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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

श्रीपरमात्मने नमः दूसरा अध्याय पहला पाद सम्बन्ध-पहले अध्यायमे यह सिद्ध किया गया कि समस्त वेदान्तवाक्य एक स्वरसे परब्रह्म परमेश्वरको ही जगत्‌का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण बताते हैं। इसीलिये उस अध्यायको 'समन्वयाध्याय' कहते हैं। ब्रह्म ही सम्पूर्ण विश्वका कारण है; इस विषयको लेकर श्रुतियोंमें कोई मतभेद नहीं है। प्रधान आदि अन्य जडवर्गको कारण बतानेवाले सांख्य आदिके मतोंको शब्दप्रमाण- शून्य बताकर तथा अन्य भी बहुत-से हेतु देकर उनका निराकरण किया गया है। अब यह सिद्ध करनेके लिये कि श्रुतियोंका न तो स्मृतियोंसे विरोध है और न आपसमे ही एक श्रुतिसे दूसरी श्रुतिका विरोध है; यह 'अविरोध' नामक दूसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले सांख्यवादीकी ओरसे शङ्का उपस्थित करके सूत्रकार उसका समाधान करते हैं- स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्य- नवकाशदोषप्रसङ्गात् ॥ २ । १ । १ ॥ चेत्=यदि कहो; स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गः=प्रधानको जगत्‌का कारण न माननेसे सांख्यस्मृतिको अवकाश (मान्यता) न देनेका दोष उपस्थित होगा; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; अन्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात्= क्योकि उसको मान्यता देनेपर दूसरी अनेक स्मृतियोको मान्यता न देनेका दोष आता है। व्याख्या-“यदि कहा जाय कि 'प्रधान'को जगत्‌का कारण न मानकर 'ब्रह्म'को ही माना जायगा तो सर्वज्ञ कपिल ऋषिद्वारा बनायी हुई सांख्यस्मृतिको अवकाश न देनेका-उसे प्रमाण न माननेका प्रसङ्ग आयेगा, इसलिये प्रधानको जगत्‌का कारण अवश्य मानना चाहिये।” तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि सांख्यशास्त्रको मान्यता देकर यदि प्रकृतिको जगत्‌का कारण मान ले तो दूसरे-

सूत्र १-२ ] अध्याय २ १०३

सूत्र १-२ ] अध्याय २ १०३ दूसरे महर्षियोंद्वारा बनायी हुई स्मृतियोंको न माननेका दोष उपस्थित हो सकता है; इसलिये वेदानुकूल स्मृतियोंको ही प्रमाण मानना उचित है; न कि वेदके प्रतिकूल अपनी इच्छाके अनुसार बनायी हुई स्मृतिको । दूसरी स्मृतियोंमे स्पष्ट ही परब्रह्म परमेश्वरको जगत्का कारण बताया है । (श्रीमद्भगवद्गीता)* विष्णुपुराण † और मनुस्मृति ‡ आदिमे भी समस्त जगत्की उत्पत्ति परमात्मासे ही बतायी गयी है । इसलिये वास्तवमे श्रुतियोंके साथ स्मृतियोंका कोई विरोध नहीं है । यदि कहीं विरोध हो भी तो वहाँ स्मृतिको छोड़कर श्रुतिके कथनको ही मान्यता देनी चाहिये; क्योंकि वेद और स्मृतिके विरोधमें वेद ही बलवान् माना गया है । सम्बन्ध—सांख्यशास्त्रोक्त 'प्रधान' को जगत्का कारण न माननेमें कोई दोष नहीं है; इस बातकी पुष्टिके लिये दूसरा कारण उपस्थित करते हैं— इतरेषां चानुपलब्धेः ॥ २ । १ । २ ॥ च=तथा; इतरेषाम्=अन्य स्मृतिकारोंके ( मतमे ); अनुपलब्धेः=प्रधान- कारणवादकी उपलब्धि नहीं होती, इसलिये ( भी प्रधानको जगत्का कारण न मानना उचित ही है ) ।

  • एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ( गीता ७ । ६ ) 'पहले कही हुई मेरी परा और अपरा प्रकृतियाँ सम्पूर्ण प्राणियोंकी योनि हैं, ऐसा समझो । तथा मैं जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति और प्रलयका कारण हूँ ।' प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ( गीता ९ । ८ ) 'मैं अपनी प्रकृतिका अवलम्बन करके, प्रकृतिके वशसे विवश हुए इस समस्त भूतसमुदायको बारंबार नाना प्रकारसे रचता हूँ ।' † विष्णोः सकाशादुद्भूतं जगत्तत्रैव च स्थितम् । स्थितिसंयमकत्र्तासौ जगतोऽस्य जगच्च सः ॥ ( वि० पु० १ । १ । ३१ ) 'यह सम्पूर्ण जगत् भगवान् विष्णुसे उत्पन्न हुआ है और उन्हींमें स्थित है । वे इस जगत्के पालक और संहारकर्ता हैं तथा सम्पूर्ण जगत् उन्हींका स्वरूप है ।' ‡ सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत् ॥ ( मनु० १ । ८ ) 'उन्होंने अपने शरीरसे नाना प्रकारकी प्रजाको उत्पन्न करनेकी इच्छासे सङ्कल्प करके पहले जलकी ही सृष्टि की फिर उस जलमे अपनी शक्तिरूप वीर्यका आधान किया ।'

१०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—मनु आदि जो दूसरे स्मृतिकार हैं, उनके ग्रन्थोंमे सांख्यशास्त्रोक्त प्रक्रियाके अनुसार प्रधानको कारण मानने और उससे सृष्टिके होनेका वर्णन नहीं मिलता है; इसलिये इस विषयमें सांख्यशास्त्रको प्रमाण न मानना उचित ही है। सम्बन्ध—'सांख्यकी सृष्टि-प्रक्रियाको योगशास्त्रके प्रवर्तक पातञ्जल भी मानते हैं, अतः उसको मान्यता क्यों न देनी चाहिये ?' इसपर कहते हैं— एतेन योगः प्रत्युक्तः ॥ २ । १ । ३ ॥ एतेन=इस पूर्वोक्त विवेचनसे; योगः=योगशास्त्रका भी; प्रत्युक्तः=प्रत्युत्तर हो गया । व्याख्या—उपर्युक्त विवेचनसे अर्थात् पूर्वसूत्रोंमे जो कारण बताये गये हैं, उन्हींसे पातञ्जल-योगशास्त्रकी भी उस मान्यताका निराकरण हो गया, जिसमे उन्होंने दृश्य ( जड प्रकृति ) को जगत्का स्वतन्त्र कारण कहा है; क्योंकि अन्य विषयोंमें योगका सांख्यके साथ मतभेद होनेपर भी जड प्रकृतिको जगत्का कारण माननेमें दोनों एकमत हैं; अतः एकके ही निराकरणसे दोनोंका निराकरण हो गया। सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणमें यह कहा गया है कि वेदानुकूल स्मृतियोंको ही प्रमाण मानना आवश्यक है, इसलिये वेदविरुद्ध सांख्यस्मृतिको मान्यता न देना अनुचित नहीं है। इसलिये पूर्वपक्षी वेदके वर्णनसे सांख्य-मतकी एकता दिखानेके लिये कहता है— न विलक्षणत्वादस्य तथात्वं च शब्दात् ॥ २ । १ । ४ ॥ न=चेतन ब्रह्म जगत्का कारण नहीं है; अस्य विलक्षणत्वात्=क्योंकि यह कार्यरूप जगत् उस ( कारण ) से विलक्षण ( जड ) है; च=और; तथात्वम्= उसका जड होना; शब्दात्=शब्द ( वेद ) प्रमाणसे सिद्ध है। व्याख्या—श्रुतिमे परब्रह्म परमात्माको सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त आदि लक्षणोंवाला बताया गया है ( तै० उ० २ । १ ) और जगत्को ज्ञानरहित ( तै० उ० २ । ६ ) अर्थात् जड कहा गया है। अतः श्रुति-प्रमाणसे ही 'इसकी परमेश्वरसे विलक्षणता सिद्ध होती है।' कारणसे कार्यका विलक्षण होना युक्तिसंगत नहीं है; इसलिये चेतन परब्रह्म परमात्माको अचेतन जगत्का कारण नहीं मानना चाहिये ।

