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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

सृष्ट्यादिक्रमः १९ व्यक्त आत्मावाले विष्णु तीन शक्तियों से युक्त होने से अनन्त शक्तिवाले कहे जाते हैं। तीनों शक्तियों में श्री शक्ति सत्त्वगुण प्रधान, भू शक्ति रजोगुण प्रधान है।।११।। शक्तिस्तृतीया प्रोक्ता नीलाख्या ध्वान्तरूपिणी। वासुदेवश्चतुर्थोऽभूच्छ्रीशक्त्या प्रेरितो यदा।।१२।। तीसरी नील शक्ति तमोगुण प्रधान है। इनसे भिन्न श्रीशक्ति से प्रेरित चौथे वासुदेव हैं।।१२।। सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नोऽनिरुद्ध इति मूर्त्तिधृक्। तमःशक्त्यान्वितो विष्णुर्देवः सङ्कर्षणाभिधः।।१३।। वे संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध नामक मूर्ति को धारण करते हैं, तमः शक्ति से युक्त विष्णु संकर्षण नाम से।।१३।। प्रद्युम्नो रजसा शक्त्याऽनिरुद्धः सत्त्वया युतः। महान्सङ्कर्षणाज्जातः प्रद्युम्नादहंकृतिः।।१४।। रज शक्ति से प्रद्युम्न, सत्त्व शक्ति से युक्त अनिरुद्ध होते हैं। संकर्षण से महत्तत्त्व की उत्पत्ति और प्रद्युम्न से अहंकार की उत्पत्ति हुई।।१४।। अहङ्कारात्स्वयं जातो ब्रह्माहङ्कारमूर्त्तिधृक्। सर्वेषु सर्वशक्तिश्च स्वशक्त्याधिकया युतः।।१५।। अहंकार से अहंकार की मूर्त्ति को धारण किये हुए ब्रह्मा हुए। सभी लोगों में सभी शक्तियाँ हैं किन्तु जिस शक्ति से जो उत्पन्न हुए हैं वह शक्ति उनमें अधिक है।।१५।। अहङ्कारस्त्रिधा भूत्वा सर्वमेतद्विस्तराद्। सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्चेदहंकृतिः।।१६।। अहंकार भी सात्त्विक, राजस, तामस क्रम से वैकारिक, तैजस और तामस नाम से तीन प्रकार के हैं।।१६।। देवा वैकारिकाज्जातास्तैजसादिन्द्रियाणि च। तामसाश्चैव भूतानि खादीनि स्वशक्तिभिः।।१७।। वैकारिक से देवता, तैजस से इन्द्रिय और तामस से पंचमहाभूतों की उत्पत्ति हुई है। ये सभी अपनी-अपनी शक्ति से उत्पन्न हैं।।१७।। श्रीशक्त्या सहितो विष्णुः सदापाति जगत्त्रयम्। भूशक्त्या सृजते विष्णुर्नीलशक्त्या युतोऽत्ति हि।।१८।।

२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् श्री शक्ति से युक्त होकर विष्णु (वासुदेव) तीनों लोकों का पालन करते हैं, भू शक्ति से (विष्णु) ब्रह्मा जगत् की सृष्टि करते हैं और नील शक्तिसम्पन्न शिव तीनों लोकों का लय करते हैं ।।१८।। सर्वेषु चैव जीवेषु परमात्मा विराजते । सर्वं हि तदिदं ब्रह्मन् स्थितं हि परमात्मनि ।।१९।। हे ब्रह्मन् ! सभी जीवों में परमात्मा स्थित हैं और यह समस्त जगत् परमात्मा में स्थित है ।।१९।। सर्वेषु चैव जीवेषु स्थितं ह्यंशद्वयं क्वचित् । जीवांशमधिकं तद्वैत्परमात्मांशकः किल ।।२०।। सभी जीवों में दो अंश अधिक होते हैं, किसी में जीवांश अधिक होता है और किसी में परमात्मांश अधिक होता है ।।२०।। सूर्यादयो ग्रहाः सर्वे ब्रह्मकामद्विषादयः । एते चान्ये च बहवः परमात्मांशकाधिकाः ।।२१।। सूर्यादि ग्रहों में, ब्रह्मा, शिव आदि देवता तथा अन्य अवतारों में परमात्मांश अधिक होता हैं ।।२१।। शक्तयश्च तथैतेषामधिकांशाः श्रियादयः । अन्यासु स्वस्वशक्तीषु ज्ञेया जीवांशकाधिकाः ।।२२।। इनकी जो शक्तियाँ (लक्ष्मी आदि) हैं इनमें भी परमात्मांश अधिक होता है। अन्य देवता और उनकी शक्तियों में जीवांश अधिक होता 'है।।२२।। अवतारवादः । पराशर जी के उत्तर से शंकित हो मैत्रेय जी ने पुनः प्रश्न किया। मैत्रेय उवाच- रामकृष्णादयो ये च ह्यवतारा रमापतेः । तेऽपि जीवांशसंयुक्ताः किं वा ब्रूहि मुनीश्वर ।।२३।। मैत्रेय जी बोले- हे मुनीश्वर ! राम, कृष्ण आदि जो विष्णु के अवतार हैं क्या वे भी जीवांश से युक्त हैं ।।२३।। पराशर उवाच- रामः कृष्णश्च भो विप्र नृसिंहः शूकरस्तथा । इति पूर्णावतारश्च ह्यन्ये जीवांशकान्विताः ।।२४।।

