भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

गणपतिखण्ड ४०१

परशुरामद्वारा पुत्रसहित राजा सहस्राक्षकका वध, कार्तवीर्य-परशुराम-युद्ध, परशुरामकी मूर्च्छा, शिवद्वारा उन्हें पुनर्जीवन दान, कार्तवीर्य-परशुराम-संवाद, आकाशवाणी सुनकर शिवका विप्रवेष धारण करके कार्तवीर्यसे कवच माँग लेना, परशुद्वारा कार्तवीर्य तथा अन्यान्य क्षत्रियोंका संहार, ब्रह्माका आगमन और परशुरामको गुरुस्वरूप शिवकी शरणमें जानेका उपदेश देकर स्वस्थानको लौट जाना

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! जब भगवान् विष्णु महालक्ष्मीकवच तथा दुर्गाकवचको लेकर वैकुण्ठको चले गये, तब भृगुनन्दन परशुरामने पुत्रसहित राजा *सहस्राक्षपर प्रहार किया। यद्यपि राजा कवचहीन था तथापि वह प्रयत्नपूर्वक ब्रह्मास्त्रद्वारा एक सप्ताहतक युद्ध करता रहा। अन्ततोगत्वा पुत्रसहित धराशायी हो गया। सहस्राक्षके गिर जानेपर महाबली कार्तवीर्यार्जुन दो लाख अक्षौहिणी सेनाके साथ स्वयं युद्ध करनेके लिये आया। वह रत्ननिर्मित खोलसे आच्छादित स्वर्णमय रथपर सवार हो अपने चारों ओर नाना प्रकारके अस्त्रोंको सुसज्जित करके रणके मुहानेपर डटकर खड़ा हो गया। परशुरामने राजराजेश्वर कार्तवीर्यको समरभूमिमें उपस्थित देखा। वह रत्ननिर्मित आभूषणोंसे सुशोभित करोड़ों राजाओंसे घिरा हुआ था। रत्ननिर्मित छत्र उसकी शोभा बढ़ा रहा था। वह रत्नोंके गहनोंसे विभूषित था। उसके सर्वाङ्गमें चन्दनकी खौर लगी हुई थी। उसका रूप अत्यन्त मनोहर था और वह मन्द-मन्द मुस्करा रहा था। राजा मुनिवर परशुरामको देखकर रथसे उतर पड़ा और उन्हें प्रणाम करके पुनः रथपर सवार हो राज-समुदायके साथ सामने खड़ा हुआ। तब परशुरामने राजाको समयोचित शुभाशीर्वाद दिया और पुनः यों कहा—'अनुयायियोंसहित तुम स्वर्गमें जाओ।' नारद! इसके बाद वहाँ दोनों सेनाओंमें युद्ध होने लगा। तब परशुरामके शिष्य तथा उनके महाबली भाई कार्तवीर्यसे पीड़ित होकर भाग खड़े हुए। उस समय उनके सारे अङ्ग घायल हो गये थे। राजाके बाणसमूहसे आच्छादित होनेके कारण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामको अपनी तथा राजाकी सेना ही नहीं दीख रही थी। फिर तो परस्पर घोर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग होने लगा। अन्तमें राजाने दत्तात्रेयके दिये हुए अमोघ शूलको यथाविधि मन्त्रोंका पाठ करके परशुरामपर छोड़ दिया। उस सैकड़ों सूर्योंके समान प्रभावशाली एवं प्रलयाग्निकी शिखाके सदृश शूलके लगते ही परशुराम धराशायी हो गये। तदनन्तर भगवान् शिवने वहाँ आकर परशुरामको पुनर्जीवन दान दिया। इसी समय वहाँ युद्धस्थलमें भक्तवत्सल कृपालु भगवान् दत्तात्रेय शिष्यकी रक्षा करनेके लिये आ पहुँचे। फिर परशुरामने क्रुद्ध होकर पाशुपतास्त्र हाथमें लिया; परंतु दत्तात्रेयकी दृष्टि पड़नेसे वे रणभूमिमें स्तम्भित हो गये। तब रणके मुहानेपर स्तम्भित हुए परशुरामने देखा कि जिनके शरीरकी कान्ति नूतन जलधरके सदृश है; जो हाथमें वंशी लिये बजा रहे हैं; सैकड़ों गोप जिनके साथ हैं; जो मुस्कराते हुए प्रज्वलित सुदर्शन चक्रको निरन्तर घुमा रहे हैं और अनेकों पार्षदोंसे घिरे हुए हैं एवं ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर जिनका स्तवन कर रहे हैं; वे गोपवेषधारी श्रीकृष्ण युद्धक्षेत्रमें राजाकी रक्षा कर रहे हैं। इसी समय वहाँ यों आकाशवाणी हुई—'दत्तात्रेयद्वारा दिया हुआ परमात्मा श्रीकृष्णका कवच उत्तम


* पुष्कराक्षका दूसरा नाम प्रतीत होता है।

४०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण रत्नकी गुटिकाके साथ राजाकी दाहिनी भुजापर बँधा हुआ है, अतः योगियोंके गुरु शंकर भिक्षारूपसे जब उस कवचको माँग लेंगे, तभी परशुराम राजाका वध करनेमें समर्थ हो सकेंगे।' नारद ! उस आकाशवाणीको सुनकर शंकर ब्राह्मणका रूप धारण करके गये और राजासे याचना करके उसका कवच माँग लाये। फिर शम्भुने श्रीकृष्णका वह कवच परशुरामको दे दिया। इसके बाद देवगण अपने-अपने उत्तम स्थानको चले गये। तब परशुरामने राजाको युद्धके लिये प्रेरित करते हुए कहा। परशुरामजी बोले- राजेन्द्र ! उठो और साहसपूर्वक युद्ध करो; क्योंकि मनुष्योंकी जय- पराजयमें काल ही कारण है। तुमने विधिपूर्वक शास्त्रोंका अध्ययन किया है, दान दिया है, सारी पृथ्वीपर उत्तम रीतिसे शासन किया है, संग्राममें यशोधर्वक कार्य किया है, इस समय मुझे मूर्च्छित कर दिया है, सभी राजाओंको जीत लिया है, लीलापूर्वक रावणको काबूमें कर लिया है और दत्तात्रेयद्वारा दिये गये त्रिशूलसे मुझे पराजित कर दिया है; परंतु शंकरजीने मुझे पुनः जीवित कर दिया है। परशुरामकी बात सुनकर परम धर्मात्मा राजा कार्तवीर्यने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और यथार्थ बात कहना आरम्भ किया। राजाने कहा- प्रभो! मैंने क्या अध्ययन किया, क्या दान दिया अथवा पृथ्वीका क्या उत्तम शासन किया? भूतलपर मेरे समान कितने भूपाल इस लोकसे चले गये। मेरी बुद्धि, तेज, पराक्रम, विविध प्रकारकी युद्ध-निपुणता, लक्ष्मी, ऐश्वर्य, ज्ञान, दानशक्ति, लौकिक गुण, आचार, विनय, विद्या, प्रतिष्ठा, परम तप-ये सभी मनोरमाके साथ ही नष्ट हो गये। समय आनेपर इन्द्र मानव हो जायेंगे। समय आनेपर ब्रह्मा भी मरेंगे। समय आनेपर प्रकृति श्रीकृष्णके शरीरमें तिरोहित हो जायगी। समय आनेपर सभी देवता मर जायँगे और समय आनेपर त्रिलोकीमें स्थित समस्त चर- अचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं। कालका अतिक्रमण करना दुष्कर है। परात्पर श्रीकृष्ण उस काल- के-काल हैं और स्वेच्छानुसार सृष्टिरचयिताके स्रष्टा, संहारकर्ताके संहारक और पालन करनेवालेके पालक हैं। जो महान्, स्थूलसे स्थूलतम, सूक्ष्मसे सूक्ष्मतम, कृश, परमाणुपरक काल, कालभेदक काल है। सारे विश्व जिसके रोयें हैं; वह महाविराट् पुरुष तेजमें परमात्मा श्रीकृष्णके सोलहवें अंशके बराबर है, जिससे क्षुद्र विराट् उत्पन्न हुआ है, जो सबका उत्कृष्ट कारण है। जो स्वयं स्रष्टा है और ब्रह्मा जिसके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए हैं। उस समय ब्रह्मा यत्नपूर्वक लाखों वर्षोंतक भ्रमण करनेपर भी जब नाभिकमलके दण्डका अन्त न पा सके, तब अपने स्थानपर स्थित हो गये। वहाँ उन्होंने वायुका आहार करके एक लाख वर्षतक तप किया। तदनन्तर उन्हें गोलोक तथा पार्षदसहित श्रीकृष्णके दर्शन हुए। उस समय श्रीकृष्ण गोप और गोपियोंसे घिरे हुए थे, उनके दो भुजाएँ थीं, हाथमें मुरली लिये हुए थे, रत्न-सिंहासनपर आसीन थे और राधाको वक्षःस्थलसे लगाये हुए थे। उन्हें देखकर ब्रह्माने बारंबार प्रणाम किया और ईश्वरेच्छा जानकर उनकी आज्ञा ले सृष्टिकी रचना करनेमें मन लगाया। शिव, जो सृष्टिके संहारक हैं, वे सृष्टि- कर्ताके ललाटसे उत्पन्न हुए हैं। श्वेतद्वीपनिवासी क्षुद्र विराट् विष्णु पालनकर्ता हैं। सृष्टिके कारणभूत ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर सभी विश्वोंमें श्रीकृष्णकी कलासे उत्पन्न हुए हैं। प्रकृति सबको जन्म देनेवाली है और श्रीकृष्ण प्रकृतिसे परे हैं। मायापति परमेश्वर भी उस प्रकृतिरूपिणी शक्तिके बिना सृष्टिका विधान करनेमें समर्थ नहीं हैं; क्योंकि माया बिना सृष्टिकी रचना नहीं हो सकती। वह महेश्वरी माया नित्य है। वह सृष्टि, संहार और पालनकर्ता श्रीकृष्णमें छिपी रहती है

