संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
संप्रहृष्टास्ततः सर्व्वे समेत्य च समंततः । संतोषाज्जहसुः केचिन्ननृतुश्च मुदान्विताः ॥१६ ददृशुश्च महात्मानं कपिलं दीप्ततेजसम् । वृद्धं पद्मासनासीनं नासाग्रन्यस्तलोचनम् ॥१७ ऋज्वायतशिरोग्रीवं पुरोविष्टब्धवक्षसम् । स्वतेजसाऽभिसरता परिपूर्णेन सर्वतः ॥१८ प्रकाशयमानं परितो निवातस्थप्रदीपवत् । स्वांतप्रकाशिताशेषविज्ञानमयविग्रहम् ॥१९ समाधिगतचित्तं तु निभृतांभोधिसन्निभम् । आरूढयोगं विधिवद्धयेयसंलीनसम् ॥२० योगींद्रप्रवरं शांतं ज्वालामालमिवानलम् । विलोक्य तत्र तिष्ठंतं विमृशंतः परस्परम् ॥२१
उन नृप के पुत्रों ने उस समय भूमि को खोदते हुए पाताल लोक के तले तक खोद डाला था और उसके अन्दर पाताल में फिर उस अश्व को देखा था ।१५। फिर जब उनको वह यज्ञ का अश्व वहाँ दिखाई पड़ गया तो सब चारों ओर से एकत्रित होकर बहुत अधिक प्रसन्न हुए थे । उनका बहुत अधिक सन्तोष हो गया था । उनमें कुछ तो बहुत अधिक हँसने लगे थे और कुछ परमानन्दित होते हुए नाचने लग गये थे ।१६। वहाँ पर महान आत्मा वाले कपिल मुनि का दर्शन किया था जो कि परम वृद्ध थे और तेज से देदीप्यमान हो रहे थे । उन्होंने पद्मासन बाँध रक्खा था । इस तरह से बैठकर अपने नेत्रों को नासिका के अग्रभाग लगाकर ध्यान में योग क्रिया के अनुसार मग्न हो रहे थे ।१७। उनका शिर और ग्रीवा एकदम सीधे थे और आगे की ओर उनका वक्षःस्थल विष्टब्ध था । उनका परिपूर्ण तेज सभी ओर से अभिसरण कर रहा था अर्थात् उनका अपना आत्म तेज उनके चारों ओर एक मण्डलाकार में उद्दीप्त होकर दिखाई दे रहा था ।१८। जिस तरह से निर्वात स्थान में एक रस दीपक की लौ प्रकाशित हुआ करती है कि उसी भाँति से सब ओर उनका तेज प्रकाशित होता हुआ दिखाई दे रहा था । उनके अपने अन्तःकरण में प्रकाशित जो विज्ञान था उसी से परिपूर्ण उनका कलेवर था ।१९। समाधि में उनका संलग्न चित्त छिपे हुए समुद्र के ही
सगर विनाश वर्णन ] [ ३१
समान था और वे विधि के साथ योगाभ्यास में समारूढ़ होकर अपने ध्येय परब्रह्म में संलग्न मन वाले थे ।२०। उन्होंने परम शान्त योगीन्द्रों में अधिक श्रेष्ठ मुनि का अवलोकन किया तो ऐसा उस समय में आभास हो रहा था कि यह कोई जलती हुई ज्वालाओं की मालाओं से परिपूर्ण साक्षात् अग्नि का ही स्वरूप है । जब उनको समाधि स्थित सबने देखा था तो सब आपस में विचार करने लगे थे कि यह अत्यधिक तेजस्वी कौन महापुरुष है ।२१।
मुहूर्त्तमिव ते राजन्साध्वसं परमं गताः ।
ततोऽयमश्वहर्त्तेति सागरा कालचोदिताः ॥२२
परिवव्रुर्दुरात्मानः कपिलं मुनिसत्तमम् ।
ततस्तं परिवार्योचुश्चोरोऽयं नात्र संशयः ॥२३
अश्वहर्त्ता ततोह्येष वध्योऽस्माभिर्दुराशयः ।
तं प्राकृतवदासीनं ते सर्वे हतबुद्धयः ॥२४
आसन्नमरणाश्चक्रुर्धर्षितं मुनिमंजसा ।
जैमिनिरुवाच—
ततो मुनिरदीनात्मा ध्यानभंगप्रधर्षितः ॥२५
क्रोधेन महताऽऽविष्टश्चुक्षुभे कपिलस्तदा ।
प्रचचाल दुराधर्षो धर्षितस्तैर्दुरात्मभिः ॥२६
व्यजृम्भत च कल्पांते मरुद्भिरिव चानलः ।
तस्य चार्णवगंभीराद्वपुषः कोपपावकः ॥२७
दिधक्षुरिव पातालाँल्लोकात्सांकर्षणोऽनलः ।
शुशुभे धर्षणक्रोधपरामर्शविदीपितः ॥२८
हे राजन् ! मुहूर्त मात्र समय तक तो दङ्ग से होकर रह गये थे और उनको बड़ा भारी डर लगा था। फिर भावी की प्रबलता से प्रेरित होकर उन सगर के पुत्रों ने यही निश्चय बना लिया कि हो न हो यही इस अश्व के हरण करने वाला है ।२२। उन दुष्ट आत्माओं वालों ने परम श्रेष्ठ मुनि कपिल को चारों ओर घेर लिया था और घेरा डालकर उन्होंने कहा था— यही चोर है—इसमें लेश भर भी संशय नहीं हैं ।२३। क्योंकि इसने अश्व का अपहरण किया है इसलिए इस बुरे विचार वाले का हमको वध कर
३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
डालना चाहिए। उन सब की बुद्धि तो होनहार के वश क्षीण हो गयी थी और उनकी मृत्यु निकट में प्राप्त हो रही थी। उन सबने योगासीन उस मुनि को एक साधारण मनुष्य के ही समान सहसा धर्षित किया था अर्थात् डाट-फटकार लगाना आरम्भ कर दिया था। जैमिनी मुनि ने कहा—इसके पश्चात् यह हुआ था कि जब उन सबने बहुत शोर मचाया तो मुनि का ध्यान टूट गया था और अत्युच्च आत्मा वाले मुनि कपिल प्रधर्षित हो गये थे। २४-२५। उस समय में ध्यान के भङ्ग हो जाने से कपिल मुनि को महान् क्रोध हो गया था और उस समय में विष्ट उनके हृदय में बड़ा भारी क्षोभ हो गया था। वे तो इतने तेजस्वी थे कि उनके ऊपर किसी का भी प्रभाव नहीं पड़ सकता था और उनका दबा देना महान् कठिन था। जब उन दुरात्माओं ने धर्षित करने का प्रयास किया था तो वे संचलित हो गये थे। उस समय में कपिल मुनि ऐसे ही क्रोधवेग में देदीप्यमान दिखाई पड़ रहे थे जैसे कल्प के अन्त में सर्व संहारक वायु से प्रेरित अग्नि होता है। उस समय में समुद्र के समान परम गम्भीर उनके शरीर से कोपाग्नि निकल रही थी। २६-२७। वह सर्वसंहारक क्रोधाग्नि पाताल लोकों को दग्ध करने वाले के ही समान था और धर्षण अर्थात् फटकार से जो क्रोध उत्पन्न हो गया था उसके होने से अत्यधिक प्रदीप्त होकर वह शोभित हो रहा था। २८।
