ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश
Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh
स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)
ब्रह्मचर्यामृत
(बदकारी) गन्दे नीचों ने सिखलादी। मैं कई वर्ष तक हस्तमैथुन अर्थात् अपने हाथों से नाश करता रहा। मैं बहुत ही सुन्दर लड़का था। खाने-पीने में भी चटोरा था। कई विद्यार्थी जो मेरी कक्षा में थे, मेरे से आयु में बड़े और शरीर से तगड़े थे, वे बड़े नीच व गुण्डे थे। वे ऊपर से मेरे से बड़ा प्रेम करते थे। मुझे अनेक बार पैसे देते, बाजार से अच्छी-२ चीजें खरीदकर खिलाते और जब मैं उनकी बात नहीं मानता तो वे मुझे डराते और धमकाते। शनैः-शनैः उन्होंने ऐसे डोरे डाले कि मुझे अपने जाल में फँसा ही लिया। कई वर्ष तक मुझे खूब खराब किया। उन्ही दिनों मेरे स्कूल के एक अध्यापक ने मेरे से प्रेम करना आरम्भ किया, इस प्रेम का कारण मेरी सुन्दरता थी। उस नीच ने भी मेरे साथ कितनी बार मुँह काला किया। जब मैं इन बुराइयों में नहीं फँसा था, अपनी कक्षा में पढ़ने में प्रथम था, शरीर सुन्दर और स्वस्थ था। अब इन बुराइयों का फल मिलने लगा। रात को स्वप्न में सप्ताह में दो बार वीर्यनाश हो जाता। पेशाब में भी गड़बड़ होने लगी। मस्तिष्क निर्बल हो गया। पढ़ने में मन नहीं लगता था, उठते बैठते अन्धेरी आती। कई वर्ष अपना नाश करते रहने के कारण शरीर भी थोथे वृक्ष की तरह निर्बल हो गया। देखने को मुख पर अभी सुन्दरता शेष थी, किन्तु युवा होने से पहले बुढ़ापा आ गया। घरवाले विवाह की चिन्ता में थे, मन बड़ा दुःखी और उदास रहता था, मैं जीवन से निराश था। कई बार मन में आता था कि विष खाकर सदा के लिए सो जाऊँ, रेल के आगे कटकर मर जाऊँ। इस जीने से तो मरना भी अच्छा है। गुण्डे विद्यार्थियों और नीच अध्यापक के चंगुल से निकलने का भी यत्न किया, किन्तु वे बड़े धूर्त थे-उनके जाल से निकलना कोई सहज बात थोड़ी ही थी। बार-बार यत्न करने पर भी उसी प्रकार दल-दल में फँसा रहा। ऐसे विकट समय में डूबते को तिनके का सहारा आर्यसमाज के एक सदाचारी उपदेशक का सत्संग मिला। उस सच्चे देवता ने मुझे बार-बार ब्रह्मचर्य और सदाचार की शिक्षा दी। ब्रह्मचर्य सम्बन्धी अनेक पुस्तकें उन्होंने दी और पढ़ाई। कई वर्ष लगातार घोर परिश्रम करके मुझे उन गुण्डों के चंगुल से निकाला। उनके सत्संग से मेरी सब कुटेब (बुराइयों) छूट गई। प्रतिदिन नियमित व्यायाम
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जीवन-सन्देश
करने और अन्य ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करने से फिर से शक्ति और बल आने लगा। निराशा समाप्त हुई। सच्चा आनन्द क्या होता है, उसका स्वाद चखने को कुछ—२ मिला। क्या ही अच्छा होता यह सत्संग मुझे बाल्यकाल में ही मिलता और मैं नष्ट होने से बच जाता।”
