भारतकोश
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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

६५- श्रीकृष्णका नन्दको दुर्गा-स्तोत्र सुनाना तथा ब्रज लौट जानेका आदेश देना, नन्दका श्रीकृष्णसे चारों युगोंके धर्मका वर्णन करनेके लिये प्रार्थना करना

७०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

दान करके वह उस पापसे मुक्त होता है। जो अधम मानव मेरे जन्मदिन—भाद्रपदमासकी कृष्णाष्टमीको भोजन करता है, उसे निःसंदेह त्रिलोकीमें होनेवाले सभी पापोंको भोगना पड़ता है। इस प्रकार सभी नरकोंका भोग करनेके पश्चात् वह चाण्डाल होता है। इसी तरह शिवरात्रि और श्रीरामनवमीके दिन भी समझना चाहिये। जो शक्तिहीन होनेके कारण उपवास करनेमें असमर्थ हो, उसे हविष्यान्नका भोजन करना चाहिये और मेरा पुण्य महोत्सव सम्पन्न करके ब्राह्मणोंको भी भोजन कराना चाहिये। इससे वह पापमुक्त होकर शुद्ध हो जाता है। इसके लिये यत्नपूर्वक मेरे नामोंका संकीर्तन करना चाहिये। जो देव-मूर्तियोंकी चोरी करता है, वह सात जन्मोंतक अंधा, दरिद्र, रोगग्रस्त, बहरा और कुबड़ा होता है। जो नराधम ब्राह्मण और देव-प्रतिमाको देखकर उन्हें नमस्कार नहीं करता; वह जबतक जीता है तबतक अपवित्र यवन होता है। जो ब्राह्मणको आया हुआ देखकर उठकर स्वागत नहीं करता; वह निश्चितरूपसे महापापी होता है। जो शिवका द्वेषी तथा देव-प्रतिमापर चढ़े हुए द्रव्यसे जीविका-निर्वाह करनेवाला है, वह सात जन्मतक मुर्गा होता है। जो अज्ञानी पितरों और देवताओंके वेदोक्त पूजनका विनाश करता है, वह पापी रौरव नरकमें जाता है। वहाँ एक हजार वर्षतक यातना भोगनेके पश्चात् तीन जन्मोंतक तीर्थकाक होता है। फिर तीन जन्मोंतक किसी तीर्थमें सियारकी योनिमें उत्पन्न होकर मुर्देकी लाश खाता है। ब्रजेश्वर ! वही पापी तीन जन्मोंतक तीर्थोंमें शवकी रक्षा तथा कर्मानुसार मुर्दोंकी कफनखसोटी करता है। जो मूर्ख नित्य दम्भपूर्वक देवताकी पूजा करके भक्तिपूर्वक गुरुका पूजन नहीं करता और न उन्हें अन्न प्रदान करता है; वह पापी देवताके शापसे दुःखी, देवल (देवप्रतिमापर चढ़े हुए द्रव्यसे जीविका चलानेवाला) और भयंकर देवद्रोही होता है; उसे पूजाका फल नहीं मिलता।

ब्रजेश्वर ! (हाथसे) दीपको बुझानेवाला सात जन्मोंतक जुगुनू होता है। जो इष्टदेवको निवेदन किये बिना ही खाता है तथा मछलीका अत्यन्त लोभी है; वह मछरंगा पक्षी होता है तथा सात जन्मोंतक बिलावकी योनिमें जन्म धारण करता है। बोरा चुरानेवाला कबूतर, माला हरण करनेवाला आकाशचारी पक्षी, धान्यकी चोरी करनेवाला गौरैया और मांसचोर हाथी होता है। विद्वानोंके कवित्वपर प्रहार करनेवाला सात जन्मतक मेढक होता है। जो झूठे ही अपनेको विद्वान् कहकर गाँवकी पुरोहिती करता है; वह सात जन्मोंतक नेवला, एक जन्ममें कोढ़ी और तीन जन्मोंतक गिरगिट होता है। फिर एक जन्ममें बर्र होनेके बाद वृक्षकी चींटी होता है। तत्पश्चात् क्रमशः शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण होता है। चारों वर्णोंमें कन्या बेचनेवाला मानव तामिस्र नरकमें जाता है और वहाँ तबतक निवास करता है, जबतक सूर्य-चन्द्रमाकी स्थिति रहती है। इसके बाद वह मांस बेचनेवाला व्याध होता है। तत्पश्चात् पूर्वजन्ममें जो जैसा होता है, उसीके अनुसार उसे व्याधि आ घेरती है। मेरे नामको बेचनेवाले ब्राह्मणकी मुक्ति नहीं होती—यह ध्रुव है। मृत्युलोकमें जिसके स्मरणमें मेरा नाम आता ही नहीं; वह अज्ञानी एक जन्ममें गौकी योनिमें उत्पन्न होता है। इसके बाद बकरा, फिर मेढ़ा और सात जन्मोंतक भैंसा होता है। जो मानव महान् षड्यन्त्री, कुटिल और धर्महीन होता है; वह एक जन्ममें तेली होकर फिर कुम्हार होता है। जो झूठा कलंक लगानेवाला और देवता एवं ब्राह्मणका निन्दक होता है, वह एक जन्ममें सोनार होकर सात जन्मोंतक धोबी होता है। जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र कुत्सित आचरणवाले तथा पवित्रतासे रहित होते हैं, उन्हें

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७०३ दस हजार वर्षोंतक म्लेच्छयोनिमें जन्म लेना पड़ता है। जो पुरुष कामभावसे स्त्रियोंकी कटि, स्तन और मुखकी ओर निहारता है, वह दूसरे जन्ममें दृष्टिहीन और नपुंसक होता है। जो ब्राह्मण ज्ञानहीन होते हुए आभिचारिक कर्म करनेवाला तथा हिंसक होता है; वह इस प्रकार दस हजार वर्षोंतक अन्धतामिस्र नरकमें वास करता है। तत्पश्चात् कर्मके भोगके अनुसार वह ब्राह्मण शूद्र होता है। जो शास्त्रज्ञ ज्योतिषी लोभवश झूठ बोलता है; वह सात जन्मोंतक वानरोंका सरदार होता है- यह ध्रुव है। तत्पश्चात् वह धर्महीन पापी अनेक जन्मोंकी तपस्याके फलस्वरूप भारतवर्षमें उत्तम बुद्धिसम्पन्न परम धर्मात्मा ब्राह्मण होता है। अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाला ब्राह्मण अग्निसे भी बढ़कर पवित्र और अत्यन्त तेजस्वी होता है, उससे देवगण सदा डरते रहते हैं। जैसे नदियोंमें गङ्गा, तीर्थोंमें पुष्कर, पुरियोंमें काशी, ज्ञानियोंमें शंकर, शास्त्रोंमें वेद, वृक्षोंमें पीपल, तपस्याओंमें मेरी पूजा तथा व्रतोंमें उपवास सर्वश्रेष्ठ है; उसी तरह समस्त जातियोंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ होता है। समस्त पुण्य, तीर्थ और व्रत ब्राह्मणके चरणोंमें निवास करते हैं। ब्राह्मणकी चरणरज शुद्ध तथा पाप और रोगका विनाश करनेवाली होती है। उनका शुभाशीर्वाद सारे कल्याणोंका कारण होता है। तात! इस प्रकार मैंने अपनी जानकारी तथा शास्त्रज्ञानके अनुसार आपसे कर्मविपाकका वर्णन कर दिया। अब जो अवशिष्ट है, उसे श्रवण करो। इस कर्मविपाकको सुनकर उस वाचकको सोना, चाँदी, वस्त्र और पान देना चाहिये। मनुष्यको चाहिये कि मेरी प्रसन्नताके लिये उस ब्राह्मणको तुरंत सौ स्वर्णमुद्राएँ, बहुत-सी गायें, चाँदी, वस्त्र और ताम्बूल दक्षिणारूपमें समर्पित करे। (अध्याय ८५) केदार-कन्याके वृत्तान्तका वर्णन नन्दजीने पूछा - प्रभो! आपने स्त्रियोंके प्रसङ्गसे केदार-कन्याका प्रस्ताव करके कर्मविपाकका वर्णन किया। अब विस्तारपूर्वक केदार-कन्याका चरित्र बतलाइये। वह केदार-कन्या कौन थी? भूपाल केदार कौन थे? किसके वंशमें उनका जन्म हुआ था? यह विवरणसहित मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये। श्रीभगवान्ने कहा- नन्दजी ! सृष्टिके आदिमें ब्रह्माके पुत्र स्वायम्भुव मनु हुए। उनकी स्त्रीका नाम शतरूपा था, जो स्त्रियोंमें धन्या और माननीया थी। उन दोनोंके प्रियव्रत और उत्तानपाद नामके दो पुत्र हुए। उत्तानपादके पुत्र महायशस्वी ध्रुव हुए। ध्रुवके पुत्र नन्दसावर्णि और नन्दसावर्णिके पुत्र केदार हुए। स्वयं श्रीमान् केदार विष्णु-भक्त तथा सातों द्वीपोंके अधिपति थे। उनकी रक्षाके लिये वे प्रतिदिन राजदरबारमें सुन्दर रूप- रंगवाली, सीधी, नौजवान गायें, जिनके सींगोंमें सोना मढ़ा गया था, ब्राह्मणोंको दान करते थे। प्रातःकालसे लेकर सायंकालतक ब्राह्मणोंको भोजन कराते थे; दुःखियों और भिक्षुकोंको यथोचित धन देते थे और स्वयं राजा विष्णु-भक्तिपरायण हो इन्द्रियोंको काबूमें करके फल-मूलका आहार करते हुए सब कुछ मुझे समर्पित करके रात- दिन मेरा जप करते थे। तदनन्तर लक्ष्मी अपनी कलासे कामिनियोंमें श्रेष्ठ कमलनयनी कन्याके रूपमें उनके यज्ञकुण्डसे प्रकट हुईं। उनके शरीरपर अग्निमें तपाकर शुद्ध किया हुआ वस्त्र था और वे रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित थीं। उन्होंने राजासे यों कहा- 'महाराज! मैं आपकी कन्या हूँ।' तब राजाने भक्तिपूर्वक उसकी

७०४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण भलीभाँति पूजा की और उसे अपनी पत्नीको समर्पित करके वे चुपचाप खड़े हो गये। तदनन्तर वह कन्या हर्षपूर्वक विनती करके और माता- पिताकी आज्ञा ले तपस्या करनेके लिये यमुना- तटपर स्थित रमणीय पुण्यवनको चली गयी। वह वृन्दाका तपोवन था; इसीलिये उसे 'वृन्दावन' कहते हैं। वहाँ तपस्या करके उसने वरोंमें श्रेष्ठ मुझको वररूपसे वरण किया। तब ब्रह्माने उसे वरदान दिया कि 'कुछ कालके पश्चात् तू कृष्णको प्राप्त करेगी'। फिर ब्रह्माजीने उसकी परीक्षाके लिये धर्मको एक परम सुन्दर तरुण ब्राह्मणके रूपमें उसके पास भेजा। वहाँ जाकर धर्मने कहा- मनोहरे ! तुम किसकी कन्या हो ? तुम्हारा क्या नाम है? यहाँ एकान्तमें तुम क्या कर रही हो? यह मुझे बतलाओ। सुन्दरि ! तुम क्या चाहती हो और किसलिये यह तपस्या कर रही हो? तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, वह वरदान माँगो। वृन्दा बोली - विप्रवर! मैं केदारराजकी कन्या हूँ, मेरा नाम वृन्दा है। मैं इस वृन्दावनमें वास करती हुई एकान्तमें तपस्या कर रही हूँ और श्रीहरिको अपना पति बनानेकी चिन्तामें हूँ। अतः ब्राह्मण ! यदि तुम्हारेमें ऐसा वरदान देनेकी शक्ति हो तो मेरा अभीष्ट वर मुझे प्रदान करो; अन्यथा यदि तुम असमर्थ हो तो अपने रास्ते जाओ। तुम्हें यह सब पूछनेसे क्या लाभ ? धर्मने कहा- वृन्दे ! जो इच्छारहित, तर्कणा करनेके अयोग्य, ऐश्वर्यशाली, निर्गुण, निराकार और भक्तानुग्रहमूर्ति हैं; उन परमात्माको पति बनानेके लिये लक्ष्मी और सरस्वतीके अतिरिक्त दूसरी कौन स्त्री समर्थ हो सकती है? वैकुण्ठशायी चतुर्भुज भगवान्‌की ये ही दो भार्याएँ हैं। गोलोकमें भी जो द्विभुज, वंशी बजानेवाले, किशोर गोप- वेषधारी, परिपूर्णतम श्रीकृष्ण हैं; उनकी पत्नी स्वयं परात्परा महालक्ष्मी राधा हैं। वे परमब्रह्म- स्वरूपिणी राधा उन श्यामसुन्दरकी, जो परम आत्मबलसे सम्पन्न, ऐश्वर्यशाली, शमपरायण और परम सौन्दर्यशाली हैं, जिनका सुन्दर शरीर करोड़ों कामदेवोंके सौन्दर्यकी निन्दा करनेवाला, अमूल्य रत्नाभरणोंसे विभूषित, सत्यस्वरूप और अविनाशी है तथा जो रमणीय पीताम्बर धारण करनेवाले और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता हैं; सदा सेवा करती रहती हैं। वे श्रीकृष्ण द्विभुज और चतुर्भुज-रूपसे दो रूपोंमें विभक्त हैं। वे स्वयं चतुर्भुज-रूपसे वैकुण्ठमें और द्विभुज-रूपसे गोलोकमें वास करते हैं। पचीस हजार युग बीतनेके बाद इन्द्रका पतन होता है, ऐसे चौदह इन्द्रोंका शासनकाल लोकोंके विधाता ब्रह्माका एक दिन होता है, उतनी ही बड़ी उनकी रात्रि होती है। ऐसे तीस दिनका एक मास और बारह मासका एक वर्ष होता है। ऐसे सौ वर्षतक ब्रह्माकी आयु समझनी चाहिये। उन ब्रह्माकी आयुसमाप्ति, जिनका एक निमेष होता है, सनक आदि महर्षि जिनकी जीवनपर्यन्त सेवा करते रहते हैं, परंतु करोड़ों-करोड़ों कल्पोंमें भी जो विभु साध्य नहीं होते। सहस्रमुखधारी शेषनाग अरबों-खरबों कल्पोंतक जिनकी भक्तिपूर्वक रात-दिन सेवा तथा नाम- जप करते रहते हैं; परंतु वे परात्पर, दुराराध्य, हितकारी भगवान् साध्य नहीं होते। जो ब्रह्मा वेदोंके उत्पादक, विधाता, फलदाता और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता हैं; वे प्रत्येक जन्ममें उन ब्रह्मस्वरूप अविनाशी सनातनदेवका सदा अपने चारों मुखोंद्वारा स्तवन करते रहते हैं; परंतु वेदोंद्वारा अनिर्वचनीय, कालके काल तथा अन्तकके अन्तक उन भगवान्‌को सिद्ध नहीं कर पाते। वृन्दे! जो अपनी कलासे रुद्ररूप धारण करके जगत्‌का संहार करते हैं, पाँचों मुखोंसे उनकी स्तुति करते हैं, जिनसे बढ़कर भगवान्‌को दूसरा कोई प्रिय नहीं है; उनके द्वारा जब भगवान्

