेश्वर भगवान् श्रीहरि चुप हो गये। तब गङ्गाने भक्तिसे अत्यन्त नम्र होकर उनसे कहा।

**गङ्गा बोलीं—**नाथ! सरस्वतीका शाप पहलेसे ही मेरे सिरपर सवार है, आप आज्ञा दे ही रहे हैं और इन महाराज भगीरथकी एतदर्थ तपस्या भी हो रही है, अतः मैं अभी भारतवर्षमें जा रही हूँ; परंतु प्रभो! वहाँ जानेपर अनेकों पापीजन अपने जिस-किसी प्रकारके भी पापको मुझपर लाद देंगे। ऐसी स्थितिमें मेरे ऊपर आये हुए वे पाप कैसे नष्ट होंगे—इसका उपाय तो बतला दीजिये। देवेश! मुझे भारतवर्षमें कितने वर्षोंतक रहना पड़ेगा? फिर मैं कब आप परम प्रभुके धाममें आनेकी अधिकारिणी बन सकूँगी? प्रभो! आप सर्वान्तर्यामीसे कोई भी बात छिपी नहीं है। सर्वज्ञ देव! मेरे अन्तःकरणमें अन्य भी जो-जो कामनाएँ छिपी हैं, उनके भी पूर्ण होनेका उपाय बतानेकी कृपा करें।

**श्रीभगवान् बोले—**सुरेश्वरि! गङ्गे! मैं तुम्हारे सभी अभिप्रायोंसे परिचित हूँ। तुम नदी-रूपसे भारतवर्षमें पधारोगी और मेरे ही अंश-स्वरूप समुद्र तुम्हारे पति होंगे। भारतवर्षमें सरस्वती आदि अन्य जितनी नदियाँ होंगी, उन सबमें समुद्रके लिये तुम ही सबसे अधिक सौभाग्यवती मानी जाओगी। देवेशि! कलियुगके पाँच हजार वर्षोंतक तुम्हें सरस्वतीके शापसे भारतवर्षमें रहना है। देवि! लक्ष्मीरूपा तुम रसिका हो और मेरे स्वरूप समुद्र रसिकराज हैं। तुम उनके साथ एकान्तमें निरन्तर प्रियसंगम करोगी। भारतवासी सम्पूर्ण मनुष्य भगीरथप्रणीत स्तोत्रसे तुम्हारी स्तुति करेंगे और उनके द्वारा भक्तिपूर्वक तुम सुपूजित भी होओगी। कण्वशाखामें बताये गये प्रकारसे तुम्हारा ध्यान करके लोग तुम्हारी पूजामें तत्पर होंगे। जो तुम्हारी स्तुति और तुम्हें प्रणाम करेगा, उसको अश्वमेध-यज्ञका फल सुलभतासे प्राप्त होगा। चाहे सैकड़ों योजनकी दूरीपर क्यों न हो; किंतु जो 'गङ्गा-गङ्गा' इस नामका उच्चारण करके स्नान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर विष्णुलोकमें चला जाता है। हजारों पापी व्यक्तियोंके स्नानसे जो तुमपर पाप आ जायँगे, मेरे भक्तोंके स्पर्शमात्रसे ही उनकी सत्ता नष्ट हो जायगी। हजारों पापी प्राणियोंके शवका स्पर्श अवश्य ही पापका साधन है; किंतु मेरे मन्त्रका अनुष्ठान करनेवाले पुण्यात्मा भक्तपुरुष भी तो तुम्हारेमें स्नान करने आयेंगे। उनके स्नानसे तुम्हारा वह सारा पाप नष्ट हो जायगा। शुभे! पवित्र भारतवर्षमें ही तुम्हारा निवास होगा। उस पापमोचन स्थानपर सरस्वती आदि सभी श्रेष्ठ नदियाँ तुम्हारा साथ देंगी। जहाँ तुम्हारे गुणोंका कीर्तन होगा, वह स्थान तुरंत तीर्थ बन जायगा। तुम्हारे रजःकणका स्पर्शमात्र हो


* गङ्गाको प्रणाम करके प्रवेश करे और निश्चेष्ट होकर अर्थात् बिना हाथ-पैर हिलाये शान्तभावसे स्नान कर ले। इसे 'मौसलस्नान' कहते हैं।

