भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ
१८०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कालीने सिंहनाद किया। देवीके उस सिंहनादसे दानव मूर्च्छित हो गये। कालीने बारंबार दैत्योंके लिये अमङ्गलसूचक अट्टहास किया। वे युद्धके मुहानेपर हर्षपूर्वक मधु पीने और नृत्य करने लगीं। उग्रदंष्ट्रा, उग्रचण्डा और कौट्टरी भी मधु-पान करने लगीं। योगिनियों और डाकिनियोंके गण तथा देवगण आदि भी इस कार्यमें योग देने लगे। कालीको उपस्थित देख शङ्खचूड़ तुरंत रणभूमिमें आ पहुँचा। दानव डरे हुए थे। दानवराजने उन सबको अभय दान दिया। कालीने प्रलयाग्निकी शिखाके समान अग्नि फेंकना आरम्भ किया, परंतु राजा शङ्खचूड़ने पार्जन्यास्त्रके द्वारा उसे अवहेलनापूर्वक बुझा दिया। तब कालीने तीव्र एवं परम अद्भुत वारुणास्त्र चलाया। परंतु दानवेन्द्रने गान्धर्वास्त्र चलाकर खेल-खेलमें ही उसे काट डाला। तदनन्तर कालीने अग्निशिखाके समान तेजस्वी माहेश्वरास्त्रका प्रयोग किया, किंतु राजा शङ्खचूड़ने वैष्णवास्त्रका प्रयोग करके उस अस्त्रको अवहेलनापूर्वक शीघ्र शान्त कर दिया। तब देवीने मन्त्रोच्चारणपूर्वक नारायणास्त्र चलाया। उसे देखते ही राजा रथसे उतर पड़ा और उस नारायणास्त्रको प्रणाम करने लगा। शङ्खचूड़ने दण्डकी भाँति भूमिपर पड़कर भक्तिभावसे नारायणास्त्रको साष्टाङ्ग प्रणाम किया। तब प्रलयाग्निकी शिखाके समान तेजस्वी वह अस्त्र ऊपरको चला गया। तदनन्तर कालीने मन्त्रके साथ यत्नपूर्वक ब्रह्मास्त्र चलाया; किंतु महाराज शङ्खचूड़ने अपने ब्रह्मास्त्रसे उसे शान्त कर दिया। फिर तो देवीने मन्त्रोच्चारणपूर्वक बड़े-बड़े दिव्यास्त्र चलाये। परंतु राजाने अपने दिव्यास्त्रोंसे उन सबको शान्त कर दिया। इसके बाद देवीने बड़े यत्नसे शक्तिका प्रहार किया, जो एक योजन लंबी थी। परंतु दानवराजने अपने तीखे अस्त्रोंके समूहसे उसके सौ टुकड़े कर डाले। तब देवीने मन्त्रोच्चारणपूर्वक पाशुपतास्त्रको हाथमें उठा लिया और उसे चलाना ही चाहती थीं कि उन्हें मना करती हुई यह स्पष्ट आकाशवाणी हुई—'यह राजा एक महान् पुरुष है, इसकी मृत्यु पाशुपतास्त्रसे कदापि नहीं होगी। जबतक यह अपने गलेमें भगवान् श्रीहरिके मन्त्रका कवच धारण किये रहेगा और जबतक इसकी पतिव्रता पत्नी अपने सतीत्वकी रक्षा करती रहेगी, तबतक इसके समीप जरा और मृत्यु अपना कुछ भी प्रभाव नहीं डाल सकती—यह ब्रह्माका वर है।'

इस आकाशवाणीको सुनकर भगवती भद्रकालीने शस्त्र चलाना बंद कर दिया। अब वे क्षुधातुर होकर करोड़ों दानवोंको लीलापूर्वक निगलने लगीं। भयंकर वेषवाली वे देवी शङ्खचूड़को खा जानेके लिये बड़े वेगसे उसकी ओर झपटीं। तब दानवने अपने अत्यन्त तेजस्वी दिव्यास्त्रसे उन्हें रोक दिया। भद्रकाली अपनी सहयोगिनी योगिनियोंके साथ भाँति-भाँतिसे दैत्यदलका विनाश करने लगीं। उन्होंने दानवराज शङ्खचूड़को भी बड़ी चोट पहुँचायी, पर वे दानवराजका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकीं। तब वे भगवान् शंकरके पास चली गयीं और उन्होंने आरम्भसे लेकर अन्ततक क्रमशः युद्ध-सम्बन्धी सभी बातें भगवान् शंकरको बतलायीं। दानवोंका विनाश सुनकर भगवान् हँसने लगे।

भद्रकालीने यह भी कहा—'अब भी रणभूमिमें लगभग एक लाख प्रधान दानव बचे हुए हैं। मैं उन्हें खा रही थी, उस समय जो मुखसे निकल गये, वे ही बच रहे हैं। फिर जब मैं संग्राममें दानवराज शङ्खचूड़पर पाशुपतास्त्र छोड़नेको तैयार हुई और जब आकाशवाणी हुई कि यह राजा तुमसे अवध्य है, तबसे महान् ज्ञानी एवं असीम बल-पराक्रमसे सम्पन्न उस दानवराजने मुझपर अस्त्र छोड़ना बंद कर दिया। वह मेरे छोड़े हुए बाणोंको काट भर देता था। (अध्याय १९)


प्रकृतिखण्ड १८१ भगवान् शंकर और शङ्खचूड़ का युद्ध, शंकरके त्रिशूलसे शङ्खचूड़का भस्म होना तथा सुदामा गोपके स्वरूपमें उसका विमानद्वारा गोलोक पधारना भगवान् नारायण कहते हैं- नारद ! भगवान् शिव तत्त्व जाननेमें परम प्रवीण हैं। भद्रकालीद्वारा युद्धकी सारी बातें सुनकर वे स्वयं अपने गणोंके साथ संग्राममें पहुँच गये। उन्हें देखकर शङ्खचूड़ विमानसे उतर गया और उसने परम भक्तिके साथ पृथ्वीपर मस्तक टेककर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। यों भक्तिविनम्र होकर प्रणाम करनेके पश्चात् वह तुरंत रथपर सवार हो गया और भगवान् शिवके साथ युद्ध करने लगा। ब्रह्मन् ! उस समय शिव और शङ्खचूड़में बहुत लंबे कालतक युद्ध होता रहा। कोई किसीसे न जीतते थे और न हारते थे। कभी समयानुसार शङ्खचूड़ शस्त्र रखकर रथपर ही विश्राम कर लेता और कभी भगवान् शंकर भी शस्त्र रखकर वृषभपर ही आराम कर लेते। शंकरके बाणोंसे असंख्य दानवोंका संहार हुआ। इधर संग्राममें देवपक्षके जो-जो योद्धा मरते थे, उनको विभु शंकर पुनः जीवित कर देते थे। उसी समय भगवान् श्रीहरि एक अत्यन्त आतुर बूढ़े ब्राह्मणका वेष बनाकर युद्धभूमिमें आये और दानवराज शङ्खचूड़से कहने लगे। वृद्ध ब्राह्मणके वेषमें पधारे हुए श्रीहरिने कहा - राजेन्द्र ! तुम मुझ ब्राह्मणको भिक्षा देनेकी कृपा करो। इस समय सम्पूर्ण शक्तियाँ प्रदान करनेकी तुममें पूर्ण योग्यता है। अतः तुम मेरी अभिलाषा पूर्ण करो। मैं निरीह, तृषित एवं वृद्ध ब्राह्मण हूँ। पहले तुम देनेके लिये सत्य प्रतिज्ञा कर लो, तब मैं तुमसे कहूँगा। राजेन्द्र शङ्खचूड़ने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा - 'हाँ, हाँ, बहुत ठीक - आप जो चाहें सो ले सकते हैं।' तब अतिशय माया फैलाते हुए उन वृद्ध ब्राह्मणने कहा- 'मैं तुम्हारा 'कृष्णकवच' चाहता हूँ।' उनकी बात सुनकर सत्यप्रतिज्ञ शङ्खचूड़ने तुरंत वह दिव्य कवच उन्हें दे दिया और उन्होंने उसे ले भी लिया। फिर वे ही श्रीहरि शङ्खचूड़का रूप बनाकर तुलसीके निकट गये। वहाँ जाकर कपटपूर्वक उन्होंने उससे हास-विलास किया। (इस प्रकार शङ्खचूड़की पत्नीके रूपमें उसका सतीत्व भङ्ग हो गया। यद्यपि तत्त्वरूपसे तो वह श्रीहरिकी परम प्रेयसी पत्नी ही थी।) ठीक इसी समय शंकरने शङ्खचूड़पर चलानेके लिये श्रीहरिका दिया हुआ त्रिशूल हाथमें उठा लिया। वह त्रिशूल इतना प्रकाशमान था, मानो ग्रीष्म ऋतुका मध्याह्नकालीन सूर्य हो, अथवा प्रलयकालीन प्रचण्ड अग्नि। वह दुर्निवार्य, दुर्धर्ष, अव्यर्थ और शत्रुसंहारक था। सम्पूर्ण शस्त्रोंके सारभूत उस त्रिशूलकी तेजमें चक्रके साथ तुलना की जाती थी। उस भयंकर त्रिशूलको शिव अथवा केशव - ये दो ही उठा सकते थे। अन्य किसीके मानका वह नहीं था। वह साक्षात् सजीव ब्रह्म ही था। उसके रूपका कभी परिवर्तन नहीं होता और सभी उसे देख भी नहीं पाते थे। नारद ! अखिल ब्रह्माण्डका संहार करनेकी उस त्रिशूलमें पूर्ण शक्ति थी। भगवान् शंकरने लीलासे ही उसे उठाकर हाथपर जमाया और शङ्खचूड़पर फेंक दिया। तब उस बुद्धिमान् नरेशने सारा रहस्य जानकर अपना धनुष धरतीपर फेंक दिया और वह बुद्धिपूर्वक योगासन लगाकर भक्तिके साथ अनन्य-चित्तसे भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलका ध्यान करने लगा। त्रिशूल कुछ समयतक तो चक्कर काटता रहा। तदनन्तर वह शङ्खचूड़के ऊपर जा गिरा। उसके गिरते ही तुरंत वह दानवेश्वर तथा उसका रथ - सभी जलकर भस्म हो गये।

२१- सावित्री देवीकी पूजा-स्तुतिका विधान

१८२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

दानव-शरीरके भस्म होते ही उसने एक दिव्य गोपका वेष धारण कर लिया। उसकी किशोर अवस्था थी। वह दो दिव्य भुजाओंसे सुशोभित था। उसके हाथमें मुरली शोभा पा रही थी और रत्नमय आभूषण उसके शरीरको विभूषित कर रहे थे। इतनेमें अकस्मात् सर्वोत्तम दिव्य मणियोंद्वारा निर्मित एक दिव्य विमान गोलोकसे उतर आया। उसमें चारों ओर असंख्य गोपियाँ बैठी थीं। शङ्खचूड़ उसीपर सवार होकर गोलोकके लिये प्रस्थित हो गया।

मुने! उस समय वृन्दावनमें रासमण्डलके मध्य भगवान् श्रीकृष्ण और भगवती श्रीराधिका विराजमान थीं। वहाँ पहुँचते ही शङ्खचूड़ने भक्तिके साथ मस्तक झुकाकर उनके चरणकमलोंमें साष्टाङ्ग प्रणाम किया। अपने चिरसेवक सुदामाको देखकर उन दोनोंके श्रीमुख प्रसन्नतासे खिल उठे। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर उसे अपनी गोदमें उठा लिया। तदनन्तर वह त्रिशूल बड़े वेगसे आदरपूर्वक भगवान् श्रीकृष्णके पास लौट आया। शङ्खचूड़की हड्डियोंसे शङ्खकी उत्पत्ति हुई। वही शङ्ख अनेक प्रकारके रूपोंमें विराजमान होकर देवताओंकी पूजामें निरन्तर पवित्र माना जाता है। उसके जलको श्रेष्ठ मानते हैं; क्योंकि देवताओंको प्रसन्न करनेके लिये वह अचूक साधन है। उस पवित्र जलको तीर्थमय माना जाता है। उसके प्रति केवल शंकरकी आदरबुद्धि नहीं है। जहाँ-कहीं भी शङ्खध्वनि होती है, वहीं लक्ष्मीजी सम्यक् प्रकारसे विराजमान रहती हैं। जो शङ्खके जलसे स्नान कर लेता है, उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नानका फल प्राप्त हो जाता है। शङ्ख साक्षात् भगवान् श्रीहरिका अधिष्ठान है। जहाँपर शङ्ख रहता है, वहाँ भगवान् श्रीहरि भगवती लक्ष्मीसहित सदा निवास करते हैं। अमङ्गल दूरसे ही भाग जाता है।