६६- श्रीकृष्णद्वारा चारों युगोंके धर्मादिका कथन, श्रीकृष्णको गोकुल चलनेके लिये नन्दका आग्रह

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७०५

साध्य नहीं होते, तब दूसरेकी क्या बात है? वृन्दे! जो सर्वशक्तिस्वरूपा, दुर्गतिनाशिनी, परमब्रह्म-स्वरूपिणी, ईश्वरी, मूलप्रकृति, नारायणी, विष्णुमाया, वैष्णवी और सनातनी हैं, जिनकी मायासे भ्रमणशील जगत् सदा चक्कर काटता रहता है, वे दुर्गा भी जिन देवकी भक्तिपूर्वक रात-दिन स्तुति करती रहती हैं। गजानन गणेश और छः मुखवाले स्वामीकार्तिक भी भक्तिसहित यथाशक्ति जिनका स्तवन करते हैं। जिनकी सर्वप्रथम पूजा होती है, जो सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी और ज्ञानियोंके गुरुके गुरु हैं, जिन गणेशसे बढ़कर सिद्धेन्द्र, देवेन्द्र, योगीन्द्र और ज्ञानियोंके गुरुओंमें कोई विद्वान् नहीं है, जो गणोंके स्वामी और देवताओंके अधिपति हैं; वे भगवान् गणेश जिनका ध्यान करते हैं। परमेश्वरी सरस्वती जिनका स्तवन करनेमें असमर्थ हैं। लक्ष्मी रात-दिन जिनके चरणकमलकी सेवा करती हैं। जिनके कटाक्षसे सारा जगत् परिपूर्णतम एवं कल्याणमय है। जिनके भयसे वायु चलती है; जिनके भयसे सूर्य तपते हैं, इन्द्र वर्षा करते हैं, अग्नि जलाती है और मृत्यु प्राणियोंमें विचरण करती है। जिनकी सेवा करनेसे पृथ्वी सबकी आधार-स्वरूपा तथा धनकी भण्डार हो गयी है। सुन्दरि! जिनसे भयभीत होकर समुद्र और पर्वत निश्चलरूपसे अपनी-अपनी मर्यादामें स्थित रहते हैं। जिनके चरणकमलकी सेवासे गङ्गादेवी तीर्थोंकी साररूपा, पवित्र, मुक्तिदायिनी और लोकोंको पावन करनेवाली हो गयी हैं। जिनके स्मरण और सेवनसे तुलसीदेवी पवित्र हो गयी हैं तथा नवग्रह और दिक्पाल जिनके प्रतापसे डरते रहते हैं। सारे ब्रह्माण्डोंमें जो-जो ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा अन्यान्य सुरेश्वर, शेष आदि तथा मुनिगण हैं; उनमेंसे कुछ परमात्मा श्रीकृष्णके कलास्वरूप, कुछ अंशरूप और कुछ कलांशरूप हैं। कल्याणि! तुम उन्हीं परमेश्वरको, जो प्रकृतिसे परे हैं, अपना पति बनाना चाहती हो, परंतु वे गोलोकमें केवल राधिकाद्वारा साध्य हैं; दूसरा कोई कभी भी उन्हें सिद्ध नहीं कर सकता। इतना कहकर छद्मवेषधारी धर्मने उसकी परीक्षाके लिये प्रचुर भोगसुखका प्रलोभन दिया और अपनेको ही पतिरूपमें स्वीकार करनेका अनुरोध किया। फिर धर्म उसकी ओर बढ़े। व्रजेश! उनका विचार केवल उसके सतीत्वको जानना था। उनकी यह चेष्टा देखकर उस राजकन्याके मुख और नेत्र क्रोधसे वक्र हो गये। तब वह हितकारक, सत्य, योगयुक्त, यशस्कर एवं धर्मार्थ वचन बोली।

श्रीवृन्दाने कहा— महाभाग! धैर्य धारण कीजिये। आप तो जातियोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं। ब्राह्मणोंका स्वभाव तपोमूलक, सत्यपरक, वेदव्रती और धैर्यशाली होता है। परायी स्त्रियोंके प्रति आकर्षित होना तो अधर्मियोंका स्वभाव है। विप्रवर! अधर्मसे ही दुष्टको अमङ्गलका दर्शन होता है। तत्पश्चात् वह शत्रुपर विजय-लाभ करता है और फिर समूल नष्ट हो जाता है। जो बलपूर्वक पतिव्रताओंके साथ व्यभिचार करता है, वह मातृगामी कहलाता है और उसे तुरंत ही सौ ब्रह्महत्याका पाप लगता है—यह निश्चित है। जबतक सूर्य-चन्द्रमाकी स्थिति है, तबतक वह कुम्भीपाकमें यातना भोगता है। यमदूत उसके मस्तकपर लोहेके डंडेसे प्रहार करते हैं; वह खौलते हुए तेलमें जलाया जाता है; परंतु उसकी सूक्ष्मदेहसे प्राण विलग नहीं होते। यह क्षणिक सुख चिरकालिक दुःखका दाता और सर्वविनाशका कारण है। इसीलिये धर्मात्मा पुरुष अगम्याके गमनजन्य दुःखकी इच्छा नहीं करते; अतः ज्ञानदुर्बल ब्राह्मण! आपका कल्याण हो, मुझे क्षमा कीजिये और अपने रास्ते जाइये। जैसे दीपककी लौ देखकर पतिङ्गा निश्चय ही उसपर टूट पड़ता है; लोभी मीन और मृग काँटेके अग्रभागमें मिष्टान्नको देखकर उसे निगलना चाहता है; भूखा

७०६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण मनुष्य विषमिश्रित भोजनको खा जाता है और दुष्ट मुखपर छलछलाते हुए दूधवाले दूषित विषकुम्भको ग्रहण कर लेता है; उसी तरह लम्पट पुरुष परायी स्त्रियोंके मनोहर मुखकमलको, जो विनाशका कारण है, देखकर मोहवश भ्रान्त हो जाता है। स्त्रियोंका सुन्दर मुख, दोनों नितम्ब तथा स्तन काम-वासनाके आधार, नाशके कारण और अधर्मके स्थान हैं। जो लार और मूत्रसे संयुक्त है, जिसमेंसे दुर्गन्ध निकलती है, जो पाप तथा यमदण्डका कारण है, स्त्रियोंका वह मूत्रस्थान (योनि) नरककुण्डके सदृश है। ब्राह्मण ! एकान्त देखकर जो तुम मेरी धर्षणा करना चाहते हो तो यहीं समस्त देवता, लोकपाल, कर्मोंके शासक तथा साक्षी जाज्वल्यमान धर्म, स्वयं श्रीहरिद्वारा नियुक्त दण्डकर्ता यमराज, स्वयं धर्मात्मा श्रीकृष्ण, ज्ञानरूपी महेश्वर, दुर्गा, बुद्धि, मन, ब्रह्मा, इन्द्रियाँ तथा देवगण उपस्थित हैं। ये सम्पूर्ण प्राणियोंमें उनके कर्मोंके साक्षीरूपसे वर्तमान रहते हैं; अतः अज्ञानी ब्राह्मण ! कौन-सा स्थान गुप्त है और कौन-सा रहस्यमय ? विप्र ! तुम्हारा कल्याण हो। मुझे क्षमा कर दो और जाओ। मैं तुम्हें भस्म कर डालनेमें समर्थ हूँ; परंतु ब्राह्मण अवध्य होते हैं। अतः वत्स ! तुम सुखपूर्वक यहाँसे चले जाओ। द्विज ! तपस्या करते हुए मुझे एक सौ आठ युग बीत गये। अब न तो मेरे पिताका गोत्र ही रह गया है और न मेरे माता- पिता ही हैं। सबके अन्तरात्मास्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण मेरी रक्षा करते हैं। श्रीकृष्णद्वारा स्थापित धर्म नित्य मेरी रक्षामें तत्पर है। सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अग्नि, ब्रह्मा, शम्भु, भगवती दुर्गा-ये सभी सदा मेरी देख-भाल करते हैं। जिन्होंने हंसोंको श्वेत, शुकोंको हरा और मयूरोंको रंग-बिरंगा बनाया है; वे ही मेरी रक्षा करेंगे। सभी देवता अनाथों, बालकों तथा वृद्धोंकी सर्वदा रक्षा करते हैं, अतः नारी समझकर धर्म मेरा परित्याग करके नहीं जा सकते। इसके बाद श्रीवृन्दाने पतिव्रत-धर्मकी महिमा और दुराचारकी निन्दा करके कोपप्रकाशपूर्वक शाप दे दिया—'दुराचार ! तुम्हारा नाश हो जाय। पापिष्ठ ! तुम नष्ट हो जाओ।' इतना कहकर जब पुनः शाप देनेको उद्यत हुई तब स्वयं सूर्यने उसे यत्न करके रोक दिया। इसी बीच वहाँ ब्रह्मा, शिव, सूर्य और इन्द्र आदि देवता आ पहुँचे। सबने उससे क्षमा माँगी और 'धर्म तुम्हारी परीक्षाके लिये आया था। उसमें तनिक भी पापबुद्धि नहीं थी। धर्मके नाशसे जगत्के सनातनधर्म- रूप जीवनका नाश हो जायगा' यह कहकर धर्मको जीवनदान देनेकी प्रार्थना की। तब वृन्दाने कहा—देव! मैं नहीं जानती थी कि ये ब्राह्मणवेषधारी धर्म हैं और मेरी परीक्षा करनेके लिये आये हैं। इसी कारण मैंने क्रोधवश इनका नाश किया है। अब आप लोगोंकी कृपासे मैं अवश्य धर्मको जीवन-दान दूँगी। ब्रजेश्वर ! यों कहकर वह वृन्दा पुनः बोली—'यदि मेरी तपस्या सत्य हो तथा मेरा विष्णुपूजन सत्य हो तो उस पुण्यके प्रभावसे ये विप्रवर यहाँ शीघ्र ही दुःखरहित हो जायें। यदि मुझमें सत्य वर्तमान हो और मेरा व्रत सत्य तथा तप शुद्ध हो तो उस पुण्य तथा सत्यके प्रभावसे ये ब्राह्मण कष्टरहित हो जायें। यदि नित्यमूर्ति सर्वात्मा नारायण तथा ज्ञानात्मक शिव सत्य हैं तो ये द्विजवर संतापरहित हो जायें। यदि ब्रह्म सत्य हो, सभी देवता और परमा प्रकृति सत्य हों, यज्ञ सत्य हो और तप सत्य हो तो इन ब्राह्मणका कष्ट दूर हो जाय।'-इतना कहकर सती वृन्दाने धर्मको अपनी गोदमें कर लिया और उन कलारूपको देखकर वह कृपापरवश हो रुदन करने लगी। इसी बीच धर्मकी भार्या मूर्ति, जो शोकसे व्याकुल थी, सिरके बल विष्णुके चरणपर गिर पड़ी और यों बोली।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७०७

