ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
५३७
ग्वाल-बालोंका श्रीकृष्णकी आज्ञासे तालवनके फल तोड़ना, धेनुकासुरका आक्रमण, श्रीकृष्णके स्पर्शसे उसे पूर्वजन्मकी स्मृति और उसके द्वारा श्रीकृष्णका स्तवन, वैष्णवी मायासे पुनः उसे स्वरूपकी विस्मृति, फिर श्रीहरिके साथ उसका युद्ध और वध, बालकों-द्वारा सानन्द फल-भक्षण तथा सबका घरको प्रस्थान
भगवान् नारायण कहते हैं— नारद! एक दिन राधिकानाथ श्रीकृष्ण बलराम तथा ग्वाल-बालोंके साथ उस तालवनमें गये, जो पके फलोंसे भरा हुआ था। उन तालवृक्षोंकी रक्षा गर्दभरूपधारी एक दैत्य करता था, जिसका नाम धेनुक था। उसमें करोड़ों सिंहोंके समान बल था। वह देवताओंके दर्पका दलन करनेवाला था। उसका शरीर पर्वतके समान और दोनों नेत्र कूपके तुल्य थे। उसके दाँत हरिसकी पाँतके समान और मुँह पर्वतकी कन्दराके सदृश था। उसकी चञ्चल एवं भयानक जीभ सौ हाथ लंबी थी। नाभि तालाबके समान जान पड़ती थी। उसका शब्द बड़ा भयंकर होता था। तालवनको सामने देख उन श्रेष्ठ ग्वाल-बालोंको बड़ा हर्ष हुआ। उनके मुखारविन्दपर मुस्कराहट छा गयी। वे कौतुकवश श्रीकृष्णसे बोले।
बालकोंने कहा— हे श्रीकृष्ण! हे करुणासिन्धो! हे दीनबन्धो! आप सम्पूर्ण जगत्के पालक हैं। महाबली बलरामजीके भाई हैं तथा समस्त बलवानोंमें श्रेष्ठ हैं। प्रभो! आधे क्षणके लिये हमारे निवेदनपर ध्यान दीजिये। भक्तवत्सल! हम आपके भक्त-बालकोंको बड़ी भूख लगी है। इधर सामने ही स्वादिष्ट फल और सुन्दर ताल-फल हैं, उनकी ओर दृष्टिपात कीजिये। हम इन फलोंको तोड़नेके लिये वृक्षोंको हिलाना और नाना रंगोंके फूलों तथा दुर्लभ पके फलोंको गिराना चाहते हैं। श्रीकृष्ण! यदि आप आज्ञा दें तो हम ऐसी चेष्टा कर सकते हैं; परंतु इस वनमें गर्दभरूपधारी बलवान् दैत्य धेनुक रहता है, जिसपर सम्पूर्ण देवता भी विजय नहीं पा सके हैं। वह महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न है। सब देवता मिलकर भी उसे रोकनेमें सफल नहीं हो पाते। यह राजा कंसका महान् सहायक है। समस्त प्राणियोंका हिंसक तथा ताल-वनोंका रक्षक है। जगत्पते! वक्ताओंमें श्रेष्ठ! आप भलीभाँति सोचकर हमसे कहिये। हम जो काम करना चाहते हैं वह उचित है या अनुचित? हम इसे करें या न करें। बालकोंकी यह बात सुनकर भगवान् मधुसूदन उनसे मधुर वाणीमें सुखदायक वचन बोले।
श्रीकृष्णने कहा— ग्वालबालो! तुमलोग तो मेरे साथी हो, तुम्हें दैत्योंसे क्या भय है? वृक्षोंको तोड़कर हिलाकर जैसे चाहो, बेखटके इन फलोंको खाओ।
श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर बलशाली गोपबालक उछले और वृक्षोंके शिरोपर चढ़ गये। वे भूखे थे; इसलिये फल लेना चाहते थे। नारद! उन्होंने अनेक रंगके स्वादिष्ट, सुन्दर और पके हुए फल गिराये। कितने ही बालकोंने वृक्ष तोड़ डाले, कितनोंने उन्हें बारंबार हिलाया। कई बालक वहाँ कोलाहल करने लगे और कितने ही नाचने लगे। वृक्षोंसे उतरकर वे बलशाली बालक जब फल लेकर जाने लगे, तब उन्होंने उस गर्दभरूपधारी महाबली, महाकाय, घोर दैत्यशिरोमणि धेनुकको बड़े वेगसे आते देखा। वह भयंकर शब्द कर रहा था। उसे देखकर सब बालक रोने लगे। उन्होंने भयके कारण फल त्याग दिये और बारंबार जोर-जोरसे 'कृष्ण-कृष्ण' का कीर्तन आरम्भ कर
५३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
दिया। वे बोले—'हे करुणानिधान कृष्ण! आओ हमारी रक्षा करो। हे संकर्षण! हमें बचाओ, नहीं तो इस दानवके हाथसे अब हमारे प्राण जा रहे हैं। हे कृष्ण! हे कृष्ण! हरे! मुरारे! गोविन्द! दामोदर! दीनबन्धो! गोपीश! गोपेश! अनन्त! नारायण! भवसागरमें डूबते हुए हमलोगोंकी रक्षा करो, रक्षा करो। दीननाथ! भय-अभयमें, शुभ-अशुभ अथवा सुख और दुःखमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई हमें शरण देनेवाला नहीं है। हे माधव! भवसागरमें हमारी रक्षा करो, रक्षा करो। गुणसागर श्रीकृष्ण! तुम्हीं भक्तोंके एकमात्र बन्धु हो। हम बालक बहुत भयभीत हैं। हमारी रक्षा करो, रक्षा करो। यह दानव-कुलका स्वामी हमारा काल बनकर आ पहुँचा है। आप इसका वध कीजिये और इसे मारकर देवताओंके बल-दर्पको बढ़ाइये।'
बालकोंकी व्याकुलता देखकर भयहन्ता भक्तवत्सल माधव बलरामजीके साथ उस स्थानपर आये, जहाँ वे बालक खड़े थे। 'कोई भय नहीं है, कोई भय नहीं है'—यों कहकर वे शीघ्रतापूर्वक उनके पास दौड़े आये और मन्द मुस्कानसे युक्त प्रसन्नमुखद्वारा उन्होंने उन बालकोंको अभय दान दिया। श्रीकृष्ण और बलरामको देखकर बालक हर्षसे नाचने लगे। उनका भय दूर हो गया। क्यों न हो, भगवान्की स्मृति ही अभयदायिनी तथा सब प्रकारसे मङ्गल प्रदान करनेवाली है। बालकोंको निगल जानेको उद्यत हुए उस दानवको देख मधुसूदन श्रीकृष्णने महाबली बलरामको सम्बोधित करके कहा।
श्रीकृष्ण बोले— भैया! यह दानव राजा बलिका बलवान् पुत्र है। इसका नाम साहसिक है। पूर्वकालमें दुर्वासाने इसे शाप दिया था। उस ब्रह्मशापसे ही यह गदहा हुआ है। यह बड़ा पापी तथा महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न है; अतः मेरे ही हाथसे वधके योग्य है। मैं इसका वध करूँगा। तुम बालकोंकी रक्षा करो। सब बालकोंको लेकर दूर चले जाओ।
तब बलराम उन बालकोंको लेकर श्रीकृष्णकी आज्ञाके अनुसार शीघ्र ही दूर चले गये। इधर इस महाबली एवं महापराक्रमी दानवराजने श्रीकृष्णपर दृष्टि पड़ते ही उन्हें रोषपूर्वक अनायास ही निगल लिया। श्रीकृष्ण प्रज्वलित अग्नि-शिखाके समान थे। उन्हें निगल लेनेपर उस दानवके भीतर बड़ी जलन होने लगी। उनके अतिशय तेजसे वह मरणासन्न हो गया। तब उस दैत्यने भयभीत हो उन तेजस्वी प्रभुको फिर उगल दिया। परित्यक्त होनेपर उन परमेश्वरकी ओर एकटक दृष्टिसे देखता हुआ वह दैत्य मोहित हो गया। भगवान्का श्रीविग्रह अत्यन्त सुन्दर, शान्त तथा ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान था। श्रीकृष्णके दर्शनमात्रसे उस दानवको पूर्वजन्मकी स्मृति हो आयी। उसने अपने-आपको तथा जगत्के परम कारण श्रीकृष्णको भी पहचान लिया। उन तेजःस्वरूप ईश्वरको देखकर वह दानव शास्त्रके अनुसार श्रुतिसे परे गुणातीत प्रभुका जिस प्रकार जन्म हुआ, उसे दृष्टिमें लाकर उनकी स्तुति करने लगा।
दानव बोला— प्रभो! आप ही अपने अंशसे वामन हुए थे और मेरे पिताके यज्ञमें याचक बने थे। आपने पहले तो हमारे राज्य और लक्ष्मीको हर लिया। पर पुनः बलिकी भक्तिके वशीभूत होकर हम सब लोगोंको सुतललोकमें स्थान दिया। आप महान् वीर, सर्वेश्वर और भक्तवत्सल हैं। मैं पापी हूँ और शापसे गर्दभ हुआ हूँ। आप शीघ्र ही मेरा वध कर डालिये। दुर्वासामुनिके शापसे मुझे ऐसा घृणित जन्म मिला है। जगत्पते! मुनिने मेरी मृत्यु आपके हाथसे बतायी थी। आप अत्यन्त तीखे और अतिशय तेजस्वी षोडशार चक्रसे मेरा वध
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५३९
कीजिये। मुक्तिदाता जगन्नाथ! ऐसा करके मुझे उत्तम गति दीजिये। आप ही वसुधाका उद्धार करनेके लिये अंशतः वाराहरूपमें अवतीर्ण हुए थे। नाथ! आप ही वेदोंके रक्षक तथा हिरण्याक्षके नाशक हैं। आप पूर्ण परमात्मा स्वयं ही हिरण्यकशिपुके वधके लिये नृसिंहरूपमें प्रकट हुए थे। प्रह्लादपर अनुग्रह और वेदोंकी रक्षा करनेके लिये ही आपने यह अवतार ग्रहण किया था। दयानिधे! आपने ही राजा मनुको ज्ञान देने, देवता और ब्राह्मणोंकी रक्षा करने तथा वेदोंके उद्धारके लिये अंशतः मत्स्यावतार धारण किया था। आप ही अपने अंशसे सृष्टिके लिये शेषके आधारभूत कच्छप हुए थे। सहस्रलोचन! आप ही अंशतः शेषके रूपमें प्रकट हुए हैं और सम्पूर्ण विश्वका भार वहन करते हैं। आप ही जनकनन्दिनी सीताका उद्धार करनेके लिये दशरथनन्दन श्रीराम हुए थे। उस समय आपने समुद्रपर सेतु बाँधा और दशमुख रावणका वध किया। पृथ्वीनाथ! आप ही अपनी कलासे जमदग्निनन्दन महात्मा परशुराम हुए; जिन्होंने इक्कीस बार क्षत्रिय नरेशोंका संहार किया था। सिद्धोंके गुरुके भी गुरु महर्षि कपिल अंशतः आपके ही स्वरूप हैं, जिन्होंने माताको ज्ञान दिया और योग (एवं सांख्य)-शास्त्रकी रचना की। ज्ञानिशिरोमणि नर-नारायण ऋषि आपके ही अंशसे उत्पन्न हुए हैं। आप ही धर्मपुत्र होकर लोकोंका विस्तार कर रहे हैं। इस समय आप स्वयं परिपूर्णतम परमात्मा ही श्रीकृष्णरूपमें प्रकट हैं और सभी अवतारोंके सनातन बीजरूप हैं। आप यशोदाके जीवन, नन्दरायजीके एकमात्र आनन्दवर्धन, नित्यस्वरूप, गोपियोंके प्राणाधिदेव तथा श्रीराधाके प्राणाधिक प्रियतम हैं। वसुदेवके पुत्र, शान्तस्वरूप तथा देवकीके दुःखका निवारण करनेवाले हैं। आपका स्वरूप अयोनिज है। आप पृथ्वीका भार उतारनेके लिये यहाँ पधारे हैं। आपने पूतनाको माताके समान गति प्रदान की है; क्योंकि आप कृपानिधान हैं। आप बक, केशी तथा प्रलम्बासुरको और मुझे भी मोक्ष देनेवाले हैं। स्वेच्छामय! गुणातीत! भक्तभयभञ्जन! राधिकानाथ! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये और मेरा उद्धार कीजिये। हे नाथ! इस गर्दभ-योनि और भवसागरसे मुझे उबारिये। मैं मूर्ख हूँ तो भी आपके भक्तका पुत्र हूँ; इसलिये आपको मेरा उद्धार करना चाहिये। वेद, ब्रह्मा आदि देवता तथा मुनीन्द्र भी जिनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं, उन्हीं गुणातीत परमेश्वरकी स्तुति मुझ-जैसा पुरुष क्या करेगा? जो पहले दैत्य था और अब गदहा है। करुणासागर। आप ऐसा कीजिये, जिससे मेरा जन्म न हो। आपके चरणारविन्दके दर्शन पाकर कौन फिर जन्म अथवा घर-गृहस्थीके चक्करमें पड़ेगा? ब्रह्मा जिनकी स्तुति करते हैं, उन्हींका स्तवन आज एक गदहा कर रहा है। इस बातको लेकर आपको उपहास नहीं करना चाहिये; क्योंकि सच्चिदानन्दस्वरूप एवं विज्ञ परमेश्वरकी योग्य और अयोग्यपर भी समानरूपसे कृपा होती है।