उधर शिव भी शङ्खचूड़को मारकर अपने लोकको पधार गये। उनके मनमें अपार हर्ष था। वे वृषभपर आरूढ़ होकर अपने गणोंसहित चले गये। अपना राज्य पा जानेके कारण देवताओंके हर्षकी सीमा नहीं रही। स्वर्गमें देव-दुन्दुभियाँ बज उठीं और गन्धर्व तथा किन्नर यशोगान करने लगे। भगवान् शंकरके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा आरम्भ हो गयी। देवताओं और मुनिगणोंने भगवान् शंकरकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। (अध्याय २०)


शङ्खचूड़-वेषधारी श्रीहरिद्वारा तुलसीका पातिव्रत्यभङ्ग, शङ्खचूड़का पुनः गोलोक जाना, तुलसी और श्रीहरिका वृक्ष एवं शालग्राम-पाषाणके रूपमें भारतवर्षमें रहना तथा तुलसीमहिमा, शालग्रामके विभिन्न लक्षण तथा महत्त्वका वर्णन

**नारदजीने कहा—**प्रभो! भगवान् नारायणने कौन-सा रूप धारण करके तुलसीसे हास-विलास किया था? यह प्रसङ्ग मुझे बतानेकी कृपा करें।

**भगवान् नारायण ऋषि कहते हैं—**नारद! भगवान् श्रीहरिने वैष्णवी माया फैलाकर शङ्खचूड़से कवच ले लिया। फिर शङ्खचूड़का ही रूप धारण करके वे साध्वी तुलसीके घर पहुँचे, वहाँ उन्होंने तुलसीके महलके दरवाजेपर दुन्दुभि बजवायी और जय-जयकारके घोषसे उस सुन्दरीको अपने आगमनकी सूचना दी।

तुलसीने पतिको युद्धसे आया देख उत्सव मनाया और महान् हर्षभरे हृदयसे स्वागत किया। फिर दोनोंमें युद्धसम्बन्धी चर्चा हुई; तदनन्तर शङ्खचूड़के वेषमें जगत्प्रभु भगवान् श्रीहरि सो गये। नारद! उस समय तुलसीके साथ उन्होंने सुचारूरूपसे

प्रकृतिखण्ड १८३ हास-विलास किया तथापि तुलसीको इस बार पहलेकी अपेक्षा आकर्षण आदिमें व्यतिक्रमका अनुभव हुआ; अतः उसने सारी वास्तविकताका अनुमान लगा लिया और पूछा। तुलसीने कहा-मायेश ! बताओ तो तुम कौन हो ? तुमने कपटपूर्वक मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया; इसलिये अब मैं तुम्हें शाप दे रही हूँ। ब्रह्मन् ! तुलसीके वचन सुनकर शापके भयसे भगवान् श्रीहरिने लीलापूर्वक अपना सुन्दर मनोहर स्वरूप प्रकट कर दिया। देवी तुलसीने डाला। प्रभो ! आप अवश्य ही पाषाण-हृदय हैं, तभी तो इतने निर्दय बन गये ! अतः देव ! मेरे शापसे अब पाषाणरूप होकर आप पृथ्वीपर रहें। अहो ! बिना अपराध ही अपने भक्तको आपने क्यों मरवा दिया ? इस प्रकार कहकर शोकसे संतप्त हुई तुलसी आँखोंसे आँसू गिराती हुई बार-बार विलाप करने लगी। तदनन्तर करुण-रसके समुद्र कमलापति भगवान् श्रीहरि करुणायुक्त तुलसीदेवीको देखकर नीतिपूर्वक वचनोंसे उसे समझाने लगे। भगवान् श्रीहरि बोले- भद्रे ! तुम मेरे लिये भारतवर्षमें रहकर बहुत दिनोंतक तपस्या कर चुकी हो। उस समय तुम्हारे लिये शङ्खचूड़ भी तपस्या कर रहा था। (वह मेरा ही अंश था।) अपनी तपस्याके फलसे तुम्हें स्त्रीरूपमें प्राप्त करके वह गोलोकमें चला गया। अब मैं तुम्हारी तपस्याका फल देना उचित समझता हूँ। तुम इस शरीरका त्याग करके दिव्य देह धारणकर मेरे साथ आनन्द करो। लक्ष्मीके समान तुम्हें सदा मेरे साथ रहना चाहिये। तुम्हारा यह शरीर नदीरूपमें परिणत हो 'गण्डकी' नामसे प्रसिद्ध होगा। यह पवित्र नदी पुण्यमय भारतवर्षमें मनुष्योंको उत्तम पुण्य देनेवाली बनेगी। तुम्हारे केशकलाप पवित्र वृक्ष होंगे। तुम्हारे केशसे उत्पन्न होनेके कारण तुलसीके नामसे ही उनकी प्रसिद्धि होगी। वरानने ! तीनों लोकोंमें देवताओंकी पूजाके काममें आनेवाले जितने भी पत्र और पुष्प हैं, उन सबमें तुलसी प्रधान मानी जायगी। स्वर्गलोक, मर्त्यलोक, पाताल तथा वैकुण्ठलोकमें-सर्वत्र तुम मेरे संनिकट रहोगी। सुन्दरि ! तुलसीके वृक्ष सब पुष्पोंमें श्रेष्ठ हों। गोलोक, विरजा नदीके तट, रासमण्डल, वृन्दावन, भूलोक, भाण्डीरवन, चम्पकवन, मनोहर चन्दनवन एवं माधवी, केतकी, अपने सामने उन सनातन प्रभु देवेश्वर श्रीहरिको विराजमान देखा। भगवान्‌का दिव्य विग्रह नूतन मेघके समान श्याम था। आँखें शरत्कालीन कमलकी तुलना कर रही थीं। उनके अलौकिक रूप-सौन्दर्यमें करोड़ों कामदेवोंकी लावण्य-लीला प्रकाशित हो रही थी। रत्नमय भूषण उन्हें आभूषित किये हुए थे। उनका प्रसन्नवदन मुस्कानसे भरा था। उनके दिव्य शरीरपर पीताम्बर सुशोभित था। उन्हें देखकर पतिके निधनका अनुमान करके कामिनी तुलसी मूर्च्छित हो गयी। फिर चेतना प्राप्त होनेपर उसने कहा। तुलसी बोली-नाथ ! आपका हृदय पाषाणके सदृश है; इसीलिये आपमें तनिक भी दया नहीं है। आज आपने छलपूर्वक (मेरे इस शरीरका) धर्म नष्ट करके मेरे (इस शरीरके) स्वामीको मार

१८४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कुन्द और मल्लिकाके वनमें तथा सभी पुण्य स्थानोंमें तुम्हारे पुण्यप्रद वृक्ष उत्पन्न हों और रहें। तुलसी-वृक्षके नीचेके स्थान परम पवित्र एवं पुण्यदायक होंगे; अतएव वहाँ सम्पूर्ण तीर्थों और समस्त देवताओंका भी अधिष्ठान होगा। वरानने ! ऊपर तुलसीके पत्ते पडें, इसी उद्देश्यसे वे सब लोग वहाँ रहेंगे। तुलसीपत्रके जलसे जिसका अभिषेक हो गया, उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करने तथा समस्त यज्ञोंमें दीक्षित होनेका फल मिल गया। साध्वी ! हजारों घड़े अमृतसे नहलानेपर भी भगवान् श्रीहरिको उतनी तृप्ति नहीं होती है, जितनी वे मनुष्योंके तुलसीका एक पत्ता चढ़ानेसे प्राप्त करते हैं। पतिव्रते ! दस हजार गोदानसे मानव जो फल प्राप्त करता है, वही फल तुलसी-पत्रके दानसे पा लेता है। जो मृत्युके समय मुखमें तुलसी-पत्रका जल पा जाता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके लोकमें चला जाता है। जो मनुष्य नित्यप्रति भक्तिपूर्वक तुलसीका जल ग्रहण करता है, वही जीवन्मुक्त है और उसे गङ्गा-स्नानका फल मिलता है। जो मानव प्रतिदिन तुलसीका पत्ता चढ़ाकर मेरी पूजा करता है, वह लाख अश्वमेध-यज्ञोंका फल पा लेता है। जो मानव तुलसीको अपने हाथमें लेकर और शरीरपर रखकर तीर्थोंमें प्राण त्यागता है, वह विष्णुलोकमें चला जाता है। तुलसी-काष्ठकी मालाको गलेमें धारण करनेवाला पुरुष पद-पदपर अश्वमेध-यज्ञके फलका भागी होता है, इसमें संदेह नहीं।

जो मनुष्य तुलसीको अपने हाथपर रखकर प्रतिज्ञा करता है और फिर उस प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता, उसे सूर्य और चन्द्रमाकी अवधिपर्यन्त 'कालसूत्र' नामक नरकमें यातना भोगनी पड़ती है। जो मनुष्य तुलसीको हाथमें लेकर या उसके निकट झूठी प्रतिज्ञा करता है, वह 'कुम्भीपाक' नामक नरकमें जाता है और वहाँ दीर्घकालतक वास करता है। मृत्युके समय जिसके मुखमें तुलसीके जलका एक कण भी चला जाता है वह अवश्य ही विष्णुलोकको जाता है। पूर्णिमा, अमावास्या, द्वादशी और सूर्य-संक्रान्तिके दिन, मध्याह्नकाल, रात्रि, दोनों संध्याओं और अशौचके समय, तेल लगाकर, बिना नहाये-धोये अथवा रातके कपड़े पहने हुए जो मनुष्य तुलसीके पत्रोंको तोड़ते हैं, वे मानो भगवान् श्रीहरिका मस्तक छेदन करते हैं। साध्वि ! श्राद्ध, व्रत, दान, प्रतिष्ठा तथा देवार्चनके लिये तुलसीपत्र बासी होनेपर भी तीन राततक पवित्र ही रहता है। पृथ्वीपर अथवा जलमें गिरा हुआ तथा श्रीविष्णुको अर्पित तुलसी-पत्र धो देनेपर दूसरे कार्यके लिये शुद्ध माना जाता है।*


* तव केशसमूहाश्च पुण्यवृक्षा भवन्त्विति। तुलसीकेशसम्भूतास्तुलसीति च विश्रुताः॥
त्रिषु लोकेषु पुष्पाणां पत्राणां देवपूजने। प्रधानरूपा तुलसी भविष्यति वरानने॥
स्वर्गे मर्त्ये च पाताले वैकुण्ठे मम संनिधौ। भवन्तु तुलसीवृक्षा वराः पुष्पेषु सुन्दरि॥
गोलोके विरजातीरे रासे वृन्दावने भुवि। भाण्डीरे चम्पकवने रम्ये चन्दनकानने॥
माधवीकेतकीकुन्दमल्लिकामालतीवने । भवन्तु तरवस्तत्र पुण्यस्थानेषु पुण्यदाः॥
तुलसीतरुमूले च पुण्यदेशे सुपुण्यदे। अधिष्ठानं तु तीर्थानां सर्वेषां च भविष्यति॥
तत्रैव सर्वदेवानां समधिष्ठानमेव च। तुलसीपत्रपतनप्राप्तये च वरानने॥
स स्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः। तुलसीपत्रतोयेन योऽभिषेकं समाचरेत्॥
सुधाघटसहस्रेण सा तृप्तिर्न भवेद्धरेः। या च तृप्तिर्भवेन्नॄणां तुलसीपत्रदानतः॥
गवामयुतदानेन यत्फलं लभते नरः। तुलसीपत्रदानेन तत्फलं लभते सति॥
तुलसीपत्रतोयं च मृत्युकाले च यो लभेत्। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥

प्रकृतिखण्ड १८५

तुम निरामय गोलोक-धाममें तुलसीकी अधिष्ठात्री देवी बनकर मेरे स्वरूपभूत श्रीकृष्णके साथ निरन्तर क्रीड़ा करोगी। तुम्हारी देहसे उत्पन्न नदीकी जो अधिष्ठात्री देवी है, वह भारतवर्षमें परम पुण्यदा नदी बनकर मेरे अंशभूत क्षार-समुद्रकी पत्नी होगी। स्वयं तुम महासाध्वी तुलसीरूपसे वैकुण्ठमें मेरे संनिकट निवास करोगी। वहाँ तुम लक्ष्मीके समान सम्मानित होओगी। गोलोकके रासमें भी तुम्हारी उपस्थिति होगी, इसमें संशय नहीं है।