सूत्र ३-६ ] अध्याय २ १०५

सूत्र ३-६ ] अध्याय २ १०५ सम्बन्ध—यदि कहो, अचेतन कहे जानेवाले आकाश आदि तत्त्वोंका भी श्रुतिमें चेतनकी भाँति वर्णन मिलता है। जैसे—'तत्तेज ऐक्षत' (छा० उ० ६।२। ३)—'उस तेजने विचार किया।' 'ता आप ऐक्षन्त' (छा० उ० ६।२। ४) 'उस जलने विचार किया।' इत्यादि। तथा पुराणोंमें नदी, समुद्र, पर्वत आदिका भी चेतन-जैसा वर्णन किया गया है। इस प्रकार चेतन होनेके कारण यह जगत् चेतन परमात्मासे विलक्षण नहीं है; इसलिये चेतन परमात्माको इसका कारण माननेमें कोई आपत्ति नहीं है, तो इसका उत्तर इस प्रकार दिया जाता है— अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ॥ २ । १ । ५ ॥ तु=किन्तु; (वहाँ तो) अभिमानिव्यपदेशः=उन-उन तत्त्वोंके अभिमानी देवताओंका वर्णन है; (यह बात) विशेषानुगतिभ्याम्=विशेष शब्दोंके प्रयोग- से तथा उन तत्त्वोंमे देवताओंके प्रवेशका वर्णन होनेसे (सिद्ध होती है)। व्याख्या—श्रुतिमें जो 'तेज, जल आदिने विचार किया' इत्यादि रूपसे जड तत्त्वोंमें चेतनके व्यवहारका कथन है, वह तो उन तत्त्वोंके अभिमानी देवताओंको लक्ष्य करके है। यह बात उन-उन स्थलोंमें प्रयुक्त हुए विशेष शब्दोंसे सिद्ध होती है। जैसे तेज, जल और अन्न—इन तीनोंकी उत्पत्तिका वर्णन करनेके बाद इन्हें 'देवता' कहा गया है (छा० उ० ६।३।२)। तथा ऐतरेयोपनिषद् (१।२।४) मे 'अग्नि वाणी बनकर मुखमें प्रविष्ट हुआ, वायु प्राण बनकर नासिकामें प्रविष्ट हुआ।' इस प्रकार उनकी अनुगतिका उल्लेख होनेसे भी उनके अभिमानी देवताओंका ही वर्णन सिद्ध होता है। इसलिये ब्रह्मको जगत्का उपादान कारण बताना युक्ति- संगत नहीं है, क्योंकि आकाश आदि जड तत्त्व भी इस जगत्मे उपलब्ध होते हैं, जो कि चेतन ब्रह्मके धर्मोंसे सर्वथा विपरीत लक्षणोंवाले हैं। सम्बन्ध—ऊपर उठायी हुई शङ्काका ग्रन्थकार उत्तर देते हैं— दृश्यते तु ॥ २ । १ । ६ ॥ तु=किन्तु; दृश्यते=श्रुतिमे उपादानसे विलक्षण वस्तुकी उत्पत्तिका वर्णन भी देखा जाता है (अतः ब्रह्मको जगत्का उपादान कारण मानना अनुचित नहीं है)।

१०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—यह कहना ठीक नहीं है कि उपादानसे उत्पन्न होनेवाला कार्य उससे विलक्षण नहीं हो सकता; क्योकि मनुष्य आदि चेतन व्यक्तियोसे नख-लोम आदि जड वस्तुओकी उत्पत्तिका वर्णन वेदमे देखा जाता है । जैसे, 'यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाक्षरात् संभवतीह विश्वम् ।' ( मु० उ० १ । १ । ७ ) अर्थात् 'जैसे जीवित मनुष्यसे केश और रोएँ उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार अविनाशी परब्रह्मसे यह सब जगत् उत्पन्न होता है।' सजीव चेतन पुरुषसे जड नख-लोम आदिकी उत्पत्ति उससे सर्वथा विलक्षण ही तो .है । अतः ब्रह्मको जगत्‌का कारण मानना युक्तिसंगत तथा श्रुति-स्मृतियोंसे अनुमोदित है । इसमें कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध—इसी विषयमे दूसरी शङ्का उपस्थित करके उसका निराकरण करते हैं— असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात् ॥ २ । १ । ७ ॥ चेत्=यदि कहो; ( ऐसा माननेसे ) असत्=असत्कार्यवाद अर्थात् जिसकी सत्ता नहीं है, ऐसी वस्तुकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; प्रतिषेधमात्रत्वात्=क्योंकि वहाँ 'असत्' शब्द प्रतिषेध- मात्रका अर्थात् सर्वथा अभावका बोधक है । व्याख्या—यदि कहो 'अवयवरहित चेतन ब्रह्मसे सावयव जड-वर्गकी उत्पत्ति माननेपर जो वस्तु पहले नहीं थी, उसकी उत्पत्ति माननेका दोष उपस्थित होगा, जो कि श्रुति-प्रमाणके विरुद्ध है, क्योंकि वेदमें असत्‌से सत्‌की उत्पत्तिको असंभव बताया गया है।' तो ऐसी बात नहीं है; क्योंकि वहाँ वेदमे कारणसे विलक्षण कार्यकी उत्पत्तिका निषेध नहीं है; अपितु 'असत्'शब्दवाच्य अभावसे भावकी उत्पत्तिको असंभव कहा गया है । वेदान्त शास्त्रमें अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं मानी गयी है; किन्तु सत्स्वरूप सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमात्मामे जो जडचेतनात्मक जगत शक्तिरूपसे विद्यमान होते हुए भी अप्रकट रहता .है, उसीका उसके सङ्कल्पसे प्रकट होना उत्पत्ति है । इसलिये परब्रह्मसे जगत्‌की उत्पत्ति मानना असत्‌से सत्‌की उत्पत्ति मानना नहीं है । सम्बन्ध—इसपर पुनः पूर्वपक्षकी ओरसे शङ्का उपस्थित की जाती है— अपीतौ तद्वत्प्रसङ्गादसमञ्जसम् ॥ २ । १ । ८ ॥