यों कहकर दैत्यराज धेनुक श्रीहरिके सामने खड़ा हो गया। उसके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी, वह श्रीसम्पन्न एवं अत्यन्त संतुष्ट जान पड़ता था। दैत्यद्वारा किये गये इस स्तोत्रका जो प्रतिदिन भक्तिभावसे पाठ करता है, वह अनायास ही श्रीहरिका लोक, ऐश्वर्य और सामीप्य प्राप्त कर लेता है। इतना ही नहीं, वह इहलोकमें श्रीहरिकी भक्ति, अन्तमें उनका परम दुर्लभ दास्यभाव, विद्या, श्री, उत्तम कवित्व, पुत्र-पौत्र तथा यश भी पाता है।
भगवान् श्रीनारायण कहते हैं—दैत्यराजकी यह स्तुति सुनकर करुणानिधान श्रीकृष्णने मन-ही-मन विचार किया कि 'अहो! ऐसे भक्तका
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संहार मैं कैसे करूँ?' ऐसा सोचकर भगवान्ने स्वयं ही उसकी पूर्वजन्मकी स्मृति हर ली; क्योंकि स्तुति करनेवालेका वध उचित नहीं है। दुर्वचन बोलनेवालेके ही वधका विधान है। तब दानव वैष्णवी मायाके प्रभावसे पुनः अपने-आपको भूल गया। उसके कण्ठदेशमें दुर्वचनने स्थान जमा लिया। मुने! वह शीघ्र ही मरना चाहता था, इसलिये दुर्दैवसे ग्रस्त हो विवेक खो बैठा। क्रोधसे उसके ओठ फड़कने लगे और वह दैत्य श्रीहरिसे इस प्रकार बोला।
दैत्यने कहा— दुर्मते! तू निश्चय ही मरना चाहता है। मनुष्यके बच्चे! मैं आज तुम्हें यमलोक भेज दूँगा।
इस प्रकार बहुत-से दुर्वचन कहकर उस गदहेने श्रीकृष्णपर आक्रमण कर दिया। भयानक युद्ध हुआ। अन्तमें श्रीहरिने प्रसन्नतापूर्वक हँसकर उस दानवराजकी प्रशंसा करते हुए कहा—'मेरे भक्त बलिके पुत्र! दानवेन्द्र! तुम्हारा उत्तम जीवन धन्य है। वत्स! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम मोक्ष प्राप्त करो। मेरा दर्शन कल्याणका बीज तथा मोक्षका परम कारण है। तुम सबसे अधिक और सबसे उत्कृष्ट मनोहर स्थान प्राप्त करो।'
यों कहकर श्रीकृष्णने अपने उत्तम चक्रका स्मरण किया, जो अपनी दीप्तिसे करोड़ों सूर्योंके समान उद्दीप्त होता है। स्मरण करते ही वह आ गया और श्रीकृष्णने उस सुदर्शनचक्रको अपने हाथमें ले लिया। उसमें सोलह अरे थे। उस उत्तम अस्त्रको घुमाकर श्रीकृष्णने उसकी ओर फेंका तथा जिसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी नहीं मार सकते थे, उसे लीलासे ही काट डाला।
उस महात्मा दानवका मस्तक पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके शरीरसे सैकड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् तेजःपुञ्ज उठा, जो श्रीहरिकी ओर देखकर उन्हींके चरणकमलोंमें लीन हो गया। अहो! उस दानवराजने परम मोक्ष प्राप्त कर लिया। उस समय आकाशमें खड़े हुए समस्त देवता और मुनि अत्यन्त हर्षसे उत्फुल्ल हो वहाँ पारिजातके फूलोंकी वर्षा करने लगे। स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बज उठीं। अप्सराएँ नाचने लगीं। गन्धर्व-समूह गीत गाने लगे और मुनिलोग सानन्द स्तुति करने लगे। स्तुति करके हर्षसे विह्वल हुए समस्त देवता और मुनि चले गये। 'धेनुकासुर मारा गया'—यह देख ग्वाल-बाल वहाँ आ गये। बलवानोंमें श्रेष्ठ बलरामने पुरुषोत्तमका स्तवन किया। समस्त ग्वाल-बालोंने भी उनके गुण गाये। वे खुशीके मारे नाचने लगे। श्रीकृष्ण और बलरामको कुछ पके हुए फल देकर शेष सभी फलोंको उन बालकोंने प्रसन्न-चित्त होकर खाया। खा-पीकर बलराम और बालकोंके साथ श्रीहरि शीघ्र अपने घरको गये। (अध्याय २२)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५४१
धेनुकके पूर्वजन्मका परिचय, बलि-पुत्र साहसिक तथा तिलोत्तमाका स्वच्छन्द विहार, दुर्वासाका शाप और वर, साहसिकका गदहेकी योनिमें जन्म लेना तथा तिलोत्तमाका बाणपुत्री 'उषा' होना
नारदजीने पूछा— भगवन्! किस पापसे बलि-पुत्र साहसिकको गदहेकी योनि प्राप्त हुई? दुर्वासाजीने किस अपराधसे दानवराजको शाप दिया? नाथ! फिर किस पुण्यसे दानवेश्वरने सहसा महाबली श्रीहरिका धाम एवं उनके साथ एकत्व (सायुज्य) मोक्ष प्राप्त कर लिया? संदेह-भंजन करनेवाले महर्षे! इन सब बातोंको आप विस्तारपूर्वक बताइये। अहो! कविके मुखमें काव्य पद-पदपर नया-नया प्रतीत होता है।
भगवान् श्रीनारायणने कहा— वत्स! नारद! सुनो। मैं इस विषयमें प्राचीन इतिहास कहूँगा। मैंने इसे पिता धर्मके मुखसे गन्धमादन पर्वतपर सुना था। यह विचित्र एवं अत्यन्त मनोहर वृत्तान्त पाद्म-कल्पका है और श्रीनारायणदेवकी कथासे युक्त होनेके कारण कानोंके लिये उत्तम अमृत है। जिस कल्पकी यह कथा है, उसमें तुम उपबर्हण नामक गन्धर्वके रूपमें थे। तुम्हारी आयु एक कल्पकी थी। तुम शोभायमान, सुन्दर और सुस्थिर यौवनसे सम्पन्न थे। पचास कामिनियोंके पति होकर सदा शृङ्गारमें ही तत्पर रहते थे। ब्रह्माजीके वरदानसे तुम्हें सुमधुर कण्ठ प्राप्त हुआ था और तुम सम्पूर्ण गायकोंके राजा समझे जाते थे। उन्हीं दिनों दैववश ब्रह्माका शाप प्राप्त होनेसे तुम दासीपुत्र हुए और वैष्णवोंके अवशिष्ट भोजनजनित पुण्यसे इस समय साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्र हो। अब तो तुम असंख्य कल्पोंतक जीवित रहनेवाले महान् वैष्णवशिरोमणि हो। ज्ञानमयी दृष्टिसे सब कुछ देखते और जानते हो तथा महादेवजीके प्रिय शिष्य हो। मुने! उस पाद्म-कल्पका वृत्तान्त मुझसे सुनो। दैत्यके इस सुधा-तुल्य मधुर वृत्तान्तको मैं तुम्हें सुना रहा हूँ।
एक दिनकी बात है। बलिका बलवान् पुत्र साहसिक अपने तेजसे देवताओंको परास्त करके गन्धमादनकी ओर प्रस्थित हुआ। उसके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। वह रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो रत्नके ही सिंहासनपर विराजमान था। उसके साथ बहुत बड़ी सेना थी। इसी समय स्वर्गकी परम सुन्दरी अप्सरा तिलोत्तमा उस मार्गसे आ निकली। उसने साहसिकको देखा और साहसिकने उसको। पुंश्चली स्त्रियोंका आचरण दोषपूर्ण होता ही है। वहीं दोनों एक-दूसरेके प्रति आकर्षित हो गये। चन्द्रमाके समीप जाती हुई तिलोत्तमा वहाँ बीचमें ही ठहर गयी। कुलटा स्त्रियाँ कैसी दुष्टहृदया होती हैं और वे किसी भी पापका विचार न करके सदा पापरत ही रहा करती हैं—यह सब बतलाकर भी तिलोत्तमाने अपने बाह्य रूप-सौन्दर्यसे साहसिकको मोहित कर लिया। तदनन्तर वे दोनों गन्धमादनके एकान्त रमणीय स्थानमें जाकर यथेच्छ विहार करने लगे। वहीं मुनिवर दुर्वासा योगासनसे विराजमान होकर श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका चिन्तन कर रहे थे। तिलोत्तमा और साहसिक उस समय कामवश चेतनाशून्य थे। उन्होंने अत्यन्त निकट ध्यान लगाये बैठे हुए मुनिको नहीं देखा। उनके उच्छृङ्खल अभिसारसे मुनिका ध्यान सहसा भङ्ग हो गया। उन्होंने उन दोनोंकी कुत्सित चेष्टाएँ देख क्रोधमें भरकर कहा।
दुर्वासा बोले— ओ गदहेके समान आकार-
८४- ब्रह्मा, शिव, पार्वती, धर्म, इन्द्र, रुद्र, दिक्पाल, ग्रह, अत्रि, लक्ष्मी, सरस्वती आदिका वैकुण्ठलोकमें आकर दुर्वासाके अपराधको क्षमाकर उनकी रक्षा करनेके लिये भगवान् विष्णुसे करुण प्रार्थना करना
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वाले निर्लज्ज नराधम! उठ। भक्तशिरोमणि बलिक पुत्र होकर भी तू इस तरह पशुवत् आचरण कर रहा है। देवता, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व तथा राक्षस—ये सभी सदा अपनी जातिमें लज्जाका अनुभव करते हैं। पशुओंके सिवा सभी मैथुन-कर्ममें लज्जा करते हैं। विशेषतः गदहेकी जाति ज्ञान तथा लज्जासे हीन होती है; अतः दानवश्रेष्ठ! अब तू गदहेकी योनिमें जा। तिलोत्तमे! तू भी उठ। पुंश्चली स्त्री तो निर्लज्ज होती ही है। दैत्यके प्रति तेरी ऐसी आसक्ति है तो अब तू दानवयोनिमें ही जन्म ग्रहण कर।