उन्मीलयत्तदा नेत्रे वह्निचक्रसमद्युतिः । तवाऽक्षिणी क्षणं राजन्राजेतां सुभृशारुणे ॥ २६
पूर्वसंध्यासमुदितौ पुष्पवंताविवांबरे । ततोऽप्युद्वर्त्तमानाभ्यां नेत्राभ्यां नृपनंदनान् ॥ ३०
अवेक्षत च गंभीरः कृतांतः कालपर्यये । क्रुद्धस्य तस्य नेत्राभ्यां सहसा पावकार्चिषः ॥ ३१
निश्चेहुरभितो दिक्षु कालाग्नेरिव संतताः । सधूमकवलोद्ग्राः स्फुलिंगौघमुचो मुहुः ॥ ३२
मुनिकोधानलज्वालाः समंताद्व्यानशुर्दिशः । व्यालोदरोग्रकुहरा ज्वालास्तन्नेत्रनिर्गताः ॥ ३३
विरेजुर्गिभृतांभोधेर्वडवाग्नेरिवाचिषः ।
सगर विनाश वर्णन ] [ ३३
क्रोधाग्निः सुमहाराज ज्वालाव्याप्तदिगंतरः ॥३४ दग्धांश्चकार तान्सर्वानावृण्वानो नभस्तलम् ॥३५
उस समय में कपिल मुनि ने अग्नि मण्डल के समान अपने नेत्रों को खोला था । हे राजन् ! उनकी दोनों आँखें क्षण भर तो अत्यधिक अरुण दिखलाई देती हुईं शोभा वाली हुई थीं ।२९। और वे दोनों नेत्र पूर्व सन्ध्या में समुदित अम्बर में दो पुष्पों के ही सदृश प्रतीत हो रहे थे । इसके अनन्तर ही उन्होंने अपने खुले हुए नेत्रों को उन सब नृप सगर के पुत्रों पर डाला था ।३०। संहार के समय में यमराज के ही तुल्य अत्यन्त गम्भीर मुनि ने नृप सुतों की ओर देखा था । अत्यधिक क्रोध तो समाधि के भङ्ग होने से उनको हो ही रहा था । परम क्रुद्ध उनके नेत्रों से अग्नि की ज्वालायें निकल रही थीं ।३१। और वे ज्वालाएँ कालाग्नि के ही समान दिशाओं में सभी ओर फैली हुई थीं । धूम के समूहों से युक्त वे ज्वालाएँ अत्यन्त आगे की ओर बढ़ रही थीं और बारम्बार उनमें से अग्नि के कण छूटकर निकल रहे थे ।३२। क्रोधाग्नि की ज्वालाओं ने सभी ओर दिशाओं को व्याप्त कर दिया था । उनके नेत्रों से निकलने वाली क्रोधाग्नि की ज्वालाएं कालोदर के उग्र कुहरों वाली थीं तात्पर्य यह है कि ज्वालाओं के मण्डल की ऐसी व्याप्ति हो गयी थी । उस समय में कुहरे के समान कुछ भी दिखलाई नहीं दे रहा था ।३३। हे सुमहाराज ! उनके क्रोधाग्नि की ज्वालाएँ छिपे हुए समुद्र की बड़वाग्नि की ज्वालाओं के ही समान शोभित हो रही थीं और उन कपिल मुनि की क्रोधाग्नि ने सभी दिशाओं के अन्तर को व्याप्त कर रक्खा था वह सर्वत्र फैल गया था ।३४। उस क्रोधाग्नि ने पूर्ण नभ-स्थल को आवृत करते हुए उन समस्त सगर के साठ सहस्र पुत्रों को दग्ध करके भस्मीभूत कर दिया था ।३५।
सशब्दमुद्ध्वांतमरुत्प्रकोपविवर्त्तमानानलधूमजालैः । महीरजोभिश्च नितांतमुद्धतैः समावृतं लोकमभूद् भृशातुरम् ॥३६ ततः स वह्निर्विलिखन्निवाभितः समीरवेगाभि रमीभिरंबरम्। शिखाभिरुर्वीशसुतानशेषतो ददाह सद्यः सुर- विद्विषस्तान् ॥३७ मिषतः सर्वलोकस्य क्रोधाग्निस्तमृते हयम् ।
३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
सागरांस्तानशेषेण भस्मसादकरोत्स तान् ॥३८ एवं क्रोधाग्निना तेन सागराः पापचेतसः । जज्वलुः सहसा दावे तरवो नीरसा इव ॥३९ दृष्ट्वा तेषां तु निधनं सागराणां दुरात्मनाम् । अन्योन्यमब्रुवन्देवा विस्मिता ऋषिभिः सह ॥४० अहोदारुणपापानां विपाको न चिरायितः । दुरंतः खलु लोकेऽस्मिन्नराणामसदात्मनाम् ॥४१ यदि मे पर्वताकारा नृशंसाः क्रूरबुद्धयः । युगपद्विलयं प्राप्ताः सहसैव तृणाग्निवत् ॥४२
सरर-सरर करती हुई महाध्वनि से परिपूर्ण बड़ी जोरदार हवा के प्रकोप से चारों ओर फैली हुई अग्नि की धुँआ के गुब्बारों से और अत्यधिक ऊपर की ओर उठकर उड़ती हुई भूमि की धूलि के सम्पूर्ण लोक ढक सा गया था और बहुत ही अधिक लोक में विकलता हो गयी थी।३६। इसके पश्चात् वह अग्नि वायु के वेग से समाहृत शिखाओं से जो घूम-घूम करके ऊपर की ओर उठ रहीं थीं नभस्तत में मानों वे कुछ लिख रहीं होवें चारों ओर फैली हुई थी। उन्होंने उन सुरगण के शत्रु नृप के पुत्रों को पूर्णतया तुरन्त ही प्रदग्ध कर दिया था ।३७। समग्र लोक का विनाश करने वाले उन सगर के पुत्रों का पूर्णतया उस कपिल मुनि की क्रोधाग्नि ने दाह करके राख की ढेरियाँ बना दिया था और उस यज्ञ के अश्व को छोड़ दिया था ।३८। नीरस सूखे हुए वृक्ष तुरन्त ही दाव की अग्नि से जल जाया करते हैं उसी भाँति पुण्य रस विहीन पापात्मा के सगर सुत तुरन्त ही जल गये थे ।३९। इस रीति से उन महान् दुष्ट सगर सुतों का निधन का अवलोकन करके सभी देवगण अत्यन्त विस्मय को प्राप्त हो गये थे और परस्पर में ऋषियों के साथ एक दूसरे से कहने लगे थे ।४०। अहो ! बड़े आश्चर्य की बात है कि महान् दारुण पाप करने वालों के पापों का विपाक कितनी शीघ्रता से हो गया है। निश्चय ही इस लोक में जो असत् आत्माओं वाले नर होते हैं उनका अन्त बड़ा ही दुःख से पूर्ण हुआ करता है। तात्पर्य यह है कि नीचों का विनाश तुरन्त ही अवश्यम्भावी होता है। ।४१। यही बात है कि ये महान् क्रूर बुद्धि वाले निर्दयी जिनका कलेवरा-कार पर्वतों के सदृश था और कितनी अधिक संख्या में थे इस समय में तृण