२६- ब्रह्माद्वारा भगवती राधाका स्तवन

प्रकृतिखण्ड १४५

जानेपर भी पापी पवित्र हो सकता है और उन रजःकणोंकी जितनी संख्या होती है, उतने वर्षोंतक वह देवीके लोकमें बसनेका अधिकारी माना जाता है।

देवी! जो भक्ति एवं ज्ञानसे सम्पन्न होकर मेरे नामका स्मरण करते हुए प्राण-त्याग करते हैं, वे सीधे मेरे परमधाममें जाते हैं और वहाँ पार्षद बनकर दीर्घकालतक निवास करते हैं। वे असंख्य प्राकृतिक प्रलय देख सकते हैं। मृत व्यक्तिका शव बड़े पुण्यके प्रभावसे ही तुम्हारे अंदर आ सकता है। जितने दिनोंतक उसकी एक-एक हड्डी तुम्हारेमें रहती है, उतने समयतक वह वैकुण्ठमें वास करता है। यदि कोई अज्ञानी व्यक्ति तुम्हारे जलका स्पर्श करके प्राण-त्याग करता है तो वह मेरी कृपासे सालोक्यपदका अधिकारी होता है। अथवा कोई कहीं भी मरे; यदि मरते समय जिस-किसी प्रकारसे भी तुम्हारे नामका स्मरण हो जाता है तो उसे मैं सालोक्य-पद प्रदान करता हूँ। ब्रह्माकी आयुपर्यन्त वह वहाँ रह सकता है। कोई तीर्थमें मरे या अतीर्थमें, तुम्हारे स्मरणके प्रभावसे सारूप्यपदका अधिकारी वह पुरुष, ऐसा शक्तिशाली बन जाता है कि वह त्रिलोकीको भी पवित्र कर सकता है। जिनके बान्धव मेरे भक्त हैं—वे चाहे पशु आदि ही क्यों न हों—वे सर्वोत्तम रत्ननिर्मित विमानपर सवार होकर गोलोकमें चले जाते हैं।

मुनिवर! इस प्रकार गङ्गासे कहकर भगवान् श्रीहरिने राजा भगीरथसे कहा—‘राजन्! तुम अभी इन गङ्गाकी स्तुति तथा भक्तिभावके साथ पूजा करो।’ तब भगीरथ भक्तिपूर्वक गङ्गाके स्तवन और पूजनमें संलग्न हो गये। कौथुमिशाखामें कहे हुए ध्यान और स्तोत्रसे उन्होंने गङ्गाकी पूजा सम्पन्न की। तदनन्तर उन्होंने परमप्रभु परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको बार-बार प्रणाम किया। इसके बाद भगीरथ और गङ्गाकी अभीष्ट स्थानकी ओर यात्रा आरम्भ हो गयी तथा भगवान् अन्तर्धान हो गये।

नारदने पूछा—वेदज्ञोंमें प्रमुख प्रभो! किस ध्यान-स्तोत्रसे तथा किस पूजा-क्रमसे राजा भगीरथने गङ्गाकी पूजा की? यह मुझे स्पष्ट बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! राजा भगीरथने नित्यक्रियाके पश्चात् स्नान किया। दो स्वच्छ वस्त्र धारण किये। तब इन्द्रियोंको नियन्त्रणमें रखकर भक्तिपूर्वक छः देवताओंकी पूजा की। वे छः देवता हैं—गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और भगवती शिवा। इन देवताओंका पूजन करनेपर वे गङ्गाजीकी पूजाके पूर्ण अधिकारी बन गये। नारद! विघ्न दूर होनेके लिये गणेशकी, आरोग्यताके लिये सूर्यकी, पवित्रताके लिये अग्निकी, मुक्ति-प्राप्तिके लिये विष्णुकी, ज्ञानके लिये ज्ञानेश्वर शिवकी तथा बुद्धिकी वृद्धिके लिये भगवती शिवाकी पूजा करना आवश्यक है। विद्वान् पुरुषको इन देवताओंकी पूजा सम्पन्न कर लेनेपर ही अन्य किसी पूजामें सफलता प्राप्त होती है। मुने! सुनो, इस प्रकारसे भगीरथने गङ्गाका ध्यान किया था।