ऐसा कहकर रोषसे जलते हुए दुर्वासामुनि वहाँ चुप हो गये। फिर वे दोनों लज्जित और भयभीत होकर उठे तथा मुनिकी स्तुति करने लगे।
साहसिक बोला—मुने! आप ब्रह्मा, विष्णु और साक्षात् महेश्वर हैं। अग्नि और सूर्य हैं। आप संसारकी सृष्टि, पालन तथा संहार करनेमें समर्थ हैं। भगवन्! मेरे अपराधको क्षमा करें। कृपानिधे! कृपा करें। जो सदा मूढ़ोंके अपराधको क्षमा करे, वही संत-महात्मा एवं ईश्वर है।
यों कहकर वह दैत्यराज मुनिके आगे उच्चस्वरसे फूट-फूटकर रोने लगा और दाँतोंमें तिनके दबाकर उनके चरणकमलोंमें गिर पड़ा।
तिलोत्तमा बोली—हे नाथ! हे करुणासिन्धो! हे दीनबन्धो! मुझपर कृपा कीजिये। विधाताकी सृष्टिमें सबसे अधिक मूढ स्त्रीजाति ही है। सामान्य स्त्रीकी अपेक्षा अधिक मतवाली एवं मूढ कुलटा होती है, जो सदा अत्यन्त कामातुर रहती है। प्रभो! कामुक प्राणीमें लज्जा, भय और चेतना नहीं रह जाती है।
नारद! ऐसा कहकर तिलोत्तमा रोती हुई दुर्वासाजीकी शरणमें गयी। भूतलपर विपत्तिमें पड़े बिना भला किन्हें ज्ञान होता है? उन दोनोंकी व्याकुलता देखकर मुनिको दया आ गयी। उस समय उन मुनिवरने उन्हें अभय देकर कहा।
दुर्वासा बोले—दानव! तू विष्णुभक्त बलिका पुत्र है। उत्तम कुलमें तेरा जन्म हुआ है। तू पैतृक परम्परासे विष्णुभक्त है। मैं तुझे निश्चितरूपसे जानता हूँ। पिताका स्वभाव पुत्रमें अवश्य रहता है। जैसे कालियके सिरपर अङ्कित हुआ श्रीकृष्णका चरणचिह्न उसके वंशमें उत्पन्न हुए सभी सर्पोंके मस्तकपर रहता है। वत्स! एक बार गदहेकी योनिमें जन्म लेकर तू निर्वाण (मोक्ष)-को प्राप्त हो जा। सत्पुरुषोंद्वारा पहले जो चिरकालतक श्रीकृष्णकी आराधना की गयी होती है, इसके पुण्य-प्रभावका कभी लोप नहीं होता। अब तू शीघ्र ही व्रजके निकट वृन्दावनके ताल-वनमें जा। वहाँ श्रीहरिके चक्रसे प्राणोंका परित्याग करके तू निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेगा। तिलोत्तमे! तू भारतवर्षमें बाणासुरकी पुत्री होगी; फिर श्रीकृष्ण-पौत्र अनिरुद्धका आलिङ्गन प्राप्त करके शुद्ध हो जायगी।
महामुने! यों कहकर दुर्वासामुनि चुप हो गये। तत्पश्चात् वे दोनों भी उन मुनिश्रेष्ठको प्रणाम करके यथास्थान चले गये। इस प्रकार दैत्य साहसिकके गर्दभ-योनिमें जन्म लेनेका सारा वृत्तान्त मैंने कह सुनाया। तिलोत्तमा बाणासुरकी पुत्री उषा होकर अनिरुद्धकी पत्नी हुई।
(अध्याय २३)
८५- अपने घरपर आये हुए दुर्वासाको देखकर राजा अम्बरीषका उनके चरणोंमें हाथ जोड़कर प्रणाम करना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५४३ दुर्वासाका और्वकन्या कन्दलीसे विवाह, उसकी कटूक्तियोंसे कुपित हो मुनिका उसे भस्म कर देना, फिर शोकसे देह-त्यागके लिये उद्यत मुनिको विप्ररूपधारी श्रीहरिका समझाना, उन्हें एकानंशाको पत्नी बनानेके लिये कहना, कन्दलीका भविष्य बताना और मुनिको ज्ञान देकर अन्तर्धान होना तथा मुनिकी तपस्यामें प्रवृत्ति भगवान् श्रीनारायण कहते हैं- मुने! दुर्वासामु्निका गूढ़ वृत्तान्त सुनो। सबसे अद्भुत बात यह है कि उन ऊर्ध्वरेता मुनीश्वरको भी स्त्रीका संयोग प्राप्त हुआ। यह कैसे ? सो बता रहा हूँ। साहसिक तथा तिलोत्तमाका शृङ्गार (मिलन-प्रसंग) देखकर उन जितेन्द्रिय मुनिके मनमें भी कामभावका संचार हो गया। असत्- पुरुषोंका सङ्ग प्राप्त होनेसे उनका सांसर्गिक दोष अपनेमें आ जाता है। इसी समय उस मार्गसे मुनिवर और्व अपनी पुत्रीके साथ आ पहुँचे। उनकी पुत्री पतिका वरण करना चाहती थी। पूर्वकालमें तपःपरायण ब्रह्माजीके ऊरुसे उन ऊर्ध्वरेता योगीन्द्रका जन्म हुआ था, इसलिये वे 'और्व' कहलाये। उनके जानुसे एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम 'कन्दली' था। वह दुर्वासाको ही अपना पति बनाना चाहती थी, दूसरा कोई पुरुष उसके मनको नहीं भाता था। पुत्रीसहित मुनिवर और्व दुर्वासामु्निके आगे आकर खड़े हो गये। वे बड़े प्रसन्न थे और अपने तेजसे प्रज्वलित अग्निशिखाके समान उद्भासित होते थे। मुनिवर और्वको सामने आया देख मुनीश्वर दुर्वासा भी बड़े वेगसे उठे और सानन्द उनके प्रति नत-मस्तक हो गये। प्रसन्नतासे भरे हुए और्वने दुर्वासाको हृदयसे लगा लिया और उनसे अपनी कन्याका मनोरथ प्रकट किया। और्व बोले- मुने ! यह मेरी मनोहरा कन्या 'कन्दली' नामसे विख्यात है। अब यह सयानी हो गयी है और संदेशवाहकोंके मुखसे आपकी प्रशंसा सुनकर केवल आपका ही 'पति'-रूपसे चिन्तन करने लगी है। यह कन्या अयोनिजा है और अपने सौन्दर्यसे तीनों लोकोंका मन मोह लेनेमें समर्थ है। वैसे तो यह समस्त गुणोंकी खान है; किंतु इसमें एक दोष भी है। दोष यह है कि कन्दली अत्यन्त कलहकारिणी है। यह क्रोधपूर्वक कटु भाषण करती है; परंतु अनेक गुणोंसे युक्त वस्तुको केवल एक ही दोषके कारण त्यागना नहीं चाहिये। और्वका वचन सुनकर दुर्वासाको हर्ष और शोक दोनों प्राप्त हुए। उसके गुणोंसे हर्ष हुआ और दोषसे दुःख। उन्होंने गुण तथा रूपसे सम्पन्न मुनि-कन्याको सामने देखा और व्यथित-हृदयसे मुनिवर और्वको इस प्रकार उत्तर दिया। दुर्वासाने कहा- नारीका रूप त्रिभुवनमें मुक्तिमार्गका निरोधक, तपस्यामें व्यवधान डालनेवाला तथा सदा ही मोहका कारण होता है। वह संसाररूपी कारागारमें बड़ी भारी बेड़ी है, जिसका भार वहन करना अत्यन्त दुष्कर है। शंकर आदि महापुरुष भी ज्ञानमय खड्गसे उस बेड़ीको काट नहीं सकते। नारी सदा साथ देनेवाली छायासे भी अधिक सहगामिनी है। वह कर्मभोग, इन्द्रिय, इन्द्रियाधार, विद्या और बुद्धिसे भी अधिक बाँधनेवाली है। छाया शरीरके रहनेतक ही साथ देती है; भोग तभीतक साथ रहते हैं जबतक उनकी समाप्ति न हो जाय; देह और इन्द्रियाँ जीवनपर्यन्त ही साथ रहती हैं; विद्या जबतक उसका अनुशीलन होता है तभीतक साथ देती है; यही दशा बुद्धिकी भी है; परंतु सुन्दरी स्त्री जन्म-जन्ममें मनुष्यको बन्धनमें डाले रहती है। सुन्दरी स्त्रीवाला पुरुष जबतक जीता है, तबतक अपने जन्म-मरणरूपी बन्धनका निवारण नहीं
५४४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण कर सकता। जबतक जीवधारीका जन्म होता है, तबतक उसे भोग सुखदायक जान पड़ते हैं। परंतु मुनीन्द्र ! सबसे अधिक सुखदायिनी है श्रीहरिके चरणकमलोंकी सेवा। मैं यहाँ श्रीकृष्ण-चरणारविन्दोंके चिन्तनमें लगा था, परंतु मेरे इस शुभ अनुष्ठानमें भारी विघ्न उपस्थित हो गया। न जाने पूर्वजन्मके किस कर्म-दोषसे यह विघ्न आया है। किंतु मुने ! मैं आपकी कन्याके सौ कटु वचनोंको अवश्य क्षमा करूँगा। इससे अधिक होनेपर उसका फल उसे दूँगा। स्त्रीके कटु वचनोंको सुनते रहना- यह पुरुषके लिये सबसे बड़ी निन्दाकी बात है। जिसे स्त्रीने जीत लिया हो, वह तीनों लोकोंके सत्पुरुषोंमें अत्यन्त निन्दित है। मैं आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके इस समय आपकी पुत्रीको ग्रहण करूँगा। ऐसा कहकर दुर्वासा चुप हो गये। और्वमुनिने वेदोक्त-विधिसे अपनी पुत्री उनको ब्याह दी। दुर्वासाने 'स्वस्ति' कहकर कन्याका पाणिग्रहण किया। और्वमुनिने उन्हें दहेज दिया और अपनी कन्या उन्हें सौंपकर वे मोहवश रोने लगे। संतानके वियोगसे होनेवाला शोक आत्माराम मुनिको भी नहीं छोड़ता। और्व बोले-बेटी ! सुनो। मैं तुम्हें नीतिका परम दुर्लभ सार-तत्त्व बता रहा हूँ। वह हितकारक, सत्य, वेदप्रतिपादित तथा परिणाममें सुखद है। नारीके लिये अपना पति ही इहलोक और परलोकमें सबसे बड़ा बन्धु है। कुलवधुओंके लिये पतिसे बढ़कर दूसरा कोई प्रियतम नहीं है। पति ही उनका महान् गुरु है। देवपूजा, व्रत, दान, तप, उपवास, जप, सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान, समस्त यज्ञोंकी दीक्षा, पृथ्वीकी परिक्रमा तथा ब्राह्मणों और अतिथियोंका सेवन-ये सब पतिसेवाकी सोलहवीं कलाके समान भी नहीं हैं। पतिव्रताको इन सबसे क्या प्रयोजन है? समस्त शास्त्रोंमें पतिसेवाको परम धर्म कहा गया है। अपनी बुद्धिसे पतिको सदा नारायणसे भी अधिक समझकर तुम उनके चरणकमलोंकी प्रतिदिन सेवा करना। परिहास, क्रोध, भ्रम अथवा अवहेलनासे भी अपने स्वामी मुनिके लिये उनके सामने या परोक्षमें भी कभी कटु वचन न बोलना। भारतवर्षकी भूमिपर जो स्त्रियाँ स्वेच्छानुसार कटु वचन बोलती अथवा दुराचारमें प्रवृत्त होती हैं, उनकी शुद्धिके लिये श्रुतिमें कोई प्रायश्चित्त नहीं है। उन्हें सौ कल्पोंतक नरकमें रहना पड़ता है। जो स्त्री समस्त धर्मोंसे सम्पन्न होनेपर भी पतिके प्रति कटु वचन बोलती है, उसका सौ जन्मोंका किया हुआ पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है। इस प्रकार अपनी कन्याको देकर और उसे समझा-बुझाकर मुनिवर और्व चले गये तथा स्वात्माराम मुनि दुर्वासा स्त्रीके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रममें रहने लगे। चतुर पुरुषका चतुरा स्त्रीके साथ योग्य समागम हुआ। मुनीश्वर दुर्वासा तपस्या छोड़कर घर-गृहस्थीमें आसक्त हो गये। कन्दली स्वामीके साथ प्रतिदिन कलह करती थी और मुनीन्द्र दुर्वासा नीतियुक्त वचन कहकर अपनी पत्नीको समझाते थे; परंतु उनकी बातको वह कुछ नहीं समझती थी। वह सदा कलहमें ही रुचि रखती थी। पिताके दिये हुए ज्ञानसे भी वह शान्त नहीं हुई। समझानेसे भी उसने अपनी आदत नहीं छोड़ी। स्वभावको लाँघना बहुत कठिन होता है। वह बिना कारण ही पतिको प्रतिदिन जली-कटी सुनाती थी। जिनके डरसे सारा जगत् काँपता था, वे ही मुनि उस कन्दलीके कोपसे थर-थर काँपते थे और उसकी की हुई कटूक्तिको चुपचाप सह लेते थे। दयानिधान मुनि मोहवश उसे तत्काल समझाने लगते थे। कुछ ही कालमें उसकी सौ कटूक्तियाँ पूरी हो गयीं तो भी मुनिने कृपापूर्वक उसकी सौसे भी अधिक कटूक्तियोंको क्षमा किया। पत्नीकी जली-कटी बातोंसे मुनिका हृदय दग्ध
