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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

९८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


नारद! समस्त ब्राह्मणोंके लिये जो अभक्ष्य है, उसका वर्णन सुनो। ताँबेके पात्रमें दूध पीना, जूठे बर्तन या अन्नमें घी लेकर खाना तथा नमकके साथ दूध पीना तत्काल गोमांस-भक्षणके समान माना गया है। काँसके बर्तनमें रखा हुआ एवं जो द्विज उठकर बायें हाथसे जल पीता है, वह शराबी माना गया है और समस्त धर्मोंसे बहिष्कृत है। मुने! भगवान् श्रीहरिको निवेदित न किया गया अन्न, खानेसे बचा हुआ जूठा भोजन तथा पीनेसे शेष रहा जूठा जल—ये सब सर्वथा निषिद्ध हैं। कार्तिकमें बैगनका फल, माघमें मूली तथा श्रीहरिके शयनकाल (चौमासे)-में कलम्बींका शाक सर्वथा नहीं खाना चाहिये। सफेद ताड़, मसूर और मछली—ये सभी ब्राह्मणोंके लिये समस्त देशोंमें त्याज्य हैं। प्रतिपदाको कूष्माण्ड (कोहड़ा) नहीं खाना चाहिये; क्योंकि उस दिन वह अर्थका नाश करनेवाला है। द्वितीयाको बृहती (छोटे बैगन अथवा कटेहरी) भोजन कर ले तो उसके दोषसे छुटकारा पानेके लिये श्रीहरिका स्मरण करना चाहिये। तृतीयाको परवल शत्रुओंकी वृद्धि करनेवाला होता है; अतः उस दिन उसे नहीं खाना चाहिये। चतुर्थीको भोजनके उपयोगमें लायी हुई मूली धनका नाश करनेवाली होती है। पञ्चमीको बेल खाना कलङ्क लगनेमें कारण होता है। षष्ठीको नीमकी पत्ती चबायी जाय या उसका फल या दाँतुन मुँहमें डाला जाय तो उस पापसे मनुष्यको पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। सप्तमीको ताड़का फल खाया जाय तो वह रोग बढ़ानेवाला तथा शरीरका नाशक होता है। अष्टमीको नारियलका फल खाया जाय तो उससे बुद्धिका नाश होता है। नवमीको लौकी और दशमीको कलम्बीका शाक सर्वथा त्याज्य है। एकादशीको शिम्बी (सेम), द्वादशीको पूतिका (पोई) और त्रयोदशीको बैगन खानेसे पुत्रका नाश होता है। मांस सबके लिये सदा वर्जित है।

पार्वणश्राद्ध और व्रतके दिन प्रातःकालिक स्नानके समय सरसोंका तेल और पकाया हुआ तेल उपयोगमें लाया जाय तो उत्तम है। अमावास्या, पूर्णिमा, संक्रान्ति, चतुर्दशी और अष्टमी तिथियोंमें, रविवारको, श्राद्ध और व्रतके दिन स्त्री-सहवास तथा तिलके तेलका सेवन निषिद्ध है। सभी वर्णोंके लिये दिनमें अपनी स्त्रीका भी सेवन वर्जित है। रातमें दही खाना, दिनमें दोनों संध्याओंके समय सोना तथा रजस्वला स्त्रीके साथ समागम करना—ये नरककी प्राप्तिके कारण हैं। रजस्वला तथा कुलटाका अन्न नहीं खाना चाहिये।

ब्रह्मर्षे! शूद्रजातीय स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मणका अन्न भी खाने योग्य नहीं है। ब्रह्मन्! सूदखोर और गणकका अन्न भी नहीं खाना चाहिये। अग्रदानी ब्राह्मण (महापात्र) तथा चिकित्सक (वैद्य या डाक्टर)-का अन्न भी खाने योग्य नहीं है। अमावास्या तिथि और कृत्तिका नक्षत्रमें द्विजोंके लिये क्षौर-कर्म (हजामत) वर्जित है। जो मैथुन करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करता है, उसका वह जल रक्तके समान होता है तथा उसे देनेवाला नरकमें पड़ता है। नारद! जो करना चाहिये, जो नहीं करना चाहिये, जो भक्ष्य है और जो अभक्ष्य है, वह सब तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहते हो? (अध्याय २७)


* जलज शाकविशेष अथवा कदम्ब।

ब्रह्मखण्ड

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परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका निरूपण

नारदजीने पूछा— जगन्नाथ! जगद्गुरो! आपकी कृपासे मैंने सब कुछ सुन लिया। अब आप ब्रह्मके स्वरूपका वर्णन—ब्रह्मतत्त्वका निरूपण कीजिये। प्रभो! सर्वेश्वर! ब्रह्म साकार है या निराकार? क्या उसका कुछ विशेषण भी है? अथवा वह विशेषणोंसे रहित (निर्विशेष) ही है? ब्रह्मका नेत्रोंसे दर्शन हो सकता है या नहीं? वह समस्त देहधारियोंमें लिप्त है अथवा नहीं? उसका क्या लक्षण बताया गया है? वेदमें उसका किस प्रकार निरूपण किया गया है? क्या प्रकृति ब्रह्मसे अतिरिक्त है या ब्रह्मस्वरूपिणी ही है? श्रुतिमें प्रकृतिका सारभूत लक्षण किस प्रकार सुना गया है? ब्रह्म और प्रकृति इन दोनोंमेंसे किसकी सृष्टिमें प्रधानता है? दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? सर्वज्ञ! इन सब बातोंपर मनसे विचार करके जो सिद्धान्त हो, उसे अवश्य मुझे बताइये।

नारदजीकी यह बात सुनकर भगवान् पञ्चमुख महादेव ठठाकर हँस पड़े और उन्होंने परब्रह्म-तत्त्वका निरूपण आरम्भ किया।

महादेवजी बोले— वत्स नारद! तुमने जो-जो पूछा है, वह उत्तम गूढ़ ज्ञानका विषय है। वेदों और पुराणोंमें भी वह उत्तम एवं गूढ़ ज्ञान परम दुर्लभ है। ब्रह्मन्! मैं, ब्रह्मा, विष्णु, शेषनाग, धर्म और महाविराट्—इन सबने तथा श्रुतियोंने भी सब बातोंका निरूपण किया है। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारद! जो सविशेष तथा प्रत्यक्ष दृश्य-तत्त्व है, उसका हमलोगोंने वेदमें निरूपण किया है। प्राचीनकालकी बात है, वैकुण्ठधाममें मैंने, ब्रह्माजीने और धर्मने श्रीहरिके समक्ष अपना प्रश्न उपस्थित किया था। उस समय श्रीहरिने उसका जो कुछ उत्तर दिया, वह सुनो; मैं तुम्हें बताता हूँ। वह ज्ञान तत्त्वोंका सारभूत तत्त्व है, अज्ञानान्धकारसे अन्धे हुए लोगोंके लिये नेत्ररूप है तथा दुविधा अथवा द्वैत नामक भ्रमरूपी अन्धकारका नाश करनेके लिये सर्वोत्तम प्रदीपके समान है। सनातन परब्रह्म परमात्मस्वरूप है। वह देहधारियोंके कर्मोंके साक्षीरूपसे समस्त शरीरोंमें विराजमान है। प्रत्येक शरीरमें पाँचों प्राणोंके रूपमें साक्षात् भगवान् विष्णु विद्यमान हैं। मनके रूपमें प्रजापति ब्रह्मा विराज रहे हैं। सम्पूर्ण ज्ञान (बुद्धि)-के रूपमें स्वयं मैं हूँ और शक्तिके रूपमें ईश्वरीय प्रकृति है। हम सब-के-सब परमात्माके अधीन हैं। शरीरमें उसके स्थित होनेपर ही स्थित होते हैं और उसके चले जाने (सम्बन्ध हटा लेने)-पर हम भी चले जाते हैं। जैसे राजाके सेवक सदा राजाका अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार हम-लोग उस परमात्माके अनुगामी बने रहते हैं। जीव परमात्माका प्रतिबिम्ब है। वही कर्मोंके फलका उपभोग करता है। जैसे जलसे भरे हुए घड़ोंमें पृथक्-पृथक् सूर्य और चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब होता है तथा उन घड़ोंके फूट जानेपर वह प्रतिबिम्ब फिर चन्द्रमा और सूर्यमें लीन हो जाता है, उसी प्रकार सृष्टिकालमें परमात्माके प्रतिबिम्ब-स्वरूप जीवकी उपलब्धि होती है तथा सृष्टिमयी उपाधिके नष्ट हो जानेपर वह प्रतिबिम्बस्वरूप जीव पुनः सर्वव्यापी परमात्मामें लीन हो जाता है।

वत्स! संसारका संहार हो जानेपर एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही शेष रहता है। हम तथा यह चराचर जगत् उसीमें लीन हो जाते हैं। वह ब्रह्म मण्डलाकार ज्योतिःपुञ्जस्वरूप है। ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालमें प्रकट होनेवाले कोटि-कोटि सूर्योंके समान उसका प्रकाश है। वह आकाशके समान विस्तृत, सर्वत्र व्यापक तथा अविनाशी है। योगीजनॉको ही वह चन्द्रमण्डलके समान सुखपूर्वक दिखायी देता है। योगीलोग उसे सनातन परब्रह्म कहते हैं और दिन-रात उस सर्वमङ्गलमय सत्यस्वरूप परमात्माका ध्यान करते रहते हैं। वह परमात्मा निरीह, निराकार तथा सबका ईश्वर है।

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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

उसका स्वरूप उसकी इच्छाके अनुसार है। वह स्वतन्त्र तथा समस्त कारणोंका भी कारण है। परमानन्दस्वरूप तथा परमानन्दकी प्राप्तिका हेतु है। सबसे उत्कृष्ट, प्रधान पुरुष (पुरुषोत्तम), प्राकृत गुणोंसे रहित तथा प्रकृतिसे परे है। प्रलयके समय उसीमें सर्वबीजस्वरूपिणी प्रकृति लीन होती है। ठीक उसी तरह, जैसे अग्निमें उसकी दाहिका शक्ति, सूर्यमें प्रभा, दुग्धमें धवलता और जलमें शीतलता लीन रहती है। मुने! जैसे आकाशमें शब्द और पृथ्वीमें गन्ध सदा विद्यमान है, उसी तरह निर्गुण ब्रह्ममें निर्गुण प्रकृति सर्वदा स्थित है। जब ब्रह्म सृष्टिके लिये उन्मुख होता है, तब अपने अंशसे पुरुष कहलाता है। वत्स! वही गुणों—विषयोंसे सम्बन्ध स्थापित करनेपर प्राकृत एवं विषयी कहा गया है। त्रिगुणा प्रकृति उस परमात्मामें ही उत्कृष्ट छायारूपिणी मानी गयी है। मुने! जैसे कुम्हार मिट्टीसे घड़ा बनानेमें सदा ही समर्थ होता है, उसी प्रकार वह ब्रह्म प्रकृतिके द्वारा सृष्टिका निर्माण करनेमें नित्य समर्थ है। जैसे सुनार सुवर्णसे कुण्डल बनानेकी शक्ति रखता है, उसी तरह परमेश्वर उपादानभूता प्रकृतिके द्वारा सदा सृष्टि करनेमें समर्थ है। जैसे कुम्हार मिट्टीका निर्माण नहीं करता, मिट्टी उसके लिये नित्य एवं सनातन है तथा जैसे सुनार सुवर्णकी सृष्टि नहीं करता, सुवर्ण उसके लिये नित्य वस्तु ही है, उसी प्रकार वह परब्रह्म परमात्मा नित्य है और वह प्रकृति भी नित्य मानी गयी है। इसीलिये कुछ लोग सृष्टिमें उन दोनोंकी ही समानरूपसे प्रधानता बतलाते हैं। कुम्हार और सुनार स्वयं मिट्टी और सुवर्ण पैदा करके लानेमें समर्थ नहीं हैं तथा मिट्टी और सुवर्ण भी कुम्हार और सुनारको ले आनेकी शक्ति नहीं रखते। अतः मिट्टी और कुम्हारकी घटमें तथा सुवर्ण और सुनारकी कुण्डलमें समानरूपसे प्रधानता है।