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! यह ध्यान सम्पूर्ण पापोंको नष्ट कर देता है। गङ्गाका वर्ण श्वेत चम्पाके समान स्वच्छ है। ये समस्त पापोंका उच्छेद कर देती हैं। परब्रह्म पूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णके श्रीविग्रहसे इनका प्राकट्य हुआ है। ये परम साध्वी और उन्हींके समान सुयोग्य हैं। वह्निशुद्ध चिन्मय वस्त्र इनकी शोभा

१४६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

बढ़ाते हैं। रत्नमय भूषणोंसे ये विभूषित हैं। इन आदरणीया देवीने शरत्पूर्णिमाके सैकड़ों चन्द्रमाओंकी स्वच्छ प्रतिभाको अपनेमें स्थान दे रखा है। ये सदा मुस्कराती रहती हैं। इनके तारुण्यमें कभी शिथिलता नहीं आती। ये शान्तस्वरूपिणी देवी भगवान् नारायणकी प्रिया हैं। सत्सौभाग्य कभी इनसे दूर नहीं हो सकता। इनके सिरपर सघन अलकावली है। मालतीके पुष्पोंकी माला इनकी शोभा बढ़ा रही है। इनके ललाटपर चन्दन-बिन्दुओंके साथ सिन्दूरकी बिन्दी है, जिससे उनका लालित्य बढ़ गया है। गण्डस्थलपर कस्तूरीसे पत्ररचना की गयी है, जो नाना प्रकारके चित्रोंसे सुशोभित है। इनके परम मनोहर दोनों होठ पके हुए बिम्बाफलकी लालिमाको तुच्छ कर रहे हैं। इनकी मनोहर दन्तपंक्तियोंके सामने मोतियोंकी लड़ी नगण्य समझी जाती है। इनके कटाक्षपूर्ण बाँकी चितवनसे युक्त नेत्र परम मनोहर हैं। इनका वक्षःस्थल विशाल है। स्थल-कमलकी प्रभाका पराभव करनेवाले दो सुन्दर चरण हैं। रत्नमय पादुकाओंसे शोभा पानेवाले उन चरणोंमें महावर लगा है। देवराज इन्द्रके मुकुटमें लगे हुए मन्दारके फूलोंके रजःकणसे इन देवीके श्रीचरणोंकी लालिमा गाढ़ी हो गयी है। देवता, सिद्ध और मुनीन्द्र अर्घ्य लेकर सदा सामने खड़े हैं। तपस्वियोंके मुकुटमें रहनेवाले भौंरोंकी पंक्तिसे इनके चरण संयुक्त हैं। इनके पावन चरण मुमुक्षुजनोंको मुक्ति देनेमें तथा कामी पुरुषोंकी कामना पूर्ण करनेमें अत्यन्त कुशल हैं। ये परमादरणीया देवी सबकी पूज्या, वर देनेमें प्रवीण, भक्तोंपर कृपा करनेमें परम कुशल, भगवान् विष्णुका पद प्रदान करनेवाली तथा विष्णुपदी नामसे सुविख्यात हैं। इन परम साध्वी गङ्गादेवीकी मैं उपासना करता हूँ।

ब्रह्मन्! इसी ध्यानसे तीन मार्गोंसे विचरण करनेवाली कल्याणी गङ्गाका हृदयमें स्मरण करना चाहिये। इसके बाद सोलह प्रकारके उपचारोंसे इनकी पूजा करे। आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, अनुलेपन, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, शीतल जल, वस्त्र, आभूषण, माला, चन्दन, आचमन और सुन्दर शय्या—ये अर्पण करनेके योग्य सोलह उपचार हैं। इन्हें भगवती गङ्गाको भक्तिपूर्वक समर्पण करके प्रणाम करे और दोनों हाथ जोड़कर स्तुति करे। इस प्रकार गङ्गादेवीकी उपासना करनेवाले बड़भागी पुरुषको अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। इसके बाद श्रीगङ्गाजीका परम पुण्यदायक और पापनाशक स्तोत्र सुनाकर फिर भगवान् नारायणने कहा।