इसी प्रकार देश के प्रायः सभी होनहार बच्चे बुरी आदतों में फँसकर नष्ट हो रहे हैं। प्यारे विद्यार्थियो ! यदि कोई नीच साथी तुम्हें यह गुप्त (गन्दी) शिक्षा दे कि मूत्रेन्द्रिय के हिलाने या मलने से आनन्द आयेगा, ऐसे नीच के मुँह को पीट देना। यदि तुमने किसी के बहकावे से मूत्रेन्द्रिय के साथ कोई खेल किया तो तुम्हारे जीवन का ही खेल बिगड़ जायेगा। परमात्मा ने मूत्रेन्द्रिय और गुदेन्द्रिय को मूत्र-मल (पेशाब, पाखाना) निकालने के द्वार बनाया है। इससे भूलकर भी कोई काम न लें। पेशाब पाखाना निकालना ही इनका काम है। मूत्रेन्द्रिय के द्वारा ही शरीर का राजा वीर्य भी कुचेष्टा(बुराई) करने से निकलता है। इसलिए इसे कभी हाथ न लगाओ, हाथ लगाने से कुट्टेयों में फँसने का डर है। स्नान आदि के समय मैल अवश्य साफ कर लिया करो। मूत्रेन्द्रिय का एक और भी काम है सन्तान पैदा करना। वह २५ वर्ष के पीछे गृहस्थाश्रम का काम है। किन्तु सच्चा विद्यार्थी तो महात्मा शुक्राचार्य के उपदेशानुसार (विद्यार्थी ब्रह्मचारी स्यात्) सच्चा ब्रह्मचारी ही होता है। जैसे दीपक में तेल बत्ती के सहारे उपर चढ़कर प्रकाश के रूप में बदल जाता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य का वीर्य मस्तिष्क में पहुँचकर विचार-अग्नि का ईंधन बनता है, ज्ञानरूपी प्रकाश का संचार करता है। मनुष्य के अविद्यारूपी अन्धकार को मिटाकर मन और आत्मा को देदीप्यमान् (प्रकाशित) करता है। प्यारे युवको ! सारी शक्ति लगाकर शरीर के सार, शक्ति के भण्डार, वीर्य की रक्षा करो। जैसे दूध में से मक्खन (घी) निकाल दिया जाये तो शेष छाछ का कोई मूल्य नहीं, गन्ने और सन्तरे का रस निकाल दिया जाये तो बचे हुए छिलके पैरों नीचे रौंदे जाते हैं, जिस साईकिल में से हवा निकल जाये तो वह सवारी के काम की नहीं, जिस वृक्ष को कीड़े (घुन) ने खाकर खोखला कर रखा है उसकी कड़ी-शहतीर आदि नहीं बन सकते, ऐसे ही जो मनुष्य के तत्त्व (कीमती
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ब्रह्मचर्यामृत
जौहर) वीर्य को नष्ट कर देता है ऐसा वीर्य-हीन (थौथा) मनुष्य अपने सौभाग्य को नष्ट करके दुःखसागर में डूब मरता है।
ब्रह्मचारी का शरीर वज्र के समान होता है। उसकी नस नाड़ियाँ फौलाद (इस्पात) से भी कठोर होती हैं। शरीर दृढ़, सुन्दर और सुडौल होता है। सारे शरीर और मुख-मण्डल पर ऐसी लाली, सुन्दरता (चमक) और तेज आता है कि जिसके दर्शन करके मनुष्य का पेट नहीं भरता। पाठकगण! इस ब्रह्मचर्य के आनन्द को खूब लूटिये और इस पवित्र सन्देश को देश के सब विद्यार्थियों और युवकों तक पहुँचाइये।
ब्रह्मचर्य का शत्रु बाल-विवाह
बाल-विवाह भी तुम्हारे मार्ग में एक भयंकर बाधा है। इस अन्याय के विरुद्ध वीरता से युद्ध करो। इसके कुचक्र में न फँसो। संसार में कोई मूर्ख किसान ऐसा नहीं जो चना-गेहूँ का कच्चा बीज अगले साल की फसल के बोने के लिए रखता हो, किन्तु भारतवर्ष ही एक ऐसा भाग्यहीन देश है जिसमें १६ वर्ष से पूर्व कन्या और २५ वर्ष से पूर्व बच्चों को बाल-विवाह की फाँसी देकर जब कि इनका शरीर और वीर्यादि धातुएँ भी कच्ची होती हैं, इनसे सन्तान पैदा कराई जाती है। फिर सन्तान कौनसी भीम-अर्जन पैदा होती है ? कीड़े-मकौड़े पैदा हो जाते हैं