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ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

( ३ )

वय का विवेचन करते हुए, ब्रह्मचर्य के प्राचीन आदर्श को सामने रखा है, जिसमें वीर्य-रक्षा और उसके परम पुरुषार्थ की सिद्धि से उपयोग—दोनों का अन्तर्भाव होता है। ब्रह्मचर्य का पदार्थ और भावार्थ भी ऐसा ही है। ब्रह्मचर्य की महिमा का वर्णन करने में लेखक ने बहुत विस्तार किया है, परंतु हमारी समझ से वह व्यर्थ न होगा। इस विस्तार में प्राचीन ग्रन्थों से जो अवतरण उद्घोषित दिये हैं, वे बहुत ही रक्तविद्याक और समय पर काम देने वाले हैं। प्रस्तुत विषय के संबंध में सभी विचारणीय बातों का समावेश इस पुस्तक में किया गया है, जिससे पुस्तक सब के लिये बड़े काम की हुई है। ऐसी पुस्तकों का देश में जितना प्रचार हो, उतना अच्छा है। हमारे समाज में जितने अधिक लोग ब्रह्मचर्य के महत्व को समझेंगे, जितने अधिक लोग उसका पालन करेंगे, हमारे समाज का भौतिक और नैतिक बल उतना ही अधिक बढ़ेगा। ब्रह्मचर्य का बल ही हमारी सब समस्याओं को हल करेगा।

फाल्गुन शुद्ध २, सं० १९८३

खच्चमणोरायण गर्द

लागत का ब्योरा

कागज.........५२५) रु०
छपाई.........५१५) "
बाईडिंग.........९६) "
लिखाई, न्यवस्था, विद्यापन आदि खर्च६७०) "
१८०६) रु०

कुल प्रतिघों ३०००

लागत मुख्य प्रति संख्या ११॥

आदर्श पुस्तक-भण्डार

हमारे यहाँ दूसरे प्रकाशकों की उत्तम, उपयोगी और चुनी हुई हिन्दी-पुस्तकें भी मिलती हैं। गन्दे और चरित्र-नाशक उपन्यास, नाटक आदि पुस्तक हम नहीं बेचते। हिन्दी-पुस्तकें संगाने की जगह आपको जरूरत हो तो इस मण्डल के नाम ही आर्डर भेजने के लिये हम आपसे अनुरोध करते हैं, क्योंकि बाहरी पुस्तकें भेजने में यदि हमें न्यवस्था का खर्च निकाल कर कुछ भी नचात रही तो वह मण्डल की पुस्तकें और भी सस्ती करने में लगाई जायगी।

पता—खस्ता-साहित्य-मण्डल, अजमेर

पूर्वाभास

एतदेश-प्रसूतस्य, सकाशाद् अग्र-जन्मनः ।

स्वत्वं चरित्रं शिखेरन्धुश्रिष्यां सर्वमानवाः ॥ (मनुस्मृति)

उस परमपिता परमेश्वर को कोटिशः धन्यवाद है, जिसके अपार कर्ण-कटाक्ष से गत कई वर्षों की मेरी मनः कामना पूरी हुई । जिस ब्रह्मचर्य-विषय के ग्रन्थ के लिखने में, मैं बहुत दिनों तक व्यस्त था, वह आज निर्धिन्न समाप्त हो गया । अतएव इसके प्रस्तुत करने के सम्बन्ध की कुछ आवश्यक बातें यहाँ प्रकट कर देना चाहता हूँ—

‘ब्रह्मचर्य’ बहुत ही गहन विषय है । इसके आध्यात्मिक तत्वों का विवेचन करना, सरल काम नहीं । इसके निरूढ़ रहस्यों को भली भाँति प्रकाशित करने में इसके आचार्य ही कुछ समर्थ हो सकते हैं । इसकी उत्तमता तथा वैज्ञानिकता के सम्बन्ध में इतना ही कह देना पर्याप्त है कि इस पर वारंवार जो कुछ लिखा जाय, या जो कुछ कहा जाय, सो सब थोड़ा है ।