नारद! इस विवेचनसे ब्रह्म प्रकृतिसे परे ही सिद्ध होता है। यही बात दृष्टिमें रखकर कुछ लोग प्रकृति और ब्रह्म दोनोंकी ही निश्चितरूपसे नित्यताका प्रतिपादन करते हैं। कुछ विद्वानोंका कथन है कि ब्रह्म स्वयं ही प्रकृति और पुरुषरूपमें प्रकट है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि प्रकृति ब्रह्मसे अतिरिक्त (भिन्न) है। वह ब्रह्म परमधाम-स्वरूप तथा समस्त कारणोंका भी कारण है। ब्रह्मन्! उस ब्रह्मका लक्षण श्रुतिमें कुछ इस प्रकारका सुना गया है—ब्रह्म सबका आत्मा है। वह सबसे निर्लिप्त और सबका साक्षी है। सर्वत्र व्यापक और सबका आदिकारण है। सर्वबीजस्वरूपिणी प्रकृति उस ब्रह्मकी शक्ति है। जिससे वह ब्रह्म शक्तिमान् है, अतः शक्ति और शक्तिमान् दोनों अभिन्न हैं। योगीलोग सदा तेजःस्वरूपमें ही ब्रह्मका ध्यान करते हैं; परंतु सूक्ष्म बुद्धिवाले मेरे भक्त—वैष्णवजन ऐसा नहीं मानते। वे वैष्णवजन उस आश्चर्यमय तेजोमण्डलके भीतर सदा साकार, सर्वात्मा, स्वेच्छामय पुरुषके मनोहर रूपका ध्यान करते हैं। करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान जो मण्डलाकार तेजःपुञ्ज है, उसके भीतर नित्यधाम छिपा हुआ है, जिसका नाम गोलोक है। वह मनोहर लोक चारों ओरसे लक्षकोटि योजन विस्तृत है। सर्वश्रेष्ठ दिव्य रत्नोंके सारतत्त्वसे जिनका निर्माण हुआ है, ऐसे दिव्य भवनों तथा गोपाङ्गनाओंसे वह लोक भरा हुआ है। उसे सुखपूर्वक देखा जा सकता है। चन्द्रमण्डलके समान ही वह गोलाकार है। रतेन्द्रसारसे निर्मित वह धाम परमात्माकी इच्छाके अनुसार बिना किसी आधारके ही स्थित है। उस नित्य लोककी स्थिति वैकुण्ठसे पचास करोड़ योजन ऊपर है। वहाँ गौएँ, गोप और गोपियाँ निवास करती हैं। वहाँ कल्पवृक्षोंके वन हैं। गोलोक कामधेनु गौओंसे भरा हुआ तथा रासमण्डलसे मण्डित है। मुने! वह वृन्दावनसे आच्छन्न और विरजा नदीसे आवेष्टित है। वहाँ सैकड़ों शिखरोंसे सुशोभित गिरिराज विराजमान है। सुवर्णनिर्मित

ब्रह्मखण्ड १०१

लक्ष कोटि मनोहर आश्रम हैं, जिनसे वह अभीष्ट धाम अत्यन्त दीप्तिमान् एवं श्रीसम्पन्न दिखायी देता है। उन सबके मध्यभागमें एक परम मनोहर आश्रम है, जो अकेला ही सौ मन्दिरोंसे संयुक्त है। वह परकोटों तथा खाइयोंसे घिरा हुआ तथा पारिजातके वनोंसे सुशोभित है। उस आश्रमके भवनोंमें जो कलश लगे हैं, उनका निर्माण रत्नराज कौस्तुभमणिसे हुआ है। इसलिये वे उत्तम ज्योतिःपुञ्जसे जाज्वल्यमान रहते हैं। उन भवनोंमें जो सीढ़ियाँ हैं, वे दिव्य हीरोंके सार-तत्त्वसे बनी हुई हैं। उनसे उन भवनोंका सौन्दर्य बहुत बढ़ गया है। मणीन्द्रसारसे निर्मित वहाँके किवाड़ोंमें दर्पण जड़े हुए हैं। नाना प्रकारके चित्र-विचित्र उपकरणोंसे वह आश्रम भलीभाँति सुसज्जित है। उसमें सोलह दरवाजे हैं तथा वह आश्रम रत्नमय प्रदीपोंसे अत्यन्त उद्भासित होता रहता है।

वहाँ बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित तथा नाना प्रकारके विचित्र चित्रोंसे चित्रित रमणीय रत्नमय सिंहासनपर सर्वेश्वर श्रीकृष्ण बैठे हुए हैं। उनकी अङ्गकान्ति नवीन मेघ-मालाके समान श्याम है। वे किशोर-अवस्थाके बालक हैं। उनके नेत्र शरत्कालकी दोपहरिके सूर्यकी प्रभाको छीने लेते हैं। उनका मुखमण्डल शरत्पूर्णिमाके पूर्ण चन्द्रमाकी शोभाको ढक देता है। उनका सौन्दर्य कोटि कामदेवोंकी लावण्यलीलाको तिरस्कृत कर रहा है। उनका पुष्ट श्रीविग्रह करोड़ों चन्द्रमाओंकी प्रभासे सेवित है। उनके मुखपर मुस्कराहट खेलती रहती है। उनके हाथमें मुरली शोभा पाती है। उनके मनोहर छबिकी सबने भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वे परम मङ्गलमय हैं। अग्निमें तपाकर शुद्ध किये गये सुवर्णके समान रंगवाले दो पीताम्बर धारण करनेसे उनका श्रीविग्रह परम उज्ज्वल प्रतीत होता है। भगवान्‌के सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित तथा कौस्तुभमणिसे प्रकाशित हैं। घुटनोंतक लटकती हुई मालतीकी माला और वनमालासे वे विभूषित हैं। त्रिभंगी छबिसे युक्त और मणिमाणिक्यसे अलंकृत हैं। मोरपंखका मुकुट धारण करते हैं। उत्तम रत्नमय मुकुटसे उनका मस्तक जगमगाता रहता है। रत्नोंके बाजूबंद, कंगन और मंजीरसे उनके हाथ-पैर सुशोभित हैं। उनके गण्डस्थल रत्नमय युगल कुण्डलसे अत्यन्त शोभा पाते हैं। उनकी दन्तपंक्ति मोतियोंकी पाँतिका तिरस्कार करनेवाली है। वे बड़े ही मनोहर हैं। उनके ओठ पके हुए बिम्बफलके समान लाल हैं। उन्नत नासिका उनकी शोभा बढ़ाती है। सब ओरसे घेरकर खड़ी हुई गोपाङ्गनाएँ उन्हें सदा सादर निहारती रहती हैं। वे गोपाङ्गनाएँ भी सुस्थिर यौवनसे युक्त, मन्द मुस्कानसे सुशोभित तथा उत्तम रत्नोंके बने हुए आभूषणोंसे विभूषित हैं। देवेन्द्र, मुनीन्द्र, मुनिगण तथा नरेशोंके समुदाय और ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अनन्त तथा धर्म आदि उनकी सानन्द वन्दना किया करते हैं। वे भक्तोंके प्रियतम, भक्तोंके नाथ तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर रहनेवाले हैं। राधाके वक्षःस्थलपर विराजमान परम रसिक रासेश्वर हैं। मुने! वैष्णवजन उन निराकार परमात्माका इस रूपमें ध्यान किया करते हैं। वे परमात्मा ईश्वर हम सब लोगोंके सदा ही ध्येय हैं। उन्हींको अविनाशी परब्रह्म कहा गया है। वे ही दिव्य स्वेच्छामय शरीरधारी सनातन भगवान् हैं। वे निर्गुण, निरीह और प्रकृतिसे परे हैं। सर्वाधार, सर्वबीज, सर्वज्ञ, सर्वरूप, सर्वेश्वर, सर्वपूज्य तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंको हाथमें देनेवाले हैं। वे आदिपुरुष भगवान् स्वयं ही द्विभुज रूप धारण करके गोलोकमें निवास करते हैं। उनकी वेश-भूषा भी ग्वालोंके समान होती है और वे अपने पार्षद गोपालोंसे घिरे रहते हैं। उन परिपूर्णतम भगवान्‌को श्रीकृष्ण कहते हैं। वे सदा श्रीजीके साथ रहनेवाले और श्रीराधिकाके प्राणेश्वर हैं। सबके अन्तरात्मा, सर्वत्र प्रत्यक्ष

१०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

दर्शन देनेके योग्य और सर्वव्यापी हैं। 'कृष्' का अर्थ है सब और 'ण' का अर्थ है आत्मा। वे परब्रह्म परमात्मा सबके आत्मा हैं। इसलिये उनका नाम 'कृष्ण' है। 'कृष्' शब्द सर्वका वाचक है और 'ण' कार आदिवाचक है। वे सर्वव्यापी परमेश्वर सबके आदिपुरुष हैं, इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। वे ही भगवान् अपने एक अंशसे वैकुण्ठधाममें चार भुजाधारी लक्ष्मीपतिके रूपमें निवास करते हैं, चार भुजाधारी पार्षद उन्हें घेरे रहते हैं। वे ही जगत्पालक भगवान् विष्णु अपनी एक कलासे श्वेतद्वीपमें चार भुजाधारी रमापति-रूपसे निवास करते हैं। समुद्रतनया रमा उनकी पत्नी हैं।

इस प्रकार मैंने तुमसे परब्रह्म-निरूपणविषयक सब बातें बतायीं। वे परमात्मा हम सबके प्रिय, वन्दनीय, सेव्य तथा सर्वदा स्मरणीय हैं।

शौनक! ऐसा कहकर भगवान् शंकर वहाँ चुप हो गये। तब नारदने गन्धर्वराज उपबर्हणद्वारा रचे गये स्तोत्रसे उनकी स्तुति की। मुनिके उस स्तोत्रसे संतुष्ट हो अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले आदि भगवान् मृत्युञ्जयने उन्हें अभीष्ट वरदान—ज्ञान प्रदान किया। उस समय मुनिवर नारदके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। वे भगवान् शिवको प्रणाम करके उनकी आज्ञा ले पुण्यमय नारायणाश्रमको चले गये।

(अध्याय २८)


बदरिकाश्रममें नारायणके प्रति नारदजीका प्रश्न

सौति कहते हैं—शौनक! देवर्षि नारदने नारायण ऋषिके आश्चर्यमय आश्रमको देखा, जो बेरके वनोंसे सुशोभित था। नाना प्रकारके वृक्षों और फलोंसे भरे हुए उस आश्रममें कोयलकी मीठी कूक मुखरित हो रही थी। बड़े-बड़े शरभों, सिंहों और व्याघ्रसमुदायोंसे घिरे होनेपर भी उस आश्रममें ऋषिराज नारायणके प्रभावसे हिंसा और भयका कहीं नाम नहीं था। वह विशाल वन जनसाधारणके लिये अगम्य और स्वर्गसे भी अधिक मनोहर था। वहाँ नारदजीने देखा—ऋषिप्रवर नारायण मुनियोंकी सभामें रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं। उनका रूप बड़ा मनोहर है और वे योगियोंके गुरु हैं। श्रीकृष्णस्वरूप परमेश्वर परब्रह्मका जप करते हुए नारायण मुनिका दर्शन करके ब्रह्मपुत्र नारदने उन्हें प्रणाम किया। उन्हें आया देख नारायणने सहसा उठकर हृदयसे लगा लिया और उत्तम आशीर्वाद प्रदान किया। साथ ही स्नेहपूर्वक कुशल-समाचार पूछा और आतिथ्यसत्कार किया। फिर नारदजीको भी उन्होंने रमणीय रत्नमय सिंहासनपर बिठाया। उस रमणीय आसनपर बैठकर नारदजीने रास्तेकी थकावट दूर की और उन ऋषिश्रेष्ठ सनातन भगवान् नारायणसे, साथ ही उन सब परम दुर्लभ मुनियोंसे भी पूछा, जो पिताके स्थानमें वेदाध्ययन करके वहाँ विराजमान थे।

नारदजी बोले—प्रभो! योगेश्वर शंकरसे ज्ञान और मन्त्रका उपदेश पाकर भी मेरा मन तृप्त नहीं हो रहा है; क्योंकि यह बड़ा चञ्चल है और इसे रोकना अत्यन्त कठिन है। मेरे मनमें प्रभुकी कुछ ऐसी प्रेरणा हुई, जिससे मैंने आपके चरणारविन्दोंका दर्शन किया। इस समय मैं आपसे कुछ विशेष ऐसा ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ, जिसमें श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन हो, जो कि जन्म, मृत्यु और जराका नाश करनेवाला है। भगवन्! ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता, देवराज इन्द्र, मुनि और विद्वान् मनु किसका चिन्तन करते हैं? सृष्टिका प्रादुर्भाव किससे होता है अथवा उसका लय कहाँ होता है? समस्त