मूर्तिने कहा—हे नाथ! आप तो करुणासागर हैं। दीनबन्धो! मुझपर कृपा कीजिये। कृपामूर्ति जगन्नाथ! मेरे पतिदेवको शीघ्र जीवित कर दीजिये; क्योंकि जो नारी पतिसे हीन हो जाती है, वह इस भवसागरमें पापिनी समझी जाती है। उसकी दशा नेत्रहीन मुख और प्राणरहित शरीरके समान हो जाती है। माता-पिता, भाई-बन्धु और पुत्र तो परिमित सुख देनेवाले होते हैं, सर्वस्व प्रदान करनेवाला तो सामर्थ्यशाली पति ही होता है। इतना कहकर मूर्ति देवी वहाँ खड़ी हो गयीं और विलाप करने लगीं। तब भगवान् जो सर्वात्मा एवं प्रकृतिसे परे हैं; वृन्दासे बोले।

श्रीभगवान्ने कहा—सुन्दरि! तुमने तपस्याद्वारा ब्रह्माकी आयुके समान आयु प्राप्त की है। वह अपनी आयु तुम धर्मको दे दो और स्वयं गोलोकको चली जाओ। वहाँ तुम तपस्याके प्रभावसे इसी शरीरद्वारा मुझे प्राप्त करोगी। सुमुखि! गोलोकमें आनेके पश्चात् वाराहकल्पमें तुम राधाकी छायाभूता वृषभानुकी कन्या होओगी। उस समय मेरे कलांशसे उत्पन्न हुए रायाण गोप तुम्हारा पाणिग्रहण करेंगे। फिर रासक्रीड़ाके अवसरपर तुम गोपियों तथा राधाके साथ मुझे प्राप्त करोगी। जब राधा श्रीदामाके शापसे वृषभानुकी कन्या होकर प्रकट होंगी, उस समय वे ही वास्तविक राधा रहेंगी। तुम तो उनकी छायास्वरूपा होओगी। विवाहके समय वास्तविक राधा तुम्हें प्रकट करके स्वयं अन्तर्धान हो जायँगी और रायाण गोप तुम छायाको ही ग्रहण करेंगे; परंतु गोकुलमें मोहाच्छन्न लोग तुम्हें 'यह राधा ही है'—ऐसा समझेंगे। उन गोपोंको तो स्वप्नमें भी वास्तविक राधाके चरणकमलका दर्शन नहीं होता; क्योंकि स्वयं राधा मेरी गोदमें रहती हैं और उनकी छाया रायाणकी भार्या होती है।

इस प्रकार भगवान् विष्णुके वचनको सुनकर सुन्दरी वृन्दाने धर्मको अपनी आयु प्रदान कर दी। फिर तो धर्म पूर्णरूपसे उठकर खड़े हो गये। उनके शरीरकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णकी भाँति चमक रही थी और उनका सौन्दर्य पहलेकी अपेक्षा बढ़ गया था। तब उन श्रीमान्ने परात्पर परमेश्वरको प्रणाम किया।

पुनः वृन्दाने कहा—देवगण मेरे वचनको, जिसका उल्लङ्घन करना कठिन है, सावधानतया श्रवण करें। मेरा वाक्य मिथ्या नहीं हो सकता। मैंने क्रोधावेशमें जो तीन बार 'क्षयो भव', 'तुम्हारा नाश हो जाय'—ऐसा वचन कहा है और पुनः कहनेके लिये उद्यत होनेपर सूर्यने मना कर दिया था, उसका फल यों होगा—यह धर्म सत्ययुगमें जैसे पहले परिपूर्ण था, उसी तरह इस समय भी रहेगा; परंतु त्रेतामें इसके तीन पैर, द्वापरमें दो पैर और कलियुगके प्रथमांशमें एक पैर रह जायगा। कलियुगके शेष भागमें यह कलाका षोडशांशमात्र रह जायगा। सत्ययुग आनेपर यह पुनः परिपूर्ण हो जायगा। मेरे मुखसे तीन बार 'क्षय' शब्द निकला है; इसलिये उसी क्रमसे क्षय भी होगा। मनमें पुनः कहनेका विचार करनेपर

७०८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सूर्यने रोक दिया था; इसी कारण यह धर्म कलियुगकी समाप्तिमें कलामय ही रह जायगा।

नन्दजी! इसी बीच देवताओंने वेगपूर्वक गोलोकसे आये हुए एक अत्यन्त सुन्दर एवं शुभ रथको देखा। उस रथका निर्माण अमूल्य रत्नोंद्वारा हुआ था। उसमें हीरेके हार लटक रहे थे और वह मणि, माणिक्य, मुक्ता, वस्त्र, श्वेत चँवर, भूषण और सुन्दर रत्नजटित दर्पणोंसे विभूषित था। उस रथको देखकर वृन्दाने हरि, शंकर, ब्रह्मा तथा समस्त देवताओंको नमस्कार किया और फिर उसपर सवार हो वह गोलोकको चली गयी। तत्पश्चात् सभी देवता अपने-अपने स्थानको चले गये। अब तुम्हारी पुनः क्या सुननेकी इच्छा है?

(अध्याय ८६)


सनत्कुमार आदिके साथ श्रीकृष्णका समागम, सनत्कुमारके द्वारा श्रीकृष्णके रहस्योद्घाटन करनेपर नन्दजीका पश्चात्तापपूर्ण कथन तथा मूर्च्छित होना

नन्दजीने कहा— प्रभो! आप स्वयं वेदोंके अधीश्वर हैं; अतः वेद, ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवता तथा मुनि और सिद्ध आदि आपको जाननेमें असमर्थ हैं। आप कौन हैं—यह जाननेके लिये मेरे मनमें प्रबल उत्कण्ठा है; अतः इस निर्जन स्थानमें आप अपना सारा वृत्तान्त यथार्थ रूपसे वर्णन कीजिये।

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! इसी बीच वहाँ श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये सहसा पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, भृगु, अङ्गिरा, प्रचेतागण, वसिष्ठ, दुर्वासा, कण्व, कात्यायन, पाणिनि, कणाद, गौतम, सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन, कपिल, आसुरि, वायु (वोढु), पञ्चशिख, विश्वामित्र, वाल्मीकि, कश्यप, पराशर, विभाण्डक, मरीचि, शुक्र, अत्रि, बृहस्पति, गार्ग्य, वात्स्य, व्यास, जैमिनि, परिमित वचन बोलनेवाले ऋष्यशृङ्ग, याज्ञवल्क्य, शुक, शुद्ध जटाधारी सौभरि, भरद्वाज, सुभद्रक, मार्कण्डेय, लोमश, आसुरि, विटंकण, अष्टावक्र, शतानन्द, वामदेव, भागुरि, संवर्त, उतथ्य, नर, मैं (नारायण), नारद, जाबालि, परशुराम, अगस्त्य, पैल, युधामन्यु, गौरमुख, उपमन्यु, श्रुतश्रवा, मैत्रेय, च्यवन, करथ और कर मुनीश्वर आ पहुँचे। वत्स! वे सभी ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उन्हें आया देखकर श्रीकृष्ण सहसा उठ खड़े हुए और हाथ जोड़कर नमस्कार करनेके पश्चात् उन्हें आदरसहित रमणीय सिंहासनोंपर बैठाये। फिर श्रीकृष्णने कुशल-प्रश्नपूर्वक परस्पर वार्तालाप करके उनकी विधिवत् पूजा की और स्वयं भी उन्हींके मध्यमें आसनासीन हुए। इसी समय श्रीकृष्णको आकाशमें एक समुज्ज्वल तेजोराशि दीख पड़ी। उसे मुनियोंने भी देखा। वत्स नारद! उस तेजके अंदर सुवर्णकी-सी कान्तिवाले, पञ्चवर्षीय नग्न-बालकके रूपमें सनत्कुमारजी थे। वे सहसा उस सभाके बीच प्रकट हो गये। उन्हें एकाएक सामने खड़े देखकर सभी मुनिवरोंने प्रणाम किया तथा श्रीकृष्णने भी मुस्कानयुक्त एवं स्निग्ध नेत्रोंवाले कुमारको युक्तिपूर्वक सादर सिर झुकाया। तब सनत्कुमारजी उन सबको आशीर्वाद देकर उस सभामें विराजमान हुए और उन ऋषियों तथा सनातन भगवान् श्रीकृष्णसे बोले।

सनत्कुमारने कहा— मुनिवरो! आपलोगोंका सदा कल्याण हो और तपस्याओंका अभीष्ट फल प्राप्त हो; किंतु कल्याणके कारणस्वरूप इन श्रीकृष्णका कुशल-प्रश्न निष्फल है। इस समय तो आपलोगोंका सर्वथा कुशल है; क्योंकि आप-लोग उन परमात्माका दर्शन कर रहे हैं, जो प्रकृतिसे परे होनेपर भी भक्तोंके अनुरोधसे शरीर

६७- श्रीकृष्णका उद्धवको गोकुल भेजना, उद्धवका गोकुलमें सत्कार तथा उनका वृन्दावन आदि सभी वनोंकी शोभा देखते हुए राधिकाके पास पहुँचना और राधास्तोत्रद्वारा उनका स्तवन करना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७०९ धारण करते हैं; निर्गुण, इच्छारहित और समस्त तेजोंके कारण हैं तथा इस समय पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही आविर्भूत हुए हैं। श्रीकृष्णने पूछा- विप्रवर! जब सभी शरीरधारियोंके लिये कुशल-प्रश्न अभीष्ट होता है, तब भला मेरे विषयमें वह कुशल-प्रश्न क्यों नहीं है? सनत्कुमारजी बोले-नाथ! प्राकृत शरीरके विषयमें कुशल-प्रश्न करना तो सर्वदा शुभदायक है; परंतु जो शरीर नित्य और मङ्गलका कारण है, उसके विषयमें कुशल-प्रश्न निरर्थक है। श्रीभगवान्‌ने कहा- विप्रवर! जो-जो शरीरधारी है, वह-वह प्राकृतिक कहा जाता है; क्योंकि उस नित्या प्रकृतिके बिना शरीर बन ही नहीं सकता। सनत्कुमारजी बोले-प्रभो! जो शरीर रज-वीर्यसे उत्पन्न होते हैं, वे ही प्राकृतिक कहे जाते हैं; किंतु जो प्रकृतिके स्वामी और कारण हैं उनका शरीर प्राकृत कैसे हो सकता है? आप तो समस्त कारणोंके आदिकारण, सभी अवतारोंके प्रधान बीज, अविनाशी स्वयं भगवान् हैं। वेद आपको सदा नित्य, सनातन, ज्योतिःस्वरूप, परमोत्कृष्ट, परमात्मा और ईश्वर कहते हैं। प्रभो! वेदाङ्ग तथा वेदज्ञ लोग भी आप मायापति निर्गुण परात्परको मायाद्वारा सगुणरूप हुआ बतलाते हैं। श्रीकृष्णने कहा- विप्रवर! इस समय मैं वसुदेवका पुत्र वासुदेव हूँ। मेरा शरीर रक्त- वीर्यके ही आश्रित है; फिर यह प्राकृत कैसे नहीं है और इसके लिये कुशल-प्रश्न अभीष्ट क्यों नहीं है? सनत्कुमारजी बोले- जिसके रोमकूपोंमें सारे विश्व निवास करते हैं तथा जो सबका निवासस्थान है, उसे 'वासु' कहते हैं; उसका देवता परब्रह्म 'वासुदेव' ऐसा कहा जाता है। उनका 'वासुदेव' यह नाम चारों वेदों, पुराणों, इतिहासों और सभी प्रथाओंमें देखा जाता है। भला, वेदमें आपके रक्तवीर्याश्रित शरीरका कहाँ निरूपण हुआ है? इसके लिये ये मुनिगण तथा धर्म सर्वत्र साक्षी हैं। इस अवसरपर वेद और सूर्य-चन्द्रमा मेरे गवाह हैं। भृगुने कहा- विप्रेन्द्र! आप ही वैष्णवोंमें अग्रगण्य हैं; आपका कहना बिलकुल सत्य है। आपका स्वागत है; सदा कुशल तो है न? किस निमित्तको लेकर आपका यहाँ आगमन हुआ है? सनत्कुमारजी बोले- श्रीकृष्ण! इस समय मैं जिस निमित्तसे अत्यन्त शीघ्रतापूर्वक यहाँ आया हूँ उसका कारण श्रवण करो और ये सभी मुनि भी उसे सुन लें। श्रीकृष्णने कहा- भगवन्! आप सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता हैं। सर्वज्ञ ! आप तो सब कुछ जानते हैं; क्योंकि आप ही विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं; अतः बताइये, किस प्रयोजनसे आप यहाँ पधारे हैं? सनत्कुमारजी बोले- भगवन्! आप धन्य हैं। लोकोंके लिये भी आप सदा मान्य हैं और समस्त ईश्वरोंके भी ईश्वर आप ही हैं। विश्वमें आपसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। तदनन्तर मुनियोंके पूछनेपर सनत्कुमारजीने बताया कि मैं परम धन्य, मान्य, विधाताके भी विधाता, सर्वादि, सर्वकारक, परमात्मा, परिपूर्णतम प्रभुके दर्शनार्थ मथुरामें आया हूँ। यह सुनकर सभी देवता और मुनि हँसने लगे तथा उन्हें महान् विस्मय हुआ। नन्दजी भी आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने श्रीकृष्णके प्रति पुत्रभावका त्याग कर दिया और शोकसे व्याकुल हो वे सभाके बीच लज्जा छोड़कर रोने लगे। तब पार्वती ने 'मोहको त्याग दो'- यों कहकर उन्हें ढाढ़स बँधाया। तब श्रीनन्दजी बोले- देवेश ! जैसे कुजन्माके गृहमें स्थित अमूल्य रत्न और हीरेका मूल्य नहीं समझा जाता, उसी तरह प्रभो! मैं भी ठगा गया। भगवन्! आप प्रकृतिसे परे हैं; अतः मेरा अपराध