सूत्र ७-९ ] अध्याय २ १०७

सूत्र ७-९ ] अध्याय २ १०७ अपीतौ = ( ऐसा माननेपर ) प्रलयकालमे; तद्वत्प्रसङ्गात् = ब्रह्मका उस संसारके जडत्व और सुख-दुःखादि धर्मोंसे युक्त माननेका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, इसलिये; असमञ्जसम् = उपर्युक्त मान्यता युक्तिसगत नहीं है । व्याख्या--यदि प्रलयकालमे भी संपूर्ण जगत्‌का उस परब्रह्म परमात्मामे विद्यमान रहना माना जायगा, तब तो उस ब्रह्मको जड प्रकृतिके जडत्व तथा जीवोंके सुख-दुःख आदि धर्मोंसे युक्त माननेका प्रसङ्ग आ जायगा, जो किसीको मान्य नहीं है; क्योकि श्रुतिमे उस परब्रह्म परमेश्वरको सदैव जडत्व आदि धर्मोंमे रहित, निर्विकार और सर्वथा विशुद्ध बताया गया है । इसलिये उपर्युक्त मान्यता युक्तियुक्त नहीं है । सम्बन्ध--अब सूत्रकार उपर्युक्त शङ्काका निराकरण करते है-- न तु दृष्टान्तभावात् ॥ २ । १ । ९ ॥ (उपर्युक्त वेदसम्मत सिद्धान्तमे ) तु = निःसदेह; न = पूर्वसूत्रमे बताये हुए दोष नहीं हैं; दृष्टान्तभावात् = क्योंकि ऐसे बहुत-से दृष्टान्त उपलब्ध होते है ( जिनसे कारणमे कार्यके विलीन हो जानेपर भी उसमे कार्यके धर्म नहीं रहनेकी बात सिद्ध होती है ) । व्याख्या--पूर्वसूत्रमें की हुई शङ्का समीचीन नहीं है; क्योकि कार्यके अपने कारणमे विलीन हो जानेके बाद उसके धर्म कारणमे रहते हैं, ऐसा नियम नहीं है; अपितु इसके विपरीत बहुत-से दृष्टान्त मिलते हैं । अर्थात् जब कार्य कारणमे विलीन होता है, तब उसके धर्म भी कारणमे विलीन हो जाते है, ऐसा देखा जाता है । जैसे सुवर्णसे बने हुए आभूषण जब अपने कारणमे विलीन हो जाते हैं, तब उन आभूषणोके धर्म सुवर्णमे नहीं देखे जाते हैं । तथा मिट्टीसे बने हुए घट आदि पात्र जब अपने कारण मृत्तिकामे विलीन हो जाते हैं, तब घट आदिके धर्म उस मृत्तिकामे नहीं देखे जाते हैं । इसी प्रकार और भी बहुत-से दृष्टान्त हैं । इससे यही सिद्ध हुआ कि प्रलयकाल या सृष्टिकालमे और किसी भी अवस्थामे कारण अपने कार्यके धर्मोसे लिप्त नहीं होता है । सम्बन्ध--उपर्युक्त सूत्रमे वादीकी शङ्काका निराकरण किया गया । अब उसके द्वारा उठाये हुए दोषोंकी उसीके मतमें व्याप्ति बताकर अपने मतको निर्दोष सिद्ध करते है--

१०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ स्वपक्षदोषाच्च ॥ २ । १ । १० ॥ स्वपक्षदोषात् = वादीके अपने पक्षमे उपर्युक्त सभी दोष आते हैं, इसलिये; च = भी; प्रधानको जगत्का कारण मानना ठीक नहीं है। व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी स्वयं यह मानते हैं कि जगत्का कारणरूप प्रधान अवयवरहित, अव्यक्त और अग्राह्य है। उससे साकार, व्यक्त तथा देखने- सुननेमे आनेवाले जगत्की उत्पत्ति मानना तो कारणसे विलक्षण कार्यकी उत्पत्ति माननेका दोष स्वीकार करना है। तथा जगत्की उत्पत्तिके पहले कार्यके शब्द, स्पर्श आदि धर्म प्रधानमे नहीं रहते और कार्यकी उत्पत्तिके पश्चात् कार्यमे आ जाते हैं, यह माननेके कारण उनके मतमे असत्से सत्की उत्पत्ति स्वीकार करनेका दोष भी ज्यो-का-त्यो रहा। इसके सिवा, प्रलयकालमे जब समस्त कार्य प्रधानमें विलीन हो जाते हैं, उस समय कार्यके शब्द, स्पर्श आदि धर्म प्रधानमें नहीं रहते; ऐसी मान्यता होनेके कारण वादीके मतमे भी कारणमे कार्यके धर्म आ जानेकी शङ्का पूर्ववत् बनी रहती है। इसलिये वादीके द्वारा उपस्थित किये हुए तीनो दोष उसके प्रधानकारणवादमें ही पाये जाते हैं, अतः प्रधानको जगत्का कारण मानना कदापि उचित नहीं है। सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनपर वादीद्वारा किये जा सकनेवाले आक्षेपको स्वयं उपस्थित करके सूत्रकार उसका निराकरण करते हैं— तर्काप्रतिष्ठानादप्यन्यथानुमेयमिति चेदेवमप्यनिर्मोक्ष- प्रसङ्गः ॥ २ । १ । ११ ॥ चेद् इति = यदि ऐसा कहो कि; तर्काप्रतिष्ठानात् = तर्कोंकी स्थिरता न होनेपर; अपि = भी; अन्यथानुमेयम् = दूसरे प्रकारसे अनुमानके द्वारा कारणका निश्चय करना चाहिये; एवम् अपि = तो ऐसी स्थितिमे भी; अनिर्मोक्षप्रसङ्गः = मोक्ष न होनेका प्रसङ्ग आ जायगा। व्याख्या—एक मतावलम्बीद्वारा उपस्थित की हुई युक्तिको दूसरा नहीं मानता, वह उसमें दोष सिद्ध करके दूसरी युक्ति उपस्थित करता है; किन्तु इस दूसरी युक्तिको वह पहला नहीं मानता, वह उसमे भी दोष सिद्ध करके नयी ही युक्ति प्रस्तुत करता है। इस प्रकार एकके बाद दूसरे तर्क उठते रहनेसे उनकी

सूत्र १०—१३ ] अध्याय २ १०९

सूत्र १०—१३ ] अध्याय २ १०९ कोई स्थिरता या समाप्ति नहीं है, यह कहना ठीक है, तथापि दूसरे प्रकारसे अनुमानके द्वारा कारणतत्त्वका निश्चय करना चाहिये, ऐसा कोई कहे तो ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसी स्थितिमे वेदप्रमाणरहित कोई भी अनुमान वास्तविक ज्ञान करानेवाला सिद्ध नहीं होगा । अतएव उसके द्वारा तत्त्वज्ञान होना असम्भव है और तत्त्वज्ञानके बिना मोक्ष नहीं हो सकता। अतः सांख्य-मतमे ससारसे मोक्ष न होनेका प्रसङ्ग आ जायगा । सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे प्रधानकारणवादका खण्डन करके उन्हीं युक्तियोंसे अन्य वेदविरुद्ध मतोंका भी निराकरण हो जाता है, ऐसा कहते हैं— एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः ॥ २ । १ । १२ ॥ एतेन = इस पूर्वनिरूपित सिद्धान्तमे; शिष्टापरिग्रहाः = शिष्ट पुरुषोद्वारा अस्वीकृत अन्य सब मतोंका; अपि = भी; व्याख्याताः = प्रतिवाद कर दिया गया । व्याख्या—पाँचवें सूत्रसे ग्यारहवे सूत्रतक जो सांख्यमतावलम्बियोंद्वारा उपस्थित की हुई शङ्काओंका निराकरण करके वैदिक सिद्धान्तका प्रतिपादन किया गया है; इसीसे दूसरे मत-मतान्तरोंका भी, जो वेदानुकूल न होनेके कारण शिष्ट पुरुषोंको मान्य नहीं है, निराकरण हो गया । क्योकि उनके मत भी इस विषयमे सांख्यमतसे ही मिलते-जुलते हैं। सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणमें प्रधानकारणवादका निराकरण किया गया। अब ब्रह्मकारणवादमे दूसरे प्रकारके दोषोंकी उद्भावना करके उनका निवारण किया जाता है— भोक्त्रापत्तेरविभागश्चेत् स्याल्लोकवत् ॥ २ । १ । १३ ॥ चेत् = यदि कहो; भोक्त्रापत्तेः = ( ब्रह्मको जगत्का कारण माननेसे उसमें ) भोक्तापनका प्रसङ्ग आ जायगा, इसलिये; अविभागः = जीव और ईश्वरका विभाग सिद्ध नहीं होगा, उसी प्रकार जीव और जड-वर्गका भी परस्पर विभाग सिद्ध नहीं होगा; ( इति न = ) तो यह कहना ठीक नहीं है; लोकवत् = क्योंकि लोकमें जैसे विभाग देखा जाता है, वैसे; स्यात् = हो सकता है। व्याख्या—यदि कहो कि 'ब्रह्मको जगत्का कारण मान लेनेसे स्वयं ब्रह्मका ही जीवके रूपमें कर्म-फलरूप सुख-दुःख आदिका भोक्ता होना सिद्ध हो जायगा; इससे जीव और ईश्वरका विभाग सम्भव नहीं रहेगा तथा जडवर्गमे भोक्तापन

११० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ आ जानेसे भोक्ता ( जीवात्मा ) और भोग्य ( जडवर्ग ) का भी विभाग असम्भव हो जायगा; तो ऐसी बात नहीं है; क्योकि लोकमे एक कारणसे उत्पन्न हुई वस्तुओमें ऐसा विभाग प्रत्यक्ष देखा जाता है; उसी प्रकार ब्रह्म और जीवात्मा तथा जीव और जडवर्गका विभाग होनेमे भी कोई बाधा नहीं रहेगी। अर्थात् लोकमे जैसे यह बात देखी जाती है कि पिताका अंशभूत बालक जब गर्भमे रहता है तो गर्भजनित पीड़ाका भोक्ता वही होता है, पिता नहीं होता। तथा उस बालक और पिताका विभाग भी प्रत्यक्ष देखा जाता है। उसी प्रकार ब्रह्ममे भोक्तापन आनेकी आशङ्का नहीं है तथा जीवात्मा और परमात्माके परस्पर विभाग होनेमे भी कोई अड़चन नहीं है। इसके - सिवा, जैसे एक ही पितासे उत्पन्न बहुत-से लड़के परस्पर एक-दूसरेके सुख-दुःखके भोक्ता नहीं होते, इसी प्रकार भिन्न-भिन्न जीवोंको कर्मानुसार जो सुख-दुःख प्राप्त होते हैं, उनका उपभोग वे पृथक्-पृथक् ही करते हैं, एक दूसरेके नहीं। इसी तरह यह भी देखा जाता है कि एक ही पृथिवी-तत्त्वके नाना प्रकारके कार्य घट, पट, कपाट आदिमे परस्पर भेदकी उपलब्धि अनायास हो रही है, उसमे कोई बाधा नहीं आती। घड़ा वस्त्र या कपाट नहीं बनता और वस्त्र घड़ा नहीं बनता और कपाट वस्त्र नहीं बनता। सबके अलग-अलग नाम, रूप और व्यवहार चलते रहते है। उसी प्रकार एक ही ब्रह्मके असंख्य कार्य होनेपर भी उनके विभागमे किसी प्रकारकी बाधा नहीं आती है। सम्बन्ध—ऐसा माननेसे कारण और कार्यमें अनन्यता सिद्ध नही होगी, ऐसी शङ्का प्राप्त होनेपर कहते हैं— तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ॥ २ । १ । १४ ॥ आरम्भणशब्दादिभ्यः = आरम्भण शब्द आदि हेतुओसे; तदनन्यत्वम् = उसकी अर्थात् कार्यकी कारणसे अनन्यता सिद्ध होती है। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्में यह कहा गया है कि 'यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद् वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्।' (छा० उ० ६ । १ । ४) अर्थात् 'हे सोम्य ! जैसे मिट्टीके एक ढेलेका तत्त्व जान लेनेपर मिट्टीसे उत्पन्न होनेवाले समस्त कार्य जाने हुए हो जाते हैं; उनके नाम और आकृतिके भेद तो व्यवहारके लिये है, वाणीसे उनका कथनमात्र

सूत्र १४-१५ ] अध्याय २ १११

सूत्र १४-१५ ] अध्याय २ १११ होता है, वास्तवमे तो कार्यरूपमे भी वह मिट्टी ही है।' इसी प्रकार यह कार्य- रूपमे वर्तमान जगत् भी ब्रह्मरूप ही है। इस कथनसे जगत्‌की ब्रह्मसे अनन्यता सिद्ध होती है; तथा सूत्रमे 'आदि' शब्दका प्रयोग होनेसे यह अभिप्राय निकलता है कि इस प्रकरणमे आये हुए दूसरे वाक्योसे भी यही बात सिद्ध होती है। उक्त प्रकरणमे 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्'का ( छा० उ० ६। ८ से लेकर १६ वे खण्डतक ) प्रयोग कई बार हुआ है। इसका अर्थ है कि 'यह सब कुछ ब्रह्मस्वरूप है।' इस प्रकार श्रुतिने कारणरूप ब्रह्मसे कार्यरूप जगत्‌की अनन्यताका स्पष्ट शब्दोमे प्रतिपादन किया है। उसी प्रकरणमे उपदेशका आरम्भ करके आचार्यने कहा है— 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्।' ( छा० उ० ६ । २ । १ ) अर्थात् 'हे सोम्य ! यह समस्त जगत् प्रकट होनेसे पहले एकमात्र अद्वितीय सत्यस्वरूप ब्रह्म ही था।' इससे अनन्यताके साथ-साथ यह भी सिद्ध होता है कि यह जड- चेतन भोग्य और भोक्ताके आकारमे प्रत्यक्ष दीखनेवाला जगत् उत्पत्तिके पहले भी अवश्य था। परन्तु था परब्रह्म परमात्माकी शक्तिरूपमे। इसका वर्तमानरूप उस समय अप्रकट था। जैसे स्वर्णके विकार हार-कंकण-कुण्डल आदि उत्पत्तिके पहले और विलीन होनेके बाद अपने कारणरूप स्वर्णमे शक्तिरूपसे रहते है। शक्ति, शक्तिमान्‌मे अभेद होनेके कारण उनकी अनन्यतामे किसी प्रकारका दोष नहीं आता; उसी प्रकार यह जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् उत्पत्तिके पहले और प्रलयके बाद परब्रह्म परमेश्वरमें शक्तिरूपसे अव्यक्त रहता है। अतः जगत्‌की ब्रह्मसे अनन्यतामे किसी प्रकारकी बाधा नहीं आती। गीतामे भगवान्‌ने स्वयं कहा है कि 'यह आठ भेदोवाले जड प्रकृति तो मेरी अपरा प्रकृतिरूपा शक्ति है और जीवरूप चेतन-समुदाय मेरी परा प्रकृति है, ( ७। ५ ) इसके बाद यह भी बताया है कि ये दोनो समस्त प्राणियोके कारण है, और मैं सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्ति एवं प्रलयरूप महाकारण हूँ।' ( गीता ७ । ६ ) इस कथनसे भगवान्‌ने अपनी प्रकृतियोंके साथ अनन्यता सिद्ध की है। इसी प्रकार सर्वत्र समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध—पहले जो यह बात कही थी कि कार्य केवल वाणीका विषय है, कारण ही सत्य है; उससे यह भ्रम हो सकता है कि कार्यकी वास्तविक सत्ता नहीं है। अतः इस शङ्काको दूर करनेके लिये यह सिद्ध करते हैं कि अपनी वर्तमान अवस्थाके पहले भी शक्तिरूपमे कार्यकी सत्ता रहती है— भावे चोपलब्धेः ॥ २ । १ । १५ ॥