गणपतिखण्ड ४०३ और सृष्टि-रचनाके समय प्रकट हो जाती है। जैसे मिट्टीके बिना कुम्हार घड़ा नहीं बना सकता और स्वर्णके बिना सोनार कुण्डलका निर्माण करनेमें असमर्थ है (उसी तरह स्रष्टा मायाके बिना सृष्टि- रचना नहीं कर सकते)। वह शक्ति ईश्वरकी इच्छासे सृष्टिकालमें राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गादेवी और सरस्वती नामसे पाँच प्रकारकी हो जाती हैं। परमात्मा श्रीकृष्णकी जो प्राणाधिष्ठात्री देवी हैं, वह प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतमा 'राधा' कही जाती हैं। जो सम्पूर्ण मङ्गलोंको सम्पन्न करनेवाली, परमानन्दरूपा तथा ऐश्वर्यकी अधिष्ठात्री देवी हैं; वे 'पद्मा' नामसे पुकारी जाती हैं। जो वेद, शास्त्र और योगकी जननी, परम दुर्लभ और परमेश्वरकी विद्याकी अधिष्ठात्री देवी हैं; उनका नाम 'सावित्री' है। जो सर्वशक्तिस्वरूपिणी, सर्वज्ञानात्मिका, सर्वस्वरूपा और बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं; वे दुर्गनाशिनी 'दुर्गा' कहलाती हैं। जो वाणीकी अधिष्ठात्री देवी और सदा शास्त्र-ज्ञान प्रदान करनेवाली हैं तथा जो श्रीकृष्णके कण्ठसे उत्पन्न हुई हैं; वे देवी 'सरस्वती' कही जाती हैं। आदिमें स्वयं मूलप्रकृति परमेश्वरीदेवी पाँच प्रकारकी थीं। परंतु वे ही पीछे सृष्टि-क्रमसे बहुत-सी कलाओंवाली हो गयीं। सृष्टि-कालमें मायाद्वारा स्त्रियाँ प्रकृतिके और पुरुषगण पुरुषके अंशसे उत्पन्न हुए; क्योंकि माया-शक्ति बिना सृष्टि नहीं हो सकती। ब्रह्मन् ! प्रत्येक विश्वमें सृष्टि सदा ब्रह्मासे ही प्रकट होती है। विष्णु उसके पालक और निरन्तर मङ्गल प्रदान करनेवाले शिव संहारक हैं। परशुराम ! यह ज्ञान दत्तात्रेयजीका दिया हुआ है, उन्होंने पुष्करतीर्थमें माघी पूर्णिमाके दिन दीक्षाके अवसरपर मुनिवरोंके संनिकट मुझे दिया था। इतना कहकर कार्तवीर्यने मुस्कराते हुए परशुरामको नमस्कार किया और शीघ्र ही बाणसहित धनुष हाथमें लेकर वह रथपर जा बैठा। तत्पश्चात् परशुरामने श्रीहरिका स्मरण करते हुए ब्रह्मास्त्रद्वारा राजाकी सेनाका सफाया कर दिया। फिर लीलापूर्वक पाशुपतास्त्रका प्रयोग करके राजाकी जीवनलीला समाप्त कर दी। इसी प्रकार परशुरामने शिवजीका स्मरण करते हुए खेल-ही-खेलमें क्रमशः इक्कीस बार पृथ्वीको राजाओंसे शून्य कर दिया। परशुरामने अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करनेके लिये क्षत्रियोंके गर्भमें स्थित तथा माताकी गोदमें खेलनेवाले शिशुओंका, नौजवानोंका तथा वृद्धोंका संहार कर डाला। इस प्रकार कार्तवीर्य गोलोकमें श्रीकृष्णके संनिकट चला गया और परशुराम श्रीहरिका स्मरण करते हुए अपने आश्रमको लौट गये। महेश्वरने इक्कीस बार पृथ्वीको भूपालोंसे हीन देख और रामको फरसेद्वारा क्रीडा करते देखकर उनका नाम परशुराम रख दिया। नारद! तब देवता, मुनि, देवियाँ, सिद्ध, गन्धर्व, किन्नर - ये सभी लोग परशुरामके मस्तकपर पुष्पोंकी वृष्टि करने लगे। स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और हरिनाम- संकीर्तन होने लगा। इस प्रकार परशुरामके उज्ज्वल यशसे सारा जगत् व्याप्त हो गया। फिर ब्रह्मा, भृगु, शुक्र, च्यवन, वाल्मीकि तथा परम प्रसन्न हुए जमदग्नि ब्रह्मलोकसे वहाँ पधारे। उनके सारे अङ्ग पुलकायमान थे और नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये थे। वे सभी हाथमें दूब और पुष्प लेकर मङ्गलाशासन कर रहे थे। तब परशुरामने दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर उन सबको प्रणाम किया। तब क्रमशः 'तात' यों कहते हुए पहले ब्रह्माने उन्हें अपनी गोदमें बैठा लिया। फिर जगद्गुरु स्वयं ब्रह्मा परशुरामसे हितकारक, नीतियुक्त, वेदका सारतत्त्व और परिणाममें सुखदायक वचन बोले। ब्रह्माने कहा - राम ! जो सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको देनेवाला परमोत्कृष्ट, सर्वसम्मत और सत्य है, वह काण्वशाखोक्त वचन कहता हूँ, सुनो। जो सभी पूजनीयोंमें इष्ट, पूज्यतम और प्रधान है, वह जन्म देनेके कारण जनक और पालन करनेके कारण पिता कहा जाता है। किंतु मुने! जो

३९- परशुरामको गौरीका स्तवन करनेके लिये कहकर विष्णुका वैकुण्ठ-गमन, परशुरामका पार्वतीकी स्तुति करना

४०४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अन्नदाता पिता है, वह जन्मदाता पितासे बड़ा है; क्योंकि पितासे उत्पन्न हुआ शरीर अन्नके बिना नित्य क्षीण होता जाता है। माता उन दोनोंसे सौ गुनी पूज्या, मान्या और वन्दनीया है; क्योंकि गर्भमें धारण करने और पालन-पोषण करनेसे वह उन दोनोंसे बड़ी है। श्रुतिमें ऐसा सुना गया है कि अपना अभीष्टदेव उन सबसे सौगुना बढ़कर पूज्य है और ज्ञान, विद्या तथा मन्त्र देनेवाला गुरु अभीष्टदेवसे भी बढ़कर है। गुरुपुत्र गुरुकी भाँति ही मान्य है; किंतु गुरुपत्नी उससे भी अधिक पूज्या है। देवताके रुष्ट होनेपर गुरु रक्षा कर लेते हैं, परंतु गुरुके क्रुद्ध होनेपर कोई भी रक्षा नहीं कर सकता। इसलिये गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही महेश्वरदेव, गुरु ही परब्रह्म और ब्राह्मणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। गुरु ही ज्ञान देते हैं और वह ज्ञान हरि-भक्ति उत्पन्न करता है। इस प्रकार जो हरि-भक्ति प्रदान करनेवाला है, उससे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है? अज्ञानरूपी अन्धकारसे आच्छादित हुए मनुष्यको जहाँसे ज्ञानरूपी दीपक प्राप्त होता है, जिसे पाकर सब कुछ निर्मल दीखने लगता है, उससे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है? गुरुके दिये हुए मन्त्रका जप करनेसे ज्ञानकी प्राप्ति होती है और उस ज्ञानसे सर्वज्ञता तथा सिद्धि मिलती है; अतः गुरुसे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है? गुरुद्वारा दी गयी जिस विद्याके बलसे मनुष्य सर्वत्र सुखपूर्वक विजयी होता है और जगत्में पूज्य भी हो जाता है, उस गुरुसे बढ़कर बन्धु दूसरा कौन है? हे पुत्र! श्रीकृष्ण तुम्हारे अभीष्टदेव हैं और स्वयं शंकर गुरु हैं; अतः तुम अभीष्टदेवसे भी बढ़कर पूजनीय गुरुकी शरण ग्रहण करो। जिनके आश्रयसे तुमने इक्कीस बार पृथ्वीको भूपालोंसे रहित कर दिया है और श्रीहरिकी भक्ति प्राप्त की है; उन शिवकी शरणमें जाओ। जो मङ्गलस्वरूप, कल्याणकी मूर्ति, कल्याणदाता, कल्याणके कारण, पार्वतीके आराध्य और शान्तरूप हैं; अपने गुरुदेव उन शिवकी शरणमें जाओ। तुम्हारे इष्टदेव जो गोलोकनाथ भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वे ही अपने अंशसे शिवका रूप धारण करके तुम्हारे गुरु हुए हैं, अतः उन्हींकी शरण ग्रहण करो। बेटा! समस्त प्राणियोंमें श्रीकृष्ण आत्मा हैं, शिव ज्ञान हैं, मैं मन हूँ और विष्णुकी सारी शक्तियोंसे सम्पन्न प्रकृति प्राण है। जो ज्ञानदाता, ज्ञानस्वरूप, ज्ञानके कारण, सनातन मृत्युको जीतनेवाले तथा कालके भी काल हैं; उन गुरुकी शरणमें जाओ। जो ब्रह्मज्योतिःस्वरूप, भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रह, सर्वज्ञ, ऐश्वर्यशाली और सनातन हैं; उन गुरुदेवकी शरणका आश्रय लो। प्रकृतिस्वरूपिणी पार्वतीने लाखों वर्षोतक तपस्या करके जिन परमेश्वरको अपने मनोनीत प्रियतम पतिके रूपमें प्राप्त किया है; उन गुरुदेवकी शरण ग्रहण करो। नारद! इतना कहकर कमलजन्मा ब्रह्मा मुनियोंके साथ चले गये। तब परशुरामने भी कैलास जानेका विचार किया।

(अध्याय ४०)


परशुरामका कैलास-गमन, वहाँ शिव-भवनमें पार्षदोंसहित गणेशको प्रणाम करके आगे बढ़नेको उद्यत होना, गणेशद्वारा रोके जानेपर उनके साथ वार्तालाप

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! श्रीहरिका कवच धारण करके जब परशुरामने पृथ्वीको क्षत्रियोंसे रहित कर दिया, तब वे अपने गुरुदेव शिवको नमस्कार करने और गुरुपत्नी अम्बा शिवाको तथा दोनों गुरुपुत्र कार्तिकेय और गणेश्वरको, जो गुणोंमें नारायणके समान थे, देखनेके लिये कैलासको चले। वे भृगुवंशी महात्मा मनके समान वेगशाली थे; अतः उसी

गणपतिखण्ड४०५

क्षण कैलासपर जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने अत्यन्त रमणीय परम मनोहर नगर देखा। वह नगर ऐसी बड़ी-बड़ी सड़कोंसे सुशोभित था, जो अत्यन्त भली लगती थीं। उनकी भूमि सोनेकी भूमिकी-सी थी, जिनपर शुद्ध स्फटिकके सदृश मणियाँ जड़ी हुई थीं। उस नगरमें चारों ओर सिंदूरकी-सी रंगवाली मणियोंकी वेदिकाएँ बनी थीं। वह राशि-की-राशि मुक्ताओंसे संयुक्त और मणियोंके मण्डपोंसे परिपूर्ण था। उसमें यक्षोंके एक अरब दिव्य भवन थे, जो रत्नों और काञ्चनोंसे परिपूर्ण, यक्षेन्द्रगणोंसे परिवेष्टित और मणिनिर्मित किवाड़, खम्भे और सीढ़ियोंसे शोभायमान थे। वह नगर दिव्य सुवर्ण-कलशों, चाँदीके बने हुए श्वेत चँवरों, रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित था। वह उदीप्त होती हुई सुन्दरियों, हाथोंमें चित्रलिखित पुत्तलिकाएँ लिये हुए निरन्तर स्वच्छन्दतापूर्वक हँसते और खेलते हुए सुन्दर-सुन्दर बालकों एवं बालिकाओं तथा स्वर्गगङ्गाके तटपर उगे हुए पारिजातके वृक्षसमूहोंसे खचाखच भरा था। सुगन्धित एवं खिले हुए पुष्पसमूहोंसे सम्पन्न, कल्पवृक्षोंका आश्रय लेनेवाले कामधेनुसे पुरस्कृत, सिद्धविद्यामें अत्यन्त निपुण पुण्यवान् सिद्धोंद्वारा सेवित था। जो तीन लाख योजन ऊँचे और सौ योजनके विस्तारवाले थे। जिनमें सैकड़ों मोटी-मोटी डालियाँ थीं, जो असंख्य शाखासमूहों और असंख्य फलोंसे संयुक्त थे। परम मनोहर शब्द करनेवाले विभिन्न प्रकारके पक्षिसमूहोंसे व्याप्त थे। शीतल-सुगन्ध वायु जिन्हें कम्पायमान कर रही थी, ऐसे अविनाशी वटवृक्षोंसे, सहस्रों पुष्पोद्यानोंसे, सैकड़ों सरोवरोंसे तथा मणियों एवं रत्नोंसे बने हुए सिद्धेन्द्रोंके लाखों भवनोंसे वह नगर सुशोभित था। उसे देखकर परशुरामका मन अत्यन्त प्रसन्नतासे खिल उठा। फिर सामने ही उन्हें शंकरजीका शोभाशाली रमणीय आश्रम दीख पड़ा। विश्वकर्माने बहुमूल्य सुनहली मणियोंद्वारा उसकी रचना की थी। उसमें हीरे जड़े हुए थे। वह पंद्रह योजन ऊँचा और चार योजन विस्तृत था। उसके चारों ओर अत्यन्त सुन्दर सुडौल चौकोर परकोटा बना हुआ था। दरवाजोंपर नाना प्रकारकी चित्रकारियोंसे युक्त रत्नोंके किवाड़ लगे थे। वह उत्तम मणियोंकी वेदियोंसे युक्त तथा मणियोंके खंभोंसे सुशोभित था।