ब्रह्मचर्य जैसे दायित्व-पूर्ण विषय पर अपनी लोछुप लेखनी चला कर, निरस्तन्देह मैंने दुस्साहस का काम किया

( २ )

है। यदि कोई अधिकारी मुदा इस विषय में अपनी नेजगिनी प्रतिभा का परिचय देता, तो मेरे विचार से विशेष उपकार की सम्भावना तथा सन्तोष की बात थी, और अन्य भी साहो-पाह पूरे हो पाता। इसलिये मैं महाकवि कालिदास के कण्ठ से कण्ठ मिलाकर, निम्नलिखित उक्ति कह कर, आपनी धुएना के लिये स्वयं विलजित हूँ—

क सूर्यप्रभवो वंशः, फलापविषया गतिः ।

नितीर्णुर्दुस्तरं मोनाद्वयुपेनादि नागरम् ॥ (शुभंश)

कहाँ अन्नचर्य जैसा सारगमित एवं हिन्दू विषय और कहाँ मैं हिन्दी का एक अल्पत्र तथा साधारण लोह लिखने वाला ! अतएव मैंने जो पुस्तक रचनामयी बटुनई (होटी नाच) पर चढ़ कर अन्नचर्य जैसे महासमुद्र के पार जाने का यत्न किया है, उसके लिये पाठकों से क्षमा-प्रार्थना करता हूँ।

इस ग्रन्थ को मैंने बड़े उत्साह और परिश्रम के साथ लिखा है। प्रचुर समय इसके चिन्तन और मनन में लगाया है। पर जिस रूप में इसे उपस्थित करना चाहता था, उस रूप में न हो सका। अभी मुझे इस समग्र्य में इससे भी अधिक अवलोकन तथा सद्गुण की आवश्यकता थी, जो समयाभाव के कारण असह्य जान पड़ने लगी। इसलिये मैंने जो कुछ हो, जैसा कुछ हो, इसे लिख डालने को ही उचित समझा।

हमारी हिन्दी-भाषा में उच्च विषयों के मौलिक ग्रन्थों

( ३ )

का अभी एक प्रकार से अभाव ही समझना चाहिये। चरित्र सम्बन्धी तथा धार्मिक शिक्षावाले ग्रन्थों की तो नितान्त कमी है। अतः मुझे विश्वास है कि इस ग्रन्थ से वात्क-वाहिकायें, युवक-युवतियाँ तथा अनेक पुस्तक-खियाँ— प्रायः सभी लोग अपने चरित्र-निर्माण में कुछ न कुछ अवश्य सहायता पा सकेंगे। जो लोग ब्रह्मचर्य की वास्तविक महिमा न जान कर, घोर अन्धकार में भटक रहे हैं, बहुत सम्भव है, वे भी इसे पढ़कर प्रकाश में आने के लिये उत्सुक हो जायें।

मैंने इस ग्रन्थ का नाम 'ब्रह्मचर्य-विज्ञान' रखा है। जो बातें इसमें दिसलाई गई हैं, वे प्रायः वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विचारों की सत्यता पर ही रह गई हैं।

यह सम्पूर्ण ग्रन्थ सात खण्डों में विभक्त किया गया है। मैंने इन खण्डों में ब्रह्मचर्य की प्राचीन मर्यादायें, वर्तमान-कालिक दोषों एवं आगे के लिये सुधार सम्बन्धी विचारों को दर्जाने की चेष्टा की है। फिर भी—

“दृष्टं किसपि लोकेस्मिन्नित्योपं नच निर्गुणम् । ( सूक्ति )

इस संसार में कोई वस्तु दोष-हीन और गुण-नहित नहीं देखी गई। अर्थात् सब में कुछ न कुछ दोष तथा कुछ न कुछ गुण अवश्य होता ही है।

“सर्तं ततो ग्राह्यमापत्य फल्गु—

हंसैर्यथा चौरमिवाम्बुमश्चात् ।” ( हितोपदेश )

( ४ )

पतद्वय जिस प्रकार से इस जल में से दूध ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार किसी पदार्थ के द्रवित अंश को छोड़ कर, उसके सार को शपनाना उचित है ।