**भगवान् नारायण बोले—**नारद! राजा भगीरथ उस स्तोत्रसे गङ्गाकी स्तुति करके उन्हें साथ ले वहाँ पहुंचे, जहाँ सगरके साठ हजार पुत्र जलकर भस्म हो गये थे। गङ्गाका स्पर्श करके बहनेवाली वायुका स्पर्श होते ही वे राजकुमार तुरंत वैकुण्ठमें चले गये।

भगीरथके सत्प्रयत्नसे गङ्गाका आगमन हुआ है। अतः गङ्गाको ‘भागीरथी’ कहते हैं। यों गङ्गाका सम्पूर्ण उत्तम उपाख्यान कह दिया। यह उपाख्यान पुण्यदायी तथा मोक्षका साधन है। अब आगे तुम और क्या सुनना चाहते हो?

प्रकृतिखण्ड १४७

नारदजीने पूछा—शिवजीके संगीतसे मुग्ध हो जब श्रीकृष्ण और राधा द्रवभावको प्राप्त हो गये तब क्या हुआ? उस समय वहाँ जो लोग उपस्थित थे, उन्होंने कौन-सा उत्तम कार्य किया? ये सब बातें विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें।

भगवान् नारायण बोले—नारद! एक समयकी बात है—कार्तिककी पूर्णिमा थी। राधा-महोत्सव बड़े धूमधामसे मनाया जा रहा था। भगवान् श्रीकृष्ण सम्यक् प्रकारसे राधाकी पूजा करके रासमण्डलमें विराजमान थे। तत्पश्चात् ब्रह्मादि देवता तथा शौनकादि ऋषि—प्रायः सभी महानुभावोंने बड़े आनन्दके साथ श्रीकृष्णपूजिता श्रीराधाजीकी पूजा की और फिर वे वहीं विराजमान हो गये। इतनेमें भगवान् श्रीकृष्णको संगीत सुनानेवाली देवी सरस्वती हाथमें वीणा लेकर सुन्दर ताल-स्वरके साथ गीत गाने लगीं। तब ब्रह्माने प्रसन्न होकर एक सर्वोत्तम रत्नसे बना हार पुरस्कार-रूपमें उन्हें अर्पण किया। शिवसे उन्हें अखिल ब्रह्माण्डके लिये दुर्लभ एक उत्तम मणि प्राप्त हुई। भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें सम्पूर्ण रत्नोंमें श्रेष्ठ कौस्तुभमणि भेंट की। राधाने अमूल्य रत्नोंसे निर्मित एक अनुपम हार, भगवान् नारायणने एक सुन्दर पुष्पमाला तथा लक्ष्मीने बहुमूल्य रत्नोंके दो कुण्डल सरस्वतीको पुरस्काररूपमें दिये। विष्णुमाया, ईश्वरी, दुर्गा, नारायणी और ईशाना नामसे विख्यात भगवती मूलप्रकृतिने सरस्वतीके अन्तःकरणमें परम दुर्लभ परमात्मभक्ति प्रकट की। धर्मने धार्मिक बुद्धि उत्पन्न करनेके साथ ही प्रपञ्चात्मक जगत्में उनकी कीर्ति विस्तृत की। अग्निदेवने चिन्मय वस्त्र तथा पवनदेवने मणिमय नूपुर सरस्वतीको प्रदान किये।

इतनेमें ब्रह्मासे प्रेरित होकर भगवान् शंकर श्रीकृष्णसम्बन्धी पद्य, जिसके प्रत्येक शब्दमें रसके उल्लासको बढ़ानेकी शक्ति भरी थी, बारंबार गाने लगे। उसे सुनकर सम्पूर्ण देवता मूर्च्छित-से हो गये। जान पड़ता था, मानो सब चित्र-विचित्र पुतले हैं। बड़ी कठिनतासे किसी प्रकार उन्हें चेत हुआ। उस समय देखा गया कि समस्त रासमण्डलमें सम्पूर्ण स्थल जलसे आप्लावित है। श्रीराधा और श्रीकृष्णका कहीं पता नहीं है। फिर तो गोप, गोपी, देवता और ब्राह्मण—सभी अत्यन्त उच्च स्वरसे विलाप करने लगे। उस समय ब्रह्माजी भी वहीं थे। उन्होंने ध्यानके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णका पुनीत विचार समझ लिया। भगवान् श्रीकृष्ण ही श्रीराधाके साथ जलमय हो गये हैं—यह बात उन्हें भलीभाँति मालूम हो गयी। तब वे सभी महाभाग देवता परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे। सबने अपनी प्रार्थना सुनायी।

