ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५७८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण दिव्य जलराशि ही देवनदी गङ्गाके नामसे प्रख्यात हुई। वह मुमुक्षुओंको मोक्ष और भक्तोंको हरि- भक्ति प्रदान करनेवाली है। उसका स्पर्श करके आयी हुई वायुके सम्पर्कसे भी पापियोंके करोड़ों जन्मोंके नानाविध पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। प्राणेश्वरि ! देवनदीके साक्षात् दर्शन तथा स्पर्शका क्या फल होगा—यह मैं भी नहीं जानता; फिर उसके जलमें स्नान करनेसे प्राप्त होनेवाले पुण्यके विषयमें तो कहना ही क्या है ? उसकी महिमाका सम्यक् निरूपण असम्भव है। पृथ्वीपर 'पुष्कर' को सब तीर्थोंसे उत्तम बताया गया है। वेदोंने उसे सर्वश्रेष्ठ कहा है; परंतु वह भी इस (गङ्गा)-की सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है। राजा भगीरथ इस देवनदीको भूतलपर लाये थे, इसलिये यह 'भागीरथी' नामसे प्रसिद्ध हुई। सुरधुनी अपने स्रोतके अंशसे पृथ्वीपर आयी थी; अतः 'गां गता' इस व्युत्पत्तिके अनुसार उसका 'गङ्गा' नाम प्रसिद्ध हुआ। इसके जलपर क्रोध होनेके कारण महात्मा जह्नुने इस नदीको अपने जानुओं (घुटनों)-द्वारा ग्रहण कर लिया था। फिर उनकी कन्यारूपसे इसका प्राकट्य हुआ; अतः इसका दूसरा नाम 'जाह्नवी' है। वसुके अवतार भीष्म इसके गर्भसे उत्पन्न हुए थे, इस कारण यह 'भीष्मसू' (भीष्मजननी) कहलाती है। गङ्गा मेरी आज्ञासे तीन धाराओंद्वारा स्वर्ग, पृथ्वी तथा पातालमें गयी है; अतः 'त्रिपथगा' कही जाती है। इसकी प्रमुख धारा स्वर्गमें है। वहाँ इसे 'मन्दाकिनी' कहते हैं। स्वर्गमें इसका पाट एक योजन चौड़ा है और यह दस हजार योजनकी दूरीमें प्रवाहित होती है। इसका जल दूधके समान स्वच्छ एवं स्वादिष्ट है तथा इसमें सदा ऊँची-ऊँची लहरें उठती रहती हैं। वैकुण्ठसे यह ब्रह्मलोकमें और वहाँसे स्वर्गमें आयी है। स्वर्गसे चलकर हिमालयके शिखरपर होती हुई यह प्रसन्नतापूर्वक पृथ्वीपर उतरी है। इसकी उस धाराका नाम 'अलकनन्दा' है। यह क्षार-समुद्रमें जाकर मिली है। इसकी जलराशि शुद्ध स्फटिकके समान स्वच्छ तथा अत्यन्त वेगवती है। यह पापियोंके पापरूपी सूखे काठको जलानेके लिये अग्निरूपिणी है। इसीने राजा सगरके पुत्रोंको निर्वाणमोक्ष प्रदान किया है। यह वैकुण्ठधामतक जानेके लिये श्रेष्ठ सोपान है। यदि मृत्युकालमें पहले पुण्यात्मा सत्पुरुषोंके चरणोंको धोकर उस चरणोदकको मुमूर्षु मनुष्यके मुखमें दिया जाय तो उसे गङ्गाजल पीनेका पुण्य होता है। ऐसे पुण्यात्मा सत्पुरुष गङ्गारूपी सोपानपर आरूढ़ हो निरामयपद (वैकुण्ठधाम)- को प्राप्त होते हैं। वे ब्रह्मलोकतकको लाँघकर विमानपर बैठे हुए निर्बाध गतिसे ऊपरके लोक (वैकुण्ठ)-में चले जाते हैं। यदि दैववश पूर्वकर्मके प्रभावसे पापी पुरुष गङ्गामें डूब जायँ तो वे शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतने दिव्य वर्षोंतक भगवद्धाममें सानन्द निवास करते हैं। तदनन्तर उन्हें निश्चय ही अपने पाप-पुण्यका फल भोगना पड़ता है। परंतु वह भोग स्वल्पकालमें ही पूरा हो जाता है; तत्पश्चात् भारतवर्षमें पुण्यवानोंके घरमें जन्म ले निश्चल भक्ति पाकर वे भगवत्स्वरूप हो जाते हैं। जो शुद्धिके लिये यात्रा करके देवेश्वरी गङ्गामें नहानेके लिये जाता है, वह जितने पग चलता है, उतने वर्षोंतक अवश्य ही वैकुण्ठधाममें आनन्द भोगता है। यदि आनुषङ्गिकरूपसे भी गङ्गाको पाकर कोई पापयुक्त मनुष्य उसमें स्नान करता है तो वह उस समय सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। यदि वह फिर पापमें लिप्त न हो तो निष्पाप ही रहता है। कलियुगमें पाँच हजार वर्षोंतक भारतवर्षमें गङ्गाकी साक्षात् स्थिति है। उसके विद्यमान होते हुए कलिका क्या प्रभाव रह सकता है ? कलिमें दस हजार वर्षोंतक मेरी प्रतिमाएँ तथा पुराण रहते हैं। उनके होते हुए वहाँ कलिका प्रभाव क्या हो सकता है ?
दहन तथा पार्वतीको तपस्याद्वारा शिवकी प्राप्ति
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५७९
गङ्गाकी जो धारा पाताललोकको जाती है, उसका नाम भोगवती है। वह सदा दुग्ध-फेनके समान स्वच्छ तथा अत्यन्त वेगवती है। अमूल्य रत्नों तथा श्रेष्ठ मणियोंकी वह सदा खान बनी रहती है। सुस्थिर यौवनवाली नागकन्याएँ उसके तटपर सदा ही क्रीड़ा करती हैं। स्वयं देवी गङ्गा वैकुण्ठको चारों ओरसे घेरकर सदा प्रवाहित होती रहती हैं। मेरी इस पुत्रीका विनाश प्रलयकालमें भी नहीं होता। उसका परम मनोहर दिव्य तट नाना रत्नोंकी खान है। इस प्रकार गङ्गाके जन्मका सारा पुण्यदायक प्रसङ्ग मैंने कह सुनाया। अब ब्रह्माजीको मोहिनीके शापसे किस प्रकार छुटकारा मिला, यह सुनो।
(अध्याय ३४)
गङ्गा-स्नानसे ब्रह्माजीको मिले हुए शापकी निवृत्ति, गोलोकमें ब्रह्माजीको भारतीकी प्राप्ति, भारतीसहित ब्रह्माका अपने लोकमें प्रवेश, भगवान् शिवके दर्पभङ्गकी कथा, वृकासुरसे उनकी रक्षा, श्रीराधिकाके पूछनेपर श्रीकृष्णके द्वारा शिवके तत्त्व-रहस्यका निरूपण
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— प्रिये! तदनन्तर सबने गङ्गाको देखकर मेरी माया मानी। उस समय नारायणने कृपापूर्वक ब्रह्माजीसे कहा।
श्रीनारायण बोले— चतुर्मुख! उठो, जाओ, तुम्हारा कल्याण होगा। तुम्हें शाप लगा है; अतः मेरी आज्ञासे इस गङ्गामें स्नान करके पवित्र हो जाओ। यद्यपि तुम स्वयं पवित्र हो और वे समस्त तीर्थ तुम वैष्णवपतिका स्पर्श प्राप्त करना चाहते हैं, तथापि प्रकृतिकी अवहेलना करने (हँसी उड़ाने)-से तुम्हें शाप मिला है। अहंकार सभीके लिये पापोंका बीज और अमङ्गलकारी होता है। तुम शीघ्र मेरे परात्पर धाम गोलोकको जाओ। वहाँ प्रकृतिकी अंशरूपा मङ्गलदायिनी भारतीको पाओगे। कल्याण-सृष्टिकी बीजरूपिणी प्रकृतिको अपनाओ। अहो! तुमने एक कल्पतक तप किया है तो भी इस समय एक अप्सराके शापसे कोई भी तुम्हारे मन्त्रको नहीं ग्रहण करते हैं। अन्य देवताओंकी पूजामें भी तुम्हारी ही पूजा होगी; क्योंकि तुम्हीं जगत्के धारण-पोषण करनेवाले, स्वात्माराम, सर्वरूपी तथा सब ओर समस्त देहोंमें पूजास्वरूप हो।
उस समय मेरी आज्ञा मानकर जगद्गुरु ब्रह्माने गङ्गाके जलमें स्नान किया और मुझे प्रणाम करके वे शीघ्र ही गोलोकको चले गये। फिर समस्त देवता और मुनि भी प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानको लौट गये। वे बारंबार मेरे परम निर्मल यशका गान कर रहे थे। ब्रह्माजीने गोलोकमें जाकर मेरे मुखारविन्दसे निर्गत, सम्पूर्ण विद्याओंकी अधिदेवी सती भारतीको प्राप्त किया। वागीश्वरी भारतीको पाकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन त्रिभुवनमोहिनी देवीको प्राप्त करके मुझे प्रणाम करनेके अनन्तर वे लौट आये। ब्रह्मलोकके निवासियोंने उन भारतीदेवीको देखा। वे कौतूहलसे भरी हुई, परम सुन्दरी, रमणीया तथा श्वेतवर्णा थीं। उनके मुखपर मन्द मुसकानकी प्रभा फैल रही थी। मुख शरद् ऋतुके चन्द्रमाको लज्जित कर रहा था। नेत्र शरद्-ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंके समान जान पड़ते थे। दीप्तिमान् ओष्ठ और अधरपल्लव पके बिम्बफलकी प्रभाको छीने लेते थे। मुक्तापंक्तिकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाली दन्तपंक्तियोंसे उनके मुखकी मनोहरता बढ़ गयी थी। रत्ननिर्मित केयूर-कंगन हाथोंकी और रत्नोंके नूपुर चरणोंकी शोभा बढ़ाते थे। रत्नमय युगल कुण्डलोंसे कानोंके नीचेके भाग झलमला रहे थे।
५८० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