नारद! परशुरामने उस आश्रमके प्रधानद्वारके दाहिनी ओर वृषेन्द्रको और बायीं ओर सिंह तथा नन्दीश्वर, महाकाल, भयंकर पिंगलाक्ष, विशालाक्ष, बाण, महाबली विरूपाक्ष, विकटाक्ष, भास्कराक्ष, रक्ताक्ष, विकटोदर, संहारभैरव, भयंकर कालभैरव, रुरुभैरव, ईशकी-सी आभावाले महाभैरव, कृष्णाङ्गभैरव, दृढ़पराक्रमी क्रोधभैरव, कपालभैरव, रुद्रभैरव तथा सिद्धेन्द्रों, रुद्रगणों, विद्याधरों, गुह्यकों, भूतों, प्रेतों, पिशाचों, कूष्माण्डों, ब्रह्मराक्षसों, वेतालों, दानवों, जटाधारी योगीन्द्रों, यक्षों, किंपुरुषों और किन्नरोंको देखा। उन्हें देखकर भृगुनन्दनने उनके साथ वार्तालाप किया। फिर नन्दिकेश्वरकी आज्ञा ले वे प्रसन्न मनसे भीतर घुसे। आगे बढ़नेपर उन्हें बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए सैकड़ों मन्दिर दीख पड़े, जो अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित चमचमाते हुए कलशोंसे सुशोभित थे। अमूल्य रत्नोंके बने हुए किवाड़, जिनमें हीरे जड़े हुए थे और मोतियाँ एवं निर्मल शीशे लगे हुए थे, उन मन्दिरोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनमें गोरोचना नामक मणियोंके हजारों खंभे लगे थे और वे मणियोंकी सीढ़ियोंसे सम्पन्न थे। परशुरामने उनके भीतरी द्वारको देखा, जो नाना प्रकारकी चित्रकारीसे चित्रित तथा हीरे-मोतियोंकी गुँथी हुई मालाओंसे सुशोभित था। उसकी बायीं ओर कार्तिकेय और दाहिनी ओर गणेश तथा शिव-तुल्य पराक्रमी विशालकाय वीरभद्र दीख पड़े। नारद! वहाँ प्रधान-प्रधान पार्षद और क्षेत्रपाल भी रत्नाभरणोंसे विभूषित हो रत्ननिर्मित सिंहासनोंपर बैठे हुए थे। महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न भृगुवंशी

५९- परशुरामकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर दुर्गाका उन्हें अभय वरदान देना

४०६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण परशुराम उन सबसे सम्भाषण करके हाथमें फरसा लिये हुए शीघ्र ही आगे बढ़नेको उद्यत हुए। उन्हें आगे बढ़ते देखकर गणेशने कहा—'भाई! क्षणभर ठहर जाओ। इस समय महादेव निद्राके वशीभूत होकर शयन कर रहे हैं। मैं उन ईश्वरकी आज्ञा लेकर यहाँ आता हूँ और तुम्हें साथ लिवा ले चलूँगा। इस समय रुक जाओ।' गणेशकी बात सुनकर महाबली परशुराम, जो बृहस्पतिके समान वक्ता थे, कहनेके लिये उद्यत हुए। (अध्याय ४१) परशुरामका शिवके अन्तःपुरमें जानेके लिये गणेशसे अनुरोध, गणेशका उन्हें समझना, न माननेपर उन्हें स्तम्भित करके अपनी सूँड़में लपेटकर सभी लोकोंमें घुमाते हुए गोलोकमें श्रीकृष्णका दर्शन कराकर भूतलपर छोड़ देना, होशमें आनेपर परशुरामका कुपित होकर गणेशपर फरसेका प्रहार करना, गणेशका एक दाँत टूट जाना, देवलोकमें हाहाकार, पार्वतीका रुदन और शिवसे प्रार्थना परशुरामने कहा— भाई! मैं ईश्वरको प्रणाम करनेके लिये अन्तःपुरमें जाऊँगा और भक्तिपूर्वक माता पार्वतीको नमस्कार करके तुरंत ही घरको लौट जाऊँगा। जो सगुण-निर्गुण, भक्तोंके लिये अनुग्रहके मूर्तरूप, सत्य, सत्यस्वरूप, ब्रह्मज्योति, सनातन, स्वेच्छामय, दयासिन्धु, दीनबन्धु, मुनियोंके ईश्वर, आत्मामें रमण करनेवाले, पूर्णकाम, व्यक्त- अव्यक्त, परात्पर, पर-अपरके रचयिता, इन्द्रस्वरूप, सम्मानित, पुरातन, परमात्मा, ईशान, सबके आदि, अविनाशी, समस्त मङ्गलोंके मङ्गलस्वरूप, सम्पूर्ण मङ्गलोंके कारण, सभी मङ्गलोंके दाता, शान्त, समस्त ऐश्वर्योंको प्रदान करनेवाले, परमोत्कृष्ट, शीघ्र ही संतुष्ट होनेवाले, प्रसन्न मुखवाले, शरणमें आये हुएकी रक्षा करनेवाले, भक्तोंके लिये अभयप्रद, भक्तवत्सल और समदर्शी हैं, जिनसे मैंने नाना प्रकारकी विद्याओं और अनेक प्रकारके परम दुर्लभ शस्त्रोंको प्राप्त किया है; उन जगदीश्वर गुरुके इस समय मैं दर्शन करना चाहता हूँ। यों कहकर परशुराम गणपतिके आगे खड़े हो गये। इसपर श्रीगणेशजीने उनको बहुत तरहसे समझाया कि इस समय भगवान् शंकर और माताजी अन्तःपुरमें हैं। आपको वहाँ नहीं जाना चाहिये, पर परशुरामजी हठ करते ही रहे। उन्होंने अनेकों युक्तियोंद्वारा अपना अंदर जाना निर्दोष बतलाया। यों परस्पर दोनोंमें वाद-विवाद होता रहा। गणेशजी विनयपूर्वक ही परशुरामको रोकते रहे, पर जब परशुरामने बलपूर्वक जाना चाहा तो गणेशजीने रोक दिया। तब परस्परमें वाग्युद्ध और करताड़न होने लगा। अन्तमें परशुरामने गणेशजीपर अपना फरसा उठा लिया। तब कार्तिकेयने बीचमें आकर उन्हें समझाया। परशुरामने गणेशजीको धक्का दे दिया, वे गिर पड़े। फिर उठकर उन्होंने परशुरामको फटकारा। इसपर परशुरामने पुनः कुठार उठा लिया। तब गणेशजीने अपनी सूँड़को बहुत लंबा कर लिया और उसमें परशुरामको लपेटकर वे घुमाने लगे। जैसे छोटेसे साँपको गरुड़ ऊपर उठा लेता है, वैसे ही अपने योगबलसे शिवपुत्र गणेशने उनको उठाकर स्तम्भित कर दिया और सप्तद्वीप, सप्तपर्वत, सप्तसागर, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, जनलोक, तपोलोक, ध्रुवलोक, गौरीलोक, शम्भुलोक उनको दिखा दिये। तदनन्तर उन्हें गम्भीर समुद्रमें फेंक दिया। जब वे तैरने लगे तो पुनः पकड़कर उठा लिया और घुमाते हुए वैकुण्ठ दिखलाकर फिर

४०- सबका स्तवन-पूजन और नमस्कार करके परशुरामका जानेके लिये उद्यत होना, गणेश-पूजामें तुलसी-निषेधके प्रसङ्गमें गणेश-तुलसीके संवादका वर्णन तथा गणपति-खण्डका श्रवण-माहात्म्य

गणपतिखण्ड ४०७


गोलोकधाममें भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन कराये। उस समय भगवान् रत्नाभरणोंसे विभूषित हो रत्ननिर्मित सिंहासनपर आसीन थे। राधाजी उनके वक्षःस्थलसे सटी हुई थीं। तेजमें वे करोड़ों सूर्योंके समान प्रभावशाली थे। उनके दो भुजाएँ थीं, हाथमें मुरली शोभा पा रही थी, परम मनोहर रूप था और वे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। इस प्रकार श्रीकृष्णके दर्शन कराकर उनसे बारंबार प्रणाम कराया। यों सम्पूर्ण पापोंका पूर्णतया नाश कर देनेवाले इष्टदेव श्रीकृष्णके दर्शन कराकर गणेशजीने परशुरामके भ्रूणहत्याजनित पापको दूर कर दिया। यों तो पापजनित यातना भोगे बिना नष्ट नहीं होती, किंतु परशुरामको थोड़ी ही भोगनी पड़ी और सब श्रीकृष्णके दर्शनसे नष्ट हो गयी। क्षणभरके बाद परशुरामकी चेतना लौट आयी और वे वेगपूर्वक भूतलपर गिर पड़े। उस समय उनका गणेशद्वारा किया गया स्तम्भन भी दूर हो गया। तब उन्होंने अपने अभीष्टदेव श्रीकृष्ण, अपने गुरु जगद्गुरु शम्भु तथा गुरुद्वारा दिये गये परम दुर्लभ स्तोत्र और कवचका स्मरण किया। मुने! तदनन्तर परशुरामने अपने अमोघ फरसेको, जिसकी प्रभा ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक सूर्यकी प्रभासे सौगुनी थी और जो तेजमें शिव-तुल्य था, गणेशपर चला दिया। पिताके उस अमोघ अस्त्रको आते देखकर स्वयं गणपतिने उसे अपने बायें दाँतसे पकड़ लिया; उस अस्त्रको व्यर्थ नहीं होने दिया। तब महादेवजीके बलसे वह फरसा वेगपूर्वक गिरकर मूलसहित गणेशके दाँतको काटकर पुनः परशुरामके हाथमें लौट आया। यह देखकर वीरभद्र, कार्तिकेय और क्षेत्रपाल आदि पार्षद तथा आकाशमें देवगण महान् भयसे भीत होकर हाहाकार करने लगे।

इधर वह दाँत खूनसे सनकर शब्द करता हुआ भूमिपर गिर पड़ा, मानो गेरुसे युक्त स्फटिकका पर्वत धराशायी हो गया हो। विप्रवर! उस महान् शब्दसे भयभीत होकर पृथ्वी काँप उठी। सभी कैलासवासी प्राणी उसी क्षण डरके मारे मूर्च्छित हो गये। उस समय निद्राके स्वामी जगदीश्वर शिवकी निद्रा भंग हो गयी। वे घबराये हुए पार्वतीके साथ अन्तःपुरसे बाहर आये। मुने! उस समय गणेश घायल हो गये थे, उनका दाँत टूट गया था और मुख रक्तसे सराबोर था। उनका क्रोध शान्त हो गया था और वे लज्जित होकर मुस्कराते हुए सिर झुकाये हुए थे। उन्हें इस दशामें सामने देखकर पार्वतीने शीघ्र ही स्कन्दसे पूछा—‘बेटा! यह क्या बात है?’ तब स्कन्दने भयपूर्वक पूर्वापरका सारा वृत्तान्त उनसे कह सुनाया। उसे सुनकर दुर्गाको क्रोध आ गया। वे कृपापरवश हो रोने लगीं और शम्भुके सामने अपने पुत्र गणेशको छातीसे लगाकर बोलीं। सती-साध्वी पार्वतीने शोकके कारण डरकर विनयपूर्वक शम्भुको समझाया और फिर प्रणत होकर प्रणतकी पीड़ा हरनेवाले पतिदेवसे कहने लगीं।

(अध्याय ४२-४३)