जो संसार में भार बनकर पाप ही बढ़ाते हैं। बाल-विवाह से प्रथम तो सन्तान होती नहीं, होती है तो मरी हुई। यदि जीवित भी हुई तो शीघ्र मर जाती है, जब तक जीती है सदा रोगी रहती है। बाल-विवाह से बढ़कर कोई पाप और अत्याचार संसार में नहीं है किसी को शीघ्र ही विवाह करना हो तो कम से कम लड़के की आयु २५ वर्ष और लड़की की आयु १६ वर्ष से कम न हो। यह अधम और निकृष्ट विवाह हैं। इससे पूर्व विवाह करना अपनी संतान को विषय-भोग की भट्टी में झोंकना है। १७ वर्ष से १६ वर्ष तक की स्त्री और ३० वर्ष से ४० वर्ष तक का-पुरुष विवाह करे मो मध्यम विवाह जानो और २० वर्ष से लेकर २४ वर्ष तक की स्त्री और ४० से ४८ वर्ष तक का पुरुष का विवाह करे तो सर्वोत्तम
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जीवन-सन्देश
है। जो कोई ब्रह्मचारी ऋतुगामी अर्थात् सन्तान पैदा करने के लिए वीर्यदान देने वाला, परस्त्री-त्यागी और एक स्त्रीवाला न हो तो वह भी बना बनाया धूल में मिल जावेगा। यदि आपके मूर्ख माता-पिता ने आपका बाल-विवाह कर दिया तो अपने आप को अविवाहित समझो। जब तक तुम २५ वर्ष के न हो जाओ गृहस्थ को विष समझो। नहीं तो तुम्हारा सर्वनाश हो जायेगा। तुम विद्या न पढ़ सकोगे, तुम्हारा शरीर भी बिगड़ जायेगा, पीछे पछताओगे और रोओगे। कोई आँसू भी पोछनेवाला नहीं मिलेगा। घर जाना भी पड़े तो बचकर रहो। बात तो तब है कि वे सैंकड़ों नवयुवक जिनके बाल-विवाह हो गये हों घरवालों के विरुद्ध सत्याग्रह करें, विवाह के बन्धन को तोड़ डालें और विवाह को विवाह न मानकर गृहस्थी न रहें। तब कहीं यह बाल-विवाह का पाप मिट सकेगा, नहीं तो रात-दिन इस देश के होनहार बालक इसी प्रकार मिट्टी में मिलते रहेंगे।
सगाई भी आधा विवाह है इसे भी २५ वर्ष की आयु से पूर्व स्वीकार नहीं करना चाहिए। सगाई के बहाने बालक को एक रुपया देकर ये धूर्त लोग अपने जाल में फँसा लेते हैं। सगाई करने वाले बड़ी मीठी-मीठी बातें करते हैं, इनके जाल में न फँसो।
विशेष जानकारी के लिए मेरी बनाई पुस्तक “बाल-विवाह से हानियाँ” पढ़ो।
निराश न हों।
बहुत से नवयुवक जिनका विवाह भी नही हुआ होता, किन्तु अज्ञानवश बाल्यकाल में कुसंगति में फँस अपना जीवन भ्रष्ट कर लेते हैं, उन्हें सत्संग से जब होश आता है बड़े हताश और दुःखी देखे जाते हैं। उन्हे घबराना नहीं चाहिए। जब आँख खुले, तभी प्रभात समझो। पिछली बातों को याद करके रोने-धोने में समय न खोओ। व्यर्थ चिन्ता करके अपनी चिता तैयार न करो। बीती को बिसार दो, रही को सँभालो। जब वाल्मीकि-सा डाकू महिर्ष बन सकता है, नास्तिक, शराबी तथा चरित्रहीन मुन्शीराम सच्चा साधु स्वामी श्रद्धानन्द सन्यासी अमर शहीद का पद पाता है, प्राचीन गुरुकुल शिक्षाप्रणाली का उद्धार कर हलचल मचाता है, थोड़ी-सी हड़्डियों
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ब्रह्मचर्यामृत