रत्नेन्द्रसारनिर्मित हारसे उनका वक्षःस्थल अत्यन्त प्रकाशमान दिखायी देता था। वे अग्निशुद्ध सूक्ष्म वस्त्र धारण करके नूतन यौवनसे सम्पन्न एवं अत्यन्त कमनीय दृष्टिगोचर होती थीं। उनके दो हाथोंमें वीणा और पुस्तक तथा अन्य हाथोंमें व्याख्याकी मुद्रा देखी जाती थी। ब्रह्मलोकवासियोंने उनपर प्रिय वस्तुएँ निछावर करके परम मङ्गलमय उत्सव मनाया और ब्रह्मा तथा भारतीको वे सानन्द पुरीके भीतर ले गये।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिये! ब्रह्माण्डोंमें जिन-जिन लोगोंको अपनी शक्तिपर गर्व होता है, उनके उस गर्व या अभिमानको जानकर मैं ही उनपर शासन करता हूँ—उनके घमंडको चूर कर देता हूँ; क्योंकि मैं सबका आत्मा और परात्पर परमेश्वर हूँ; पहले ब्रह्माके गर्वको जो मैंने चूर्ण किया था, वह प्रसङ्ग तो तुमने सुन लिया। अब शंकर, पार्वती, इन्द्र, सूर्य, अग्नि, दुर्वासा तथा धन्वन्तरिके अभिमान-भञ्जनका प्रसङ्ग क्रमशः सुनाता हूँ, सुनो। प्रिये! छोटे-बड़े जो भी लोग हैं, उनके इस तरहके गर्वको मैं अवश्य चूर्ण कर देता हूँ। स्वयं शिव मेरे अंश हैं, जगत्के संहारक हैं और मेरे समान ही तेज, ज्ञान तथा गुणसे परिपूर्ण हैं। प्रिये! योगीलोग उनका ध्यान करते हैं। वे योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु हैं तथा ज्ञानानन्दस्वरूप हैं। उनकी कथा कहता हूँ, सुनो। साठ सहस्र युगोंतक दिन-रात तपस्या करके मेरी कलासे पूर्ण भगवान् शिव तप और तेजमें मेरे समान हो गये। सनातन तेजकी राशि हो गये। उनमें करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाश प्रकट हुआ। वे भक्तोंकी मनोवाञ्छा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षरूप हो गये। योगीन्द्रगण दीर्घकालतक उनके तेजका ध्यान करते-करते उसके भीतर अत्यन्त सुन्दर स्वरूपका साक्षात्कार करने लगते हैं। उनकी अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल है। वे पाँच मुखोंसे सुशोभित होते हैं और उनके प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र शोभा पाते हैं। हाथोंमें त्रिशूल और पट्टिश हैं। कटिभागमें व्याघ्रचर्ममय वस्त्र शोभा पाता है। वे श्वेत कमलके बीजकी मालासे स्वयं ही अपने-आपका—अपने मन्त्रोंका जप करते हैं। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी छटा छायी रहती है। वे परात्पर शिव मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट तथा सुनहरे रंगकी जटाओंका भार धारण करते हैं। उनका स्वरूप शान्त है। वे तीनों लोकोंके स्वामी तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर रहनेवाले हैं। अपने-आपको परमेश्वर मानकर समस्त सम्पत्तियोंके दाता होकर कल्पवृक्षके समान सबको सारी मनोवाञ्छित वस्तुएँ देते हैं। जो जिस वस्तुकी इच्छा करता है, उसे वही वर देकर वे समस्त वरोंके स्वामी हो गये हैं। इस प्रकार स्वात्माराम शिव अपनी ही लीलासे अभिमानको अपनाकर गर्वयुक्त हो गये।
एक समयकी बात है। वृक नामक दैत्यने शिवके केदारतीर्थमें एक वर्षतक दिन-रात कठोर तपस्या की। कृपानिधान शिव प्रतिदिन कृपापूर्वक अभीष्ट वर देनेके लिये उसके पास जाते थे; परंतु वह असुर किसी दिन भी वर नहीं ग्रहण करता था; वर्ष पूर्ण होनेपर भगवान् शंकर निरन्तर उसके सामने उपस्थित रहने लगे। वे भक्ति-पाशसे बँधकर वर देनेके लिये उद्यत हो क्षणभर भी वहाँसे अन्यत्र न जा सके। सम्पूर्ण ऐश्वर्य, समस्त सिद्धि, भोग, मोक्ष तथा श्रीहरिका पद—यह सब कुछ भगवान् शूलपाणि देना चाहते थे; परंतु उस दैत्यने कुछ भी ग्रहण नहीं किया। वह केवल उनके चरणकमलोंका ध्यान करता रहा। जब ध्यान टूटा, तब उस दैत्यराजने अपने सामने साक्षात् शिवको देखा, जो सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता हैं। उनकी ही मायासे प्रेरित हो वृकने भक्तिपूर्वक यह वर माँगा कि 'प्रभो! मैं जिसके माथेपर हाथ रख दूँ, वह जलकर भस्म हो
··· श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५८१
जाय।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर जाते हुए भगवान् शिवके पीछे वह दैत्यराज दौड़ा। फिर तो मृत्युञ्जय शंकर मृत्युके भयसे त्रस्त होकर भागे। उनका डमरू गिर पड़ा। मनोहर व्याघ्रचर्मकी भी यही दशा हुई। वे दिगम्बर होकर दानवके भयसे दसों दिशाओंमें भागने लगे। वे चाहते तो उसे मार डालते; परंतु भक्तवत्सल जो ठहरे। अतः भक्तपर कृपा करके उसे मारते नहीं थे। साधु पुरुष दुष्टके अनुसार बर्ताव कदापि नहीं करते हैं। भगवान् शिव उसे समझा भी न सके। उन्होंने कृपापूर्वक उसे अपना स्वरूप ही माना; क्योंकि उनकी सर्वत्र समान दृष्टि थी। शिव उसे अपनी मृत्यु मानकर भयभीत हो उठे। उनका अहंकार गल गया। भद्रे! मुझे याद करते हुए उन्होंने मेरी ही शरण ली। उस समय मुझे अपने आश्रमपर आते देख उन्हें कुछ धैर्य मिला। उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे और वे भयसे विह्वल हो 'हे हरे! रक्षा करो, रक्षा करो'— इसका जप कर रहे थे। तब मैंने उस दैत्यको अपने पास बिठाकर समझाया और सब समाचार पूछा। पूछनेपर उसने सब बातें क्रमशः बतायीं। उस समय मेरी आज्ञासे वह असुर तुरंत मायाद्वारा ठगा गया। (मैंने उसको यह कहकर मोहमें डाल दिया कि तुम अपने सिरपर हाथ रखकर परीक्षा तो करो कि यह बात सत्य है या नहीं।) उसने अपने मस्तकपर हाथ रखा और तत्काल जलकर भस्म हो गया। तब सिद्ध, सुरेन्द्र, मुनीन्द्र और मनु प्रसन्नतापूर्वक उत्तम भक्तिभावसे मेरी स्तुति करने लगे और शिवजी लज्जित हो गये। उनका गर्व चूर्ण हो गया। फिर मैंने उन्हें समझाया और वे अपने स्थानको गये।
इसी तरह गर्वमें भरे हुए रुद्र भयानक असुर त्रिपुरका वध करनेके लिये गये। वे मन-ही-मन यह समझकर कि 'मैं तो समस्त लोकोंका संहारक हूँ, फिर मेरे सामने इस पतिंगेके समान दैत्यकी क्या बिसात है?' युद्धक्षेत्रमें गये। उस समय उन्होंने मेरे दिये हुए त्रिशूल तथा श्रेष्ठ कवचको साथ नहीं लिया था। उनका त्रिपुरके साथ एक वर्षतक दिन-रात युद्ध होता रहा; किंतु कोई भी किसीपर विजय नहीं पा सका। समराङ्गणमें दोनों समान सिद्ध हुए। प्रिये! पृथ्वीपर युद्ध करके दैत्यराज मायासे बहुत ऊँचाईपर पचास करोड़ योजन ऊपर उठ गया। साथ ही विश्वनाथ शंकर भी उस दैत्यका वध करनेके लिये तत्काल ऊपरको उठे। वहाँ निराधार स्थानपर एक मासतक युद्ध चलता रहा। भयानक संग्राम हुआ। अन्तमें शिवको उठाकर उस दैत्यने भूतलपर दे मारा। रथसहित रुद्रके धराशायी हो जानेपर देवर्षिगण भयभीत हो मेरी स्तुति करने लगे और बार-बार बोले—'श्रीकृष्ण! रक्षा करो, रक्षा करो।' भयका कारण उपस्थित हुआ जान शिवने निर्भयतापूर्वक मेरा ही स्मरण किया। उन्होंने संकटकालमें मेरे ही दिये हुए स्तोत्रसे भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन किया। उस समय अपनी कलाद्वारा शीघ्र ही वृषभरूप धारण करके मैंने सोते शंकरको सींगोंसे उठाया और उन्हें अपना कवच तथा शत्रुर्मदन शूल दिया। उसे पाकर उन्होंने दानवोंके उस अत्यन्त ऊँचे स्थान त्रिपुरको, जो आकाशमें निराधार टिका हुआ था, मेरे दिये हुए शूलसे नष्ट कर दिया। इसके बाद शिवने मुझ दर्पहन्ताका ही बारंबार लज्जापूर्वक स्तवन किया। दैत्यराज त्रिपुर उसी क्षण चूर-चूर होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। यह देख सब देवता और मुनि प्रसन्नतापूर्वक शिवजीकी स्तुति करने लगे। तबसे भगवान् शंकरने विघ्नके बीजस्वरूप दर्पको त्याग दिया। वे ज्ञानानन्दस्वरूपसे स्थित हो सब कर्मोंमें निर्लिप्तभावसे संलग्न रहने लगे। तदनन्तर मैं अपने प्रिय भक्त शंकरको वृषरूपसे पीठपर वहन करने लगा; क्योंकि तीनों लोकोंमें शिवसे बढ़कर प्रियतम मेरे लिये दूसरा
३४- पार्वतीकी तपस्या, उनके तपके प्रभावसे अग्निका शीतल होना, ब्राह्मण-बालकका रूप धारण करके आये हुए शिवके साथ उनकी बातचीत, पार्वतीका घरको लौटना और माता-पिता आदिके द्वारा उनका सत्कार, भिक्षुवेशधारी शंकरका आगमन, शैलराजको उनके विविध रूपोंके दर्शन, उनकी शिव-भक्तिसे देवताओंको चिन्ता, उनका बृहस्पतिजीको शिव-निन्दाके लिये उकसाना तथा बृहस्पतिका देवताओंको शिव-निन्दाके दोष बताकर तपस्याके लिये जाना
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कोई नहीं है$^१$। ब्रह्मा मेरे मनस्वरूप, महेश्वर मेरे ज्ञानरूप और मूलप्रकृति ईश्वरी भगवती दुर्गा मेरी बुद्धिरूपा हैं। निद्रा आदि जो-जो शक्तियाँ हैं, वे सब-की-सब प्रकृतिकी कलाएँ हैं। साक्षात् सरस्वती मेरी वाणीकी अधिष्ठात्री देवी हैं। कल्याणके अधिदेवता गणेशजी मेरे हर्ष हैं। स्वयं धर्म परमार्थ है तथा अग्निदेव मेरे भक्त हैं; गोलोकके सम्पूर्ण निवासी मेरे समस्त ऐश्वर्यके अधिदेवता हैं। तुम सदा मेरे प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी एवं प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हो। गोपाङ्गनाएँ तुम्हारी कलाएँ हैं; अतएव मुझे प्यारी हैं। गोलोकनिवासी समस्त गोप मेरे रोमकूपसे उत्पन्न हुए हैं$^२$। सूर्य मेरे तेज और वायु मेरे प्राण हैं। वरुण जलके अधिदेवता तथा पृथ्वी मेरे मलसे प्रकट हुई है। मेरे शरीरका शून्यभाग ही महाकाश कहा गया है। कामकी उत्पत्ति मेरे मनसे हुई है। इन्द्र आदि सब देवता मेरी कलाके अंशांशसे प्रकट हुए हैं। सृष्टिके बीजरूप जो महत् आदि तत्त्व हैं, उन सबका बीजरूप आश्रयहीन आत्मा मैं स्वयं ही हूँ। कर्मभोगका अधिकारी जीव मेरा प्रतिबिम्ब है। मैं साक्षी और निरीह हूँ। किसी कर्मका भोगी नहीं हूँ। मुझ स्वेच्छामय परमेश्वरका यह शरीर भक्तोंके ध्यानके लिये है। एकमात्र परात्पर परमेश्वर मैं ही प्रकृति हूँ और मैं ही पुरुष हूँ।
