भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

विषयानुक्रम

[ प्रथम खण्ड ]

संख्याविषयपृष्ठाङ्क
—ब्रह्म-वन्दना......२५
—ब्रह्मचर्य की व्याख्या......२६
—ब्रह्मचर्य के आविष्कारक......२९
—ब्रह्मचर्य की प्राचीनता......३१
—ब्रह्मचर्य की महिमा......३३
—धन्वन्तरि का ब्रह्मचर्योपदेश......३६
—ब्रह्मचर्य-विज्ञान का समर्थन......३८
—ब्रह्मचर्यस और ब्रह्मलोक......४०
—प्राचीन आर्य और ब्रह्मचर्य......४३
१०—धर्म और ब्रह्मचर्य......४६
११—सदाचार और ब्रह्मचर्य......४९
१२—तप और ब्रह्मचर्य......५१
१३—योग और ब्रह्मचर्य......५४
१४—सत्य और ब्रह्मचर्य......५६
१५—कर्तव्य और ब्रह्मचर्य......५८
१६—यम-नियम और ब्रह्मचर्य......६०
१७—यज्ञ और ब्रह्मचर्य......६४
१८—ज्ञो, आदर्श ब्रह्मचारी......६६
१९—ब्रह्मचर्य के दो बड़े आचार्य......७२

( २ )

संख्या विषय

पृष्ठाङ्क

२०—त्रिनेत्र और सन्जीवनी-विद्या...४५
२१—अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त...७८

[ द्वितीय खण्ड ]

१—ब्रह्म-वन्दना......१०१
२—त्रिविध ब्रह्मचर्य......१०२
३—मानसिक ब्रह्मचर्य की प्रधानता......१०४
४—ब्रह्मचर्य से विद्याध्ययन......१०६
५—ब्रह्मचर्य से शक्ति-साधन......१०८
६—ब्रह्मचर्य से सम्पत्ति-सेवा......११०
७—ब्रह्मचर्य से अपूर्व मेधा......१११
८—ब्रह्मचर्य से दीर्घायु......११३
९—ब्रह्मचर्य से ब्रह्मसाहस......११७
१०—ब्रह्मचर्य से स्वाध्य-रक्षा......११८
११—ब्रह्मचर्य से सुसन्तान......१२१
१२—ब्रह्मचर्य से योग-शान्ति......१२३
१३—ब्रह्मचर्य से ब्रह्मज्ञान......१२५
१४—ब्रह्मचर्य से मुक्ति-ब्रह्मत्व......१२७
१५—सृष्टि के आदि में ब्रह्मचर्य......१३०
१६—ब्रह्मचर्य का वायुसण्डल......१३१
१७—ब्रह्मचर्य पर प्राचीन मत......१३३

[ तृतीय खण्ड ]

१—ब्रह्म-वन्दना......१३९
२—ब्रह्मचर्याश्रम......१४०

( ३ )

संख्या विषय

पृष्ठाङ्क

३—ब्रह्मचर्य युक्त अन्याश्रम......१४१
( १ ) ब्रह्मचर्याश्रम......१४२
( २ ) गृहस्थाश्रम......१४३
( ३ ) वानप्रस्थाश्रम......१४४
( ४ ) सन्यासाश्रम......१४५
४—ब्रह्मचर्य युक्त वर्ण-व्यवस्था......१४६
( १ ) ब्राह्मण......१४७
( २ ) क्षत्रिय......१४७
( ३ ) वैश्य......१४८
( ४ ) शूद्र......१४८
५—गुरुकुल-वृत्तिशुल्क......१४९
६—उपनयन संस्कार......१५१
७—यहोपवीत विधि......१५४
८—ब्रह्मचारी की प्रविक्षा......१५६
९—आचार्य के दिव्योपदेश......१५८
१०—पठन-पाठन के आदेश......१६१
११—गुरु-महिमा......१६३
१२—आदर्श शिष्य......१६५
१३—ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार......१६७
१४—मरुत् और साध्यपद-ब्रह्मचारी......१७०
१५—ब्रह्मचारी की मित्रा......१७१
१६—ब्रह्मचारी के तीन प्रकार......१७३
१७—ब्रह्मचारी के वर्जित कर्म......१७५