का पिंजर एम० के० गांधी महात्मा पद को पाता है, तो आप क्या नहीं बन सकते ? सब कुछ बन सकते हैं। इनके जीवन पहले क्या कम गिरे थे ? इतना गिरा हुआ तो कोई ही नवयुवक होता है। इन्हे संसार का सिरमौर किसने बना दिया? सदाचार ने। अन्धकार कितना ही पुराना हो, प्रकाश होते ही भाग जाता है। जो कुचेष्टाओं को छोड़ेगा, ब्रह्मचर्य के नियमों और साधनों का दृढ़तापूर्वक पालन करेगा, उसके सब संकट और दुःख दूर हो जायेंगे और सफल होगा।
ब्रह्मचर्य के साधन
१. प्रातःजागरण
सदैव प्रातः काल चार बजे उठो। उठते ही ईश्वर का चिन्तन करो। फिर अन्य कार्य करो। प्रातः काल उठने से बुद्धि तीव्र होती है। मनुष्य रोगरहित और स्वस्थ रहता है। जो आलसी मनुष्य अमृतवेला में सोता है, स्वप्नदोष आदि रोग उसे ही सताते हैं, क्योंकि गन्दे स्वप्न प्रायः चार बजे के पीछे ही आते हैं। इसलिये चार बजे के पीछे ब्रह्मचर्य-प्रेमियों को नहीं सोना चाहिए।
२. उषःपान तथा चक्षुरस्नान
शुद्ध जल को लेकर मुख में पूरा भरलो—और साथ ही दूसरे जल से आँखों में खूब छींटे दो, फिर कुल्ली करके आठ—दस घूँट जल पी लो। इस जलपान से वीर्य सम्बन्धी रोग नष्ट होता है। बवासीर नहीं होती। अर्जीण (कब्ज) दूर होता है और शौच खुलकर आता है। कामविकार और शरीर की ऊष्णता दूर होती है।
३. शौच
जल पीकर लघुशंका जा कुछ समय के पीछे खुले जंगल में जाकर मलत्याग (शौच) करें। शौच के लिए जितना ग्राम से दूर जायें उतना ही अच्छा है। जिधर से वायु आता हो उधर मुख करके बैठें। मुख तथा दाँतों
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जीवन-सन्देश
को बन्द रखें। बारें पैर पर दबाव रखें। शौच के समय जोर न लगायें और न ही किणछें, बल लगाने से वीर्यनाश हो जाता है। जो मल (टट्टी) स्वयं आजाये, ठीक है। यदि शौच खुलकर नहीं आता और कब्ज रहता है, तो शौच जाने से पूर्व पेट के आसनादि हल्के व्यायाम करें। पेट को खूब हिलायें। पीछे शौच जायें तो मलबद्ध नहीं होगा। सायंकाल ताँबे के पात्र में जल रख दें। उसका प्राःकाल पान करने से शौच ठीक होता है।
शौच दोनों समय प्रातः और सायं अवश्य जायें। मल तथा मूत्र के वेग को कभी नहीं रोकें। इनके रोकन से अनेक रोग हो जाते हैं। मल मूत्र की उष्णता से वीर्यनाश भी हो जाता है। शौच जाते समय जलपात्र अवश्य ही साथ ले जायें। दोनो समय मूत्र-इन्द्रिय तथा गुदा-इन्द्रिय को शुद्ध ठण्डे जल से कई बार मिट्टी लगाकर धोयें। जो सफेद मैल मूत्रेन्द्रिय के अगले भाग पर खाल के नीचे जम जाता है उसे जल से साफ कर दें और इन्द्रिय के छिद्र पर, जिससे मूत्र निकलता है ठण्डे पानी की बारीक धार एक-दो मिनट डालें। ऐसा करते समय ईश्वर का चिन्तन करें। विचार शुद्ध रखें। ठण्डे पानी की धार से शरीर में ठण्डक होकर मन की चंचलता दूर होती है और निरन्तर सेवन से स्वप्नदोष भी नहीं होता। जब-जब मूत्र त्याग करें, तब-तब ठण्डे जल से इन्द्रिय को धो डालें। शौच के पीछे हाथ तथा जलपात्र को कई बार मिट्टी लगा-लगाकर धोयें।
प्रातः जागरण, उषःपान, चक्षुःस्नान, शौचादि के विषय में मेरी पुस्तक "ब्रह्मचर्य के साधन" १-२ भाग पढ़ें।
४. दन्त-धावन