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५४५ होता रहता था। दिये हुए वचनके अनुसार उस कटूक्तिकारिणी स्त्रीके अपराध पूरे हो गये। दुर्वासामुनि यद्यपि स्वात्माराम और दयालु थे तथापि क्रोधको नहीं छोड़ सके थे। उन्होंने मोहवश पत्नीको शाप दे दिया—'अरी तू राखका ढेर बन जा।' मुनिके संकेतमात्रसे वह जलकर भस्म हो गयी। जो ऐसी उच्छृङ्खला स्त्रियाँ हैं, उनका तीनों लोकोंमें कल्याण नहीं होता। शरीरके भस्म हो जानेपर आत्माका प्रतिबिम्बरूप जीव आकाशमें स्थित हो पतिसे विनयपूर्वक बोला। जीवने कहा—हे नाथ! आप अपनी ज्ञान- दृष्टिसे सदा सब कुछ देखते हैं। सर्वज्ञ होनेके कारण आपको सब कुछका ज्ञान है। फिर मैं आपको क्या समझाऊँ! उत्तम वचन, कटु वचन, क्रोध, संताप, लोभ, मोह, काम, क्षुधा, पिपासा, स्थूलता, कृशता, नाश, दृश्य, अदृश्य तथा उत्पन्न होना—ये सब शरीरके धर्म हैं। न तो जीवके धर्म हैं और न आत्माके ही। सत्त्व, रज और तम— इन तीन गुणोंसे शरीर बना है। वह भी नाना प्रकारका है। सुनिये, मैं आपको बताती हूँ। किसी शरीरमें सत्त्वगुणकी अधिकता होती है, किसीमें रजोगुणकी और किसीमें तमोगुणकी। मुने! कहीं भी सम गुणोंवाला शरीर नहीं है। जब सत्त्वगुणका उद्रेक होता है तब मोक्षकी इच्छा जाग्रत् होती है, रजोगुणकी वृद्धिसे कर्म करनेकी इच्छा प्रबल होती है और तमोगुणसे जीव-हिंसा, क्रोध एवं अहंकार आदि दोष प्रकट होते हैं। क्रोधसे निश्चय ही कटु वचन बोला जाता है। कटु वचनसे शत्रुता होती है और शत्रुतासे मनुष्यमें तत्काल अप्रियता आ जाती है। अन्यथा इस भूतलपर कौन किसका शत्रु है? कौन प्रिय है और कौन अप्रिय ? कौन मित्र है और कौन वैरी ? सर्वत्र शत्रु और मित्रकी भावनामें इन्द्रियाँ ही बीज हैं। स्त्रियोंके लिये पति प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है और पतिके लिये स्त्री प्राणोंसे भी बढ़कर प्यारी है। फिर भी दुर्वचनके कारण एक क्षणमें हम दोनोंके बीच तत्काल शत्रुता पैदा हो गयी। प्रभो! जो बीत गया सो गया। यह सब काम-दोषसे हुआ था। अब आप मेरा सारा अपराध क्षमा कर दें और बतावें इस समय मुझे क्या करना चाहिये। मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ ? कहाँ मेरा जन्म होगा? मैं तीनों लोकोंमें आपके सिवा किसीकी भार्या नहीं होऊँगी। यों कहकर कन्दलीका जीवात्मा मौन हो गया। इधर शोकसे अचेत हो दुर्वासामुनि मूर्च्छित हो गये। वे स्वात्माराम और महाज्ञानी होकर भी अपनी चेतना खो बैठे। चतुर पुरुषोंके लिये नारीका वियोग सब शोकोंसे बढ़कर होता है। एक ही क्षणमें उन्हें चेत हुआ और वे अपने प्राण त्याग देनेको उद्यत हो गये। उन्होंने वहीं योगासन लगाकर वायुधारणा आरम्भ की। इतनेहीमें एक ब्राह्मण-बालक वहाँ आ पहुँचा। उसके हाथमें दण्ड और चक्र था। उसने लाल वस्त्र धारण किया था और ललाटमें उत्तम चन्दन लगा रखा था। उसकी अङ्गकान्ति श्याम थी। वह ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान था। उसकी अवस्था बहुत छोटी थी; परंतु वह शान्त, ज्ञानवान् तथा वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ जान पड़ता था। उसे देख दुर्वासाने वेगपूर्वक प्रणाम किया, वहीं बैठाया और भक्तिभावसे उसका पूजन किया। ब्राह्मण वटुकने मुनिको शुभाशीर्वाद दे वार्तालाप आरम्भ किया। उसके दर्शन और आशीर्वादसे मुनिका सारा दुःख दूर हो गया। वह नीतिविशारद विचक्षण बालक क्षणभर चुप रहकर अमृतमयी वाणीमें बोला। शिशुने कहा—सर्वज्ञ विप्र ! आप गुरुमन्त्रके प्रसादसे सब कुछ जानते हैं; फिर भी शोकसे कातर हो रहे हैं; अतः मैं पूछता हूँ, इसका यथार्थ रहस्य क्या है? ब्राह्मणोंका धर्म तप है। तपस्यासे तीनों लोकोंको वशमें किया जा सकता है। मुने ! इस
| ५४६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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समय अपने धर्म—तपस्याको छोड़कर आप क्या करने जा रहे हो? त्रिभुवनमें कौन किसकी पत्नी है और कौन किसका पति? भगवान् श्रीहरि मूर्खोंको बहलानेके लिये मायासे इन सम्बन्धोंकी सृष्टि करते हैं। यह कन्दली आपकी मिथ्या पत्नी थी; इसीलिये अभी क्षणभरमें चली गयी। जो सत्य है, वह कभी तिरोहित नहीं होता। मिथ्या वही है, जिसकी चिरकालतक स्थिति न रहे। वसुदेव-पुत्री एकानंशा, जो श्रीकृष्णकी बहिन है, पार्वतीके अंशसे उत्पन्न हुई है। वह सुशीला और चिरजीविनी है। वह सुन्दरी प्रत्येक कल्पमें आपकी पत्नी होगी; अतः आप कुछ दिनोंतक प्रसन्नतापूर्वक तपस्यामें मन लगाइये। कन्दली इस भूतलपर 'कन्दली' जाति होगी। वह कल्पान्तरमें शुभदा, फलदायिनी, कमनीया, एक संतान देनेवाली, परम दुर्लभा तथा शान्तरूपा स्त्री होकर आपकी पत्नी होगी। जो अत्यन्त उच्छृङ्खल हो, उसका दमन करना उचित ही है; ऐसा श्रुतिमें सुना गया है (अतः उसके भस्म होनेसे आपको शोक नहीं करना चाहिये)।
यों कहकर ब्राह्मणरूपधारी श्रीहरि ब्रह्मर्षि दुर्वासाको ज्ञान दे शीघ्र ही वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तब मुनिने सारा भ्रम छोड़कर तपस्यामें मन लगाया। कन्दली इस धरातलपर कन्दली जाति हो गयी। मुने! दैत्य साहसिक तालवनमें जाकर गदहा हो गया और तिलोत्तमा यथासमय बाणासुरकी पुत्री हुई। फिर श्रीहरिके चक्रसे मारा जाकर अपने प्राणोंका परित्याग करके दैत्यराज साहसिकने गोविन्दके उस परम अभीष्ट चरणारविन्दको प्राप्त कर लिया जो मुनिके लिये भी परम दुर्लभ है। तिलोत्तमा भी बाण-पुत्री उषाके रूपमें जन्म ले श्रीकृष्ण-पौत्र अनिरुद्धके आलिङ्गनसे सफलमनोरथ होकर समयानुसार पुनः अपने निवासस्थान—स्वर्गलोकको चली गयी। इस प्रकार श्रीकृष्णके इस उत्तम लीलोपाख्यानको पितासे सुनकर मैंने तुमसे कहा है। यह पद-पदमें सुन्दर है। अब और क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय २४)
महर्षि और्वद्वारा दुर्वासाको शाप, दुर्वासाका अम्बरीषके यहाँ द्वादशीके दिन पारणाके समय पहुँचकर भोजन माँगना, वसिष्ठजीकी आज्ञासे अम्बरीषका पारणाकी पूर्तिके लिये भगवान्का चरणोदक पीना, दुर्वासाका राजाको मारनेके लिये कृत्या-पुरुष उत्पन्न करना, सुदर्शनचक्रका कृत्याको मारकर मुनिका पीछा करना, मुनिका कहीं भी आश्रय न पाकर वैकुण्ठमें जाना, वहाँसे भगवान्की आज्ञाके अनुसार अम्बरीषके घर आकर भोजन करना तथा आशीर्वाद देकर अपने आश्रमको जाना
**नारदजीके पूछनेपर भगवान् श्रीनारायणने कहा—**मुने! महर्षि और्व सरस्वती नदीके तटपर तपस्या कर रहे थे; उन्हें ध्यानसे अपनी पुत्रीके मरणका वृत्तान्त ज्ञात हो गया। तब वे शोकाकुल होकर दुर्वासाके पास आये। दुर्वासाने श्वशुरको प्रणाम करके सब बातें बतायीं और उस घटित घटनाके लिये महान् दुःख प्रकट किया। मुनिवर और्वने दुर्वासाको उलाहना दिया और कहा—'तुमने बहुत थोड़े अपराधपर उसको भारी दण्ड दे दिया। यदि उसे भस्म न करके त्याग ही दिया होता तो वह मेरे ही पास रह जाती।' फिर रोषसे भरकर शाप दे दिया कि 'तुम्हारा पराभव होगा।' इतना कहकर मुनि और्व लौट गये। यह कथा सुनकर नारदजीने दुर्वासाके पराभवका इतिहास पूछा।
**नारद बोले—**भगवन्! दुर्वासा साक्षात्
श्रीराधाकी प्रार्थनासे भगवान्का सब वस्तुएँ लौटा देना, व्रतका विधान, दुर्गाका ध्यान, गौरी-व्रतकी कथा, लक्ष्मीस्वरूपा वेदवतीका सीता होकर इस व्रतके प्रभावसे श्रीरामको पतिरूपमें पाना, सीताद्वारा की हुई पार्वतीकी स्तुति, श्रीराधा आदिके द्वारा व्रतान्तमें दान, देवीका उन सबको दर्शन देकर राधाको स्वरूपकी स्मृति कराना, उन्हें अभीष्ट वर देना तथा श्रीकृष्णका राधा आदिको पुनः दर्शनसम्बन्धी मनोवाञ्छित वर देना