( ४ )

संख्या विषय

संख्याविषयपृष्ठान्क.
१८—ब्रह्मचारी के कर्तव्य कर्म ...१७७
१९—आचार्य के कर्तव्य ...१८०
२०—अष्ट मैथुन-निषेध ...१८२
२१—वेदाध्ययन-विचार ...१८४
२२—ब्रह्मचारी-भेद ...१८६
२३—गुरु-दक्षिणा-प्रकरण ...१८८
२४—समावर्त्तन-संस्कार ...१९०
२५—विवाह-विधात ...१९२
२६—पूहृत्थ-ब्रह्मचर्य ...१९४
२७—सदाचार की सौ शिक्षाये ...१९६

[ चतुर्थ खण्ड ]

१—ब्रह्म-वन्दना ...२०५.
२—कन्या और ब्रह्मचर्य ...२०६
३—ब्रह्मचारिणी का विवाह ...२०९
४—ब्रह्मचारिणी देवियाँ ...२१२
५—पारित्रसत और ब्रह्मचर्य ...२१८
६—महिलाओं का महत्व ...२१९.
७—आदर्श माता ...२२२
८—ब्रह्मचर्य युक्त गर्भाधान ...२२४
९—शुश्रूषक ब्रह्मचारिणी सरस्वती ...२२७
१०—वेदवृत्ती का अपूर्व ब्रह्मचर्य ...२२८
११—स्वर्गिक ब्रह्मचारिणी सीता ...२३०

( ५ )

संख्याविषयपृष्ठाङ्क
१२—गृहस्थ ब्रह्मचारिणी देवहूती......२३३
१३—झी-जाति का पतन......२३५
१४—व्यभिचारिणी की दुर्दशा......२३७
१५—झी-जाति पर विदेशी मत......२३९
[ पञ्चम खण्ड ]
१—ब्रह्म-वन्दना......२४२
२—शरीर का सार......२४३
३—वीर्य की उत्पत्ति......२४५
४—ओज और वीर्य......२४६
५—वीर्य पर वैज्ञानिक दृष्टि......२४८
६—वीर्य के पकने का काल......२४९
७—वीर्य का स्थान और परिमाण......२५२
८—सन्मोग से वीर्य-स्खलन......२५४
९—वीर्य के कार्य......२५५
१०—जरा और मृत्यु......२५७
११—आयुर्वेद का कारण......२५९
१२—वीर्य-क्षय से राजयोग......२६०
(१) प्रमेह......२६०
(२) क्षय या यक्ष्मा......२६२
(३) स्तम्भ-दोष......२६३
(४) नपुंसकता......२६४
१३—वीर्य-रक्षा से लाभ......२६५
१४—वीर्य-नाश से हानि......२६७

( ६ )

संख्या विषय

पृष्ठान्कः

१५—अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता ...

२६९

१६—ब्रह्मचर्य के कुछ उपदेशा ...

२७१

[ षष्ठ खण्ड ]

१—ब्रह्म-वन्दना ... .. २७४

२—आधुनिक विचार्यार्थी ... .. २७५

३—अपक वीर्यपात के दोष ... .. २७७

४—वीर्य-नाश के प्रधान कारण ... .. २७९

(१) चाल-विवाह ... .. २८०

(२) दृढ़-विवाह ... .. २८१

(३) वेश्यागमन ... .. २८२

(४) पर-स्त्री-गमन ... .. २८४

(५) अति मैथुन ... .. २८६

(६) अनैसर्गिक मैथुन ... .. २८७

(७) तामस तथा राजस भोजन ... .. २८९

(८) मादक द्रव्य-सेवन ... .. २९१

(९) कुशिका और कुसङ्घ ... .. २९२

५—भोग की रूपया ... .. २९३

६—दुराचार की निन्दा ... .. २९६

७—काम-शमन के उपदेश ... .. २९८

८—स्वास्थ्य की शिक्षाये ... .. ३००

[ सप्तम खण्ड ]