सृष्ट्यादिक्रमः २१ पराशर जी बोले- हे विप्र! राम, कृष्ण, नृसिंह और शूकर ये पूर्ण अवतार हैं। अन्य अवतार जीवांश से युक्त हैं।। २४ ।। अवताराण्यनेकानि ह्यजस्य परमात्मनः। जीवानां कर्मफलदो ग्रहरूपी जनार्दनः।। २५ ।। अजन्मा परमात्मा के अनेक अवतार हैं। जीवों के कर्मानुसार फल देने के लिए ग्रहरूप जनार्दन भगवान् का अवतार है।। २५ ।। दैत्यानां बलनाशाय देवानां बलवृद्धये। धर्मसंस्थापनार्थाय ग्रहाज्जाताः शुभाः क्रमात् ।। २६ ।। दैत्यों के बल को नाश करने के लिए और देवताओं का बल बढ़ाने के लिये तथा धर्म को स्थापित करने के लिये ग्रहों से शुभद अवतार हुए हैं।। २६ ।। रामोऽवतारः सूर्यस्य चन्द्रस्य यदुनायकः। नृसिंहो भूमिपुत्रस्य बुद्धः सोमसुतस्य च।। २७ ।। जैसे सूर्य का रामावतार, चन्द्रमा का कृष्णावतार, भौम का नृसिंहावतार और बुध का बौद्धावतार है।। २७ ।। वामनो विबुधेज्यस्य भार्गवो भार्गवस्य च। कूर्मो भास्करपुत्रस्य सैंहिकेयस्य सूकरः।। २८ ।। बृहस्पति का वामन अवतार, शुक्र का भार्गव (परशुराम) अवतार, शनि का कूर्म अवतार, राहु का सूकर अवतार है।।२८।। केतोर्मीनावतारश्च ये चान्ये तेऽपि खेटजाः। परमात्मांशमधिकं येषु ते च वै खेचराभिधाः।। २९ ।। केतु का मत्स्यावतार हुआ है, अन्य अवतार भी ग्रहों से ही हुए हैं। जिनमें परमात्मांश अधिक है वे खेचर यानि देव कहे जाते हैं।। २९ ।। जीवांशमधिकं येषु जीवास्ते वै प्रकीर्त्तिताः। सूर्यादिभ्यो ग्रहेभ्यश्च परमात्मांशनिःसृताः ।। ३० ।। रामकृष्णादयः सर्वे ह्यवतारा भवन्ति वै। तत्रैव ते विलीयन्ते पुनः कार्यान्तरे सदा ।। ३१ ।। जिनमें जीवांश अधिक हैं वे जीव कहे जाते हैं। सूर्य आदि ग्रहों से परमात्मांश निकल कर ही राम, कृष्ण आदि अवतार हुए हैं। वे अपने- अपने कार्यों को करके पुनः उन्हीं में लीन हो जाते हैं।। ३०-३१ ।।

२२ - बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् जीवांशनिःसृतास्तेषां तेभ्यो जाता नरादयः। तेऽपि तथैव लीयन्ते तेऽव्यक्ते समयान्ति हि।।३२।। उन्हीं (सूर्यादिग्रहों) में से जीवांश के निकलने से मनुष्य आदि जीवों की सृष्टि होती हैं वे भी इहलोक में अपने-अपने कार्यों को करके अन्त में उन्हीं में लीन हो जाते हैं। ये ग्रह भी प्रलय के समय अव्यक्त परमात्मा में लीन हो जाते हैं।।३२।। इदं ते कथितं विप्र स यस्मिन् वै भवेदिति । भूतान्यपि भविष्यन्ति तत्तत्सर्वज्ञतामियात् ।। ३३ ।। हे विप्र ! इस प्रकार से मैंने सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय जैसे होती है, हुई है और होगी उन सभी को तुम से कहा। इन सबको वही सर्वज्ञ (परमात्मांश पुरुष) ही जानता है।।३३।। विना तज्ज्योतिषं नान्यो ज्ञातुं शक्नोति कर्हिचित् । तस्मादवश्यमध्येयं ब्राह्मणैश्च विशेषतः।।३४।। इन सभी बातों को बिना ज्योतिषशास्त्र के कोई कभी भी नहीं जान सकता है। इसलिये इस शास्त्र का अध्ययन अवश्य करना चाहिए, विशेषकर ब्राह्मण को अवश्य करना चाहिए।।३४।। यो नरः शास्त्रमज्ञात्वा ज्योतिषं खलु निन्दति । रौरवं नरकं भुक्त्वा चान्धत्वं चान्यजन्मनि ।। ३५ ।। इति बृहत्पाराशरहोरायां पूर्वखंडे सृष्ट्यादिक्रमशास्त्रावतरणं नाम प्रथमोऽध्यायः ।।१।। जो मनुष्य इस शास्त्र को न जानते हुए ज्योतिषशास्त्र की निन्दा करता है, वह रौरवं नरक को भोगकर दूसरे जन्म में अन्धा होता है।।३५।। इति पाराशरहोरायां सुबोधिन्यां प्रथमोऽध्यायः ।।१।। अथ राशिप्रभेदाध्यायः मैत्रेय उवाच- यदव्यक्तात्मको विष्णुः कालरूपो जनार्दनः। तस्याङ्गानि निबोध त्वं क्रमान्मेषादि राशयः ।। १ ।। मैत्रेय जी बोले- जो व्यक्त (प्रकट रूप) विष्णु काल (समय) रूपी जनार्दन हैं, उनके अंगों का ज्ञान क्रम से मेषादि राशियों द्वारा बताइये ।। १ ।।

राशिप्रभेदाध्यायः २३ पराशर उवाच- अहोरात्र्याद्यन्तलोपाद्धोरेतिं प्रोच्यते बुधैः । तस्य हि ज्ञानमात्रेण जातकर्म फलं वदेत् ॥१२॥ पराशर जी बोले- अहोरात्र शब्द के आदिम वर्ण 'अ' और अन्तिम वर्ण 'त्र' का लोप हो जाने से होरा शब्द होता है, जिसका ज्ञान होने से जातक के शुभ-अशुभ फल का ज्ञान होता है॥१२॥ मेषो वृषश्च मिथुनः कर्कसिंहकुमारिकाः । तुलालिधनुषो नक्रकुम्भमीनास्ततः परम्॥३॥ मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धन, मकर, कुम्भ और मीन ये बारह राशियाँ हैं॥३॥ शीर्षाननौ तथा बाहू हृत्क्रोडकटिवस्तयः। गुह्योरुजानुयुग्मे वै युगले जङ्घके तथा॥४॥ जन्मलग्न से उक्त बारह राशियाँ क्रम से शिर, मुख, दोनों भुजायें, हृदय, पेट, कटि, बस्ति (नाभिलिंग के मध्यभाग को बस्ति कहते हैं), गुह्यस्थान (स्त्री-पुरुष के चिह्न), उरु, दोनों जानु, जंघे हैं॥४॥ चरणौ द्वौ तथा लग्नात् ज्ञेयाः शीर्षादयः क्रमात्। चरस्थिरद्विस्वभावाः क्रूराक्रूरौ नरस्त्रियौ ॥५॥ दोनों चरण कालपुरुष के अंग में हैं। मेषादि राशियों की क्रम से चर, स्थिर, द्विस्वभाव तथा क्रूर, शुभ और पुरुष स्त्री संज्ञायें हैं॥५॥ पित्तानिलस्त्रिधा त्वैक्यं श्लेष्मिकाश्च क्रियादयः। रक्तवर्णो बृहद्गात्रश्चतुष्पाद्रात्रिविक्रमी ॥६॥ पित्त, वायु, पित्त वायु कफ तीनों मिले हुए, और कफ प्रकृति है मेष राशि का लाल वर्ण, बड़ी शरीर, चार पैर, रात में बलवान् हैं॥६॥ अथ मेषराशिस্বরূপम्- पूर्ववासी नृपज्ञातिः शैलचारी रजोगुणी । पृष्ठोदयी पावकी च मेषराशिः कुजाधिपः ॥७॥ पूर्व दिशा, क्षत्रिय वर्ण, पर्वतीय प्रदेश में घुमनेवाली, रजोगुणी, पृष्ठोदयी अग्निराशि है और इसके स्वामी मंगल हैं॥७॥ अथ वृषराशिस্বরূপम्- श्वेतः शुक्राधिपो दीर्घः चतुष्पाच्छर्वरी बली। याम्येट् ग्राम्यो वणिग्भूमिः स्त्री पृष्ठोदयो वृषः॥८॥