अतः पाठकों से नम्र निवेदन है कि इस ग्रंथ के दोनों पर ध्यान न देकर, इसके सार को ग्रहण करें ।

जो वेश—जो समाज-दुःख-दार्दिनी दासत्व-शृङ्खला से अपनी मुक्ति चाहता है—जो धर्म अपनी विजय-नैजवन्ती भूमण्डल में उड़ाना चाहता है—जो जाति अपनी पतिततावस्था से उथाना चाहती है—जो राष्ट्र अपने को सर्वोच्च बनाना

बाहता है—उसके लिये ब्रह्मचर्य ही महामन्त्र और अमोघ श्रद्धा है। ब्रह्मचर्य के अतिरिक्त सुख-शान्ति का साधक दूसरा उपाय कहाँ है ही नहीं। जो जाति ब्रह्मचर्य के महत्त्व को नहीं जानती, वह अधिक दिनों तक नहीं जी सकती। नृत्तक से मृतक जाति भी ब्रह्मचर्य-रूपी-अमृत पान कर के संसार में अमर हो जाती है।

हमारी हिन्दू-जाति के खो-पुखो ! आप लोग अपने दिव्य तथा ईश्वर-कल्प ऋषि-महर्षियों के लिये हुये अमृत को क्यों नहीं पीते ? हम सब्जता और भन्तराला को साजी देकर फहते हैं कि एक शताब्दी के विधिवत् ब्रह्मचर्य के पालन से आपके कई शताब्दियों के दोष दूर हो सकते हैं। आप पुनः अपनी आर्य-संस्कृति का अबाध प्रचार कर के, अनर्थता का नाश कर सकते

( ५ )

हैं। शास्त्रों की बातें कभी मिथ्या नहीं होतीं। धैर्य, उत्साह, प्रेम, विश्वास तथा नव्रता-पूर्वक अपनी जाति में ब्रह्मचर्य का वातावरण उत्पन्न करो, फिर तो आपके उद्धार में किंचिन्मात्र सन्देह नहीं रह जायगा। हमारा प्रबल अनुरोध है कि इस ग्रन्थ को पढ़ कर ही न रह जाओ, बल्कि उसके विचारों को कार्य-रूप में परिणत करने का पूर्ण व्रत लो। कदाचित् एक दो बार असफल होओ, पर अन्त में आपको सफलता अवश्य मिलेगी। इसे सत्य समझो! अपने पूर्वजों का इतिहास देखो और उनके महा-मन्त्र ब्रह्मचर्य का प्रचार करना, अपना सर्व-श्रेष्ठ धर्म समझो। इसी में सुख मिलेगा—इसी में शान्ति मिलेगी।

इस ग्रन्थ के लिखने के पूर्व मैंने अनेक पुराने तथा नये ग्रन्थों का एवं पत्र-पत्रिकाओं का अवलोकन, एवं आवश्यक सार-संग्रह किया है। अतएव मैं उनके उपदेष्टा, कर्ता तथा सम्पादक महाशयों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। क्योंकि उनके साहाय्य के बिना मेरा कार्य और भी कठिन होता।

मैं अपने साहित्य-समालोचकों से सांख्योपनिषेद विवेदन करता हूँ कि वे इस ग्रन्थ के दोषों तथा अभावों को विशेषतः दिलाने की कृपा करें। ऐसा करने से मैं कृतज्ञता-पूर्वक इसके द्वितीय संस्करण में समुचित सुधार कर देने में समर्थ हो सकूँगा।

ब्रह्मचर्य-विषय के ग्रन्थों के प्रचार की देश के कोने-कोने में, विशेष कर हिन्दुओं के घर-घर में बहुत बड़ी आवश्यकता

( ६ )

है। यदि ऐसे ग्रन्थ बालकों और कन्याओं के पाठ्य-क्रम में रखे जायें, तो मेरे विचार से उनके दैनिक विद्याभ्यास, सदाचार और ब्रह्मचर्य के पालन में, बहुत कुछ कर्तव्य-ज्ञान प्राप्त हो सकता है। इसलिये देश के सुयोग्य माता-पिता, विद्यालयों के शिक्षक-शिक्षिका, विद्यार्थियों के अभिभावकों तथा सुधारक महोदयों से विनम्र विनय है कि वे इस ग्रन्थ का घर-घर प्रचार कर, लेखक को समेकित रूप में अनुगृहीत करें !