१—ब्रह्म-वन्दना ... .. ३०४

( ७ )

संख्या विषय

पृष्ठाङ्क

२—वीर्य-रक्षा के सन्निधम......३०५
( १ ) माक्ष सुहृत्-जागरण......३०७
( २ ) रुधःपान......३०८
( ३ ) मल-भुत्र-विसर्जन......३०९
( ४ ) उपस्थित्व की स्वच्छता......३१०
( ५ ) वायु-सेवन......३११
( ६ ) नित्य-स्नान......३१२
( ७ ) कौपीन-धारण......३१४
( ८ ) प्राणयाम-साधन......३१५
( ९ ) मानसिक योग......३१८
( १० ) सन्ध्या-वन्दन......३२१
( ११ ) स्वप्नाहार......३२४
( १२ ) सात्विक भोजन......३२४
( १३ ) फलाहार......३२४
( १४ ) दुग्ध-पान......३२५
( १५ ) सत्पंक्......३२७
( १६ ) सदुपन्यां का पाठ.........३२८
( १७ ) नियम-बद्धता......३३०
( १८ ) शंखं सङ्कल्प......३३१
( १९ ) इच्छा-शक्ति-प्रयोग.........३३२
( २० ) सदभ्यास......३३४
( २१ ) वैराग्य......३३५
( २२ ) परिश्रम और उत्साह......३३६

( ८ )

संहर्षा विषयपृष्ठाङ्क
( २३ ) सप्तमी श्रद्धा ... ..३३७
( २४ ) दृढ़ विध्यास ... ..३३८
( २५ ) विन्ध-प्रेम ... ..३३९
( २६ ) स्वज्ञाङ्क पाठनना ... ..३४०
( २७ ) सूर्य-साप-सेवन ... ..३४१
( २८ ) सामयिक शयन ... ..३४२
( २९ ) शुभ ईर्शन ... ..३४४
( ३० ) दैमिक व्यायाम ... ..३४५
( ३१ ) आसनो का अभ्यास ... ..३४६
( ३२ ) शीर्षसन ... ..३४८
( ३३ ) आङ्गभर-शून्यता ... ..३४९
( ३४ ) सातु-भाव ... ..३५०
( ३५ ) भगिनी-भाव ... ..३५१
( ३६ ) पुत्रो-भाव ... ..३५२
( ३७ ) भाव की निर्मलता ... ..३५३
( ३८ ) दानेन्द्रियों पर संयम ... ..३५४
( ३९ ) ब्रह्मचारियों की चर्चा ... ..३५७
( ४० ) मृत्यु-भय ... ..३५८
( ४१ ) व्यसन-त्याग ... ..३५९
( ४२ ) उपवास-व्रत ... ..३६१
( ४३ ) ईश-प्रार्थना ... ..३६३
३—ब्रह्मचर्य पर खदेशी और विदेशी विद्वान् ... ..३६५
४—आवश्यक सम्देश ... ..३७२

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

ब्रह्मचर्य-वैभव

[ षट्पदी छन्द ]

( १ )

उन्नतियों का सार धर्म का रथ है न्यारा ! सत्कर्मों का पुरष जाति का जीवन प्यारा ॥ सञ्जनता का मूल फूल है वैदिक वन का । सब सुख का है धाम-श्राम है सदगुण गण का ॥ ब्रह्मचर्य-सत् विश्व में, कल्प घृत्त आधार है ! इसकी महिमा से सदा, चलता सब व्यापार है ॥

( २ )

ब्रह्मचर्य से दिव्य भावनायें होती हैं ! ब्रह्मचर्य से दीर्घ-यातनायें खोती हैं ॥ ब्रह्मचर्य से ज्ञान और बल नर हैं पाते । ब्रह्मचर्य से शान्ति-मोक्ष को हैं अपनाते ॥ श्रद्धियों के उपदेश को, कभी न भाई भूलिये ! रक्षा करके बीयें की, अति खतन्त्र ही फूलिये ॥

—कविपुष्कर

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

कथम स्वरूप

१—ब्रह्म-वन्दना

य आत्मदा यलदा यस्य विस्व, उपासते, प्रशिवं यस्य देवाः। यस्यच्छायाऽमृतं यस्य मृत्युः, कस्मै देवाय हविषा विधेम।