'विभो! हमारा केवल यही अभीष्ट वर है कि आप अपनी श्रीमूर्तिके हमें पुनः दर्शन करा दें।' ठीक उसी समय अति मधुर तथा स्पष्ट शब्दोंमें आकाशवाणी हुई। सब लोगोंने उसे भलीभाँति सुना। आकाशवाणीमें कहा गया—'मैं सर्वात्मा श्रीकृष्ण और मेरी स्वरूपाशक्ति राधा—हम दोनोंने ही भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये यह

११- तुलसीके कथा-प्रसङ्गमें राजा वृषध्वजका चरित्र-वर्णन

१४८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जलमय विग्रह धारण कर लिया है। सुरेश्वरो ! तुम्हें मेरे तथा इन राधाके शरीरसे क्या प्रयोजन है ? मनु, मुनि, मानव तथा अगणित वैष्णवजन मेरे मन्त्रोंसे पवित्र होकर मुझे देखनेके लिये मेरे धाममें आयेंगे। ऐसे ही तुम्हें भी यदि स्पष्ट दर्शन करनेकी इच्छा हो तो प्रयत्न करो। शम्भु वहीं रहकर मेरी आज्ञाका पालन करें। ब्रह्मन् ! जगद्गुरो ! तुम स्वयं विधाता हो। भगवान् शंकरसे कह दो कि 'वे वेदोंके अङ्गभूत परम मनोहर विशिष्ट शास्त्र अर्थात् तन्त्रशास्त्रका निर्माण करें। उसमें सम्पूर्ण अभीष्ट फल देनेवाले बहुत-से अपूर्व मन्त्र उद्धृत हों। स्तोत्र, ध्यान, पूजाविधि, मन्त्र और कवच—इन सबसे वह तन्त्रशास्त्र सम्पन्न हो। मेरे मन्त्र और कवचका निर्माण करके तुम उसका यत्नपूर्वक गोपन करो। जो मुझसे विमुख हों, उन्हें इसका उपदेश नहीं करना चाहिये। सैकड़ों और सहस्रोंमें कोई एक भी तो मेरा सच्चा उपासक होगा। वे भक्तजन ही मेरे मन्त्रसे पवित्र हों। यदि शंकर देवसभामें ऐसा शास्त्र निर्माण करनेके लिये सुदृढ़ प्रतिज्ञा करते हैं तो उन्हें तुरन्त ही मेरे दर्शन प्राप्त हो जायेंगे।'

आकाशवाणीके द्वारा इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीहरि चुप हो गये। उनकी वाणी सुनकर जगत्की व्यवस्था करनेवाले ब्रह्माने प्रसन्नतापूर्वक उसे भगवान् शंकरसे कहा। ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ तथा ज्ञानके अधिष्ठाता भगवान् शंकरने ब्रह्माकी बात सुननेके पश्चात् हाथमें गङ्गा-जल ले लिया और आज्ञापालन करनेके लिये प्रतिज्ञा कर ली। फिर तो वे भगवती जगदम्बाके मन्त्रोंसे सम्पन्न उत्तम तन्त्रशास्त्रके निर्माणमें लग गये। 'प्रतिज्ञापालन करनेके लिये मैं वेदके सारभूत महान् तन्त्रशास्त्रका निर्माण करूँगा'—यह विचार उनके हृदयमें गूँजने लगा। उन्होंने अपना विचार व्यक्त किया कि 'यदि कोई मनुष्य गङ्गाका जल हाथमें लेकर प्रतिज्ञा करेगा और फिर उस अपनी की हुई प्रतिज्ञाका पालन नहीं करेगा तो वह 'कालसूत्र' नामक नरकका भागी होगा और ब्रह्माकी पूरी आयुतक उसे वहाँ रहना पड़ेगा।'