• श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५४७ भगवान् शंकरके अंश हैं तथा तेजमें भी उन्हींके समान हैं। फिर कौन ऐसा महातेजस्वी पुरुष था, जिसने उनका भी पराभव कर दिया ? भगवान् श्रीनारायणने कहा - मुने ! सूर्यवंशमें अम्बरीष नामसे प्रसिद्ध एक राजाधिराज (सम्राट्) हो गये हैं। उनका मन सदा श्रीकृष्णके चरणकमलोंके चिन्तनमें ही लगा रहता था। राज्यमें, रानियोंमें, पुत्रोंमें, प्रजाओंमें तथा पुण्य कर्मोंद्वारा अर्जित की हुई सम्पत्तियोंमें भी उनका चित्त क्षणभरके लिये भी नहीं लगता था। वे धर्मात्मा नरेश दिन-रात सोते-जागते हर समय प्रसन्नतापूर्वक श्रीहरिका ध्यान किया करते थे। राजा अम्बरीष बड़े भारी जितेन्द्रिय, शान्तस्वरूप तथा विष्णुसम्बन्धी व्रतोंके पालनमें तत्पर रहते थे। वे एकादशीका व्रत रखते और श्रीकृष्णकी आराधनामें संलग्न रहते थे। उनके सारे कर्म श्रीकृष्णको समर्पित थे और वे उनमें कभी लिप्त नहीं होते थे। भगवान्का सोलह अरोंसे युक्त और अत्यन्त तीक्ष्ण जो सुदर्शन नामक चक्र है, वह करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान तथा श्रीहरिके ही तुल्य तेजस्वी है। ब्रह्मा आदि भी उसकी स्तुति करते हैं। वह अस्त्र देवताओं और असुरोंसे भी पूजित है। भगवान्ने अपने उस चक्रको राजाकी निरन्तर रक्षाके लिये उनके पास ही रख दिया था। एक समयकी बात है। राजा अम्बरीष एकादशी-व्रतका अनुष्ठान करके द्वादशीके दिन समयानुसार विधिपूर्वक स्नान और पूजन करके ब्राह्मणोंको भोजन करा स्वयं भी भोजनके लिये बैठे। इसी समय तपस्वी ब्राह्मण दुर्वासा भूखसे व्याकुल हो वहाँ राजाके समक्ष आ गये। उन्होंने दण्ड और छत्र ले रखा था, उनके शरीरपर श्वेत वस्त्र शोभा पा रहे थे। ललाटमें उज्ज्वल तिलक चमक रहा था। सिरपर जटाएँ थीं और शरीर अत्यन्त कृश हो रहा था। वे त्रस्त-से जान पड़ते थे। उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे। मुनीन्द्रपर दृष्टि पड़ते ही राजाने उठकर उन्हें प्रणाम किया और प्रसन्नतापूर्वक पैर धोनेके लिये जल प्रस्तुत करके बैठनेको स्वर्णका सिंहासन दिया। विप्रवर दुर्वासा उन्हें आशीर्वाद देकर उस सुखद आसनपर बैठे। तब राजाने भयभीत होकर उनसे पूछा-'मुने! मेरे लिये आपकी क्या आज्ञा है? यह मुझे बताइये।' राजाकी बात सुनकर मुनिवर दुर्वासाने कहा- 'नृपश्रेष्ठ ! मैं भूखसे पीड़ित होकर यहाँ आया हूँ। अतः मुझे भोजन कराओ; परंतु मैं अघमर्षण-मन्त्रका जप करके शीघ्र ही आ रहा हूँ, क्षणभर प्रतीक्षा करो।' ऐसा कहकर मुनि चले गये। ब्राह्मण दुर्वासाके चले जानेपर राजर्षि अम्बरीषको बड़ी भारी चिन्ता हुई। द्वादशी तिथि प्रायः बीत चली है; यह देख वे डर गये। इसी समय गुरु वसिष्ठ वहाँ आ गये। तब प्रसन्नतापूर्वक उन्हें नमस्कार करके राजाने सारी बातें उन्हें बतायीं और पूछा- 'गुरुदेव ! मुनिवर दुर्वासा अभीतक आ नहीं रहे हैं और पारणाके लिये विहित द्वादशी तिथि बीती जा रही है। ऐसे संकटके समय मुझे क्या करना चाहिये ? इसपर भलीभाँति विचार करके मुझे शीघ्र बताइये कि क्या करना शुभ है और क्या अशुभ ?' वसिष्ठजीने कहा - द्वादशीको बिताकर त्रयोदशीमें पारण करना पाप है और अतिथिसे पहले भोजन कर लेना भी पाप है। ऐसी दशामें तुम भोजन न करके भगवान्का चरणोदक ले लो। इससे पारणा भी हो जायगी और अतिथिकी अवहेलना भी नहीं होगी। महामुने ! ऐसा कहकर ब्रह्मपुत्र वसिष्ठजी चुप हो गये। राजाने श्रीकृष्ण-चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए थोड़ा-सा चरणोदक पी लिया। ब्रह्मन् ! इतनेमें ही मुनीश्वर दुर्वासा आ पहुँचे। वे सर्वज्ञ तो थे ही, अपना अपमान समझकर
५४८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण कुपित हो उठे। उन्होंने राजाके सामने ही अपनी एक जटा तोड़ डाली। उस जटासे शीघ्र ही एक पुरुष प्रकट हुआ, जो अग्निशिखाके समान तेजस्वी था। उसके हाथमें तलवार थी। वह महाभयंकर पुरुष महाराज अम्बरीषको मार डालनेके लिये उद्यत हो गया। यह देख करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान श्रीहरिके सुदर्शनचक्रने उस कृत्या-पुरुषको काट डाला। अब वह बाबा दुर्वासाको भी काटनेके लिये उद्यत हुआ। यह देख विप्रवर दुर्वासा भयसे व्याकुल हो भाग चले। उन्होंने अपने पीछे-पीछे प्रज्वलित अग्निशिखाके समान तेजस्वी चक्रको आते देखा। वे अत्यन्त व्याकुल हो सारे ब्रह्माण्डका चक्कर लगाते- लगाते थक गये, खिन्न हो गये और ब्रह्माजीको सम्पूर्ण जगत्का रक्षक मान उनकी शरणमें गये। 'बचाइये-बचाइये' - पुकारते हुए उन्होंने ब्रह्माजीकी सभामें प्रवेश किया। ब्रह्माजीने उठकर विप्रवर दुर्वासाका कुशल-मङ्गल पूछा। तब उन्होंने आदिसे ही सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कह सुनाया। सुनकर ब्रह्माजीने लम्बी साँस ली और भयसे व्याकुल होकर कहा। ब्रह्माजीने कहा- बेटा! तुम किसके बलपर श्रीहरिके दासको शाप देने गये थे? जिसके रक्षक भगवान् हैं, उसको तीनों लोकोंमें कौन मार सकता है? भक्तवत्सल श्रीहरिने छोटे- बड़े सभी भक्तोंकी रक्षाके लिये सुदर्शनचक्रको सदा नियुक्त कर रखा है। जो मूढ़ श्रीविष्णुके लिये प्राणोंके समान प्रिय वैष्णव भक्तसे द्वेष रखता है, उसका संहार भगवान् विष्णु स्वयं करते हैं। वे श्रीहरि संहारकर्ताका भी संहार करनेमें समर्थ हैं। अतः बेटा! तुम शीघ्र किसी दूसरे स्थानमें जाओ। अब यहाँ तुम्हारी रक्षा नहीं हो सकती। यदि नहीं हटे तो सुदर्शनचक्र मेरे साथ ही तुम्हारा वध कर डालेगा। ब्रह्माजीकी बात सुनकर ब्राह्मणदेवता दुर्वासा वहाँसे भयभीत होकर भागे। अब वे डरकर कैलास पर्वतपर भगवान् शंकरकी शरणमें गये और बोले - 'कृपानिधान! हमारी रक्षा कीजिये।' भगवान् शिव सर्वज्ञ हैं। उन्होंने ब्राह्मण दुर्वासाका कुशल-समाचारतक नहीं पूछा। जो क्षणभरमें जगत्का संहार करनेमें समर्थ तथा दीन-दुःखियोंके स्वामी हैं, वे महादेवजी मुनिसे बोले। शंकरजीने कहा - द्विजश्रेष्ठ! सुस्थिर होकर मेरी बात सुनो। मुने! तुम महर्षि अत्रिके पुत्र तथा जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीके पौत्र हो। वेदोंके विद्वान् तथा सर्वज्ञ हो, परंतु तुम्हारा कर्म मूर्खोंके समान है। वेदों, पुराणों और इतिहासोंमें सर्वत्र जिन सर्वेश्वरका निरूपण हुआ है; उन्हींको तुम मूढ़ मनुष्यकी भाँति नहीं जानते हो। जिनके भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे मैं, ब्रह्मा, रुद्र, आदित्य, वसु, धर्म, इन्द्र, सम्पूर्ण देवता, मुनीन्द्र और मनु उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं; उन्हीं श्रीहरिके प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय भक्तको तुम किसकी शक्तिसे मारने चले थे? उनका चक्र उन्हींके तुल्य तेजस्वी है। उसे रोकना सर्वथा कठिन है। उस चक्रको यद्यपि उन्होंने भक्तोंकी रक्षामें लगा रखा है, तथापि उन्हें उसपर पूरा भरोसा नहीं होता। इसलिये वे स्वयं उनकी रक्षा करनेके लिये जाते हैं। उनके मुँहसे अपने गुणों और नामोंका श्रवण करके उन्हें बड़ा आनन्द मिलता है। इसलिये भगवान् भक्तके साथ सदा छायाकी तरह घूमते रहते हैं। अतः ब्राह्मणदेव! गोविन्दका भजन करो। उनके चरणकमलोंका चिन्तन करो। श्रीहरिके स्मरणमात्रसे भी सारी आपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। अब शीघ्र ही वैकुण्ठधाममें जाओ। उस धामके अधिपति श्रीहरि ही तुम्हारे शरणदाता हैं। वे प्रभु दयाके सागर हैं; अतः तुम्हें अवश्य ही अभयदान देंगे। ये बातें हो ही रही थीं कि सारा कैलास चक्रके तेजसे व्याप्त हो उठा, जैसे समस्त