( यजु० ४० २५ स० १२ )

जो आत्मज्ञान तथा शाारीरिक बल का देने वाला है—जिस की सभी लोग उपासना करते हैं—विद्वान् पुरुष जिसे प्राप्त करते हैं—जिसका आश्रय अमृत ( हीर्य जीवन ) देने वाला है, और जिसके अधिकार में मृत्यु है—हम उस दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हैं। किसी भी महत्वपूर्ण कार्य के प्रारम्भ में उस की समाप्ति के लिये, वन्दना एक आवश्यक तथा शिष्टाचार से सम्बन्ध रखने वाला वैदिक नियम है। अतः हमने भी इस आर्य-धर्म सम्बन्धी ग्रन्थ को उपादेय बनाने की इच्छा से भावूलिक आर्थना की है। अस्तु।

ब्रह्मचर्य-विधान

२६

ऊपर के मन्त्र में ईश्वर-विनय तो हुई है, पर हमारे विचार से इसमें 'ब्रह्मचर्य' की ओर गुप्त रूप से सङ्केत भी किया गया है। उसका आशय निम्न-लिखित है:—

ब्रह्मचर्य से ही मनुष्य का मानसिक ज्ञान स्फुरित होता है। उसके शारीरिक बल का भी सर्वोत्कृष्ट साधन ब्रह्मचर्य ही है। सभी लोग ब्रह्मचर्य को श्रेष्ठ मान कर उसकी प्रतिष्ठा करना चाहते हैं। बुद्धिमानों को ब्रह्मचर्य अत्यन्त प्रिय होता भी है। ब्रह्मचर्य से ही मनुष्य दीर्घायु प्राप्त कर सकता है। ब्रह्मचर्य से ही मनुष्य दूर भगाई जा सकती है। इसलिये इस पवित्र वैदिक प्रार्थना में कहे गये 'ब्रह्मचर्य-रूप भगवान्' को हृदय में धारण करना योग्य है !

२—ब्रह्मचर्य की व्याख्या

'ब्रह्मचर्य' के सम्बन्ध में कुछ विचार प्रकट करने से पहले, यह समझना देना अत्यन्त आवश्यक है कि ब्रह्मचर्य है क्या पदार्थ ? जब तक इसके अर्थ नहीं बताये जायेंगे, तब तक उसके गूढ़ भावों के समझने और समझाने में, पाठक और लेखक—दोनों को समान रूप से अनुविधा होगी।

एक बात यह भी है कि जो वस्तु व्याख्या-द्वारा पहले पहल स्पष्ट नहीं कर दी जाती, उसके विषय में किये गये विचार भली भाँति हृदयङ्गम नहीं किये जा सकते। अतः 'ब्रह्मचर्य' किये कहते हैं ? यह वतलाना होगा।

वास्तव में 'ब्रह्मचर्य' एक शब्द नहीं, यह दो शब्दों के योग से बना है। एक 'ब्रह्म' दूसरा 'चर्य'—इस प्रकार तो ब्रह्म और चर्य—

२७

ब्रह्मचर्य को व्याख्या

इन दोनों शब्दों के भिन्न-भिन्न स्थानों पर, अनेक अर्थ होते हैं। हम पाठकों के हितार्थ कुछ को नीचे लिख देते हैं:—

‘ब्रह्म’—इस शब्द से ईश्वर, वेद, वीर्य, मोक्ष, धर्म, सूर्य, ब्राह्मण, गुरु, सुख, योग, सत्य, आत्मा, मनः, अन्न, द्रव्य, जल, महत्व, साधन और ज्ञान आदि का, और ‘चर्य’—इस शब्द से चिन्तन, अध्ययन, रक्षण, विवेचन, सेवा, नियम, उपाय, हित, ध्येय, प्रगति, प्रसार, संयम, साधना और कार्य आदि का बोध होता है।