सगर विनाश वर्णन ] [ ३५
में लगी हुई अग्नि के ही समान तुरन्त ही एक ही साथ विलय को प्राप्त हो गये हैं मानों हुए हो नहीं थे। आप उनका नाम मात्र ही रह गया है ॥४२॥
उद्वेजनीया भूतानां सद्भिभरत्यंतगर्हिताः । आजीवांतमिमे हर्तुं दिष्ट्या संक्षयमागताः ॥४३ परोपतापि नितरां सर्वलोकजुगुप्सितम् । इह कृत्वाऽशुभं कर्म कः पुमान्विन्दते सुखम् ॥४४ विक्रोश्य सर्वभूतानि संप्रयाताः स्वकर्मभिः । ब्रह्मदंडहताः पापा निरयं शाश्वतीः समाः ॥४५ तस्मात्सदेव कर्त्तव्यं कर्म पुंसां मनीषिणाम् । दूरतंश्च परित्याज्यमितरल्लोकनिन्दितम् ॥४६ कर्त्तव्यः श्रेयसे यत्नो यावज्जीवं विजानता । नाचरेत्कस्यचिद्द्रोहमनित्यं जीवनं यतः ॥४७ अनित्योऽयं सदा देहः संपदश्चातिचंचलाः । संसारश्चातिनिस्सारस्तत्कथं विश्वसेद्बुधः ॥४८ एवं सुरमुनीन्द्रेषु कथयत्सु परस्परम् । मुनिक्रोधैधनीभूता विनेशुः सगरात्मजाः ॥४९ निर्दग्धदेहाः सहसा भुवं विष्टभ्य भस्मना । अवापुर्निरयं सद्यः सागरास्ते स्वकर्मभिः ॥५० सागरांस्तानशेषेण दग्ध्वा क्रोधजोऽनलः । क्षणेन लोकानखिलानुद्यतो दग्धुमंजसा ॥५१ भयभीतास्ततो देवाः समेत्य दिवि संस्थिताः । तुष्टुवुस्ते महात्मानं क्रोधाग्निशमनार्थिनः ॥५२
ये सभी प्राणियों के लिए उद्वेग करने वाले थे और सत्पुरुषों के द्वारा बहुत ही निन्दित समझे जाया करते थे । ये जीवन जब तक इनका रहा सबका अपहरण ही किया करते थे । अब बहुत ही अच्छा हुआ कि सबके सब विनाश को प्राप्त हो गये हैं । यह तो एक प्रसन्नता की ही बात हुई है ।
३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
।४३। जो निरन्तर ही दूसरे प्राणियों को उपताप दिया करता है तथा सदा ही सर्वत्र जिसकी लोग निन्दा किया करते हैं ऐसा इस लोक में परमाशुभ कर्मों को करके कौन सा पुरुष है जो सुख प्राप्त करता है अर्थात् ऐसा कोई भी सुख नहीं प्राप्त करता है ।४४। सब प्राणियों को सता कर अपने ही कुकर्मों के द्वारा इस लोक से विदा होकर चल बसे हैं। ब्राह्मण के अपराध का दण्ड पाकर निहत हो गये हैं। ये महापापी सगर सुत निरन्तर सैकड़ों वर्षों तक नरक में रहेंगे ।४५। इस कारण से मनीषी पुरुषों को सर्वदा सत् कर्म ही करना चाहिए और जो दूसरे लोगों के द्वारा विनिन्दित कर्म हो उसका तो दूर से ही परित्याग कर देना चाहिए ।४६। मानव का परम कर्त्तव्य है कि जब तक भी उसका जीवन रहे सदा श्रेय के ही यत्न करना चाहिए क्योंकि उसको यह ज्ञान होना चाहिए कि शुभ कर्म ही सफल होता है और सदा बुरे कर्मों का बुरा ही परिणाम हुआ करता है कभी भी किसी के साथ द्रोह का समाचरण नहीं करे क्योंकि जिस जीवन में द्रोह करता है वही जीवन अनित्य है फिर द्रोह का पाप क्यों अर्जित किया जावे ।४७। यह देह तो सदा ही अनित्य है कोई चाहे कैसा भी क्यों न हो यहाँ सदा नहीं रहता है न रहा है और न कभी रहेगा । जिस सम्पदा के लिये मानव बड़े-बड़े कुत्सित कर्म किया करता है वह सम्पदा भी अत्यन्त चञ्चल है और कभी किसी के पास स्थिर नहीं रहा करती है । यह संसार अति निस्सार है अर्थात् सभी सांसारिक कर्मों में पारमार्थिक श्रेय नहीं हैं जो सार कहा जा सके । सभी यहाँ की बातें यहीं समाप्त हो जाया करती हैं फिर भी आश्चर्य यही है कि बुध पुरुष भी कैसे इसमें विश्वास किया करते हैं ।४८। इस रीति से सुरगण और मुनिगण परस्पर में कह रहे थे और नृप सगर के पुत्र सब के सब कपिल मुनि के क्रोध में इन्धन होकर विनष्ट हो गये थे । ।४९। वे सगर के पुत्र अपने ही कर्मों से दग्ध देहों वाले होकर सहसा भस्म के रूप में भूमि में मिल गये थे और तुरन्त ही नरक में पहुँच गये थे ।५०। मुनि के क्रोध की अग्नि ने पूर्ण रूप से उन सगर पुत्रों को दग्ध करके फिर वह अग्नि तुरन्त ही समस्त लोकों को दग्ध करने के लिये उद्यत हो गयी थी ।५१। तब सब देवगण भय से भीत हो गये थे और दिवलोक में ही संस्थित रहते हुए उस क्रोधाग्नि के शमन की इच्छा वालों ने उन महात्मा मुनि का स्तवन किया था ।५२।
कपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ३७
कपिल आश्रम में अश्वानयन
जैमिनिरुवाच-
क्रोधाग्निमेनं विप्रेन्द्र सद्यः संहत्तुमहंसि ।
नो चेदकाले लोकोऽयं सकलस्तेन दह्यते ॥१
दृष्टस्ते महिमानेन व्याप्तमासीच्चराचरम् ।
क्षमस्व संहर क्रोधं नमस्ते विप्रपुंगव ॥२
एवं संस्तूयमानस्तु भगवान्कपिलो मुनिः ।