कीकर, नीम, मौलसरी किसी एक वृक्ष की दातुन प्रतिदिन किया करें। इससे दाँत-रोग दूर होंगे, पाचन-शक्ति और आँखों की ज्योति बढ़ेगी। दाँतों के सम्बन्ध में पूरे विवरण के लिए मेरी "दन्त-रक्षा" पुस्तक पढ़ें।
५. स्नान
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ब्रह्मचर्यामृत
प्रतिदिन कूँए के ठण्डे और ताजा जल से रगड़-रगड़कर धर्षन स्नान करें। पहले सिर पर और फिर शरीर के सब अंगों पर पानी डालें, गर्म जल से कभी भूलकर भी नहीं नहाना। नाभि के नीचे खूब ठण्डे जल की धार डालें। इससे स्वप्नदोष दूर होकर वीर्यरक्षा में लाभ होगा। खदर के अँगोछे से पोछकर शरीर को सुखा लें, फिर शुद्ध खदर के सादे वस्त्र धारण करें। ब्रह्मचारी सदैव दोनों समय स्नान करें तो और भी अच्छा है, नहीं तो गरमी के काल में तो अवश्य की दोनों समय नहायें।
६. सन्ध्या तथा प्राणायाम
एकान्त शुद्ध स्थान में ईश्वर का भजन तथा सन्ध्या करें। सन्ध्या से पूर्व तथा जब भी प्राणायाम मन्त्र आये, तो कम से कम तीन-तीन प्राणायाम करें। सदा लम्बे तथा गहरे श्वास लेने का स्वभाव डाले। इससे आयु बढ़ती है। प्राणायाम करने के समय सिद्धासन से बैठें। मूलाधार और नाभि को ऊपर खींचें, इससे स्वप्नदोष आदि विकार दूर होते हैं, वीर्यरक्षा में बड़ी सहायता मिलती है। प्राणायाम ब्रह्मचर्य का सबसे उत्तम साधन है। अथवा यूँ समझिए कि प्राणायाम ब्रह्मचारी का प्राण है। प्राणायाम और सन्ध्या से सब पाप दूर होते हैं तथा मन और इन्द्रियाँ वश में आती हैं। प्राणायाम की पूर्णविधि 'सत्यार्थप्रकाश' के तीसरे समुल्लास और मेरी प्राणायाम पुस्तक में पढ़ें और स्नान, सन्ध्या-यज्ञ आदि के सम्बन्ध में मेरी 'ब्रह्मचारी के साधन' (पाँचवाँ भाग) पुस्तक पढ़ें।
७. व्यायाम
सन्ध्या के पीछे खुली हवा में व्यायाम करें। आसन तथा दौड़ का व्यायाम विद्यार्थियों के लिए विशेष लाभकारी है। पहले सौ गज की दौड़ आरम्भ करें और शनैः-शनैः एक मील की, फिर इससे भी अधिक का अभ्यास करें। ध्यान रहे कि श्वास सदैव नाक से ही लें। शीर्षासन ब्रह्मचर्य का प्राण है और वीर्यरक्षा का उत्कृष्ट साधन है, किन्तु यह ध्यान रहे कि सिर के नीचे कपड़े की मोटी गद्दी रखें और दौड़ आदि सभी व्यायामों से
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जीवन-सन्देश
पूर्व इसे करें। पीछे करने से बहुत हानि होती है। इसे एक मिनट से आरम्भ करके शैनः-शैनः दस- पन्द्रह मिनट तक करने का अभ्यास बढ़ावें। जिन्हें स्वप्नदोष होता हो उन्हें सांयकाल भी शीर्षासन और प्राणायाम का दीर्घकाल तक अभ्यास करना चाहिए। इससे वीर्य ऊर्ध्वगति हो जाती है। वीर्यसम्बन्धी सब रोग नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार मयूरासन, हलासन, चक्रासन तथा मयूराचालादि प्रातः काल करने चाहिए। सांय काल शीर्षासन, मोगरी, मुग्दर, बैठक और मल्लयुद्ध (कुशती थोड़ी -सी) का व्यायाम अच्छा रहता है। यदि घी, दूध बादाम आदि पुष्टिकारक पदार्थ अधिक मिलें तो अधिक; और कम मिलें तो कम व्यायाम करें। व्यायाम शक्ति और भोजन के अनुसार ही करें। जैसे जल, वायु और अन्न, जीवन का आधार है, ऐसे ही व्यायाम स्वास्थ्य का मूल कारण है। संसार का कोई भी मनुष्य बिना व्यायाम के पूर्ण स्वस्थ नहीं रह सकता। व्यायाम करने में खूब आनन्द लें। व्यायाम करने से शरीर के सब अंग दृढ़ होते हैं। शरीर सुन्दर और सुडौल बनता है। वीर्य शरीर में पचकर रक्त में मिल जाता है और शक्ति का रूप धारण करता है।