११२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ भावे=(कारणमे शक्तिरूपसे) कार्यकी सत्ता होनेपर; च=ही; उपलब्धेः= उसकी उपलब्धि होती है, इसलिये यह सिद्ध होता है कि (यह जगत् अपने कारण-ब्रह्ममें शक्तिरूपसे सदैव स्थित है)। व्याख्या-यह बात दृढ़ करते हैं कि कार्य अपने कारणमे शक्तिरूपसे सदैव विद्यमान रहता है, तभी उसकी उपलब्धि होती है; क्योंकि जो वस्तु वास्तव- में विद्यमान होती है, उसीकी उपलब्धि हुआ करती है। जो वस्तु नहीं होती अर्थात् खरगोशके सींग और आकाशके पुष्पकी भाँति जिसका सर्वथा अभाव होता है, उसकी उपलब्धि भी नहीं होती। इसलिये यह जड-चेतनात्मक जगत् अपने कारणरूप परब्रह्म परमेश्वरमे शक्तिरूपसे अवश्य विद्यमान है, और सदैव अपने कारणसे अभिन्न है। सम्बन्ध-सत्कार्यवादकी सिद्धिके लिये ही पुनः कहते हैं- सत्त्वाच्चावरस्य ॥ २ । १ । १६ ॥ अवरस्य=कार्यका; सत्त्वात्=सत् होना श्रुतिमे कहा गया है, इससे; च=भी; (प्रकट होनेके पहले उसका होना सिद्ध होता है)। व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् (६। २। १) में कहा गया है कि 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्- 'हे सोम्य ! यह प्रकट होनेसे पहले भी सत्य था।' बृहदारण्यकमें भी कहा है 'तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् (१।४।७) 'उस समय यह अप्रकट था।' इन वर्णनोंसे यह सिद्ध है कि स्थूलरूपमे प्रकट होनेके पहले यह सम्पूर्ण जगत् अपने कारणमे शक्तिरूपसे विद्यमान रहता है और वही सृष्टिकालमे प्रकट होता है। सम्बन्ध-श्रुतिमे विरोध प्रतीत होनेपर उसका निराकरण करते हैं- असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात् ॥२। १।१७॥ चेत्=यदि कहो; (दूसरी श्रुतिमे) असद्व्यपदेशात्=उत्पत्तिका पहले इस जगत्को 'असत्' बतलाया है, इसलिये; न=कार्यका कारणमे पहलेसे ही विद्यमान होना सिद्ध नहीं होता; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; (क्योंकि) धर्मान्त- रेण=वैसा कहना धर्मान्तरकी अपेक्षासे है; वाक्यशेषात्=यह बात अन्तिम वाक्य- से सिद्ध होती है।

सूत्र १६-१८ ] अध्याय २ ११३

सूत्र १६-१८ ] अध्याय २ ११३ व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्मे कहा है कि 'असद् वा इदमग्र आसीत् । ततो वै सदजायत । तदात्मानꣳ स्वयमकुरुत । तस्मात्तत्सुकृतमुच्यते ।' (तै० उ० २ । ७) अर्थात् 'यह सब पहले 'असत्' ही था, उसीसे सत् उत्पन्न हुआ; उसने स्वयं ही अपनेको इस रूपमें बनाया, इसलिये उसे 'सुकृत' कहते हैं।' इस श्रुतिमे जो यह बात कही गयी है कि 'पहले असत् ही था' उसका अभिप्राय यह नहीं है कि यह जगत् प्रकट होनेके पहले नहीं था, क्योकि इसके बाद 'आसीत्' पदसे उसका होना कहा है। फिर उससे सत्‌की उत्पत्ति बतलायी है। तत्पश्चात् यह कहा है कि उसने स्वयं ही अपनेको इस रूपमे प्रकट किया है। अतः यहाँ यह समझना चाहिये कि धर्मान्तरकी अपेक्षासे उसको 'असत्' कहा है। अर्थात् प्रकट होनेसे पहले जो अप्रकट रूपमे विद्यमान रहना धर्मान्तर है, इसीको 'असत्' नामसे कहा गया है, उसकी अविद्यमानता बतानेके लिये नहीं। तात्पर्य यह कि उत्पत्तिसे पूर्व यह जगत् असत्—अप्रकट था। फिर उससे सत्की उत्पत्ति हुई— अर्थात् अप्रकट जगत् अपने अप्राकट्यरूप धर्मको त्यागकर प्राकट्यरूप धर्मसे युक्त हुआ—अप्रकटसे प्रकट हो गया। छान्दोग्योपनिषद्मे इस बातको स्पष्ट रूपसे समझाया है। वहाँ श्रुतिका वर्णन इस प्रकार है—'तद्वैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत ।' (६।२।१) अर्थात् 'कोई- कोई कहते हैं, यह जगत् पहले 'असत्' ही था, अकेला वही था, दूसरा कोई नहीं, फिर उस 'असत्' से 'सत्' उत्पन्न हुआ।' इतना कहकर श्रुति स्वयं ही अभावके भ्रमका निवारण करती हुई कहती है—'कुतस्तु खलु सोम्यैवꣳ स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति ।' (६।२।२) 'किन्तु हे सोम्य ! ऐसा होना कैसे संभव है, असत्से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है।' तात्पर्य यह है कि अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसलिये 'सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीत् ।' (६।२।२) 'यह सब पहले सत् ही था' यह श्रुतिने निश्चय किया है। इस प्रकार वाक्यशेषसे सत्कार्यवादकी ही सिद्धि होती है। सम्बन्ध—पुनः इसी बातको दृढ करते है— युक्तेः शब्दान्तराच्च ॥ २ । १ । १८ ॥ युक्तेः=युक्तिसे; च=तथा; शब्दान्तरात्=दूसरे शब्दोसे भी ( यही बात सिद्ध होती है ) । वे० द० ८—

प्रकरण आरम्भ किया जाता है—

११४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—जो वस्तु वास्तवमे नहीं होती, उसका उत्पन्न होना भी नहीं देखा जाता, जैसे आकाशमे फूल उगना और खरगोशके सींग होना आजतक किसीने नहीं देखा है। इस युक्तिसे तथा बृहदारण्यक आदिमे जो उसके लिये अव्याकृत आदि शब्द प्रयुक्त है, उन शब्दोसे भी यही बात सिद्ध होती है कि 'यह जगत् उत्पन्न होनेसे पहले भी 'सत्' ही था।' सम्बन्ध—अब पुनः उसी बातको कपडेके दृष्टान्तसे सिद्ध करते हैं— पटवच्च ॥ २ । १ । १९ ॥ पटवत्=सूतमे वस्त्रकी भाँति; च=भी ( ब्रह्ममें यह जगत् पहलेसे ही स्थित है )। व्याख्या—जबतक कपड़ा शक्तिरूपसे सूतमे अप्रकट रहता है, तबतक वह नहीं दीखता, वही जब बुननेवालेके द्वारा बुन लिये जानेपर कपड़ेके रूपमे प्रकट हो जाता है, तब अपने रूपमे दीखने लगता है। प्रकट होनेसे पहले और प्रकट होनेके बाद दोनो ही अवस्थाओमे वस्त्र अपने कारणमे विद्यमान है और उससे अभिन्न भी है—इसी प्रकार जगत्‌को भी समझ लेना चाहिये। वह उत्पत्तिसे पहले भी ब्रह्ममे स्थित है और उत्पन्न होनेके बाद भी उससे पृथक् नहीं हुआ है। सम्बन्ध—इसी बातको प्राण आदिके दृष्टान्तसे समझाते हैं— यथा च प्राणादि ॥ २ । १ । २० ॥ च=तथा; यथा=जैसे; प्राणादि=प्राण और इन्द्रियाँ ( स्थूल शरीरसे बाहर निकलनेपर नहीं दीखतीं तो भी उनकी सत्ता अवश्य रहती है, उसी प्रकार प्रलयकालमे भी अव्यक्तरूपसे जगत्‌की स्थिति अवश्य है )। व्याख्या—जैसे मृत्युकालमे प्राण और इन्द्रिय आदि जीवात्माके साथ-साथ शरीरसे बाहर अन्यत्र चले जाते हैं, तब उनके स्वरूपकी उपलब्धि नहीं होती, तथापि उनकी सत्ता अवश्यं है। उसी प्रकार प्रलयकालमे इस जगत्‌की अप्रकट अवस्था उपलब्ध न होनेपर भी इसकी कारण-रूपमे सत्ता अवश्य है, ऐसा समझना चाहिये। सम्बन्ध—ब्रह्मको जगत्‌का कारण और जगत्‌की उसके साथ अनन्यता माननेमें दूसरे प्रकारकी शङ्का उठाकर उसका निराकरण करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—