ब्रह्मखण्ड १०३

कारणोंके भी कारणभूत सर्वेश्वर विष्णु कौन हैं? जगत्पते! उन ईश्वरका रूप अथवा कर्म क्या है? इन सब बातोंपर मन-ही-मन विचार करके आप बतानेकी कृपा करें।

नारदजीका यह वचन सुनकर भगवान् नारायण ऋषि हँसे। फिर उन्होंने त्रिभुवनपावनी पुण्यकथाको कहना आरम्भ किया।

(अध्याय २९)


नारायणके द्वारा परमपुरुष परमात्मा श्रीकृष्ण तथा प्रकृतिदेवीकी महिमाका प्रतिपादन

श्रीनारायण बोले—गणेश, विष्णु, शिव, रुद्र, शेष, ब्रह्मा आदि देवता, मनु, मुनीन्द्रगण, सरस्वती, पार्वती, गङ्गा और लक्ष्मी आदि देवियाँ भी जिनका सेवन करती हैं, उन भगवान् गोविन्दके चरणारविन्दका चिन्तन करना चाहिये। जो अत्यन्त गम्भीर और भयंकर दावाग्निरूपी सर्पसे आवेष्टित हो छटपटाते अङ्गवाले संसार-सागरको लाँघकर उस पार जाना चाहता है और श्रीहरिके दास्य-सुखको पानेकी इच्छा रखता है, वह भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दका चिन्तन करे। जिन्होंने गोवर्धन पर्वतको हाथपर उठाकर व्रजभूमिको इन्द्रके कोपसे बचानेकी कीर्ति प्राप्त की है, वाराहावतारके समय एकार्णवके जलमें गली जाती हुई पृथ्वीको अपनी दाढ़ोंके अग्रभागसे उठाकर जलके ऊपर स्थापित किया तथा जो अपने रोमकूपोंमें असंख्य विश्व-ब्रह्माण्डको धारण करते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दके चरणारविन्दका चिन्तन करना चाहिये। जो गोपाङ्गनाओंके मुखारविन्दके रसिक भ्रमर हैं और वृन्दावनमें विहार करनेवाले हैं, उन व्रजवेषधारी विष्णुरूप परमपुरुष रसिक-रमण रासेश्वर श्रीकृष्णके चरणारविन्दका चिन्तन करना चाहिये। वत्स नारदमुने! जिनके नेत्रोंकी पलक गिरते ही जगत्स्रष्टा ब्रह्मा नष्ट हो जाते हैं, उनके कर्मका वर्णन करनेमें भूतलपर कौन समर्थ है? तुम भी श्रीहरिके चरणारविन्दका अत्यन्त आदरपूर्वक

चिन्तन करो। तुम और हम उन भगवान्की कलाकी कलाके अंशमात्र हैं। मनु और मुनीन्द्र भी उनकी कलाके कलांश ही हैं। महादेव और ब्रह्माजी भी कलाविशेष हैं और महान् विराट्-पुरुष भी उनकी विशिष्ट कलामात्र हैं। सहस्त्र सिरोंवाले शेषनाग सम्पूर्ण विश्वको अपने मस्तकपर सरसोंके एक दानेके समान धारण करते हैं, परंतु कूर्मके पृष्ठभागमें वे शेषनाग ऐसे जान पड़ते हैं, मानो हाथीके ऊपर मच्छर बैठा हो। वे भगवान् कूर्म (कच्छप) श्रीकृष्णकी कलाके कलांशमात्र हैं। नारद! गोलोकनाथ भगवान् श्रीकृष्णका निर्मल यश वेद और पुराणमें किञ्चिन्मात्र भी प्रकट नहीं हुआ। ब्रह्मा आदि देवता भी उसका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं। ब्रह्मपुत्र नारद! तुम उन सर्वेश्वर श्रीकृष्णका ही मुख्यरूपसे भजन करो।

जिन विश्वाधार परमेश्वरके सम्पूर्ण लोकोंमें सदा बहुत-से ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र रहा ही करते हैं तथा श्रुतियाँ और देवता भी उनकी नियत संख्याको नहीं जानते हैं, उन्हीं परमेश्वर श्रीकृष्णकी तुम आराधना करो। वे विधाताके भी विधाता हैं। वे ही जगत्प्रसविनी नित्यरूपिणी प्रकृतिको प्रकट करके संसारकी सृष्टि करते हैं। ब्रह्मा आदि सब देवता प्रकृतिजन्य हैं। वे भक्तिदायिनी श्रीप्रकृतिका भजन करते हैं। प्रकृति ब्रह्मस्वरूपा है। वह ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। उसीके द्वारा सनातन पुरुष परमात्मा संसारकी सृष्टि करते हैं, श्रीप्रकृतिकी

२- परब्रह्म श्रीकृष्ण और श्रीराधासे प्रकट चिन्मय देवी और देवताओंके चरित्र

१०४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कलासे ही संसारकी सारी स्त्रियाँ प्रकट हुई हैं। प्रकृति ही माया है, जिसने सबको मोहमें डाल रखा है। वह सनातनी परमा प्रकृति नारायणी कही गयी है; क्योंकि वह परमपुरुष नारायणकी शक्ति है। सर्वात्मा ईश्वर भी उसीके द्वारा शक्तिमान् होते हैं। उस शक्तिके बिना वे सृष्टि करनेमें सदा असमर्थ ही हैं। वत्स! तुम इस समय जाकर विवाह करो। मैं तुम्हें पिताके आदेशका पालन करनेकी आज्ञा देता हूँ। जो गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला है, वह सदा सर्वत्र पूजनीय तथा विजयी होता है। जो पुरुष वस्त्र, अलंकार और चन्दनसे अपनी पत्नीका सत्कार करता है, उसपर प्रकृतिदेवी संतुष्ट होती हैं। ठीक उसी तरह जैसे ब्राह्मणकी पूजा-अर्चा करनेपर भगवान् श्रीकृष्ण संतुष्ट होते हैं। प्रकृति ही सम्पूर्ण लोकोंमें अपनी मायासे स्त्रियोंके रूपमें प्रकट हुई हैं। अतः महिलाओंके अपमानसे वे प्रकृतिदेवी ही अपमानित होती हैं। जिसने पति-पुत्रसे युक्त सती-साध्वी दिव्य नारीका पूजन किया है, उसके द्वारा सर्वमङ्गलदायिनी प्रकृतिदेवीका ही पूजन सम्पन्न हुआ है। मूल प्रकृति एक ही है। वह पूर्ण ब्रह्मस्वरूपिणी है। उसीको सनातनी विष्णुमाया कहा गया है। सृष्टिकालमें वह पाँच रूपोंमें प्रकट होती है। जो परमात्मा श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी है तथा समस्त प्रकृतियोंमें उन्हें सबसे अधिक प्यारी है, उस मुख्या प्रकृतिका नाम 'राधा' है। दूसरी प्रकृति नारायणप्रिया लक्ष्मी हैं, जो सर्वसम्पत्स्वरूपिणी हैं। तीसरी प्रकृति वाणीकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती हैं, जो सदा सबके द्वारा पूजनीया हैं। चौथी प्रकृति वेदमाता सावित्री हैं। वे ब्रह्माजीकी प्यारी पत्नी और सबकी पूजनीया हैं। पाँचवीं प्रकृतिका नाम दुर्गा है, जो भगवान् शंकरकी प्यारी पत्नी हैं। उन्हींके पुत्र गणेश हैं। (अध्याय ३०)


ब्रह्मखण्ड सम्पूर्ण


प्रकृतिखण्ड

पञ्चदेवीरूपा प्रकृतिका तथा उनके अंश, कला एवं कलांशका विशद वर्णन

भगवान् नारायण कहते हैं— नारद ! गणेशजननी दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री और राधा—ये पाँच देवियाँ प्रकृति कहलाती हैं। इन्हींपर सृष्टि निर्भर है।

नारदजीने पूछा— ज्ञानियोंमें प्रमुख स्थान प्राप्त करनेवाले साधो ! वह प्रकृति कहाँसे प्रकट हुई है, उसका कैसा स्वरूप है, कैसे लक्षण हैं तथा क्यों वह पाँच प्रकारकी हो गयी ? उन समस्त देवियोंके चरित्र, उनके पूजाके विधान, उनके गुण और वे किसके यहाँ कैसे प्रकट हुईं—ये सभी प्रसङ्ग आप मुझे बतानेकी कृपा करें।

भगवान् नारायणने कहा— वत्स ! 'प्र' का अर्थ है 'प्रकृष्ट' और 'कृति' से सृष्टिके अर्थका बोध होता है, अतः सृष्टि करनेमें जो प्रकृष्ट (परम प्रवीण) है, उसे देवी 'प्रकृति' कहते हैं। सर्वोत्तम सत्त्वगुणके अर्थमें 'प्र' शब्द, मध्यम रजोगुणके अर्थमें 'कृ' शब्द और तमोगुणके अर्थमें 'ति' शब्द है। जो त्रिगुणात्मकस्वरूपा है, वही सर्वशक्तिसे सम्पन्न होकर सृष्टिविषयक कार्यमें प्रधान है, इसलिये 'प्रधान' या 'प्रकृति' कहलाती है। 'प्र' प्रथम अर्थमें और 'कृति' सृष्टि-अर्थमें है। अतः जो देवी सृष्टिकी आदिकारणरूपा है, उसे प्रकृति कहते हैं। सृष्टिके अवसरपर परब्रह्म परमात्मा स्वयं दो रूपोंमें प्रकट हुए—प्रकृति और पुरुष। उनका आधा दाहिना अङ्ग 'पुरुष' और आधा बायाँ अङ्ग 'प्रकृति' हुआ। वही प्रकृति ब्रह्मस्वरूपा, नित्या और सनातनी माया है। जैसे परमात्मा हैं, वैसी उनकी शक्तिस्वरूपा प्रकृति है अर्थात् परब्रह्म परमात्माके सभी अनुरूप गुण इन प्रकृतिमें निहित हैं, जैसे अग्निमें दाहिका शक्ति सदा रहती है। इसीसे परम योगी पुरुष स्त्री और पुरुषमें भेद नहीं मानते हैं। नारद ! वे सबको ब्रह्ममय देखते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण स्वेच्छामय, सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र परम पुरुष हैं। उनके मनमें सृष्टिकी इच्छा उत्पन्न होते ही सहसा 'मूल प्रकृति' परमेश्वरी प्रकट हो गयीं। तदनन्तर परमेश्वरकी आज्ञाके अनुसार सृष्टि-रचनाके लिये इनके पाँच रूप हो गये। भगवती प्रकृति भक्तोंके अनुरोधसे अथवा उनपर कृपा करनेके लिये विविध रूप धारण करती हैं।

जो गणेशकी माता 'भगवती दुर्गा' हैं, उन्हें 'शिवस्वरूपा' कहा जाता है। ये भगवान् शंकरकी प्रेयसी भार्या हैं। नारायणी, विष्णुमाया और पूर्ण ब्रह्मस्वरूपिणी नामसे ये प्रसिद्ध हैं। ब्रह्मादि देवता, मुनिगण तथा मनु प्रभृति—सभी इनकी पूजा करते हैं। ये सबकी अधिष्ठात्री देवी हैं, सनातन ब्रह्मस्वरूपा हैं। यश, मङ्गल, धर्म, श्री, सुख, मोक्ष और हर्ष प्रदान करना इनका स्वाभाविक गुण है। दुःख, शोक और उद्वेगको ये दूर कर देती हैं। शरणमें आये हुए दीनों एवं पीड़ितोंकी रक्षामें सदा संलग्न रहती हैं। ये तेजःस्वरूपा हैं। इनका विग्रह परम तेजस्वी है। इन्हें तेजकी अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। ये सर्वशक्तिस्वरूपा हैं और भगवान् शंकरको निरन्तर शक्तिशाली बनाये रखती हैं। सिद्धेश्वरी, सिद्धिरूपा, सिद्धिदा, सिद्धिदाताओंकी ईश्वरी, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, पिपासा, छाया, तन्द्रा, दया, स्मृति, जाति, क्षान्ति, शान्ति, कान्ति, भ्रान्ति, चेतना, तुष्टि, पुष्टि, लक्ष्मी, वृत्ति और माता—ये सब इनके नाम हैं। श्रीकृष्ण परब्रह्म परमात्मा हैं। उनके समीप सर्वशक्तिरूपसे ये विराजती हैं। श्रुतिमें इनके सुविख्यात गुणका अत्यन्त संक्षेपमें वर्णन किया गया है, जैसा कि आगमोंमें उपलब्ध होता है। ये अनन्ता हैं। अतएव इनमें गुण भी