मैं तुम्हारे शापको सत्य करनेके लिये भारतवर्षमें 'पाषाण' (शालग्राम) बनकर रहूँगा। गण्डकी नदीके तटपर मेरा वास होगा। वहाँ रहनेवाले करोड़ों कीड़े अपने तीखे दाँतरूपी आयुधोंसे काट-काटकर उस पाषाणमें मेरे चक्रका चिह्न करेंगे। जिसमें एक द्वारका चिह्न होगा, चार चक्र होंगे और जो वनमालासे विभूषित होगा, वह नवीन मेघके समान श्यामवर्णका पाषाण 'लक्ष्मी-नारायण' का बोधक होगा। जिसमें एक द्वार और चार चक्रके चिह्न होंगे तथा वनमालाकी रेखा नहीं प्रतीत होती होगी, ऐसे नवीन मेघकी तुलना करनेवाले श्यामरंगके पाषाणको 'लक्ष्मीजनार्दन' की संज्ञा दी जानी चाहिये। दो द्वार, चार चक्र और गायके खुरके चिह्नसे सुशोभित एवं वनमालाके चिह्नसे रहित श्याम पाषाणको भगवान् 'राघवेन्द्र' का विग्रह मानना चाहिये। जिसमें बहुत छोटे दो चक्रके चिह्न हों, उस नवीन मेघके समान कृष्णवर्णके पाषाणको भगवान् 'दधिवामन' मानना चाहिये, वह गृहस्थोंके लिये सुखदायक है। अत्यन्त छोटे आकारमें दो चक्र एवं वनमालासे सुशोभित पाषाण स्वयं भगवान् 'श्रीधर' का रूप है—ऐसा समझना चाहिये। ऐसी मूर्ति भी गृहस्थोंको सदा श्रीसम्पन्न बनाती है। जो पूरा स्थूल हो, जिसकी आकृति गोल हो, जिसके ऊपर वनमालाका चिह्न अङ्कित न हो तथा जिसमें दो अत्यन्त स्पष्ट चक्रके चिह्न दिखायी पड़ते हों, उस शालग्राम शिलाकी 'दामोदर' संज्ञा है। जो मध्यम श्रेणीका वर्तुलाकार हो, जिसमें दो चक्र तथा तरकस और बाणके चिह्न शोभा पाते हों, एवं जिसके ऊपर बाणसे कट जानेका चिह्न हो, उस पाषाणको रणमें शोभा पानेवाले भगवान् 'रणराम' की संज्ञा देनी चाहिये। जो मध्यम श्रेणीका पाषाण सात चक्रोंसे तथा छत्र एवं तरकससे अलंकृत हो, उसे भगवान् 'राजराजेश्वर' की प्रतिमा समझे। उसकी उपासनासे मनुष्योंको राजाकी सम्पत्ति सुलभ हो सकती है। चौदह चक्रोंसे सुशोभित तथा नवीन मेघके समान रंगवाले स्थूल पाषाणको भगवान् 'अनन्त' का विग्रह मानना चाहिये। उसके पूजनसे धर्म, अर्थ,


नित्यं यस्तुलसीतोयं भुङ्क्ते भक्त्या च मानवः। स एव जीवन्मुक्तश्च गङ्गास्नानफलं लभेत्॥
नित्यं यस्तुलसीं दत्त्वा पूजयेन्मां च मानवः। लक्षाश्वमेधजं पुण्यं लभते नात्र संशयः॥
तुलसीं स्वकरे कृत्वा देहे धृत्वा च मानवः। प्राणांस्त्यजति तीर्थेषु विष्णुलोकं स गच्छति॥
तुलसीकाष्ठनिर्माणमालां गृह्णाति यो नरः। पदे पदेऽश्वमेधस्य लभते निश्चितं फलम्॥
तुलसीं स्वकरे धृत्वा स्वीकारं यो न रक्षति। स याति कालसूत्रं च यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
करोति मिथ्या शपथं तुलस्या यो हि मानवः। स याति कुम्भीपाकं च यावदिन्द्राश्चतुर्दश॥
तुलसीतोयकणिकां मृत्युकाले च यो लभेत्। रत्नयानं समारुह्य वैकुण्ठं स प्रयाति च॥
पूर्णिमायाममायां च द्वादश्यां रविसंक्रमे। तैलाभ्यङ्गे चास्नाते च मध्याह्ने निशि संध्ययोः॥
अशौचेऽशुचिकाले वा रात्रिवासोऽन्विता नराः। तुलसीं ये विचिन्वन्ति ते छिन्दन्ति हरेः शिरः॥
त्रिरात्रं तुलसीपत्रं शुद्धं पर्युषितं सति। श्राद्धे व्रते च दाने च प्रतिष्ठायां सुरार्चने॥
भूतं तोयपतितं यद्दत्तं विष्णवे सति। शुद्धं च तुलसीपत्रं क्षालनादन्यकर्मणि॥
(प्रकृतिखण्ड २१। ३२—५३)

१८६ || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

काम और मोक्ष—ये चारों फल प्राप्त होते हैं। जिसकी आकृति चक्रके समान हो तथा जो दो चक्र, श्री और गो-खुरके चिह्नसे शोभा पाता हो, ऐसे नवीन मेघके समान वर्णवाले मध्यम श्रेणीके पाषाणको भगवान् ‘मधुसूदन’ समझना चाहिये। केवल एक चक्रवाला ‘सुदर्शन’ का, गुप्तचक्र-चिह्नवाला ‘गदाधर’ का तथा दो चक्र एवं अश्वके मुखकी आकृतिसे युक्त पाषाण भगवान् ‘हयग्रीव’ का विग्रह कहा जाता है। साध्वि ! जिसका मुख अत्यन्त विस्तृत हो, जिसपर दो चक्र चिह्नित हों तथा जो बड़ा विकट प्रतीत होता हो ऐसे पाषाणको भगवान् ‘नरसिंह’ की प्रतिमा समझनी चाहिये। वह मनुष्यको तत्काल वैराग्य प्रदान करनेवाला है। जिसमें दो चक्र हों, विशाल मुख हो तथा जो वनमालाके चिह्नसे सम्पन्न हो, गृहस्थोंके लिये सदा सुखदायी हो, उस पाषाणको भगवान् ‘लक्ष्मीनारायण’ का विग्रह समझना चाहिये। जो द्वार-देशमें दो चक्रोंसे युक्त हो तथा जिसपर श्रीका चिह्न स्पष्ट दिखायी पड़े, ऐसे पाषाणको भगवान् ‘वासुदेव’ का विग्रह मानना चाहिये। इस विग्रहकी अर्चनासे सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध हो सकेंगी। सूक्ष्म चक्रके चिह्नसे युक्त, नवीन मेघके समान श्याम तथा मुखपर बहुत-से छोटे-छोटे छिद्रोंसे सुशोभित पाषाण ‘प्रद्युम्न’ का स्वरूप होगा। उसके प्रभावसे गृहस्थ सुखी हो जायँगे। जिसमें दो चक्र सटे हुए हों और जिसका पृष्ठभाग विशाल हो, गृहस्थोंको निरन्तर सुख प्रदान करनेवाले उस पाषाणको भगवान् ‘संकर्षण’ की प्रतिमा समझनी चाहिये। जो अत्यन्त सुन्दर गोलाकार हो तथा पीले रंगसे सुशोभित हो, विद्वान् पुरुष कहते हैं कि गृहाश्रमियोंको सुख देनेवाला वह पाषाण भगवान् ‘अनिरुद्ध’ का स्वरूप है।

जहाँ शालग्रामकी शिला रहती है, वहाँ भगवान् श्रीहरि विराजते हैं और वहीं सम्पूर्ण तीर्थोंको साथ लेकर भगवती लक्ष्मी भी निवास करती हैं। ब्रह्महत्या आदि जितने पाप हैं, वे सब शालग्राम-शिलाकी पूजा करनेसे नष्ट हो जाते हैं। छत्राकार शालग्राममें राज्य देनेकी तथा वर्तुलाकारमें प्रचुर सम्पत्ति देनेकी योग्यता है। शकटके आकारवाले शालग्रामसे दुःख तथा शूलके नोकके समान आकारवालेसे मृत्यु होनी निश्चित है। विकृत मुखवाले दरिद्रता, पिङ्गलवर्णवाले हानि, भग्नचक्रवाले व्याधि तथा फटे हुए शालग्राम निश्चितरूपसे मरणप्रद हैं। व्रत, दान, प्रतिष्ठा तथा श्राद्ध आदि सत्कार्य शालग्रामकी संनिधिमें करनेसे सर्वोत्तम हो सकते हैं। जो अपने ऊपर शालग्राम-शिलाका जल छिड़कता है, वह सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर चुका तथा समस्त यज्ञोंका फल पा गया। अखिल यज्ञों, तीर्थों, व्रतों और तपस्याओंके फलका वह अधिकारी समझा जाता है। साध्वि ! चारों वेदोंके पढ़ने तथा तपस्या करनेसे जो पुण्य होता है, वही पुण्य शालग्राम-शिलाकी उपासनासे प्राप्त हो जाता है। जो निरन्तर शालग्राम-शिलाके जलसे अभिषेक करता है, वह सम्पूर्ण दानके पुण्य तथा पृथ्वीकी प्रदक्षिणाके उत्तम फलका मानो अधिकारी हो जाता है। शालग्राम-शिलाके जलका निरन्तर पान करनेवाला पुरुष देवाभिलषित प्रसाद पाता है; इसमें संशय नहीं। उसे जन्म, मृत्यु और जरासे छुटकारा मिल जाता है। सम्पूर्ण तीर्थ उस पुण्यात्मा पुरुषका स्पर्श करना चाहते हैं। जीवन्मुक्त एवं महान् पवित्र वह व्यक्ति भगवान् श्रीहरिके पदका अधिकारी हो जाता है। भगवान्‌के धाममें वह उनके साथ असंख्य प्राकृत प्रलयतक रहनेकी सुविधा प्राप्त करता है। वहाँ जाते ही भगवान् उसे अपना दास बना लेते हैं। उस पुरुषको देखकर, ब्रह्महत्याके समान जितने बड़े-बड़े पाप हैं, वे इस प्रकार भागने लगते हैं, जैसे गरुड़को देखकर सर्प। उस पुरुषके चरणोंकी रजसे पृथ्वीदेवी तुरंत पवित्र हो जाती हैं। उसके जन्म लेते ही लाखों पितरोंका उद्धार हो जाता है।

२२- राजा अश्वपतिद्वारा सावित्रीकी उपासना तथा फलस्वरूप सावित्री नामक कन्याकी उत्पत्ति, सत्यवान्के साथ सावित्रीका विवाह, सत्यवान्की मृत्यु, सावित्री और यमराजका संवाद