व्यायाम से रंग-रोगन निखरता है। मुख पर तेज और लाली आती है। मनुष्य सदा जवान रहता है। घर के कार्य को कभी व्यायाम न समझें। कार्य-कार्य ही है और व्यायाम-व्यायाम ही। व्यायाम के लिए प्रातः काल का समय सबसे अच्छा है। यदि ब्रह्मचारी दोनों समय नियमित व्यायाम करे तो सोने पर सुहागा है। व्यायाम इतना करें कि पसीना आजाये। पैरों के व्यायाम की अपेक्षा हाथों का व्यायाम अधिक करें, जिससे भुजायें, छाती और मस्तिष्क अधिक बलशाली हों। उष्णकाल में स्नान से पूर्व और शीतकाल में स्नान-सन्ध्या के पीछे व्यायाम कर सकते हैं। शरीर ठण्डा होने पर अर्थात् आधा घण्टा पीछे स्नान करें। खाना खाकर कभी व्यायाम न करें। ग्रीष्मकाल में व्यायाम के पीछे प्यास लगती है, जल कभी न पियें, बहुत हानि करता है, गोदुग्ध का पान सर्वश्रेष्ठ है। यदि दूध न मिले तो बादाम आदि रगड़कर पीयें। व्यायाम के पीछे भूख लगा करती है, थोड़ा पुष्टिकारक भोजन अवश्य करलें, भूखा रहना अच्छा नहीं।
पूरे विवरण के लिए मेरे द्वारा लिखित "व्यायाम का महत्त्व और
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१९ | जीवन सन्देश
प्रकार का सन्देह नहीं।
मनुष्य अपने जीवन को सुन्दर, सुखी और शान्त बनाने के लिये अनेक प्रकार के यत्न करता है, परन्तु जब तक वह ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करता, तब तक उसे सच्ची शान्ति और सुख प्राप्त नहीं हो सकता। ब्रह्मचर्य ही जीवन का मूल आधार है। जो मनुष्य वीर्य की रक्षा करता है, उसका शरीर पुष्ट, मन प्रसन्न और बुद्धि तीव्र होती है। इसके विपरीत जो मनुष्य वीर्य का नाश करता है, वह दुर्बल, रोगी, अल्पायु और निस्तेज हो जाता है।
अतः प्रत्येक युवक और युवती का यह परम कर्तव्य है कि वह ब्रह्मचर्य के महत्व को समझे और अपने जीवन में उसका दृढ़तापूर्वक पालन करे। विषय-वासनाओं के जाल में फँसकर अपने अमूल्य जीवन को नष्ट न करे। सदा उत्तम विचारों का चिन्तन करे, सत्पुरुषों की संगति करे और ईश्वर की उपासना में मन लगावे। इसी से उसका लोक और परलोक दोनों सुधर सकते हैं।
ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करने से मनुष्य दीर्घायु, बलवान् और यशस्वी बनता है। हमारे प्राचीन ऋषियों-महर्षियों ने ब्रह्मचर्य के बल पर ही महान् कार्य किये और संसार का मार्गदर्शन किया।
जीवन-सन्देश
हो। स्वाद के लिए जिह्वा के दास न बनें। लाल, काली सफेद, हरी किसी भी प्रकार की मिर्च न खायें। ये सभी ब्रह्मचर्य के लिए विष हैं, सोडावाटर, बर्फ, चाय, कहवा, कॉफी ये सभी वीर्यनाशक हैं, इन्हें कभी न छुयें। माँस, मछली, अण्डे मनुष्य का भोजन नहीं, इन्हे खाकर सात जन्म में भी ब्रह्मचारी नहीं रह सकता। यदि खाते हैं तो अभी छोड़ दें।