सूत्र १९-२२ ] अध्याय २ ११५

सूत्र १९-२२ ] अध्याय २ ११५

इतरव्यपदेशाद्धिताकरणादिदोषप्रसक्तिः ॥ २ । १ । २१ ॥ इतरव्यपदेशात्=ब्रह्म ही जीवरूपसे उत्पन्न होता है, ऐसा कहनेसे; हिताकरणादिदोषप्रसक्तिः=( ब्रह्ममे ) अपना हित न करने या अहित करने आदिका दोष आ सकता है । व्याख्या—श्रुतिमे कहा है कि 'तत्त्वमसि श्वेतकेतो' ( छा० उ० ६ । ८ । ७ ) —'हे श्वेतकेतु ! तू वही है।' 'अयमात्मा ब्रह्म' ( बृह० उ० २ । ५ । १९ )— 'यह आत्मा ब्रह्म है ।' तथा 'सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत्' ( छा० उ० ६ । ३ । ३ )—अर्थात् 'उस देवता ( ब्रह्म ), ने तेज आदि तत्त्वसे निर्मित शरीरमे इस जीवात्मारूपसे प्रवेश करके नाम- रूपोंको प्रकट किया।' इसके सिवा यह भी कहा गया है कि 'त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी' ( श्वेता० ४ । ३ )—'तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू ही कुमार और कुमारी है।' इत्यादि । इस वर्णनसे स्पष्ट है कि ब्रह्म स्वयं ही जीवरूपसे उत्पन्न हुआ है। इससे ब्रह्ममें अपना हित न करने अथवा अहित करनेका दोष आता है, जो उचित नहीं है; क्योकि जगत्‌मे ऐसा कोई भी प्राणी नहीं देखा जाता जो कि समर्थ होकर भी दुःख भोगता रहे और अपना हित न करे। यदि वह स्वयं ही जीव बनकर दुःख भोग रहा है, तब तो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका इस प्रकार अपना हित न करना और अहित करना अर्थात् अपनेको जन्म-मरणके चक्करमे डाले रहना आदि अनेक दोष संघटित होने लगेंगे, जो कि सर्वथा अयुक्त हैं; अतः ब्रह्मको जगत्‌का कारण मानना उचित नहीं है। सम्बन्ध—अब उक्त शङ्काका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— अधिकं तु भेदनिर्देशात् ॥ २ । १ । २२ ॥ तु=किन्तु ( ब्रह्म जीव नहीं है, अपितु उससे ); अधिकम्=अधिक है; भेदनिर्देशात्=क्योंकि जीवात्मासे ब्रह्मका भेद बताया गया है । व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्मे जनक और याज्ञवल्क्यके संवादका वर्णन है। वहाँ सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि आदि दैवी ज्योतियोका तथा वाणी आदि आध्यात्मिक ज्योतियोंका वर्णन करनेके पश्चात् इनके अभावमे 'आत्मा' को 'ज्योति'

११६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ अर्थात् प्रकाशक बतलाया है। (बृ० उ० ४ । ३ । ४-६) फिर उस आत्माका स्वरूप पूछे जानेपर विज्ञानमय जीवको आत्मा बताया। (बृ० उ० ४। ३। ७) तदनन्तर जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्ति आदि अवस्थाओके भेदका वर्णन करते हुए कहा है कि 'यह जीव सुषुप्तिकालमें बाहर-भीतरके ज्ञानसे शून्य होकर परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होता है।' (बृ० उ० ४ । ३ । २१) तत्पश्चात् मरणकालकी स्थितिका निरूपण करते हुए बताया है कि 'उस परब्रह्मसे अधिष्ठित हुआ यह एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जाता है।' (बृ० उ० ४ । ३ । ३५) इस वर्णनसे जीव और ब्रह्मका भेद स्पष्ट हो जाता है। इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्मे जो यह कहा है कि 'अनेन जीवेनात्माननुप्रविश्य' इत्यादि; इसका अर्थ जीवरूपसे ब्रह्मका प्रवेश करना नहीं, अपितु जीवके सहित ब्रह्मका प्रवेश करना है। ऐसा माननेसे ही श्वेताश्वतरोपनिषद् (४। ६) मे जो जीव और ईश्वरको एक ही शरीररूप वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षियोकी भाँति बताया गया है, वह सङ्गत होता है। (एवं) कठोपनिषद्मे जो द्विवचनका प्रयोग करके हृदयरूपी गुहामे प्रविष्ट दो तत्त्वो (जीवात्मा और परमात्मा) का वर्णन किया गया है। श्वेताश्व० (१।९) मे जो सर्वज्ञ और अल्पज्ञ विशेषण देकर दो अजन्मा आत्माओं (जीव और ईश्वर) का प्रतिपादन हुआ है तथा श्रुतिमे जो परब्रह्म परमेश्वरको प्रकृति एवं जीवात्मा दोनोपर शासन करनेवाला कहा गया है, इन सब वर्णनोकी सङ्गति भी जीव और ब्रह्ममे भेद माननेपर ही हो सकती है। अन्तर्यामि-ब्राह्मणमे तो स्पष्ट शब्दोमे जीवात्माको ब्रह्मका शरीर कहा गया है (बृ० उ० ३। ७। २२)। मैत्रेयी ब्राह्मण (बृ० उ० २ । ४ । ५) में परमात्माको जानने तथा ध्यान करने योग्य बताया है। इस प्रकार वेदमे जीवात्मा और परमात्माके भेदका वर्णन होनेसे यही सिद्ध होता है कि वह जगत्का कर्ता, धर्ता और सहर्ता परमेश्वर जीव नहीं; किन्तु उससे अधिक अर्थात् जीवके स्वामी है। 'तत्त्वमसि' 'अयमात्मा ब्रह्म' इत्यादि वाक्योद्वारा जो जीवको ब्रह्मरूप बताया गया है, वह पूर्ववर्णित कारण और कार्यकी अनन्यताको लेकर है। परमेश्वर कारण है और जड-चेतनात्मक जगत् उनका कार्य है। कारणसे कार्य अभिन्न होता है, क्योंकि वह उसकी ही शक्तिका विस्तार है। इसी दृष्टिसे जीव भी परमात्मासे अभिन्न है। फिर भी उनमे स्वरूपगत भेद तो है ही। जीव अल्पज्ञ है, ब्रह्म सर्वज्ञ। जीव ईश्वरके अधीन है, परमात्मा सबके शासक और स्वामी है। अतः जीव और ब्रह्मका अत्यन्त