४०८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पार्वतीकी शिवसे प्रार्थना, परशुरामको देखकर उन्हें मारनेके लिये उद्यत होना, परशुरामद्वारा इष्टदेवका ध्यान, भगवान्का वामनरूपसे पधारना, शिव-पार्वतीको समझाना और गणेशस्तोत्रको प्रकट करना पार्वतीने कहा- प्रभो! जगत्में सभी लोग शंकरकी किंकरी मुझ दुर्गाको जानते हैं कि यह अपेक्षारहित दासी है, उसका जीवन व्यर्थ है। परंतु ईश्वरके लिये तृणसे लेकर पर्वतपर्यन्त सभी जातियाँ समान हैं; अतः दासीपुत्र गणेश और आपके शिष्य परशुराम-इन दोनोंमें किसका दोष है, इसपर विचार करना उचित है; क्योंकि आप धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं। वीरभद्र, कार्तिकेय और पार्षदगण इसके साक्षी हैं। भला, गवाहीके काममें झूठ कौन कहेगा। साथ ही ये दोनों भाई इन लोगोंके लिये समान हैं। यों तो धर्म-निर्णयके अवसरपर गवाही देते समय सत्पुरुषोंके लिये शत्रु और मित्र समान हो जाते हैं (अर्थात् उनकी पक्षपातकी भावना नहीं रहती); क्योंकि जो गवाह गवाहीके विषयको ठीक-ठीक जानते हुए भी सभामें काम, क्रोध, लोभ अथवा भयके कारण झूठी गवाही देता है, वह अपनी सौ पीढ़ियोंको नरकमें गिराकर स्वयं भी कुम्भीपाक नरकमें जाता है। यद्यपि मैं इन दोनोंको समझाने तथा इसका निर्णय करनेमें समर्थ हूँ, तथापि आपके समक्ष मेरा आज्ञा देना श्रुतिमें निन्दित कहा गया है। प्रभो! सभामें राजाके वर्तमान रहते भृत्योंकी प्रभाका उसी प्रकार मूल्य नहीं होता, जैसे सूर्यके उदय होनेपर पृथ्वीपर जुगनूकी कोई गणना नहीं होती। सदा परित्यागके भयसे डरी हुई मैंने चिरकालतक तपस्या करके आपके चरणकमलोंको पाया है; अतः जगन्नाथ ! दारुण पुत्र-स्नेहके कारण क्रोध, शोक और मोहके वशीभूत होकर मैंने जो कुछ कहा है, उसे क्षमा कीजिये। यदि आपने मेरा परित्याग कर दिया तो उस पुत्रसे क्या लाभ ? क्योंकि उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई पतिव्रता नारीके लिये पति सौ पुत्रोंसे बढ़कर है। जो नारी नीच कुलमें उत्पन्न, दुष्टस्वभाववाली, ज्ञानहीन और माता-पिताके दोषसे निन्दित होती है, वह अपने पतिको नहीं मानती। उत्तम कुलमें पैदा हुई स्त्री अपने निन्दित, पतित, मूर्ख, दरिद्र, रोगी और जड पतिको भी सदा विष्णुके समान समझती है। समस्त तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ अग्नि अथवा सूर्य पतिव्रताके तेजकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। महादान, पुण्यप्रद व्रतोपवास और तप- ये सभी पति-सेवाके सोलहवें अंशकी समता करनेके योग्य नहीं हैं। * उत्तम कुलमें जन्म लेनेवाली स्त्रियोंके लिये चाहे पुत्र हो, पिता हो अथवा सहोदर भाई हो, कोई भी पतिके समान नहीं होता। स्वामीसे इतना कहकर दुर्गाने अपने सामने परशुरामको देखा, जो निर्भय होकर शम्भुके चरणकमलोंकी सेवा कर रहे थे। तब पार्वती उनसे बोलीं। पार्वतीने कहा- हे महाभाग राम! तुम ब्रह्मवंशमें उत्पन्न हुए हो। तुम्हारी बुद्धि सदसत्का विवेचन करनेवाली है। तुम जमदग्निके पुत्र और योगियोंके गुरु इन महादेवके शिष्य हो। सती- साध्वी रेणुका, जो लक्ष्मीके अंशसे उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई हैं, तुम्हारी माता हैं। तुम्हारे नाना विष्णुभक्त और मामा उनसे भी बढ़कर वैष्णव हैं। तुम मनुके वंशमें उत्पन्न हुए राजा रेणुकके दौहित्र

  • कुत्सितं पतितं मूढं दरिद्रं रोगिणं जडम्। कुलजा विष्णुतुल्यं च कान्तं पश्यति संततम् ॥ हुताशनो वा सूर्यो वा सर्वतेजस्विनां परः। पतिव्रतातेजसश्च कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ महादानानि पुण्यानि व्रतान्यनशनानि च। तपांसि पतिसेवायां कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ (गणपतिखण्ड ४४ । १३-१५)

गणपतिखण्ड ४०९ हो। साधुस्वभाववाले शूरवीर राजा विष्णुयशा तुम्हारे मामा हैं। तुम किसके दोषसे ऐसे दुर्धर्ष हो गये हो ? इस अशुद्धिका कारण मुझे ज्ञात नहीं हो रहा है; क्योंकि जिनके दोषसे मनुष्य दूषित हो जाता है, तुम्हारे वे सभी सम्बन्धी शुद्ध मनवाले हैं। तुमने करुणासागर गुरु और अमोघ फरसा पाकर पहले क्षत्रिय-जातिपर परीक्षा करके पुनः गुरु-पुत्रपर परीक्षा की है। कहाँ तो श्रुतिमें 'गुरुको दक्षिणा देना उचित है' - यों सुना जाता है और कहाँ तुमने गुरुपुत्रके दाँतको ही तोड़ दिया, अब उसका मस्तक भी काट डालो। शंकरके वरदान तथा अमोघवीर्य फरसेसे तो चूहोंको खानेवाला सियार सिंह और शार्दूलको भी मार सकता है। जितेन्द्रिय पुरुषोंमें श्रेष्ठ गणेश तुम्हारे-जैसे लाखों- करोड़ों जन्तुओंको मार डालनेकी शक्ति रखता है, परंतु वह मक्खीपर हाथ नहीं उठाता। श्रीकृष्णके अंशसे उत्पन्न हुआ यह गणेश तेजमें श्रीकृष्णके ही समान है। अन्य देवता श्रीकृष्णकी कलाएँ हैं। इसीसे इसकी अग्रपूजा होती है। यों कहकर पार्वती क्रोधवश उन परशुरामको मारनेके लिये उद्यत हो गयीं। तब परशुरामने मन-ही-मन गुरुको प्रणाम करके अपने इष्टदेव श्रीकृष्णका स्मरण किया। इतनेमें ही दुर्गाने अपने सामने एक अत्यन्त बौने ब्राह्मण-बालकको उपस्थित देखा। उसकी कान्ति करोड़ों सूर्योंके समान थी। उसके दाँत स्वच्छ थे। वह शुक्ल वस्त्र, शुक्ल यज्ञोपवीत, दण्ड, छत्र और ललाटपर उज्ज्वल तिलक धारण किये हुए था। उसके गलेमें तुलसीकी माला पड़ी थी। उसका रूप परम मनोहर था, मुखपर मन्द मुसकान थी और वह रत्नोंके बाजूबंद, कङ्कण और रत्नमालासे विभूषित था। पैरोंमें रत्नोंके नूपुर थे। मस्तकपर बहुमूल्य रत्नोंके मुकुटकी उज्ज्वल छटा थी और कपोलोंपर रत्ननिर्मित दो कुण्डल झलमला रहे थे, जिससे उसकी विशेष शोभा हो रही थी। वह भक्तोंका ईश और भक्तवत्सल था तथा भक्तोंको बायें हाथसे स्थिरमुद्रा और दाहिने हाथसे अभयमुद्रा दिखा रहा था। उसके साथ नगरके हँसते हुए बालक और बालिकाओंका समूह था और कैलासवासी आबालवृद्ध सभी उसकी ओर हर्षपूर्वक देख रहे थे। उस बालकको देखकर पुत्रों तथा भृत्योंसहित शम्भुने घबराकर भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् दुर्गाने भी दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर नमस्कार किया। तब बालकने सबको अभीष्टप्रद आशीर्वाद दिया। उसे देखकर सभी बालक भयके कारण महान् आश्चर्यमें पड़ गये। तदनन्तर शिवजीने भक्तिपूर्वक उसे षोडशोपचार समर्पित करके उस परिपूर्णतमकी वेदोक्त-विधिसे पूजा की और फिर सिर झुकाकर काण्वशाखामें कहे हुए स्तोत्रद्वारा उन सनातन भगवान्की स्तुति की। उस समय उनके सर्वाङ्गमें रोमाञ्च हो आया था। पुनः जो रत्नसिंहासनपर आसीन थे और अपने उत्कृष्ट तेजसे जिन्होंने सबको आच्छादित कर रखा था, उन वामन- भगवान्से स्वयं शंकरजी कहने लगे। शंकरजीने कहा - ब्रह्मन् ! जो आत्माराम हैं, उनके विषयमें कुशलप्रश्न करना अत्यन्त विडम्बनाकी बात है; क्योंकि वे स्वयं कुशलके आधार और कुशल-अकुशलके प्रदाता हैं। श्रीकृष्णकी सेवाके फलोदयसे आज आप जो मुझे अतिथिरूपसे प्राप्त हुए हैं, इससे मेरा जन्म सफल और जीवन धन्य हो गया। कृपासागर परिपूर्णतम श्रीकृष्ण लोगोंके उद्धारके लिये पुण्यक्षेत्र भारतमें अपनी कलासे अवतीर्ण हुए हैं। जिसने अतिथिका आदर-सत्कार किया है, उसने मानो सम्पूर्ण देवताओंकी पूजा कर ली; क्योंकि जिसपर अतिथि प्रसन्न हो जाता है, उसपर स्वयं श्रीहरि प्रसन्न हो जाते हैं। समस्त तीर्थोंमें स्नान करनेसे, सर्वस्व दान करनेसे, सभी प्रकारके व्रतोपवाससे, सम्पूर्ण यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण करनेसे, सभी प्रकारकी

१- नारदजीके प्रश्न तथा मुनिवर नारायणद्वारा भगवान् विष्णु एवं वैष्णवोंके माहात्म्यका वर्णन, श्रीराधा और श्रीकृष्णके गोकुलमें अवतार लेनेका एक कारण श्रीदाम और राधाका परस्पर शाप

४१० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

तपस्याओंसे और नित्य-नैमित्तिकादि विविध कर्मानुष्ठानोंसे जो फल प्राप्त होता है—वह अतिथिसेवाकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकता। अतिथि जिसके गृहसे निराश एवं रुष्ट होकर चला जाता है, उसका पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है।

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! शंकरके वचन सुनकर जगत्पति स्वयं श्रीहरि संतुष्ट हो गये और मेघके समान गम्भीर वाणीद्वारा उनसे बोले।

विष्णुने कहा—शिवजी! आपलोगोंके कोलाहलको जानकर कृष्णभक्त परशुरामकी रक्षा करनेके लिये इस समय मैं श्वेतद्वीपसे आ रहा हूँ; क्योंकि इन कृष्णभक्तोंका कहीं अमङ्गल नहीं होता। गुरुके कोपके अतिरिक्त अन्य अवस्थाओंमें मैं हाथमें चक्र लेकर उनकी रक्षा करता रहता हूँ। गुरुके रुष्ट होनेपर मैं रक्षा नहीं करता; क्योंकि गुरुकी अवहेलना बलवती होती है। जो गुरुकी सेवासे हीन है, उससे बढ़कर पापी दूसरा नहीं है। अहो! जिसकी कृपासे मानव सब कुछ देखता है, वह पिता सबके लिये सबसे बढ़कर माननीय और पूजनीय होता है। वह मनुष्योंके जन्म देनेके कारण जनक, रक्षा करनेके कारण पिता और विस्तीर्ण करनेके कारण कलारूपसे प्रजापति है। उस पितासे माता गर्भमें धारण करने एवं पालन-पोषण करनेसे सौगुनी बढ़कर वन्दनीया, पूज्या और मान्या है। वह प्रसव करनेवाली वसुन्धराके समान है। अन्नदाता मातासे भी सौगुना वन्दनीय, पूज्य और मान्य है; क्योंकि अन्नके बिना शरीर नष्ट हो जाता है और विष्णु ही कलारूपसे अन्नदाता होते हैं। अभीष्टदेव अन्नदातासे भी सौगुना श्रेष्ठ कहा जाता है। किंतु विद्या और मन्त्र प्रदान करनेवाला गुरु अभीष्टदेवसे भी सौगुना बढ़कर है। जो अज्ञानरूपी अन्धकारसे आच्छादित हुए समस्त पदार्थोंको ज्ञानदीपकरूपी नेत्रसे दिखलाता है, उससे बढ़कर बान्धव कौन है? गुरुद्वारा दिये गये मन्त्र और तपसे अभीष्ट सुख, सर्वज्ञता और समस्त सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है; अतः गुरुसे बढ़कर बान्धव दूसरा कौन है? गुरुद्वारा दी गयी विद्याके बलसे मनुष्य सर्वत्र समयपर विजयी होता है, इसलिये जगत्में गुरुसे बढ़कर पूज्य और उनसे अधिक प्रिय बन्धु कौन हो सकता है? जो मूर्ख विद्यामद अथवा धनमदसे अंधा होकर गुरुकी सेवा नहीं करता, वह ब्रह्महत्या आदि पापोंसे लिपायमान होता है; इसमें संशय नहीं है। जो दरिद्र, पतित एवं क्षुद्र गुरुके साथ साधारण मानवकी भाँति आचरण करता है, वह तीर्थस्नायी होनेपर भी अपवित्र है और उसका कर्मोंके करनेमें अधिकार नहीं है। शिव! जो छल-कपट करके माता, पिता, भार्या, गुरुपत्नी और गुरुका पालन-पोषण नहीं करता, वह महान् पापी है। गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही महेश्वरदेव, गुरु ही परब्रह्म, गुरु ही सूर्यरूप, गुरु ही चन्द्र, इन्द्र, वायु, वरुण और अग्निरूप हैं। यहाँतक कि गुरु स्वयं सर्वरूपी ऐश्वर्यशाली परमात्मा हैं। वेदसे उत्तम दूसरा शास्त्र नहीं है, श्रीकृष्णसे बढ़कर दूसरा देवता नहीं है, गङ्गाके समान दूसरा तीर्थ नहीं है और तुलसीसे उत्तम दूसरा पुष्प नहीं है*। पृथ्वीसे बढ़कर दूसरा क्षमावान् नहीं है, पुत्रसे अधिक दूसरा कोई प्रिय नहीं है, दैवसे बढ़कर शक्ति नहीं है और एकादशीसे उत्तम व्रत नहीं है। शालग्रामसे बढ़कर यन्त्र, भारतसे उत्तम क्षेत्र और पुण्यस्थलोंमें वृन्दावनके समान पुण्यस्थान नहीं है। मोक्षदायिनी पुरियोंमें काशी और वैष्णवोंमें शिवके समान दूसरा नहीं है। न तो पार्वतीसे अधिक कोई पतिव्रता है और न गणेशसे उत्तम कोई जितेन्द्रिय है। न तो विद्याके समान कोई