श्रीराधिकाने पूछा—भगवन्! आप सब तत्त्वोंके ज्ञाता, सबके बीज और सनातन पुरुष हैं। समस्त संदेहोंका निवारण करनेवाले प्रभो! मेरे अभीष्ट प्रश्नका समाधान कीजिये। भगवान् शंकर सम्पूर्ण ज्ञानोंके अधिदेवता, समस्त तत्त्वोंके ज्ञाता, मृत्युञ्जय, कालके भी काल तथा आपके ही तुल्य महान् हैं। फिर वे अपने सारे अङ्गोंमें विभूति क्यों लगाते हैं? पञ्चमुख और त्रिलोचन क्यों कहलाते हैं? दिगम्बर और जटाधारी क्यों हैं? सर्प-समुदायसे क्यों विभूषित होते हैं? वे देवेन्द्र श्रेष्ठ वाहन छोड़कर वृषभके द्वारा क्यों भ्रमण करते हैं? रत्नसारनिर्मित आभूषण क्यों नहीं धारण करते हैं? अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्रको त्यागकर व्याघ्रचर्म क्यों पहनते हैं? पारिजात छोड़कर धतूरेके फूल क्यों धारण करते हैं? उन्हें मस्तकपर रत्नमय किरीट धारण करनेकी इच्छा क्यों नहीं होती? जटापर ही उनकी अधिक प्रीति क्यों है? दिव्यलोक छोड़कर उन प्रभुको श्मशानमें रहनेकी अभिलाषा क्यों होती है? चन्दन, अगुरु, कस्तूरी तथा सुगन्धित पुष्पोंको छोड़कर वे बिल्वपत्र तथा बिल्व-काष्ठके अनुलेपनकी स्पृहा क्यों रखते हैं? मैं यह सब जानना चाहती हूँ। प्रभो! आप विस्तारके साथ इसका वर्णन करें। नाथ! इसे सुननेके लिये मेरे मनमें कौतूहल बढ़ रहा है। इच्छा जाग उठी है।
राधिकाकी यह बात सुनकर मधुसूदनने हँसते हुए उन्हें अपने समीप बिठा लिया और कथा कहना आरम्भ किया।
श्रीकृष्ण बोले—प्रिये! पूर्णतम महेश्वरने साठ हजार युगोंतक तप करते हुए मनके द्वारा सानन्द मेरा ध्यान किया। तत्पश्चात् वे तपस्यासे विरत हो गये। इसी बीच उन्होंने मुझे अपने सामने खड़ा देखा। अत्यन्त कमनीय अङ्ग, किशोर अवस्था और परम उत्तम श्यामसुन्दर रूप—सब कुछ अनिर्वचनीय था। मेरे उस रूपको देखकर त्रिलोचनके लोचन तृप्त न हो सके। वे एकटक नेत्रोंसे देखते रहे तथा भक्तिके उद्रेकसे
१. ततोऽहं वृषरूपेण वहामि तेन तं प्रियम्। मम प्रियतमो नास्ति त्रैलोक्येषु शिवात्परः॥
(३६। ५७)
२. गोपाङ्गनास्तव कला अतएव मम प्रियाः। मल्लोमकूपजा गोपाः सर्वे गोलोकवासिनः॥
(३६। ६२)
९१- ब्राह्मणबालकका रूप धारणकर शंकरजीका तपस्या करती हुई पार्वतीके पास आना और उनसे बातचीत
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५८३ प्रेम-विह्वल हो महाभक्त शिव रोने लगे। उन्होंने सोचा, सहस्रमुख शेषनाग तथा चतुर्मुख ब्रह्मा बड़े भाग्यवान् हैं, जिन्होंने बहुसंख्यक नेत्रोंसे भगवान्के मनोहर रूपका दर्शन करके अनेक मुखोंसे उनकी स्तुति की है। मैं ऐसे स्वामीको पाकर दो ही नेत्रोंसे इनके रूपको क्या देखूँ और एक ही मुखसे इनकी क्या स्तुति करूँ? इस बातको उन्होंने चार बार दोहराया। तपस्वी शंकरके मन-ही-मन इस प्रकार संकल्प करनेपर उनके चार मुख और प्रकट हो गये तथा पहलेके मुखको लेकर पञ्चम संख्याकी ही पूर्ति हो गयी। उनका एक-एक मुख तीन-तीन नेत्रोंसे सुशोभित होने लगा; इसलिये वे पञ्चमुख और त्रिलोचन नामसे प्रसिद्ध हुए। शिवकी स्तुतिकी अपेक्षा मेरे रूपके दर्शनमें ही अधिक प्रेम है; इसलिये उनके नेत्र ही अधिक प्रकट हुए। उन ब्रह्मस्वरूप शिवके वे तीन नेत्र सत्त्व, रज तथा तम नामक तीन गुणरूप हैं; इसका कारण सुनो। भगवान् शिव सात्त्विक अंशवाली दृष्टिसे देखते हुए सात्त्विक जनोंकी, राजस दृष्टिसे राजसिक लोगोंकी तथा तामस दृष्टिसे तमोगुणी लोगोंकी रक्षा करते हैं। संहारकर्ता हरके ललाटवर्ती तामस नेत्रसे पीछे चलकर संहारकालमें क्रोधपूर्वक संवर्तक अग्निका आविर्भाव होता है। वे अग्निदेव करोड़ों ताड़ोंके बराबर ऊँचे, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान तथा विशाल लपटोंसे युक्त हो अपनी जीभ लपलपाते हुए तीनों लोकोंको दग्ध कर देनेमें समर्थ हैं। भगवान् शंकर सतीके दाह-संस्कारजनित भस्मको लेकर अपने अङ्गोंमें मलते हैं। इसलिये 'विभूतिधारी' कहे जाते हैं। सतीके प्रति प्रेमभावके कारण ही वे उनकी हड्डियोंकी माला और भस्म धारण करते हैं। यद्यपि शिव स्वात्माराम हैं, तथापि उन्होंने पूरे एक सालतक सतीके शवको लेकर चारों ओर घूमते हुए रोदन किया था। सतीका एक-एक अङ्ग जहाँ-जहाँ गिरा, वहाँ- वहाँ सिद्धपीठ हो गया, जो मन्त्रोंकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है। राधिके! तदनन्तर अवशिष्ट शवको छातीसे लगाकर वे मूर्च्छित हो सिद्धक्षेत्रमें गिर पड़े। तब मैंने महेश्वरके पास जा उन्हें गोदमें ले सचेत किया और शोकको हर लेनेवाले परम उत्तम दिव्य तत्त्वका उपदेश दिया। उस समय शिव संतुष्ट हो अपने लोकको पधारे और अपनी ही दूसरी मूर्ति कालके द्वारा उन्होंने अपनी प्रिया सतीको प्राप्त कर लिया। वे योगस्थ होनेके कारण दिगम्बर हैं। उन नित्य परमेश्वरमें इच्छाका सर्वथा अभाव है। उनके सिरपर जो जटाएँ हैं, वे तपस्या-कालकी हैं, जिन्हें वे आज भी विवेकपूर्वक धारण करते हैं। योगीको केशोंका संस्कार करने (बालोंको सँवारने) तथा शरीरको वेश-भूषासे विभूषित करनेकी इच्छा नहीं होती। उसका चन्दन और कीचड़में तथा मिट्टीके ढेले और श्रेष्ठ मणिरत्नमें भी समभाव होता है। गरुड़से द्वेष रखनेवाले सर्प भगवान् शंकरकी शरणमें गये। उन्हीं शरणागतोंको वे कृपापूर्वक अपने शरीरमें धारण करते हैं। उनका वृषभरूप वाहन तो मैं स्वयं हूँ। दूसरा कोई भी उनका भार वहन करनेमें समर्थ नहीं है। पूर्वकालमें त्रिपुरके वधके समय मेरे कलांशसे उस वृषभकी उत्पत्ति हुई। पारिजात आदि पुष्प तथा चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थ वे शिव मुझको अर्पित कर चुके हैं; इसलिये उनमें उनकी कभी प्रीति नहीं होती। धतूर, बिल्वपत्र, बिल्व-काष्ठका अनुलेपन, गन्धहीन पुष्प तथा व्याघ्रचर्म योगियोंको अभीष्ट हैं। इसलिये उनमें उनकी सदा प्रीति रहती है। दिव्य लोकमें, दिव्य शय्यामें और जनसमुदायमें उनका मन नहीं लगता है; इसलिये वे अत्यन्त एकान्त श्मशानमें रहकर दिन-रात मेरा ध्यान किया करते हैं। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त प्रत्येक प्राणीको भगवान् शिव समान समझते हैं। केवल मेरे इस अनिर्वचनीय रूपमें ही उनका मन निरन्तर लगा
५८४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण रहता है। ब्रह्माजीका पतन हो जानेपर भी शूलपाणि शंकरका क्षय नहीं होता। उनकी आयुका प्रमाण मैं भी नहीं जानता, फिर श्रुति क्या जानेगी ? मृत्युञ्जय शिव ज्ञानस्वरूप हैं। वे मेरे तेजके समान शूल धारण करते हैं। मेरे बिना कोई भी शंकरको जीत नहीं सकता। शंकर मेरे परम आत्मा हैं। शिव मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर हैं। उन त्रिलोचनमें मेरा मन सदा लगा रहता है। भगवान् भवसे बढ़कर मेरा प्रिय और कोई नहीं है। राधे ! मैं गोलोक और वैकुण्ठमें नहीं रहता। तुम्हारे वक्षमें भी वास नहीं करता। मैं तो सदाशिवके प्रेमपाशमें बँधकर उन्हींके हृदयमें निरन्तर निवास करता हूँ*। शंकर अपने पाँच मुखोंद्वारा मीठी तानके साथ सदा मेरी गाथाका स्वरसिद्ध गान किया करते हैं। इसलिये मैं उनके समीप रहता हूँ। वे योगद्वारा भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे ब्रह्माण्ड-समुदायकी सृष्टि और संहार करनेमें समर्थ हैं। शंकरसे बढ़कर दूसरा कोई योगी नहीं है। जो अपने दिव्य ज्ञानसे भ्रूभङ्ग-लीलाद्वारा नष्ट हुए मृत्यु और काल आदिकी पुनः सृष्टि करनेमें समर्थ हैं; उन शंकरसे बढ़कर कोई ज्ञानी नहीं है। वे मेरी भक्ति, दास्यभाव, मुक्ति, समस्त सम्पत्ति तथा सम्पूर्ण सिद्धिको भी देनेमें समर्थ हैं; अतः शंकरसे बढ़कर कोई दाता नहीं है। वे पाँच मुखोंसे दिन- रात मेरे नाम और यशका गान करते हैं और निरन्तर मेरे स्वरूपका ध्यान करते रहते हैं; अतः शंकरसे बढ़कर कोई भक्त नहीं है। मैं, सुदर्शनचक्र तथा शिव-ये तीनों समान तेजस्वी हैं। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भी योग और तेजमें हम लोगोंकी समानता नहीं करते हैं। प्रिये ! इस प्रकार मैंने शंकरके निर्मल यशका पूर्णतः वर्णन किया, तथापि उनका भी दर्प दलित हुआ। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो ? (अध्याय ३५-३६) देवी सती और पार्वतीके गर्व-मोचनकी कथा, सतीका देहत्याग, पार्वतीका जन्म, गर्ववश उनके द्वारा आकाशवाणीकी अवहेलना, शंकरजीका आगमन, शैलराजद्वारा उनकी स्तुति तथा उस स्तुतिकी महिमा तदनन्तर शिव-निर्माल्यका प्रसङ्ग सुनाकर श्रीकृष्णने कहा-देवि ! जगद्गुरु शंकरके दर्प- भङ्गका वृत्तान्त तो तुमने सुन लिया। अब मुझसे दुर्गाके दर्पविमोचनकी कथा सुनो। सम्पूर्ण देवताओंके तेजसे प्रकट हो जगदम्बाने कामिनीका कमनीय एवं मनोहर रूप धारण किया तथा दानवेन्द्रोंका वध करके देवकुलकी रक्षा की। इसके बाद देवीने दक्षपत्नीके उदरसे जन्म लिया। दक्षकन्या सतीदेवीने पिनाकपाणि शिवको पतिरूपमें ग्रहण किया और बड़ी भक्तिके साथ वे निरन्तर स्वामीकी सेवामें लगी रहीं। दैवयोगसे देवताओंकी सभामें दक्षके साथ शिवकी अकारण शत्रुता हो गयी। दक्षने घर आकर एक यज्ञका आयोजन किया। उसमें उन्होंने समस्त देवताओंको आमन्त्रित किया; किंतु क्रोधके कारण शंकरको नहीं बुलाया। सब देवता अपनी पत्नियोंके साथ दक्षके घर आये; परंतु स्वाभिमानवश शंकर अपने गणोंके साथ वहाँ नहीं गये। उनके मनमें भी