तूर्णमेव क्षयं निन्ये क्रोधाग्निमतिभैरवम् ॥३
ततः प्रशांतमभवज्जगत्सर्वं चराचरम् ।
देवास्तपस्विनश्चैव बभूवुर्विगतज्वराः ॥४
एतस्मिन्नेव काले तु भगवान्नारदो मुनिः ।
अयोध्यामगमद्राजन्देवलोकाद्यदृच्छया ॥५
तमागतमभिप्रेक्ष्य नारदं सगरस्तदा ।
अर्घ्यपाद्यादिभिः सम्यक्पूजयामास शास्त्रतः ॥६
परिगृह्य च तत्पूजामासीनः परमासने ।
नारदो राजशार्दूलमिदं वचनमब्रवीत् ॥७
जैमिनी मुनि ने कहा—देवों ने कपिल मुनि से प्रार्थना की थी—विप्रेन्द्र ! आप इस क्रोध की महान् भीषण अग्नि का तुरन्त ही संहार करने के योग्य हैं । यदि इसका संहरण नहीं किया गया तो उससे अकाल में ही यह सम्पूर्ण लोक दाह को प्राप्त होता जा रहा है ।१। आपकी महिमा तो इसी से देखी जा चुकी है जो कि इस चराचर में व्याप्त थी । हे विप्रों में परम श्रेष्ठ ! अब क्षमा कीजिए और अपने क्रोध का संहरण कीजिए । आपकी सेवा में हम सबका प्रणाम है ।२। इस रीति से जब देवों के द्वारा उनकी स्तुति की गयी थी तो भगवान कपिल मुनि ने उस अत्यधिक भैरव क्रोधाग्नि का क्षय कर दिया था ।३। फिर यह समस्त चराचर जगत् प्रशान्त हो गया था और सब देवगण तथा तपस्वी गण दुःख से रहित हो गये थे अर्थात् इन सबका सन्ताप दूर हो गया था ।४। इसी समय में देवर्षि भगवान्
३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
नारद मुनि स्वेच्छा से ही देवलोक से विचरण करते हुए अयोध्या पुरी में समागत हो गये थे ।५। राजा सगर ने जब भगवान् नारदजी को वहाँ पर प्राप्त हुए देखा। तो शास्त्रानुसार अर्घ्य-पाद्य आदि से भली भाँति उनका अर्चन किया था ।६। नारदजी ने उसकी पूजा को ग्रहण करके आसन पर संस्थिति की थी और फिर उन्होंने उस नृप शार्दूल से यह वचन कहा था ।७।
नारद उवाच-
हयसंचारणार्याय संप्रयातास्तवात्मजाः ।
ब्रह्मदंडहताः सर्वे विनष्टा नृपसत्तम ॥८
संरक्ष्यमाणस्तैः सर्वैर्हयस्ते यज्ञियो नृप ।
केनाप्यलक्षितः क्वापि नीतो विधिवशाद्दिवि ॥६
ततो विनष्टं तुरंगं विचिन्वंतो महीतले ।
प्रालभंत न ते क्वापि तत्प्रवृत्तिं चिरान्नृप ॥१०
ततोऽवनेरधस्तेऽश्वं विचेतुं कृतनिश्चयाः ।
सागरास्ते समारभ्य प्रचखनुर्वसुधातलम ॥११
खनंतो वसुधामश्वं पाताले ददृशुर्नृप ।
समीपे तस्य योगींद्रं कपिलं च महामुनिम् ॥१२
तं दृष्ट्वा पापकर्मणिस्ते सर्वे कालचोदिताः ।
कपिलं कोपयामासुरश्वहर्त्ताऽयमित्यलम् ॥१३
ततस्तत्क्रोधसंभूतनेत्राग्नेर्दहतो दिशः ।
इन्धनीभूतदेहास्ते पुत्राः संक्षयमागताः ॥१४
श्री नारदजी ने कहा— हे राजन् ! यज्ञ के अश्व के सञ्चारण के लिए आपके पुत्रों ने संप्रयाण किया था । हे श्रेष्ठ नृप ! वे सब ब्रह्म-दण्ड से हत होकर विनष्ट हो गये हैं ।८। उन सबके द्वारा भली भाँति रक्षा किया भी वह यज्ञिय अश्व किसी के द्वारा अलक्षित कर दिया गया था और भाग्य वश दिव में वह ले जाया गया था ।६। फिर जब वह अश्व विनष्ट अर्थात् खोया हुआ हो गया था उन्होंने महीतल में खोज की थी किन्तु उन्होंने
कपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ३६
उसको कहीं पर भी प्राप्त नहीं किया था और वह किस ओर गया है—यह भी बहुत समय तक उनको ज्ञात नहीं हुआ था ।१०। इसके पश्चात् उन्होंने इस वसुन्धरा के नीचे उस अश्व की खोज करने निश्चय किया था। उन आपके पुत्रों ने समारम्भ करके इस वसुधा के तल भाग को खोद डाला था ।११। जब वे लगातार पृथ्वी को खोदते ही चले गये तो हे नृप ! उन्होंने पाताल में उस अश्व को देखा था जिस अश्व के ही समीप में योगीन्द्र महा-मुनि कपिल जी समाधि में स्थित हुए उनको दिखाई दिये थे ।१२। उन महामुनि को वहाँ देखकर पापपूर्ण कर्मों वाले उन सबने काल की गति से प्रेरित होकर उन कपिल देव के ही ऊपर बड़ा कोप किया था और यह ही इस अश्व के हरण करने वाला है—यह कहा था ।१३। इसके अनन्तर उन मुनि को क्रोध उत्पन्न हो गया था और उससे संभूत नेत्रों की अग्नि से जो दशों दिशाओं को दग्ध कर रही थी आपके समस्त पुत्र इन्धन हो गये थे और जल भुनकर उसके देह भस्मीभूत हो गये थे तथा सब नष्ट हो गये थे ।१४।
क्रूराः पापसमाचाराः सर्वलोकोपरोधकाः ।
यतस्ते तेन राजेंद्र न शोकं कर्तुमर्हसि ॥१५
स त्वं धैर्यधनो भूत्वा भवितव्यतयात्मनः ।
नष्टः मृतमतीतं च नानुशोचंति पंडिताः ॥१६
तस्मात्पौत्रमिमं बालमंशुमंतं महामतिम् ।
तुरगानयनार्थाय नियुंक्ष्व नृपसत्तम ॥१७
इत्युक्त्वा राजशार्दूलं सदस्यर्त्विक्समन्वितम् ।
क्षणेन पश्यतां तेषां नारदोऽतर्दधे मुनिः ॥१८
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य नारदस्य नृपोत्तमः ।
दुःखशोकपरीतात्मा दध्यौ चिरमुदारधीः ॥१९
तं ध्यानयुक्तं सदसि समासीनमवाङ्मुखम् ।
वसिष्ठः प्राह राजानं सांत्वयन्देशकालवित् ॥२०
किमिदं धैर्यसाराणामवकाशं भवादृशाम् ।
लभते हृदि चेच्छोकः प्राप्तं धीरतया फलम् ॥२१