१०६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अनन्त हैं। अब इनके दूसरे रूपका वर्णन करता हूँ, सुनो।

जो परम शुद्ध सत्त्वस्वरूपा हैं, उन्हें ‘भगवती लक्ष्मी’ कहा जाता है। परम प्रभु श्रीहरिकी वे शक्ति कहलाती हैं। अखिल जगत्की सारी सम्पत्तियाँ उनके स्वरूप हैं। उन्हें सम्पत्तिकी अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। वे परम सुन्दरी, अनुपम संयमरूपा, शान्तस्वरूपा, श्रेष्ठ स्वभावसे सम्पन्न तथा समस्त मङ्गलोंकी प्रतिमा हैं। लोभ, मोह, काम, क्रोध, मद और अहंकार आदि दुर्गुणोंसे वे सहज ही रहित हैं। भक्तोंपर अनुग्रह करना तथा अपने स्वामी श्रीहरिसे प्रेम करना उनका स्वभाव है। वे सबकी आदिकारणरूपा और पतिव्रता हैं। श्रीहरि प्राणके समान जानकर उनसे अत्यन्त प्रेम करते हैं। वे सदा प्रिय वचन ही बोलती हैं; कभी अप्रिय बात नहीं कहतीं; धान्य आदि सभी शस्य तथा सबके जीवन-रक्षाके उपाय उनके रूप हैं। प्राणियोंका जीवन स्थिर रहे—एतदर्थ उन्होंने यह रूप धारण कर रखा है। वे परम साध्वी देवी ‘महालक्ष्मी’ नामसे विख्यात होकर वैकुण्ठमें अपने स्वामीकी सेवामें सदा संलग्न रहती हैं। स्वर्गमें ‘स्वर्गलक्ष्मी’, राजाओंके यहाँ ‘राजलक्ष्मी’ तथा मर्त्यलोकवासी गृहस्थोंके घर ‘गृहलक्ष्मी’ के रूपमें वे विराजमान हैं। समस्त प्राणियों तथा द्रव्योंमें सर्वोत्कृष्ट शोभा उन्हींका स्वरूप है। वे परम मनोहर हैं। पुण्यात्माओंकी कीर्ति उन्हींकी प्रतिमा है। वे राजाओंकी प्रभा हैं। व्यापारियोंके यहाँ वे वाणिज्यरूपसे विराजती हैं। पापीजन जो कलह आदि अशिष्ट व्यवहार करते हैं, उनमें भी इन्हींकी शक्ति है। वे दयामयी हैं, भक्तोंकी माता हैं और उन भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये सदा व्याकुल रहती हैं। इस प्रकार दूसरी शक्ति (या प्रकृति)-का परिचय दिया गया। उनका वेदोंमें वर्णन है तथा सबने उनका सम्मान किया है। सब लोग उनकी आराधना और वन्दना करते हैं।

नारद! अब मैं अन्य प्रकृतिदेवीका परिचय देता हूँ, सुनो। परब्रह्म परमात्मासे सम्बन्ध रखनेवाली वाणी, बुद्धि, विद्या और ज्ञानकी जो अधिष्ठात्री देवी हैं, उन्हें ‘सरस्वती’ कहा जाता है। सम्पूर्ण विद्याएँ उन्हींके स्वरूप हैं। मनुष्योंको बुद्धि, कविता, मेधा, प्रतिभा और स्मरण-शक्ति उन्हींकी कृपासे प्राप्त होती हैं। अनेक प्रकारके सिद्धान्तभेदों और अर्थोंकी कल्पनाशक्ति वे ही देती हैं। वे व्याख्या और बोधस्वरूपा हैं। उनकी कृपासे समस्त संदेह नष्ट हो जाते हैं। उन्हें विचारकारिणी और ग्रन्थकारिणी कहा जाता है। वे शक्तिस्वरूपा हैं। सम्पूर्ण संगीतकी सन्धि और तालका कारण उन्हींका रूप है। प्रत्येक विश्वमें जीवोंके लिये विषय, ज्ञान और वाणीरूपा वे ही हैं। उनका एक हाथ व्याख्या (अथवा उपदेश)-की मुद्रामें सदा उठा रहता है। वे शान्तस्वरूपा हैं तथा हाथमें वीणा और पुस्तक लिये रहती हैं। उनका विग्रह शुद्धसत्त्वमय है। वे सदाचारपरायण तथा भगवान् श्रीहरिकी प्रिया हैं। हिम, चन्दन, कुन्द, चन्द्रमा, कुमुद और कमलके समान उनकी कान्ति है। वे रत्न (स्फटिकमणि)-की माला फेरती हुई भगवान् श्रीकृष्णके नामोंका जप करती हैं। उनकी मूर्ति तपोमयी है। तपस्वीजनोंको उनके तपका फल प्रदान करनेमें वे सदा तत्पर रहती हैं। सिद्धि-विद्या उनका स्वरूप है। वे सदा सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करती हैं। इस प्रकार तृतीया देवी (प्रकृति) श्रीजगदम्बा सरस्वतीका शास्त्रके अनुसार किञ्चित् वर्णन किया गया। अब चौथी प्रकृतिका परिचय सुनो।

नारद! वे चारों वेदोंकी माता हैं। छन्द और वेदाङ्ग भी उन्हींसे उत्पन्न हुए हैं। संध्या-वन्दनके मन्त्र और तन्त्रोंकी जननी भी वे ही हैं। द्विजातिवर्णोंके लिये उन्होंने अपना यह रूप धारण किया है। वे जगद्रूपा, तपस्विनी, ब्रह्मतेजसे

१४- अपनी चिन्मयी शक्तिद्वारा स्वर्गर्भसे उत्पन्न बालकको ब्रह्माण्ड-गोलकके अथाह जलमें छोड़ दिये जानेपर श्रीकृष्णका उसे संतानहीना हो जानेका शाप देना और उस (शक्ति) देवीकी जीभके अग्रभागसे सहसा वीणा-पुस्तकधारिणी एक मनोहर कन्याका प्रकट होना

प्रकृतिखण्ड १०७

सम्पन्र तथा सबका संस्कार करनेवाली हैं। उन पवित्र रूप धारण करनेवाली देवीको 'सावित्री' अथवा 'गायत्री' कहते हैं। वे ब्रह्माकी परम प्रिय शक्ति हैं। तीर्थ अपनी शुद्धिके लिये उनके स्पर्शकी कामना करते हैं। शुद्ध स्फटिकमणिके समान उनकी स्वच्छ कान्ति है। वे शुद्ध सत्त्वमय विग्रहसे शोभा पाती हैं। उनका रूप परम आनन्दमय है। उनका सर्वोत्कृष्ट रूप सदा बना रहता है। वे परब्रह्मस्वरूपा हैं। मोक्ष प्रदान करना उनका स्वाभाविक गुण है। वे ब्रह्मतेजसे सम्पन्न परमशक्ति हैं। उन्हें शक्तिकी अधिष्ठात्री माना जाता है। नारद! उनके चरणकी धूलि सम्पूर्ण जगत्को पवित्र कर देती है।

नारद! इन चौथी देवीका प्रसंग सुना चुका। अब तुम्हें पाँचवीं देवीका परिचय देता हूँ। ये प्रेम और प्राणोंकी अधिदेवी तथा पञ्चप्राणस्वरूपिणी हैं। परमात्मा श्रीकृष्णको प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। सम्पूर्ण देवियोंमें अग्रगण्य हैं, सबकी अपेक्षा इनमें सुन्दरता अधिक है। इनमें सभी सद्गुण सदा विद्यमान हैं। ये परम सौभाग्यवती और मानिनी हैं। इन्हें अनुपम गौरव प्राप्त है। परब्रह्मका वामार्द्धाङ्ग ही इनका स्वरूप है। ये ब्रह्मके समान ही गुण और तेजसे सम्पन्न हैं। इन्हें परावरा, सारभूता, परमाद्या, सनातनी, परमानन्दरूपा, धन्या, मान्या और पूज्या कहा जाता है। ये नित्यनिकुञ्जेश्वरी, रासक्रीड़ाकी अधिष्ठात्री देवी हैं। परमात्मा श्रीकृष्णके रासमण्डलमें इनका आविर्भाव हुआ है। इनके विराजनेसे रासमण्डलकी विचित्र शोभा होती है। गोलोकधाममें रहनेवाली ये देवी 'रासेश्वरी' एवं 'सुरसिका' नामसे प्रसिद्ध हैं। रासमण्डलमें पधारे रहना इन्हें बहुत प्रिय है। ये गोपीके वेषमें विराजती हैं। ये परम आह्लादस्वरूपिणी हैं। इनका विग्रह संतोष और हर्षसे परिपूर्ण है। ये निर्गुणा (लौकिक त्रिगुणोंसे रहित स्वरूपभूत गुणवती), निर्लिप्ता (लौकिक विषयभोगसे रहित), निराकारा (पाञ्चभौतिक शरीरसे रहित दिव्यचिन्मयस्वरूपा), आत्मस्वरूपिणी (श्रीकृष्णकी आत्मा) नामसे विख्यात हैं। इच्छा और अहंकारसे ये रहित हैं। भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही इन्होंने अवतार धारण कर रखा है। वेदोक्त विधिके अनुसार ध्यान करनेसे विद्वान् पुरुष इनके रहस्यको समझ पाते हैं। सुरेन्द्र एवं मुनीन्द्र प्रभृति समस्त प्रधान देवता अपने चर्मचक्षुओंसे इन्हें देखनेमें असमर्थ हैं। ये अग्निशुद्ध नीले रंगके दिव्य वस्त्र धारण करती हैं। अनेक प्रकारके दिव्य आभूषण इन्हें सुशोभित किये रहते हैं। इनकी कान्ति करोड़ों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशमान है। इनका सर्वशोभासम्पन्न श्रीविग्रह सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न है। भगवान् श्रीकृष्णके भक्तोंको दास्य-रति प्रदान करनेवाली एकमात्र ये ही हैं; क्योंकि सम्पूर्ण सम्पत्तियोंमें ये इस दास्य-सम्पत्तिको ही परम श्रेष्ठ मानती हैं। श्रीवृषभानुके घर पुत्रीके रूपसे ये पधारी हैं। इनके चरणकमलका संस्पर्श प्राप्तकर पृथ्वी परम पवित्र हो गयी है। मुने! जिन्हें ब्रह्मा आदि देवता नहीं देख सके, वही ये देवी भारतवर्षमें सबके दृष्टिगोचर हो रही हैं। ये स्त्री-रत्नोंमें साररूपा हैं। भगवान् श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर इस प्रकार विराजती हैं, जैसे आकाशस्थित नवीन नील मेघोंमें बिजली चमक रही हो। इन्हें पानेके लिये ब्रह्माने साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की है। उनकी तपस्याका उद्देश्य यही था कि इनके चरणकमलके नखके दर्शन सुलभ हो जायँ, जिससे मैं परम पवित्र बन जाऊँ; परंतु स्वप्नमें भी वे इन भगवतीके दर्शन प्राप्त न कर सके; फिर प्रत्यक्षकी तो बात ही क्या है। उसी तपके प्रभावसे ये देवी वृन्दावनमें प्रकट हुई हैं—धराधामपर इनका पधारना हुआ है, जहाँ ब्रह्माजीको भी इनका दर्शन प्राप्त हो सका। ये ही पाँचवीं देवी 'भगवती राधा' के नामसे प्रसिद्ध हैं।