यह ग्रन्थ अत्यन्त शीघ्रता में प्रकाशित हुआ है। इसलिये इसमें जहाँ कहीं संशोधन तथा मुद्रण की अशुद्धियाँ या त्रुटियाँ रह गई हों, उनके लिये पाठक-पाठिकाओं से क्षमा-प्रार्थना है। आशा है, द्वितीय संस्करण में उचित सुधार हो सकेगा। ॐ शम् ।

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, नकरिष्यद्बुःखमानुयात् ॥

महाशिवरात्रि सं० १६म्बर } रामनगर-काशीराज्य }

चिनीत जगन्नारायणदेव शर्मा

विषयानुक्रम

[ प्रथम खण्ड ]

संख्याविषयपृष्ठाङ्क
—ब्रह्म-वन्दना......२५
—ब्रह्मचर्य की व्याख्या......२६
—ब्रह्मचर्य के आविष्कारक......२९
—ब्रह्मचर्य की प्राचीनता......३१
—ब्रह्मचर्य की महिमा......३३
—धन्वन्तरि का ब्रह्मचर्योपदेश......३६
—ब्रह्मचर्य-विज्ञान का समर्थन......३८
—ब्रह्मचर्यस और ब्रह्मलोक......४०
—प्राचीन आर्य और ब्रह्मचर्य......४३
१०—धर्म और ब्रह्मचर्य......४६
११—सदाचार और ब्रह्मचर्य......४९
१२—तप और ब्रह्मचर्य......५१
१३—योग और ब्रह्मचर्य......५४
१४—सत्य और ब्रह्मचर्य......५६
१५—कर्तव्य और ब्रह्मचर्य......५८
१६—यम-नियम और ब्रह्मचर्य......६०
१७—यज्ञ और ब्रह्मचर्य......६४
१८—ज्ञो, आदर्श ब्रह्मचारी......६६
१९—ब्रह्मचर्य के दो बड़े आचार्य......७२

( २ )

संख्या विषय

पृष्ठाङ्क

२०—त्रिनेत्र और सन्जीवनी-विद्या...४५
२१—अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त...७८

[ द्वितीय खण्ड ]

१—ब्रह्म-वन्दना......१०१
२—त्रिविध ब्रह्मचर्य......१०२
३—मानसिक ब्रह्मचर्य की प्रधानता......१०४
४—ब्रह्मचर्य से विद्याध्ययन......१०६
५—ब्रह्मचर्य से शक्ति-साधन......१०८
६—ब्रह्मचर्य से सम्पत्ति-सेवा......११०
७—ब्रह्मचर्य से अपूर्व मेधा......१११
८—ब्रह्मचर्य से दीर्घायु......११३
९—ब्रह्मचर्य से ब्रह्मसाहस......११७
१०—ब्रह्मचर्य से स्वाध्य-रक्षा......११८
११—ब्रह्मचर्य से सुसन्तान......१२१
१२—ब्रह्मचर्य से योग-शान्ति......१२३
१३—ब्रह्मचर्य से ब्रह्मज्ञान......१२५
१४—ब्रह्मचर्य से मुक्ति-ब्रह्मत्व......१२७
१५—सृष्टि के आदि में ब्रह्मचर्य......१३०
१६—ब्रह्मचर्य का वायुसण्डल......१३१
१७—ब्रह्मचर्य पर प्राचीन मत......१३३

[ तृतीय खण्ड ]

१—ब्रह्म-वन्दना......१३९
२—ब्रह्मचर्याश्रम......१४०

( ३ )