७१० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण क्षमा कर दीजिये। अब मैं पुनः यमुना-तटपर स्थित गोकुलमें अपने घर नहीं जाऊँगा। भला, आप ही बताइये, वहाँ जाकर मैं यशोदा तथा तुम्हारी प्रेयसी राधिकाको भी क्या उत्तर दूँगा और तुम्हारे प्रेमपात्र गोपबालकोंसे क्या कहूँगा ? नारद ! इतना कहकर नन्दजी सभामें ही मूर्च्छित हो गये। तब जगदीश्वर श्रीकृष्ण उसी क्षण उन्हें गोदमें लेकर समझाने लगे। (अध्याय ८७) श्रीकृष्णका नन्दको दुर्गा-स्तोत्र सुनाना तथा व्रज लौट जानेका आदेश देना, नन्दका श्रीकृष्णसे चारों युगोंके धर्मका वर्णन करनेके लिये प्रार्थना करना श्रीकृष्णने कहा- हे तात ! चेत करो। पिताजी ! होशमें आ जाओ। अरे ! चराचरसहित यह सारा संसार जलके बुलबुलेकी भाँति क्षणध्वंसी है; अतः महाभाग ! मोह त्याग दो और उन महाभागा मायाकी- जो परात्परा, ब्रह्मस्वरूपा, परमोत्कृष्टा, सम्पूर्ण मोहका उच्छेद करनेवाली, मुक्ति-प्रदायिनी और सनातनी विष्णुमाया हैं- स्तुति करो। नन्दजी ! त्रिपुर-वधके समय भयंकर महायुद्धमें भयभीत होनेपर शम्भुने जिस स्तोत्रद्वारा स्तवन करके महामायाके प्रभावसे त्रिपुरासुरका वध किया था, वह स्तोत्रराज, जो सारे अज्ञानका उच्छेदक और सम्पूर्ण मनोरथोंका पूरक है; मैं आपको इस सभामें प्रदान करूँगा, सुनिये। श्रीनन्दजी बोले-जगदीश्वर ! तुम वेदोंके उत्पादक, निर्गुण और परात्पर हो; अतः भक्तवत्सल ! मनुष्योंके सम्पूर्ण विघ्नोंके विनाश, दुःखोंके प्रशमन, विभूति, यश और मनोरथ-सिद्धिके लिये दुर्गतिनाशिनी जगज्जननी महादेवीका वह परम दुर्लभ, गोपनीय, परमोत्तम एकमात्र स्तोत्र मुझ विनीत भक्तको अवश्य प्रदान करो। श्रीभगवान्ने कहा- वैश्येन्द्र ! पूर्वकालमें नारायणके उपदेश तथा ब्रह्माकी प्रेरणासे युद्धसे भयभीत हुए भगवान् शंकरने जिसके द्वारा स्तवन किया था और जो मोह-पाशको काटनेवाला है; उस परम अद्भुत स्तोत्रका वर्णन करता हूँ, सुनो। नारायणने शिवको शत्रुके चंगुलमें फँसा देखकर यह स्तोत्र ब्रह्माको बतलाया; तब ब्रह्माने रणक्षेत्रमें रथपर पड़े हुए शिवको बतलाते हुए कहा- 'शंकर ! शूरवीरोंद्वारा प्राप्त हुए संकटकी शान्तिके लिये तुम उन दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका- जो आद्या, मूलप्रकृति और ब्रह्मस्वरूपिणी हैं - स्तवन करो। सुरेश्वर ! यह मैं तुमसे श्रीहरिकी प्रेरणासे कह रहा हूँ; क्योंकि शक्तिकी सहायताके बिना कौन किसको जीत सकता है?' ब्रह्माकी बात सुनकर शंकरने स्नान करके धुले हुए वस्त्र धारण किये, फिर चरणोंको धोकर हाथमें कुश ले आचमन किया। इस प्रकार पवित्र हो भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर और अञ्जलि बाँधकर वे विष्णुका ध्यान करते हुए दुर्गाका स्मरण करने लगे। श्रीमहादेवजीने कहा- दुर्गर्तिका विनाश करनेवाली महादेवि दुर्गे ! मैं शत्रुके चंगुलमें फँस गया हूँ; अतः कृपामयि ! मुझ अनुरक्त भक्तकी रक्षा करो, रक्षा करो। महाभागे जगदम्बिके ! विष्णुमाया, नारायणी, सनातनी, ब्रह्मस्वरूपा, परमा और नित्यानन्दस्वरूपिणी - ये तुम्हारे ही नाम हैं। तुम ब्रह्मा आदि देवताओंकी जननी हो। तुम्हीं सगुण-रूपसे साकार और निर्गुण-रूपसे निराकार हो। सनातनि ! तुम्हीं मायाके वशीभूत हो पुरुष और मायासे स्वयं प्रकृति बन जाती हो तथा जो इन पुरुष-प्रकृतिसे परे है; उस परब्रह्मको तुम धारण करती हो। तुम वेदोंकी माता परात्परा सावित्री हो। वैकुण्ठमें समस्त सम्पत्तियोंकी स्वरूपभूता महालक्ष्मी, क्षीरसागरमें शेषशायी नारायणकी प्रियतमा मर्त्यलक्ष्मी, स्वर्गमें

१०३- विरहविदग्धा राधाको उद्धवका प्रणाम करना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

७११

स्वर्गलक्ष्मी और भूतलपर राजलक्ष्मी तुम्हीं हो। तुम पातालमें नागादिलक्ष्मी, घरोंमें गृहदेवता, सर्वशस्यस्वरूपा तथा सम्पूर्ण ऐश्वर्योंका विधान करनेवाली हो। तुम्हीं ब्रह्माकी रागाधिष्ठात्री देवी सरस्वती हो और परमात्मा श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिदेवी भी तुम्हीं हो। तुम गोलोकमें श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर शोभा पानेवाली गोलोककी अधिष्ठात्री देवी स्वयं राधा, वृन्दावनमें होनेवाले रासमण्डलमें सौन्दर्यशालिनी वृन्दावनविनोदिनी तथा चित्रावली नामसे प्रसिद्ध शतशृङ्गपर्वतकी अधिदेवी हो। तुम किसी कल्पमें दक्षकी कन्या और किसी कल्पमें हिमालयकी पुत्री हो जाती हो। देवमाता अदिति और सबकी आधारस्वरूपा पृथ्वी तुम्हीं हो। तुम्हीं गङ्गा, तुलसी, स्वाहा, स्वधा और सती हो। समस्त देवाङ्गनाएँ तुम्हारे अंशांशकी अंशकलासे उत्पन्न हुई हैं। देवि! स्त्री, पुरुष और नपुंसक तुम्हारे ही रूप हैं। तुम वृक्षोंमें वृक्षरूपा हो और अंकुर-रूपसे तुम्हारा सृजन हुआ है। तुम अग्निमें दाहिका शक्ति, जलमें शीतलता, सूर्यमें सदा तेजःस्वरूप तथा कान्तिरूप, पृथ्वीमें गन्धरूप, आकाशमें शब्दरूप, चन्द्रमा और कमलसमूहमें सदा शोभारूप, सृष्टिमें सृष्टिस्वरूप, पालन-कार्यमें भलीभाँति पालन करनेवाली, संहारकालमें महामारी और जलमें जलरूपसे वर्तमान रहती हो। तुम्हीं क्षुधा, तुम्हीं दया, तुम्हीं निद्रा, तुम्हीं तृष्णा, तुम्हीं बुद्धिरूपिणी, तुम्हीं तुष्टि, तुम्हीं पुष्टि, तुम्हीं श्रद्धा और तुम्हीं स्वयं क्षमा हो। तुम स्वयं शान्ति, भ्रान्ति और कान्ति हो तथा कीर्ति भी तुम्हीं हो। तुम लज्जा तथा भोग-मोक्ष-स्वरूपिणी माया हो। तुम सर्वशक्तिस्वरूपा और सम्पूर्ण सम्पत्ति प्रदान करनेवाली हो। वेदमें भी तुम अनिर्वचनीय हो, अतः कोई भी तुम्हें यथार्थरूपसे नहीं जानता। सुरेश्वरि! न तो सहस्र मुखवाले शेष तुम्हारा स्तवन करनेमें समर्थ हैं, न वेदोंमें वर्णन करनेकी शक्ति है और न सरस्वती ही तुम्हारा बखान कर सकती हैं; फिर कोई विद्वान् कैसे कर सकता है? महेश्वरि! जिसका स्तवन स्वयं ब्रह्मा और सनातन भगवान् विष्णु नहीं कर सकते, उसकी स्तुति युद्धसे भयभीत हुआ मैं अपने पाँच मुखोंद्वारा कैसे कर सकता हूँ? अतः महामाये! तुम मुझपर कृपा करके मेरे शत्रु का विनाश कर दो। करुणासहित यों कहकर रणक्षेत्रमें शिवजीके रथपर गिर जानेपर करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमती दुर्गा प्रकट हो गयीं। उस समय परमात्मा नारायणने कृपापरवश हो उन्हें प्रेरित किया था। तब वे महादेवी शीघ्र ही शिवके समक्ष खड़ी हो उनके मङ्गल और विजयके लिये यों बोलीं— 'शिव! मायाशक्तिका आश्रय लेकर असुरका संहार करो*।'


* श्रीमहादेव उवाच

रक्ष रक्ष महादेवि दुर्गे दुर्गतिनाशिनि। मां भक्तमनुरक्तं च शत्रुग्रस्तं कृपामयि॥
विष्णुमाये महाभागे नारायणि सनातनि। ब्रह्मस्वरूपे परमे नित्यानन्दस्वरूपिणि॥
त्वं च ब्रह्मादिदेवानाम्म्बिके जगदम्बिके। त्वं साकारे च गुणतो निराकारे च निर्गुणात्॥
मायया पुरुषस्त्वं च मायया प्रकृतिः स्वयम्। तयोः परं ब्रह्म परं त्वं बिभर्षि सनातनि॥
वेदानां जननी त्वं च सावित्री च परात्परा। वैकुण्ठे च महालक्ष्मीः सर्वसम्पत्स्वरूपिणी॥
मर्त्यलक्ष्मीश्च क्षीरोदे कामिनी शेषशायिनः। स्वर्गेषु स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं राजलक्ष्मीश्च भूतले॥
नागादिलक्ष्मीः पाताले गृहेषु गृहदेवता। सर्वशस्यस्वरूपा त्वं सर्वैश्वर्यविधायिनी॥
रागाधिष्ठातृदेवी त्वं ब्रह्मणश्च सरस्वती। प्राणानामधिदेवी त्वं कृष्णस्य परमात्मनः॥
गोलोके च स्वयं राधा श्रीकृष्णस्यैव वक्षसि। गोलोकाधिष्ठिता देवी वृन्दावनवने वने॥
श्रीरासमण्डले रम्या वृन्दावनविनोदिनी। शतशृङ्गाधिदेवी त्वं नाम्ना चित्रावलीति च॥
दक्षकन्या कुत्र कल्पे कुत्र कल्पे च शैलजा। देवमातादितिस्त्वं च सर्वाधारा वसुन्धरा॥
त्वमेव गङ्गा तुलसी त्वं च स्वाहा स्वधा सती। त्वदंशांशांशकलया सर्वदेवादियोषितः॥

७१२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

श्रीदुर्गाने कहा—शंकर! तुम्हारा कल्याण हो! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, वह वर माँग लो। चूँकि तुम समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ हो; अतः मैं तुम्हें विजय प्रदान करूँगी।