प्रकृतिखण्ड १८७ मृत्युकालमें जो शालग्रामके जलका पान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकको चला जाता है। उसे निर्वाणमुक्ति सुलभ हो जाती है। वह कर्मभोगसे छूटकर भगवान् श्रीहरिके चरणोंमें लीन हो जाता है— इसमें कोई संशय नहीं। शालग्रामको हाथमें लेकर मिथ्या बोलनेवाला व्यक्ति 'कुम्भीपाक' नरकमें जाता है और ब्रह्माकी आयुपर्यन्त उसे वहाँ रहना पड़ता है। जो शालग्रामको धारण करके की हुई प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता, उसे लाख मन्वन्तरतक 'असिपत्र' नामक नरकमें रहना पड़ता है। कान्ते ! जो व्यक्ति शालग्रामपरसे तुलसीके पत्रको दूर करेगा, उसे दूसरे जन्ममें स्त्री साथ न दे सकेगी। शङ्खसे तुलसीपत्रका विच्छेद करनेवाला व्यक्ति भार्याहीन तथा सात जन्मोंतक रोगी होगा। शालग्राम, तुलसी और शङ्ख—इन तीनोंको जो महान् ज्ञानी पुरुष एकत्र सुरक्षितरूपसे रखता है, उससे भगवान् श्रीहरि बहुत प्रेम करते हैं। नारद! इस प्रकार देवी तुलसीसे कहकर भगवान् श्रीहरि मौन हो गये। उधर देवी तुलसी अपना शरीर त्यागकर दिव्य रूपसे सम्पन्न हो भगवान् श्रीहरिके वक्षःस्थलपर लक्ष्मीकी भाँति शोभा पाने लगी। कमलापति भगवान् श्रीहरि उसे साथ लेकर वैकुण्ठ पधार गये। नारद! लक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा और तुलसी—ये चार देवियाँ भगवान् श्रीहरिकी पत्नियाँ हुईं। उसी समय तुलसीकी देहसे गण्डकी नदी उत्पन्न हुई और भगवान् श्रीहरि भी उसीके तटपर मनुष्योंके लिये पुण्यप्रद शालग्राम- शिला बन गये। मुने ! वहाँ रहनेवाले कीड़े शिलाको काट-काटकर अनेक प्रकारकी बना देते हैं। वे पाषाण जलमें गिरकर निश्चय ही उत्तम फल प्रदान करते हैं। जो पाषाण धरतीपर पड़ जाते हैं, उनपर सूर्यका ताप पड़नेसे पीलापन आ जाता है, ऐसी शिलाको पिङ्गला समझनी चाहिये। (वह शिला पूजामें उत्तम नहीं मानी जाती है।) नारद! इस प्रकार यह सभी प्रसङ्ग मैंने कह सुनाया; अब पुनः क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय २१) तुलसी-पूजन, ध्यान, नामाष्टक तथा तुलसी-स्तवनका वर्णन नारदजीने पूछा- प्रभो! तुलसी भगवान् नारायणकी प्रिया हैं, इसलिये परम पवित्र हैं। अतएव वे सम्पूर्ण जगत्के लिये पूजनीया हैं; परंतु इनकी पूजाका क्या विधान है और इनकी स्तुतिके लिये कौन-सा स्तोत्र है ? यह मैंने अभीतक नहीं सुना है। मुने! किस मन्त्रसे उनकी पूजा होनी चाहिये ? सबसे पहले किसने तुलसीकी स्तुति की है? किस कारणसे वह आपके लिये भी पूजनीया हो गयीं ? अहो ! ये सब बातें आप मुझे बताइये। सूतजी कहते हैं- शौनक ! नारदकी बात सुनकर भगवान् नारायणका मुखमण्डल प्रसन्नतासे खिल उठा। उन्होंने पापोंका ध्वंस करनेवाली परम पुण्यमयी प्राचीन कथा कहनी आरम्भ कर दी। भगवान् नारायण ऋषि बोले- मुने ! भगवान् श्रीहरि तुलसीको पाकर उसके और लक्ष्मीके साथ आनन्द करने लगे। उन्होंने तुलसीको भी गौरव तथा सौभाग्यमें लक्ष्मीके समान बना दिया। लक्ष्मी और गङ्गाने तो तुलसीके नवसङ्गम, सौभाग्य और गौरवको सह लिया, किंतु सरस्वती क्रोधके कारण यह सब सहन न कर सकीं। सरस्वतीके द्वारा अपना अपमान होनेसे तुलसी अन्तर्धान हो गयीं। ज्ञानसम्पन्ना देवी तुलसी सिद्धयोगिनी एवं सर्वसिद्धेश्वरी थीं। अतः उन्होंने श्रीहरिकी आँखोंसे अपनेको सर्वत्र ओझल कर लिया। भगवान्ने उसे न देखकर सरस्वतीको समझाया और उससे आज्ञा लेकर वे तुलसीवनमें गये। लक्ष्मीबीज (श्रीं),

१८८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मायाबीज (ह्रीं), कामबीज (क्लीं) और वाणीबीज (ऐं)—इन बीजोंका पूर्वमें उच्चारण करके 'वृन्दावनी' इस शब्दके अन्तमें (ङे) विभक्ति लगायी और अन्तमें वह्निजाया (स्वाहा)-का प्रयोग करके 'श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वृन्दावन्यै स्वाहा' इस दशाक्षर-मन्त्रका उच्चारण किया। नारद! यह मन्त्रराज कल्पतरु है। जो इस मन्त्रका उच्चारण करके विधिपूर्वक तुलसीकी पूजा करता है, उसे निश्चय ही सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। घृतका दीपक, धूप, सिन्दूर, चन्दन, नैवेद्य और पुष्प आदि उपचारोंसे तथा स्तोत्रद्वारा भगवान्‌से सुपूजित होनेपर तुलसीको बड़ी प्रसन्नता हुई। अतः वह वृक्षसे तुरंत बाहर निकल आयी और परम प्रसन्न होकर भगवान् श्रीहरिके चरणकमलोंकी शरणमें चली गयी। तब भगवान्‌ने उसे वर दिया—'देवी! तुम सर्वपूज्या हो जाओ। मैं स्वयं तुम्हें अपने मस्तक तथा वक्षःस्थलपर धारण करूँगा। इतना ही नहीं, सम्पूर्ण देवता तुम्हें अपने मस्तकपर धारण करेंगे।' यों कहकर उसे साथ ले भगवान् श्रीहरि अपने स्थानपर लौट गये।

**भगवान् नारायण कहते हैं—**मुने! तुलसीके अन्तर्धान हो जानेपर भगवान् श्रीहरि विरहसे आतुर होकर वृन्दावन चले गये थे और वहाँ जाकर उन्होंने तुलसीकी पूजा करके इस प्रकार स्तुति की थी।

**श्रीभगवान् बोले—**जब वृन्दा (तुलसी)-

रूप वृक्ष तथा दूसरे वृक्ष एकत्र होते हैं, तब वृक्षसमुदाय अथवा वनको बुधजन 'वृन्दा' कहते हैं। ऐसी वृन्दा नामसे प्रसिद्ध अपनी प्रिया तुलसीकी मैं उपासना करता हूँ। जो देवी प्राचीनकालमें वृन्दावनमें प्रकट हुई थी, अतएव जिसे 'वृन्दावनी' कहते हैं, उस सौभाग्यवती देवीकी मैं उपासना करता हूँ। जो असंख्य वृक्षोंमें निरन्तर पूजा प्राप्त करती है, अतः जिसका नाम 'विश्वपूजिता' पड़ा है, उस जगत्पूज्या देवीकी मैं उपासना करता हूँ। देवि! जिसने सदा अनन्त विश्वोंको पवित्र किया है, उस 'विश्वपावनी' देवीका मैं विरहसे आतुर होकर स्मरण करता हूँ। जिसके बिना अन्य पुष्प-समूहोंके अर्पण करनेपर भी देवता प्रसन्न नहीं होते, ऐसी 'पुष्पसारा'—पुष्पोंमें सारभूता शुद्धस्वरूपिणी तुलसी देवीका मैं शोकसे व्याकुल होकर दर्शन करना चाहता हूँ। संसारमें जिसकी प्राप्तिमात्रसे भक्त परम आनन्दित हो जाता है, इसीलिये 'नन्दिनी' नामसे जिसकी प्रसिद्धि है, वह भगवती तुलसी अब मुझपर प्रसन्न हो जाय। जिस देवीकी अखिल विश्वमें कहीं तुलना नहीं है, अतएव जो 'तुलसी' कहलाती है, उस अपनी प्रियाकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ। वह साध्वी तुलसी वृन्दारूपसे भगवान् श्रीकृष्णकी जीवनस्वरूपा है और उनकी सदा प्रियतमा होनेसे 'कृष्णजीवनी' नामसे विख्यात है। वह देवी तुलसी मेरे जीवनकी रक्षा करे*।


* नारायण उवाच—
अन्तर्हितायां तस्यां च गत्वा च तुलसीवनम्। हरिः सम्पूज्य तुष्टाव तुलसीं विरहातुरः॥
श्रीभगवानुवाच—
वृन्दारूपाश्च वृक्षाश्च यदैकत्र भवन्ति च। विदुर्बुधास्तेन वृन्दां मत्प्रियां तां भजाम्यहम्॥
पुरा बभूव या देवी त्वादौ वृन्दावने वने। तेन वृन्दावनी ख्याता सौभाग्यां तां भजाम्यहम्॥
असंख्येषु च विश्वेषु पूजिता या निरन्तरम्। तेन विश्वपूजिताख्यां जगत्पूज्यां भजाम्यहम्॥
असंख्यानि च विश्वानि पवित्राणि यया सदा। तां विश्वपावनीं देवीं विरहेण स्मराम्यहम्॥
देवा न तुष्टाः पुष्पाणां समूहेन यया विना। तां पुष्पसारां शुद्धां च द्रष्टुमिच्छामि शोकतः॥
विश्वे यत्प्राप्तिमात्रेण भक्तानन्दो भवेद् ध्रुवम्। नन्दिनी तेन विख्याता सा प्रीता भवताद्धि मे॥

प्रकृतिखण्ड १८९

इस प्रकार स्तुति करके लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरि वहीं बैठ गये। इतनेमें उनके सामने साक्षात् तुलसी प्रकट हो गयी। उस साध्वीने उनके चरणोंमें तुरंत मस्तक झुका दिया। अपमानके कारण उस मानिनीकी आँखोंसे आँसू बह रहे थे; क्योंकि पहले उसे बड़ा सम्मान मिल चुका था। ऐसी प्रिया तुलसीको देखकर प्रियतम भगवान् श्रीहरिने तुरंत उसे अपने हृदयमें स्थान दिया। साथ ही सरस्वतीसे आज्ञा लेकर उसे अपने महलमें ले गये। उन्होंने शीघ्र ही सरस्वतीके साथ तुलसीका प्रेम स्थापित करवाया। साथ ही भगवान्ने तुलसीको वर दिया—'देवि! तुम सर्वपूज्या और शिरोधार्या होओ। सब लोग तुम्हारा आदर एवं सम्मान करें।' भगवान् विष्णुके इस प्रकार कहनेपर वह देवी परम संतुष्ट हो गयी। सरस्वतीने उसे हृदयसे लगाया और अपने पास बैठा लिया। नारद! लक्ष्मी और गङ्गा इन दोनों देवियोंने मन्द मुस्कानके साथ विनयपूर्वक साध्वी तुलसीका हाथ पकड़कर उसे भवनमें प्रवेश कराया। वृन्दा, वृन्दावनी, विश्वपावनी, विश्वपूजिता, पुष्पसारा, नन्दिनी, तुलसी और कृष्णजीवनी—ये देवी तुलसीके आठ नाम हैं। यह सार्थक नामावली स्तोत्रके रूपमें परिणत है। जो पुरुष तुलसीकी पूजा करके इस 'नामाष्टक' का पाठ करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त हो जाता है।* कार्तिककी पूर्णिमा तिथिको देवी तुलसीका मङ्गलमय प्राकट्य हुआ और सर्वप्रथम भगवान् श्रीहरिने उसकी पूजा सम्पन्न की। जो इस कार्तिकी पूर्णिमाके अवसरपर विश्वपावनी तुलसीकी भक्तिभावसे पूजा करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके लोकमें चला जाता है। जो कार्तिक महीनेमें भगवान् विष्णुको तुलसीपत्र अर्पण करता है, वह दस हजार गोदानका फल निश्चितरूपसे पा जाता है। इस तुलसीनामाष्टकके स्मरणमात्रसे संतानहीन पुरुष पुत्रवान् बन जाता है। जिसे पत्नी न हो, उसे पत्नी मिल जाती है तथा बन्धुहीन व्यक्ति बहुत-से बान्धवोंको प्राप्त कर लेता है। इसके स्मरणसे रोगी रोगमुक्त हो जाता है, बन्धनमें पड़ा हुआ व्यक्ति छुटकारा पा जाता है, भयभीत पुरुष निर्भय हो जाता है और पापी पापोंसे मुक्त हो जाता है।

नारद! यह तुलसी-स्तोत्र बतला दिया। अब ध्यान और पूजा-विधि सुनो। तुम तो इस ध्यानको जानते ही हो। वेदकी कण्व-शाखामें इसका प्रतिपादन हुआ है। ध्यानमें सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेकी अबाध शक्ति है। ध्यान करनेके पश्चात् बिना आवाहन किये भक्तिपूर्वक तुलसीके वृक्षमें षोडशोपचारसे इस देवीकी पूजा करनी चाहिये।

परम साध्वी तुलसी पुष्पोंमें सार हैं। ये पूजनीया तथा मनोहारिणी हैं। सम्पूर्ण पापरूपी ईंधनको भस्म करनेके लिये ये प्रज्वलित अग्निकी लपटके समान हैं। पुष्पोंमें अथवा देवियोंमें किसीसे भी इनकी तुलना नहीं हो सकी। इसीलिये उन सबमें पवित्ररूपा इन देवीको तुलसी कहा गया। ये सबके द्वारा अपने मस्तकपर धारण करने योग्य हैं। सभीको इन्हें पानेकी इच्छा रहती है। विश्वको पवित्र करनेवाली ये देवी जीवन्मुक्त हैं।

यस्या देव्यास्तुला नास्ति विश्वेषु निखिलेषु च । तुलसी तेन विख्याता तां यामि शरणं प्रियाम् ॥
कृष्णजीवनरूपा या शश्वत्प्रियतमा सती । तेन कृष्णजीवनीति मम रक्षतु जीवनम् ॥
(प्रकृतिखण्ड २२। १८—२६)

* वृन्दा वृन्दावनी विश्वपावनी विश्वपूजिता । पुष्पसारा नन्दिनी च तुलसी कृष्णजीवनी ॥
एतन्नामाष्टकं चैव स्तोत्रं नामार्थसंयुतम् । यः पठेत् तां च सम्पूज्य सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥
(प्रकृतिखण्ड २२। ३३-३४)

२३- सावित्री-धर्मराजके प्रश्नोत्तर, सावित्रीको वरदान

१९० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मुक्ति और भगवान् श्रीहरिकी भक्ति प्रदान करना इनका स्वभाव है। ऐसी भगवती तुलसीकी मैं उपासना करता हूँ।* विद्वान् पुरुष इस प्रकार ध्यान, पूजन और स्तवन करके देवी तुलसीको प्रणाम करे। नारद! तुलसीका उपाख्यान कह चुका। पुनः क्या सुनना चाहते हो। (अध्याय २२)

सावित्री देवीकी पूजा-स्तुतिका विधान

नारदजीने कहा— भगवन्! अमृतकी तुलना करनेवाली तुलसीकी कथा मैं सुन चुका। अब आप सावित्रीका उपाख्यान कहनेकी कृपा करें। देवी सावित्री वेदोंकी जननी हैं; ऐसा सुना गया है। ये देवी सर्वप्रथम किससे प्रकट हुईं? सबसे पहले इनकी किसने पूजा की और बादमें किन लोगोंने?