संख्या विषय

पृष्ठाङ्क

३—ब्रह्मचर्य युक्त अन्याश्रम......१४१
( १ ) ब्रह्मचर्याश्रम......१४२
( २ ) गृहस्थाश्रम......१४३
( ३ ) वानप्रस्थाश्रम......१४४
( ४ ) सन्यासाश्रम......१४५
४—ब्रह्मचर्य युक्त वर्ण-व्यवस्था......१४६
( १ ) ब्राह्मण......१४७
( २ ) क्षत्रिय......१४७
( ३ ) वैश्य......१४८
( ४ ) शूद्र......१४८
५—गुरुकुल-वृत्तिशुल्क......१४९
६—उपनयन संस्कार......१५१
७—यहोपवीत विधि......१५४
८—ब्रह्मचारी की प्रविक्षा......१५६
९—आचार्य के दिव्योपदेश......१५८
१०—पठन-पाठन के आदेश......१६१
११—गुरु-महिमा......१६३
१२—आदर्श शिष्य......१६५
१३—ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार......१६७
१४—मरुत् और साध्यपद-ब्रह्मचारी......१७०
१५—ब्रह्मचारी की मित्रा......१७१
१६—ब्रह्मचारी के तीन प्रकार......१७३
१७—ब्रह्मचारी के वर्जित कर्म......१७५

( ४ )

संख्या विषय

संख्याविषयपृष्ठान्क.
१८—ब्रह्मचारी के कर्तव्य कर्म ...१७७
१९—आचार्य के कर्तव्य ...१८०
२०—अष्ट मैथुन-निषेध ...१८२
२१—वेदाध्ययन-विचार ...१८४
२२—ब्रह्मचारी-भेद ...१८६
२३—गुरु-दक्षिणा-प्रकरण ...१८८
२४—समावर्त्तन-संस्कार ...१९०
२५—विवाह-विधात ...१९२
२६—पूहृत्थ-ब्रह्मचर्य ...१९४
२७—सदाचार की सौ शिक्षाये ...१९६

[ चतुर्थ खण्ड ]

१—ब्रह्म-वन्दना ...२०५.
२—कन्या और ब्रह्मचर्य ...२०६
३—ब्रह्मचारिणी का विवाह ...२०९
४—ब्रह्मचारिणी देवियाँ ...२१२
५—पारित्रसत और ब्रह्मचर्य ...२१८
६—महिलाओं का महत्व ...२१९.
७—आदर्श माता ...२२२
८—ब्रह्मचर्य युक्त गर्भाधान ...२२४
९—शुश्रूषक ब्रह्मचारिणी सरस्वती ...२२७
१०—वेदवृत्ती का अपूर्व ब्रह्मचर्य ...२२८
११—स्वर्गिक ब्रह्मचारिणी सीता ...२३०

( ५ )

संख्याविषयपृष्ठाङ्क
१२—गृहस्थ ब्रह्मचारिणी देवहूती......२३३
१३—झी-जाति का पतन......२३५
१४—व्यभिचारिणी की दुर्दशा......२३७
१५—झी-जाति पर विदेशी मत......२३९
[ पञ्चम खण्ड ]
१—ब्रह्म-वन्दना......२४२
२—शरीर का सार......२४३
३—वीर्य की उत्पत्ति......२४५
४—ओज और वीर्य......२४६
५—वीर्य पर वैज्ञानिक दृष्टि......२४८
६—वीर्य के पकने का काल......२४९
७—वीर्य का स्थान और परिमाण......२५२
८—सन्मोग से वीर्य-स्खलन......२५४
९—वीर्य के कार्य......२५५
१०—जरा और मृत्यु......२५७
११—आयुर्वेद का कारण......२५९
१२—वीर्य-क्षय से राजयोग......२६०
(१) प्रमेह......२६०
(२) क्षय या यक्ष्मा......२६२
(३) स्तम्भ-दोष......२६३
(४) नपुंसकता......२६४
१३—वीर्य-रक्षा से लाभ......२६५
१४—वीर्य-नाश से हानि......२६७

( ६ )

संख्या विषय

पृष्ठान्कः

१५—अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता ...

२६९

१६—ब्रह्मचर्य के कुछ उपदेशा ...