श्रीमहादेवजी बोले—परमेश्वरि! तुम आद्या सनातनी शक्ति हो; अतः दुर्गे! 'दैत्यका विनाश हो जाय'—यह मेरा अभीष्ट वर मुझे प्रदान करो।

भगवतीने कहा—महाभाग! तुम तो स्वयं ही भगवान् विधाता और ज्योतिर्मय परमेश्वर हो; अतः जगद्गुरो! श्रीहरिका स्मरण करो और इस दैत्यको जीत लो।

इसी बीच सर्वव्यापी विष्णुने अपनी एक कलासे वृषका रूप धारण किया और शूलपाणि शंकरके उस उग्र रथको, जिसका पहिया ऊपर उठ गया था, प्रकृतिस्थ कर दिया। तत्पश्चात् उसे अपने सिरपर उठा लिया। उन्होंने शंकरको एक मन्त्रपूत शस्त्र भी प्रदान किया। तब शंकरने उस शस्त्रको लेकर और विष्णु तथा महेश्वरी दुर्गाका ध्यान करके शीघ्र ही त्रिपुरपर प्रहार किया। उसकी चोट खाकर वह दैत्य भूतलपर गिर पड़ा। उस समय देवताओंने शंकरका स्तवन किया और उनपर पुष्पोंकी वर्षा की। दुर्गाने उन्हें त्रिशूल, विष्णुने पिनाक और ब्रह्माने शुभाशीर्वाद दिया। मुनिगण हर्षमग्न हो गये। सभी देवता हर्षविभोर हो नाचने लगे और गन्धर्व-किन्नर गान करने लगे। तात! इसी अवसरपर अनुपम स्तवराज भी प्रकट हुआ—जो विघ्नों, विघ्नकर्ताओं और शत्रुओंका संहारक, परमैश्वर्यका उत्पादक, सुखद, परम शुभ, निर्वाण-मोक्षका दाता, हरि-भक्तिप्रद, गोलोकका वास प्रदान करनेवाला, सर्वसिद्धिप्रद और श्रेष्ठ है। उस स्तवराजका पाठ करनेसे पार्वती सदा प्रसन्न रहती हैं। वह मनुष्योंके लोभ, मोह, काम, क्रोध और कर्मके मूलका उच्छेदक, बल-बुद्धिकारक, जन्म-मृत्युका विनाशक, धन, पुत्र, स्त्री, भूमि आदि समस्त सम्पत्तियोंका प्रदाता, शोक-दुःखका हरण करनेवाला, सम्पूर्ण सिद्धियोंका दाता तथा सर्वोत्तम है। इस स्तोत्रराजके पाठसे महावन्ध्या भी प्रसविनो हो जाती है, बँधा हुआ बन्धनमुक्त हो जाता है, दुःखी निश्चय ही भयसे छूट जाता है, रोगीका रोग नष्ट हो जाता है, दरिद्र धनी हो जाता है तथा महासागरमें नावके डूब जानेपर एवं दावाग्निके बीच घिर जानेपर भी उस मनुष्यकी मृत्यु नहीं होती। वैश्येन्द्र! इस स्तोत्रके प्रभावसे मनुष्य डाकुओं, शत्रुओं तथा हिंसक जन्तुओंसे घिर जानेपर भी कल्याणका भागी होता है। तात! यदि गोलोककी प्राप्तिके लिये आप नित्य इस स्तोत्रका पाठ करेंगे तो यहाँ ही आपको उन पार्वतीके साक्षात् दर्शन होंगे।


स्त्रीरूपं चातिपुरुषं देवि त्वं च नपुंसकम्। वृक्षाणां वृक्षरूपा त्वं सृष्टा चाङ्कुररूपिणी॥
वह्नौ च दाहिकाशक्तिर्जले शैत्यस्वरूपिणी। सूर्यतेजःस्वरूपा च प्रभारूपा च संततम्॥
गन्धरूपा च भूमौ च आकाशे शब्दरूपिणी। शोभास्वरूपा चन्द्रे च पद्मसंघे च निश्चितम्॥
सृष्टौ सृष्टिरूपा च पालने परिपालिका। महामारी च संहारे जले च जलरूपिणी॥
क्षुत्त्वं दया त्वं निद्रा त्वं तृष्णा त्वं बुद्धिरूपिणी। तुष्टिस्त्वं चापि पुष्टिस्त्वं श्रद्धा त्वं च क्षमा स्वयंम्॥
शान्तिस्त्वं च स्वयं भ्रान्तिःकान्तिस्त्वं कीर्तिरेव च। लज्जा त्वं च तथा माया भुक्तिमुक्तिस्वरूपिणी॥
सर्वशक्तिस्वरूपा त्वं सर्वसम्पत्प्रदायिनी। वेदेऽनिर्वचनीया त्वं त्वां न जानाति कश्चन॥
सहस्रवक्त्रस्त्वां स्तोतुं न च शक्तः सुरेश्वरि। वेदा न शक्ताः को विद्वान् न च शक्ता सरस्वती॥
स्वयं विधाता शक्तो न न च विष्णुः सनातनः। किं स्तौमि पञ्चवक्त्रेण रणत्रस्तो महेश्वरि॥
कृपां कुरु महामाये मम शत्रुक्षयं कुरु। इत्युक्त्वा च सकरुणं रथस्थे पतिते रणे॥
आविर्बभूव सा दुर्गा सूर्यकोटिसमप्रभा। नारायणेन कृपया प्रेरिता परमात्मना॥
शिवस्य पुरतः शीघ्रं शिवाय च जयाय च। इत्युवाच महादेवी मायाशक्त्यासुरं जहि॥
(८८। १५—३८)

६८- राधा-उद्धव-संवाद

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७१३

विप्रेन्द्र! श्रीकृष्णका वचन सुनकर नन्दने इस स्तोत्रद्वारा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको प्रदान करनेवाली पार्वतीका स्तवन किया। मुने! तब दुर्गाने उन्हें गोलोक-वासरूप अभीष्ट वर प्रदान किया। साथ ही जो वेदमें भी नहीं सुना गया है, वह परम दुर्लभ ज्ञान, गोकुलकी राजाधिराजता और परम दुर्लभ श्रीकृष्ण-भक्ति भी दी। इसके अतिरिक्त नन्दको श्रीकृष्णकी दासता, महत्ता और सिद्धता भी प्राप्त हुई। इस प्रकार वरदान देकर और शम्भुके साथ वार्तालाप करके दुर्गाजी अदृश्य हो गयीं। तब देवता और मुनिगण भी नन्दनन्दनकी स्तुति करके अपने-अपने स्थानको चले गये।

[तत्पश्चात् नन्दसे श्रीकृष्णने कहा—] 'नन्दजी! अब आप दुर्लभ ज्ञानसे संयुक्त होनेके कारण मोहका त्याग करके प्रसन्नमनसे ब्रजवासियोंसहित ब्रजको लौट जाइये। ब्रजराज! जाइये, जाइये, घर जाइये, ब्रजको पधारिये। अब आपको सम्पूर्ण तत्त्वोंका ज्ञान हो गया। आपने मुनियों तथा देवताओंके दर्शन कर लिये और मेरे द्वारा अत्यन्त दुर्लभ नाना प्रकारके इतिहास, धनवर्धक आख्यान और जन्म एवं पापका विनाश करनेवाला दुर्गाका स्तोत्रराज भी सुन लिया। जो कुछ सामने उपस्थित था, उसका मैंने आपसे हर्ष और सुखपूर्वक वर्णन कर दिया। मैंने बाल-चपलतावश जो कुछ अपराध किया हो, उसे क्षमा कीजिये। तात! जो सुख मैंने माता-पिताके राजमहलमें नहीं किया, उससे बढ़कर तथा स्वर्गसे भी परम दुर्लभ सुख आपके यहाँ किया है। मेरे प्रिय वचन, नम्रता, विनय, भय, बहुसंख्यक परिहास, यशोदा, गोपिकागण, बालसमूह और विशेषतया राधा—ये सभी एकत्र स्थित हैं। उन बन्धुवर्गोंके साथ कर्मानुसार यहीं सुख भोगकर उत्तम गोलोकको जाओ। तात! यशोदा, रोहिणी, गोपिकागण, गोपबालक, वृषभानु, गोपसमूह, राधाकी माता कलावती और राधाके साथ आप पार्थिव देहको त्यागकर और दिव्य देह धारण करके गोलोक जायँगे। राधा और राधाकी माता कलावतीकी उत्पत्ति योनिसे नहीं हुई है; अतः वह निश्चय ही अपने उसी नित्यदेहसे गोलोकमें जायगी। कलावती पितरोंकी मानसी कन्या है; अतः धन्य और माननीय है। इसी प्रकार सीतामाता, दुर्गामाता, मेनका, दुर्गा, तारा और सुन्दरी सीता—ये सभी अयोनिजा तथा धन्य हैं। वे तथा मेना और कलावती योनिसे न उत्पन्न होनेके कारण धन्यवादकी पात्र हैं। तात! इस प्रकार मैंने परम दुर्लभ गोपनीय आख्यानका वर्णन कर दिया तथा मैंने और दुर्गाने आपको यह वरदान भी दे दिया।' श्रीकृष्णका वचन सुनकर श्रीकृष्णभक्त व्रजेश्वर उन भक्तवत्सल जगदीश्वरसे पुनः बोले।

नन्दने कहा—प्रभो! श्रीकृष्ण! चारों युगोंके जो-जो सनातन धर्म होते हैं, उनका तथा कलियुगकी समाप्तिमें कलिके जो-जो गुण-दोष होते हों और पृथ्वी, धर्म तथा प्राणियोंकी क्या गति होती है—इन सबका क्रमशः विस्तारपूर्वक मुझसे वर्णन कीजिये। नन्दकी बात सुनकर कमलनयन श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गये, फिर उन्होंने मधुरताभरी विचित्र कथा कहना आरम्भ किया।

(अध्याय ८८-८९)


श्रीकृष्णद्वारा चारों युगोंके धर्मादिका कथन, श्रीकृष्णको गोकुल चलनेके लिये नन्दका आग्रह

श्रीकृष्णने कहा—नन्दजी! पुराणोंमें जैसी अत्यन्त मधुर रमणीय कथा कही गयी है, उसे कहता हूँ। आप प्रसन्नमन होकर उसे श्रवण करें। सत्ययुगमें धर्म, सत्य और दया—ये अपने सभी

७९४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण अङ्गोंसे परिपूर्ण थे। प्रजा धार्मिक थी। चारों वेदों, वेदाङ्गों, विविध इतिहासों तथा संहिताओंका रूप अत्यन्त प्रकाशमान था। पाँचों रमणीय पञ्चरात्र तथा जितने पुराण और धर्मशास्त्र हैं, सभी रुचिर एवं मङ्गलकारक थे। सभी ब्राह्मण वेदवेत्ता, पुण्यवान् और तपस्वी थे, वे नारायणमें मनको तल्लीन करके उन्हींका ध्यान और जप करते थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—चारों वर्ण विष्णुभक्त थे। शूद्र सत्यधर्ममें तत्पर तथा ब्राह्मणोंके सेवक थे। राजा लोग धार्मिक तथा प्रजाओंके पालनमें तत्पर रहते थे। वे प्रजाओंकी आयका केवल सोलहवाँ भाग कर-रूपमें ग्रहण करते थे। ब्राह्मणोंसे कर नहीं लिया जाता था, वे पूज्य और स्वच्छन्दगामी थे। पृथ्वी सदा सभी अन्नोंसे सम्पन्न तथा रत्नोंकी भण्डार थी। शिष्य गुरुभक्त, पुत्र पितृभक्त और नारियाँ पतिभक्ता तथा पतिव्रतपरायणा थीं। सभी लोग ऋतुकालमें अपनी पत्नीके साथ सम्भोग करते थे। वे न तो स्त्रीके लोभी थे और न लम्पट थे। सत्ययुगमें न तो परायी स्त्रीसे मैथुन करनेवाले पुरुष थे और न लुटेरों तथा चोरोंका भय था। वृक्षोंमें पूर्णरूपसे फल लगते थे। गायें पूरा दूध देती थीं। सभी मनुष्य बलवान्, दीर्घायु, (अथवा ऊँचे कदवाले) और सौन्दर्यशाली होते थे। किन्हीं- किन्हीं पुण्यवानोंकी नीरोगताके साथ-साथ लाखों वर्षोंकी आयु होती थी। जैसे ब्राह्मण विष्णुभक्त थे, उसी तरह क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—ये तीनों वर्ण भी विष्णुसेवी थे। नद तथा नदियाँ सदा जलसे भरी रहती थीं। कन्दराएँ तपस्वियोंसे परिपूर्ण थीं। चारों वर्णोंके लोग तीर्थयात्रा करके अपनेको पवित्र करते थे। द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) तपस्यासे पावन थे। सभीका मन पवित्र था। तीनों लोक दुष्टोंसे हीन, उत्तम कीर्तिसे परिपूर्ण, यशस्कर तथा मङ्गलसम्पन्न थे। घर- घरमें सभी अवसरोंपर पितरोंकी, निर्दिष्ट तिथियोंमें देवताओंकी और सभी समय अतिथियोंकी पूजा होती थी। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—तीनों वर्ण ब्राह्मणोंकी सेवा करते थे और सदा उन्हें भोजन कराते रहते थे; क्योंकि ब्राह्मणका मुख ऊसररहित एवं अकण्टक क्षेत्र है। सभी लोग उत्सवके अवसरपर हर्षके साथ नारायणके नामोंका कीर्तन करते थे। उस समय कोई भी देवताओं, ब्राह्मणों तथा विद्वानोंकी निन्दा नहीं करता था। कोई भी अपने मुँह अपनी प्रशंसा नहीं करता था। सभी दूसरेके गुणोंके लिये उत्सुक रहते थे। मनुष्योंके शत्रु नहीं होते थे, बल्कि सभी सबके हितैषी थे। पुरुष अथवा स्त्री कोई भी मूर्ख नहीं था; सभी पण्डित थे। सभी मनुष्य सुखी थे। सभीके रत्ननिर्मित महल थे; जो सदा मणि, माणिक्य, बहुत प्रकारके रत्न और स्वर्णसे भरे रहते थे। न कोई भिक्षुक था न रोगी; सभी शोकरहित और हर्षमग्न थे। पुरुष अथवा स्त्री—कोई भी आभूषणोंसे रहित नहीं था। न पापी थे न धूर्त; न क्षुधार्त न निन्दित। प्राणियोंकी वृद्धावस्था नहीं आती थी; वे निरन्तर नवयुवक बने रहते थे। सभी देहधारी मानसिक तथा शारीरिक व्याधिसे रहित और निर्विकार थे। इस प्रकार सत्ययुगमें जो सत्य, दया आदि धर्म बतलाया गया है; वह त्रेतायुगमें एक पादसे हीन और द्वापरमें सत्ययुगका आधा रह जाता है। कलिके प्रारम्भमें वही धर्म निर्बल और कृश हो जाता है तथा उसका एक ही पाद अवशिष्ट रह जाता है। ब्रजेश्वर! उस समय दुष्टों, लुटेरों और चोरोंका अङ्कुर उत्पन्न होने लगता है। लोग अधर्मपरायण हो जाते हैं। उनमें कुछ लोग भयवश अपने पापोंपर परदा डालते रहते हैं। धर्मात्माओंको सदा भय लगा रहता है और पापी भी काँपते रहते हैं। राजाओंमें धर्म नाममात्रका रह जाता है और ब्राह्मणोंकी वेदनिष्ठा कम हो जाती है। उनमें कोई-कोई ही व्रत और धर्ममें