* नास्ति वेदात् परं शास्त्रं न हि कृष्णात् परः सुरः। नास्ति गङ्गासमं तीर्थं न पुष्पं तुलसीपरम्॥
(गणपतिखण्ड ४४। ७२)

गणपतिखण्ड ४११

बन्धु है और न गुरुसे बढ़कर कोई अन्य पुरुष है। विद्या प्रदान करनेवालेके पुत्र और पत्नी भी निस्संदेह उसीके समान होते हैं। गुरुकी स्त्री और पुत्रकी परशुरामने अवहेलना कर दी है, उसीका सम्मार्जन करनेके लिये मैं तुम्हारे घर आया हूँ।

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! वहाँ भगवान् विष्णु शिवजीसे ऐसा कहकर दुर्गाको समझाते हुए सत्यके साररूप उत्तम वचन बोले।

विष्णुने कहा—देवि! मैं नीतियुक्त, वेदका तत्त्वरूप तथा परिणाममें सुखदायक वचन कहता हूँ, मेरे उस शुभ वचनको सुनो। गिरिराजकिशोरी! तुम्हारे लिये जैसे गणेश और कार्तिकेय हैं, निस्संदेह उसी प्रकार भृगुवंशी परशुराम भी हैं। सर्वज्ञे! इनके प्रति तुम्हारे अथवा शंकरजीके स्नेहमें भेदभाव नहीं है। अतः मातः! सबपर विचार करके जैसा उचित हो, वैसा करो। पुत्रके साथ पुत्रका यह विवाद तो दैवदोषसे घटित हुआ है। भला, दैवको मिटानेमें कौन समर्थ हो सकता है? क्योंकि दैव महाबली है। वत्से! देखो, तुम्हारे पुत्रका 'एकदन्त' नाम वेदोंमें विख्यात है। वरानने! सभी देव उसे नमस्कार करते हैं। ईश्वरि! सामवेदमें कहे हुए अपने पुत्रके नामाष्टक स्तोत्रको ध्यान देकर श्रवण करो। मातः! वह उत्तम स्तोत्र सम्पूर्ण विघ्नोंका नाशक है।

मातः! तुम्हारे पुत्रके गणेश, एकदन्त, हेरम्ब, विघ्ननायक, लम्बोदर, शूर्पकर्ण, गजवक्त्र और गुहाग्रज—ये आठ नाम हैं। इन आठों नामोंका अर्थ सुनो। शिवप्रिये! यह उत्तम स्तोत्र सभी स्तोत्रोंका सारभूत और सम्पूर्ण विघ्नोंका निवारण करनेवाला है। 'ग' ज्ञानार्थवाचक और 'ण' निर्वाणवाचक है। इन दोनों (ग+ण)-के जो ईश हैं; उन परब्रह्म 'गणेश' को मैं प्रणाम करता हूँ।

'एक' शब्द प्रधानार्थक है और 'दन्त' बलवाचक है; अतः जिनका बल सबसे बढ़कर है; उन 'एकदन्त' को मैं नमस्कार करता हूँ। 'हे' दीनार्थवाचक और 'रम्ब' पालकका वाचक है; अतः दीनोंका पालन करनेवाले 'हेरम्ब' को मैं शीश नवाता हूँ। 'विघ्न' विपत्तिवाचक और 'नायक' खण्डनार्थक है, इस प्रकार जो विपत्तिके विनाशक हैं; उन 'विघ्ननायक' को मैं अभिवादन करता हूँ। पूर्वकालमें विष्णुद्वारा दिये गये नैवेद्यों तथा पिताद्वारा समर्पित अनेक प्रकारके मिष्टान्नोंके खानेसे जिनका उदर लम्बा हो गया है; उन 'लम्बोदर' की मैं वन्दना करता हूँ। जिनके कर्ण शूर्पाकार, विघ्न-निवारणके हेतु, सम्पदाके दाता और ज्ञानरूप हैं; उन 'शूर्पकर्ण' को मैं सिर झुकाता हूँ। जिनके मस्तकपर मुनिद्वारा दिया गया विष्णुका प्रसादरूप पुष्प वर्तमान है और जो गजेन्द्रके मुखसे युक्त हैं; उन 'गजवक्त्र' को मैं नमस्कार करता हूँ। जो गुह (स्कन्द)-से पहले जन्म लेकर शिव-भवनमें आविर्भूत हुए हैं तथा समस्त देवगणोंमें जिनकी अग्रपूजा होती है; उन 'गुहाग्रज' देवकी मैं वन्दना करता हूँ। दुर्गे! अपने पुत्रके नामोंसे संयुक्त इस उत्तम नामाष्टक स्तोत्रको पहले वेदमें देख लो, तब ऐसा क्रोध करो। जो इस नामाष्टक स्तोत्रका, जो नाना अर्थोंसे संयुक्त एवं शुभकारक है, नित्य तीनों संध्याओंके समय पाठ करता है, वह सुखी और सर्वत्र विजयी होता है। उसके पाससे विघ्न उसी प्रकार दूर भाग जाते हैं, जैसे गरुड़के निकटसे साँप। गणेश्वरकी कृपासे वह निश्चय ही महान् ज्ञानी हो जाता है, पुत्रार्थीको पुत्र और भार्याकी कामनावालेको उत्तम स्त्री मिल जाती है तथा महामूर्ख निश्चय ही विद्वान् और श्रेष्ठ कवि हो जाता है*।

(अध्याय ४४)


* विष्णुरुवाच—
गणेशमेकदन्तं च हेरम्बं विघ्ननायकम्। लम्बोदरं शूर्पकर्णं गजवक्त्रं गुहाग्रजम्॥

४१२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

परशुरामको गौरीका स्तवन करनेके लिये कहकर विष्णुका वैकुण्ठ-गमन, परशुरामका पार्वतीकी स्तुति करना

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! इस प्रकार पार्वतीको समझा-बुझाकर भगवान् विष्णु परशुरामसे हितकारक, तत्त्वस्वरूप, नीतिका साररूप और परिणाममें सुखदायक वचन बोले।

विष्णुने कहा— राम! तुमने अकल्याणकर मार्गपर स्थित हो क्रोधवश जो गणेशका दाँत तोड़ डाला है, इससे तुम श्रुतिके मतानुसार इस समय सचमुच ही अपराधी हो। अतएव मेरेद्वारा बतलाये हुए स्तोत्रसे देवश्रेष्ठ गणपतिका स्तवन करके पुनः काण्वशाखामें कहे हुए स्तोत्रद्वारा जगज्जननी दुर्गाकी स्तुति करो। ये जगदीश्वर श्रीकृष्णकी परा शक्ति एवं बुद्धिस्वरूपा हैं। इनके रुष्ट हो जानेपर तुम्हारी बुद्धि नष्ट हो जायगी। ये सर्वशक्तिस्वरूपा हैं। जगत् इन्हींसे शक्तिमान् हुआ है। यहाँतक कि जो प्रकृतिसे परे और निर्गुण हैं, वे श्रीकृष्ण भी इन्हींसे शक्तिशाली हुए हैं। इस शक्तिके बिना ब्रह्मा भी सृष्टिरचनामें समर्थ नहीं हैं। हम—ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर इन्हींसे उत्पन्न हुए हैं। द्विजवर! पूर्वकालमें जब असुरोंने देवसमुदायको अपने अधीन कर लिया था, उस भयंकर समयमें ये सती सम्पूर्ण देवताओंके तेजसे आविर्भूत हुई थीं। तत्पश्चात् श्रीकृष्णकी आज्ञासे इन्होंने असुरोंका वध करके देवताओंका पद उन्हें प्रदान किया। फिर दक्षकी तपस्याके कारण दक्षपत्नीके गर्भसे जन्म लिया। उस जन्ममें सती शंकरकी भार्या हुईं। पुनः पतिकी निन्दाके कारण उस शरीरको त्यागकर इन्होंने शैलराजकी पत्नीके गर्भसे जन्म धारण किया। फिर तपस्या करके योगीन्द्रोंके गुरुके गुरु शंकरको पाया और श्रीकृष्णकी सेवासे श्रीकृष्णके अंशभूत गणपतिको पुत्ररूपमें प्राप्त किया। बालक! जिनका तुम नित्य ध्यान करते हो, क्या उन्हें नहीं जानते? वे भगवान् श्रीकृष्ण ही अपने अंशसे पार्वती-पुत्र होकर प्रकट हुए हैं। इसलिये जो मङ्गलस्वरूपा, कल्याणदायिनी, शिवपरायणा, मङ्गलकी कारण और मङ्गलकी अधीश्वरी हैं; उन शिवप्रिया दुर्गाकी तुम हाथ जोड़ सिर झुकाकर शिवाके स्तोत्रराजद्वारा, जिसे पूर्वकालमें त्रिपुरोंके भयंकर वधके अवसरपर ब्रह्माकी प्रेरणासे शंकरजीने स्तवन किया था, उससे स्तुति करो।


नामाष्टार्थं च पुत्रस्य शृणु मातर्हरप्रिये । स्तोत्राणां सारभूतं च सर्वविघ्नहरं परम् ॥
ज्ञानार्थवाचको गश्च णश्च निर्वाणवाचकः । तयोरीशं परं ब्रह्म गणेशं प्रणमाम्यहम् ॥
एकशब्दः प्रधानार्थो दन्तश्च बलवाचकः । बलं प्रधानं सर्वस्मादेकदन्तं नमाम्यहम् ॥
दीनार्थवाचको हेश्च रम्बः पालकवाचकः । दीनानां परिपालकं हेरम्बं प्रणमाम्यहम् ॥
विपत्तिवाचको विघ्नो नायकः खण्डनार्थकः । विपत्खण्डनकारकं नमामि विघ्ननायकम् ॥
विष्णुदत्तैश्च नैवेद्यैर्यस्य लम्बोदरं पुरा । पित्रा दत्तैश्च विविधैर्वन्दे लम्बोदरं च तम् ॥
शूर्पकारौ च यत्कर्णौ विघ्नवारणकारणौ । सम्पदौ ज्ञानरूपौ च शूर्पकर्णं नमाम्यहम् ॥
विष्णुप्रसादपुष्पं च यन्मूर्ध्नि मुनिदत्तकम् । तद् गजेन्द्रवक्त्रयुक्तं गजवक्त्रं नमाम्यहम् ॥
गुहस्याग्रे च जातोऽयमाविर्भूतो हरालये । वन्दे गुहाग्रजं देवं सर्वदेवाग्रपूजितम् ॥
एतन्नामाष्टकं दुर्गे नामभिः संयुतं परम् । पुत्रस्य पश्य वेदे च तदा कोपं तथा कुरु ॥
एतन्नामाष्टकं स्तोत्रं नानार्थसंयुक्तं शुभम् । त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स सुखी सर्वतो जयी ॥
ततो विघ्नाः पलायन्ते वैनतेयाद् यथोरगाः । गणेश्वरप्रसादेन महाज्ञानी भवेद् ध्रुवम् ॥
पुत्रार्थी लभते पुत्रं भार्यार्थी विपुलां स्त्रियम् । महाजडः कवीन्द्रश्च विद्यावांश्च भवेद् ध्रुवम् ॥
(गणपतिखण्ड ४४ । ८५–९८)

२- पृथ्वीका देवताओंके साथ ब्रह्मलोकमें जाकर अपनी व्यथा-कथा सुनाना, ब्रह्माजीका उन सबके साथ कैलासगमन, कैलाससे ब्रह्मा, शिव तथा धर्मका वैकुण्ठमें जाकर श्रीहरिकी आज्ञासे गोलोकमें जाना और वहाँ विरजाटट, शतशृङ्गपर्वत, रासमण्डल एवं वृन्दावन आदिके प्रदेशोंका अवलोकन करना, गोलोकका विस्तृत वर्णन