२४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् वृष राशि का श्वेत (सफेद) वर्ण, लम्बी शरीर, चार पैर, रात्रिबली, दक्षिण दिशा, ग्रामवासी, वैश्यवर्ण, भूमिप्रिय, पृष्ठोदयी है और शुक्र इसके स्वामी हैं।।८।। अथ मिथुनराशिस्वरूपम्- शीर्षोदयी नृमिथुनं सगदं च सवीणकम्। प्रत्यक्स्वामी द्विपाद्रात्रिबली ग्राम्याग्रगोऽनिला।।९।। समगात्रो हरिद्वर्णो मिथुनाख्यो बुधाधिपः। मिथुन राशि शीर्षोदय, पुरुष-स्त्री, पुरुष गदा को लिए और स्त्री वीणा को लिए हुए, पश्चिम दिशा का स्वामी, द्विपद, रात्रिबली, ग्राम में रहनेवाला, वायु प्रकृति है।।९।। समान (चौखूटी) शरीर, हरे रंग की है और बुध इसके स्वामी हैं। अथ कर्कराशिस्वरूपम्- पाटलो वनचारी च ब्राह्मणो निशि वीर्यवान् ।।१०।। बहुपटुतरः स्थौल्यतनुः सत्त्वगुणी बली। पृष्ठोदयी कर्कराशिर्मृगाङ्कोऽधिपतिः स्मृतः।।११।। कर्क राशि का पाटल (थोड़ा लाल और सफेद मिला हुआ) वर्ण, वनचारी, ब्राह्मण वर्ण, रात में बली है।।१०।। अत्यन्त विद्वान्, स्थूल शरीर, जल में रहने वाली, पृष्ठोदयी राशि है और चन्द्रमा इसके स्वामी हैं।।११।। अथ सिंहराशिस्वरूपम्- सिंहः सूर्याधिपः सत्त्वी चतुष्पात्क्षत्रियो बली। शीर्षोदयी बृहद्गात्रः पाण्डुः पूर्वेद्युवीर्यवान् ।।१२।। सिंह राशि सतोगुणी, चतुष्पाद, क्षत्रिय वर्ण, बलवान्, शीर्षोदयी राशि, लम्बी शरीर, पांडुवर्ण, पूर्वदिशा का स्वामी, दिन में बली है और सूर्य इसके स्वामी हैं।।१२।। अथ कन्याराशिस्वरूपम्- पार्वतीयोथ कन्याख्या राशिर्दिनबलान्विता। शीर्षोदया च मध्याङ्गा द्विपाद्याम्यचरा स्मृता ।।१३।। कन्या राशि पर्वत में विशेष रुचिवाली, दिवाबली, शीर्षोदयराशि, मध्यम शरीर, द्विपद, दक्षिण दिशा में रहनेवाली, वैश्यवर्ण है।।१३।।

राशिप्रभेदाध्यायः २५ ससस्यदहना वैश्या चित्रवर्णा प्रभञ्जिनी। कुमारी तमसायुक्ता बालभावा बुधाधिपः॥१४॥ धान को भूजती हुई, चित्र वर्ण (छींट) के वस्त्र को पहने हुई कन्या तमोगुण से युक्त बालभाव वाली है और बुध इसके स्वामी हैं॥१४॥ अथ तुलाराशिस्वरूपम्- शीर्षोदयी द्युवीर्याढ्यस्तथा शूद्रो रजोगुणी । शुक्रोऽधिपो पश्चिमेशो तुलो मध्यतनुर्द्विपात्॥१५॥ तुलाराशि शीर्षोदयी, दिवाबली, शूद्रवर्ण, रजोगुणी, पश्चिम दिशा की स्वामी, मध्यम शरीरवाली है और शुक्र स्वामी हैं॥१५॥ अथ वृश्चिकराशिस्वरूपम्- शीर्षोदयोऽथ स्वल्पाङ्गो बहुपाद्ब्राह्मणो बली। सौम्यस्थो दिनवीर्याढ्यः पिशङ्गो जलभूचरः। रोमस्वाढ्योऽतितीक्ष्णाङ्गो वृश्चिकश्च कुजाधिपः॥१६॥ वृश्चिक राशि- शीर्षोदय राशि, छोटा शरीर, अनेक चरण, ब्राह्मण वर्ण, उत्तर दिशा में बली, दिवाबली, धुम्रवर्ण जलीय भूमि पर चलने वाली है॥१६॥ रोम से युक्त शरीर, अत्यन्त तीखे अंगोवाली है और भौम स्वामी हैं। अथ धनुराशिस्वरूपम्- अश्वजङ्घो त्वथ धनुर्गुरू स्वामी च सात्त्विकः॥१७॥ पिङ्गलो निशि वीर्याढ्यः पावकः क्षत्रियो द्विपाद्। आदावन्ते चतुष्पाद् समगात्रो धनुर्धरः॥१८॥ धन राशि को घोड़े का जंघा है, सात्त्विक राशि है॥१७॥ पिंगल वर्ण, रात्रिबली, अग्निराशि, क्षत्रिय वर्ण, पूर्वार्ध द्विपद और उत्तरार्ध चतुष्पद, समान शरीर, धनुष को लिये हुए है॥१८॥ पूर्वस्थो वसुधाचारी तेजवान्पृष्ठतोद्गमी। पूर्वदिशा का स्वामी, भूमि पर रहने वाली, तेजस्वी, पृष्ठोदयी है और गुरु इसके स्वामी हैं। अथ मकरराशिस्वरूपम्- मन्दाधिपस्तमी भौमी याम्येऽट् च निशि वीर्यवान्॥१९॥