२७१

[ षष्ठ खण्ड ]

१—ब्रह्म-वन्दना ... .. २७४

२—आधुनिक विचार्यार्थी ... .. २७५

३—अपक वीर्यपात के दोष ... .. २७७

४—वीर्य-नाश के प्रधान कारण ... .. २७९

(१) चाल-विवाह ... .. २८०

(२) दृढ़-विवाह ... .. २८१

(३) वेश्यागमन ... .. २८२

(४) पर-स्त्री-गमन ... .. २८४

(५) अति मैथुन ... .. २८६

(६) अनैसर्गिक मैथुन ... .. २८७

(७) तामस तथा राजस भोजन ... .. २८९

(८) मादक द्रव्य-सेवन ... .. २९१

(९) कुशिका और कुसङ्घ ... .. २९२

५—भोग की रूपया ... .. २९३

६—दुराचार की निन्दा ... .. २९६

७—काम-शमन के उपदेश ... .. २९८

८—स्वास्थ्य की शिक्षाये ... .. ३००

[ सप्तम खण्ड ]

१—ब्रह्म-वन्दना ... .. ३०४

( ७ )

संख्या विषय

पृष्ठाङ्क

२—वीर्य-रक्षा के सन्निधम......३०५
( १ ) माक्ष सुहृत्-जागरण......३०७
( २ ) रुधःपान......३०८
( ३ ) मल-भुत्र-विसर्जन......३०९
( ४ ) उपस्थित्व की स्वच्छता......३१०
( ५ ) वायु-सेवन......३११
( ६ ) नित्य-स्नान......३१२
( ७ ) कौपीन-धारण......३१४
( ८ ) प्राणयाम-साधन......३१५
( ९ ) मानसिक योग......३१८
( १० ) सन्ध्या-वन्दन......३२१
( ११ ) स्वप्नाहार......३२४
( १२ ) सात्विक भोजन......३२४
( १३ ) फलाहार......३२४
( १४ ) दुग्ध-पान......३२५
( १५ ) सत्पंक्......३२७
( १६ ) सदुपन्यां का पाठ.........३२८
( १७ ) नियम-बद्धता......३३०
( १८ ) शंखं सङ्कल्प......३३१
( १९ ) इच्छा-शक्ति-प्रयोग.........३३२
( २० ) सदभ्यास......३३४
( २१ ) वैराग्य......३३५
( २२ ) परिश्रम और उत्साह......३३६

( ८ )

संहर्षा विषयपृष्ठाङ्क
( २३ ) सप्तमी श्रद्धा ... ..३३७
( २४ ) दृढ़ विध्यास ... ..३३८
( २५ ) विन्ध-प्रेम ... ..३३९
( २६ ) स्वज्ञाङ्क पाठनना ... ..३४०
( २७ ) सूर्य-साप-सेवन ... ..३४१
( २८ ) सामयिक शयन ... ..३४२
( २९ ) शुभ ईर्शन ... ..३४४
( ३० ) दैमिक व्यायाम ... ..३४५
( ३१ ) आसनो का अभ्यास ... ..३४६
( ३२ ) शीर्षसन ... ..३४८
( ३३ ) आङ्गभर-शून्यता ... ..३४९
( ३४ ) सातु-भाव ... ..३५०
( ३५ ) भगिनी-भाव ... ..३५१
( ३६ ) पुत्रो-भाव ... ..३५२
( ३७ ) भाव की निर्मलता ... ..३५३
( ३८ ) दानेन्द्रियों पर संयम ... ..३५४
( ३९ ) ब्रह्मचारियों की चर्चा ... ..३५७
( ४० ) मृत्यु-भय ... ..३५८
( ४१ ) व्यसन-त्याग ... ..३५९
( ४२ ) उपवास-व्रत ... ..३६१
( ४३ ) ईश-प्रार्थना ... ..३६३
३—ब्रह्मचर्य पर खदेशी और विदेशी विद्वान् ... ..३६५
४—आवश्यक सम्देश ... ..३७२

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

ब्रह्मचर्य-वैभव

[ षट्पदी छन्द ]

( १ )