४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
वे सब आपके पुत्र अत्यन्त क्रूर थे—पाप कर्मों का समाचरण करने वाले तथा समस्त लोकों के उपरोधक थे। क्योंकि ऐसे ही जघन्य थे अतः हे राजेन्द्र ! अब आप उनके लिए शोक करने के योग्य नहीं हैं ।१५। आप तो धैर्य को ही धन मानने वाले हैं अतएव आपको धीरज की रक्षा करनी चाहिए। जो भी कुछ भवितव्यता होती है तथा नष्ट हो जाता है और व्यतीत हो जाता है उसको पण्डित लोग नहीं सोचा करते हैं ।१६। इस कारण से अब इस अपने अंशुमान् पौत्र को जो महान् मतिमान् है हे नृप श्रेष्ठ ! उस अश्व को लाने के कार्य में नियुक्त करो ।१७। समस्त सदस्य और ऋत्विजों से युक्त उस नृप शार्दूल से यही कहकर सभी के देखते हुए एक ही क्षण में नारदजी अन्तर्धान हो गये थे ।१८। फिर उस राजा ने नारदजी के कहे हुए उन वचनों का श्रवण करके भी महान् दुःख और शोक से पूर्णतया घिरा हुआ होकर उस उदार बुद्धि वाले ने बहुत काल तक चिन्तन किया था ।१६। उस समय में राजा सभा में नीचे की ओर मुख वाला होकर बैठे हुए थे। उसी समय में देश और काल के ज्ञाता वसिष्ठजी ने आकर राजा को सान्त्वना देते हुए कहा था ।२०। आप तो धैर्य को बहुत महत्त्व देने वाले हैं फिर आप जैसे महान् पुरुषों को यह ऐसा अवसर क्यों प्राप्त हो रहा है। यदि आपके हृदय में भी शोक ने स्थान ग्रहण कर लिया है तो धीरता से क्या फल होता है। अर्थात् फिर तो धैर्य व्यर्थ ही है ।२१।
दौर्मनस्यं शिथिलयन्सर्वं दिष्टवशानुगम् ।
मन्वानोऽनन्तरं कृत्यं कर्तुमर्हस्यसंशयम् ॥२२
वसिष्ठेनैवमुक्तस्तु राजा कार्यार्थतत्त्ववित् ।
धृतिं सत्त्वं समालंब्य तथेति प्रत्यभाषत ॥२३
अंशुमंतं समाहूय पौत्रं विनयशालिनम् ।
ब्रह्म क्षत्रसभामध्ये शनैरिदमभाषत ॥२४
ब्रह्मदंडहताः सर्वे पितरस्तव पुत्रक ।
पतिताः पापकर्माणो निरये शाश्वतीः समाः ॥२५
त्वमेव संततिर्मह्यं राज्यस्यास्य च रक्षिता ।
त्वदायत्तमशेषं मे श्रेयोऽमुत्र परत्र च ॥२६
स त्वं गच्छ ममादेशात्पाताले कपिलांतिकम् ।
कपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ४१
तुरगानयनार्थाय यत्नेन महतान्वितः ॥२७
तं प्रार्थयित्वा विधिवत्प्रसाद्य च विशेषतः ।
आदाय तुरगं वत्स शीघ्रमागंतुमर्हसि ॥२८
आप इस मन की उदासी को शिथिल करके यह सोच लीजिये कि यह सभी कुछ भाग्य के कारण से ही हुआ है और इसमें अन्य किसी का भी कुछ वश नहीं चलता है। ऐसा ही मानकर बिना किसी संशय के जो भी कुछ पीछे करने का कृत्य है उसको ही करना अब उचित है ।२२। वसिष्ठ जी के द्वारा इस रीति से कहा जाने पर कार्यों के अर्थ के तत्त्वों के ज्ञाता राजा सगर ने धैर्य का सहारा लिया था और मुनि से वही सब कुछ करने के लिये प्रार्थना की थी ।२३। फिर नृप सगर ने अपने विनय शाली पौत्र अंशुमान् को अपने पास बुलाकर विप्रों और क्षत्रियों की सभा के मध्य में धीरे से उससे कहा था ।२४। हे बेटा ! तुम्हारे सभी पितृगण ब्रह्मदण्ड से निहत हो गये हैं और वे पाप कर्मों के करने वाले सैकड़ों वर्षों के लिए नरक में पतित हो गये हैं ।२५। इस समय में तो मेरे अन्य सभी पुत्रों का विनाश हो गया है मेरी केवल एक तुम ही सन्तति शेष रहे हो जो कि इस मेरे विशाल राज्य के रक्षा करने वाले हो । अब तो इस लोक में और परलोक में मेरे पूर्ण श्रेय को करना तुम्हारे ही अधीन है ।२६। वह आप ही अब मेरी आज्ञा से पाताल लोक में कपिल मुनि के समीप में गमन करो । और महान् यत्न से उस यज्ञ के अश्व को यहाँ पर ले आओ ।२७। आप वहाँ पर पहुँच कर उन मुनिवर से विधि के साथ प्रार्थना करना और विशेष रूप से उनको प्रसन्न कर लेना । फिर उस अश्व को अपने साथ लेकर हे वत्स ! तुम बहुत ही शीघ्रता से यहाँ पर वापिस आ जाओ ।२८।
जैमिनिरुवाच-
एवमुक्तोऽशुमांस्तेन प्रणम्य पितरं पितुः ।
तथेत्युक्त्वा महाबुद्धिः प्रययौ कपिलांतिकम् ॥२६
तमुपागम्य विधिवन्नमस्कृत्य यथामति ।
प्रश्रयावनतो भूत्वा शनैरिदमुवाच ह ॥३०
प्रसीद विप्रशार्दूल त्वामहं शरणं गतः ।
कोपं च संहर क्षिप्रं लोकप्रक्षयकारकम् ॥३१
४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
त्वयि क्रुद्धे जगत्सर्वं प्रकाशमुपयास्यति ।
प्रशांतिमुपयाह्याशु लोकाः संतु गतव्यथाः ॥३२
प्रसन्नोऽस्मान्महाभाग पश्य सौम्येन चक्षुषा ।
ये त्वत्क्रोधाग्निनिर्दग्धास्तत्संततिमवेहि माम् ॥३३
नाम्नांशुमंतं नप्तारं सगरस्य महीपतेः ।
सोऽहं तस्य नियोगेन त्वत्प्रसादाभिकांक्षया ॥३४
प्राप्तो दास्यसि चेद्ब्रह्मंस्तुरगानयनाय च ।
जैमिनिरुवाच—
इति तद्वचनं श्रुत्वा योगींद्रप्रवरो मुनिः ॥३५