- शंकरः परमात्मा मे प्राणेभ्योऽपि परः शिवः। त्र्यम्बके मन्मनः शश्वन्न प्रियो मे भवात्परः ॥ न संवसामि गोलोके वैकुण्ठे तव वक्षसि । सदाशिवस्य हृदये निबद्धः प्रेमपाशतः ॥ (३६।१०८, ११०)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५८५ दक्षके प्रति बड़ा रोष था। सतीके मनमें पिता आदिके प्रति मोह था; इसलिये उन्होंने यत्नपूर्वक पतिदेवको उस यज्ञमें चलनेके लिये समझाया। जब किसी तरह उन्हें वहाँ ले जानेमें वे समर्थ न हो सकीं, तब स्वयं चञ्चल हो उठीं और पतिकी आज्ञा प्राप्त किये बिना ही दर्पवश पिताके घर चली आयीं। पतिके शापसे वहाँ उनका दर्प- भङ्ग हुआ। पिताने उनसे बाततक नहीं की। वाणीमात्रसे भी पुत्रीका सत्कार नहीं किया। इतना ही नहीं, उन्हें वहाँ पतिकी निन्दा भी सुननी पड़ी। उसे सुनकर स्वाभिमानवश सतीने अपने शरीरको त्याग दिया। प्रिये ! इस प्रकार सतीके दर्प-भङ्गका वृत्तान्त कहा गया। अब तुम उनके जन्मान्तर तथा दर्प- दलनकी कथा सुनो। सतीने शीघ्र ही गिरिराज हिमालयकी पत्नी मेनाके गर्भसे जन्म ग्रहण किया। शिवने प्रेमवश सतीकी चिताका भस्म और उनकी अस्थियाँ ग्रहण कीं। अस्थियोंकी तो माला बनायी और भस्मसे अङ्गरागका काम लिया। वे प्रेमवश बार-बार सतीको याद करते और उनके विरहमें इधर-उधर घूमते रहते थे। उधर मेनाने देवीको जन्म दिया। उनकी आकृति बड़ी ही मनोहर थी। विधाताकी सृष्टिमें गिरिराजनन्दिनीके लिये कहीं कोई उपमा नहीं थी। गुणोंकी तो वे जननी ही हैं; अतः सभी और सब प्रकारके सद्गुणोंको धारण करती हैं। समस्त देवपत्नियों उनकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं। जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमाकी कला बढ़ती है, उसी तरह हिमालयके घरमें वे देवी दिनोंदिन बढ़ने लगीं। जब उन्होंने युवावस्थामें प्रवेश किया, तब उन जगदम्बाको सम्बोधित करके आकाशवाणीने कहा—'शिवे ! तुम कठोर तपस्याद्वारा भगवान् शिवको पति-रूपमें प्राप्त करो; क्योंकि तपस्याके बिना ईश्वरको पाना अथवा उनके अंशसे गर्भ धारण करना असम्भव है।' यह आकाशवाणी सुनकर यौवनके गर्वसे भरी हुई पार्वती हँसकर चुप हो रहीं। वह मन-ही-मन सोचने लगीं कि 'जो मेरे दूसरे जन्मकी अस्थि और भस्मको धारण करते हैं; वे इस जन्ममें मुझे सयानी हुई देख कैसे नहीं ग्रहण करेंगे। जो चतुर होकर भी मेरे शोकसे समूचे ब्रह्माण्डमें भटकते फिरे; वे ही मुझ परम सुन्दरीको अपनी आँखोंसे देख लेनेपर क्यों नहीं ग्रहण करेंगे ? जिन कृपानिधानने मेरे लिये दक्षयज्ञका विध्वंस कर डाला था; वे अपनी जन्म-जन्मकी पत्नी मुझ पार्वतीको क्यों नहीं ग्रहण करेंगे ? पूर्वजन्मसे ही जो जिसकी पत्नी है और जिसका जो पति है, उन दोनोंमें यहाँ भेद कैसे हो सकता है ? क्योंकि प्रारब्धको कोई पलट नहीं सकता।' अत्यन्त अभिमानके कारण अपनेको समस्त रूप और गुणोंका आधार मानकर साध्वी शिवाने तप नहीं किया। उन्होंने शिवको ईश्वर नहीं समझा। 'समस्त सुन्दरियोंमें मुझसे बढ़कर सुन्दरी दूसरी कोई नहीं है'—यह धारणा हृदयमें लेकर शिवादेवी गर्ववश तपस्यामें नहीं प्रवृत्त हुईं। वे यही सोचती थीं कि पुरुष अपनी स्त्रियोंके रूप, यौवन तथा वेश-भूषाका ग्राहक है। शिव मेरा नाम सुनते ही बिना तपस्याके मुझे ग्रहण कर लेंगे। मनमें यह विश्वास लेकर गिरिजा हिमवान्के घरमें रहती थीं और दिन-रात सखी-सहेलियोंके बीच खेल-कूदमें मतवाली रहा करती थीं। इसी समय शीघ्रतापूर्वक दूतने गिरिराजके भवनमें आकर दोनों हाथ जोड़ उनके सामने मधुर वाणीमें कहा। दूत बोला-शैलराज ! उठिये, उठिये। अक्षयवटके पास जाइये। वहाँ वृषभवाहन महादेवजी अपने गणोंके साथ पधारे हैं। महाराज ! आप भक्तिभावसे मस्तक झुका उन्हें मधुपर्क आदि देकर उन इन्द्रियातीत देवेश्वरका पूजन कीजिये।
| ५८६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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महादेवजी सिद्धस्वरूप, सिद्धोंके स्वामी, योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु, मृत्युञ्जय, कालके भी काल तथा सनातन ब्रह्मज्योति हैं। वे प्रभु परमात्मस्वरूप, सगुण तथा निर्गुण हैं। उन्होंने भक्तोंके ध्यानके लिये निर्मल महेश्वररूप धारण किया है।
दूतकी यह बात सुनकर हिमवान् प्रसन्नतापूर्वक उठे और मधुपर्क आदि साथ ले भगवान् शंकरके समीप गये। दूतकी पूर्वोक्त बात सुनकर देवी शिवाके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। उन्होंने अपने मनमें यही माना कि महेश्वर मेरे ही लिये आये हैं। यही जानकर उन्होंने विविध दिव्य वस्त्रों तथा दिव्य रत्नालंकारों एवं मालाओंके द्वारा अपने सम्पूर्ण अङ्गोंको सुसज्जित किया। तत्पश्चात् अपने अनुपम रूपको देखकर पार्वती ने मन-ही-मन शंकरजीका ध्यान किया। विशेषतः स्वामीके चरणकमलोंका वे चिन्तन करने लगीं। उस समय शिवको छोड़कर पिता, माता, बन्धु-बान्धव, साध्वी वर्ग तथा सहोदर भाई किसीको भी उन्होंने अपने मनमें स्थान नहीं दिया।
इधर गिरिराज हिमालयने वहाँ जाकर भगवान् चन्द्रशेखरके दर्शन किये। वे गङ्गाजीके रमणीय तटसे ऊपरको आ रहे थे। उनके मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही थी। वे संस्कारयुक्त माला धारण किये मेरे नामका जप कर रहे थे। उनके सिरपर सुनहरी प्रभासे युक्त जटाराशि विराजमान थी। वे वृषभकी पीठपर बैठकर हाथमें त्रिशूल लिये सब प्रकारके आभूषणोंसे सुशोभित थे। सर्पका ही यज्ञोपवीत पहने सर्पमय आभूषणोंसे विभूषित थे। उनकी अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल थी, वे वस्त्रके स्थानमें व्याघ्रचर्म धारण किये, हड्डियोंकी माला पहने तथा अङ्गोंमें विभूति रमाये बड़ी शोभा पाते थे। दिगम्बर वेष, पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। उनके श्रीअङ्गोंसे करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाश फैल रहा था। हिमवान्ने उनके चारों ओर एकादश रुद्रोंको देखा, जो ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान थे। शिवके वामभागमें महाकाल और दाहिने भागमें नन्दिकेश्वर खड़े थे। भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, बेताल, क्षेत्रपाल, भयानक पराक्रमी भैरव, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन, जैगीषव्य, कात्यायन, दुर्वासा और अष्टावक्र आदि ऋषि—सब उनके सामने खड़े थे। हिमालयने इन सबको मस्तक झुकाकर भगवान् शिवको प्रणाम किया और पृथ्वीपर माथा टेक दण्डकी भाँति पड़कर दोनों हाथ जोड़ लिये। इसके बाद बड़ी भक्ति-भावनासे शिवके चरणकमल पकड़कर पर्वतराजने नमस्कार किया और नेत्रोंसे आँसू बहाते पुलकित-शरीर हो धर्मके दिये हुए स्तोत्रसे परमेश्वर शिवकी स्तुति आरम्भ की।
**हिमालय बोले—**भगवन्! आप ही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं। आप ही जगत्पालक विष्णु हैं। आप ही सबका संहार करनेवाले अनन्त हैं और आप ही कल्याणदाता शिव हैं। आप गुणातीत ईश्वर, सनातन ज्योतिःस्वरूप हैं। प्रकृति और उसके ईश्वर हैं। प्राकृत पदार्थरूप होते हुए भी प्रकृतिसे परे हैं। भक्तोंके ध्यान करनेके लिये आप अनेक रूप धारण करते हैं। जिन रूपोंमें जिसकी प्रीति है, उसके लिये आप वे ही रूप धारण करते हैं। आप ही सृष्टिके जन्मदाता सूर्य हैं। समस्त तेजोंके आधार हैं। आप ही शीतल किरणोंसे सदा शस्योंका पालन करनेवाले सोम हैं। आप ही वायु, वरुण और सर्वदाहक अग्नि हैं। आप ही देवराज इन्द्र, काल, मृत्यु तथा यम हैं। मृत्युञ्जय होनेके कारण मृत्युकी भी मृत्यु, कालके भी काल तथा यमके भी यम हैं। वेद, वेदकर्ता तथा वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् भी आप ही
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५८७
हैं। आप ही विद्वानोंके जनक, विद्वान् तथा विद्वानोंके गुरु हैं। आप ही मन्त्र, जप, तप और उनके फलदाता हैं। आप ही वाक् और आप ही वाणीकी अधिष्ठात्री देवी हैं। आप ही उसके स्रष्टा और गुरु हैं। अहो! सरस्वतीका बीज अद्भुत है। यहाँ कौन आपकी स्तुति कर सकता है?