सूत्र २३-२४ ] अध्याय २ ११७

सूत्र २३-२४ ] अध्याय २ ११७ अभेद नहीं सिद्ध होता । जिस प्रकार कार्यरूप जड प्रपञ्चकी कारणरूप ब्रह्मसे अभिन्नता होते हुए भी भेद प्रत्यक्ष है । उसी प्रकार जीवात्माका भी ब्रह्मसे भेद है । ब्रह्म नित्यमुक्त है; अतः अपना अहित करना—आवागमनके चक्रमे अपने- को डाले रहना आदि दोष उसपर नहीं लगाये जा सकते । सम्बन्ध—इसी बातको दृढ करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ॥ २ । १ । २३ ॥ च=तथा; अश्मादिवत्=(जड) पत्थर आदिकी भाँति, (अल्पज्ञ) जीवात्मा भी ब्रह्मसे भिन्न है, इसलिये; तदनुपपत्तिः=जीवात्मा और परमात्माका अत्यन्त अभेद नहीं सिद्ध होता । व्याख्या—जिस प्रकार परमेश्वर चेतन, ज्ञानस्वरूप, आनन्दमय तथा सबके रचयिता होनेके कारण अपनी अपरा प्रकृतिके विस्ताररूप पत्थर, काठ, लोहा और सुवर्ण आदि निर्जीव जड पदार्थोंसे भिन्न हैं, केवल कारणरूपसे उन वस्तुओंमें अनुगत होनेके कारण ही उनसे अभिन्न कहे जाते हैं, उसी प्रकार अपनी परा प्रकृतिके विस्तारभूत जीवसमुदायसे भी वे भिन्न ही हैं; क्योंकि जीव अल्पज्ञ एवं सुख-दुःख आदिका भोक्ता है और परमात्मा सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वनियन्ता तथा सुख-दुःखसे परे है । कारण और कार्यकी अनन्यताको लेकर ही जीवमात्र परमेश्वरसे अभिन्न बतलाये जाते हैं । इसलिये ब्रह्ममे यह दोष नहीं आता कि 'वह अपना अहित करता है।' वह हित-अहितसे ऊपर है । सबका हित उसीसे होता है । सम्बन्ध—यहाँतक सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् परमेश्वरको समस्त जगत्का कारण होते हुए भी सबसे विलक्षण तथा सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया गया । उसमें प्रतीत होनेवाले दोषोंका भी भलीभाँति निराकरण किया गया । अब उस सत्यसंकल्प परमेश्वरका बिना किसीकी सहायता और परिश्रमके केवल संकल्पमात्रसे ही विचित्र जगत्की रचना कर देना उन्हींके अनुरूप है, यह सिद्ध करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि ॥ २ । १ । २४ ॥ चेत्=यदि कहो; उपसंहारदर्शनात्=(लोकमे घट आदि बनानेके लिये)

११८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ साधन-सामग्रीका संग्रह देखा जाता है, (किंतु ब्रह्मके पास कोई साधन नहीं है) इसलिये; न=ब्रह्म जगत्‌का कर्ता नहीं है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; हि=क्योंकि; क्षीरवत्=दूधकी भाँति (ब्रह्मको अन्य साधनोंकी अपेक्षा नहीं है)। व्याख्या—यदि कहो कि लोकमें घड़ा, वस्त्र आदि बनानेके लिये सक्रिय कार्य- कर्ताका होना तथा मिट्टी, दण्ड, चाक और सूत-करघा आदि साधनोंका संग्रह आवश्यक देखा जाता है; उन साधन-सामग्रियोंके बिना कोई भी कार्य होता नहीं दिखायी देता है। परंतु ब्रह्मको एकमात्र, अद्वितीय, निराकार, निष्क्रिय आदि कहा गया है, उसके पास कोई भी साधन-सामग्री नहीं है; इसलिये वह इस विचित्र जगत्‌की सृष्टिका कार्य नहीं कर सकता तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योकि जैसे दूध अपनी सहज शक्तिसे, किसी बाह्य साधनकी सहायता लिये बिना ही दहीरूपमे परिणत हो जाता है, उसी प्रकार परमात्मा भी अपनी स्वाभाविक शक्तिसे जगत्‌का स्वरूप धारण कर लेता है। जैसे मकड़ीको जाला बनानेके लिये किसी अन्य साधनकी अपेक्षा नहीं होती, उसी प्रकार परब्रह्म भी किसी अन्य साधनका सहारा लिये बिना अपनी अचिन्त्य शक्तिसे ही जगत्‌की रचना करता है। श्रुति परमेश्वरकी उस अचिन्त्य शक्तिका वर्णन इस प्रकार करती है—‘उस परमात्माको किसी साधनकी आवश्यकता नहीं है, उसके समान और उससे बढ़कर भी कोई नहीं देखा जाता है। उसकी ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक पराशक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती है।’ (श्वेता० ६।८) सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि ‘दूध-जल आदि जड वस्तुओंमें तो इस प्रकारका परिणाम होना सम्भव है, क्योंकि उसमें सङ्कल्पपूर्वक विचित्र रचना करनेकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती; परंतु ब्रह्म तो ईक्षण (संकल्प या विचार) पूर्वक जगत्‌की रचना करता है, अतः उसके लिये दूधका दृष्टान्त देना ठीक नहीं है। जो लोग सोच-विचारकर कार्य करनेवाले हैं, ऐसे लोगोंको साधन- सामग्रीकी आवश्यकता होती ही है। ब्रह्म अद्वितीय होनेके कारण साधनशून्य है, इसलिये वह जगत्‌का कर्ता कैसे हो सकता है?’ इसपर कहते हैं— देवादिवदपि लोके ॥ २ । १ । २५ ॥

सूत्र २५-२६ ] अध्याय २ ११९

सूत्र २५-२६ ] अध्याय २ ११९ लोके=लोकमे; देवादिवत्=देवता आदिकी भाँति; अपि=( बिना उपकरण- के ) भी; ( कार्य करनेकी शक्ति देखी जाती है ) । व्याख्या—जैसे लोकमे देवता और योगी आदि बिना किसी उपकरणकी सहायताके अपनी अद्भुत शक्तिके द्वारा ही बहुत-से शरीर आदिकी रचना कर लेते हैं; बिना किसी साधन-सामग्रीके संकल्पमात्रसे मनोवाञ्छित विचित्र पदार्थोंको प्रकट कर लेते हैं* उसी प्रकार अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न परमेश्वर अपने सङ्कल्प- मात्रसे यदि जड-चेतनके समुदायरूप विचित्र जगत्की रचना कर दे या स्वयं उसके रूपमे प्रकट हो जाय तो क्या आश्चर्य है। साधारण मकड़ी भी अपनी ही शक्तिसे अन्य साधनोके बिना ही जाला बना लेती है, तब सर्वशक्तिमान् परमेश्वर- को इस जगत्‌का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण माननेमे क्या आपत्ति हो सकती है। सम्बन्ध—उपर्युक्त बातको दृढ करनेके लिये शङ्का उपस्थित करते हैं— कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा ॥ २ । १ । २६ ॥ कृत्स्नप्रसक्तिः=( ब्रह्मको जगत्‌का कारण माननेपर ) वह पूर्णरूपसे जगत्- के रूपमे परिणत हो गया, ऐसा माननेका दोष उपस्थित होगा, वा=अथवा; निरवयवत्वशब्दकोपः=उसको अवयवरहित बतानेवाले श्रुतिके शब्दोसे विरोध होगा। व्याख्या—पूर्वपक्षका कहना है कि यदि ब्रह्मको जगत्‌का कारण माना जायगा तो उसमे दो दोष आवेगे। एक तो यह कि ब्रह्म अवयवरहित होनेके कारण अपने सम्पूर्ण रूपसे ही जगत्‌के आकारमे परिणत हो गया, ऐसा मानना पड़ेगा, फिर जगत्‌से भिन्न ब्रह्मनामकी कोई वस्तु नहीं रही। यदि ब्रह्म सावयव होता तो ऐसा समझते कि उसके शरीरका एक अंश विकृत होकर जगद्रूपमे परिणत हो गया और शेष अंश ब्रह्मरूपमे ही स्थित है, परंतु वह अवयवयुक्त तो है नहीं; क्योकि श्रुति 'उसे निष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निरवद्य और निरञ्जन बताती है,† दिव्य और अमूर्त आदि विशेषणोसे विभूषित करती है‡। ऐसी दशा- मे पूर्णत ब्रह्मका परिणाम मान लेनेपर उसके श्रवण, मनन और निदिध्यासन