  • पृष्ठोदयी बृहद्गात्रः मकरो जलभूचरः।

२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् आदौ चतुष्पादन्ते च द्विपदो जलगो मतः॥२०॥ मकर राशि तमोगुणी, भूतत्त्व, दक्षिण दिशा का स्वामी, रात्रिबली है॥१९॥ पृष्ठोदयी, बड़ा शरीर, जलीय भूमि में चलनेवाली, पूर्वार्ध चतुष्पद और उत्तरार्ध द्विपद, जल में रहने वाली है और शनि स्वामी हैं॥२०॥ अथ कुम्भराशिस्वरूपम्- कुम्भः कुम्भी नरो बभ्रुः वर्णमध्यतनुर्द्विपात्। द्युवीर्यो जलमध्यस्थो वातशीर्षोदयी तमः॥२१॥ शूद्रः पश्चिमदेशस्य स्वामी दैवाकरिः स्मृतः। कुम्भ राशि- घड़ा लिये हुए, पुरुष नेवले के रंग के जैसा (भूरा) वर्ण, मध्यम शरीर, द्विपद, दिवाबली, जल में रहने वाली (जलचर), वायु प्रकृति, शीर्षोदयी तम प्रकृति है॥२१॥ शूद्रवर्ण, पश्चिम देश वा दिशा का स्वामी है और शनि स्वामी हैं। अथ मीनराशिस्वरूपम्- मीनौ पुच्छास्य संलग्नौ मीनराशिर्दिवाबली॥२२॥ जली सत्त्वगुणाढ्यश्च स्वस्थो जलचरो द्विजः। अपदो मध्यदेही च सौम्यस्थो ह्युभयोदयी॥२३॥ मीनराशि- दो मछलियों में एक का मुख दूसरे की पूँछ में लगा हुआ स्वरूप, दिन में बली हैं॥२२॥। जलचर, सतोगुणी, ब्राह्मण वर्ण, चरण हीन, मध्यम शरीर, उत्तर दिशा का स्वामी, उभयोदयी है॥२३॥ सुराचार्याधिपश्चास्य राशीनां गदितं मया। त्रिंशद्भागात्मकः स्थूलसूक्ष्माकरफलाय च॥२४॥ गुरु स्वामी हैं। इस प्रकार मैंने ३० अंश के राशियों का स्वरूप कहा, इनके स्थूल और सूक्ष्म फल ग्रन्थों में कहे हुए हैं॥२४॥ इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां राशिस्वरूपाध्यायः द्वितीयः॥२॥ अथ ग्रहस्वरूपाध्यायः॥३॥ पराशर उवाच- कालात्मा च दिवानाथो मनः कुमुदबान्धवः। सत्त्वं कुजो विजानीयाद्बुधो वाणीप्रदायकः॥१॥

ग्रहस्वरूपाध्यायः २७ पराशरजी बोले- हे विप्र ! सूर्य कालपुरुष (उत्पन्न पुरुष) की आत्मा, चन्द्रमा मन, मंगल सत्त्व, बुध वाणी है ।।१।। देवेज्यो ज्ञानसुखदो भृगुवीर्यप्रदायकः। विचार्यतामिदं सर्वं छायासूनुश्च दुःखदः ।।२।। गुरु ज्ञान और सुख और शुक्र बल के तथा शनि दुःख के स्वामी हैं ।।२।। राजानौ भानुहिमगू नेता ज्ञेयो धरात्मजः। बुधो राजकुमारश्च सचिवौ गुरुभार्गवौ ।।३।। ग्रहों में सूर्य और चन्द्रमा राजा, मंगल नेता, बुध राजकुमार, गुरु और शुक्र मन्त्री हैं ।।३।। प्रेष्यको रविपुत्रश्च सेना स्वर्भानुपुच्छकौ। एवं क्रमेण वै विप्र ! सूर्यादीनां विचिन्तयेत् ।।४।। शनि दास और सेना राहु तथा केतु हैं। इस प्रकार सूर्यादि ग्रहों से विचार करना चाहिए ।।४।। रक्तश्यामो दिवाधीशो गौरगात्रो निशाकरः। अत्युच्चाङ्गो रक्तभौमो दुर्वाश्यामो बुधस्तथा ।।५।। हे द्विजश्रेष्ठ ! सूर्य का श्यामता लिये हुए रक्तवर्ण, चन्द्रमा का गौरवर्ण, मंगल का ऊँचा शरीर रक्तवर्ण, बुध का दूर्वा के समान श्यामवर्ण है ।।५।। गौरगात्रो गुरुर्ज्ञेयः शुक्रः श्यामस्तथैव च। कृष्णदेहो रवेः पुत्रो ज्ञायते द्विजसत्तम ।।६।। गुरु का गौरवर्ण, शुक्र का श्याम वर्ण और शनि का काला वर्ण है ।।६।। वह्न्यम्बुशिखिजा विष्णुविडौजशचिका द्विज । सूर्यादीनां खगानाञ्च नाथाः ज्ञेयां क्रमेण च ।।७।। सूर्य के अग्नि, चन्द्रमा के जल, भौम के स्वामि कार्त्तिक, बुध के विष्णु, गुरु के इन्द्र, शुक्र के इन्द्राणी और शनि के ब्रह्मा स्वामी हैं ।।७।। क्लीवौ द्वौ सौम्यसौरी च युवतीन्दुभृगुद्विज। नरा शेषाश्च विज्ञेया भानुभौमौ गुरुस्तथा ।।८।। बुध और शनि ये नपुंसक, चन्द्रमा और शुक्र स्त्रीग्रह और शेष सूर्य, भौम और गुरु ये पुरुषग्रह हैं ।।८।।

२८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अग्निभूमिनभस्तोयवायवः क्रमतो द्विज। भौमादीनां ग्रहाणां च तत्त्वाश्चामी प्रकीर्त्तिताः।।१९।। भौमादि ग्रहों में क्रम से अग्नि, भूमि, आकाश, जल, वायु ये तत्त्व हैं ।।१९।। गुरुशुक्रौ विप्रवर्णौ कुजार्कौ क्षत्रियौ द्विज। शशिसौम्यौ वैश्यवर्णौ शनिः शूद्रो द्विजोत्तम ।।२०।। गुरु-शुक्र का ब्राह्मण वर्ण, भौम-सूर्य का क्षत्रिय वर्ण, चन्द्रमा-बुध का वैश्य वर्ण और शनि का शूद्र वर्ण है।।२०।। चन्द्रसूर्यगुरुसौम्या भृग्वारशनयो द्विज!। सत्त्वं रजस्तम इति स्वभावो ज्ञायते क्रमात् ।।२१।। चन्द्र, सूर्य, गुरु इनका सतोगुणी स्वभाव, बुध-शुक्र का रजोगुणी स्वभाव और भौम-शनि का तमोगुणी स्वभाव है।।२१।। मधुपिङ्गलदृक्सूर्यश्चतुरस्रः शुचिर्द्विज। पित्तप्रकृतिको श्रीमान्पुमानल्पकचो द्विज ।।२२।। सूर्य- मधु के सदृश पीले नेत्रोंवाला, चौखूटी शरीर, स्वच्छ कान्ति वाला, पित्त प्रकृति, दर्शनीय, पुरुषग्रह, थोड़े बालों से युक्त स्वरूपवाला है।।१२।। बहु वातकफः प्राज्ञश्चन्द्रो वृत्ततनुर्द्विज!। शुभदृक् मधुवाक्यश्च चञ्चलो मदनातुरः ।।२३।। चन्द्रमा- वायु और कफ से युक्त प्रकृति, बुद्धिमान्, गोल शरीर, सुन्दर नेत्र, मीठे वचन बोलनेवाला, चंचल और कामी है।।२३।। क्रूररक्तेक्षणो भौमश्चपलोदारमूर्त्तिकः। पित्तप्रकृतिकः क्रोधी कृशमध्यतनुर्द्विज ।।२४।। भौम- क्रूर स्वभाव, रक्तवर्ण की दृष्टि, चपल, उदार स्वभाव, पित्त प्रकृति, क्रोधी, पतली मध्यम कद की शरीरवाला है।।२४।। वपुः श्रेष्ठो श्लिष्टवाक्य ह्यतिहास्यरुचिर्बुधः। पित्तवान्कफवान्विप्र मारुतप्रकृतिकस्तथा ।।२५।। बुध- अच्छी शरीर, तोतली बोली वाला, अत्यंत हँसी करनेवाला, पित्त- कफ-वायु से युक्त प्रकृतिवाला है।।२५।।