ऐसा कहकर गिरिराज हिमालय उनके चरणकमलोंको धारण करके खड़े रहे। भगवान् शिव वृषभपर बैठे हुए शैलराजको प्रबोध देते रहे। जो मनुष्य तीनों संध्याओंके समय इस परम पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है, वह भवसागरमें रहकर भी समस्त पापों तथा भयोंसे मुक्त हो जाता है। पुत्रहीन मनुष्य यदि एक मासतक इसका पाठ करे तो पुत्र पाता है। भार्याहीनको सुशीला तथा परम मनोहारिणी भार्या प्राप्त होती है। वह चिरकालसे खोयी हुई वस्तुको सहसा तथा अवश्य पा लेता है। राज्यभ्रष्ट पुरुष भगवान् शंकरके प्रसादसे पुनः राज्यको प्राप्त कर लेता है। कारागार, श्मशान और शत्रु-संकटमें पड़नेपर तथा अत्यन्त जलसे भरे गम्भीर जलाशयमें नाव टूट जानेपर, विष खा लेनेपर, महाभयंकर संग्रामके बीच फँस जानेपर तथा हिंसक जन्तुओंसे घिर जानेपर इस स्तुतिका पाठ करके मनुष्य भगवान् शंकरकी कृपासे समस्त भयोंसे मुक्त हो जाता है।
(अध्याय ३७-३८)
गिरिराज हिमवान्द्वारा गणोंसहित शिवका सत्कार, मेनाको शिवके अलौकिक सौन्दर्यके दर्शन, पार्वतीद्वारा शिवकी परिक्रमा, शिवका उन्हें आशीर्वाद, शिवाद्बारा शिवका षोडशोपचार-पूजन, शंकरद्वारा कामदेवका दहन तथा पार्वतीको तपस्याद्वारा शिवकी प्राप्ति
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिये! इस प्रकार स्तुति करके गिरिराज हिमवान् नगरसे दूर निवास करनेवाले भगवान् शंकरसे कुछ ही दूरीपर उनकी आज्ञा ले स्वयं भी ठहर गये। उन्होंने भक्तिपूर्वक भगवान्को मधुपर्क आदि दिया और मुनियों तथा शिवके पार्षदोंका पूजन किया। उस समय मेना स्त्रियोंके साथ वहाँ आयी। उसने वटके नीचे आसन लगाये चन्द्रशेखर शिवको देखा। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। वे व्याघ्रचर्म धारण किये मुनि-मण्डलीके मध्य भागमें ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहे थे, मानो आकाशमें तारिकाओंके बीच द्विजराज चन्द्रमा शोभा पा रहे हों। करोड़ों कन्दर्पोंके समान उनका मनोहर रूप अत्यन्त आह्लाद प्रदान करनेवाला था। वे वृद्धावस्था छोड़कर नूतन यौवन धारण करते थे और अत्यन्त सुन्दर रमणीय रूप हो युवतियोंके चित्त चुरा रहे थे। वे कामातुरा कामिनियोंको कामदेवके समान जान पड़ते थे। सतियोंको औरस पुत्रके समान प्रतीत होते थे। वैष्णवोंको महाविष्णु तथा शैवोंको सदाशिवके रूपमें दृष्टिगोचर होते थे। शक्तिके उपासकोंको शक्तिस्वरूप, सूर्यभक्तोंको सूर्यरूप, दुष्टोंको कालरूप तथा श्रेष्ठ पुरुषोंको परिपालकके रूपमें दिखायी देते थे। कालको कालके समान, मृत्युको मृत्यु एवं अत्यन्त भयानक जान पड़ते थे। स्त्रियोंके लिये उनका व्याघ्रचर्म मनोहर वस्त्र बन गया। भस्म चन्दन हो गया। सर्प सुन्दर मालाओंके रूपमें परिणत हो गये। कण्ठमें कालकूटकी प्रभा कस्तूरीके समान प्रतीत हुई। जटा सुन्दर सँवारी हुई चूड़ा
३५- ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका शिवजीसे शैलराजके घर जानेका अनुरोध करना, शिवका ब्राह्मण-वेषमें जाकर अपनी ही निन्दा करके शैलराजके मनमें अश्रद्धा उत्पन्न करना, मेनाका पुत्रीको साथ ले कोप-भवनमें प्रवेश और शिवको कन्या न देनेके लिये दृढ़ निश्चय, सप्तर्षियों और अरुन्धतीका आगमन तथा शैलराज एवं मेनाको समझाना, वसिष्ठ और हिमवान्की बातचीत, शिवकी महत्ता तथा देवताओंकी प्रबलताका प्रतिपादन, प्रसङ्गवश राजा अनरण्य, उनकी पुत्री पद्मा तथा पिप्पलादमुनिकी कथा
५८८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
जान पड़ी। चन्द्रमा भाल-देशमें चन्दन जान पड़े। मस्तकपर गङ्गाकी मनोहारिणी धारा परम सुन्दर मालती मालाके रूपमें परिणत हो गयी। अस्थियोंकी माला रत्नमाला बन गयी। धतूर मनोहर चम्पाके रूपमें बदल गया। पाँच मुखके स्थानमें उन्हें एक ही मुख दिखायी देने लगा, जो दो नेत्र-कमलोंसे सुशोभित था। मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी आभाको प्रतिहत करके अत्यन्त देदीप्यमान हो रहा था। बन्धुजीव (दुपहरिया)-की लालीको तिरस्कृत करनेवाले उनके ओष्ठ और अधरसे मुखकी मनोहरता बढ़ गयी थी। श्वेत चन्द्रमा ही मानो वृषभराज नन्दी बन गये थे और भूत आदि नर्तकोंका काम करते थे। महेश्वरके स्वरूपमें तत्काल सब कुछ बदल गया। शिवका ऐसा रूप देख मेना बहुत संतुष्ट हुई। कितनी रमणियाँ भगवान् शंकरके रूप-सौन्दर्यको देखकर अत्यन्त मुग्ध हो गयीं और नाना प्रकारकी अभिलाषाएँ करने लगीं। अहो! पार्वती बड़ी पुण्यवती है। भारतवर्षमें इसीका जन्म स्पृहणीय है; क्योंकि ये शिव इसके स्वामी होनेवाले हैं।
इस प्रकारकी बातें कितनी ही स्त्रियाँ कर रही थीं। शिवका दर्शन करके मेना सानन्द अपने घरको लौट गयीं। शिवका पूजन करके उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर शैलराज भी अपने घरको गये। गिरिराजने मेनाके साथ एकान्तमें सलाह करके पार्वतीको उसकी मङ्गल-कामनासे शिवके समीप भेजा। पार्वतीका हृदय भगवान् शंकरमें अनुरक्त था। सखियोंके साथ मनोहर वेष धारण करके हर्षपूर्वक वे शिवके निकट गयीं। वहाँ प्रसन्नमुख और नेत्रवाले शान्तस्वरूप शिवका दर्शन करके शिवाने सात बार परिक्रमा की और मुस्कराकर उन्हें प्रणाम किया। उस समय भगवान् शिवने आशीर्वाद देते हुए कहा—'सुन्दरि! तुम्हें अनन्य प्रेमी, गुणवान्, अमर, ज्ञानिशिरोमणि और सुन्दर पति प्राप्त हो। शुभे! तुम्हारा पतिविषयक सौभाग्य सतत बना रहे। साध्वि! तुम्हारा पुत्र नारायणके समान गुणवान् होगा। जगदम्बिके! तीनों लोकोंमें तुम्हारी उत्कृष्ट पूजा होगी। तुम समस्त ब्रह्माण्डोंमें सबसे श्रेष्ठ होओ। सुन्दरि! तुमने सात बार परिक्रमा करके भक्तिभावसे मुझे नमस्कार किया है। अतः मैं सात जन्मोंके लिये संतुष्ट हो गया। तुम उसका फल पाओ। तीर्थ, प्रियतम पति, इष्टदेवता, गुरुमन्त्र तथा औषधमें जिनकी जैसी आस्था होती है, उन्हें वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है।'
ऐसा कहकर योगीश्वर शंकरने व्याघ्रचर्मपर योगासन लगाया और मुझ परब्रह्मरूप ज्योतिका तत्काल ध्यान आरम्भ कर दिया। तब देवी पार्वतीने उनके दोनों चरण पखारकर चरणामृत-पान किया और अग्निशुद्ध वस्त्रसे भक्तिपूर्वक उन चरणोंका मार्जन किया। विश्वकर्माद्वारा निर्मित रमणीय रत्नसिंहासन उनकी सेवामें अर्पित किया। फिर कांस्यपात्रमें रखे हुए अपूर्व नैवेद्यका भोग लगाया। तत्पश्चात् उनके चरणोंमें गङ्गाजलसे युक्त अर्घ्य दिया। इसके बाद मनोहर सुगन्धयुक्त चन्दन तथा कस्तूरी और कुंकुम भी सेवामें प्रस्तुत किये। तदनन्तर हालाहल विषके चिह्नसे सुन्दर प्रतीत होनेवाले कण्ठमें मालतीकी माला पहनायी। भक्ति-भावसे पूजा की। शिवकी प्रसन्नताके लिये उनपर पुष्पोंकी वृष्टि की। सुवर्णपात्रमें अमृत और मधुर मधु दिया। सैकड़ों रत्नमय दीप जलाये। सब ओर उत्तम धूपकी सुगन्ध फैलायी। त्रिभुवन-दुर्लभ वस्त्र, सोनेके तारोंका यज्ञोपवीत तथा पीनेके लिये सुगन्धित एवं शीतल जल पार्वतीने अपने प्रियतमकी सेवामें प्रस्तुत किये। फिर रत्नसारेन्द्रनिर्मित अतिशय सुन्दर रमणीय भूषण, सुवर्णमढ़ी सींगवाली दुर्लभ कामधेनु, स्नानोपयोगी द्रव्य, तीर्थजल तथा मनोहर ताम्बूल भी
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५८९ क्रमशः अर्पित किये। इस प्रकार षोडशोपचार चढ़ाकर पार्वतीने बारंबार प्रणाम किया। यह उनका नित्यका नियम बन गया। वे प्रतिदिन भक्तिभावसे शिवकी पूजा करके पिताके घर लौट जाया करती थीं। अप्सराओंके मुखसे इन्द्रने यह सुना कि भगवान् महेश्वर पार्वतीदेवीके प्रति अनुरक्त हैं। यह समाचार सुनकर इन्द्र हर्षसे नाचने लगे। उन्होंने बड़ी उतावलीके साथ दूत भेजकर कामदेवको बुलवाया। इन्द्रकी आज्ञासे कामदेव अमरावतीपुरीमें गये। तब इन्द्रने उन्हें शीघ्र ही उस स्थानपर भेजा, जहाँ शिवा और शिव विद्यमान थे। पञ्चबाण कामने अपने पाँचों बाणोंको साथ ले उस स्थानको प्रस्थान किया, जहाँ शक्तिसहित शिव विराजमान थे। वहाँ पहुँचकर मदनने देखा, भगवान् शिव शिवाके साथ विद्यमान हैं। उनके मुख और नेत्र प्रसन्न दिखायी देते हैं। वे त्रिभुवनकान्त एवं शान्त हैं। उन्हें देखकर कामदेव बाणसहित धनुष हाथमें लिये आकाशमें खड़ा हो गया। उसने बड़े हर्षके साथ अपने अमोघ एवं अनिवार्य अस्त्रका शंकरपर प्रयोग किया; परंतु वह अमोघ अस्त्र भी परमात्मा शंकरपर व्यर्थ हो गया। जैसे आकाश निर्लेप होता है, उसी तरह निर्लिप्त परमात्मा शिवपर जब वह शस्त्र विफल हो गया, तब कामदेवको बड़ा भय हुआ। वह सामने खड़ा हो भगवान् मृत्युञ्जयकी ओर देखता हुआ काँपने लगा। भयसे विह्वल हुए कामने इन्द्र आदि देवताओंका स्मरण किया। तब सब देवता वहाँ आये और शंकरके कोपसे डरकर काँपने लगे। उन्होंने स्तोत्र पढ़कर देवाधिदेव शंकरका स्तवन किया। इतनेमें ही शिवके ललाटवर्ती नेत्रसे कोपाग्नि प्रकट हुई। देवतालोग स्तुति कर ही रहे थे कि शम्भुसे उत्पन्न हुई वह आग ऊँची-ऊँची लपटें उठाती हुई प्रज्वलित हो उठी। वह प्रलयकालिक अग्निकी ज्वालाके समान जान पड़ती थी। आकाशमें ऊपर उठकर चक्कर काटती हुई वह आग पृथ्वीपर उतर आयी और चारों ओर चक्कर देकर कामदेवपर टूट पड़ी। भगवान् शंकरके कोपसे कामदेव एक ही क्षणमें भस्म हो गये। यह देख सब देवता विषादमें डूब गये और पार्वतीने भी सिर नीचा कर लिया। तदनन्तर रति भगवान् शिवके सामने बहुत विलाप करने लगी। भयसे काँपते हुए समस्त देवताओंने शिवका स्तवन किया। इसके बाद वे बार-बार रोते हुए रतिसे बोले—'माँ ! पतिके शरीरका थोड़ा-सा भस्म लेकर उसकी रक्षा करो और भय छोड़ो। हमलोग उन्हें जीवित करायेंगे। तुम पुनः अपने प्रियतमको प्राप्त करोगी; परंतु जब भगवान् शंकरका क्रोध दूर हो जायगा और उनकी प्रसन्नताका समय होगा, तभी यह कार्य सम्भव हो सकेगा।'