भगवान् नारायण कहते हैं— मुने! सर्वप्रथम ब्रह्माजीने वेदजननी सावित्रीकी पूजा की। तत्पश्चात् ये देवताओंसे सुपूजित हुईं। तदनन्तर विद्वानोंने इनका पूजन किया। इसके बाद भारतवर्षमें राजा अश्वपतिने पहले इनकी उपासना की। तदनन्तर चारों वर्णोंके लोग इनकी आराधनामें संलग्न हो गये।

नारदजीने पूछा— ब्रह्मन्! राजा अश्वपति कौन थे? किस कामनासे उन्होंने सावित्रीकी पूजा की थी?

भगवान् नारायण बोले— मुने! महाराज अश्वपति मद्रदेशके नरेश थे। शत्रुओंकी शक्ति नष्ट करना और मित्रोंके कष्टका निवारण करना उनका स्वभाव था। उनकी रानीका नाम मालती था। धर्मोंका पालन करनेवाली वह महाराज्ञी राजाके साथ इस प्रकार शोभा पाती थी, जैसे लक्ष्मीजी भगवान् विष्णुके साथ। नारद! उस महासाध्वी रानीने वसिष्ठजीके उपदेशसे भक्तिपूर्वक भगवती सावित्रीकी आराधना की; परंतु उसे देवीकी ओरसे न तो कोई प्रत्यादेश मिला और न देवीजीने साक्षात् दर्शन ही दिये। अतः मनमें कष्टका अनुभव करती हुई दुःखसे घबराकर वह घर चली गयी। राजा अश्वपतिने उसे दुःखी देखकर नीतिपूर्ण वचनोंद्वारा समझाया और स्वयं भक्तिपूर्वक वे सावित्रीकी प्रसन्नताके निमित्त तपस्या करनेके लिये पुष्करक्षेत्रमें चले गये। वहाँ रहकर इन्द्रियोंको वशमें करके उन्होंने बड़ी तपस्या की। तब भगवती सावित्रीके दर्शन तो नहीं हुए, किंतु उनका प्रत्यादेश (उत्तर) प्राप्त हुआ। महाराज अश्वपतिको यह आकाशवाणी सुनायी दी—'राजन्! तुम दस लाख गायत्रीका जप करो।' इतनेमें ही वहाँ मुनिवर पराशरजी पधार गये। राजाने मुनिको प्रणाम किया। मुनि राजासे कहने लगे।

पराशरने कहा— राजन्! गायत्रीका एक बारका जप दिनके पापको नष्ट कर देता है। दस बार जप करनेसे दिन और रातके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। सौ बार जप करनेसे महीनोंका उपार्जित पाप नहीं ठहर सकता। एक हजारके जपसे वर्षोंके पाप भस्म हो जाते हैं। गायत्रीके एक लाख जपमें एक जन्मके तथा दस लाख जपमें तीन जन्मोंके भी पापोंको नष्ट करनेकी अमोघ शक्ति है। एक करोड़ जप करनेपर सम्पूर्ण जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। दस करोड़ गायत्री-जप ब्राह्मणोंको


* तुलसीं पुष्पसारां च सतीं पूज्यां मनोहराम्। कृत्स्नपापेध्मदाहाय ज्वलदग्निशिखोपमाम् ॥
पुष्पेषु तुलनाप्यस्या नासीद् देवीषु वा मुने। पवित्ररूपा सर्वासु तुलसी सा च कीर्तिता ॥
शिरोधार्यां च सर्वेषामीप्सितां विश्वपावनीम्। जीवन्मुक्तां मुक्तिदां च भजे तां हरिभक्तिदाम् ॥
(प्रकृतिखण्ड २२। ४२—४४)

प्रकृतिखण्ड १९१

मुक्त कर देता है। द्विजको चाहिये कि वह पूर्वाभिमुख होकर बैठे। हाथको सर्पकी फणके समान कर ले। वह हाथ ऊर्ध्वमुख हो और ऊपरकी ओरसे कुछ-कुछ मुद्रित (मुँदा-सा) रहे। उसे किञ्चित् झुकाये हुए स्थिर रखे। अनामिकाके बिचले पर्वसे आरम्भ करके नीचे और बायें होते हुए तर्जनीके मूलभागतक अँगूठेसे स्पर्शपूर्वक जप करे। हाथमें जप करनेका यही क्रम है।* राजन्! श्वेत कमलके बीजोंकी अथवा स्फटिक मणिकी माला बनाकर उसका संस्कार कर लेना चाहिये। इन्हीं वस्तुओंकी माला बनाकर तीर्थमें अथवा किसी देवताके मन्दिरमें जप करे। पीपलके सात पत्तोंपर संयमपूर्वक मालाको रखकर गोरोचनसे अनुलिप्त करे। फिर गायत्री-जपपूर्वक विद्वान् पुरुष उस मालाको स्नान करावे। तत्पश्चात् उसी मालापर विधिपूर्वक गायत्रीके सौ मन्त्रोंका जप करना चाहिये। अथवा पञ्चगव्य या गङ्गाजलसे स्नान करा देनेपर भी मालाका संस्कार हो जाता है। इस तरह शुद्ध की हुई मालासे जप करना चाहिये।

राजर्षे! तुम इस क्रमसे दस लाख गायत्रीका जप करो। इससे तुम्हारे तीन जन्मोंके पाप क्षीण हो जायँगे। तत्पश्चात् तुम भगवती सावित्रीका साक्षात् दर्शन कर सकोगे। राजन्! तुम प्रतिदिन मध्याह्न, सायं एवं प्रातःकालकी संध्या पवित्र होकर करना; क्योंकि संध्या न करनेवाला अपवित्र व्यक्ति सम्पूर्ण कर्मोंके लिये सदा अनधिकारी हो जाता है। वह दिनमें जो कुछ सत्कर्म करता है, उसके फलसे वञ्चित रहता है। जो प्रातः एवं सायंकालकी संध्या नहीं करता है, वह ब्राह्मण सम्पूर्ण ब्राह्मणोचित कर्मोंसे बहिष्कृत माना जाता है। जो प्रातः और सायंकालकी संध्योपासना नहीं करता है, वह शूद्रकी भाँति समस्त द्विजोचित कर्मोंसे बहिष्कृत कर देने योग्य हो जाता है। जीवनपर्यन्त त्रिकाल-संध्या करनेवाले ब्राह्मणमें तेज अथवा तपके प्रभावसे सूर्यके समान तेजस्विता आ जाती है। ऐसे ब्राह्मणकी चरणरजसे पृथ्वी पवित्र हो जाती है। जिस ब्राह्मणके हृदयमें संध्याके प्रभावसे पाप स्थान नहीं पा सके हों, वह तेजस्वी द्विज जीवन्मुक्त ही है। उसके स्पर्शमात्रसे सम्पूर्ण तीर्थ पवित्र हो जाते हैं। पाप उसे छोड़कर वैसे ही भाग जाते हैं; जैसे गरुड़को देखकर सर्पोंमें भगदड़ मच जाती है। त्रिकाल संध्या न करनेवाले द्विजके दिये हुए पिण्ड और तर्पणको उसके पितर इच्छापूर्वक ग्रहण नहीं करते तथा देवगण भी स्वतन्त्रतासे उसे लेना नहीं चाहते।

मुने! इस प्रकार कहकर मुनिवर पराशरने राजा अश्वपतिको सावित्रीकी पूजाके सम्पूर्ण विधान तथा ध्यान आदि अभिलषित प्रयोग बतला दिये। उन महाराजको उपदेश देकर मुनिवर अपने स्थानको चले गये; फिर राजाने सावित्रीकी उपासना की। उन्हें उनके दर्शन प्राप्त हुए और अभीष्ट वर भी प्राप्त हो गया।

नारदने पूछा— भगवन्! मुनिवर पराशरने सावित्रीके किस ध्यान, किस पूजा-विधान, किस स्तोत्र और किस मन्त्रका उपदेश दिया था तथा राजाने किस विधिसे श्रुति-जननी सावित्रीकी पूजा करके किस वरको प्राप्त किया? किस विधानसे भगवती उनसे सुपूजित हुईं? मैं ये सभी प्रसङ्ग सुनना चाहता हूँ। सावित्रीकी श्रेष्ठ महिमा अत्यन्त रहस्यमयी है। कृपया मुझे सुनाइये।


* करं सर्पफणाकारं कृत्वा तं तूर्ध्वमुद्रितम् ॥
आनम्रमूर्ध्वमचलं प्रजपेत् प्राङ्मुखो द्विजः। अनामिकामध्यदेशादधो वामक्रमेण च॥
तर्जनीमूलपर्यन्तं जपस्यैष क्रमः करे।
(प्रकृतिखण्ड २३। १७—१९)

१९२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशीके दिन संयमपूर्वक रहकर चतुर्दशीके दिन व्रत करके शुद्ध समयमें भक्तिके साथ भगवती सावित्रीकी पूजा करनी चाहिये। यह चौदह वर्षका व्रत है। इसमें चौदह फल और चौदह नैवेद्य अर्पण किये जाते हैं। पुष्प एवं धूप, वस्त्र तथा यज्ञोपवीत आदिसे विधिपूर्वक पूजन करके नैवेद्य अर्पण करनेका विधान है। एक मङ्गल-कलश स्थापित करके उसपर फल और पल्लव रख दे। द्विजको चाहिये कि गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और पार्वतीकी पूजा करके आवाहित कलशपर अपनी इष्टदेवी सावित्रीका पूजन करे। देवी सावित्रीका ध्यान सुनो। यजुर्वेदकी माध्यन्दिनी शाखामें इसका प्रतिपादन हुआ है। स्तोत्र, पूजा-विधान तथा समस्त कामप्रद मन्त्र भी बतलाता हूँ। ध्यान यह है—

'भगवती सावित्रीका वर्ण तपाये हुए सुवर्णके समान है। ये सदा ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान रहती हैं। इनकी प्रभा ऐसी है, मानो ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक सहस्रों सूर्य हों। इनके प्रसन्न मुखपर मुस्कान छायी रहती है। रत्नमय भूषण इन्हें अलंकृत किये हुए हैं। दो अग्निशुद्ध वस्त्रोंको इन्होंने धारण कर रखा है। भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही ये साकाररूपसे प्रकट हुई हैं। जगद्धाता प्रभुकी इन प्राणप्रियाको 'सुखदा', 'मुक्तिदा', 'शान्ता', 'सर्वसम्पत्स्वरूपा' तथा 'सर्वसम्पत्प्रदात्री' कहते हैं। ये वेदोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं (वेद-शास्त्र इनके स्वरूप हैं। मैं ऐसी वेदबीजस्वरूपा वेदमाता आप भगवती सावित्रीकी उपासना करता हूँ।' इस प्रकार ध्यान करके अपने मस्तकपर पुष्प रखे। फिर श्रद्धाके साथ ध्यानपूर्वक कलशके ऊपर भगवती सावित्रीका आवाहन करे। वेदोक्त मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए सोलह प्रकारके उपचारोंसे व्रती पुरुष भगवतीकी पूजा करे। विधिपूर्वक पूजा और स्तुति सम्पन्न हो जानेपर देवेश्वरी सावित्रीको प्रणाम करे। आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, अनुलेपन, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, शीतल जल, वस्त्र, भूषण, माला, गन्ध, आचमन और मनोहर शय्या—ये देने योग्य षोडश उपचार हैं।

[आसन-समर्पण-मन्त्र]

दारुसारविकारं च हेमादिनिर्मितं च वा।
देवाधारं पुण्यदं च मया तुभ्यं निवेदितम्॥ ५५॥