‘ब्रह्मचर्य’ बहुत प्राचीन एवं प्रभावोत्पादक शब्द है। इसके बहुत से अर्थ हो सकते हैं, जिन्हें हम ऊपर दे चुके हैं, पर हमारे वैदिक साहित्य में इसके तीन ही प्रधान अर्थ होते हैं। हमने जहाँ कहाँ देखा है, इन्हीं तीनों अर्थों को ध्यान में रख कर, इस शब्द का प्रायः व्यवहार हुआ है। प्रायः उन्हीं अर्थों को लक्ष्य में रख कर, हमारा यह ग्रन्थ भी लिखा जा रहा है। अतएव हम उन्हीं प्रयुक्त नीचे स्पष्ट कर देते हैं:—

‘ब्रह्म’ शब्द वीर्य, वेद और ईश्वर वाचक है। और ‘चर्य’ रक्षण, अध्ययन तथा चिन्तन का चोत्तक है। इस प्रकार ब्रह्मचर्य के ये तीन प्रधान अर्थ समझे जाने चाहिये। १—वीर्य-रक्षण, २—वेदाध्ययन और ३—ईश्वर-चिन्तन। प्रयुक्त-प्रयुक्त तो तीन अर्थ हुये, पर तत्त्वतः वे तीनों ही एक मूलभूत ‘ब्रह्मचर्य’ में सञ्जित हैं।

‘ब्रह्मचर्य’ का पहला अर्थ हमने ‘वीर्य-रक्षण’ किया है। यह अर्थ प्राचीन समय से जनता में रुढ़ि को प्राप्त हो गया है। ब्रह्मचर्य का नाम लेते ही लोगों के हृदय में वीर्य-रक्षण का भाव उठता है। यह साधन-रूप से अब भी संसार में प्रतिष्ठित है।

‘ब्रह्मचर्य’ का दूसरा अर्थ हमने ‘वेदाध्ययन’ किया है। यह

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

२८

अर्थ चीर्य-रक्षण के साथ ही प्रचलित था। ब्रह्मचर्य की अवस्था में वेदाध्ययन एक प्रधान कार्य समझा जाता था। अब भी विद्यो-पार्जन की प्रणाली किसीन किसी रूप में सर्वत्र प्रचलित है ही।

‘ब्रह्मचर्य’ का तीसरा अर्थ हमने ‘ईश्वर-चिन्तन’ किया है। यह भी प्राचीन काल में उद्देश्य-रूप से माना जाता था। वीर्य-रक्षण और वेदाध्ययन की परिपाटी के साथ ही ईश्वर-चिन्तन भी होता था। अब भी लोग देवाराधन करते हैं।

ब्रह्मचर्य में वीर्य-रक्षण, वेदाध्ययन और ईश्वर-चिन्तन—इन तीनों बातों की सिद्धि होती है।

अर्थात् एक साथ वीर्य-रक्षण करने, वेदाध्ययन करने तथा ईश्वर-चिन्तन करने का नाम ‘ब्रह्मचर्य’ है। इन्हीं तीन महत्वशाली प्रयोजनों के एकत्र किये हुये भाव से ‘ब्रह्मचर्य’ शब्द की संसार में उत्पत्ति हुई है।

अब हम ऊपर कहे गये तीन प्रयोजनों के समूह-रूप ‘ब्रह्मचर्य’ को आगे बतला देंगे। हमने जिन आधारों पर ऊपर के अर्थ किये हैं, वे भी नीचे लिखे जाते हैं:—

कठोपनिषत्—

“तदेव शुक् तद्ब्रह्म, तदेवामृतममृतत्वे।”

अर्थात् वही वीर्य है—वही परमात्मा है और वही अमृत कहलाता है।

यजुर्वेद—

“तदेव शुक् तद्ब्रह्म, ता आपः स प्रजापतिः।”

अर्थात् वही वीर्य है—वही ईश्वर है—वही जीवन है, और वही सृष्टि-कर्ता भी है।

१९

ब्रह्मचर्य की व्याख्या

पैतरेयोपनिषत्—

“प्रज्ञानं वै ब्रह्म ।”

अर्थात् वेद साक्षात् परमेश्वर है ।

मनुस्मृति—

“ब्रह्मभ्यासेन वाजस्वमनन्तसुखमश्नुते ।”