रतिका विलाप देखकर पार्वती मूर्च्छित हो गयीं और उन अतीन्द्रिय गुणातीत चन्द्रशेखरकी स्तुति करने लगीं। तब भगवान् शिव रोती हुई पार्वतीको वहीं छोड़कर अपने स्थानको चले गये। फिर तो उसी क्षण पार्वतीका सारा अभिमान चूर हो गया। गिरिराजनन्दिनीने अपने रूप और यौवनका गर्व त्याग दिया। अब उन्हें सखियोंको अपना मुँह दिखानेमें भी लज्जाका अनुभव होने लगा। सब देवता रतिको आश्वासन दे रुद्रदेवको दण्डवत् प्रणाम करनेके पश्चात् अपने स्थानको चले गये। उस समय उनका मन शोकसे उद्विग्न हो रहा था। राधिके ! कामपत्नी रति रोषसे लाल आँखोंवाले रुद्रदेवका भयसे स्तवन करके शोकसे रोती हुई अपने घरको चली गयी। परंतु पार्वती लज्जावश पिताके घर नहीं गयी। वह सखियोंके मना करनेपर भी तपस्याके लिये वनमें चली गयी। तब शोकसे विह्वल हुई सखियोंने भी उन्हींका अनुगमन किया। माताओंके रोकनेपर भी वे सब-की-सब गङ्गातटवर्ती वनकी ओर चली
५९० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण गयीं। आगे चलकर पार्वतीने दीर्घकालतक तपस्या | सम्बन्ध रखनेवाली सारी बातें कही गयीं। करके भगवान् त्रिलोचनको पतिरूपमें प्राप्त किया। | पार्वतीका यह चरित्र गूढ़ है। बताओ, तुम और रतिने भी शंकरके वरसे यथासमय कामदेवको | क्या सुनना चाहती हो ? प्राप्त किया। राधे ! इस प्रकार पार्वतीके दर्पमोचनसे | (अध्याय ३९) पार्वतीकी तपस्या, उनके तपके प्रभावसे अग्निका शीतल होना, ब्राह्मण-बालकका रूप धारण करके आये हुए शिवके साथ उनकी बातचीत, पार्वतीका घरको लौटना और माता-पिता आदिके द्वारा उनका सत्कार, भिक्षुवेषधारी शंकरका आगमन, शैलराजको उनके विविध रूपोंके दर्शन, उनकी शिव-भक्तिसे देवताओंको चिन्ता, उनका बृहस्पतिजीको शिव-निन्दाके लिये उकसाना तथा बृहस्पतिका देवताओंको शिव-निन्दाके दोष बताकर तपस्याके लिये जाना श्रीराधिका बोलीं- प्रभो ! यह बहुत ही | निराहार रहकर भक्ति-भावसे तपस्या की। तदनन्तर विचित्र और अपूर्व चरित्र सुननेको मिला है, जो | और भी कठोर तप आरम्भ किया। ग्रीष्म-ऋतुमें कानोंमें अमृतके समान मधुर, सुन्दर, निगूढ़ एवं | अपने चारों ओर आग प्रज्वलित करके वह दिन- ज्ञानका कारण है। भगवन् ! यह न तो अधिक | रात उसे जलाये रखती और उसके बीचमें संक्षेपसे सुना गया है और न विस्तारसे ही। परंतु | बैठकर निरन्तर मन्त्र जपती रहती थी। वर्षा-ऋतु अब विस्तारसे ही सुननेकी इच्छा है; अतः आप | आनेपर श्मशानभूमिमें शिवा सदा योगासन लगाकर विस्तारपूर्वक इस विषयका वर्णन कीजिये। पार्वतीने | बैठती और शिलाकी ओर देखती हुई जलकी स्वयं कौन-कौन-सा कठोर तप किया था ? और | धारासे भीगती रहती थी। शीतकाल आनेपर वह किस-किस वरको पाकर किस तरह महेश्वरको | सदा जलके भीतर प्रवेश कर जाती तथा शरत्की प्राप्त किया तथा रतिने फिर किस प्रकार कामदेवको | भयंकर बर्फवाली रातोंमें भी निराहार रहकर जिलाया ? प्यारे कृष्ण ! आप पार्वती और शिवके | भक्तिपूर्वक तपस्या करती थी। विवाहका वर्णन कीजिये। | इस प्रकार अनेक वर्षोंतक कठोर तप करके श्रीकृष्णने कहा- प्राणाधिके राधिके ! | भी जब सती-साध्वी पार्वती शंकरको न पा सकी, प्राणवल्लभे ! सुनो। प्राणेश्वरि ! तुम प्राणोंकी अधिष्ठात्री | तब वह शोकसे संतप्त हो अग्निकुण्डका निर्माण देवी हो। प्राणाधारे! मनोहरे ! जब रुद्रदेव | करके उसमें प्रवेश करनेको उद्यत हो गयी। वटवृक्षके नीचेसे चले गये, तब पार्वती माता- | तपस्यासे अत्यन्त कृशकाय हुई सती शैल-पुत्रीको पिताके बार-बार रोकनेपर भी तपस्याके लिये | अग्निकुण्डमें प्रवेश करनेको उद्यत देख कृपासिन्धु चली गयी। गङ्गाके तटपर जा तीनों काल स्नान | शिव कृपा करके स्वयं उसके पास गये। अत्यन्त करके वह मेरे दिये हुए मन्त्रका प्रसन्नतापूर्वक | नाटे कदके बालक ब्राह्मणका रूप धारण करके जप करने लगी। उस जगदम्बाने पूरे एक वर्षतक | अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए भगवान् शिव
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मन-ही-मन बड़े हर्षका अनुभव कर रहे थे। उनके सिरपर जटा थी। उन्होंने दण्ड और छत्र भी ले रखे थे। श्वेत वस्त्र, श्वेत यज्ञोपवीत, श्वेत कमलके बीजोंकी माला एवं श्वेत तिलक धारण किये वे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। निर्जन स्थानमें उस बालकको देखकर पार्वतीके हृदयमें स्नेह उमड़ आया। उसके तेजसे अत्यन्त आच्छादित हो उन्होंने स्वयं तप छोड़ दिया और सामने खड़े हुए शिशुसे पूछा—'तुम कौन हो?' शिवा बड़े आदरके साथ उसे हृदयसे लगा लेना चाहती थी। शैलकुमारीका प्रश्न सुनकर परमेश्वर शिव हँसे और ईश्वरीके कानोंमें अमृत उँड़ेलते हुए-से मधुर वाणीमें बोले।
शंकरने कहा—मैं इच्छानुसार विचरनेवाला ब्रह्मचारी एवं तपस्वी ब्राह्मण-बालक हूँ; परंतु सुन्दरि! तुम कौन हो, जो परम कान्तिमती होकर भी इस दुर्गम वनमें तप कर रही हो? बताओ, किसके कुलमें तुम्हारा जन्म हुआ है? तुम किसकी कन्या हो और तुम्हारा नाम क्या है? तुम तो तपस्याका फल देनेवाली हो; फिर स्वयं किसलिये तपस्या करती हो? कमललोचने! तुम तपस्याकी मूर्तिमती राशि हो। अवश्य ही तुम्हारा यह तप लोकशिक्षाके लिये है। तुम मूलप्रकृति ईश्वरी, लक्ष्मी, सावित्री और सरस्वती—इन देवियोंमेंसे कौन हो? इसका अनुमान करनेमें मैं असमर्थ हूँ। कल्याणि! तुम जो भी हो, मुझपर प्रसन्न हो जाओ; क्योंकि तुम्हारे प्रसन्न होनेपर परमेश्वर प्रसन्न होंगे। पतिव्रता स्त्रीके संतुष्ट होनेपर स्वयं नारायण संतुष्ट होते हैं और नारायणदेवके संतुष्ट होनेपर सदा तीनों लोक संतोषका अनुभव करते हैं; ठीक उसी तरह जैसे वृक्षकी जड़ सींच देनेपर उसकी शाखाएँ स्वतः सिंच जाती हैं।
शिशुकी यह बात सुनकर परमेश्वरी शिवा हँसने लगी और कानोंमें अमृतकी वर्षा करती हुई मनोहर वाणी बोली।
पार्वतीने कहा—ब्रह्मन्! न तो मैं वेदजननी सावित्री हूँ, न लक्ष्मी हूँ और न वाणीकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती ही हूँ। मेरा जन्म भारतवर्षमें हुआ है। मैं इस समय गिरिराज हिमवान्की पुत्री हूँ। इससे पहले मेरा जन्म प्रजापति दक्षके घरमें हुआ था। उस समय मैं शंकर-पत्नी सतीके नामसे प्रसिद्ध थी। एक बार पिताने पतिकी निन्दा की। इसलिये मैंने योगके द्वारा अपने शरीरको त्याग दिया। इस जन्ममें भी पुण्यके प्रभावसे भगवान् शंकर मुझे मिल गये थे; परंतु दुर्भाग्यवश वे मुझे छोड़कर और कामदेवको भस्म करके चले गये। शंकरजीके चले जानेपर मैं मानसिक संताप और लज्जासे विवश हो पिताके घरसे तपस्याके लिये निकल पड़ी। अब मेरा मन इस गङ्गाजीके तटपर ही लगता है। दीर्घकालतक कठोर तप करके भी मैं अपने प्राणवल्लभको न पा सकी। इसलिये अग्निमें प्रवेश करने जा रही थी। किंतु तुम्हें देखकर क्षणभरके लिये रुक गयी। अब तुम जाओ। मैं प्रलयाग्निकी शिखाके समान प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश करूँगी। ब्रह्मन्! महादेवजीकी प्राप्तिका संकल्प मनमें
५९२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
लेकर शरीरका त्याग करूँगी और जहाँ-जहाँ भी जन्म लूँगी, परमेश्वर शिवको ही पतिके रूपमें प्राप्त करूँगी। प्रत्येक जन्ममें भगवान् शिव ही मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतम पति होंगे। सब स्त्रियाँ अपने प्रियतमको ही पानेके लिये मनोवाञ्छित जन्म ग्रहण करती हैं। उन सबका वह जन्म अपने अभीष्ट पतिकी उपलब्धिके लिये ही होता है, ऐसा श्रुतिमें सुना गया है। पूर्वजन्मका जो पति है, वही स्त्रियोंके प्रत्येक जन्ममें पति होता है। जो स्त्री जिनकी पत्नी नियत है, वही उन्हें प्रत्येक जन्ममें प्राप्त होती है; अतः इस जन्ममें घोरतर तपके पश्चात् भी पतिको न पाकर मैं यहाँ इस शरीरको अग्निकुण्डमें होम दूँगी। मेरा यह कार्य पतिकी कामनाको लेकर होगा; इसलिये परलोकमें मैं उन्हें अवश्य प्राप्त करूँगी।
यों कहकर पार्वती वहाँ ब्राह्मणके बार-बार मना करनेपर भी उसके सामने ही अग्निकुण्डमें समा गयी। परमेश्वरी राधे! पार्वतीके अग्नि-प्रवेश करते ही उसकी तपस्याके प्रभावसे वह अग्नि तत्काल चन्दनके समान शीतल हो गयी। वृन्दावनविनोदिनि! एक क्षणतक अग्निकुण्डमें रहकर जब शिवा ऊपर आने लगी, तब शिवने पुनः सहसा उससे पूछा।
श्रीमहादेवजी बोले—भद्रे! तुम्हारी तपस्या क्या है? (सफल है या असफल?) यह कुछ भी मेरी समझमें नहीं आया। जिस तपके प्रभावसे अग्निने तुम्हारा शरीर नहीं जलाया, उसीसे तुम्हारी मनोवाञ्छित कामना पूर्ण नहीं हुई; यह आश्चर्यकी बात है। तुम कल्याणस्वरूप शिवको पति बनाना चाहती हो; परंतु वे तो निराकार हैं! निराकारको पति बनाकर तुम्हारा कौन-सा मनोरथ सिद्ध होगा? शुचिस्मिते! यदि संहारकर्ता हरको स्वामी बनानेकी इच्छा है तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि कौन ऐसी स्त्री है जो सर्वसंहारकारीको अपना कान्त (प्राणवल्लभ) बनानेकी इच्छा करेगी?