देवि! यह आसन उत्तम काष्ठके सारतत्त्वसे बना हुआ है। साथ ही सुवर्ण आदिका बना हुआ आसन भी प्रस्तुत है। देवताओंके बैठनेयोग्य यह पुण्यप्रद आसन मैंने सदाके लिये आपकी सेवामें समर्पित कर दिया है॥ ५५॥

[पाद्य-मन्त्र]

तीर्थोदकं च पाद्यं च पुण्यदं प्रीतिदं महत्।
पूजाङ्गभूतं शुद्धं च मया भक्त्या निवेदितम्॥ ५६॥

देवेश्वरि! यह तीर्थका पवित्र जल आपके लिये पाद्यके रूपमें प्रस्तुत है, जो अत्यन्त प्रीतिदायक तथा पुण्यप्रद है। पूजाका अङ्गभूत यह शुद्ध पाद्य मैंने भक्तिभावसे आपके चरणोंमें अर्पित किया है॥ ५६॥

[अर्घ्य-मन्त्र]

पवित्ररूपमर्घ्यं च दूर्वापुष्पाक्षतान्वितम्।
पुण्यदं शङ्खतोयाक्तं मया तुभ्यं निवेदितम्॥ ५७॥

देवि! यह शङ्खके जलसे युक्त तथा दूर्वा, पुष्प और अक्षतसे सम्पन्न परम पवित्र पुण्यदायक अर्घ्य मेरे द्वारा आपकी सेवामें निवेदन किया गया है॥ ५७॥

[स्नानीय-मन्त्र]

सुगन्धिधात्रीतैलं च देहसौन्दर्यकारणम्।
मया निवेदितं भक्त्या स्नानीयं प्रतिगृह्यताम्॥ ५८॥

देवि! जो शरीरके सौन्दर्यको बढ़ानेमें कारण है, वह सुगन्धित आँवलेका तैल और स्नानके लिये जल मैंने भक्तिभावसे सेवामें निवेदित किया है। आप यह सब स्वीकार करें॥ ५८॥

द्वारा धर्मराजको प्रणाम-निवेदन

प्रकृतिखण्ड १९३


[अनुलेपन-मन्त्र]
मलयाचलसम्भूतं देहशोभाविवर्द्धनम्।
सुगन्धियुक्तं सुखदं मया तुभ्यं निवेदितम्॥ ५९॥
देवेश्वरि! यह मलयपर्वतसे उत्पन्न, सुगन्धयुक्त सुखद चन्दन, जो देहकी शोभाको बढ़ानेवाला है, मैंने अनुलेपनके रूपमें आपको अर्पित किया है॥ ५९॥

[धूप-समर्पण-मन्त्र]
गन्धद्रव्योद्भवः पुण्यः प्रीतिदो दिव्यगन्धदः।
मया निवेदितो भक्त्या धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥ ६०॥
देवि! जो सुगन्धित द्रव्योंसे बना हुआ, पवित्र, प्रीतिदायक तथा दिव्य सुगन्ध प्रकट करनेवाला है, ऐसा यह धूप मैंने भक्तिभावसे आपको अर्पित किया है। आप इसे ग्रहण करें॥ ६०॥

[दीप-समर्पण-मन्त्र]
जगतां दर्शनीयं च दर्शनं दीप्तिकारणम्।
अन्धकारध्वंसबीजं मया तुभ्यं निवेदितम्॥ ६१॥
देवेश्वरि! जो जगत्के लिये दर्शनीय, दृष्टिका सहायक तथा दीप्ति (प्रकाश)-का कारण है, जिसे अन्धकारके विनाशका बीज कहा गया है, वह दिव्य दीप मेरे द्वारा आपकी सेवामें निवेदन किया गया है॥ ६१॥

[नैवेद्य-समर्पण-मन्त्र]
तुष्टिदं पुष्टिदं चैव प्रीतिदं क्षुद्विनाशनम्।
पुण्यदं स्वादुरूपं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥ ६२॥
देवि! जो तुष्टि, पुष्टि, प्रीति तथा पुण्य प्रदान करनेवाला तथा भूख मिटानेमें समर्थ है, ऐसा सुस्वादु नैवेद्य आपके समक्ष प्रस्तुत है, आप इसे स्वीकार करें॥ ६२॥

[ताम्बूल-समर्पण-मन्त्र]
ताम्बूलं च वरं रम्यं कर्पूरादिसुवासितम्।
तुष्टिदं पुष्टिदं चैव मया भक्त्या निवेदितम्॥ ६३॥
देवेश्वरि! यह सुन्दर, रमणीय, सन्तोषप्रद, पुष्टिकारक एवं कर्पूर आदिसे सुवासित ताम्बूल मैंने भक्तिभावसे अर्पित किया है। कृपया ग्रहण करें॥ ६३॥

[शीतल जल-समर्पण-मन्त्र]
सुशीतलं वासितं च पिपासानाशकारणम्।
जगतां जीवरूपं च जीवनं प्रतिगृह्यताम्॥ ६४॥
हे देवि! यह प्यास मिटानेमें समर्थ तथा सम्पूर्ण जगत्का जीवनरूप सुवासित एवं सुशीतल जल अर्पित है, इसे स्वीकार करें॥ ६४॥

[वस्त्र-समर्पण-मन्त्र]
देहशोभास्वरूपं च सभाशोभाविवर्द्धनम्।
कार्पासजं च कृमिजं वसनं प्रतिगृह्यताम्॥ ६५॥
देवेश्वरि! यह सूती और रेशमी वस्त्र देहकी शोभाका तो स्वरूप ही है, सभामें शरीरकी विशेष शोभाकी वृद्धि करनेवाला है। अतः इसे ग्रहण करें॥ ६५॥

[भूषण-समर्पण-मन्त्र]
काञ्चनादिविनिर्माणं श्रीयुक्तं श्रीकरं सदा।
सुखदं पुण्यदं चैव भूषणं प्रतिगृह्यताम्॥ ६६॥
देवि! सुवर्ण आदिका बना हुआ यह आभूषण सेवामें अर्पित है। यह स्वयं तो सुन्दर है ही; जो इसे धारण करता है, उसकी शोभाको भी यह सदा बढ़ाता रहता है। इससे सुख और पुण्यकी प्राप्ति होती है, अतः आप कृपापूर्वक इसे स्वीकार करें॥ ६६॥

[माल्य-समर्पण-मन्त्र]
नानापुष्पविनिर्माणं बहुभाससमन्वितम्।
प्रीतिदं पुण्यदं चैव माल्यं च प्रतिगृह्यताम्॥ ६७॥
देवेश्वरि! नाना प्रकारके फूलोंका बना हुआ यह सुन्दर हार अत्यन्त प्रकाशमान है। इससे आपको प्रसन्नता प्राप्त होगी। अतः कृपया इस पुण्यदायक हारको आप ग्रहण करें॥ ६७॥

[गन्ध-समर्पण-मन्त्र]
सर्वमङ्गलस्वरूपश्च सर्वमङ्गलदो वरः।
पुण्यप्रदश्च गन्धाढ्यो गन्धश्च प्रतिगृह्यताम्॥ ६८॥
देवि! यह सर्वमङ्गलस्वरूप एवं सर्वमङ्गलदायक, श्रेष्ठ, पुण्यप्रद तथा सुगन्धित गन्ध आपकी सेवामें समर्पित है, इसे स्वीकार कीजिये॥ ६८॥

१९४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

[आचमनीय-समर्पण-मन्त्र]
शुद्धं शुद्धिप्रदं चैव शुद्धानां प्रीतिदं महत्।
रम्यमाचमनीयं च मया दत्तं प्रगृह्यताम्॥ ६९॥
देवेश्वरि! मेरा दिया हुआ यह रमणीय आचमनीय शुद्ध होनेके साथ ही शुद्धिदायक भी है। इससे शुद्ध पुरुषोंको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होती है। आप कृपापूर्वक इसे स्वीकार करें॥ ६९॥
[शय्या-समर्पण-मन्त्र]
रत्नसारादिनिर्माणं पुष्पचन्दनसंयुतम्।
सुखदं पुण्यदं चैव सुतल्पं प्रतिगृह्यताम्॥ ७०॥
देवि! यह सुन्दर शय्या रत्नसार आदिकी बनी हुई है। इसपर फूल बिछे हैं और चन्दनका छिड़काव हुआ है। अतएव यह सुखदायिनी और पुण्यदायिनी भी है। आप इसे ग्रहण करें॥ ७०॥
[फल-समर्पण-मन्त्र]
नानावृक्षसमुद्भूतं नानारूपसमन्वितम्।
फलस्वरूपं फलदं फलं च प्रतिगृह्यताम्॥ ७१॥
देवेश्वरि! अनेक वृक्षोंसे उत्पन्न तथा नाना रूपोंमें उपलब्ध अभीष्ट फलस्वरूप एवं अभिलषित फलदायक यह फल सेवामें प्रस्तुत है। इसे स्वीकार करें॥ ७१॥
[सिन्दूर-समर्पण-मन्त्र]
सिन्दूरं च वरं रम्यं भालशोभाविवर्द्धनम्।
पूरणं भूषणानां च सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम्॥ ७२॥
देवि! यह सुन्दर एवं सुरम्य सिन्दूर भालकी शोभाको बढ़ानेवाला है। इसे आभूषणोंका पूरक माना गया है। आप इसे ग्रहण करें॥ ७२॥
[यज्ञोपवीत-समर्पण-मन्त्र]
विशुद्धग्रन्थिसंयुक्तं पुण्यसूत्रविनिर्मितम्।
पवित्रं वेदमन्त्रेण यज्ञसूत्रं च गृह्यताम्॥ ७३॥
देवेश्वरि! पवित्र सूतका बना हुआ यह यज्ञोपवीत विशुद्ध ग्रन्थियोंसे युक्त है। इसे वेदमन्त्रसे पवित्र किया गया है। कृपया स्वीकार करें॥ ७३॥
विद्वान् पुरुष इन द्रव्योंको मूलमन्त्रसे भगवती सावित्रीके लिये अर्पण करके स्तोत्र पढ़े। तदनन्तर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको दक्षिणा दे। ‘सावित्री’ इस शब्दमें चतुर्थी विभक्ति लगाकर अन्तमें ‘स्वाहा’ शब्दका प्रयोग होना चाहिये। इसके पूर्व लक्ष्मी, माया और कामबीजका उच्चारण हो। ‘श्रीं ह्रीं क्लीं सावित्र्यै स्वाहा’ यह अष्टाक्षर-मन्त्र ही मूलमन्त्र कहा गया है। भगवती सावित्रीका सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाला स्तोत्र माध्यन्दिनी शाखामें वर्णित है। ब्राह्मणोंके लिये जीवनस्वरूप इस स्तोत्रको तुम्हारे सामने मैं व्यक्त करता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें गोलोकधाममें विराजमान भगवान् श्रीकृष्णने सावित्रीको ब्रह्माके साथ जानेकी आज्ञा दी; परंतु सावित्री उनके साथ ब्रह्मलोक जानेको प्रस्तुत नहीं हुई। तब भगवान् श्रीकृष्णके कथनानुसार ब्रह्माजी भक्तिपूर्वक वेदमाता सावित्रीकी स्तुति करने लगे। तदनन्तर सावित्रीने संतुष्ट होकर ब्रह्माको पति बनाना स्वीकार कर लिया। ब्रह्माजीने सावित्रीकी इस प्रकार स्तुति की।

ब्रह्माजीने कहा—सुन्दरि! तुम नारायणस्वरूपा एवं नारायणी हो। सनातनी देवि! भगवान् नारायणसे ही तुम्हारा प्रादुर्भाव हुआ है। तुम मुझपर प्रसन्न होनेकी कृपा करो। देवि! तुम परम तेजःस्वरूपा हो। तुम्हारे प्रत्येक अङ्गमें परम आनन्द व्याप्त है। द्विजातियोंके लिये जातिस्वरूपा सुन्दरि! तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ। सुन्दरि! तुम नित्या, नित्यप्रिया तथा नित्यानन्दस्वरूपा हो। तुम अपने सर्वमङ्गलमय रूपसे मुझपर प्रसन्न हो जाओ। शोभने! तुम ब्राह्मणोंके लिये सर्वस्व हो। तुम सर्वोत्तम एवं मन्त्रोंकी सार-तत्त्व हो। तुम्हारी उपासनासे सुख और मोक्ष सुलभ हो जाते हैं। मुझपर प्रसन्न हो जाओ। सुन्दरि! तुम ब्राह्मणोंके पापरूपी ईंधनको जलानेके लिये प्रज्वलित अग्नि हो। ब्रह्मतेज प्रदान करना तुम्हारा सहज गुण है! तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ। मनुष्य मन, वाणी अथवा शरीरसे जो भी