·· श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५४९ भूमण्डल सूर्यकी किरणोंसे उद्दीप्त हो उठा हो। उस समय सम्पूर्ण कैलासवासी उस चक्रकी विकराल ज्वालासे संतप्त हो 'त्राहि-त्राहि' पुकारते हुए भगवान् शंकरकी शरणमें गये। उस दुःसह चक्रको देख पार्वतीसहित करुणानिधान भगवान् शंकरने ब्राह्मणको प्रेमपूर्वक आशीर्वाद देते हुए कहा- 'यदि तेज सत्य है और चिरकालसे संचित तप सत्य है तो अपराध करके भयभीत हुआ यह ब्राह्मण संतापसे मुक्त हो जाय।' पार्वती बोलीं- यह ब्राह्मण मेरे स्वामीके पुण्यकर्मोंके अवसरपर शरणमें आया है; अतः मेरे आशीर्वादसे इसका महान् भय दूर हो जाय और यह शीघ्र ही संतापसे छूट जाय। कृपापूर्वक ऐसा कहकर पार्वती और शिव चुप हो गये। मुनिने उन्हें प्रणाम करके देवेश्वर वैकुण्ठनाथकी शरण ली। मनके समान तीव्र गतिसे चलनेवाले मुनीश्वर दुर्वासा वैकुण्ठभवनमें जाकर सुदर्शनको अपने पीछे-पीछे आते देख श्रीहरिके अन्तःपुरमें घुस गये। वहाँ ब्राह्मणने श्रीनारायणदेवके दर्शन किये। वे रत्नमय सिंहासनपर विराजमान थे। उनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म शोभा पाते थे। उन परम प्रभुने पीताम्बर धारण कर रखा था। उनके चार भुजाएँ थीं। अङ्गकान्ति श्याम थी। वे शान्त-स्वरूप लक्ष्मी- कान्त अपने दिव्य सौन्दर्यसे मनको मोह लेते थे। रत्नमय अलंकारोंकी शोभा उन्हें और भी श्री- सम्पन्न बना रही थी। गलेमें रत्नमयी मालासे वे विभूषित थे। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर दिखायी देते थे। उत्तम रत्नोंके सार- तत्त्वसे निर्मित मुकुट धारण करके उनका मस्तक अनुपम ज्योतिसे जगमगा रहा था। श्रेष्ठ पार्षदगण हाथोंमें श्वेत चँवर लिये प्रभुकी सेवा कर रहे थे। कमला उनके चरणकमलोंकी सेवामें लगी थीं। सरस्वती सामने खड़ी हो स्तुति करती थीं। सुनन्द, नन्द, कुमुद और प्रचण्ड आदि पार्षद उन्हें घेरकर खड़े थे। ऐसे प्रभुको देख दुर्वासाने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर प्रणाम किया और सामवेदवर्णित स्तुतिके द्वारा उन परमेश्वरका स्तवन किया। दुर्वासा बोले- कमलाकान्त ! मेरी रक्षा कीजिये। करुणानिधे ! मुझे बचाइये। प्रभो ! आप दीनोंके बन्धु और अत्यन्त दुः खियोंके स्वामी हैं। दयाके सागर हैं। वेद-वेदाङ्गोंके स्रष्टा विधाताके भी विधाता हैं। मृत्युकी भी मृत्यु और कालके भी काल हैं। मैं संकटके समुद्रमें पड़ा हूँ। मेरी रक्षा कीजिये। आप संहारकर्ताके भी संहारक, सर्वेश्वर और सर्वकारण हैं। महाविष्णुरूपी वृक्षके बीज हैं। प्रभो ! इस भवसागरसे मेरी रक्षा कीजिये। शरणागत एवं शोकाकुल जनोंका भय दूर करके उनकी रक्षामें लगे रहनेवाले भगवन् ! मुझ भयभीतका उद्धार कीजिये। नारायण ! आपको नमस्कार है। वेदोंमें जिन्हें आदिसत्ता कहा गया है, वेद भी जिनकी स्तुति नहीं कर सकते और सरस्वती भी जिनके स्तवनमें जडवत् हो जाती हैं; उन्हीं प्रभुकी दूसरे विद्वान् क्या स्तुति कर सकते हैं ? शेष सहस्र मुखोंसे जिनकी स्तुति करनेमें जडभावको प्राप्त होते हैं, पञ्चमुख महादेव और चतुर्मुख ब्रह्मा भी जडीभूत हो जाते हैं, श्रुतियाँ, स्मृतिकार और वाणी भी जिनकी स्तुतिमें अपनेको असमर्थ पाती हैं; उन्हींका स्तवन मुझ-जैसा ब्राह्मण कैसे कर सकता है ? मानद ! मैं वेदोंका ज्ञाता क्या हूँ, वेदवेत्ता विद्वानोंका शिष्य हूँ। मुझमें आपकी स्तुति करनेकी क्या योग्यता है ? अट्ठाईसवें मनु और महेन्द्रके समाप्त हो जानेपर जिनका एक दिन- रातका समय पूरा होता है, वे विधाता अपने वर्षसे एक सौ आठ वर्षतक जीवित रहते हैं। परंतु जब उनका भी पतन होता है, तब आपके नेत्रोंकी एक पलक गिरती है; ऐसे अनिर्वचनीय परमेश्वरकी मैं क्या स्तुति कर सकूँगा ? प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये।
५५० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
इस प्रकार स्तुति करके भयसे विह्वल हुए दुर्वासा श्रीहरिके चरणकमलोंमें गिर पड़े और अपने अश्रुजलसे उन्हें सींचने लगे। दुर्वासाद्वारा किये गये परमात्मा श्रीहरिके इस सामवेदोक्त जगन्मङ्गल नामक पुण्यदायक स्तोत्रका जो संकटमें पड़ा हुआ मनुष्य भक्तिभावसे पाठ करता है, नारायणदेव कृपया शीघ्र आकर उसकी रक्षा करते हैं।
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! मुनिकी की हुई स्तुति सुनकर भक्तवत्सल भगवान् वैकुण्ठनाथ हँसकर अमृतकी वर्षा-सी करती हुई मधुर वाणीमें बोले।
श्रीभगवान्ने कहा—मुने! उठो, उठो। मेरे वरसे तुम्हारा कल्याण होगा; परंतु मेरा नित्य सत्य एवं सुखदायक वचन सुनो। ब्राह्मणदेव! वेदों, पुराणों और इतिहासोंमें वैष्णवोंकी जो महिमा गायी गयी है, उसे सबने और सर्वत्र सुना है। मैं वैष्णवोंके प्राण हूँ और वैष्णव मेरे प्राण हैं। जो मूढ़ उन्हींसे द्वेष करता है, वह मेरे प्राणोंका हिंसक है। जो अपने पुत्रों, पौत्रों और पत्नियों तथा राज्य और लक्ष्मीको भी त्यागकर सदा मेरा ही ध्यान करते हैं, उनसे बढ़कर मेरा प्रिय और कौन हो सकता है? भक्तसे बढ़कर न मेरे प्राण हैं, न लक्ष्मी हैं, न शिव हैं, न सरस्वती हैं, न ब्रह्मा हैं, न पार्वती हैं और न गणेश ही हैं। ब्राह्मण, वेद और वेदमाता सरस्वती भी मेरी दृष्टिमें भक्तोंसे बढ़कर नहीं हैं। इस प्रकार मैंने सब सच्ची बात कही है। यह वास्तविक सार तत्त्व है। मैंने भक्तोंकी प्रशंसाके लिये कोई बात बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कही है। वे वास्तवमें मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। जो मेरे प्राणाधिक प्रिय भक्तोंसे द्वेष करते हैं, उनको मैं शीघ्र ही दण्ड देता हूँ और परलोकमें भी चिरकालतक उन्हें नरकयातना भोगनी पड़ती है। मैं सबकी उत्पत्तिका कारण तथा सबका ईश्वर और परिपालक हूँ। सर्वव्यापी एवं स्वतन्त्र हूँ, तथापि दिन-रात भक्तोंके अधीन रहता हूँ। गोलोकमें मेरा द्विभुज रूप है और वैकुण्ठमें चतुर्भुज। यह रूपमात्र ही उन-उन लोकोंमें रहता है; किंतु मेरे प्राण तो सदा भक्तोंके समीप ही रहते हैं। भक्तका दिया हुआ अन्न साधारण हो तो भी मेरे लिये सादर भक्षण करनेयोग्य है; परंतु अभक्तका दिया हुआ अमृतके समान मधुर द्रव्य भी मेरे लिये अभक्ष्य है। ब्रह्मन्! राजाओंमें श्रेष्ठ अम्बरीष निरीह हैं—सब प्रकारकी इच्छाएँ छोड़ चुके हैं। कभी किसीकी हिंसा नहीं करते हैं। स्वभावसे दयालु हैं और समस्त प्राणियोंके हितमें लगे रहते हैं। ऐसे महात्मा पुरुषका वध तुम क्यों करना चाहते हो? जो संत महापुरुष सदा समस्त प्राणियोंपर दया करते हैं; उनसे द्वेष रखनेवाले मूढ़जनोंका वध मैं स्वयं करता हूँ। जो भक्तोंका हिंसक है, शत्रु है, उसकी रक्षा करनेमें मैं असमर्थ हूँ। अतः तुम अम्बरीषके घर जाओ। वे ही तुम्हारी रक्षा कर सकते हैं।
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! भगवान् श्रीहरिका वह वचन सुनकर ब्राह्मण दुर्वासा भयसे व्याकुल हो गये। उनके मनमें बड़ा खेद हुआ और वे श्रीकृष्णचरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए वहीं खड़े रहे। इसी समय वहाँ ब्रह्मा, शिव,
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५५१
पार्वती, धर्म, इन्द्र, रुद्र, दिक्पाल, ग्रह, मुनिगण, अत्रि, लक्ष्मी, सरस्वती, पार्षद तथा नर्तकगण आये और सबने दुर्वासाके अपराधको क्षमा करके उनकी रक्षा करनेके लिये भगवान् विष्णुसे करुण-प्रार्थना की।
[ तब ] श्रीभगवान् बोले—आप सब लोग मेरा नीतियुक्त और सुखदायक वचन सुनें। मैं आपकी आज्ञासे ब्राह्मणकी रक्षा अवश्य करूँगा; किंतु ये मुनि वैकुण्ठलोकसे पुनः राजा अम्बरीषके घर जायँ और उनकी प्रसन्नताके लिये वहीं पारणा करें। ये ब्रह्मर्षि अम्बरीषके अतिथि होकर भी बिना किसी अपराधके उन्हें शाप देनेको उद्यत हो गये। इसलिये अपने रक्षणीय राजाकी रक्षाके लिये सुदर्शनचक्र इन ब्राह्मणदेवताको ही मार डालनेके लिये उद्यत हो गया। इन्हें भयभीत होकर भागते हुए आज पूरा एक वर्ष हो गया। तभीसे इनके लिये शोकग्रस्त हुए महाराज अम्बरीष अपनी पत्नीसहित उपवास कर रहे हैं। भक्तके उपवास करनेके कारण मैं भी उपवास करता हूँ। जैसे माता दूध-पीते बच्चेको उपवास करते देख स्वयं भी भोजन नहीं करती, वही दशा मेरी है। मेरे आशीर्वादसे मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा शीघ्र ही संतापमुक्त हो जायँगे। मार्गमें मेरा चक्र इनकी हिंसा नहीं करेगा। इनके भोजन करनेसे मेरा भक्त भोजन करेगा और तभी मैं भी आज निश्चिन्त होकर सुखसे भोजन करूँगा; यह निश्चित बात है। भक्तके द्वारा प्रीतिपूर्वक जो वस्तु मुझे दी जाती है, उसे मैं अमृतके समान मधुर मानकर ग्रहण करता हूँ। लक्ष्मीके हाथसे परोसे गये पदार्थको भी भक्तके दिये बिना मैं नहीं खा सकता। जिस पदार्थको भक्तने नहीं दिया, वह मुझे तृप्ति नहीं दे सकता। वत्स! महाप्राज्ञ मुनीन्द्र! तुम राजा अम्बरीषके घर जाओ तथा ये सब देवता, देवियाँ और मुनि अपने-अपने घरको पधारें।
ऐसा कहकर श्रीहरि तुरंत ही अपने अन्तःपुरमें चले गये तथा अन्य सब लोग उन जगदीश्वरको प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानको लौट गये। मनके समान तीव्र गतिसे चलनेवाले ब्राह्मण दुर्वासा राजा अम्बरीषके घरको गये। साथ ही करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान सुदर्शनचक्र भी गया। एक वर्षतक उपवास करनेके बाद राजाके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे। वे सिंहासनपर बैठे हुए थे। उसी समय उन्होंने मुनिवर दुर्वासाको सामने देखा। देखते ही वे बड़े वेगसे उठे और तत्काल उनके चरणोंमें प्रणाम करके सादर भोजनके लिये ले गये। राजाने मुनिको स्वादिष्ट अन्न भोजन कराकर फिर स्वयं भी अन्न ग्रहण किया। भोजन करके संतुष्ट हुए द्विजश्रेष्ठ दुर्वासाने उन्हें उत्तम आशीर्वाद दिया। बारंबार उनकी प्रशंसा की। तदनन्तर उन्होंने शीघ्र ही अपने आश्रमको प्रस्थान किया। मार्गमें वे विप्रवर आश्चर्यचकित हो मन-ही-मन कहने लगे—'अहो! वैष्णवोंका माहात्म्य दुर्लभ है।'