नशों से बचें
हुक्का, बीड़ी, सिगरेट, शराब, गॉंजा, अफीम, चण्डू, भंग आदि खाने-पीने की वस्तु नहीं। इनके खाने-पीनेवाला जीवन से प्रेम छोड़ दे, कफन मंगवाकर घर में रखे। कहो वीर्यरक्षा और कहां ये नशे ओर व्यसन, इनका क्या मेल ? सिगरेट शराब आदि पीने वाला इन्हें बिना छोड़े ही वीर्यरक्षा करना चाहता है। यदि अपना कल्याण चाहते हैं तो आज ही कान पकड़ लें और व्रत लें कि “कभी सिगरेट, शराब आदि विष का पान नहीं करेंगे, चाहे मर भी जायें इन्हे छुयेंगे नहीं।” इनके पीने खानेवाला सर्वथा नष्ट होकर मिट्टी में मिल जाता है। विशेष विवरण के लिये ‘भोजन’ पुस्तक पढ़ें।
६. शयन
सदा अकेले सोयें। कभी किसी अवस्था में भी किसी के साथ यहाँ तक कि सगे भाई के साथ भी न सोयें। सोने से पूर्व लघुशंका (पेशाब) अवश्य करें। हाथ, पैर, मुख शीतल जल से धोयें। मूत्रेन्द्रिय का स्नान भी हितकर है। अँगोछे से हाथ पैर पोंछलें। कुर्ता धोती आदि सब वस्त्र उतार दें। केवल शुद्ध और बारीक खदर का लंगोट बाँधे रहें। मर्द का लंगोट और घोड़े का तंग २४ घण्टे बँधा ही रहना चाहिए। सदा भूमि पर सोये। एक दरी का बिछौना रखें। यदि जाड़े में न रह सकें तो एक कम्बल और डाललें, रूई के गढ़े वा कोमल बिस्तर पर कभी न सार्यें। सीधे, पेट के बल कभी न सोयें, ब्रह्मचारी को दार्या करवट सोना चाहिए। सोते समय पैर के ऊपर पैर न रखें, आगे पीछे रखें। सिर पूर्व वा दक्षिण की ओर ही रखें।
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२१ | जीवन सन्देश
सकता। जो मनुष्य अपने मन को वश में कर लेता है, वह संसार के समस्त सुखों का उपभोग करने में समर्थ होता है।
मन की चंचलता को रोकने के लिये प्राणायाम, ईश्वर-प्रार्थना और स्वाध्याय परम आवश्यक साधन हैं। जब मन पवित्र और एकाग्र हो जाता है, तब विषय-वासनाएँ स्वतः ही शान्त हो जाती हैं।
युवकों को चाहिये कि वे गन्दे उपन्यासों, अश्लील चित्रों और सिनेमा के कुप्रभाव से दूर रहें। कुसंगति से सदा बचें, क्योंकि जैसी संगति होगी, वैसा ही रंग चढ़ेगा। शुद्ध, सात्विक और पौष्टिक भोजन करें। अधिक मिर्च-मसाले और उत्तेजक पदार्थों का त्याग करें। रात्रि को शीघ्र सोयें और प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर भ्रमण व व्यायाम करें।
इस प्रकार के नियमबद्ध जीवन से स्वास्थ्य उत्तम रहता है और ब्रह्मचर्य की रक्षा सहज ही हो जाती है।
जीवन सन्देश | २२
ब्रह्मचर्य के बिना किसी भी राष्ट्र की उन्नति सम्भव नहीं है। जिस देश के युवक ब्रह्मचारी, वीर्यवान् और चरित्रवान् होंगे, वही देश संसार में सिरमौर बन सकता है। चरित्र ही मनुष्य का सच्चा धन है। यदि धन नष्ट हो गया तो कुछ नहीं गया, यदि स्वास्थ्य नष्ट हो गया तो कुछ नष्ट हुआ, परन्तु यदि चरित्र नष्ट हो गया तो सब कुछ नष्ट हो गया।
अतः आओ, हम सब मिलकर यह प्रतिज्ञा करें कि हम अपने चरित्र की रक्षा करेंगे, ब्रह्मचर्य का व्रत धारण करेंगे और अपने देश तथा समाज का मस्तक ऊँचा करेंगे।
ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः !
इति शुभम्
महाशय रणधीर सिंह जी का जन्म गान्धरा गाँव जिला रोहतक में सन् १६२६ को महाशय श्री भानी सिंह रिसालदार के यहाँ हुआ। आपके पिता श्री बडे धर्मात्मा व दानी महानुभाव थे। अपनी वीरता के कारण ही आपने सेना में रिसालदार का पद प्राप्त किया। सेना से निवृत्त होकर आए तो आपकी दान की ख्याति सुनकर लोग जिस दिन पेंशन लेने आप जाते उस दिन सैंकड़ों याचक आपके समक्ष उपस्थित होते, आप सारी पेंशन का उनको सामान खरीद कर देते जो शेष बच जाते उनको अगली पेंशन के उधार पर सामान दिलवा देते आप घर पर एक भी पैसा नहीं पहुँचा पाते। घर का खर्चा खेती-बाड़ी में चल जाता। स्वयं महाशय रणधीर जी भी पिताश्री से कम नहीं निकले। घर से दूध बेचने के बहाने ले जाते और रोहतक अस्थल बोहर डेरे में साधु सन्तों को पिलाकर वापिस आ जाते। घर का खर्च आपकी धर्मपत्नी धनकौर देवी जी अपनी कर्मठता से तथा आप भी कृषि से चलाते। आपके चार पुत्र, दो पुत्रियाँ क्रमशः राजवीर, तसवीर, सुखवीर, जगवीर, कृष्णा व दर्शना है। पिछले बीस वर्षों से लगातार दैनिक अग्निहोत्र करते हुए यज्ञमय जीवन इस परिवार का चल रहा है। इस यज्ञ ने इस परिवार को प्रत्येक दिशा में उन्नत किया है। श्री राजवीर जी उपासक के मन में एक भावना सदा रहती थी कि मैं खेतों में घर बनाकर योगियों की तरह जीवन जीऊँ वह इच्छा इनकी पूरी हुई आज घरौटी जिला रोहतक
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में गाँव से दूर नहर के किनारे इनके चवालीस एकड़ भूमि में योगियों के आश्रम सदृश इनका घर है। जिसमें नित्य दोनों समय पूरा परिवार मिलकर ब्रह्मयज्ञ तथा अग्निहोत्र करते हैं। पूर्ण वैदिक जीवन जीते हुए यह परिवार पूर्ण आनन्द को प्राप्त कर रहा है।
पुत्र-पुत्रियाँ भी पिता-पितामह के चरणचिन्हों का अनुसरण करके चल रहे हैं। माता धनकौर देवी जी ने इस पुस्तक के प्रकाशन के लिए एक लाख रुपये सात्विक दान दिया है। इसके लिए इस परिवार को कोटि-कोटि धन्यवाद तथा प्रभु से प्रार्थना है कि इस प्रकार के लाखों करोड़ों परिवार भारत में हों जिससे कि देश धर्म की उन्नति हो सके।
इस पुस्तक को पढ़कर आज की भटकती हुई युवा पीढ़ी अवश्य ही प्रेरणाप्राप्त अपने जीवन को व राष्ट्र समाज की अवश्य ही सुख पहुँचायेगी।
आचार्य बलदेव
आर्य महाविद्यालय गुरुकुल कालवा, जिला जीन्द (हरयाणा)
दूरभाष : 01686-268348
यशवन्त आर्य:
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गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) के प्रसिद्ध प्रकाशन
- ब्रह्मचर्यामृत (जीवन सन्देश) — स्वामी ओमानन्द सरस्वती
- महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र
- सत्यार्थ प्रकाश (सरल व्याख्या)
- योग दर्शन एवं स्वास्थ्य रक्षा
- संस्कार विधि एवं दैनिक कर्तव्य
सत्साहित्य मँगाने का पता :
व्यवस्थापक, गुरुकुल झज्जर, जिला रोहतक (हरियाणा)