ग्रहस्वरूपाध्यायः २९ बृहद्गात्रो गुरुश्चैव पिङ्गलो मूर्धजेक्षणः। कफप्रकृतिको धीमान् सर्वशास्त्रविशारदः।।१६।। गुरु-लम्बी शरीर, पीले शिर के केश और दृष्टि वाला, कफ प्रकृति, बुद्धिमान्, सभी शास्त्रों का जाननेवाला है।।१६।। सुखी कान्तवपुः श्रेष्ठ सुलोचनो भृगोः सुतः। काव्यकर्त्ता कफाधिक्यानिलात्मा वक्रमूर्धजः।।१६।। शुक्र-सुन्दर शरीर, सुखी, अच्छे सुन्दर नेत्रोंवाला, काव्य (कविता) करनेवाला, कफ-वायुमिश्रित प्रकृति, टेढ़े शिर के बालों वाला है।।१७।। कृशदीर्घतनुः सौरिः पिङ्गदृष्ट्यनिलात्मकः। स्थूलदन्तोऽलसो पङ्गु खररोमकचो द्विज ! ।।१८।। शनि-दुर्बल लम्बी शरीर, पीले नेत्र, वायु प्रकृति, मोटे दाँत, आलसी, पंगु, रूखे रोम और बालों वोला है।।१८।। धूम्राकारो नीलतनुर्वनस्थोऽपि भयङ्करः। वातप्रकृतिको धीमान् स्वर्भानुः प्रतिमः शिखी।।१९।। राहु-धुएँ के सदृश वर्ण, नीले रंग की शरीर, जंगल में रहनेवाला, भयंकर, वायु प्रकृति और बुद्धिमान् है। केतु का भी स्वरूप राहु के समान ही है।।१९।। अस्थिरक्तस्तथा मज्जा त्वक्वसावीर्यस्नायवः। तासामीशा क्रमेणोक्ता ज्ञेयाः सूर्यादयो द्विजाः।।२०।। सूर्य आदि क्रम से अस्थि (हड्डी), रक्त, मज्जा, त्वक् (चर्म), वसा, वीर्य, स्नायु (नस) इनके स्वामी हैं।।२०।। देवालयं जलं वह्नी क्रीडादीनां तथैव च। कोशशय्या ह्युत्कराणामीशाः सूर्यादयः क्रमात्।।२१।। एवं सूर्य आदि ग्रहों के क्रम से देवालय, जलाशय, अग्निस्थान, क्रीडास्थान, कोश (खजाना), शय्यास्थान, ऊसरभूमि ये स्थान हैं।।२१।। अयनक्षणवासर्तुमासपक्षसमा - द्विज ! । सूर्यादीनां क्रमाज्ज्ञेया निर्विशङ्कं द्विजोत्तम । २२ ।। सूर्य आदि ग्रह क्रम से अयन, क्षण (मुहूर्त), वासर (दिन), ऋतु, मास, पक्ष, वर्ष के स्वामी हैं।।२२।।

३० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कटुलवणतिक्तमिश्रमधुरोकषायकाः । क्रमेण सर्वे विज्ञेया सूर्यादीनां द्विजोत्तम ।।२३।। सूर्य आदि ग्रहों के क्रम से कटु, लवण, तीता मिश्रित, मधुर, खट्टा, और कसैला ये रस हैं।।२३।। बुधेज्यौ बलिनौ पूर्वे रविभौमौ च दक्षिणे। वारुणे सूर्यपुत्रश्च सितचन्द्रौ तथोत्तरे ।।२४।। बुध-गुरु पूर्वदिशा (लग्न में) में, सूर्य-भौम दक्षिण दिशा (दशम) में, शनि पश्चिम (सप्तम) में, शुक्र-चन्द्रमा उत्तर (चतुर्थ) में बली होते हैं।।२४।। निशायां बलिनश्चन्द्रकुजसौरा भवन्ति हि । सर्वदा ज्ञो बली ज्ञेयो दिनशेषा द्विजोत्तम ।।२५।। चन्द्रमा, भौम, शनि ये रात में बली, बुध दिन-रात्रि दोनों में और शेष सूर्य, गुरु, शुक्र दिन में बली होते हैं।।२५।। कृष्णे च बलिनः क्रूराः सौम्याः वीर्ययुताः सिते। सौम्यायने सौम्यखेटो बली याम्यायनेऽपरः ।।२६।। कृष्णपक्ष में पापग्रह और शुक्लपक्ष में शुभग्रह बली होते हैं। उत्तरायण में शुभग्रह और दक्षिणायन में पापग्रह बली होते हैं।।२६।। स्वदिवससमहोरामासपैः कालवीर्यकम् । शकुवुगुशुचराद्या वृद्धितो वीर्यवन्तराः ।।२७।। जो ग्रह जिस दिन का, वर्ष का, होरा का और मास का स्वामी होता है वह अपने दिन, वर्ष, होरा, मास में बली होता है। शनि, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, चंद्र और सूर्य यथोत्तर बली होते हैं। अर्थात् शनि से भौम, भौम से बुध, बुध से गुरु, गुरु से शुक्र, शुक्र से चन्द्रमा और चन्द्र से सूर्य बली होता है।।२७।। स्थूलान् जनयति सूर्यो दुर्भगान् सूर्यपुत्रकः । क्षीरोपेतांस्तथा चन्द्रः कण्टकाद्यान्धरासुतः ।।२८।। स्थूल वृक्षों का कारक सूर्य है, दुष्ट वृक्षों का कारक शनि, दूधवाले वृक्षों का चन्द्रमा, काँटेवाले वृक्षों का भौम है।।२८।। गुरुज्ञौ सफलान्विप्र पुष्पवृक्षान्भृगोः सुतः । नीरसान्सूर्यपुत्रश्च एवं ज्ञेया खगाः द्विज ।।२९।।