गणपतिखण्ड ४१३ नारद! यों कहकर भगवान् विष्णु शीघ्र ही वैकुण्ठको चले गये। श्रीहरिके चले जानेपर परशुराम हरिका स्मरण करके विष्णुप्रदत्त स्तोत्रद्वारा, जो सम्पूर्ण विघ्नोंका नाशक तथा धर्म-अर्थ- काम-मोक्षका कारण है; उन दुर्गाकी स्तुति करनेको उद्यत हुए। उन्होंने गङ्गाके शुभजलमें स्नान करके धुले हुए वस्त्र धारण किये। फिर अञ्जलि बाँधकर भक्तैश्वर गुरुको प्रणाम किया। फिर आचमन करके दुर्गाको सिर झुकाकर नमस्कार किया। उस समय भक्तिके कारण उनके कंधे झुके हुए थे, आँखोंमें आनन्दाश्रु छलक आये थे और सारा अङ्ग पुलकायमान हो गया था। परशुरामने कहा- प्राचीन कालकी बात है; गोलोकमें जब परिपूर्णतम श्रीकृष्ण सृष्टि- रचनाके लिये उद्यत हुए, उस समय उनके शरीरसे तुम्हारा प्राकट्य हुआ था। तुम्हारी कान्ति करोड़ों सूर्योंके समान थी। तुम वस्त्र और अलंकारोंसे विभूषित थीं। शरीरपर अग्निमें तपाकर शुद्ध की हुई साड़ीका परिधान था। नव तरुण अवस्था थी। ललाटपर सिंदूरकी बेंदी शोभित हो रही थी। मालतीकी मालाओंसे मण्डित गुँथी हुई सुन्दर चोटी थी। बड़ा ही मनोहर रूप था। मुखपर मन्द मुस्कान थी। अहो ! तुम्हारी मूर्ति बड़ी सुन्दर थी, उसका वर्णन करना कठिन है। तुम मुमुक्षुओंको मोक्ष प्रदान करनेवाली तथा स्वयं महाविष्णुकी विधि हो। बाले ! तुम सबको मोहित कर लेनेवाली हो। तुम्हें देखकर श्रीकृष्ण उसी क्षण मोहित हो गये। तब तुम उनसे सम्भावित होकर सहसा मुस्कराती हुई भाग चलीं। इसी कारण सत्पुरुष तुम्हें 'मूलप्रकृति' ईश्वरी राधा कहते हैं। उस समय सहसा श्रीकृष्णने तुम्हें बुलाकर वीर्यका आधान किया। उससे एक महान् डिम्ब उत्पन्न हुआ। उस डिम्बसे महाविराट्की उत्पत्ति हुई, जिसके रोमकूपोंमें समस्त ब्रह्माण्ड स्थित हैं। फिर राधाके शृङ्गारक्रमसे तुम्हारा निःश्वास प्रकट हुआ। वह निःश्वास महावायु हुआ और वही विश्वको धारण करनेवाला विराट् कहलाया। तुम्हारे पसीनेसे विश्वगोलक पिघल गया। तब विश्वका निवासस्थान वह विराट् जलकी राशि हो गया। तब तुमने अपनेको पाँच भागोंमें विभक्त करके पाँच मूर्ति धारण कर ली। उनमें परमात्मा श्रीकृष्णकी जो प्राणाधिष्ठात्री मूर्ति है, उसे भविष्यवेत्ता लोग कृष्णप्राणाधिका 'राधा' कहते हैं। जो मूर्ति वेद-शास्त्रोंकी जननी तथा वेदाधिष्ठात्री है, उस शुद्धरूपा मूर्तिको मनीषीगण 'सावित्री' नामसे पुकारते हैं। जो शान्ति तथा शान्तरूपिणी ऐश्वर्यकी अधिष्ठात्री मूर्ति है, उस सत्त्वस्वरूपिणी शुद्ध मूर्तिको संतलोग 'लक्ष्मी' नामसे अभिहित करते हैं। अहो ! जो रागकी अधिष्ठात्री देवी तथा सत्पुरुषोंको पैदा करनेवाली है, जिसकी मूर्ति शुक्ल वर्णकी है, उस शास्त्रकी ज्ञाता मूर्तिको शास्त्रज्ञ 'सरस्वती' कहते हैं। जो मूर्ति बुद्धि, विद्या, समस्त शक्तिकी अधिदेवता, सम्पूर्ण मङ्गलोंकी मङ्गलस्थान, सर्वमङ्गलस्वरूपिणी और सम्पूर्ण मङ्गलोंकी कारण है, वही तुम इस समय शिवके भवनमें विराजमान हो। तुम्हीं शिवके समीप शिवा (पार्वती), नारायणके निकट लक्ष्मी और ब्रह्माकी प्रिया वेदजननी सावित्री और सरस्वती हो। जो परिपूर्णतम एवं परमानन्दस्वरूप हैं, उन रासेश्वर श्रीकृष्णकी तुम परमानन्दरूपिणी राधा हो। देवाङ्गनाएँ भी तुम्हारे कलांशकी अंशकलासे प्रादुर्भूत हुई हैं। सारी नारियाँ तुम्हारी विद्यास्वरूपा हैं और तुम सबकी कारणरूपा हो। अम्बिके ! सूर्यकी पत्नी छाया, चन्द्रमाकी भार्या सर्वमोहिनी रोहिणी, इन्द्रकी पत्नी शची, कामदेवकी पत्नी ऐश्वर्यशालिनी रति, वरुणकी पत्नी वरुणानी, वायुकी प्राणप्रिया स्त्री, अग्निकी प्रिया स्वाहा, कुबेरकी सुन्दरी भार्या, यमकी पत्नी सुशीला, नैर्ऋतकी जाया कैटभी, ईशानकी पत्नी शशिकला,

४१४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मनुकी प्रिया शतरूपा, कर्दमकी भार्या देवहूति, वसिष्ठकी पत्नी अरुन्धती, देवमाता अदिति, अगस्त्य मुनिकी प्रिया लोपामुद्रा, गौतमकी पत्नी अहल्या, सबकी आधाररूपा वसुन्धरा, गङ्गा, तुलसी तथा भूतलकी सारी श्रेष्ठ सरिताएँ—ये सभी तथा इनके अतिरिक्त जो अन्य स्त्रियाँ हैं, वे सभी तुम्हारी कलासे उत्पन्न हुई हैं।

तुम मनुष्योंके घरमें गृहलक्ष्मी, राजाओंके भवनोंमें राजलक्ष्मी, तपस्वियोंकी तपस्या और ब्राह्मणोंकी गायत्री हो। तुम सत्पुरुषोंके लिये सत्त्वस्वरूप और दुष्टोंके लिये कलहकी अङ्कुर हो। निर्गुणकी ज्योति और सगुणकी शक्ति तुम्हीं हो। तुम सूर्यमें प्रभा, अग्निमें दाहिका-शक्ति, जलमें शीतलता और चन्द्रमामें शोभा हो। भूमिमें गन्ध और आकाशमें शब्द तुम्हारा ही रूप है। तुम भूख-प्यास आदि तथा प्राणियोंकी समस्त शक्ति हो। संसारमें सबकी उत्पत्तिकी कारण, साररूपा, स्मृति, मेधा, बुद्धि अथवा विद्वानोंकी ज्ञानशक्ति तुम्हीं हो। श्रीकृष्णने शिवजीको कृपापूर्वक सम्पूर्ण ज्ञानकी प्रसविनी जो शुभ विद्या प्रदान की थी, वह तुम्हीं हो; उसीसे शिवजी मृत्युञ्जय हुए हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली जो त्रिविध शक्तियाँ हैं, उनके रूपमें तुम्हीं विद्यमान हो; अतः तुम्हें नमस्कार है। जब मधु-कैटभके भयसे डरकर ब्रह्मा काँप उठे थे, उस समय जिनकी स्तुति करके वे भयमुक्त हुए थे; उन देवीको मैं सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। मधु-कैटभके युद्धमें जगत्के रक्षक ये भगवान् विष्णु जिन परमेश्वरीका स्तवन करके शक्तिमान् हुए थे; उन दुर्गाको मैं नमस्कार करता हूँ। त्रिपुरके महायुद्धमें रथसहित शिवजीके गिर जानेपर सभी देवताओंने जिनकी स्तुति की थी; उन दुर्गाको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनका स्तवन करके वृषरूपधारी विष्णुद्वारा उठाये गये स्वयं शम्भुने त्रिपुरका संहार किया था; उन दुर्गाको मैं अभिवादन करता हूँ। जिनकी आज्ञासे निरन्तर वायु बहती है, सूर्य तपते हैं, इन्द्र वर्षा करते हैं और अग्नि जलाती है; उन दुर्गाको मैं सिर झुकाता हूँ। जिनकी आज्ञासे काल सदा वेगपूर्वक चक्कर काटता रहता है और मृत्यु जीव-समुदायमें विचरती रहती है; उन दुर्गाको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनके आदेशसे सृष्टिकर्ता सृष्टिकी रचना करते हैं, पालनकर्ता रक्षा करते हैं और संहर्ता समय आनेपर संहार करते हैं; उन दुर्गाको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनके बिना स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण, जो ज्योतिःस्वरूप एवं निर्गुण हैं, सृष्टि-रचना करनेमें समर्थ नहीं होते; उन देवीको मेरा नमस्कार है। जगज्जननी! रक्षा करो, रक्षा करो; मेरे अपराधको क्षमा कर दो। भला, कहीं बच्चेके अपराध करनेसे माता कुपित होती है।

इतना कहकर परशुराम उन्हें प्रणाम करके रोने लगे। तब दुर्गा प्रसन्न हो गयीं और शीघ्र ही उन्हें अभयका वरदान देती हुई बोलीं—'हे वत्स! तुम अमर हो जाओ। बेटा! अब शान्ति धारण करो। शिवजीकी कृपासे सदा सर्वत्र तुम्हारी विजय हो। सर्वान्तरात्मा भगवान् श्रीहरि सदा

गणपतिखण्ड ४१५

तुमपर प्रसन्न रहें। श्रीकृष्णमें तथा कल्याणदाता गुरुदेव शिवमें तुम्हारी सुदृढ़ भक्ति बनी रहे; क्योंकि जिसकी इष्टदेव तथा गुरुमें शाश्वती भक्ति होती है, उसपर यदि सभी देवता कुपित हो जायँ तो भी उसे मार नहीं सकते। तुम तो श्रीकृष्णके भक्त और शंकरके शिष्य हो तथा मुझ गुरूपत्नीकी स्तुति कर रहे हो; इसलिये किसकी शक्ति है जो तुम्हें मार सके। अहो! जो अन्यान्य देवताओंके भक्त हैं अथवा उनकी भक्ति न करके निरंकुश ही हैं, परंतु श्रीकृष्णके भक्त हैं तो उनका कहीं भी अमङ्गल नहीं होता। भार्गव! भला, जिन भाग्यवानोंपर बलवान् चन्द्रमा प्रसन्न हैं तो दुर्बल तारागण रुष्ट होकर उनका क्या बिगाड़ सकते हैं। सभामें महान् आत्मबलसे सम्पन्न सुखी नरेश जिसपर संतुष्ट है, उसका दुर्बल भृत्यवर्ग कुपित होकर क्या कर लेगा? यों कहकर पार्वती हर्षित हो परशुरामको शुभाशीर्वाद देकर अन्तःपुरमें चली गयीं। तब तुरंत हरि-नामका घोष गूँज उठा।