इन प्रकृतिदेवीके अंश, कला, कलांश और

१६- श्रीराधाके रोमकूपोंसे बहुत-सी गोप-कन्याओंका प्राकट्य

१०८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कलांशांशभेदसे अनेक रूप हैं। प्रत्येक विश्वमें सम्पूर्ण स्त्रियाँ इन्हींकी रूप मानी जाती हैं। ये पाँच देवियाँ परिपूर्णतम कही गयी हैं। इन देवियोंके जो-जो प्रधान अंश हैं, अब उनका वर्णन करता हूँ, सुनो। भूमण्डलको पवित्र करनेवाली गङ्गा इनका प्रधान अंश हैं। ये सनातनी 'गङ्गा' जलमयी हैं। भगवान् विष्णुके विग्रहसे इनका प्रादुर्भाव हुआ है। पापियोंके पापमय ईंधनको भस्म करनेके लिये ये प्रज्वलित अग्नि हैं। इन्हें स्पर्श करने, इनमें नहाने अथवा इनका जलपान करनेसे पुरुष कैवल्य-पदके अधिकारी हो जाते हैं। गोलोक-धाममें जानेके लिये ये सुखप्रद सीढ़ीके रूपमें विराजमान हैं। इनका रूप परम पवित्र है। समस्त तीर्थों और नदियोंमें ये श्रेष्ठ मानी जाती हैं। ये भगवान् शंकरके मस्तकपर जटामें ठहरी थीं। वहाँसे निकलीं और पङ्क्तिबद्ध होकर भारतवर्षमें आ गयीं। तपस्वीजन अपनी तपस्यामें सफलता प्राप्त कर सकें—एतदर्थ शीघ्र ही इनका पधारना हो गया। इनका शुद्ध एवं सत्त्वमय स्वरूप चन्द्रमा, श्वेतकमल या दूधके समान स्वच्छ है। मल और अहंकार इनमें लेशमात्र भी नहीं है। ये परम साध्वी गङ्गा भगवान् नारायणको बहुत प्रिय हैं।

श्री 'तुलसी' को प्रकृतिदेवीका प्रधान अंश माना जाता है। ये विष्णुप्रिया हैं। विष्णुको विभूषित किये रहना इनका स्वाभाविक गुण है। भगवान् विष्णुके चरणमें ये सदा विराजमान रहती हैं। मुने! तपस्या, संकल्प और पूजा आदि सभी शुभकर्म इन्हींसे शीघ्र सम्पन्न होते हैं। पुष्पोंमें ये मुख्य मानी जाती हैं। ये परम पवित्र एवं सदा पुण्यप्रदा हैं। अपने दर्शन और स्पर्शमात्रसे ये तुरंत मनुष्योंको परमधामके अधिकारी बना देती हैं। पापमयी सूखी लकड़ीको जलानेके लिये प्रज्वलित अग्निके समान रूप धारण करके ये कलिमें पधारी हैं। इन देवी तुलसीके चरणकमलका स्पर्श होते ही पृथ्वी परम पावन बन गयी। तीर्थ स्वयं पवित्र होनेके लिये इनका दर्शन एवं स्पर्श करना चाहते हैं। इनके अभावमें अखिल जगत्के सम्पूर्ण कर्म निष्फल समझे जाते हैं। इनकी कृपासे मुमुक्षुजन मुक्त हो जाते हैं। जो जिस कामनासे इनकी उपासना करते हैं, उनकी वे सारी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। भारतवर्षमें वृक्षरूपसे पधारनेवाली ये देवी कल्पवृक्षस्वरूपा हैं। भारतवासियोंका त्राण (उद्धार एवं रक्षा) करनेके लिये इनका यहाँ पधारना हुआ है। ये पूजनीयोंमें परम देवता हैं।

प्रकृतिदेवीके एक अन्य प्रधान अंशका नाम देवी 'जरत्कारु' है। ये कश्यपजीकी मानसपुत्री हैं; अतः 'मनसा' देवी कहलाती हैं। इन्हें भगवान् शंकरकी प्रिय शिष्या होनेका सौभाग्य प्राप्त है। ये परम विदुषी हैं। नागराज शेषकी बहिन हैं। सभी नाग इनका सम्मान करते हैं। नागकी सवारीपर चलनेवाली इन अनुपम सुन्दरी देवीको 'नागेश्वरी' और 'नागमाता' भी कहा जाता है। प्रधान-प्रधान नाग इनके साथ विराजमान रहते हैं। ये नागोंसे सुशोभित रहती हैं। नागराज इनकी स्तुति करते हैं। ये सिद्धयोगिनी हैं और नागलोकमें निवास करती हैं। ये विष्णुस्वरूपिणी हैं। भगवान् विष्णुमें इनकी अटल श्रद्धा-भक्ति है। ये सदा श्रीहरिकी पूजामें संलग्न रहती हैं। इनका विग्रह तपोमय है। तपस्वीजनोंको फल प्रदान करनेमें ये परम कुशल हैं। ये स्वयं भी तपस्या करती हैं। इन्होंने देवताओंके वर्षसे तीन लाख वर्षतक भगवान् श्रीहरिकी प्रसन्नताके लिये तपस्या की है। भारतवर्षमें जितने तपस्वी और तपस्विनियाँ हैं, उन सबमें ये पूज्य एवं श्रेष्ठ हैं। सर्प-सम्बन्धी मन्त्रोंकी ये अधिष्ठात्री देवी हैं। ब्रह्मतेजसे इनका विग्रह सदा प्रकाशमान रहता है। इनको 'परब्रह्मस्वरूपा' कहते हैं। ये ब्रह्मके चिन्तनमें सदा संलग्न रहती हैं। जरत्कारुमुनि भगवान् श्रीकृष्णके अंश हैं। उन्हींकी ये पतिव्रता

३- परिपूर्णतम श्रीकृष्ण और चिन्मयी श्रीराधासे प्रकट विराट्स्वरूप बालकका वर्णन

प्रकृतिखण्ड १०९

पत्नी हैं। मुनिवर आस्तीक, जो तपस्वियोंमें श्रेष्ठ गिने जाते हैं, ये देवी उनकी माता हैं।

नारद! प्रकृतिदेवीके एक प्रधान अंशको 'देवसेना' कहते हैं। मातृकाओंमें ये परम श्रेष्ठ मानी जाती हैं। इन्हें लोग भगवती 'षष्ठी' के नामसे कहते हैं। प्रत्येक लोकमें शिशुओंका पालन एवं संरक्षण करना इनका प्रधान कार्य है। ये तपस्विनी, विष्णुभक्ता तथा कार्तिकेयजीकी पत्नी हैं। ये साध्वी भगवती प्रकृतिका छठा अंश हैं। अतएव इन्हें 'षष्ठी' देवी कहा जाता है। संतानोत्पत्तिके अवसरपर अभ्युदयके लिये इन षष्ठी योगिनीकी पूजा होती है। अखिल जगत्‌में बारहों महीने लोग इनकी निरन्तर पूजा करते हैं। पुत्र उत्पन्न होनेपर छठे दिन सूतिकागृहमें इनकी पूजा हुआ करती है—यह प्राचीन नियम है। कल्याण चाहनेवाले कुछ व्यक्ति इक्कीसवें दिन इनकी पूजा करते हैं। इनकी मातृका संज्ञा है। ये दयास्वरूपिणी हैं। निरन्तर रक्षा करनेमें तत्पर रहती हैं। जल, थल, आकाश, गृह—जहाँ कहीं भी बच्चोंको सुरक्षित रखना इनका प्रधान उद्देश्य है।

प्रकृतिदेवीका एक प्रधान अंश 'मङ्गलचण्डी' के नामसे विख्यात है। ये मङ्गलचण्डी प्रकृतिदेवीके मुखसे प्रकट हुई हैं। इनकी कृपासे समस्त मङ्गल सुलभ हो जाते हैं। सृष्टिके समय इनका विग्रह मङ्गलमय रहता है। संहारके अवसरपर ये क्रोधमयी बन जाती हैं। इसीलिये इन देवीको पण्डितजन 'मङ्गलचण्डी' कहते हैं। प्रत्येक मङ्गलवारको विश्वभरमें इनकी पूजा होती है। इनके अनुग्रहसे साधक पुरुष पुत्र, पौत्र, धन, सम्पत्ति, यश और कल्याण प्राप्त कर लेते हैं। प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण स्त्रियोंके समस्त मनोरथ पूर्ण कर देना इनका स्वभाव ही है। ये भगवती महेश्वरी कुपित होनेपर क्षणमात्रमें विश्वको नष्ट कर सकती हैं।

देवी 'काली' को प्रकृतिदेवीका प्रधान अंश मानते हैं। इन देवीके नेत्र ऐसे हैं, मानो कमल हों। संग्राममें जब भगवती दुर्गाके सामने प्रबल राक्षस-बन्धु शुम्भ और निशुम्भ डटे थे, उस समय ये काली भगवती दुर्गाके ललाटसे प्रकट हुई थीं। इन्हें दुर्गाका आधा अंश माना जाता है। गुण और तेजमें ये दुर्गाके समान ही हैं। इनका परम पुष्ट विग्रह करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान है। सम्पूर्ण शक्तियोंमें ये प्रमुख हैं। इनसे बढ़कर बलवान् कोई है ही नहीं। ये परम योगस्वरूपिणी देवी सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करती हैं। श्रीकृष्णके प्रति इनमें अटूट श्रद्धा है। तेज, पराक्रम और गुणमें ये श्रीकृष्णके समान ही हैं। इनका सारा समय भगवान् श्रीकृष्णके चिन्तनमें ही व्यतीत होता है। इन सनातनी देवीके शरीरका रंग भी कृष्ण ही है। ये चाहें तो एक श्वासमें समस्त ब्रह्माण्डको नष्ट कर सकती हैं। अपने मनोरञ्जनके लिये अथवा जगत्‌को शिक्षा देनेके विचारसे ही ये संग्राममें दैत्योंके साथ युद्ध करती हैं। सुपूजित होनेपर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—सब कुछ देनेमें ये पूर्ण समर्थ हैं। ब्रह्मादि देवता, मुनिगण, मनु प्रभृति और मानवसमाज सब-के-सब इनकी उपासना करते हैं।

भगवती 'वसुन्धरा' भी प्रकृतिदेवीके प्रधान अंशसे प्रकट हैं। अखिल जगत् इन्हींपर ठहरा है। ये सर्व-शस्य-प्रसूतिका (सम्पूर्ण खेतीको उत्पन्न करनेवाली) कही जाती हैं। इन्हें लोग 'रत्नाकरा' और 'रत्नगर्भा' भी कहते हैं। सम्पूर्ण रत्नोंकी खान इन्हींके अंदर विराजमान है। राजा और प्रजा—सभी लोग इनकी पूजा एवं स्तुति करते हैं। सबको जीविका प्रदान करनेके लिये ही इन्होंने यह रूप धारण कर रखा है। ये सम्पूर्ण सम्पत्तिका विधान करती हैं। ये न रहें तो सारा चराचर जगत् कहीं भी ठहर नहीं सकता।

मुनिवर! प्रकृतिदेवीकी जो-जो कलाएँ हैं, उन्हें सुनो और ये जिन-जिनकी पत्नियाँ हैं, वह सब भी मैं तुम्हें बताता हूँ। देवी 'स्वाहा' अग्निकी

११० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

पत्नी हैं। सम्पूर्ण जगत्में इनकी पूजा होती है। इनके बिना देवता अर्पित की हुई हवि पानेमें असमर्थ हैं। यज्ञकी पत्नीको 'दक्षिणा' कहते हैं। इनका सर्वत्र सम्मान होता है। इनके न रहनेपर विश्वभरके सम्पूर्ण कर्म निष्फल समझे जाते हैं। 'स्वधा' पितरोंकी पत्नी हैं। मुनि, मनु और मानव—सभी इनकी पूजा करते हैं। इनका उच्चारण न करके पितरोंको वस्तु अर्पण की जाय तो वह निष्फल हो जाती है। वायुकी पत्नीका नाम देवी 'स्वस्ति' है। प्रत्येक विश्वमें इनका सत्कार होता है। इनके बिना आदान-प्रदान सभी निष्फल हो जाते हैं। 'पुष्टि' गणेशकी पत्नी हैं। धरातलपर सभी इनको पूजते हैं। इनके बिना पुरुष और स्त्री—सभी क्षीणशक्ति-हीन हो जाते हैं। अनन्तकी पत्नीका नाम 'तुष्टि' है। सब लोग इनकी पूजा एवं वन्दना करते हैं। इनके बिना सम्पूर्ण संसार सम्यक् प्रकारसे कभी संतुष्ट हो ही नहीं सकता। ईशानकी पत्नीका नाम 'सम्पत्ति' है। देवता और मनुष्य—सभी इनका सम्मान करते हैं। इनके न रहनेपर विश्वभरकी जनता दरिद्र कहलाती है। 'धृति' कपिलमुनिकी पत्नी हैं। सब लोग सर्वत्र इनका स्वागत करते हैं। ये न रहें तो जगत्में सम्पूर्ण प्राणी धैर्यसे हाथ धो बैठें। 'क्षमा' यमकी पत्नी हैं; ये साध्वी और सुशीला हैं, सभी इनका सम्मान करते हैं; ये न हों तो सब लोग रुष्ट एवं उन्मत्त हो जायँ। सती-साध्वी 'रति' कामदेवकी पत्नी हैं, ये क्रीड़ाकी अधिष्ठात्री देवी हैं। ये न रहें तो जगत्के सब प्राणी केलि-कौतुकसे शून्य हो जायँ। सती 'मुक्ति' को सत्यकी भार्या कहा गया है। सबसे आदर पानेवाली ये देवी परम लोकप्रिय हैं। इनके बिना जगत् सर्वथा बन्धुता-शून्य हो जाता है। परम साध्वी 'दया' मोहकी पत्नी हैं। ये पूज्य एवं जगत्प्रिय हैं। इनके अभावमें सम्पूर्ण प्राणी सर्वत्र निष्ठुर माने जाते हैं। पुण्यकी सहधर्मिणी 'प्रतिष्ठा' हैं। ये पुण्यरूपा देवी सदा सुपूजित होती हैं। मुने! इनके बिना सारा संसार जीते हुए ही मृतकके समान समझा जाता है। सुकर्मकी पत्नी 'कीर्ति' हैं, जो धन्या और माननीया हैं। सबके द्वारा इनका सम्मान होता है। इनके अभावमें अखिल जगत् यशोहीन होकर मृतकके समान हो जाता है। 'क्रिया' उद्योगकी पत्नी हैं। इन आदरणीया देवीसे सब लोग सहमत हैं। नारद! इनके बिना सारा संसार उच्छिन्न-सा हो जाता है। अधर्मकी पत्नीको 'मिथ्या' कहते हैं। सभी धूर्त इनका सत्कार करते हैं। सत्ययुगमें ये बिलकुल अदृश्य थीं। त्रेतायुगमें सूक्ष्म रूप धारण करके प्रकट हो गयीं। द्वापरमें अपने आधे शरीरसे शोभा पाने लगीं और कलियुगमें तो इन 'मिथ्या' देवीका शरीर पूरा हृष्ट-पुष्ट हो गया है। सब जगह इनकी पहुँच होनेके कारण ये बड़ी प्रगल्भता (धृष्टता)-के साथ सर्वत्र अपना आधिपत्य जमाये रहती हैं। इनके भाईका नाम 'कपट' है। उसके साथ ये प्रत्येक घरमें चक्कर लगाती हैं। 'शान्ति' और 'लज्जा'—ये सुशीलकी दो आदरणीया पत्नियाँ हैं। नारद! इनके न रहनेपर सारा जगत् उन्मत्तकी भाँति जीवन व्यतीत करने लगता है। ज्ञानकी तीन पत्नियाँ हैं—'बुद्धि', 'मेधा' और 'स्मृति'। ये साथ छोड़ दें तो समस्त संसार मूर्ख और मरेके समान हो जाय।

धर्मकी सहधर्मिणीका नाम 'मूर्ति' है। कमनीय कान्तिवाली ये देवी सबके मनको मुग्ध किये रहती हैं। इनका सहयोग न मिले तो परमात्मा निराकार ही रह जायँ और सम्पूर्ण विश्व भी निराधार हो जाय। इनके स्वरूपको अपनाकर ही साध्वी लक्ष्मी सर्वत्र शोभा पाती हैं। 'श्री' और 'मूर्ति'—दोनों इनके स्वरूप हैं। ये परम मान्य, धन्य एवं सुपूज्य हैं। 'कालाग्नि' रुद्रकी पत्नीका नाम है। इनको 'योगनिद्रा' भी कहते हैं। रात्रिमें इनका सहयोग पाकर सम्पूर्ण प्राणी

१८- विराट्मय बालकका श्रीकृष्णसे उनके चरणकमलोंमें अविचल भक्तिकी वर-याचना

प्रकृतिखण्ड १११ आच्छन्न अर्थात् नींदसे व्याप्त हो जाते हैं। कालकी तीन भार्याएँ हैं- 'संध्या', 'रात्रि' और 'दिन'। ये न रहें तो ब्रह्मा भी काल-संख्याका परिगणन नहीं कर सकते। 'क्षुधा' और 'पिपासा'- ये दो लोभकी भार्याएँ हैं। ये परम धन्य, मान्य और आदरकी पात्र हैं। इन्होंने सम्पूर्ण जगत्‌पर अपना प्रभाव जमा रखा है। इन्हींके कारण जगत् क्षोभयुक्त तथा चिन्तातुर होता है। 'प्रभा' और 'दाहिका'-ये तेजकी दो स्त्रियाँ हैं। इनके अभावमें जगत्स्रष्टा ब्रह्मा अपना कार्य-सम्पादन करनेमें असमर्थ हैं। ज्वरकी दो प्यारी भार्याएँ हैं-'जरा' और 'मृत्यु'। ये दोनों कालकी पुत्रियाँ हैं। इनकी सत्ता न रहे तो ब्रह्माके बनाये हुए जगत्‌की व्यवस्था ही बिगड़ जाय। निद्राकी कन्याका नाम 'तन्द्रा' है। यह और 'प्रीति'-ये दो सुखकी प्रियाएँ हैं। ब्रह्मपुत्र नारद ! विधिके विधानमें बना रहनेवाला यह सारा जगत् इनसे व्याप्त है। 'श्रद्धा' और 'भक्ति'-ये वैराग्यकी दो परम आदरणीय पत्नियाँ हैं। मुने! इनके कृपा- प्रसादसे अखिल जगत् सदा जीवन्मुक्त हो सकता है। देवमाता 'अदिति', गौओंको उत्पन्न करनेवाली 'सुरभि', दैत्योंकी माता 'दिति', 'कद्रू', 'विनता' और 'दनु' - ये सभी देवियाँ सृष्टिका कार्य सँभालती हैं। इन्हें भगवती प्रकृतिकी 'कला' कहा जाता है। अन्य भी बहुत-सी कलाएँ हैं। कुछ कलाओंका परिचय कराता हूँ, सुनो। चन्द्रमाकी पत्नी 'रोहिणी' और सूर्यकी 'संज्ञा' हैं। मनुकी भार्याका नाम 'शतरूपा' है। 'शची' इन्द्रकी धर्मपत्नी हैं। बृहस्पतिकी सहधर्मिणी 'तारा' हैं। 'अरुन्धती' वसिष्ठमुनिकी धर्मपत्नी हैं। 'अहल्या' गौतमकी, 'अनसूया' अत्रिकी, 'देवहूति' कर्दममुनिकी और 'प्रसूति' दक्षकी पत्नियाँ हैं। पितरोंकी मानसी कन्या 'मेनका' पार्वतीकी जननी हैं। 'लोपामुद्रा', 'आहूति', कुबेरकी पत्नी, वरुणकी पत्नी, यमकी पत्नी, 'बलिकी भार्या विन्ध्यावली', 'कुन्ती', 'दमयन्ती', 'यशोदा', 'सती देवकी', 'गान्धारी', 'द्रौपदी', 'शैव्या', 'सत्यवान्‌की पत्नी सावित्री', 'राधाकी जननी वृषभानुप्रिया कलावती', 'मन्दोदरी', 'कौसल्या', 'सुभद्रा', 'कैकेयी', 'रेवती', 'सत्यभामा', 'कालिन्दी', 'लक्ष्मणा', 'जाम्बवती', 'नाग्नजिती', 'मित्रविन्दा', 'रुक्मिणी', 'सीता'-जो स्वयं लक्ष्मी कहलाती हैं। 'व्यासको जन्म देनेवाली महासती योजनगन्धा', 'काली', 'बाणपुत्री उषा' उसकी सखी 'चित्रलेखा', 'प्रभावती', 'भानुमती', 'सती मायावती', 'परशुरामजीकी माता रेणुका', 'हलधर बलरामकी जननी रोहिणी' और 'श्रीकृष्णकी परम साध्वी बहिन दुर्गास्वरूपा एकानंशा' आदि भारतवर्षमें भगवती प्रकृतिकी बहुत-सी कलाएँ विख्यात हैं। जो-जो ग्राम- देवियाँ हैं, वे सभी प्रकृतिकी कलाएँ हैं। प्रत्येक लोकमें जितनी स्त्रियाँ हैं, उन सबको प्रकृतिकी कलाके अंशका अंश समझना चाहिये। इसीलिये स्त्रियोंके अपमानसे प्रकृतिका अपमान माना जाता है। जो पति और पुत्रवाली साध्वी ब्राह्मणीकी वस्त्र, अलंकार और चन्दनसे पूजा करता है, उसके द्वारा भगवती प्रकृतिकी पूजा सम्पन्न होती है। जिसने ब्राह्मणकी अष्टवर्षा कुमारीका वस्त्र, अलंकार एवं चन्दन आदिसे अर्चन कर लिया, उसके द्वारा भगवती प्रकृति स्वयं पूजित हो गयीं। उत्तम, मध्यम और अधम-सभी स्त्रियाँ भगवती प्रकृतिके अंशसे उत्पन्न हैं। जो श्रेष्ठ आचरणवाली तथा पतिव्रता स्त्रियाँ हैं, इन्हें प्रकृतिदेवीका सत्त्वांश समझना चाहिये। इनको 'उत्तम' माना जाता है। जिन्हें भोग ही प्रिय है, वे राजस अंशसे प्रकट स्त्रियाँ 'मध्यम' श्रेणीकी कही गयी हैं। वे सुख-भोगमें आसक्त होकर सदा अपने कार्यमें लगी रहती हैं। प्रकृतिदेवीके तामस अंशसे उत्पन्न स्त्रियाँ 'अधम' कहलाती हैं। उनके कुलका कुछ पता नहीं रहता। वे मुखसे दुर्वचन बोलनेवाली, कुलटा, धूर्त,