जैमिनि मुनि ने कहा—जब राजा के द्वारा अपने पौत्र अंशुमान् से इस प्रकार से कहा गया था तो महान् बुद्धिमान उसने पिता के पिता को प्रणाम किया था ओर मैं ऐसा ही करूँगा—यह कहकर वह कपिल मुनि के समीप में चला गया था ।२६। उसके समीप में प्राप्त होकर उसने विधि के साथ उनके प्रणाम किया था और फिर बुद्धि के अनुसार विनम्रता से अवनत होकर धीरे से उनसे कहा था ।३०। हे विप्रशार्दूल ! मुझ पर कृपया प्रसन्न होइए—मैं तो आपके चरणों की शरण में समागत हुआ हूँ । आपके हृदय में जो कोप समुत्पन्न हो गया है उसका संहरण शीघ्र ही कर लीजिए क्योंकि आपका यह कोप समस्त लोकों के विनाश कर देने वाला है ।३१। आपके क्रुद्ध हो जाने पर तो यह समग्र जगत विनाश को ही प्राप्त हो जायगा । अब आप प्रशान्ति को शीघ्र प्राप्त हो जाइए । जिससे इन सब लोकों की व्यथा दूर हो जावे ।३२। हे महाभाग ! आप हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाइए । सौम्य नेत्रों से हमको देखिए । जो आपके क्रोध की अग्नि से संदग्ध हो गये हैं उन्हीं की सन्तति मुझे आप समझिए ।३३। मेरा नाम अंशुमान है और मैं राजा सगर का नाती हूँ । वह मैं राजा के ही नियोग से आपकी प्रसन्नता की अभिकांक्षा से ही मैं यहाँ पर समागत हुआ हूँ ।३४। मैं तो उस यज्ञ के अश्व के ले जाने के ही लिए आया हूँ यदि कृपा कर मुझे देंगे । जैमिनि मुनि ने कहा—उस अंशुमान के इस वचन को सुनकर योगीन्द्र प्रवर मुनि ने अंशुमान का अवलोकन किया और परम प्रसन्न होकर यह वचन उससे कहा था ।३५।
[ कपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ४३
अंशुमंतं समालोक्य प्रसन्न इदमब्रवीत् । स्वागतं भवतो वत्स दिष्ट्या च त्वमिहागतः ॥३६ गच्छ शीघ्रं हयश्चायं नीयतां सगरांतिकम् । अधिक्षिप्तोऽस्य यज्ञोऽपि प्रागतः संप्रवर्त्तताम् ॥३७ व्रियतां च वरो मत्तस्त्वया यस्ते मनोगतः । दास्ये सुदुर्लभमपि त्वद्भक्तिपरितोषितः ॥३८ एषां तु संप्रणाशं हि गत्वा वद पितामहम् । पापानां मरणं त्वेषां न च शोचितुमर्हसि ॥३९ ततः प्रणम्य योगींद्रमंशुमानिदमब्रवीत् । वरं ददासि चेन्मह्यं वरये त्वां महामुने ॥४० वरमर्हामि चेत्त्वत्तः प्रसन्नो दातुमर्हसि । त्वद्रोषपावकप्लुष्टाः पितरो ये ममाखिलाः ॥४१ संप्रयास्यंति ते ब्रह्मन्निरयं शाश्वतीः समाः । ब्रह्मदंडहतानां तु न हि पिंडोदकक्रियाः ॥४२
हे वत्स ! आपका स्वागत है । बड़े ही हर्ष की बात है कि आप यहाँ पर आ गये हो ।३६। अब बहुत शीघ्र जाओ यह अश्व राजा सगर के समीप में ले जाओ । पूर्व से ही संप्रवृत्त हुआ इस राजा का यज्ञ रुक गया है उसको पूर्ण करो ।३७। और आपके मन में जो भी कुछ हो वह वरदान अब मुझसे प्राप्त कर लो । मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत ही परितुष्ट हो गया हूँ यदि तुम्हारा वर परम दुर्लभ भी होगा तो भी मैं तुमको दे ही दूँगा ।३८। अब तुम इन साठ सहस्र नृप के पुत्रों का विनाश हो गया है—यह राजा से कह देना । ये महान पापी थे अतः इनके मरण के विषय में राजा से कह देना कि कोई शोक न करें ।३९। फिर उन योगीन्द्र मुनि को प्रणाम करके अंशुमान ने उनसे यह कहा था । हे मुने ! आप यदि मुझको वरदान देने की इच्छा करते हैं तो मैं आपसे वर का वरण करूँ ।४०। यदि मैं वर पाने के योग्य हूँ तो आपसे वरदान प्राप्त करूँ किन्तु वह वरदान आप सुप्रसन्न होकर ही मुझे दीजिए । आपके रोष की अग्नि से मेरे सभी पितृगण संप्लुष्ट हो गये हैं ।४१। हे ब्रह्मन् ! क्योंकि उन्होंने आपका महान अपराध किया
४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
था इससे वे सभी बहुत वर्षों तक नरक में जायेंगे । क्योंकि वे सब ब्रह्मदण्ड से हत हैं अतएव उनकी पिण्डोदक क्रिया भी कुछ नहीं हो सकती है ।४२।
पिंडोदकविहीनानामिह लोके महामुने । विद्यते पितृसालोक्यं न खलु श्रुतिचोदितम् ॥४३ अक्षयः स्वर्गवासोऽस्तु तेषां तु त्वत्प्रसादतः । वरेणानेन भगवन्कृतकृत्यो भवाम्यहम् ॥४४ तत्प्रसीद त्वमेवैषां स्वर्गतेर्वद कारणम् । येनोद्धारणमेतेषां वह्नेः कोपस्य वै भवेत् ॥४५ ततस्तमाह योगीन्द्रः सुप्रसन्नेन चेतसा । निरयोद्धारं तेषां त्वया वत्स न शक्यते ॥४६ तैंश्चापि नरके तावद्वस्तव्यं पापकर्मभिः । कालः प्रतीक्ष्यतां तावद्यावत्त्वत्पौत्रसंभवः ॥४७ कालांते भविता वत्स पौत्रस्तव महामतिः । राजा भगीरथो नाम सर्वधर्मार्थतत्त्ववित् ॥४८ स तु यत्नेन महता पितृगौरवयंत्रितः । आनेष्यति दिवो गंगां तपस्तप्त्वा महद्ध्रुवम् ॥४९
हे महामुने ! इस लोक में जिनकी पिण्डोदक क्रिया नहीं होती है वे पितृगण के लोक में उनका सालोक्य प्राप्त नहीं कर सकते हैं—ऐसा श्रुति सम्मत प्रमाण है ।४३। अब मेरा यही वर मुझे प्रदान कीजिए कि आपके प्रसाद से उनको अक्षय स्वर्ग का निवास प्राप्त होवे । हे भगवान् ! इस वरदान से मैं कृत-कृत्य हो जाऊँगा ।४४। सो आप प्रसन्न हो जाइए और उनके स्वर्ग में गमन करने का कारण बता दीजिए । जिसके करने से उनका कोप की अग्नि से उद्धार हो जावे ।४५। इसके अनन्तर योगीन्द्र प्रसन्न चित्त से उससे बोले—हे वत्स ! उनका नरक से उद्धार तुम्हारे द्वारा नहीं किया जा सकता है ।४६। पाप कर्मों के करने वालों को तब तक नरक में वास करना ही होगा । उस समय की प्रतीक्षा करो जब तक तुम्हारे यहाँ पौत्र जन्म ग्रहण करे ।४७। कुछ काल के पश्चात् हे वत्स ! तुम्हारा एक महामति पौत्र होगा । उसका शुभ नाम राजा भगीरथ होगा जो समस्त धर्मों के
कपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ४५
अर्थों के तत्त्वों का ज्ञाता होगा ।४८। वह अपने पितरों के गौरव से सुसमन्वित होगा और महान् यत्न से परम घोर तप करके निश्चय ही स्वर्ग से यहाँ पर गङ्गा को लावेगा ।४६।
तदंभसा पावितेषु तेषां गात्रास्थिभस्मसु ।
प्राप्नुवंति गतिं स्वर्गे भवतः पितरोऽखिला ॥५०
तथेति तस्या माहात्म्यं गंगाया नृपनन्दन ।
भागीरथीति लोकेऽस्मिन्सा विख्यातिमुपैष्यति ॥५१
यत्तोयप्लावितेष्वस्थिभस्मलोमनखेष्वपि ।
निरयादपि संयाति देही स्वर्लोकमक्षयम् ॥५२
तस्मात्त्वं गच्छ भद्रं ते न शोकं कर्तुं मर्हसि ।
पितामहाय चैवैनमश्वं संप्रतिपादय ॥५३
जैमिनिरुवाच—
ततः प्रणम्य तं भक्त्या तथेत्युक्त वा महामतिः ।
ययौ तेनाभ्यनुज्ञातः साकेतनगरं प्रति ॥५४
सगरं स समासाद्य तं प्रणम्य यथाक्रमम् ।
न्यवेदयच्च वृत्तांतं मुनेस्तेषां तथात्मनः ॥५५
प्रददौ तुरगं चापि समानीतं प्रयत्नतः ।
अतः परमनुष्ठेयमब्रवीत्कि मयेति च ॥५६
उस पतित पावनी गङ्गा के पुनीत जल से उन सबके गात्र-अस्थि और भस्म के पवित्र हो जाने पर वे समस्त आपके पितृगण स्वर्ग में गति को प्राप्त करेंगे ।५०। हे नृपनन्दन उस गङ्गा का माहात्म्य ही ऐसा अद्भुत है । राजा भगीरथ के द्वारा यहाँ लाने से इस लोक में उसका नाम भागीरथी प्रसिद्ध होगा ।५१। गङ्गा का बड़ा अद्भुत माहात्म्य होता है कि उसके जल में किसी भी प्राणी की अस्थि-भस्म-नख आदि कोई भी भाग जब प्लावित हो जाता है तो वह प्राणी नरक की यातनाओं से भी मुक्त होकर अक्षय स्वर्गलोक में चला जाया करता है ।५२। इस कारण से अब आप यहाँ से चले जाइए—आपका कल्याण होगा—आपको कुछ भी शोक नहीं करना चाहिए । अपने पितामह को यह अश्व ले जाकर दे दो ।५३। जैमिनि मुनि
४६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ने कहा—इसके अनन्तर उस महामति ने—ऐसा ही करूंगा—यह कहकर उनको भक्ति से प्रणाम किया था और उनकी आज्ञा प्राप्त कर साकेत नगरी की ओर वहाँ से गमन किया था ।५४। राजा सगर के समीप में पहुँच कर उसने क्रमानुसार उनको प्रणाम किया था और फिर उन सबका—मुनि का और अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त राजा से निवेदन कर दिया था ।५५। और वह अश्व भी राजा को दे दिया था । जिसको वह बड़े प्रयत्न से लाया था । फिर राजा की सेवा में प्रार्थना की थी कि अब आगे मुझे क्या सेवा करनी चाहिए—यह अपनी आज्ञा प्रदान कीजिए ।५६।
—x—
।। अंशुमान को राज्य प्राप्ति ।।
जैमिनिरुवाच— ततः पौत्रं परिष्वज्य सगरः प्रेमविह्वलः । अभिनंद्याशिषात्यर्थं लालयन्प्रशंस ह ॥१॥ अथ ऋत्विक्सदस्यैश्च सहितो राजसत्तमः । उपाक्रमत तं यज्ञं विधिवद्वेदपारगः ॥२॥ ततः प्रवृत्ते यज्ञः सर्वसंपद्गुणान्वितः । सम्यगौर्ववसिष्ठाद्यैर्मुनिभिः संप्रवर्त्तितः ॥३॥ हिरण्मयमयी वेदिः पात्राण्युच्चावचानि च । सुसमृद्धं यथाशास्त्रं यज्ञे सर्वं बभूव ह ॥४॥ एवं प्रवर्त्तितं यज्ञमृत्विजः सर्व एव ते । क्रमात्समापयामासुर्यजमानपुरस्सराः ॥५॥ समापयित्वा तं यज्ञं राजा विधिविदां वरः । यथावद्दक्षिणां चैव ऋत्विजां प्रददौ तदा ॥६॥ अथ ऋत्विक्सदस्यानां ब्राह्मणानां तथार्थिनाम् । तत्कांक्षितादभ्यधिकं प्रददौ वसु सर्वशः ॥७॥
अंशुमान को राज्य प्राप्ति ] [ ४७
जैमिनी मुनि ने कहा—इसके अनन्तर राजा सगर ने प्रेम से विह्वल होकर अपने पौत्र का परिष्वजन किया था और अत्यधिक आशीर्वचनों से उसका अभिनन्दन करके बहुत ही अधिक लाड़ करते हुए उसकी प्रशंसा की थी ।१। इसके उपरान्त सब ऋत्विजों और सदस्यों के सहित उस नृप श्रेष्ठ ने वेदों के पारगामी विप्रों के द्वारा उस यज्ञ का विधि सहित उपक्रम किया था ।२। इसके अनन्तर सब प्रकार की सम्पत्ति और गुणों से संयुत वह यज्ञ आरम्भ हुआ था जिसका समारम्भ और्व और वसिष्ठ आदि मुनियों के द्वारा भली भांति सम्प्रवर्तित किया गया था ।३। उस यज्ञ की वेदी सुवर्ण से निर्मित की गयी थी तथा उसके उपयुक्त सभी छोटे-बड़े पात्र अत्युत्तम जुटाये गये थे । उस यज्ञ में शास्त्र के अनुसार सभी वस्तुएं सुसमृद्ध थीं ।४ इस प्रकार से आरम्भ किया हुआ वह यज्ञ था जिसको सभी ऋत्विजों ने किया था और यजमान के साथ उन्होंने उसको समाप्त किया था।५। विधि के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ राजा ने उस यज्ञ को समाप्त कराकर उसी समय में ऋत्विजों के लिए उचित दक्षिणा दी थी ।६। इसके उपरान्त ऋत्विज-सदस्य-ब्राह्मण तथा याचकों के लिए सबको जो भी उनका आकांक्षित था उस से अधिक धन दिया था ।७।