जो मनुष्य इस काण्वशाखोक्त स्तोत्रका पूजाके समय, यात्राके अवसरपर अथवा प्रातःकाल पाठ करता है, वह अवश्य ही अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेता है। इसके पाठसे पुत्रार्थीको पुत्र, कन्यार्थीको कन्या, विद्यार्थीको विद्या, प्रजार्थीको प्रजा, राज्यभ्रष्टको राज्य और धनहीनको धनकी प्राप्ति होती है। जिसपर गुरु, देवता, राजा अथवा बन्धु-बान्धव क्रुद्ध हो गये हों, उसके लिये ये सभी इस स्तोत्रराजकी कृपासे प्रसन्न होकर वरदाता हो जाते हैं। जिसे चोर-डाकुओंने घेर लिया हो, साँपने डस लिया हो, जो भयानक शत्रुके चंगुलमें फँस गया हो अथवा व्याधिग्रस्त हो; वह इस स्तोत्रके स्मरणमात्रसे मुक्त हो जाता है। राजद्वारपर, श्मशानमें, कारागारमें और बन्धनमें पड़ा हुआ तथा अगाध जलराशिमें डूबता हुआ मनुष्य इस स्तोत्रके प्रभावसे मुक्त हो जाता है। स्वामिभेद, पुत्रभेद तथा भयंकर मित्रभेदके अवसरपर इस स्तोत्रके स्मरणमात्रसे निश्चय ही अभीष्टार्थकी प्राप्ति होती है। जो स्त्री वर्षपर्यन्त भक्तिपूर्वक दुर्गाका भलीभाँति पूजन करके हविष्यान्न खाकर इस स्तोत्रराजको सुनती है, वह महावन्ध्या हो तो भी प्रसववाली हो जाती है। उसे ज्ञानी एवं चिरजीवी दिव्य पुत्र प्राप्त होता है। छः महीनेतक इसका श्रवण करनेसे दुर्भगा सौभाग्यवती हो जाती है। जो काकवन्ध्या और मृतवत्सा नारी भक्तिपूर्वक नौ मासतक इस स्तोत्रराजको सुनती है, वह निश्चय ही पुत्र पाती है। जो कन्याकी माता तो है परंतु पुत्रसे हीन है, वह यदि पाँच महीनेतक कलशपर दुर्गाकी सम्यक् पूजा करके इस स्तोत्रको श्रवण करती है तो उसे अवश्य ही पुत्रकी प्राप्ति होती है।

(अध्याय ४५)


सबका स्तवन-पूजन और नमस्कार करके परशुरामका जानेके लिये उद्यत होना, गणेश-पूजामें तुलसी-निषेधके प्रसङ्गमें गणेश-तुलसीके संवादका वर्णन तथा गणपतिखण्डका श्रवण-माहात्म्य

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! इस प्रकार परशुरामने हर्षमग्न-चित्तसे दुर्गाकी स्तुति करके पुनः श्रीहरिद्वारा बतलाये गये स्तोत्रसे गणेशका स्तवन किया। तत्पश्चात् नाना प्रकारके नैवेद्यों, धूपों, दीपों, गन्धों और तुलसीके अतिरिक्त अन्य पुष्पोंसे भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की। इस प्रकार परशुरामने भक्तिभावसहित भाई गणेशका भलीभाँति पूजन करके गुरूपत्नी पार्वती और गुरुदेव शिवको नमस्कार किया तथा शंकरकी आज्ञा ले वे वहाँसे जानेको उद्यत हुए।

४१६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


नारदजीने पूछा— प्रभो! परशुरामने जब विविध नैवेद्यों तथा पुष्पोंद्वारा भगवान् गणेशकी पूजा की थी, उस समय उन्होंने तुलसीको छोड़ क्यों दिया? मनोहारिणी तुलसी तो समस्त पुष्पोंमें मान्य एवं धन्यवादकी पात्र हैं; फिर गणेश उस सारभूत पूजाको क्यों नहीं ग्रहण करते?

श्रीनारायण बोले— नारद! ब्रह्मकल्पमें एक ऐसी घटना घटित हुई थी, जो परम गुह्य एवं मनोहारिणी है। उस प्राचीन इतिहासको मैं कहता हूँ, सुनो। एक समयकी बात है। नवयौवन-सम्पन्ना तुलसीदेवी नारायणपरायण हो तपस्याके निमित्तसे तीर्थोंमें भ्रमण करती हुई गङ्गा-तटपर जा पहुँचीं। वहाँ उन्होंने गणेशको देखा, जिनकी नयी जवानी थी; जो अत्यन्त सुन्दर, शुद्ध और पीताम्बर धारण किये हुए थे; जिनके सारे शरीरमें चन्दनकी खौर लगी थी; जो रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित थे; सुन्दरता जिनके मनका अपहरण नहीं कर सकती; जो कामनारहित, जितेन्द्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ और योगीन्द्रोंके गुरु-के-गुरु हैं तथा मन्द-मन्द मुस्कराते हुए जन्म, मृत्यु और बुढ़ापाका नाश करनेवाले श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान कर रहे थे; उन्हें देखते ही तुलसीका मन गणेशकी ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी उनसे लम्बोदर तथा गजमुख होनेका कारण पूछकर उनका उपहास करने लगी। ध्यान-भङ्ग होनेपर गणेशजीने पूछा—'वत्से! तुम कौन हो? किसकी कन्या हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? माता! यह मुझे बतलाओ; क्योंकि शुभे! तपस्वियोंका ध्यान भङ्ग करना सदा पापजनक तथा अमङ्गलकारी होता है। शुभे! श्रीकृष्ण कल्याण करें, कृपानिधि विघ्नका विनाश करें और मेरे ध्यान-भङ्गसे उत्पन्न हुआ दोष तुम्हारे लिये अमङ्गलकारक न हो।'

इसपर तुलसीने कहा— प्रभो! मैं धर्मात्मजकी नवयुवती कन्या हूँ और तपस्यामें संलग्न हूँ। मेरी यह तपस्या पति-प्राप्तिके लिये है; अतः आप मेरे स्वामी हो जाइये। तुलसीकी बात सुनकर अगाध बुद्धिसम्पन्न गणेश श्रीहरिका स्मरण करते हुए विदुषी तुलसीसे मधुरवाणीमें बोले।

गणेशने कहा— हे माता! विवाह करना बड़ा भयंकर होता है; अतः इस विषयमें मेरी बिलकुल इच्छा नहीं है; क्योंकि विवाह दुःखका कारण होता है, उससे सुख कभी नहीं मिलता। यह हरि-भक्तिका व्यवधान, तपस्याके नाशका कारण, मोक्षद्वारका किवाड़, भव-बन्धनकी रस्सी, गर्भवासकारक, सदा तत्त्वज्ञानका छेदक और संशयोंका उद्गमस्थान है। इसलिये महाभागे! मेरी ओरसे मन लौटा लो और किसी अन्य पतिकी तलाश करो। गणेशके ऐसे वचन सुनकर तुलसीको क्रोध आ गया। तब वह साध्वी गणेशको शाप देते हुए बोली—'तुम्हारा विवाह होगा।' यह सुनकर शिव-तनय सुरश्रेष्ठ गणेशने भी तुलसीको शाप दिया—'देवि! तुम निस्संदेह असुरद्वारा ग्रस्त होओगी। तत्पश्चात् महापुरुषोंके शापसे तुम वृक्ष हो जाओगी।' नारद! महातपस्वी गणेश इतना कहकर चुप हो गये। उस शापको सुनकर तुलसीने फिर उस सुरश्रेष्ठ गणेशकी स्तुति की। तब प्रसन्न होकर गणेशने तुलसीसे कहा।

गणेश बोले— मनोरमे! तुम पुष्पोंकी सारभूता होओगी और कलांशसे स्वयं नारायणकी प्रिया बनोगी। महाभागे! यों तो सभी देवता तुमसे प्रेम करेंगे, परंतु श्रीकृष्णके लिये तुम विशेष प्रिय होओगी। तुम्हारे द्वारा की गयी पूजा मनुष्योंके लिये मुक्तिदायिनी होगी और मेरे लिये तुम सर्वदा त्याज्य रहोगी। तुलसीसे यों कहकर सुरश्रेष्ठ गणेश पुनः तप करने चले गये। वे श्रीहरिकी आराधनामें व्यग्र होकर बदरीनाथके संनिकट गये। इधर तुलसीदेवी दुःखित हृदयसे पुष्करमें जा पहुँची

गणपतिखण्ड ४१७

और निराहार रहकर वहाँ दीर्घकालिक तपस्यामें संलग्न हो गयी। नारद! तत्पश्चात् मुनिवरके तथा गणेशके शापसे वह चिरकालतक शङ्खचूडकी प्रिय पत्नी बनी रही। मुने! तदनन्तर असुरराज शङ्खचूड शंकरजीके त्रिशूलसे मृत्युको प्राप्त हो गया, तब नारायणप्रिया तुलसी कलांशसे वृक्षभावको प्राप्त हो गयी। यह इतिहास, जिसका मैंने तुमसे वर्णन किया है, पूर्वकालमें धर्मके मुखसे सुना था। इसका वर्णन अन्य पुराणोंमें नहीं मिलता। यह तत्त्वरूप तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है। तदनन्तर महाभाग परशुराम गणेशका पूजन करके तथा शंकर और पार्वतीको नमस्कार कर तपस्याके लिये वनको चले गये। इधर गणेश समस्त सुरश्रेष्ठों तथा मुनिवरोंसे वन्दित एवं पूजित होकर शिव-पार्वतीके निकट स्थित हुए।

जो मनुष्य इस गणपतिखण्डको दत्तचित्त होकर सुनता है, उसे निश्चय ही राजसूययज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। पुत्रहीन मनुष्य श्रीगणेशकी कृपासे धीर, वीर, धनी, गुणी, चिरजीवी, यशस्वी, पुत्रवान्, विद्वान्, श्रेष्ठ कवि, जितेन्द्रियोंमें श्रेष्ठ, समस्त सम्पदाओंका दाता, परम पवित्र, सदाचारी, प्रशंसनीय, विष्णुभक्त, अहिंसक, दयालु और तत्त्वज्ञानविशारद पुत्र पाता है। महावन्ध्या स्त्री वस्त्र, अलंकार और चन्दनद्वारा भक्तिपूर्वक गणेशकी पूजा करके और इस गणपतिखण्डको सुनकर पुत्रको जन्म देती है। जो मनुष्य नियमपरायण हो मनमें किसी कामनाको लेकर इसे सुनता है, सुरश्रेष्ठ गणेश उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं। विघ्ननाशके लिये यत्नपूर्वक इस गणपतिखण्डको सुनकर वाचकको सोनेका यज्ञोपवीत, श्वेत छत्र, श्वेत अश्व, श्वेतपुष्पोंकी माला, स्वस्तिक मिष्टान्न, तिलके लड्डू और देशकालोद्भव पके हुए फल प्रदान करना चाहिये।

(अध्याय ४६)


॥ गणपतिखण्ड सम्पूर्ण ॥

४१८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

नारदजीके प्रश्न तथा मुनिवर नारायणद्वारा भगवान् विष्णु एवं वैष्णवके माहात्म्यका वर्णन, श्रीराधा और श्रीकृष्णके गोकुलमें अवतार लेनेका एक कारण श्रीदाम और राधाका परस्पर शाप

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्॥

भगवान् नारायण, नरश्रेष्ठ नर तथा देवी सरस्वतीको नमस्कार करके जय (इतिहास-पुराण आदि)-का पाठ करना चाहिये।

**नारदजीने कहा—**ब्रह्मन्! मैंने सबसे पहले पूज्यपाद पिता ब्रह्माजीके मुखारविन्दसे ब्रह्मखण्डकी मनोहर कथा सुनी है, जो अत्यन्त अद्भुत है। तदनन्तर उन्हींकी आज्ञासे मैं तुरंत आपके निकट चला आया और यहाँ अमृतखण्डसे भी अधिक मधुर प्रकृतिखण्ड सुननेको मिला। तत्पश्चात् मैंने गणपतिखण्ड श्रवण किया, जो अखण्ड जन्मोंका खण्डन करनेवाला है। परंतु मेरा लोलुप मन अभी तृप्त नहीं हुआ। यह और भी विशिष्ट प्रसङ्गको सुनना चाहता है। अतः अब श्रीकृष्णजन्मखण्डका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये, जो मनुष्योंके जन्म-मरण आदिका खण्डन करनेवाला है। वह समस्त तत्त्वोंका प्रकाशक, कर्मबन्धनका नाशक, हरिभक्ति प्रदान करनेवाला, तत्काल वैराग्यजनक, संसारविषयक आसक्तिका निवारक, मुक्तिबीजका कारण तथा भवसागरसे पार उतारनेवाला उत्तम साधन है। वह कर्मभोगरूपी रोगोंका नाश करनेके लिये रसायनका काम देता है। श्रीकृष्णचरणारविन्दोंकी प्राप्तिके लिये सोपानका निर्माण करता है। वैष्णवोंका तो वह जीवन ही है। तीनों लोकोंको परम पवित्र करनेवाला है। मैं आपका शरणागत भक्त एवं शिष्य हूँ। अतः आप मुझे श्रीकृष्णजन्मखण्डकी कथाको विस्तारपूर्वक सुनाइये। किसकी प्रार्थनासे एकमात्र परिपूर्णतम परमेश्वर श्रीकृष्ण अपने सम्पूर्ण अंशोंसे इस भूतलपर अवतीर्ण हुए? किस युगमें, किस हेतुसे और कहाँ उनका आविर्भाव हुआ? उनके पिता वसुदेव कौन थे अथवा माता देवकी भी कौन थीं? बताइये। किसके कुलमें भगवान्ने मायाद्वारा जन्म-ग्रहणकी लीला की? श्रीहरिने किस रूपसे यहाँ आकर क्या किया? मुने! सुना जाता है कि श्रीकृष्ण कंसके भयसे सूतिकागृहसे गोकुलको चले गये थे। जो स्वयं भयके स्वामी हैं, उन्हें कीटतुल्य कंससे क्यों भय हुआ? उन श्रीहरिने गोप-वेष धारण करके गोकुलमें कौन-सी लीला की? वे तो जगदीश्वर हैं। फिर उन्होंने गोपाङ्गनाओंके साथ क्यों विहार किया? गोपाङ्गनाएँ कौन थीं? अथवा वे ग्वाल-बाल भी कौन थे? यशोदा कौन थीं? नन्दरायजी कौन थे? उन्होंने कौन-सा पुण्य किया था? श्रीहरिकी प्रेयसी गोलोकवासिनी पुण्यवती देवी श्रीराधा क्यों व्रजमें व्रजकन्या होकर प्रकट हुईं? गोपियोंने किस प्रकार दुराराध्य परमेश्वरको प्राप्त किया? श्रीहरि उन सबको छोड़कर मथुरा क्यों चले गये? महाभाग! पृथ्वीका भार उतारकर कौन-सी लीला करनेके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण पुनः परमधामको पधारे? आप उनकी लीला-कथा सुनाइये; क्योंकि उसका श्रवण और कीर्तन पुण्यदायक है। श्रीहरिकी कथा अत्यन्त दुर्लभ है। वह भवसागरसे पार उतारनेके लिये नौकाके तुल्य है। प्रारब्धभोगरूपी बेड़ी तथा क्लेशोंका उच्छेद करनेके लिये कटार है। पापरूपी ईंधन-राशिका दाह करनेके लिये प्रज्वलित अग्नि-शिखाके समान है। इसे सुननेवाले पुरुषोंके करोड़ों जन्मोंकी पापराशिका यह नाश