  • देखिये वाल्मीकिरामायण तथा रामचरितमानसमे भरद्वाजजीके द्वारा भरतके आतिथ्यसत्कारका प्रसङ्ग । † निष्क्रियं निष्कलं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् । ( श्वेता० ६ । १९ ) ‡ दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । ( मु० उ० २ । १ । २ )

पादन किया है । (देखिये श्वेताश्वतर ६। १६—१९ तथा मुण्डक

१२० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ आदिका उपदेश व्यर्थ होगा। और यदि इस दोषसे बचनेके लिये ब्रह्मको सावयव मान लिया जाय तब तो उसे 'अवयवरहित अजन्मा' आदि बतानेवाले श्रुतिके शब्दोंसे स्पष्ट ही विरोध आता है; सावयव होनेपर वह नित्य और सनातन भी नहीं रह सकेगा; इसलिये ब्रह्मको जगत्का कारण मानना युक्तिसंगत नहीं है। सम्बन्ध-इस शङ्काके उत्तरमें कहते हैं— श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात् ॥ २ । १ । २७ ॥ तु=किंतु (यह दोष नहीं आता क्योंकि); श्रुतेः=श्रुतिसे (यह सिद्ध है कि ब्रह्म जगत्का कारण होता हुआ भी निर्विकाररूपसे स्थित है); शब्द- मूलत्वात्=ब्रह्मका स्वरूप कैसा है ? इसमे वेद ही प्रमाण है (इसलिये वेद जैसा वर्णन करता है, वैसा ही उसका स्वरूप मानना चाहिये)। व्याख्या—पूर्वपक्षीने जो दोष उपस्थित किये है, वे सिद्धान्तपक्षपर लागू नहीं होते; क्योंकि वह श्रुतिपर आधारित है । श्रुतिने जिस प्रकार ब्रह्मसे जगत्- की उत्पत्ति बतायी है, उसी प्रकार निर्विकार रूपसे ब्रह्मकी स्थितिका भी प्रति- पादन किया है । (देखिये श्वेताश्वतर ६। १६—१९ तथा मुण्डक १। १। ९) अतः श्रुतिप्रमाणसे यही मानना ठीक है कि ब्रह्म जगत्का कारण होता हुआ भी निर्विकार रूपसे नित्य स्थित है। वह अवयवरहित और निष्क्रिय होते हुए ही जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है। उस सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके लिये कोई बात असम्भव नहीं है। वह मन-इन्द्रिय आदिसे अतीत है, इनका विषय नहीं है। उसकी सिद्धि कोरे तर्क और युक्तिसे नहीं होती। उसके लिये तो वेद ही सर्वोपरि निर्भ्रान्त प्रमाण है। वेदने उसका स्वरूप जैसा बताया है, वैसा ही मानना चाहिये। वेद उस परब्रह्मको अवयवरहित बतानेके साथ ही यह भी कहता है कि 'वह सम्पूर्णरूपेण जगत्के आकारमें परिणत नहीं होता।' यह समस्त ब्रह्माण्ड ब्रह्मके एक पादमें स्थित है, शेष अमृतस्वरूप तीन पाद परमधाममें स्थित हैं,*

  • तावानस्य महिमा ततो ज्यायाश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (छा० उ० ३ । १२ । ६)

सूत्र २७-२८ ] अध्याय २ १२१

सूत्र २७-२८ ] अध्याय २ १२१ ऐसा श्रुतिने स्पष्ट शब्दोमे वर्णन किया है। अतः ब्रह्मको जगत्‌का कारण माननेमे पूर्वोक्त दोनो ही दोष नहीं प्राप्त होते हैं। सम्बन्ध—इसी बातको युक्तिसे भी दृढ़ करते हैं— आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि ॥ २ । १ । २८ ॥ च=इसके सिवा ( युक्तिसे भी इसमे कोई विरोध नहीं है ); हि=क्योंकि; आत्मनि=( अवयवरहित ) जीवात्मामे; च=भी; एवम्=ऐसी; विचित्राः=विचित्र सृष्टियाँ ( देखी जाती हैं ) । व्याख्या—पूर्व सूत्रमें ब्रह्मके विषयमे केवल श्रुति-प्रमाणकी गति बतायी गयी, सो तो है ही, उसके सिवा, विचार करनेपर युक्तिसे भी यह बात समझने आ सकती है कि अवयवरहित परब्रह्मसे इस विचित्र जगत्‌का उत्पन्न होना असंगत नहीं है; क्योंकि स्वप्नावस्थामे इस अवयवरहित निर्विकार जीवात्मासे नाना प्रकारकी विचित्र सृष्टि होती देखी जाती है; यह सबके अनुभवकी बात है । योगी लोग भी स्वयं अपने स्वरूपसे अविकृत रहते हुए ही अनेक प्रकारकी रचना करते हुए देखे जाते हैं। महर्षि विश्वामित्र, च्यवन, भरद्वाज, वसिष्ठ तथा उनकी धेनु नन्दिनी आदिमे अद्भुत सृष्टि-रचनाशक्तिका वर्णन इतिहास-पुराणोमे जगह-जगह पाया जाता है। जब ऋषि-मुनि आदि विशिष्ट जीवकोटिके लोग भी स्वरूपसे अविकृत रहकर विचित्र सृष्टि-निर्माणमे समर्थ हो सकते हैं, तब परब्रह्ममें ऐसी शक्तिका होना तो कोई आश्चर्यकी बात ही नहीं है। विष्णुपुराणमे प्रश्न और उत्तरके द्वारा इस बातको बहुत अच्छी तरह समझाया गया है ।*

  • निर्गुणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याप्यमलात्मनः । कथं सर्गादिकर्तृत्वं ब्रह्मणोऽभ्युपगम्यते ॥ ( वि० पु० १ । ३ । १ ) मैत्रेय पूछते हैं, 'मुने ! जो ब्रह्म निर्गुण, अप्रमेय, शुद्ध और निर्मलात्मा है, उसे सृष्टि आदिका कर्ता कैसे माना जा सकता है ?' शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः । यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः । भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता ॥ ( वि० पु० १ । ३ । २-३ ) पराशर मुनि उत्तर देते हैं—'तपस्वियोंमे श्रेष्ठ मैत्रेय ! समस्त भावपदार्थोंकी शक्तियाँ अचिन्त्य ज्ञानकी विषय हैं, ( साधारण मनुष्य उनको नहीं समझ सकता ) अग्निकी उष्णता-शक्तिकी भाँति ब्रह्मकी भी सर्गादिरचना-रूप शक्तियाँ स्वाभाविक हैं।'