ग्रहस्वरूपाध्यायः ३१ फूलवाले वृक्षों का गुरु-बुध, फूल के वृक्षों का शुक्र और नीरस वृक्षों का शनि कारक है।।२९।। राहुश्चाण्डालजातिश्च केतुर्जात्यन्तरस्तथा। शिखिस्वर्भानुमन्दानां वल्मीकस्थानमुच्यते।।३०।। राहु की चांडाल जाति और केतु वर्णशंकर जाति का है। केतु, राहु और शनि का वल्मीक (विमौट) स्थान है।।३०।। चित्रकन्था फणीन्द्रस्य केतोश्छिद्रयुतो द्विज। सीसं राहोर्नीलमणिः केतोर्ज्ञेयो द्विजोत्तम।।३१।। अनेक रंग के कपड़ों से कथरी (गुदरी) राहु का और केतु का छेदों से युक्त वस्त्र है। राहु का शीशा और केतु का नीलमणि धातु है।।३१।। गुरोः पीताम्बरं विप्र! भृगोः क्षौमं तथैव च। रक्तक्षौमं भास्करस्य इन्दोः क्षौमं सितं द्विज ! ।।३२।। गुरु का पीताम्बर, शुक्र का रेशमी वस्त्र, सूर्य का लाल रंग का, चन्द्रमा का श्वेत रेशमी वस्त्र है।।३२।। बुधस्य तु कृष्णक्षौमं रक्तवस्त्रं कुजस्य च। वस्त्रं चित्रं शनेर्विप्र! पट्टवस्त्रं तथैव च।।३३।। बुध का काले रंग का, भौम का लाल रंग का वस्त्र और शनि का चित्रवर्ण पट्टवस्त्र है।।३३।। भृगोर्ऋतुवसन्तश्च कुजभान्वोश्च ग्रीष्मकः। चन्द्रस्य वर्षा विज्ञेया शरच्चैव तथा विदः।।३४।। शुक्र की वसन्तऋतु, भौम और रवि की ग्रीष्मऋतु, चन्द्रमा की वर्षाऋतु, बुध की शरदऋतु है।।३४।। हेमन्तोऽपि गुरोर्ज्ञेयः शनेस्तु शिशिरो द्विज ! । अष्टौ मासाश्च स्वर्भानोः केतोर्मासत्रयं द्विज ! ।।३५।। गुरु की हेमन्त ऋतु और शनि की शिशिर ऋतु है। राहु का ८ मास और केतु का ३ मास है।।३५।। राह्वारपङ्गुचन्द्राश्चं विज्ञेया धातुखेचराः। मूलग्रहौ सूर्यशुक्रौ अपरा जीवसंज्ञकाः।।३६।। राहु, भौम और चन्द्रमा धातु के स्वामी, सूर्य-शुक्र मूल के स्वामी और शेष बुध, गुरु, केतु जीव के स्वामी हैं।।३६।।

३२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ग्रहेषु मन्दो वृद्धोऽस्ति आयुर्वृद्धिप्रदायकः । नैसर्गिके बहुसमान्ददाति द्विजसत्तम ।।३७।। सभी ग्रहों में शनि वृद्ध (निर्बल) है, किन्तु निसर्ग आयु साधन करने में बहुत वर्ष को देता है।।३७।। अथ ग्रहाणामुच्चनीचमाह- अजो वृषो मृगः कन्या कुलीरंझषतौलिकाः । सूर्यादीनां क्रमादेतास्तुङ्गसंज्ञाः प्रकीर्तिताः ।।३८।। दिग्गुणाष्टयमा भागा तिथिभूतर्क्षनखासमा । स्वोच्चात्सप्तमं नीचं पूर्वोक्तांशैः प्रकीर्तितम् ।।३९।। मेष, वृष, मकर, कन्या, कर्क, मीन, तुला राशियों में १०, ३, २८, १५, ५, २७ अंश सूर्यादि ग्रहों के उच्च होते हैं और अपनी उच्च राशि से सातवीं राशि में उतने ही अंश तक नीच होते हैं।।३८-३९।। स्पष्टार्थ चक्र

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रहाः
मे. १०वृ. ३म. २८क. १५क. ५मी. २७तु. २०उच्चराशयः अंशाः
तु. १०क. ३क. २८मी. १५म. ५क. २७मे. २०नीचराशयः अंशाः

अथ ग्रहाणां मूलत्रिकोणमाह- विंशतिरंशाः सिंहे कोणमपरे स्वभवनमर्कस्य । उच्चं भागत्रितयं वृषमिन्दोः शेषांशास्युस्त्रिकोणकाः ।।४०।। सूर्य का सिंह राशि में २० अंश तक मूलत्रिकोण है, शेष १० अंश स्वराशि है। चन्द्रमा का वृष राशि के आरम्भ से ३ अंश तक उच्च है, इसके बाद के अंश मूलत्रिकोण हैं।।४०।। द्वादशभागा मेषे त्रिकोणमपरे स्वभं तु भौमस्य । उच्चफलं च कन्यायां बुधस्य तिथ्यंशकैः सदा भवेत् ।।४१।। भौम का मेष राशि में १२ अंश तथा मूलत्रिकोण है, शेष अंश स्वराशि है। बुध का कन्या राशि में १५ अंश तक उच्च, इसके बाद ५ अंश तक मूलत्रिकोण और शेष अंश स्वराशि है।।४१।।