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७१५ तत्पर रहते हैं; प्रायः सभी मनमाना आचरण करने लगते हैं। जबतक तीर्थ वर्तमान हैं, जबतक सत्पुरुष स्थित हैं और जबतक ग्रामदेवता, शास्त्र तथा पूजा-पद्धति मौजूद है; तभीतक कुछ-कुछ तप, सत्य तथा स्वर्गदायक धर्मका अंश विद्यमान रहता है। तात ! दोषके भण्डाररूप इस कलियुगका एक महान् गुण भी है, इसमें मानसिक धर्म पुण्यकारक होता है, परंतु मानसिक पाप नहीं लगता *। पिताजी ! कलियुगके अन्तमें अधर्म पूर्णरूपसे व्याप्त हो जायगा। उस समय चारों वर्ण मिलकर एक वर्ण हो जायेंगे। न वेदमन्त्रोच्चारणसे पवित्र विवाह होगा और न सत्य तथा क्षमाका ही अस्तित्व रह जायगा। ग्राम्यधर्मकी प्रधानतासे विवाह सदा स्त्रीकी स्वीकृतिपर ही निर्भर करेगा। ब्राह्मण सदा यज्ञोपवीत और तिलक नहीं धारण करेंगे। वे संध्या-वन्दन और शास्त्रोंसे हीन हो जायेंगे। उनका वंश सुननेमात्रको रह जायगा। सब लोग अनियमित रूपसे सबके साथ बैठकर भोजन करेंगे। चारों वर्णोंके लोग अभक्ष्यभक्षी और परस्त्रीगामी हो जायेंगे। स्त्रियोंमें कोई पतिव्रता नहीं रह जायगी। घर-घरमें कुलटा ही दीख पड़ेंगी; वे अपने पतिको नौकरकी तरह डराती-धमकाती रहेंगी। पुत्र पिताकी और शिष्य गुरुकी भर्त्सना करेगा। प्रजाएँ राजाको और राजा प्रजाओंको पीडित करता रहेगा। दुष्ट, चोर और लुटेरे सत्पुरुषोंको खूब कष्ट देंगे। पृथ्वी अन्नसे हीन और गायें दूधरहित हो जायँगी। दूधके कम हो जानेपर घी और माखनका सर्वथा अभाव हो जायगा। सभी मनुष्य सत्यहीन हो जायँगे और वे सदा झूठ बोलेंगे। ब्राह्मण पवित्रता, संध्या- वन्दन और शास्त्रज्ञानसे हीन होकर बैलोंको जोतेंगे, रसोइयाका काम करेंगे और सदा शूद्रामें लवलीन रहेंगे। शूद्र ब्राह्मण-पत्नियोंसे प्रेम करेंगे। रसोइया तथा लम्पट शूद्र जिस ब्राह्मणका अन्न खायेंगे, उसकी सुन्दरी पत्नीको हथिया लेंगे। नौकर राजाका वध करके स्वयं राजा बन बैठेंगे। सभी लोग स्वच्छन्दाचारी, शिश्नोदरपरायण, पेटू, रोगग्रस्त, मैले-कुचैले, खण्डित मन्त्रोंसे युक्त और मिथ्या मन्त्रोंके प्रचारक होंगे। जातिहीन, अवस्थाहीन और निन्दक गुरु होंगे। धर्मकी निन्दा करनेवाले यवन और म्लेच्छ राजा होंगे; वे हर्षपूर्वक सत्पुरुषोंकी उत्तम कीर्तिको भी समूल नष्ट कर देंगे। लोग पितरों, देवताओं, द्विजातियों, अतिथियों, गुरुजनों और माता-पिताकी पूजा नहीं करेंगे; वे सदा स्त्रीकी ही आवभगतमें लगे रहेंगे। पिताजी ! स्त्रियोंके भाई-बन्धुओं तथा स्त्रियोंका ही सदा गौरव होगा। उत्तम कुलमें उत्पन्न लोग चोर और ब्राह्मण तथा देवताके द्रव्यका हरण करनेवाले होंगे। कलियुगमें लोग कौतुकवश लोभयुक्त धर्मसे मानको धारण करेंगे। सारा जगत् देव-मन्दिरोंसे शून्य तथा भयाकुल हो जायगा। कलिके दोषसे सदा दुर्नीतिके कारण अराजकता फैली रहेगी। मनुष्य भूखे, मैले-कुचैले, दरिद्र और रोगग्रस्त हो जायँगे। जो पहले अशर्फियोंके घटके स्वामी थे, वे राजालोग कौड़ियोंके घड़ोंके मालिक हो जायँगे। गृहस्थोंके घरोंकी शोभा नष्ट हो जायगी; वे सभी जल रखनेके पात्र, अन्न और वस्त्रसे शून्य, दुर्गन्धसे व्याप्त, दीपकसे रहित तथा अन्धकारयुक्त हो जायँगे। सभी मनुष्य पापपरायण तथा हिंसक जन्तुओंसे

  • कलेर्दोषनिधेस्तात गुण एको महानपि। मानसं च भवेत् पुण्यं सुकृतं न हि दुष्कृतम् ॥ (१०।२९) कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा ॥ (श्रीरामचरितमानस ७। १०३। ८)

६९- सखियोंद्वारा श्रीकृष्णकी निन्दा एवं प्रशंसा और उद्धवका मूर्च्छित हुई राधाको सान्त्वना प्रदान करना

७१६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


भयभीत रहेंगे। सभी फलके विशेष लोभी होंगे। कुलटाओंको कलह ही प्रिय लगेगा। न तो स्त्रियाँ ही यथार्थ सुन्दरी होंगी और न पुरुषोंमें ही सौन्दर्य रह जायगा। नदियों, नदों, कन्दराओं, तड़ागों और सरोवरोंमें जल तथा कमल नहीं रह जायगा एवं बादल जलशून्य हो जायँगे। नारियाँ संतानहीन, कामुकी और जार पुरुषसे सम्बन्ध रखनेवाली होंगी। सभी लोग पीपल काटनेवाले होंगे। पृथ्वी वृक्षहीन हो जायगी। वृक्ष शाखा और स्कन्धसे रहित हो जायँगे और उनमें फल नहीं लगेंगे। फल, अन्न और जलका स्वाद नष्ट हो जायगा। मनुष्य कटुवादी, निर्दयी और धर्महीन हो जायँगे। व्रजेश्वर! उसके बाद बारहों आदित्य प्रकट होकर ताप और बहुवृष्टिद्वारा मानवों तथा समस्त जन्तुओंका संहार कर डालेंगे। उस समय पृथ्वी और उसकी कथामात्र अवशिष्ट रह जायगी। जैसे वर्षके बीत जानेपर क्षेत्र खाली हो जाता है, वैसे ही कलियुगके व्यतीत होनेपर पृथ्वी जीवोंसे रहित हो जायगी। तब पुनः क्रमशः सत्ययुगकी प्रवृत्ति होगी।

तात! इस प्रकार मैंने चारों युगोंका सारा धर्म बतला दिया; अब आप सुखपूर्वक व्रजको लौट जाइये। मैं आपका दुधमुँहा शिशु पुत्र हूँ; भला, मैं (धर्मके विषयमें) क्या कह सकता हूँ? मैंने आपके यहाँ माखन, घी, दूध, दही, सुन्दर रूपसे बनाया हुआ मट्ठा, स्वस्तिकके आकारका पकवान, शुभकर्मोंके योग्य अमृतोपम मिष्टान्न तथा पितरों और देवोंके निमित्त जो कुछ मिठाइयाँ बनती थीं, वह सब मैं रोकर जबरदस्ती खा जाता था; बालकोंका रोना ही उनका बल है। अतः मेरे अपराधको क्षमा कीजिये; बालक तो पग-पगपर अपराध करता है। आप मेरे बाबा हैं और मैं आपका पुत्र हूँ; यशोदा मेरी मैया हैं। अब आप व्रजमें जाकर अपने इस बच्चेके मुखसे सुने हुए मेरे सारे परिहासको यशोदा और रोहिणीसे कहिये; फिर तो सारे गोकुलवासी उस सबका कीर्तन करेंगे। अहो! कहाँ तो गोकुलमें वैश्यकुलोत्पन्न वैश्यके अधिपति तथा गोकुलके राजा आप नन्द और कहाँ मथुरामें उत्पन्न हुआ मैं वसुदेवका पुत्र; किंतु कंससे डरे हुए मेरे पिता वसुदेवने मुझे आपके घर पहुँचाया; इसलिये आप मेरे पितासे बढ़कर पिता और यशोदा मेरी मातासे भी बढ़कर माता हैं। महाभाग व्रजेश्वर! आपको मैंने तथा पार्वतीने ज्ञान प्रदान किया है; अतः तात! उस ज्ञानके बलसे मोहका त्याग कर दीजिये और सुखपूर्वक घरको लौट जाइये।

नन्दजीने कहा— प्यारे कृष्ण! तुम रमणीय वृन्दावन, पुण्य महोत्सव, गोकुल, गो-समूह, परम सुन्दर यमुना-तट, गोपियोंके लिये परम सुन्दर तथा अपने प्रिय रासमण्डल, गोपाङ्गनाओं, गोप-बालकों, यशोदा, रोहिणी और अपनी प्रिया राधाका स्मरण तो करो। अरे बेटा! तुम्हें प्राणोंसे प्यारी राधिकाका स्मरण कैसे नहीं हो रहा है? वत्स! एक बार कुछ दिनोंके लिये तो गोकुल चले चलो। इतना कहकर नन्दने श्रीकृष्णको अपनी गोदमें बैठा लिया और शोकसे विह्वल होकर वे उन्हें नेत्रोंके मधुर आँसुओंसे पूरी तरह नहलाने लगे। फिर स्नेहवश उन्हें छातीसे लगाकर आनन्दपूर्वक उनके दोनों कपोलोंको चूमने लगे। तब परमानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण उनसे बोले।

(अध्याय ९०)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७१७

श्रीकृष्णका उद्धवको गोकुल भेजना, उद्धवका गोकुलमें सत्कार तथा उनका वृन्दावन आदि सभी वनोंकी शोभा देखते हुए राधिकाके पास पहुँचना और राधास्तोत्रद्वारा उनका स्तवन करना