अर्थात् वेद के सर्वत्र अध्ययन करने से अपरिमित सुख मिलता है ।

कैवह्योपनिषत्—

“यत्परब्रह्म सर्वात्मा, विभ्रमस्यावतर्न महत् ।”

अर्थात् जो परब्रह्म है—सर्वात्मा है, और संसार का श्रेष्ठ धाम है ।

वेदान्तदर्शन—

“अशातो ब्रह्म-जिज्ञासा ।”

अर्थात् अब हम परमात्म-तत्व की विवेचना करते हैं ।

ऊपर के अवतरणों से पाठक समझ गये होंगे कि ‘ब्रह्म’ से वीर्य, वेद और ईश्वर का बोध होता है । ब्रह्मचर्य-व्याख्या—कहने का अभिप्राय यह है कि वीर्य, वेद और ईश्वर का—रत्न, अण्व-यंत तथा चिन्तन ही ‘ब्रह्मचर्य’ है । इन तीनों में से एक भी कम हुआ, तो ब्रह्मचर्य की सम्पूर्णता नहीं प्राप्त हो सकती ।

३-ब्रह्मचर्य के आविष्कारक

गयन्ति देवाः किल गीतकानि—

धन्यास्तु ये भारत-भूमि-भागे ।

स्वर्गापवर्गस्य च हेतु-भूते,

भवन्ति भूयः पुरुषाः सुखत्वात् ॥

(श्रीमद्भागवत)

ब्रह्मचर्य-विज्ञान .

३०

यह वही महत्त्वशाली महादेश है, जहाँ की सम्पत्ता अपने अलौ-किक गुणों के कारण, एक बार उन्नति की चरम-सीमा को पहुँच गई थी। यह वही पुराय-प्रधान भूमि है, जहाँ का अन्तिम आलोक ग्रहण कर आधुनिक सभ्य तथा उन्नत कहलाने वाले देशों के निवासी, विश्व में अपनी विजय-वैजयन्ती उड़ा रहे हैं। वास्तव में हमारे उस गौरव-नरिमामय वैभव-विकास के आश्रय-भूत, इस देश में रहनेवाले, परम स्वार्थत्यागी और त्रिकालदर्शी ऋषि, मुनि तथा महात्मा लोग थे, जो उच्च पर्वतों की कन्दराओं और हरे-भरे वनों की कुटियों में बस कर, समस्त मनुष्य-जाति के लिये हितकर, एवं सुख-शान्तिमय उपाय सोचा करते थे। उनके सत्सिद्धान्त कोरी कल्पना (Theory) की अरसित भित्ति पर ही नहीं ठहरते थे, वरन् वे आदर्श विज्ञान (Science) की खरी कसौटी पर सुदृढ़ अभ्यास (Practice) द्वारा कसे जाकर ही जनता में प्रच-लित किये जाते थे। यही एक मुख्य कारण था कि उनके अनुगमन से प्रजा सदा फूलती-फलती रही। उन्होंने सामाजिक जीवन को नियम-बद्ध किया। ईश्वर की सत्ता को स्थिर रखने के लिये तथा मानवी-स्थिति को कुमार्ग-गामिनी होने से बचाने के उद्देश्य से, अनेक शास्त्रों की रचना की, और उनमें अनेक अमूल्य, उच्च तथा स्वभाविक विधान किये। उन्होंने स्वभाव-सिद्ध ब्राह्मणादि चार वर्णों और ब्रह्मचर्यादि चार आश्रमों की योजना की। जैसे वर्णों में ब्राह्मण, वैसे आश्रमों में ब्रह्मचर्य को प्रथमता और श्रेष्ठता का स्थान मिला। इस रहस्य-पूर्ण प्रणाली को हम उनके सर्वतोभद्र-मस्तिष्क और दिव्य-दृष्टि का सबसे बड़ा उत्पादन मानते हैं। संसार की प्राथमिक अवस्था में, वास्तव में, यह उनकी अपूर्व योग्यता:

३१

ब्रह्मचर्य की प्राचीनता

थी। अतएव ब्रह्मचर्य के मूल आविष्कारक, इसी देश के प्राचीन महात्मा तथा दूरदर्शी देव-पुत्र्य पुरुष थे। इन्होंने के कारण कई शताब्दियों तक ब्रह्मचर्य-प्रथा का प्रचार धार्मिक रूप से भारत में ही किया, समस्त भूमण्डल में उत्तरोत्तर-वृहत दिनों तक बढ़ता गया।

काल के प्रभाव से उस सुवर्ण-युग का अन्त हो गया। भारत में आज वे महर्षि तथा सिद्ध लोग नहीं रहे, पर जिस कल्याणप्रद मार्ग को दिखला गये, वह इस पवित्र समय में भी उनका स्मरण दिलाता है। यदि हम अपनी अज्ञानता और अभिमान को छोड़ कर, उनकी बातों पर विश्वास और प्रेम कर, ब्रह्मचर्य-प्रणाली को पुनः उसी रूप में प्रचलित करें, तो वास्तव में हम फिर भी उनकी आत्मा को दर्शन नवीन शरीर में कर सकते हैं। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि ब्रह्मचर्य के प्रभाव से भविष्य में हम भी वैसे ही आविष्कारक तथा सत्पुरुष हो सकेंगे।

४—ब्रह्मचर्य की प्राचीनता

ब्रह्मचर्य-प्रथा के आविष्कार-काल के सम्बन्ध में कुछ कहने के लिये, विश्व का इतिहास सूक्ष्म है। इसलिये यह बात निश्चय रूप से नहीं कही जा सकती कि यह प्रथा अमुक समय में ही प्रचलित हुई थी। पर ही, इतना तो कई उदाहरणों से जान पड़ता है कि इसका स्वेभाव वैदिक काल से पहले हो चुका था। जैसा कि मित्र-लिखित सन्ध से भी सूचित होता है:—

ब्रह्मचर्येण तपसा, देवा मृत्युमुपागत ।

इन्द्रोह ब्रह्मचर्येण, देवेभ्यः स्वरामरत् ॥

(अथर्ववेद)

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

३२

ब्रह्मचर्य के तपोयल से देवों ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की, और इन्द्र को इसी ब्रह्मचर्य के पुराय-प्रताप से सुरों में उद्यासन मिला ।

वास्तव में हमारे वेद-कालीन आर्यों ने इसका पूर्ण-रूप से विकास तथा सर्वश्रेष्ठ प्रचार किया था—वस समय की आश्रम-प्रथाओं से भी यह बात स्पष्ट-स्पष्ट भलकती है। यह प्रथा पौराणिक काल तक अधिक मर्यादित रही, और यहाँ फिर इसकी धीरे-धीरे अवनति होने लगी और इस दशाको पहुँची ।

सृष्टि-सम्बन्ध पर बहुत मत-भेद है। यदि लोकमान्य तिलक के मत से वैदिक सभ्यता का समय ८००० वर्षों से पूर्व मानें, तो भी हमारी ब्रह्मचर्य-प्रथा इससे विशेष प्राचीन ठहरेगी। वेदों में कई स्थानों पर ब्रह्मचर्य विषयक मन्त्र आये हैं। उनमें कहीं सद्गुण और कहीं प्रकट रूप से ब्रह्मचर्य के वर्णन हैं। प्रथम तीन वेदों में सूक्ष्म रीति से ब्रह्मचर्य का वर्णन है, पर चौथे वेद (अथर्वण) में इसका उल्लेख बहुत सार-गर्भित रूप में किया गया है, जो आगे यथास्थान दिया जायगा ।

वेदों के पश्चात् उपनिषदों की गणना है। हमारे कई उपनिषदों में ब्रह्मचर्य-विषय की आख्यायिकायें आई हैं, और उनमें के अन्तर्गत इस सम्बन्ध के मनोहर उपदेश भी दिये गये हैं, जिन्हें हम प्रसङ्ग-प्रसङ्ग पर पाठकों के लिये उपस्थित करेंगे ।