(अध्याय २५)
५५२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण एकादशीव्रतका माहात्म्य, इसे न करनेसे हानि, व्रतके सम्बन्धमें आवश्यक निर्णय, व्रतका विधान—छः देवताओंका पूजन, श्रीकृष्णका ध्यान और षोडशोपचार- पूजन तथा कर्ममें न्यूनताकी पूर्तिके लिये भगवान्से प्रार्थना तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर एकादशीका माहात्म्य बताते हुए श्रीनारायणने कहा-मुने ! यह एकादशीव्रत देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। यह श्रीकृष्णप्रीतिका जनक तथा तपस्वियोंका श्रेष्ठ तप है। जैसे देवताओंमें श्रीकृष्ण, देवियोंमें प्रकृति, वर्णोंमें ब्राह्मण तथा वैष्णवोंमें भगवान् शिव श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार व्रतोंमें यह एकादशीव्रत श्रेष्ठ है। यह चारों वर्णोंके लिये सदा ही पालनीय व्रत है। यतियों, वैष्णवों तथा विशेषतः ब्राह्मणोंको तो इस व्रतका पालन अवश्य करना चाहिये। सचमुच ही ब्रह्महत्या आदि सारे पाप एकादशीके दिन चावल (भात)-का आश्रय लेकर रहते हैं। जो मन्द-बुद्धि मानव इतने पापोंका भक्षण करते हुए चावल खाता है, वह इस लोकमें अत्यन्त पातकी है और अन्तमें निश्चय ही नरकगामी होता है। दशमीके लङ्घनमें जो दोष है, उसे बताता हूँ; सुनो। पूर्वकालमें धर्मके मुखसे मैंने इसका श्रवण किया था। जो मूढ़ जान-बूझकर कलामात्र दशमीका लङ्घन करता है, उसे तुरंत ही दारुण शाप देकर लक्ष्मी उसके घरसे निकल जाती हैं। इस लोकमें निश्चय ही उसके वंशकी और यशकी भी हानि होती है। जिस दिन दशमी, एकादशी और द्वादशी तीनों तिथियाँ हों, उस दिन भोजन करके दूसरे दिन उपवास-व्रत करना चाहिये। द्वादशीको व्रत करके त्रयोदशीको पारण करना चाहिये। उस दशामें व्रतधारियोंको द्वादशी-लङ्घनसे दोष नहीं होता। जब पूरे दिन और रातमें एकादशी हो तथा उसका कुछ भाग दूसरे दिन प्रातःकालतक चला गया हो, तब दूसरे दिन ही उपवास करना चाहिये। यदि परा तिथि बढ़कर साठ दण्डकी हो गयी हो और प्रातःकाल तीन तिथियोंका स्पर्श हो तो गृहस्थ पूर्व दिनमें ही व्रत करते हैं; यति आदि नहीं। उन्हें दूसरे दिन उपवास करके नित्य-कृत्य करना चाहिये। दो दिन एकादशी हो तो भी व्रतमें सारा जागरण-सम्बन्धी कार्य पहली ही रातमें करे। पहले दिनमें व्रत करके दूसरे दिन एकादशी बीतनेपर पारण करे। वैष्णवों, यतियों, विधवाओं, भिक्षुओं एवं ब्रह्मचारियोंको सभी एकादशियोंमें उपवास करना चाहिये। वैष्णवेतर गृहस्थ शुक्लपक्षकी एकादशीको ही उपवास-व्रत करते हैं। अतः नारद! उनके लिये कृष्णा एकादशीका लङ्घन करनेपर भी वेदोंमें दोष नहीं बताया गया है। हरिशयनी और हरिबोधिनी-इन दो एकादशियोंके बीचमें जो कृष्णा एकादशियाँ आती हैं, उन्हींमें गृहस्थ पुरुषको उपवास करना चाहिये। इनके सिवा दूसरी किसी कृष्णपक्षकी एकादशीमें गृहस्थ पुरुषको उपवास नहीं करना चाहिये। ब्रह्मन् ! इस प्रकार एकादशीके विषयमें निर्णय कहा गया, जो श्रुतिमें प्रसिद्ध है। अब इस व्रतका विधान बताता हूँ, सुनो। दशमीके दिन पूर्वाह्नमें एक बार हविष्यान्न भोजन करे। उसके बाद उस दिन फिर जल भी न ले। रातमें कुशकी चटाईपर अकेला शयन करे और एकादशीके दिन ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर प्रातःकालिक कार्य करके नित्य-कृत्य पूर्ण करनेके पश्चात् स्नान करे। फिर श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे व्रतोपवासका संकल्प लेकर संध्या-तर्पण करनेके अनन्तर नैत्यिक पूजन आदि करे। दिनमें नैत्यिक पूजन करके व्रतसम्बन्धी आवश्यक सामग्रीका संग्रह करे। षोडशोपचार- सामग्रीका सानन्द संग्रह करके शास्त्रीय विधिसे प्रेरित हो आवश्यक कार्य करे। षोडश उपचारोंके
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
५५३
नाम ये हैं—आसन, वस्त्र, पाद्य, अर्घ्य, पुष्प, अनुलेपन, धूप, दीप, नैवेद्य, यज्ञोपवीत, आभूषण, गन्ध, स्नानीय पदार्थ, ताम्बूल, मधुपर्क और पुनराचमनीय जल—इन सब सामानोंको दिनमें जुटाकर रातमें व्रत-सम्बन्धी पूजनादि कार्य करे।
स्नान आदिसे पवित्र हो धुले हुए धौत और उत्तरीय वस्त्र धारण करके आसनपर बैठे। फिर आचमन-प्राणायामके पश्चात् श्रीहरिको नमस्कार करके स्वस्तिवाचन करे। तदनन्तर शुभ बेलामें सप्तधान्यके ऊपर मङ्गल-कलशकी स्थापना करके उसके ऊपर फल-शाखासहित आम्रपल्लव रखे। कलशमें चन्दनका अनुलेप करे और मुनियोंने वेदोंमें कलशके स्थापन और पूजनकी जो विधि बतायी है, उसका प्रसन्नतापूर्वक सम्पादन करे। फिर अलग-अलग धान्यपुञ्जपर छः देवताओंका आवाहन करके विद्वान् पुरुष उत्कृष्ट पञ्चोपचार-सामग्रीद्वारा उनका पूजन करे। वे छः देवता हैं—गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव तथा पार्वती। इन सबकी पूजा और वन्दना करके श्रीहरिका स्मरण करते हुए व्रत करे। व्रती पुरुष यदि इन छः देवताओंकी आराधना किये बिना नित्य और नैमित्तिक कर्मका अनुष्ठान करता है तो उसका वह सारा कर्म निष्फल हो जाता है। इस प्रकार व्रतकी अङ्गभूत सारी आवश्यक विधि बतायी गयी। इसका काण्वशाखामें वर्णन है। महामुने! अब तुम अभीष्ट व्रतके विषयमें सुनो।
सामवेदमें बताये हुए ध्यानके अनुसार परात्पर भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करके मस्तकपर फूल रखकर फिर ध्यान करे। नारद! मैं गूढ़ ध्यान बता रहा हूँ, जो सबके लिये वाञ्छनीय है। इसे अभक्त पुरुषके सामने नहीं प्रकाशित करना चाहिये। भक्तोंके लिये तो यह ध्यान प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है। भगवान् श्रीकृष्णका शरीर-विग्रह नवीन मेघमालाके समान श्याम तथा सुन्दर है। उनका मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी आभाको तिरस्कृत करता है। वे सर्वश्रेष्ठ एवं परम मनोहर हैं। उनके नेत्र शरत्कालके सूर्योदयकी बेलामें विकसित होनेवाले कमलोंकी प्रभाको छीन लेते हैं। विभिन्न अङ्गोंमें धारित रत्नमय आभूषण उनके अपने ही अङ्गोंकी सौन्दर्य-शोभासे विभूषित होते हैं। गोपियोंके प्रसन्नतापूर्ण एवं अनुरागसूचक नेत्रकोण उन्हें सतत निहारते रहते हैं, मानो भगवान्का शरीर-विग्रह उनके प्राणोंसे ही निर्मित हुआ है। वे रासमण्डलके मध्यभागमें विराजमान तथा रासोल्लासके लिये अत्यन्त उत्सुक हैं। राधाके मुखरूपी शरच्चन्द्रकी सुधाका पान करनेके लिये चकोररूप हो रहे हैं। मणिराज कौस्तुभकी प्रभासे उनका वक्षःस्थल अत्यन्त उद्भासित हो रहा है और पारिजात-पुष्पोंकी विविध मालाओंसे वे अत्यन्त शोभायमान हैं। उनका मस्तक उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित दिव्य मुकुटकी ज्योतिसे जगमगा रहा है। मनोविनोदकी साधनभूता मुरलीको उन्होंने अपने हाथमें ले रखा है। देवता और असुर सभी उनकी पूजा करते हैं। वे ध्यानके द्वारा भी किसीके वशमें आनेवाले नहीं हैं। उन्हें आराधनाद्वारा रिझा लेना भी बहुत कठिन है। ब्रह्मा आदि देवता भी उनकी वन्दना करते हैं और वे समस्त कारणोंके भी कारण हैं; उन परमेश्वर श्रीकृष्णका मैं भजन करता हूँ।
इस विधिसे ध्यान और आवाहन करके पूर्वोक्त सोलह प्रकारकी उपहार-सामग्री अर्पित करते हुए भक्तिभावसे उनका पूजन करे। नारद! निम्नाङ्कित मन्त्रोंसे उन्हें पूजनोपचार अर्पित करने चाहिये।
आसन
परमेश्वर! यह रत्नसारजटित सुवर्णनिर्मित सिंहासन भाँति-भाँतिके विचित्र चित्रोंसे अलंकृत है। इसे ग्रहण कीजिये।
वस्त्र
‘राधावल्लभ! विश्वकर्माद्वारा निर्मित इस दिव्य वस्त्रको प्रज्वलित आगमें धोकर शुद्ध किया गया
५५४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
है। इसका मूल्य वर्णनातीत है। इसे धारण कीजिये।
पाद्य करुणानिधान! आपके चरणोंको पखारनेके लिये सुवर्णमय पात्रमें रखा हुआ यह सुवासित शीतल जल स्वीकार कीजिये।
अर्घ्य भक्तवत्सल! शङ्ख-पात्रमें रखे गये जल, पुष्प, दूर्वा तथा चन्दनसे युक्त यह पवित्र अर्घ्य आपकी सेवामें प्रस्तुत है। इसे ग्रहण कीजिये।
पुष्प सर्वकारण! चन्दन और अगुरुसे युक्त यह सुवासित श्वेत पुष्प शीघ्र ही आपके मनमें आनन्दका संचार करनेवाला है। इसे स्वीकार कीजिये।
अनुलेपन श्रीकृष्ण! चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, कुंकुम और खससे तैयार किया गया यह उत्तम अनुलेपन सबको प्रिय है। इसे ग्रहण कीजिये।
धूप भगवन्! नाना द्रव्योंसे मिश्रित यह सुगन्धयुक्त सुखद धूप वृक्षविशेषका रस है। इसे स्वीकार कीजिये।
दीप प्रभो! रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित तथा दिन-रात भलीभाँति प्रकाशित होनेवाला यह दिव्य दीप अन्धकार-नाशका हेतु है। इसे ग्रहण कीजिये।