१. सृष्टि-क्रम, ग्रह-स्वरूप, राशि-लक्षण, षोडशवर्ग एवं वर्ण-गुण विचार

ग्रहस्वरूपाध्यायः ३३ ततस्त्रिकोणजाते पंचभिरंशैः स्वराशिजं परतः। दशभिर्भागैर्जीवस्य त्रिकोणफलं स्वयं परं चापे।।४२।। गुरु का धन राशि में १० अंश तक मूलत्रिकोण तथा शेष अंश स्वराशि है।।४२।। शुक्रस्य तु तिथयोऽशास्त्रिकोणभपरे तुले स्वराशिश्च। शनेः कुम्भे नखांशास्त्रिकोणं परतस्तु स्वराशिजं ज्ञेयम् ।।४३।। तुला राशि में १५ अंश तक शुक्र का मूलत्रिकोण और शेष अंश स्वराशि है। कुम्भ राशि में २० अंश तक शनि का मूलत्रिकोण हैं तथा शेष अंश स्वराशि है।।४३।। अथ ग्रहाणां नैसर्गिकमित्रामित्रत्वमाह- रवेः समो ज्ञः सितसूर्यपुत्रावरी परे ये सुहृदो भवन्ति । चन्द्रस्य नारी रविचन्द्रपुत्रौ स्मृतास्तु शेषग्रहाः समाः ।।४४।। सूर्य के बुध सम, शुक्र-शनि शत्रु और शेष चन्द्रमा, भौम, गुरु मित्र हैं। चन्द्रमा के कोई शत्रु नहीं हैं, सूर्य-बुध मित्र हैं और शेष ग्रह सम हैं।।४४।। समौ सितार्की शशिजश्च शत्रुर्मित्राणि शेषाः पृथिवीसुतस्य। शत्रुः शशी सूर्यसितौ च मित्रे समापरे स्युः शशिनन्दनस्य ।।४५ ।। भौम के शुक्र-शनि सम हैं, बुध, शुक्र और शेष ग्रह मित्र हैं। बुध के चन्द्रमा शत्रु, सूर्य-शुक्र मित्र और शेष ग्रह सम हैं।।४५।। गुरोर्ज्ञसृशुकौ रिपुसंज्ञकौ तु शनिः समोऽन्ये सुहृदो भवन्ति। शुक्रस्य मित्रे बुधसूर्यपुत्रौ समौ कुजार्यावितरावरीतौ ।।४६ ।। गुरु के बुध-शुक्र शत्रु, शनि सम और शेष ग्रह मित्र हैं। शुक्र के बुध, शनि भित्र, भौम-गुरु सम और शेष ग्रह शत्रु हैं।।४६।। शनेः समो वाक्पतिरिन्दुसूनु शुक्रौ च मित्रे रिपवः परेऽपि। ध्रुवं ग्रहाणां चतुराननेन शत्रुत्वमित्रत्वसमत्वमुक्तम् ।।४७।। शनि के गुरु सम, बुध-शुक्र मित्र और शेष ग्रह शत्रु हैं। इस प्रकार से ब्रह्माजी ने ग्रहों के मित्र, सम, शत्रु को कहा है।।४७।। अथ तात्कालिकमित्रशत्रुत्वमाह- दशायबन्धुसहजस्वान्त्यस्थास्ते परस्परम्। तत्काले सुहृदो ज्ञेयः शेषस्थाने त्वमित्रकम् ।।४८।।

३४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् जो ग्रह जिस ग्रह से १०।११।४।३।२।१२ वें स्थान में होता है वह ग्रह उस ग्रह का तात्कालिक मित्र होता है, शेष स्थानों में शत्रु होता है ।।४८।। अथ पञ्चधा मैत्रीमाह— तात्कालिके निसर्गे च मित्रत्वे त्वधिमित्रकम्। द्वयोर्मित्रसमत्वे च मित्रं शत्रुः शत्रुसमत्वके ।।४९।। जो ग्रह जिस ग्रह का तात्कालिक और निसर्ग में मित्र होता है वह उस ग्रह का अधिमित्र होता है। तत्काल में मित्र और निसर्ग में सम हो तो वह मित्र होता है। तात्कालिक शत्रु और नैसर्गिक सम हो तो शत्रु होता है।।४९।। समौ तु शत्रुमित्रत्वे शत्रुशत्रौ त्वधिशत्रुकम्। एवं पञ्चप्रकाराः स्युः ग्रहाणां मित्रता बुधैः ।।५०।। नैसर्गिक मित्र और तात्कालिक शत्रु या नैसर्गिक शत्रु और तात्कालिक मित्र हो तो सम होता है। तात्कालिक शत्रु और नैसर्गिक सम हो तो शत्रु होता है और तात्कालिक शत्रु और नैसर्गिक शत्रु हो तो अधिशत्रु होता है। इस प्रकार ग्रहों की पाँच प्रकार की मैत्री होती है ।।५०।। उदाहरण नैसर्गिकमैत्रीचक्रम्

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रहाः
चं. <br> मं. <br> बृ.सू. <br> बु.सू. <br> चं. <br> बृ.सू. <br> शु.सू. <br> चं. <br> मं.बु. <br> श.बु. <br> शु.मित्राणि
बु.मं. <br> बृ. <br> शु. <br> श.शु. <br> श.चं. <br> बृ. <br> श.श.मं. <br> बृ.बृ.समाः
शु. <br> श.बु.चं.बु. <br> शु.सू. <br> चं.सू. <br> चं. <br> मं.शत्रवः

जन्माङ्गम्

  • लग्न (१०): रिक्त
  • द्वितीय भाव (११): मं.
  • तृतीय भाव (१२): रिक्त
  • चतुर्थ भाव (१): रिक्त
  • पञ्चम भाव (२): के.
  • षष्ठ भाव (३): शु., चं.
  • सप्तम भाव (४): सू.
  • अष्टम भाव (५): बु., बृ.
  • नवम भाव (६): रिक्त
  • दशम भाव (७): रिक्त
  • एकादश भाव (८): श., रा.
  • द्वादश भाव (९): रिक्त

ग्रहस्वरूपाध्यायः ३५ अथ तात्कालिकमैत्रीचक्रम्

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रहाः
चं. बु.<br>बृ. शु.सू. बु.<br>बृ. शु.श.सू. चं.<br>बृ. शु.<br>श.सू. चं.<br>बु. शु.<br>श.सू. चं.<br>बु. बृ.मं. बु.<br>बृ.मित्राणि
मं. श.मं. श.सू. चं.<br>बु. बृ.<br>शु.मं.मं.मं. श.सू. चं.<br>शु.शत्रवः

अथ पञ्चधा मैत्रीचक्रम्

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रहाः
चं. बृ.सू. बु.सू. शु.सू. चं.बु.बु.अधिमित्राणि
बु.बृ. शु.चं. बृ.<br>श.श.मं. बृ.बृ.मित्राणि
मं. गु.सू. चं.<br>बृ. श.मं.मं. बु.<br>शु.सू. चं.<br>श.मं. शु.समाः
मं.शु.शत्रवः
श.श.बु.सू. चं.अधिशत्रवः

अथ ग्रहाणामुच्चादिबलमाह— स्वोच्चे शुभं बलं पूर्ण त्रिकोणे पादवर्जितम्। स्वर्क्षे दलं मित्रगेहे पादमात्रं प्रकीर्त्तितम्॥५१॥ यदि ग्रह अपनी उच्च राशि में हो तो सम्पूर्ण शुभ बल, अपने मूलत्रिकोण राशि में हो तो ३ चरण, अपनी राशि में हो तो आधा बल, मित्र की राशि में हो तो १ चरण है॥५१॥ पादार्धं समभे प्रोक्तं व्यर्थं नीचास्तशत्रुभे। तद्वद्दुष्टबलं ब्रूयाद् व्यत्ययेन विचक्षणः॥५२॥ सम की राशि में हों तो आधा बल प्राप्त करता है। नीच अस्त और शत्रु की राशि में हो तो शून्य बल पाता है। इसके विपरीत शेष अशुभ बल पाता है॥५२॥