श्रीभगवान्‌ने कहा— तात! कर्मफल-भोगके अनुसार संयोग और उसीसे वियोग भी होता है तथा उसीसे क्षणमात्रमें दर्शन भी प्राप्त हो जाता है। भला, उस कर्मभोगको कौन मिटा सकता है? पिताजी! उद्धव गमनागमनका प्रयोजन बतलायेंगे। मैं उन्हें शीघ्र ही भेजता हूँ। तत्पश्चात् आपको भी सब मालूम हो जायगा। वे गोकुलमें जाकर यशोदा, रोहिणी, गोपिकाओं, ग्वालबालों और उस प्राणप्यारी राधिकाको समझायेंगे—श्रीकृष्ण यों कह ही रहे थे कि वहाँ वसुदेव, देवकी, बलदेव, उद्धव तथा अक्रूर शीघ्र ही आ पहुँचे।

वसुदेवने कहा— नन्दजी! तुम तो बलवान्, ज्ञानी, मेरे सद्बन्धु और सखा हो; अतः मोहको त्याग दो और घरको प्रस्थान करो। यह श्रीकृष्ण जैसे मेरा बच्चा है, उसी तरह तुम्हारा भी है। मित्र! मधुरा नगरी गोकुलसे दूर नहीं है; वह तो उसके दरवाजेके समान है। अतः नन्दजी! सदा आनन्द-महोत्सवके अवसरपर तुम्हें यह पुत्र देखनेको मिलेगा।

श्रीदेवकीने कहा— नन्दजी! यह श्रीकृष्ण जैसे हम दोनोंका पुत्र है; उसी तरह आपका भी है—यह निश्चित है; फिर किसलिये आपका शरीर शोकसे मुरझाया हुआ दीख रहा है? श्रीकृष्ण तो बलदेवके साथ आपके महलमें ग्यारह वर्षोंतक सुखपूर्वक रह चुका है, तब आप थोड़े दिनोंके वियोगसे ही शोकग्रस्त कैसे हो जायँगे? (यदि ऐसी बात है तो) कुछ दिनोंतक मथुरामें ही इस पुत्रके साथ आप रहिये और उसके पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुखका अवलोकन कीजिये तथा अपना जन्म सफल कीजिये।

तब श्रीभगवान् बोले— उद्धव! तुम सुखपूर्वक गोकुल जाओ। भद्र! तुम्हारा कल्याण होगा। तुम हर्षपूर्वक गोकुलमें जाकर मेरे द्वारा दिये गये शोकका विनाश करनेवाले आध्यात्मिक ज्ञानसे माता यशोदा, रोहिणी, ग्वालबाल-समूह, मेरी राधिका और गोपिकाओंको सान्त्वना दो। शोकके कारण नन्दजी मेरी माताकी आज्ञासे अब यहीं रहें। तुम नन्दजीका ठहरना और मेरी विनय यशोदाको बतला देना।—यों कहकर श्रीकृष्ण पिता, माता, बलराम और अक्रूरके साथ तुरंत ही महलके भीतर चले गये। नारद! उद्धव मथुरामें रात बिताकर प्रातःकाल शीघ्र ही रमणीय वृन्दावन नामक वनके लिये प्रस्थित हुए।

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! श्रीकृष्णकी प्रेरणासे उद्धव हर्षपूर्वक गणेश्वरको प्रणाम करके नारायण, शम्भु, दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वतीका स्मरण करते हुए मन-ही-मन गङ्गा और उस दिशाके स्वामी महेश्वरका ध्यान करके मङ्गल-सूचक शकुनोंको देखते हुए आगे बढ़े। उन्हें मार्गमें दुन्दुभि और घण्टाका शब्द, शङ्खध्वनि, हरिनाम-संकीर्तन और मङ्गल-ध्वनि सुनायी पड़ी। इस प्रकार वे मार्गमें पति-पुत्रवती साध्वी नारी, प्रज्वलित दीप, माला, दर्पण, जलसे परिपूर्ण घट, दही, लावा, फल, दूर्वाङ्कुर, सफेद धान, चाँदी, सोना, मधु, ब्राह्मणोंका समूह, कृष्णसार मृग, साँड़, घी, गजराज, नरेश्वर, श्वेत रंगका घोड़ा, पताका, नेवला, नीलकण्ठ, श्वेत पुष्प और चन्दन आदि कल्याणमय वस्तुओंको देखते हुए वृन्दावन नामक वनमें जा पहुँचे। वहाँ उन्हें सामने ही भाण्डीर-वट नामक वृक्ष दीख पड़ा; जिसका रंग लाल था तथा जो अविनाशी, कोमल, पुण्यदाता और अभीष्ट तीर्थ है। उसके बाद लाल रंगके गहनोंसे सजे हुए सुन्दर वेषधारी बालकोंको देखा।

७०- उद्धवका कथन सुनकर राधाका चैतन्य होना और अपना दुःख सुनाते हुए उद्धवको उपदेश देकर मथुरा जानेकी आज्ञा देना

७१८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वे बाल-कृष्णका नाम ले-लेकर शोकवश रो रहे थे। उन्हें आश्वासन देकर उद्धव आनन्दपूर्वक नगरमें प्रवेश करके कुछ दूर आगे गये। तब उन्हें वह नन्दभवन दिखायी दिया, जिसे विश्वकर्माने बनाया था। उसका निर्माण मणियों और रत्नोंसे हुआ था। उसमें मोती, माणिक्य और हीरे जड़े हुए थे। वह अमूल्य रत्नोंके बने हुए मनोरम कलशोंसे सुशोभित था। नाना प्रकारकी चित्रकारी दरवाजेकी शोभा बढ़ा रही थी। उसे देखकर उद्धव हर्षपूर्वक उसके भीतर प्रविष्ट हुए और उसके आँगनमें पहुँचकर तुरंत ही रथसे उतरकर भूतलपर खड़े हो गये। उन्हें देखकर यशोदा और रोहिणीने तुरंत ही उनका कुशल-समाचार पूछा और आनन्दमग्न हो उन्हें आसन, जल, गौ और मधुपर्क निवेदित किया। तदनन्तर वे पूछने लगीं—'उद्धव! नन्दजी कहाँ हैं? तथा बलराम और श्रीकृष्ण कहाँ हैं? वह सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बतलाओ।' तब उद्धवने क्रमशः कहना आरम्भ किया—'यशोदे! सुनो, वे सब सर्वथा सकुशल हैं; नन्दजी आनन्दपूर्वक हैं। वे श्रीकृष्ण और बलरामके साथ कुछ विलम्बसे आयेंगे; क्योंकि वहाँ श्रीकृष्णके उपनयन-संस्कारतक ठहरेंगे। मैं विधिपूर्वक तुमलोगोंका कुशल-समाचार जानकर मथुरा लौट जाऊँगा।' इस मङ्गल-समाचारको सुनकर यशोदा और रोहिणी आनन्दविभोर हो गयीं; उन्होंने ब्राह्मणको बुलाकर रत्न, सुवर्ण और उत्तम वस्त्र प्रदान किया। तत्पश्चात् उद्धवको अमृतोपम मिष्टान्न भोजन कराया तथा उन्हें उत्तम मणि, रत्न और हीरे भेंटमें दिये। फिर नाना प्रकारके माङ्गलिक बाजे बजवाये, मङ्गल-कार्य कराया, ब्राह्मणोंको जिमाया और वेदपाठ करवाया। फिर परमानन्दपूर्वक नाना प्रकारके उपहार, नैवेद्य, पुष्प, धूप, दीप, चन्दन, वस्त्र, ताम्बूल, मधु, गो-दुग्ध, दधि और घृत आदि सामग्रियोंसे ब्राह्मणद्वारा सर्वव्यापी भगवान् शंकरका पूजन सम्पन्न किया। मुने! तदनन्तर षोडशोपचारकी सामग्रियों और अनेक प्रकारकी बलिसे श्रीवृन्दावनकी अधिष्ठात्री देवीकी पूजा की और श्रीकृष्णके कल्याणके लिये तुरंत ही ब्राह्मणोंको सौ सूधी भैंसें, एक हजार बकरियाँ, पंद्रह हजार शुद्ध भेड़, सौ मोहरें तथा सौ गायें दक्षिणामें दीं। फिर बारंबार आदरसहित उद्धवका सेवा-सत्कार किया।

तत्पश्चात् उद्धव यशोदा, रोहिणी, ग्वालबालों, वृद्धों और सभी गोपियोंको भलीभाँति आश्वासन देकर रासमण्डल देखनेके लिये गये। वहाँ उन्होंने रमणीय रासमण्डलको देखा, जो चन्द्रमण्डलके समान गोलाकार और सैकड़ों केलेके खंभोंसे सुशोभित था। तदनन्तर रासमण्डलकी शोभा, असंख्य गोपी तथा श्रीकृष्ण ही आ गये—इस अनुमानसे असंख्य गोपोंको प्रतीक्षा करते देखा। फिर यमुनाकी प्रदक्षिणा करके उद्धवने चन्दन, चम्पक, यूथिका, केतकी, माधवी, मौलसिरी, अशोक, काञ्चन, कर्णिका आदि वनोंकी प्रदक्षिणा की। फिर आनन्दपूर्ण मनसे नागेश्वर, लवङ्ग, शाल, ताल, हिंताल, पनस, रसाल, मन्दार आदि काननोंको देखते हुए रमणीय कुञ्जवनके दर्शन करके अत्यन्त मधुर रमणीय मधुकाननमें प्रवेश किया। पुनः बदरीवनमें जानेके बाद कदलीवनमें जाकर अति निभृत स्थानमें श्रीराधिकाके आश्रमके दर्शन किये। वहाँकी दिव्य विलक्षण शोभाको देखनेके बाद वे अन्तिम द्वारपर पहुँचे। सखियोंने उनका स्वागत करके उन्हें राधाके पास पहुँचा दिया। उद्धवने आश्चर्यचकित कर देनेवाली राधाको सामने देखा। वे चन्द्रकलाके समान सुन्दरी थीं, उनके नेत्र पूर्णतया खिले हुए कमलके सदृश थे, उन्होंने भूषणोंका त्याग कर दिया था, केवल कानोंमें सुवर्णके रंग-बिरंगे कुण्डल झलमला रहे थे, अत्यन्त क्लेशके कारण उनका मुख लाल हो गया था, वे शोकसे मूर्च्छित हो

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७१९

भूमिपर पड़ी हुई रो रही थीं, उनकी चेष्टाएँ शान्त थीं, उन्होंने आहारका त्याग कर दिया था, उनके अधर और कण्ठ सूख गये थे, केवल कुछ-कुछ साँस चल रही थी। उन्हें इस अवस्थामें देखकर भक्त उद्धवके सर्वाङ्गमें रोमाञ्च हो आया। वे भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करते हुए बोले।

उद्धवने कहा—मैं श्रीराधाके उन चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ, जो ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा वन्दित हैं तथा जिनकी कीर्तिके कीर्तनसे ही तीनों भुवन पवित्र हो जाते हैं। गोकुलमें वास करनेवाली राधिकाको बारंबार नमस्कार। शतशृङ्गपर निवास करनेवाली चन्द्रवतीको नमस्कार-नमस्कार। तुलसीवन तथा वृन्दावनमें बसनेवालीको नमस्कार-नमस्कार। रासमण्डलवासिनी रासेश्वरीको नमस्कार-नमस्कार। विरजाके तटपर वास करनेवाली वृन्दाको नमस्कार-नमस्कार। वृन्दावनविलासिनी कृष्णाको नमस्कार-नमस्कार। कृष्णप्रियाको नमस्कार। शान्ताको पुनः-पुनः नमस्कार। कृष्णके वक्षःस्थलपर स्थित रहनेवाली कृष्णप्रियाको नमस्कार-नमस्कार। वैकुण्ठवासिनीको नमस्कार। महालक्ष्मीको पुनः-पुनः नमस्कार। विद्याकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वतीको नमस्कार-नमस्कार। सम्पूर्ण ऐश्वर्योंकी अधिदेवी कमलाको नमस्कार-नमस्कार। पद्मनाभकी प्रियतमा पद्माको बारंबार प्रणाम। जो महाविष्णुकी माता और पराद्या हैं; उन्हें पुनः-पुनः नमस्कार। सिन्धुसुताको नमस्कार। मर्त्यलक्ष्मीको नमस्कार-नमस्कार। नारायणकी प्रिया नारायणीको बारंबार नमस्कार। विष्णुमायाको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। वैष्णवीको नमस्कार-नमस्कार। महामायास्वरूपा सम्पदाको पुनः-पुनः नमस्कार। कल्याणरूपिणीको नमस्कार। शुभाको बारंबार नमस्कार। चारों वेदोंकी माता और सावित्रीको पुनः-पुनः नमस्कार। दुर्गविनाशिनी दुर्गादेवीको बारंबार नमस्कार। पहले सत्ययुगमें जो सम्पूर्ण देवताओंके तेजोंमें अधिष्ठित थीं; उन देवीको तथा प्रकृतिको नमस्कार-नमस्कार। त्रिपुरहारिणीको नमस्कार। त्रिपुराको पुनः-पुनः नमस्कार। सुन्दरियोंमें परम सुन्दरी निर्गुणाको नमस्कार-नमस्कार। निद्रास्वरूपाको नमस्कार और निर्गुणाको बारंबार नमस्कार। दक्षसुताको नमस्कार और सत्याको पुनः-पुनः नमस्कार। शैलसुताको नमस्कार और पार्वतीको बार-बार नमस्कार। तपस्विनीको नमस्कार-नमस्कार और उमाको बारंबार नमस्कार। निराहारस्वरूपा अपर्णाको पुनः-पुनः नमस्कार। गौरीलोकमें विलास करनेवाली गौरीको बारंबार नमस्कार। कैलासवासिनीको नमस्कार और माहेश्वरीको नमस्कार-नमस्कार। निद्रा, दया और श्रद्धाको पुनः-पुनः नमस्कार। धृति, क्षमा और लज्जाको बारंबार नमस्कार। तृष्णा, क्षुत्स्वरूपा और स्थितिकर्त्रीको नमस्कार-नमस्कार। संहाररूपिणीको नमस्कार और महामारीको पुनः-पुनः नमस्कार। भया, अभया और मुक्तिदाको नमस्कार-नमस्कार। स्वधा, स्वाहा, शान्ति और कान्तिको बारंबार नमस्कार। तुष्टि, पुष्टि और दयाको पुनः-पुनः नमस्कार। निद्रास्वरूपाको नमस्कार-नमस्कार। श्रद्धाको बार-बार नमस्कार। क्षुत्पिपासास्वरूपा और लज्जाको बारंबार नमस्कार।