नैवेद्य स्वात्माराम! ये नाना प्रकारके स्वादिष्ट, सुगन्धित और पवित्र भक्ष्य, भोज्य तथा चोष्य आदि द्रव्य आपकी सेवामें प्रस्तुत हैं। इन्हें अङ्गीकार कीजिये।
यज्ञोपवीत देवदेवेश्वर! गायत्री-मन्त्रसे दी गयी ग्रन्थिसे युक्त तथा सुवर्णमय तन्तुओंसे निर्मित यह चतुर शिल्पीद्वारा रचित यज्ञोपवीत ग्रहण कीजिये।
भूषण नन्दनन्दन! बहुमूल्य रत्नोंद्वारा रचित दिव्य प्रभासे प्रकाशमान तथा समस्त अवयवोंको विभूषित करनेवाला यह भूषण स्वीकार कीजिये।
गन्ध दीनबन्धो! समस्त मङ्गल-कर्ममें वर्णनीय तथा मङ्गलदायक यह प्रमुख गन्ध सेवामें समर्पित है। इसे स्वीकार कीजिये।
स्नानीय भगवन्! आँवला तथा बिल्वपत्रसे तैयार किया गया यह मनोहर विष्णु-तैल समस्त लोकोंको अभीष्ट है। इसे ग्रहण कीजिये।
ताम्बूल नाथ! जिसे सब चाहते हैं, वह कर्पूर आदिसे सुवासित ताम्बूल मैंने आपकी सेवामें अर्पित किया है। इसे अङ्गीकार कीजिये।
मधुपर्क गोपीकान्त! उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित पात्रमें रखा हुआ यह मधुर मधु बहुत ही मीठा और स्वादिष्ट है। इसके सेवनसे सबको प्रसन्नता होती है। अतः कृपापूर्वक इसे ग्रहण कीजिये।
पुनराचमनीय जल मधुसूदन! यह परम पवित्र, सुवासित और निर्मल गङ्गा-जल पुनः आचमनके लिये अङ्गीकार कीजिये।
इस प्रकार भक्तपुरुष प्रसन्नतापूर्वक सोलह उपचार अर्पित करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे यत्नपूर्वक फूल और माला चढ़ावे।
प्रभो! श्वेत डोरेमें नाना प्रकारके फूलोंसे गुँथा हुआ यह पुष्पहार समस्त आभूषणोंमें श्रेष्ठ है। इसे स्वीकार कीजिये।
इस प्रकार पुष्पमाला अर्पित करके व्रती पुरुष मूल-मन्त्रसे पुष्पाञ्जलि दे और भक्तिभावसे दोनों हाथ जोड़कर भगवान्की स्तुति करे।
८६- गौरीव्रतके पूर्ण होनेपर आकाशसे प्रकट होकर भगवती दुर्गाका मुस्कराते हुए मुखारविन्दसे राधिकाको सम्बोधित कर कहना
·· श्रीकृष्णजन्मखण्ड ·· ५५५
हे श्रीकृष्ण! हे राधाकान्त! हे करुणासागर! हे प्रभो! घोर एवं भयानक संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये। प्रभो! सैकड़ों जन्मोंसे सांसारिक क्लेश भोगनेके कारण मैं उद्विग्न हो उठा हूँ और अपने कर्मपाशरूपी बेड़ियोंसे बँधा हूँ। आप इस बन्धनसे मुझे छुड़ाइये। नाथ! आपके चरणोंमें पड़ा हूँ। मुझ शरणागतकी ओर कृपापूर्वक देखिये। भवपाशके भयसे डरे हुए मुझ शरणापन्नकी रक्षा कीजिये। प्रभो! जो वस्तु भक्तिहीन, क्रियाहीन, विधिहीन तथा वेदमन्त्रोंसे रहित हो और इस प्रकार जिसके समर्पणमें त्रुटि आ गयी हो; उसे आप स्वयं ही पूर्ण कीजिये। हरे! वेदोक्त विधिको न जाननेके कारण अङ्गहीन हुए कर्ममें आपके नामोच्चारणसे ही समस्त न्यूनताओंकी पूर्ति होती है।
इस प्रकार स्तुति और प्रणाम करके ब्राह्मणको दक्षिणा दे और महोत्सवपूर्वक व्रती पुरुष रातमें जागरण करे। यदि व्रत और उपवास करके कोई नींद ले ले अथवा पुनः जल पी ले तो उसे उस व्रतका आधा ही फल मिलता है; अतः विप्रवर! यत्नपूर्वक एक ही बार हविष्यान्न ग्रहण करे। उस समय श्रीकृष्णके चरणोंका स्मरण करते हुए निम्नाङ्कित मन्त्रको पढ़े।
विष्णुरूप अन्न! ब्रह्माद्वारा प्राणियोंके प्राणके रूपमें तुम्हारा निर्माण हुआ है; अतः तुम मुझे व्रत और उपवासका फल दो। जो इस प्रकार भारतवर्षमें भक्तिपूर्वक इस उत्तम व्रतका अनुष्ठान करता है, वह पहले और बादकी सात-सात पीढ़ियोंका तथा अपना भी अवश्य ही उद्धार करता है। व्रती मनुष्य निश्चय ही माता, पिता, भाई, सास, ससुर, पुत्री, दामाद तथा भृत्य-वर्गका भी उद्धार कर देता है। ब्रह्मन्! इस तरह श्रीकृष्णका चरित्र और व्रत कहा गया। यह सुख और मोक्ष प्रदान करनेवाला सारभूत साधन है। अब मैं तुमसे श्रीकृष्णकी दूसरी लीलाएँ कहता हूँ। (अध्याय २६)
गोपकिशोरियोंद्वारा गौरी-व्रतका पालन, दुर्गा-स्तोत्र और उसकी महिमा, समासिके दिन गोपियोंको नग्न-स्नान करती जान श्रीकृष्णद्वारा उनके वस्त्र आदिका अपहरण, श्रीराधाकी प्रार्थनासे भगवान्का सब वस्तुएँ लौटा देना, व्रतका विधान, दुर्गाका ध्यान, गौरी-व्रतकी कथा, लक्ष्मीस्वरूपा वेदवतीका सीता होकर इस व्रतके प्रभावसे श्रीरामको पतिरूपमें पाना, सीताद्वारा की हुई पार्वतीकी स्तुति, श्रीराधा आदिके द्वारा व्रतान्तमें दान, देवीका उन सबको दर्शन देकर राधाको स्वरूपकी स्मृति कराना, उन्हें अभीष्ट वर देना तथा श्रीकृष्णका राधा आदिको पुनः दर्शन-सम्बन्धी मनोवाञ्छित वर देना
भगवान् श्रीनारायण कहते हैं—नारद! सुनो। अब मैं पुनः श्रीकृष्ण-लीलाका वर्णन करता हूँ। यह वह लीला है, जिसमें गोपियोंके चीरका अपहरण हुआ और उन्हें मनोवाञ्छित वरदान दिया गया। हेमन्तके प्रथम मास—मार्गशीर्षमें गोपाङ्गनाएँ प्रेमके वशीभूत हो प्रतिदिन केवल एक बार हविष्यान्न ग्रहण करके पूर्णतः संयमशील हो पूरे महीनेभर भक्तिभावसे व्रत करती रहीं। वे नहाकर यमुनाके तटपर पार्वतीकी बालुकामयी मूर्ति बना उसमें देवीका आवाहन करके
| ५५६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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मन्त्रोच्चारणपूर्वक नित्यप्रति पूजा किया करती थीं। मुने! गोपियाँ चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, कुंकुम, नाना प्रकारके मनोहर पुष्प, भाँति-भाँतिके पुष्पहार, धूप, दीप, नैवेद्य, वस्त्र, अनेकानेक फल, मणि, मोती और मूँगे चढ़ाकर तथा अनेक प्रकारके बाजे बजाकर प्रतिदिन देवीकी पूजा सम्पन्न करती थीं।
हे देवि जगतां मात: सृष्टिस्थित्यन्तकारिणि।
नन्दगोपसुतं कान्तमस्मभ्यं देहि सुव्रते॥
'उत्तम व्रतका पालन करनेवाली हे देवि! हे जगदम्ब! तुम्हीं जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली हो; तुम हमें नन्दगोप-नन्दन श्यामसुन्दरको ही प्राणवल्लभ पतिके रूपमें प्रदान करो।'
इस मन्त्रसे देवेश्वरी दुर्गाकी मूर्ति बनाकर संकल्प करके मूलमन्त्रसे उनका पूजन करे। सामवेदोक्त मूलमन्त्र बीजमन्त्रसहित इस प्रकार है—
ॐ श्रीदुर्गायै सर्वविघ्नविनाशिन्यै नम:।—
इसी मन्त्रसे सब गोपकुमारियाँ भक्तिभाव और प्रसन्नताके साथ देवीको फूल, माला, नैवेद्य, धूप, दीप और वस्त्र चढ़ाती थीं। मूँगेकी मालासे भक्तिपूर्वक इस मन्त्रका एक सहस्र जप और स्तुति करके वे धरतीपर माथा टेककर देवीको प्रणाम करती थीं। उस समय कहतीं कि 'समस्त मङ्गलोंका भी मङ्गल करनेवाली और सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली शंकरप्रिये देवि शिवे! तुम्हें नमस्कार है। तुम मुझे मनोवाञ्छित वस्तु दो।' यों कह नमस्कार करके दक्षिणा दे सारे नैवेद्य ब्राह्मणोंको अर्पित करके वे घरको चली जाती थीं।
**भगवान् श्रीनारायण कहते हैं—**मुने! अब तुम देवीका वह स्तवराज सुनो, जिससे सब गोपकिशोरियाँ भक्तिपूर्वक पार्वतीजीका स्तवन करती थीं, जो सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंको देनेवाली हैं।
जब सारा जगत् घोर एकार्णवमें डूब गया था; चन्द्रमा और सूर्यकी भी सत्ता नहीं रह गयी थी; कज्जलके समान जलराशिने समस्त चराचर विश्वको आत्मसात् कर लिया था; उस पुरातन कालमें जलशायी श्रीहरिने ब्रह्माजीको इस स्तोत्रका उपदेश दिया। उपदेश देकर उन जगदीश्वरने योगनिद्राका आश्रय लिया। तदनन्तर उनके नाभिकमलमें विराजमान ब्रह्माजी जब मधु और कैटभसे पीड़ित हुए, तब उन्होंने इसी स्तोत्रसे मूलप्रकृति ईश्वरीका स्तवन किया।
'ॐ नमो जय दुर्गायै'
**ब्रह्मा बोले—**दुर्गे! शिवे! अभये! माये! नारायणि! सनातनि! जये! मुझे मङ्गल प्रदान करो। सर्वमङ्गले! तुम्हें मेरा नमस्कार है। दुर्गाका 'दकार' दैत्यनाशरूपी अर्थका वाचक कहा गया है। 'उकार' विघ्ननाशरूपी अर्थका बोधक है। उसका यह अर्थ वेदसम्मत है। 'रेफ' रोगनाशक अर्थको प्रकट करता है। 'गकार' पापनाशक अर्थका वाचक है। और 'आकार' भय तथा शत्रुओंके नाशका प्रतिपादक कहा गया है। जिनके चिन्तन, स्मरण और कीर्तनसे ये दैत्य आदि निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं; वे भगवती दुर्गा श्रीहरिकी शक्ति कही गयी हैं। यह बात किसी औरने नहीं, साक्षात् श्रीहरिने ही कही है। 'दुर्ग' शब्द विपत्तिका वाचक है और 'आकार' नाशका। जो दुर्ग अर्थात् विपत्तिका नाश करनेवाली हैं; वे देवी ही सदा 'दुर्गा' कही गयी हैं। 'दुर्ग' शब्द दैत्यराज दुर्गमासुरका वाचक है और 'आकार' नाश अर्थका बोधक है। पूर्वकालमें देवीने उस दुर्गमासुरका नाश किया था; इसलिये विद्वानोंने उनका नाम 'दुर्गा' रखा। शिवा शब्दका 'शकार' कल्याण अर्थका, 'इकार' उत्कृष्ट एवं समूह अर्थका तथा 'वाकार' दाता अर्थका वाचक है। वे देवी कल्याणसमूह तथा उत्कृष्ट वस्तुको देनेवाली हैं; इसलिये 'शिवा' कही गयी हैं। वे शिव अर्थात् कल्याणकी मूर्तिमती राशि हैं;