ब्रह्मन् ! गोलोकमें देवताओंकी सभा जुड़ी थी। उसमें भगवान् शंकर जब इस प्रकारकी बात कह चुके, तब अकस्मात् परब्रह्म परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण भगवती श्रीराधाके साथ वहाँ प्रकट हो गये। उन पुरुषोत्तम भगवान् श्रीहरिके प्रत्यक्ष दर्शन करनेपर देवताओंकी प्रसन्नताकी सीमा नहीं रही। वे उनकी स्तुति करने लगे।

इसके बाद उपस्थित देवताओंने अत्यन्त आनन्दमें भरकर फिरसे उत्सव मनाया। तत्पश्चात् समयानुसार भगवान् शंकरने शास्त्रदीपका— शास्त्रीय मतको प्रकाशित करनेवाले सात्त्विक तन्त्रशास्त्रका निर्माण किया।

नारद ! इस प्रकार सम्पूर्ण परम गोप्य प्रसङ्ग मैं तुम्हें सुना चुका। यह सबके लिये अत्यन्त दुर्लभ है। वे ही पूर्णब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण जलरूप होकर गङ्गा बन गये थे। गोलोकसे प्रकट होनेवाली गङ्गाका यही रहस्य है। यों भगवान् श्रीराधाकृष्ण ही गङ्गाके रूपमें प्रकट हुए हैं।

श्रीराधा और श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट हुई यह गङ्गा भुक्ति और मुक्ति दोनोंको देनेवाली हैं। परमात्मा श्रीकृष्णकी व्यवस्थाके अनुसार जगह-जगह रहनेका सुअवसर इन्हें प्राप्त हो गया। श्रीकृष्णस्वरूपा इन आदरणीया गङ्गादेवीको सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके लोग पूजते हैं। (अध्याय १०)

प्रकृतिखण्ड १४९

श्रीराधाजीका गङ्गापर रोष, श्रीकृष्णके प्रति राधाका उपालम्भ, श्रीराधाके भयसे गङ्गाका श्रीकृष्णके चरणोंमें छिप जाना, जलाभावसे पीड़ित देवताओंका गोलोकमें जाना, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे राधाका प्रसन्न होना तथा गङ्गाका प्रकट होना, देवताओंके प्रति श्रीकृष्णका आदेश तथा गङ्गाके विष्णुपत्नी होनेका प्रसङ्ग

नारदजीने पूछा— सुरेश्वर! कलिके पाँच हजार वर्ष बीत जानेपर गङ्गाका कहाँ जाना होगा? महाभाग! यह प्रसङ्ग मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् नारायणने कहा— नारद! सरस्वतीके शापसे गङ्गा भारतवर्षमें आयीं। शापकी अवधि पूरी हो जानेपर वह पुनः भगवान् श्रीहरिकी आज्ञासे वैकुण्ठमें चली जायेंगी। ऐसे ही सरस्वती भारतवर्षको छोड़कर श्रीहरिके धाममें पधारेंगी। शाप समाप्त हो जानेपर लक्ष्मीका भी भगवान्‌के पास पधारना होगा। नारद! ये ही गङ्गा, सरस्वती और लक्ष्मी भगवान् श्रीहरिकी प्रेयसी पत्नियाँ हैं। ब्रह्मन्! तुलसीसहित चार पत्नियाँ वेदोंमें प्रसिद्ध हैं।