देवि! यदि उन्हें अपना स्वामी बनाकर तुम मोक्ष लेना चाहती हो तो इसके लिये तुम्हारी तपस्या व्यर्थ है; क्योंकि सबको मुक्ति प्रदान करनेवाली तो तुम स्वयं ही हो! ‘शिव’ का अर्थ है—मङ्गल (कल्याण), मोक्ष और संहारकर्ता। इसके अतिरिक्त अन्य अर्थमें इस शब्दका प्रयोग नहीं देखा जाता। शिव शब्दका दूसरा कोई अर्थ वेदमें नहीं निरूपित हुआ है। सुन्दरि! यदि तुम संहारकर्ता शिवको चाहती हो, तब तो सर्वलोकभयंकर रुद्रको अपने प्रति अनुरक्त पाओगी। न तो तुम्हारा मोक्ष होगा और न अपने अभीष्ट देवताकी सेवा ही उपलब्ध होगी। भगवान् श्रीहरिका स्मरण अमोघ है, वह सदा सब प्रकारसे सम्पूर्ण मङ्गलोंका दाता है। अब तुम शीघ्र ही अपने पिताके घर जाओ। वहाँ मेरे आशीर्वादसे और अपने तपके फलसे तुम्हें परम दुर्लभ शिवके दर्शन प्राप्त होंगे।
ऐसा कहकर ब्राह्मण वहीं अन्तर्धान हो गया। दुर्गा ‘महादेव! महादेव!’ का उच्चारण करती हुई पिताके घरकी ओर चल दी। पार्वतीका आगमन सुनकर मेना और हिमालय दिव्य यानको आगे करके हर्षविह्वल हो अगवानीके लिये चले। सारा नगर सजाया गया। मार्गोंपर चन्दन, कस्तूरी आदिका छिड़काव हुआ। बाजे बजने लगे। शङ्खध्वनि गूँज उठी। सड़कोंपर सिन्दूर तथा चन्दनके जलसे कीच मच गयी। नगरमें प्रवेश करके दुर्गाने माता-पिताके दर्शन किये। वे दोनों अत्यन्त प्रसन्न हो दौड़ते हुए सामने आये। उनके नेत्रोंमें हर्षके आँसू भरे थे और अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो रहा था। देवी शिवाके मुखपर भी प्रसन्नता थी। उसने सखियोंसहित निकट जा माता-पिताको प्रणाम किया। तब उन दोनोंने आशीर्वाद देकर पुत्रीको हृदयसे लगा लिया और ‘ओ मेरी बच्ची!’ कहकर प्रेमसे विह्वल हो रोने लगे। उस समय दुर्गाको रथपर बिठाकर वे दोनों अपने घर गये। स्त्रियोंने निर्मञ्छन किया और
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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ब्राह्मणोंने आशीर्वाद दिया। पर्वतराजने ब्राह्मणों और बन्दीजनोंको धन दिया। उनसे वेद-पाठ और मङ्गल-पाठ करवाये। इस प्रकार वे दोनों अपनी पुत्रीके साथ सुखसे घरमें रहने लगे। शिवाके आ जानेसे उनके मनमें बड़ा हर्ष था।
एक दिन हिमवान् तप करनेके लिये गङ्गाजीके तटपर गये। मेना अपनी पुत्रीके साथ प्रसन्नतापूर्वक घरके आँगनमें बैठी थीं। इसी समय एक नाचने-गानेवाला भिक्षुक सहसा मेनाके पास आया। उसके बायें हाथमें सींगका बाजा और दायें हाथमें डमरू था। बहुत ही वृद्ध और जरासे अत्यन्त जर्जर हो चुका था। उसने सारे शरीरमें विभूति लगा रखी थी। पीठपर गुदड़ी लिये और लाल वस्त्र पहने वह भिक्षुक बड़ा मनोहर जान पड़ता था। उसका कण्ठ बड़ा ही मधुर था। वह मनोहर नृत्य करते हुए मेरे गुणोंका गान करने लगा। कभी शृङ्ग बजाता और कभी डमरू। उसके बाजेकी आवाज सुनकर बहुत-से नागरिक हर्षविह्वल हो वहाँ आ गये। दर्शकोंमें बालक, बालिका, वृद्ध, युवक, युवतियाँ तथा वृद्धाएँ भी थीं। मधुर तान और स्वरसे युक्त उस सुन्दर गीतको सुनकर सहसा सब लोग मोहित एवं मूर्च्छित हो गये। दुर्गाको भी मूर्च्छा आ गयी। उसने अपने हृदयमें भगवान् शंकरको देखा। वे त्रिशूल, पट्टिश और व्याघ्रचर्म धारण किये सम्पूर्ण अङ्गोंमें विभूतिसे विभूषित थे। बड़ा ही रम्य रूप था। गलेमें अत्यन्त निर्मल अस्थियोंकी माला शोभा देती थी। प्रसन्नमुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। उनकी आकृतिसे आन्तरिक उल्लास सूचित होता था। पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र शोभा पाते थे। हाथमें माला, कंधेपर नागोंका यज्ञोपवीत और मस्तकपर चन्द्राकार मुकुट—बड़ी सुन्दर झाँकी थी। वे पार्वतीसे कह रहे थे कि वर माँगो। हृदयस्थित हरको देखकर पार्वतीने मन-ही-मन उन्हें प्रणाम किया और वर माँगा, ‘आप हमारे पति हो जाइये।’ ‘एवमस्तु’ कहकर शिव अन्तर्धान हो गये। हृदयमें शिवको न देखकर दुर्गाकी मूर्च्छा भङ्ग हुई। उसने आँख खोलकर देखा, सामने वही भिक्षुक गा रहा है।
भिक्षुके नृत्य और संगीतसे संतुष्ट हो मेना सोनेके पात्रमें बहुत-से रत्न ले उसे देनेके लिये गयीं; परंतु भिक्षुने भिक्षामें दुर्गाको ही माँगा; दूसरी कोई वस्तु नहीं ली। वह कौतुकवश पुनः नृत्य करनेको उद्यत हुआ; परंतु मेना उसकी बात सुनकर कुपित हो उठी थीं। उन्हें आश्चर्य भी हुआ था। उन्होंने भिक्षुकको बहुत डाँटा तथा उसे घरसे बाहर निकाल देनेकी आज्ञा दी। इसी बीचमें अपना तप पूरा करके हिमवान् घरपर आये। वहाँ उन्हें आँगनमें खड़ा हुआ एक भिक्षु दिखायी दिया, जो बड़ा मनोहर था। उसके विषयमें मेनाके मुखसे सब बातें सुनकर हिमवान् हँसे और रुष्ट भी हुए। उन्होंने अपने सेवकको आज्ञा दी—‘इस भिक्षुकको बाहर निकाल दो।’ परंतु वह कोई साधारण भिक्षुक नहीं था। आकाशकी भाँति उसका स्पर्श करना भी कठिन था। वह अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहा था। उसे कोई बाहर न कर सका। उसके निकट जानेकी भी किसीमें क्षमता नहीं थी। हिमवान्ने एक ही क्षणमें देखा—उस भिक्षुकके सुन्दर चार भुजाएँ हैं; मस्तकपर किरीट, कानोंमें कुण्डल तथा शरीरपर पीताम्बर शोभा पाता है; श्याम-सुन्दर रुचिर वेष मनको मोहे लेता है; मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही है। सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित हैं तथा वे श्रीहरि (रूपधारी शिव) भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते हैं।
हिमवान् श्रीहरिके उपासक थे। उन्होंने पूजाकालमें भगवान् गदाधरको जो-जो फूल चढ़ाये थे, वे सब भिक्षुकके अङ्गमें और
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मस्तकपर देखे। उनके द्वारा जो धूप-दीप दिये गये थे अथवा जो मनोरम नैवेद्य निवेदित हुआ था, वह भी भिक्षुकके सामने प्रस्तुत दिखायी दिया। दूसरे ही क्षणमें वह भिक्षुक द्विभुज-रूपमें दृष्टिगोचर हुआ। अब उसके हाथमें विनोदकी साधनभूता मुरली थी। गोपवेष, किशोर-अवस्था, श्यामसुन्दर वर्ण, मुस्कराता हुआ मुख, मस्तकपर मोरपंखका मुकुट, श्रीअङ्गोंमें रत्नमय आभूषण, चन्दनके अङ्गराग तथा गलेमें वनमाला—मानो साक्षात् श्रीकृष्ण दर्शन दे रहे हों। फिर क्षणभरमें वह उज्ज्वल-कान्ति चन्द्रशेखर शिवके रूपमें दिखायी दिया। उसके हाथोंमें त्रिशूल और पट्टिश शोभा पा रहे थे। वस्त्रकी जगह सुन्दर बाघम्बर था। सम्पूर्ण अङ्गोंमें विभूति लगी थी। धवल वर्ण था। गलेमें अस्थियोंकी माला थी, जो आभूषणका काम देती थी। कंधेपर सर्पमय यज्ञोपवीत तथा सिरपर तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाली जटा थी। हाथोंमें शृङ्ग और डमरू थे। सुप्रशस्त एवं मनोहर रूप चित्तको आकृष्ट कर लेता था। भगवान् शिव श्वेत कमलोंके बीजकी मालासे हरिनामका जप करते थे। उनके प्रसन्न मुखपर मन्दहासकी छटा छा रही थी। वे भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर दिखायी देते थे। अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उनके पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। फिर दूसरे ही क्षणमें वह भिक्षुक 'जगत्स्रष्टा' चतुर्मुख ब्रह्माके रूपमें दृष्टिगोचर हुआ। ब्रह्माजी स्फटिककी माला लेकर हरिनामका जप कर रहे थे।
हिमवान्ने देखा, क्षणभरमें वह त्रिगुणात्मक सूर्यस्वरूप हो गया। अत्यन्त दुःसह प्रकाशसे युक्त सूर्यदेव ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान थे। फिर एक क्षणतक वह अत्यन्त तेजसे प्रज्वलित अग्निके रूपमें विद्यमान रहा। तत्पश्चात् क्षणभर आह्लादजनक चन्द्रमाके रूपमें शोभा पाता रहा। तदनन्तर एक ही क्षणमें तेजःस्वरूप, निराकार, निरञ्जन, निर्लिप्त, निरीह परमात्मस्वरूपमें स्थित हो गया। इस प्रकार स्वेच्छामय नाना रूप धारण करनेवाले परमेश्वरका दर्शनकर शैलराजके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये। उनका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो गया। उन्होंने साष्टाङ्ग दण्डवत्-प्रणाम किया और भक्तिभावसे परिक्रमा करके बारंबार मस्तक झुकाया। फिर हर्षसे उछलकर हिमवान्ने जब पुनः देखा तो वही भिक्षुक सामने था। वास्तवमें वह भिक्षुक ही है—ऐसा उन्हें दिखायी दिया। भगवान् विष्णुकी मायासे शैलराज उसके नाना रूप-धारण-सम्बन्धी सब बातोंको भूल गये। भिक्षुक उनसे भीख माँगने लगा। उसके पास भिक्षाका पात्र था। उसने रक्त वस्त्र धारण किया था। हाथोंमें शृङ्ग और विचित्र डमरूके बाजे थे। वह भिक्षामें केवल दुर्गाको ग्रहण करनेके लिये उत्सुक था, दूसरी किसी वस्तुको नहीं, परंतु विष्णु-मायासे मोहित हुए शैलराजने उसकी याचना स्वीकार नहीं की। भिक्षुने भी और कुछ नहीं लिया। वह वहीं अन्तर्धान हो गया। प्रिये! उस समय मेना और गिरिराजको ज्ञान हुआ। वे बोले—'अहो! हमने विश्वनाथको दिनमें स्वप्नकी भाँति देखा है। भगवान् शिव हम दोनोंको वञ्चित करके अपने स्थानको चले गये।'
उन दोनों पति-पत्नीकी भगवान् शिवमें भक्ति बढ़ रही है—यह देख सब देवताओंको चिन्ता हो गयी। इन्द्र आदि देवता भारसे सुमेरुकी रक्षाके लिये युक्ति करने लगे। वे आपसमें कहने लगे—'यदि हिमवान् अनन्य भक्तिसे भारतमें भगवान् शिवको कन्यादान करेंगे तो निश्चय ही निर्वाण-मोक्षको प्राप्त होंगे। अनन्त रत्नोंका आधार हिमालय यदि पृथ्वीको छोड़कर चला जायगा तो इसका 'रत्नगर्भा' नाम अवश्य ही मिथ्या हो जायगा। शूलपाणि शिवको अपनी कन्या दे स्थावरत्वका परित्याग और दिव्य रूप धारण
३६- अनरण्यकी पुत्री पद्माकी धर्मद्वारा परीक्षा, सती पद्माका उनको शाप देना तथा उस शापसे उनकी रक्षाकी भी व्यवस्था करना, वसिष्ठजीका हिमवान्को संक्षेपसे सतीके देह-त्यागका प्रसङ्ग सुनाना