** श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४१९ कर देती है। भगवान्‌की कथा शोक-सागरका नाश करनेवाली मुक्ति है। वह कानोंमें अमृतके समान मधुर प्रतीत होती है। कृपानिधे ! मैं आपका भक्त एवं शिष्य हूँ। आप मुझे श्रीहरिकथाका ज्ञान प्रदान कीजिये। तप, जप, बड़े-बड़े दान, पृथ्वीके तीथोंके दर्शन, श्रुतिपाठ, अनशन, व्रत, देवार्चन तथा सम्पूर्ण यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण करनेसे मनुष्यको जो फल मिलता है, वह सब ज्ञानदानकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। पिताजीने मुझे आपके पास ज्ञान प्राप्त करनेके लिये भेजा है। सुधा- समुद्रके पास पहुँचकर कौन दूसरी वस्तु (जल आदि) पीनेकी इच्छा करेगा ? भगवान् नारायण बोले-कुलको पवित्र करनेवाले नारद! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम धन्य हो। पुण्यकी मूर्तिमती राशि हो। लोकोंको पवित्र करनेके लिये ही तुम इनमें भ्रमण करते हो। वाणीसे मनुष्योंके हृदयकी तत्काल पहचान हो जाती है। शिष्य, कलत्र, कन्या, दौहित्र, बन्धु-बान्धव, पुत्र-पौत्र, प्रवचन, प्रताप, यश, श्री, बुद्धि, वैरी और विद्या-इनके विषयमें मनुष्योंके हार्दिक अभिप्रायका पता चल जाता है। तुम जीवन्मुक्त और पवित्र हो। भगवान् गदाधरके शुद्ध भक्त हो। अपने चरणोंकी धूलसे सबकी आधारभूता वसुधाको पवित्र करते फिरते हो। समस्त लोकोंको अपने स्वरूपका दर्शन देकर पवित्र बनाते हो। भगवान् श्रीहरिकी कथा परम मङ्गलमयी है, इसीलिये तुम उसे सुनना चाहते हो। जहाँ श्रीकृष्णकी कथाएँ होती हैं, वहीं सब देवता निवास करते हैं। ऋषि, मुनि और सम्पूर्ण तीर्थ भी वहीं रहते हैं। वे कथा सुनकर अन्तमें अपने निरापद स्थानको जाते हैं। जिन स्थानोंमें श्रीकृष्णकी शुभ कथाएँ होती हैं, वे तीर्थ बन जाते हैं। सैकड़ों जन्मोंतक तपस्या करके जो पवित्र हो गया है, वही इस भारतवर्षमें जन्म पाता है। वह यदि श्रीहरिकी अमृतमयी कथाका श्रवण करे, तभी अपने जन्मको सफल कर सकता है। भगवान्‌की पूजा, वन्दना, मन्त्र-जप, सेवा, स्मरण, कीर्तन, निरन्तर उनके गुणोंका श्रवण, उनके प्रति आत्मनिवेदन तथा उनका दास्यभाव-ये भक्तिके नौ लक्षण हैं*। नारद ! इन सबका अनुष्ठान करके मनुष्य अपने जन्मको सफल बनाता है। उसके मार्गमें विघ्न नहीं आता और उसकी पूरी आयु नष्ट नहीं होती। उसके सामने काल उसी तरह नहीं जाता है, जैसे गरुड़के सामने सर्प। भगवान् श्रीहरि उस भक्तका सामीप्य एक क्षणके लिये भी नहीं छोड़ते हैं। अणिमा आदि सिद्धियाँ तुरंत उसकी सेवामें उपस्थित हो जाती हैं। भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे उसकी रक्षाके लिये सुदर्शन चक्र दिन- रात उसके पास घूमता रहता है। फिर कौन उसका क्या कर सकता है? यमराजके दूत स्वप्नमें भी उसके निकट वैसे ही नहीं जाते हैं, जैसे शलभ जलती हुई आगको देखकर उससे दूर भागते हैं। उसके ऊपर ऋषि, मुनि, सिद्ध तथा सम्पूर्ण देवता संतुष्ट रहते हैं। वह भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे सर्वत्र सुखी एवं निःशंक रहता है। श्रीकृष्णकी कथामें सदा तुम्हारा आत्यन्तिक अनुराग है। क्यों न हो ? पिताका स्वभाव पुत्रमें अवश्य ही प्रकट होता है। विप्रवर ! तुम्हारी यह प्रशंसा क्या है ? तुम्हारा जन्म ब्रह्माजीके मानससे हुआ है। जिसका जिस कुलमें जन्म होता है, उसकी बुद्धि उसके अनुसार ही होती है। तुम्हारे पिता श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी सेवासे ही विधाताके पदपर प्रतिष्ठित हैं। वे नित्य-निरन्तर नवधा भक्तिका पालन करते हैं। जिसका श्रीकृष्णकी कथामें अनुराग हो,

  • अर्चनं वन्दनं मन्त्रजपं सेवनमेव च। स्मरणं कीर्तनं शश्वद् गुणश्रवणमीप्सितम् ॥ निवेदनं तस्य दास्यं नवधा भक्तिलक्षणम्। (श्रीकृष्णजन्मखण्ड १।३३-३४)

४२० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


कथा सुनकर जिसके नेत्रोंमें आँसू छलक आते हों और शरीरमें रोमाञ्च छा जाता हो तथा मन उसीमें डूब जाता हो; उसीको विद्वान् पुरुषोंने सच्चा भक्त कहा है। जो मन, वाणी और शरीरसे स्त्री-पुत्र आदि सबको श्रीहरिका ही स्वरूप समझता है, उसे विद्वानोंने भक्त कहा है। जिसकी सब जीवोंपर दया है तथा जो सम्पूर्ण जगत्‌को श्रीकृष्ण जानता है, वह महाज्ञानी पुरुष ही वैष्णव भक्त माना गया है। जो निर्जन स्थानमें अथवा तीर्थोंके सम्पर्कमें रहकर आसक्तिशून्य हो बड़े आनन्दके साथ श्रीहरिके चरणारविन्दका चिन्तन करते हैं, वे वैष्णव माने गये हैं। जो सदा भगवान्‌के नाम और गुणका गान करते, मन्त्र जपते तथा कथा-वार्ता कहते-सुनते हैं, वे अत्यन्त वैष्णव हैं। मीठी वस्तुएँ पाकर श्रीहरिको प्रसन्नतापूर्वक भोग लगानेके लिये जिसका मन हर्षसे खिल उठता है, वह ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भक्त है। जिसका मन सोते, जागते, दिन-रात श्रीहरिके चरणारविन्दमें ही लगा रहता है और जो बाह्य शरीरसे पूर्व कर्मोंका फल भोगता है, वह वैष्णव है। तीर्थ सदा वैष्णवोंके दर्शन और स्पर्शकी अभिलाषा करते हैं; क्योंकि उनके सङ्गसे उन तीर्थोंके वे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, जो उन्हें पापियोंके संसर्गसे मिले होते हैं। जितनी देरमें गाय दुही जाती है, उतनी देर भी जहाँ वैष्णव पुरुष ठहर जाता है, वहाँकी धरतीपर उतने समयके लिये सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं। वहाँ मरा हुआ पापी मनुष्य निश्चय ही पापमुक्त हो श्रीहरिके धाममें वैसे ही चला जाता है, जैसे अन्तकालमें श्रीकृष्णकी स्मृति होनेपर अथवा ज्ञानगङ्गामें अवगाहन करनेपर मनुष्य परम पदको प्राप्त हो जाता है। तथा जैसे तुलसीवनमें, गोशालामें, श्रीकृष्ण-मन्दिरमें, वृन्दावनमें, हरिद्वारमें एवं अन्य तीर्थोंमें भी मृत्यु होनेपर मनुष्यको परम धामकी प्राप्ति होती है। तीर्थोंमें स्नान करने या गोता लगानेसे पापियोंके पाप धुल जाते हैं। फिर उन तीर्थोंके पाप वैष्णवोंको छूकर बहनेवाली वायुके स्पर्शसे नष्ट होते हैं। जो भगवान् हृषीकेशकी और उनके पुण्यात्मा भक्तकी निन्दा करते हैं, उनके सौ जन्मोंका पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है। वैष्णवोंके स्पर्शमात्रसे पातकी मनुष्य पातकसे मुक्त हो जाता है। पातकीके स्पर्शसे उस भक्तमें जो पाप आता है, उसका नाश उसके अन्तः-करणमें बैठे हुए भगवान् मधुसूदन अवश्य कर देते हैं। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने भगवान् विष्णु और वैष्णव भक्तके गुणोंका वर्णन किया है। अब मैं तुम्हें श्रीहरिके जन्मका प्रसङ्ग सुनाता हूँ, सुनो।

श्रीनारायणने कहा— एक बार गोलोकमें श्रीकृष्ण विरजादेवीके समीप थे। श्रीराधाको यह ठीक नहीं लगा। श्रीराधा सखियोंसहित वहाँ जाने लगीं। तब श्रीदामने उन्हें रोका। इसपर श्रीराधाने श्रीदामको शाप दे दिया कि ‘तुम असुरयोनिको प्राप्त हो जाओ।’ तब श्रीदामने भी श्रीराधाको यह शाप दिया कि ‘आप भी मानवी-योनिमें जायँ। वहाँ गोकुलमें श्रीहरिके ही अंश महायोगी रायाण नामक एक वैश्य होंगे। आपका छायारूप उनके साथ रहेगा। अतएव भूतलपर मूढ़ लोग आपको रायाणकी पत्नी समझेंगे, श्रीहरिके साथ कुछ समय आपका विछोह रहेगा।’

इससे श्रीदाम और श्रीराधा दोनोंको ही क्षोभ हुआ। तब श्रीकृष्णने श्रीदामको सान्त्वना देकर कहा कि ‘तुम त्रिभुवनविजेता सर्वश्रेष्ठ शङ्खचूड़ नामक असुर होओगे और अन्तमें श्रीशंकरके त्रिशूलसे भिन्न-देह होकर यहाँ मेरे पास लौट आओगे।’

श्रीराधाको बड़े ही प्रेमके साथ हृदयसे लगाकर भगवान्‌ने कहा—‘वाराहकल्पमें मैं पृथ्वीपर जाऊँगा और व्रजमें जाकर वहाँके पवित्र काननोंमें तुम्हारे साथ विहार करूँगा। मेरे रहते तुमको क्या भय है?’

उधर विरजादेवी नदी हो गयीं और उनके