नारदजीने पूछा— भगवन्! भगवान् श्रीहरिके चरणकमलोंसे प्रकट हुई गङ्गादेवी किस प्रकार परब्रह्मके कमण्डलुमें रहीं तथा शंकरकी प्रिया होनेका सुअवसर उन्हें कैसे मिला? मुनिवर! गङ्गा भगवान् नारायणकी प्रेयसी भी हो चुकी हैं। अहो! किस प्रकार ये सभी बातें संघटित हुईं? आप यह रहस्य मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् नारायणने कहा— नारद! पूर्वकालमें जलमयी गङ्गा गोलोकमें विराजमान थीं। राधा और श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट हुई यह गङ्गा उनका अंश तथा उन्हींका स्वरूप हैं। द्रवकी अधिष्ठात्री देवीके रूपमें अत्यन्त सुन्दर रूप धारण करके भूमण्डलपर पधारीं। उस समय भूमण्डलमें उनके रूप-लावण्यकी कहीं तुलना नहीं थी। उनका शरीर नूतन यौवनसे सम्पन्न था। उनके सभी अङ्ग रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत थे। शरद्-ऋतुके मध्याह्नकालमें खिले हुए कमलकी भाँति उनका मुस्कानभरा मुख परम मनोहर था। उनकी आभा तपाये हुए सुवर्णके सदृश थी। तेजमें वह शरत्कालके चन्द्रमाको भी परास्त कर रही थीं। मनोहरसे भी मनोहर उनकी कान्ति थी। उन्होंने शुद्ध सात्त्विक स्वरूप धारण कर रखा था। विशाल दो नेत्र अनुपम शोभा बढ़ा रहे थे। अत्यन्त कटाक्षपूर्ण दृष्टिसे वे देख रही थीं। सुन्दर अलकावली शोभा बढ़ा रही थी। उसमें उन्होंने मालतीके पुष्पोंका मनोहर हार लगा रखा था। ललाटपर चन्दन-बिन्दुओंके साथ सिन्दूरकी सुन्दर बिंदी थी। दोनों मनोहर गण्डस्थलोंपर कस्तूरीसे पत्ररचनाएँ हुई थीं। नीचे उनका अधर-ओष्ठ इतना सुन्दर था मानो दुपहरियाका विकसित फूल हो। दाँतोंकी अत्यन्त उज्ज्वल पंक्ति पके हुए अनारके दानोंकी भाँति चमक रही थी। अग्नि-शुद्ध दो दिव्य वस्त्रोंको उन्होंने धारण कर रखा था। ऐसी वे गङ्गा लज्जाका भाव प्रदर्शित करती हुई भगवान् श्रीकृष्णके पास विराजमान हो गयीं। वे अञ्चलसे अपना मुँह ढककर निर्निमेष नेत्रोंसे भगवान्‌के मुखरूपी अमृतका निरन्तर प्रसन्नतापूर्वक पान कर रही थीं। उनका मुखमण्डल प्रसन्नतासे खिल रहा था। भगवान् श्रीकृष्णके रूपने उन्हें बेसुध तथा अत्यन्त पुलकायमान बना दिया था।

इतनेमें भगवती राधिका वहाँ पधारकर विराजमान हो गयीं। उस समय राधाके साथ असंख्य गोपियाँ थीं। राधाकी कान्ति ऐसी थी मानो करोड़ों चन्द्रमाओंकी ज्योत्स्ना एक साथ

२७- वैकुण्ठमें विष्णुके समक्ष आकर शंकरका उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम करना तथा ब्रह्मा और अत्यन्त भयभीत सूर्यद्वारा शंकरको प्रणाम-निवेदन

१५०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

प्रकट हो। वे उस समय क्रोधकी लीला करना चाहती थीं; अतः उनकी आँखें लाल कमलकी तुलना करने लगीं। उनका वर्ण पीले चम्पककी तुलना कर रहा था तथा उनकी चाल ऐसी थी मानो मतवाला गजराज हो। अमूल्य रत्नोंसे बने हुए नाना प्रकारके आभूषण उनके श्रीविग्रहकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके शरीरपर अमूल्य रत्नोंसे जटित दो दिव्य चिन्मय पीताम्बर शोभा पा रहे थे। भगवान् श्रीकृष्णके अर्घ्यसे सुशोभित चरणकमलोंको उन्होंने हृदयमें धारण कर रखा था। सर्वोत्तम रत्नोंसे बने हुए विमानसे उतरकर वे वहाँ पधारी थीं। ऋषिगण उनकी सेवामें संलग्न थे। स्वच्छ चँवर डुलाया जा रहा था। कस्तूरीके बिन्दुसे युक्त, चन्दनोंसे समन्वित, प्रज्वलित दीपकके समान आकारवाला बिन्दुरूपमें शोभायमान सिन्दूर उनके ललाटके मध्यभागमें शोभा पा रहा था। उनके सीमन्तका निचला भाग परम स्वच्छ था। पारिजातके पुष्पोंकी सुन्दर माला उनके गलेमें सुशोभित थी। अपनी सुन्दर अलकावलीको कँपाती हुई वे स्वयं भी कम्पित हो रही थीं। रोषके कारण उनके सुन्दर रागयुक्त ओष्ठ फड़क रहे थे। भगवान् श्रीकृष्णके पास जाकर वे सुन्दर रत्नमय सिंहासनपर विराजित हो गयीं। उनको पधारे देखकर भगवान् श्रीकृष्ण उठ गये और कुछ हँसकर आश्चर्य प्रकट करते हुए मधुर वचनोंमें उनसे बातचीत करने लगे।