···· प्रकृतिखण्ड १९५

पाप करता है, वे सभी पाप तुम्हारे नामका स्मरण करते ही भस्म हो जायेंगे।*

इस प्रकार स्तुति करके जगद्धाता ब्रह्माजी वहीं गोलोककी सभामें विराजमान हो गये। तब सावित्री उनके साथ ब्रह्मलोकमें जानेके लिये प्रस्तुत हो गयीं। मुने! इसी स्तोत्रराजसे राजा अश्वपतिने भगवती सावित्रीकी स्तुति की थी, तब उन देवीने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिये। राजाने उनसे मनोऽभिलषित वर प्राप्त किया। यह स्तवराज परम पवित्र है। पुरुष यदि संध्याके पश्चात् इस स्तवका पाठ करता है तो चारों वेदोंके पाठ करनेसे जो फल मिलता है, उसी फलका वह अधिकारी हो जाता है।

(अध्याय २३)


राजा अश्वपतिद्वारा सावित्रीकी उपासना तथा फलस्वरूप सावित्री नामक कन्याकी उत्पत्ति, सत्यवान्‌के साथ सावित्रीका विवाह, सत्यवान्‌की मृत्यु, सावित्री और यमराजका संवाद

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! जब राजा अश्वपतिने विधिपूर्वक भगवती सावित्रीकी पूजा करके इस स्तोत्रसे उनका स्तवन किया, तब देवी उनके सामने प्रकट हो गयीं। उनका श्रीविग्रह ऐसा प्रकाशमान था, मानो हजारों सूर्य एक साथ उदित हो गये हों। साध्वी सावित्री अत्यन्त प्रसन्न होकर हँसती हुई राजा अश्वपतिसे इस प्रकार बोलीं, मानो माता अपने पुत्रसे बात कर रही हो। उस समय देवी सावित्रीकी प्रभासे चारों दिशाएँ उद्भासित हो रही थीं।

देवी सावित्रीने कहा—महाराज! तुम्हारे मनकी जो अभिलाषा है, उसे मैं जानती हूँ। तुम्हारी पत्नीके सम्पूर्ण मनोरथ भी मुझसे छिपे नहीं हैं। अतः सब कुछ देनेके लिये मैं निश्चितरूपसे प्रस्तुत हूँ। राजन्! तुम्हारी परम साध्वी रानी कन्याकी अभिलाषा करती है और तुम पुत्र चाहते हो; क्रमसे दोनों ही प्राप्त होंगे।

इस प्रकार कहकर भगवती सावित्री ब्रह्मलोकमें चली गयीं और राजा भी अपने घर लौट आये। यहाँ समयानुसार पहले कन्याका जन्म हुआ। भगवती सावित्रीकी आराधनासे उत्पन्न हुई लक्ष्मीकी कलास्वरूपा उस कन्याका नाम राजा अश्वपतिने सावित्री रखा। वह कन्या समयानुसार शुक्लपक्षके चन्द्रमाके समान प्रतिदिन बढ़ने लगी। समयपर उस सुन्दरी कन्यामें नवयौवनके लक्षण प्रकट हो गये। द्युमत्सेनकुमार सत्यवान्‌का उसने पतिरूपमें वरण किया; क्योंकि सत्यवान् सत्यवादी, सुशील एवं नाना प्रकारके उत्तम गुणोंसे सम्पन्न थे। राजाने रत्नमय भूषणोंसे अलंकृत करके अपनी कन्या सावित्री सत्यवान्‌को समर्पित कर दी। सत्यवान् भी श्वशुरकी ओरसे मिले हुए बड़े भारी दहेजके साथ उस कन्याको लेकर अपने घर चले गये।


* ब्रह्मोवाच
नारायणस्वरूपे च नारायणि सनातनि । नारायणात् समुद्भूते प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥
तेजःस्वरूपे परमे परमानन्दरूपिणि । द्विजातीनां जातिरूपे प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥
नित्ये नित्यप्रिये देवि नित्यानन्दस्वरूपिणि । सर्वमङ्गलरूपेण प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥
सर्वस्वरूपे विप्राणां मन्त्रसारे परात्परे । सुखदे मोक्षदे देवि प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥
विप्रपापेन्धदाहाय ज्वलदग्निशिखोपमे । ब्रह्मतेजःप्रदे देवि प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥
कायेन मनसा वाचा यत्पापं कुरुते द्विजः । तत् ते स्मरणमात्रेण भस्मीभूतं भविष्यति ॥
(प्रकृतिखण्ड २३ । ७९–८४)

१९६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

एक वर्ष व्यतीत हो जानेके पश्चात् सत्यपराक्रमी सत्यवान् अपने पिताकी आज्ञाके अनुसार हर्षपूर्वक फल और ईंधन लानेके लिये अरण्यमें गये। उनके पीछे-पीछे साध्वी सावित्री भी गयी। दैववश सत्यवान् वृक्षसे गिरे और उनके प्राण प्रयाण कर गये। मुने! यमराजने उनके अङ्गुष्ठ-सदृश जीवात्माको सूक्ष्म शरीरके साथ बाँधकर यमपुरीके लिये प्रस्थान किया। तब साध्वी सावित्री भी उनके पीछे लग गयी। संयमनीपुरीके स्वामी साधुश्रेष्ठ यमराजने सुन्दरी सावित्रीको पीछे-पीछे आती देख मधुर वाणीमें कहा।

**धर्मराजने कहा—**अहो सावित्री! तुम इस मानव-देहसे कहाँ जा रही हो? यदि पतिदेवके साथ जानेकी तुम्हारी इच्छा है तो पहले इस शरीरका त्याग कर दो। मर्त्यलोकका प्राणी इस पाञ्चभौतिक शरीरको लेकर मेरे लोकमें नहीं जा सकता। नश्वर व्यक्ति नश्वर लोकमें ही जानेका अधिकारी है। साध्वि! तुम्हारा पति सत्यवान् भारतवर्षमें आया था। उसकी आयु अब पूर्ण हो चुकी, अतएव अपने किये हुए कर्मका फल भोगनेके लिये अब वह मेरे लोकको जा रहा है। प्राणीका कर्मसे ही जन्म होता है और कर्मसे ही उसकी मृत्यु भी होती है। सुख, दुःख, भय और शोक—ये सब कर्मके अनुसार प्राप्त होते रहते हैं। कर्मके प्रभावसे जीव इन्द्र भी हो सकता है। अपना उत्तम कर्म उसे ब्रह्मपुत्रतक बनानेमें समर्थ है। अपने शुभ कर्मकी सहायतासे प्राणी श्रीहरिका दास बनकर जन्म आदि विकारोंसे मुक्त हो सकता है। सम्पूर्ण सिद्धि, अमरत्व तथा श्रीहरिके सालोक्यादि चार प्रकारके पद भी अपने शुभ कर्मके प्रभावसे मिल सकते हैं। देवता, मनु, राजेन्द्र, शिव, गणेश, मुनीन्द्र, तपस्वी, क्षत्रिय, वैश्य, म्लेच्छ, स्थावर, जङ्गम, पर्वत, राक्षस, किन्नर, अधिपति, वृक्ष, पशु, किरात, अत्यन्त सूक्ष्म जन्तु, कीड़े, दैत्य, दानव तथा असुर—ये सभी योनियाँ प्राणीको अपने कर्मके अनुसार प्राप्त होती हैं। इसमें कुछ भी संशय नहीं है।

इस प्रकार सावित्रीसे कहकर यमराज मौन हो गये।

**भगवान् नारायण कहते हैं—**मुने! पतिव्रता सावित्रीने यमराजकी बात सुनकर परम भक्तिके साथ उनका स्तवन किया; फिर वह उनसे पूछने लगी।

**सावित्रीने पूछा—**भगवन्! कौन कार्य है, किस कर्मके प्रभावसे क्या होता है, कैसे फलमें कौन कर्म हेतु है, कौन देह है और कौन देही है अथवा संसारमें प्राणी किसकी प्रेरणासे कर्म करता है? ज्ञान, बुद्धि, शरीरधारियोंके प्राण, इन्द्रियाँ तथा उनके लक्षण एवं देवता, भोक्ता, भोजयिता, भोज, निष्कृति तथा जीव और परमात्मा—ये सब कौन और क्या हैं? इन सबका परिचय देनेकी कृपा कीजिये।

**धर्मराज बोले—**साध्वी सावित्री! कर्म दो प्रकारके हैं—शुभ और अशुभ। वेदोक्त कर्म शुभ हैं। इनके प्रभावसे प्राणी कल्याणके भागी होते हैं। वेदमें जिसका स्थान नहीं है, वह अशुभ कर्म नरकप्रद है। भगवान् विष्णुकी जो संकल्परहित अहैतुकी सेवा की जाती है, उसे 'कर्म-निर्मूलरूपा' कहते हैं। ऐसी ही सेवा 'हरि-भक्ति' प्रदान करती है। कौन कर्मके फलका भोक्ता है और कौन निर्लिप्त—इसका उत्तर यह है। श्रुतिका वचन है कि श्रीहरिका जो भक्त है, वह मनुष्य मुक्त हो जाता है। जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, शोक और भय—ये उसपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते। साध्वि! श्रुतिमें मुक्ति भी दो प्रकारकी बतायी गयी है, जो सर्वसम्मत है। एकको 'निर्वाणप्रदा' कहते हैं और दूसरीको 'हरिभक्तिप्रदा'। मनुष्य इन दोनोंके अधिकारी हैं। वैष्णव पुरुष हरिभक्तिस्वरूपा मुक्ति चाहते हैं और अन्य साधु-जन निर्वाणप्रदा मुक्तिकी इच्छा करते

प्रकृतिखण्ड

१९७

हैं। कर्मका जो बीजरूप है, वही सदा फल प्रदान करनेवाला है। कर्म कोई दूसरी वस्तु नहीं, भगवान् श्रीकृष्णका ही रूप है। वे भगवान् प्रकृतिसे परे हैं। कर्म भी इन्हींसे होता है; क्योंकि वे उसके हेतुरूप हैं। जीव कर्मका फल भोगता है; आत्मा तो सदा निर्लिप्त ही है। देही आत्माका प्रतिबिम्ब है, वही जीव है। देह तो सदासे नश्वर है। पृथ्वी, तेज, जल, वायु और आकाश—ये पाँच भूत उसके उपादान हैं। परमात्माके सृष्टि-कार्यमें ये सूत्ररूप हैं। कर्म करनेवाला जीव देही है। वही भोक्ता और अन्तर्यामीरूपसे भोजयिता भी है। सुख एवं दुःखके साक्षात् स्वरूप वैभवका ही दूसरा नाम भोग है। निष्कृति मुक्तिको ही कहते हैं। सदसत्सम्बन्धी विवेकके आदिकारणका नाम ज्ञान है। इस ज्ञानके अनेक भेद हैं। घट-पटादि विषय तथा उनका भेद ज्ञानके भेदमें कारण कहा जाता है। विवेचनमयी शक्तिको 'बुद्धि' कहते हैं। श्रुतिमें ज्ञानबीज नामसे इसकी प्रसिद्धि है। वायुके ही विभिन्न रूप प्राण हैं। इन्हींके प्रभावसे प्राणियोंके शरीरमें शक्तिका संचार होता है। जो इन्द्रियोंमें प्रमुख, परमात्माका अंश, संशयात्मक, कर्मोंका प्रेरक, प्राणियोंके लिये दुर्निवार्य, अनिरूप्य, अदृश्य तथा बुद्धिका एक भेद है, उसे 'मन' कहा गया है। यह शरीरधारियोंका अङ्ग तथा सम्पूर्ण कर्मोंका प्रेरक है। यही इन्द्रियोंको विषयोंमें लगाकर दुःखी बनानेके कारण शत्रुरूप हो जाता है और सत्कार्यमें लगाकर सुखी बनानेके कारण मित्ररूप है। आँख, कान, नाक, त्वचा और जिह्वा आदि इन्द्रियाँ हैं। सूर्य, वायु, पृथ्वी और वाणी आदि इन्द्रियोंके देवता कहे गये हैं। जो प्राण एवं देहादिको धारण करता है, उसीकी 'जीव' संज्ञा है। प्रकृतिसे परे जो सर्वव्यापी निर्गुण ब्रह्म हैं, उन्हींको 'परमात्मा' कहते हैं। ये कारणोंके भी कारण हैं। ये स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं।

वत्से! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने शास्त्रानुसार बतला दिया। यह विषय ज्ञानियोंके लिये परम ज्ञानमय है। अब तुम सुखपूर्वक लौट जाओ।