उन्नतियों का सार धर्म का रथ है न्यारा ! सत्कर्मों का पुरष जाति का जीवन प्यारा ॥ सञ्जनता का मूल फूल है वैदिक वन का । सब सुख का है धाम-श्राम है सदगुण गण का ॥ ब्रह्मचर्य-सत् विश्व में, कल्प घृत्त आधार है ! इसकी महिमा से सदा, चलता सब व्यापार है ॥

( २ )

ब्रह्मचर्य से दिव्य भावनायें होती हैं ! ब्रह्मचर्य से दीर्घ-यातनायें खोती हैं ॥ ब्रह्मचर्य से ज्ञान और बल नर हैं पाते । ब्रह्मचर्य से शान्ति-मोक्ष को हैं अपनाते ॥ श्रद्धियों के उपदेश को, कभी न भाई भूलिये ! रक्षा करके बीयें की, अति खतन्त्र ही फूलिये ॥

—कविपुष्कर

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

कथम स्वरूप

१—ब्रह्म-वन्दना

य आत्मदा यलदा यस्य विस्व, उपासते, प्रशिवं यस्य देवाः। यस्यच्छायाऽमृतं यस्य मृत्युः, कस्मै देवाय हविषा विधेम।

( यजु० ४० २५ स० १२ )

जो आत्मज्ञान तथा शाारीरिक बल का देने वाला है—जिस की सभी लोग उपासना करते हैं—विद्वान् पुरुष जिसे प्राप्त करते हैं—जिसका आश्रय अमृत ( हीर्य जीवन ) देने वाला है, और जिसके अधिकार में मृत्यु है—हम उस दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हैं। किसी भी महत्वपूर्ण कार्य के प्रारम्भ में उस की समाप्ति के लिये, वन्दना एक आवश्यक तथा शिष्टाचार से सम्बन्ध रखने वाला वैदिक नियम है। अतः हमने भी इस आर्य-धर्म सम्बन्धी ग्रन्थ को उपादेय बनाने की इच्छा से भावूलिक आर्थना की है। अस्तु।

ब्रह्मचर्य-विधान

२६

ऊपर के मन्त्र में ईश्वर-विनय तो हुई है, पर हमारे विचार से इसमें 'ब्रह्मचर्य' की ओर गुप्त रूप से सङ्केत भी किया गया है। उसका आशय निम्न-लिखित है:—

ब्रह्मचर्य से ही मनुष्य का मानसिक ज्ञान स्फुरित होता है। उसके शारीरिक बल का भी सर्वोत्कृष्ट साधन ब्रह्मचर्य ही है। सभी लोग ब्रह्मचर्य को श्रेष्ठ मान कर उसकी प्रतिष्ठा करना चाहते हैं। बुद्धिमानों को ब्रह्मचर्य अत्यन्त प्रिय होता भी है। ब्रह्मचर्य से ही मनुष्य दीर्घायु प्राप्त कर सकता है। ब्रह्मचर्य से ही मनुष्य दूर भगाई जा सकती है। इसलिये इस पवित्र वैदिक प्रार्थना में कहे गये 'ब्रह्मचर्य-रूप भगवान्' को हृदय में धारण करना योग्य है !

२—ब्रह्मचर्य की व्याख्या

'ब्रह्मचर्य' के सम्बन्ध में कुछ विचार प्रकट करने से पहले, यह समझना देना अत्यन्त आवश्यक है कि ब्रह्मचर्य है क्या पदार्थ ? जब तक इसके अर्थ नहीं बताये जायेंगे, तब तक उसके गूढ़ भावों के समझने और समझाने में, पाठक और लेखक—दोनों को समान रूप से अनुविधा होगी।

एक बात यह भी है कि जो वस्तु व्याख्या-द्वारा पहले पहल स्पष्ट नहीं कर दी जाती, उसके विषय में किये गये विचार भली भाँति हृदयङ्गम नहीं किये जा सकते। अतः 'ब्रह्मचर्य' किये कहते हैं ? यह वतलाना होगा।

वास्तव में 'ब्रह्मचर्य' एक शब्द नहीं, यह दो शब्दों के योग से बना है। एक 'ब्रह्म' दूसरा 'चर्य'—इस प्रकार तो ब्रह्म और चर्य—