११२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण स्वेच्छाचारिणी और कलहप्रिया होती हैं। भूमण्डलकी कुलटाएँ, स्वर्गकी अप्सराएँ तथा व्यभिचारिणी स्त्रियाँ प्रकृतिका तामस अंश कही गयी हैं। नारद ! इस प्रकार प्रकृतिके सम्पूर्ण रूपका वर्णन कर दिया। वे सभी देवियाँ पृथ्वीपर पुण्यक्षेत्र भारतमें पूजित हुई हैं। दुर्गा दुर्गतिका नाश करती हैं। राजा सुरथने सर्वप्रथम इनकी उपासना की है। इसके पश्चात् रावणका वध करनेकी इच्छासे भगवान् श्रीरामने देवीकी पूजा की है। तत्पश्चात् भगवती जगदम्बा तीनों लोकोंमें सुपूजित हो गयीं। पहले दैत्यों और दानवोंका वध करनेके लिये ये दक्षके यहाँ प्रकट हुई थीं। परंतु कुछ कालके पश्चात् पिताके यज्ञमें स्वामीका अपमान देखकर इन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। फिर ये हिमालयकी पत्नीके उदरसे उत्पन्न हुईं। उस समय इन्होंने भगवान् शंकरको पतिरूपमें प्राप्त किया। गणेश और स्कन्द - इनके दो पुत्र हुए। गणेशको स्वयं श्रीकृष्ण माना जाता है। स्कन्द विष्णुकी कलासे उत्पन्न हुए हैं। नारद ! इसके बाद राजा मङ्गलने सर्वप्रथम लक्ष्मीकी आराधना की है। तत्पश्चात् तीनों लोकोंमें देवता, मुनि और मानव इनकी पूजा करने लगे। राजा अश्वपतिने सबसे पहले सावित्रीकी उपासना की; फिर प्रधान देवता और श्रेष्ठ मुनि भी इनके उपासक बन गये। सबसे पहले ब्रह्माने सरस्वतीका सम्मान किया। इसके बाद ये देवी तीनों लोकोंमें देवताओं और मुनियोंकी पूजनीया हो गयीं। सर्वप्रथम गोलोकमें रासमण्डलके भीतर परमात्मा श्रीकृष्णने भगवती राधाकी पूजा की है। गोपों, गोपियों, गोपकुमारों और कुमारियोंके साथ सुशोभित होकर श्रीकृष्णने राधाका पूजन किया था। उस समय कार्तिकी पूर्णिमाकी चाँदनी रात थी। गौओंका समुदाय भी इस उत्सवमें सम्मिलित था। फिर भगवान्‌की आज्ञा पाकर ब्रह्मा प्रभृति देवता तथा मुनिगण बड़े हर्षके साथ भक्तिपूर्वक पुष्प एवं धूप आदि सामग्रियोंसे निरन्तर इनकी पूजा- वन्दना करने लगे। इस भूमण्डलमें पहले राधादेवीकी पूजा राजा सुयज्ञने की है। ये नरेश पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें थे। भगवान् शंकरके उपदेशके अनुसार इन्होंने देवीकी उपासना की थी। फिर भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर त्रिलोकीमें मुनिगण पुष्प एवं धूप आदि उपचारोंसे भक्ति प्रदर्शित करते हुए इनकी पूजामें सदा तत्पर रहने लगे। जो-जो कलाएँ प्रकट हुई हैं, उन सबकी भारतवर्षमें पूजा होती है। मुने ! तभीसे प्रत्येक ग्राम और नगरमें ग्रामदेवियोंकी पूजा होती है। नारद ! इस प्रकार आगमोंके अनुसार भगवती प्रकृतिका सम्पूर्ण शुभ चरित्र मैंने तुम्हें सुना दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय १) परब्रह्म श्रीकृष्ण और श्रीराधासे प्रकट चिन्मय देवी और देवताओंके चरित्र नारदजीने कहा-प्रभो ! देवियोंके सम्पूर्ण चरित्रको मैंने संक्षेपसे सुन लिया। अब सम्यक् प्रकारसे बोध होनेके लिये आप पुनः विस्तारपूर्वक उसका वर्णन कीजिये। सृष्टिके अवसरपर भगवती आद्यादेवी कैसे प्रकट हुईं? वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन् ! देवीके पञ्चविध होनेमें क्या कारण है ? यह रहस्य बतानेकी कृपा करें। देवीकी त्रिगुणमयी कलासे संसारमें जो-जो देवियाँ प्रकट हुईं, उनका चरित्र मैं विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। सर्वज्ञ प्रभो ! उन देवियोंके प्राकट्यका प्रसङ्ग, पूजा एवं ध्यानकी विधि, स्तोत्र, कवच, ऐश्वर्य तथा मङ्गलमय शौर्य - इन सबका वर्णन कीजिये। भगवान् नारायण बोले- नारद ! आत्मा, आकाश, काल, दिशा, गोकुल तथा गोलोकधाम-

४- सरस्वतीकी पूजाका विधान तथा कवच

प्रकृतिखण्ड ११३

ये सभी नित्य हैं। कभी इनका अन्त नहीं होता। गोलोकधामका एक भाग जो उससे नीचे है, वैकुण्ठधाम है। वह भी नित्य है। ऐसे ही प्रकृतिको भी नित्य माना जाता है। यह परब्रह्ममें लीन रहनेवाली उनकी सनातनी शक्ति है। जिस प्रकार अग्निमें दाहिका शक्ति, चन्द्रमा एवं कमलमें शोभा तथा सूर्यमें प्रभा सदा वर्तमान रहती है, वैसे ही यह प्रकृति परमात्मामें नित्य विराजमान है। जैसे स्वर्णकार सुवर्णके अभावमें कुण्डल नहीं तैयार कर सकता तथा कुम्हार मिट्टीके बिना घड़ा बनानेमें असमर्थ है, ठीक उसी प्रकार परमात्माको यदि प्रकृतिका सहयोग न मिले तो वे सृष्टि नहीं कर सकते। जिसके सहारे श्रीहरि सदा शक्तिमान् बने रहते हैं, वह प्रकृतिदेवी ही शक्तिस्वरूपा हैं। 'शक्'का अर्थ है 'ऐश्वर्य' तथा 'ति' का अर्थ है 'पराक्रम'; ये दोनों जिसके स्वरूप हैं तथा जो इन दोनों गुणोंको देनेवाली है, वह देवी 'शक्ति' कही गयी है। 'भग' शब्द समृद्धि, बुद्धि, सम्पत्ति तथा यशका वाचक है, उससे सम्पन्न होनेके कारण शक्तिको 'भगवती' कहते हैं; क्योंकि वह सदा भगस्वरूपा हैं। परमात्मा सदा इस भगवती प्रकृतिके साथ विराजमान रहते हैं, अतएव 'भगवान्' कहलाते हैं। वे स्वतन्त्र प्रभु साकार और निराकार भी हैं। उनका निराकार रूप तेजःपुञ्जमय है। योगीजन सदा उसीका ध्यान करते और उसे परब्रह्म परमात्मा एवं ईश्वरकी संज्ञा देते हैं। उनका कहना है कि परमात्मा अदृश्य होकर भी सबका द्रष्टा है। वह सर्वज्ञ, सबका कारण, सब कुछ देनेवाला, समस्त रूपोंका अन्त करनेवाला, रूपरहित तथा सबका पोषक है। परंतु जो भगवान्के सूक्ष्मदर्शी भक्त वैष्णवजन हैं, वे ऐसा नहीं मानते हैं। वे पूछते हैं—यदि कोई तेजस्वी पुरुष—साकार पुरुषोत्तम नहीं है तो वह तेज किसका है? योगी जिस तेजोमण्डलका ध्यान करते हैं, उसके भीतर अन्तर्यामी तेजस्वी परमात्मा परमपुरुष विद्यमान हैं। वे स्वेच्छामयरूपधारी, सर्वस्वरूप तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं। वे प्रभु जिस रूपको धारण करते हैं, वह अत्यन्त सुन्दर, रमणीय तथा परम मनोहर है। इन भगवान्की किशोर अवस्था है, ये शान्त-स्वभाव हैं। इनके सभी अङ्ग परम सुन्दर हैं। इनसे बढ़कर जगत्में दूसरा कोई नहीं है। इनका श्याम विग्रह नवीन मेघकी कान्तिका परम धाम है। इनके विशाल नेत्र शरत्कालके मध्याह्नमें खिले हुए कमलोंकी शोभाको छीन रहे हैं। मोतियोंकी शोभाको तुच्छ करनेवाली इनकी सुन्दर दन्तपंक्ति है। मुकुटमें मोरकी पाँख सुशोभित है। मालतीकी मालासे ये अनुपम शोभा पा रहे हैं। इनकी सुन्दर नासिका है। मुखपर मुस्कान छायी है। ये परम मनोहर प्रभु भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल रहते हैं। प्रज्वलित अग्निके समान विशुद्ध पीताम्बरसे इनका विग्रह परम मनोहर हो गया है। इनकी दो भुजाएँ हैं। हाथमें बाँसुरी सुशोभित है। ये रत्नमय भूषणोंसे भूषित, सबके आश्रय, सबके स्वामी, सम्पूर्ण शक्तियोंसे युक्त एवं सर्वव्यापी पूर्ण पुरुष हैं। समस्त ऐश्वर्य प्रदान करना इनका स्वभाव ही है। ये परम स्वतन्त्र एवं सम्पूर्ण मङ्गलके भण्डार हैं। इन्हें 'सिद्ध', 'सिद्धेश', 'सिद्धिकारक' तथा 'परिपूर्णतम ब्रह्म' कहा जाता है। इन देवाधिदेव सनातन प्रभुका वैष्णव पुरुष निरन्तर ध्यान करते हैं। इनकी कृपासे जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, शोक और भय सब नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्माकी आयु इनके एक निमेषकी तुलनामें है। वे ही ये आत्मा परब्रह्म श्रीकृष्ण कहलाते हैं।

'कृष्' का अर्थ है भगवान्की भक्ति और 'न' का अर्थ है, उनका 'दास्य'। अतः जो अपनी भक्ति और दास्यभाव देनेवाले हैं, वे 'कृष्ण' कहलाते हैं। 'कृष्' सर्वार्थवाचक है, 'न' से बीज अर्थकी उपलब्धि होती है। अतः सर्वबीजस्वरूप

११४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

परब्रह्म परमात्मा 'कृष्ण' कहे गये हैं।

नारद! अतीत कालकी बात है, असंख्य ब्रह्माओंका पतन होनेके पश्चात् भी जिनके गुणोंका नाश नहीं होता है तथा गुणोंमें जिनकी समानता करनेवाला दूसरा नहीं है; वे भगवान् श्रीकृष्ण सृष्टिके आदिमें अकेले ही थे। उस समय उनके मनमें सृष्टिविषयक संकल्पका उदय हुआ। अपने अंशभूत कालसे प्रेरित होकर ही वे प्रभु सृष्टिकर्मके लिये उन्मुख हुए थे। उनका स्वरूप स्वेच्छामय है। वे अपनी इच्छासे ही दो रूपोंमें प्रकट हो गये। उनका वामांश स्त्रीरूपमें आविर्भूत हुआ और दाहिना भाग पुरुषरूपमें। वे सनातन पुरुष उस दिव्यस्वरूपिणी स्त्रीको देखने लगे। उसके समस्त अङ्ग बड़े ही सुन्दर थे। मनोहर चम्पाके समान उसकी कान्ति थी। उस असीम सुन्दरी देवीने दिव्य स्वरूप धारण कर रखा था। मुसकराती हुई वह बंकिम भङ्गिमाओंसे प्रभुकी ओर ताक रही थी। उसने विशुद्ध वस्त्र पहन रखे थे। रत्नमय दिव्य आभूषण उसके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह अपने चकोर-चक्षुओंके द्वारा श्रीकृष्णके श्रीमुखचन्द्रका निरन्तर हर्षपूर्वक पान कर रही थी। श्रीकृष्णका मुखमण्डल इतना सुन्दर था कि उसके सामने करोड़ों चन्द्रमा भी नगण्य थे। उस देवीके ललाटके ऊपरी भागमें कस्तूरीकी बिंदी थी। नीचे चन्दनकी छोटी-छोटी बिंदियाँ थीं। साथ ही मध्य ललाटमें सिन्दूरकी बिन्दी भी शोभा पा रही थी। प्रियतमके प्रति अनुरक्त चित्तवाली उस देवीके केश घुँघराले थे। मालतीके पुष्पोंका सुन्दर हार उसे सुशोभित कर रहा था। करोड़ों चन्द्रमाओंकी प्रभासे सुप्रकाशित परिपूर्ण शोभासे इस देवीका श्रीविग्रह सम्पन्न था। यह अपनी चालसे राजहंस एवं गजराजके गर्वको नष्ट कर रही थी। श्रीकृष्ण परम रसिक एवं रासके स्वामी हैं। उस देवीको देखकर रासके उल्लासमें उल्लसित हो वे उसके साथ रासमण्डलमें पधारे। रास आरम्भ हो गया। मानो स्वयं शृङ्गार ही मूर्तिमान् होकर नाना प्रकारकी शृङ्गारोचित चेष्टाओंके साथ रसमयी क्रीड़ा कर रहा हो। एक ब्रह्माकी सम्पूर्ण आयुपर्यन्त यह रास चलता रहा। तत्पश्चात् जगत्पिता श्रीकृष्णको कुछ श्रम आ गया। उन नित्यानन्दमयने शुभ वेलामें देवीके भीतर अपने तेजका आधान किया।

उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नारद! रासक्रीड़ाके अन्तमें श्रीकृष्णके असह्य तेजसे श्रान्त हो जानेके कारण उस देवीके शरीरसे दिव्य प्रस्वेद बह चला और जोर-जोरसे साँस चलने लगी। उस समय जो श्रमजल था, वह समस्त विश्वगोलक बन गया तथा वह निःश्वास वायुरूपमें परिणत हो गया, जिसके आश्रयसे सारा जगत् वर्तमान है। संसारमें जितने सजीव प्राणी हैं, उन सबके भीतर इस वायुका निवास है। फिर वायु मूर्तिमान् हो गया। उसके वामाङ्गसे प्राणोंके समान प्यारी स्त्री प्रकट हो गयी। उससे पाँच पुत्र हुए, जो प्राणियोंके शरीरमें रहकर पञ्चप्राण कहलाते हैं। उनके नाम हैं—प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। यों पाँच वायु और उनके पुत्र पाँच प्राण हुए। पसीनेके रूपमें जो जल बहा था, वही जलका अधिष्ठाता देवता वरुण हो गया। वरुणके बायें अङ्गसे उनकी पत्नी 'वरुणानी' प्रकट हुई।