उस समय गोपोंके भयकी सीमा नहीं रही। नम्रताके कारण कंधे झुकाकर उन्होंने भगवती राधिकाको प्रणाम किया और वे उनकी स्तुति करने लगे। परब्रह्म श्रीकृष्णने भी राधिकाकी स्तुति की। गङ्गा भी तुरंत उठ गयीं और उन्होंने राधाका स्तवन किया। उनके हृदयमें भय छा गया था। अत्यन्त विनय प्रकट करते हुए उन्होंने राधासे कुशल पूछी। वे डरकर नीचे खड़ी हो गयीं। उन्होंने ध्यानके द्वारा मन-ही-मन श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी शरण ली। गङ्गाके हृदयस्थित कमलके आसनपर विराजमान भगवान् श्रीकृष्णने उस समय डरी हुई गङ्गाको आश्वासन दिया। इस प्रकार सर्वेश्वर श्रीकृष्णसे वर पाकर देवी गङ्गा स्थिरचित्त हो सकीं। अब गङ्गाने देखा, देवी राधिका ऊँचे सिंहासनपर बैठी हैं। उनका रूप परम मनोहर है। वे देखनेमें बड़ी सुखप्रद हैं। ब्रह्मतेजसे उनका श्रीविग्रह प्रकाशमान हो रहा है। वे सनातनी देवी सृष्टिके आदिमें असंख्य ब्रह्माओंको रचती हैं। उनकी अवस्था सदा बारह वर्षकी रहती है। अभिनव यौवनसे उनका विग्रह परम शोभा पाता है। अखिल विश्वमें उनके सदृश रूपवती और गुणवती कोई भी नहीं है। वे परम शान्त, कमनीय, अनन्त, परम साध्वी तथा आदि-अन्त-रहित हैं। उन्हें 'शुभा', 'सुभद्रा' और 'सुभगा' कहा जाता है। अपने स्वामीके सौभाग्यसे वे सदा सम्पन्न रहती हैं। सम्पूर्ण स्त्रियोंमें वे श्रेष्ठ हैं तथा परम सौन्दर्यसे सुशोभित हैं। उन्हें भगवान् श्रीकृष्णकी अर्द्धाङ्गिनी कहा जाता है। तेज, अवस्था और प्रकाशमें वे भगवान् श्रीकृष्णके ही समान हैं। लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने लक्ष्मीको साथ लेकर उन महालक्ष्मीकी उपासना की है। परमात्मा श्रीकृष्णकी समुज्ज्वल सभाको ये अपनी कान्तिसे सदा आच्छादित करती हैं। सखियोंका दिया हुआ दुर्लभ पान उनके मुखमें शोभा पा रहा है। वे स्वयं अजन्मा होती हुई भी अखिल जगत्की जननी हैं। उनकी कीर्ति और प्रतिष्ठा विश्वमें सर्वत्र विस्तृत है। वे भगवान् श्रीकृष्णके प्राणोंकी साक्षात् अधिष्ठात्री देवी हैं। उन परम सुन्दरी देवीको भगवान् प्राणोंसे भी अधिक प्रिय मानते हैं।

नारद ! रासेश्वरी श्रीराधाकी इस अनुपम झाँकीको देखकर गङ्गाका मन तृप्त न हो सका। वे निर्निमेष नेत्रोंसे निरन्तर राधा-सौन्दर्य-सुधाका पान करती रहीं। मुने ! इतनेमें राधाने मधुर वाणीमें