वेद तथा उपनिषदों के पश्चात् पुराण, रामायण, महाभारत और विविध ग्रन्थशास्त्र, प्रमाण-कोटि के ग्रन्थ हैं—इन ग्रन्थों में भी ब्रह्मचर्य की कथायें, पालन की शिक्षायाँ, विविध प्रशंसायें तथा निश्चित की हुई विधियाँ मिलती हैं । इसलिये ऐसी अवस्था में

३३

ब्रह्मचर्य की प्राचीनता

इसकी प्राचीनता में कोई सन्देह ही नहीं रह जाता। प्राचीन ग्रन्थों में ऐसा कोई विरला ही ग्रन्थ होगा, जो ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में अपना भिन्न मत रखता हो, और कुछ न कुछ उपदेश न देता हो।

आज से ५००० वर्ष पहले हमारी रामायण और महाभारत के समय में भी अनेक पुरुष ब्रह्मचर्य के पालन में आदर्श स्वरूप हो गये हैं। पुरुष ही नहीं, बहुत सी स्त्रियाँ भी इस अलौकिक धर्म की दृढ़ अनुयायिनी थीं। हिन्दू-राजाओं के अधःपतन-काल में भी उस ब्रह्मचर्य का दीपक कहीं-कहीं टिमटिमा रहा था। वास्तव में ब्रह्मचर्य का इतिहास भारतीय सभ्यता के इतिहास से कम प्राचीन नहीं है। इसका उत्थान और पतन सभ्यता के साथ ही साथ होता आया।

५-ब्रह्मचर्य की महिमा

ब्रह्मचर्य-प्रतिष्ठायां, वीर्य-लामो भवत्यपि।

सुरत्यं मानवोयाति, चान्तेयाति परांगतिम् ॥

(चण्डि)

ब्रह्मचर्य का पालन करने से वीर्य का लाभ होता है। ब्रह्मचर्य की रक्षा करने वाले मनुष्य को दिव्यता प्राप्त होती है, और साधना पूरी होने पर, परम गति भी उसे मिलती है।

ब्रह्मचर्य की महिमा अपार है। वाणी से उसका वर्णन करना सूर्य को दीपक से दिखाने के समान है। 'ब्रह्मचर्य' वह उग्र व्रत है, जिसकी साधना से लोग नर से नारायण हो सकते हैं। इसके पालन से अब तक अनेक लोग देव-कोटि में गिने गये। तभी तो

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

३४

भगवान् शङ्कर ने अपने मुखारविन्द से इस प्रकार कह कर, आदेश किया है:—

न तपस्तपस्तत्प्राहृष्टम्वच्यं तपोचमम् । उध्वरेतामचेद्यस्तु, सदेवो नतुमातुपः ॥

तप कुछ भी नहीं है । ब्रह्मचर्य ही उत्तम तप है । जिसने अपने वीर्य को वश में कर लिया है, वह देव-स्वरूप है—भतुष्य नहीं !

“एकतक्षतुरो वेदा, ब्रह्मचर्यं तथैकतः ।”

( छान्दोग्योपनिषत् )

एक ओर वा चारों वेदों के उपदेश, और दूसरी ओर ब्रह्मचर्य—दोनों एक गुला पर रखकर तौले जायें, तो दोनों पलड़े बराबर होंगे । अर्थात् ब्रह्मचर्य का महत्व वेदों से भी विशेष है ।

“तेषामेवैव स्वर्गलोकौ, येषां तपो ब्रह्मचर्यं, येतु सत्यं प्रतिष्ठितम् ।”

( प्रश्नोपनिषत् )

उन्हीं जनों को स्वर्ग-सुख मिलता है, जिन्होंने ब्रह्मचर्य जैसे तप का अनुष्ठान किया है, और जिनके हृदय में ब्रह्मचर्य स्वी सत्य विराजमान है ।

ब्रह्मचर्यं पालनीयं, देशानामपि दुर्लभम् । वीर्यं सुरक्षितेयान्ति, सर्वलोकार्थ-सिद्धम् ॥

( सूक्ति )

ब्रह्मचर्य का पालन करना योग्य है । देवों के लिये भी ब्रह्म-