सावित्रीने कहा— प्रभो! आप ज्ञानके अथाह समुद्र हैं। अब मैं इन अपने प्राणनाथ और आपको छोड़कर कैसे कहाँ जाऊँ? मैं जो-जो बातें पूछती हूँ, उसे आप मुझे बतानेकी कृपा करें। जीव किस कर्मके प्रभावसे किन-किन योनियोंमें जाता है? पिताजी! कौन कर्म स्वर्गप्रद है और कौन नरकप्रद? किस कर्मके प्रभावसे प्राणी मुक्त हो जाता है तथा श्रीहरिमें भक्ति उत्पन्न करनेके लिये कौन-सा कर्म कारण होता है? किस कर्मके फलस्वरूप प्राणी रोगी होता है और किस कर्मफलसे नीरोग? दीर्घजीवी और अल्पजीवी होनेमें कौन-कौनसे कर्म प्रेरक हैं? किस कर्मके प्रभावसे प्राणी सुखी होता है और किस कर्मके प्रभावसे दुःखी? किस कर्मसे मनुष्य अङ्गहीन, एकाक्ष, बधिर, अन्धा, पङ्गु, उन्मादी, पागल तथा अत्यन्त लोभी और नरघाती होता है एवं सिद्धि और सालोक्यादि मुक्ति प्राप्त होनेमें कौन कर्म सहायक है? किस कर्मके प्रभावसे प्राणी ब्राह्मण होता है और किस कर्मके प्रभावसे तपस्वी? स्वर्गादि भोग प्राप्त होनेमें कौन कर्म साधन है? किस कर्मसे प्राणी वैकुण्ठमें जाता है? ब्रह्मन्! गोलोक निरामय और सम्पूर्ण स्थानोंसे उत्तम धाम है। किस कर्मके प्रभावसे उसकी प्राप्ति हो सकती है? कितने प्रकारके नरक हैं और उनकी कितनी संख्या और उनके क्या-क्या नाम हैं? कौन किस नरकमें जाता है और कितने समयतक वहाँ यातना भोगता है? किस कर्मके फलसे पापियोंके शरीरमें कौन-सी व्याधि उत्पन्न होती है? भगवन्! मैंने ये जो-जो प्रश्न किये हैं, इन सबके उत्तर देनेकी आप कृपा करें। (अध्याय २४-२५)

२५- नरक-कुण्डों और उनमें जानेवाले पापियों तथा पापोंका वर्णन

१९८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सावित्री-धर्मराजके प्रश्नोत्तर, सावित्रीको वरदान

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! सावित्रीके वचन सुनकर यमराजके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे हँसकर प्राणियोंके कर्म-विपाक कहनेके लिये उद्यत हो गये।

धर्मराजने कहा—प्यारी बेटी! अभी तुम हो तो अल्प वयकी बालिका, किंतु तुम्हें पूर्ण विद्वानों, ज्ञानियों और योगियोंसे भी बढ़कर ज्ञान प्राप्त है। पुत्री! भगवती सावित्रीके वरदानसे तुम्हारा जन्म हुआ है। तुम उन देवीकी कला हो। राजाने तपस्याके प्रभावसे सावित्री-जैसी कन्यारत्नको प्राप्त किया है। जिस प्रकार लक्ष्मी भगवान् विष्णुके, भवानी शंकरके, राधा श्रीकृष्णके, सावित्री ब्रह्माके, मूर्ति धर्मके, शतरूपा मनुके, देवहूति कर्दमके, अरुन्धती वसिष्ठके, अदिति कश्यपके, अहल्या गौतमके, शची इन्द्रके, रोहिणी चन्द्रमाके, रति कामदेवके, स्वाहा अग्निके, स्वधा पितरोंके, संज्ञा सूर्यके, वरुणानी वरुणके, दक्षिणा यज्ञके, पृथ्वी वराहके और देवसेना कार्तिकेयके पास सौभाग्यवती प्रिया बनकर शोभा पाती हैं, तुम भी वैसी ही सत्यवान्‌की प्रिया बनो। मैंने यह तुम्हें वर दे दिया। महाभागे! इसके अतिरिक्त भी जो तुम्हें अभीष्ट हो, वह वर माँगो। मैं तुम्हें सभी अभिलषित वर देनेको तैयार हूँ।

सावित्री बोली—महाभाग! सत्यवान्‌के औरस अंशसे मुझे सौ पुत्र प्राप्त हों—यही मेरा अभिलषित वर है। साथ ही, मेरे पिता भी सौ पुत्रोंके जनक हों। मेरे श्वशुरको नेत्र-लाभ हों और उन्हें पुनः राज्यश्री प्राप्त हो जाय, यह भी मैं चाहती हूँ। जगत्प्रभो! सत्यवान्‌के साथ मैं बहुत लंबे समयतक रहकर अन्तमें भगवान् श्रीहरिके धाममें चली जाऊँ, यह वर भी देनेकी आप कृपा करें।

प्रभो! मुझे जीवके कर्मका विपाक तथा विश्वसे तर जानेका उपाय भी सुननेके लिये मनमें महान् कौतूहल हो रहा है; अतः आप यह भी बतावें।

धर्मराजने कहा—महासाध्वि! तुम्हारे सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण होंगे। अब मैं प्राणियोंका कर्म-विपाक कहता हूँ, सुनो। भारतवर्षमें ही शुभ-अशुभ कर्मोंका जन्म होता है—यहाँके कर्मोंको 'शुभ' या 'अशुभ' की संज्ञा दी गयी है। यहाँ सर्वत्र पुण्यक्षेत्र है, अन्यत्र नहीं; अन्यत्र प्राणी केवल कर्मोंका फल भोगते हैं। पतिव्रते! देवता, दैत्य, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा मनुष्य—ये सभी कर्मके फल भोगते हैं। परंतु सबका जीवन समान नहीं है। उनमेंसे मानव ही कर्मका जनक होता है अर्थात् मनुष्ययोनिमें ही शुभाशुभ कर्म किये जाते हैं; जिनका फल सर्वत्र सभी योनियोंमें भोगना पड़ता है। विशिष्ट जीवधारी—विशेषतः मानव ही सब योनियोंमें कर्मोंका फल भोगते हैं और सभी योनियोंमें भटकते हैं। वे पूर्व-जन्मका किया हुआ शुभाशुभ कर्म भोगते हैं। शुभ कर्मके प्रभावसे वे स्वर्गलोकमें जाते हैं और अशुभ कर्मसे उन्हें नरकमें भटकना पड़ता है। कर्मका निर्मूलन हो जानेपर मुक्ति होती है। साध्वि! मुक्ति दो प्रकारकी बतलायी गयी है—एक निर्वाणस्वरूपा और दूसरी परमात्मा श्रीकृष्णकी सेवारूपा। बुरे कर्मसे प्राणी रोगी होता है और शुभ कर्मसे आरोग्यवान्। वह अपने शुभाशुभ कर्मके अनुसार दीर्घजीवी, अल्पायु, सुखी एवं दुःखी होता है। कुत्सित कर्मसे ही प्राणी अङ्गहीन, अंधे-बहरे आदि होते हैं। उत्तम कर्मके फलस्वरूप सिद्धि आदिकी प्राप्ति होती है।

देवि! सामान्य बातें बतायी गयीं; अब विशेष बातें सुनो। सुन्दरि! यह अतिशय दुर्लभ विषय शास्त्रों और पुराणोंमें वर्णित है। इसे सबके सामने नहीं कहना चाहिये। सभी जातियोंके लिये भारतवर्षमें मनुष्यका जन्म पाना परम दुर्लभ है। साध्वि! उन सब जातियोंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ माना

प्रकृतिखण्ड

१९९


जाता है। वह समस्त कर्मोंमें प्रशस्त होता है। भारतवर्षमें विष्णुभक्त ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है। पतिव्रते! वैष्णवके भी दो भेद हैं—सकाम और निष्काम। सकाम वैष्णव कर्मप्रधान होता है और निष्काम वैष्णव केवल भक्त। सकाम वैष्णव कर्मोंका फल भोगता है और निष्काम वैष्णव शुभाशुभ भोगके उपद्रवसे दूर रहता है।

साध्वि! ऐसा निष्काम वैष्णव शरीर त्यागकर भगवान् विष्णुके निरामय पदको प्राप्त कर लेता है। ऐसे निष्काम वैष्णवोंका संसारमें पुनरागमन नहीं होता। द्विभुज भगवान् श्रीकृष्ण पूर्णब्रह्म परमेश्वर हैं। उनकी उपासना करनेवाले भक्तपुरुष अन्तमें दिव्य शरीर धारण करके गोलोकमें जाते हैं। सकाम वैष्णव पुरुष उच्च वैष्णव लोकोंमें जाकर समयानुसार पुनः भारतवर्षमें लौट आते हैं। द्विजातियोंके कुलमें उनका जन्म होता है। वे भी कालक्रमसे निष्काम भक्त बन जाते और भगवान् उन्हें निर्मल भक्ति भी अवश्य देते हैं। वैष्णव ब्राह्मणसे भिन्न जो सकाम मनुष्य हैं, वे विष्णुभक्तिसे रहित होनेके कारण किसी भी जन्ममें विशुद्ध बुद्धि नहीं पा सकते। साध्वि! जो तीर्थस्थानमें रहकर सदा तपस्या करते हैं, वे द्विज ब्रह्माके लोकमें जाते हैं और पुण्यभोगके पश्चात् पुनः भारतवर्षमें आ जाते हैं। भारतमें रहकर अपने कर्तव्य-कर्मोंमें संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण तथा सूर्यभक्त शरीर त्यागनेपर सूर्यलोकमें जाते हैं और पुण्यभोगके पश्चात् पुनः भारतवर्षमें जन्म पाते हैं। अपने धर्ममें निरत रहकर शिव, शक्ति तथा गणपतिकी उपासना करनेवाले ब्राह्मण शिवलोकमें जाते हैं; फिर उन्हें लौटकर भारतवर्षमें आना पड़ता है। जो धर्मरहित होनेपर भी निष्कामभावसे श्रीहरिका भजन करते हैं, वे भी भक्तिके बलसे श्रीहरिके धाममें चले जाते हैं।

साध्वि! जो अपने धर्मका पालन नहीं करते, वे आचारहीन, कामलोलुप लोग अवश्य ही नरकमें जाते हैं। चारों ही वर्ण अपने धर्ममें कटिबद्ध रहनेपर ही शुभकर्मका फल भोगनेके अधिकारी होते हैं। जो अपना कर्तव्य-कर्म नहीं करते, वे अवश्य ही नरकमें जाते हैं। कर्मका फल भोगनेके लिये वे भारतवर्षमें नहीं आ सकते। अतएव चारों वर्णोंके लिये अपने धर्मका पालन करना अत्यन्त आवश्यक है।

अपने धर्ममें संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण, स्वधर्मनिरत विप्रको अपनी कन्या देनेके फलस्वरूप चन्द्रलोकको जाते हैं और वहाँ चौदह मन्वन्तर कालतक रहते हैं। साध्वि! यदि कन्याको अलंकृत करके दानमें दिया जाय तो उससे दुगुना फल प्राप्त होता है। उन साधु पुरुषोंमें यदि कामना हो तब तो वे चन्द्रमाके लोकमें जाते हैं। निष्कामभावसे दान करें तो वे भगवान् विष्णुके परम धाममें पहुँच जाते हैं। गव्य (दूध), चाँदी, सुवर्ण, वस्त्र, घृत, फल और जल ब्राह्मणोंको देनेवाले पुण्यात्मा पुरुष चन्द्रलोकमें जाते हैं। साध्वि! एक मन्वन्तरतक वे वहाँ सुविधापूर्वक निवास करते हैं। उस दानके प्रभावसे उन्हें वहाँ सुदीर्घ कालतक निवास प्राप्त होता है। पतिव्रते! पवित्र ब्राह्मणको सुवर्ण, गौ और ताम्र आदि द्रव्यका दान करनेवाले सत्पुरुष सूर्यलोकमें जाते हैं। वे भय-बाधासे शून्य हो, उस विस्तृत लोकमें सुदीर्घ कालतक वास करते हैं। जो ब्राह्मणोंको पृथ्वी अथवा प्रचुर धान्य दान करता है, वह भगवान् विष्णुके परम सुन्दर श्वेतद्वीपमें जाता है और दीर्घकालतक वहाँ वास करता है। भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको गृह-दान करनेवाले पुरुष स्वर्गलोकमें जाते और वहाँ दीर्घकालतक निवास करते हैं; वे उस लोकमें उतने वर्षोंतक रहते हैं, जितनी संख्यामें उस दान-गृहके रजःकण हैं। मनुष्य जिस-जिस देवताके उद्देश्यसे गृह-दान करता है, अन्तमें उसी देवताके लोकमें जाता है और घरमें जितने धूलिकण हैं, उतने वर्षोंतक वहाँ रहता