७२० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

धृति, चेतना और क्षमाको बारंबार नमस्कार। जो सबकी माता तथा सर्वशक्तिस्वरूपा हैं; उन्हें नमस्कार-नमस्कार। अग्निमें दाहिका-शक्तिके रूपमें विद्यमान रहनेवाली देवी और भद्राको पुनः-पुनः नमस्कार। जो पूर्णिमाके चन्द्रमामें और शरत्कालीन कमलमें शोभारूपसे वर्तमान रहती हैं; उन शोभाको नमस्कार-नमस्कार। देवि! जैसे दूध और उसकी धवलतामें, गन्ध और भूमिमें, जल और शीतलतामें, शब्द और आकाशमें तथा सूर्य और प्रकाशमें कभी भेद नहीं है, वैसे ही लोक, वेद और पुराणमें—कहीं भी राधा और माधवमें भेद नहीं है; अतः कल्याणि! चेत करो। सति! मुझे उत्तर दो। यों कहकर उद्धव वहाँ उनके चरणोंमें पुनः-पुनः प्रणिपात करने लगे। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस उद्धवकृत स्तोत्रका पाठ करता है; वह इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें वैकुण्ठमें जाता है। उसे बन्धुवियोग तथा अत्यन्त भयंकर रोग और शोक नहीं होते। जिस स्त्रीका पति परदेश गया होता है, वह अपने पतिसे मिल जाती है और भार्यावियोगी अपनी पत्नीको पा जाता है। पुत्रहीनको पुत्र मिल जाते हैं, निर्धनको धन प्राप्त हो जाता है, भूमिहीनको भूमिकी प्राप्ति हो जाती है, प्रजाहीन प्रजाको पा लेता है, रोगी रोगसे विमुक्त हो जाता है, बँधा हुआ बन्धनसे छूट जाता है, भयभीत मनुष्य भयसे मुक्त हो जाता है, आपत्तिग्रस्त आपद्से छुटकारा पा जाता है और अस्पष्ट कीर्तिवाला उत्तम यशस्वी तथा मूर्ख पण्डित हो जाता है*। (अध्याय ९१-९२)


*उद्धव उवाच—

वन्दे राधापदाम्भोजं ब्रह्मादिसुरवन्दितम्। यत्कीर्तिकीर्तनेनैव पुनाति भुवनत्रयम्॥
नमो गोलोकवासिन्यै राधिकायै नमो नमः। शतशृङ्गनिवासिन्यै चन्द्रवत्यै नमो नमः॥
तुलसीवनवासिन्यै वृन्दारण्यै नमो नमः। रासमण्डलवासिन्यै रासेश्वर्यै नमो नमः॥
विरजातीरवासिन्यै वृन्दायै च नमो नमः। वृन्दावनविलासिन्यै कृष्णायै च नमो नमः॥
नमः कृष्णप्रियायै च शान्तायै च नमो नमः। कृष्णवक्षःस्थितायै च तत्प्रियायै नमो नमः॥
नमो वैकुण्ठवासिन्यै महालक्ष्म्यै नमो नमः। विद्याधिष्ठातृदेव्यै च सरस्वत्यै नमो नमः॥
सर्वैश्वर्याधिदेव्यै च कमलायै नमो नमः। पद्मनाभप्रियायै च पद्मायै च नमो नमः॥
महाविष्णोश्च मात्रे च पराद्यायै नमो नमः। नमः सिन्धुसुतायै च मर्त्यलक्ष्म्यै नमो नमः॥
नारायणप्रियायै च नारायण्यै नमो नमः। नमोऽस्तु विष्णुमायायै वैष्णव्यै च नमो नमः॥
महामायास्वरूपायै सम्पदायै नमो नमः। नमः कल्याणरूपिण्यै शुभायै च नमो नमः॥
मात्रे चतुर्णां वेदानां सावित्र्यै च नमो नमः। नमो दुर्गविनाशिन्यै दुर्गादेव्यै नमो नमः॥
तेजःसु सर्वदेवानां पुरा कृतयुगे मुदा। अधिष्ठानकृतायै च प्रकृत्यै च नमो नमः॥
नमस्त्रिपुरहारिण्यै त्रिपुरायै नमो नमः। सुन्दरीषु च रम्यायै निर्गुणायै नमो नमः॥
नमो निद्रास्वरूपायै निर्गुणायै नमो नमः। नमो दक्षसुतायै च नमः सत्यै नमो नमः॥
नमः शैलसुतायै च पार्वत्यै च नमो नमः। नमो नमस्तपस्विन्यै ह्युमायै च नमो नमः॥
निराहारस्वरूपायै ह्यपर्णायै नमो नमः। गौरीलोकविलासिन्यै नमो गौर्यै नमो नमः॥
नमः कैलासवासिन्यै माहेश्वर्यै नमो नमः। निद्रायै च दयायै च श्रद्धायै च नमो नमः॥
नमो धृत्यै क्षमायै च लज्जायै च नमो नमः। तृष्णायै क्षुत्स्वरूपायै स्थितिकर्त्र्यै नमो नमः॥
नमः संहाररूपिण्यै महामायै नमो नमः। भयायै चाभयायै च मुक्तिदायै नमो नमः॥
नमः स्वधायै स्वाहायै शान्त्यै कान्त्यै नमो नमः। नमस्तुष्ट्यै च पुष्ट्यै च दयायै च नमो नमः॥
नमो निद्रास्वरूपायै श्रद्धायै च नमो नमः। क्षुत्पिपासास्वरूपायै लज्जायै च नमो नमः॥
नमो धृत्यै क्षमायै च चेतनायै नमो नमः। सर्वशक्तिस्वरूपिण्यै सर्वमात्रे नमो नमः॥

७१- राधाका उद्धवको बिदा करना, बिदा होते समय उद्धवद्वारा राधा-महत्त्व-वर्णन तथा उद्धवके यशोदाके पास चले जानेपर राधाका मूर्च्छित होना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७२१ राधा-उद्धव-संवाद श्रीनारायण कहते हैं- नारद! उद्धवद्वारा | यमुनाटट वही है, सुगन्धित मलय-पवन भी वही किये गये स्तवनको सुनकर राधिकाकी चेतना | है, उनके केलि-कदम्बोंका मूल भी वही है, लौट आयी। तब वे विषादग्रस्त हो उद्धवको | उनका अभीष्ट पुण्यमय रमणीय वृन्दावन भी श्रीकृष्णके सदृश आकारवाला देखकर बोलीं। | विद्यमान है। वही पुंस्कोकिलोंकी बोली, चन्दनचर्चित श्रीराधिकाने कहा - वत्स ! तुम्हारा क्या | शय्या, चारों प्रकारके भोज्य पदार्थ, सुन्दर मधुपान नाम है ? किसने तुम्हें भेजा है ? तुम कहाँसे आये | तथा दुरन्त एवं दुःखद पापात्मा मन्मथ भी वही हो ? तुम्हारे यहाँ आनेका क्या कारण है ? यह | मौजूद है। रासमण्डलमें वे रत्नप्रदीप अभी भी सब मुझे बतलाओ। तुम्हारा सर्वाङ्ग श्रीकृष्णकी | जलते हैं, उत्तम मणियोंका बना हुआ रतिमन्दिर आकृतिसे मिलता-जुलता है; अतः मैं समझती हूँ | भी है ही, गोपाङ्गनाओंका समूह भी विद्यमान है, कि तुम श्रीकृष्णके पार्षद हो। अब तुम बलदेव | पूर्णिमाका चन्द्रमा भी सुशोभित हो रहा है और और श्रीकृष्णका कुशल-समाचार वर्णन करो। | सुगन्धित पुष्पोंद्वारा रचित चन्दनचर्चित शय्या भी साथ ही यह भी बतलाओ कि नन्दजी किस | है। रति-भोगके योग्य कर्पूर आदिसे सुवासित कारणसे वहीं ठहरे हुए हैं ? क्या श्रीकृष्ण इस | पानका बीड़ा, सुगन्धित मालतीकी मालाएँ, श्वेत रमणीय वृन्दावनमें फिर आयेंगे ? क्या मैं उनके | चँवर, दर्पण, जिसमें मोती और मणि जड़े हुए हैं पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखका पुनः | ऐसे हीरेके मनोहर हार, अनेकों रमणीय उपकानन, दर्शन करूँगी तथा रासमण्डलमें उनके साथ पुनः | सुन्दर क्रीड़ा-सरोवर, सुगन्धित पुष्पोंकी वाटिका, क्रीड़ा करूँगी ? क्या सखियोंके साथ पुनः जल- | कमलोंकी मनोहर पंक्ति आदि सभी वैभव विहार हो सकेगा ? और क्या श्रीनन्दनन्दनके | विद्यमान हैं (यह सब है); परंतु मेरे प्राणनाथ शरीरमें पुनः चन्दन लगा पाऊँगी ? | कहाँ हैं ? हा कृष्ण ! हा रमानाथ ! हा मेरे उद्धव बोले- सुमुखि ! मैं क्षत्रिय हूँ। मेरा | प्राणवल्लभ ! तुम कहाँ हो ? मुझ दासीसे कौन- नाम उद्धव है। तुम्हारा शुभ समाचार जाननेके | सा अपराध हो गया है ? हुआ ही होगा; क्योंकि लिये परमात्मा श्रीकृष्णने मुझे भेजा है; इसीलिये | यह दासी तो पग-पगपर अपराध करनेवाली है। मैं तुम्हारे पास आया हूँ। मैं श्रीहरिका पार्षद भी | इतना कहकर राधिका देवी पुनः मूर्च्छित हूँ। इस समय श्रीकृष्ण, बलदेव और नन्दजी | हो गयीं। तब उद्धवने पुनः उन्हें चैतन्य कराया। कुशलसे हैं। | उनकी उस दशाको देखकर क्षत्रियश्रेष्ठ उद्धवको श्रीराधिकाने कहा - उद्धव ! इस समय भी | परम आश्चर्य हुआ। उस समय सात सखियाँ अग्नौ दाहस्वरूपायै भद्रायै च नमो नमः। शोभायै पूर्णचन्द्रे च शरत्पद्मे नमो नमः ॥ नास्ति भेदो यथा देवि दुग्धधावल्ययोः सदा। यथैव गन्धभूम्योश्च यथैव जलशैत्ययोः ॥ यथैव शब्दनभसोर्ज्योतिः सूर्यकयोर्यथा। लोके वेदे पुराणे च राधामाधवयोस्तथा ॥ चेतनं कुरु कल्याणि देहि मामुत्तरं सति । इत्युक्त्वा चोद्धवस्तत्र प्रणनाम पुनः पुनः ॥ इत्युद्धवकृतं स्तोत्रं यः पठेद् भक्तिपूर्वकम् । इह लोके सुखं भुक्त्वा यात्यन्ते हरिमन्दिरम् ॥ न भवेद् बन्धुविच्छेदो रोगः शोकः सुदारुणः । प्रोषिता स्त्री लभेत् कान्तं भार्याभेदी लभेत् प्रियाम् ॥ अपुत्रो लभते पुत्रान् निर्धनो लभते धनम् । निर्भूमिर्लभते भूमिं प्रजाहीनो लभेत् प्रजाम् ॥ रोगाद् विमुच्यते रोगी बद्धो मुच्येत बन्धनात् । भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ अस्पष्टकीर्तिः सुयशा मूर्खो भवति पण्डितः ॥ (१२।६३-९३)