.३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् अथ बलचक्रम् | उच्च | मूलत्रिकोण | स्वर्क्षं | मित्र क्षेत्र | सम | नीच अस्त | शत्रु | | १ | ० | ० | .० | ७ | ० | ० | | ० | ४५ | ३० | १५ | ३० | ० | ० | अथ धूमाद्यप्रकाशग्रहानयनमाह- सदा चतुर्भिः विश्वांशैः नखलिप्ताधिको रविः। धूमो नाम महादोषः सर्वकर्मविनाशकः।।५३।। सूर्य में ४ राशि १३ अंश २० कला जोड़ देने से धूम नाम का महादोष होता है, जो कि सभी कार्यों का विनाशक होता है।।५३।। धूमो मण्डलतः शुद्धो व्यतीपातोऽत्र दोषदः। सषड्भेऽत्र व्यतीपाते परिवेषस्तु दोषदः।।५४।। धूम को १२ राशि में घटा देने से 'शेष व्यतीपात नाम का दोष होता है। व्यतीपात में ६ राशि जोड़ देने से परिवेष नाम का दोष होता है।।५४।। परिवेषश्युतश्चक्रादिन्द्रचापस्तु दोषदः। त्र्यंशोनात्यष्ट्यंशा युतश्चापः केतुग्रहो भवेत्।।५५।। परिवेष को १२ राशि में घटाने से इन्द्रचाप नामक दोष होता है। १७ अंश में अंश का तृतीयांश १० कला घटाने से शेष १६°।४०' इन्द्रचाप में जोड़ने से केतु नाम का दोष होता है।।५५।। एकराशियुते केतौ सूर्यः स्यात्पूर्ववत्समः। अप्रकाशग्रहाश्चैते दोषाः पापग्रहाः स्मृताः।।५६।। केतु में १ राशि जोड़ देने से पूर्वोक्त सूर्य के तुल्य हो जाता है। यही अप्रकाशग्रह हैं, जो कि दोषरूप पापग्रह हैं।।५६।। उदाहरण-स्पष्ट सूर्य ३।१०।२६।२९ इसमें ४ राशि १३ अंश २० कला जोड़ने से ८।१।४६।२० धूम ग्रह हुआ। इसको १२ राशि में घटाने से ३।२८।१३।४० यह व्यतीपात ग्रह हुआ। इसमें ६ राशि जोड़ने से ९।२८।१३।४० यह परिवेष ग्रह हुआ। इसे १२ राशि में घटाने से २।१।४६।२० यह इन्द्रचाप हुआ। इसमें १६ अंश. ४० कला जोड़ने से २।१८।२६।२० यह केतु ग्रह हुआ। इसमें १ राशि जोड़ने से पूर्वोक्त सूर्य के तुल्य ३।१८।२६।२० हुआ।

भान्विन्दुलग्नगेष्वेषु वंशा‌युर्ज्ञाननाशनम्। एषां बह्वर्कदोषाणां स्थितिः पद्मासनोदिताः ॥५७॥ पूर्वोक्त धूम आदि अप्रकाश ग्रह यदि सूर्य-चन्द्र लग्न से युक्त हों तो क्रम से वंश, आयु और ज्ञान का नाश करते हैं। इस प्रकार दोषकारक अप्रकाश ग्रहों की स्थिति ब्रह्मा ने कही है ॥५७॥ इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां ग्रहस्वरूपाध्यायस्तृतीयः ॥३॥ अथ लग्नाध्यायः ॥४॥ तत्रादौ गुलिकादिकालज्ञानमाह— रविवारादिशन्त्यन्तं गुलिकादि निरूप्यते। दिवसानष्टधा कृत्वा वारेशाद्गणयेत्क्रमात् ॥१॥ रवि से शनि पर्यन्त वारों में गुलिक आदि का निरूपण कर रहे हैं। (जिस दिन इनका विचार करना हो उस दिन के) दिनमान में आठ का भाग देने से जो लब्ध हो उतना ही एक खंड का मान होता है; वारेश से (जिस दिन विचार कर रहे हों उस वार से खंडों के अनुसार अपने इष्टकाल तक) गिन

३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् भाग देने से ४।६।१५ यह लब्धि हुई। यहाँ वारेश शनि से गणना करने से प्रथम खंड ही गुलिक हुआ। इसी को इष्टकाल मानकर सूर्य को स्पष्ट कर लग्न लाने से गुलिक लग्न ४।९।२६।२५ हुआ। अथ गुलिकध्रुवाङ्कचक्रम्

रविचन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनिवाराः
दिवा
रात्रौ

अथ प्राणपदसाधनम्— घटी चतुर्गुणा कार्या तिथ्याप्तैश्च पलैर्युताः। दिनकरेणापहतं शेषं प्राणपदं स्मृतम्॥५॥ यहाँ प्राणपद साधन के दो प्रकार दिये हैं- (१) इष्टकाल के घटी को ४ से गुणा कर एक जगह रख देवें। पलों में १५ का भाग देकर लब्धि को चतुर्गुणित इष्ट घटी में जोडकर योगफल में १२ का भाग देने से जो शेष बचे, वह प्राणपद की राशि होती है॥५॥ शेषात्पलान्ताद्द्विगुणी विधाय राश्यंशसूर्यर्क्षनियोजिताच्च । तत्रापि तद्राशिवशान् क्रमेण लग्नांशप्राणांशपदैक्यता स्यात् ।।६।। शेष बचे हुए पलों को दूना करने से अंश होता है। इस प्रकार से राशि और अंश मध्यम प्राणपद के होते हैं।।६।। अथच—स्वेष्टकालं पलीकृत्य तिथ्याप्तं भादिकं च यत् ।।७।। चरागद्विभके भानौ योज्यं स्वे नवमे सुते ।।७।। स्फुटं प्राणपदं तस्मात् पूर्ववच्छोधयेत्तनुम् ।।७।। इसमें सूर्य की राशि चर-स्थिर-द्विस्वभाव के अनुसार सूर्य की राशि अंश, सूर्य की राशि से नवीं राशि और अंश तथा सूर्य की राशि से पाँचवीं राशि और अंश को जोड़ देने से राश्यादि स्पष्ट प्राणपद होता है। ऐसा करने से यदि जन्मलग्न का अंश और प्राणपद का अंश बराबर हो तो इष्टकाल शुद्ध होता है। (२) इष्टकाल को पलात्मक बनाकर उसमें १५ का भाग देकर लब्धि राशि और अंश लाकर उसमें ऊपर कहे हुए अनुसार सूर्य की राशि के अनुसार राशि-अंश जोड़ने से स्पष्ट राश्यादि प्राणपद होता है। इससे जन्म-