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करके वे विष्णुलोकको चले जायँगे। फिर तो अनायास ही उन्हें नारायणका सारूप्य प्राप्त हो जायगा। वे भगवान्के पार्षदभावको पाकर हरिदास हो जायँगे।' यह सब सोचकर देवताओंने आपसमें सलाह की और वे गुरु बृहस्पतिको हिमालयके घर भेजनेके लिये गये। उन सबने गुरुको प्रणाम करके निवेदन किया—'गुरुदेव! आप हिमालयके यहाँ जाकर उनके समक्ष भगवान् शिवकी निन्दा कीजिये। यह तो निश्चय है कि दुर्गा शिवके सिवा दूसरे किसी वरका वरण नहीं करेगी। उस दशामें हिमवान् अनिच्छासे ही अपनी पुत्री शिवको देंगे। ऐसा करनेसे कन्यादानका फल कम हो जायगा। कालान्तरमें गिरिराज भले ही मुक्त हो जायँ; परंतु इस समय तो इन्हें पृथ्वीपर रहना ही चाहिये। भगवन्! आप ही अनन्त रत्नोंके आधारभूत हिमालयको भारतवर्षमें रखिये। (इन्हें यहाँसे जाने न दीजिये।)
देवताओंका वचन सुनकर गुरु बृहस्पतिजीने दोनों हाथ कानोंमें लगा लिये और 'नारायण!' 'नारायण!' का स्मरण करते हुए उनकी प्रार्थना अस्वीकार कर दी। वेद-वेदान्तके विद्वान् बृहस्पति हरि और हरके महान् भक्त थे। उन्होंने देवताओंको बारंबार फटकारकर कहा।
बृहस्पति बोले—स्वार्थ-साधनमें तत्पर रहनेवाले देवताओ! मेरी सच्ची बात सुनो। मेरा यह वचन नीतिका सारतत्त्व, वेदोंद्वारा प्रतिपादित तथा परिणाममें सुख देनेवाला है। जो पापी शिव और विष्णुके भक्तकी, भूदेवता ब्राह्मणोंकी, गुरु और पतिव्रताकी, पति, भिक्षु, ब्रह्मचारी तथा सृष्टिके बीजभूत देवताओंकी निन्दा करते हैं; वे चन्द्रमा और सूर्यके रहनेतक कालसूत्र नामक नरकमें पकाये जाते हैं। उन्हें कफ तथा मल-मूत्रमें दिन-रात सोना पड़ता है। उन्हें कीड़े खाते हैं और वे कातर वाणीमें आर्तनाद करते हैं। जो सृष्टिकर्ता जगद्गुरु ब्रह्माकी निन्दा करते हैं; जो सुरश्रेष्ठ शिव, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, गीता, तुलसी, गङ्गा, वेद, वेदमाता सावित्री, व्रत, तपस्या, पूजा, मन्त्र तथा मन्त्रदाता गुरुमें दोष बताते हैं; वे अन्धकूप नामक नरकमें यातना भोगते हैं और वहाँ उन्हें ब्रह्माकी आधी आयुतक रहना पड़ता है तथा वे सर्प-समूहोंसे भक्षित हो सदा चीखते-चिल्लाते रहते हैं। जो दूसरे देवताओंके साथ तुलना करके भगवान् हृषीकेशकी निन्दा करते हैं; विष्णुभक्ति प्रदान करनेवाले पुराणमें, जो श्रुतिसे भी उत्कृष्ट है, दोष निकालते हैं; राधा तथा उनकी कायव्यूहरूपा गोपियोंकी और सदा पूजित होनेवाले ब्राह्मणोंकी भी निन्दा करते हैं; वे देवता ही क्यों न हों, ब्रह्माजीकी आयुपर्यन्त नरकके गड्ढेमें पकाये जाते हैं। उनके मुँह नीचे लटकाये जाते हैं और उनकी जाँघें ऊपरकी ओर होती हैं। विकृताकार सर्पसमूह तथा सर्पकी-सी आकृतिवाले कीट उनके सारे अङ्गोंमें लिपटकर काटते रहते हैं और वे अत्यन्त कातर तथा भयभीत हो सदा आर्तनाद किया करते हैं। निश्चय ही वहाँ उन्हें क्षोभपूर्वक कफ एवं मल-मूत्र खाने पड़ते हैं। रोषसे भरे हुए यमराजके किङ्कर उनके मुँहमें जलती हुई लुआठी डाल देते हैं। तीनों संध्याओंके समय उन्हें डाँट बताते हुए डंडोंसे पीटते हैं। डंडोंके प्रहारसे जब उन्हें प्यास लगती है, तब वे उन यमदूतोंके भयसे मूत्र-पान करते हैं। जब दूसरा कल्प आरम्भ होता है और पहले-पहल सृष्टिका आयोजन किया जाता है, उस समय उन पापियोंके पापोंका निवारण होता है—ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। निश्चय ही शिवकी निन्दा करनेवाले देवता नरकमें पड़ेंगे। मेरे बच्चो! क्या तुमलोग मेरा यही उपकार करना चाहते हो? ब्रह्माजीकी आज्ञासे दक्ष प्रजापतिने शूलपाणि शंकरको अपनी पुत्री दी। उसीके पुण्यसे शिवकी निन्दा करनेपर भी उन्हें पाप नहीं लगा; अपितु परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई। उन्होंने अनिच्छासे ही
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भगवान् शंकरको कन्यादान किया था। इसलिये उन्हें चौथाई पुण्यकी ही प्राप्ति हुई। अतएव वे सारूप्य मोक्षको न पाकर तुच्छ सृष्टिका ही अधिकार प्राप्त कर सके। देवताओ! तुम्हीं लोगोंमेंसे कोई हिमवान्के घर जाकर अपने मतके अनुसार कार्य करे और प्रयत्नपूर्वक शैलराजके मनमें अश्रद्धा उत्पन्न करे। अनिच्छासे कन्यादान करके गिरिराज हिमवान् सुखपूर्वक भारतवर्षमें स्थित रहें। भक्तिपूर्वक शिवको पुत्री देकर तो वे निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेंगे। अश्रद्धा उत्पन्न होनेके बाद अरुन्धतीको साथ ले सब सप्तर्षि अवश्य ही गिरिराजके घर जाकर उन्हें समझायेंगे। दुर्गा शिवके सिवा दूसरे किसी वरका वरण नहीं करेगी। उस दशामें पुत्रीके आग्रहसे वे अनिच्छापूर्वक शिवको अपनी कन्या देंगे। इस प्रकार मैंने अपना सारा विचार व्यक्त कर दिया। अब देवतालोग अपने-अपने घरको पधारें।
यों कहकर बृहस्पतिजी शीघ्र ही तपस्याके लिये आकाशगङ्गाके तटपर चले गये।
(अध्याय ४०)
ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका शिवजीसे शैलराजके घर जानेका अनुरोध करना, शिवका ब्राह्मण-वेषमें जाकर अपनी ही निन्दा करके शैलराजके मनमें अश्रद्धा उत्पन्न करना, मेनाका पुत्रीको साथ ले कोप-भवनमें प्रवेश और शिवको कन्या न देनेके लिये दृढ़ निश्चय, सप्तर्षियों और अरुन्धतीका आगमन तथा शैलराज एवं मेनाको समझाना, वसिष्ठ और हिमवान्की बातचीत, शिवकी महत्ता तथा देवताओंकी प्रबलताका प्रतिपादन, प्रसङ्गवश राजा अनरण्य, उनकी पुत्री पद्मा तथा पिप्पलादमुनिकी कथा
श्रीकृष्ण कहते हैं— तब देवतालोग आपसमें विचार करके ब्रह्माजीके निकट गये। वहाँ उन्होंने उन लोकनाथ ब्रह्मासे अपना अभिप्राय निवेदन किया।
देवता बोले— संसारकी सृष्टि करनेवाले पितामह! आपकी सृष्टिमें हिमालय सब रत्नोंका आधार है। वह यदि मोक्षको प्राप्त हो जायगा तो पृथ्वी रत्नगर्भा कैसे कहलायेगी? शूलपाणि शंकरको भक्तिपूर्वक अपनी पुत्री देकर शैलराज स्वयं नारायणका सारूप्य प्राप्त कर लेंगे—इसमें संशय नहीं है। अतः आप शिवकी निन्दा करके गिरिराजके मनमें अश्रद्धा उत्पन्न कीजिये। प्रभो! आपके सिवा दूसरा कोई यह कार्य करनेमें समर्थ नहीं है। इसलिये आप उनके घर जाइये।
देवताओंकी यह बात सुनकर स्वयं ब्रह्माजी उनसे कानोंको अमृतके समान मधुर प्रतीत होनेवाला तथा नीतिका सारभूत उत्तम वचन बोले।
ब्रह्माजीने कहा— बच्चो! मैं शिवकी निन्दा करनेमें समर्थ नहीं हूँ। यह अत्यन्त दुष्कर कार्य है। शिवकी निन्दा सम्पत्तिका नाश करनेवाली और विपत्तिका बीज है। तुमलोग भूतनाथ शिवको ही वहाँ भेजो। वे स्वयं अपनी निन्दा करें। परायी निन्दा विनाशका और अपनी निन्दा यशका कारण होती है*।
प्रिये! ब्रह्माजीका वचन सुनकर उन्हें प्रणाम
* परनिन्दा विनाशाय स्वनिन्दा यशसे परम्। (४१।७)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५९७
करके देवतालोग शीघ्र ही कैलास पर्वतको गये और वहाँ पहुँचकर भगवान् शिवकी स्तुति करने लगे। स्तुति करके उन सबने करुणानिधान शंकरको अपना अभिप्राय बताया। उनकी बात सुनकर भगवान् शंकर हँसे और उन्हें आश्वासन दे स्वयं शैलराजके पास गये; फिर तो सब देवता शीघ्र ही अपने घर लौटकर आनन्दका अनुभव करने लगे। क्यों न हो, इष्टसिद्धि आनन्द देनेवाली और अभीष्ट वस्तुकी असिद्धि सदा दुःख बढ़ानेवाली होती है।
उधर शैलराज अपनी सभामें बन्धुवर्गसे घिरे हुए प्रसन्नतापूर्वक बैठे थे। उनके साथ पार्वती भी थीं। इसी बीच स्वयं भगवान् शिव ब्राह्मणका रूप धारण करके सहसा वहाँ आ पहुँचे। उनके मुख और नेत्रोंसे प्रसन्नता प्रकट हो रही थी। ब्राह्मणके हाथमें दण्ड और छत्र था। उनका वस्त्र लंबा था। उन्होंने ललाटमें उत्तम तिलक लगा रखा था। उनके एक हाथमें स्फटिकमणिकी माला थी और उन्होंने गलेमें भगवान् शालग्रामको धारण कर रखा था। उन्हें देखते ही हिमवान् अपने सेवकगणोंसहित उठकर खड़े हो गये। उन्होंने भूमिपर दण्डकी भाँति पड़कर भक्तिभावसे उस अपूर्व अतिथिको प्रणाम किया। पार्वतीने भी विप्ररूपधारी प्राणेश्वरको भक्तिपूर्वक मस्तक झुकाया। फिर ब्राह्मणने सबको प्रसन्नतापूर्वक आशीर्वाद दिये। गिरिराजके दिये हुए आसनपर वे शीघ्रतापूर्वक बैठे और आतिथ्यमें मधुपर्क आदि जो कुछ भी मिला, वह सब उन्होंने प्रेमपूर्वक ग्रहण किया। शैलराजने ब्राह्मणका कुशल-समाचार पूछते हुए कहा—'विप्रवर! आपका परिचय क्या है?' तब उन द्विजराजने गिरिराजको आदरपूर्वक सब कुछ बताया।
ब्राह्मण बोले—गिरिराज! मैं घटक¹-वृत्तिका आश्रय लेकर भूमण्डलमें घूमता रहता हूँ। मेरी मनके समान तीव्र गति है। गुरुदेवके वरदानसे मैं सर्वत्र पहुँचनेमें समर्थ एवं सर्वज्ञ हूँ। मुझे ज्ञात हुआ है कि तुम अपनी इस लक्ष्मी-सरीखी दिव्य कन्याको शंकरके हाथमें देना चाहते हो, जिसके शील और कुलका कुछ भी पता नहीं है। शंकर निराश्रय हैं—उनका कहीं भी ठौर-ठिकाना नहीं है। वे असङ्ग—सदा अकेले रहनेवाले हैं। उनके न रूप है, न गुण। वे श्मशानमें विचरनेवाले, सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति तथा योगी हैं। शरीरपर वस्त्रतक नहीं है। सदा दिगम्बर—नंग-धड़ंग रहते हैं। उनके शरीरमें सर्पोंका वास है। अङ्गरागके स्थानमें राख—भभूत ही उनके अंगोंको विभूषित करती है। उनका स्वरूप ही व्यालग्राही (दुष्टों अथवा सर्पोंको ग्रहण करनेवाला) है। वे कालका व्यापादन (नाश या अपव्यय) करनेवाले हैं। अज्ञात²मृत्यु, ज्ञ³ अथवा अज्ञ, अनाथ⁴ और अबन्धु⁵ हैं। भव (संसारकी उत्पत्तिके कारण) अथवा अभव (जन्मरहित) हैं। वे सिरपर तपाये हुए सुवर्णकी- सी कान्तिवाली जटाओंका बोझ धारण करनेवाले (विरक्त) तथा निर्धन हैं। उनकी अवस्था कितनी
१- जो वरके लिये योग्य कन्या और कन्याके लिये योग्य वरका पता देकर उन दोनोंमें सगाई या वैवाहिक सम्बन्ध पक्का कराते हैं, उन्हें 'घटक' कहते हैं। उनकी वृत्ति ही घटक या घाटिका-वृत्ति है।
२- निन्दापक्षमें अज्ञातमृत्युका अर्थ है, जिसकी मृत्युका किसीको ज्ञान नहीं है अर्थात् जन्मकुण्डली आदि न होनेसे जिनकी आयुका पता लगाना असम्भव है। कन्या उसको दी जाती है, जिसके दीर्घायु होनेका निश्चय कर लिया गया हो। स्तुतिपक्षमें—जिन्हें मृत्युका कभी अनुभव नहीं हुआ अर्थात् जो अमर एवं मृत्युञ्जय है।
३- निन्दापक्षमें 'अज्ञ' पदच्छेद है और स्तुतिपक्षमें 'ज्ञ'।
४- निन्दापक्षमें अनाथका अर्थ असहाय है और स्तुतिपक्षमें जो नाथरहित है—स्वयं ही सबके नाथ हैं।
५- अबन्धु—बन्धुहीन, बेसहारा अथवा अद्वितीय।