एवं संतर्प्य विप्रादीन्दक्षिणाभिर्यथाक्रमम् ।
क्षमापयामास गुरून्सदस्यान्प्रणिपत्य च ॥८
ब्राह्मणैस्ततो वर्णैऋत्विग्भिश्च समन्वितः ।
वारकीयाकदंबैश्च सूतमागधवंदिभिः ॥९
अन्वीयमानः सस्त्रीकः श्वेतच्छत्रविराजितः ।
दोधूयमानचमरो बालव्यजनराजितः ॥१०
नानावादित्रनिर्घोषैर्बधिरीकृतदिङ्मुखः ।
स गत्वा सरयूतीरं यथाशास्त्रं यथाविधि ॥११
चकारावभृथस्नानं मुदितः सह बन्धुभिः ।
एवं स्नात्वा सपत्नीकः सुहृद्भिर्ब्राह्मणैः सह ॥१२
वीणावेणुमृदंगादिनानावादित्रनिःस्वनैः ।
मंगल्यैर्वेदघोषैश्च सह विप्रजनेरितैः ॥१३
४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
संस्तूयमानः परितः सूतमागधबंदिभिः । प्रविवेश पुरीं रम्यां हृष्टपुष्टजनायुताम् ॥१४
इस प्रकार से विप्रगण आदि की दक्षिणाओं से भली-भाँति तृप्ति करके क्रम के अनुसार गुरुवर्गों को और सदस्यों को प्रणिपात करके उनसे क्षमा की याचना की थी ।८। फिर वह राजा शोभा यात्रा के स्वरूप में सरयू के तट पर गया था । उसके साथ ब्राह्मण आदि सभी वर्णों वाले लोग तथा ऋत्विज गण थे और जो मार्ग में रोकथाम करने वाले लोग थे उनके भी समूह और सूत—मागध और बन्दी जन भो थे ।६। इन सब को साथ में लेकर अपनी पत्नियों के सहित राजा वहाँ से चला था जिसके ऊपर श्वेत छत्र शोभित था । उसके दोनों ओर चमर ढुलाये जा रहे थे तथा बाल व्यजन भी किये जा रहे थे ।१०। अनेक वाद्य उस समय बजाये जा रहे थे जिनकी तुमुल ध्वनि से सभी दिशाओं कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था । इस रीति से वह शास्त्र के कथनानुसार विधिपूर्वक सरयू पर प्राप्त हो गया था ।११। समस्त बन्धु-बान्धवों के साथ परम प्रसन्न होकर अवभृथ अर्थात् यज्ञान्त स्नान राजा ने किया था । इस रीति के पत्नियों के सहित सुहृद्गण और विप्रों के साथ स्नान करके वहाँ से राजा वापिस चला था ।१२। उस समय में वीणा-वेणु-मृदङ्ग आदि अनेक बाजे रहे थे और माङ्गलिक वेद-मन्त्रों की भी ध्वनि हो रही थी जिन मन्त्रों को ब्राह्मण बोल रहे थे ।१३। सूत-मागध और बन्दीजन सभी ओर से संस्तवन कर रहे थे । इस रीति से हृष्ट-पुष्टजनों से समन्वित अपनी सुरम्यपुरी में राजा ने प्रवेश किया था ।१४।
श्वेतव्यजनसच्छत्रपताकाध्वजमालिनीम् । सिक्तसंमृष्टभूभागापणशोभासमन्विताम् ॥१५ कैलासाद्रिप्रकाशाभिरुज्ज्वलां सौधपक्तिभिः । स तत्रागरुधूपोत्थगंधामोदितदिङ्मुखम् ॥१६ विकीर्यमाणः परितः पौरनारीजनैर्मुहुः । लाजवर्षेण सानंदं वीक्षमाणश्च नागरैः ॥१७ उपदाभिरनेकाभिस्तत्र तत्र वणिग्जनैः । संभाव्यमानः शनकैर्जगाम स्वपुरं प्रति ॥१८
अंशुमान को राज्य प्राप्ति ] [ ४६
स प्रविश्य गृहं रम्यं सर्वमंडलमंडितम् । सम्यक्संभावयामास सुहृदो ब्राह्मणानपि ॥१९ संसेव्यमानश्च तदा नानादेशेश्वरैर्नृपैः । सभायां राजशार्दूलो रेमे शक्र इवापरः ॥२० एवं सुहृद्भिः सहितः पूरयित्वा मनोरथम् । सगरः सह भार्याभ्यां रेमे नृपवरोत्तमः ॥२१
उस पुरी की शोभा का वर्णन किया जाता है कि उसमें सर्वत्र छत्र पताका-ध्वजाओं की मालायें दिखाई दे रही थीं सर्वत्र पुरी का भूभाग संमार्जित तथा संसिक्त था और उसमें दुकान और बाजारों की भी अतीव अद्भुत शोभा हो रही थी ।१५। उस पुरी में बड़े-बड़े भवनों की की पंक्तियां थी जो बहुत ही ऊँचे थे और जिनमें प्रकाश हो रहा था । वे ऐसे ही प्रतीत हो रहे थे मानों उज्ज्वल कैलाश गिरि के शिखर हों । वहाँ पर अगुरु की धूप की गन्ध चारों ओर फैल रही थी जिससे सभी दिशाओं के मुख आमोदित हो रहे थे ।१६। नगर निवासिनी नारियों का समुदाय सभी ओर बारम्बार खीलों की वर्षा राजा के ऊपर कर रहा था और नगर निवासी पुरुष बड़े आनन्द के साथ राजा का मुखावलोकन कर रहे थे ।१७। साकेत पुरी के वणिग्जन अपनी भेंटें लेकर जो अनेक प्रकार की थी जहाँ-तहाँ पर राजा का सम्मान कर रहे थे । इस रीति से राजा धीरे-धीरे अपने पुर की ओर गये थे ।१८। उस नृप ने सभा मण्डलों से मण्डित अपने सुरम्य गृह में प्रवेश किया था ओर वहाँ पर अपने सुहृदों का तथा ब्राह्मणों का भली भाँति सत्कार-समादर किया था ।१९। वहाँ पर अनेक देशों के नृप उस समय में विद्यमान थे और उनके द्वारा राजा का पूर्ण सेवा-सम्मान किया गया था । वह राजाशार्दूल अपनी सभी में दूसरे इन्द्र के ही समान रमण किया करता था ।२०। इस प्रकार से सुहृदों के सहित नृप नरोत्तम सगर ने मनोरथ को पूर्ण किया था और वह अपनी दोनों भार्याओं के साथ रमण किया करता था ।२१।
अंशुमन्तं ततः पौत्रं मुदा विनयशालिनम् । वसिष्ठानुमते राजा यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ॥२२ पौरजानपदानां तु बंधूनां सुहृदामपि ।