उस समय श्रीकृष्णकी वह चिन्मयी शक्ति उनकी कृपासे गर्भस्थितिका अनुभव करने लगी। सौ मन्वन्तरतक ब्रह्मतेजसे उसका शरीर देदीप्यमान बना रहा। श्रीकृष्णके प्राणोंपर उस देवीका अधिकार था। श्रीकृष्ण प्राणोंसे भी बढ़कर उससे प्यार करते

प्रकृतिखण्ड ११५

थी। वह सदा उनके साथ रहती थी। श्रीकृष्णका वक्षःस्थल ही उसका स्थान था। सौ मन्वन्तरका समय व्यतीत हो जानेपर उसने एक सुवर्णके समान प्रकाशमान बालक उत्पन्न किया। उसमें विश्वको धारण करनेकी समुचित योग्यता थी, किंतु उसे देखकर उस देवीका हृदय दुःखसे संतप्त हो उठा। उसने उस बालकको ब्रह्माण्ड-गोलकके अथाह जलमें छोड़ दिया। इसने बच्चेको त्याग दिया—यह देखकर देवेश्वर श्रीकृष्णने तुरंत उस देवीसे कहा—‘अरी कोपशीले! तूने यह जो बच्चेका त्याग कर दिया है, यह बड़ा घृणित कर्म है। इसके फलस्वरूप तू आजसे संतानहीना हो जा। यह बिलकुल निश्चित है। यही नहीं, किंतु तेरे अंशसे जो-जो दिव्य स्त्रियाँ उत्पन्न होंगी, वे सभी तेरे समान ही नूतन तारुण्यसे सम्पन्न रहनेपर भी संतानका मुख नहीं देख सकेंगी।’ इतनेमें उस देवीकी जीभके अग्रभागसे सहसा एक परम मनोहर कन्या प्रकट हो गयी। उसके शरीरका वर्ण शुक्ल था। वह श्वेतवर्णका ही वस्त्र धारण किये हुए थी। उसके दोनों हाथ वीणा और पुस्तकसे सुशोभित थे। सम्पूर्ण शास्त्रोंकी वह अधिष्ठात्री देवी रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थी।

तदनन्तर कुछ समय व्यतीत हो जानेके पश्चात् वह मूल प्रकृतिदेवी दो रूपोंमें प्रकट हुई। आधे वाम-अङ्गसे ‘कमला’ का प्रादुर्भाव हुआ और दाहिनेसे ‘राधिका’ का। उसी समय श्रीकृष्ण भी दो रूप हो गये। आधे दाहिने अङ्गसे स्वयं ‘द्विभुज’ विराजमान रहे और बायें अङ्गसे ‘चार भुजावाले विष्णु’ का आविर्भाव हो गया। तब श्रीकृष्णने सरस्वतीसे कहा—‘देवी! तुम इन विष्णुकी प्रिया बन जाओ। मानिनी राधा यहाँ रहेंगी। तुम्हारा परम कल्याण होगा। इसी प्रकार संतुष्ट होकर श्रीकृष्णने लक्ष्मीको नारायणकी सेवामें उपस्थित होनेकी आज्ञा प्रदान की। फिर तो जगत्की व्यवस्थामें तत्पर रहनेवाले श्रीविष्णु उन सरस्वती और लक्ष्मी देवियोंके साथ वैकुण्ठ पधारे। मूल प्रकृतिरूपा राधाके अंशसे प्रकट होनेके कारण वे देवियाँ भी संतान प्रसव करनेमें असमर्थ रहीं। फिर नारायणके अङ्गसे चार भुजावाले अनेक पार्षद उत्पन्न हुए। सभी पार्षद गुण, तेज, रूप और अवस्थामें श्रीहरिके समान थे। लक्ष्मीके अङ्गसे उन्हीं-जैसे लक्षणोंसे सम्पन्न करोड़ों दासियाँ उत्पन्न हो गयीं।

मुनिवर नारद! इसके बाद गोलोकेश्वर भगवान् श्रीकृष्णके रोमकूपसे असंख्य गोप प्रकट हो गये। अवस्था, तेज, रूप, गुण, बल और पराक्रममें वे सभी श्रीकृष्णके समान ही प्रतीत होते थे। प्राणके समान प्रेमभाजन उन गोपोंको परम प्रभु श्रीकृष्णने अपना पार्षद बना लिया। ऐसे

११६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ही श्रीराधाके रोमकूपोंसे बहुत-सी गोपकन्याएँ प्रकट हुईं। वे सभी राधाके समान ही जान पड़ती थीं।

उन मधुरभाषिणी कन्याओंको राधाने अपनी दासी बना लिया। वे रत्नमय भूषणोंसे विभूषित थीं। उनका नया तारुण्य सदा बना रहता था। परम पुरुषके शापसे वे भी सदाके लिये सन्तानहीना हो गयी थीं।

विप्र! इतनेमें श्रीकृष्णके शरीरसे देवी दुर्गाका सहसा आविर्भाव हुआ। ये दुर्गा सनातनी एवं भगवान् विष्णुकी माया हैं। इन्हें नारायणी, ईशानी और सर्वशक्तिस्वरूपिणी कहा जाता है। ये परमात्मा श्रीकृष्णकी बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं। सम्पूर्ण देवियाँ इन्हींसे प्रकट होती हैं। अतएव इन्हें देवियोंकी बीजस्वरूपा मूलप्रकृति एवं ईश्वरी कहते हैं। ये परिपूर्णतमा देवी तेजःस्वरूपा तथा त्रिगुणात्मिका हैं। तपाये हुए सुवर्णके समान इनका वर्ण है। प्रभा ऐसी है, मानो करोड़ों सूर्य चमक रहे हों। इनके मुखपर मन्द-मन्द मुस्कराहट छायी रहती है। ये हजारों भुजाओंसे सुशोभित हैं। अनेक प्रकारके अस्त्र और शस्त्रोंको हाथमें लिये रहती हैं। इनके तीन नेत्र हैं। ये विशुद्ध वस्त्र धारण किये हुई हैं। रत्ननिर्मित भूषण इनकी शोभा बढ़ा रहे हैं। सम्पूर्ण स्त्रियाँ इनके अंशकी कलासे उत्पन्न हैं। इनकी माया जगत्के समस्त प्राणियोंको मोहित करनेमें समर्थ है। सकामभावसे उपासना करनेवाले गृहस्थोंको ये सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। इनकी कृपासे भगवान् श्रीकृष्णमें भक्ति उत्पन्न होती है। विष्णुके उपासकोंके लिये ये भगवती वैष्णवी (लक्ष्मी) हैं। मुमुक्षुजनोंको मुक्ति प्रदान करना और सुख चाहनेवालोंको सुखी बनाना इनका स्वभाव है। स्वर्गमें ‘स्वर्गलक्ष्मी’ और गृहस्थोंके घर ‘गृहलक्ष्मी’ के रूपमें ये विराजती हैं। तपस्वियोंके पास तपस्यारूपसे, राजाओंके यहाँ श्रीरूपसे, अग्निमें दाहिकारूपसे, सूर्यमें प्रभारूपसे तथा चन्द्रमा एवं कमलमें शोभारूपसे इन्हींकी शक्ति शोभा पा रही है। सर्वशक्तिस्वरूपा ये देवी परमात्मा श्रीकृष्णमें विराजमान रहती हैं। इनका सहयोग पाकर आत्मामें कुछ करनेकी योग्यता प्राप्त होती है। इन्हींसे जगत् शक्तिमान् माना जाता है। इनके बिना प्राणी जीते हुए भी मृतकके समान हैं।

नारद! ये सनातनी देवी संसाररूपी वृक्षके लिये बीजस्वरूपा हैं। स्थिति, बुद्धि, फल, क्षुधा, पिपासा, दया, श्रद्धा, निद्रा, तन्द्रा, क्षमा, मति, शान्ति, लज्जा, तुष्टि, पुष्टि, भ्रान्ति और कान्ति आदि सभी इन दुर्गाके ही रूप हैं।

ये देवी सर्वेश श्रीकृष्णकी स्तुति करके

प्रकृतिखण्ड ११७

उनके सामने विराजमान हुईं। राधिकेश्वर श्रीकृष्णने इन्हें एक रत्नमय सिंहासन प्रदान किया। महामुने ! इतनेमें चतुर्मुख ब्रह्मा अपनी शक्तिके साथ वहाँ पधारे। विष्णुके नाभिकमलसे निकलकर उनका पधारना हुआ था। ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ परम तपस्वी श्रीमान् ब्रह्मा अपने हाथमें कमण्डलु लिये हुए थे। ब्रह्मतेजसे उनका शरीर देदीप्यमान हो रहा था। अपने चारों मुखोंसे वे भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे। उस समय सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान प्रभावशाली उनकी परम सुन्दरी शक्ति अग्निशुद्ध वस्त्र एवं रत्ननिर्मित भूषणोंसे अलंकृत होकर सर्वकारण श्रीकृष्णकी स्तुति करके पतिदेवके साथ श्रीकृष्णके सामने रत्नमय सिंहासनपर प्रसन्नतापूर्वक बैठ गयीं।

इसी समय भगवान् श्रीकृष्णके दो रूप हो गये। उनका आधा बाँया अङ्ग महादेवके रूपमें परिणत हो गया। दक्षिण अङ्गसे गोपीपति श्रीकृष्ण रह गये। महादेवकी कान्ति ऐसी थी, मानो शुद्ध स्फटिकमणि हो। एक अरब सूर्यके समान वे चमक रहे थे। भुजाएँ पट्टिश और त्रिशूलसे सुशोभित थीं। वे बाघम्बर पहने हुए थे। तपाये हुए सुवर्णके सदृश उनके वर्णकी आभा थी। सिरपर जटाओंका भार छबि बढ़ा रहा था। वे शरीरमें भस्म लगाये हुए थे। मस्तकपर चन्द्रमाकी शोभा हो रही थी। मुखमण्डल मुसकानसे भरा था। नीले कण्ठसे शोभा पानेवाले वे शंकर दिगम्बरवेषमें थे। सर्पोंने भूषण बनकर उन्हें भूषित कर रखा था। उनके दाहिने हाथमें रत्नोंकी बनी हुई सुसंस्कृत माला सुशोभित थी। वे अपने पाँच मुखोंसे ब्रह्मज्योतिःस्वरूप सनातन श्रीकृष्णके नामका जप कर रहे थे। श्रीकृष्ण सत्यस्वरूप, परमात्मा एवं ईश्वर हैं। ये कारणोंके कारण, सम्पूर्ण मङ्गलोंके मङ्गल, जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, शोक और भयको हरनेवाले और मृत्युके भी मृत्यु हैं। मृत्युकी मृत्यु श्रीकृष्णकी स्तुति करके वे 'मृत्युञ्जय' नामसे विख्यात हो गये। फिर महाभाग शंकर सामने रखे हुए रत्नमय सुरम्य सिंहासनपर विराज गये। (अध्याय २)


परिपूर्णतम श्रीकृष्ण और चिन्मयी श्रीराधासे प्रकट विराट्स्वरूप बालकका वर्णन

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद ! तदनन्तर वह बालक जो केवल अण्डाकार था, ब्रह्माकी आयुपर्यन्त ब्रह्माण्डगोलकके जलमें रहा। फिर समय पूरा हो जानेपर वह सहसा दो रूपोंमें प्रकट हो गया। एक अण्डाकार ही रहा और एक शिशुके रूपमें परिणत हो गया। उस शिशुकी ऐसी कान्ति थी, मानो सौ करोड़ सूर्य एक साथ प्रकाशित हो रहे हों। माताका दूध न मिलनेके कारण भूखसे पीड़ित होकर वह कुछ समयतक रोता रहा। माता-पिता उसे त्याग चुके थे। वह निराश्रय होकर जलके अंदर समय व्यतीत कर रहा था। जो असंख्य ब्रह्माण्डका स्वामी है, उसीने अनाथकी भाँति, आश्रय पानेकी इच्छासे ऊपरकी ओर दृष्टि दौड़ायी। उसकी आकृति स्थूलसे भी स्थूल थी। अतएव उसका नाम 'महाविराट्' पड़ा। जैसे परमाणु अत्यन्त सूक्ष्मतम होता है, वैसे ही वह अत्यन्त स्थूलतम था। वह बालक तेजमें परमात्मा श्रीकृष्णके सोलहवें अंशकी बराबरी कर